प्रश्नोपनिषद् — पृष्ठ 241–250
प्रश्नोपनिषद् · पृष्ठ 241–250
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पश्चिम प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य अव्यक्तप्राणनिरूपण ६- चत्वारिंशस्तोम — ( २४ ) ७- चतुश्चत्वारिंशस्तोम - ( ४४ ) → छन्दोमास्तोम नाम से प्रसिद्ध – ' युग्मस्तोम ' ८- अष्टाचत्वारिश स्तोम ( ४८ ) पृष्ठयस्तोम में उद्गीथरूप १७ व स्तोम और मान लिया जाता है तो ६ पृष्ठययस्तोम हो जाते है । इसी से ' षडह ' यज्ञ का स्वरूप बनता है - इसी को ' पृष्ठ्य षडह ' कहा जाता है । इन स्तोमों के हिसाब से ' त्रिवृत् ' तक पहला पार्थिवस्तर है । पञ्चदश तक आपोरूप प्राणस्तर है । एकविंश तक द्यौस्तर है | २७ तक भास्वरसोमस्तर है । ३३ तक दिक्सोमस्तर है । दोनों को मिलाकर एक अप्स्तर है । ४८ तक यही वेदस्तर है— ( अष्टाचत्वारिंशत् वेद: - | चतुश्चत्वारिंशत् चत्वारिंशत् -वेदः -ब्रह्मपृष्ठ ४ आकाशः आप: -' त्रयस्त्रिशः- दिक्सोम त्रिणवः- भास्वरसोमः द्यौ: - [ एकविशः- आदित्यः] -आपः वायुः → बहिःपृष्ठ ३ अग्निः गौ- [ पञ्चदश वायुः - चितेनिधेयाग्निः जलम् त्रिवृदग्निः पृथिवी वाक्- | पिण्डपृथिवी ] - चित्याग्निः ] - अन्तःपृष्ठ २ हृदयम् ] J - हृत्पृष्ठ १ वाक् प्रपञ्च १ - हिकार, पूर्वप्रतिपादित स्तोमरूप साम के सात ( ७ ) अवयव माने जाते हैं । वे सातों से अवयव प्रसिद्ध हैं । जहाँ से २- प्रस्ताव, ३ - आदि, ४- उद्गीथ, ५ - प्रतिहार, ६ - उपद्रव, ७- निधन- इन नामों है, अतएव इसे साम के वस्तुस्वरूप प्रारम्भ होता है वहाँ हिंकार है । हिंकार वस्तु के बाहर की वस्तु के साम नहीं हो सकता, बाहर निकाल दिया जाता है । परन्तु इतना अवश्य है कि विना हिंकार उसकी प्रतिष्ठारूपा - ' हाँ हाँ-अतएव - ' हिंकृत्वा साम गीयते ' यह कहा जाता है । गवय्या संगीत से पहले स्थिति शब्दब्रह्म आ आ ' किया करता है । यही हिंकार है । इसके बाद गान चलता है । जैसी [ २२७ ]
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पश्चम प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञान भाष्य अव्यक्तप्राणनिरूपण स्वरूप साम में है - वैसी ही स्थिति श्रर्थब्रह्मरूप साम में है एवं वस्तु का जो उपक्रम है उसे ' प्रस्ताव ' कहते हैं । इसके बाद शादि है । केन्द्रस्थान उद्गीथ है । आगे - प्रतिहार - उपद्रव हैं । समाप्तिबिन्दु निधनसाम है | यही ' उदृच ' नाम से प्रसिद्ध है । हमारे पञ्चलोकात्मक पृथिवीलोक का साम पृथिवी पिण्ड से शुरू होता है, अतएव हम इसे ' हिकार ' कह सकते हैं । त्रिवृत्स्थान प्रस्ताव है । पञ्चदश आदि है | एकविंश उद्गीथ है । यह केन्द्र में पड़ता है । त्रिणव प्रतिहार है । त्रयस्त्रिश उपद्रव है । अष्टाचत्वारिंशत् निधन है । इस प्रकार इन पाँच लोकों में सात साम विभक्त हो जाते हैं । इसी अभिप्राय से- ' लोकेषु सप्तविधं सामोपासीत ' यह कहा जाता है । वेदः छन्दोमाः दिक्सोमः त्रयस्त्रिशः भास्वरसोमः त्रिणवः आदित्यः एक विशः - निधनम् - ७ समाप्तिबिन्दु ) = ब्रह्मपृष्ठम् + वेदमयम् -१ - उपद्रवः -६ - प्रतिहारः - ५ - उद्गीथः -४ ' वस्तु का केन्द्र ' ( महिमा - केन्द्रः ) ( → बहिः पृष्ठम् -२ वायुः पञ्चदशः - आदिः -३ अग्निः त्रिवृत् - प्रस्तावः - २ वस्तु की उपक्रम बिन्दु ) चित्याग्निः -पिण्डपृथिवी - हिकारः - १ वस्तु के बाहर का उपक्रमस्थान | + अन्तः पृष्ठम् - ३ ( पिण्डकेन्द्र ) > हृत्पृष्ठम् - ४ पूर्व के निरूपण से यह भलीभाँति सिद्ध हो जाता है कि पृथिवी में सारे ब्रह्मसत्य का भोग हो रहा है । स्वयम्भू - परमेष्ठि - सूर्य्य - चन्द्र- पृथिवी - पाँचों की समष्टि पृथिवी है । पाँचों की समष्टि ही परम ओंकार है । यह ओंकार- उसी षोडशी पुरुष पर प्रतिष्ठित है । आदित्य से नीचे पृथिवी का मर्त्यभाग है । आदित्य से ऊपर अमृतभाग है । आदित्य अमृत मत्यं का समुच्चय है । इन तीनों विभागों का अध्यक्ष वही षोडशी है । षोडशी की अपेक्षा ये तीनों ही भाग मर्त्य हैं । आादित्य से नीचे का सारा प्रपञ्च- ' म् ' है । प्रतिस्थूल है । ऊपर का सारा प्रपञ्च ' अ ' है । सूक्ष्म है । मध्य का श्रादित्य ' उ ' है । यह स्थूल सूक्ष्म है । तीनों मृत्युमात्राएँ - उसी श्रमृतरूप श्रर्द्धमात्रा नाम से प्रसिद्ध प्रमात्र षोडशी पुरुष पर प्रतिष्ठित हैं । यही महा ओंकार है - इसी को ' प्रणवोङ्कार ' कहते हैं । ' नु स्तुतौ ' से प्रणव बनता है । इस श्रोम का उपक्रम पृथिवी है । वही प्रस्तावसाम है । वही प्रणव है । ४८ वीं बिन्दु निधन है । चूंकि इस ओंकार का उपक्रम पृथिवीरूप प्रस्तावसाम है, अतएव हम इसे- ' प्रणव ' ओंकार कह सकते हैं । इसके पेट में पाँचों लोक या जाते हैं । यही ईश्वर है । इसका वाचक यही ओंकार है— [ २२८ ]
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पवम प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य षोडशी प्रजापतिः स्वयम्भू [ वेद अमृतात्मा अर्द्धमात्रा निधन दिक्सोम उपद्रव → द्यौः ' अ ' ' ओम् ' सूक्ष्म परमेष्ठी भास्वरसोम प्रतिहार सूय्यं | आदित्य उद्गीथ → अन्तरिक्षम् ' उ ' ' प्रो ' स्थूलसूक्ष्म चन्द्रमा | वायु आदि > पृथिवी ' म् ' स्थूल अग्नि प्रस्ताव पृथिवी अव्यक्तप्राणनिरूपण ' ओंकारः परम प्रसिद्धः प्रणवनाम्ना ' ’ ‘ ईश्वरः चित्यग्निपिण्ड हिकार आगे आने वाले ' मुण्डकोपनिषत् ' के ' दिव्यो ह्यमूर्त्तः पुरुषः- इसमें द्यावापृथिवी का निरूपण किया गया है । भूः भुवः स्वः ' - तीनों स्थूल, स्थूलसूक्ष्म, सूक्ष्म अवस्थाओं के वाचक हैं- यह बतलाया जा चुका है, अतः विश्व के तीन विभागों के साथ पृथिवी अन्तरिक्ष- द्यौः नाम देखकर कोई आपत्ति नहीं करनी चाहिए । इस परम प्रकार की तीनों मात्राओं का यदि अमृतात्मा ( षोडशी प्रजापति ) की दृष्टि से विचार किया जाता है तब तो तीनों मर्त्यभावापन्न हो जाती हैं । क्योंकि तीनों ही क्षररूप हैं । परन्तु अमृतात्मा को छोड़कर केवल इन्हीं का विचार किया जाए तो इनमें भी मर्त्यामृत दो विभाग हो जाते हैं । आदित्य से ऊपर अमृत है । नीचे मर्त्य है । अमृत नाम से प्रसिद्ध परार्ध्य भाग का उपक्रम उद्गीथ-स्थानीय आदित्य है एवं मर्त्य नाम से प्रसिद्ध अवरार्ध्य का उपक्रम पृथिवी है । इन दो भेदों के कारण उस परम श्रोंकार की महिमा में दो अवान्तर श्रोंकार और हो जाते हैं । वे ही दोनों - उद्गीथों-कार एवं प्रणव प्रोंकार नाम से प्रसिद्ध हैं । पहले प्रणव प्रोंकार को ही लीजिए । पृथिवी ' म् ' है । अन्तरिक्ष ' उ ' है । आदित्यरूप द्यौ ' अ ' है एवं ब्रह्मसत्य का सूर्य्यभाग अर्द्धमात्रा है । वह सूर्य्य परअव्यय षोडशीयुत है । पृथिवी से यह ' ओम् ' चलता है, अतएव पूर्वपरिभाषानुसार मर्त्योपक्रम-स्थानीय इस प्रकार को हम ' प्रणव ' कहने के लिए तय्यार हैं ॥ २२६ ]
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पश्चम प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञान माध्य अव्यक्त महान् पुरुषर्गामत सूर्य्य ( अमृतसेतुरूप ) अर्द्धमात्रा सूर्य-द्यौ | श्रादित्यः द्यौः - ' अ ' ' ओम् ' सूक्ष्म अन्तरिक्ष- वायुः ] → श्रन्तरिक्षम् –'उ ' ' थ्रो ' स्थूलसूक्ष्म त्रिवृदग्निः पृथिवी-- पृथिवी —'म् ' ' म् ’ स्थूल चित्याग्निपिण्डः अव्यक्तप्राणनिरूपण ' ओंकारः प्ररणवः मत्यपक्रमस्थानीयः ' अब सूर्य को उद्गीथ समझिए । उत् - गी - थ ' ही उद्गीथ है ' उत् ' ऊपर, ' गी ' जाओ, ' थ ' ठहरो । सूर्य्यं उत्तर कहलाता है । पृथिवी दक्षिण कहलाती है । वह उत्तर है - यह श्रवाची है । उत्तर शब्द का अर्थ है - ऊपर । अवाची का अर्थ है - नीचे । ऊपर जाओ और वहाँ ठहरो । उसको ( सूर्य्यं को ) लक्ष्य बनाओ । वह तुम्हारा ' उद्गीथ ' है । यह अमृतमण्डल का उपक्रम है । यह पहली मात्रा है । परमेष्ठी श्रव्यक्तरूप दोनों सोम दूसरी मात्रा हैं । अव्यक्तरूप वेद तीसरी मात्रा है । तीनों का आधार वही षोडशी है । यही अमृतोपक्रमरूप दूसरा उद्गीथ प्रोंकार है— पुरुष [ षोडशी प्रजापति स्वयम्भू वेदः ( दिक्सोम परमेष्ठी | भास्वरसोम अर्द्धमात्रा 7a7: ' अ ' ' ओम् ' + • अन्तरिक्षम् ' उ ' ' ओ ' ' म् ' ' म् ' सूय्यं [ सूर्य्यं ( आदित्य ) ] → पृथिवी ' अमृतोपक्रमस्थानीयोद्गीथोंकार ' अमृत, ब्रह्म, शुक्र - तीन सृष्टियोनिएँ हैं । इनमें अमृत आत्मयोनि है । यही पुरुष योनि है । आत्मा शब्द जहाँ देखो वहाँ इस अमृत ( षोडशी ) का सम्बन्ध समझो । ब्रह्म प्राणयोनि है यही प्रकृति है । जहाँ प्राण शब्द देखो वहीं इस प्राण का सम्बन्ध समझो । शुक्र पशुयोनि है - यही विकृति है । जहाँ पशुशब्द देखो, वहीं शुक्र का सम्बन्ध समभो । तीनों की समष्टि को एक अश्वत्थ प्रजापति समझो । यही श्रोंकार है । यही परापर ब्रह्म है । षोडशी आत्मा अमृत है । स्वयम्भू, परमेष्ठी, सूय्यं, चन्द्र, पृथिवी - ये पाँचों ब्रह्म हैं । इनमें रहने वाला भूतप्रपञ्च शुक्र है । वह उक्थ है - मध्य का अर्क है । अन्त की प्रशिति है । वह आत्मा है । मध्य का प्राण है की । अन्त का पशु है, वह पुरुष । मध्य प्रकृति है । अन्त की विकृति है । सर्वोपरि विकृति है तदन्तर्गत प्रकृति है । सर्वान्तरतम गूढोत्मा पुरुष है, अतएव उसके लिए— [ २३० ]
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पश्चिम प्रश्न 12 प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य " एष सर्वेषु भूतेषु गूढोत्मा न प्रकाशते । दृश्यते त्वग्र्यया बुद्ध्या सूक्ष्मया सूक्ष्मदर्शिभिः ” । ' अव्यक्तप्राणनिरूपण — यह कहा जाता है । विकृति प्रकृति एक है - पुरुष एक है । वह पुरुष विकृतिमय प्रकृति में अन्तर्निगूढ है । प्रकृति मध्य में है । ऊपर पुरुष है । नीचे विकृति है, अतएव ब्रह्मसत्यरूप प्रकृति से दोनों का ग्रहण हो जाता है यही ' सर्वम् ' है । इससे अतिरिक्त कुछ नहीं है । इस ब्रह्म के ( विकृति पुरुषविशिष्ट ब्रह्म के ) पर और अपर दो भेद हैं । अमृतसूर्य्य, परमेष्ठी स्वयम्भू परब्रह्म है । यह अमृतरूप है । मर्त्य सूर्य, चन्द्रमा पृथिवी - यह अपरब्रह्म है । यही मर्त्यब्रह्म है । पृथिवी वाक् है । चन्द्रमा वाक्प्राण है । सूर्य्यं मनः प्राणवाक् है । परमेष्ठी प्राणवाक् है । स्वयम्भू वाक् है । यही परापर ब्रह्मनाम से प्रसिद्ध ओंकार है । पूर्व का विभाग केवल पार्थिव था । यह पांचों से सम्बन्ध रखता है । जो स्वरूप पञ्चकलोपेता पृथिवी का था वही इसका है । आगे लिखी तालिकाओं से सारा विषय स्पष्ट हो जाता है-१ - कठोप ० १।३।१२ । [ २३१ ]
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पवम प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य व्यक्तप्राणनिरूपण ब्रह्मापेक्षया-१-पौरुषं ब्रह्म २-प्राकृतं ब्रह्म ३-शुक्रियं ब्रह्म १ = = तद्ब्रह्म = तदेवामृतमुच्यते = षोडशी पुरुष = मात्मा = पुरुष = प्राण = तदेव शुक्रम् = पञ्चीकृत विश्वसृट् भूतभौतिकप्रपञ्च = पशु 3 ४ विकृति = प्रशिति पशु पाश ५ प्रकृति = = अर्क उक्थ पशुपति = = प्राणयोनि आत्मयोनि -ब्रह्म अमृत = पशुयोनि -शुक्र भूत पक्षया पिण्डापेक्षया प्रजापेक्षया स्तोमा : पृष्ठापेक्षया पुरुषापेक्षया ७ प्रकृत्यपेक्षया १-आकाशः वाक् ' स्वयम्भू २ ' ' वेदाः ' = ४८ ब्रह्मपृष्ठम् = वाक्पृष्ठ = प्राणपृष्ठ २-वायुः ३-तेजः – ४ जलम् ६-पृथिवी ' आप : - परमेष्ठी ' ' लोकाः ' = ३३ = पारावतपृष्ठम् = प्राणवाक्पृष्ठ = आपःपृष्ठ = ' द्यौः सूर्यः ' ' देवाः ' = २१ अग्निपृष्ठम् = मनप्राणवाक् = वाक्पृष्ठ ' अन्तरिक्ष-चन्द्रमाः ' ' भूतानि ' = वायुपृष्ठम् = प्राणवाक्पृष्ठ अन्नपृष्ठ = ' पृथिवी - पृथिवी ' ' पशवः ' = पिण्डम् १५ = वाक्पृष्ठम् = वाक्पृष्ठ ' अन्नादपृष्ठ अश्वत्थः [ २३२ ] प्रजापतिः
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पंचम प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञान माध्य अव्यक्तप्राणनिरूपण सामापेक्षया-१ - निधनसाम -वस्तु के बाहर की सीमा -वस्तु का उपसंहार २- उपद्रवसाम -- स्वयम्भूः ३ - प्रतीहारसाम • परमेष्ठी ४- उद्गीथसाम -वस्तु का केन्द्र - सूर्य्य: + ' लोकेषु सप्तविध सामोपासीत " । ५- आदिसाम - चन्द्रमा ६- प्रस्तावसाम -वस्तु का उपक्रम • पृथिवी ७- हिंकारसाम - वस्तुकेबाहर की सीमा परापरब्रह्मापेक्षया-वाक् - स्वयम्भूः वाक् -प्राण परमेष्ठी प्राणः ऋतत्वात् -मन अमृत सूर्यो मनः -- + वाक् मनःप्राणवाक् + परब्रह्म अमृतम् मन मनः प्राण अन्तरिक्षं - प्राणः ऋतत्वात्-वाक्प्राणो -अपरब्रह्म वाक् - पृथिवी -वाक् वाक् मृत्युः यदोङ्कारः ब्रह्म व चापरं परं सत्यकाम एतद्वै " - यह है- ' ओंकार ' इसकी - ' ओम् ' इस शब्दब्रह्म द्वारा उपासना करने से क्या फल होता है? यह श्वाँ प्रश्न इसी प्रश्न का समाधान करता है । सौर्यायणी गाग्यं के समाधान होने पर शैब्य नाम से प्रसिद्ध सत्यकाम प्राए और उन्होंने पिप्पलाद से प्रश्न किया कि भगवन्! मनुष्यों में जो मनुष्य यावज्जीवन मृत्युकालपर्यन्त ओंकार का ध्यान करता है, उसी की उपासना में तल्लीन रहता है- वह इस उपासनारूप प्रोंकार से किस लोक को अपने अधिकार में करने में समर्थ होता है? अर्थात् मकार की उपासना का क्या फल? जैसा कि ऋषि कहते है-[ २३३ ]
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पश्चिम प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य श्रव्यक्तप्राणनिरूपण " अथ हैनं शैब्यः सत्यकामः पप्रच्छ । स यो ह वैतद्भगवन्मनुष्येषु
प्रायणान्तमोङ्कारमभिध्यायीत । कतमं वाव स तेन लोकं जयतीति ” ॥१ ॥
11211 प्रश्न सुनकर ऋषि शैब्यसत्यकाम को कहने लगे कि सत्यकाम! यही पर और अपर ब्रह्म है-जो कि ओंकार है । ओंकार दोनों का समुच्चय है, अतएव इस परापररूप ओंकार ब्रह्म के यथार्थं स्वरूप को जानने वाला विद्वान् इन्हीं दोनों में से किसी एक आयतन से किसी एकमार्ग का श्राश्रय कर सकता है । ओंकार का स्वरूप बतलाते हुए हमने कह दिया है कि इस प्रकार के पेट में अमृतोपक्रम-स्थानीय उद्गीथोंकार एवं मर्त्योपक्रम स्थानीय प्रणवोंकार - दो श्रोंकार हैं । दोनों ही मार्ग हैं । प्रणव से चलो या उद्गीथ से चलो । प्रणव मृत्युलोक पर सत्ता करवाता है । उद्गीथ मृत्यु से अति-मुक्ति करवाता है । प्रणव का फल अपरामुक्ति है । उद्गीथ का फल समवलय नाम से प्रसिद्ध परामुक्ति हैं । ऋषि दोनों का ही निरूपण करते हैं । किसकी उपासना की जाय? इस प्रश्न का उत्तर अधिकारी की योग्यता है । साधारण अधिकारी प्रणव की उपासना करने में समर्थ होते हैं एवं असाधारण अधिकारी उद्गीथ की उपासना करने में समर्थ होते हैं । ' एकतरं अन्वेति ' का अर्थ है- ' परं अपरं वा अन्वेति । यदि प्रणव की उपासना है, तब तो अपरब्रह्म - प्राप्ति है । यदि उद्गीथ की उपासना है तो ' पर ' की प्राप्ति है । जैसा कि ऋषि कहते हैं-" तस्मै स होवाच । एतद्वै सत्यकाम परं चापरं च ब्रह्म यदोंकारस्त-स्माद्विद्वानेतेनैवायतनेनैकतरमन्वेति ॥२ ॥
|| २ || -888-अथ प्रणवोंकारस्वरूपनिरूपणं - फलादेशश्च -' स्थूलारुन्धतिन्याय ' को लक्ष्य में रखते हुए पहले पिप्पलाद अपरब्रह्मप्राप्ति के साधनभूत अपर-ब्रह्मरूप प्रणव ओङ्कार का एवं उसकी उपासना से प्राप्त फल का ही निरूपण करते हैं । पृथिवी, अन्तरिक्ष, द्यौ - तीन लोक मर्त्यलोक हैं । पृथिवी पृथिवी है । अन्तरिक्ष चान्द्रसोममय है । द्यौ मर्त्य सूर्य है । इसके ऊपर अमृतसूर्य है । पृथिवीं में अग्नि की सत्ता है । अन्तरिक्ष में वायु की सत्ता है । द्युलोक में मयंसू ( जो कि आदित्य नाम से प्रसिद्ध है ) की सत्ता है । अग्नि, वायु, आदित्य- तीनों त्रैलोक्य के अधिष्ठाता हैं । तीनों की प्रतिष्ठा क्रमशः ऋक्, यजुः साम वेद हैं । इसी अभिप्राय से तो— [ २३४ ]
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पश्चम प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य अव्यक्तप्राणनिरूपण " अग्निवायुरविभ्यस्तु त्रयं ब्रह्म सनातनम् । दुवोह यज्ञसिद्धयर्थं ऋग्यजुः सामलक्षणम् " ॥ ' -यह कहा जाता है । इस विषय का विस्तृत विवेचन ' अपरविद्यानिरूपणात्मक ' प्रथममुण्डक के द्वितीयखण्ड में देखना चाहिए । ' अ ' मन का वाचक है । ' उ ' प्रणव का वाचक है । ' म् ' वाक् का वाचक है । पूर्व में बतला दिया है कि पृथिवी केवल वाङ्मयी है । इसका देवता श्रग्नि है । वेद ऋक् है | अक्षर ' म् ' है । केवल वागुरूप होने से यह ' म् ' मात्र है । सोममय अन्तरिक्ष में वाक् - प्राण दोनों हैं । प्राण का अधिक विकास है । वाक् का अभिभव है, अतः यहाँ अरूपमन आधार बन जाता है । बस, वेद यजुः है । देवता वायु है । अक्षर ' प्रो ' है । ' द्यौ ' में ' ओम् ' तीनों हैं । क्योंकि वह मनःप्राणवाङ्मय है । तीनों लोक क्रमशः मनुष्यलोक, सोमलोक ( पितृलोक ), देवलोक नाम से प्रसिद्ध हैं । लोक तीन ही होते हैं । इसी अभिप्राय से-" त्रयो वाव लोकाः - मनुष्यलोकः, पितृलोकः, देवलोकः " ॥३ — यह कहा जाता है । यहाँ देवलोक को अपरब्रह्मसम्बन्ध से ' ब्रह्मलोक ' कहा है । देवलोक के ' ऐन्द्र, प्राजापत्य, ब्राह्म ' - तीन भेद हैं । ऐन्द्रलोक देवलोक है । यहाँ तीसरा ब्राह्मलोक प्राप्त होता है जो कि देवलोकों में अन्तिम लोक है, अतएव देवलोक न कहकर ' ब्राह्मलोक ' कहा है । बस, जो मनुष्यएक अक्षर ( म् ) का निशाना बनाकर उपासना करता है - वह मनुष्यलोक पर अधिष्ठित हो जाता है । सारे भूमण्डल पर उसका साम्राज्य हो जाता है । वह तप, ब्रह्मचर्य, श्रद्धा से संपन्न होता हुआ जीवन-पर्य्यन्त पार्थिव वैभव को भोगा करता है । यद्यपि ध्यान करता है पूरे ओंकार का, परन्तु दृष्टि है - एक ही मात्रा पर । पार्थिव कामना से यदि ओम् की उपासना की जाती है तो एक ही मात्रा का सम्बन्ध होता है - दो भाग अलग हो जाते हैं । यावज्जीवन वह यदि ऐसा करता है तो उसके प्रभाव से संवेदित ( पूर्णरूप से उस मात्रा ज्ञान से युक्त ) होता हुआ शरीर छोडने के अनन्तर इतर क्रमिक योनियों में न जाकर अतिशीघ्र इसी भूमण्डल पर जन्म लेता है । वहाँ पर आए हुए इस मनुष्य को वही एकमात्ररूप ऋभाग मनुष्यलोक में प्रतिष्ठित करता है । उसके प्रभाव से वह ब्राह्मण श्रेष्ठ बनता हुआ तप श्रादि से युक्त हो जीवनपय्यन्त पूर्ण वैभव का भोग करता है । इसी को गीता में ' योगभ्रष्ट ' कहा है । श्रोम् का योग किया, परन्तु एकमात्रा से । यही भ्रष्टता है । इसका फल --" प्राप्य पुण्यकृतां लोकानुषित्वा शाश्वतीः समाः । शुचीनां श्रीमतां गेहे योगभ्रष्टोऽभिजायते " ॥ १- मनुस्मृति १।२३ । ३ - गीता ६।४१ । २- शत ० ब्रा ० १४।४।३।२४ । [ २३५ ]
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पंचम प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्यं " अथवा योगिनामेव कुले भवति धीमताम् । एतद्धि दुर्लभतरं लोके जन्म यदीदृशम् " ॥ ' श्रव्यक्तप्राणनिरूपण - यही है । ' जगत्यां से अर्थं भूलोक है । ' मनुष्यलोक: ' से मनुष्ययोनि उसमें भी ब्राह्मण श्रभित है । क्यों? उत्तर यही ' ऋक् ' है । ऋक् वैश्वानर अग्नि से सम्बन्ध रखती है । वैश्वानर ही पुरुष पशु है । यही ब्रह्मवीर्य्यं का अधिष्ठाता है । जगती में जन्म लेता है, परन्तु पशु आदि हीन योनियों में नहीं पितु, ब्राह्मणादि उत्कृष्ट योनियों में जन्म लेता है । इसका कारण वही ' ऋक् ' है । जैसा कि ऋषि कहते हैं-" स यद्येकमात्रमभिध्यायीत स तेनैव संवेदितस्तूर्णमेव जगत्यामभि-संपद्यते । तमृचो मनुष्यलोकमुपनयन्ते स तत्र तपसा ब्रह्मचर्येण श्रद्धया सम्पन्नो महिमानमनुभवति ” ॥३ ॥
॥३ ॥
---अब यदि चन्द्रलोकरूप पितृलोक की कामना है तो दो मात्राओं के साथ मन का योग होता है । यदि दो मात्राओं से मन में युक्त होता है - ध्यान योगद्वारा यह उपासक दो मात्राओं से अपने मन से संपन्न हो जाता है तो अन्तरिक्ष का यजुः - भाग इसे सोमलोकरूप अन्तरिक्ष में ले जाता है । वहाँ उस लोक की विभूति भोगकर वह पुनः इसी लोक में आ जाता है । श्रुति के अक्षरों में बडा चमत्कार है । अक्षर थोड़े से हैं, परन्तु विषय बहुत है । एकमात्रा की उपासना करने वाले को चन्द्रलोक में रहने का अधिकार नहीं है एवं ' ओम् ' की उपासना के प्रभाव से वह नरक में भी नहीं जा सकता । वह मरते ही और किसी लोक में न जाकर अव्यवहितोत्तरकाल में ही इसी भूमण्डल पर मनुष्य योनि में आ जाता है - इसी विषय को ध्यान में रखकर - ' स तेनैव संवेदितस्तूर्णमेव जगत्यामभिसंपद्यते ' - यह कहा है । परन्तु द्विमात्रा की उपासना में यह बात नहीं है । यहाँ शरीर छोडने पर इस चन्द्रलोक में जाना पड़ता है । वहाँ का वैभव भोगना पड़ता है एवं भोग समाप्त होने के अनन्तर योगभ्रष्ट होने से पुनः इसी लोक में आना पड़ता है । पूर्वोक्त- ' प्राप्य पुण्यकृतां लोकान् उषित्वा शाश्वतीः समा ' - यह गीतावाक्य इसी द्वैमात्रिका गति से सम्बन्ध रखता है । जैसा कि ऋषि कहते हैं-" अथ यदि द्विमात्रेण मनसि संपद्यते सोऽन्तरिक्षं यजुभिरुन्नीयते स सोमलोकं स सोमलोके विभूतिमनुभूय पुनरावर्तते ” ॥४ ॥
॥ ४ ॥
-888-१- गीता ६।४२ । [ २३६ ]