प्रश्नोपनिषद् — पृष्ठ 271–280
प्रश्नोपनिषद् · पृष्ठ 271–280
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षष्ठ प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञान माध्य षोडशी प्रजापतिनिरूपण व्यवहारों में सर्वथा अक्षम नहीं होता । इस प्रकार अनृतभावापन्न अतएव प्रसंस्कृत आत्मा सांसारिक है । नास्ति के लिए - असत् ही रहता है । इस ' अभावरूप अनृत के लिए शब्दप्रपञ्च में ' न ' शब्द नियत जड़ इस वाक्वृक्ष का के लिए ' न ' कहा जाता है । वाक्प्रपञ्च ( शब्दब्रह्म ) एक वृक्ष है । इस वृक्ष की को आत्मा वाङ्मय है । उसकी जड़ ' अनृत ' है - ' न ' है । वृक्ष के मूल ' न ' माग है । उधर हमारा भी रखना यदि काट दिया जाता है तो सारा वृक्ष सूख जाता है । अतः उस मूल को सुरक्षित करना वाङ्मयवृक्ष आवश्यक है । अनृतरूप ' न ' वाक्रूप वृक्ष ( आत्मा ) का मूल है, अतः इसे नष्ट वाङ्मूल का खर्च होना को नष्ट करना है । कोई विषय आया- ' न ' ' न ' बोल दिया । ' न ' बोलना जाता है- विना है । इससे संस्काराभाव होता है । शुद्ध नात्मा रह जाता है । शुद्ध क्या कि रह ' अनृत ' वाङ्मय फलफूल वाले वृक्ष की तरह शुष्क रह जाता है । ऋषि आदेश करते स हैं भवति असद् ब्रह्मति आत्मवृक्ष की जड़ है । अतः इसे मत बोलो । ' न ' अन्यथा - ' असन्नेव विभूति से वश्चित हो जाओगे । वेद चेत् ' - के अनुसार तुम्हारा आत्मा कोरा रह जाएगा । तुम सांसारिक तुमने मुँह से न बोल दिया तो ' न ' को खर्च मत करो -सुरक्षित रखो । अपने भीतर ही रखो । यदि वाक् का मूल काट कर फेंक दिया । कोई मनुष्य ऐसा है कि जो रात - दिन यह भी झूठा - यह भी कुछ नहीं ही - यह विद्या भी है कुछ । उसका नहीं - इसमें यही किया करता है । ऐसा मनुष्य मूर्ख रह जाता है । संस्कारावच्छिन्न ज्ञान होता है तो इस समय अभाव रहता है । ऐसे मनुष्य के सामने जब कोई सांसारिक व्यवहार उपस्थित होता हुआ यह मूकवत् देखा करते है । संस्कारज्ञान के अभाव से उसे कर तो सकता नहीं, अतः इसका असमर्थ श्रात्मा अत्यन्त ' अरे! यह कुछ नहीं - सब झगड़ा है - इस प्रकार झल खाया करता है । इससे का मूल संस्कार क्षुब्ध हो पड़ता है । क्षोभ श्रात्मशक्ति का घात है । क्षोभ का मूल अज्ञान है को । अज्ञान लक्ष्य में रखकर श्रुति का अभाव है । संस्काराभाव का मूल अनृत बोलना है । बस, इसी विज्ञान कहती है-" अथैतन्मूलं वाचो यदनृतम् । तद्यथा वृक्ष आविर्मूलः शुष्यति स उद्वर्त्तते । एवमेवानृतं वदन्नाविर्मूलमात्मानं करोति । स शुष्यति । स उद्वर्त्तते । तस्मा-दनृतं न वदेत् । दयेत त्वेनेन " " । ‘ ओमिति सत्यं नेत्यनृतम् ' के अनुसार अनृत का वाचक ' न ' है - सत्य का वाचक ‘ ओम् ’ है | ‘ हाँ-' है । ना ' के लिए ' ओम् ' - ' न ' शब्द नियत हैं । श्रात्मा पूर्णरूप से तभी तक है जब तक कि वह ' ओम् में आत्मा में उक्थ अर्क -अशिति-संस्कार जब तक है तब तक आत्मा अशुष्क है - पूर्ण है । इस अवस्था समष्टि ' प्रोम् ' है । इस तीन भाग रहते हैं । उक्थ ' अ ' है । अर्क ' उ ' है । अशिति ' म् ' है । तीनों की १- ऐ ० आ ० २।३।६ । [ २५७ ]
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षष्ठ प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य षोडशी प्रजापतिनिरूपण ' ओम् ' का स्वरूप- ( संस्कारावच्छिन्न, अतएव महदुक्थ काम अशितिरूप आत्मा का स्वरूप ) ' अस्ति ब्रह्मेति चेद् वेद सन्तमेनं ततो विदुः ' के अनुसार ' स्वीकारभाव ' पर ही प्रतिष्ठित है । ' हाँ ' करने वाला ( श्रद्धा-पूर्वक विषयज्ञान को ग्रहण करना ही यहाँ ' हाँ ' करना है ) विषयसंस्काररूप ऋत की अपने आत्मा में आहुति कर यज्ञ सम्पत्ति सम्पन्न करता है । इस संस्कार से इसका श्रात्मा पूर्वकथनानुसार वेदत्रयीरूप सत्य से युक्त हो जाता है । सत्यमय यह श्रात्मा है, अतः संस्काररूप सत्यज्ञान के प्रभाव से लोकव्यवहार उत्पन्न होते हैं । इससे इसका श्रमस्वरूप सुरक्षित रहता है । इसको सुरक्षित रखने वाला अस्तित्व है-' हाँ ' है, अतएव सत्यस्वरूप सम्पादक इस ' हाँ ' भाव के लिए ' ओम् ' शब्द व्यवहृत किया है । सत्य, अनृत- दोनों परस्पर प्रतिद्वन्दी हैं । सत्य तभी तक है जब तक कि ऋत है । ऋत का अभाव होना अनृत है । अनृत सत्य का ( त्रयी सत्य का ) विरोधी है । मिथ्या शब्द कोई वस्तु नहीं है । अनृत वस्तु यथार्थ में एक वस्तु है, अतएव श्रुति में सर्वत्र सत्य की प्रतिस्व ही में अनृत शब्द रखा है । ओम् सत्य है, क्योंकि वही सत्यस्वरूपसम्पादक है । यह सत्या वाक् - उस वाङ्मय आत्मा के फल और पुष्प हैं । श्रात्मा में जो संस्कार- पुञ्ज हैं वह तो पुष्प है - इसे ही उक्थ कहा है एवं इसके द्वारा होने वाले सारे लोकव्यवहार फल हैं । वाङ्मय आत्मा वृक्ष है । अतृत इसका मूल है । जो अनृत बोलता है, वह इसकी जड़ काटता है । सत्य फलपुष्प हैं । ये तो खर्च होते ही हैं । जड़ सुरक्षित रहती है । फलपुष्प उपयोग में आते हैं, अतः सत्य ही बोलना उचित है । जो वाक् के सत्यभाग को बोलता है, वह संस्कार ज्ञान-मय बनकर संसार में फलता फूलता है । सारे प्रपञ्च का निष्कर्ष यही है कि - पूर्व के निरूपण से यह सिद्ध हो जाता है कि तुम ' न ' मत करो, ' हाँ ' करो । तो क्या मद्यमांसादि निकृष्ट पदार्थों के लिए भी ' हाँ ' करें? यदि ऐसा होगा तो बुरे संस्कार भी आत्मा में होंगे । ये भी अनृतवत् दुःख का ही बनेंगे । इसके लिए निम्नलिखित व्यवस्था होनी चाहिए । जो संस्कार ( सत् संस्कार ) उपादेय कारण हैं, जिनसे श्रात्मविज्ञान बढता है उन्हीं के लिए ' ओम् ' करना चाहिए, क्योंकि वे ही संस्कार अपेक्षित हैं । एवं मद्यमासांदि के लिए ' न ' ही करना चाहिए । ऐसा करना बुरे संस्कारों की जड़ काटना है । ' यान्यस्माकं सुचरितानि तानि स्वयोपास्यानि । नो इतराणि । ' यान्यनवद्यानि कर्माणि तानि सेवितव्यानि ' १ - का भी यही तात्पर्य है । सर्वत्र ' ओम् ' करना भी बुरा है । सर्वत्र न करना भी बुरा है अपितु, सद्विषयों के लिए ' ओम् ' करना उचित है । असदर्थों के लिए ' न ' करना उचित है । ' न ' करने । से आत्मा सूख जाता है- इसका अर्थ यही है कि- सद्विषयों के लिए आत्मा सूख जाता है - विद्यामय आत्मोपयोगी संस्कारों से अलग हो जाता है । इस प्रकार कहीं सत्य, कहीं अनृत - दोनों से काम लेना चाहिए । इसी सिद्धान्त का स्पष्टीकरण करते हुए ऐतरेय कहते हैं-" पराग्वा एतद्रिक्तमक्षरं यदेतदोमिति । तद्यत् किं च - ओमित्याह श्रत्रै-वास्तंद्रिच्यते । स यत्सर्वमों कुय्यद्रिञ्ध्यादात्मानम् । स कामेभ्यो नालं स्यात् । अथैतत्पूर्णमभ्यात्मं यन्नेति स यत्सर्वं नेति ब्रूयात्पापिकाऽस्य कीर्ति-१- तैत्ति ० उप ० १।११।१-२ । [ २५८ ]
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षष्ठ प्रश्न 44 १ - ऐ ० आ ० २।३।६ । षोडशी प्रजापतिनिरूपण प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य ॥ १ ॥
२- मुण्डकोप ० ३।२।४ । [ २५६ ] जति । सैनं तत्रैव हन्यात् । तस्मात् काल एव दद्यात्काले न दद्यात् । तत् सत्यानृते मिथुनीकरोति । तयोमिथुनात्प्रजायते भूयान् भवति - इति । " " इस ' ओम् ' - ' न ' की व्यवस्था दिव्य आसुरी विभूति पर अवलम्बित है । जो ' ओम् ' ही करता है-वह विषसंपृक्तान्नवत् दोनों संस्कारों को लेता है । यह भी बुरा है । जो ' न ' ही करता है वह दोनों से ही शून्य रहता है । दोनों में से दिव्यविभूति ग्राह्य है, अतः उसके सम्बन्ध में ' सत्यरूप श्रोम् ' बोलना चाहिए एवं आसुरी विभूति ' अग्राह्य ' है, अतः उसके सम्बन्ध में ' न ' ही करना चाहिए । यह है सत्यानृत का वैज्ञानिक अर्थ । अब व्यावहारिक अर्थ पर भी दृष्टि डालिए । ' सत्य ' यज्ञरूप है । यज्ञ त्रयीघन है, यही दिव्यविभूति है । असुर ग्रनृत हैं- मायारूप हैं - यही आसुरी विभूति है । असत्य भाषण से सत्यबल कम होता है । श्रात्मा कुटिल बनता है । ऐसा आत्मा निर्बल हो जाता है । ' नायमात्मा बलहीनेन लभ्यः २ - यह निश्चित सिद्धान्त है, अतः औपनिषद् ज्ञान को प्राप्त करने के लिए ' सत्य ' ही बोलना चाहिए । अनृत से विज्ञान में अव्यवसाय होता है । क्षेत्र विषम हो जाता है । विषम क्षेत्र में सूर्य्यप्रतिबिम्बवत् चिदाभास प्रसन्न ( उल्बण ) नहीं होता । इसलिए हम कह सकते हैं कि जो मिथ्या भाषण करता है, उसका प्रात्मा कुटिल होता हुआ आत्मज्ञान से वश्चित हो जाता है । ' रसो व सः ' के अनुसार अव्ययाभिन्न अक्षर रसरूप है । यही प्रतिबिम्बित होता है । कुटिलता में इसका पूर्ण सम्बन्ध नहीं होता । इस रसरूप श्रात्मा से अलग होने वाला ( मिथ्या भाषण करने वाले का ) भोक्तात्मा शुष्क ही है । गुहानिहित इसी पूर्वोक्त सत्यानृतविज्ञान को लक्ष्य में रखकर ऋषि कहते हैं— " समूलो वा एष परिशुष्यति योऽनृतमभिवदति । तस्मान्नाहम्यिनृतं वक्तुम् " ॥ इस प्रकार सत्यवक्ता भारद्वाज ने ' मैं ' जिस षोडशकल पुरुष के लिए हिरण्यनाभ के लिए असमर्थता दिखलाई थी- प्राज भारद्वाज - महर्षि पिप्पलाद से उसी का स्वरूप पूछते हैं । भारद्वाज के प्रश्न करने पर पिप्पलाद कहने लगे कि भारद्वाज! ' इहैवान्तः शरीरे सोम्य! स पुरुषो यस्मिन्नेताः षोडशकलाः प्रभवन्तीति " । षोडशकल पुरुष का निरूपण करें- इसके पहले तत्सम्बन्धी कुछ ऊपरी बातें जान लेना आवश्यक होगा । विना ऊपर की बातें जाने गम्भीर उपनिषद् के थोड़े से अक्षरों के अर्थ का यथानुरूप समन्वय कर लेना कठिन ही नहीं, अपि तु, असम्भव है । भारद्वाज के पास जिस समय हिरण्यनाभ षोडशकल उसी पुरुष का स्वरूप पूछने आए थे तब से भारद्वाज को इसके जानने की जिज्ञासा लग रही थी ।
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षष्ठ प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य षोडशीप्रजापतिनिरूपण जिज्ञासा से प्रेरित होकर आज ये पिप्पलाद के सामने खड़े हुए । पिप्पलाद कहने लगे कि भारद्वाज! जिसे तुम खोज रहे हो- जिसके लिए तुम इतनी दूर से मेरे पास आए हो, वह कोई दूर की वस्तु नहीं है । ' सोम्य ' विशेषण बालक के लिए दिया जाता है । सोमसम्बन्ध से ही बच्चे को सुत कहा जाता है । ' सोम्य ' विशेषण का तात्पर्य यही है कि हे भोले भारद्वाज! वह पुरुष तो इसी शरीर में अन्तः प्रविष्ट 1 उसे पूछने के लिए इतनी दूर से श्राना व्यर्थ है । वह तुम्हें अपने श्राप में मिलेगा । इससे पिप्पलाद को बतलाना यही है कि वह आत्मतत्त्व प्रवचन से नहीं या सकता । उसे तो अपने आत्मा से पूछना चाहिए । उ का ज्ञान आत्मगुरुसापेक्ष । हाँ, उस आत्मपुरुष से निकलने वाली जो १६ कलाएँ हैं, उन्हें हम जरूर शब्द द्वारा बतला सकते हैं, क्योंकि १६ कला विश्व की वस्तु हैं । १६ कला का परिचय कराना हमारा काम है । परन्तु जिससे ये १६ कला निकलती हैं- उसके लिए तो हम-" नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन । यमेवैष वृणुते तेन लभ्यस्तस्यैव आत्मा विवृणुते तनूं स्वाम् " ॥ ' - यही कहेंगे । पाँचों प्रश्नों में पांच प्राणों का निरूपण है । वे विज्ञेय हैं । शब्दब्रह्म द्वारा उनका निरूपण किया जा सकता है, अतः उनके लिए ' इहैवान्तः शरीरे ' नहीं कहा । परन्तु जिससे ये प्राण निकलते हैं - वह शब्दातीत है । इस रहस्य को सूचित करने के लिए इसके विषय में- ' इहैवान्तः शरीरे ' -यह कहा है । आगे के उपनिषदों में यह स्पष्ट हो जाएगा कि उपनिषत् की प्रधानदृष्टि ' अक्षर ' पर है । कारण इसका यही है कि उपनिषत् अध्यात्मविद्या का निरूपण करते हैं । जीवात्मा का - जीवभूतां महा-बाहो! ययेदं धार्यते जगत् ' के अनुसार अक्षर से सम्बन्ध है । जैसा कि मुण्डकोपनिषत् के- ' द्वा सुपर्णा०'-इत्यादि मन्त्र में स्पष्ट कर दिया जाएगा । अव्यय, अक्षर, आत्मक्षर तीनों की समष्टि षोडशी पुरुष है । इसी का नाम ' गूढोत्मा ' है । यही अमृतात्मा है । ' ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाहममृतस्याव्ययस्य च ' में ' अमृत ' शब्द अक्षर के लिए प्रयुक्त हुआ है । अक्षर ही प्रधान है । अक्षर के द्वारा ही अव्यय आत्मक्षर सृष्टि के अधिष्ठान और आरम्भण बनते हैं । क्योंकि अक्षर ही कुर्वद्रूप है, अतएव अमृत शब्द से षोडशी का ग्रहण कर लिया जाता है । यह अक्षरप्रधान अतएव अमृत नाम से प्रसिद्ध पोडशी पुरुष आत्म-योनि है । आत्मक्षर की प्राण, आप, वाक्, अन्न, अन्नाद - ये पाँच वैकारिक कलाएँ हैं । इन पांचों के पञ्चीकरण से अधिदैवत में क्रमशः स्वयम्भू परमेष्ठी, सूर्य, चन्द्र, पृथिवी - ये पाँच पिण्ड बनते हैं । इन पाँच पिण्डों के कारण वह अक्षरात्मापरपर्य्यायक गूढोत्मा पाँच स्थानों पर प्रतिष्ठित हो जाता है । यही स्थिति अध्यात्म में है । अध्यात्म में ये पांचों- ' श्रव्यक्तात्मा, महानात्मा, विज्ञानात्मा, प्रज्ञानात्मा भूतात्मा ' नामसे प्रसिद्ध । इनमें अव्यक्तभाग प्राण है आत्मा वही षोडशी है । महत्भाग ' आप ' है - आत्मा -भाग वही षोडशी है । विज्ञान वाक् ( इन्द्र ) है - आत्माभाग वही षोडशी है । प्रज्ञान अन्न ( सोम ) है-१ - कठोप ० १।२।२३ । [ २६० ]
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षष्ठ प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञान भाष्य षोडशी प्रजापतिनिरूपण आत्मभाग वही षोडशी है । भूत - अन्नाद ( अग्नि ) है- श्रात्मा वही षोडशी है । इस प्रकार अव्यक्त, महान्, विज्ञान, प्रज्ञान, भूत सर्वथा भिन्न हैं । इन पाँचों के श्रात्मव्यवहार का कारण वह श्रात्मा ' अविभक्तं विभक्तेषु विभक्तमिव च स्थितम् ' के अनुसार वही एक अविभक्त आत्मतत्त्व पाँच भागों में विभक्त हो रहा है । इस ' वही ' के कारण अव्यक्तादि पाँचों क्षररूप होने पर भी ' आत्मा ' कहलाते हैं । बस, उप-निषत् का एकमात्र यही कर्त्तव्य है कि वह पाँचों में से किसी एक ' क्षर ' को लक्ष्य बनाकर क्षर-प्रतिष्ठित उस प्रमृततत्त्व को दिखला दे । उदाहरणार्थ- केन, माण्डूक्य प्रज्ञान को लक्ष्य बनाकर उसके अक्षर को दिखलाते । कठ भूतात्मा को लक्ष्य बनाकर उसके अक्षर को दिखलाता है । मुण्डक विज्ञान को लक्ष्य बनाकर इसके अक्षर को दिखलाता है । ईशोपनिषत् पाँचों की समष्टि को लक्ष्य बनाकर उस एकरूप अविभक्त अक्षर को दिखलाता है । पाँच द्वार हैं - लक्ष्य एक है । द्वारापेक्षया सब उपनिषत् विभिन्नार्थं के प्रतिपादक हैं । लक्ष्यापेक्षया सब एक ही श्रर्थं का निरूपण करते हैं । यह है- उपनिषदों का गुप्त रहस्य । हमारा यह प्रश्नोपनिषत् भी अक्षर का ही ( उस श्रात्मतत्त्व का ही ) निरूपण करता है, परन्तु विज्ञान द्वारा । विज्ञान को यह लक्ष्य बनाता है । इसके द्वारा अक्षर का ज्ञान करवाता है । जैसा कि तीसरे प्रश्न से स्पष्ट हो जाता है । पाँच विभिन्न वर्ण के आदर्शों ( काचों ) पर आने वाला एक ही सौर तेज ( उपाधिभेद से ) पाँच रूप धारण कर लेता है । एवमेव अव्यक्तादि पाँच क्षरों के कारण वह एक ही अक्षरतत्त्व पाँच स्वरूप धारण कर लेता है । इसी उपाधिभेद से पाँचों पुरुषों की कलाएँ भिन्न - भिन्न हो जाती हैं । पहले ' अव्यक्ताक्षररूप ' - अव्यक्तात्मा को ही लीजिए । वाक्, प्राण- दोनों इस अव्यक्तात्मा के स्वरूपधम्मं हैं । धम्र्मस्वरूप और श्राश्रित भेद से दो प्रकार के होते हैं । स्वरूपधर्म से उस वस्तु का स्वरूप ( जीवन ) सुरक्षित रहता है । आश्रितधर्म्म ग्रागन्तुक हैं । विरोधी आश्रित धर्म्म वस्तु-स्वरूप के नाश के कारण बनते हुए अधर्मं कहलाते हैं एवं उपकारक आश्रितधर्म्म धम्मं कहलाते हैं । उदाहरणार्थ- पानी को लीजिए । पानी की शीतलता उसका स्वरूपधम्मं है । गरम पानी की गर्मी आश्रित है । यही यदि अधिक रूप से आता है तो पानी हवा बनकर उड़ जाता है । ऐसा आश्रित धर्मं वस्तुस्वरूप का नाश करता हुआ अधर्म बन जाता है । यही व्यवस्था हमारे पाँचों क्षरात्माओं में समझनी चाहिए । पाँचों में स्वरूपधर्म भी हैं एवं आश्रितधर्म्म भी हैं । स्वरूपधर्म्म उनकी शक्ति है । शक्ति - शक्तिमान् का ' उष्णता अग्निवत् ' अभेद है, अतः स्वरूपधर्मं तो वस्तुस्वरूप में ही अन्तर्भूत हो जाते हैं । बाकी बचते हैं - उपकारक आश्रितधर्मं । ये उपकारक आगन्तुक धर्म्म ही उस वस्तु की कलाएँ कह-लाती हैं । अव्यक्तात्मा - दूसरे शब्दों में अव्यक्ताक्षर तभी तक है - जब तक कि अव्यक्त है । वाक् प्राण की समष्टि का नाम ही ' अव्यक्त ' है । चूंकि इसकी सत्ता पर अव्यक्ताक्षर की सत्ता है, अतएव अव्यक्तरूप वाक् प्राण का हम अव्यक्ताक्षर में ही अन्तर्भाव करने के लिए तय्यार हैं, अतएव हम इनको ( वाक्प्राण को ) कला भी नहीं कह सकते । इस अव्यक्ताक्षर के आश्रय में वेदत्रयी ( ब्रह्मनिःश्वसित वेद ) प्रतिष्ठित है । ऋग् - यजुः-साम- तीन इसके श्राश्रितधर्म हैं, श्रतएव इन तीनों को हम अव्यक्ताक्षर की कला कहेंगे । अव्यक्त के बाद महान् है । पूर्वं परिभाषा के अनुसार रयिप्राण महदक्षर के स्वरूपधर्म हैं एवं सत्त्व, रज, तम नाम से प्रसिद्ध ( सत्त्व से यहाँ मलिन सत्त्व अभिप्रेत है क्योंकि विशुद्ध सत्त्व का तो स्वरूपधर्म में ही अन्त-भव है ) - तीन गुण आगन्तुक हैं । ये ही तीन कला हैं । विद्या ( धिषणा ), अविद्या ( प्राण ), विज्ञानाक्षर के स्वरूपधर्मं हैं एवं भागे बतलाए जाने वाली १६ आगन्तुक आश्रितधर्मं इसकी १६ कलाएँ हैं । प्रज्ञाप्राण [ २६१ ]
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षष्ठ प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य षोडशी प्रजापतिनिरूपणे प्रज्ञानाक्षर के स्वरूपधम्मं हैं एवं ' केनोपनिषत् ' में बतलाए गए २४ आश्रितधर्म्म इसकी कलाएँ हैं । भूतप्राण भूताक्षर के स्वरूपधम्मं हैं एवं पाँचों तन्मात्राएं आश्रितधम्मं हैं । ये ही इसकी पाँच कला हैं । ऐसी अवस्था में कह सकते हैं कि अव्यक्तपुरुष त्रिकल है । महत्पुरुष त्रिकल है । विज्ञानपुरुष षोडश-कल है । प्रज्ञानपुरुष चतुर्विंशतिकल है एवं भूतपुरुष पञ्चकल है । वह पुरुष भी स्वयं षोडशकल है । इस पुरुष की षोडशकलाओं के कारण तो पाँचों ही पुरुष षोडशकल हैं । इसीलिए- ' षोडशकलं वा इदं सर्वम् ' यह कहा जाता है एवं आगन्तुक कलाओं की अपेक्षा विज्ञानरूप षोडशकल ही षोडशकल है— २- महत्पुरुष पारमेष्ठ्यः ३ - विज्ञानपुरुष १- अव्यक्तपुरुष ( प्रव्यक्तात्मा ) स्वायम्भुवः - प्राणमयः ( महानात्मा ) ( विज्ञानात्मा ) सौरः स्वरूपधर्माः ब्रह्ममयः वाक्प्राणमयः विष्णुमय: - रयिप्राणमयः श्रापोमयः -- वाङ्मयः ४- प्रज्ञानपुरुष ५- भूतपुरुष ( प्रज्ञानात्मा ) ( भूतात्मा ) चान्द्रः पार्थिवः - ग्रन्नमयः - इन्द्रमयः - धिषणाप्राणमयः सोममयः - प्रज्ञाप्राणमयः - अन्नादमयः - अग्निमयः - भूतप्राणमयः आश्रितधर्माः कलानाम्ना प्रसिद्धाः वेदत्रयी सम्बन्धात् - त्रैगुण्यसम्बन्धात् - प्राणादिसम्बन्धात् पोडशकलः १- अव्यक्तषोडशीपुरुषः २- महत्षोडशी पुरुषः ३ - विज्ञानषोडशीपुरुषः ४- प्रज्ञानषोडशीपुरुषः ५- भूतषोडशीपुरुषः - त्रिकल: - त्रिकलः इन्द्रियादिसम्बन्धात् - चतुर्विंशतिकल: - तन्मात्रसम्बन्धात् - पचकलः इस उपनिषत् ने विज्ञान को ही प्रधान क्यों माना? इस प्रश्न का उत्तर- प्राणविद्या है । इस उपनिषत् का प्रधान निरूपणीय विषय है- ' प्राण ' । प्राण- ' अव्यक्त, महत्, विज्ञान, प्रज्ञान, भूत - भेद से पाँच प्रकार के हैं । ये पाँचों क्रमशः प्राण, आपः, वाक्, अन्न, अन्नाद नाम से प्रसिद्ध हैं । ये पाँचों शुद्धरूप से कभी नहीं रहते । पञ्चीकरण से ही पांचों विश्वरूप में परिणत होते हैं । पांचों मण्डलों के आत्मा की योनि जैसे षोडशी पुरुष है, तथैव पाँचों मण्डलों के पञ्चीकृत प्राण की योनि क्रमशः शुद्ध ( अपञ्चीकृत ) प्राण, आपः, वाक्, अन्न, अन्नाद हैं । स्वायम्भुव पञ्चीकृत प्राण ( विश्वप्राण ) की योनि शुद्ध ( विकारक्षर-रूप - अपञ्चीकृत ) वेदमय ब्राह्म प्राण है । पञ्चीकृत आपः की योनि शुद्ध श्रापोमय वैष्णव आप्यप्राण है । पीकृत वाक् की योनि शुद्ध वाङ्मय ऐन्द्र प्राण है । पञ्चीकृत अन्न की योनि शुद्ध सोममय सौम्यप्राण है एवं पश्वीकृत अन्नाद की शुद्ध योनि शुद्ध अन्नाद श्रग्निमय प्राण है, अतएव इन आत्मसमर्पित पाँचों प्राणों को हमने पूर्व में ' प्राणयोनि ' कहा है । इस क्रम से यह भी सिद्ध हो जाता है कि पाँचों मण्डलों में पाँचों प्राण हैं । इतना होने पर भी इन पाँचों का विकास मध्य के सूर्य्यविज्ञान में ही होता है । पाँच प्राण ही १६ कलाएँ पैदा करते हैं- जैसा कि आगे जाकर स्पष्ट हो जाएगा । चूँकि इन सोलह कलाओं के विकासमूलक पाँचों प्राणों का विकास इसी चितिधर्मा विज्ञान में होता है, अतएव यहाँ [ २६२ ]
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षष्ठ प्रश्न प्रश्नोपनिपद्विज्ञानभाष्य षोडशी प्रजापतिनिरूपण इसी को षोडशी बतलाया है । अपि च- मध्यपतित विज्ञानपुरुष ही सबका अनुग्राहक है । इससे ऊपर अमृतमण्डल है । नीचे मर्त्यमण्डल है । पृथिवी चन्द्रमा मत्यं हैं । स्वयम्भू - परमेष्ठी अमृत हैं । मध्यस्थ सिद्ध सूर्य्यं दोनों से सम्बन्ध रखता है । इस प्रकार अधिदेवत में मध्यस्थ सूय्यं का सर्वप्राणानुग्राहकत्व है । ' मनोऽधि-हो जाता है । यही बात अध्यात्म में है । हृदय पर मन है । यहीं विज्ञानसूर्य्यं प्रतिष्ठित में प्रविष्ट कृत्यायात्यस्मिन् शरीरे ' के अनुसार वह आधिदैविक सौरप्राण इसी मन के आधार से अध्यात्म " यह कहा होकर आयु का कारण बनता है, अतएव - ' यावद्ध्यस्मिन् शरीरे प्राणो वसति तावदायुः है, अतएव जाता है । जब तक यह है तब तक अव्यक्तादि हैं । हृदय पर वही ब्यानरूप से प्रतिष्ठित इसके लिए-" न प्राणेन नापानेन मत्य जीवति कश्चन । इतरेण तु जीवन्ति यस्मिन्नेतावुपाश्रितौ " ॥ " "
ऊर्ध्वं प्राणमुन्नयति प्रपानं प्रत्यगस्यति ।
मध्ये वामनमासीनं विश्वेदेवा उपासते " ॥3
विज्ञानप्राण की -यह कहा जाता है । इस प्रकार शरीर में अन्तः प्रविष्ट ( मध्यप्रविष्ट ) इस सर्वव्यापकता भली - भाँति सिद्ध हो जाती है । इसी विज्ञान को लक्ष्य में रखकर मन्त्रश्रुति कहती है-" विमान एष दिवो मध्य श्रास्त प्रापप्रिवान्नोदसी अन्तरिक्षम् । स विश्वाचीरभिचष्टे घृताचीरन्तरा पूर्वमपरं च केतुम् " ॥ " मध्यपतित पञ्चीकृत पाँचों प्राणों से १६ कलाएँ उत्पन्न होती हैं । इन पाँचों का विकासधाम विज्ञान है, अतः इसी के साथ सोलह कलाओं का सम्बन्ध होता है । इसी रहस्य को लक्ष्य में रखकर ऋषि ने - ' इहैवान्तःशरीरे ' कहा है । शरीर का प्रन्तभीग ( मध्यभाग ) हृदय है । यहीं प्रज्ञानमन पर विज्ञान सम्प्रतिष्ठित है । अव्यक्तादि पाँचों में यही षोडशकल है । यह उपनिषत् इसी की १६ कलाओं का निरूपण करता है । जो लक्ष्य हिरण्यगर्भविद्यामूलक मुण्डकोपनिषत् का है, वही लक्ष्य प्राणरूप से में इस उपनिषत् का है । सम्पूर्ण उपनिषत् क्रमशः पाँच प्राणों का निरूपण कर उनका विज्ञानपुरुष समावेश करता है । अन्त में इसी को ज्ञेय बतला कर अपना वक्तव्य समाप्त करता है । बस, इस ऊपर के प्रपञ्च को लक्ष्य में रखकर ही आगे का प्रकरण देखना चाहिए-१- कौषी ० उप ० ३।२ । ३- कठोप ० २२३ । २- कठोप ० २२५ । ४ - यजुर्वेद १७।५६ । [ २६३ ]
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प्रश्नोपनिषद्विज्ञान माध्य षष्ठ प्रश्न १- अव्यक्तात्मा आत्मा स्वयम्भूः १-२ - पञ्चीकृतप्राणः प्राणाः ३ - त्रिकलस्त्रयी प्राणः पशवः मृत १- महानात्मा आत्मा परमेष्ठी २-२ - पञ्चीकृत ग्रापः प्राणाः ३ - त्रिकल त्रैगुण्यम् = पशवः १- विज्ञानात्मा आत्मा सूर्य्यः ३-२- पञ्चीकृता वाक् = प्राणाः ३ - षोडशकल प्राणादि पशवः १- प्रज्ञानात्मा आत्मा चन्द्रमाः ४-२ - पञ्चीकृतमन्नम् = प्राणाः ३ - चतुर्विंशतिकलमिन्द्रिया ० = पशवः र १ - भूतात्मा = श्रात्मा पृथिवी ५२ - पञ्चीकृतान्नादः = प्राणाः ३- पञ्चकल तन्मात्र प्रपञ्चः पशवः [ २६४ ] षोडशी प्रजापतिनिरूपण → ' अव्यक्तप्रजापतिः ' ' त्रिकलः ' ' महत्प्रजापतिः ' ' त्रिकलः ' ' विज्ञानप्रजापतिः ' ' षोडशकलः ' - ' प्रज्ञानप्रजापतिः ' ' चतुविशतिकलः ' ' भूतप्रजापतिः ' ' पञ्चकलः ' प्रजापति में आत्मा, प्राण, पशु - तीन अवयव होते हैं । व्यासज्यवृत्त्या तीनों पर प्रजापति निरूढ है । आत्मा आत्मा है, प्राण, पशु प्रजा है । अथवा पशु प्रजा है । इस प्रजा को श्रात्मा से बद्ध रखने वाला पाश ' प्राण ' है । तीनों मिलकर एक प्रजापति है । ऐसे पांच प्रजापति हैं । अव्यक्तप्रजापति में अव्यक्त आत्मा है । वाक्प्राणरूप पञ्चीकृत ( अतएव पाँच ) प्राण ' प्राण ' है । त्रिकलप्राण पशु है । यही व्यवस्था शेष चारों में समझनी चाहिए- जैसा कि निम्नलिखित तालिका से स्पष्ट हो जाता है-
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षष्ठ प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य षोडशी प्रजापतिनिरूपण ' द्वा सुपर्णा ० ' - इत्यादि मुण्डकोक्त मन्त्र में इसका स्पष्टीकरण किया जाएगा । ब्राह्मणग्रन्थों में- इन पूर्वोक्त पांचों प्रजापतियों में से पहला श्रव्यक्तप्रजापति ' आभू प्रजापति ' नाम से प्रसिद्ध है एवं चारों प्रतिमाप्रजापति - नाम से प्रसिद्ध हैं । आश्रितधर्म्मरूप १६ कलाओं का विकास चूँकि मध्यस्थ उभयानुग्राहक विज्ञान में है इसलिए यही षोडशकल है । इस प्रकार प्रागन्तुक पशुरूप-कलाओं की अपेक्षा तो यह सोलहकलायुक्त है ही साथ ही में श्रात्मकलानों की अपेक्षा भी यह विज्ञान ही षोडशकल है । पञ्चकल अव्यय, पञ्चकल अक्षर, पञ्चकल आत्मक्षर, परात्पर की समष्टि ही षोडशी पुरुष हैं । इस बोडशकल आत्मयोनिभूत अक्षरदृष्ट्या श्रमृतनाम से प्रसिद्ध षोडशी पुरुषकी सत्ता यद्यपि पाँचों स्थानों पर है । इसलिए आत्मकलापेक्षया पांचों षोडशकल हैं । परन्तु इन सोलह कलाओं का विकास भी यहीं ( अधिदैवत में सूयं में, अध्यात्म में ) विज्ञान में होता है । सूर्य्यं चितिधर्म्मा है । आनन्दविज्ञानगर्भित अक्षरात्मक्षरविशिष्ट मन - प्राण वाङ्मय श्रात्मा चितिधर्म्मा इसी सूय्यं में विकसित होता है - जैसा कि पांचवें प्रश्न में विस्तार के साथ बतलाया जा चुका है । इस प्रकार श्रात्मकलापेक्षया, पशुकलापेक्षया उभयथा शरीर के अन्तर्भाग में प्रतिष्ठित इस विज्ञान के साथ षोडश-कलापना सिद्ध हो जाता है । परन्तु इतना अवश्य है कि यहाँ आत्मकलाओं का निरूपण नहीं है अपितु, ' पशु ' - कलाओं का ही निरूपण है । आत्मकलाओं का निरूपण पञ्चकोषनिरूपण ' में देखना चाहिए । यह पूर्वोक्त षोडशकल विज्ञानात्मा शरीर में प्रतिष्ठित रहता है, परन्तु कब तक? जब तक १६ कलाएँ रहती हैं तभी तक । हम बतला आए हैं कि आत्मा, प्राण, पशु - तीनों मिलकर प्रजापति का स्वरूप बनता है । विना प्राण- पशु के प्रजापति नहीं है । दूसरे शब्दों में विना प्रजा के प्रजापति नहीं है । जिस दिन इसकी पशुरूप सोलह कलाएँ उत्क्रान्त हो जाती हैं, उस दिन शुद्धरूप में परिणत होता हुआ श्रात्मा- ' यथोदकं शुद्धे शुद्धमासिक्तं तादृगेव भवति ' के अनुसार उस व्यापक में मिल जाता है । प्रजापति का प्रजापतिपना नष्ट हो जाता है । विज्ञानप्रजापति अपने स्वरूप में तभी तक प्रतिष्ठित है, जब तक कि उसके साथ पशुरूप सोलह कलाओं का सम्बन्ध है । इनके उत्क्रान्त हो जाने पर यह भी उत्क्रान्त हो जाता है, अतएव इसे अपनी प्रतिष्ठा के लिए अपने पञ्चीकृत वाङ्मय प्राण की - प्राण, आपः, वाक्, अन्न, अन्नाद - इन पाँच कलाओं से १६ कलाएँ उत्पन्न करनी पड़ती हैं । ये पाँचों इसी से उत्पन्न होती हैं एवं ' तत्सृष्ट्वा तदेवानुप्राविशत् ' के अनुसार उन्हें उत्पन्न कर उनका भोग करता हुआ, अतएव प्रजापतिनाम धारण करता हुआ यह इनके आधार पर प्रतिष्ठित रहता है । आध्यात्मिक विज्ञानपुरुष से १६ कलाएँ उत्पन्न नहीं होती - अपि तु, आधिदैविक विज्ञान ( सूर्य ) से १६ कलाओं का प्रादुर्भाव होता है । परन्तु ' योऽसावादित्ये पुरुषः सोऽहं'- ' योऽहं सोऽसौ - योऽसौ सोऽहम् ' के अनुसार दोनों अभिन्न हैं । यह उसी का अंश है । इसी अभेदभाव का उपदेश देने के अभिप्राय से यहाँ अन्तः प्रविष्ट विज्ञान से १६ कलाओं की उत्पत्ति बतला दी गई हैं । यह विज्ञानपुरुष तभी तक अन्तःशरीर में प्रविष्ट रहता है, जब तक कि इससे उत्पन्न ( इसके अंशीसूर्य से उत्पन्न ) १६ कलाओं का शरीर से सम्बन्ध रखता है । इसी सारे विज्ञान को लक्ष्य में रखकर ऋषि कहते हैं-१- द्रष्टव्य तैत्ति ० उप ० २८ । [ २६५ ]
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षष्ठ प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञान भाष्य षोडशी प्रजापतिनिरूपण " तस्मै स होवाच । इहैवान्तः शरीरे सोम्य स पुरुषोयस्मिन्नेताः षोडशकलाः प्रभवन्तीति । स ईक्षाञ्चक्रे । कस्मिन्नु प्रहमुत्क्रान्ते उत्क्रान्तो भविष्यामि कस्मिन्वा प्रतिष्ठिते प्रतिष्ठास्यामि " - इति ॥ ॥ २–३ ॥ आगे का चौथा मन्त्र इन कलाओं का ही निरूपण करता है । अध्यात्मविज्ञान अधिदेवत का अंश है, एतदर्थं प्रध्यात्मविज्ञान से १६ कलाओं की उत्पत्ति बतलाई है - यह गौण समाधान है । वस्तुतः आध्यात्मिक १६ कलाओं का प्रभव - प्रतिष्ठा - परायण आध्यात्मिक विज्ञान ही है । इसी के आधार पर इनकी सत्ता है, अतएव इसी से इनकी उत्पत्ति मानने में भी कोई बाधा नहीं है । हम बतला आए हैं । कि स्वरूपधर्म्मरूप पञ्चीकृत वाङ्मय प्राण इसमें प्रतिष्ठित हैं । आत्माभाग अकर्त्ता है, निर्लेप है । वह स्वयं पैदा नहीं करता, अपि तु प्रकृतिरूप - कुर्वद्रूप - स्वरूपधर्म्मरूप प्राण से ही ३ नई वस्तु उत्पन्न करने में समर्थ होता है । शक्तिमान् निर्लेप है - शक्ति कर्त्री है । इसी अभिप्राय से- ' प्रकृतिः कर्त्री पुरुषस्तु पुष्करपलाशवन्निर्लेपः ० ' - यह कहा जाता है । प्रकृति पुरुष अविनाभूत हैं, अतः अविद्याग्रस्त मनुष्य प्रकृति द्वारा होने वाले प्रपञ्च को-" प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः । अहंकारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते " ॥ -के अनुसार प्रकृतिसंपरिष्वक्त पुरुषभाग को कर्त्ता मान बैठता है । वस्तुतः पुरुष अधिष्ठान-मात्र है, आलम्बनमात्र है । आरम्भण तो प्राणरूप प्रकृति ही बनती है । षोडशी श्रात्मा पुरुष है - उसे स्वप्रतिष्ठार्थं १६ कलाएँ उत्पन्न करनी हैं, एतदर्थं प्रारम्भणरूप पञ्चीकृत वाङ्मयप्राण ( जो कि इस पुरुष की प्रकृति है ) की अपेक्षा रखता है । इसे हमने स्वरूपधर्म बतलाया है । वह तादात्म्यापन्न होता है, अतएव इसे दार्शनिक परिभाषा में स्वभाव ( आत्मा का भाव ) कहा जाता है । इसी के आधार पर उस अजन्मा अजपुरुष को प्रकृति द्वारा होने वाले सर्ग में आना पड़ता है । इसी विज्ञान को लक्ष्य में रखकर भगवान् कहते हैं—
" अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन् ।
प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय संभवाम्यात्ममायया " ॥
यहाँ इस विज्ञानात्मा का स्वभाव वाङ्मयप्राण है । यह पञ्चीकृत होने से प्राण, आपः, वाक्, अन्न, अन्नादमय है । इनमें पहले ' प्राण ' को ही लीजिए । इस प्राणभाग से ( प्राकृत प्राणभाग से ) सर्वप्रथम वह प्रजापति ' प्राण ' ही उत्पन्न करता है । प्राण से उत्पन्न यही प्राणभाग आगे जाकर प्राण, १- गीता ३।२७ । २- गीता ४-६ । [ २६६ ]