प्रश्नोपनिषद् — पृष्ठ 61–70
प्रश्नोपनिषद् · पृष्ठ 61–70
पृष्ठ 61
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
प्रथम प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य रविप्राणनिरूपण " रथिर्वा एतत्सर्वं यन्मूर्तं चामूर्तं च तस्मान् मूत्तिरेव रयिः ” ॥ -यह कहा है । वायु, प्राण आदि नीरूप पदार्थ हैं, पृथिवी, सूर्य्यं श्रादि रूपी द्रव्य हैं । हमने द्वितीय विभाग में दोनों को मूर्तं बतलाया था, यहाँ ऋषि वायु आदि को अमूर्त बतला रहे हैं, एवं पृथिवी प्रादि को मूर्त बतला रहे हैं । इसमें विरोध नहीं समझना चाहिए । आपः, वायु, प्राण, मेघ - इन मूत्तों में से आप, मेघ- ये दो तो मूर्त ही हैं । ये तो उभयथा मूर्त्त हैं । केवल सत्यपिण्ड की अपेक्षा से इन्हें ' अमूर्त ' कह दिया जाता है । इन अमूत्तों का हमें आँखों से प्रत्यक्ष होता है । परन्तु वायु और प्राण दोनों दूसरे विभाग के अनुसार तो ' मूर्त ' हैं, परन्तु ग्राँखों से न दिखलाई देने के कारण नीरूप होने से ' अमूर्त हैं । यह अमूर्त मी ' रथ ' है - अंगिरा प्राणमय सत्य मूर्त्तगण्ड भी रयि है - जैसा कि अनुपद में ही बतलाया जा चुका है । श्रुति के ' अमूर्त ' शब्द का अर्थ है- अदृष्टमूर्ति । उसकी मूर्ति अवश्य है, परन्तु ' भवि ' प्राण के प्रभाव से सौररश्मियों का प्रतिफलन नहीं होता, अतएव हम उसी वायु - प्राण की मूर्ति नहीं देखते अथवा अनियत शरीर को अमूर्त समझो । प्रापः, वायु आदि का कोई नियत शरीर नहीं है । आधार जिस आकार का होता है ये उसी आकार में परिणत हो जाते हैं । स्वयं इनकी कोई मूर्ति नहीं है, अतएव ये अमूर्त हैं । हृदययुक्त सत्यपिण्ड नियत शरीरी होने से मूर्त हैं । मूर्त्त श्रमूर्त्त दोनों रथि हैं । अमूर्त ऋत रयि का भृगुभाग है । मूर्त्त रयि का अंगिरा भाग है । अग्निगर्भित रयि ही मूर्ति है । मूर्त अमूर्तवेष्टित रहता है । पिण्ड मूर्त है । यह परमाकाश में स्थित अमूर्त्ततत्त्व से आक्रान्त है । दोनों की समष्टि रयि है । यही मूर्ति है, अतएव हम अवश्य ही ' मूर्ति ' को ही ' रयि ' कहने के लिए तय्यार हैं । रयि सोम है - यही स्त्री है यही शक्ति है । महर्षि ' तस्मान् मूत्तिरेव रयिः ' - मे शक्ति की ही प्रधानता सूचित करते हैं । इस रयिप्राण का विकास सूय्यं और चन्द्रमास्वरूप से होता है । सूर्य्य प्राणघन है । चन्द्रमा रयिघन है । ग्रादित्य अग्नि है, चन्द्रमा सोम है । वह प्रजापति परमेष्ठीरूप अपने भाग का प्रावपन बना अपने ही एक भाग से रयि बनाता है - प्राण बनाता है । इन दोनों का रोदसी त्रिलोकी में श्रादित्य और चन्द्रमारूप से विकास कर तद्वारा सारी प्रजाएँ उत्पन्न करता रहता है - इसी विज्ञान को लक्ष्य में रखकर ऋषि कहते हैं-" आदित्यो ह वै प्राणो रयिरेव चन्द्रमा रयिर्वा एतत्सर्वं यन्मूत्तं चामूर्तं च । तस्मान्मूत्तिरेव रयिः " - इत्यादि ॥ ५ ॥
" परमेष्ठी प्रजापति से उत्पन्न होने वाले - रविप्राणात्मक अग्नि - सोम ही प्रजासृष्टि के मुख्य उपादान हैं " - अब तक के निरूपण से यह भलीभाँति सिद्ध हो जाता है । यह ग्रग्नीषोमात्मक परमेष्ठी प्रजापति, दूसरे शब्दों में अग्नीषोम किस - किस रूप से इस विश्व में प्रतिष्ठित होकर प्रजानिर्माण करते हैं - इस प्रकरण का प्रारम्भ किया जाता है । हमारा यह अग्नीषोमात्मक परमेष्ठी प्रजापति १ - विश्वरूप, २- संवत्सर, ३ - माम, ४ - अहोरात्र, ५ - अन्न- इन पाँच स्वरूपों में परिणत होकर प्रजा-निर्माण कर रहा है । सबसे पहले यह प्रजापति विश्वरूप में परिणत होता है । अनन्तर संवत्सररूप में [ ४७ ]
पृष्ठ 62
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
प्रथम प्रश्न १० । १३।३४ । ३. रविप्राणनिरूपण प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य २ - ऐ ० ब्रा ० १।५ । [ ४८ ] परिणत होता है । संवत्सर से मासरूप में परिणत होता है । मास से अहोरात्ररूप में परिणत होता है एवं अहोरात्र से अन्नरूप में परिणत होता है । अन्न द्वारा वह सारी प्रजा का निर्माण करता है । प्रजापति के सत्य और यज्ञ दो रूप होते हैं । सत्य प्रजापति आलम्बन है, यज्ञ प्रजापति आलम्बित है । यज्ञप्रजापति सत्यप्रजापति पर प्रतिष्ठित है । सत्यप्रजापति अमृतात्मा ( षोडशी पुरुष ) पर प्रतिष्ठित है । षोडशी अमृत है । सत्यप्रजापति ब्रह्म है । यज्ञप्रजापति शुक्र है । अमृतभाग पर प्रतिष्ठित प्रजाकाम सत्यप्रजापति यज्ञरूप में परिणत होकर ही प्रजोत्पत्ति करने में समर्थ होता है । सत्य परब्रह्म है, यज्ञ अपरब्रह्म है । यही अवरब्रह्म प्रजा का उपादान होने से ' शुक्र ' नाम से व्यवहृत होता है । इस प्रकार-' तदेव शुक्रं तद् ब्रह्म तदेवामृतमुच्यते ' के अनुसार उस एक ही के अमृत ब्रह्म - शुक्र - तीन विवर्त्त हो जाते हैं । शुक्र यज्ञात्मक है । प्रजा यज्ञ के साथ उत्पन्न होती है । अग्नि में सोम की आहुति होने का नाम ही ' यज्ञ ' है । प्रजापति यज्ञरूप में परिणत होकर ही प्रजोत्पत्ति करने में समर्थ होता है । इसी यज्ञविज्ञान को लक्ष्य में रखकर यज्ञेश्वर कहते हैं— “ सहयज्ञाः प्रज्ञाः सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः । अनेन प्रसविष्यध्वमेष वोऽस्त्विष्टकामधुक् " - इति ॥ ' यज्ञ परमेष्ठी से उत्पन्न होता है, अतएव हमने प्रारम्भ में प्रजापति शब्द को परमेष्ठिपरक बतलाया है । यह परमेष्ठीरूप प्रजापति रयिप्राणात्मक यज्ञसृष्टि करने में असमर्थ है, प्रतएव यह सौरयज्ञ का सहारा लेता है । ' पाङ्क्तो वै यज्ञः २ - के अनुसार यज्ञ पाकयज्ञ, अग्निहोत्र, हविर्यज्ञ, सोमयज्ञ, विश्वरूप-यज्ञ भेद से पाँच प्रकार का है । अन्नयश पाकयज्ञ है । अहोरात्रयज्ञ अग्निहोत्र है । मास हविर्यज्ञ है । संवत्सरयज्ञ सोमयज्ञ है । सौरप्राणयुक्त परमेष्ठियज्ञ विश्वरूप यज्ञ है । इन पाँच यज्ञों से युक्त पाङ्क्त प्रजापति सृष्टि का निर्माण करता है । पांचों यज्ञ अग्नीषोमात्मक । पाँचों में से सर्वव्यापक सौर-प्राणोपेत परमेष्ठी नाम के विश्वरूपयज्ञ का निरूपण करते हुए ऋषि कहते हैं- ' अथादित्य: ' ० - इत्यादि ( ६-७- ८ वें मन्त्र ) - इन तीनों मन्त्रों से इस विश्वरूपयज्ञ का निरूपण किया गया है । सूर्य्य भिन्न वस्तु है, आदित्य भिन्न वस्तु है । विज्ञानकोटि में आदित्य को सूर्य का प्राण समझना अशुद्ध है । सूय्यं एक है - मादित्य १२ हैं । १२ श्रादित्यों में से जो एक इन्द्रनाम का क्षत्र श्रादित्य है - तद्युक्त चित्याग्निपिण्ड का नाम सूय्यं है । श्रादित्यजनक है - सूर्य्यं जन्य है । आदित्य परमेष्ठी का भाग है- अंगिरा परमेष्ठी है । इसी के एक भाग का नाम आदित्य है । इस आदित्य का श्रागे जाकर सूर्य्यरूप में विकास होता है । इसी श्रादित्यात्मक परमेष्ठी यज्ञ को ' स्वाराज्ययज्ञ ' कहा जाता है । सूय्यं विराज्यज्ञ है । प्रादित्य परमेष्ठी ' स्वाराज्ययज्ञ ' है । आदित्य ही सूर्य्यं बनता है इसलिए आदित्य को भी सूर्य्यं कहा जा सकता है, परन्तु चादित्य ही सूर्य्यं यह कहना अनुचित है । ' तस्य यद् ( परमेष्ठिप्रजापतेः यत् ) रेतसः प्रथममुवदीप्यत तदसावादित्यः’3_ के अ परमेष्ठी शुक्र का पहला विकास श्रादित्यात्मक सूर्य्यं है । स्वाराज्य यज्ञ ही विराट्यज्ञ में
पृष्ठ 63
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
प्रथम प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य रविप्राणनिरूपण से से दोनों का ग्रहण । यही सूर्य्यात्मक आदित्य अग्नीषोमरूप परिणत होता है । यहाँ उन्मुग्वरूप है । सारा विश्व इस महादशा से श्राक्रान्त सम्पूर्ण विश्व में अभिव्याप्त है । यह अग्नि - सोम की महादशा दिशाओंों में अपनी सहस्र रश्मियों से व्याप्त होता है । पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण, ऊर्ध्व, अधः- छओं रहा है । इस आदित्य में ज्योति, गौ, श्रायु-हुआ यह विश्वरूप आदित्य सबके प्राणों को आकर्षित कर यही आदित्य सबका आत्मा है । सबका भूत तीन भाग हैं । चा द्रसोमगर्भित अतएव अग्नीषोमात्मक तीन शरीर होते हैं । स्थूलशरीर भूतमय है । सबका देवता है । प्रत्येक पदार्थ में कारण- सूक्ष्म - स्थूल है । कारण-यह सौर ज्योतिभाग से गृहीत है - यह सौर गोभाग से गृहीत है । सूक्ष्मशरीर देवता इन है- तीनों से सूर्य्य ने सबको आकर्षित कर रखा शरीर आत्मा है - यह उसके आयुभाग से निगृहीत है । यही आदित्ययज्ञ है । है । जड़चेतनात्मक सम्पूर्ण विश्व की प्रभव प्रतिष्ठा - परायण को घूमता हुआ देखते हैं । इस पृथिवी सूर्य्यं के चारों ओर घूमती है । इससे हम, अधः स्थिर - भेद सूर्य्यं से सौर रश्मिऍ ६ भागों में विभक्त दृश्यमण्डल के अनुसार पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण, ऊर्ध्व , उत्तरा, ऊर्ध्वा, अधरा - इन ६ स्वरूपों में परिणत हो जाती हैं । उसकी रश्मिएँ प्राची, प्रतीची, दक्षिणा है । इस समय यह प्राची रश्मियों की सत्ता रहती हो जाती हैं । प्रातःकाल ३ बजे से 8 बजे तक इसकी तक दक्षिण रश्मियों बद्ध रखता है । ६ से ३ बजे इन रश्मियों से जड़चेतनात्मक प्राणियों को अपने में है । ३ बजे से रात्रि के से प्राणों को खँचा करता की सत्ता रहती है । इतने समय तक इन रश्मियों इस समय इनसे प्राणियों के प्राणों का हरण किया ६ बजे तक पश्चिमा रश्मियों की सत्ता रहती हैं- रश्मियों की सत्ता रहती है । इस समय करता है । रात्रि के 8 बजे से ३ बजे तक उत्तरा अहोरात्र में ६ ६ ६ ६ विभाग में विभक्त इनके द्वारा प्राणों को लिया करता । इस करता प्रकार है । बाकी बचता है - मध्य का विषुववृत्त । चारों रश्मियों से चारों ओर के प्राण लिया अघरा हैं । इन ऊर्ध्वा हैं । अधोभाग की इस पर सूर्य्यं स्वयं स्थिर है । इसके उपरिभाग की रश्मिएँ है । प्रातःकाल का सौरप्राण ब्रह्मवीर्यप्रधान है । पर रहकर सर्वात्मना सर्वरूप से प्राण लिया करता है । रात्रि का आसुरवीर्य्यप्रधान है । प्रातः मध्याह्न का क्षत्रवीर्य्यप्रधान है । सायंकाल का विड्वीर्यप्रधान है । रात्रि में रयिसोम इस पर सवार है । दिन में से सायं तक सौर प्राण रयिसोम पर सवार रहता में सोमरूप शुक्र इस पर सवार है, अतः सौर प्राण उल्बण है, अतः इतने समय तक प्रकाश अन्धकार है । रात्रि है । दिन में अग्नि आधेय है - सांम आधार रात्रि में कृष्णसोम का राज्य है, अतएव रात्रि में का स्वरूप है - जैसा कि आगे जाकर स्पष्ट है । रात्रि में सोम प्राधेय है, अग्नि आधार है यही प्रजनन कि इस सूर्य्य ने अपने प्राणों से सबके प्राणों हो जायगा । अभी केवल यही समझ लेना पर्याप्त होगा सौर प्राण दिशाओं में विभक्त है, एवमेव पृथिवी को अपने में बद्ध कर रखा है । जैसे पृथिवी के घूमने से के कारण दिशाओं में विभक्त हैं । बस, तत्तद् में रहने वाली प्रजाओं के प्राण भी इस पार्थिव परिभ्रमण प्रजानों के प्राणों को अपने तत्तत् प्राणों दिशाओं में विभक्त सौर प्राण तत्तद् दिशाओं में विभक्त है, अतएव ' श्रादत्ते सर्वान् प्राणान् रश्मिषु'-से आकर्षित किए रहता है । यह सारे प्राणों को लेता विज्ञान को कहने के लिए तय्यार हैं । इसी इस व्युत्पत्ति से इस विश्वरूप को हम अवश्य ही आदित्य लक्ष्य में रखकर ऋषि कहते हैं-[ ve ]
पृष्ठ 64
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
प्रथम प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य रयिप्राणनिरूपण " अथादित्य उदयन्यत्प्राचीं दिशं प्रविशति तेन प्राच्यान्प्राणान् रश्मिषु संनिधत्ते । यद् दक्षिणां यत् प्रतीचीं यदुदीचीं यदधो यदूर्ध्वं यदन्तरा दिशो यत् सर्वं प्रकाशयति तेन सर्वान् प्राणान् रश्मिषु संनिधत्ते " ॥६ ॥
वह समष्टि और व्यष्टिरूप से उमयथा प्राणों को अपने में प्रतिष्ठित रखता है । व्यष्टिरूप से -उसने दिग्भेद से सारे प्राणों को अपनी रश्मियों में प्रतिष्ठित कर रखा है - इस अभिप्राय से तो ' प्राचीं ' ' यद्दक्षिणां ' - इत्यादि कहा है एवं समष्टिरूप से सर्वात्मना वह अपनी सहस्ररश्मियों से सबके प्राणों पर व्याप्त है । इस अभिप्राय से- ' यत्सर्वं प्रकाशयति तेन सर्वान् प्राणान् रश्मिषु संनिधत्ते ' यह कहा है । --सर्वव्यापक यह आदित्यप्राण वैश्वानररूप में परिणत होकर ही प्रजा के प्राणों का निग्रहानुग्रह करने में समर्थ होता है । वैश्वानर पृथक् वस्तु है, प्रादित्य पृथक् वस्तु है । सूर्य्यं पृथिवी, अन्तरिक्ष तीनों के अग्नि से पैदा होने वाला यह वैश्वानर पृथिवीपृष्ठ से सूर्य्यं तक व्याप्त रहता है, अतएव इसके लिए ' वैश्वानरो यतते सूर्येण ' ' ' श्रा यो द्यां भात्या पृथिवीम् २ - इत्यादि कहा जाता है । यद्यपि स यः स वैश्वानरः-- असौ स आदित्यः ' 3 - इत्यादिरूप से श्रादित्य को वैश्वानर बतलाया जाता है, परन्तु वास्तव में ऐसा नहीं है । वैश्वानर का उपादान प्रादित्य है- इस अभिप्राय से वैश्वानर को ' आदित्य ' कह दिया है । वैश्वानर आदित्य से भिन्न आदित्य, वायु, अग्नि- तीनों नरों से उत्पन्न होने वाला है - जैसा कि निम्न-लिखित श्रुति से स्पष्ट हो जाता हैं-" स यः स वैश्वानरः । इमे स लोकाः । इयमेव पृथिवी विश्वं श्रग्निर्नरः ।
अन्तरिक्षमेव विश्वं वायुर्नरः । द्यौरेव विश्वं श्रादित्यो नरः " ॥४
तीन नराग्नियों के मेल से उत्पन्न होने के कारण ही तो इसका नाम ' वैश्वानर ' है । इसमें पार्थिव, प्रान्तरिक्ष्य, दिव्य तीनों श्रग्नि हैं । इसीलिए इसके लिए ' वैश्वानरो वै सर्वे अग्नयः " - यह कहा जाता है । भूतसर्ग चौदह प्रकार का है । ५ तिर्यक् सर्ग हैं, १ मनुष्य सर्ग है, आठ ( ८ ) देवसर्ग हैं । देवस्वर्ग दिव्य-स्थानीय हैं । मानुषसर्ग अन्तरिक्ष्य है । तिर्यक्सर्ग पार्थिव है । तीनों लोकों की प्रजा पर त्रैलोक्य-व्यापक वैश्वानर प्राण की सत्ता है । द्युलोकस्थ केवल आदित्यप्राण तीनों के प्राणों का निग्रह करने में असमर्थ हैं । वह पृथिवी अन्तरिक्षरूप में परिणत होता हुआ संवत्सर - स्वरूप में परिणत होता है । संवत्सर बनकर उषा में रेतः सिञ्चन करके वैश्वानररूप में परिणत होकर तीनों प्रजाओं का शासन १ - ऋग्वेद मं ० ११६८१ । ३- शत ० ब्रा ० ६।३।१।२५ । ५ - शत ० ब्रा ० ६।२।१।३५ । २- यास्क निरुक्त - दैवतकाण्ड ७।२३।५ । ४- शत ० ब्रा ० ६।३।१।३ । [ ५० ]
पृष्ठ 65
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
प्रथम प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य रविप्राणनिरूपण में स्पष्ट हो जायगा । करने में समर्थ होता है । जैसा कि अनुपद में ही बननाए जाने वाले संवत्सरस्वरूप का, तद्गत प्रजा का वैश्वानर अग्नि ही त्रैलोक्यव्यापक होने से विश्वरूप हो सकता है । यही को लोकत्रय अपनी रश्मियों में प्रतिष्ठित निग्रहानुग्रह करने में समर्थ हो सकता है । प्रादित्य ही प्रजाओं के प्राण साक्षात् रूप से ऐसा करने में असमर्थ करता है - यह सच है । परन्तु ऋषि कहते हैं - आदित्य ( सुय्यं ) में परिणत करता हुआ विश्वरूप होता हुआ अपने को संवत्सर के द्वारा विश्वरूप वैश्वानराग्निस्वरूप यज्ञ बन रहा है । इसी अभिप्राय से ऋषि कहते हैं—
" स एष वैश्वानरो विश्वरूपः प्राणोऽग्निरुदयते । तदेतदृचाभ्युक्तम् " ॥७ ॥
-18-इसी अर्थ का निम्नलिखित ऋचा से स्पष्टीकरण हुआ है-" विश्वरूपं, हरिणं, जातवेदसं, परायणं ज्योतिरेकं तपन्तम् । सहस्ररश्मिः शतधा वर्तमानः- प्राणः प्रजानामुदयत्येष सूर्यः ॥८ ॥
अध्याहार कर के निम्न-इस मन्त्र का अन्वय - ' एतं सूर्यं एतादृशं विदुः यः ' इत्यादि पदों का लिखित रूप से करना पड़ेगा-विश्वरूपं, हरिणं, जातवेदसं, ज्योतिः ( श्रनुः ) तपन्तं, एकं परायणं,, ( विद्वांसः - एतं सूर्यं - एतादृशं विदुः ) । ( एतद्दृश्यश्च ) एष सूर्य्यः सहस्ररश्मिभिः शतधा, श्रावर्त्तमानः, प्रजानां प्राणः ( सन् ) उदयति ॥ तु वैश्वानरात्मक सूर्य का वर्णन ध्यान रहे यह मन्त्र शुद्ध सूय्यं का वर्णन नहीं करता, श्रपि करता है - जैसा कि तत्तद् विशेषणों से स्पष्ट हो जाता है । से पृथिवी बनी है । इसी ( १ ) - यह वैश्वानरात्मक सूर्य्यं विश्वरूप है । त्रैलोक्यव्यापक के है चित्याग्निभाग । सूर्य्यं से बने हैं एवं तीनों से अन्तरिक्ष बना है, इसी से द्युलोक बना । तीनों लोक सूर्य रखते हैं । तीनों विश्व भी यही हैं । तीनों लोकों के अग्नि वायु - इन्द्र तीन नर चितेनिधेयभाग से सम्बन्ध ' कहने के लिए तय्यार हैं । अपि च-विश्वों के तीन नर भी यही हैं, अतः हम अवश्य ही इसे ' विश्वरूप की महिमा है । त्वष्टा नाम का आप हरित, नील, पीतादि जितने रंग देखते हैं - सब सूर्य के मघवा इन्द्रभाग बोभवीति ' - ' इन्द्रो रूपाणि करीकृद-श्रादित्यप्राण आकाररूप का अधिष्ठाता है एवं ' रूपं रूपं में का अधिष्ठाता है । सूर्य की प्रतिरश्मि चरत् ' के अनुसार इन्द्र नाम का सौर आदित्यभाग वर्णरूप ) इन्हीं सातों की अवान्तर अवस्थाएँ हैं । सात सात रंग हैं । सात सात रूप हैं । सारे रूप ( विश्वरूप १ - ऋग्वेद मं ० ३।५३३८ । [ ५१ ]
पृष्ठ 66
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
प्रथम प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य रयिप्राणनिरूपण चूंकि यह सौर इन्द्रभाग ही विश्वरूप ( सर्ववरूप ) का जनक है, इसलिए भी हम इसे ' विश्वरूप ' कहने के लिए तय्यार हैं । ( २ ) - वैश्वानरात्मक यह सूर्य्यं प्रजायों के प्राणों का निरन्तर हरण किया करता है । रश्मियों द्वारा तीनों लोकों के रस को लिया करता है । वर्षा के पानी को खैच लेना- इन्हीं सौर- रश्मियों का काम है । जो यह सूर्य आत्मा देता है - वही हमारे श्रात्मा को खैच भी लेता है । इसीलिए तो ' तद्यदेष मृत्यु: -असौ स आदित्य: - इस रूप से मृत्यु कहा जाता है । आत्मसत्ता रखने के समय यह अमृत है, आत्म-सत्ता को उच्छिन्न करने के समय वही मृत्यु बन जाता है । अमृत - मृत्यु दोनों इसके स्वरूप हैं । इसीलिए तो इसके लिए- ' निवेशयन्नमृतं मर्त्यं च १ - यह कहा जाता है । इस प्रकार सब तरह से इसकी हरण - शीलता स्पष्ट हो जाती है, अतएव हम अवश्य ही इसे ' हरिण ( सर्वरसापहर्त्ता आत्मा-पहर्त्ता ) कह सकते हैं ' । ( ३ ) - हम अच्छा बुरा जो कुछ जानते हैं वह इसी की महिमा है । वैश्वानरात्मक सूर्य्य ही ज्ञान का जनक है । यही घोरनिद्रा में निमग्न मनुष्यों को प्रातःकाल में उदित होता हुआ अपनी प्राचीरश्मियों से हमें जगा देता है । प्राणियों में जो ज्ञानशक्ति देखी जाती है जानने का माद्दा पाया जाता है - वह इसी सूर्य की महिमा है । १२ आदित्यों में एक सविता नाम का ग्रादित्य है । यह सवितात्मक श्रादित्य ही बुद्धि में प्रेरणा करता है । सूर्य्यसत्ता में ही हम पदार्थों को जानने में समर्थ होते हैं । ' जातो वेदो ( ज्ञानं ) यस्मात् ' - इस व्युत्पत्ति से सौर सावित्रप्राण ही जातवेदा है । इस जातवेदा सावित्र सूर्य्यं की जो ज्ञानज्योति है - वही- ' जातवेदसं ' ( जातवेदसः- - इव इवं ज्योति: - जातवेदसम् ' ) है । ' जातवेदसं ' का ' ज्योतिविषयिणम् ' - यही अर्थ है । ( ४ ) - वही सूय्यं त्रैलोक्य का परायण है । पार्थिव प्रजा का अन्तरिक्ष अयन है- द्युलोक अयन है, परन्तु सूर्य्यं परायण है- अन्तिम गति है । जब तक श्रात्मा आत्मा है तब तक इसकी परप्रतिष्ठा यही सूर्य्यं है । इसके बाहर गए बाद आत्मा आत्मा नहीं रहता - परमात्मा बन जाता है । आत्मदशा में तो आत्मा का और त्रैलोक्य का परायण यही है । सारा त्रैलोक्य सूर्य्यं के बृहत्साम में प्रतिष्ठित है, अतएव हम इसको अवश्य ही - ' परायण ' कहने के लिए तय्यार हैं । ( ५ ) - यह ( सूर्य ) इन्द्र के कारण ज्योतिर्मय है । अग्नि के कारण तापधर्मा है । सूर्य्य में ताप भी है - प्रकाश भी है । यह तापधर्म्म ही हमें इसके लिए बाध्य करता है कि हम इस सूर्य्यं को वैश्वानरात्मक मानें । कारण इसका यही है कि सौर सावित्राग्नि, पार्थिव गायत्राग्नि, आन्तरिक्ष्याग्नि- तीनों प्राणाग्नि हैं । तीनों नीरूप हैं - रूपरसगन्धस्पर्शशब्दादिशून्य हैं । इन तीनों में ही ताप नहीं है । इन तीनों के घर्षण से जो त्रैलोक्यव्यापक नया वैश्वानराग्नि उत्पन्न होता है - वही तापधर्म्मा है । सूर्य्याग्नि में ताप नहीं है-वैश्वानरयुक्त सूर्य में ताप हैं । ताप वैश्वानराग्नि का भाग है । प्रकाश इन्द्र का भाग है । यह ताप-१ - ऋग्वेद मं ० १।३५।२ । [ ५२ ]
पृष्ठ 67
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
प्रथम प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञान भाष्य रविप्राणनिरूपण धर्म ज्योति के आधार पर प्रतिष्ठित है । ज्योति इन्द्र का असली भाग है - साक्षात् सूर्य्यं है । यदि यह न हो तो - पृथिवी, अन्तरिक्ष, द्यौ न हों । तीनों न हों तो तापधर्म्मा वैश्वानर उत्पन्न न हो । वैश्वानरात्मक सूर्य्यं तप रहा है, परन्तु - ' ज्योतिरनुलक्ष्य ' ० ज्योतिर्भागमाश्रित्य अर्थात् ज्योति को लक्ष्य बनाकर ज्योति का आश्रय लेकर । वैश्वानर सूर्य्यं के आधार से ही उत्पन्न होता है - उसी पर प्रतिष्ठित रहता है - यही निष्कर्ष है । यह ज्योति और तापमय वैश्वानरात्मक सूर्य्यं सारी त्रिलोकी का एक अधिपति है । पृथिवी, चन्द्रमा आदि आदि जो परज्योतिपिण्ड हैं उनमें आधे भाग में ज्योतिर्मय इन्द्र की सत्ता रहती है, आधे भाग में तमोमय वृत्रासुर की सत्ता रहती है । वहाँ देवासुर ( ज्योतिस्तम ) दो अधिपति हैं, परन्तु स्वज्योतिर्मय सूर्य्यं असपत्न है- एकल्ला शासक है । तमोमय आसुर प्राण का सर्वथा अभाव है । इसी अभिप्राय से तो स्वज्योतिर्म्मय इस सूर्य के लिए-" न त्वं युयत्से कतमश्चनाह " यह कहा जाता है । यहाँ ' ज्योतिरेकम् ' है । अन्यत्र परज्योतिर्मय पिण्डों में ज्योतिः सद्वितीयम् है । अथवा ' एकम् ' का मुख्यपरक समझना चाहिए । सूर्य्य, चन्द्र, अग्नि, तारक, विद्युत् भेद से ज्योति कुल पाँच प्रकार की हैं । इनमें से आगे की चारों ज्योतियों की प्रभव प्रतिष्ठा - परायणरूपा यह पाँचवीं मुख्य सूर्य्यज्योति ही है । बस, वैज्ञानिक लोग वैश्वानरात्मक, अतएव विश्वरूपप्राणप्रदाता सूर्य्यं को पूर्वोक्त धर्मों से युक्त समझते हैं । इस सूर्य में कुल हजार रश्मिएँ हैं । ३६० दिन की एक परिक्रमा में ( संवत्सर परिभ्रमण में ) हमें इसकी हजारों रश्मिएँ मिल जाती हैं । ३३३ रश्मिएँ पार्थिव वासवाग्नि में विभक्त है, ३३३ रश्मिएँ आन्तरिक्ष्य वायव्याग्नि में विभक्त हैं एवं ३३३ ही रश्मिएँ दिव्य आदित्यों में विभक्त हैं । एक सर्वरूपा कामगवी रश्मि है । इन हजारों का एक संवत्सर में हम भोग करते हैं । वसन्त से प्रारम्भ कर शिशिर तक हजारों रश्मिप्राणों को हम अपना अन्न बना डालते हैं । वसन्त- ग्रीष्म प्रातः सवन है - इसमें वासव ३३३ रश्मियों का सम्बन्ध होता है । वर्षा - शरद् माध्यन्दिनसवन है - इसमें रौद्र ३३३ रश्मियों का सम्बन्ध होता है । हेमन्त शिशिर सायंसवन है - इसमें ३३३ आदित्यों का सम्बन्ध होता है । एक रश्मि सब पर व्याप्तसी रहती है । इस प्रकार संवत्सरयज्ञ से उत्पन्न होने वाले हम प्राणिलोग सवनत्रय में विभक्त संवत्सर की हजार रश्मियों को ले लेते हैं । ऐसे १०० संवत्सर हमारे अन्न हैं । सूर्य जब १०० बार परिक्रमा लगा लेता है तो हमारी आयु समाप्त हो जाती है । इसी विज्ञान के आधार पर ' शतायुर्वे पुरुषः १ - यह कहा जाता है । सूर्य्यं शतधा आवर्त्तमान होकर प्रजाओं का प्राण बनता हुआ उदित होता है - इसका तात्पय्यं यही है कि वह १०० परिक्रमा तक प्रत्येक को अपना प्राण दिया करता है । अनन्तर उसका प्राणद्वार उसके लिए बन्द हो जाता है । प्राणान के बन्द होते ही-आत्मा उत्क्रान्त हो जाता है । इस प्रकार १०० वर्ष तक प्रजाओं का प्राण द्वारा विवरण करता हुआ-वैश्वानररूप में परिणत होता हुआ यह विश्वरूप अग्नीषोमापरपर्य्यायक- रविप्राणात्मक प्राजापत्ययज्ञ सर्वत्रव्याप्त हो रहा है । १ - कौ ० ब्रा ० १८। १० । " [ ५३ ]
पृष्ठ 68
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
प्रथम प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य रविप्राणनिरूपण इस पारमेष्ठ्य विश्वरूप को आदित्यात्मक बतलाया गया है । ऋषि को बतलाना है - पारमेष्ठ्य यज्ञ का स्वरूप, परन्तु आदित्यरूप से वे इसका निरूपण करते हैं । आदित्य साक्षात् परमेष्ठी है । जैसा कि चयनयज्ञ में स्पष्ट किया गया है । वहाँ पर आदित्यात्मिका प्राजापत्या चिति को परमेष्ठिरूपा बतलाया गया है || ८ || ॥ इति प्रथमो विश्वरूपयज्ञः - प्रादित्ययज्ञः परमेष्ठियज्ञो वा ॥ ॥ १ ॥
----प्रजाकाम प्रजापति तप श्रम के द्वारा रवि प्राण उत्पन्न करता है । वही रविप्राणात्मक प्रजापति ( इसका अंगिरा भाग ) सूर्य्यरूप में परिणत होकर त्रैलोक्यजन्मा वैश्वानर से युक्त होकर सारे त्रैलोक्य में व्याप्त हो रहा है । यह वैश्वानरात्मक सूर्य संवत्सरस्वरूप में परिणत होता है । संवत्सर सूय्यंरूप है । यह उस आदित्यात्मक परमेष्ठी का दूसरा अवतार है । संवत्सर के आगे मासप्रजापति है । मासप्रजा-पति के आगे ग्रहोरात्र प्रजापति है । अहोरात्र के उदर में अन्न प्रजापति है । इस प्रकार पूर्वकथनानुसार रविप्राणात्मक उस एक प्रजापति के १- विश्वरूप ( परमेष्ठी ), २- संवत्सर, ३ - मास, ४-- अहोरात्र, ५- अन्न- ये पाँच स्वरूप हो जाते है-१- विश्वरूपयज्ञः स्वाराज्ययज्ञः -परमेष्ठी - ( सर्वात्मकः ) -सूर्य: - - ( संवत्सरात्मकः ) – ३६० २- संवत्सरयज्ञ: सोमयज्ञः ३ - मासयज्ञः- -दर्शपूर्णमासयज्ञ: चन्द्रमाः-- ( मासात्मकः ) --३० ४ - ग्रहोरात्रयज्ञ: अग्निहोत्रयज्ञ: -- पृथिवी-- ( अहोरात्रात्मकः ) - १ ५- श्रन्नयज्ञः- -- पाकयज्ञः - पशु: -- ( अन्नात्मकः ) - X । यज्ञः वै पाक्तो पांचों यज्ञों में से ६-७-८ वे इन तीन मन्त्रों से विश्वरूपयश का स्वरूप बतला दिया गया, प्रवक्रम प्राप्त संवत्सरयज्ञ का स्वरूप बतलाते हैं । संवत्सर पार्थिव, सौर भेद से दो प्रकार का है । यद्यपि ब्राह्मणग्रन्थों में पृथिवी, सूर्य्य - दोनों के साथ संवत्सर का सम्बन्ध बतलाया जाता है, परन्तु प्रधान रूप से सूर्य के साथ ही संवत्सर का सम्बन्ध बतलाया जाता है । ' स यः स संवत्सरोऽसौ स श्रादित्यः ' १ ' एव संवत्सरो य एष तपति " इत्यादि श्रुतिवचन संवत्सर को ग्रादित्यात्मक ही बतलाते हैं । इस संवत्सर का स्वरूप चूंकि पृथिवीपरिभ्रमण से बनता है इसलिए संवत्सर का पृथिवी के साथ भी १ - शत ब्रा ० १०।२।४।२ । २- शत ० ० १४।१।१।२७ । [ ५४ ]
पृष्ठ 69
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
प्रथम प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य रयिप्राणनिरूपण सम्बन्ध बतला दिया जाता है । वस्तुतः संवत्सर है - सूर्य्यं की वस्तु । वैदिक सिद्धान्त के सूर्य्य अनुसार को केन्द्र सूय्यं में स्थिर माना जाता है । दृश्यमण्डलानुसार अचला पृथिवी ' चला ' मानी जाती है । ' क्रान्तिवृत्त ' रखकर पृथिवी जिस नियतमार्ग पर सूर्य्यं के चारों ओर परिक्रमा लगाती है वह वृत्त मार्ग है । खगोलीय नाम से प्रसिद्ध है । खगोल के ३६० अंशों में से मध्य के ४८ अंशों के परिसर में यह दक्षिणोत्तर में १२-८-४ मध्यमवृत्त ' विषुवद्वृत्त ' कहलाता है । यही बृहती छन्द है । इस विषुवत् के बनते हैं । इस क्रम से क्रान्तिवृत्त को काटते हुए तीन वृत्त दक्षिणभाग में बनते हैं, तीन ही उत्तर में ' ' अहोरात्रवृत्त ' प्रकार विषुवत् को मिलाकर कुल सात वृत्त हो जाते हैं । इन सातों वृत्तों को ' पूर्वापरवृत्त - गायत्री, श्रादि नामों से पुकारा जाता है । दक्षिण से प्रारम्भ कर ये ही सातों अहोरात्रवृत्त क्रमशः एक पहिया उष्णिक्, अनुष्टुप् बृहती, पङ्क्ति, त्रिष्टुप् जगती इन नामों से प्रसिद्ध हैं । क्रान्तिवृत्तरूप रथ का संक्षिप्त है । सौर हिरण्मय प्राण सुनहरी रथ है । ये सात छन्द सात घोड़े हैं । यह सूर्य के सबके बीच परिचय है जो कि वैज्ञानिक भाव के अनुसार वस्तुतः पृथिवी का रथ है । इन सातों में जो का बृहती छन्द ( विषुवत् ) है - ' सूर्यो बृहतीमध्यूढस्तपति ' के अनुसार इसके ऊपर भगवान् वही संवत्सर सूर्य्यं प्रति- है । ष्ठित हैं । इनसे २४ अंश दक्षिण, २४ अंश उत्तर- इतना ४८ अंश का जो भाग है कि यह संवत्सर सौराग्निमय है । ब्राह्मणग्रन्थों ने इस संवत्सर को ' सुपर ' नाम से पुकारा है - जैसा निम्नलिखित वाजसनेय श्रुति से स्पष्ट हो जाता है— " अथ ह वा एष महासुपर्ण एव यत् संवत्सरः । तस्य यान् पुरस्तात्-विषुवतः षण्मासानुपयन्ति सोऽन्यतरः पक्षः, अथ यान् षडुपरिष्टात् सोऽन्यतर श्रात्मा विषुवान् " " । बृहती छन्द के ऊपर प्रतिष्ठित सूर्य्य ही इस संवत्सर- सुपर्णं का आत्मा सूर्य्यं है । दक्षिणभाग से निष्पन्न दक्षिणपक्ष है, उत्तरभाग उत्तरपक्ष है । इस सुपर्णसंवत्सर का स्वरूप बृहतीमध्यस्थ प्रतिष्ठित है, होता है । यदि सूर्य्यं न होता तो संवत्सर सर्वथा अनुपपन्न था । सूर्य्यं स्वयं वृहतीछन्द पर मध्य का सारा अग्निमण्डल अतएव - ' बृहती हि संवत्सरः " - यह कहा जाता है । पृथिवी परिभ्रमणवृत्त के एकमात्र ' संवत्सर ' है - यही निष्कर्ष है । अब यह अग्निमण्डल ' संवत्सर ' नाम से क्यों व्यवहृत होता है? यह प्रश्न बाकी बच जाता है । मान लीजिए --अभी न तो संवत्सर पैदा हुआ है एवं न संवत्सर का जनक सूर्य्यं पैदा केन्द्र हुआ में है वही । इस समय केवल है तो आपोमय परमेष्ठी प्रजापति । सर्वत्र पानी भरा हुआ है । उसके प्रजापति के केन्द्र में उसी हमारा रविप्राणात्मक परमेष्ठी प्रजापति प्रतिष्ठित है । इस परमेष्ठी में परिणत अंगिरा भाग से ' हिरण्मयमण्डल ' पैदा होता है । अंगिराप्राण सिमट सिमट कर मण्डलाकार है । यह हो जाता है । इसी हिरण्मय मण्डल के लिए- ' तदण्डमभवर्द्धमं सहस्रांशुसमप्रभम् ' 3 – कहा जाता १- शत ० ब्रा ० १२।२।३।७ । ३ - मनुस्मृति १६ । २- शत ० ब्रा ० ६।४।२।१० । [ ५५ ]
पृष्ठ 70
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
प्रथम प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य रविप्राणनिरूपण हिरण्मयाग्नि ही एक संवत्सर में ( संवत्सरोपलक्षितकाल में ) पुरुषरूप में परिणत हो जाता है । अर्थात् मण्डलाग्निपरमाणु केन्द्र में जमा होते जाते हैं । होते होते जब वे परमघनता को प्राप्त हो जाते हैं तो उनका एक पिण्ड बन जाता है । यही हिरण्मयमण्डलस्थ केन्द्रस्थ आग्नेय पुरुष है । यही पुरुष सूर्य्यं नाम धारण करता है । आपोमय परमेष्ठीमण्डल के केन्द्र में प्रतिष्ठित रहने के कारण ही यह पुरुष ' सूर्य्यनारायण ' नाम से प्रसिद्ध है । यही उस प्रापोमय प्रजापति का दूसरा अवतार है । इस सूर्य्यं के चारों ओर हिरण्मयमण्डल है । इसके बाहर प्रापोमय परमेष्ठी है । परमेष्ठी अथर्ववेद है । मण्डलोपहित सूर्य्य त्रयीवेद है । यह त्रयीमय सूर्य अंगिराभृग्वात्मक आपोमय परमेष्ठी के केन्द्र में प्रतिष्ठित है, अतएव इसके लिए -" आपो भृग्वङ्गिरोरूपमापो भृग्वङ्गिरोमयम् । अन्तरैते त्रयो वेदा भृगूनङ्गिरसोऽनुगाः ” । ' — यह कहा जाता है । सूर्य्यपिण्ड ऋग्वेद है । हिरण्मयमण्डल सामवेद है । सूर्य्यपिण्ड का केन्द्राग्नि यजुरग्नि है -यही पुरुष है । इसी प्रजापति से आगे की सारी सृष्टियाँ होने वाली हैं । इस सूर्य्यं से पूर्व में बतलाए गए ‘ ग्रहोपग्रहोत्पत्ति ' प्रकरण के अनुसार क्रमशः पृथिवी अन्तरिक्ष द्यौ तीन लोक उत्पन्न होते हैं एवं तीनों लोकों के अग्नि, वायु, आदित्य - तीन देवता पैदा होते हैं । सूर्य्य अग्निमय है । यह अग्नि चित्य - चितेनिधेय भाग से दो प्रकार का है । इसमें चित्यभाग से तो पृथिवी अन्तरिक्ष द्यौ, तीन लोक बनते हैं एवं चितेनिवेयभाग से अग्नि वायु इन्द्र - तीन देवता उत्पन्न होते हैं । इन ६ नों को उत्पन्न करने के कारण वह सूर्य्यप्रजापति विस्रस्त हो जाता है । उतना भाग निकलकर इन देवादिस्वरूपों में परिणत हो जाता है । सौर प्रजापति में अवाक् - पराक् भेद से दो प्राण हैं । अवाक् प्राण रयि है, पराक् प्राण प्राण है । रयि पानी है, प्राण अग्नि है । इसमें अग्निरूप प्राणभाग ज्योतिर्म्मय को है । इससे तीन ज्योतिएँ ( अग्नि, वायु, आदित्य ) पैदा होती हैं । याज्ञिक परिभाषा में इन्हीं तीनों विश्वज्योति इष्टका कहा जाता है । पृथिवी अन्तरिक्ष द्यौ विश्व है । तीनों देवता इन तीनों की प्रका-शिका है । बाकी बचता है - आपोरूप प्रर्वाप्राण । यह तमोमय है । इससे आसुर प्राणदेवता उत्पन्न होते हैं । इस प्रकार - ' देवाश्च वा असुराश्च । उभये प्राजापत्याः २ - इस श्रौत सिद्धान्त के अनुसार उस प्रजापति से ज्योतिर्मय देवता, तमोमय असुर - दोनों प्रजा उत्पन्न होती हैं । देवताओं का प्राणभाग से सम्बन्ध है, असुरों का रयिभाग से सम्बन्ध है । इन्हीं दोनों के मिथुन से आगे की सारी सृष्टियाँ होती हैं । इमी अभिप्राय से - " देवेभ्यस्तु जगत् सर्वं चरं स्थाण्व नुपूर्वशः " 3 - यह कहा जाता है । ' देवेभ्यस्तु ' के तुकार को – ‘ असुरेभ्यः ' का उपलक्षण समझना चाहिए । ज्योतिर्भागमयी देवतात्रयी - ' अहः ' पैदा है, तमो- किया भागमयी प्रासुरप्राणसमष्टि रात्रि है । दोनों की समष्टि संवत्सर है । प्रजापति ने ज्योति - तम क्या अहोरात्रात्मक ( संवत्सर ) पैदा किया । एक प्रकार से प्रजापति का सारा भाग इस संवत्सर - निर्माण में १ - गोपथ ब्रा ० पूर्व १।१।३६ । ३ - मनुस्मृति ३।२०१ । २- शत ० ब्रा ० १।७।२।२२ । [ ५६ ]