श्रीगणेशाय नमः।

वाल्मीकि रामायण — खण्ड २ — पृष्ठ 111–120

वाल्मीकि रामायण — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 111–120

पृष्ठ 111

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९ ३६ श्रीमदुवाल्मीकीयरामायणे

अपि चास्या विशालाक्ष्या न किंचिदुपलक्षये ।

विरूपमपि चाङ्गेषु सुसूक्ष्ममपि लक्षणम् ॥ ४७ ॥

' इन विशाललोचना सीताके अङ्गोंमें मुझे कोई सूक्ष्म - से-सूक्ष्म भी विपरीत लक्षण नहीं दिखायी देता ( जिससे समझा जाय कि ये सदा कष्टमें ही रहेंगी ) ॥ ४७ ॥

छायावैगुण्यमात्रं तु शङ्के दुःखमुपस्थितम् ।

अदुःखामिमां देवीं वैहायसमुपस्थिताम् ॥ ४८ ॥

“ मैं तो समझती हूँ कि इन्हें जो वर्तमान दुःख प्राप्त हुआ है, वह ग्रहण के समय चन्द्रमापर पड़ी हुई छायाके समान थोड़ी ही देरका है; क्योंकि ये देवी सीता मुझे स्वप्न-में विमानपर बैठी दिखायी दी हैं, अतः ये दुःख भोगने के योग्य कदापि नहीं हैं ॥ ४८ ॥

अर्थसिद्धिं तु वैदेह्याः पश्याम्यहमुपस्थिताम् ।

राक्षसेन्द्रविनाशं च विजयं राघवस्य च ॥ ४ ९ ॥

' मुझे तो अब जानकीजीके अभीष्ट मनोरथकी सिद्धि उपस्थित दिखायी देती है । राक्षसराज रावण के विनाश और रघुनाथजीकी विजय में अब अधिक विलम्ब नहीं है ॥४ ९ ॥

निमित्तभूतमेतत् तु श्रोतुमस्या महत् प्रियम् ।

दृश्यते च स्फुरच्चक्षुः पद्मपत्रमिवायतम् ॥ ५० ॥

' कमलदलके समान इनका विशाल बायाँ नेत्र फड़कता दिखायी देता है । यह इस बातका सूचक है कि इन्हें शीघ्र ही अत्यन्त प्रिय संवाद सुनने को मिलेगा ॥ ५० ॥

ईषद्धि हृषितो वास्या दक्षिणाया दक्षिणः ।

अकस्मादेव वैदेह्या बाहुरेकः प्रकम्पते ॥ ५१ ॥

' इन उदारहृदया विदेहराजकुमारीकी एक बाँयी बाँह कुछ रोमाञ्चित होकर सहसा काँपने लगी है ( यह भी शुभका ही सूचक है ) ॥ ५१ ॥

करेणुहस्तप्रतिमः सव्यश्चोरुरनुत्तमः ।

वेपन् कथयतीवास्या राघवं पुरतः स्थितम् ॥ ५२ ॥

' हाथी की सूँड़के समान जो इनकी परम उत्तम बाँयीं जाँघ है, वह भी कम्पित होकर मानो यह सूचित कर रही है । कि अब श्रीरघुनाथजी शीघ्र ही तुम्हारे सामने उपस्थित होंगे ॥ ५२ ॥

पक्षी च शाखानिलयं प्रविष्टः पुनः पुनश्चोत्तमसान्त्ववादी । सुखागतां वाचमुदीरयाणः पुनः पुनश्चोदयतीव हृष्टः ॥ ५३ ॥

' देखो, सामने यह पक्षी शाखाके ऊपर अपने घोंसले में बैठकर बारंबार उत्तम सान्त्वनापूर्ण मीठी बोली बोल रहा है 1 । इसकी वाणीसे ' मुस्वागतम् ' की ध्वनि निकल रही है और इसके द्वारा यह हर्षमें भरकर मानो पुनः - पुनः मङ्गलप्राप्ति-की सूचना दे रहा है अथवा आनेवाले प्रियतमकी अगवानी-के लिये प्रेरित कर रहा है ' ॥ ५३ ॥

ततः सा हीमती बाला भर्तुर्विजयहर्षिता ।

अवोचद् यदि तत् तथ्यं भवेयं शरणं हि वः ॥ ५४ ॥

इस प्रकार पतिदेवकी विजयके संवादसे हर्षमें भरी हुई लजीली सीता उन सब से बोलीं- ' यदि तुम्हारी बात ठीक हुईं तो मैं अवश्य ही तुम सबकी रक्षा करूँगी ' ॥ ५४ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये सुन्दरकाण्डे सप्तविंशः सर्गः ॥ २७ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्धरामायण आदिकाव्यके सुन्दरकाण्डमें सत्ताईसवाँ सर्गं पूरा हुआ ॥ २७ ॥

अष्टाविंशः सर्गः विलाप करती हुई सीताका प्राण त्यागके लिये उद्यत होना सा राक्षसेन्द्रस्य वचो निशम्य तद् रावणस्य प्रियमप्रियार्ता । सीता वितत्रास यथा वनान्ते सिंहाभिपन्ना गजराजकन्या ॥ १ ॥

पतिके विरहके दुःखसे व्याकुल हुई सीता राक्षसराज रावण के उन अप्रिय वचनोंको याद करके उसी तरह भयभीत हो गयीं, जैसे वनमें सिंहके पंजे में पड़ी हुई कोई गजराजकी बच्ची ॥ १ ॥

सा राक्षसीमध्यगता च भीरु-र्वाग्भिर्भृशं रावणतर्जिता च । कान्तारमध्ये विजने विसृष्टा बालेव कन्या विललाप सीता ॥ २ ॥

राक्षसियोंके बीच में बैठकर उनके कठोर वचनोंसे बारंबार धमकायी और रावणद्वारा फटकारी गयी भीरु स्वभाववाली सीता निर्जन एवं बीहड़ वनमें अकेली छूटी हुई अल्पवयस्का बालिकाके समान विलाप करने लगीं ॥२ ॥

सत्यं बतेदं प्रवदन्ति लोके नाकालमृत्युर्भवतीति सन्तः । यत्राहमेवं परिभर्त्स्यमाना जीवामि यस्मात् क्षणमप्यपुण्या ॥ ३ ॥

वे बोली- ' संतजन लोकमें यह बात ठीक ही कहते हैं कि बिना समय आये किसीकी मृत्यु नहीं होती, तभी तो इस प्रकार धमकायी जानेपर भी मैं पुण्यहीना नारी क्षणभर भी जीवित रह पाती हूँ ॥ ३ ॥

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सुन्दरकाण्डे अष्टाविंशः सर्गः ९ ३७ सुखाद् विहीनं बहुदुःखपूर्ण-मिदं तु नूनं हृदयं स्थिरं मे । विदीर्यते यन्न सहस्रधाद्य वज्राहतं शृङ्गमिवाचलस्य ॥ ४ ॥

' मेरा यह हृदय सुखसे रहित और अनेक प्रकार के दुःखोंसे भरा होनेपर भी निश्चय ही अत्यन्त दृढ़ है । इसीलिये वज्रके मारे हुए पर्वतशिखर की भाँति आज इसके सहस्रों टुकड़े नहीं हो जाते ॥ ४ ॥

नैवास्ति नूनं मम दोषमंत्र वध्याहमस्याप्रियदर्शनस्य 1 भावं न चास्याद्दमनुप्रदातु-मलं द्विजो मन्त्रमिवाद्विजाय ॥ ५ ॥

' मैं इस दुष्ट रावणके हाथसे मारी जानेवाली हूँ, इसलिये यहाँ आत्मघात करनेसे भी मुझे कोई दोष नहीं लग सकता । कुछ भी हो, जैसे द्विज किसी शूद्रको वेदमन्त्र-का उपदेश नहीं देता, उसी प्रकार मैं भी इस निशाचर को अपने हृदयका अनुराग नहीं दे सकती ॥ ५ ॥

तस्मिन्ननागच्छति लोकनाथे गर्भस्थजन्तोरिव शल्यकृन्तः । नूनं ममाङ्गान्यचिरादनार्यः ' शस्त्रैः शितैश्छेत्स्यति राक्षसेन्द्रः ॥ ६ ॥

' हाय! लोकनाथ भगवान् श्रीरामके आनेसे पहले ही यह दुष्ट राक्षसराज निश्चय ही अपने तीखे शस्त्रोंसे मेरे अङ्गोंके शीघ्र ही टुकड़े - टुकड़े कर डालेगा । ठीक वैसे ही, जैसे शल्यचिकित्सक किसी विशेष अवस्थामें गर्भस्थ शिशुके टूक - टूक कर देता है ( अथवा जैसे इन्द्रने दिति के गर्भ में स्थित शिशुके उनचास टुकड़े कर डाले थे ) ॥ ६ ॥

दुःखं बतेदं ननु दुःखिताया मासौ चिरायाभिगमिष्यतो द्वौ । बद्धस्य वध्यस्य यथा निशान्ते राजोपरोधादिव तस्करस्य ॥ ७ ॥

' मैं बड़ी दुखिया हूँ । दुःखकी बात है कि मेरी अवधि के ये दो महीने भी जल्दी ही समाप्त जायँगे । राजाके कारागार में कैद हुए और रात्रि के अन्तमें फाँसी की सजा पानेवाले अपराधी चोरकी जो दशा होती है, वही मेरी भी है ॥ ७ ॥

हा राम हा लक्ष्मण हा सुमित्रे हा राममातः सह मे जनन्यः । एषा विपद्याम्यहमल्पभाग्या महार्णवे नौरिव मूढवाता ॥ ८ ॥

' हा राम! हा लक्ष्मण! हा सुमित्रे! हा श्रीरामजननी कौसल्ये | और हा मेरी माताओ! जिस प्रकार बवंडर में वा ० रा ० ५.७. १०-पड़ी हुई नौका महासागरमें डूब जाती है, उसी प्रकार आज मैं मन्दभागिनी सीता प्राणसङ्कटकी दशामें पड़ी हुई हूँ ॥ ८ ॥

तरखिनौ धारयता मृगस्य सत्त्वेन रूपं मनुजेन्द्रपुत्रौ । नूनं विशस्तौ मम कारणात् तौ सिंहर्षभौ द्वाविव वैद्युतेन ॥ ९ ॥

' निश्चय ही उस मृगरूपधारी जीवने मेरे कारण उन दोनों वेगशाळी राजकुमारोंको मार डाला होगा । जैसे दो श्रेष्ठ सिंह बिजली से मार दिये जायँ, वही दशा उन दोनों भाइयोंकी हुई होगी ॥ ९ ॥

नूनं स कालो मृगरूपधारी माल्पभाग्यां लुलुभे तदानीम् । यत्रार्यपुत्रौ विससर्ज मूढा रामानुजं लक्ष्मणपूर्वजं च ॥ १० ॥

' अवश्य ही उस समय कालने ही मृगका रूप धारण करके मुझ मन्दभागिनीको लुभाया था, जिससे प्रभावित हो मुझ मूढ़ नारीने उन दोनों आर्यपुत्रों— श्रीराम और लक्ष्मणको उसके पीछे भेज दिया था ॥ १० ॥

हा राम सत्यव्रत दीर्घबाहो छा पूर्णचन्द्र प्रतिमानवक्त्र । हा जीवलोकस्य हितः प्रियश्च वध्यां न मां वेत्सि हि राक्षसानाम् ॥ ११ ॥

' हा सत्यव्रतधारी महाबाहु श्रीराम! हा पूर्ण चन्द्रमा के समान मनोहर मुखवाले रघुनन्दन! हा जीवजगत् के हितैषी और प्रियतम! आपको पता नहीं है कि मैं राक्षसों के हाथसे मारी जानेवाली हूँ ॥ ११ ॥

अनन्य देवत्वमियं क्षमा च भूमौ च शय्या नियमश्च धर्मे । पतिव्रतात्वं विफलं ममेदं कृतं कृतघ्नेष्विव मानुषाणाम् ॥ १२ ॥

‘ मेरी यह अनन्योपासना, क्षमा, भूमिशयन, धर्म-सम्बन्धी नियमोंका पालन और पतिव्रतपरायणता - ये सब - के - सब कृतघ्नों के प्रति किये गये मनुष्योंके उपकारकी भाँति निष्फल हो गये ॥ १२ ॥

मोघो हि धर्मश्वरितो ममायं तथैकत्वमिदं निरर्थकम् । या त्वां न पश्यामि कृशा विवर्णा हीना त्वया सङ्गमने निराशा ॥ १३ ॥

' प्रभो! यदि मैं अत्यन्त कृश और कान्तिहीन होकर आपसे बिछुड़ी ही रह गयी तथा आपसे मिलने की आशा खो बैठी, तब तो मैंने जिसका जीवनभर आचरण किया

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९ ३८ श्रीमद्वाल्मीकीय रामायणे है, वह धर्म मेरे लिये व्यर्थ हो गया और यह एकपत्नीव्रत भी किसी काम नहीं आया ॥ १३ ॥

पितुर्निदेशं नियमेन कृत्वा वनान्निवृत्तश्चरितव्रतश्च 1 स्त्रीभिस्तु मन्ये विपुलेक्षणाभिः संरस्यसे वीतभयः कृतार्थः ॥ १४ ॥

" मैं तो समझती हूँ आप नियमानुसार पिताकी आज्ञाका पालन करके अपने व्रतको पूर्ण करनेके पश्चात् जब वनसे लौटेंगे, तब निर्भय एवं सफलमनोरथ हो विशाल नेत्रोंवाली बहुत - सी सुन्दरियोंके साथ विवाह करके उनके साथ रमण करेंगे || १४ || अहं तु राम त्वयि जातकामा चिरं विनाशाय निबद्धभावा । मोघं चरित्वाथ तपो व्रतं च त्यक्ष्यामि धिग्जीवितमल्पभाग्याम् ॥ १५ ॥

' किंतु श्रीराम! मैं तो केवल आपमें ही अनुराग रखती हूँ । मेरा हृदय चिरकालतक आपसे ही बँधा रहेगा । मैं अपने विनाशके लिये ही आपसे प्रेम करती हूँ । अबतक मैंने तप और व्रत आदि जो कुछ भी किया है, वह मेरे लिये व्यर्थ सिद्ध हुआ है । उस अभीष्ट फलको न देनेवाले धर्मका आचरण करके अब मुझे अपने प्राणोका परित्याग करना पड़ेगा । अतः मुझ मन्दभागिनीको धिक्कार है ॥ १५ ॥

संजीवितं क्षिप्रमहं त्यजेयं

विषेण शस्त्रेण शितेन वापि ।

विषस्य दाता न तु मेऽस्ति कश्चि-च्छस्त्रस्य वा वेश्मनि राक्षसस्य ॥ १६ ॥

" मैं शीघ्र ही किसी तीखे शस्त्र अथवा विषसे अपने प्राण त्याग दूँगी; परंतु इस राक्षसके यहाँ मुझे कोई विष या शस्त्र देनेवाला भी नहीं है ' ॥ १६ ॥

शोकाभितप्ता बहुधा विचिन्त्य

सीताथ वेणीग्रथनं गृहीत्वा ।

उद्वद्ध्य वेण्युग्रथनेन शीघ्र-महं गमिष्यामि यमस्य मूलम् ॥ १७ ॥

शोक संतप्त हुई सीताने इसी प्रकार बहुत कुछ विचार करके अपनी चोटीको पकड़कर निश्चय किया कि मैं शीघ्र ही इस चोटी से फाँसी लगाकर यमलोक में पहुँच जाऊँगी ॥ १७ ॥

उपस्थिता सा मृदुसर्वगात्री शाखां गृहीत्वा च नगस्य तस्य । तस्यास्तु रामं परिचिन्तयन्त्या रामानुजं स्वं च कुलं शुभाङ्गन्याः ॥ १८ ॥

तस्या विशोकानि ता बहूनि धैर्यार्जितानि प्रवराणि लोके । प्रादुर्निमित्तानि तदा बभूवुः पुरापि सिद्धान्युपलक्षितानि ॥ १ ९ ॥ सीताजी के सभी अङ्ग बड़े कोमल थे । वे उस अशोक वृक्षके निकट उसकी शाखा पकड़कर खड़ी हो गयीं । इस प्रकार प्राण त्यागके लिये उद्यत हो जब वे श्रीराम, लक्ष्मण और अपने कुलके विषयमें विचार करने लगीं, उस समय शुभाङ्गी सीता के समक्ष ऐसे बहुत - से लोकप्रसिद्ध श्रेष्ठ शकुन प्रकट हुए, जो शोककी निवृत्ति करनेवाले और उन्हें ढाढ़स बँधानेवाले थे । उन शकुनोंका दर्शन और उनके शुभ फलोंका अनुभव उन्हें पहले भी हो चुका था ॥ १८-१९ ॥ इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये सुन्दरकाण्डेऽष्टाविंशः सर्गः ॥ २८ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आरामायण आदिकाव्य के सुन्दरकाण्ड में अट्ठाईसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ २८ ॥

एकोनत्रिंशः सर्गः सीताजीके तथागतां तां व्यथितामनिन्दितां व्यतीतहर्षा परिदीनमानसाम् । शुभां निमित्तानि शुभानि भेजिरे नरं श्रिया जुष्टमिवोपसेविनः ॥ १ ॥

इस प्रकार अशोकवृक्षके नीचे आनेपर बहुत - से शुभ शकुन प्रकट हो उन व्यथितहृदया, सती - साध्वी, हर्षशून्य, दीनचित्त तथा शुभलक्षणा सीताका उसी तरह सेवन करने लगे, जैसे श्रीसम्पन्न पुरुषके पास सेवा करनेवाले लोग स्वयं पहुँच जाते हैं ॥ १ ॥

शुभ शकुन तस्याः शुभं वाममरालपक्ष्म-राज्यावृतं कृष्णविशालशुक्लम् । प्रास्पन्दतैकं नयनं सुकेश्या मीनाइतं पद्ममिवाभिताम्रम् ॥ २ ॥

उस समय सुन्दर केशोंवाली सीताका बाँकी बरौनियों से घिरा हुआ परम मनोहर काला, श्वेत और विशाल बाँया नेत्र फड़कने लगा । जैसे मछली के आघात से लाल कमल हिलने लगा हो ॥ २ ॥

पृष्ठ 114

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सुन्दरकाण्डे त्रिंशः सर्गः ९ ३ ९ भुजश्च चार्वश्चितवृत्तपीनः परार्ध्य कालागुरुचन्दनार्हः 1 अनुत्तमेनाध्युषितः प्रियेण चिरेण वामः समवेपताशु ॥ ३ ॥

साथ ही उनकी सुन्दर प्रशंसित गोलाकार मोटी, बहु-मूल्य काले अगुरु और चन्दनसे चर्चित होने योग्य तथा परम उत्तम प्रियतमद्वारा चिरकालसे सेवित बाँयीं भुजा भी तत्काल फड़क उठी ॥ ३ ॥

गजेन्द्र हस्तप्रतिमश्च पीन-स्तयोर्द्वयोः संहतयोस्तु जातः । प्रस्पन्दमानः पुनरुरुरख्या रामं पुरस्तात् स्थितमाचचक्षे ॥ ४ ॥

फिर उनकी परस्पर जुड़ी हुई दोनों जॉधोंमेंसे एक बाँयीं जाँघ, जो गजराजकी सूँड़ के समान पीन ( मोटी ) थी, बारंबार फड़ककर मानो यह सूचना देने लगी कि भगवान् श्रीराम तुम्हारे सामने खड़े हैं ॥ ४ ॥

शुभं पुनर्हेमसमानवर्ण-मीषद्र जोध्वस्तमिवातुलाक्ष्याः । वासः स्थितायाः शिखराग्रदन्त्याः किंचित् परिस्रंसत चारुगात्र्याः ॥ ५ ॥

तत्पश्चात् अनारके बीजकी भाँति सुन्दर दाँत, मनोहर गात्र और अनुपम नेत्रवाली सीताका, जो वहाँ वृक्षके नीचे खड़ी थीं, सोने के समान रंगवाला किंचित् मलिन रेशमी पीताम्बर तनिका - सा खिसक गया और भावी शुभकी सूचना देने लगा ॥ ५ ॥

एतैर्निमित्तैरपरैश्च सुभ्रूः संचोदिता प्रागपि साधुसिद्धैः । वातातपक्कान्तमिव प्रणष्टं वर्षेण बीजं प्रतिसंजहर्ष ॥ ६ ॥

इनसे तथा और भी अनेक शकुनोंसे, जिनके द्वारा पहले भी मनोरथ सिद्धि का परिचय मिल चुका था, प्रेरित हुई सुन्दर भौंहोंवाली सीता उसी प्रकार हर्षसे खिल उठीं, जैसे हवा और धूपसे सूखकर नष्ट हुआ बीज वर्षाके जलसे सिंचकर हरा हो गया हो ॥ ६ ॥

तस्याः पुनर्विम्बफलोपमोष्टं स्वक्षिकेशान्तरालपक्ष्म I वक्त्रं बभासे सितशुक्लदंष्ट्रं राहोर्मुखाच्चन्द्र इव प्रमुक्तः ॥ ७ ॥

उनका बिम्बफल के समान लाल ओठों, सुन्दर नेत्रों, मनोहर भौंहों, रुचिर केशों, बाँकी बरौनियों तथा श्वेत उज्ज्वल दाँतोंसे सुशोभित मुख राहुके ग्राससे मुक्त हुए चन्द्रमाकी भाँति प्रकाशित होने लगा ॥ ७ ॥

सा वीतशोका व्यपनीत तन्द्रा शान्तज्वरा हर्षविबुद्धसत्त्वा । अशोभतार्या वदनेन शुक्ले शीतांशुना रात्रिरिवोदितेन ॥ ८ ॥

उनका शोक जाता रहा, सारी थकावट दूर हो गयी, मनका ताप शान्त गया और हृदय हर्षसे खिल उठा । उस समय आर्या सीता शुक्लपक्षमें उदित हुए शीतरश्मि चन्द्रमा-से सुशोभित रात्रिकी भाँति अपने मनोहर मुखसे अद्भुत शोभा पाने लगीं ॥ ८ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये सुन्दरकाण्डे एकोनत्रिंशः सर्गः ॥ २ ९ ॥ इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आरामायण आदिकाव्यके सुन्दरकाण्ड में उन्तीसवाँ सगँ पूरा हुआ ॥ २ ९ ॥ त्रिंशः सर्गः सीताजी से वार्तालाप करनेके विषयमें हनुमान्जीका विचार करना

हनुमानपि विक्रान्तः सर्व शुश्राव तत्त्वतः ।

सीतायात्रिजटायाश्च राक्षसीनां च तर्जितम् ॥ १ ॥

पराक्रमी हनुमान् जीने भी सीताजीका विलाप, त्रिजटा की स्वप्नचर्चा तथा राक्षसियों की डाँट - डपट —ये सब प्रसंग ठीक - ठीक सुन लिये ॥ १ ॥

अवेक्षमाणस्तां देवीं देवतामिव नन्दने ।

ततो बहुविधां चिन्तां चिन्तयामास वानरः ॥ २ ॥

सीताजी ऐसी जान पड़ती थीं मानो नन्दनवनमें कोई देवी हों । उन्हें देखते हुए वानरवीर हनुमानूजी तरह - तरह की चिन्ता करने लगे- ॥ २ ॥

यां कपीनां सहस्राणि सुबहून्ययुतानि च ।

दिक्षु सर्वासु मार्गन्ते सेयमासादिता मया ॥ ३ ॥

' जिन सीताजीको हजारों - लाखों वानर समस्त दिशाओं में ढूँढ़ रहे हैं, आज उन्हें मैंने पा लिया ॥ ३ ॥

चारेण तु सुयुक्तेन शत्रोः शक्तिमवेक्षता ।

गूढेन चरता तावदवेक्षितमिदं मया ॥ ४ ॥

राक्षसानां विशेषश्च पुरी चेयं निरीक्षिता ।

राक्षसाधिपतेरस्य प्रभावो रावणस्य च ॥ ५ ॥

" मैं स्वामीद्वारा नियुक्त दूत बनकर गुप्तरूपसे शत्रु की शक्तिका पता लगा रहा था । इसी सिलसिले में मैंने राक्षसोंके

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९ ४० श्रीमवाल्मीकीय रामायणे तारतम्यका, इस पुरीका तथा इस राक्षसराज रावण के प्रभावका भी निरीक्षण कर लिया ॥ ४-५ ॥

यथा तस्याप्रमेयस्य सर्वसत्त्वदयावतः ।

समाश्वासयितुं भार्या पतिदर्शनकाङ्गिणीम् ॥ ६ ॥

' श्रीसीताजी असीम प्रभावशाली तथा सब जीवोंपर दया करनेवाले भगवान् श्रीरामकी भार्या हैं । ये अपने पति -देवका दर्शन पानेकी अभिलाषा रखती हैं, अतः इन्हें सान्त्वना देना उचित है ॥ ६ ॥

अहमाश्वासयाम्येनां पूर्णचन्द्रनिभाननाम् ।

अदृष्टदुःखां दुःखस्य न ह्यन्तमधिगच्छतीम् ॥ ७ ॥

‘ इनका मुख पूर्णचन्द्रमाके समान मनोहर है । इन्होंने पहले कभी ऐसा दुःख नहीं देखा था, परंतु इस समय दुःखका पार नहीं पा रही हैं । अतः मैं इन्हें आश्वासन दूँगा ॥ ७ ॥

यदि ह्यहं सतीमेनां शोकोपहतचेतनाम् ।

अनाश्वास्य गमिष्यामि दोषवद् गमनं भवेत् ॥ ८ ॥

" ये शोकके कारण अचेत सी हो रही हैं, यदि मैं इन सती - साध्वी सीताको सान्त्वना दिये बिना ही चला जाऊँगा तो मेरा वह जाना दोषयुक्त होगा ॥ ८ ॥

गते हि मयि तत्रेयं राजपुत्री यशखिनी ।

परित्राणमपश्यन्ती जानकी जीवितं त्यजेत् ॥ ९ ॥

‘ मेरे चले जानेपर अपनी रक्षाका कोई उपाय न देख-कर ये यशस्विनी राजकुमारी जानकी अपने जीवनका अन्त कर देंगी ॥ ९ ॥

यथा च स महाबाहुः पूर्णचन्द्रनिभाननः ।

समाश्वासयितुं न्याय्यः सीतादर्शनलालसः ॥ १० ॥

' पूर्णचन्द्रमा के समान मनोहर मुखवाले महाबाहु श्री-रामचन्द्रजी भी सीताजी के दर्शन के लिये उत्सुक हैं । जिस प्रकार उन्हें सीताका संदेश सुनाकर सान्त्वना देना उचित है, उसी प्रकार सीता को भी उनका संदेश सुनाकर आश्वासन देना उचित होगा ॥ १० ॥

निशाचरीणां प्रत्यक्षमक्षमं चाभिभाषितम् ।

कथं नु खलु कर्तव्यमिदं कृच्छ्रगतो ह्यहम् ॥ ११ ॥

‘ परंतु राक्षसियोंके सामने इनसे बात करना मेरे लिये ठीक नहीं होगा । ऐसी अवस्था में यह कार्य कैसे सम्पन्न करना चाहिये, यही निश्चय करना मेरे लिये सबसे बड़ी कठिनाई है ॥ ११ ॥

अनेन रात्रिशेषेण यदि नाश्वास्यते मया ।

सर्वथा नास्ति संदेहः परित्यक्ष्यति जीवितम् ॥ १२ ॥

" यदि इस रात्रि के बीतते - बीतते मैं सीताको सान्त्वना नहीं दे देता हूँ तो ये सर्वथा अपने जीवनका परित्याग कर देंगी, इसमें संदेह नहीं है ॥ १२ ॥

रामस्तु यदि पृच्छेन्मां किं मां सीताब्रवीद्वचः ।

किमहं तं प्रतिब्रूयामसम्भाष्य सुमध्यमाम् ॥ १३ ॥

' यदि श्रीरामचन्द्रजी मुझसे पूछें कि सीताने मेरे लिये क्या संदेश भेजा है तो इन सुमध्यमा सीतासे बात किये बिना मैं उन्हें क्या उत्तर दूँगा ॥ १३ ॥

सीतासंदेशरहितं मामितस्त्वरया गतम् ।

निर्दहेदपि काकुत्स्थः क्रोधतीव्रेण चक्षुषा ॥ १४ ॥

" यदि मैं सीताका संदेश लिये बिना ही यहाँसे तुरंत लौट गया तो ककुत्स्थ कुलभूषण भगवान् श्रीराम अपनी क्रोधभरी दुःसह दृष्टिसे मुझे जलाकर भस्म कर डालेंगे । १४ ॥

यदि वोद्योजयिष्यामि भर्तारं रामकारणात् ।

व्यर्थमागमनं तस्य ससैन्यस्य भविष्यति ॥ १५ ॥

' यदि मैं इन्हें सान्त्वना दिये बिना ही लौट जाऊँ और श्रीरामचन्द्रजी के कार्यकी सिद्धिके लिये अपने स्वामी वानरराज सुग्रीवको उत्तेजित करूँ तो वानरसेना के साथ उनका यहाँतक आना व्यर्थ हो जायगा ( क्योंकि सीता इसके पहले ही अपने प्राण त्याग देंगी ) ॥ १५ ॥

अन्तरं त्वहमासाद्य राक्षसीनामवस्थितः ।

शनैराश्वासयाम्यद्य संतापबहुलामिमाम् ॥ १६ ॥

' अच्छा तो राक्षसियों के रहते हुए ही अवसर पाकर आज मैं यहीं बैठे - बैठे इन्हें धीरे - धीरे सान्त्वना दूँगा; क्योंकि इनके मनमें बड़ा संताप है ॥ १६ ॥

अहं ह्यतितनुश्चैव वानरश्च विशेषतः ।

वाचं चोदाहरिष्यामि मानुषीमिह संस्कृताम् ॥ १७ ॥

' एक तो मेरा शरीर अत्यन्त सूक्ष्म है, दूसरे मैं वानर हूँ । विशेषतः वानर होकर भी मैं यहाँ मानवोचित संस्कृत भाषामें बोलूँगा ॥ १७ ॥

यदि वाचं प्रदास्यामि द्विजातिरिव संस्कृताम् ।

रावणं मन्यमाना मां सीता भीता भविष्यति ॥ १८ ॥

' परंतु ऐसा करने में एक बाधा है, यदि मैं द्विजकी भाँति संस्कृत - वाणीका प्रयोग करूँगा तो सीता मुझे रावण समझकर भयभीत हो जायँगी ॥ १८ ॥

अवश्यमेव वक्तव्यं मानुषं वाक्यमर्थवत् ।

मया सान्त्वयितुं शक्या नान्यथेयमनिन्दिता ॥ १ ९ ॥

' ऐसी दशा में अवश्य ही मुझे उस सार्थक भाषाका प्रयोग करना चाहिये, जिसे अयोध्या के आस - पासकी साधारण जनता बोलती है, अन्यथा इन सती - साध्वी सीताको मैं उचित आश्वासन नहीं दे सकता ॥ १ ९ ॥

सेयमालोक्य मे रूपं जानकी भाषितं तथा ।

रक्षोभिस्त्रासिता पूर्व भूयस्त्रासमुपैष्यति ॥ २० ॥

' यदि मैं सामने जाऊँ तो मेरे इस वानररूपको देखकर

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सुन्दरकाण्डे त्रिंशः सर्गः ९ ४१ और मेरे मुख से मानवोचित भाषा सुनकर ये जनकनन्दिनी सीता, जिन्हें पहले से ही राक्षसोंने भयभीत कर रक्खा है, और भी डर जायँगी ॥ २० ॥

ततो जातपरित्रासा शब्दं कुर्यान्मनखिनी ।

जानाना मां विशालाक्षी रावणं कामरूपिणम् ॥ २१ ॥

' मनमें भय उत्पन्न हो जानेपर ये विशाललोचना मनस्विनी सीता मुझे इच्छानुसार रूप धारण करनेवाला रावण समझकर जोर - जोर से चीखने - चिल्लाने लगेंगी ॥ २१ ॥

सीतया च कृते शब्दे सहसा राक्षसीगणः ।

नानाप्रहरणो घोरः समेयादन्तकोपमः ॥ २२ ॥

" सीता के चिल्लाने पर ये यमराजके समान भयानक राक्षसियाँ तरह - तरहके हथियार लेकर सहसा आ धमकेंगी ॥

ततो मां सम्परिक्षिप्य सर्वतो विकृताननाः ।

विधे च ग्रहणे चैव कुर्युर्यत्नं महाबलाः ॥ २३ ॥

‘ तदनन्तर ये विकट मुखवाली महाबलवती राक्षसियाँ मुझे सब ओरसे घेरकर मारने या पकड़ लेनेका प्रयत्न करेंगी ॥ २३ ॥

तं मां शाखाः प्रशाखाश्च स्कन्धांश्चोत्तमशाखिनाम् । दृष्ट्ा च परिधावन्तं ' फिर मुझे बड़े - बड़े मोटी डालियों पर दौड़ता उठेंगी ॥ २४ ॥

मम रूपं च सम्प्रेक्ष्य राक्षस्यो भयवित्रस्ता ' वनमें विचरते हुए राक्षसियाँ भी भयभीत हो ततः कुर्युः समाह्नानं राक्षसेन्द्र नियुक्तानां भवेयुः परिशङ्किताः ॥ २४ ॥

वृक्षोंकी शाखा प्रशाखा और मोटी-देख ये सब की सब सशङ्क हो

वने विचरतो महत् ।

भवेयुर्विकृतस्वराः ॥ २५ ॥

मेरे इस विशाल रूपको देखकर बुरी तरहसे चिल्लाने लगेंगी ॥ २५ ॥

राक्षस्यो रक्षसामपि ।

राक्षसेन्द्रनिवेशने ॥ २६ ॥

‘ इसके बाद वे निशाचरियाँ राक्षसराज रावणके महलमें उसके द्वारा नियुक्त किये गये राक्षसों को बुला लेंगी ॥ २६ ॥

ते शूलशरनिस्त्रिंश विविधायुधपाणयः ।

आपतेयुर्विमर्देऽस्मिन् वेगेनोद्वेगकारणात् ॥ २७ ॥

' इस हलचल में वे राक्षस भी उद्विग्न होकर शूल, बाण, तलवार और तरह - तरह के शस्त्रास्त्र लेकर बड़े वेगसे आ घमकेंगे ॥ २७ ॥

संरुद्धस्तैस्तु परितो विधमे राक्षसं बलम् ।

शक्नुयां न तु सम्प्राप्तुं परं पारं महोदधेः ॥ २८ ॥

' उनके द्वारा सब ओरसे घिर जानेपर मैं राक्षसों की सेनाका संहार तो कर सकता हूँ; परंतु समुद्रके उस पार नहीं पहुँच सकता ॥ २८ ॥

मां वा गृह्णीयुरावृत्य बहवः शीघ्रकारिणः ।

स्यादियं चागृहीतार्था मम च ग्रहणं भवेत् ॥ २ ९ ॥

' यदि बहुत - से फुर्तीले राक्षस मुझे घेरकर पकड़ लें तो सीताजीका मनोरथ भी पूरा नहीं होगा और मैं भी बंदी बना लिया जाऊँगा ॥ २ ९ ॥

हिंसाभिरुचयो हिंस्युरिमां वा जनकात्मजाम् ।

विपन्नं स्यात् ततः कार्य रामसुग्रीवयोरिदम् ॥ ३० ॥

" इसके सिवा हिंसा में रुचि रखनेवाले राक्षस यदि इन जनकदुलारीको मार डालें तो श्रीरघुनाथजी और सुग्रीवका यह सीताकी प्राप्तिरूप अभीष्ट कार्य ही नष्ट हो जायगा ॥ ३० ॥

उद्देशे नष्टमार्गेऽस्मिन् राक्षसैः परिवारिते ।

सागरेण परिक्षिप्ते गुप्ते वसति जानकी ॥ ३१ ॥

" यह स्थान राक्षसोंसे घिरा हुआ है । यहाँ आनेका मार्ग दूसरोंका देखा या जाना हुआ नहीं है तथा इस प्रदेशको समुद्रने चारों ओर से घेर रक्खा है । ऐसे गुप्त स्थान में जानकीजी निवास करती हैं ॥ ३१ ॥

विशस्ते वा गृहीते वा रक्षोभिर्मयि संयुगे ।

नाशं पश्यामि रामस्य सहायं कार्यसाधने ॥ ३२ ॥

" यदि राक्षसोंने मुझे संग्राममें मार दिया या पकड़ लिया तो फिर श्रीरघुनाथजीके कार्यको पूर्ण करनेके लिये कोई दूसरा सहायक भी मैं नहीं देख रहा हूँ ॥ ३२ ॥

विमृशंश्च न पश्यामि यो इते मयि वानरः ।

शतयोजनविस्तीर्ण लङ्घयेत महोदधिम् ॥ ३३ ॥

' बहुत विचार करनेपर भी मुझे ऐसा कोई वानर नहीं दिखायी देता है, जो मेरे मारे जानेपर सौ योजन विस्तृत महासागरको लाँघ सके ॥ ३३ ॥

कामं हन्तुं समर्थोऽस्मि सहस्राण्यपि रक्षसाम् ।

न तु शक्ष्याम्यहं प्राप्तुं परं पारं महोदधेः ॥ ३४ ॥

मैं इच्छानुसार सहस्रों राक्षसों को मार डालने में समर्थ हूँ; परंतु युद्धमें फँस जानेपर महासागरके उस पार नहीं जा सकूँगा ॥ ३४ ॥

असत्यानि च युद्धानि संशयो मे न रोचते ।

कश्च निःसंशयं कार्य कुर्यात् प्राज्ञः ससंशयम् ॥ ३५ ॥

' युद्ध अनिश्चयात्मक होता है ( उसमें किस पक्षकी विजय होगी, यह निश्चित नहीं रहता ) और मुझे संशययुक्त कार्य प्रिय नहीं है । कौन ऐसा बुद्धिमान् होगा, जो संशयरहित कार्यको संशययुक्त बनाना चाहेगा ॥ ३५ ॥

एष दोषो महान् हि स्यान्मम सीताभिभाषणे ।

प्राणत्यागश्च वैदेह्या भवेदनभिभाषणे ॥ ३६ ॥

" सीताजी से बातचीत करने में मुझे यही महान् दोष प्रतीत होता है और यदि बातचीत नहीं करता हूँ तो विदेहनन्दिनी सीताका प्राणत्याग भी निश्चित ही है । ३६ ॥

भूताश्चार्था विरुध्यन्ति देशकालविरोधिताः ।

विक्लवं दूतमासाद्य तमः सूर्योदये यथा ॥ ३७ ॥

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९ ४२ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे ' अविवेकी या असावधान दूतके हाथमें पड़नेपर बने -बनाये काम भी देश कालके विरोधी होकर उसी प्रकार असफल हो जाते हैं, जैसे सूर्यका उदय होनेपर सब ओर फैले हुए अन्धकारका कोई वश नहीं चलता, वह निष्फल हो जाता है ॥ ३७ ॥

अर्थानर्थान्तरे बुद्धिर्निश्वितापि न शोभते ।

घातयन्ति हि कार्याणि दूताः पण्डितमानिनः ॥ ३८ ॥

" कर्तव्य और अकर्त्तव्यके विषय में स्वामीकी निश्चित बुद्धि भी अविवेकी दूतके कारण शोभा नहीं पाती है; क्योंकि अपनेको बड़ा बुद्धिमान् या पण्डित समझनेवाले दूत अपनी ही नासमझी से कार्यको नष्ट कर डालते हैं ॥ ३८ ॥

नविनश्येत् कथं कार्य वैक्लव्यं न कथं मम ।

लङ्घनं च समुद्रस्य कथं नु न वृथा भवेत् ॥ ३ ९ ॥

कथं नु खलु वाक्यं मे शृणुयान्नोद्विजेत च ।

इति संचिन्त्य हनुमांश्चकार मतिमान् मतिम् ॥ ४० ॥

" फिर किस प्रकार यह काम न बिगड़े, किस तरह मुझसे कोई असावधानी न हो, किस प्रकार मेरा समुद्र लाँघना व्यर्थ न हो जाय और किस तरह सीताजी मेरी सारी बातें सुन लें, किंतु घबराहट में न पड़ें -इन सब बातोंपर विचार करके बुद्धिमान् हनुमानजीने यह निश्चय किया ॥ ३ ९ -४० ॥

राममक्लिष्टकर्माणं सुबन्धुमनुकीर्तयन् ।

नैनामुद्वेजयिष्यामि तद्वन्धुगतचेतनाम् ॥ ४१ ॥

" जिनका चित्त अपने जीवन - बन्धु श्रीराममें ही लगा है, उन सीताजीको मैं उनके प्रियतम श्रीरामका जो अनायास ही महान् कर्म करनेवाले हैं, गुण गा - गाकर सुनाऊँगा और उन्हें उद्विग्न नहीं होने दूँगा ॥ ४१ ॥

इक्ष्वाकूणां वरिष्ठस्य रामस्य विदितात्मनः ।

शुभानि धर्मयुक्तानि वचनानि समर्पयन् ॥ ४२ ॥

' मैं इक्ष्वाकु कुलभूषण विदितात्मा भगवान् श्रीरामके सुन्दर, धर्मानुकूल वचनोंको सुनाता हुआ यहीं बैठा रहूँगा ॥

श्रावयिष्यामि सर्वाणि मधुरां प्रब्रुवन् गिरम् ।

श्रद्धास्यति यथा सीता तथा सर्व समादधे ॥ ४३ ॥

' मीठी वाणी बोलकर श्रीरामके सारे संदेशोंको इस प्रकार सुनाऊँगा, जिससे सीताका उन वचनोंपर विश्वास हो । जिस तरह उनके मनका संदेह दूर हो, उसी तरह मैं सब बातोंका समाधान करूँगा ' ॥ ४३ ॥

इति स बहुविधं महाप्रभावो जगतिपतेः प्रमदामवेक्षमाणः । मधुरमवितथं जगाद वाक्यं द्रुमविटपान्तरमास्थितो हनूमान् ॥ ४४ ॥

इस प्रकार भाँति - भाँति से विचार करके अशोक वृक्ष की शाखाओंमें छिपकर बैठे हुए महाप्रभावशाली हनुमानजी पृथ्वीपति श्रीरामचन्द्रजीकी भार्याकी ओर देखते हुए मधुर एवं यथार्थ बात कहने लगे ॥ ४४ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये सुन्दरकाण्डे त्रिंशः सर्गः ॥ ३० ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आरामायण आदिकाव्यके सुन्दरकाण्ड में तीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ३० ॥

एकत्रिंशः सर्गः हनुमान्जीका सीताको सुनानेके

एवं बहुविधां चिन्तां चिन्तयित्वा महामतिः ।

संभवे मधुरं वाक्यं वैदेह्या व्याजहार ह ॥ १ ॥

इस प्रकार बहुत - सी बातें सोच - विचारकर महामति हनुमानजीने सीताको सुनाते हुए मधुर वाणीमें इस तरह कहना आरम्भ किया ॥ १ ॥

राजा दशरथो नाम रथकुञ्जरवाजिमान् ।

पुण्यशीलो महाकीर्तिरिक्ष्वाकूणां महायशाः ॥ २ ॥

' इक्ष्वाकुवंशमें राजा दशरथ नामसे प्रसिद्ध एक पुण्यात्मा राजा हो गये हैं । वे अत्यन्त कीर्तिमान् और महान् यशस्वी थे । उनके यहाँ रथ, हाथी और घोड़े बहुत अधिक थे ॥ २ ॥

राजर्षीणां गुणश्रेष्ठस्तपसा चर्षिभिः समः ।

चक्रवर्तिकुले जातः पुरंदरसमो बले ॥ ३ ॥

लिये श्रीराम कथाका वर्णन करना ' उन श्रेष्ठ नरेश में राजर्षियोंके समान गुण थे । तपस्या में भी वे ऋषियों की समानता करते थे । उनका जन्म चक्रवर्ती नरेशोंके कुलमें हुआ था । वे देवराज इन्द्रके समान बलवान् थे ॥ ३ ॥

अहिंसारतिरक्षुद्रो घृणी सत्यपराक्रमः ।

मुख्यस्येक्ष्वाकुवंशस्य लक्ष्मीवाँलक्ष्मिवर्धनः ॥ ४ ॥

पार्थिवव्यञ्जनैर्युक्तः पृथुश्रीः पार्थिवर्षभः ।

पृथिव्यां चतुरन्तायां विश्रुतः सुखदः सुखी ॥ ५ ॥

' उनके मन में अहिंसा धर्मके प्रति बड़ा अनुराग था । उनमें क्षुद्रताका नाम नहीं था । वे दयालु, सत्य - पराक्रमी और श्रेष्ठ इक्ष्वाकुवंशकी शोभा बढ़ानेवाले थे । वे लक्ष्मीवान् नरेश राजोचित लक्षणोंसे युक्त, परिपुष्ट शोभासे सम्पन्न और भूपालोंमें श्रेष्ठ थे । चारों समुद्र जिसकी सीमा हैं, उस सम्पूर्ण

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सुन्दरकाण्डे एकत्रिंशः सर्गः भूमण्डलमें सब ओर उनकी बड़ी ख्याति थी । वे स्वयं तो सुखी थे ही । दूसरोंको भी सुख देनेवाले थे । ४-५ ॥

तस्य पुत्रः प्रियो ज्येष्ठस्ताराधिपनिभाननः ।

रामो नाम विशेषज्ञः श्रेष्ठः सर्वधनुष्मताम् ॥ ६ ॥

' उनके ज्येष्ठ पुत्र श्रीराम - नामसे प्रसिद्ध हैं । वे पिता के लाड़ले, चन्द्रमाके समान मनोहर मुखवाले, सम्पूर्ण धनु-र्घारियोंमें श्रेष्ठ और शस्त्र - विद्या के विशेषज्ञ हैं ॥ ६ ॥

रक्षिता स्वस्य वृत्तस्य स्वजनस्यापि रक्षिता ।

रक्षिता जीवलोकस्य धर्मस्य च परंतपः ॥ ७ ॥

' शत्रुओंको संताप देनेवाले श्रीराम अपने सदाचारके, स्वजनोंके, इस जीव जगत् के तथा धर्मके भी रक्षक हैं ॥ ७ ॥

तस्य सत्याभिसंधस्य वृद्धस्य वचनात् पितुः ।

सभार्यः सह व भ्रात्रा वीरः प्रवजितो वनम् ॥ ८ ॥

' उनके बूढ़े पिता महाराज दशरथ बड़े सत्यप्रतिज्ञ थे । उनकी आज्ञा से वीर श्रीरघुनाथजी अपनी पत्नी और भाई लक्ष्मणके साथ वनमें चले आये ॥ ८ ॥

तेन तत्र महारण्ये मृगयां परिधावता ।

राक्षसा निहताः शूरा बहवः कामरूपिणः ॥ ९ ॥

" वहाँ विशाल वनमें शिकार खेलते हुए श्रीरामने इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले बहुत - से शूरवीर राक्षसोंका वध कर डाला ॥ ९ ॥

जनस्थानवधं श्रुत्वा निहतौ खरदूषणौ ।

ततस्त्वमर्षापहृता जानकी रावणेन तु ॥ १० ॥

' उनके द्वारा जनस्थानके विध्वंस और खरदूषण के वधका समाचार सुनकर रावणने अमर्षवश जनकनन्दिनी सीताका अपहरण कर लिया ॥ १० ॥

वञ्चयित्वा वने रामं मृगरूपेण मायया ।

स मार्गमाणस्तां देवीं रामः सीतामनिन्दिताम् ॥ ११ ॥

आससाद वने मित्रं सुग्रीवं नाम वानरम् । ' पहले तो उस राक्षसने मायासे मृग बने हुए मारीचके द्वारा वनमें श्रीरामचन्द्रजीको धोखा दिया और स्वयं जानकी-जीको हर ले गया । भगवान् श्रीराम परम साध्वी सीतादेवीकी खोज करते हुए मतंग- वनमें आकर सुग्रीव नामक वानरसे मिले और उनके साथ उन्होंने मैत्री स्थापित कर ली ॥११३ ॥

ततः स वालिनं हत्वा रामः परपुरंजयः ॥ १२ ॥

आयच्छत् कपिराज्यं तु सुग्रीवाय महात्मने । ' तदनन्तर शत्रु - नगरीपर विजय पानेवाले श्रीरामने वाली का वध करके वानरोंका राज्य महात्मा सुग्रीवको दे दिया ॥ सुग्रीवेणाभिसंदिष्टा हरयः कामरूपिणः ॥ १३ ॥

दिक्षु सर्वासु तां देवीं विचिन्वन्तः सहस्रशः । ' तत्पश्चात् वानरराज सुग्रीवकी आज्ञासे इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले हजारों वानर सीता देवीका पता लगाने के लिये सम्पूर्ण दिशाओंमें निकले हैं ॥ १३३ ॥

अहं सम्पातिवचनाच्छतयोजनमायतम् ॥ १४ ॥

तस्या हेतोर्विशालाक्ष्याः समुद्रं वेगवान् प्लुतः । " उन्हीं में से एक मैं भी हूँ । मैं सम्पातिके कहने से विशाल-लोचना विदेहनन्दिनी की खोजके लिये सौ योजन विस्तृत समुद्रको वेगपूर्वक लाँघकर यहाँ आया हूँ ॥ १४३ ॥

यथारूपां यथावर्णा यथालक्ष्मवतीं च ताम् ॥ १५ ॥

अश्रौषं राघवस्याहं सेयमासादिता मया ।

विररामैवमुक्त्वा स वाचं वानरपुङ्गवः ॥ १६ ॥

" मैंने श्रीरघुनाथजी के मुखसे जानकीजीका जैसा रूप, जैसा रंग तथा जैसे लक्षण सुनेथे, उनके अनुरूप ही इन्हें पाया है । ' इतना ही कहकर वानर शिरोमणि हनुमानजी चुप हो गये ॥ १५-१६ ॥ जानकी चापि तच्छ्रुत्वा विस्मयं परमं गता ।

ततः सा वक्रकेशान्ता सुकेशी केशसंवृतम् ।

उन्नम्य वदनं भीरुः शिशपामन्ववैक्षत ॥ १७ ॥

उनकी बातें सुनकर जनकनन्दिनी सीताको बड़ा विस्मय हुआ । उनके केश घुँघराले और बड़े ही सुन्दर थे । भीरु सीताने केशोंसे ढके हुए अपने मुँहको ऊपर उठाकर उस अशोक वृक्षकी ओर देखा ॥ १७ ॥

निशम्य सीता वचनं कपेश्च दिशश्च सर्वाः प्रदिशश्च वीक्ष्य । स्वयं प्रहर्ष परमं जगाम सर्वात्मना राममनुस्मरन्ती ॥ १८ ॥

कपिके वचन सुनकर सीताको बड़ी प्रसन्नता हुई । वे सम्पूर्ण वृत्तियोंसे भगवान् श्रीरामका स्मरण करती हुई समस्त दिशाओं में दृष्टि दौड़ाने लगीं ॥ १८ ॥

सा तिर्यगूर्ध्व च तथा ह्यधस्ता-निरीक्षमाणा तमचिन्त्यबुद्धिम् । ददर्श पिङ्गाधिपतेरमात्यं वातात्मजं सूर्यमिवोदयस्थम् ॥ १ ९ ॥ उन्होंने ऊपर - नीचे तथा इधर - उधर दृष्टिपात करके उन अचिन्त्य बुद्धिवाले पवनपुत्र हनुमान्को, जो वानरराज सुग्रीवके मन्त्री थे, उदयाचलपर विराजमान सूर्यके समान देखा ॥ १ ९ ॥ इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये सुन्दरकाण्डे एकत्रिंशः सर्गः ॥ ३१ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आरामायण आदिकाव्यके सुन्दरकाण्डमें इकतीसवाँ सगँ पूरा हुआ ॥ ३१ ॥

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९ ४४ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे द्वात्रिंशः सर्गः सीताजीका तर्क - वितर्क बुद्धिमानों में श्रेष्ठ, वानरप्रवर पवनपुत्र हनुमान् जीको

ततः शाखान्तरे लीनं दृष्ट्वा चलितमानसा ।

वेष्टितार्जुनवस्त्रं तं विद्युत्संघातपिङ्गलम् ॥ १ ॥ देखा ॥ ७ ॥

सा ददर्श कपिं तत्र प्रथितं प्रियवादिनम् ।

फुल्लाशोकोत्कराभासं तप्तचामीकरेक्षणम् ॥ २ ॥

तब शाखाके भीतर छिपे हुए, विद्युत्पुञ्जके समान अत्यन्त पिङ्गल वर्णवाले और श्वेत वस्त्रधारी हनुमानजी पर उनकी दृष्टि पड़ी । फिर तो उनका चित्त चञ्चल हो उठा । उन्होंने देखा, फूले हुए अशोकके समान अरुण कान्तिसे प्रकाशित एक विनीत और प्रियवादी वानर डालियोंके बीचमें बैठा है । उसके नेत्र तपाये हुए सुवर्णके समान चमक रहे हैं ॥ १-२ ॥

साथ दृष्ट्वा हरिश्रेष्ठं विनीतवदवस्थितम् ।

मैथिली चिन्तयामास विस्मयं परमं गता ॥ ३ ॥

विनीतभावसे बैठे हुए वानरश्रेष्ठ हनुमानजीको देखकर मिथिलेश कुमारीको बड़ा आश्चर्य हुआ । वे मन - ही - मन सोचने लगीं ॥ ३ ॥

अहो भीममिदं सत्त्वं वानरस्य दुरासदम् ।

दुर्निरीक्ष्यमिदं मत्वा पुनरेव मुमोह सा ॥ ४ ॥

' अहो! वानरयोनिका यह जीव तो बड़ा ही भयंकर है । इसे पकड़ना बहुत ही कठिन है । इसकी ओर तो आँख उठाकर देखनेका भी साहस नहीं होता । ऐसा विचारकर वे पुनः भयसे मूच्छित सी हो गयीं ॥ ४ ॥

विललाप भृशं सीता करुणं भयमोहिता ।

रामरामेति दुःखार्ता लक्ष्मणेति च भामिनी ॥ ५ ॥

भयसे मोहित हुई भामिनी सीता अत्यन्त करुणाजनक स्वरमें ' हा राम! हा राम! हा लक्ष्मण | ऐसा कहकर दुःखसे आतुर हो अत्यन्त विलाप करने लगीं ॥ ५ ॥

रुरोद सहसा सीता मन्दमन्दखरा सती ।

साथ दृष्ट्वा हरिवरं विनीतवदुपागतम् ।

मैथिली चिन्तयामास स्वप्नोऽयमिति भामिनी ॥ ६ ॥

उस समय सीता मन्द स्वरमें सहसा रो पड़ीं । इतनेही में उन्होंने देखा, वह श्रेष्ठ वानर बड़ी विनयके साथ निकट आ बैठा है । तब भामिनी मिथिलेशकुमारीने सोचा – ' यह कोई स्वप्न तो नहीं है ' ॥ ६ ॥

सा वीक्षमाणा पृथुभुग्नवक्त्रं शाखामृगेन्द्रस्य यथोक्तकारम् । ददर्श पिङ्गप्रवरं महार्ह वातात्मजं बुद्धिमतां वरिष्ठम् ॥ ७ ॥

सा तं समीक्ष्यैव भृशं विपन्ना गतासुकल्पेव बभूव सीता । चिरेण संज्ञां प्रतिलभ्य चैवं विचिन्तयामास विशालनेत्रा ॥ ८ ॥

उन्हें देखते ही सीताजी अत्यन्त व्यथित होकर ऐसी दशाको पहुँच गयीं, मानो उनके प्राण निकल गये हो । फिर बड़ी देर में चेत होनेपर विशाललोचना विदेह-राजकुमारीने इस प्रकार विचार किया ॥ ८ ॥

स्वप्नो मयायं विकृतोऽद्य दृष्टः शाखामृगः शास्त्रगणैर्निषिद्धः । स्वस्त्यस्तु रामाय सलक्ष्मणाय तथा पितुर्मे जनकस्य राज्ञः ॥ ९ ॥

' आज मैंने यह बड़ा बुरा स्वप्न देखा है | सपने में वानरको देखना शास्त्रोंने निषिद्ध बताया है । मेरी भगवान् से प्रार्थना है कि श्रीराम, लक्ष्मण और मेरे पिता जनकका मङ्गल हो ( उनपर इस दुःस्वप्न का प्रभाव न पड़े ) ॥ ९ ॥

स्वप्नो हि नायं नहि मेऽस्ति निद्रा शोकेन दुःखेन च पीडितायाः । सुखं हि मे नास्ति यतो विहीना तेन्दु पूर्ण प्रतिमाननेन ॥ १० ॥

' परंतु यह स्वप्न तो हो नहीं सकता; क्योंकि शोक और दुःखसे पीड़ित रहने के कारण मुझे कभी नींद आती ही नहीं है ( नींद उसे आती है, जिसे सुख हो ) । मुझे तो उन पूर्णचन्द्रके समान मुखवाले श्रीरघुनाथजीसे बिछुड़ जाने के कारण अब सुख सुलभ ही नहीं है ॥ १० ॥

रामेति रामेति सदैव बुद्धया

विचिन्त्य वाचा ब्रुवती तमेव ।

तस्यानुरूपं च कथां तदर्था-मेवं प्रपश्यामि तथा शृणोमि ॥ ११ ॥

' मैं बुद्धिसे सर्वदा ' राम! राम! ऐसा चिन्तन करके वाणीद्वारा भी राम नामका ही उच्चारण करती रहती हूँ; अतः उस विचार के अनुरूप वैसे ही अर्थवाली यह कथा देख और सुन रही हूँ ॥ ११ ॥

अहं हि तस्याद्य मनोभवेन सम्पीडिता तद्गतसर्वभावा । विचिन्तयन्ती सततं तमेव तथैव पश्यामि तथा शृणोमि ॥ १२ ॥

उधर दृष्टिपात करते हुए उन्होंने वानरराज सुग्रीव के विशाल और टेढ़े मुखवाले, परम आदरणीय, ' मेरा हृदय सर्वदा श्रीरघुनाथमें ही लगा हुआ है; आज्ञापालक

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