प्रश्नोपनिषद् — पृष्ठ 261–270

प्रश्नोपनिषद् · पृष्ठ 261–270

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षष्ठ प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य षोडशी प्रजापतिनिरूपण ष्ठित होते हैं । मनुष्य विना विषय के अपने ज्ञान से नई - नई वस्तु बनाया करता है । यही नहीं - स्थूल । वस्तु का स्वरूप पहले ज्ञान में बनता है । शिल्पी मकान का नक्शा पहले अपने ज्ञान में खींच लेता है फिर इस ज्ञानीय मकान में बहिर्जगत् के स्थूलभूतों को प्रतिष्ठित कर उस अन्तर्जगत् के मकान को बहिर्जगत् की वस्तु बना देता है । यदि ज्ञानीय मकान के विरुद्ध कहीं पर ईंट चूना लग जाता है तो उसे नापसन्द करता हुआ तोड़ डालता है । ' समझ में बैठा नहीं, चाहते थे जैसा मकान बना नहीं'- ये अक्षर उसी ज्ञानीय मकान के सम्बन्ध से निकलते हैं । यदि तदनुरूप भूत की चिति होती है तो वह-' हाँ, अब मैं जैसा चाहता था वैसा मकान बन गया ' - यह कहने लगता है । कहना इससे यही है कि बनते हैं । बस, जो वस्तु ज्ञानीय मनुष्यनिम्मित जितने भी अर्थप्रपञ्च हैं सब पहले ज्ञानमय मन में होती है - वह उसी मन पर प्रतिष्ठित होती है । इसी को ' भावना संस्कार ' कहते हैं । मन के बाद है-प्राण । जैसे मन से ज्ञान होता है, तथैव प्राण से कर्म होता है । मनुष्य प्राणव्यापार द्वारा कोई वस्तु बनाता है । उस वस्तु का संस्कार भी इस पर आता है । यह संस्कार चूंकि प्राण से होता है, अतएव वह प्राण पर ही प्रतिष्ठित होता है । इसी को ' वासना - संस्कार ' कहते हैं । ज्ञानजनित संस्कार भावना है । उसका आधार मन है । कर्म्मजनितसंस्कार ' वासना ' है । इसका आधार प्राण है । ये ही दोनों संस्कार - ' अनुभवाहित, कम्र्माहित ' नाम से भी प्रसिद्ध हैं । तीसरी वाक् है । प्राण से व्यापार होता है । वाक् से श्रम होता है । तद्द्वारा अर्थनिर्माण होता है । वाक् में प्राण - मन दोनों का समावेश है । वाक् विना प्राण - मन के अप्रतिष्ठित है, अतएव इसे ' वाक् ' कहा जाता है । संकेत भाषानुसार ' अ ' मन का नाम है । ' उ ' प्राण का नाम है । जो घामच्छद तत्त्व अपनी स्वरूपसत्ता के लिए ' अ ' और ' उ ' की ( मन और प्राण की ) याच्या करता है - अपेक्षा रखता है, अतएव ' अश्च उश्च श्रचते याचते श्रपेक्षते'- इस व्युत्पत्ति से इस तीसरे धामच्छद तत्त्व को ' वाक् ' कहा जाता है । अर्थपिण्ड वाङ्मय है - इसका अर्थ है - मनप्राणवाङ्मय है । वाक् में ज्ञानमय मन, क्रियामय प्राण- दोनों का सम्बन्ध है, अतएव हम वाक् को भावना वासना दोनों संस्कारों का श्राधार मान सकते हैं । वाक्प्रविष्ट मनोजन्यसंस्कार ' भावना ' है । वाक्प्रविष्ट प्राणजन्यसंस्कार ' वासना ' है । ' वाक् ' दोनों की अनुग्राहिका है । यथार्थ है- ' घट ' वाक् है । इसका हमें ज्ञान भी होता है एवं इस पर अबधारणादि - कर्म्म भी करते हैं । वाङ्मयघटज्ञान भावनासंस्कार का जनक है । वाङ्मयघटक-वासनासंस्कार का जनक है । इस प्रकार मनः प्राणवाङ्मय प्रज्ञानात्मा में मनोजन्य भावना, प्राणजन्यवासना एवं वाक्जन्य उभयविध संस्कार श्राते रहते हैं । इन संस्कारों का इस आत्मा के साथ अन्तर्य्याम - बहि-यम भेद से दो प्रकार से सम्बन्ध होता है । ग्रन्थिबन्धनसम्बन्ध अन्तर्य्याम कहलाता है । सहचरसम्बन्ध बहिर्य्याम कहलाता है । एक बार जो सोच लिया, जान लिया, काम कर लिया, उसे कभी नहीं भूला-यह अन्तर्य्यामसम्बन्ध है । श्रभी किया, अभी जाना, थोडी देर बाद भूल गए - यह बहिर्य्यामसम्बन्ध है । अन्तर्य्यामसम्बन्ध में वे संस्कार आत्मस्वरूप में प्रविष्ट हो जाते हैं । आत्ममय बन जाते हैं । बस; आत्मस्वरूप में प्रविष्ट - इन तीनों संस्कारों को ही हम ' आत्मा का ' अन्न कहेंगे । ये ही संस्कार आत्मा के अन्न हैं । दधिमधुघृतामृतमय - गोधूम, यव, ब्रीहि आदि शरीर के धन्न हैं । यदि यह हजम [ २४७ ]

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षष्ठ प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य षोडशी प्रजापतिनिरूपण हो जाते हैं तो शरीरस्वरूप में परिणत हो जाते हैं । यही अन्तर्य्याम है । यदि वान्ति हो जाती है तो इनका अन्नपना गायब हो जाता है । यही बहिर्य्याम है । जैसे ये शरीरान हैं- एवमेव पूर्वोक्त संस्कार आत्मान्न हैं । अन्तर्य्याम - सम्बन्ध से प्रविष्ट ही ये संस्कार प्रात्मान्न होने में समर्थ हो सकते हैं । मनःप्राण नीरूप हैं - अघामच्छद हैं । तीसरे वाक्माग को हमने घामच्छद बतलाया है । यही वाक् ' वागिन्द्रः ' के अनुसार इन्द्र है । इसके अमृत मर्त्यं दो भाग हैं । अमृता वाक् इन्द्र कहलाती है । मर्त्यावाक् ' इन्द्र पत्नी ' कहलाती है । इन्द्र से आध्यात्मिक, आधिदैविक देवसृष्टि होगी । इन्द्रपत्नी से मर्त्यावाक् से ( मर्त्याकाश से ) भूतसृष्टि होती है । वही वाक् उत्तरोत्तर के चितिसम्बन्ध से आकाश, वायु, तेज, जल, मिट्टी - इन पाँच स्वरूपों में परिणत हो जाती है । ' केनोपनिषत् ' में इस वाक् की व्यापकता का विशदरूप से निरूपण किया जा चुका है, अतः यहाँ हम केवल इतना ही कहना पर्याप्त समझते हैं कि आत्मा का वाक्माग पाँच भूतों में परिणत होकर मनःप्राणरूप से आप स्वयं उसमें प्रविष्ट हो रहा है । मनःप्राण आत्मा है । वाक् ( पञ्च भूत ) शरीर है । इस प्रकार अध्यात्मप्रपञ्च सप्तकल हो जाता है । जो जिससे बनता है उसकी सत्ता उसी से रहती है - यह ध्रुव सिद्धान्त है । अध्यात्मप्रपञ्च मनः प्राणआकाशवायुते जजलपृथिव्यात्मक में मन है, अतः यह तभी तक प्रतिष्ठित रह सकता है जब तक कि ये सातों इसमें आते रहें । इन सातों से भावनासंस्कार अभिप्रेत है । प्राण से वासनासंस्कार अभिप्रेत है । श्राकाश से शब्द अभिप्रेत है । वायु से श्वास - प्रश्वास अभिप्रेत है । तेज से प्रकाश ( रोशनी ) अभिप्रेत है । जल प्रसिद्ध है । पृथिवी से लोकप्रसिद्ध अन्न अभिप्रेत है । इनमें जल, मिट्टी दो के लिए तो हमें उद्योग करना पड़ता है । खेती द्वारा मिट्टी को अन्नरूप में परिणत करो, लाओ, पीसो, छानो, रोटी बनाम्रो - तब खायो । पानी के लिए कुप्रा खोदो, लाओ, तब पीओ । इस प्रकार मनुष्य को कर्म्मण्य बनाए रखने के लिए प्रजापति ने दो- अन्न परिश्रमसाध्य रखे हैं । शेष पाँचों अपने आप मिलते हैं । प्रकाश सूर्य्य देता है । वायु सम्बन्धी श्वास - प्रश्वास के लिए भी हमें उद्योग नहीं करना पड़ता । शब्द भी हम सुनते रहते हैं । बोर जंगल में पक्षीरव है । वह भी नहीं तो जंगल की सनसनाहट है । ' न हि कश्चित् क्षरणमपि जातु तिष्ठ-स्यकर्मकृत् ' - के अनुसार प्राणान्न भी ( कम्मन्न भी ) अपने आप मिलता ही रहता है यही वासना है । मनोमय भावनाजनक ज्ञान के विषय में तो कुछ कहना ही नहीं है । इसी अन्नविज्ञान को लक्ष्य में रखकर - ' यत् सप्तान्नानि मेधया तपसाऽजनयत् पिता ' " - यह कहा जाता है । इस प्रपञ्च से बतलाना यही है कि आत्मशब्द आत्मा, शरीर दोनों का ग्राहक है । मनःप्राण-भाग आत्मा है । पञ्चभूतस्वरूप में परिणत वाक् शरीर है । शरीरविशिष्ट मनःप्राणवाङ्मय प्रज्ञानात्मा मनोऽन्न, प्राणान्न, वागन्न ( भूतान्न ) त्रिविध अन्नों को निरन्तर खाया करता है । यदि इन अन्नों का आत्मा के साथ अन्तर्य्यामसम्बन्ध हो जाता है तो आत्मा ' महदुक्थ ' नाम से प्रसिद्ध हो जाता है । यह अन्न प्रज्ञान के ही बनते हैं । इसका कारण यही है कि प्राज्ञइन्द्र सोममय है । सोम स्नेहधर्म्मा है । १- बृहदा ० उप ० १।५।१ । [ २४८ ]

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षष्ठ प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य षोडशी प्रजापतिनिरूपण विज्ञान आग्नेय होने से असंग है । यही कारण है कि शीतप्रधानवस्तु प्रज्ञानबल बढाती है । अग्नि-प्रधानवस्तु से विज्ञानबल बढता है । इन संस्कारों को पकड़ना - स्नेहतत्त्वोपेत प्रज्ञान का ही काम है । दूसरे शब्दों में - प्रज्ञानसंपरिष्वक्त विज्ञानेन्द्र के मन - प्राण वाक् पर ही संस्कार आते हैं । एक बात और - प्रज्ञान चान्द्र है । प्रज्ञान के नीचे प्राज्ञ तैजस - वैश्वानररूप देवसत्य और हैं । जैसा कि ' कठोपनिषत् ' में विस्तार के साथ बतलाया जा चुका है । वैश्वानर आग्नेय है - तेजस वायव्य है एवं प्राज्ञ आदित्य है । तीनों में प्रज्ञान ब्याप्त है । वैश्वानरसंपरिष्वक्त प्रज्ञान स्थूलभुक् है । तैजससंपरिष्वक्त प्रज्ञान प्रविविक्तभुक् है एवं प्राज्ञसंपरिष्वक्त प्रज्ञान आनन्दभुक् है । ये ही तीन अवस्था क्रमशः जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति की अधिष्ठात्री हैं । इस विषय का विशद विवेचन ' माण्डूक्योपनिषत् ' में किया जाने वाला है । यहाँ केवल यही समझ लेना आवश्यक होगा कि पूर्वोक्त संस्कारों का भोग्य शुद्धप्रज्ञान पर ही अवलम्बित नहीं है । श्रपि तु, वैश्वानर, तेजस, प्राणयुक्त प्रज्ञान ही मोक्ता बनता है । वस्तुतस्तु श्रात्मत्रयी ही भोक्ता है । प्रज्ञानमन तो साधक है । संस्कार प्राज्ञ पर होते हैं । प्राज्ञ प्रज्ञानाविनाभूत है, अतः उसे भी भोक्तृकोटि में समाविष्ट कर लिया जाता है । प्रज्ञानमन ही भोग का साधक है । वैश्वानर- तैजस - प्राज्ञ जीवात्मा भोक्ता है । इन्द्रियों और मन के द्वारा यह भोग करता है, अतएव ' आत्मेन्द्रियमनोयुक्तं भोक्तेत्याहुर्मनीषिणः-यह कहा जाता है । केन एवं माण्डूक्य के अनुसार- इन्द्रिऍ, वैश्वानर - तेजस - प्राज्ञरूप देवसत्य सब प्रज्ञान की महिमा में अन्तः प्रविष्ट हैं, अतएव यहाँ हमने प्रज्ञान को ही सप्तविधान्नभोक्ता बतला दिया है । इस अन्न के लिए वेद में ' अशिति ' शब्द नियत है । खुराक को ही ' अशिति ' कहते हैं । इस प्रशिति ( अन्न ) के सम्बन्ध से - विषयभोगसम्बन्ध से ही हमारा प्रज्ञानात्मा ' महदुक्थ ' कहलाता है । इसी विज्ञान को लक्ष्य में रखकर ' अशितिभिह महदुक्थमाख्यायते ' - यह कहा जाता है । जब तक आत्मा महदुक्थ रहता है अर्थात् अन्नखाता रहता है- दूसरे शब्दों में विषयावच्छिन्न रहता है, तभी तक यह व्यवहारोपयुक्त बनताहै । अर्थात् ' श्रयं जीवः ' - यह व्यवहार अन्न- सम्बन्ध पर ही निर्भर है । जिस दिन अन्नाहुतिरूप यज्ञक्रम बन्द हो जाएगा उस दिन आत्मा जीवव्यवहार से खारिज होता हुआ इस देह से उत्क्रान्त हो जाएगा । सविषयक आत्मा संसारी है । विषयातीत आत्मा मुक्त है । ' उक्थ अर्क -अशिति ' तीनों पारिभाषिक शब्द हैं । सूर्य्यं उक्थ है - उससे निकलने वाली रश्मिएँ अर्क हैं । अर्को से गृहीत त्रैलोक्य के सारे पदार्थ प्रशिति हैं । सूर्य्यरूप उक्थ अपने अके द्वारा विश्व के यच्चयावत् पदार्थों को सोम में परिणत करके खा रहा है । सबकी सूर्य में निरन्तर आहुति लगा करती है, अतएव सूर्य्य के लिए ' सूर्यो ह वा श्रग्निहोत्रम् ' यह कहा जाता है । जब तक यह आहुति हो रही है, तभी तक सूर्य्य अर्क निकालता हुआ महदुक्थ बन रहा है । दूसरे शब्दों में ग्राहुति ही सूर्य्यं में जाकर महदुक्थरूप में परिणत हो रही है । इसलिए हम अवश्य ही इस अशिति के लिए ' अशिति-मिहि महदुक्थमाख्यायते ' - यह कह सकते हैं । यही बात अध्यात्म में है । मनोमय प्रज्ञान इसी अशिति से महदुक्थ बन रहा है । इस महदुक्थ से अर्क निकल रहे हैं । विविध प्रकार की कामनाएँ ही यहाँ अर्क हैं । काम को ही ' अशनाया ' ( ' बुभुक्षा ' - पदार्थ लेने की इच्छा ) कहते हैं । इसको काम इच्छा प्रशनाया-अकं इन चारों नामों से व्यवहृत किया जाता है । [ २४६ ]

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षष्ठ प्रश्न १ - काम-२ - इच्छा-३ - अशनाया-प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य षोडशी प्रजापतिनिरूपण [ २५० ] ' क - अ म् - अ ' काम में इतने वर्ण हैं । ' कम् ' सुख का वाचक है । इसी को ' कं ब्रह्म ' कहा जाता है । ' अ ' मन का वाचक है - जैसा कि पूर्व में बतलाया जा चुका है । कम् के उदर में भी ' अ ' है - बाहर भी ' अ ' है । इसका तात्पर्य्य यही है कि सुख के भीतर भी मन है - बाहर भी मन है । दूसरे शब्दों में मन सुख में सर्वत्र डूबा हुआ है । बस ' के ओतप्रोतं मनः ' ही ' काम ' है । विषय सुखरूप है । वही ' कम् ' है । विषय-भोग की इच्छा रखने वाला मन ' विषय ' की भावना करता है । भावना द्वारा जिस विषय को यह प्राप्त करना चाहता है - वह विषय ज्ञानरूप से पहले ही प्राप्त हो जाता है । सुन्दर स्त्री पर आसक्त पुरुष के मन में सुखरूपा स्त्री बैठी रहती है । यही नियम सारे सुखप्रद विषय में है । चूंकि मन में वह बैठा है - मन उसके बाहर भीतर सब ओर व्याप्त हो रहा है, अतएव ' सुखे श्रोतप्रोतं मनः'- इस व्युत्पत्ति से मन से निकलने वाली रश्मियों को हम अवश्य ही ' काम ' कह सकते हैं । मन अपने स्थान पर प्रतिष्ठित रहता है । इसकी रश्मिएँ ही विषय पर जाती हैं, अतः अर्कभावापन्न मन ही ( रश्मि ही ) काम कहलाती है । मन काममय है । काम इसका पहला रेत है । इसी विज्ञान को लक्ष्य में रखकर - ' काममय एवायं पुरुषः ' ' कामस्तदग्रे समवर्त्तताधि मनसो रेतः प्रथमं यदासीत् ' इत्यादि कहा जाता है । बालकों को समझाने के लिए भगवान् पाणिनि ने ' इषु इच्छायाँ ' घातु से इच्छा शब्द बना डाला है । परन्तु विज्ञानकोटि में इसमें प्रत्यय करने की आवश्यकता नहीं है । निरुक्तक्रमानुसार धातु - धातु मिलकर ही शब्द बने हैं । इच्छा में ' इष् ' ' शी ' दो धातु हैं । इट् अन्न का नाम है । शीङ् का अर्थ है-सोना । अन्न में प्रसुप्त मन ही ' इट् प्रन्नं तत्र सुप्तं तन्मयतां गतं ' लोनं मनः ' इच्छा है । जो अर्थ काम का है - वही इच्छा का है । विषय प्राप्त नहीं हुआ है, किन्तु ज्ञानरूप से मन पर आ गया है । विषय में जाकर - ' समाने वृक्ष पुरुषो निमग्नः ' अनुसार मन अपना स्वरूप खो बैठता है- तन्मय हो जाता है । इसी विज्ञान को समझाने के लिए उसे ' इच्छा ' कहा जाता है । रश्मिरूप मन ही इच्छा है, अतः अर्क को ही इच्छा कहा जाना उचित है । इसी इच्छासूत्र के द्वारा कामसूत्र के द्वारा विषय का उक्थ मन से सम्बन्ध होता है । वैदिकों ने व्याकरणानुसार ' अशनाया पिपासा ० ' इत्यादि सूत्र से ' क्यच् ' करके ' अशनाया ' नहीं बनाया है-अपि तु वे प्रशनाया को - ' यथा गोनायः - श्रश्वनायः तथा अशनाया ' कहते हुए ' अशं ( अन्नं ) नयते ( प्रापयति उक्थे ) ' - यह निर्वचन किया है । वह इच्छासूत्र ही तो अन्न का मन के साथ सम्बन्ध कराता है । जब इच्छित विषय आ जाता है तो मन शान्त हो जाता है । इसी अशनाया के अधीन सारा विश्व है । यदि भूख न होती तो कौन किसकी गुलामी करता? मनुष्य इसी के चक्र में पड़कर आत्मस्वरूप खो बैठता है - प्रात्मा विषयागमन से मलिन होकर मृत्युमय विश्व के चक्कर में पड़कर पराधीन हो जाता है, अतएव इसके लिए- ' अशनाया वे पाप्मा ' ' अशनाया हि मृत्युः - यह कहा जाता है । यह सब

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षष्ठ प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य षोडशीप्रजापतिनिरूपण कुछ है, परन्तु विश्व का मूल यही प्रशनाया है । यदि कामना न होती तो प्रजापतिद्वारा सृष्टि ही न होती । जीवस्वरूप को जीवस्वरूप में सुरक्षित रखने वाली- इसे लोकव्यवहारयोग्य बनाने वाली तो यही अशनाया है । ४ - मर्श : -मन से निकलने वाली रश्मियों का क्या स्वरूप है? बस, अर्कशब्द इसी प्रश्न का समाधान करता है । ' अच्चन् अचरत् तस्मात् प्रकः - इसकी यही निरुक्ति है । सूर्य्यं रश्मियों पर दृष्टि डालिए । वे -प्राणदपानत् व्यापार करती हुई आगे चलती हैं । सरकती हुई छाया में आप इस प्राणदपानत् क्रिया का साक्षात्कार कर सकते हैं । रश्मि आगे बढती है परन्तु कैसे? जैसे - इञ्जिन के पार्श्वभाग में लगा हुआ दण्ड । वह पीछे खिसकता हुआ आगे चलता है यही उसकी गति है । आगे बढना प्राणत् है । फिर जरासा पीछे हटना ही अपानत् है । इस प्रकार छाया पीछे सरकती हुई आगे चलती है । इसी क्रिया को ' अच्चन ' कहते हैं । इस क्रिया से यह सौररश्मि विषय की याच्ञा करती हुई आगे चलती है । ' अर्च ' से ' अर्क ' शब्द निष्पन्न होता है । बस, यही स्वरूप मन की रश्मियों का है, अतएव उन्हें अवश्य ही ' नर्क ' कहा जा सकता है । चारों शब्दों में थोड़ा - थोड़ा अन्तर है इसलिए चारों पर्य्याय नहीं बन सकते । परन्तु परमार्थतः चारों अभिश्रार्थक है । यह काम महदुक्थरूप मन से निकलता है । महदुक्थ संस्काररूप में परिणत अशितिमय है । इससे सिद्ध हो जाता है कि प्रशितिरूप संस्कारमय महदुक्थापन मन ही काम का कारण है । यह भी एक वैज्ञानिकों का माना हुआ सिद्धान्त है कि कामना उसी वस्तु की होती है जिसका संस्कार पहले से मन में बैठा रहता है एवं उसी से विषयज्ञान होता है । यदि किसी के मन में वह संस्कार नहीं होता है तो तद्विषयिणी कामना भी उसमें नहीं होती है, अतएव उस विषय का ज्ञान भी उन्हें नहीं होता है । कितने ही मनुष्यों को लाल मिर्च में तिक्तता प्रतीत नहीं होती । कारण वही संस्काराभाव है । कितने ही गन्धज्ञानशून्य होते हैं कारण वही संस्काराभाव कितने ही जन्म से मांसप्रिय होते हैं, कारण वही संस्कारसत्ता । कितने ही मांस, मदिरा, लशुन आदि आसुरभावापक्ष पदार्थों से घृणा करते हैं उन्हें कभी इनकी इच्छा नहीं होती कारण वही संस्काराभाव । कामना के लिए संस्कार अपेक्षित हैं । जैसा संग किया जाता है - संग के प्रभाव से धीरे - धीरे तद्विषयक संस्कार पैदा होने लगते हैं । इस संस्कार के दृढ होने से तद्विषयक कामना का प्रादुर्भाव हो जाता है । उक्थ विना अर्क के रह ही नहीं सकता । सूर्य्यं क्या रश्मि विना रह सकता है? कदापि नहीं । यदि संस्कार दृढ हो जाता है तो उक्थ बन जाता है । उसी समय उसमें से अर्क निकलने लगते हैं । एक मनुष्य मद्य - मांस-धूम्र - पानादि श्रात्मविरोधी पदार्थों से घृणा करता है । परन्तु ऐसे पदार्थों को अपनाने वालों से दुर्भाग्य से इसका पाला पड़ जाता है । बस, वहां के वातावरण में फैले हुए मद्यमांसादि के परमाणु धीरे - धीरे संस्काररूप से इसमें प्रविष्ट होने लगते हैं । बस, कालान्तर में दृढमूल होते हुए उक्थरूप बनकर यही इसे उनकी कामना की ओर झुका देते हैं । इसी विज्ञान को लक्ष्य में रखकर ' संगात् संजायते कामः ' [ २५१ ]

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षष्ठ प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य षोडशीप्रजापतिनिरूपण -यह कहा जाता है । बुरी अच्छी दोनों का संग से सम्बन्ध है । साधु पुरुषों की संगति - साधुसस्कार पैदा करती हुई अविद्यानाश का कारण बनती है । जैसा कि पंडितराज कहते हैं -" दूरीकरोति कुर्मात विमलीकरोति चेतश्चिरन्तनमघं चुलुकीकरोति । भूतेषु किं च करुणां बहुलीकरोति संगः सतां किमु न मंगलमातनोति ” । ' ठीक इसके विपरीत दुर्जनसंग विद्यानाशक कामना का कारण बनता है । क्योंकि वहाँ तदनुकूल ही उक्थ बनते हैं । अतएव —

" वरं पर्वतदुर्गेषु भ्रान्तं वनचरैः सह ।

न मूर्खजनसम्पर्कः सुरेन्द्रभवनेष्वपि " ॥

- के अनुसार बुरे संग से बचना चाहिए । खूब विद्या पढो - यदि संग बुरा है तो कुछ नहीं । मत पढो संग अच्छा है तो सब कुछ अच्छा है, अतएव भीष्म ने स्थान - स्थान पर युधिष्ठिर को साधुमेवा-वृद्धसेवा की ही प्रधानता बतलाई है । यह संस्काररूप उक्थस्वरूप आगे के भेद से दो प्रकार के होते हैं । इसी जीवनकाल में अच्छे - बुरे पदार्थों के सेवन से संग - कुसंग के सम्बन्ध से जो बुरे संस्कार उत्पन्न होते हैं - वे ' ग्रागन्तुक ' अतएव बहिरङ्ग संस्कार कहलाते हैं । परन्तु जिन संस्कारों की कृपा से इसने माता के गर्भ में जन्म लिया है वे स्वरूपधर्म हैं - अन्तरङ्ग हैं । आगन्तुकों की अपेक्षा अतिदृढ हैं । वे ही संस्कार प्रबल हैं । इन्हीं संस्कारों को ' प्रकृति ' कहा जाता है । पानी की प्रकृति ठंडी है । यह इसका स्वरूपधर्म्म है । परन्तु अग्नि से गरम पानी आगन्तुकधर्म में निरुढ है । आगन्तुकधम्मं हटाया जा सकता है, परन्तु प्रकृतिधर्म नहीं हटाए जा सकते । इसी अभिप्राय से- ' प्रकृति यान्ति भूतानि निग्रहः किं करिष्यति ' - यह कहा जा सकता है । प्रयास करने पर भी जो मनुष्य सन्मार्ग पर नहीं आता, उसके लिए उसके अभिभावक - ' क्या करें - खूब समझा लिया नहीं मानता - जैसा इसने किया है - वैसा भोगे-हमारा काम तो समझाने का था ' - यह कहा करते हैं । यह उन्हीं ' प्राकृत ' ( पुराने ) संस्कारों की रहें- ही महिमा है । जो ब्राह्मणकुल में जन्म लेता है - उसमें तदनुकूल संस्कार होते हैं । वे संस्कार सदा बने प्रबल विरुद्ध संस्कार इसे ब्राह्मणत्वसंपादक संस्कारों से न गिरा दें- एतदर्थं तत्तद्वर्णानुकूल वैधसंस्कार किए जाते हैं । आज के इस अराजककाल में बुरे संस्कारों का साम्राज्य है, अतएव तत्तद्वर्णों के प्राकृत संस्कार निर्बल हो गए हैं । सबको उलटा ही उलटा सूझता है । धर्म्मविरुद्ध कार्य्यं ही धर्म समझा जा रहा है एवं वे ही अधर्म्मप्रचारक आज देश के पूज्य नेता बन रहे हैं- क्यों? उत्तर स्पष्ट है । वैधसंस्कारों का लोप, श्रात्मविरुद्ध पाश्चात्त्य संस्कारों का प्रबल आक्रमण, मद्य - मांस सोडा - आइस्क्रीम धूम्रवर्तिका आदि पदार्थों का सेवन शासनसूत्र के संचालकों की कुटिल एवं घातक नीति ही इस परिस्थिति का कारण है । १ - रसगंगाधर [ २५२ ]

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प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य षष्ठ प्रश्न मूढा १- " पुरुष एवोक्थम् " । ' २- " स एष पुरुषः समुद्रः " ४- " तद्धि तद् वनमित्युपास्व " । " १- मुण्डकोप ० १२८ । ३- ऐ ० आ ० २।३।३ । ५- केनोप ० ४।६ । [ २५३ ] षोडशीप्रजापतिनिरूपण २ - ऐ ० आ ० २।१।२ । ४ ते ० ब्रा ० २।२।५ । के जिन्होंने अपने युवाकाल में पाश्चात्यों के साथ घनिष्ठ सम्बन्ध रखा है । मद्यमांस की स्वतन्त्रता साथ आराधना की है । जो वैधसंस्कारों से शून्य हैं, आज वे ही लुप्त प्राकृत संस्कारयुक्त महानुभाव हमारे देश के ही नहीं विश्व के सर्वश्रेष्ठ मनुष्य बन रहें हैं । एवं-" अविद्यायामन्तरे वर्तमानाः स्वयं धीराः पण्डितंमन्यमानाः । जङ्घन्यमानाः परियन्ति अन्धेनैव नीयमाना यथान्धाः " ॥ ' इस श्रुतिवचन को चरितार्थ करते हुए उन नेताओं के चक्र में पड़कर स्वयं भी इधर - उधर मारे मारे फिरते हैं । आज सबका ' महदुक्थ ' बिगड़ रहा है, अतएव महदुक्थ से निकलने वाले काम और तद्गृहीत, अशितिएँ बिगड़ रही हैं । स्पृश्यास्पृश्यव्यवस्था का विरोध, वर्णाश्रमरक्षा की मूलभित्ति जाति का विरोध सहभोज, रण्डापरिणय- युवतिविवाह - देशवेशभूषा का परित्याग आदि इसके ज्वलन्त उदाहरण हैं । ऊपर के प्रपञ्च से पाठकों को यह भलीभाँति विदित हो गया होगा कि अच्छा - बुरा सारा प्रपञ्च संस्काररूप ' महदुक्थ ' ही है । इसी महदुक्थ की कृपा से वह असंगतत्त्व जीव बनकर लोक-व्यवहार में प्रविष्ट हो रहा है । हमारे मन में अनन्त कामनाएँ उठती हैं । एक एक कामना का एक एक उक्थ है । श्रात्मा में यद्विषयक उक्थ का प्रभाव रहता है - उसमें तद्विषयिणी कामना का भी अभाव रहता है । चूँकि कामना अनन्त हैं । अनन्त कामनाओं के कारण इस प्रज्ञानपुरुष के लिए— ३- " कामं समुद्रमाविशेत्याह । समुद्र इव हि कामः । नैव हि काम-स्यान्तोऽस्ति । न समुद्रस्य " । " — इत्यादि कहा जाता है । चूंकि इस काममय पुरुषोक्त की व्याप्ति पूर्वकथनानुसार रहती है । मनः प्राणवाङ्मय पुरुष से आत्मा, जीव दोनों का ग्रहण है, श्रतएव श्रुति कहती है-

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षष्ठ प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य षोडशी प्रजापतिनिरूपण " स एष पुरुषः पञ्चविधः । तस्य यदुष्णं तज्ज्योतिः ( तेजः ) यानि खानि स श्राकाशः ( शब्दश्च ) । अथ यल्लोहितं श्लेष्मा रेतस्ता श्रापः । यच्छरीरं सा पृथिवी । यः प्रारणः ( प्राणोदानसमानव्यानापानभेदेन पञ्चधा विभक्त: -श्वासप्रश्वासरूपश्च ) स वायुः । मनो वागिति प्रारणस्य ह्यन्वपायमेता श्रपि-यन्ति ( मध्यपतितप्राणस्यैव कुर्वद्रूपवत्वात् ) " ॥ ' चूँकि अनन्त कामना हैं एवं प्रत्येक कामना का भिन्न - भिन्न उक्थ है, अतएव मन में अनन्त उक्थों की सत्ता सिद्ध हो जाती है । अनन्त उक्थ अशिति द्वारा बने हैं, अतएव अशितिसम्पन्न इन अनन्त उक्थों के श्राधारभूत प्रज्ञानात्मा के लिए ' महदुक्थ ' ( बडा उक्थ- जिसमें कि अनन्त उक्थ प्रतिष्ठित हैं ) कहा गया है । केवल मात्र प्रशिति के प्रभाव से इस प्रज्ञानपुरुष में- ' महदुक्थ, अर्करूपकाम, प्रशितिरूप अन्न ’ तीन पदार्थों की सत्ता सिद्ध हो जाती है । महदुक्थ संस्काररूप है - इसका श्राधार मन है । मन ही उक्थ है । हम है । काम प्राणरूप है । यहीं अर्क है । अशिति अन्नरूप है - यही वाक् है यही पशु है । -मन अत्ता है - प्राण - प्रशिति इसकी प्रजा हैं । भुक्तान्न में तीनों हैं । ' अन्न में पार्थिवस्थूलभाग, आन्तरिक्ष्य सूक्ष्म प्राणभाग, दिव्य सोममय ज्ञानभाग तीनों हैं । मन आदित्य का भाग है । वह अन्न में अन्तःस्यूत है । प्राण अन्तरिक्ष की वस्तु है । वह आदित्य भाग के ऊपर । वाक् पृथिवी की वस्तु है । वह सबके ऊपर है । इस त्रिविधभावापन्न अन्न से क्रमशः उक्थरूप श्रात्मा के मनःभाग की, कामरूप प्राणभाग की, अशितिरूप वाग्भाग की पुष्टि होती है । अन्तरिक्ष में वायुवत् श्रापः की भी सत्ता है, अतः प्राण को वायव्य की तरह आप्य भी कहा जा सकता है । असल में प्राण वायव्य ही है । परन्तु उसका आधार शापः है । मन का आधार सोम है । सोम ऊपर है- श्रापः नीचे है । मध्य में वायु है । ऊपर का सोम मादित्य में जाकर मन बन जाता है । नीचे का आपः वायव्यप्राण की प्रतिष्ठा बन जाता है । इसी विज्ञान के आधार पर ' अन्नमयं हि सोम्य मनः प्रापोमयः प्राणः ' यह कहा जाता है । पार्थिव स्थूलवाक् से उत्तरोत्तर में होने वाले क्रमिक विशकलन से क्रमशः रस, असृक्, मांस, मेदा, अस्थि, मज्जा, शुक्र - सात धातु बनते । सातों धातु वाङ्मय हैं - पार्थिव हैं । इसके बाद भीतर का आपोमय प्राण धातु के भीतर प्रविष्ट ओज का अनुग्राहक है । यही प्रान्तरिक्ष्य प्राण है । तदन्तर्गत सोममय चेतनारूप इन्द्रभाग मन का अनुग्राहक है । यह दिव्य है । इस क्रम से मनःप्राणवाङ्मय आत्मा त्रैलोक्य - विभूति से युक्त हो जाता है । इसी विज्ञान को लक्ष्य में रखकर— “ स एष पुरुषः समुद्रः सर्वं लोकमति यद्ध किच- प्रश्नुते, प्रत्येनं मन्यते । यद्यन्तरिक्षलोकमश्नुतेऽत्येनं मन्यते । यद्यमं लोकमश्नुवीत प्रत्येवैनं मन्येत " ॥ ' १ - ऐ ० आ ० २।३।३ । २- ऐ ० आ ० २।३।३ । [ २५४ ]

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षष्ठ प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य अन्नयुक्त प्रज्ञान ही प्रजापति है । यही ब्रह्म है यही इन्द्र है । महोक्थं ऋक् महाव्रतं साम षोडशी प्रजापतिनिरूपण १ - आत्मा २- प्राण ३- पशु १- महदुक्थ २ - अर्क ३- अशिति} - ' प्रजापति ' १- मन २- प्राण ३- वाक् १ - ज्ञान २- क्रिया ३- अर्थ शरीरम् - १- रस, असृक्, मांस, मेदा, अस्थि, मज्जा, शुक्र- पार्थिवभाग = वाक् २- प्रोज आत्मा + -३- मन-१- अन्नगतवाग्भागेन- आत्मनो वाग्भागस्य पुष्टि: -२- नगत वायुभागेन- आत्मन: प्राणभागस्य पुष्टि: -→ श्रान्तरिक्ष्यभाग = प्राण → दिव्यभाग = मनः ( अन्नं ब्रह्मत्युपासीत ) ३- अन्नगतसूक्ष्मतम - आदित्यभागेन आत्मनो मनोभागस्य पुष्टि: -' अशितिः ' 'अन्नम् ' उक्थमन अपने स्थान में ( हृदयप्रदेश में ) प्रतिष्ठित रहता है । इसमें से निकलने वाले काममय अर्क शरीर से निकलकर बडी दूर तक अपना मण्डल बनाते हैं । जहाँ तक उक्थात्मा का भोग्य ( अशिति ) रहता है - वहां तक रश्मिरूप से श्रात्मा व्याप्त रहता है, अतएव ' यावद्वित्तं तावदात्मा'-यह कहा जाता है । प्रथम भोग्य शरीर है- फिर स्त्री, पुत्र हैं- पौत्रादि हैं - बन्धुवर्ग है - भृत्य वर्ग है - पशु वर्ग है- अन्न संपत्ति है - स्थावर प्रासाद द्रव्य - भूमि आदि हैं । उत्तर - उत्तर की अपेक्षा पूर्व - पूर्व भोग्य के साथ आत्मा का अधिक सम्बन्ध है । इनमें आत्मा काम द्वारा स्वरश्मि द्वारा विभूत रहता है - व्याप्त रहता है, अतएव यह सारा भोग्यप्रपञ्च- ' विभवति यत्र श्रात्मा'- इस व्युत्पत्ति से ' आत्मा का वैभव ' कहलाता है । सारा वैभव आत्मनिःसृत रश्मिमण्डल में प्रतिष्ठित है । सूर्य्यपिण्ड को श्रात्मा समझिए । सौररश्मिमण्डल को ( जो कि मण्डल बृहत्साम नाम से प्रसिद्ध है ) प्राण समझिए । बृहत्सामान्तर्गत पृथिवी -शनि - मंगल - रवि - बुध आदि ग्रहप्रपञ्च एवं त्रैलोक्य के इतर संपूर्ण स्थावर जंगम पदार्थों को पशु समझिए । इनका आत्मा वह है, अतएव ' सूर्य आत्मा जगतस्त-[ २५५ ]

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षष्ठ प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञान भाष्य षोडशी प्रजापतिनिरूपण स्थुषश्च'- यह कहा जाता है । बस, ' ऋङ्मूतिः ' ' महदुक्थं ऋक् ' के अनुसार सूर्य्यपिण्ड ' ऋग्वेद ' है । ' मण्डलं साम ' ' महाव्रतं साम ' के अनुसार सौररश्मिमण्डल साम ( बृहत्साम ) वेद है । इतर पदार्थों के क्षुद्र साम इस महासाम में अन्तर्भूत हैं, अतएव सौर साम बृहत्साम कहलाता है एवं मूर्ति और मण्डल प्रतिष्ठित शितिरूप वय ( अन्न ) यजु: है । यही व्यवस्था अध्यात्म में समझिए । आत्मा ( मन ) महदुक्थ है । वही ऋक् है । शरीर से स्थावरसंपत्तिपर्य्यन्त सारा वैभव यजुः है । काममण्डल साम है । महदुक्थ- काम - प्रशिति कहो या ऋक्साम - यजुः कहो एक ही बात है । ऋक्साम आयतन है-वयोनाध है । यजुः वय है - अन्न है । इस प्रकार ग्रात्मा का वेदमय होना सिद्ध हो जाता है । ' मनः प्रारण-वाचा संघातः सत्ता ' के अनुसार मनःप्राणवाक् की समष्टि ही अस्ति है । अस्ति ही उपलब्धि है । इस उपलब्धिरूप महदुक्थ मन का नाम ऋक् है । प्राण साम है । वाक् यजुः है । यही अस्तित्व है । ' अयं मनुष्य ' - इस प्रकार से जो प्रस्तिरूप मनुष्य की उपलब्धि हो रही है - वह उस त्रयी की ही उपलब्धि हो रही है । वेद ही उपलब्ध हो रहा है, अतएव ' विद्यते वेत्ति - विन्दते - इन तीनों व्युत्पत्तियों को लक्ष्य में रखकर इस त्रयीतत्त्व को ' वेद ' कहा जाता है । वेदत्रयीरूप आत्मा यज्ञमय है । अन्न ऋत पदार्थ है । उस ऋत की प्राहुति हो रही है । अन्नाद में अन्न की जो आहिति है वही यज्ञ है । यज्ञान्न सोमरूप होने से ऋत है । इसी की आहुति से महदुक्थ है । महदुक्थ पर काम है । काम पर पशु है । आत्मा की तीनों कलाएँ इसी यज्ञ पर प्रतिष्ठित हैं । ऋतसोम से यह त्रयीयज्ञ प्रतिष्ठित है, प्रतएव हम इस आत्मा को सत्य कहने के लिए तय्यार हैं । इस सत्यत्रिकल श्रात्मा की सत्ता तभी तक है- जब तक कि ऋतसोम की श्राहुति हो रही है, अतएव हम कह सकते हैं कि सत्यात्मा ऋत पर प्रतिष्ठित है । वेद एवं तदाधार पर प्रतिष्ठित यज्ञात्मा सत्य है - इस विषय का निरूपण ' मुण्डकोपनिषत् ' के तृतीय मुण्डक में देखना चाहिए । विषयज्ञान भी प्रश्न है । गुरूपदिष्ट शब्दविषयक ज्ञान आत्मा की आहुति है । यह प्राहुति ऋत-सोमरूप है । यह इसके पास आती है । यदि अश्रद्धा द्वारा यह इस आए हुए विषयज्ञान का तिरस्कार कर देता है- ' न ' कर देता है तो आत्मा पर उस ऋतसंस्कार का सम्बन्ध नहीं होता है । ऋत का संस्कार नहीं होता - मपि तु, ' न ' स्वरूप धतृत संस्कार हो जाता है । कोई वस्तु यदि आपको कोई दे - यदि आप न कर दें तो अभावरूप संस्कार आपको अवश्य हो जाएगा जो कि स्वानुभवैकगम्य है । शब्दज्ञान निदर्शनमात्र है । जितने भी अन्नसंपत्ति द्वारा आने वाले भावनावासनासंस्कार हैं - सब ऋतरूप हैं । इन सबका जो ' न ' है - अस्वीकार है - वही अनूत है । यदि एकान्ततः ऋतभाव के लिए ' न ' कर दिया जाता है - ऋताभावरूप अनृत को अपना लिया जाता है तो आत्मा पर कोई संस्कार नहीं होने पाता । निर्विषयावच्छिन्न होता हुआ आत्मा शुद्धरूप से रह जाता है । श्रात्मा में आने वाले अशितिरूप ऋतसंस्कार का प्रतिरोध ही ' अनृत ' है । जहाँ ग्रनृत है ( ऋत का निषेध है ) वहीं यज्ञ नहीं है । जहाँ यज्ञ नहीं - वहाँ संस्काराभाव से उक्थ नहीं । उक्थ नहीं तो ग्ररूप काम नहीं । ऐसी अवस्था में अनृत बोलने वाले मनुष्य का आत्मा ऋतशून्य होकर संस्कार शून्य हो जाता है । उसे किसी प्रकार का व्यावहारिक ज्ञान [ २५६ ]