Ramayana 2 — पृष्ठ 91–100
वाल्मीकि रामायण — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 91–100
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९ १६ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे ' देवि! इस विषय में तुम्हें भय नहीं करना चाहिये ।
प्रिये! मुझपर विश्वास करो और यथार्थ रूपसे प्रेमदान दो ।
इस तरह शोकसे व्याकुल न हो जाओ ॥ ७ ॥
एकवेणी अधःशय्या ध्यानं मलिनमम्बरम् ।
अस्थानेऽप्युपवासश्च नैतान्यौपयिकानि ते ॥ ८ ॥
' एक वेणी धारण करना, नीचे पृथ्वीपर सोना, चिन्ता मग्न रहना, मैले वस्त्र पहनना और बिना अवसर के उपवास करना - ये सब बातें तुम्हारे योग्य नहीं हैं ॥ ८ ॥
विचित्राणि च माल्यानि चन्दनान्यगुरूणि च ।
विविधानि च वासांसि दिव्यान्याभरणानि च ॥ ९ ॥
महाणि च पानानि शयनान्यासनानि च ।
गीतं नृत्यं च वाद्यं च लभ मां प्राप्य मैथिलि ॥ १० ॥
' मिथिलेशकुमारी! मुझे पाकर तुम विचित्र पुष्प माला, चन्दन, अगुरु, नाना प्रकार के वस्त्र, दिव्य आभूषण, बहु-मूल्य पेय, शय्या, आसन, नाच, गान और वाद्यका सुख भोगो ॥ ९ -१० ॥
स्त्रीरत्नमसि मैवं भूः कुरु गात्रेषु भूषणम् ।
मां प्राप्य हि कथं वा स्यास्त्वमन सुविग्रहे ॥ ११ ॥
' तुम स्त्रियोंमें रत्न हो । इस तरह मलिन वेषमें न रहो । अपने अङ्गोंमें आभूषण धारण करो । सुन्दरि! मुझे पाकर भी तुम भूषण आदिसे असम्मानित कैसे रहोगी १ ॥ ११ ॥
इदं ते चारु संजातं यौवनं ह्यतिवर्तते ।
यदतीतं पुनर्नैति स्रोतः स्नोतस्विनामिव ॥ १२ ॥
" यह तुम्हारा नवोदित सुन्दर यौवन बीता जा रहा है । जो बीत जाता है, वह नदियोंके प्रवाहकी भाँति फिर लौटकर नहीं आता ॥ १२ ॥
त्वां कृत्वोपरतो मन्ये रूपकर्ता स विश्वकृत् ।
नहि रूपोपमा ह्यन्या तवास्ति शुभदर्शने ॥ १३ ॥
" शुभदर्शने । तो ऐसा समझता हूँ कि रूपकी रचना करनेवाला लोकस्रष्टा विधाता तुम्हें बनाकर फिर उस कार्यसे विरत हो गया; क्योंकि तुम्हारे रूपकी समता करनेवाली दूसरी कोई स्त्री नहीं है ॥ १३ ॥
त्वां समासाद्य वैदेहि रूपयौवनशालिनीम् ।
कः पुनर्नातिवर्तेत साक्षादपि पितामहः ॥ १४ ॥
' विदेहनन्दिनि! रूप और यौवनसे सुशोभित होनेवाली तुमको पाकर कौन ऐसा पुरुष है, जो धैर्यसे विचलित न • होगा । भले ही वह साक्षात् ब्रह्मा क्यों न हो ॥ १४ ॥
यद् यत् पश्यामि ते मात्रं शीतांशुसदृशानने ।
तस्मिंस्तस्मिन् पृथुश्रोणि चक्षुर्मम निबध्यते ॥ १५ ॥
' चन्द्रमा के समान मुखवाली सुमध्यमे । मैं तुम्हारे जिस-जिस अङ्गको देखता हूँ, उसी उसीमें मेरे नेत्र उलझ जाते हैं ।
भव मैथिलि भार्या मे मोहमेतं विसर्जय ।
बहीनामुत्तमस्त्रीणां ममाश्रमहिषी भव ॥ १६ ॥
' मिथिलेशकुमारी! तुम मेरी भार्या बन जाओ । पातिव्रत्य के इस मोहको छोड़ो । मेरे यहाँ बहुत - सी सुन्दरी रानियाँ हैं । तुम उन सबमें श्रेष्ठ पटरानी बनो ॥ १६ ॥
लोकेभ्यो यानि रत्नानि सम्प्रमथ्याहृतानि मे ।
तानि ते भीरु सर्वाणि राज्यं चैव ददामि ते ॥ १७ ॥
" भीरु! मैं अनेक लोकोंसे उन्हें मथकर जो - जो रत्न लाया हूँ, वे सब तुम्हारे ही होंगे और यह राज्य भी मैं तुम्हीं को समर्पित कर दूँगा ॥ १७ ॥
विजित्य पृथिवीं सर्वा नानानगरमालिनीम् ।
जनकाय प्रदास्यामि तव हेतोर्विलासिनि ॥ १८ ॥
' विलासिनि! तुम्हारी प्रसन्नता के लिये मैं विभिन्न नगरोंकी मालाओंसे अलंकृत इस सारी पृथ्वीको जीतकर राजा जनकके हाथमें सौंप दूँगा ॥ १८ ॥
नेह पश्यामि लोकेऽन्यं यो मे प्रतिबलो भवेत् ।
पश्य सुमहद्वीर्यमप्रतिद्वन्द्वमाहवे ॥ १ ९ ॥
' इस संसार में मैं किसी दूसरे ऐसे पुरुष को नहीं देखता, जो मेरा सामना कर सके । तुम युद्धमें मेरा वह महान् पराक्रम देखना, जिसके सामने कोई प्रतिद्वन्द्वी टिक नहीं पाता ॥
असकृत् संयुगे भग्ना मया विमृदितध्वजाः ।
अशक्ताः प्रत्यनीकेषु स्थातुं मम सुरासुराः ॥ २० ॥
' मैंने युद्धस्थलमें जिनकी ध्वजाएँ तोड़ डाली थीं, वे देवता और असुर मेरे सामने ठहरनेमें असमर्थ होनेके कारण कई बार पीठ दिखा चुके हैं ॥ २० ॥
इच्छ मां क्रियतामद्य प्रतिकर्म तवोत्तमम् ।
सुप्रभाण्यवसज्जन्तां तवाङ्गे भूषणानि हि ॥ २१ ॥
' तुम मुझे स्वीकार करो । भाव तुम्हारा उत्तम शृङ्गार किया जाय और तुम्हारे अङ्गोंमें चमकीले आभूषण पहनाये जायँ ॥ २१ ॥
साधु पश्यामि ते रूपं सुयुक्तं प्रतिकर्मणा ।
प्रतिकर्माभिसंयुक्ता दाक्षिण्येन वरानने ॥ २२ ॥
' सुमुखि! आज मैं शृङ्गारसे सुसजित हुए तुम्हारे सुन्दर रूपको देख रहा हूँ । तुम उदारतावश मुझपर कृपा करके शृङ्गारसे सम्पन्न हो जाओ ॥ २२ ॥
भुङ्क्ष्व भोगान् यथाकामं पिब भीरु रमख च ।
यथेष्टं च प्रयच्छ त्वं पृथिवीं वा धनानि च ॥ २३ ॥
" भीरु! फिर इच्छानुसार भाँति - भाँति के भोग भोगो, दिव्य * यहाँ भविष्यका वर्तमानकी भाँति वर्णन होने से ' भाविक ' अलंकार समझना चाहिये ।
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सुन्दरकाण्डे विंशः सर्गः ९ १७ रसका पान करो, विहरो तथा पृथ्वी या घनका यथेष्टरूपसे दान करो ॥ २३ ॥
ललख मयि विस्रब्धा धृष्टमाज्ञापयख च ।
मत्प्रासादाल्ललन्त्याश्च ललतां बान्धवस्तव ॥ २४ ॥
' तुम मुझपर विश्वास करके भोग भोगनेकी इच्छा करो और निर्भय होकर मुझे अपनी सेवाके लिये आज्ञा दो । मुझपर कृपा करके इच्छानुसार भोग भोगती हुई तुम - जैसी पटरानीके भाई - बन्धु भी मनमाने भोग भोग सकते हैं ॥ २४ ॥
ऋद्धिं ममानुपश्य त्वं श्रियं भद्रे यशखिनि ।
किं करिष्यसि रामेण सुभगे चीरवासिना ॥ २५ ॥
' भद्रे! यशस्विनि! तुम मेरी समृद्धि और धन - सम्पत्ति-की ओर तो देखो । सुभगे! चीर - वस्त्र धारण करनेवाले रामको लेकर क्या करोगी १ ॥ २५ ॥
निक्षिप्तविजयो रामो गतश्रीर्वनगोचरः ।
व्रती स्थण्डिलशायी च शङ्के जीवति वा न वा ॥ २६ ॥
' रामने विजयकी आशा त्याग दी है । वे श्रीहीन होकर वन - वनमें विचर रहे हैं, व्रतका पालन करते हैं और मिट्टी की वेदीपर सोते हैं । अब तो मुझे यह भी संदेह होने लगा है कि वे जीवित भी हैं या नहीं ॥ २६ ॥
नहि वैदेहि रामस्त्वां द्रष्टुं वाप्युपलभ्यते ।
पुरोबला कैरसितै में ज्योत्स्नामिवावृताम् ॥ २७ ॥
' विदेहनन्दिनि! जिनके आगे बगुलोंकी पंक्तियाँ चलती हैं, उन काले बादलोंसे छिपी हुई चन्द्रिका के समान तुमको अब राम पाना तो दूर रहा, देख भी नहीं सकते हैं ॥ २७ ॥
न चापि मम हस्तात् त्वां प्राप्तुमर्हति राघवः ।
हिरण्यकशिपुः कीर्तिमिन्द्रहस्तगतामिव ॥ २८ ॥
' जैसे हिरण्यकशिपु इन्द्रके हाथमें गयी हुई कीर्तिको न पा सका, उसी प्रकार राम भी मेरे हाथसे तुम्हें नहीं पा सकते ॥
चारुस्मिते चारुदति चारुनेत्रे विलासिनि ।
मनो हरसि मे भीरु सुपर्णः पन्नगं यथा ॥ २ ९ ॥
' मनोहर मुस्कान, सुन्दर दन्तावलि तथा रमणीय नेत्रोंवाली विलासिनि! भीरु! जैसे गरुड़ सर्पको उठा ले जाते हैं, उसी प्रकार तुम मेरे मनको हर लेती हो ॥ २ ९ ॥
क्लिष्टकौशेयवसनां तन्वीमप्यनलंकृताम् ।
त्वां दृष्ट्रा स्वेषु दारेषु रतिं नोपलभाम्यहम् ॥ ३० ॥
' तुम्हारा रेशमी पीताम्बर मैला हो गया है । तुम बहुत दुबली - पतली हो गयी हो और तुम्हारे अङ्गोंमें आभूषण भी नहीं हैं तो भी तुम्हें देखकर अपनी दूसरी स्त्रियोंमें मेरा मन नहीं लगता ॥ ३० ॥
अन्तःपुरनिवासिन्यः स्त्रियः सर्वगुणान्विताः ।
यावत्यो मम सर्वासामैश्वर्ये कुरु जानकि ॥ ३१ ॥
' जनकनन्दिनि । मेरे अन्तःपुर में निवास करने वाली जितनी भी सर्वगुण सम्पन्न रानियाँ हैं, उन सबकी तुम स्वामिनी बन जाओ ॥ ३१ ॥
मम ह्यसितकेशान्ते त्रैलोक्यप्रवरस्त्रियः ।
तास्त्वां परिचरिष्यन्ति श्रियमप्सरसो यथा ॥ ३२ ॥
' काले केशोंवाली सुन्दरी! जैसे अप्सराएँ लक्ष्मीकी सेवा करती हैं, उसी प्रकार त्रिभुवनकी श्रेष्ठ सुन्दरियाँ यहाँ तुम्हारी परिचर्या करेंगी ॥ ३२ ॥
यानि वैभवणे सुभ्र रत्नानि च धनानि च । तानि लोकांश्च सुश्रोणि मया भुङ्क्ष्व यथासुखम् ।३३ । ' सुभ्रु! सुश्रोणि! कुबेरके यहाँ जितने भी अच्छे रत्न और धन हैं, उन सबका तथा सम्पूर्ण लोकोंका तुम मेरे साथ सुखपूर्वक उपभोग करो ॥ ३३ ॥
न रामस्तपसा देवि न बलेन च विक्रमैः ।
न धनेन मया तुल्यस्तेजसा यशसापि वा ॥ ३४ ॥
' देवि! राम तो न तपसे, न बलसे, न पराक्रमसे, न घनसे और न तेन अथवा यशके द्वारा ही मेरी समानता कर सकते हैं ॥ ३४ ॥
पिब विहर रमस्व भुङ्क्ष्व भोगान् धननिचयं प्रदिशामि मेदिनीं च । मयि लल ललने यथासुखं त्वं त्वयि च समेत्य ललन्तु बान्धवास्ते ॥३५ ॥
' तुम दिव्य रसका पान, विहार एवं रमण करो तथा अभीष्ट भोग भोगो । मैं तुम्हें धनकी राशि और सारी पृथ्वी भी समर्पित किये देता हूँ । ललने! तुम मेरे पास रद्दकर मौजसे मनचाही वस्तुएँ ग्रहण करो और तुम्हारे निकट आकर तुम्हारे भाई - बन्धु भी सुखपूर्वक इच्छानुसार भोग आदि प्राप्त करें ॥ ३५ ॥
कुसुमितत रुजालसंततानि भ्रमरयुतानि समुद्रतीरजानि । कनकवि मलहारभूषिताङ्गी विहर मया सह भीरु काननानि ॥ ३६ ॥
' भीरु! तुम सोने के निर्मल हारोंसे अपने अङ्गको विभूषित करके मेरे साथ समुद्र - तटवर्ती उन काननोंमें विहार करो, जिनमें खिले हुए बृक्षोंके समुदाय सब ओर फैले हुए हैं और उनपर भ्रमर मँडरा रहे हैं ' ॥ ३६ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये सुन्दरकाण्डे विंशः सर्गः ॥ २० ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके सुन्दरकाण्डमें बीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ २० ॥
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९ १८ श्रीमद्द्वाल्मीकीयरामायणे एकविंशः सर्गः सीताजीका रावणको समझाना और
तस्य तद् वचनं श्रुत्वा सीता रौद्रस्य रक्षसः ।
आर्ता दीनखरा दीनं प्रत्युवाच ततः शनैः ॥ १ ॥
उस भयंकर राक्षसकी वह बात सुनकर सीताको बड़ी पीड़ा हुई । उन्होंने दीन वाणी में बड़े दुःखके साथ धीरे-धीरे उत्तर देना आरम्भ किया ॥ १ ॥
दुःखार्ता रुदती सीता वेपमाना तपखिनी ।
चिन्तयन्ती वरारोहा पतिमेव पतिव्रता ॥ २ ॥
उस समय सुन्दर अङ्गोंवाली पतिव्रता देवी तपस्विनी सीता दुःखसे आतुर होकर रोती हुई काँप रही थीं और अपने पतिदेवका ही चिन्तन कर रही थीं ॥ २ ॥
तृणमन्तरतः कृत्वा प्रत्युवाच शुचिस्मिता ।
निवर्तय मनो मत्तः स्वजने प्रीयतां मनः ॥ ३ ॥
पवित्र मुस्कानवाली विदेहनन्दिनीने तिनकेकी ओट करके रावणको इस प्रकार उत्तर दिया – “ तुम मेरी ओरसे अपना मन हटा लो और आत्मीय जनों ( अपनी ही पत्नियों ) पर प्रेम करो ॥ ३ ॥
न मां प्रार्थयितुं युक्तस्त्वं सिद्धिमिव पापकृत् ।
अकार्य न मया कार्यमेकपल्या विगर्हितम् ॥ ४ ॥
' जैसे पापाचारी पुरुष सिद्धिकी इच्छा नहीं कर सकता, उसी प्रकार तुम मेरी इच्छा करनेके योग्य नहीं हो । जो पतिव्रताके लिये निन्दित है, वह न करनेयोग्य कार्य मैं कदापि नहीं कर सकती ॥ ४ ॥
कुलं सम्प्राप्तया पुण्यं कुले महति जातया ।
एवमुक्त्वा तु वैदेही रावणं तं यशस्विनी ॥ ५ ॥
रावणं पृष्ठतः कृत्वा भूयो वचनमब्रवीत् ।
नाहमौपयिकी भार्या परभार्या सती तव ॥ ६ ॥
' क्योंकि मैं एक महान् कुलमें उत्पन्न हुई हूँ और व्याह करके एक पवित्र कुलमें आयी हूँ । ' रावणसे ऐसा कहकर यशस्विनी विदेहराजकुमारीने उसकी ओर अपनी पीठ फेर ली और इस प्रकार कहा- ' रावण! मैं सती और परायी स्त्री हूँ । तुम्हारी भार्या बनने योग्य नहीं हूँ ॥ ५-६ ॥
साधु धर्ममवेक्षख साधु साधुव्रतं चर ।
यथा तव तथान्येषां रक्ष्या दारा निशाचर ॥ ७ ॥
‘ निशाचर | तुम श्रेष्ठ घर्मकी ओर दृष्टिपात करो और सत्पुरुषोंके व्रतका अच्छी तरह पालन करो । जैसे तुम्हारी स्त्रियाँ तुमसे संरक्षण पाती हैं, उसी प्रकार दूसरोंकी स्त्रियोंकी भी तुम्हें रक्षा करनी चाहिये ॥ ७ ॥
आत्मानमुपमां कृत्वा स्वेषु दारेषु रम्यताम् । अतुष्टं स्वेषु दारेषु चपलं चपलेन्द्रियम् । उसे श्रीराम के सामने नगण्य बताना नयन्ति निकृतिप्रज्ञं परदाराः पराभवम् ॥ ८ ॥
' तुम अपनेको आदर्श बनाकर अपनी ही स्त्रियोंमें अनुरक्त रहो । जो अपनी स्त्रियोंसे संतुष्ट नहीं रहता तथा जिसकी बुद्धि धिक्कार देने योग्य है, उस चपल इन्द्रियोंवाले चञ्चल पुरुषको परायी स्त्रियाँ पराभवको पहुँचा देती हैं — उसे फजीहतमें डाल देती हैं ॥ ८ ॥
इह सन्तो न वा सन्ति सतो वा नानुवर्तसे ।
यथा हि विपरीता ते बुद्धिराचारवर्जिता ॥ ९ ॥
" क्या यहाँ सत्पुरुष नहीं रहते हैं अथवा रहनेपर भी तुम उनका अनुसरण नहीं करते हो? जिससे तुम्हारी बुद्धि ऐसी विपरीत एवं सदाचारशून्य हो गयी है? ॥ ९ ॥
वो मिथ्याप्रणीतात्मा पथ्यमुक्तं विचक्षणैः ।
राक्षसानामभावाय त्वं वा न प्रतिपद्यसे ॥ १० ॥
' अथवा बुद्धिमान् पुरुष जो तुम्हारे हितकी बात कहते हैं, उसे निःसार मानकर राक्षसों के विनाशपर तुले रहने-के कारण तुम ग्रहण ही नहीं करते हो १ ॥ १० ॥
अकृतात्मानमासाद्य राजानमनये रतम् ।
समृद्धानि विनश्यन्ति राष्ट्राणि नगराणि च ॥ ११ ॥
' जिसका मन अपवित्र तथा सदुपदेशको नहीं ग्रहण करनेवाला है, ऐसे अन्यायी राजाके हाथमें पड़कर बड़े - बड़े समृद्धिशाली राज्य और नगर नष्ट हो जाते हैं ॥ ११ ॥
तथैव त्वां समासाद्य लङ्का रतौघसंकुला ।
अपराधात् तवैकस्य नचिराद् विनशिष्यति ॥ १२ ॥
' इसी प्रकार यह रत्न राशिसे पूर्ण लङ्कापुरी तुम्हारे हाथ में आ जानेसे अब अकेले तुम्हारे ही अपराधसे बहुत जल्द नष्ट हो जायगी ॥ १२ ॥
स्वतैन्यमानस्य रावणादीर्घदर्शिनः ।
अभिनन्दन्ति भूतानि विनाशे पापकर्मणः ॥ १३ ॥
' रावण! जब कोई अदूरदर्शी पापाचारी अपने कुकर्मों से मारा जाता है, उस समय उसका विनाश होने पर समस्त प्राणियोंको प्रसन्नता होती है ॥ १३ ॥
एवं त्वां पापकर्माणं वक्ष्यन्ति निकृता जनाः ।
दिष्टयैतद् व्यसनं प्राप्तो रौद्र इत्येव हर्षिताः ॥ १४ ॥
" इसी प्रकार तुमने जिन लोगोंको कष्ट पहुँचाया है, वे तुम्हें पापी कहेंगे और ' बड़ा अच्छा हुआ, इस आततायी-को यह कष्ट प्राप्त हुआ ' ऐसा कहकर हर्ष मनायेंगे ॥ १४ ॥
शक्या लोभयितुं नाहमैश्वर्येण धनेन वा ।
अनन्या राघवेणाहं भास्करेण यथा प्रभा ॥ १५ ॥
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सुन्दरकाण्डे एकविंशः सर्गः ९ १ ९ " जैसे प्रभा सूर्यसे अलग नहीं होती, उसी प्रकार मैं श्रीरघुनाथजीसे अभिन्न हूँ । ऐश्वर्य या धनके द्वारा तुम मुझे लुभा नहीं सकते ॥ १५ ॥
उपधाय भुजं तस्य लोकनाथस्य सत्कृतम् ।
कथं नामोपधास्यामि भुजमन्यस्य कस्यचित् ॥ १६ ॥
' जगदीश्वर श्रीरामचन्द्रजीकी सम्मानित भुजापर सिर रखकर अब मैं किसी दूसरेकी बहकी तकिया कैसे लगा सकती हूँ? ॥ १६ ॥
अहमौपयिकी भार्या तस्यैव च धरापतेः ।
व्रतनातस्य विद्येव विप्रस्य विदितात्मनः ॥ १७ ॥
' जिस प्रकार वेदविद्या आत्मज्ञानी स्नातक ब्राह्मणकी ही सम्पत्ति होती है, उसी प्रकार मैं केवल उन पृथ्वीपति रघुनाथजी की ही भार्या होने योग्य हूँ ॥ १७ ॥
साधु रावण रामेण मां समानय दुःखिताम् ।
वने वासितया सार्धं करेण्वेव गजाधिपम् ॥ १८ ॥
' रावण! तुम्हारे लिये यही अच्छा होगा कि जिस प्रकार वनमें समागमकी वासनासे युक्त हथिनीको कोई गजराजसे मिला दे, उसी प्रकार तुम मुझ दुखियाको श्रीरघुनाथजी से मिला दो ॥ १८ ॥
मित्रमौपयिकं कर्ते रामः स्थानं परीप्सता ।
बन्धं चानिच्छता घोरं त्वयासौ पुरुषर्षभः ॥ १ ९ ॥
' यदि तुम्हें अपने नगरकी रक्षा और दारुण बन्धन से बचने की इच्छा हो तो पुरुषोत्तम भगवान् श्रीरामको अपना मित्र बना लेना चाहिये; क्योंकि वे ही इसके योग्य हैं ॥ १ ९ ॥
विदितः सर्वधर्मशः शरणागतवत्सलः ।
तेन मैत्री भवतु ते यदि जीवितुमिच्छसि ॥ २० ॥
' भगवान् श्रीराम समस्त धर्मोंके ज्ञाता और सुप्रसिद्ध शरणागतवत्सल हैं । यदि तुम जीवित रहना चाहते हो तो उनके साथ तुम्हारी मित्रता हो जानी चाहिये ॥ २० ॥
प्रसादयस्व त्वं चैनं शरणागतवत्सलम् ।
मां चास्मै प्रयतो भूत्वा निर्यातयितुमर्हसि ॥ २१ ॥
' तुम शरणागतवत्सल श्रीरामकी शरण लेकर उन्हें प्रसन्न करो और शुद्धहृदय होकर मुझे उनके पास लौटा दो ॥ २१ ॥
एवं हि ते भवेत् स्वस्ति सम्प्रदाय रघूत्तमे ।
अन्यथा त्वं हि कुर्वाणः परां प्राप्स्यसि चापदम् ॥ २२ ॥
' इस प्रकार मुझे श्रीरघुनाथजीको सौंप देनेपर तुम्हारा भला होगा । इसके विपरीत आचरण करनेपर तुम बड़ी भारी विपत्ति में पड़ जाओगे ॥ २२ ॥
वर्जयेद् वज्रमुत्सृष्टं वर्जयेदन्तकश्चिरम् ।
त्वद्विधं न तु संक्रुद्धो लोकनाथः स राघवः ॥ २३ ॥
' तुम्हारे - जैसे निशाचरको कदाचित् हाथसे छूटा हुआ वज्र बिना मारे छोड़ सकता है और काल भी बहुत दिनों तक तुम्हारी उपेक्षा कर सकता है; किंतु क्रोधमें भरे हुए लोक-. नाथ रघुनाथजी कदापि नहीं छोड़ेंगे ॥ २३ ॥
' रामस्य धनुषः शब्दं श्रोष्यसि त्वं महास्वनम् ।
शतक्रतुविसृष्टस्य निर्घोषमशनेरिव ॥ २४ ॥
' इन्द्रके छोड़े हुए वज्रकी गड़गड़ाहटके समान तुम श्रीरामचन्द्रजी के धनुषकी घोर टंकार सुनोगे ॥ २४ ॥
इह शीघ्रं सुपर्वाणो ज्वलितास्या इवोरगाः ।
इषवो निपतिष्यन्ति रामलक्ष्मणलक्षिताः ॥ २५ ॥
" यहाँ श्रीराम और लक्ष्मणके नामोंसे अङ्कित और सुन्दर गाँठवाले बाण प्रज्वलित मुखवाले सर्पोंके समान शीघ्र ही गिरेंगे ॥ २५ ॥
रक्षांसि निहनिष्यन्तः पुर्यामस्यां न संशयः ।
असम्पातं करिष्यन्ति पतन्तः कङ्कवाससः ॥ २६ ॥
" वे कङ्कपत्र वाले बाण इस पुरीमें राक्षसोंका संहार करेंगे, इसमें संशय नहीं है । इस तरह बरसेंगे कि यहाँ तिल रखने की भी जगह नहीं रह जायगी ॥ २६ ॥
राक्षसेन्द्रमहासर्पान् स रामगरुडो महान् ।
उद्धरिष्यति वेगेन वैनतेय इवोरगान् ॥ २७ ॥
‘ जैसे विनतानन्दन गरुड़ सर्पोंका संहार करते हैं, उसी प्रकार श्रीरामरूपी महान् गरुड़ राक्षसराजरूपी बड़े - बड़े सर्पोको वेगपूर्वक उच्छिन्न कर डालेंगे ॥ २७ ॥
अपनेष्यति मां भर्ता त्वत्तः शीघ्रमरिंदमः ।
असुरेभ्यः श्रियं दीप्तां विष्णुस्त्रिभिरिव क्रमैः ॥ २८ ॥
' जैसे भगवान् विष्णुने अपने तीन ही पगोंद्वारा असुरोंसे उनकी उद्दीप्त राजलक्ष्मी छीन ली थी, उसी प्रकार मेरे स्वामी शत्रुसूदन श्रीराम मुझे शीघ्र ही तेरे यहाँसे निकाल ले जायँगे ॥ २८ ॥
जनस्थाने इतस्थाने निहते रक्षसां बले ।
अशक्तेन त्वया रक्षः कृतमेतदसाधु वै ॥ २ ९ ॥
' राक्षस! जब राक्षसोंकी सेनाका संहार हो जानेसे जनस्थान-का तुम्हारा आश्रय नष्ट हो गया और तुम युद्ध करनेमें असमर्थ हो गये, तब तुमने छल और चोरीसे यह नीच कर्म किया है ॥ २ ९ ॥
आश्रमं तत्तयोः शून्यं प्रविश्य नरसिंहयोः ।
गोचरं गतयोर्भ्रात्रोरपनीता स्वयाधम ॥ ३० ॥
' नीच निशाचर | तुमने पुरुषसिंह श्रीराम और लक्ष्मण-के सूने आश्रम में घुसकर मेरा हरण किया था । वे दोनों उस समय मायामृगको मारनेके लिये वनमें गये हुए थे ( नहीं तो तभी तुम्हें इसका फल मिल जाता ) ॥ ३० ॥
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९ २० श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे
नहि गन्धमुपाघ्राय रामलक्ष्मणयोस्त्वया ।
शक्यं संदर्शने स्थातुं शुना शार्दूलयोरिव ॥ ३१ ॥
' श्रीराम और लक्ष्मणकी तो गन्ध पाकर भी तुम उनके सामने नहीं ठहर सकते । क्या कुत्ता कभी दो - दो बाघोंके सामने टिक सकता है! ॥ ३१ ॥
तस्य ते विग्रहे ताभ्यां युगग्रहणमस्थिरम् ।
वृत्रस्येवेन्द्रबाहुभ्यां बाहोरेकस्य विग्रहे ॥ ३२ ॥
" जैसे इन्द्रकी दो बाँहों के साथ युद्ध छिड़नेपर वृत्रासुर-की एक बाँह के लिये संग्रामके बोझको सँभालना असम्भव हो गया, उसी प्रकार समराङ्गणमें उन दोनों भाइयोंके साथ युद्धका जुआ उठाये रखना या टिकना तुम्हारे लिये सर्वथा असम्भव है ॥ ३२ ॥
क्षिप्रं तव सनाथो मे रामः सौमित्रिणा सह ।
तोयमल्पमिवादित्यः प्राणानादास्यते शरैः ॥ ३३ ॥
" वे मेरे प्राणनाथ श्रीराम सुमित्रा कुमार लक्ष्मण के साथ आकर अपने बाणोंद्वारा शीघ्र तुम्हारे प्राण हर लेंगे । ठीक उसी तरह, जैसे सूर्य थोड़े से जलको अपनी किरणोंद्वारा शीघ्र सुखा देते हैं ॥ ३३ ॥
गिरिं कुबेरस्य गतोऽथवाऽऽलयं सभां गतो वा वरुणस्य राशः । असंशयं दाशरथेर्विमोक्ष्यसे महाद्रुमः कालहतोऽशनेरिव ॥ ३४ ॥
" तुम कुबेर के कैलासपर्वतपर चले जाओ, अथवा वरुणकी सभा में जाकर छिप रहो, किंतु कालका मारा हुआ विशाल वृक्ष जैसे वज्रका आघात लगते ही नष्ट हो जाता है, उसी प्रकार तुम दशरथनन्दन श्रीरामके बाणसे मारे जाकर तत्काल प्राणोंसे हाथ धो बैठोगे, इसमें संशय नहीं है; क्योंकि काल तुम्हें पहले से ही मार चुका है ' ॥ ३४ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये सुन्दरकाण्डे एकविंशः सर्गः ॥ २१ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आरामायण आदिकाव्यके सुन्दरकाण्डमें इक्कीसवाँ सगँ पूरा हुआ ॥ २१ ॥
द्वाविंशः सर्गः रावणका सीताको दो मासकी अवधि देना, सीताका उसे फटकारना, फिर रावणका उन्हें धमकाकर राक्षसियोंके नियन्त्रणमें रखकर स्त्रियोंसहित पुनः महलको लौट जाना
सीताया वचनं श्रुत्वा परुषं राक्षसेश्वरः ।
प्रत्युवाच ततः सीतां विप्रियं प्रियदर्शनाम् ॥ १ ॥
सीता के ये कठोर वचन सुनकर राक्षसराज रावणने उन प्रियदर्शना सीताको यह अप्रिय उत्तर दिया- ॥ १ ॥
यथा यथा सान्त्वयिता वश्यः स्त्रीणां तथा तथा ।
यथा यथा प्रियं वक्ता परिभूतस्तथा तथा ॥ २ ॥
‘ लोकमें पुरुष जैसे - जैसे स्त्रियोंसे अनुनय - विनय करता है, वैसे - वैसे वह उनका प्रिय होता जाता है; परंतु मैं तुमसे ज्यों - ज्यों मीठे वचन बोलता हूँ, त्यों ही - त्यों तुम मेरा तिरस्कार करती जा रही हो ॥ २ ॥
संनियच्छति मे क्रोधं त्वयि कामः समुत्थितः ।
द्रवतो मार्गमासाद्य हयानिव सुसारथिः ॥ ३ ॥
' किंतु जैसे अच्छा सारथि कुमार्गमें दौड़ते हुए घोड़ों-को रोकता है, वैसे ही तुम्हारे प्रति जो मेरा प्रेम उत्पन्न हो गया है, वही मेरे क्रोधको रोक रहा है ॥ ३ ॥
वामः कामो मनुष्याणां यस्मिन् किल निबध्यते ।
जने तस्मिंस्त्वनुक्रोशः स्नेहश्च किल जायते ॥ ४ ॥
' मनुष्यों में यह काम ( प्रेम ) बड़ा टेढ़ा है । वह जिसके प्रति बँध जाता उसीके प्रति करुणा और स्नेह उत्पन्न हो जाता है ॥ ४ ॥
एतस्मात् कारणान्न त्वां घातयामि वरानने ।
वधाहमवमानाह मिथ्या प्रव्रजने रताम् ॥ ५ ॥
' सुमुखि! यही कारण है कि झूठे वैराग्यमें तत्पर तथा व और तिरस्कार के योग्य होनेपर भी तुम्हारा मैं वध नहीं कर रहा हूँ ॥ ५ ॥
परुषाणि हि वाक्यानि यानि यानि ब्रवीषि माम् ।
तेषु तेषु वधो युक्तस्तव मैथिलि दारुणः ॥ ६ ॥
' मिथिलेशकुमारी! तुम मुझसे जैसी जैसी कठोर बातें कह रही हो, उनके बदले तो तुम्हें कठोर प्राणदण्ड देना ही उचित है ' ॥ ६ ॥
एवमुक्त्वा तु वैदेहीं रावणो राक्षसाधिपः ।
क्रोधसंरम्भसंयुक्तः सीतामुत्तरमब्रवीत् ॥ ७ ॥
विदेहराजकुमारी सीतासे ऐसा कहकर क्रोध के आवेशमें भरे हुए राक्षसराज रावणने उन्हें फिर इस प्रकार उत्तर दिया ॥ ७ ॥
द्वौ मासौ रक्षितव्यौ मे योऽवधिस्ते मया कृतः ।
ततः शयनमारोह मम त्वं वरवर्णिनि ॥ ८ ॥
‘ सुन्दरि! मैंने तुम्हारे लिये जो अवधि नियुक्त की है,
उसके अनुसार मुझे दो महीने और प्रतीक्षा करनी है ।
तत्पश्चात् तुम्हें मेरी शय्यापर आना होगा ॥ ८ ॥
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९ २१ सुन्दरकाण्डे द्वाविंशः सर्गः
द्वाभ्यामूर्ध्व तु मासाभ्यां भर्तारं मामनिच्छतीम् ।
सुदाश्छेत्स्यन्ति खण्डशः ॥ ९ ॥
मम त्वां प्रातराशार्थे ' अतः याद रक्खो यदि दो महीने के बाद तुम मुझे अपना पति बनाना स्वीकार नहीं करोगी तो रसोइये मेरे कलेवेके लिये तुम्हारे टुकड़े - टुकड़े कर डालेंगे ' ॥ ९ ॥
तां भर्त्स्यमानां सम्प्रेक्ष्य राक्षसेन्द्रेण जानकीम् ।
विषेदुर्विकृतेक्षणाः ॥ १० ॥
देवगन्धर्व कन्यास्ता रावणके द्वारा जनकनन्दिनी सीताको इस राक्षसराज धमकायी जाती देख देवताओं और गन्धर्वोंकी कन्याओं प्रकार हुआ । उनकी आँखें विकृत हो गयीं ॥ १० ॥
को बड़ा विषाद । नेत्रैर्वक्त्रैस्तथापराः सुस्तर्जितां तेन रक्षसा ॥ ११ ॥
सीतामाश्वासयामा तब उनमें से किसीने किसीने मुँहके संकेतसे उस को धैर्य बँधाया ॥ ११ ॥
ताभिराश्वासिता सीता उवाचात्महितं वाक्यं उनके धैर्यं बँधानेपर ओठोंसे, किसीने नेत्रोंसे तथा
राक्षसद्वारा डाँटी जाती हुई सीता-रावणं राक्षसाधिपम् ।
वृत्तशौटीर्यगर्वितम् ॥ १२ ॥
सीताने राक्षसराज रावणसे अपने सदाचार ( पातिव्रत्य ) और पतिके शौर्य के अभिमानसे पूर्ण हितकर वचन कहा- ॥ १२ ॥
नूनं न ते जनः कश्चिदस्मिन्निःश्रेयसि स्थितः ।
निवारयति यो न त्वां कर्मणोऽस्माद् विगर्हितात् ॥ १३ ॥
' अरे! इक्ष्वाकुनाथ श्रीरामका तिरस्कार करते तुझे लजा नहीं आती । तू जबतक उनकी आँखोंके सामने नहीं जाता, तबतक जो चाहे कह ले ॥ १७ ॥
इमे ते नयने क्रूरे विकृते कृष्णपिङ्गले ।
क्षितौ न पतिते कस्मान्मामनार्य निरीक्षतः ॥ १८ ॥
' अनायें! मेरी ओर दृष्टि डालते समय तेरी ये क्रूर और विकारयुक्त काली - पीली आँखें पृथ्वीपर क्यों नहीं गिर पड़ीं? ॥ १८ ॥
तस्य धर्मात्मनः पत्नी स्नुषा दशरथस्य च ।
मां ते न जिह्ना पाप शीर्यति ॥ १ ९ ॥
कथं व्याहरतो " मैं धर्मात्मा श्रीरामकी धर्मपत्नी और महाराज दशरथ-की ' पुत्रवधू हूँ । पापी! मुझसे पापकी बातें करते समय तेरी जीभ क्यों नहीं गल जाती है १ ॥ १ ९ ॥
असंदेशात्तु रामस्य तपसश्चानुपालनात् ।
न त्वां कुर्मि दशग्रीव भस्म भस्माईतेजसा ॥ २० ॥
रावण! मेरा तेज ही तुझे भस्म कर डालने के ' दशमुख पर्याप्त है । केवल श्रीरामकी आज्ञा न होने से और लिये अपनी तपस्याको सुरक्षित रखने के विचार से मैं तुझे भस्म नहीं कर रही हूँ ॥ २० ॥
नापहर्तुमहं शक्या तस्य रामस्य धीमतः ।
विधिस्तव वधार्थाय विहितो नात्र संशयः ॥ २१ ॥
" मैं मतिमान् श्रीरामकी भार्या हूँ, मुझे हर ले आने की लिये ही ही इस नगर में कोई भी पुरुष तेरा भला शक्ति तेरे अंदर नहीं थी । निःसंदेह तेरे वध के ' निश्चय नहीं है, जो तुझे इस निन्दित कर्मसे रोके ॥ १३ ॥ विधाताने यह विधान रच दिया है ॥ २१ ॥
चाहनेवाला हि धर्मात्मनः पत्नीं शचीमिव शचीपतेः । शूरेण धनदभ्रात्रा बलैः समुदितेन च । मां प्रार्थयेन्मनसापि कः ॥ १४ ॥ अपोह्य रामं कस्माच्चिद् दारचौर्य त्वया कृतम् ॥ २२ ॥
त्वदन्यस्त्रिषु लोकेषु ' जैसे शची इन्द्रकी धर्मपत्नी हैं, उसी प्रकार मैं धर्मात्मा ' तू तो बड़ा शूरवीर बनता है, कुबेरका भाई है और भगवान् श्रीरामकी पत्नी हूँ । त्रिलोकीमें तेरे सिवा दूसरा तेरे पास सेनाएँ भी बहुत हैं, फिर श्रीरामको छलसे दूर कौन है, जो मनसे भी मुझे प्राप्त करने की इच्छा करे ॥ १४ ॥ हटाकर क्यों तूने उनकी स्त्रीकी चोरी की है ११ ॥ १२ ॥
राक्षसाधम रामस्य भार्याममिततेजसः । सीताया वचनं श्रुत्वा रावणो राक्षसाधिपः ।
उक्तवानसि यत् पापं क्व गतस्तस्य मोक्ष्यसे ॥ १५ ॥ क्रूरे जानकीमन्ववैक्षत ॥ २३ ॥
' नीच राक्षस! तूने अमित तेजस्वी श्रीरामकी भार्यासे विवृत्य सीताकी नयने ये बातें सुनकर राक्षसराज रावणने उन जनक-जो पापकी बात कही है, उसके फलस्वरूप दण्डसे तू कहाँ दुलारीकी ओर आँखें तरेरकर देखा । उसकी दृष्टिसे क्रूरता जाकर छुटकारा पायेगा? ॥ १५ ॥ टपक रही थी ॥ २३ ॥
यथा हप्ता मातङ्गः शशश्च सहितौ वने । महाभुजशिरोधरः ।
रामस्त्वं नीच शशवत् स्मृतः ॥ १६ ॥ नीलजीमूतसंकाशो दीप्तजिह्नोग्रलोचनः ॥ २४ ॥
तथा द्विरदवद् हाथी और कोई खर- सिंहसत्त्वगतिः श्रीमान् ' जिस प्रकार वनमें कोई मतवाला वह नीलमेघ के समान काला और विशालकाय था । गोश दैववश एक दूसरेके साथ युद्ध के लिये तुल जायँ, वैसे और ग्रीवा बड़ी थीं । वह गति और पराक्रममें ही भगवान् श्रीराम और तू है । नीच निशाचर । भगवान् उसकी भुजाएँ था और तेजस्वी दिखायी देता था । उसकी राम तो गजराज के समान हैं और तू खरगोशके तुल्य है ॥ १६ ॥ सिंहके समान समान लपलपा रही थी तथा नेत्र बड़े
वै क्षिपन्निह न लज्जसे । जीभ आग की लपटके समिक्ष्वाकुनाथं ॥ १७ ॥ भयंकर प्रतीत होते थे ॥ २४ ॥
चक्षुषो विषये तस्य न यावदुपगच्छसि बा ० रा ० ५.७.८-
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९ २२ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे चलाग्रमुकुट प्रांशुश्चित्रमाल्यानुलेपनः 1 रक्तमाल्याम्बरधरस्तप्ताङ्गदविभूषणः ॥ २५ ॥
श्रोणीसूत्रेण महता मेचकेन सुसंवृतः ।
अमृतोत्पादने नद्धो भुजङ्गेनेव मन्दरः ॥ २६ ॥
क्रोध के कारण उसके मुकुटका अग्रभाग हिल रहा था, जिससे वह बहुत ऊँचा जान पड़ता था । उसने तरह - तरह के हार और अनुलेपन धारण की ओर देखा और फुफकारते हुए सर्पके समान लंबी साँसें खींचकर कहा – ॥ ३० ॥
अनयेनाभिसम्पन्नमर्थहीनमनुव्रते नाशयाम्यहमद्य त्वां सूर्यः संध्यामिवौजसा ॥ ३१ ॥
' अन्यायी और निर्धन मनुष्यका अनुसरण करनेवाली नारी । जैसे सूर्यदेव अपने तेजसे प्रातः कालिक संध्याके बने हुए बाजूबंद कर रक्खे थे तथा पक्के सोनेके अन्धकारको नष्ट कर देते हैं, उसी प्रकार आज मैं तेरा उसकी शोभा बढ़ा रहे थे । वह लाल रंगके फूलों की माला और लाल वस्त्र पहने हुए था । उसकी कमरके चारों ओर काले रंगका लंबा कटिसूत्र बँधा हुआ था, जिससे वह अमृत - मन्थनके समय वासुकिसे लिपटे हुए मन्दराचलके समान जान पड़ता था ॥ २५-२६ ॥
ताभ्यां स परिपूर्णाभ्यां भुजाभ्यां राक्षसेश्वरः ।
शुशुभेऽचलसंकाशः शृङ्गाभ्यामिव मन्दरः ॥ २७ ॥
पर्वत के समान विशालकाय राक्षसराज रावण अपनी दोनों परिपुष्ट भुजाओं से उसी प्रकार शोभा पा रहा था, मानो दो शिखरोंसे मन्दराचल सुशोभित हो रहा हो । २७ ।
तरुणादित्यवर्णाभ्यां कुण्डलाभ्यां विभूषितः ।
रक्त पल्लव पुष्पाभ्यामशोकाभ्यामिवाचलः ॥ २८ ॥
प्रातःकालके सूर्यकी भाँति अरुण पीत कान्तिवाले दो कुण्डल उसके कानोंकी शोभा बढ़ा रहे थे, मानो लाल पल्लवों और फूलोंसे युक्त दो अशोक वृक्ष किसी पर्वतको सुशोभित कर रहे हों ॥ २८ ॥
स कल्पवृक्ष प्रतिमो वसन्त इव मूर्तिमान् ।
श्मशानचैत्य प्रतिमो भूषितोऽपि भयंकरः ॥ २ ९ ॥
वह अभिनव शोभासे सम्पन्न होकर कल्पवृक्ष एवं मूर्तिमान् वसन्तके समान जान पड़ता था । आभूषणोंसे विभूषित होनेपर भी श्मशानचैव्य ( मरघट में बने हुए देवालय ) की भाँति भयंकर प्रतीत होता था ॥ २ ९ ॥
अवेक्षमाणो वैदेहीं कोपसंरक्तलोचनः ।
उवाच रावणः सीतां भुजङ्ग इव निःश्वसन् ॥ ३० ॥
रावणने क्रोधसे लाल आँखें करके विदेहकुमारी सीता-१. प्राचीनकालमै नगरकी श्मशानभूमिके पास एक गोला-कार देवालय - सा बना रहता था, जहाँ राजाको आज्ञासे प्राणदण्डके अपराधियोंका जल्लादोंके द्वारा वध कराया जाता था । जब वहाँ किसीको प्राणदण्ड देनेका अवसर आता, तब उस देवालयको लीप-पोतकर फूलोंको बन्दनवारोंसे सजाया जाता था । उस विभूषित श्मशान चैत्यको देखते ही लोग यह सोचकर भयभीत हो उठते थे कि आज यहाँ किसीके जीवनका अन्त होनेवाला है । इस तरह जैसे वह श्मशानचैत्य विभूषित होनेपर भी भयंकर लगता था, उसी प्रकार रावण सुन्दर शृङ्गार करके भी सीताको भयानक प्रतीत विनाश किये देता हूँ ' ॥ ३१ ॥
इत्युक्त्वा मैथिलीं राजा रावणः शत्रुरावणः ।
संददर्श ततः सर्वा राक्षसीर्घोरदर्शनाः ॥ ३२ ॥
मिथिलेशकुमारीसे ऐसा कहकर शत्रुओंको रुलानेवाले राजा रावणने भयंकर दिखायी देनेवाली समस्त राक्षसियों की ओर देखा ॥ ३२ ॥
एकाक्षीमेककर्णी च कर्णप्रावरणां तथा ।
गोकर्णी हस्तिकर्णीच लम्बकर्णीमकर्णिकाम् ॥ ३३ ॥
हस्तिपद्यश्वपद्यौ च गोपदीं पादचूलिकाम् ।
एकाक्षीमेकपदी च पृथुपादीमपादिकाम् ॥ ३४ ॥
अतिमात्र शिरोग्रीवामतिमात्र कुचोदरीम् 1 अतिमात्रास्य नेत्रां च दीर्घजिहानखामपि ॥ ३५ ॥
अनासिकां सिंहमुखीं गोमुखीं सूकरीमुखीम् ।
यथा मद्वशगा सीता क्षिप्रं भवति जानकी ॥ ३६ ॥
तथा कुरुत राक्षस्यः सर्वाः क्षिप्रं समेत्य वा ।
प्रतिलोमानुलो मैश्च सामदानादिभेदनैः ॥ ३७ ॥
आवर्जयत वैदेहीं दण्डस्योद्यमनेन च । उसने एकाक्षी ( एक आँखवाली ), एककर्णी ( एक कानवाली ), कर्णप्रावरणा ( लंबे कानोंसे अपने शरीरको ढक लेनेवाली ), गोकर्णी ( गौके से कानवाली ), हस्तिकर्णी ( हाथी के समान कानवाली ), लंबकर्णी ( लंबे कानवाली ), अकर्णिका ( बिना कानकी ), हस्तिपदी ( हाथी के से पैरों-वाली ), अश्वपदी ( घोड़े के समान पैरवाली ), गोपदी ( गायके समान पैरवाली ), पादचूलिका ( केशयुक्त पैरों-वाली ), एकाक्षी, एकपादी ( एक पैरवाली ), पृथुपादी ( मोटे पैरवाली ), अपादिका ( बिना पैरोंकी ), अतिमात्र-शिरोग्रीवा ( विशाल सिर और गर्दनवाली ), अतिमात्र-कुचोदरी ( बहुत बड़े- बड़े स्तन और पेटवाली ), अतिमात्रा-स्यनेत्रा ( विशाल मुख और नेत्रवाली ), दीर्घजिह्वानखा ( लंबी जीभ और नखोंवाली ), अनासिका ( बिना नाक-की ), सिंहमुखी ( सिंहके समान मुखवाली ), गोमुखी ( गौके समान मुखवाली ) तथा सूकरीमुखी ( सूकरी के समान मुख-वाली ) -- इन सब राक्षसियोंसे कहा- ' निशाचरियो! तुम सब लोग मिलकर अथवा अलग - अलग शीघ्र ही ऐसा प्रयत्न करो, होता था; क्योंकि वह उनके सतीत्वको नष्ट करना चाहता था । जिससे जनक किशोरी सीता बहुत जल्द मेरे वशमें आ जाय ।
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सुन्दरकाण्डे त्रयोविंशः सर्गः ९ २३ अनुकूल - प्रतिकूल उपायोंसे, साम, दान और भेदनीतिसे तथा दण्डका भी भय दिखाकर विदेहकुमारी सीताको वशमें लानेकी चेष्टा करो ' ॥ ३३-३७३ ॥ इति प्रतिसमादिश्य राक्षसेन्द्रः पुनः पुनः ॥ ३८ ॥
काममन्युपरीतात्मा जानकीं प्रति गर्जत । राक्षसियोंको इस प्रकार बारंबार आज्ञा देकर काम और क्रोधसे व्याकुल हुआ राक्षसराज रावण जानकीजीकी ओर देखकर गर्जना करने लगा ॥ ३८३ ॥
उपगम्य ततः क्षिप्रं राक्षसी धान्यमालिनी ॥ ३ ९ ॥ परिष्वज्य दशग्रीवमिदं वचनमब्रवीत् । तदनन्तर राक्षसियोंकी स्वामिनी मन्दोदरी तथा धान्यमालिनी नामवाली राक्षस कन्या शीघ्र रावणके पास आयीं और उसका आलिङ्गन करके बोलीं- ॥ ३ ९ ३ ॥ मया क्रीड महाराज सीतया किं तवानया ॥ ४० ॥
विवर्णया कृपणया मानुष्या राक्षसेश्वर । ' महाराज राक्षसराज! आप मेरे साथ क्रीडा कीजिये । इस कान्तिहीन और दीन मानव- कन्या सीतासे आपको क्या प्रयोजन है? ॥ ४०३ ॥
नूनमस्यां महाराज न देवा भोगसत्तमान् ॥ ४१ ॥
विदधत्यमरश्रेष्ठास्तव बाहुबलार्जितान् । ' महाराज! निश्चय ही देवश्रेष्ठ ब्रह्माजीने इसके भाग्य में आपके बाहुबलसे उपार्जित दिव्य एवं उत्तम भोग नहीं लिखे हैं ॥ ४१३ ॥
कामयानस्य शरीरमुपतप्यते ॥ ४२ ॥
इच्छतीं कामयानस्य प्रीतिर्भवति शोभना । ' प्राणनाथ! जो स्त्री अपने से प्रेम नहीं करती, उसकी कामना करनेवाले पुरुषके शरीरमें केवल ताप ही होता है और अपने प्रति अनुराग रखनेवाली स्त्रीकी कामना करनेवालेको उत्तम प्रसन्नता प्राप्त होती है ' ॥ ४२३ ॥
एवमुक्तस्तु राक्षस्या समुत्क्षिप्तस्ततो बली ।
मेघसंकाशो राक्षसः स न्यवर्तत ॥ ४३ ॥
प्रहसन् जब राक्षसीने ऐसा कहा और उसे दूसरी ओर वह हटा ले गयी, तब मेघ के समान काला और बलवान् राक्षस रावण जोर - जोरसे हँसता हुआ महलकी ओर लौट पड़ा ॥ ४३ ॥
प्रस्थितः स दशग्रीवः कम्पयन्निव मेदिनीम् ।
ज्वलद्भास्करसंकाशं प्रविवेश निवेशनम् ॥ ४४ ॥
अशोकवाटिकासे प्रस्थित होकर पृथ्वीको कम्पित - सी करते हुए दशग्रीवने उद्दीप्त सूर्यके सदृश प्रकाशित होनेवाले अपने भवन में प्रवेश किया ॥ ४४ ॥
देवगन्धर्व कन्याश्च नागकन्याश्च तास्ततः ।
परिवार्य दशग्रीवं प्रविशुस्ता गृहोत्तमम् ॥ ४५ ॥
तदनन्तर देवता, गन्धर्व और नागोंकी कन्याएँ भी रावणको सब ओर से घेरकर उसके साथ ही उस उत्तम राज. भवनमें चली गयीं ॥ ४५ ॥
स मैथिलीं धर्मपरामवस्थितां प्रवेपमानां परिभत् रावणः । विहाय सीतां मदनेन मोहितः स्वमेव वेश्म प्रविवेश रावणः ॥ ४६ ॥
इस प्रकार अपने धर्म में तत्पर, स्थिरचित्त और भय से काँपती हुई मिथिलेशकुमारी सीताको धमकाकर काममोहित रावण अपने ही महल में चला गया ॥ ४६ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये सुन्दरकाण्डे द्वाविंशः सर्गः ॥ २२ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आरामायण आदिकाव्यके सुन्दरकाण्डमें बाईसवाँ सगँ पूरा हुआ ॥ २२ ॥
त्रयोविंशः सर्गः राक्षसियोंका सीताजीको समझाना
इत्युक्त्वा मैथिलीं राजा रावणः शत्रुरावणः ।
संदिश्य च ततः सर्वा राक्षसीर्निर्जगाम ह ॥ १ ॥
शत्रुओंको रुलानेवाला राजा रावण सीताजी से पूर्वोक्त बातें कहकर तथा सब राक्षसियोंको उन्हें वशमें लानेके लिये आदेश दे वहाँसे निकल गया ॥ १ ॥
निष्क्रान्ते राक्षसेन्द्रे तु पुनरन्तःपुरं गते ।
राक्षस्यो भीमरूपास्ताः सीतां समभिदुद्रुवुः ॥ २ ॥
अशोक वाटिका से निकलकर जब राक्षसराज रावण अन्तःपुरको चला गया, तब वहाँ जो भयानक रूपवाली राक्षसियाँ थीं, वे सब चारों ओरसे दौड़ी हुई सीताके पास आयीं ॥ २ ॥
ततः सीतामुपागम्य राक्षस्यः क्रोधमूर्चिछताः ।
परं परुषया वाचा वैदेहीमिदमब्रुवन् ॥ ३ ॥
विदेहकुमारी सीताके समीप आकर क्रोधसे व्याकुल हुईं उन राक्षसियोंने अत्यन्त कठोर वाणीद्वारा उनसे इस प्रकार कहना आरम्भ किया ॥ ३ ॥
पौलस्त्यस्य वरिष्ठस्य रावणस्य महात्मनः ।
दशग्रीवस्य भार्यात्वं सीते न बहु मन्यसे ॥ ४ ॥
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९ २४ श्रीमवाल्मीकीय रामायणे ' सीते! तुम पुलस्त्यजीके कुलमें उत्पन्न हुए सर्वश्रेष्ठ इटनेवाले शूरवीर हैं । ऐसे बल - पराक्रमसम्पन्न पुरुषकी भार्या दशग्रीव महामना रावणकी भार्या बनना भी कोई बहुत बड़ी बनना तुम क्यों नहीं चाहती हो? ॥ ११ ॥
बात नहीं समझतीं? ' ॥ ४ ॥
ततस्त्वेकजटा प्रियां बहुमतां भार्या त्यक्त्वा राजा महाबलः ।
नाम राक्षसी वाक्यमब्रवीत् । सर्वासां च महाभागां त्वामुपैष्यति रावणः ॥ १२ ॥
आमन्त्रय कोधताम्राक्षी सीतां करतलोदरीम् ॥ ५ ॥ समृद्धं स्त्रीसहस्रेण नानारत्नोपशोभितम् ।
तत्पश्चात् एकजटा नामवाली राक्षसीने क्रोवसे लाल अन्तःपुरं तदुत्सृज्य त्वामुपैष्यति रावणः ॥ १३ ॥
आँखें करके कृशोदरी सीताको पुकारकर कहा- ॥ ५ ॥
प्रजापतीनां षण्णां तु चतुर्थोऽयं प्रजापतिः ।
मानसो ब्रह्मणः पुत्रः पुलस्त्य इति विश्रुतः ॥ ६ ॥
' विदेहकुमारी! पुलस्त्यजी छे: प्रजापतियों में चौथे हैं और ब्रह्माजीके मानस पुत्र हैं । इस रूपमें उनकी सर्वत्र ख्याति है ॥ ६ ॥
पुलस्त्यस्य तु तेजस्वी महर्षिर्मानसः सुतः ।
नाम्ना स विश्रवा नाम प्रजापतिसमप्रभः ॥ ७ ॥
' पुलस्त्यजीके मानस पुत्र तेजस्वी महर्षि विश्रवा हैं । वे भी प्रजापतिके समान ही प्रकाशित होते हैं ॥ ७ ॥
तस्य पुत्रो विशालाक्षि रावणः शत्रुरावणः ।
तस्य त्वं राक्षसेन्द्रस्य भार्या भवितुमर्हसि ॥ ८ ॥
मयोक्तं चारुसर्वाङ्ग वाक्यं किं नानुमन्यसे । ' विशाललोचने! ये शत्रुओंके रुलानेवाले महाराज रावण उन्हीं के पुत्र हैं और समस्त राक्षोंके राजा हैं । तुम्हें इनकी भार्या हो जाना चाहिये । सर्वाङ्गसुन्दरी । मेरी इस कही हुई बातका तुम अनुमोदन क्यों नहीं करतीं ११ ॥ ८३ ॥
ततो हरिजटा नाम राक्षसी वाक्यमब्रवीत् ॥ ९ ॥
विवृत्य नयने कोपान्मार्जारसदृशेक्षणा ।
येन देवास्त्रयस्त्रिंशद् देवराजश्च निर्जितः ॥ १० ॥
तस्य त्वं राक्षसेन्द्रस्य भार्या भवितुमर्हसि । इसके बाद बिल्ली के समान भूरे आँखोंवाली हरिजटा नामकी राक्षसीने क्रोधसे आँखें फाड़कर कहना आरम्भ किया— ' अरी! जिन्होंने तैंतीसों ' देवताओं तथा देवराज इन्द्रको भी परास्त कर दिया है, उन राक्षसराज रावण की रानी तो तुम्हें अवश्य बन जाना चाहिये ॥ ९ -१०३ ॥
वीर्योत्सितस्य शूरस्य संग्रामेष्वनिवर्तिनः ।
बलिनो वीर्ययुक्तस्य भार्यात्वं किं न लिप्ससे ॥ ११ ॥
' उन्हें अपने पराक्रमपर गर्व है । वे युद्धसे पीछे न १. मरीचि, अत्रि, अङ्गिरा, पुलस्त्य, पुलह और क्रतु — ये छः प्रजापति हैं । २. बारह आदित्य, ग्यारह रुद्र, आठ वसु और दो अश्विनी-कुमार- ये तैंतीस देवता हैं 1 ' महाबली राजा रावण अपनी अधिक प्रिय और सम्मानित भार्या मन्दोदरीको भी, जो सबकी स्वामिनी हैं, छोड़कर तुम्हारे पास पधारेंगे । तुम्हारा कितना महान् सौभाग्य है । वे सहस्रों रमणियोंसे भरे हुए और अनेक प्रकारके रत्नोंसे सुशोभित उस अन्तःपुरको छोड़कर तुम्हारे पास पधारेंगे ( अतः तुम्हें उनकी प्रार्थना मान लेनी चाहिये ) ॥ १२-१३ ॥ अन्या तु विकटा नाम राक्षसी वाक्यमब्रवीत् ।
असकृद् भीमवीर्येण नागा गन्धर्वदानवाः ।
निर्जिताः समरे येन स ते पार्श्वमुपागतः ॥ १४ ॥
तस्य सर्वसमृद्धस्य रावणस्य महात्मनः ।
किमर्थ राक्षसेन्द्रस्य भार्यात्वं नेच्छसेऽधमे ॥ १५ ॥
तदनन्तर विकटा नामवाली दूसरी राक्षसीने कहा ---' जिन भयानक पराक्रमी राक्षसराजने नागों, गन्धर्वों और दानवों को भी समराङ्गणमें बारंबार परास्त किया है, वे ही तुम्हारे पास पधारे थे 1 । नीच नारी! उन्हीं सम्पूर्ण ऐश्वयसे सम्पन्न क्यों इच्छा महामना राक्षसराज रावण की भार्या बनने के लिये तुम्हें नहीं होती है? ' ॥ १४-१५ ॥ ततस्तां दुर्मुखी नाम राक्षसी वाक्यमब्रवीत् ।
यस्य सूर्यो न तपति भीतो यस्य स मारुतः ।
न वाति स्मायतापाङ्गि किं त्वं तस्य न तिष्ठसे ॥ १६ ॥
फिर उनसे दुर्मुखी नामवाली राक्षसीने कहा-‘ विशाललोचने! जिनसे भय मानकर सूर्य तपना छोड़ देता है और वायुकी गति रुक जाती है, उनके पास तुम क्यों नहीं रहतीं? ॥ १६ ॥
पुष्पवृष्टिं च तरवो मुमुचुर्यस्य वै भयात् ।
शैलाः सुस्रुवुः पानीयं जलदाश्च यदेच्छति ॥ १७ ॥
तस्य नैर्ऋतराजस्य राजराजस्य भामिनि ।
किं त्वं न कुरुषे बुद्धिं भार्यार्थे रावणस्य हि ॥ १८ ॥
' भामिनि । जिनके भयसे वृक्ष फूल बरसाने लगते हैं । और जो जब इच्छा करते हैं, तभी पर्वत तथा मेघ जलका स्रोत बहाने लगते हैं । उन्हीं राजाधिराज राक्षसराज रावण-की भार्या बनने के लिये तुम्हारे मनमें क्यों नहीं विचार होता है १ ॥ १७-१८ ॥ साधु ते तत्त्वतो देवि कथितं साधु भामिनि ।
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९ २५ सुन्दरकाण्डे चतुर्विंशः सर्गः मुस्कानवाली सीते! तुम मेरी बात मान लो,
वाक्यमन्यथा न भविष्यसि ॥ १ ९ ॥ कही है । सुन्दर हाथ धोना पड़ेगा ' ॥ १ ९ ॥
गृहाण सुस्मिते, यथार्थ और हितकी बात नहीं तो तुम्हें प्राणोंसे ' देवि! मैंने तुमसे उत्तम त्रयोविंशः सर्गः ॥ २३ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये सुन्दरकाण्डे में तेईसवाँ सगँ पूरा हुआ ॥ २३ ॥
श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के सुन्दरकाण्ड इस प्रकार चतुर्विंशः सर्गः बात माननेसे इनकार कर देना तथा राक्षसियोंका सीताजीका राक्षसियोंकी उन्हें मारने- काटने की धमकी देना
ततः सीतां समस्तास्ता राक्षस्यो विकृताननाः ।
॥ १ ॥
परुषं परुषानहमूचुस्तद्वाक्यमप्रियम् उन समस्त राक्षसियोंने जो तदनन्तर विकराल मुखवाली तथा कटुवचन सुनने के योग्य नहीं थीं, उन सीतासे अप्रिय कठोर वचन कहना आरम्भ किया ॥ १ ॥
किं स्वमन्तःपुरे सीते सर्वभूतमनोरमे ।
न वासमनुमन्यसे ॥ २ ॥
महाईशयनोपेते समस्त प्राणियों के लिये मनोरम ' सीते | रावणका अन्तःपुर है । वहाँ बहुमूल्य शय्याएँ बिछी रहती हैं । उस अन्तःपुरमें निवास हो, इसके लिये तुम क्यों नहीं अनुमति तुम्हारा देतीं १ ॥ २ ॥ ।
मानुषी मानुषस्यैव भार्यात्वं बहु मन्यसे ॥ ३ ॥
मनो रामान्नैव जातु भविष्यति प्रत्याहर ' तुम मानुषी हो, इसलिये मनुष्यकी भार्याका जो पद है, उसीको तुम अधिक महत्त्व देती हो; किंतु अब तुम रामकी ओरसे अपना मन हटा लो, अन्यथा कदापि जीवित नहीं रहोगी ॥ ३ ॥
त्रैलोक्यवभोक्तारं रावणं राक्षसेश्वरम् ।
विहरख यथासुखम् ॥ ४ ॥
' तुम सब मिलकर मुझसे जो यह लोक - विरुद्ध प्रस्ताव कर रही हो, तुम्हारा यह पापपूर्ण वचन मेरे हृदय में एक क्षण के लिये भी नहीं ठहर पाता है ॥ ७ ॥
राक्षसस्य भार्या भवितुमर्हति ।
न मानुषी मां सर्वा न करिष्यामि वो वचः ॥ ८ ॥
कामं खादत भार्या नहीं हो " एक मानवकन्या किसी राक्षसकी खा जाओ; किंतु सकती । तुम सब लोग भले ही मुझे बात नहीं मान सकती ॥ ८ ॥
मैं तुम्हारी
वा राज्यहीनो वा यो मे भर्ता स मे गुरुः ।
दीनो सूर्य सुवर्चला ॥ ९ ॥
तं नित्यमनुरक्तास्मि हों अथवा यथा राज्यद्दीन — वे ही मेरे स्वामी " मेरे पति दीन हैं, वे ही मेरे गुरु हैं, मैं सदा उन्हींमें अनुरक्त हूँ और सूर्यमें अनुरक्त रहती हैं ॥ ९ ॥
रहूँगी । जैसे सुवर्चला । यथा शची महाभागा शक्रं समुपतिष्ठति यथा ॥ १० ॥
अरुन्धती वसिष्ठं च रोहिणी शशिनं
लोपामुद्रा यथागस्त्यं सुकन्या च्यवनं यथा ।
सत्यवन्तं च कपिलं श्रीमती यथा ॥ ११ ॥
सावित्री केशिनी सगरं यथा ।
सौदासं मदयन्तीव भैमी पतिमनुव्रता ॥ १२ ॥
नैषधं दमयन्तीव रामं पतिमनुव्रता । तथादमिक्ष्वाकुवरं भर्तारमुपसंगम्य भोगनेवाले राक्षसराज रावणको ' जैसे महाभागा शची इन्द्रकी सेवामें उपस्थित होती हैं, ' तुम त्रिलोकीके ऐश्वर्यको करो ॥ ४ ॥ देवी अरुन्धती महर्षि वसिष्ठ में, रोहिणी चन्द्रमामें, लोपा-पतिरूपमें पाकर आनन्दपूर्वक विहार । जैसे च्यवनमें, सावित्री सत्यवान् में,
मानुषी मानुषं तं तु राममिच्छसि शोभने मुद्रा अगस्त्यमें, सुकन्या, केशिनी सगर में तथा विक्नुवन्तमनिन्दिते ॥ ५ ॥ श्रीमती कपिलमें, मदयन्ती सौदासमें
राज्याद् भ्रष्टमसिद्धार्थ भीमकुमारी दमयन्ती अपने पति निषधनरेश नलमें अनुराग ' अनिन्द्य सुन्दरि! तुम मानवी हो, इसीलिये मनुष्य- रखती हैं, उसी प्रकार मैं भी अपने पतिदेव इक्ष्वाकुवंश-जातीय रामको ही चाहती हो; परंतु राम इस समय राज्यसे भगवान् श्रीराममें अनुरक्त हूँ ' ॥ १०–१२३ ॥
भ्रष्ट हैं । उनका कोई मनोरथ सफल नहीं होता है तथा वे शिरोमणि क्रोधमूर्चिछताः ।
व्याकुल रहते हैं ' ॥ ५ ॥ सीताया वचनं श्रुत्वा राक्षस्यः रावणचोदिताः ॥ १३ ॥
सदा राक्षसीनां वचः श्रुत्वा सीता पद्मनिभेक्षणा । भर्त्सयन्ति स्म परुषैर्वाक्यै क्रोध की सीमा न रही । वे वचनमब्रवीत् ॥ ६ ॥ सीताकी बात सुनकर राक्षसियोंके धमकाने
नेत्राभ्यामश्रुपूर्णाभ्यामिदं सीताने आँसू- रावणकी आज्ञाके अनुसार कठोर वचनोंद्वारा उन्हें राक्षसियोंकी ये बातें सुनकर कमलनयनी
भरे नेत्रोंसे उनकी ओर देखकर इस प्रकार कहा— ॥ ६ ॥ लगीं ॥ १३ ॥ हनुमाशशपाद्रुमे ।
लोकविद्विष्टमुदाहरत संगताः । अवलीनः स निर्वाक्यो कपिः ॥ १४ ॥
यदिदं मे किल्विषं प्रतितिष्ठति ॥ ७ ॥ सीतां संतर्जयन्तीस्ता राक्षसीरशृणोत्
नैतन्मनसि वाक्यं