प्रश्नोपनिषद् — पृष्ठ 251–260

प्रश्नोपनिषद् · पृष्ठ 251–260

पृष्ठ 251

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पश्वम प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य अध्यरात्राणनिरूपण अब यदि वह त्रिमात्र से युक्त पूर्ण ( क्षर से उस ' पर ' का ध्यान करता है तो वह: मृत्यु के अनन्तर - ' तेजः परस्यां देवतायाम् ' के अनुसार उस सूर्य्यरूप ' परतेज ' में सम्पन्न ( लीन ) होता हुना उसी प्रकार सारे पाप्मानों से विनिर्मुक्त हो जाता है कि जैसे पादोदर ( सर्प ) अपनी त्वचा ( कंचुकी नाम से प्रसिद्ध ) से विनिर्मुक्त हो जाता है । ' प्रोम् ' यह अक्षर ब्रह्म है । अक्षर अक्षर है । इसकी प्राप्ति से ' पुनरागमन सम्भव नहीं है । देवलोक से ( ऐन्द्र लोक से ) पुनरागमन सम्भव है, परन्तु ब्रह्म-लोक से ( जो कि देवलोक का अन्तिम भाग है ) पुनरागमन नहीं हो सकता । १७ से २० तक पुनरागमन है । सूर्य्य २१ पर है । यही ब्रह्मलोक है । यह साममय है । ओम् का वही सामभाग इसे इसी लोक में प्रतिष्ठित करता है, अतएव यहाँ गए बाद पुनरागमन कथमपि सम्भव नहीं है । यह एक प्रकार की अपरा मुक्ति है । सूर्य्यं हिरण्यगर्भ प्रजापति है । रोदसी ब्रह्माण्ड के सारे जीव इससे निकले हैं, अतएव हम इसे ' जीवधन ' कह सकते हैं । आज यह मनुष्य ओम् के प्रभाव से जीवधन में लीन हो गया है । इसी जीवधन की कृपा से वह उस पुरिशय परात्परपुरुष को देखा करता है । 46. मर्त्यसूय्यं जीवधन है । अमृतसूय्यं महदक्षरयुक्त है । अक्षर अव्ययपुरुष से अविनाभूत है । पुरुष मायापुर में रहने से पुरुष कहलाता है । मर्त्यसूर्य्यं, अमृतसूर्य्य, महान्, अक्षर, अव्यय- पाँचों मिलकर एक परात्परपुरुष है । जीवपुरुष ' पर ' है । यह भाग जीव ' पर ' ( अव्यय ) से भी पर है, अतएव उसे परात्पर पुरुष कहा जाता है । यह कहने की आवश्यकता यही हुई कि हम परात्पर को अव्यय से बाहर बतलाते हैं । यहाँ परात्पर से वह परात्पर अभिप्रेत नहीं है । इसी का स्पष्टीकरण करने के लिए परात्पर के साथ पुरुष- शब्द का उल्लेख कर दिया है । परात्पर पुरुष से अभिमत नहीं होता । उसके साथ सामीप्य-भावमात्र को प्राप्त होता है । अपरामुक्तिमात्र है । इस प्रकार प्रथममात्रा से मनुष्यलोकप्राप्ति है । दो से पितृस्वर्ग प्राप्ति है । तीन से ब्रह्मलोकावाप्ति है । तीनों नहीं तो ' नरक ' है अर्थात् इन तीनों के अभाव में कुत्सित गति प्राप्त होती है । इस प्रकार एक ही अपर प्रोंकार में मात्राभेद से- मनुष्यलोक, स्वर्ग, अपरामुक्ति - तीन विभाग हो जाते हैं- BIR १- पृथिवी ऋक् मनुष्यलोकभौमसुख ' म् ' २- प्रन्तरिक्ष यजुः पितृलोक पितृस्वर्ग ' ओ ' - " श्रपरब्रह्मरूपप्रणवोङ्कारः ” ३- द्यौः साम ब्रह्मलोक अपरामुक्ति ' ओम् ' -के इसी विज्ञान को लक्ष्य में रखकर ऋषि कहते हैं-" यः पुनरेतं त्रिमात्रेणोमित्येतेनैवाक्षरेण परं पुरुषमभिध्यायीत स तेजसि सूर्ये सम्पन्नः ॥ यथा पादोदरस्त्वचा विनिर्मुच्यत एवं ह वै स पाप्मना विनि-[ २३७ ]

पृष्ठ 252

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पश्चम प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य अव्यक्तप्राणनिरूपण र्मुक्तः स सामभिरुन्नीयते ब्रह्मलोकं स एतस्माज्जीवधनात्परात्परं पुरिशयं पुरुष-मीक्षते ॥ तदेतौ श्लोकौ भवतः " ॥५ ॥

॥ ५ ॥

------इसी अर्थ का निरूपण करने वाले निम्नलिखित दो श्लोक द्रष्टव्य हैं—

१ - " तिस्रो मात्रा मृत्युमत्यः प्रयुक्ता अन्योन्यसक्ता श्रनविप्रयुक्ताः ।

क्रियासु बाह्याभ्यन्तरमध्यमासु सम्यक्प्रयुक्तासु न कम्पते ज्ञः " ॥६ ॥

एक - इस श्लोक का सम्बन्ध प्रणव प्रकार से है एवं आगे का सातवाँ श्लोक उद्गीथ ओंकार से सम्बन्ध रखता है - जैसा कि अनुपद में ही स्पष्ट हो जाएगा । पृथिवी अन्तरिक्ष- द्यौ रूप तीन मात्रा मृत्युमयी हैं, क्योंकि तीनों लोक मर्त्य हैं । तीनों मात्राएँ परस्पर अविनाभूत हैं । इसलिए हम तीनों के लिए- ' अन्यो-न्यसंयुक्ताः - कह सकते हैं । परन्तु स्वरूप से तीनों भिन्न हैं, अतः तीनों के लिए- ' अनविप्रयुक्ताः ' कह सकते हैं । भावदृष्ट्या विभिन्न हैं । सत्तादृष्टया एक हैं । तीन भाति हैं । तीनों मिलकर वस्तु एक है, यही तात्पय्यं है । यदि संसार के बाह्याभ्यन्तर सारे क्रियाकलापों में इन तीनों मात्रानों का सम्बन्ध कर दिया जाता है । तो ऐसी अवस्था में ऐसा विद्वान् कम्पशून्य हो जाता है । इसी को भगवान् आत्मसमर्पण योग कहा है । योगशास्त्र वाले इसी को अजपाजाप कहते हैं । सब कुछ करो, परन्तु ' ओम् ' को ध्यान में रखो । सर्वत्र ओम् की तीनों मात्रात्रों को अनुस्यूत देखो । इससे स्थिरयोग उत्पन्न होगा एवं इससे संसाररूप, अतएव मयरूप विश्वबन्धन से अलग होकर उसी प्रपुनरावृत्तिरूप ब्रह्मलोक में

प्रतिष्ठित हो जाओगे ।

॥ इति प्ररणवोङ्कारस्वरूपनिरूपणम् - फलादेशश्च ॥

॥ ६ ॥

अथ - प्रमृतोपक्रमस्थानीय उद्गीथोङ्कारोपदेशः --अपर के बाद है - परब्रह्म । वह अमृतरूप । उसकी प्राप्ति का उपाय उद्गीथोंकार है । उसी का संक्षिप्तरूप से निरूपण करते हुए ऋषि कहते हैं— २- " ऋग्भिरेतं यजुभिरन्तरिक्षं स सामभिर्यत् तत् कवयो वेदयन्ते । तमो-ङ्कारेणैवायतनेनान्वेति विद्वान् यत्तच्छान्तम् श्रजरम् अमृतम् - प्रभयं परं च " ॥७ ॥

[ २३८ ]

पृष्ठ 253

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पश्चिम प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञान भाष्य अव्यक्तवाणनिरूपण ऋगुरूप प्रथममात्रा से इस मनुष्यलोक को, यजु रू । द्विमात्रा से सोमलोकरूप अन्तरिक्षलोक को एवं सामरूप त्रिमात्रा से उस लोक को जो कि ब्रह्मलोक है, विद्वान् लोग प्राप्त करते हैं । श्रर्थात् मत्यं त्रिलोकी के प्राप्ति का उपाय वेदत्रयीरूप अपरब्रह्म ही है । जैसे वह इससे इस अपरब्रह्म को प्राप्त करने में समर्थ होता है- एवमेव उस परब्रह्म को भी उस उद्गीथ ओंकार से ही वह प्राप्त कर सकता है - जो कि परब्रह्म - अव्यक्त, अक्षर, ग्रव्यय, परात्पर की समष्टिरूप है । अव्यक्त स्वयम्भू है । इसी को कठ ने शान्तात्मा कहा है । इसके अभिप्राय से ' शान्तम् ' कहा है - यही श्रजर है । अक्षर अमृत नाम से प्रसिद्ध है । परात्पर अभय नाम से प्रसिद्ध है एवं अव्यय ' पर ' नाम से प्रसिद्ध है । इन सब की समष्टि ही ' परब्रह्म ' है । ओंकार से ही अपरब्रह्म प्राप्ति होती है । श्रोंकार से ही परब्रह्म प्राप्ति होती है । अपर-ब्रह्म की प्राप्ति मर्त्योपक्रम स्थानीय पार्थिव प्रणव प्रकार से होती है एवं परब्रह्म की प्राप्ति श्रमृतोपक्रम स्थानीय सौर उद्गीथ ओंकार से होती है । बस, शैब्य सत्यकाम के ---" यो ह वै तद्भगवन् मनुष्येषु प्रायणान्तमोंकारमभिध्यायीत । कतमं वाव स तेन लोकं जयति "? इस प्रश्न का 11 संक्षिप्त उत्तर है । का यही संक्षिप्त उर ओम् का मूलभाग स्वयम्भू का अव्यक्तभाग है । वहीं ओम् का विकास है । अव्यक्त वाक् प्राणमय है । यही प्राणमयी वाक् ओम्स्वरूप में परिणत होती है । इस प्रश्न में इसी का निरूपण है, अतएव हम अवश्य ही इस पाँचवें प्रश्न को स्वायम्भुव श्रव्यक्तप्राण का निरूपक कहने के लिए तय्यार हैं । इसीलिए तो श्रुति ने उपसंहार - मन्त्र में ' शान्तम् ' कहा है । वह ' परब्रह्म ' शान्तरूप है । शान्तात्मा

वही श्रव्यक्त है ॥। इति उद्गीथनिरूपणम् ॥

निष्कर्ष: -श्रोम् + उपास्य १- सर्वज्ञ २- हिरण्यगर्भ ओ ३ - वैश्वानर अ + hePalk 4 [ २३६ ] अधिदैवतब्रह्म = ईश्वरात्मा

पृष्ठ 254

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पश्चम प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य प्रत्यक्तप्राणनिरूपण १- ओम् २- भो → उपासनासाधक = शब्दब्रह्म = अधिभूतात्मा + प्राप्तिसाधन ३ - अ १- प्राज्ञ - ओम् २ - तेजस -ओ → उपासक = अध्यात्मब्रह्म : जीवात्मा → प्राप्तिकर्त्ता ३- वंश्वानर -अ अपने अध्यात्म की -प्र - ओ - प्रोग्रूप वैश्वानर - तेजस प्राज्ञरूप तीनों कलानों के अधिभूतरूप-( दरूप ) - प्रो- ओम् द्वारा- अधिदैवत की तीनों कलाओं को युक्त कर देना ही सारे उपनिषत्

का निष्कर्ष है ।

॥ इति श्रव्यक्तप्रारणनिरूपरणात्मकः पञ्चमप्रश्नः ॥

॥ ५ ॥

[ २४० ].

पृष्ठ 255

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अथ षोडशीप्रजापतिनिरूपणात्मकः षष्ठप्रश्नः ६

" मय्येव सकलं जातं मयि सर्वं प्रतिष्ठितम् ।

मयि सर्वं लयं याति तद् ब्रह्माद्वयमस्म्यहम् ” ॥

( कैवल्योप ० १।१६ । )

" एषोऽणुरात्मा चेतसा वेदितव्यो यस्मिन्प्राणः पञ्चधा संविवेश ।

प्राणैश्चित्तं सर्वमोतं प्रजानां यस्मिन् विशुद्धे विभवत्येष आत्मा ” ॥

( मुण्डकोप ० ३ | १ | | )

पृष्ठ 256

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अथ प्रश्नोपनिषदि -षष्ठः प्रश्नः [ मूलपाठः ] अथ हैनं सुकेशा भारद्वाजः पप्रच्छ । भगवन्हिरण्यनाभः कौसल्यो राजपुत्रो मामुपेत्यैतं प्रश्नमपृच्छत । षोडशकलं भारद्वाज पुरुषं वेत्थ, तमहं कुमारमब्रुवं नाहमिमं वेद । यद्यहमिममवेदिषं कथं ते नावक्ष्यमिति । समूलो वा एष परिशुष्यति योऽनृतमभिवदति तस्मान्नार्हाम्यनृतं वक्तुम् । स तूष्णीं रथ-मारुह्य प्रवव्राज । तं त्वा पृच्छामि क्वासौ पुरुष इति ॥ १ ॥

तस्मै स होवाच । इहैवान्तःशरीरे सोम्य स पुरुषो यस्मिन्नेताः षोडशकलाः प्रभवन्तीति ॥२ ॥

स ईक्षांचक्रे । कस्मिन्नहमुत्क्रान्ते उत्क्रान्तो भविष्यामि कस्मिन्वा प्रति-ष्ठिते प्रतिष्ठास्यामीति ॥३ ॥

स प्रारणमसृजत प्राणाच्छ्रद्धां खं वायुर्ज्योतिरापः पृथिवीन्द्रियं मनोऽन्नम-शाद्वीर्यं तपो मन्त्राः कर्म लोका लोकेषु च नाम च ॥४ ॥

स यथेमा नद्यः स्यन्दमानाः समुद्रायणाः समुद्रं प्राप्यास्तं गच्छन्ति भिद्येते तासां नामरूपे समुद्र इत्येवं प्रोच्यते । एवमेवास्य परिद्रष्टुरिमाः षोडशकलाः पुरुषायणाः पुरुषं प्राप्यारतं गच्छन्ति भिद्येते चासां नामरूपे पुरुष इत्येवं प्रोच्यते

स एषोऽकलोऽमृतो भवति । तदेष श्लोकः ॥ ५ ॥

[ २४३ ]

पृष्ठ 258

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प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य षष्ठ प्रश्न वो मृत्युः परिव्यथा इति ॥६ ॥

॥ इति षष्ठप्रश्नस्य मूलपाठः ॥ [ २४४ ] षोडशीप्रजापतिनिरूपण श FIBER BOIF अरा इव रथनाभौ कला यस्मिन्प्रतिष्ठिताः । तं वेद्यं पुरुषं वेद यथा मा तान्होवाचतावदेवाहमेतत्परं ब्रह्म वेद नातः परमस्तीति ॥७ ॥

ते तमर्चयन्तस्त्वं हि नः पिता योऽस्माकमविद्यायाः परं पारं तारयसीति ।

नमः परमऋषिभ्यो नमः परमऋषिभ्यः ॥८ ॥

पृष्ठ 259

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अथ षोडशीप्रजापतिनिरूपणात्मकः षष्ठप्रश्नः [ विज्ञानभाष्य ] इस उपनिषत् को हमने ' प्राणोपनिषत् ' कहा है । ' यस्मिन् प्राणः पञ्चधा आविवेश ' के अनुसार वह प्राण पाँच प्रकार के हैं । इन पाँचों प्राणों का पूर्व के पाँच प्रश्नों में बड़े विस्तार के साथ निरूपण किया जा चुका है । अब बचता है प्राणाधार पुरुष । अमृत, ब्रह्म, शुक्र - ये तीन सृष्टियोनिएँ हैं- जैसा कि पाँचवें प्रश्न में बतलाया जा चुका है । इन तीनों में अमृत आत्मयोनि है । ब्रह्म प्राणयोनि है । शुक्र पशुयोनि है । आत्मयोनि पौरुष ब्रह्म है । प्राणयोनि प्राकृत ब्रह्म है एवं पशुयोनि शुक्रिय ब्रह्म है । तीनों की समष्टि प्रजापति है । इसमें प्राण उस प्रजापति के प्राण हैं । यह प्राण उस प्रजापति में प्रविष्ट रहते हैं । बस, इस छठे प्रश्न में उसी प्रजापति का ' विज्ञान ' रूप से निरूपण है-शैब्य सत्यकाम के समाधान हो जाने पर अब सुकेशा भारद्वाज पिप्पलाद के सामने आए और । उन्होंने कहा कि-भगवन्! कोसल देश में रहने वाला, अतएव ' कौसल्य ' नाम से प्रसिद्ध हिरण्यनाभ नाम का राजपुत्र ( क्षत्रिय ) एक बार मेरे पास आया और मेरे से वह प्रश्न करने लगा कि भारद्वाज! आप कृपाकर मुझे षोडशकल पुरुष का स्वरूप बतलाओ? प्रश्न करने पर मैंने उस कुमार से कहा कुमार कि! मैं षोडशकल प्रजापति का स्वरूप नहीं जानता । यदि मैं जानता रहता तो तुम्हें कैसे उसका स्वरूप नहीं बतलाता? वह जड़ से सूख जाता है ( उसका आत्मा जड़ से सूख जाता है ) जो कि अतृत बोलता है । इसलिए मैं कभी मिथ्या नहीं बोल सकता हूँ । ( मेरी इस विवशता से ) कुमार विना कुछ कहे सुने चुपचाप वापस लौट गए । हे पिप्पलाद! आज मैं आपसे वही प्रश्न करता हूँ । कृपाकर बतलाइए! वह षोडशी पुरुष • कौन सा है? उसका क्या स्वरूप है? यह है- भारद्वाज के प्रश्न का स्वरूप । इस प्रश्न में बतलाया गया है कि जो मनुष्य मिथ्याभाषण करता है - वह जड़ से सूख जाता है । मिथ्या बोलने से आत्मा कैसे सूख जाता है? इसका उत्तर निम्न-लिखित सत्यानृत प्रकरण को देखने से मिल सकता है । [ २४५ ]

पृष्ठ 260

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षष्ठ प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य षोडशी प्रजापतिनिरूपण सत्य, ऋत, अनृत- तीनों भावों में विश्व विभक्त है । सशरीर सहृदय तत्त्व सत्य है एवं प्रहृदय-अशरीरी तत्त्व ऋत है । ऋत सत्य का अभाव ' अनृत ' है । अंगिरा सत्य है, भृगु ऋत है । अग्नि, यम, आदित्य- तीनों अंगिरा हैं - तीनों सत्य हैं । आपः, वायु, सोम - तीनों भृगु हैं । तीनों ' ऋत ' हैं । उभयाभाव ' अनृत ' है । यद्यपि ऋत का अभाव अनृत हैं, तथापि ऋत के पेट में चूंकि सत्य रहता है, बिना ऋत के सत्य नहीं रह सकता, अतएव अनृत को उभयाभावरूप कहा जा सकता है । वेद में मिथ्या के लिए ' असत्य ' शब्द नहीं श्राता, अपि तु, ' अनृत ' शब्द श्राता है । क्योंकि असत्य वस्तु ऋत का अभाव है । अनृत ही सत्य का अभाव है, अतएव जहाँ ' सत्यसंहिता वै देवाः ' यह कहा जाता है, वहाँ जोड़े में ' अनृत संहिता वै मनुष्याः ' - यही कहा जाता है । अग्नि सत्य है, सोम ऋत है । ऋत के पेट में अग्नि का जन्म होता है एवं उसी ऋत की आहुति से वह सत्य प्रतिष्ठित रहता है । परमेष्ठी सोममय है । उसके पेट में सूर्य्याग्नि है । पारमेष्ठ्य ऋत श्रापः ने ( भृगु ने इसी सत्यसूर्य्यं को अपने में प्रतिष्ठित कर रखा है । सूर्याग्निनिरन्तर सोमाहुति खा रहा है । इसी ऋत सोमाहुति पर इस सूर्य्यं सत्य का स्वरूप प्रतिष्ठित है । वस्तुपिण्ड सत्य है । पिण्ड भावरूप है । भाव अभाव पर निर्भर है । अभाव का अर्थ है - उस पिण्ड का प्रभाव । जब तक पिण्ड के बाहर उसका प्रभाव नहीं होगा, तब तक उसमें व्यक्तित्व न आवेगा । वह प्रभाव दार्शनिक परिभाषा में तो कोरा अभाव ही है, परन्तु विज्ञानजगत् उसे ' ऋत ' कहता है । खाली स्थान ' ऋत ' है- क्योंकि खाली स्थान में आप:, वायु, सोम भरे रहते हैं एवं इन तीनों की समष्टि ही ' ऋत ' है । प्राणात्मक ऋत उस पिण्ड को घेरे रहता है । उसी को दार्शनिक लोग ' शरीराकाश ' कहा करते हैं । ऐसा कोई भी सत्यपिण्ड नहीं जो ऋत से वेष्टित न हो । ऋत के साथ सत्य अन्तर्य्याम बना रहता है । जिस दिन दोनों की ग्रन्थि टूट जाती है - उस दिन सत्यपिण्ड नष्ट हो जाता है । वैश्वानर, तेजस, प्राज्ञविशिष्ट प्रज्ञानात्मा भूतात्मा है । यही कम्र्मात्मा है । ' स वा एष प्रज्ञानात्मा विज्ञानात्मना संपरिष्वक्तः ' के अनुसार सौरविज्ञानभाग अध्यात्म में श्राकर प्रज्ञान से युक्त होता हुआ उससे अविना-भूत रहता है । भूतात्मा का ग्रात्मापना इसी विज्ञान पर निर्भर है । इसीलिए तो सौर विज्ञान के लिए-' सूर्य श्रात्मा जगतस्तस्थुषश्च ' यह कहा जाता है । यह विज्ञानसंपरिष्वक्त प्रज्ञानात्मा वाक्, प्राण, मनोमय है । इसकी वाक्प्राणमनोमयता का कारण वही विज्ञान है । विज्ञानसूर्य्यं मनोमय, प्राणमय, बाङ्मय है - जैसा कि पाँचवें प्रश्न में बड़े विस्तार के साथ बतलाया जा चुका है । वही मनःप्राणवाङ्मय विज्ञान प्रज्ञान में आया हुआ है, अतएव प्रज्ञान भी मनःप्राणवाङ्मय बना हुआ है । प्रज्ञान पर निरन्तर सौर मन - प्राण - वाक् आते रहते हैं । प्रज्ञान मन विना विषय के अपना व्यापार करने में असमर्थ है, अतएव विज्ञानसंपरिष्वक्त श्रतएव मनःप्राणवाङ्मय प्रज्ञानात्मा विना विषय के रहता हुआ भी नहीं रहने के समान है । दूसरे शब्दों में मनःप्राणवाङ्मय आत्मा विषयसम्बन्ध से ही व्यवहार का अधिकारी बनता है । ' घटमहं जानामि ' ' पटमहं जानामि ' में ' अहं ' पदार्थ आत्मा है । यह अहं घटपटादि के सम्बन्ध से ही प्रतिभासित हो रहा है । अहंरूप से प्रकाशित होना ही इसका व्यवहार में आना है । यह व्यवहार विषयसम्बन्ध पर ही निर्भर है । इस आत्मा में मन, प्राण, वाक् - तीन कला हैं । इन तीनों में मन ज्ञानमय है । इस ज्ञानमय मन पर ज्ञानीय संस्कार ( जो कि संस्कार भावना नाम से प्रसिद्ध हैं ) प्रति-[ २४६ ]