प्रश्नोपनिषद् — पृष्ठ 51–60
प्रश्नोपनिषद् · पृष्ठ 51–60
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प्रथम प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य रविप्राणनिरूपण सकता, परन्तु इतना अवश्य कहेंगे कि इस अर्थ से पाठकों की वेद की ओर प्रवृत्ति अवश्य ही होगी । अस्तु, कहना यह है कि यहाँ पर कबन्धी कात्यायन के प्रश्न करने पर पिप्पलाद ने ' प्रजापति ' को सामने रखा है । यह प्रजापति कौनसा प्रजापति है? पहले इसी का विचार करना है । चाहे कोई सा भी प्रजापति हो उसमें आत्मा - प्राण- पशु - ये तीन खण्ड तो अवश्य ही मानने पड़ेंगे । आत्मरूप अमृतात्मक प्रजापति सबमें मुख्य है । पहले सबकी उधर ही दृष्टि जाती है । क्या यहाँ का प्रजापति शुद्ध आत्मा का वाचक है? नहीं । कारण इसका यही है कि यहाँ के प्रजापति को सृष्टिकर्त्ता बतलाया है । सृष्टि करना कर्म है । कायिक, वाचिक, मानसिक भेद से कर्म्म कुल तीन प्रकार के होते हैं । काय स्थूल-शरीर है, वाक् सूक्ष्मशरीर है, मन कारणशरीर है । आत्मा तीनों से पृथक् है । सुतरां शुद्ध ग्रात्मा की निष्क्रियता सिद्ध हो जाती है । यह आत्मा ( षोडशी प्रजापति ) प्रकृति को साथ लेकर ही कर्म्म करने में समर्थ होता है । शुद्ध आत्मा को प्रजापति कह दिया जाता है, परन्तु वस्तुतः शुद्ध प्रात्मा प्रजापति नहीं है । प्रकृति से युक्त होकर प्रजा पैदा करने के अनन्तर वह प्रजापति नाम धारण करता है, अतएव यहाँ के प्रजापति शब्द को हम प्रकृतिविशिष्टपुरुष कहने के लिए तय्यार हैं । प्रकृतिएँ स्वयम्भू - परमेष्ठी - सूर्य्य - चन्द्रमा पृथिवी पाँच हैं । पाँचों से युक्त पुरुष प्रजापति है । इन पाँचों में भी सृष्टि का प्रधान कारण परमेष्ठीरूप महत् - प्रकृति से युक्त पुरुष प्रजापति ही है । सृष्टिभाव, गुण, विकार भेद से तीन प्रकार की होती हैं । इनमें -" महर्षयः सप्त पूर्वे चत्वारो मनवस्तथा " ॥ “ भवन्ति भावा भूतानां मत्त एव पृथग्विधाः " ॥ ' -के अनुसार भावसृष्टि का अव्ययपुरुष ( शुद्ध श्रात्मा ) से सम्बन्ध है । इस सृष्टि के अभिप्राय से ही हमने शुद्ध आत्मा को भी प्रजापति शब्द से व्यवहृत कर दिया है । इसी को ' मानसी सृष्टि ' कहते हैं । अक्षररूप पराप्रकृति से गुणसृष्टि होती है एवं क्षररूप अपरा प्रकृति से विकारसृष्टि होती है । इसी अभिप्राय से- ' विकारांश्च गुणांश्चैव विद्धि प्रकृतिसम्भवान् ' २ - इत्यादि कहा जाता है । इन तीनों सृष्टियों में भाव, गुण - दोनों कहने को सृष्टि हैं । क्योंकि संसृष्टि ( दो वस्तुओं का परस्पर में घनिष्ठ सम्बन्ध ) सृष्टि कहलाती है । अव्यय, अक्षर- दोनों की भाव, गुणरूप दोनों सृष्टिएँ अलग हैं, अतः वे दोनों सृष्टिएँ संसृष्टिरूप प्रजासृष्टि से बाहर की वस्तु हैं । सुतरां यहाँ पर दोनों अलग हो जाते हैं । बाकी बचती है - विकारसृष्टि । क्षरभाग से विकार उत्पन्न होते हैं । विकारक्षर पञ्चीकरण द्वारा पञ्चजन- पुरञ्जन बनते हैं इनमें सबसे पहला पुर स्वयम्भू है । इसमें ऋषिसृष्टि होती है । विकार सृष्टि की यह पहली सृष्टि भी कहने भर को ही विकारसृष्टि है, वस्तुतः यह भी पूर्ववत् प्रसंग ही है । संगभाव स्नेहगुरण से सम्बन्ध रखता है । यह स्नेहृतत्त्व परमेष्ठी में उत्पन्न होता है, अतएव संसृष्टिरूप सृष्टि का मूलकारण स्नेहयुक्त परमेष्ठी प्रजापति को ही माना जाता है । ऐसी अवस्था में यहाँ का प्रजापति शब्द - ' परमेष्ठी ' प्रजापति का, दूसरे शब्दों में- परमेष्ठिप्रकृतियुत पुरुष १ - गीता १०।५-६ । २ - गीता १३।१६ । [ ३७ ]
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प्रथम प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञान माध्य रविप्राणनिरूपण प्रजापति का ही वाचक समझना चाहिए ' दहर उत्तरेभ्य: ' इस शारीरक सिद्धान्त के अनुसार उस ब्रह्मसत्यात्मक प्रजापति की ( प्राकृत प्राणविशिष्ट षोडशी की ) क्रमशः स्वयम्भू - परमेष्ठी सूपं चन्द्रमा-पृथिवी ये पाँच संस्थाएँ हो जाती हैं । पाँचों में सृष्टि का मूलभूत यही स्नेहधर्मा परमेष्ठी प्रजापति है । प्रजासृष्टि से यहाँ मैथुनी सृष्टि अभिप्रेत है इसीलिए तो मिथुनमुत्पादयते ' कहा है । मैथुनी सृष्टि दो तत्त्वों के संयोग पर निर्भर है । यह संयोग पानी का धर्म है । पानी स्नेहगुणोपेत है । यह परमेष्ठी की वस्तु है, अतः इसी प्रजापति को मिथुनभाव का उत्पादक माना जा सकता है । यह परमेष्ठी प्रजा-पति सृष्टि की कामना करता है - तदनुकूल तप करता है । श्रम करता है । श्रमानन्तर यथाकाम वस्तु बना डालता है । मानसी मैथुनी चाहे कोई सृष्टि हो मन, प्राण, वाक् तीनों के बिना वह असम्भव है । ये तीनों सृष्टि के साधारण अनुबन्ध हैं । मनोव्यापार कामना है, प्राणव्यापार तप है । वाग्-व्यापार श्रम है । इन तीनों अनुबन्धों का पूर्व के उपनिषदों में विस्तार के साथ निरूपण किया जा चुका है । यहाँ पर उनका केवल स्मरणमात्र कराया गया है । इन तीनों से उस प्रजाकाम परमेष्ठी प्रजापति ने रवि और प्राण नाम का मिथुन उत्पन्न किया । प्रजापति ने उत्पन्न क्या किया, वह अपने आप इन दो स्वरूपों में परिणत हो गया । परमेष्ठी के ऊपर व्याप्त ऋषिप्राणमय अतएव असंग स्वयम्भू प्रजापति का स्मरण कीजिए । स्वयम्भू प्रजापति प्राणमय है - वेदमय है । ऋग्यजुः साम तीनों में ऋक् महदुक्थ है । साम महाव्रत है । यजुः अग्नि है । इस यजुः के यत् और जू - ये दो भाग बतलाए हैं । यत् भाग प्राण है, जू भाग वाक् है । इसी यजुरग्नि का नाम - प्राणाग्नि का नाम - ' ब्रह्माग्नि ' है । इस स्वयम्भूकी ब्रह्माग्नि के घर्षण से पानी पैदा हो जाता है । ' अग्नेराप: - इस सिद्धान्त के अनुसार विजातीय प्राणाग्नि के घर्षण से पानी उत्पन्न हो जाता है । बस, आपोमय यही दूसरा परमेष्ठी मण्डल है । इस श्रापोमय मण्डल के केन्द्रस्थान में परमाणुरूप सर्वव्यापक वही अग्नि धीरे - धीरे केन्द्र में आती रहती है । आगे - मागे जब वह अग्निपुज्ज घनभाव में परिणत हो पड़ता है तो वह एकदम प्रज्वलित हो पड़ता है । वही ' हिरण्यगर्भ सूर्य्य ' है । सूयं गतिशील है । अपने प्रक्ष पर प्रबल वेग से घूम रहा है । इस घुमाव के कारण इसका मण्डल में गतिवैषम्य हो जाता है । इस गतिर्वैषम्य के कारण अगला भाग प्रवर्ग्य बनकर अलग निकलकर स्वतन्त्र संस्था बनाता हुआ उसी नियत स्थान पर घूमा करता है । सृष्टि के प्रारम्भ से अब तक उसमें से ६ खण्ड अलग हो चुके हैं । वे ६ खण्ड - इन्द्र ( हर्बल ), वरुण ( नेपच्यून ), शनि, बृहस्पति, देवसेना, मंगल, पृथिवी, शुक्र, बुध - इन नामों से प्रसिद्ध हैं । ये सब सूर्य के उपग्रह है । विज्ञान कहता है कि जिस स्थान पर शनि इन्द्र या वरुण हैं । पहले उतना बडा सूर्य्यं था । आज वह उपग्रहों के कारण इतना छोटा हो गया । अभी खण्ड निकलने का सिलसिला बन्द नहीं हुआ है । आज भी उसमें से माठर, कपिल, दण्ड नाम के तीन उपग्रह दिखलाई पड़ते हैं । अभी वे सूर्य से पृथक् नहीं हुए हैं । किन्तु शीघ्र ही होने वाले हैं । होते होते इन उपग्रहों के कारण एक दिन सारा सूर्य्यं गायब हो जायगा । इधर सौरान से जीवित रहने वाले उसके आकर्षण से अपनी सत्ता रखने वाले सारे उपग्रह नष्ट हो जायेंगे । इसी का नाम प्रलय है । फिर उसी ग्रापोमय परमेष्ठी का परमाणुरूप अग्नि केन्द्र में जमा होकर सूर्य बनेगा फिर उपग्रह बनेंगे । इस प्रकार सृष्टि - प्रलय - सृष्टि-प्रलय वह धारा निरन्तर चला करता है । [ ३६ ]
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प्रथम प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य रयिप्राणनिरूपण जिन अग्निपरमाणु संघों से सूर्य्य बनता है - वह हमारे शास्त्र में घूम्रकेतु नाम से प्रसिद्ध हैं । ये कुल हजार हैं । ये सूर्य्यं के चारों ओर घूमते रहते हैं । इस प्रपञ्च से बतलाना यही है कि प्रापोमय परमेष्ठी -मण्डल के पेट में सबसे पहले सत्यरूप सूर्य्यं ही गर्भ धारण करता है । सूय्यं अग्निमय है । यह अन्नाद है । इसके लिए प्रजापति की इच्छा से सूर्य्य से ऊपर परमेष्ठी के नीचे एक सोममण्डल और प्रतिष्ठित होता है । इसी सोम को ब्रह्मणस्पति सोम कहा जाता है । सूर्य्यं के बाद चन्द्रमा है, चन्द्रमा के अनन्तर उपग्रहरूपा पृथिवी है । पृथिवी जैसे सूर्य्यं का उपग्रह है, एवमेव चन्द्रमा पृथिवी का उपग्रह है । पृथिवी में से एक अत्रिप्राण ( पारदर्शिकत्वप्रतिबन्धी प्राण ) निकलता है । पृथिवी के २१ परिभ्रमण के अनन्तर यही अत्रि चन्द्रपिण्ड बन जाता है, ' अतएव चन्द्रमा को अत्रिपुत्र कहा जाता है । कहने का तात्पर्य यही है कि वह स्वयम्भूप्रजापति काम, तप, श्रम द्वारा क्रमशः परमेष्ठी, सोम ( ब्रह्मणस्पति - चन्द्रमा ) सूर्य्य, पृथिवी - इन चार पिण्डों को उत्पन्न कर देता है । ये चारों उस स्वयम्भू रूप परमप्रजापति की ' प्रतिमा ' कहलाती हैं । ( अर्थात् ) जैसा यह है, वैसे ही ये चारों हैं । उसमें श्रात्मा ( षोडशी ), पद ( पिण्ड ), पुनःपद ( महिमा मण्डल ) - ये तीन हैं । ये ही तीनों सब में हैं । मनोता भी पाँचों में तीन तीन हैं । आत्मा - पद - पुनःपद भी पाँचों में हैं । आत्मा - प्राण- पशु भी पाँचों में हैं । इस प्रकार पाँच जगह कई प्रकार से तीन तीन हैं । जो स्वरूप स्वयम्भू का है वही शेष चारों का है, अतः हम अवश्य ही इन चारों को उसकी ' प्रतिमा ' कहने के लिए तय्यार हैं । जो प्रतिमाविशिष्ट परमप्रजापति के पञ्चधा विभक्त पाँचों अवयवों के तीन तीन को जान जाता है वह सब कुछ जान जाता है । इसी विज्ञान को लक्ष्य में रखकर छान्दोग्य श्रुति कहती है-" यानि पञ्चधा त्रीणि त्रीणि तेभ्यो न ज्यायः परमन्यदस्ति । यस्तद् वेद स वेद सर्वं सर्वा दिशो बलिमस्मै हरन्ति " -इति ॥ २ श्रुति का विशद विवेचन उसी उपनिषद् में किया जायगा । यहाँ पर केवल परम - प्रजापति और प्रतिमा- प्रजापति का स्वरूप समझ लेना ही पर्याप्त होगा । इन्हीं का उत्पत्ति क्रम बतलाते हुए भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं-“ स ऐक्षत प्रजापतिः । इमं वा श्रात्मनः प्रतिमामसृक्षि । ता वा एताः । प्रजा-पतेरधि देवता असृज्यन्त - अग्निः ( पृथिवी ), इन्द्रः ( सूर्य्यः ), सोमः ( चन्द्रमाः ) परमेष्ठी प्राजापत्यः " ॥ 3 कहना यही है कि स्वयम्भू प्रजापति का जो वागग्नि था, वही प्राण के व्यापार से आपः बन गया । इसीलिए तो - ' सोऽपोऽसृजत । वाच एव लोकाद्वागेवास्य साऽसृज्यत ' - यह कहा जाता है । इसी आपोमय परमेष्ठी की उत्पत्ति बतलाते हुए भगवान् मनु कहते हैं— १- इस विषय का विस्तार के साथ वर्णन पं ० प्रभाजी प्रणीत ' प्रत्रिख्याति ' के नामक ग्रन्थ पृष्ठ संख्या १६, प्रघटक संख्या २५ एवं स्व ० शास्त्रीजी कृत अप्रकाशित अत्रिख्याति विज्ञान भाष्य की पाण्डुलिपि के पृष्ठ संख्या ६० से ६३ में किया गया है । २ छान्दोग्योप ० २।२१।३ । ३- शत ० ब्रा ० ११।१।६।१३-१४ । [ ३ ९ ]
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प्रथम प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य रयिप्राणनिरूपण " सोऽभिध्याय शरीरात्स्वात् सिसृक्षुविविधाः प्रजाः । अप एव ससर्जादौ तासु बीजमवासृजत् " - इति ॥ ' परमेष्ठी प्रजापति उत्पन्न हो गए । यह प्रजाकामना से तप - श्रम द्वारा रथि प्राणरूप में परिणत हो गए । रवि भृगु है, प्राण अंगिरा है । रयि स्त्री है, प्राण पुरुष है । दोनों पति - पत्नी उस आपोमय
परमेष्ठी के भाग हैं । इसीलिए तो-" ग्रापो भृग्वङ्गिरोरूपमापो भृग्वङ्गिरोमयम् ।
अन्तरते त्रयो वेदा भृगूनङ्गिरसोऽनुगाः " ॥२
-यह कहा है । मनु कहते हैं- पानी पैदा करके उसमें बीज डाल दिया । वह बीज और कोई नहीं सूर्य्य है । सूर्य्यं गायत्रीमात्रिक वेदमय है, अतएव इसके लिए ' त्रयी वा एषा विद्या तपति'- यह कहा जाता है । यह त्रयीमय त्रिगुणात्मक सूर्य्यनारायण उस भृगु अंगिरोमय पारमेष्ठ्य अप के बीच में प्रतिष्ठित है, इसी अभिप्राय से- ' अन्तरते त्रयो वेदा भृगुनङ्गिरसोऽनुगाः ' यह कहा है । भृगु की घन- तरल - विरल भेद से प्रापः- वायु सोम- ये तीन अवस्थाएँ हो जाती हैं एवं अंगिरा की अग्नि - यम- श्रादित्य- ये तीन अव-स्थाएँ हो जाती हैं । ये ही ईशोपनिषद् के षड् ब्रह्म हैं । स्वयम्भू का यजुः द्विब्रह्म है । द्विब्रह्मयुक्त षड्-ब्रह्म ही शुक्र है । यही संसार का मैथुनी सृष्टि का मूल प्रभव है । जैसा कि पूर्व के उपनिषदों में विस्तार के साथ बतलाया जा चुका है । द्विब्रह्मगर्भित षड्ब्रह्मात्मक शुक्ररूप परमेष्ठी प्रजापति ही सृष्टि का मूल कारण है । शुक्र का भृगुरूप रयिभाग पत्नी है, प्राणभाग पुरुष है । इस पति - पत्नी के संयोग से सबसे पहले विराट् सूर्य्यं ही उत्पन्न होता है - जैसा कि भगवान् मनु कहते हैं-" द्विधा कृत्वात्मनो देहमर्धेन पुरुषोऽभवत् । अर्धनारी तस्यां स विराजमसृजत्प्रभुः " - इति ॥ रविप्राणात्मक परमेष्ठी से उत्पन्न यही विराट् पुरुष सारी रोदसी प्रजा का उत्पादक है । इसी-५ ' प्रारणः लिए इस विराट् पुरुष के लिए ' नूनं जनाः सूर्येण प्रसूताः ' ४ ' सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च ', ' प्रजानामुदयत्येष सूर्य: ' ६ - इत्यादि कहा जाता है । " परमेष्ठी प्रजापति ने प्रजा - कामना से - रयि प्राणरूप भृगु और अंगिरा पैदा किए इस मिथुन से सारा संसार बनाया । " अब तक के प्रपञ्च से यही निष्कर्ष निकलता है । १- मनुस्मृति १८ | ३ - मनुस्मृति १।३२ । ५ - ऋग्वेद मं ० १।११५।५ । २ - गोपथ ब्रा ० पूर्व १।१।३६ । ४- ऋग्वेद मं ० ७।६३।४ । ६- प्रश्नोप ० १८ | [ ४० }
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प्रथम प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य रयिप्राणनिरूपण प्रजाविषयक कार्य्यकारणभाव पितापुत्रवत् नहीं है अपितु, मृद्घटवत् है, तन्तुपटवत् है । अर्थात् अभिन्नसत्ताक है । प्रजापति ही प्रजा बनता है, परन्तु पुत्रवत् प्रजा पिताप्रजापति से स्वतन्त्र सत्ता धारण करने में असमर्थ है । यह उसी ( उसी सत्ता ) पर प्रतिष्ठित रहती है । प्रजापति ही एकभाग से- रयिप्राण बनता है, एक भाग से प्रजा बनता है । यहाँ पर एक प्रश्न हो सकता है । वह यही है कि प्रजा उत्पन्न करने के कारण परमेष्ठी ' प्रजापति ' कहलाता है । ऐसी अवस्था में प्रजोत्पत्ति से पहले उसे प्रजापति कहना अनुचित है । फिर यहाँ पर ' प्रजोत्पत्ति ' से पहले ही उसे प्रजापति कैसे कहा गया? प्रश्न यथार्थ है । परन्तु हम कह आए हैं कि परमेष्ठी के साथ षोडशी है । परमेष्ठी प्रकृति है । यह विना उस पुरुष के नहीं रहती । पुरुष मनःप्रारणवाङ्मय है । इन तीनों की परमेष्ठी में सत्ता है । प्रजोत्पत्ति से भी पहले इसमें मन - प्राण वाक् तीन भाग हैं । मन भाग से यह कामना करता है, प्राण-भाग से तप करता है- वाक् भाग से श्रम करता है । मन भाग श्रात्मा है, प्राणभाग प्रारण है - वाक् भाग पशु है । यद्यपि स्थूलप्रजा उस समय नहीं है, तथापि वाक्रूप पशु - प्रजा तो मैथुनी सृष्टि से पहले ही उस परमेष्ठी में मौजूद है । बस, इसी वाक् प्रजा को लक्ष्य में रखकर मैथुनी प्रजोत्पत्ति से पहले ही हम अवश्य ही परमेष्ठी को ' प्रजापति ' कहने के लिए तय्यार हैं । वही प्रजापति एक भाग से आपन बनता है । एक भाग से अन्नाद बनता है । एक भाग से अन्न बनता है । परमेष्ठी आवपन है । रयि अन्न है । प्रारण अन्नाद है । तीनों की समष्टि- ' शं ब्रह्म ' है - जैसा कि पूर्व में बतलाया जा चुका है । प्रजापति का विचार हो चुका - अब क्रमप्राप्त रयि और प्राण का विचार करना चाहिए । ' वीर्यं वै रथिः " - यह श्रुति वीर्य्यं को ' रवि ' बतलाती है । वीर्य्य रेत है । रेत अन्न से पैदा होता है । अन्न चन्द्रमा से पैदा होता है । अन्न औषधि है । श्रौषधियों में चान्द्र रस की प्रधानता है, वनस्पतियों में सौर रस की प्रधानता है । चान्द्र रस साक्षात् सोम है । इसीलिए तो इसके लिए ' एष वै सोमो राजा देवानामन्नं यच्चन्द्रमाः २ - यह कहा जाता है । वीर्य्यं ' रयि ' है इसका तात्पर्य यही है कि सोम रयि है | यही सोम भृगु है । भृगु की तरलावस्था ही सोम है । सोम स्नेहतत्त्व है- संकोचधर्म्मा है-सर्वथा ऋत है । उत्तरोत्तर संकुचित होना- इसकी प्रधानवृत्ति है । इसीलिए तो रयिरूप इस सोम को ' भृगु ' कहा जाता है । ' बिभ्राणः सन् - भरन् सन् गच्छति ' - इस व्युत्पत्ति से इसे ' भृगु ' कहा जाता है । वस्तु को भरता हुआ यह केन्द्र में जाता है, अतएव - ' भरन् सन् - स्थूलतां प्राप्तः सन् केन्द्रे गच्छति ' -इस व्युत्पत्ति से हम अवश्य ही इसे ' भृगु ' कहने के लिए तय्यार हैं । भार्गव सौम्य प्रारण एक दूसरे से चिपकना चाहता है- मिलना चाहता है । एक दूसरे के मेल से परस्पर में मूच्छित होता रहता है । इस मेल की - दूसरे शब्दों में मूर्च्छा की जब पराकाष्ठा हो जाती है तो ' मूर्ति ' बन जाता है । इसीलिए निरुक्त ने मूर्ति का मूर्च्छनात् मूत्तिः ' यह निर्वचन किया है । मूच्छित सौम्य प्रारणसंघ ही ' मूत्ति ' है । रयि ही मूर्ति है । स्नेह के कारण परस्पर में एक दूसरे से प्रतिमूच्छित होते हुए रयिरूप सौम्य प्रारण मूर्तिरूप में परिणत हो जाते हैं । १- शत ० ब्रा ० १३।४।२।१३ । २- शत ० ब्रा ० १।६।४।५ । [ ४१ ]
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प्रथम प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य रयिप्राणनिरूपण भृगुरयि के सम्बन्ध से अब चलिए प्राण की ओर । यद्यपि प्राण अनन्त प्रकार के हैं, अग्निः तथापि " के अनुसार यहाँ हम यहाँ प्राणशब्द से ' अंगिरा प्राण ' का ही ग्रहण समझना चाहिए -- । ' प्रारणा प्राणशब्द से श्रग्निमय अंगिरा प्राण का ही ग्रहण करेंगे संकोचधर्मा था, यह विकासधर्मा है । यह अंगिरा प्राण भृगुप्राण से सर्वथा विजातीय है । वह उत्तरोत्तर ' कहा जाता है । जैसे सौम्य भार्गवप्राण ' अंगी सन् रसति ' - इस व्युत्पत्ति से इसे ' अंगिरा ठीक इसके विरुद्ध यह आग्नेय आंगिरस प्राण संकुचित होता हुआ प्रधि से केन्द्र की ओर आता है, जाता रहता है । वस्तुपिण्ड अंगी है । इसमें उत्तरोत्तर विशकलित होता हुआ केन्द्र से प्रधि की ओर इन्द्र - तीन भेद अग्निरस के अग्नि, वायु, से वह अग्निरस निरन्तर निकलता रहता है । इसी निर्गत तीन स्वरूपों में परिणत होकर अपने अपने हो जाते हैं । पिण्ड से निकलकर २१ तक यह अंगिरा रस पृथिवी है - पिण्ड की महिमा का २१ वीं पिण्ड के त्रैलोक्य में ( महिमामण्डल में ) व्याप्त होता है । पिण्ड से छोटे और बड़े से बडे यच्चयावत् पदार्थों अहर्गण द्युलोक है । यह द्यावापृथिवी की व्यवस्था छोटे कहती है-में समान है । इसी साधारण विज्ञान को लक्ष्य में रखकर मन्त्रश्रुति
" इत एत उदारुहन् दिवः पृष्ठान्यारुहन् ।
प्रभूर्जयो यथापथ द्यामङ्गिरसो ययुः " - इति ॥
का स्वरूप बना हुआ सोम - आगच्छति है । अंगिरा निर्गच्छति है । दोनों के समन्वय से । यही संसार रयि है । इस शुक्रशोणिता-है । स्त्री का शोणित अंगिरा है । यही प्राण है । पुरुष का शुक्र भृगु है का सम्बन्ध पुरुष - स्त्री के मिथुन परपर्यायक रथि प्राण के यज्ञ से ही प्रजोत्पत्ति होती है । प्रजोत्पत्ति रथि प्राण का परस्पर सम्बन्ध नहीं होता पर निर्भर नहीं है- रयि - प्राण के मिथुन पर निर्भर है । जब तक - स्त्री के निरन्तर संभोग करने पर भी प्रजो-दोनों की चिति ( ग्रन्थिबन्धन ) नहीं होती तब तक के पुरुष जहाँ रयिप्राण मिल जाते हैं - प्रजोत्पत्ति हो त्पत्ति नहीं होती एवं विना भी स्त्री - पुरुष के मिथुन से दोनों की चिति होते ही जीवसृष्टि हो जाती है । दोनों प्राण विश्व में व्याप्त हैं । कारणविशेष जो लाखों कीड़े देखते हैं - यह उसी रयिप्राण जाती है । चातुर्मास्य में आप सड़कों की लालटेनों के पास प्राण है । दोनों के मिथुन होते ही की चिति का प्रभाव है । वर्षा का जल रयिप्राणयुक्त श्रग्नि है । दीपप्राण है । बस, संसार की सारी प्रजा इसी अग्नी-लाखों जीव उत्पन्न हो जाते हैं । रयि सोम है - प्राण अंगिरा- दोनों परमेष्ठी की वस्तु षोमापरपर्य्यायक रयिप्राण के मिथुन पर ही निर्भर है । भृगु और तो इन दोनों को ' आप ' कहा जाता है । हैं । परमेष्ठि ऋत हैं, अतएव दोनों भी ऋत ही हैं, अतएव अंगिरा भाग आगे जाकर सत्य बन जाता है । इस आपः का भृगुभाग तो सदा ऋत ही रहता है, परन्तु अन्तर है । बात एक ही है । हमने ऋत - सत्य, सोम - अग्नि, रयि - प्राण - एक बात है । कहने मात्र में कर रहे हैं । इनमें रयिप्राण, प्रज्ञाप्राण प्रारम्भ में ही कहा है कि ऋषि यहाँ पाँचों प्राणों का निरूपण १ - शत ० ब्रा ० ६।३।१।२१ । २- सामवेद पू ० १।२।१०।२ । [ ४२ ]
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प्रथम प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य रयिप्राणनिरूपण भूतप्राण, धिषणाप्राण, वाक्प्राण- यह क्रम रखा है । इस क्रम से पाँचों का निरूपण किया है । प्रारम्भ में रयिप्राण का निरूपण है । इसमें प्राण वाले अंगिरा के आदित्य, यम, अग्नि - तीन भेद हो जाते हैं । श्रादित्य सौर प्राण है, यम आन्तरिक्ष्य वायव्य प्राण है । अग्नि पार्थिव भूतप्राण है । भादित्यप्राण विषणा प्राण है, पार्थिवप्राण भूतप्राण है । रयिप्राण प्रज्ञाप्राण है । इस प्रकार केवल रयिप्राण में चारों का अन्तर्भाव हो जाता है । रविप्राण विना वाक्प्राण के अनुपपन्न है । सुतरां इसका भी रयिप्राण अन्तर्भाव सिद्ध हो जाता । इस प्रकार अन्तर्दृष्टि से देखने पर प्रथम प्रश्न के रयि प्रारण निरूपण से में ही पाँचों प्राणों का स्वरूप प्रत्यक्ष हो जाता है । सारे प्रपञ्च का ' अग्नीषोमात्मकं जगत्'- यही निष्कर्ष है । इसी निष्कर्ष को हमारे सामने रखते हुए पिप्पलाद कहते हैं— तस्मै स होवाच- प्रजाकामो वै प्रजापतिः स तपोऽतप्यत । स तप-स्तप्त्वा स मिथुनमुत्पादयते । रयि च प्राणं चेति । एतौ मे बहुधा प्रजाः करि-ष्यत इति ॥४ ॥।
श्रुति के रयि और प्राण शब्द से स्पष्ट अर्थ नहीं निकलता । रयि और प्राण दोनों ही शब्द श्रप्रसिद्ध हैं । साधारण मनुष्य- " रविप्राण के मिथुन से संसार उत्पन्न होता है - इससे कुछ नहीं समझ सकते, अतएव आगे जाकर इन दोनों का स्पष्टरूप से साक्षात् करवाते हुए कहते हैं कि आदित्य ही प्रारण है । रयि ही चन्द्रमा है । संसार में जो मूर्त और प्रमूर्त्त हैं वे सब रयि हैं, अतः मूर्ति ही रयि है । " शीर्षक देखने से पाठकों को विदित हुआ होगा कि इस प्रथम प्रश्न में ऋषि ने ' सृष्टिरहस्य का निरूपण किया है । सृष्टि संसृष्टि है । संसृष्टि स्नेहगुण से सम्बन्ध रखती है । स्नेहगुण भार्गव है ' । भृगु रयि है । यह परमेष्ठि की वस्तु है, अतः ऋषि ने उसी सृष्टिमूलक रयिप्राण का सर्वप्रथम निरूपण किया है । सृष्टि ही विश्व है । ' ऋतं च सत्यं चाभीद्धात् ० ' - इत्यादि ऋक् श्रुति ऋत और सत्य-तत्त्व को सृष्टि का मूलकारण बतलाती है एवं प्रकृत में रयिप्राण को सृष्टि का उपादानकारण बतलाया गया है । इसमें कोई विरोध नहीं समझना चाहिए । संहितामन्त्र के ऋत सत्य ही उपनिषत् श्रुति के रयिप्राण हैं । कंसे हैं? इसके लिए निम्नलिखित ऋतसत्यस्वरूप पर ध्यान देना आवश्यक होगा— सारा विश्व ऋत और सत्य- इन दो भागों में विभक्त है । संसार में हम भाति, सत्ता, मातिसत्ता भेद से तीन प्रकार के पदार्थों का प्रत्यक्ष करते हैं । केवल भातिसिद्ध केवल सत्तासिद्ध - उभयात्मक विश्व के यच्चयावत् पदार्थ कुल तीन ही भागों में विभक्त हैं । जिन पदार्थों का अस्तित्व है, परन्तु हम उन्हें नहीं जानते - ऐसे पदार्थ केवल ' सत्ता ' - सिद्ध हैं । सूर्य के ऊपर परमेष्ठी है, स्वयम्भू है । फिर ऊपर परात्पर है । ये सब सत्तासिद्ध पदार्थ हैं, परन्तु इनका हमें भान नहीं होता । हम विज्ञानचक्षु से ही इनका भान करने में समर्थ होते हैं । इंग्लैण्ड सत्तासिद्ध है, परन्तु उसका हमें भान नहीं होता, अतः हम भारतवासियों के लिए इंग्लैंग्ड सत्तासिद्ध है । परन्तु इंग्लैण्ड में रहने वाले युरोपियनों के लिए एवं जो भारतीय वहाँ जा आए हैं एवं वहाँ रहते हैं उनके लिए वह इंग्लैण्ड मातिसिद्ध भी है-[ ४३ ]
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प्रथम प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञान भाष्य रयिप्राणनिरूपण , परन्तु सत्तासिद्ध भी है । विश्व के भीतर जितने भी पदार्थ हैं वे किसी के लिए भातिसिद्ध सत्तासिद्ध हैं , किन्तु जिनका किसी के लिए सत्तासिद्ध ही हैं । इस केवल पक्ष को लक्ष्य बनाकर जिन्हें हम नहीं देखते करते हैं । विश्व के प्राणि-अस्तित्व है उनके लिए हम हमारी अपेक्षा से ' सत्तासिद्ध ' शब्द का प्रयोग मात्र के लिए सत्तासिद्ध तो विश्वातीत केवल परात्पर ही है उसे कोई नहीं जानता । क्योंकि बा ' शुद्धसत्ता ' मनसातीत होने से वह जानने की सीमा से बाहर है, श्रतएव हम परात्पर को अवश्य ही सिद्ध पदार्थ कहने के लिए तय्यार हैं । का दूसरा विभाग है- मातिसिद्ध पदार्थों का जो हैं नहीं परन्तु मालूम होते हैं, जिनसे दिशाओं संसार से सारा काम चलता है ऐसे पदार्थ ' नातिसिद्ध ' हैं ऐसे पदार्थ अनन्त हैं । पूर्वपश्विमादि इनका अस्तित्व संसार काम लेता है परन्तु ये भातिसिद्ध हैं । सूय्यं पृथिवी आदि की तरह कोई मनुष्य लक्ष्मणलाल नहीं बतला सकता । यह केवल व्यावहारिक ( काल्पनिक ) जगत् है इसीलिए रामलाल जाता है, परन्तु भरतलाल तीनों के आगे पीछे बैठे रहने पर भरतलाल से लक्ष्मणलाल रामलाल पूर्व हो ही पश्चिम है । इसी वही रामलाल से पश्चिम हो जाता है । जो पश्चिम है- वही पूर्व है । पूर्व है, युग जो यादि काल, सेर दो सेर, प्रकार एक को छोड़कर शेष सारी संस्थाएँ, दिन, मास, पक्ष, संवत्सर अपरत्व आदि सब भाति-छटाँक, पाव, मन आदि परिमाण, पृथक्त्व, समवाय, संयोग, विभाग, परत्व, होते हैं । यह सिद्ध पदार्थ हैं । दीखने वाला नीला आकाश स्त्रयं भातिसिद्ध है । हैं नहीं परन्तु मालूम दूसरा विभाग है । हैं अर्थात् जिनकी अस्ति एवं जो घट, पट, सूर्य्यं, चन्द्र, पशु, पक्षी आदि पदार्थ हैं एवं जिन्हें हम नहीं जानते जानते, वे सत्तासिद्ध पदार्थ भी है - भाति भी है - वे उभयसिद्ध पदार्थ हैं । इन उभयों में से हम जिन्हें - पदार्थ को ( चाहे वह ज्ञात हैं, जिन्हें जानते हैं वे उभयसिद्ध पदार्थ हैं । दोनों को दूसरे शब्दों में अस्तित्व सत्तासिद्ध है । वह पदार्थ सत्ताश्रित हो या अज्ञात हो ) वैज्ञानिक जगत् में ' सत्य ' कहा जाता है । सत्ता ' सत्ताश्रयं सति भवम्'- इन दोनों व्युत्पत्तियों से हम उसे रहता है - सत् में प्रतिष्ठित रहता है, अतः तीन खण्ड हैं । तीनों के समु-अवश्य ही ' सत्य ' कहने के लिए तय्यार हैं । सत्ता के मन, प्राण, वाक् । - मन के आधार पर प्राण रहता है, च्चय का नाम ' अस्तित्व ' है । मन हृदय में प्रतिष्ठित रहता है । तीनों की समष्टि ' सत्य ' है । सत्य प्राण के आधार पर ' वाक् ' रहती है । तीनों का आधार ' हृदय ' इस है अक्षररूप ' हृदय ' को ' सत्यप्रजापति ' पदार्थ का आधार सत्ता है । सत्ता का आधार हृदय है, अतएव । यहाँ हमें केवल यही कहना है कहा जाता है । अस्तु, इस विषय को हम अधिक नहीं बढाना चाहते ऋत हैं । यह ऋत-कि सत्तासिद्ध पदार्थ सत्ताश्रय होने से सत्य है एवं भातिसिद्ध आकाशदिक्कालादि सत्य का पहला विभाग है ॥१ ॥
सत्य को लीजिए इनमें भातिरूप सिद्धपदार्थस्वरूप ऋत को छोड दीजिए एवं सत्तासिद्धरूप देर के लिए भुला एवं इस सत्य के लिए हमने जो पूर्व में ' हृदय ' भाव बतलाया है उसे ' सत्य भी ' थोड़ी कहते हैं । बस, केवल इतने दीजिए सत्तासिद्ध पदार्थ चाहे वह ज्ञात हो या अज्ञात हो उसे होता है । यही ऋत-अंश पर अपनी दृष्टि रखिए । यह सत्य पुनः ऋत और सत्य - दो भेदों में परिणत [ w ] ] ४४
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प्रथम प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञान भाष्य रयिप्राणनिरूपण च ', ' निरञ्चा-सत्य का दूसरा अवतार है । इन्हीं दोनों के लिए श्रुति में ' ऋतं च सत्यं च ', ' मूर्तं चामूर्तं । दोनों का अस्तित्व निरुक्तम् ' इत्यादि कहा गया । अमूर्त पदार्थ, मूर्त पदार्थ दोनों ही सत्तासिद्ध हैं और मूर्त्त दो रूप है - अतएव हम दोनों को सत्य कहने के लिए तय्यार हैं । दूसरे शब्दों में- सत्य के अमूर्त सत्य हैं । मानने के लिए तय्यार हैं । इन दोनों में सत्तासिद्ध अमूर्त पदार्थ ऋत हैं । सत्तासिद्ध मूर्त पदार्थं पानी अग्नि - मिट्टी आदि जितने पदार्थ हम आँखों से शरीर तत्त्व - अमूर्त हैं, सशरीर पदार्थ मूर्त हैं । अग्नि-देखते हैं - वे सब मूर्त्त हैं । इनका एक शरीर है । शरीर से यहाँ आकार, रूप अभिप्रेत है । पानी में मिट्टी आदि का आकार है, अतएव हम इनको सशरीर अतएव मूर्त्त कहने के लिए तय्यार हैं । संसार प्रत्यक्ष दृष्ट सशरीर जितने भी मूर्त पदार्थ हैं- उन सबमें प्रत्येक में भिन्न - भिन्न शक्तिएँ ( पावर ) रहती हैं । पानी में भिन्न शक्ति है । अग्नि भी भिन्न शक्ति है । मिट्टी भी भिन्न शक्ति है । जिसमें शक्ति नहीं-वह पदार्थ नहीं । पदार्थ शिव ( सुरक्षित ) रूप में तभी तक प्रतिष्ठित रह सकता है जब तक कि नहीं वह शक्ति से युक्त रहता है । बिना शक्ति के वह शव है नष्टप्राय है । इन शक्तियों को हम आँखों से देखते । इनसे होने वाले फल का प्रत्यक्ष कर सकते हैं इनका नहीं । प्रत्यक्षदृष्ट सशरीरी मूर्त पदार्थों को में यह रहती है - स्वयं यह अमूर्त है । अशरीर अतएव अमूर्त होने से इन मूर्त पदार्थों की शक्तियों हम ' ऋत ' कहने के लिए तय्यार हैं । परिच्छेद ( सीमा ) का नाम ' मात्रा ' है । परिच्छिन्न वस्तुमात्रिक है । जो अमात्रिक है - वह परिच्छेदशून्य होने से अशरीर है । यही ऋत है एवं मात्रिक सशरीरी वस्तु-जात ' मूर्त्त ' है ' यही सत्य है । यह ' ऋतसत्य ' का दूसरा विभाग है ॥२ ॥
प्रथम ऋतसत्य विभाग में जिस हृदयतत्त्व का निरूपण किया गया था एवं जिसके लिए दूसरे ऋत-सत्य विभाग में भूल जाने के लिए कहा था उसे अब तीसरे ' ऋतसत्य ' विभाग में स्मरण कीजिए— शक्तिरूप ऋत, शक्तिमान् सशरीरी मूर्त्तरूप सत्य- इन दोनों में से शक्तिरूप ' ऋत ' को छोड दीजिए एवं केवल शक्तिमान् सशरीरी मूर्त्त सत्य पर दृष्टि डालिए । इस मूर्तसत्य के फिर ऋत - सत्य-दो विभाग होते हैं । यही ऋत सत्य का तीसरा अवतार है । सारे सशरीरी मूर्त पदार्थ - सहृदय - अहृदय भेद से दो भागों में विभक्त हैं । पानी, वायु, सोम, मेघ श्रादि मूर्त्त पदार्थों का शरीर है । इसलिए तो हम इन्हें पूर्वपरिभाषानुसार ' सत्य ' कहने के लिए तय्यार हैं । परन्तु ' सशरीरं अहृदयं ऋतम् ' - इस लक्षण के अनुसार इन्हें हम ' ऋत ' कहने के लिए तय्यार हैं । पानी आदि पूर्वोक्त मूर्त्त पदार्थों का शरीर अवश्य है, परन्तु इनमें केन्द्र नहीं है । इसका प्रत्यक्ष प्रमाण यही है कि पानी के परमाणु जहाँ से उठाए जाते हैं- अलग निकल आते हैं । मेघ विच्छिन्न हो जाता है । जिसमें हृदय होता है वह पदार्थ एक संस्था से पकड़ा रहता है । सशरीरी मूतं पृथिवी, सूर्य्यादि पिण्ड सत्य हैं । इनमें केन्द्र है । केन्द्र की पकड़ में सारा पिण्ड बद्ध है । सूय्यं रश्मि के सामने एक तिल रख दो, रश्मि टकराकर वापस चली जायगी, क्योंकि वह सूर्य्यं केन्द्र से बद्ध है । परन्तु पानी के आगे हाथ लगा दो फिर भी वह वापस नहीं लौटेगा । अपितु, हाथ के इधर - उधर होके आगे निकल जायगा । क्योंकि वह केन्द्र से बद्ध नहीं है । बस, मूर्त पदार्थों में जितने केन्द्रयुक्त पदार्थ हैं वे सत्य हैं, एवं अकेन्द्र भावापन्न मूर्त पदार्थ ऋत हैं । आपः, वायु, सोम - तीनों भृगु हैं । तीनों अकेन्द्र होने से ऋत हैं । प्राणाग्नि ( अंगिराग्नि ) आगे जाकर सत्य बन [ ४५ ]
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प्रथम प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य रविप्राणनिरूपण जाती है । भृगुरूप रयि ऋत है, प्राणरूप अग्नि सत्य है । प्रजोत्पत्ति का सम्बन्ध - इसी श्रग्नीषोमरूप तीसरे ऋतसत्य से है, अतएव ऋषि ने ऋतसत्य का प्रयोग न कर ' रयिप्राण ' का उल्लेख किया है । ऋत - सत्य शब्द - ऋत - सत्य के तीनों विभागों का संग्राहक है । वह प्रजासृष्टि में अभिप्रेत नहीं है एवं रयिप्राण शब्द- तीसरे मूर्त ऋत सत्य का वाचक है, अतः यहाँ उसी को हमारे सामने रखा है मूर्ति ही ' मूर्त्त ' पदार्थ है । पूर्वोक्त तृतीय विभाग में निरूपित मूर्त पदार्थ ही ऋत है, मूर्त पदार्थ ही सत्य है । अन्तर केवल हृदय प्रहृदय का है । जो मूत्तं पदार्थ सहृदय है- वह सत्य है । अहृदय मूर्तं पदार्थं ऋत है । श्रहृदय आप: - वायु - सोम- तीनों मूर्त्तं ऋत पदार्थ हैं । क्योंकि इन तीनों में केन्द्र नहीं हैं । इन तीनों की समष्टि ' रयि ' है । इस ' रयि ' से ही ' सत्य - मूर्त ' का निर्माण होता है । प्रारम्भ में ही बतलाया जा चुका है कि प्रतिमूच्छित सोम प्राण ही मूच्छित होकर मूर्ति कहलाने लगता है । ऋत - तत्त्व ही सत्यशरीर का आरम्भक है । उदाहरण के लिए पृथिवी को ही लीजिए । पृथिवी अग्नि-पिण्ड है- सत्य है- यह अनुपद में ही बतलाया जा चुका है । इस पृथिवी का निर्माण पानी से होता है । भृगु, अङ्गिरा - दोनों ‘ आप: ' हैं । इसमें भृगु पानी के पेट में अङ्गिरा पानी है । यह पानी तेजोयुक्त है-भार्गव पानी स्नेहयुक्त है । इस स्नेह - तेज के योग से वही ' आप ' पृथिवीस्वरूप में परिणत हो जाता है । आपोमय परमेष्ठी ऋत था । वही सत्य पृथिवी बना, अतएव ऋत को हम अवश्य ही मूर्तिरूप सत्य का आरम्भक मानने के लिए तय्यार हैं । ऋत के पेट में सत्य प्रतिष्ठित रहते हैं । पिण्ड सत्य है । इसके परमाकाश में चारों ओर ऋत सोम रहता है । वह एक प्रकार से मूर्त होता हुआ भी अमूर्त है । तन्मध्यपतित पिण्ड मूर्ति है । परमाकाशस्थ ऋत तो रयि है ही, परन्तु तन्मध्यपतित सत्यपिण्ड भी रयि ही है । क्योंकि रयि ऋत हो तो पूर्वकथनानुसार सत्यपिण्ड का प्रारम्भक है । निष्कर्ष यही हुआ कि संसार में मूर्त्त, अमूर्त भेद से दो प्रकार के पदार्थ हैं । पिण्डात्मक पदार्थ सत्य हैं । तरल-विरलात्मक - श्रापः- वायु - सोम ऋत हैं । पिण्ड श्रग्नि प्राणमय है, पिण्डों की महिमा ऋतमय है । ऋत रयि है- पिण्ड प्रसूत है । इस प्रकार यद्यपि दो वस्तु हो जाती हैं, तथापि इनमें प्रधानता रयि की है । मूर्त्त - अमूर्त्त दोनों रयि ( ऋत ) हैं । दोनों ऋतमय हैं । भृगु, अङ्गिरा ऋत हैं, दोनों आपः रूप हैं । यही आापः रयि है । इस भवरूप रयि का ही - अङ्गिरा भाग सत्यरूप में परिणत होता हुआ ' मूर्ति ' बनता है एवं इसी रयि का भृगुभाग- मूर्ति के बाहर - श्रापः- वायु- सोम में परिणत होकर चारों ओर से अपने माग से निम्मित पिण्ड को घेरे रहता है । इसी ऋत का प्रधानता की निरूपण करते हुए महर्षि कहते हैं—-" ऋतमेव परमेष्ठि, ऋतं नात्येति किञ्चन । ऋते समुद्र ग्राहितः, ऋते भूमिरियं श्रिता " ॥ ' ' ऋतं नात्येति किञ्चन'- इस रूप से दृढतापूर्वक ऋत की व्यापकता बतलाई जा रही है जो कि सर्वांश में यथार्थ है । उसी व्यापकता को लक्ष्य में रखकर यहाँ पर ऋषि ने १ ते ० ब्रा ० १।५।५।१ । [ ४६ ]