प्रश्नोपनिषद् — पृष्ठ 81–90
प्रश्नोपनिषद् · पृष्ठ 81–90
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प्रथम प्रश्न १- श्रन्नादी ३- भद्रा ५- अनिलया ७- अनाप्ता ६ - अमाइष्टा ११- अपूर्वा रविप्राणनिरूपण प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य २- अन्नपाली ४- कल्याणी ६- अपभया ८- अनाप्या १० अनाधृष्या १२- अभ्रातृव्या [ ६७ ] ' पुरीषिणम् ' कहा है । अथवा केवल इस एक ही मन्त्र में आत्मा, प्राण, पशु - इन तीनों का निरूपण समझना चाहिए । ' पञ्चपादम् ' प्राण भाग का निरूपण' करता है । ' ऋतवो वै प्राणा: ' - के अनुसार पाँच ऋतु उसके प्राण हैं । प्राणनिरूपक उपनिषत् में इसी को मुख्य रखते हुए ऋषि ने ' पञ्चपादम् ' को पहला स्थान दिया है । ग्रात्मा पाँच ही प्राणों से युक्त रहता है । ' यस्मिन् प्राणः पञ्चधा संविवेश'-के अनुसार उस अभय आत्मा में पाँच प्राण हैं । सूर्य की दृष्टि से ' पञ्चपाद ' ऋतुनों का वाचक है । आत्मा की दृष्टि से पञ्चपाद पाँच आत्मप्राणों का वाचक है । महासंवत्सर की अपेक्षा से इद्वत्सर-इडावत्सरादि पाँच संवत्सरों का वाचक है । ' पितरम् ' आत्मभाग का निरूपक है । ' पुरीषिणम्'- पशुभाग का निरूपण करता है । पशु नहीं कहा- पुरीष कहा है । पशु से केवल पञ्चपशु का ही ग्रहण होता है । सूर्य में सब कुछ है - इसलिए ' पुरीषम् ' कहा है । ' पुरीषम् ' से पशु का भी ग्रहण हो जाता है और श्रौर पदार्थों का भी ग्रहण हो जाता है । कितने ही विद्वान् इस पूर्वोक्तरूप से सौर संवत्सरप्रजापति की स्तुति करते हैं । वे कौन विद्वान् ? इसका उत्तर ऋषि ने बुद्धि के व्यापार पर छोड दिया है । यज्ञ, तप, दान, करने वाले विद्वान् ही उस प्रजापति का ऐसा स्वरूप समझते हैं । उनका विश्वास है कि वह परमप्रजापति आत्मरूप से त्रैलोक्य के केन्द्र में प्रतिष्ठित है एवं ' एषोऽणुरात्मा ०१ - के अनुसार उसके पाँचपाद हैं । पाँच प्राण हैं एवं वह श्रात्मप्रजापति स्वयं निम्नलिखित १२ तनू धारण करके संसार में व्याप्त हो रहा है-एवं १२ वह पशुयुक्त है । वे पाँच ऋतुओं के द्वारा उसके पाँच आत्मप्राणों के दर्शन कर रहे हैं मासों के द्वारा १२ आत्मतयों का साक्षात्कार कर रहे हैं । ऐसे ब्रह्मवित् ही सूर्य्यप्रजापति की आत्म-रूप से उपासना करने वाले विद्वान् ही उत्तरमार्गस्थित श्रादित्यलोक के अधिकारी हैं । बस, यज्ञतप-दानात्मक उत्तरकर्म्म करने वाले सूर्य्यं प्रजापति की किस रूप से उपासना करते हैं? इसका उत्तर देते हुए ' ऋषि ' कहते हैं— ' पञ्चपादं पितरं द्वादशाकृतिं दिव श्राहुः परे अर्द्ध पुरीषिणम् " ॥ स्वरूप परन्तु जो इष्ट, आपूर्त, दनरूा दक्षिणकम्मं करने वाले हैं वे उसका निम्नलिखित विषय समझ लेते हैं । पूर्व में इष्टापूर्त्तदत्त- इन तीनों का स्वरूप समझा दिया गया है । प्रसंगागत इनके १ – मुण्डकोप ० ३।१।६ |
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प्रथम प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य रयिप्राणनिरूपण पितृस्वर्गसाधककर्म्म तीन में कुछ कह किया जाता है, वह इष्ट है । समाज और देते हैं । स्वार्थ, परमार्थं, परार्थ भेद से यह विद्यानिरपेक्ष भागों में विभक्त हो जाता है । अपने आत्मा के लिए जो कर्म ये ही हैं- वे परम ( उत्कृष्ट ) अर्थ हैं -के उपकार के लिए वापी - कूप - तड़ागादि निर्माणरूप जो कर्म इनमें जो इष्ट है वह प्राध्या-आपूर्त हैं एवं व्यक्तिसापेक्ष दानादि कम्मं परार्थ हैं ये ही तप, दत्त सत्यभाषण हैं ।, ब्रह्मचर्य्यं यह आध्यात्मिक त्मिक, आधिदैविक, आधिभौतिक भेद से तीन प्रकार का है । इष्टकर्म्म है । इन इष्ट है । अग्निहोत्र, वैश्वदेव आधिदैविक इष्टकर्म हैं एवं अतिथिसत्कार आधिभौतिक सबका फल पितृस्वर्गप्राप्ति है । १- स्वार्थम् - इष्टम् ( श्रात्मार्थ ) २- परमार्थम् - श्रापूर्त्तम् ( समाजसापेक्ष ) ३ - परार्थम् - दत्तम् ( व्यक्तिसापेक्ष ) १ - आध्यात्मिक इष्टकर्म्म तपः, सत्य, ब्रह्मचर्य्यं २- श्राधिदैविक इष्टक -अग्निहोत्र, वैश्वदेव ३- प्राधिभौतिक इष्टकम् - अतिथिसत्कार इन विद्यानिरपेक्षकम्मों को करने वाले विद्वानों का कहना है कि विचक्षण नाम से प्रसिद्ध उस सप्तचक्रात्मक - षडरात्मक संवत्सर प्रजापति में ही सारा विश्व अर्पित है । सात अहोरात्रवृत्त सातचक्र हैं । ६ ऋतु ६ आरे हैं । चन्द्रमा विचक्षण है । इस विचक्षण सोमान्न को खाकर ही यह चमक रहा है । संवत्सर की जो प्रकाशमयी मूर्ति है यह चन्द्रमारूप रयिसोम की महिमा है । इसीलिए तो इसके लिए ' त्वं ज्योतिषा वि तमो ववर्थ १- यह कहा जाता है । विचक्षण समझने वालों की दृष्टि में रयि प्रधान है । सोम प्रधान है । सोम की प्रधानता दक्षिणभाग में है । इष्टापूर्त्तवाले ही इधर जाते हैं । संवत्सरप्रजापति निरन्तर होने वाली सोमाहुति से चमक रहा है । यही संवत्सरयज्ञ सोमा-हुति के कारण - ' सोमयज्ञ ' कहलाता है । यही उस प्रजापति का दूसरा अवतार है । ॥ इति द्वितीयः संवत्सरात्मकः सोमयज्ञः ॥ ॥२ ॥
इसी संवत्सरप्रजापति का तीसरा अवतार मास है । यही तीसरा ' मास - प्रजापति ' है । इसका कृष्णपक्षभाग रयि है, शुक्लपक्षभाग प्राण है । जैसा कि श्रुति कहती है-१- ऋग्वेद मं १।११।२२ । [ ६८ ]
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प्रथम प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य रयिप्राणनिरूपण " मासो वै प्रजापतिस्तस्य कृष्णपक्ष एव रयिः शुक्लः प्रारणस्तस्मादेते ऋषयः शुक्ल इष्टं कुर्वन्तीतर इतरस्मिन् " ॥ ॥ १२ ॥
-8-चौथा अवतार अहोरात्रात्मक प्रजापति है । इसका अहर्भाग प्राण है, रात्रिभाग रयि है । वे मनुष्य अपने प्राण का नाश करते हैं जो कि दिन में रतिक्रीड़ा करते हैं एवं जो रात्रि में रति से युक्त होते हैं - वे ' ब्रह्मचर्य व्रत का ही पालन करते है । प्रथम प्रजापति का स्वरूप बतलाते हुए हमने कहा था कि दिन में सौर प्राणभाग की प्रधानता रहती है, रात्रि में रविभाग की प्रधानता रहती है । रात्रि में रयि आधेय है - प्राण आधार है । दिन में प्राण आधेय है- रयि आधार है । रयिसोम ही शुक्र है - यह आहत हो कर प्रजोत्पत्ति का कारण बनता है, अतः प्रजननसम्बन्धी मिथुनभाव रात्रि में ही करना उचित है । जो मनुष्य ब्रह्म ( प्रजापति ) सम्बन्धी विज्ञान का तिरस्कार कर दिन में मिथुन करते हैं उनका प्राणभाग शिथिल हो जाता है । दिन में प्राण प्राता रहता है, ऐसी अवस्था में दिन में रतियोग से प्राणविच्छेद हो जाता है । प्राण आयुभाग है । इसके विच्छेद से यमराज शीघ्र ही अपना अधिकार जमा लेता है-" अहोरात्रो वै प्रजापतिस्तस्याहरेव प्राणो रात्रिरेव रयिः प्राणं वा एते प्रस्कन्दन्ति ये दिवा रत्या संयुज्यन्ते ब्रह्मचर्यमेव तद्यद्रात्रौ रत्या संयुज्यन्ते " ॥ ॥ १३ ॥
---पाँचवाँ प्रजापति है - प्रन्न । अन्न में पुंरेत और स्त्रीरेत ( अग्नि - सोम ) दोनों रहते हैं । अन्न से रेत बनता है । रेत से सारी प्रजा उत्पन्न होती है । रेत से ही सारा विश्व उत्पन्न हुआ है । प्रजापति के रेत से देवता उत्पन्न हुए हैं । देवताओं के रेत से वृष्टि हुई है । वृष्टि के रेत से औषधिएँ उत्पन्न हुई हैं । औषधियों के रेत से अन्न पैदा हुआ है । अन्न के रेत से प्रजा पैदा हुई है । प्रजा के रेत ( मक्षित अन्नरस ) से पैदा है । मन के रेत से वाक्सृष्टि हुई है । वाक्रेत से हुआ है । हृदय के रेत से मन पैदा हुआ हृदय कर्म पैदा हुआ है । यहाँ पर सृष्टिक्रम की समाप्ति है । रेत से कैसे सृष्टि होती है? इस विषय का विस्तृत विवेचन ' ऐतरेयारण्यक ' के ' अथातो रेतसः सृष्टि: ' - इस प्रकरण में देखना चाहिए । कम्बन्धी कात्यायन ने महर्षि पिप्पलाद से जो ' भगवन्! कुतो ह वा इमाः प्रजाः प्रजायन्ते'-यह प्रश्न किया था उसका विस्तार से निरूपण करके अन्त में पिप्पलाद ने रेत को प्रधान मानते हुए ' ततो ह वै तद्रेतसः प्रजाः प्रजायन्ते ' पर अपने उत्तर का उपसंहार किया है-[ ६६ ]
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प्रथम प्रश्न इति ॥ प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य रयिप्राणनिरूपण " अन्नं वै प्रजापतिस्ततो ह वै तद्रेतस्तस्मादिमाः प्रजाः प्रजायन्त ॥ १४ ॥
---उत्तर समाप्त हो चुका । फलश्रुति बतलाकर इस प्रकरण को समाप्त करते हैं । जो विद्वान् पूर्वप्रतिपादित प्रजापतिव्रत का अनुसरण करते हैं - वे ही प्रजापति की तरह मिथुन उत्पन्न करने में समर्थ होते हैं । वे ही प्रजा द्वारा प्रजापति कहलाने का अधिकार सुरक्षित रख सकते हैं । इस प्रजापतिव्रत का आचरण करने वाले जिन विद्वानों में सत्यतत्त्व प्रतिष्ठित है, तप और ब्रह्मचर्य्यं जिनकी प्राति-स्विक सम्पत्ति है उन्हीं विद्वानों का यह ब्रह्मलोक ( चान्द्र - लोक ) है । प्रजाकाम विद्वान् प्रजा पैदा करते हुए पितृस्वर्ग में जाते हैं । जिनका प्रजासूत्र टूट जाता है उनके आत्मा का उद्धार असंभव है । इसी आधार पर -" पुत्रेण लोकान् जयति पौत्रेणानन्त्यमश्नुते । अथ पुत्रस्य पौत्रेण ब्रध्नस्याप्नोति विष्टपम् " ॥ ' — यह कहा जाता है । इष्टापूर्त्तदत्तवालों को प्रजा द्वारा यही चान्द्रलोक मिलता है - यही निष्कर्ष है । चन्द्रमा ब्रह्मा है, अतः हम अवश्य ही चान्द्रलोक को ब्रह्मलोक कहने के लिए तय्यार हैं— " तद्ये ह वै तत्प्रजापतिव्रतं चरन्ति ते मिथुनमुत्पादयन्ते ॥ तेषामेवैष ब्रह्मलोको येषां तपो ब्रह्मचर्यं येषु सत्यं प्रतिष्ठितम् " ॥ ॥ १५ ॥
एवं विद्यासापेक्ष यज्ञ, तप, दान उतरकर्म -8-- करने वाले उन विद्वानों का विरज ब्रह्मलोक है । जिसमें न जिह्मभाव है, न अमृतभाव है, न माया है । रज से प्रतीत होने पर मुक्ति है । वह विरज ब्रह्मलोक अभय है । ब्रह्मलोकस्वरूप पूर्व के चान्द्रलोक से पुनरावर्तन है, किन्तु इस विरज ब्रह्मलोक से पुनरावर्तन नहीं है । इसको प्राप्त करने वाले को तीनों दोषों से निरन्तर बचना चाहिए । मन, प्राण, वाक् - तीनों को विरुद्ध मार्ग में ले जाना - मन में कुछ और है, कर कुछ और रहे हैं, कह कुछ और रहे हैं- इस कुटिलवृत्ति को ही ' जिम ' कहते हैं । बैठे बैठे असंभव कल्पनाएँ किए जाना अनृत है । निरर्थक कम्मं अनृत है एवं किसी को धोखा देना- विश्वासघात करना माया है । ये तीनों दोष विद्या के १- मनुस्मृति ६।१३७ । [ ७० ]
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प्रथम प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य रयिप्राणनिरूपण प्रतिबन्धक हैं- अविद्या के सहायक हैं । आत्मजिज्ञासुत्रों को इन तीनों दोषों से बचना चाहिए एवं तीनों के स्थान में - सत्य, ब्रह्मचर्य्य, तप को अपनाना चाहिए-" तेषामसौ विरजो ब्रह्मलोको न येषु जिह्ममनृतं न माया चेति " ॥ ॥ १६ ॥
---॥ इति रयिप्राणनिरूपरणात्मकः प्रथमप्रश्नः ॥ 11 911 [ ७१ ]
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अथ धिषणाप्राणनिरूपणात्मको द्वितीयप्रश्नः २ २ - सूर्य्यः - विज्ञानात्मा
" स ब्रह्मा स शिवः सेन्द्रः सोऽक्षरः परमः स्वराट् ।
स एव विष्णुः स प्राणः स कालोऽग्निः स चन्द्रमाः ” ॥
( कैवल्योप ० ११८ ) " तद्विज्ञानेन परिपश्यन्ति धीराः " ॥ ( मुण्डकोप ० २।२।७ )
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( 01919 opfancy )
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श्रथ प्रश्नोपनिषदि -30 द्वितीयः प्रश्नः [ मूलपाठः ] अथ हैनं भार्गवो वैदभिः पप्रच्छ, भगवन्कत्येव देवाः प्रजां विधारयन्ते, कतर एतत्प्रकाशयन्ते, कः पुनरेषां वरिष्ठ इति ॥ १ ॥
तस्मै स होवाचाकाशो ह वा एष देवो वायुरग्निरापः पृथिवी वाङ्मनश्चक्षुः श्रोत्रं च ॥ ते प्रकाश्याभिवदन्ति वयमेतद्बारणमवष्टभ्य विधारयामः ॥ २ ॥
तान्वरिष्ठः प्राण उवाच, मा मोहमापद्यथाहमेवैतत्पञ्चधात्मानं प्रवि-भज्येतद्वारणमवष्टभ्य विधारयामीति ॥ तेऽश्रद्दधाना बभूवुः || ३ || सोऽभिमानादूर्ध्वमुत्क्रमत इव तस्मिन्नुत्क्रामत्यथेतरे सर्व एवोत्क्रामन्ते तस्मिव प्रतिष्ठमाने सर्व एव प्रातिष्ठन्ते तद्यथा मक्षिका मधुकरराजानमुत्का-मन्तं सर्वा एवोत्क्रामन्ते तस्मिश्च प्रतिष्ठमाने सर्वा एव प्रातिष्ठन्त एवं वाङ्-मनश्चक्षुः श्रोत्रं च ते प्रीताः प्राणं स्तुन्वन्ति ॥४ ॥
एषोऽग्निस्तपत्येष सूर्य एष पर्जन्यो मघवानेष वायुरेष पृथिवी रयिर्देवः सदसच्चामृतं च यत् ॥५ ॥
अरा इव रथनाभौ प्राणे सर्वं प्रतिष्ठितम् ॥ ऋचो यजूंषि सामानि यज्ञः क्षत्रं ब्रह्म च ॥६ ॥
प्रजापतिश्चरति गर्भे त्वमेव प्रतिजायसे ॥ तुभ्यं प्रारण प्रजास्त्विमा बलि हरन्ति यः प्राणैः प्रतितिष्ठसि ॥७ ॥
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द्वितीय प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य धिषणाप्राणनिरूपण देवानामसि वह्नितमः पितॄणां प्रथमा स्वधा ॥ ऋषीरणां चरितं सत्यमथर्वाङ्गिरसामसि ॥ ८ ॥
इन्द्रस्त्वं प्राण तेजसा रुद्रोऽसि परिरक्षिता ॥ त्वमन्तरिक्षे चरसि सूर्यस्त्वं ज्योतिषां पतिः ॥६ ॥
यदा त्वमभिवर्षस्यथेमाः प्राणते प्रजाः ॥ श्रानन्दरूपास्तिष्ठन्ति कामायानं भविष्यतीति ॥१० ॥
व्रात्यस्त्वं प्राणैकऋषिरत्ता विश्वस्य सत्पतिः ॥ वयमाद्यस्य दातारः पिता त्वं मातरिश्व नः ॥ ११ ॥
या ते तनूर्वाचि प्रतिष्ठिता या श्रोत्रे या च चक्षुषि ॥ या च मनसि संतता शिवां तां कुरु मोत्क्रमीः ॥ १२ ॥
प्रारणस्येदं वशे सर्वं त्रिदिवे यत्प्रतिष्ठितम् ॥ मातेव पुत्रान् रक्षस्व श्रीश्च प्रज्ञां च विधेहि न इति ॥ १३ ॥
॥ इति द्वितीयप्रश्नस्य मूलपाठः ॥ २ ॥
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