प्रश्नोपनिषद् — पृष्ठ 41–50
प्रश्नोपनिषद् · पृष्ठ 41–50
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प्रथम प्रश्न ३- प्रारणो वा अर्कः । ' ५- चन्द्रमा व प्राणः । ७ - वायुर्वे प्राणः । ६ - वायुर्मे प्राणे श्रितः । प्रश्नोपनिषद्विज्ञान माध्य ११- प्राणा वै साध्या देवाः । * १३- प्रारणा रश्मयः । १५ - प्राजापत्यः प्राणः । १७ - प्राणदेवत्यो वै ब्रह्मा । १५ ४- प्राणः सोमः । ६- प्रारणा अग्निः । ८ - वायुहि प्राणः । " १०- प्रारणो वै वनस्पतिः ।5 रयिप्राणनिरूपण १२ - प्रारणा वा ऋषयः । " १४- प्रारणा उ वै प्रजापतिः । १३ १६- प्रारणा उ वै ब्रह्म । " १८- प्रारणा वा श्रापः । १६ इन श्रुतिवचनों से पाठकों को भलीभाँति ज्ञात हो गया होगा कि कहीं अग्नि को प्राण बतलाया जाता है, कहीं वायु को, कहीं सोम को, कहीं वनस्पति को, कहीं ऋषि को, कहीं अर्क को प्राण बतलाया जाता है । कहीं प्राणों को आत्मा की रश्मिऍ बतलाया जाता है तो कहीं प्राण को ही श्रात्मा बतलाया जाता । कभी प्राण को प्रजापति से निकलने वाला मानकर प्राजापत्य बतलाया जाता है तो कहीं प्राण को साक्षात् प्रजापति बतलाया जाता है । यह परस्पर का विरोध कैसे हटाया जाय? आत्मा को प्राण माना जाय, या आत्मरश्मियों को प्राण माना जाय? इस विरोध का परिहार पूर्वोक्त पाँच प्रकार प्राण के प्रारण मान लेने से ही हो जाता है । पाँचों में सबसे पहला मुख्य प्रारण परोरजा है । इस परोरजा को ही विरज भी कहा जाता है । इसी को विरजा ब्रह्म माना जाता है । यह प्राण अमृत ( षोडशी ) का भाग है । अव्यय की पाँच कलाओं में जो प्राण है वही परोरजा प्राण है । इसका विकास स्वयम्भूमण्डल में होता है । स्वयम्भू ब्रह्म है, अतएव इसके लिए ' प्राणो वं ब्रह्म ' ' प्राणो वै प्रजापतिः ' इत्यादि रश्मिएँ कहना हैं-सुसंगत हो जाता है । यह प्राण आत्मरूप है - प्रजापतिरूप है । शेष चारों प्राण इसकी इसके लिए ' प्राजापत्यः प्राणः ' कहा जाता है । प्राजापत्य प्राण आग्नेय, सौम्य, वायव्य, आप्य तीन हैं । अग्नि अंगिरा है । इसके अग्नि, यम ( घोर वायु ), आदित्य - ये तीन भेद हैं । इसलिए हम - ' आग्नेयः प्राणः ', ' यमो वं प्राणः ', ' सविता वं प्राणः ' कह सकते हैं एवं आपः वायु- सोम- ये तीन मृगुप्राण हैं, अतएव ' आपो वै प्राणाः ' सोमो वै प्राणः ', ' वायुर्वे प्राणः ' यह कहा जा सकता है । वस्तुतस्तु प्राण-कुल तीन ही प्रकार का है । एक स्वयम्भू का परोरजाप्राण है । यह आत्मरूप है । स्वयम्भू से नीचे १- शत ० ब्रा ० १०।४।१।२३ । २ शत ० ब्रा ० ७।३।१।२ । ५ - कौ ० ब्रा ० ८ | ४ | ८- ऐ ० ब्रा ० प्र. ६।४ एवं प्र. ७।१० । ६ - शत ० ब्रा ० १०।२।२।३ । ११- ते ० ब्रा ० ३।२।५।२ । १४- शत ० ब्रा ० ८६।४।१।३ । ३- जै ० उप ० प्र. ४।२२।११ । ४ - शत ० ब्रा ० ६।३।१।२१ । ६ - ऐ ० ब्रा ० प्र. ६।३।२६ । ७ - तै ० ब्रा ० ३।१०।६।४ । १० - शत ० ब्रा ० ६।१।१।१ । १२- शत ० ब्रा ० ८ | ४ | १ | ४ | १३-० ब्रा ० ३।३।७।२ । १५ - षडविंश ब्रा ० २६ १६- ता ० ब्रा ० ६६४ [ २७ ]
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प्रथम प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञान माध्य रविप्राणनिरूपण परमेष्ठी है । इसमें एक स्निग्ध प्राण है, एक रूक्ष प्राण है । स्निग्ध प्राण भृगु है, तेज प्राण अंगिरा है । दोनों तीन तीन हैं । आपः, वायु, सोम तीनों परमेष्ठी में ही ( वस्तु के परमाकाश में ही ) रहते हैं । शेष तीनों धादित्य यम - अग्नि क्रमशः रोदसी त्रिलोकी के सूख्यं अन्तरिक्ष, पृथिवी - इन तीनों लोकों में प्रतिष्ठित हो जाते हैं । इस क्रम से पाँचों मण्डल पकड़ में ग्रा जाते हैं । पारमेष्ठ्य सौम्यप्राण ही रोदसी अन्तरिक्ष में प्रति-ष्ठित चन्द्रमा में है । इस प्रकार स्वयम्भू परमेष्ठी, सूर्य, चन्द्रमा अन्तरिक्ष, पृथिवी इनके कुल - परो-रजा, आप्य, वायव्य, सौम्य, ग्राग्नेय ( आग्नेय वायव्य आदित्य ) पाँच प्राण हो जाते हैं । परोरजा स्वयम्भू का ऋषि प्राण है । प्राप्य पारमेष्ठ्य आसुर प्राण है, सौम्य पारमेष्ठ्य पितर प्राण हैं । शिववायु रूप वायव्य परमेष्ठी का मुख्य प्राण है । श्रादित्यरूप आग्नेय सौरप्राण है । वायुरूप श्राग्नेय प्राण अन्तरिक्ष का है एवं अग्निरूप आग्नेय प्राण पृथिवी का है । तात्पर्य्यं कहने का यही है कि इन पाँच प्राणों में यच्चयावत् प्राणों का अन्तर्भाव हो जाता है एवं परोरजा को छोडकर शेष प्राणों का तेज, स्नेहात्मक भृगु - अंगिरा में अन्तर्भाव हो जाता है । बस, हमारा यह उपनिषत् प्रधानरूप से इन्हीं दोनों का निरूपण करता है । जैसा कि प्रथम प्रश्नार्थ में स्पष्ट हो जाएगा-संसार में ऋत सत्य दो ही तत्व है । खाली स्थान को ऋत कहते हैं । पिण्ड को सत्य कहते हैं । दूसरे शब्दों में मूर्ति सत्य है, अमूर्त तत्त्व ऋत है । अमूर्त आप्यवायव्यसौम्यात्मक है । पिण्ड आग्नेय है । जितने भी पिण्ड हैं - सब ग्राग्नेय हैं । पिण्ड के बाहर के आकाश में ( जो कि आकाश वैज्ञानिक भाषा में महिमामण्डल कहलाता है एवं याज्ञिक परिभाषा में वषट्कार नाम से व्यवहुत होता है ) आप:, वायु, सोम रहता है । आप के अवान्तर सात विभाग सात समुद्र है । वायु के सात विभाग अवान्तर सात द्वीप हैं । ये ही सप्त मरुत् हैं । इनके कारण ही पानी के सात विभाग हो जाते हैं । सर्वान्त में ' सोम ' समुद्र है इसे ही पुराणों ने ' अमृत ' समुद्र माना है । अणु से अणु महान् से महान् यच्चयावत् पदार्थों में यह सारा प्रपञ्च है । एक तिल को ले लीलिए । तिल आग्नेय पिण्ड है । इसके ऊपर क्रमशः आपः, वायु- ये इस प्रकार सात वायुस्तर हैं, सात आपः स्तर हैं । ऊपर प्रमृत है । सर्वान्त में परोरजारूप वेद प्राण है । प्रत्येक पदार्थ में पांचों प्राणों की सत्तासिद्ध हो जाती है । अवान्तर सारे प्राण इन पांचों प्राणों में अन्तर्भूत है । बस हमारा उपनिषत् इन्हीं पांचों प्राकृत प्रारणों का प्रधानरूप से निरूपण करता है । ' कठोपनिषत् ' में बतलाए गए ईश्वरीय ब्रह्मसत्य का स्वरूप स्मरण में लाइए । उसके स्वयम्भू-परमेष्ठी -सूर्य - चन्द्र- पृथिवी - ये पाँच भेद बतलाए हैं एवं पाँचों के क्रमशः - १ - वाक् २ - प्राण, १- रयि २- प्राण, १ - धिषणा २- प्राण, १- प्रज्ञा २ प्राण, १ - भूत २ - प्राण- ये दो - दो भाग बतलाए हैं । ये कुल १० ( दस ) हो जाते हैं । इनमें पाँचों में प्राण हैं । वाक्प्राणौवाला प्राण परोरजा नाम का आत्मप्राण प्रारण आग्नेय है । रयिप्राणीवाला पारमेष्ठ्य प्राण - प्राप्य, वायव्य, सौम्यात्मक है । धिषणाप्राणीवाला सौर आदित्य प्राण है । प्रज्ञाप्राणीवाला चान्द्रप्राण सौम्यप्राण है भूतप्राणीवाला पार्थिव प्राण आग्नेय प्राण है | आग्नेय, वायव्य, आदित्य- तीनों सत्यप्राणात्मक आग्नेय प्राण हैं । तीनों अवराध्यं की वस्तु है हैं । प्राप्य , अतः तीनों का आग्नेय प्राण से ग्रहण है चान्द्र प्राण का पारमेष्ठ्य सौम्य प्राण में प्रन्तर्भाव वायव्य - सौम्य - तीन पारमेष्ठ्य रविप्राणवाला प्राण है । सर्वान्त में परोरजा प्राण है । इस प्रकार से [ २८ ]
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प्रथम प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य रविप्राणनिरूपण भी कुल पाँच ही प्राण रह जाते हैं । एक ही तत्त्व है - निरूपण में अन्तर है । ये पाँचों प्राण उस अमृतात्मरूप षोडशी के ( जिसे कि सर्वान्तरतम रहने से ' गूढोत्मा'- ' अणोरणीयान् ' कहा जाता है ) प्राण है । इन्हीं के लिए पूर्व में— " एषोऽणुरात्मा चेतना वेदितव्यो यस्मिन् प्रारणः पञ्चधा संविवेश " ॥ ' — यह कहा गया है । यद्यपि इनका क्रम - वाक्प्राणौ, रयिप्राणौ, धिषणाप्राणी, प्रज्ञाप्राणी, भूत-प्राणी - यह कहा है । परन्तु किसी विशेष रहस्य को लक्ष्य में रखकर प्रश्नोपनिषत् ने निम्नलिखित क्रम से इनका निरूपण किया है--१- रविप्राणौ २- प्रज्ञाप्राणौ ३- भूतप्राणौ -४- षिवरणाप्राणौ ५- वाक्प्राणो इस क्रमव्यत्यास का एकमात्र कारण सृष्टिविज्ञान है । परोरजारूप वाक्प्राणौ वाले प्राण से सृष्टि नहीं होती । वह असंग है । यहाँ पर प्रश्न- ' कुतो हवा इमाः प्रजा प्रजायन्ते ' है यह । प्रजोत्पत्ति सृष्टि है । सृष्टि संसृष्टि है । संसृष्टि मेल है । मेल पारमेष्ठ्य अपरूप स्नेहतत्त्व से सम्बन्ध रखता है, अतः ऋषि ने पहले इसी का निरूपण किया है । चन्द्रमा पारमेष्ठ्यभाग होने से सजा-तीय है, अतः रयिप्राण के अनन्तर ही श्रुति ने इस प्रज्ञात्मक प्राण को ले लिया है । प्रज्ञाप्राण भूतात्मा का भाग है, अतएव तदनन्तर भूतप्राण को रखा है । अनन्तर सौर धिषणामय प्राण का निरूपण करते हुए परोरजात्मक वाक् प्राण पर उपसंहार किया है । ' द्वयं वा इदं न तृतीयमस्ति ' २. ' अत्ता चैवाद्यं च ' इस निगम श्रुति के अनुसार अन्न और अन्नाद इन दो के अलावा कोई तीसरी वस्तु नहीं है । यदि इन दो से पृथक् तीसरी वस्तु कोई मानी जा सकती है - तो वह है- ' आवपन ' । अन्नाद जिस धरातल पर बैठकर अन्न खाता है वही श्रावपन है । श्रावपन ' ख ' ब्रह्म है । अन्नाद ' र ' ब्रह्म है, ग्रन्न ' क ' ब्रह्म है । खं ब्रह्म, रं ब्रह्म, कं ब्रह्म- जब तीनों ब्रह्म मिल जाते हैं - तब ' श ब्रह्म ' का स्वरूप बनता है । उदाहरण के लिए आप अपने को ही लीजिए । शरीर आवपन है । यही शरीराकाश ' खं ब्रह्म ' है । इस ' खं ब्रह्मरूप ' श्रावपन पर रमणशील ' र ' ब्रह्म ( भोक्तात्मा ) प्रतिष्ठित रहता है । सुखसाधक, अतएव ' क ' ब्रह्म नाम से प्रसिद्ध अन्नब्रह्म की जब इस ' र ' ब्रह्म में आहुति होती है तो ' क ' परमशान्ति को तृप्ति को प्राप्त होता हुमा ' शं ' ब्रह्म बन जाता है । बस, इन चार से पृथक् कोई पाँचवीं वस्तु नहीं है, प्रतएव ' चतुष्टयं वा इदं सर्वम् ' यह कहा जाता है । जिन प्राणों का हमने पूर्व १ - मुण्डकोप ० ३।१।६ | २- शत ० ब्रा ० १।६।३।२३ । ३- शत ० ब्रा ० १०।६।२।१ । [ २ ९ ] ह
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प्रथम प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञान भाष्य रविप्राणनिरूपण में निरूपण किया है - त्रे प्राण अन्नाद हैं । अन्नाद के लिए ग्रन्न और आवपन दो वस्तु और अपेक्षित हैं । इन दोनों के सम्बन्ध से प्राणान्नाद ' शं ' ब्रह्म बनेगा । प्रसंगागत प्राणान्नादरूप ' र ' ब्रह्म के इन दोनों के स्वरूप को बतला देना भी अनुचित न होगा । सबसे पहले स्वयम्भू को लीजिए । स्वयम्भू में वाक्प्राण है । स्वयम्भू आवपन है । प्राण अन्नाद है । वाक् अन्न है । तीनों की समष्टि ' शम् ' है । यही क्रम सबमें समझना चाहिए । साथ ही में जैसी स्थिति अधिदैवत में है - वैसी ही अध्यात्म में समझनी चाहिए । याद रखिए इस उपनिषत् के कर्त्ता पिप्पलाद हैं । पिप्पल खाने वाले - पिप्पलाद हैं । इस नाम से भी हमें कुछ सिखाया जाता है । कठोप-निषत् में - ' अश्वत्थ वृक्ष ' का निरूपण करते हुए हमने बतलाया है कि उसकी एक टहनी पर दो पक्षी बैठे हैं । उनमें एक पिप्पल का स्वाद ले रहा है, एक चौकसी कर रहा है - जैसा कि -" तयोरन्य: पिप्पलं स्वाद्वत्ति अनश्नन्नन्यो अभिचाकशीति " । " -इत्यादि से स्पष्ट हो जाता है । पिप्पल खाने वाला और कोई नहीं वही हमारा मोक्तात्मा नाम से प्रसिद्ध प्राणात्मा है । प्राण ही पिप्पलाद है । दूसरे शब्दों मे प्राणप्रपञ्च पिप्पलाद है । इस उपनिषत् में क्या है? - पिप्पलाद का वर्णन है । पिप्पल खाने वाले, अतएव पिप्पलाद नाम से प्रसिद्ध प्राणों का वन है । ' यह उपनिषत् पिप्पलाद उपनिषत् है'- इसका अर्थ यही है कि इस उपनिषत् में पिप्पलाद नाम से प्रसिद्ध प्राणों का वर्णन है । इसीलिए तो हमने इस उपनिषत् को प्रारम्भ में ' प्राणोपनिषत् ' कहा है । पाँचों पिप्पलाद प्राणों के अध्यात्म और अधिवत में भावपन और अन्न कौन कौन से हैं? यह निम्नलिखित तालिका से स्पष्ट हो जाता है-( अधिदेवत पिप्पलाद - प्रपञ्च ) ( १ ) १- आवपन स्वयम्भू = सं ब्रह्म २- अन्नाद = प्राण = रं ब्रह्म =: -शं ब्रह्म स्वयम्भूः -१ ३- अन्न == वाक् = कं ब्रह्म ( २ ) १- प्रावपन = परमेष्ठी = खं ब्रह्म २- श्रन्नाद = प्राण ३- अन्न = रवि = रं ब्रह्म - शं ब्रह्म परमेष्ठी -२ १ - मुण्डकोप ० ३।१।१ ।
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प्रथम प्रश्न ( ३ ) प्रश्नोपनिषद्विज्ञान भाष्य १ - श्रावपन = सूर्य्यः = खं ब्रह्म २- अन्नाद = प्राणः = रं ब्रह्म - शं ब्रह्म = सूर्य्य: - ३ ३- अन्न = धिषणा = कं ब्रह्म ( ४ ) १- प्रावपन चन्द्रमाः खं ब्रह्म २- श्रन्नाद = प्राणः = रं ब्रह्म - शं ब्रह्म = चन्द्रमाः -४ ३- अन्न = प्रज्ञा == कं ब्रह्म ( ५ ) १- आवपन = पृथिवी = खं ब्रह्म २- अन्नाद = प्राण: = रं ब्रह्म - शं ब्रह्म = पृथिवी - ५ ३- अन्न = भूतानि = कं ब्रह्म -883-( अध्यात्मगत पिप्पलाद - प्रपञ्च ) = ५ प्राणो वै रं- " प्रारणे हीमानि सर्वाणि भूतानि रतानि " " १- अव्यक्तात्मा १- आवपन = श्रव्यक्तखं ब्रह्म २- प्रन्नाद = प्राण = रं ब्रह्म -शं ब्रह्म = अव्यक्तात्मा - १ २- महानात्मा ३- अन्न = वाक् कं ब्रह्म १- आवपन महान् खं ब्रह्म २- अन्नाद = प्राण = रं ब्रह्म } - शं ब्रह्म = महानात्मा - २ ३- अन्न = रयि कं ब्रह्म ३ - विज्ञानात्मा १- आवपन = विज्ञान खं ब्रह्म २- अन्नाद प्राण ३- अन्न = रं ब्रह्म = धिषणा = कं ब्रह्म --शं ब्रह्म = विज्ञानात्मा -३ १- शत ० ब्रा ० १४।८।१३।३ । [ ३१ ] रयिप्राणनिरूपण THE BE
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प्रथम प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य ४- प्रज्ञानात्मा १- प्रवपन = प्रज्ञान = खं ब्रह्म = रं २- अन्नाद = प्राण = ब्रह्म } - शं ब्रह्म = प्रज्ञानात्मा -४ = कं ब्रह्म ३- अन्न = प्रज्ञा = = १- प्रावपन शरीरभूतखं ब्रह्म ५ - भूतात्मा २- अन्नाद = प्राण = रं ब्रह्म - शं ब्रह्मभूतात्मा - ५ ३- अन्न = भूत = कं ब्रह्म रविप्राणनिरूपण ( 3 ) ----है । जैसे विज्ञान तन्त्र शास्त्र में ' र ' को अग्नि बीज माना गया है । ' र ' अग्नि का निदान प्राण अन्नाद शास्त्र में सोम को अन्न माना जाता है एवमेव अग्नि को अन्नाद माना जाता है । पाँचों हैं, अतः अन्नादसाधर्म्य से अन्नाद पाँचों प्राणों के लिए ' र ' ब्रह्म कहा है । के ये पाँच सारे प्रपञ्च से प्रकृत में हमें केवल यही बतलाना है कि पूर्वप्रतिपादित धात्माओं म्रात्मा ही प्राण हैं । इन पाँचों प्राणों से जब तक वह अमृतात्मा अलग रहता है, तब तक तो वह हो जाता है तो ' सत्यात्मा ' नाम कहलाता है । परन्तु जब वह प्राकृतात्मारूप इन पाँचों प्राणों से युक्त सत्यात्मा न कहला धारण कर लेता है । यदि इसमें पाँच पशु और मिला दिए जाते हैं तो पशुविशिष्ट कर ' महात्मा ' कहलाने लगता है जैसा कि आगे जाकर स्पष्ट हो जाएगा । आत्मा और उसके पाँच प्राणों का निरूपण हो चुका अब क्रमप्राप्त पशुओंों का भी संक्षिप्त रूप से निरूपण कर देते हैं । श्राज पशु शब्द से हमने जिन अश्व, गौ, अज आदि को पशु अपने समझ आपको रखा है- विज्ञानजगत् के ' पशु ' शब्द की परिभाषा हमारी समझ से भिन्न है । जो तत्त्व रहता है यही ' प ' धारण करने में समर्थ होता है उसका नाम आत्मा है एवं जो तत्व आत्मा से छूत है । प्राणान्नसन्निविष्ट है । अनात्मीय, परतन्त्र, आत्मभोग्य, ग्रात्मा पर प्रतिष्ठित वस्तुमात्र पशु है । पशु प्रश्न ' पशु ' है सब किसी न आत्मा अन्नाद है । भोग्य अनात्मीय वस्तु ही ' पशु ' है । संसार में जितने ' - भी इस मन्त्र का अर्थ करते किसी आत्मा के अन्न हैं- जैसा कि ' ईशोपनिषत् ' के ' ईशा वास्यमिद सर्वम् किसी आत्मसत्ता से हुए उसी उपनिषद में विस्तार के साथ बतलाया जा चुका है जब तक वह वह अन्य पशु आत्मा का अन्न नहीं धाकान्त रहता है - किसी एक मात्मा का अन्न बना रहता है तब तक होने से ' पशु ' है । बन सकता । मक्खी में आत्मा और शरीर दो भाग हैं । यह शरीरभाग आत्माधीन नहीं खा सकती । पहले उस आत्मा का अन्न है । जब तक यह आत्मा है, तब तक मक्खी को छिपकली अपना धन्न बना सकेगी । इसी उसे उसको धात्मा से पृथक् कर देना पड़ेगा तब यह उस पशुभाग को [ ३२ ]
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प्रथम प्रश्तु — यह कहा है । १ - ईशोप ० १ । रविप्राणनिरूपण प्रश्नोपनिपद्विज्ञानभाष्य २ - ' यदपश्यत्तस्मादेते पशव: - शत ०० ६।२।१।२ । [ ३३ ] अज पशु है । परन्तु साधारण विज्ञान को बतलाने के लिए ' तेन त्यक्त ेन भुञ्जीबा " - यह कहा जाता तब है वह । पशुभाग ( शरीर ) अभी वह उस आत्मा का अन्न है । पहले उसकी आत्म - सत्ता हटाओ तभी बन सकता है - जब कि उसको तुम्हारा अन्न बनेगा । निष्कर्ष यही है कि एक पशु दूसरे का प्रन्न हैं । अतः ' कहते हैं । अजादि हमारे भोग्य उस आत्मा से अलग कर दिया जाता है । भोग्यजात को ' पश पशु ' हैं । यदि पशु शब्द का और भी ये हमारे पशु हैं । हम सूर्य्यादि के भोग्य हैं, अतः हम उनके वह ' पशु है ' यही निष्कर्ष निकलेगा । हम स्पष्टीकरण किया जाय तो - ' जो वस्तु हम आँखों से देखते हैं है । श्रात्मा को हम नहीं देखते । आत्मा आँखों से ' भूतप्रपञ्च ' देखते हैं । भूतप्रपञ्च के भीतर आत्मा भोग्यरूप भूतों को देखता है, अतएव अर्थात् जीवस्वरूप हम भूतों को देखते हैं । चूंकि श्रात्मप्रजापति इन ही ' पशु ' कहने के लिए तय्यार हैं । ' यदपश्यत् ० ' - इस व्युत्पत्ति से इन भूतप्रपञ्चों को हम बना अवश्य है । सब का परस्पर श्रादान - विसर्ग होता पृथिवी, जल, तेज, वायु, आकाश- इन पाँच भूतों से सब कुछ हैं । सब का आत्मभाग अन्नाद ही है, रहता है । इस परिभाषा के अनुसार सब भन्न हैं, सब अन्नाद भूतों का आधार वही प्राण है । जब भूतभाग अन्न ही है । दोनों की समष्टि ' वस्तु ' है । इन पशुरूप को ' विधर्त्ता ' कहा जाता है । इसी अभिप्राय तक प्राण रहता है तब तक भूत रहते हैं, श्रतएव प्राण से इसी उपनिषत् में इस प्राण के लिए— ” । " वयमेतद् बाणमवष्टभ्य ( शरीरयष्टिमवष्टभ्य ) विधारयामः , सलिल, अग्नि - इन नामों से प्रसिद्ध हैं । १- ये पशु कुल पांच हैं । वे पाँचों पशु - छन्द, पोष, अन्न ही लीजिए । कुल पाँच ही हो सकते । इन पाँचों में से पहले ' छन्द ' को बस, पशु हो सकते हैं तो में वय, वयोनाघ- दो पदार्थ रहते हैं । वस्तु वय प्रत्येक वस्तु ' वयुन ' नाम से प्रसिद्ध है । वयुनरूप वस्तु नहीं है - वस्तु को सुरक्षित रखने वाली सीमा है । है, वस्तु का आकार वयोनाध है । आकार कोई वस्तु कोई अपना अन्न नहीं बना सकता । रोटी वय है । जब तक वयोनाध रहता है, तब तक उस वय को वयोनाष को तोड़ो, तब रोटी तुम्हारा यह श्राकाररूप वयोनाघ से सुरक्षित है । पहले श्राकाररूप को ' छन्द ' कहा जाता है । संसार में जितने भी अन बनेगी । बस, वयोनाध से प्रसिद्ध इसी आकार संहिता में गिन डाला है । छन्द यद्यपि धाकार हैं- उनका भिन्न - भिन्न स्वरूप है- उन सबको - यजुर्वेद गया है । इन सात ( ७ ) उन सबका गायत्र्यादि ७ ( सात ) में ही अन्तर्भाव कर लिया अनन्त हैं, तथापि लिया गया है । पृथिवी, अन्तरिक्ष, द्यौ - तीन का भी अन्ततोगत्वा तीन ( ३ ) में ही पय्र्यवसान मान छन्द ' मा ' है । आन्तरिक्ष्य छन्द ' प्रमा ' है । लोक हैं । तीनों के तीन प्रकार के छन्द हैं- पार्थिव अवान्तर सारे छन्द गतार्थ हैं । यह छन्द ही दिव्य छन्द ' प्रतिमा ' है । त्रैलोक्य के इन तीनों छन्दों से से एक ही पानी भिन्न - भिन्ननामगुणोपेत पदार्थभेद का कारण है । कूप बावड़ी तालाब आदि छन्दभेद कोई छन्द नहीं हो । जिसका छन्द नहीं, वह हो जाता है । संसार में ऐसा कोई पदार्थ नहीं, जिसका । छन्दपशु है - यही निष्कर्ष है वस्तु ही नहीं । भूतमात्र में जो आकार है वही पहला
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प्रथम प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य रयिप्राणनिरूपण २ - छन्द के अनन्तर है - पोष । बल, दीर्य, द्रविण भेद से पोष तीन प्रकार का है । वित्तसंपत्ति द्रविण है । शरीरसंपत्ति बल है एवं ब्रह्म, क्षत्र, विट् - तीनों में से एक संपत्ति वीर्य्यं है । तीनों में से आत्मा के दो तो अन्तरङ्ग हैं- द्रविण बहिरंग है । इन तीनों से आत्मा पुष्ट रहता है - महाशय बना रहता है । विना इनके वह अपने आपको निर्बल, निर्वीर्य्य, भाग्यहीन समझता है । चूंकि इनसे आत्मभाग पुष्ट होता है, अतएव हम इनको ' पोष ' कहने के लिए तय्यार हैं । सादा कूर्च ( कोच ) छन्दपशु से युक्त है । पालिसदार उभारु मेज पोषपशु से युक्त है । ३ - ज्ञान, क्रिया, दाना ( पृथिवी ), पानी ( जल ), हवा ( वायु ) रोशनी ( तेज ), खुला मैदान ( श्राकाश ) - ये सात सुप्रसिद्ध श्रश्न हैं । इनको यह आत्मा खाया करता है । विना इनके यह कथमपि जीवित नहीं रह सकता । पृथिवी, जल, तेज, वायु, आकाश - ये पाँचों अन्न वाक्रूप हैं । क्रिया प्राण है | ज्ञान मन है । इन्हीं तीनों से आत्मा का स्वरूप बना हुआ है अतएव आत्मा के लिए ' स वा एष आत्मा वाङ्मयः प्राणमयो मनोनयः ' कहा जाता है । यहीं तीसरा अन्नपशु है । ४- चौथा है - सलिल । सलिल का अर्थ है- ' सरिर ' । पदार्थों में अवस्था एवं ऋतुपरिवर्त्तनादि होते रहते हैं । भिन्न - भिन्न ऋतुस्रों में पदार्थ भिन्न - भिन्न स्वरूप में परिणत होता रहता है । सर्दी में हमारा चित्त भिन्न प्रकार का ही रहता है - गर्मी में और ही तरह का रहता है । कभी सर्दी लगती है - कभी जुकाम लगती है - कभी सुख है - कभी दुःख है । कभी बालक थे- आाज युवा हैं - कभी वृद्ध हो जायेंगे । बस, जो रस इन नानाभावों में परिणत होता रहता है वही ' सरत् ( गच्छन् ) इरा ( रसः ) यस्य'- इस व्युत्पत्ति से ' सरिर ' कहलाता है । पानी भी बहता रहता है, अतएव वह भी ' सरिर ' ही कहलाता है । ' यत् पर्य्यपश्यत् सरिरस्य मध्ये ० ' - इत्यादि में सरिर ' सलिल ' का ही वाचक है । सूर्य्यमाण इरायुक्त तत्त्वविशेष ही सरिर ( सलिल ) पशु है । ५- पाँचवाँ है - ग्रग्नि । आग्नेय ये पशु - पुरुष, अश्व, गौ, अवि, अज - इन नामों से प्रसिद्ध हैं । सौर संवत्सराग्नि- पार्थिव उखा में वर्षभर तक रहकर वैश्वानर बनती है । वैश्वानर चित्ररूप में परिणत होता है । चित्र कुमार बनती है । कुमाराग्नि श्रागे जाकर पुरुषादिस्वरूप में परिणत होती है । चेतनमात्र में शरीर निर्माण करने वाला वैश्वानर नामक पुरुषपशु है । औरों की अपेक्षा यह पुरुषभाग मनुष्यों में अधिक रहता है, अतएव हम उसी ' पुरुष ' नाम से पुकारे जाने लगते हैं । वस्तुतः वस्तुमात्र पुरुष है । वैश्वानर ही सबका शरीर बना हुआ है । इसी विज्ञान के आधार पर - ' पुरुष एवेदं सर्वं यद्भूतं यच्च भाव्यम् ' - यह कहा जाता है एवं प्रतिफलित सौर अग्नि ' अश्व ' है । इससे अश्व पशु का श्रात्मा बनता है, अतएव चेतन - अश्व अश्व कहलाता है । इस उभयविध प्रश्व का ' कठोपनिषत् ' के ' अश्वत्थ ' प्रकरण में विस्तार के साथ निरूपण किया जा चुका है । श्राती हुई सीधी सौर रश्मिऍ ' गो ' हैं । इनसे जिस पशु का आत्मा बनता है वही पशुओंों में ' गौं ' नाम से प्रसिद्ध हैं एवं वृक्षों में हरियाली पैदा करने वाला द्यावापृथिव्यात्मक प्रगर्भित अग्नि ' अवि ' है इससे जिसका आत्मा बनता है- पशुओं में वह ' अवि ' नाम से प्रसिद्ध है । एतदतिरिक्त पार्थिवादि श्रवान्तर सारे अग्नि ' अज ' हैं । ये पाँचों थोड़ी बहुत मात्रा में प्रत्येक पदार्थ में रहते हैं । ये पाँचों पशु ' आग्नेय ' हैं । यह पशु की एक जाति है । [ ३४ ]
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प्रथम प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य रविप्राणनिरूपण इस प्रकार छन्द, पोष, अन्न, सरिर, अग्निभेद से पाँच प्रकार के पशु हो जाते हैं । वेद में जहाँ कहीं पशु शब्द आवे इन्हीं पाँचों में से प्रकरणानुसार किसी एक का सम्बन्ध समझना चाहिए । ये पाँचों पशु आत्मा की श्री हैं - शोभा हैं, अतएव पशुओंों के लिए ' पशवो वं श्रीः ' यह कहा जाता है । यद्यपि पशुओं के विषय में अभी बहुत कुछ वक्तव्य है, तथापि विस्तारभय से एवं अप्राकृत होने से अगत्या इस प्रकरण को यहीं समाप्त करना पड़ता है । हम अनुपद में ही बतला आए हैं कि प्राणयुक्त आत्मा ' सत्यात्मा ' कहलाता है, परन्तु यदि पशुओं का सम्बन्ध करा दिया जाता है तो वह ' यज्ञात्मा ' कहलाने लगता है । यज्ञ का स्वरूप पशुओं पर निर्भर है । जैसा कि श्रुति कहती है - पशवो हि यज्ञः ' । ' इस प्रकार पाँच आत्मा, पाँच प्राण, पाँच पशु - इन तीनों के समन्वय से एक १६ वें ( सोलहवें ) प्रजापति का स्वरूप निष्पन्न हो जाता है । इन्हीं तीनों को कठोपनिषत् ने श्रमृत, ब्रह्म, शुक्र कहा है । पांचों आत्मा अमृत हैं । पाँचों प्राण ब्रह्म हैं । पशुविशिष्ट प्राणभाग शुक्र है । एक के तीन विवर्त्त हैं । कठ में महदक्षर और अश्वत्थ- दोनों के विषय में- ' तदेव शुक्रं तद्ब्रह्म तदेवामृतमुच्यते ' यह कहा है । यह है - उपनिषत् पुरुष का स्वरूप । इस उपनिषत् में प्रधानरूप से प्राणभाग का स्वरूप बतलाया गया है ।
इस उपनिषत् में जो कुछ बतलाया गया है - सब का सार आपके सामने रख दिया गया है ।
अब इसके शब्दार्थ की ओर आपका ध्यान आकर्षित किया जाता है-॥ २ ॥
" श्रधिदेवतमध्यात्मं वा देवसत्यवैश्वानरे परमेष्ठिप्रजापति जातयोरग्नीषोमीययोस्तेजः स्नेहगुरणयोः प्राणरय्योः - सृष्टिरहस्यम् ” – पिप्पलाद की श्राज्ञानुसार ६ नों विद्वान् वर्षभर के लिए चले गए । जब वर्ष समाप्त हो गया तो उन सबमें से कबन्धी कात्यायन सबसेपहले आगे आए और विनीतभाव से प्रश्न करते हुए बोले-भगवन्! ' यह सारी प्रजा कहाँ से पैदा हुई है? इस प्रजात्मक विश्व का उपादानकारण कौनसा है? " अथ कबन्धी कात्यायन उपेत्य पप्रच्छ भगवन्कुतो ह वा इमाः प्रजाः प्रजायन्त इति ॥३ ॥
ने कबन्धी का समाधान करते हुए ऋषि बोले कि " प्रजा की इच्छा रखने वाले उस प्रजापति कि ) ये ही तप किया, तपश्चर्या द्वारा ' रथि और प्राणरूप ' मिथुन पैदा किया, ( पैदा करके उसने कहा दोनों मेरी इच्छानुसार नाना भेदभिन्न प्रजा उत्पन्न करेंगे " जैसे प्रजापति का प्राणभाग झगड़ा मरा १- शत ० ब्रा ० ३।१।४।६ । [ ३५ ]
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प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य रयिप्राणनिरूपण हुआ है - एवमेव प्रजापति शब्द भी झगड़े से खाली नहीं है । जैसा कि निम्नलिखित निगमागम श्रुति-वचनों से स्पष्ट हो जाता है— १- " प्रजापतिर्वा श्रग्निः " । " २ - " यो ह खलु वाव प्रजापतिः स उ वेवेन्द्रः " ३- " वाग्वै प्रजापतिः " ।3 ४- " प्रजापतिर्वै वाचस्पति: " ५- " संवत्सरो वै प्रजापतिः " । " ६- " एतद्वै प्रजापतेः प्रत्यक्षं रूपं यद्वायुः " ७- " प्रजापतिर्वै चन्द्रमाः " । " ८- " प्रजापति महान् " । " ६- " प्रजापतिर्वै वसिष्ठः " । " १० - " श्रात्मा वै प्रजापतिः " । १० " ११- “ पितरः प्रजापतिः " । " १२- " भूतो वै प्रजापतिः " ।१३ इस प्रकार प्रजापति शब्द भिन्न - भिन्नरूप से उपर्वाणित हुआ है । ऐसी अवस्था में श्रौत प्रजा-पति शब्दों के अर्थों में बड़ा झगड़ा हो जाता है । " अमुक स्थल का प्रजापति अमुक अर्थ में प्रयुक्त हुआ है " - इसका निर्णय करना कठिन हो जाता है । ब्राह्मणग्रन्थों में तो प्रजापति शब्द की प्रकरणानुसार प्रायः उसी स्थल पर ( में ) व्याख्या कर दी जाती है । परन्तु उपनिषदों में झगड़ा पड़ता है । उप-निषत् केवल ' प्रजापति ' शब्द का उल्लेखमात्र कर देता है । उसकी व्याख्या स्पष्टरूप से नहीं करता 7 एक प्रजापति ही क्या उपनिषत् के सारे विषय ही इतने परोक्ष हैं - केवल अक्षरार्थ से कदापि वे हल नहीं हो सकते । ऋषियों ने उपनिषदों में सारा ब्रह्मविज्ञान भर दिया है, परन्तु बहुत सूक्ष्मरूप से । हमने तो आज तक उपनिषदों के जितने भाष्य देखें हैं - उन सबको अधूरा ही पाया है । किसी ने सन्तोषप्रद अर्थ नहीं किया है । ' प्रांशुलभ्ये फले लोभादुद्वाहुरिव वामनः- इस सूक्ति को चरितार्थं करने के लिए हमने भी इस दुरूह कार्य में हाथ डाला है । ' हमारा अर्थ यथार्थ ही होगा ' - यह नहीं कहा जा १- शत ० ब्रा ० २।३।३।१८ ३- शत ० ब्रा ० ५।१४५४६ । ५ - शत ० प्रा ० २।३।३।१८ । ७ शत ० ब्रा ० ६।१।३।१६ । १- कौ ० ग्रा ० २५।२ । ११ - गो ० उ ० ब्रा ० ६११५ । २० ब्रा ० ११२१२५ | ४- शत ० ब्रा ० ५।१।१।१६ । ६- कौ ० ब्रा ० १६।२ । ८ शत ० ब्रा ० ६।१।३।१६ । १०- शत ० ब्रा ० ४।५।६।२ | १२- तै ० ब्रा ० ३।७।१।३ । ३६ ]