Ramayana 2 — पृष्ठ 101–110

वाल्मीकि रामायण — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 101–110

पृष्ठ 101

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९ २६ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे अशोक वृक्षमें चुपचाप छिपे बैठे हुए वानर हनुमानजी ' मिथिलेश कुमारी! तुम्हारा भला हो । मैं तुमसे बहुत सीता को फटकारती हुईं राक्षसियोंकी बातें सुनते रहे ॥ १४ ॥ संतुष्ट हूँ; क्योंकि तुमने मानवोचित शिष्टाचारका अच्छी

तामभिक्रम्य संख्धा वेपमानां समन्ततः । तरह पालन किया है । अब मैं भी तुम्हारे हितके लिये जो भृशं संलिलिहुर्दीप्तान् प्रलम्बान् दशनच्छदान् ॥ १५ ॥ बात कहती हूँ, उसपर ध्यान दो — उसका शीघ्र पालन

वे सब राक्षसियाँ कुपित हो वहाँ काँपती हुई सीतापर करो ॥ २२ ॥

चारों ओरसे टूट पड़ीं और अपने लंबे एवं चमकीले ओठों रावणं भज भर्तारं भर्तारं सर्वरक्षसाम् । को बारंबार चाटने लगीं ॥ १५ ॥ विक्रान्तमापतन्तं च सुरेशमिव

ऊचुश्च परमक्रुद्धाः प्रगृह्याशु परश्वधान् वासवम् ॥ २३ ॥

नेयमर्हति । ' समस्त राक्षसोंका भरण - पोषण करनेवाले महाराज भर्तारं रावणं राक्षसाधिपम् ॥ १६ ॥ रावणको तुम अपना पति स्वीकार कर लो । वे देवराज

उनका क्रोध बहुत बढ़ा हुआ था । वे सब की सब इन्द्र के समान बड़े पराक्रमी तथा रूपवान् हैं ॥ २३ ॥

तुरंत हाथोंमें फरसे लेकर बोल उठीं- ' यह राक्षसराज रावण-को पतिरूपमें पाने योग्य है ही नहीं ' ॥ १६ ॥

सा भर्त्स्यमाना भीमाभी राक्षसीभिर्वराङ्गना ।

सा बाष्पमपमार्जन्ती शिंशपां तामुपागमत् ॥ १७ ॥

उन भयानक राक्षसियोंके बारंबार डाँटने और घमकाने पर सर्वाङ्गसुन्दरी कल्याणी सीता अपने आँसू पोंछती हुई उसी अशोक वृक्षके नीचे चली आयीं ( जिसके ऊपर हनुमान्-जी छिपे बैठे थे ) ॥ १७ ॥

ततस्तां शिशपां सीता राक्षसीभिः समावृता ।

अभिगम्य विशालाक्षी तस्थौ शोकपरिप्लुता ॥ १८ ॥

विशाललोचना वैदेही शोक - सागरमें डूबी हुई थीं । इसलिये वहाँ चुपचाप बैठ गयीं । किंतु उन राक्षसियोंने वहाँ भी आकर उन्हें चारों ओर से घेर लिया ॥ १८ ॥

तां कृशां दीनवदनां मलिनाम्बरवासिनीम् ।

भर्त्सयांचक्रिरे भीमा राक्षस्यस्ताः समन्ततः ॥ १ ९ ॥

वे बहुत ही दुर्बल हो गयी थीं । उनके मुखपर दीनता छा रही थी और उन्होंने मलिन वस्त्र पहन रक्खा था । उस अवस्थामै उन जनकनन्दिनीको चारों ओर खड़ी हुई भयानक राक्षसियोंने फिर धमकाना आरम्भ किया ॥ १ ९ ॥

ततस्तु विनता नाम राक्षसी भीमदर्शना ।

अब्रवीत् कुपिताकारा कराला निर्णतोदरी ॥ २० ॥

तदनन्तर विनता नामकी राक्षसी आगे बढ़ी । वह देखने में बड़ी भयंकर थी । उसकी देह क्रोधकी सजीव प्रतिमा जान पड़ती थी । उस विकराल राक्षसी के पेट भीतरकी ओर धँसे हुए थे । वह बोली- ॥ २० ॥

सीते पर्याप्तमेतावद् भर्तुः स्नेहः प्रदर्शितः ।

सर्वत्रातिकृतं भद्रे व्यसनायोपकल्पते ॥ २१ ॥

' सीते! तूने अपने पति के प्रति जितना स्नेह दिखाया है, इतना ही बहुत है । भद्रे! अति करना तो सब जगह दुःखका ही कारण होता है ॥ २१ ॥

परितुष्टास्मि भद्रं ते मानुषस्ते कृतो विधिः ।

ममापि तु वचः पथ्यं ब्रुवन्त्याः कुरु मैथिलि ॥ २२ ॥

दक्षिणं त्यागशीलं च सर्वस्य प्रियवादिनम् ।

मानुषं कृपणं रामं त्यक्त्वा रावणमाश्रय ॥ २४ ॥

' दीन - हीन मनुष्य रामका परित्याग करके सबसे प्रिय वचन बोलनेवाले, उदार और त्यागी रावणका आश्रय लो ॥ २४ ॥

दिव्याङ्गरागा वैदेहि दिव्याभरणभूषिता ।

अद्यप्रभृति लोकानां सर्वेषामीश्वरी भव ॥ २५ ॥

' विदेहराजकुमारी! तुम आजसे समस्त लोकोंकी स्वामिनी बन जाओ और दिव्य अङ्गराग तथा दिव्य आभूषण धारण करो ॥ २५ ॥

अग्नेः स्वाहा यथा देवी शची वेन्द्रस्य शोभने ।

किं ते रामेण वैदेहि कृपणेन गतायुषा ॥ २६ ॥

' शोभने! जैसे अग्निकी प्रिय पत्नी स्वाहा और इन्द्रकी प्राणवल्लभा शची हैं, उसी प्रकार तुम रावणकी प्रेयसी बन जाओ । विदेहकुमारी! श्रीराम तो दीन हैं । उनकी आयु

भी अब समाप्त हो चली है । उनसे तुम्हें क्या मिलेगा? ॥

एतदुक्तं च मे वाक्यं यदि त्वं न करिष्यसि ।

अस्मिन् मुहूर्ते सर्वास्त्वां भक्षयिष्यामहे वयम् ॥ २७ ॥

' यदि तुम मेरी कही हुई इस बातको नहीं मानोगी तो इम सब मिलकर तुम्हें इसी मुहूर्त में अपना आहार बना लैगी ' ॥ २७ ॥

अन्या तु विकटा नाम लम्बमानपयोधरा ।

मब्रवीत् कुपिता सीतां मुष्टिमुद्यम्य तर्जती ॥ २८ ॥

तदनन्तर दूसरी राक्षसी सामने आयी । उसके लंबे - लंबे स्तन लटक रहे थे । उसका नाम विकटा था । वह कुपित हो मुक्का तानकर डाँटती हुई सीतासे बोली- ॥ २८ ॥

बहून्य प्रतिरूपाणि वचनानि सुदुर्मते ।

अनुक्रोशान्मृदुत्वाच्च सोढानि तव मैथिलि ॥ २ ९ ॥

' अत्यन्त खोटी बुद्धिवाली मिथिलेशकुमारी! अबतक हमलोगोंने अपने कोमल स्वभाववश तुमपर दया आ जानेके कारण तुम्हारी बहुत - सी अनुचित बातें सह ली हैं ॥ २ ९ ॥

पृष्ठ 102

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सुन्दरकाण्डे चतुर्विंशः सर्गः ९ २७

न च नः कुरुषे वाक्यं हितं कालपुरस्कृतम् ।

आनीतासि समुद्रस्य पारमन्यैर्दुरासदम् ॥ ३० ॥

रावणान्तःपुरे घोरे प्रविष्टा चासि मैथिलि ।

रावणस्य गृहे रुद्धा अस्माभिस्त्वभिरक्षिता ॥ ३१ ॥

' इतने पर भी तुम हमारी बात नहीं मानती हो । हमने तुम्हारे हित के लिये ही समयोचित सलाह दी थी । देखो, तुम्हें समुद्रके इस पार ले आया गया है, जहाँ पहुँचना दूसरोंके लिये अत्यन्त कठिन है । यहाँ भी रावणके भयानक अन्तःपुरमै तुम लाकर रक्खी गयी हो । मिथिलेशकुमारी! याद रक्खो, रावणके घरमें कैद हो और हम जैसी राक्षसियाँ तुम्हारी चौकसी कर रही हैं ॥ ३०-३१ ॥

न त्वां शक्तः परित्रातुमपि साक्षात् पुरंदरः ।

कुरुष्व हितवादिन्या वचनं मम मैथिलि ॥ ३२ ॥

‘ मैथिलि! साक्षात् इन्द्र भी यहाँ तुम्हारी रक्षा करने में समर्थ नहीं हो सकते । अतः मेरा कहना मानो, मैं तुम्हारे हितकी बात बता रही हूँ ॥ ३२ ॥

अलमश्रुनिपातेन त्यज शोकमनर्थकम् ।

भज प्रीतिं प्रहर्षे च त्यजन्ती नित्यदैन्यताम् ॥ ३३ ॥

‘ आँसू बहानेसे कुछ होने - जानेवाला नहीं है । यह व्यर्थ-का शोक त्याग दो । सदा छायी रहनेवाली दीनताको दूर करके अपने हृदय में प्रसन्नता और उल्लासको स्थान दो ॥

सीते राक्षसराजेन परिक्रीड यथासुखम् ।

' जानीमहे यथा भीरु स्त्रीणां यौवनमध्रुवम् ॥ ३४ ॥

' सीते! राक्षसराज रावणके साथ सुखपूर्वक क्रीडाविहार करो । भीरु! हम सभी स्त्रियाँ जानती हैं कि नारियोंका यौवन टिकनेवाला नहीं होता ॥ ३४ ॥

यावन्न ते व्यतिक्रामेत् तावत् सुखमवाप्नुहि ।

उद्यानानि च रम्याणि पर्वतोपवनानि च ॥ ३५ ॥

सह राक्षसराजेन चर त्वं मदिरेक्षणे ।

स्त्रीसहस्राणि ते देवि वशे स्थास्यन्ति सुन्दरि ॥ ३६ ॥

' जबतक तुम्हारा यौवन नहीं ढल जाता, तबतक सुख भोग लो । मदमत्त बना देनेवाले नेत्रोंसे शोभा पानेवाली सुन्दरी! तुम राक्षसराज रावण के साथ लङ्काके रमणीय उद्यानों और पर्वतीय उपवनोंमें विहार करो | देवि! ऐसा करने से सहस्रों स्त्रियाँ सदा तुम्हारी आज्ञा के अधीन रहेंगी ॥ ३५-३६ ॥

रावणं भज भर्तारं भर्तारं सर्वरक्षसाम् ।

उत्पादय वा ते हृदयं भक्षयिष्यामि मैथिलि ॥ ३७ ॥

यदि मे व्याहृतं वाक्यं न यथावत् करिष्यसि । पालन नहीं करोगी तो मैं अभी तुम्हारा कलेजा निकालकर खा जाऊँगी ' ॥ ३७३ ॥

ततश्चण्डोदरी नाम राक्षसी क्रूरदर्शना ॥ ३८ ॥

भ्रामयन्ती महच्छूलमिदं वचनमब्रवीत् । अब चण्डोदरी नामवाली राक्षसीकी बारी आयी । उसकी दृष्टिसे ही क्रूरता टपकती थी । उसने विशाल त्रिशूल घुमाते हुए यह बात कही – ॥ ३८३ ॥

इमां हरिणशावाक्षीं त्रासोत्कम्पपयोधराम् ॥ ३ ९ ॥

रावणेन हृतां दृष्ट्वा दौर्हृदो मे महानयम् ।

यकृत् प्लीहं महत् क्रोडं हृदयं च सबन्धनम् ॥ ४० ॥

गात्राण्यपि तथा शीर्ष खादेयमिति मे मतिः । ' महाराज रावण जब इसे हरकर ले आये थे, उस समय भयके मारे यह थर - थर काँप रही थी, जिससे इसके दोनों स्तन हिल रहे थे । उस दिन इस मृगशावकनयनी मानव-कन्याको देखकर मेरे हृदयमें यह बड़ी भारी इच्छा जाग्रत् हुई — इसके जिगर, तिल्ली, विशाल वक्षःस्थल, हृदय, उसके

आधारस्थान, अन्यान्य अङ्ग तथा सिरको मैं खा जाऊँ ।

इस समय भी मेरा ऐसा ही विचार है ' ॥ ३ ९ -४०३ ॥

प्रघसा नाम राक्षसी वाक्यमब्रवीत् ॥ ४१ ॥

ततस्तु

कण्ठमस्या नृशंसायाः पीडयामः किमास्यते ।

निवेद्यतां ततो राज्ञे मानुषी सा मृतेति ह ॥ ४२ ॥

नात्र कश्चन संदेहः खादतेति स वक्ष्यति । तदनन्तर प्रघसा नामक राक्षसी बोल उठी - ' फिर तो हमलोग इस क्रूर - हृदया सीताका गला घोंट दें; अब चुपचाप बैठे रहनेकी क्या आवश्यकता है? इसे मारकर महाराजको सूचना दे दी जाय कि वह मानवकन्या मर गयी । इसमें कोई संदेह नहीं कि इस समाचारको सुनकर महाराज यह आज्ञा दे देंगे कि तुम सब लोग उसे खा जाओ ' ॥ ४१-४२३ ॥ ततस्त्वजामुखी नाम राक्षसी वाक्यमब्रवीत् ॥ ४३ ॥

विशस्येमां ततः सर्वान् समान् कुरुत पिण्डकान् ।

विभजाम ततः सर्वा विवादो मे न रोचते ॥ ४४ ॥

पेयमानीयतां क्षिप्रं माल्यं च विविधं बहु । तत्पश्चात् राक्षसी अजामुखीने कहा- ' मुझे तो व्यर्थंका वादविवाद अच्छा नहीं लगता । आओ, पहले इसे काटकर इसके बहुत - से टुकड़े कर डालें 1 । वे सभी टुकड़े बराबर माप-तौलके होने चाहिये । फिर उन टुकड़ोंको हमलोग आपस में बाँट लेंगी । साथ ही नाना प्रकारकी पेय - सामग्री तथा फूल-माला आदि भी शीघ्र ही प्रचुर मात्रामें मँगा ली जाय ' ॥ ततः शूर्पणखा नाम राक्षसी वाक्यमब्रवीत् ॥ ४५ ॥

‘ महाराज रावण समस्त राक्षसोंका भरण - पोषण करनेवाले अजामुख्या यदुक्तं वै तदेव मम रोचते । स्वामी हैं । तुम उन्हें अपना पति बना लो । मैथिलि! सुरा चानीयतां क्षिप्रं सर्वशोकविनाशिनी ॥ ४६ ॥

याद रक्खो, मैंने जो बात कही है, यदि उसका ठीक - ठीक मानुषं मांसमाखाद्य नृत्यामोऽथ निकुम्भिलाम् ।

पृष्ठ 103

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९ २८ श्रीमवाल्मीकीयरामायणे तदनन्तर राक्षसी शूर्पणखाने कहा – ' अजामुखीने जो एवं निर्भर्त्स्यमाना सा सीता सुरसुतोपमा । बात कही है, वही मुझे भी अच्छी लगती है । समस्त शोकोंको राक्षसीभिर्विरूपाभिधैर्यमुत्सृज्य रोदिति नष्ट कर देनेवाली सुराको भी शीघ्र मँगवा लो । उसके साथ उन विकराल रूपवाली राक्षसियोंके द्वारा इस ॥ ४७ ॥

प्रकार मनुष्य के मांसका आस्वादन करके हम निकुम्भिला देवीके धमकायी जानेपर देवकन्या के समान सुन्दरी सीता धैर्य छोड़-सामने नृत्य करेंगी ' ॥ ४५-४६३ ॥ कर फूट - फूटकर रोने लगीं ॥ ४७ ॥

इस्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये सुन्दरकाण्डे चतुर्विंशः सर्गः ॥ २४ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मिंत आरामायण आदिकाव्यके सुन्दरकाण्ड में चौबीसवाँ सर्गं पूरा हुआ ॥ २४ ॥

पञ्चविंशः सर्गः राक्षसियोंकी बात मानने से इन्कार करके शोक संतप्त सीताका विलाप करना

अथ तासां वदन्तीनां परुषं दारुणं बहु ।

राक्षसीनाम सौम्यानां रुरोद जनकात्मजा ॥ १ ॥

जब वे क्रूर राक्षसियाँ इस प्रकारकी बहुत - सी कठोर एवं क्रूरतापूर्ण बातें कह रही थीं, उस समय जनकनन्दिनी सीता अधीर हो - होकर रो रही थीं ॥ १ ॥

एवमुक्ता तु वैदेही राक्षसीभिर्मनखिनी ।

उवाच परमत्रस्ता बाष्पगद्गदया गिरा ॥ २ ॥

उन राक्षसियोंके इस प्रकार कहनेपर अत्यन्त भयभीत हुई मनस्विनी विदेहराजकुमारी सीता नेत्रोंसे आँसू बहाती गद्गद वाणीमें बोलीं- ॥ २ ॥

न मानुषी राक्षसस्य भार्या भवितुमर्हति ।

कामं खादत मां सर्वा न करिष्यामि वो वचः ॥ ३ ॥

' राक्षसियो! मनुष्यकी कन्या कभी राक्षसकी भार्या नहीं हो सकती । तुम्हारा जी चाहे तो तुम सब लोग मिलकर मुझे खा जाओ, परंतु मैं तुम्हारी बात नहीं मानूँगी ॥ ३ ॥

सा राक्षसीमध्यगता सीता सुरसुतोपमा ।

न शर्म लेभे शोकार्ता रावणेनेव भर्त्सिता ॥ ४ ॥

राक्षसियों के बीच में बैठी हुई देवकन्या के समान सुन्दरी सीता रावण के द्वारा धमकायी जानेके कारण शोकसे आर्त-सी होकर चैन नहीं पा रही थीं ॥ ४ ॥

वेपते स्माधिकं सीता विशन्तीवाङ्गमात्मनः ।

वने यूथपरिभ्रष्टा मृगी कोकैरिवार्दिता ॥ ५ ॥

जैसे वनमें अपने यूथसे बिछुड़ी हुई मृगी भेड़ियोंसे पीड़ित होकर भय के मारे काँप रही हो, उसी प्रकार सीता जोर - जोर से काँप रही थीं और इस तरह सिकुड़ी जा रही थीं, मानो अपने अङ्गोंमें ही समा जायँगी ॥ ५ ॥

सात्वशोकस्य विपुलां शाखामालम्ब्य पुष्पिताम् ।

चिन्तयामास शोकेन भर्तारं भग्नमानसा ॥ ६ ॥

उनका मनोरथ भङ्ग हो गया था । वे हताश - सी होकर अशोकवृक्षकी खिली हुई एक विशाल शाखाका सहारा ले शोकसे पीड़ित हो अपने पतिदेवका चिन्तन करने लगीं ॥

सास्नापयन्ती विपुलौ स्तनौ नेत्रजलस्रवैः ।

चिन्तयन्ती न शोकस्य तदान्तमधिगच्छति ॥ ७ ॥

आँसुओंके प्रवाहसे अपने स्थूल उरोजोंका अभिषेक करती हुई वे चिन्तामें डूबी थीं और उस समय शोकका पार नहीं पा रही थीं ॥ ७ ॥

सा वेपमाना पतिता प्रवाते कदली यथा ।

राक्षसीनां भयत्रस्ता विवर्णवदनाभवत् ॥ ८ ॥

प्रचण्ड वायुके चलने पर कम्पित होकर गिरे हुए केले के वृक्षकी भाँति वे राक्षसियोंके भयसे त्रस्त हो पृथ्वीपर गिर पड़ीं । उस समय उनके मुखकी कान्ति फीकी पड़ गयी थी ।

तस्याः सा दीर्घबहुला वेपन्त्याः सीतया तदा ।

ददृशे कम्पिता वेणी व्यालीव परिसर्पती ॥ ९ ॥

उस बेला काँपती हुई सीताकी विशाल एवं घनीभूत वेणी भी कम्पित हो रही थी, इसलिये वह रेंगती हुईं सर्पिणी के समान दिखायी देती थी ॥ ९ ॥

सा निःश्वसन्ती शोकार्ता कोपोपहतचेतना ।

आर्ता व्यसृजदभ्रूणि मैथिली विललाप च ॥ १० ॥

वे शोकसे पीड़ित होकर लंबी साँसें खींच रही थीं और क्रोधसे अचेत - सी होकर आर्तभावसे आँसू बहा रही थीं । उस समय मिथिलेश कुमारी इस प्रकार विलाप करने लगीं —॥१० ॥

हा रामेति च दुःखार्ता हा पुनर्लक्ष्मणेति च ।

हा श्वश्रूर्मम कौसल्ये हा सुमित्रेति भामिनी ॥ ११ ॥

' हा राम! हा लक्ष्मण! हा मेरी सासु कौसल्ये । हा आयें सुमित्रे! " बारंबार ऐसा कहकर दुःखसे पीड़ित हुई भामिनी सीता रोने - बिलखने लगीं ॥ ११ ॥

लोकप्रवादः सत्योऽयं पण्डितैः समुदाहृतः ।

अकाले दुर्लभो मृत्युः स्त्रिया वा पुरुषस्य वा ॥ १२ ॥

' हाय! पण्डितोंने यह लोकोक्ति ठीक कही है कि " किसी भी स्त्री या पुरुषकी मृत्यु बिना समय आये नहीं होती ' ॥ १२ ॥

पृष्ठ 104

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सुन्दरकाण्डे षड्विंशः सर्गः ९ २ ९

यत्रामाभिः क्रूराभी राक्षसीभिरिहार्दिता ।

जीवामि होना रामेण मुहूर्तमपि दुःखिता ॥ १३ ॥

' तभी तो मैं श्रीरामके दर्शनसे वञ्चित तथा इन क्रूर राक्षसियों द्वारा पीड़ित होनेपर भी यहाँ मुहूर्तभर भी जी रही हूँ ॥ १३ ॥

पापण्या कृपणा विनशिष्याम्यनाथवत् ।

समुद्रमध्ये नौः पूर्णा वायुवेगैरिवाहिता ॥ १४ ॥

' मैंने पूर्वजन्ममें बहुत थोड़े पुण्य किये थे, इसीलिये इस दीन दशामें पड़कर मैं अनाथकी भाँति मारी जाऊँगी । जैसे समुद्रके भीतर सामानसे भरी हुई नौका वायुके वेगसे आइत हो डूब जाती है, उसी प्रकार मैं भी नष्ट हो जाऊँगी ।

भर्तारं तमपश्यन्ती राक्षसीवशमागता ।

सीदामि खलु शोकेन कूलं तोयहतं यथा ॥ १५ ॥

' मुझे पतिदेव के दर्शन नहीं हो रहे हैं । मैं इन राक्षसियों के चंगुल में फँस गयी हूँ और पानीके थपेड़ोंसे आहत हो कटते हुए कगारोंके समान शोक से क्षीण होती जा रही हूँ ॥

तं पद्मदलपत्राक्षं सिंहविक्रान्तगामिनम् ।

धन्याः पश्यन्ति मे नाथं कृतज्ञं प्रियवादिनम् ॥ १६ ॥

' आज जिन लोगोंको सिंहके समान पराक्रमी और सिंह-की - सी चालवाले मेरे कमलदललोचन, कृतज्ञ और प्रियवादी प्राणनाथ के दर्शन हो रहे हैं, वे धन्य हैं ॥ १६ ॥

सर्वथा तेन हीनाया रामेण विदितात्मना ।

तीक्ष्णं विषमिवाखाद्य दुर्लभं मम जीवनम् ॥ १७ ॥

' उन आत्मज्ञानी भगवान् श्रीरामसे बिछुड़कर मेरा जीवित रहना उसी तरह सर्वथा दुर्लभ है, जैसे तेज विषका पान करके किसीका भी जीना अत्यन्त कठिन हो जाता है ॥

कीदृशं तु महापापं मया देहान्तरे कृतम् ।

तेनेदं प्राप्यते घोरं महादुःखं सुदारुणम् ॥ १८ ॥

" पता नहीं, मैंने पूर्व - जन्ममें दूसरे शरीरसे कैसा महान् पाप किया था, जिससे यह अत्यन्त कठोर, घोर और महान् दुःख मुझे प्राप्त हुआ है १ ॥ १८ ॥

जीवितं त्यकुमिच्छामि शोकेन महता राक्षसीभिश्च रक्षन्त्या रामो नासाद्यते ' इन राक्षसियों के संरक्षण में रहकर तो मैं श्रीरामको कदापि नहीं पा सकती, इसलिये घिर गयी हूँ और इससे तंग आकर अपने कर देना चाहती हूँ ॥ १ ९ ॥

वृता ।

मया ॥ १ ९ ॥

अपने प्राणाराम महान् शोकसे जीवनका अन्त

धिगस्तु खलु मानुष्यं धिगस्तु परवश्यताम् ।

न शक्यं यत् परित्यकुमात्मच्छन्देन जीवितम् ॥ २० ॥

' इस मानव - जीवन और परतन्त्रताको धिक्कार है, जहाँ अपनी इच्छा के अनुसार प्राणोंका परित्याग भी नहीं किया जा सकता ' ॥ २० ॥

श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये सुन्दरकाण्डे पञ्चविंशः सर्गः ॥ २५ ॥

इत्यार्षे इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आरामायण आदिकाव्य के सुन्दरकाण्ड में पचीसवाँ सगँ पूरा हुआ ॥ २५ ॥

98944 षड्विंशः सर्गः सीताका करुण - विलाप तथा अपने प्राणोंको त्याग देनेका निश्चय करना

त्वेवं ब्रुवती जनकात्मजा । रावणेन प्रमथ्याहमानीता क्रोशती बलात् ॥ ३ ॥

प्रसक्तामुखी बाला विलप्तुमुपचक्रमे ॥ १ ॥ ' हाय! इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले राक्षस

अधोगतमुखी प्रमत्तेव भ्रान्तचित्तेव शोचती । मारीचके द्वारा जब रघुनाथजी दूर हटा दिये गये और मेरी उन्मत्तेव विचेष्टन्ती महीतले ॥ २ ॥ ओरसे असावधान हो गये, उस अवस्था में रावण मुझ रोती

उपावृत्ता किशोरीव बह चिल्लाती हुई अबलाको बलपूर्वक उठाकर यहाँ ले जनकनन्दिनी सीताके मुखपर आँसुओं की धारा रही थी । उन्होंने अपना मुख नीचेकी ओर झुका लिया आया ॥ ३ ॥ ।

था । वे उपर्युक्त बातें कहती हुई ऐसी जान पड़ती थीं मानो राक्षसीवशमापन्ना भर्त्स्यमाना च दारुणम् हो गयी हों उनपर भूत सवार हो गया हो अथवा चिन्तयन्ती सुदुःखार्ता नाहं जीवितुमुत्सहे ॥ ४ ॥

उन्मत्त पित्त बढ़ जानेसे पागलोंका - सा प्रलाप कर रही हों अथवा ' अब मैं राक्षसियों के वशमें पड़ी हूँ और इनकी कठोर दिग्भ्रम आदिके कारण उनका चित्त भ्रान्त हो गया हो । धमकियाँ सुनती एवं सहती हूँ । ऐसी दशा में अत्यन्त दुःखसे हो धरतीपर लोटती हुई बछेड़ी के समान पड़ी- आर्त एवं चिन्तित होकर मैं जीवित नहीं रह सकती ॥ ४ ॥

वे शोकमग्न पड़ी छटपटा रही थीं 1 । उसी अवस्था में सरलहृदया सीताने नहि मे जीवितेनार्थो नैवार्थेर्न च भूषणैः । इस प्रकार विलाप करना आरम्भ किया ॥ १-२ ॥ वसन्त्या राक्षसीमध्ये विना रामं महारथम् ॥ ५ ॥

रक्षसा कामरूपिणा । ' महारथी श्रीरामके बिना राक्षसियोंके बीचमें रहकर राघवस्य प्रमत्तस्य वा ० रा ० ५.७.९-

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९ ३० श्रीमद्वाल्मीकीय रामायणे मुझे न तो जीवनसे कोई प्रयोजन है, न घनकी आवश्यकता है और न आभूषणोंसे ही कोई काम है ॥ ५ ॥

अश्मसारमिदं नूनमथवाप्यजरामरम् ।

हृदयं मम येनेदं न दुःखेन विशीर्यते ॥ ६ ॥

' अवश्य ही मेरा यह हृदय लोहेका बना हुआ है अथवा अजर - अमर है, जिससे इस महान् दुःखमें पड़कर भी यह फटता नहीं है ॥ ६ ॥

धियामनार्यामसतीं याहं तेन विना कृता ।

मुहूर्तमपि जीवामि जीवितं पापजीविका ॥ ७ ॥

“ मैं बड़ी ही अनार्थ और असती हूँ, मुझे विकार है, जो उनसे अलग होकर मैं एक मुहूर्त भी इस पापी जीवनको धारण किये हूँ । अब तो यह जीवन केवल दुःख देनेके लिये ही है ॥ ७ ॥

चरणेनापि सव्येन न स्पृशेयं निशाचरम् ।

रावणं किं पुनरहं कामयेयं विगर्हितम् ॥ ८ ॥

' उस लोकनिन्दित निशाचर रावणको तो मैं बाँयें पैरसे भी नहीं छू सकती, फिर उसे चाहने की तो बात ही क्या है १ ॥ ८ ॥

प्रत्याख्यानं न जानाति नात्मानं नात्मनः कुलम् ।

यो नृशंसखभावेन मां प्रार्थयितुमिच्छति ॥ ९ ॥

' यह राक्षस अपने क्रूर स्वभाव के कारण न तो मेरे इन्कारपर ध्यान देता है, न अपने महत्त्वको समझता है

और न अपने कुलकी प्रतिष्ठाका ही विचार करता है ।

बारंबार मुझे प्राप्त करने की ही इच्छा करता है ॥ ९ ॥

छिन्ना भिन्ना प्रभिन्ना वा दीप्ता वाग्नौ प्रदीपिता ।

रावणं नोपतिष्ठेयं किं प्रलापेन वश्विरम् ॥ १० ॥

' राक्षसियो! तुम्हारे देरतक बकवाद करने से क्या लाभ? तुम मुझे छेदो, चीरो, टुकड़े - टुकड़े कर डालो, आग-में सेंक दो अथवा सर्वथा जलाकर भस्म कर डालो तो भी मैं रावणके पास नहीं फटक सकती ॥ १० ॥

ख्यातः प्राशः कृतशश्च सानुक्रोशश्च राघवः ।

सद्वृत्तो निरनुकोशः शङ्के मद्भाग्यसंक्षयात् ॥ ११ ॥

' श्रीरघुनाथजी विश्वविख्यात ज्ञानी, कृतज्ञ, सदाचारी और परम दयालु हैं तथापि मुझे संदेह हो रहा है कि कहीं वे मेरे भाग्यके नष्ट हो जाने से मेरे प्रति निर्दय तो नहीं हो गये १ ॥ ११ ॥

राक्षसानां जनस्थाने सहस्राणि चतुर्दश ।

एकेनैव निरस्तानि स मां किं नाभिपद्यते ॥ १२ ॥

' अन्यथा जिन्होंने जनस्थानमें अकेले ही चौदह हजार राक्षसोंको कालके गाल में डाल दिया, वे मेरे पास क्यों नहीं आ रहे हैं? ॥ १२ ॥

निरुद्धा रावणेनाहमल्पवीर्येण रक्षसा ।

समर्थः खलु मे भर्ता रावणं हन्तुमाहवे ॥ १३ ॥

' इस अल्प बलवाले राक्षस रावणने मुझे कैद कर रक्खा है । निश्चय ही मेरे पतिदेव समराङ्गणमें इस रावणका वध करने में समर्थ हैं ॥ १३ ॥

विराधो दण्डकारण्ये येन राक्षसपुङ्गवः ।

रणे रामेण निहतः स मां किं नाभिपद्यते ॥ १४ ॥

' जिन श्रीरामने दण्डकारण्यके भीतर राक्षस शिरोमणि विराधको युद्ध में मार डाला था, वे मेरी रक्षा करने के लिये यहाँ क्यों नहीं आ रहे हैं १ ॥ १४ ॥

कामं मध्ये समुद्रस्य लङ्केयं दुष्प्रधर्षणा ।

न तु राघवबाणानां गतिरोधो भविष्यति ॥ १५ ॥

' यह लङ्का समुद्र के बीच में बसी है, अतः किसी दूसरे के लिये यहाँ आक्रमण करना भले ही कठिन हो; किंतु श्रीरघुनाथ जी के बाणकी गति यहाँ भी कुण्ठित नहीं हो सकती ॥ १५ ॥

किं नु तत् कारणं येन रामो दृढपराक्रमः ।

रक्षसापहृतां भार्यामिष्टां यो नाभिपद्यते ॥ १६ ॥

" वह कौन - सा कारण है, जिससे बाधित होकर सुदृढ़ पराक्रमी श्रीराम राक्षसद्वारा अपहृत हुई अपनी प्राणपत्नी सीताको छुड़ाने के लिये नहीं आ रहे हैं ॥ १६ ॥

इहस्थां मां न जानीते शङ्के लक्ष्मणपूर्वजः ।

जानन्नपि स तेजखी धर्षणां मर्षयिष्यति ॥ १७ ॥

" मुझे तो संदेह होता है कि लक्ष्मणजी के ज्येष्ठ भ्राता श्रीरामचन्द्रजीको मेरे इस लङ्कामें होने का पता ही नहीं है । मेरे यहाँ होने की बात यदि वे जानते होते तो उनके जैसा तेजस्वी पुरुष अपनी पत्नीका यह तिरस्कार कैसे सह सकता था १ ॥ १७ ॥

हृतेति मां योऽधिगत्य राघवाय निवेदयेत् ।

गृध्रराजोऽपि स रणे रावणेन निपातितः ॥ १८ ॥

' जो श्रीरघुनाथजी को मेरे हरे जाने की सूचना दे सकते थे, उन गृधराज जटायुको भी रावणने युद्ध में मार गिराया था ॥ १८ ॥

कृतं कर्म महत् तेन मां तथाभ्यवपद्यता ।

तिष्ठता रावणवधे वृद्धेनापि जटायुषा ॥ १ ९ ॥

' जटायु यद्यपि बूढ़े थे तो भी मुझपर अनुग्रह करके रावणका वध करने के लिये उद्यत हो उन्होंने बहुत बड़ा पुरुषार्थ किया था ॥ १ ९ ॥

यदि मामिह जानीयाद् वर्तमानां हि राघवः ।

अद्य वाणैरभिक्रुद्धः कुर्याल्लो कमराक्षसम् ॥ २० ॥

' यदि श्रीरघुनाथजीको मेरे यहाँ रहने का पता लग जाता तो वे आज ही कुपित होकर सारे संसारको राक्षसोंसे शून्य कर डालते ॥ २० ॥

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सुन्दरकाण्डे षड्विंशः सर्गः ९ ३१

निर्दहेच्च पुरीं लङ्कां निर्दहेश्च महोदधिम् ।

रावणस्य च नीचस्य कीर्तिं नाम च नाशयेत् ॥ २१ ॥

' लङ्कापुरी को भी जला देते, महासागरको भी भस्म कर डालते तथा इस नीच निशाचर रावणके नाम और यशका भी नाश कर देते ॥ २१ ॥

ततो निहतनाथानां राक्षसीनां गृहे गृहे ।

यथाहमेवं रुदती तथा भूयो न संशयः ॥ २२ ॥

" फिर तो निःसंदेह अपने पतियोंका संहार हो जाने से घर - घर में राक्षसियोंका इसी प्रकार क्रन्दन होता, जैसे आज मैं रो रही हूँ ॥ २२ ॥

अन्विष्य रक्षसां लङ्कां कुर्याद् रामः सलक्ष्मणः ।

नहि ताभ्यां रिपुष्टो मुहूर्तमपि जीवति ॥ २३ ॥

‘ श्रीराम और लक्ष्मण लङ्काका पता लगाकर निश्चय ही राक्षसोंका संहार करेंगे । जिस शत्रुको उन दोनों भाइयोंने एक बार देख लिया, वह दो घड़ी भी जीवित नहीं रह सकता ॥ २३ ॥

चिताधूमाकुलपथा गृधमण्डलमण्डिता ।

अचिरेणैव कालेन श्मशानसदृशी भवेत् ॥ २४ ॥

' अब थोड़े ही समयमें यह लङ्कापुरी श्मशान भूमिके समान हो जायगी 1 । यहाँकी सड़कोंपर चिताका धुआँ फैल रहा होगा और गधोंकी जमातें इस भूमिकी शोभा बढ़ाती होंगी ॥ २४ ॥

अचिरेणैव कालेन प्राप्स्याम्येनं मनोरथम् ।

दुष्प्रस्थानोऽयमाभाति सर्वेषां वो विपर्ययः ॥ २५ ॥

' वह समय शीघ्र आनेवाला है जब कि मेरा यह मनोरथ पूर्ण होगा । तुम सब लोगोंका यह दुराचार तुम्हारे लिये शीघ्र ही विपरीत परिणाम उपस्थित करेगा, ऐसा स्पष्ट जान पड़ता है ॥ २५ ॥

यादृशानि तु दृश्यन्ते लङ्कायामशुभानि तु ।

अचिरेणैव कालेन भविष्यति हतप्रभा ॥ २६ ॥

' लङ्का में जैसे - जैसे अशुभ लक्षण दिखायी दे रहे हैं, उनसे जान पड़ता है कि अब शीघ्र ही इसकी चमक दमक नष्ट हो जायगी ॥ २६ ॥

नूनं लङ्का हते पापे रावणे राक्षसाधिपे ।

शोषमेष्यति दुर्धर्षा प्रमदा विधवा यथा ॥ २७ ॥

‘ पापाचारी राक्षसराज रावणके मारे जानेपर यह दुर्धर्ष लङ्कापुरी भी निश्चय ही विधवा युवतीकी भाँति सूख जायगी, नष्ट हो जायगी ॥ २७ ॥

पुण्योत्सव समृद्धा च नष्टभत्र सराक्षसा ।

भविष्यति पुरी लङ्का नष्टभत्र यथाङ्गना ॥ २८ ॥

के सहित अपने स्वामी के नष्ट हो जानेपर विधवा स्त्रीके समान श्रीहीन हो जायगी ॥ २८ ॥

नूनं राक्षसकन्यानां रुदतीनां गृहे गृहे ।

श्रोष्यामि नचिरादेव दुःखार्तानामिह ध्वनिम् ॥ २ ९ ॥

' निश्चय ही मैं बहुत शीघ्र लङ्काके घर - घरमें दुःख से आतुर होकर रोती हुई राक्षसकन्याओंकी क्रन्दन - ध्वनि सुनूँगी ॥ २ ९ ॥

सान्धकारा हतद्योता हतराक्षसपुङ्गवा ।

भविष्यति पुरी लङ्का निर्दग्धा रामसायकैः ॥ ३० ॥

' श्रीरामचन्द्रजी के सायकोंसे दग्ध हो जानेके कारण लङ्कापुरीकी प्रभा नष्ट हो जायगी । इसमें अन्धकार छा जायगा और यहाँ के सभी प्रमुख राक्षस कालके गाल में चले जायँगे ॥ ३० ॥

यदि नाम स शूरो मां रामो रक्तान्तलोचनः ।

जानीयाद् वर्तमानां यां राक्षसस्य निवेशने ॥ ३१ ॥

" यह सब तभी सम्भव होगा, जब कि लाल नेत्रप्रान्तवाले शुरवीर भगवान् श्रीरामको यह पता लग जाय कि मैं राक्षसके अन्तः पुरमें बंदी बनाकर रक्खी गयी हूँ ॥ ३१ ॥

अन तु नृशंसेन रावणेनाधमेन मे ।

समयो यस्तु निर्दिष्टस्तस्य कालोऽयमागतः ॥ ३२ ॥

इस ' नीच और नृशंस रावणने मेरे लिये जो समय नियत किया है, उसकी पूर्ति भी निकट भविष्य में ही हो जायगी ॥ ३२ ॥

स च मे विहितो मृत्युरस्मिन् दुष्टेन वर्तते ।

ये न जानन्ति नैर्ऋताः पापकारिणः ॥ ३३ ॥

अकार्य ' उसी समय दुष्ट रावणने मेरे वधका निश्चय किया है । ये पापाचारी राक्षस इतना भी नहीं जानते हैं कि क्या करना चाहिये और क्या नहीं ॥ ३३ ॥

अधर्मात् तु महोत्पातो भविष्यति हि साम्प्रतम् ।

नैते धर्म विजानन्ति राक्षसाः पिशिताशनाः ॥ ३४ ॥

" इस समय अधर्मसे ही महान् उत्पात होनेवाला है ।

ये मांसभक्षी राक्षस धर्मको बिल्कुल नहीं जानते हैं ॥ ३४ ॥

ध्रुवं मां प्रातराशार्थ राक्षसः कल्पयिष्यति ।

साहं कथं करिष्यामि तं विना प्रियदर्शनम् ॥ ३५ ॥

' वह राक्षस अवश्य ही अपने कलेवेके लिये मेरे शरीर के टुकड़े - टुकड़े करा डालेगा । उस समय अपने प्रियदर्शन पतिके बिना मैं असहाय अबला क्या करूँगी १ ॥ ३५ ॥

रामं रक्तान्तनयनमपश्यन्ती सुदुःखिता ।

क्षिप्रं वैवस्वतं देवं पश्येयं पतिना विना ॥ ३६ ॥

" जिनके नेत्रप्रान्त अरुण वर्णके हैं, उन श्रीरामचन्द्रजी-जिस लङ्कामें पुण्यमय उत्सव होते हैं, वह राक्षसों- का दर्शन न पाकर अत्यन्त दुःखमें पड़ी हुई मुझ असहाय ' आज

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९ ३२ श्रीमवाल्मीकीय रामायणे. अचलाको पतिका चरणस्पर्श किये बिना ही शीघ्र यमदेवताका दर्शन करना पड़ेगा ॥ ३६ ॥

नाजानाजीवतीं रामः स मां भरतपूर्वजः ।

जानन्तौ तु न कुर्यातां नोर्व्याहि परिमार्गणम् ॥ ३७ ॥

' भरतके बड़े भाई भगवान् श्रीराम यह नहीं जानते हैं कि मैं जीवित हूँ । यदि उन्हें इस बातका पता होता तो ऐसा सम्भव नहीं था कि वे पृथ्वीपर मेरी खोज नहीं करते ॥ ३७ ॥

नूनं ममैव शोकेन स वीरो लक्ष्मणाग्रजः ।

देवलोकमितो यातस्त्यक्त्वा देहं महीतले ॥ ३८ ॥

" मुझे तो यह निश्चित जान पड़ता है कि मेरे ही शोकसे लक्ष्मणके बड़े भाई वीरवर श्रीराम भूतलपर अपने शरीरका त्याग करके यहाँ से देवलोकको चले गये हैं ॥ ३८ ॥

धन्या देवाः सगन्धर्वाः सिद्धाश्च परमर्षयः ।

मम पश्यन्ति ये वीरं रामं राजीवलोचनम् ॥ ३ ९ ॥

' वे देवता, गन्धर्व, सिद्ध और महर्षिगण धन्य हैं, जो मेरे पतिदेव वीर शिरोमणि कमलनयन श्रीरामका दर्शन पा रहे हैं ॥ ३ ९ ॥

अथवा नहि तस्यार्थो धर्मकामस्य धीमतः ।

मया रामस्य राजर्षेर्भार्यया परमात्मनः ॥ ४० ॥

' अथवा केवल धर्मकी कामना रखनेवाले परमात्म-स्वरूप बुद्धिमान् राजर्षि श्रीरामको भार्यासे कोई प्रयोजन नहीं है ( इसीलिये वे मेरी सुध नहीं ले रहे हैं ) ॥ ४० ॥

दृश्यमाने भवेत् प्रीतिः सौहृदं नास्त्यदृश्यतः ।

नाशयन्ति कृतघ्नास्तु न राम्रो नाशयिष्यति ॥ ४१ ॥

' जो स्वजन अपनी दृष्टिके सामने होते हैं, उन्हींपर प्रीति बनी रहती है 1 । जो आँखसे ओझल होते हैं, उनपर लोगोंका स्नेह नहीं रहता है ( शायद इसीलिये श्रीरघुनाथजी मुझे भूल गये हैं, परंतु यह भी सम्भव नहीं है; क्योंकि ) कृतघ्न मनुष्य ही पीठ पीछे प्रेमको ठुकरा देते हैं । भगवान् श्रीराम ऐसा नहीं करेंगे ॥ ४१ ॥

किं वा मय्यगुणाः केचित् किं वा भाग्यक्षयो हि मे ।

या हि सीता वरार्हेण हीना रामेण भामिनी ॥ ४२ ॥

' अथवा मुझमें कोई दुर्गुण हैं या मेरा भाग्य ही फूट गया है, जिससे इस समय मैं मानिनी सीता अपने परम पूजनीय पति श्रीरामसे बिछुड़ गयी हूँ ॥ ४२ ॥

श्रेयो मे जीवितान्तु विहीनाया महात्मना ।

रामादक्लिष्टचारित्राच्छ्रराच्छत्रुनिबर्हणात् ॥ ४३ ॥

' मेरे पति भगवान् श्रीरामका सदाचार अक्षुण्ण है । वे शूरवीर होने के साथ ही शत्रुओंका संहार करनेमें समर्थ हैं । मैं उनसे संरक्षण पाने के योग्य हूँ, परंतु उन महात्मासे बिछुड़ गयी । ऐसी दशा में जीवित रहने की अपेक्षा मर जाना मेरे लिये श्रेयस्कर है ॥ ४३ ॥

अथवा न्यस्तशस्त्रौ तौ वने मूलफलाशनौ ।

भ्रातरौ हि नरश्रेष्ठौ चरन्तौ वनगोचरी ॥ ४४ ॥

' अथवा वनमें फल- मूल खाकर विचरनेवाले वे दोनों वनवासी बन्धु नरश्रेष्ठ श्रीराम और लक्ष्मण अब अहिंसाका व्रत लेकर अपने अस्त्र - शस्त्रोंका परित्याग कर चुके हैं ॥४४ ॥

अथवा राक्षसेन्द्रेण रावणेन दुरात्मना ।

छद्मना घातितौ शूरौ भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ ॥ ४५ ॥

' अथवा दुरात्मा राक्षसराज रावणने उन दोनों शूरवीर बन्धु श्रीराम और लक्ष्मणको छलसे मरवा डाला है ॥ ४५ ॥

साहमेवंविधे काले भर्तुमिच्छामि सर्वतः ।

न च मे विहितो मृत्युरस्मिन् दुःखेऽतिवर्तति ॥ ४६ ॥

' अतः ऐसे समय में मैं सब प्रकारसे अपने जीवनका • अन्त कर देने की इच्छा रखती हूँ; परंतु मालूम होता है इस महान् दुःखमें होते हुए भी अभी मेरी मृत्यु नहीं लिखी है ॥ ४६ ॥

धन्याः खलु महात्मानो मुनयः सत्यसम्मताः ।

जितात्मानो महाभागा येषां न स्तः प्रियाप्रिये ॥ ४७ ॥

' सत्यस्वरूप परमात्माको ही अपना आत्मा माननेवाले और अपने अन्तःकरणको वशमें रखनेवाले वे महाभाग महात्मा महर्षिगण धन्य हैं, जिनके कोई प्रिय और अप्रिय नहीं हैं ॥ ४७ ॥

प्रियान्न सम्भवेद् दुःखमप्रियादधिकं भवेत् ।

ताभ्यां हि ते वियुज्यन्ते नमस्तेषां महात्मनाम् ॥ ४८ ॥

' जिन्हें प्रियके वियोगसे दुःख नहीं होता और अप्रियका संयोग प्राप्त होनेपर उससे भी अधिक कष्टका अनुभव नहीं होता - इस प्रकार जो प्रिय और अप्रिय दोनोंसे परे हैं, उन महात्माओंको मेरा नमस्कार है ॥ ४८ ॥

साहं त्यक्ता प्रियेणैव रामेण विदितात्मना ।

प्राणांस्त्यक्ष्यामि पापस्य रावणस्य गता वशम् ॥ ४ ९ ॥

मैं अपने प्रियतम आत्मज्ञानी भगवान् श्रीरामसे बिछुड़ गयी हूँ और पापी रावण के चंगुलमें आ फँसी हूँ; अतः अब इन प्राणका परित्याग कर दूँगी ' ॥ ४ ९ ॥ इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये सुन्दरकाण्डे षडविंशः सर्गः ॥ २६ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके सुन्दरकाण्डमें छब्बीसवाँ सर्गं पूरा हुआ ॥ २६ ॥

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सुन्दरकाण्डे सप्तविंशः सर्गः ९ ३३ सप्तविंशः त्रिजटाका स्वप्न - राक्षसोंके विनाश और

इत्युक्ताः सीतया घोरं राक्षस्यः क्रोधमूर्चिछताः ।

काश्चिज्जग्मुस्तदाख्यातुं रावणस्य दुरात्मनः ॥ १ ॥

सीताने जब ऐसी भयंकर बात कही, तब वे राक्षसियाँ क्रोधसे अचेत - सी हो गयीं और उनमें से कुछ उस दुरात्मा रावणसे वह संवाद कहने के लिये चल दीं ॥ १ ॥

ततः सीतामुपागम्य राक्षस्यो भीमदर्शनाः ।

पुनः परुषमेकार्थमनर्थार्थमथाब्रुवन् ॥ २ ॥

तत्पश्चात् भयंकर दिखायी देनेवाली वे राक्षसियाँ सीताके पास आकर पुनः एक ही प्रयोजनसे सम्बन्ध रखनेवाली कठोर बातें, जो उनके लिये ही अनर्थकारिणी थीं, कहने लगीं ॥२ ॥

अद्येदानीं तवानायें सीते पापविनिश्वये ।

राक्षस्यो भक्षयिष्यन्ति मांसमेतद् यथासुखम् ॥ ३ ॥

' पापपूर्ण विचार रखनेवाली अनायें सीते! आज इसी समय ये सब राक्षसियाँ मौजके साथ तेरा यह मांस खायेंगी ' ॥

सीतां ताभिरनार्याभिर्दृष्ट्वा संतर्जितां तदा ।

राक्षसी त्रिजटा वृद्धा प्रबुद्धा वाक्यमब्रवीत् ॥ ४ ॥

उन दुष्ट निशाचरियोंके द्वारा सीताको इस प्रकार डरायी जाती देख बूढ़ी राक्षसी त्रिजटा, जो तत्काल सोकर उठी थी, उन सबसे कहने लगी- ॥ ४ ॥

आत्मानं खादतानार्या न सीतां भक्षयिष्यथ ।

जनकस्य सुतामिष्टां स्नुषां दशरथस्य च ॥ ५ ॥

' नीच निशाचरियो! तुमलोग अपने - आपको ही खा जाओ । राजा जनककी प्यारी बेटी तथा महाराज दशरथ की प्रिय पुत्रवधू सीताजीको नहीं खा सकोगी ॥ ५ ॥

स्वप्नो द्य मया दृष्टो दारुणो रोमहर्षणः ।

राक्षसानामभावाय भर्तुरस्या भवाय च ॥ ६ ॥

' आज मैंने बड़ा भयंकर और रोमाञ्चकारी स्वप्न देखा है, जो राक्षसोंके विनाश और सीतापति के अभ्युदयकी सूचना देनेवाला है ' ॥ ६ ॥

एवमुक्तात्रिजटया राक्षस्यः क्रोधमूर्चिछताः ।

सर्वा एवाब्रुवन् भीतास्त्रिजटां तामिदं वचः ॥ ७ ॥

त्रिजटा के ऐसा कहने पर वे सब राक्षसियाँ, जो पहले क्रोधसे मूर्च्छित हो रही थीं, भयभीत हो उठीं और त्रिजटासे इस प्रकार बोलीं ॥ ७ ॥

कथयस्व त्वया दृष्टः स्वप्नोऽयं कीदृशो निशि ।

तासां श्रुत्वा तु वचनं राक्षसीनां मुखोद्गतम् ॥ ८ ॥

उवाच वचनं काले त्रिजटा स्वप्नसंश्रितम् । ' अरी! बताओ तो सही, तुमने आज रातमें यह कैसा सर्गः श्रीरघुनाथजी की विजयकी शुभ सूचना स्वप्न देखा है? ' उन राक्षसियों के मुखसे निकली हुई यह बात सुनकर त्रिजटाने उस समय वह स्वप्न - सम्बन्धी बात इस प्रकार कही ॥ ८३ ॥

गजदन्तमय दिव्यां शिविकामन्तरिक्षगाम् ॥ ९ ॥

युक्तां वाजिसहस्रेण स्वयमास्थाय राघवः ।

शुक्लमाल्याम्बरधरो लक्ष्मणेन समागतः ॥ १० ॥

' आज स्वप्न में मैंने देखा है कि आकाशमें चलनेवाली एक दिव्य शिबिका है । वह हाथीदाँतकी बनी हुई है । उसमें एक हजार घोड़े जुते हुए हैं और श्वेत पुष्पोंकी माला तथा श्वेत वस्त्र धारण किये स्वयं श्रीरघुनाथजी लक्ष्मणके साथ उस शिबिकापर चढ़कर यहाँ पधारे हैं । ९ -१० ॥

स्वप्ने चाद्य मया दृष्टा सीता शुक्लाम्बरावृता ।

सागरेण परिक्षिप्तं श्वेतपर्वतमास्थिता ॥ ११ ॥

रामेण संगता सीता भास्करेण प्रभा यथा । ' आज स्वप्न में मैंने यह भी देखा है कि सीता श्वेत वस्त्र धारण किये श्वेत पर्वत के शिखरपर बैठी हैं और वह पर्वत समुद्र से घिरा हुआ है, वहाँ जैसे सूर्यदेवसे उनकी प्रभा मिलती है, उसी प्रकार सीता श्रीरामचन्द्रजीसे मिली हैं ॥ राघवश्व पुनर्दष्टश्चतुर्दतं महागजम् ॥ १२ ॥

आरूढः शैलसंकाशं चकास सहलक्ष्मणः । ' मैंने श्रीरघुनाथजी को फिर देखा, वे चार दाँतवाले विशाल गजराजपर, जो पर्वतके समान ऊँचा था, लक्ष्मणके साथ बैठे हुए बड़ी शोभा पा रहे थे ॥ १२३ ॥

ततस्तु सूर्यसंकाशौ दीप्यमानौ स्वतेजसा ॥ १३ ॥

शुक्लमाल्याम्बरधरौ जानकीं पर्युपस्थितौ । ' तदनन्तर अपने तेजसे सूर्यके समान प्रकाशित होते तथा श्वेत माला और श्वेत वस्त्र धारण किये वे दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मण जानकीजीके पास आये ॥ १३३ ॥

ततस्तस्य नगस्याग्रे ह्याकाशस्थस्य दन्तिनः ॥ १४ ॥

भर्त्रा परिगृहीतस्य जानकी स्कन्धमाश्रिता । ‘ फिर उस पर्वत - शिखर पर आकाश में ही खड़े हुए और पतिद्वारा पकड़े गये उस हाथीके कंधेपर जानकीजी भी आ पहुँचीं ॥ १४३ ॥

भर्तुरङ्कात् समुत्पत्य ततः कमललोचना ॥ १५ ॥

चन्द्रसूर्यौ मया दृष्टा पाणिभ्यां परिमार्जती । ' इसके बाद कमलनयनी सीता अपने पतिके अङ्कसे ऊपरको उछलकर चन्द्रमा और सूर्यके पास पहुँच गयीं ।

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९ ३४ श्रीमद्द्वाल्मीकीयरामायणे वहाँ मैंने देखा वे अपने दोनों हाथोंसे चन्द्रमा और सूर्यको पोंछ रही हैं— उनपर हाथ फेर रही हैं ॥ १५३ ॥

ततस्ताभ्यां कुमाराभ्यामास्थितः स गजोत्तमः ।

सीतया च विशालाक्ष्या लङ्काया उपरि स्थितः ॥ १६ ॥

तत्पश्चात् जिसपर वे दोनों राजकुमार और विशाल-लोचना सीताजी विराजमान थीं, वह महान् गजराज लङ्काके ऊपर आकर खड़ा हो गया ॥ १६ ॥

पाण्डुरर्षभयुक्तेन रथेनाष्टयुजा स्वयम् ।

इहोपयातः काकुत्स्थः सीतया सह भार्यया ॥ १७ ॥

शुक्लमाल्याम्बरधरो लक्ष्मणेन सहागतः । " फिर मैंने देखा कि आठ सफेद बैलोंसे जुते हुए एक रथपर आरूढ़ हो ककुत्स्थकुलभूषण श्रीरामचन्द्रजी श्वेत पुष्पोंकी माला और वस्त्र धारण किये अपनी धर्मपत्नी सीता और भाई लक्ष्मण के साथ यहाँ पधारे हैं ॥ १७३ ॥

ततोऽन्यत्र मया दृष्टो रामः सत्यपराक्रमः ॥ १८ ॥

लक्ष्मणेन सह भ्रात्रा सीतया सह वीर्यवान् ।

आरुह्य पुष्पकं दिव्यं विमानं सूर्यसंनिभम् ॥ १ ९ ॥

उत्तरां दिशमालोच्य प्रस्थितः पुरुषोत्तमः । ‘ इसके बाद दूसरी जगह मैंने देखा सत्यपराक्रमी और बल - विक्रमशाली पुरुषोत्तम भगवान् श्रीराम अपनी पत्नी सीता और भाई लक्ष्मण के साथ सूर्यतुल्य तेजस्वी दिव्य पुष्पक विमानपर आरूढ़ हो उत्तर दिशाको लक्ष्य करके यहाँसे प्रस्थित हुए हैं ॥ १८-१९ ३ ॥ एवं स्वप्ने मया दृष्टो रामो विष्णुपराक्रमः ॥ २० ॥

लक्ष्मणेन सह भ्रात्रा सीतया सह भार्यया । ‘ इस प्रकार मैंने स्वप्नमें भगवान् विष्णुके समान पराक्रमी श्रीरामका उनकी पत्नी सीता और भाई लक्ष्मणके साथ दर्शन किया ॥ २०३ ॥

न हि रामो महातेजाः शक्यो जेतुं सुरासुरैः ॥ २१ ॥

राक्षसैर्वापि चान्यैर्वा स्वर्गः पापजनैरिव । ' श्रीरामचन्द्रजी महातेजस्वी हैं । उन्हें देवता, असुर, राक्षस तथा दूसरे लोग भी कदापि जीत नहीं सकते । ठीक उसी तरह, जैसे पापी मनुष्य स्वर्गलोकपर विजय नहीं पा सकते ॥ २१३ ॥

रावणश्च मया दृष्टो मुण्डस्तैलसमुक्षितः ॥ २२ ॥

* जो स्त्री या पुरुष स्वप्नमें अपने दोनों हाथोंसे सूर्यमण्डल अथवा चन्द्रमण्डलको छू लेता है, उसे विशाल राज्यकी प्राप्ति होती है । जैसा कि स्वप्नाध्यायका वचन है— आदित्यमण्डलं वापि चन्द्रमण्डलमेव स्वप्ने गृह्णाति इस्ताभ्यां राज्यं सम्प्राप्नुयान्महत् ॥ ( गोविन्दराजविरचित रामायणभूषण )

रक्तवासाः पिवन्मत्तः करवीरकृतस्रजः ।

विमानात् पुष्पकादद्य रावणः पतितः क्षितौ ॥ २३ ॥

' मैंने रावणको भी सपने में देखा था । वह मूड़ मुड़ाये तेलसे नहाकर लाल कपड़े पहने हुए था । मंदिरा पीकर मतवाला हो रहा था तथा करवीरके फूलोंकी माला पहने हुए था । इसी वेषभूषामें आज रावण पुष्पक विमानसे पृथ्वीपर गिर पड़ा था ॥ २२-२३ ॥

कृष्यमाणः स्त्रिया मुण्डो दृष्टः कृष्णाम्बरः पुनः ।

रथेन खरयुक्तेन रक्तमाल्यानुलेपनः ॥ २४ ॥

पिबंस्तैलं हसन्नृत्यन् भ्रान्तचित्ताकुलेन्द्रियः ।

गर्दभेन ययौ शीघ्रं दक्षिणां दिशमास्थितः ॥ २५ ॥

' एक स्त्री उस मुण्डित - मस्तक रावणको कहीं खींचे लिये जा रही थी । उस समय मैंने फिर देखा रावणने काले कपड़े पहन रक्खे हैं 1 । वह गधे जुते हुए रथसे यात्रा कर रहा था । लाल फूर्लोकी माला और लाल चन्दनसे विभूषित था । तेल पीता, हँसता और नाचता था । पागलोंकी तरह उसका चित्त भ्रान्त और इन्द्रियाँ व्याकुल थीं । वह गधेपर सवार हो शीघ्रतापूर्वक दक्षिण दिशाकी ओर जा रहा था ॥ २४-२५ ॥

पुनरेव मया दृष्टो रावणो राक्षसेश्वरः ।

पतितोऽवाक्शिरा भूमौ गर्दभाद् भयमोहितः ॥ २६ ॥

' तदनन्तर मैंने फिर देखा राक्षसराज रावण गधेसे नीचे भूमिपर गिर पड़ा है । उसका सिर नीचे की ओर है ( और पैर ऊपरकी ओर ) तथा वह भय से मोहित हो रहा है ॥ २६ ॥

सहसोत्थाय सम्भ्रान्तो भयार्तो मदविह्वलः ।

उन्मत्तरूपो दिग्वासा दुर्वाक्यं प्रलपन् बहु ॥ २७ ॥

दुर्गन्धं दुःसहं घोरं तिमिरं नरकोपमम् ।

मलपङ्कं प्रविश्याशु मग्नस्तत्र स रावणः ॥ २८ ॥

" फिर वह भयातुर हो घबराकर सहसा उठा और मदसे विह्वल हो पागल के समान नंग - धड़ंग वेषमें बहुत - से दुर्वचन ( गाली आदि ) बकता हुआ आगे बढ़ गया । सामने ही दुर्गन्धयुक्त दुःसह घोर अन्धकारपूर्ण और नरकतुल्य मल-का पङ्क था, रावण उसीमें घुसा और वहीं डूब गया २७-२८

प्रस्थितो दक्षिणामाशां प्रविष्टोऽकर्दमं ह्रदम् ।

कण्ठे बद्ध्वा दशग्रीवं प्रमदा रक्तवासिनी ॥ २ ९ ॥

काली कर्दमलिप्ताङ्गी दिशं याम्यां प्रकर्षति ।

एवं तत्र मया दृष्टः कुम्भकर्णो महाबलः ॥ ३० ॥

' तदनन्तर फिर देखा रावण दक्षिणकी ओर जा रहा है । उसने एक ऐसे तालाब में प्रवेश किया है, जिसमें कीचड़ -का नाम नहीं है 1 । वहाँ एक काले रंगकी स्त्री है, जिसके अनोंमें कीचड़ लिपटी हुई है । वह युवती लाल वस्त्र पहने हुए है और रावणका गला बाँधकर उसे दक्षिण दिशाकी

पृष्ठ 110

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सुन्दरकाण्डे सप्तविंशः सर्गः ९ ३५ ओर खींच रही है । वहाँ महाबली कुम्भकर्णको भी मैंने इसी अवस्थामें देखा है ॥ २ ९ -३० ॥

रावणस्य सुताः सर्वे मुण्डास्तैलसमुक्षिताः ।

वराहेण दशग्रीवः शिशुमारेण चेन्द्रजित् ॥ ३१ ॥

उष्ण कुम्भकर्णश्च प्रयातो दक्षिणां दिशम् । ' रावणके सभी पुत्र भी मूड़ मुड़ाये और तेलमें नहाये दिखायी दिये हैं । यह भी देखने में आया कि रावण सूअरपर, इन्द्रजित् सूँसपर और कुम्भकर्ण ऊँटपर सवार हो दक्षिण दिशाको गये हैं ॥ ३१३ ॥

मया दृष्टः श्वेतच्छत्रो विभीषणः ॥ ३२ ॥

एकस्तत्र शुक्लागन्धानुलेपनः । शुक्लमाल्याम्बरधरः ' राक्षसों में एकमात्र विभीषण ही ऐसे हैं, जिन्हें मैंने वहाँ श्वेत छत्र लगाये, सफेद माला पहने, श्वेत वस्त्र धारण किये तथा श्वेत चन्दन और अङ्गराग लगाये देखा है ॥ ३२३ ॥

॥३३ ॥

शङ्खदुन्दुभिनिर्घोषैर्नृत्तगीतैरलंकृतः

आरुह्य शैलसंकाशं मेघस्तनितनिःस्वनम् ।

चतुर्दन्तं गजं दिव्यमास्ते तत्र विभीषणः ॥ ३४ ॥

चतुर्भिः सचिवैः सार्धं वैहाय समुपस्थितः ॥ ३५ ॥

‘ उनके पास शङ्खध्वनि हो रही थी, नगाड़े बजाये जा रहे थे । इनके गम्भीर घोष के साथ ही नृत्य और गीत भी हो रहे थे, जो विभीषणकी शोभा बढ़ा रहे थे । विभीषण वहाँ अपने चार मन्त्रियोंके साथ पर्वत के समान विशालकाय मेघ के समान गम्भीर शब्द करनेवाले तथा चार दाँतवाले दिव्य गजराजपर आरूढ़ हो आकाश में खड़े थे ॥३३-३५ ॥

समाजश्च महान् वृत्तो गीतवादित्र निःखनः ।

पितां रक्तमाल्यानां रक्षसां रक्तवाससाम् ॥ ३६ ॥

' राखसे रूखी हुई लङ्कामें सारी राक्षसरमणियाँ तेल पीकर मतवाली हो बड़े जोर - जोरसे ठहाका मारकर हँसती हैं ॥ ३ ९ ॥

कुम्भकर्णादयश्चेमे सर्वे राक्षसपुङ्गवाः ।

रक्तं निवसनं गृह्य प्रविष्टा गोमयहृदम् ॥ ४० ॥

' कुम्भकर्ण आदि ये समस्त राक्षस शिरोमणि वीर लाल कपड़े पहनकर गोबर के कुण्डमें घुस गये हैं ॥ ४० ॥

अपगच्छत पश्यध्वं सीतामाप्नोति राघवः ।

घातयेत् परमामर्षी युष्मान् सार्धं हि राक्षसैः ॥ ४१ ॥

' अतः अब तुमलोग हट जाओ और देखो कि किस तरह श्रीरघुनाथजी सीताको प्राप्त कर रहे हैं । वे बड़े अमर्षशील हैं, राक्षसों के साथ तुम सबको भी मरवा डालेंगे ॥ ४१ ॥

प्रियां बहुमतां भार्या वनवासमनुव्रताम् ।

भत्सितां तर्जितां वापि नानुमंस्यति राघवः ॥ ४२ ॥

' जिन्होंने वनवासमें भी उनका साथ दिया है, उन अपनी पतिव्रता भार्या और परमादरणीया प्रियतमा सीताका इस तरह धमकाया और डराया जाना श्रीरघुनाथजी कदापि सहन नहीं करेंगे ॥ ४२ ॥

तदलं क्रूरवाक्यैश्व सान्त्वमेवाभिधीयताम् ।

अभियाचाम वैदेहीमेतद्धि मम रोचते ॥ ४३ ॥

' अतः अब इस तरह कठोर बातें सुनाना छोड़ो; क्योंकि इनसे कोई लाभ नहीं होगा । अब तो मधुर वचन-का ही प्रयोग करो । मुझे तो यही अच्छा लगता है कि हम-लोग विदेहनन्दिनी सीतासे कृपा और क्षमाकी याचना करें ॥ ४३ ॥

यस्या ह्येवंविधः स्वप्नो दुःखितायाः प्रदृश्यते । देखने में आया कि तेल पीनेवाले तथा लाल सादुःखैर्बहुभिर्मुक्का प्रियं प्राप्नोत्यनुत्तमम् ॥ ४४ ॥

' यह भी करनेवाले राक्षसका वहाँ बहुत ' जिस दुःखिनी नारीके विषय में ऐसा स्वप्न देखा जाता माला और लाल वस्त्र धारण गीतों और वाद्योंकी मधुर है, वह बहुसंख्यक दुःखोंसे छुटकारा पाकर परम उत्तम प्रिय बड़ा समाज जुटा हुआ है एवं ध्वनि हो रही है ॥ ३६ ॥ वस्तु प्राप्त कर लेती है ॥ ४४ ॥

पुरी रम्या सवाजिरथकुञ्जरा । भत्सितामपि याचध्वं राक्षस्यः किं विवक्षया । लङ्का चेयं पतिता दृष्टा भग्नगोपुरतोरणा ॥ ३७ ॥ राघवाद्धि भयं घोरं राक्षसानामुपस्थितम् ॥ ४५ ॥

सागरे लङ्कापुरी घोड़े, रथ और हाथियोंसहित ' राक्षसियो! मैं जानती हूँ, तुम्हें कुछ और कहने या ' यह रमणीय देखी गयी है । इसके बाहरी और भीतरी बोलनेकी इच्छा है; किंतु इससे क्या होगा? यद्यपि तुमने समुद्रमें गिरी हुई सीताको बहुत धमकाया है तो भी इनकी शरण में आकर इनसे दरवाजे टूट गये हैं ॥ ३७ ॥ । याचना करो; क्योंकि श्रीरघुनाथजीकी ओर से राक्षसों-लङ्का दृष्टा मया स्वप्ने रावणेनाभिरक्षिता ॥ ३८ ॥ अभयकी

के लिये घोर भय उपस्थित हुआ है ॥ ४५ ॥

दग्धा रामस्य दूतेन वानरेण तरखिना हि मैथिली जनकात्मजा । ‘ मैंने स्वप्नमें देखा है कि रावणद्वारा सुरक्षित लङ्कापुरी- प्रणिपातप्रसन्ना राक्षस्यो महतो भयात् ॥ ४६ ॥

को श्रीरामचन्द्रजीका दूत बनकर आये हुए एक वेगशाली अलमेषा परित्रातुं सीता वानरने जलाकर भस्म कर दिया है ॥ ३८ ॥ ' राक्षसियो । जनकनन्दिनी मिथिलेशकुमारी

जायँगी । ये ही उस महाखनाः । केवल प्रणाम करनेसे ही प्रसन्न हो पीत्वा तैलं प्रमत्ताश्च प्रहसन्त्यो महान् भयसे तुम्हारी रक्षा करने में समर्थ हैं ॥ ४६ ॥

लङ्कायां भस्मरूक्षायां सर्वा राक्षसयोषितः ॥ ३ ९ ॥