प्रश्नोपनिषद् — पृष्ठ 71–80

प्रश्नोपनिषद् · पृष्ठ 71–80

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प्रथम प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञान माध्य रयिप्राणनिरूपण खर्च हो गया, अतएव वैज्ञानिकों ने इस मण्डल का ' सर्वं वा श्रत्सारिषम् ' - इस व्युत्पत्ति से संवत्सर नाम रख दिया । संवत्सराग्निमण्डल सौर अग्निमय है, अतएव उसे हम सर्वभाग के विस्रस्त हो जाने से अवश्यमेव ' संवत्सर ' कहने के लिए तय्यार हैं । इसी संवत्सर - विज्ञान को लक्ष्य में रखकर श्रुति कहती है-“ स यदस्मै देवान्त्ससृजानाय । दिवेवास तदहरकुरुत । अथ यदस्मा-ऽसुरान्त्सृजानाय तम इवास तां रात्रिमकुरुत तेऽअहोरात्रे । स ऐक्षत प्रजापतिः । सर्वं वा अत्सारिषं य इमा देवता श्रसृक्षीति स सर्वत्सरोऽभवत् । सर्वत्सरो ह वै नामैतद्यत् संवत्सर इति " । ' यह हुई संवत्सर की एक उपपत्ति । दूसरे प्रकार से भी इसका निर्वचन किया जाता है । हम बतला आए हैं कि पृथिवी ही संवत्सर की सीमा बनाती है । यह पृथिवी प्रतिबिन्दु से वक्रित होती हुई आगे चलती है । सूर्य्यं में इन्द्र है, विष्णु है । इन्द्र का धर्म विक्षेपण है, विसर्ग है । विष्णु का धम्मं आदान है । सूय्यंगत इन्द्र पृथिवी को धक्का देकर बाहर फेंक रहा है, परन्तु साथ ही में विष्णु अपनी श्रादानशक्ति से उसे अपनी ओर खैंच रहा है । ये दोनों बल विज्ञानभाषा में केन्द्रापसारिणी शक्ति, ' केन्द्राकर्षिणी शक्ति ' नाम से प्रसिद्ध हैं । इन्द्र निरन्तर उसे केन्द्र से हटाता है, विष्णु निरन्तर इसे अपने ( सूर्य्य के ) केन्द्र में आकर्षित रखता है । इन्द्र के धक्के से पृथिवी बिलकुल सीधी जाना चाहती है, परन्तुउसी क्षण विष्णु उसे मोड़कर सूर्य्याभिमुख कर लेते हैं । इस प्रकार प्रतिक्षण इन्द्र के धक्के से अपना सीधा रुख करता हुआ भूपिण्ड विष्णु की केन्द्राकर्षिणी शक्ति के प्रभाव से बिन्दु बिन्दु से वक्रित हो जाता है । बस, इसी वक्रता के कारण पृथिवी अपने परिक्रमण को गोल बना डालती है । गोल वस्तु वही होती है - जिसकी प्रतिबिन्दु वक्रित हो । पृथिवी कुटिल होती हुई प्रागे चलती है - दूसरे शब्दों में सूर्य के चारों ओर परिक्रमा लगाती है, अतएव - ' त्सरन् सन् गच्छति ' - इस व्युत्पत्ति से इस भूपिण्ड को हम त्सरवत्सर कहने के लिए तय्यार हैं । पृथिवीपरिभ्रमण सौर अग्निमण्डल बनाता है । मण्डल त्सरवत्सर होता है । इसलिए भी हम इस सौर अग्निमण्डल को ' संवत्सर ' कहने के लिए तय्यार हैं । इस संवत्सर प्रजापति को हमने पूर्व में सुपर्ण बतलाया है एवं दक्षिण, उत्तर, विषुव भेद से इसके दक्षिण-पक्ष, उत्तरपक्ष, मध्यात्मा भेद से इसके तीन विभाग बतलाए हैं । यद्यपि हमने संवत्सर को अग्निमय ही कहा है । परन्तु वस्तुतः संवत्सर अग्नीषोमात्मक है । इसी अग्नीषोमात्मक संवत्सरप्रजापति से सारी प्रजाश्रों का निर्माण होता है, अतएव इसके लिए ' संवत्सरो वै यज्ञः प्रजापति: २ - यह कहा जाता है । इस संवत्सर-प्रजापति के वही उत्तर - दक्षिण पक्ष उत्तरायण दक्षिणायन नाम से प्रसिद्ध हैं । उत्तरगोल - दक्षिणगोल भिन्न वस्तु हैं, उत्तरायण दक्षिणायन भिन्न पदार्थ हैं । उत्तरगोल में दक्षिणायन की सत्ता है, दक्षिणगोल में उत्तरा-यण की सत्ता है । पृथिवी का उत्तरायणकाल दक्षिणायनकाल है, पृथिवी का दक्षिणायनकाल उत्तरायण-१- शत ० ब्रा ० ११।१।६।११-१२। २- शत ० ब्रा ० ११।१।१।१ । [ ५७ ]

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प्रथम प्रश्न प्रश्नोपनिषदिज्ञानमाध्य रयिप्राणनिरूपण काल है । पूर्व में बतलाया जा चुका है कि पृथिवी सूर्य के चारों ओर २४-२४ अंशवाले ४८ अंशा-स्मक क्रान्तिवृत्त पर घूमती है । सूख्यं मध्य में है । पृथिवी २४ अंश तक नीचे जाती है, २४ अंश तक ऊपर जाती है । सूपं और पृथिवी की दूरी का नाम ' कान्ति ' है पृथिवी परिभ्रमणवृत्त दो समयों को छोड़कर सूर्य्यं से सदा दूर रहता है, अतएव यह वृत्त ' क्रान्तिवृत्त ' नाम से प्रसिद्ध है । उत्तरभाग की अन्तिम दूरी २४ अंश है, इधर यही चौबीसवां अंश दक्षिणभाग की परमावधि है । दूसरे शब्दों में ४८ वां अंश परम दूरी है, अतएव इसे ' परमक्रान्ति ' कहा जाता है । वसन्त ऋतु में पृथिवी दक्षिणभाग की परमक्रान्ति पर है । इस समय इसकी सत्ता गायत्री छन्द पर है । यहां से पृथिवी ऊपर चलती है । आगे बढती है । बढ़ते - बढ़ते एक दिन विषुवद् पर आ जाती है । इस दिन पृथिवी सूर्य्यं के सम धरातल पर आ जाती है । आज इसकी वह दूरी हट जाती है । आज क्रान्ति का पतन है, अतएव इसे ' संपातबिन्दु ' या ' कान्तिपात ' कहा जाता है । इस दिन अहोरात्र समान होते हैं । इसी अभिप्राय से - ' समरात्रिंदिवे काले विषुवद् विषुवं च तत् ' इत्यादि कहा जाता है । अब पृथिवी और भी आगे बढती है । बढ़ते - बढते जब यह ४६ वें अंश पर ( जगती छन्द पर ) पहुँच जाती है तो वहाँ से वापस नीचे की घोर लौट पड़ती है । लौटते - लौटते फिर विषुव पर आती है । इस दिन फिर कान्ति का पतन है । इस दिन भी अहोरात्र समान होते हैं । इन दो समयों को छोड़कर पृथिवी सदा सूर्य्यं से दूर रहती है । ६ महिने पृथिवी सूर्य के दक्षिणभाग में रहती है, ६ महिने पृथिवी सूर्य्यात्मक उत्तरभाग में रहती है । वसन्त ग्रीष्म, वर्षा - इन तीन ऋतुओं में अग्नि की सत्ता रहती है एवं शरत्, हेमन्त, शिशिर इन तीन ऋतुओं में सोम की सत्ता रहती है । वसन्तादि तीनों ऋतुस्रों का उत्तरायण से सम्बन्ध है एवं शरदादि तीनों का दक्षिणायन से सम्बन्ध है । उत्तरगोल - दक्षिणगोल- दोनों के मध्य में एक याम्योत्तररेखा खैच दीजिए । बस इस याम्योत्तररेखा का जो पूर्वभाग है वह उत्तरायण है, पश्चिमभाग दक्षिणायन है । गायत्री छन्द दक्षिणगोल के ठीक मध्य में है एवं जगतीछन्द उत्तरगोल के ठीक मध्य में है । वह याम्योत्तर रेखा इन दोनों को काटती हुई बनेगी । सुतरां उत्तरगोल में दक्षिणायन की एवं दक्षिणगोल में उत्तरा-यण की सत्तासिद्ध हो जाती है । मान लीजिए - बाज पृथिवी उत्तरगोल के जगती छन्द पर सबसे ऊंचे स्थान पर ( उत्तर की परमक्रान्ति पर ) है । पृथिवी के ऊँचे श्रा जाने से आज दृश्यमण्डल की अपेक्षा से सूर्य बिलकुल नीचे चला गया है । यह समय पृथिवी के उत्तरायण की परमक्रान्ति है, सूर्य्यं के दक्षिणायन की परमक्रान्ति है अव यहाँ से पृथिवी नीचे झुकती है । बस, इसके नीचे झुकते ही सूर्य्यं ऊँचा आने लगता है एक बात और इस स्थिति में सूर्य गायत्री छन्द पर है, पृथिवी जगती पर है - यह बतलाया जा चुका है । हम पृथिवी के उपरिभाग में रहते हैं, अतः इस समय सौर प्रकाश बहुत कम मात्रा में हमारे पास श्राता है । इस क्रान्ति पर दिन सबसे छोटा होता है, रात सबसे बडी होती है । अब यहाँ से पृथिवी दक्षिण की ओर झुकती है । यही पृथिवी का दक्षिणायनकाल है । इसके दक्षिणायन होते ही गायत्री छन्द पर स्थित सूर्य्यं का उत्तरायण होने लगता है । सूर्य्य ऊंचा होने लगता । है । यहीं से दिन बड़े होने लगते हैं । पृथिवी जब विषुव पर आ जाती है तो सूपं भी ऊँचा आता-आता विषुव पर आ जाता है । होते होते जव पृथिवी दक्षिणायन की परमक्रान्ति पर पहुँच जाती है । तो सूर्य उत्तरायण के परम कान्तिरूप जगती छन्द पर पहुंच जाता है । इस दिन अधः स्थित पृथिवी 31515135 [ ५८ ]

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प्रथम प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य रयिप्राणनिरूपण पर सौर प्रकाश अधिक मात्रा से आता है, अतएव इस दिन - दिन सबसे बडा एवं रात्रि सबसे छोटी होती है । यहाँ से सूर्य्यं नीचे गिरता है, पृथिवी ऊपर चढती है । यही सूर्य का दक्षिणायनकाल है । इस प्रकार गायत्री जगती पर दिन - रात छोटे बड़े होते हैं । विषुव पर समान होते हैं । पृथिवी जब जगती पर रहती है तो दिन सबसे छोटा होता है यह बतलाया जा चुका है । २१ मार्च को, २३ सितम्बर को दिन रात समान होते हैं, क्योंकि इस समय पृथिवी विषुव पर रहती है एवं २२ जून को दिन सबसे बडा होता है, २२ दिसम्बर को रात सबसे बडी होती है । जब से दिन छोटे होने लगते हैं एवं रात्रि बडी होने लगती है, तबसे दिन की अल्पता की पराकाष्ठा तक सोम की सत्ता रहती है । एवं जब से दिन बड़े होने लगते हैं - तब से प्रारम्भ कर दिन की बृहत्ता की पराकाष्ठा तक अग्नि की सत्ता है । भाद्रपद से फाल्गुन तक सोम की सत्ता है । इतने काल में शरत्, हेमन्त शिशिर - तीन ऋतुओं का भोग होता है । ' कानजी कल में श्राये रात बडी दिन छोटे लाये ' इस सुप्रसिद्ध लोकोक्ति के अनुसार भाद्रपद शुक्ला अष्टमी से वर्षा की समाप्ति एवं शरत् के प्रारम्भ से दिन छोटे और रात बडी होने लगती है । यह दक्षिणायनकाल है । इसमें सोम की सत्ता है एवं फाल्गुन से भाद्रपद तक अग्नि की सत्ता है । वसन्त, ग्रीष्म, वर्षा तीनों श्राग्नेय ऋतु हैं । यही उत्तरायणकाल है । यह आग्नेय होने से देवमय है एवं शरत्, हेमन्त, शिशिर तीन सौम्य ऋतु हैं - यही पितर है । यद्यपि पूर्वकथनानुसार लौकिक व्यवहार में ६ ऋतुएं मानी जाती हैं, परन्तु वास्तव में ऋतुएं कुल पाँच ही हैं । क्योंकि संवत्सर यज्ञप्रजापति है एवं ' पाङ्क्तो वै यज्ञः ' के अनुसार यज्ञ पाङ्क्त ( पंचावयव ) होता है, अतः संवत्सरप्रजापति की अवयवरूप ऋतुएँ भी पांच ही हो सकती हैं । वे पाँचों ऋतु वसन्त, ग्रीष्म, वर्षा, शरत्, हेमन्त भेद से विभक्त हैं । ' हेमन्त शिशिरयोः समासेन ' - के अनुसार शिशिर का हेमन्त में ही अन्तर्भाव है । पाँचों ऋतु ७२ ७२ दिन की हैं । यह ऋतुव्यवहार वैदिक है-अतिप्राचीन है - वास्तविक है, अतएव श्राज भी ' पून्यूँ पड़वा टाले तो दिन बहत्तर गाले'- यह लोकोक्ति प्रसिद्ध है । ७२ दिन की एक एक ऋतु है । प्रत्येक में १६-४०-१६ भेद से प्रातः सवन, माध्यन्दिनसवन, सायंसवन भेद से तीन तीन सवन होते हैं । पहले के १६ दिन ऋतु की बाल्यावस्था है, अन्त के १६ दिन वृद्धावस्था है । मध्य के ४० दिन युवावस्था है । इसमें पूर्णरूप से इस ऋतु का विकास रहता है । यही चालीसा ग्राम भाषा में ' चिल्ला ' कहलाता है । चिल्ला चालीसा का ही अपभ्रंश है । शीत में सोम की प्रधानता के कारण जो अग्निपरमाणु शीर्ण हो गए थे - शिशिरभाव को प्राप्त हो गए थे-वे ही पुनः पदार्थों में बसने लगते हैं - वही पहला वसन्तकाल है । जब अतिशयरूप से अग्नि पदार्थों का ग्रहण कर लेता है तो- वसन्त ग्रीष्म में परिणत होता है एवं पराकाष्ठा पर पहुँचकर वही अग्नि-' अग्नेराप ’: - इस सिद्धान्त के अनुसार पानी बनता हुआ वर्षा का रूप धारण कर लेता है । बस, इतना अग्निकाल है । यहाँ से अग्नि शीर्ण होने लगता है - सोम बढने लगता है - यही पहला ' शरत्काल ' है । अतिशयरूप से हीनता को प्राप्त होकर वह अग्न्युपलक्षिता ऋतु हेमन्त कहलाने लगती है । यही सोम काल है । वह अग्नीषोमात्मक संवत्सर प्रजापति - इन्हीं अग्नीषोममय पाँच ऋतुओं में परिणत होकर प्रजा का निर्माण करता है । प्रजा ऋतु पर ही ( समय पर ही ) उत्पन्न होती हैं । अग्नि ऋतु में सोम [ ५६ ]

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प्रथम प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य रयिप्राणनिरूपण नहीं है, सोम ऋतु में अग्नि नहीं है - यह बात नहीं है । दोनों में दोनों हैं केवल गौण - मुख्य का भेद है । यह श्रग्नीषोम का महाभाग है । इसके बाद मास आता है । मास में आपूर्यमाणपक्ष ( शुक्ल पक्ष ) आग्नेय है, प्रपक्षीयमाणपक्ष ( कृष्णपक्ष ) सौम्य है । यद्यपि श्राजकल मास की विभाजिका पूर्णिमा और श्रमा मानी जाती हैं, तथापि जैसे उत्तरगोल, दक्षिणगोल आग्नेय - सौम्य नहीं हैं - श्रपि तु, याम्यो-उत्तर रेखा से सीमित उत्तरायण दक्षिणायन - काल श्राग्नेय और सौम्य हैं- इसी प्रकार कृष्णाष्टमी से पक्षविभा-शुक्लाष्टमी तक का भाग सौम्य है । शुक्लाष्टमी से कृष्णाष्टमी तक का भाग आग्नेय है । जिका दोनों अष्टमिएँ हैं न कि श्रमा पूर्णिमा । इसमें अष्टमी से सम्बन्ध रखने वाला एक पक्ष अग्नि-प्रधान है वह देवमय है । एक पक्ष सौम्य है वह पितरमय है । यह अग्नीषोम का दूसरा भाग है । अमा पितरों का मध्याह्न बतलाया जाता है, पूर्णिमा देवताओं का मध्याह्न बतलाया जाता है । यह तभी हो सकता है जबकि अष्टमी को पक्षविभाजिका मान ली जाय । कृष्णाष्टमी से सौम्य पक्ष प्रारम्भ होता है । यह अष्टमी पितरों का प्रातःकाल । अमा मध्याह्नकाल है । शुक्लाष्टमी शुक्लाष्टमी सायं-काल है । पूर्णिमा आधीरात है । कृष्णाष्टमी फिर प्रातःकाल है । ठीक इसके विपरीत देवताओं का प्रातःकाल है, पूर्णिमा मध्याह्न है, कृष्णाष्टमी सायंकाल है । अमा मध्यरात्रि है है ॥ यह इस देवपितरों का दूसरा विभाग है । तीसरा है अहोरात्र विभाग । रात्रि सौम्या है - ग्रहः आग्नेय अहोरात्र का विभाग भी याम्योत्तररेखा से ही होता है । रात्रि के १२ बजे से दिन के १२ बजे तक के श्रग्नि का चढ़ाव है । यही इसका उत्तरायणकाल है । इतनी देर में देवताओं का राज्य है । दिन १२ बजे से रात्रि के बारह बजे तक अग्नि का ह्रास है- सोम की वृद्धि है । यही पितृकाल है । यही अग्नीषोम का तीसरा भाग है । इसी अग्नीषोमीय देवपितृविज्ञान को लक्ष्य में रहकर ब्राह्मणश्रुति कहती है-" वसन्तो ग्रीष्मो वर्षाः । ते देवा ऋतवः । शरद्धेमन्तः शिशिरः- ते पितरः । य एवापूर्यतेऽर्धमासः स देवाः । योऽपक्षीयते स पितरः । अहरेव देवाः, रात्रिः पितरः पुनरह्नः पूर्वाह्नो देवाः - अपराह्नः पितरः " ॥ " संवत्सर में उत्तरायणकाल शुक्लाष्टमी है । इसकी समाप्ति कृष्णाष्टमी है । दक्षिणायनकाल कृष्णाष्टमी है । इसकी समाप्ति शुक्लाष्टमी है । दोनों विषुवकाल अमापूर्णिमा हैं । उत्तरायणसम्बन्धी विषुव पूर्णिमा है - दक्षिणायनसम्बन्धी विषुव अमा है । यही व्यवस्था मास है यही व्यवस्था , मास, अहोरात्र अहोरात्र में है । इस प्रकार उस रविप्राणरूप अग्नीषोमीय विश्वरूप परमेष्ठी प्रजापति के संवत्सर उन सबका एक तीन स्थूल अवतार होते हैं । इन तीन के अलावा संसार में जितने छोटे बड़े पदार्थ हैं - पहले इसी विभाग है । उस विभाग के लिए श्रुति ने ' अन्न ' शब्द का प्रयोग किया है । इसमें सबसे पूर्वोक्त संवत्सरप्रजापति का निरूपण करते हुए ऋषि कहते हैं-" संवत्सरो वै प्रजापतिः " - इत्यादि ॥ १- शत ० ब्रा ० २।१।३।१ । [ १० ]

पृष्ठ 75

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प्रथम प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य रयिप्राणनिरूपण प्रजानिर्माण करने के कारण संवत्सर प्रजापति है । इसकी प्राप्ति के उत्तर और दक्षिण मार्ग हैं । जो मनुष्य कृतरूप इष्टापूर्त की उपासना करते हैं - वे चान्द्रलोक को ही जीतते हैं एवं वे ही जन्म लेने के लिए पुनः मृत्युलोक में लौटते हैं । प्रजाकाम विद्वान् लोग प्रजापति की तरह दक्षिणमार्ग से ही जाते हैं । यही वह ' रयि ' है -जो कि पितृयाण है-" संवत्सरो वै प्रजापतिस्तस्यायने दक्षिणं चोत्तरं च ॥ तद्ये ह वै तदिष्टापूर्ते कृतमित्युपासते ते चान्द्रमसमेव लोकमभिजयन्ते ॥ त एव पुनरा-वर्तन्ते तस्मादेते ऋषयः प्रजाकामा दक्षिणं प्रतिपद्यन्ते ॥ एष ह वै रयिर्यः पितृयाणः " ॥ ॥ ६ ॥

-8-उत्तरमार्ग से तप, ब्रह्मचय्यं, श्रद्धा, विद्याद्वारा आत्मा को खोजकर आदित्य को जीत लेते हैं । यही आदित्य प्राणों का आयतन है । यही अमृत है - यही अभय है - यही परायण है । इसमें गए बाद आत्मा वापस नहीं लौटता है । यह आदित्य पुनरावृत्ति का निरोध - स्थान है— “ अथोत्तरेण तपसा ब्रह्मचर्येण श्रद्धया विद्ययात्मानमन्विष्यादित्यमभि-जयन्त एतद्वै प्राणानामायतनमेतदमृतमभयमेतत्परायणमेतस्मान्न पुनरावर्तन्त इत्येष निरोधस्तदेष श्लोकः " ॥ ॥ १० ॥

-8-' जो वस्तु जहाँ की होती है वह वहीं जाती है यह वैज्ञानिक जगत् का निश्चित सिद्धान्त है । अध्यात्म - प्रपञ्च का निर्माण अग्नीषोमात्मक संवत्सर प्रजापति से हुआ है, अतएव सिद्ध हो जाता है कि आत्मशरीर के विश्लेषण होने के अनन्तर भूतमय अग्नीषोमीय शरीर संवत्सरप्रजापति के भूताग्नीषोम में चले जाते हैं एवं प्राणाग्नीषोमीय आत्मा प्रजापति के प्राणाग्नीषोम में चले जाते हैं । श्रग्नि - सोममय आत्मा के जाने के यदि कोई मार्ग हो सकते हैं तो आग्नेय, सौम्य भेद से दो ही हो सकते हैं | आग्नेय मार्ग का नाम ही उत्तरायण है एवं सौम्यमार्ग ही दक्षिणायन नाम से प्रसिद्ध है । आग्नेयमार्ग में प्रादित्य-मय सूर्य की संस्था है, सौम्यमार्ग में सोममय चन्द्र की सत्ता है । चन्द्रमा संवत्सर का द्वार है । ' ये वै केचनास्माल्लोकात् प्रयन्ति चन्द्रमसमेव ते सर्वे गच्छन्ति ' - इस सिद्धान्त के अनुसार पहले सब को चन्द्रलोक में जाना पड़ता है । यहाँ से उत्तर - दक्षिण दो मार्ग विभक्त हैं । दक्षिणमार्ग चन्द्रलोक है - पितृलोक है । उत्तरमार्ग प्रादित्यलोक है - देवलोक है । आत्मा या तो उत्तरमार्ग में जाता हुआ देवलोक में जा सकता है या दक्षिणमार्ग में जाता हुआ पितृलोक में जा सकता है । दो ही मार्ग हैं - दो ही गन्तव्यस्थान हैं । इसी विज्ञान को लक्ष्य में रखकर श्रुति कहती है-[ ६१ ]

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प्रथम प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य " द्वे स्रुती अशृणवं पितॄणामहं देवानामुत मर्त्यानाम् । रविप्राणनिरूपण ताभ्यामिदं विश्वमेजत् समेति यदन्तरा पितरं मातरं च " ॥ ' माता पृथिवी, पिता द्यौ - दोनों के बीच में रहने वाले प्राणिमात्र के जाने के दो ही मार्ग हैं । श्रुति का यही तात्पर्य है । इन दोनों में उत्तरमागं में गया हुआ आत्मा वापस नहीं लौटता - दक्षिणमार्ग में गए हुए को वापस लौटना पड़ता है । कौन दक्षिणमार्ग में जाता है - कौन उत्तरमार्ग में जाता है - इसका निर्णय कर्म्म - कलाप पर निर्भर है । जैसे मार्ग उत्तर - दक्षिण भेद से दो हैं । एवमेव उत्तरकर्म्म, दक्षिणकम्मं भेद से कर्म्म भी दो ही प्रकार के हैं । विद्यासापेक्ष - यज्ञ, तप, दान तीनों कम्र्म्म उत्तरकर्म्म हैं । इष्ट, आपूर्त, दत्त - तीन कर्म्म दक्षिणकर्म्म हैं । वेदविहित कर्मकाण्ड यज्ञ है । तपश्चर्या तप है । विद्वानों को दक्षिणा देना दान है ' । पाकयज्ञ, सत्यभाषण, अतिथिसत्कार आदि ' इष्ट ' हैं एवं वापी कूप, तड़ाग, देवगृह-निर्माणादि कर्म्म आपूर्त्त हैं । हीन अंग, असमर्थों का अन्नवस्त्रादि सहायता करना दान है । पूर्व के तीनों उत्तरकर्म्म विद्यासापेक्ष हैं - शास्त्रीय हैं । विद्वान् ही उन्हें कर सकता है । उत्तर के तीनों दक्षिणक विद्यानिरपेक्ष हैं- इन्हें विद्वान्मूर्ख विना पढे ही जानते हैं और करते हैं । यज्ञ - तप - दान - विद्या - श्रद्धा - तप द्वारा किए जाने पर उत्तरमार्ग की प्राप्ति के कारण बनते हैं । इष्ट, आपूर्त, दत्त- तीनों पितृस्वर्गरूप दक्षिणमार्ग की प्राप्ति के कारण हैं । इसका कारण यही है कि आदित्यात्मक अग्निप्राण ज्ञानप्रधान है । ज्ञान से बन्धन टूटता है । यज्ञ, तप, दान- तीनों कम्मं त्रयीमय आदित्यप्राणसम्बन्धी कम हैं । इनसे आध्यात्मिक आदित्यप्राणभाग प्रबल होता है इससे इसका श्रात्मा प्रबलता से उधर ही आकर्षित रहता है एवं चन्द्रमा भूतप्रधान है । चान्द्रसोम ही अग्नि में आहुत होकर मूर्त्त प्रमूर्त्त पदार्थ का जनक बनता है । चान्द्र-सोम रयि है । मूत्ति - अमूर्त सब रयि हैं । सारे द्रव्य रयिरूप हैं । दूसरे शब्दों में भूतप्रपञ्च रयिरूप हैं । इनका आकर्षण चन्द्रमा से है भूतों में रहने वाले ग्राग्नेयप्राण आदित्य से आकर्षित हैं । इष्ट, आपूर्त, दत्त तीनों कर्म्म भूतप्रधान हैं - क्रियाप्रधान हैं, अतः इनके कारण आत्मा का रविभाग प्रबल हो जाता है, अतः इन कम्मों के अनुयायी को उसी चन्द्रलोक में जाना पड़ता है । एक मार्ग ज्ञानप्रधान है - एक मार्ग कर्मप्रधान है । कर्म्मप्रधान में पुनरावृत्ति है । ' ज्ञानान्मुक्ति: ' - इस सिद्धान्त के अनुसार ज्ञानप्रधान उत्तर-मार्ग में अपुनरावृत्ति है । प्रजासृष्टि का दक्षिणसोम से सम्बन्ध है, प्रजामुक्ति का उत्तर आदित्य से सम्बन्ध है । पितृयाण रयि है, देवयान प्राण है । एक मुक्ति का कारण है, एक सृष्टि का हेतु है । उत्तरमार्ग से श्रादित्य की प्राप्ति होती है । यही आदित्य इतर सारे प्राणों का आयतन है । यही अमृत है - अक्षररूप है । सूर्य्य महदक्षर से अनुगृहीत रहता है । अक्षर के पास ही अव्यय बैठा है । वही परात्पर युक्त रहने के कारण ' अभय ' है । स्थानच्युति का नाम भय है । वह स्थान अभय है, अतएव वहाँ गए बाद वास्तव में पुनरावृत्ति नहीं हो सकती । इसी सारे मार्ग, गति प्रादि विज्ञान को लक्ष्य में रखकर कर्माचार्य्यं कहते हैं- आत्मा का शरीर अन्न है - इसमें भी अग्नि, सोम - दो भाग हैं । इसके बाद अहोरात्र है - इसमें ' अहः ' अग्नि है- ' रात्रि ' सोम है । अहोरात्र के बाद मास है । कृष्णपक्ष सोम है, शुक्लपक्ष अग्नि १ - ऋग्वेद मं ० १०।८८।१५ । [ ६२ ]

पृष्ठ 77

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प्रथम प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य रयिप्राणनिरूपण है । इसके बाद संवत्सर है । उसका उत्तरायणभाग अग्नि है, दक्षिणायनभाग सोम है । संवत्सर का अग्नि-सोम मास में आता है । मास का अहोरात्र में आता है । अहोरात्र का अन्न में आता है । ग्रन्न से हमारे में आता है । बस, जिस क्रम से आगमन है - उसी क्रम से निर्गमन है । शरीर के आधेभाग में अग्निप्राण है - आधे भाग में सौम्यप्राण हैं । सौम्यप्राण कृष्ण तम है- अग्निप्राण अग्नि ज्योति है । ये दोनों अन्नमय हैं । आत्मा शरीरपरित्यागानन्तर सबसे पहले यथाक्रम्मं यथाविध अन्नमय अग्निर्ज्योति, घूम ( कृष्णसोम ) दोनों में से किसी एक में जाता है । अनन्तर आगे रहने वाले ग्रहः - रात्रि- दोनों में से किसी में जाता है । अनन्तर द्वाररूप चन्द्रमा में जाता हुआ उत्तरायण, दक्षिणायन - दोनों में से किसी एक में जाता है । इसी सारे श्रीतविज्ञान को संक्षिप्त अक्षरों से बतलाते हुए गीताचार्य कहते हैं-" श्रग्निर्ज्योतिरहः शुक्लः षण्मासा उत्तरायणम् । तत्र प्रयाता गच्छन्ति ब्रह्म ब्रह्मविदो जनाः ॥ ' धूमो रात्रिस्तथा कृष्णः षण्मासा दक्षिणायनम् तत्र चान्द्रमसं ज्योतिर्योगी प्राप्य निवर्तते ॥

शुक्लकृष्णे गती ह्येते जगतः शाश्वते मते ।

एकया यात्यनावृत्तिमन्ययाऽऽवर्त्तते पुनः ” ॥

अग्निगति शुक्ल है, सोमगति कृष्ण है । वही पारमेष्ठ्य प्राणरूप श्रग्नि उत्तरायण, शुक्लपक्ष, श्रहः, शरीरज्योतिः - इन चार विभागों में विभक्त रहता है एवं कृष्णसोम दक्षिणायन, कृष्णपक्ष, रात्रि, शरीरधूम - इन चार भागों में विभक्त रहता है । एक बात और बतलाकर हम इस प्रकरण को समाप्त करते हैं— संवत्सरप्रजापति - रथि को अपने उदर में रखने वाला आदित्यात्मक आग्नेयप्राणप्रजापति - संवत्सर, मास, अहोरात्र, अन्नरूप में परिणत होता हुआ प्रजा का निर्माण करता है - पूर्व के प्रकरण से यह भली भाँति सिद्ध हो जाता है । प्रजा यों तो अनेक हैं । अष्टविध देवसर्ग भी प्रजा में ही अन्तर्भूत है । परन्तु यहाँ प्रजा शब्द से हम प्रधानरूप से पुरुष, अश्व, गौ, अवि, अज - इन पाँच वस्तुनों का ही ग्रहण करेंगे । इन पाँच पशुओं का ही पूर्व के उपनिषदों में विस्तार के साथ निरूपण किया जा चुका है, अतः हम यहाँ इनके विषय में अधिक कुछ नहीं कहना चाहेंगे । यहाँ हमें केवल यही कहना है कि संवत्सर सौराग्नि है-जैसा कि उपनिषत् के प्रारम्भ में ही बड़े विस्तार के साथ बतलाया जा चुका है । वह संवत्सराग्नि रेतोधा है । पृथिवीपिण्ड का उष्ण भाग रेत है । प्रातः कालीना सोररश्मिगर्भिता पार्थिव भूवायु ही ' उषा ' है । यह योनि है । इस योनि में वह रेतोधा प्रजापति अपने संवत्सराग्निरूप रेत का सिंचन करता है । पाँचों ऋतुएँ भूत हैं- इन भूतों का पति संवत्सरप्रजापति है । यही रेतोधा पिता है । उषा पत्नी है । इसमें भूतयुक्त १ - गीता ८२४-२६ । [ ६३ ]

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प्रथम प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य रविप्राणनिरूपण भूतपति संवत्सराग्नि की आहुति होती है । संवत्सराग्नि आदित्यरूप है । इसमें त्रैलोक्य का अग्नि है । यही वैश्वानर है । इसीलिए तो पूर्व में हमने यहाँ के आदित्य को ' वैश्वानर ' कहा है । यह संवत्सर प्रजापति की दूसरी अवस्था है । वैश्वानरात्मक संवत्सरप्रजापति का उषायोनि में सिक्त रेत एक वर्ष के अनन्तर कुमाररूप में परिणत होता है । यह कुमाराग्नि आगे जाकर अष्टविध चित्राग्निस्वरूप में परिणत होता है । कुमाराग्नि ही उदबुद्ध होकर अग्नि, आपः, औषधि, वायु, विद्युत्, पर्जन्य, सोम, आदित्य- इन आठ स्वरूपों में परिणत होता है । यही अष्टमूत्ति शिव है । ' त्वमर्कस्त्वं सोमः ' - इत्यादि से इसी चित्राग्नि का वर्णन किया गया है । यह चित्राग्नि आगे जा कर - पुरुष, अश्व, गौ, अवि, अज-इन पाँच वैकारिक अग्नियों के स्वरूप में परिणत होता है । यही ' पाशुक ' श्रग्नि है । संचरक्रम की यही पराकाष्ठा है । इन पाशुक अग्नियों से हम सब प्रजाओं का निर्माण होता है । चयनप्रकरण में इन सबका हमने विस्तार से निरूपण कर दिया है, अतः प्रकृत में हम अधिक न कहकर यहीं इस प्रकरण को समाप्त करते हैं । संवत्सरप्रजापति का स्वरूप ऋषि बड़े विस्तार से बतला चुके । अब मन्त्रश्रुति द्वारा इसका उपसंहार करते हुए अन्त में कहते हैं—

" पञ्चपादं पितरं द्वादशाकृति दिव आहुः परे श्रद्धे पुरीषिणम् ।

प्रथेमे अन्य उ परे ( उपरे वा ) विचक्षणं सप्तचक्रे षडर प्राहुपितम् " - इति ॥

॥ ११ ॥

--इस मन्त्र का अर्थ स्पष्ट है । शंकर भगवान् ने इस मन्त्र का जो अर्थ किया है वह मान्य है । इसलिए अधिक न कहकर केवल भाषा प्रेमियों की सुविधा के लिए यहाँ उसका उल्लेखमात्र कर देते हैं-ऋतु एक है, दो हैं - तीन हैं - पांच हैं - छह हैं । पाँच तरह से ऋतुविभाग किया जा सकता है । श्रग्नि पहली निष्पन्न ऋतु है । वसन्त, ग्रीष्म, वर्षा, शरत्, हेमन्त, शिशर छत्रों ऋतुओं का स्वरूप अग्नि के तारतम्य से, हुआ है । अग्नि का चढाव तीन विभागों में विभक्त है । वही तीनों उद्यामसम्बन्धी विभाग, वसन्त, ग्रीष्म वर्षा है । अग्नि के ही निग्रामसम्बन्धी तीन विभाग शरद्, हेमन्त, शिशिर हैं । ६ नों एक ही अग्नि की अवस्थाविशेष हैं । यही पहली ऋतु है । अग्नि - सोम भेद से दो ऋतु हैं । सर्दी, गर्मी दो मौसम सुप्र-सिद्ध हैं । सर्दी सोम है, गर्मी अग्नि है । अथवा सर्दी, गर्मी, वर्षा भेद से तीन ऋतु हैं । अथवा ७२-७२ दिन के हिसाब से पाँच ऋतु हैं । अथवा २-२ मास के हिसाब से ६ ऋतु हैं । पाँचों पक्षों में यहाँ को चौथे और पाँचवें पक्ष का ग्रहण है । पाँच ऋतुओं के अभिप्राय से यहाँ सौर संवत्सरप्रजापति ' पञ्चपाव ' कहा गया है । विषुव पर आत्मरूप से सूय्यंप्रजापति प्रतिष्ठित हैं । उसके ऋतुरूप पाँच पैर हैं । यह - ' नूनं जनाः सूर्येण प्रसूताः ' ' द्यौः पिता ' - इत्यादिरूप से सबका पिता है । १२ मास -१२ आकृतियाँ हैं । ये ही प्रजापति के १२ तनू कहलाते हैं । असल में प्रजापति एक ही है । परन्तु चन्द्रमा के कारण वह एक ही प्राणप्रजापति १२ भागों में विभक्त होकर अपने १२ स्वरूप बना लेता है । [ ६४ ]

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प्रथम प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य रविप्राणनिरूपण चन्द्रमा नक्षत्रों के कारण १२ भागों में विभक्त होता है । इन १२ जाति के चन्द्रमाओं के सम्बन्ध से आदित्य १२ तरह का बन जाता है । ये ही मेषादि १२ राशि की १२ आकृतियाँ भी मानी जा सकती हैं । द्वादश राशि हैं - १२ मास हैं ये द्वादशाकृतिएँ हैं । इस प्रकार पाँच पैर वाला एवं १२ माथे वाला यह पिता - प्रजापति सौर विषुवमण्डल के ऊर्ध्वस्थान में प्रतिष्ठित है । पुरीषरूप से विद्वान् लोग इसे प्रतिष्ठित बतलाते हैं । विषुवमण्डल दिव्यमण्डल है । हम पूर्वप्रकरण में इस बृहतीछन्दापरपर्य्यायक विषुवद्-वृत्त के केन्द्र में आत्मरूप से सूय्यं को प्रतिष्ठित बतला आए हैं । वैज्ञानिक परिभाषा में हृदय ऊर्ध्व कहलाता है, प्रधि अधोभाग कहलाता है - जैसा कि कठोपनिषत् के ' उर्ध्वमूलोऽवाक्शाखः १ - इत्यादिमन्त्र के निरूपण में विस्तार के साथ बतलाया जा चुका है । ' अर्द्धशब्द ' - ' भाग ' का वाचक है । ' परे अर्द्ध ' का ' परभागे उर्ध्वमागे - केन्द्रभागे ’ - यही अर्थ है । सौरमण्डल द्युलोक है । संवत्सरमण्डल द्युलोक है । इसका केन्द्र वही विषुव केन्द्र है । यहीं पर पञ्चपाद द्वादशाकृति- पिताप्रजापति की सत्ता बतलाई जाती है । चन्द्रमा और सूर्य के परस्पर के गमनतारतम्य से सौर संवत्सरप्रजापति पाँच भागों में विभक्त हो जाता है । दृश्यमण्डल के अनुसार सूर्य्यं प्रायः प्रतिदिन एक अंश चलता है । यदि पूरे एक अंश गति होती तब तो ३६० दिन में यह अपनी पूर्व ( उपक्रमस्थानीय ) बिन्दु पर आ जाता । परन्तु यह एक अंश से कुछ कम चलता है । इस हिसाब से स्थूलमान से ३६६ दिन में इसके संवत्सर का स्वरूप निष्पन्न होता है । सावन वर्ष की अपेक्षा से इसमें ६ दिन और बढ जाते हैं । इधर चन्द्रमा सूर्य्यं से तेज चलता है । यह एक दिन में एक अंश से भी अधिक चलता है । यह ३५४ दिन में ही अपनी परिक्रमा समाप्त कर लेता है । इस प्रकार चन्द्र और सूर्य की गति में वर्ष में १२ दिन का अन्तर हो जाता है । चन्द्रमा १२ दिन आगे निकल जाता है, सूय्यं पीछे रह जाता है । मान लीजिए - आज चन्द्रमा, सूय्यं - दोनों अश्विनी पर हैं । दोनों एक बिन्दु पर हैं । यहाँ से दोनों चलते हैं । वर्ष के अन्त में दोनों में १२ दिन का अन्तर पड़ जाता है । २ वर्ष में २४ दिन का अन्तर पड़ जाता है । २३ वर्ष में ३० दिन का अन्तर पड़ जाता है । यही मलिम्लुच मास कहलाता है । इसे ही ' अधिक ' मास कहते हैं । २३ वर्ष के बाद दूरी हटने लगती है । हटते हटते २३ वर्ष के अनन्तर पाँचवें वर्ष के अन्त में दोनों का उसी एक बिन्दु रूप अश्विनी पर योग होता है । यह ' महासंवत्सर ' कहलाता है । इस महासंवत्सर के अवान्तर पांच विभाग हैं । उन पाँचों में प्रथम संवत्सर में अग्नि की सत्ता रहती है, दूसरे में प्रादित्य की सत्ता रहती है, तीसरे में सोम की सत्ता रहती है, चौथे में ब्रह्मा की सत्ता रहती है । पांचवीं में शिववायु की सत्ता रहती है । ये पाँचों संवत्सर दूसरे शब्दों में महासंवत्सर के अवान्तर पाँचों विभाग क्रमशः निम्नलिखित नामों से प्रसिद्ध हैं-१- संवत्सर श्रग्नि २- परिवत्सर- आदित्य ३- इडावत्सर - सोम ४- अनुवत्सर - ब्रह्मा - महासंवत्सर ५- इब्वत्सर - शिव १ - कठोप ० २।३।१ । [ ६५ ]

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प्रथम प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य रयिप्राणनिरूपण महासंवत्सरपरमपिता है । इसके अवान्तर ये पाँच विभाग ही पाँच पैर हैं । अब बाकी बचता है- ' पुरीषिणम् ' पद | ब्राह्मणग्रन्थों में यह शब्द निम्नलिखित रूप से भिन्न - भिन्न अर्थों में प्रयुक्त हुआ है-१ - ' अन्नं वै पुरीषम् ' । ' २ - ' पशवो वै पुरीषम् ' । ' ३- स एष प्राण एव यत् पुरीषम् ' । ४ - पुरीषं वा इयं ( पृथिवी ) ' । ५- ' अथ यत्पुरीषं स इन्द्रः ' । ७- ' प्रजा पशवः पुरीषम् ' । ६- ' प्रजा पुरीषम् ' । ६ प्रकृतमन्त्र का ' पुरीष ' शब्द इन सारे ग्रथों से सम्बन्ध रखता है । सूर्य्यं के श्रादित्यभाग से वृष्टि होती है । वृष्टि से अन्न उत्पन्न होता है । अन्न का अधिष्ठाता सूर्य्य है । अन्न पुरीष है । इसलिए संवत्सरप्रजापति के लिए अवश्यमेव ' पुरीषिणम् ' कहा जा सकता है । संवत्सराग्नि ही क्रमशः वैश्वानर, कुमार, चित्ररूप में परिणत होती हुई पुरुषादि पश्वाग्निरूप में परिणत होता है । पशु को पुरीष कहते हैं । इसलिए भी हम उसको ' पुरीषिणम् ' कह सकते हैं । ' प्राणः प्रजानामुदयत्येष सूर्य: ' के अनुसार वह प्राणघन है । प्राण पुरीष है - इसलिए भी प्राणघन प्रजापति पुरीष है । पृथिवी पुरीष है । यह पृथिवी सौर संवत्सर में प्रतिष्ठित है । इसलिए भी हम इसे पुरीषयुक्त कह सकते हैं । ' यथाऽग्निगर्भा पृथिवी यथा द्यौरिन्द्रेण गर्भिणी ' के अनुसार द्युरूप सूर्य्य इन्द्रमय है । इन्द्र पुरीष है - इसलिए भी हम उसे ' पुरीष ' कह सकते हैं । सूर्य्यं सारी प्रजाओं का प्राण है । प्रजा उसी प्रजापति पर प्रतिष्ठित है । प्रजा पुरीष है-इसलिए भी हम इसे ' पुरीष ' कह सकते हैं । इन सारे अर्थों का यदि निष्कर्ष निकाला जाता है तो-' पुरीषिणम् ' का ' सर्व पदार्थमयम् ' यही अर्थ निकाला जाता है । वस्तुतस्तु प्रकृत का पुरीषशब्द एकमात्र पशु का वाचक है । छन्द, पोष, सलिल, अन्न, श्रग्निभेद से पशु पाँच प्रकार के हैं - जैसा कि पूर्व में बतला दिया गया है । संवत्सरप्रजापति प्रजापति है । प्रजापति में आत्मा, प्राण, पशु - ये तीन विभाग होते हैं । ऋषि को प्रकृत में प्रजापति के इन तीनों भागों का स्पष्ट निरूपण करना है । चूँकि वे इस उपनिषत् में प्रधानरूप से प्राण का निरूपण कर रहें हैं- इसलिए तो पहले उन्होंने- ' प्रारणः प्रजानामुदयत्येष सूर्यः ' - इस रूप से प्रजापति के प्राणभाग का निरूपण किया है । अनन्तर- ' एतद्वै प्राणानामायतनं एतदमृतं एत-दमयं एतत्परायणम् ' इस रूप से प्रजापति के आत्मा - भाग का निरूपण किया है । पशु बच जाता है । पुरीष पशु को कहते हैं । इसलिए तीसरे मन्त्र में उसी बाकी बचे हुए पशुभाग का निरूपण करते हुए-१- शत ० ब्रा ० ८।५।४।४ । ३- शत ० ब्रा ० ८।७।३।६ । ५ - शत ० ब्रा ० १०।४।१।७ । ७ - तै ० ब्रा ० ३।२।८।१ | २ - शत ० ब्रा ० ७।५।१६ । ४- शत ० ब्रा ० १२।५।२।५ । ६- शत ० ब्रा ० ८।७।४।१६ । [ ६६ ]