Ramayana 2 — पृष्ठ 131–140

वाल्मीकि रामायण — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 131–140

पृष्ठ 131

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९ ५४ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे

श्रुत्वा भ्रातृवधं कोपादिदं वचनमब्रवीत् ।

यवीयान् केन मे भ्राता हतः क्व च निपातितः ॥ ६५ ॥

एतदाख्यातुमिच्छामि भवद्भिर्वानरोत्तमाः । ' हमारे मुँह से अपने भाईके वधकी चर्चा सुनकर वे कुपित हो उठे और बोले - ' वानर शिरोमणियो! बताओ, मेरे छोटे भाई जटायुका वध किसने किया है? वह कहाँ मारा गया है? यह सब वृत्तान्त मैं तुमलोगोंसे सुनना चाहता हूँ ' ॥ ६५३ ॥

अङ्गदोऽकथयत् तस्य जनस्थाने महद्वधम् ॥ ६६ ॥

रक्षसा भीमरूपेण त्वामुद्दिश्य यथार्थतः । ‘ तब अंगदने जनस्थानमें आपकी रक्षाके उद्देश्यसे जूझते समय जटायुका उस भयानक रूपधारी राक्षसके द्वारा जो महान् वध किया गया था, वह सब प्रसंग ज्यों - का - त्यों कह सुनाया ॥ ६६३ ॥

जटायोस्तु वधं श्रुत्वा दुःखितः सोऽरुणात्मजः ॥ ६७ ॥

त्वामह स वरारोहे वसन्तीं रावणालये । ' जटायुके वधका वृत्तान्त सुनकर अरुणपुत्र सम्पातिको बड़ा दुःख हुआ । वरारोहे! उन्होंने ही हमें बताया कि आप रावण के घर में निवास कर रही हैं ॥ ६७३ ॥

तस्य तद्वचनं श्रुत्वा सम्पातेः प्रीतिवर्धनम् ॥ ६८ ॥

अङ्गदप्रमुखाः सर्वे ततः प्रस्थापिता वयम् ।

विन्ध्यादुत्थाय सम्प्राप्ताः सागरस्यान्तमुत्तमम् ॥ ६ ९ ॥

त्वदर्शने कृतोत्साह हृष्टाः पुष्टाः प्लवङ्गमाः ।

अङ्गदप्रमुखाः सर्वे वेलोपान्तमुपागताः ॥ ७० ॥

' सम्पातिका वह वचन वानरोंके लिये बड़ा हर्षवर्धक था । उसे सुनकर उन्हींके भेजने से अङ्गद आदि हम सभी वानर आपके दर्शनकी आशासे उत्साहित हो विन्ध्यपर्वतसे उठकर समुदके उत्तम तटपर आये । इस प्रकार अङ्गद आदि सभी हृष्ट - पुष्ट वानर समुद्र के किनारे आ पहुँचे ॥ ६८-७० ॥

चिन्तां जग्मुः पुनर्भीमां त्वदर्शनसमुत्सुकाः ।

अथाहं हरिसैन्यस्य सागरं दृश्य सीदतः ॥ ७१ ॥

व्यवधूय भयं तीव्रं योजनानां शतं प्लुतः । ' आपके दर्शन के लिये उत्सुक होनेपर भी सामने अपार समुद्रको देखकर सब वानर फिर भयानक चिन्तामें पड़ गये । समुद्रको देखकर वानर सेना कष्टमें पड़ गयी है, यह जानकर मैं उन सबके तीव्र भयको दूर करता हुआ सौ योजन समुद्र-को लाँघकर यहाँ आ गया ॥ ७१३ ॥

लङ्का चापि मया रात्रौ प्रविष्टा राक्षसाकुला ॥ ७२ ॥

रावणश्च मया दृष्टस्त्वं च शोकनिपीडिता । ' राक्षसोंसे भरी हुई लङ्का में मैंने रातमें ही प्रवेश किया है । यहाँ आकर रावणको देखा है और शोकसे पीड़ित हुई आपका भी दर्शन किया है ॥ ७२३ ॥

एतत् ते सर्वमाख्यातं यथावृत्तमनिन्दिते ॥ ७३ ॥

अभिभाषस्व मां देवि दृतो दाशरथेरहम् । ' सतीशिरोमणे! यह सारा वृत्तान्त मैंने ठीक - टीक आपके सामने रक्खा है | देवि | दशरथनन्दन श्रीरामका दूत हूँ, अतः आप मुझसे बात कीजिये ॥ ७३३ ॥

तम्मां रामकृतोद्योगं त्वन्निमित्तमिहागतम् ॥ ७४ ॥

सुग्रीवसचिवं देवि बुद्धयस्व पवनात्मजम् । " मैंने श्रीरामचन्द्रजी के कार्यकी सिद्धिके लिये ही यह सारा उद्योग किया है और आपके दर्शन के निमित्त मैं यहाँ आया हूँ । देवि! आप मुझे सुग्रीव का मन्त्री तथा वायुदेवता-का पुत्र हनुमान् समझें ॥ ७४३ ॥

कुशली तब काकुत्स्थः सर्वशस्त्रभृतां वरः ॥ ७५ ॥

गुरोराराधने युक्तो लक्ष्मणः शुभलक्षणः ।

तस्य वीर्यवतो देवि भर्तुस्तव हिते रतः ॥ ७६ ॥

' देवि! आपके पतिदेव समस्त शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ ककुत्स्थकुलभूषण श्रीरामचन्द्रजी सकुशल हैं तथा बड़े भाई-की सेवामें संलग्न रहनेवाले शुभलक्षण लक्ष्मण भी प्रसन्न । वे आपके उन पराक्रमी पतिदेव के हित - साधन में ही तत्पर रहते हैं ॥ ७५-७६ ॥

अहमेकस्तु सम्प्राप्तः सुग्रीववचनादिह ।

मयेयमसहायेन चरता कामरूपिणा ॥ ७७ ॥

दक्षिणा दिगनुक्रान्ता त्वन्मार्गविचयैषिणा । “ मैं सुग्रीवकी आज्ञा से अकेला ही यहाँ आया हूँ । इच्छानुसार रूप धारण करने की शक्ति रखता हूँ । आपका पता लगाने की इच्छा से मैंने बिना किसी सहायक के अकेले ही घूम - फिरकर इस दक्षिण दिशाका अनुसंधान किया है ॥ ७७३ ॥

दिष्टयाहं हरिसैन्यानां त्वन्नाशमनुशोचताम् ॥ ७८ ॥

अपनेष्यामि संतापं तवाधिगमशासनात् । ' आपके विनाशकी सम्भावना से जो निरन्तर शोक में डूबे रहते हैं, उन वानरसैनिकोंको यह बताकर कि आप मिल गयीं, मैं उनका संताप दूर करूँगा । यह मेरे लिये बड़े हर्षकी बात होगी ॥ ७८३ ॥

दिष्टया हि न मम व्यर्थ सागरस्येह लङ्घनम् ॥ ७ ९ ॥ प्राप्स्याम्यहमिदं देवि त्वद्दर्शनकृतं यशः । ' देवि! मेरा समुद्रको लाँघकर यहाँतक आना व्यर्थ नहीं

हुआ । सबसे पहले आपके दर्शनका यह यश मुझे ही मिलेगा ।

यह मेरे लिये सौभाग्य की बात है ॥ ७ ९ ३ ॥

राघवश्च महावीर्यः क्षिप्रं त्वामभिपत्स्यते ॥ ८० ॥

सपुत्रबान्धवं हत्वा रावणं राक्षसाधिपम् । ' महापराक्रमी श्रीरामचन्द्रजी राक्षसराज रावणको उसके पुत्र और बन्धुबान्धवों सहित मारकर शीघ्र ही आपसे आ मिलेंगे ॥ ८०३

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सुन्दरकाण्डे षट्त्रिंशः सर्गः ९ ५५ माल्यवान् नाम वैदेहि गिरीणामुत्तमो गिरिः ॥ ८१ ॥

ततो गच्छति गोकर्ण पर्वतं केसरी हरिः ।

स च देवर्षिभिर्दिष्टः पिता मम महाकपिः ।

तीर्थे नदीपतेः पुण्ये शम्बसादनमुद्धरन् ॥ ८२ ॥

यस्याहं हरिणः क्षेत्रे जातो वातेन मैथिलि ।

हनूमानिति विख्यातो लोके स्वेनैव कर्मणा ॥ ८३ ॥

' विदेहनन्दिनि! पर्वतों में माल्यवान् नामसे प्रसिद्ध एक उत्तम पर्वत है । वहाँ केसरी नामक वानर निवास करते थे । एक दिन वे वहाँसे गोकर्ण पर्वतपर गये । महाकपि केसरी मेरे पिता हैं । उन्होंने समुद्र के तटपर विद्यमान उस पवित्र गोकर्ण तीर्थ में देवर्षियोंकी आज्ञासे शम्बसादन नामक दैत्य का संहार किया था । मिथिलेशकुमारी! उन्हीं कपिराज केसरीकी स्त्रीके गर्भ से वायुदेवताके द्वारा मेरा जन्म हुआ है । मैं लोकमें अपने ही कर्मद्वारा ' हनुमान् ' नामसे विख्यात हूँ ॥ ८१-८३ ॥

विश्वासार्थ तु वैदेहि भर्तुरुक्ता मया गुणाः ।

अचिरात् त्वामितो देवि राघवो नयिता ध्रुवम् ॥ ८४ ॥

' विदेहनन्दिनि । आपको विश्वास दिलाने के लिये मैंने आपके स्वामी के गुणों का वर्णन किया है । देवि! श्रीरघुनाथ-जी शीघ्र ही आपको यहाँ से ले चलेंगे यह निश्चित बात ' है ' ॥ ८४ ॥

एवं विश्वासिता सीता हेतुभिः शोककर्शिता ।

उपपन्नैरभिज्ञानैर्दूतं तमधिगच्छति ॥ ८५ ॥

इस प्रकार युक्तियुक्त एवं विश्वसनीय कारणों तथा पहचान के रूपमें बताये गये श्रीराम और लक्ष्मणके शारीरिक चिह्नोंद्वारा हनुमानजीने शोकसे दुर्बल हुई सीता को अपना विश्वास दिलाया । तब उन्होंने हनुमानजीको श्रीरामका दूत समझा ॥ ८५ ॥

अतुलं च गता हर्षे प्रहर्षेण तु जानकी ।

नेत्राभ्यां वक्रपक्ष्माभ्यां मुमोचानन्दजं जलम् ॥ ८६ ॥

उस समय जनकनन्दिनी सीताको अनुपम हर्ष प्राप्त हुआ । उस महान् हर्ष के कारण वे कुटिल बरौनियोंवाले दोनों नेत्रोंसे आनन्द के आँसू बहाने लगीं ॥ ८६ ॥

चारु तद् वदनं तस्यास्ताम्रशुक्लायतेक्षणम् ।

अशोभत विशालाक्ष्या राहुमुक्त इवोडुराट् ॥ ८७ ॥

उस अवसर पर विशाललोचना सीताका मनोहर मुख, जो लाल, सफेद और बड़े - बड़े नेत्रोंसे युक्त था, राहु के ग्रहणसे मुक्त हुए चन्द्रमा के समान शोभा पा रहा था ॥ ८७ ॥

हनूमन्तं कपिं व्यक्तं मन्यते नान्यथेति सा ।

अथोवाच हनूमांस्तामुत्तरं प्रियदर्शनाम् ॥ ८८ ॥

अब वे हनुमानको वास्तविक वानर मानने लगीं । इसके विपरीत मायामय रूपधारी राक्षस नहीं । तदनन्तर हनुमान्-जीने प्रियदर्शना सीतासे फिर कहा- ॥ ८८ ॥

एतत् ते सर्वमाख्यातं समाश्वसिहि मैथिलि ।

किं करोमि कथं वा ते रोचते प्रतियाम्यहम् ॥ ८ ९ ॥

' मिथिलेशकुमारी! इस प्रकार आपने जो कुछ पूछा था, वह सब मैंने बता दिया । अब आप धैर्य धारण करें । बताइये, मैं आपकी कैसी और क्या सेवा करूँ । इस समय आपकी रुचि क्या है, आज्ञा हो तो अब मैं लौट जाऊँ ॥ तेऽसुरे संयति शम्बसादने कपिप्रवीरेण महर्षिचोदनात् । ततोऽस्मि वायुप्रभवो हि मैथिलि प्रभावतस्तत्प्रतिमश्च वानरः ॥ ९ ० ॥ ' महर्षियों की प्रेरणा से कपिवर केसरीद्वारा युद्ध में शम्ब-सादन नामक असुर के मारे जानेपर मैंने पवनदेवता के द्वारा जन्म ग्रहण किया । अतः मैथिलि! मैं उन वायुदेवताके समान ही प्रभावशाली वानर हूँ ' ॥ ९ ० ॥ इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये सुन्दरकाण्डे पञ्चत्रिंशः सर्गः ॥ ३५ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आरामायण आदिकाव्य के सुन्दरकाण्डमें पैंतीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ३५ ॥

षट्त्रिंशः सर्गः हनुमानजी का सीताको मुद्रिका देना, सीताका ' श्रीराम कब मेरा उद्धार करेंगे ' यह उत्सुक होकर पूछना तथा हनुमानजी का श्रीरामके सीताविषयक

भूय एव महातेजा हनूमान् पवनात्मजः ।

अब्रवीत् प्रथितं वाक्यं सीताप्रत्ययकारणात् ॥ १ ॥

तदनन्तर महातेजस्वी पवनकुमार हनुमान्जी सीताजी को विश्वास दिलाने के लिये पुनः विनययुक्त वचन बोले - ॥ १ ॥

वानरोऽहं महाभागे दूतो रामस्य धीमतः ।

रामनामाङ्कितं चेदं पश्य देव्यङ्गुलीयकम् ॥ २ ॥

प्रेमका वर्णन करके उन्हें सान्त्वना देना ' महाभागे! मैं परम बुद्धिमान् भगवान् श्रीरामका दूत वानर हूँ । देवि! यह श्रीरामनामसे अङ्कित मुद्रिका है, इसे लेकर देखिये ॥ २ ॥

प्रत्ययार्थ तवानीतं तेन दत्तं महात्मना ।

समाश्वसिहि भद्रं ते क्षीणदुःखफला ह्यसि ॥ ३ ॥

' आपको विश्वास दिलाने के लिये ही मैं इसे लेता आया

पृष्ठ 133

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९ ५६ श्रीमद्वाल्मीकीय रामायणे हूँ | महात्मा श्रीरामचन्द्रजीने स्वयं यह अंगूठी मेरे हाथमें दी थी । आपका कल्याण हो । अब आप धैर्य धारण करें । आपको जो दुःखरूपी फल मिल रहा था, वह अब समाप्त हो चला है ' ॥ ३ ॥

गृहीत्वा प्रेक्षमाणा सा भर्तुः करविभूषितम् ।

भर्तारमिव सम्प्राप्तं जानकी मुदिताभवत् ॥ ४ ॥

पति के हाथ को सुशोभित करनेवाली उस मुद्रिकाको लेकर सीताजी उसे ध्यान से देखने लगीं । उस समय जानकीजीको इतनी प्रसन्नता हुई, मानो स्वयं उनके पतिदेव ही उन्हें मिल गये हो ॥ ४ ॥

चारु तद् वदनं तस्यास्ताम्रशुक्लायतेक्षणम् ।

बभूव हर्षोदग्रं च राहुमुक्त इवोडुराट् ॥ ५ ॥

" उनका लाल, सफेद और विशाल नेत्रोंसे युक्त मनोहर मुख हर्षसे खिल उठा, मानो चन्द्रमा राहुके ग्रहणसे मुक्त हो गया हो ॥ ५ ॥

ततः सा हीमती बाला भर्तुः संदेशहर्षिता ।

परितुष्टा प्रियं कृत्वा प्रशशंस महाकपिम् ॥ ६ ॥

वे लजीली विदेवाला प्रियतमका संदेश पाकर बहुत प्रसन्न हुई । उनके मनको बड़ा संतोष हुआ । वे महाकपि हनूमान् जीका आदर करके उनकी प्रशंसा करने लगी ॥ ६ ॥

विक्रान्तस्त्वं समर्थस्त्वं प्राज्ञस्त्वं वानरोत्तम ।

येनेदं राक्षसपदं त्वयैकेन प्रधर्षितम् ॥ ७ ॥

' वानरश्रेष्ठ! तुम बड़े पराक्रमी, शक्तिशाली और बुद्धिमान् हो; क्योंकि तुमने अकेले ही इस राक्षसपुरीको पददलित कर दिया है ॥ ७ ॥

शतयोजनविस्तीर्णः सागरो मकरालयः ।

विक्रमश्लाघनीयेन क्रमता गोष्पदीकृतः ॥ ८ ॥

" तुम अपने पराक्रमके कारण प्रशंसा के योग्य हो; क्योंकि तुमने मगर आदि जन्तुओंसे भरे हुए सौ योजन विस्तारवाले महासागरको लाँघते समय उसे गायकी खुरीके बराबर समझा है । इसलिये प्रशंसा के पात्र हो ॥ ८ ॥

नहि त्वां प्राकृतं मन्ये वानरं वानरर्षभ ।

यस्य ते नास्ति संत्रासो रावणादपि सम्भ्रमः ॥ ९ ॥

" वानर शिरोमणे । मैं तुम्हें कोई साधारण वानर नहीं मानती हूँ; क्योंकि तुम्हारे मनमें रावण जैसे राक्षससे भी न तो भय होता है और न घबराहट ही ॥ ९ ॥

अर्हसे च कपिश्रेष्ठ मया समभिभाषितुम् ।

यद्यसि प्रेषितस्तेन रामेण विदितात्मना ॥ १० ॥

' कपिश्रेष्ठ! यदि तुम्हें आत्मज्ञानी भगवान् श्रीरामने भेजा है तो तुम अवश्य इस योग्य हो कि मैं तुमसे बातचीत करूँ ॥ १० ॥

प्रेषयिष्यति दुर्धर्षो रामो नह्यपरीक्षितम् ।

पराक्रममविज्ञाय मत्सकाशं विशेषतः ॥ ११ ॥

' दुर्धर्ष वीर श्रीरामचन्द्रजी विशेषतः मेरे निकट ऐसे किसी पुरुषको नहीं भेजेंगे, जिसके पराक्रमका उन्हें ज्ञान न हो तथा जिसके शीलस्वभावकी उन्होंने परीक्षा न कर ली हो ॥ ११ ॥

दिष्ट्याच कुशली रामो धर्मात्मा सत्यसंगरः ।

लक्ष्मणश्च महातेजाः सुमित्रानन्दवर्धनः ॥ १२ ॥

' सत्यप्रतिज्ञ एवं धर्मात्मा भगवान् श्रीराम सकुशल हैं । तथा सुमित्रा का आनन्द बढ़ानेवाले महातेजस्वी लक्ष्मण भी स्वस्थ एवं सुखी हैं, यह जानकर मुझे बड़ा हर्ष हुआ है और यह शुभ संवाद मेरे लिये सौभाग्यका सूचक है ॥ १२ ॥

कुशली यदि काकुत्स्थः किं न सागरमेखलाम् ।

महीं दहति कोपेन युगान्ताग्निरिवोत्थितः ॥ १३ ॥

' यदि ककुत्स्थकु भूषण श्रीराम सकुशल हैं तो वे प्रलय-कालमें उठे हुए प्रलयंकर अग्निके समान कुपित हो समुद्रोंसे घिरी हुई सारी पृथ्वीको दग्ध क्यों नहीं कर देते हैं? ॥ १३ ॥

अथवा शक्तिमन्तौ तौ सुराणामपि निग्रहे ।

ममैव तु न दुःखानामस्ति मन्ये विपर्ययः ॥ १४ ॥

' अथवा वे दोनों भाई देवताओंको भी दण्ड देनेकी शक्ति रखते हैं ( तो भी अबतक जो चुप बैठे हैं, इसमें उनका नहीं मेरे ही भाग्यका दोष है ) । मैं समझती हूँ कि अभी मेरे ही दुःखोंका अन्त नहीं आया है ॥ १४ ॥

कच्चिन्न व्यथते रामः कञ्चिन्न परितप्यते ।

उत्तराणि च कार्याणि कुरुते पुरुषोत्तमः ॥ १५ ॥

' अच्छा ', यह तो बताओ, पुरुषोत्तम श्रीरामचन्द्रजी के मनमें कोई व्यथा तो नहीं है? वे संतप्त तो नहीं होते? उन्हें आगे जो कुछ करना है, उसे वे करते हैं या नहीं? ॥१५ ॥

कच्चिन्न दीनः सम्भ्रान्तः कार्येषु च न मुह्यति ।

कच्चित् पुरुषकार्याणि कुरुते नृपतेः सुतः ॥ ६६ ॥

' उन्हें किसी प्रकारको दीनता या घबराहट तो नहीं है? वे काम करते - करते मोहके वशीभूत तो नहीं हो जाते? क्या राजकुमार श्रीराम पुरुषोचित कार्य ( पुरुषार्थ ) करते हैं? ॥ १६ ॥

द्विविधं त्रिविधोपायमुपायमपि सेवते ।

विजिगीषुः सुहृत् कश्चिन्मित्रेषु च परंतपः ॥ १७ ॥

क्या शत्रुओंको संताप देनेवाले श्रीराम मित्रोंके प्रति मित्रभाव रखकर साम और दान रूप दो उपायोंका ही अवलम्बन करते हैं? तथा शत्रुओंके प्रति उन्हें जीतने की इच्छा रखकर दान, भेद और दण्ड - इन तीन प्रकारके उपायोंका ही आश्रय लेते हैं? ॥ १७ ॥

कच्चिन्मित्राणि लभतेऽमित्रैश्चाप्यभिगम्यते ।

कच्चित् कल्याणमित्रश्च मित्रैश्चापि पुरस्कृतः ॥ १८ ॥

' क्या श्रीराम स्वयं प्रयत्नपूर्वक मित्रोंका संग्रह करते

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सुन्दरकाण्डे षट्त्रिंशः सर्गः ९ ५७ हैं? क्या उनके शत्रु भी शरणागत होकर अपनी रक्षा के लिये उनके पास आते हैं? क्या उन्होंने मित्रोंका उपकार करके उन्हें अपने लिये कल्याणकारी बना लिया है? क्या वे कभी अपने मित्रोंसे भी उपकृत या पुरस्कृत होते हैं? ॥ १८ ॥

कच्चिदाशास्ति देवानां प्रसादं पार्थिवात्मजः ।

कच्चित् पुरुषकार च देवं च प्रतिपद्यते ॥ १ ९ ॥

' क्या राजकुमार श्रीराम कभी देवताओंका भी कृपा-प्रसाद चाहते हैं- उनकी कृपाके लिये प्रार्थना करते हैं? क्या वे पुरुषार्थ और देव दोनों का आश्रय लेते हैं? ॥ १ ९ ॥

कच्चिन्न विगतस्नेहो विवासान्मयि राघवः ।

कच्चिन्मां व्यसनादस्मान्मोक्षयिष्यति राघवः ॥ २० ॥

' दुर्भाग्यवश मैं उनसे दूर हो गयी हूँ । इस कारण श्रीरघुनाथजी मुझपर स्नेहहीन तो नहीं हो गये हैं? क्या वे मुझे कभी इस संकट से छुड़ायेंगे ॥ २० ॥

सुखानामुचितो नित्यमसुखानामनूचितः ।

दुःखमुत्तरमासाद्य कच्चिद् रामो न सीदति ॥ २१ ॥

' वे सदा सुख भोगने के ही योग्य हैं, दुःख भोगनेके योग्य कदापि नहीं हैं; परंतु इन दिनों दुःख - पर - दुःख उठाने के कारण श्रीराम अधिक खिन्न और शिथिल तो नहीं हो गये हैं? ॥ २१ ॥

कौसल्यायास्तथा कश्चित् सुमित्रायास्तथैव च ।

अभीक्ष्णं श्रूयते कश्चित् कुशलं भरतस्य च ॥ २२ ॥

" क्या उन्हें माता कौसल्या, सुमित्रा तथा भरतका कुशल- समाचार बराबर मिलता रहता है? ॥ २२ ॥

मनिमित्तेन मानाहः कञ्चिच्छोकेन राघवः ।

कच्चिन्नान्यमना रामः कच्चिन्मां तारयिष्यति ॥ २३ ॥

' क्या सम्माननीय श्रीरघुनाथजी मेरे लिये होनेवाले शोकसे अधिक संतप्त हैं? वे मेरी ओरसे अन्यमनस्क तो नहीं हो गये हैं? क्या श्रीराम मुझे इस संकट से उचारेंगे? || २३ ॥

कच्चिदक्षौहिणीं भीमां भरतो भ्रातृवत्सलः ।

ध्वजिनीं मन्त्रिभिर्गुप्तां प्रेषयिष्यति मत्कृते ॥ २४ ॥

' क्या भाईपर अनुराग रखनेवाले भरतजी मेरे उद्धारके लिये मन्त्रियोंद्वारा सुरक्षित भयंकर अक्षौहिणी सेना भेजेंगे? ॥ २४ ॥

वानराधिपतिः श्रीमान् सुग्रीवः कच्चिदेष्यति ।

हरिभिवरैर्वृतो दन्तनखायुधैः ॥ २५ ॥

' क्या श्रीमान् वानरराज सुग्रीव दाँत और नखसे प्रहार करनेवाले वीर वानरोंको साथ ले मुझे छुड़ानेके लिये यहाँतक आनेका कष्ट करेंगे १ ॥ २५ ॥

कच्चिच्च लक्ष्मणः शूरः सुमित्रानन्दवर्धनः ।

अत्रविच्छरजालेन राक्षसान् विधमिष्यति ॥ २६ ॥

' क्या सुमित्राका आनन्द बढ़ानेवाले शूरवीर लक्ष्मण, जो अनेक अस्त्रों के ज्ञाता हैं, अपने बाणोंकी वर्षासे राक्षसोंका संहार करेंगे? ॥ २६ ॥

रौद्रेण कच्चिदस्त्रेण रामेण निहतं रणे ।

द्रक्ष्याम्यल्पेन कालेन रावणं ससुहृज्जनम् ॥ २७ ॥

' क्या मैं रावणको उसके बन्धु बान्धवसहित थोड़े ही दिनोंमें श्रीरघुनाथजीके द्वारा युद्ध में भयंकर अस्त्र - शस्त्रों से मारा गया देखूँगी? ॥ २७ ॥

क तद्धेमसमानवर्ण तस्याननं पद्मसमानगन्धि । मया विना शुष्यति शोकदीनं जलनये पद्ममिवातपेन ॥ २८ ॥

' जैसे पानी सूख जानेपर धूपसे कमल सूख जाता है, उसी प्रकार मेरे बिना शोकसे दुखी हुआ श्रीरामका वह सुवर्ण के समान कान्तिमान् और कमलके सदृश सुगन्धित मुख सूख तो नहीं गया है? ॥ २८ ॥

धर्मापदेशात् त्यजतः खराज्यं मां चाप्यरण्यं नयतः पदातेः । नासीद् यथा यस्य न भीर्न शोकः कश्चित् स धैर्य हृदये करोति ॥ २ ९ ॥ ' धर्मपालन के उद्देश्यसे अपने राज्यका त्याग करते और मुझे पैदल ही वनमें लाते समय जिन्हें तनिक भी भय और शोक नहीं हुआ, वे श्रीरघुनाथजी इस संकट के समय हृदय में धैर्य तो धारण करते हैं न १ ॥ २ ९ ॥ न चास्य माता न पिता न चान्यः स्नेहाद विशिष्टोऽस्ति मया समोवा । तावद्धयहं दूत जिजीविषेयं यावत् प्रवृत्तिं शृणुयां प्रियस्य ॥ ३० ॥

' दूत! उनके माता - पिता तथा अन्य कोई सम्बन्धी भी ऐसे नहीं हैं, जिन्हें उनका स्नेह मुझसे अधिक अथवा मेरे बराबर भी मिला हो । मैं तो तभीतक जीवित रहना चाहती हूँ, जबतक यहाँ आनेके सम्बन्ध में अपने प्रियतमकी प्रवृत्ति सुन रही हूँ ' ॥ ३० ॥

इतीय देवी वचनं महार्थ तं वानरेन्द्रं मधुरार्थमुक्त्वा । श्रोतुं पुनस्तस्य वचोऽभिरामं रामार्थयुक्तं विरराम रामा ॥ ३१ ॥

देवी सीता वानरश्रेष्ठ हनुमान् के प्रति इस प्रकार महान् अर्थसे युक्त मधुर वचन कहकर श्रीरामचन्द्रजीसे सम्बन्ध रखनेवाली उनकी मनोहर वाणी पुनः सुनने के लिये चुप हो गयीं ॥ ३१ ॥

सीताया वचनं श्रुत्वा मारुतिर्भीमविक्रमः ।

शिरस्यञ्जलिमाधाय वाक्यमुत्तरमब्रवीत् ॥ ३२ ॥

सीताजीका वचन सुनकर भयंकर पराक्रमी पवनकुमार

पृष्ठ 135

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९ ५८ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे हनुमान् मस्तकपर अञ्जलि बाँधे उन्हें इस प्रकार उत्तर देने लगे ॥ ३२ ॥

न त्वामहस्थां जानीते रामः कमललोचनः ।

तेन त्वां नानयत्याशु शचीमिव पुरंदरः ॥ ३३ ॥

' देवि! कमलनयन भगवान् श्रीरामको यह पता ही नहीं है कि आप लङ्कामें रह रही हैं । इसीलिये जैसे इन्द्र दानवों के यहाँसे शचीको उठा ले गये, उस प्रकार वे शीघ्र यहाँसे आपको नहीं ले जा रहे हैं ॥ ३३ ॥

श्रुत्वैव च वचो मह्यं क्षिप्रमेष्यति राघवः ।

चमूं प्रकर्षन् महतीं इयृक्षगणसंयुताम् ॥ ३४ ॥

' जब मैं यहाँसे लौटकर जाऊँगा, तब मेरी बात सुनते ही श्रीरघुनाथजी वानर और भालुओंकी विशाल सेना लेकर तुरंत वहाँसे चल देंगे ॥ ३४ ॥

विष्टम्भयित्वा बाणौघैरक्षोभ्यं करिष्यति पुरीं लङ्कां काकुत्स्थः ' ककुत्स्थ कुलभूषण श्रीराम अक्षोभ्य महासागरको भी स्तब्ध कर लङ्कापुरीमें पहुँच जायँगे कर देंगें ॥ ३५ ॥

वरुणालयम् ।

शान्तराक्षसाम् ॥ ३५ ॥

अपने बाण समूहद्वारा करके उसपर सेतु बाँध-और उसे राक्षसोंसे सूनी

तत्र यद्यन्तरा मृत्युर्यदि देवा महासुराः ।

स्थास्यन्ति पथि रामस्य स तानपि वधिष्यति ॥ ३६ ॥

' उस समय श्रीरामके मार्ग में यदि मृत्यु, देवता अथवा बड़े - बड़े असुर भी विघ्न बनकर खड़े होंगे तो वे उन सबका भी संहार कर डालेंगे ॥ ३६ ॥

तवादर्शनजेनायें शोकेन परिपूरितः ।

न शर्म लभते रामः सिंहार्दित इव द्विपः ॥ ३७ ॥

' आयें! आपको न देखने के कारण उत्पन्न हुए शोकसे उनका हृदय भरा रहता है; अतः श्रीराम सिंहसे पीड़ित हुए हाथी की भाँति क्षणभरको भी चैन नहीं पाते हैं ॥ ३७ ॥

मन्दरेण च ते देवि शपे मूलफलेन च ।

मलयेन च विन्ध्येन मेरुणा दर्दुरेण च ॥ ३८ ॥

यथा सुनयनं वल्गु बिम्बोष्ठं चारुकुण्डलम् ।

मुखं द्रक्ष्यसि रामस्य पूर्ण चन्द्रमिवोदितम् ॥ ३ ९ ॥

' देवि! मन्दर आदि पर्वत हमारे वासस्थान हैं और फल - मूल भोजन । अतः मैं ' मन्दराचल, मलय, विन्ध्य, मेरु तथा दर्द पर्वतकी और अपनी जीविका के साधन फल - मूलकी सौगंध खाकर कहता हूँ कि आप शीघ्र ही श्रीरामका नवोदित पूर्ण चन्द्रमाके समान वह मनोहर मुख देखेंगी, जो सुन्दर नेत्र, बिम्बफलके समान लाल - लाल ओठ और सुन्दर कुण्डलोंसे अलंकृत एवं चित्ताकर्षक है ॥ ३८-३९ ॥

क्षिप्रं द्रक्ष्यसि वैदेहि रामं प्रस्रवणे गिरौ ।

शतक्रतुमिवासीनं नागपृष्ठस्य मूर्धनि ॥ ४० ॥

' विदेहनन्दिनि! ऐरावत की पीठपर बैठे हुए देवराज इन्द्र के समान प्रस्रवण गिरिके शिखरपर विराजमान श्रीरामका आप शीघ्र दर्शन करेंगी ॥ ४० ॥

न मांसं राघवो भुङ्के न चैव मधु सेवते ।

वन्यं सुविहितं नित्यं भक्तमश्नाति पञ्चमम् ॥ ४१ ॥

" कोई भी रघुवंशी न तो मांस खाता है और न मधुका ही सेवन करता है; फिर भगवान् श्रीराम इन वस्तुओंका सेवन क्यों करते? वे सदा चार समय उपवास करके पाँचवें समय शास्त्रविहित जंगली फल - मूल और नीवार आदि भोजन करते हैं ॥ ४१ ॥

नैव दंशान् न मशकान् न कीठान् न सरीसृपान् ।

राघवोऽपनयेद् गात्रात् त्वद्गतेनान्तरात्मना ॥ ४२ ॥

' श्रीरघुनाथजीका चित्त सदा आपमें लगा रहता है, अतः उन्हें अपने शरीर पर चढ़े हुए डॉस, मच्छर, कीड़ों और सर्पोको हटाने की भी सुधि नहीं रहती ॥ ४२ ॥

नित्यं ध्यानपरो रामो नित्यं शोकपरायणः ।

नान्यश्चिन्तयते किंचित् स तु कामवशं गतः ॥ ४३ ॥

' श्रीराम आपके प्रेमके वशीभूत हो सदा आपका ही ध्यान करते और निरन्तर आपके ही विरह - शोकमें डूबे रहते हैं । आपको छोड़कर दूसरी कोई बात वे सोचते ही नहीं हैं ।

अनिद्रः सततं रामः सुप्तोऽपि च नरोत्तमः ।

सीतेति मधुरां वाणीं व्याहरन् प्रतिबुध्यते ॥ ४४ ॥

' नरश्रेष्ठ | श्रीरामको सदा आपकी चिन्ता के कारण कभी नींद नहीं आती है । यदि कभी आँख लगी भी तो ' सीता-सीता ' इस मधुर वाणीका उच्चारण करते हुए वे जल्दी ही जाग उठते हैं ॥ ४४ ॥

दृष्ट्रा फलं वा पुष्पं वा यच्चान्यत् स्त्रीमनोहरम् ।

बहुशो हा प्रियेत्येवं श्वसंस्त्वामभिभाषते ॥ ४५ ॥

' किसी फल, फूल अथवा स्त्रियोंके मनको लुभानेवाली दूसरी वस्तुको भी जब वे देखते हैं, तब लंबी साँस लेकर बारंबार ' हा प्रिये! हा प्रिये! ' कहते हुए आपको पुकारने लगते हैं ॥ ४५ ॥

स देवि नित्यं परितप्यमान-स्त्वामेव सीतेत्यभिभाषमाणः । धृतव्रतो राजसुतो महात्मा तवैव लाभाय कृतप्रयत्तः ॥ ४६ ॥

" देवि! राजकुमार महात्मा श्रीराम आपके लिये सदा दुखी रहते हैं, सीता - सीता कहकर आपकी ही रट लगाते हैं तथा उत्तम व्रतका पालन करते हुए आपकी ही प्राप्तिके प्रयत्न में लगे हुए हैं ' ॥ ४६ ॥

सा राम संकीर्तन वीतशोका रामस्य शोकेन समानशोका ।

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सुन्दरकाण्डे सप्तत्रिंशः सर्गः ९ ५ ९ शरम्मुखेनाम्बुदशेषचन्द्रा उन्हीं के समान शोकमें निमग्न हो गयीं । उस समय विदेह-निशेव वैदेहसुता बभूव ॥ ४७ ॥ नन्दिनी सीता शरद् ऋतु आनेपर मेघों की घटा और चन्द्रमा-श्रीरामचन्द्रजीकी चर्चासे सीताका अपना शोक तो दूर दोनोंसे युक्त ( अन्धकार और प्रकाशपूर्ण ) रात्रि के समान हर्ष

हो गया; किंतु श्रीरामके शोककी बात सुनकर वे पुनः और शोक से युक्त प्रतीत होती थीं ॥ ४७ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये सुन्दरकाण्डे ष‌ट्त्रिंशः सर्गः ॥ ३६ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आरामायण आदिकाव्यके सुन्दरकाण्डमें छत्तीसवाँ सगँ पूरा हुआ ॥ ३६ ॥

सप्तत्रिंशः सीताका हनुमान् जीसे श्रीरामको शीघ्र बुलाने साथ चलनेका अनुरोध तथा

सा सीता वचनं श्रुत्वा पूर्णचन्द्रनिभानना ।

हनूमन्तमुवाचेदं धर्मार्थसहितं वचः ॥ १ ॥

हनुमान् जीका पूर्वोक्त वचन सुनकर पूर्णचन्द्रमा के समान मनोहर मुखवाली सीताने उनसे धर्म और अर्थसे युक्त बात कही ॥ १ ॥

अमृतं विषसम्पृक्तं त्वया वानर भाषितम् ।

यच्च नान्यमना रामो यच्च शोकपरायणः ॥ २ ॥

' वानर! तुमने जो कहा कि श्रीरघुनाथजीका चित्त दूसरी ओर नहीं जाता और वे शोकमें डूबे रहते हैं, तुम्हारा यह कथन मुझे विषमिश्रित अमृत के समान लगा है ॥ २ ॥

ऐश्वर्ये वा सुविस्तीर्णे व्यसने वा सुदारुणे ।

रज्ज्येव पुरुषं बद्ध्वा कृतान्तः परिकर्षति ॥ ३ ॥

' कोई बड़े भारी ऐश्वर्य में स्थित हो अथवा अत्यन्त भयंकर विपत्ति में पड़ा हो, काल मनुष्यको इस तरह खींच लेता है, मानो उसे रस्सीमें बाँध रक्खा हो ॥ ३ ॥

विधिर्नूनम संहार्यः प्राणिनां प्लवगोत्तम ।

सौमित्रिं मां च रामं च व्यसनैः पश्य मोहितान् ॥ ४ ॥

' वानर शिरोमणे! दैवके विधानको रोकना प्राणियोंके वशकी बात नहीं है । उदाहरण के लिये सुमित्रा कुमार लक्ष्मणको, मुझको और श्रीरामको भी देख लो । हमलोग किस तरह वियोग - दुःखसे मोहित हो रहे हैं ॥ ४ ॥

शोकस्यास्य कथं पारं राघवोऽधिगमिष्यति ।

लवमानः परिक्रान्तो इतनौः सागरे यथा ॥ ५ ॥

' समुद्रमें नौकाके नष्ट हो जानेपर अपने हाथोंसे तैरने-वाले पराक्रमी पुरुषकी भाँति श्रीरघुनाथजी कैसे इस शोक-सागर से पार होंगे? ॥ ५ ॥

राक्षसानां वधं कृत्वा सूदयित्वा च रावणम् ।

लङ्कामुन्मथितां कृत्वा कदा द्रक्ष्यति मां पतिः ॥ ६ ॥

' राक्षसों का वध, रावणका संहार और लङ्कापुरीका विध्वंस करके मेरे पतिदेव मुझे कब देखेंगे? ॥ ६ ॥

स वाच्यः संत्वरस्वेति यावदेव न पूर्यते ।

अयं संवत्सरः कालस्तावद्धि मम जीवितम् ॥ ७ ॥

सर्गः का आग्रह, हनुमान्जीका सीता से अपने सीताका अस्वीकार करना ' तुम उनसे जाकर कहना, वे शीघ्रता करें । यह वर्ष जब-तक पूरा नहीं हो जाता, तभीतक मेरा जीवन शेष है ॥ ७ ॥

वर्तते दशमो मासो द्वौ तु शेषौ लवङ्गम ।

रावणेन नृशंसेन समयो यः कृतो मम ॥ ८ ॥

' वानर! यह दसवाँ महीना चल रहा है । अब वर्ष पूरा होने में दो ही मास शेष हैं । निर्दयी रावणने मेरे जीवन के लिये जो अवधि निश्चित है, उसमें इतना ही समय बाकी रह गया है ॥ ८ ॥

विभीषणेन च भ्रात्रा मम निर्यातनं प्रति ।

अनुनीतः प्रयत्नेन न च तत् कुरुते मतिम् ॥ ९ ॥

' रावण के भाई विभीषणने मुझे लौटा देनेके लिये उससे यत्नपूर्वक बड़ी अनुनय - विनय की थी, किंतु वह उनकी बात नहीं मानता है ॥ ९ ॥

मम प्रतिप्रदानं हि रावणस्य न रोचते ।

रावणं मार्ग ते संख्ये मृत्युः कालवशंगतम् ॥ १० ॥

' मेरा लौटाया जाना रावणको अच्छा नहीं लगता; क्योंकि वह कालके अधीन हो रहा है और युद्धमें मौत उसे ढूँढ रही है ॥ १० ॥

ज्येष्ठा कन्या कला नाम विभीषणलुता कपे ।

तया ममैतदाख्यातं मात्रा प्रहितया स्वयम् ॥ ११ ॥

' कपे! विभीषणकी ज्येष्ठ पुत्रीका नाम कला है । उसकी माताने स्वयं उसे मेरे पास भेजा था । उसीने ये सारी बातें मुझसे कही हैं ॥ ११ ॥

अविन्ध्यो नाम मेधावी विद्वान् राक्षसपुङ्गवः ।

धृतिमाञ्छीलवान् वृद्धो रावणस्य सुसम्मतः ॥ १२ ॥

' अविन्ध्य नामका एक श्रेष्ठ राक्षस है, जो बड़ा ही बुद्धिमान्, विद्वान्, धीर, सुशील, वृद्ध तथा रावणका सम्मान-पात्र है ॥ १२ ॥

रामात् क्षयमनुप्राप्तं रक्षसां प्रत्यचोदयत् ।

न च तस्य स दुष्टात्मा शृणोति वचनं हितम् ॥ १३ ॥

' उसने रावणको यह बताकर कि श्रीरामके हाथसे राक्षसोंके विनाशका अवसर आ पहुँचा है, मुझे लौटा देने के

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९ ६० श्रीमद्वाल्मीकीय रामायणे लिये प्रेरित किया था, किंतु वह दुष्टात्मा उसके हितकारी वचनोंको भी नहीं सुनता है ॥ १३ ॥

आशंसेयं हरिश्रेष्ठ क्षिप्रं मां प्राप्स्यते पतिः ।

अन्तरात्मा हि मे शुद्धस्तस्मिंश्च बहवो गुणाः ॥ १४ ॥

' कपिश्रेष्ठ! मुझे तो यह आशा हो रही है कि मेरे पति देव मुझसे शीघ्र ही आ मिलेंगे; क्योंकि मेरी अन्तरात्मा शुद्ध है और श्रीरघुनाथजी में बहुत - से गुण हैं ॥ १४ ॥

उत्साहः पौरुषं सत्त्वमानृशंस्यं कृतज्ञता ।

विक्रमश्च प्रभावश्च सन्ति वानर राघवे ॥ १५ ॥

' वानर! श्रीरामचन्द्रजीमें उत्साह, पुरुषार्थ, बल, दयालुता, कृतज्ञता, पराक्रम और प्रभाव आदि सभी गुण विद्यमान हैं ॥ १५ ॥

चतुर्दश सहस्राणि राक्षसानां जघान यः ।

जनस्थाने बिना भ्रात्रा शत्रुः कस्तस्य नोद्विजेत् ॥ १६ ॥

' जिन्होंने जनस्थानमें अपने भाई की सहायता लिये बिना ही चौदह हजार राक्षसों का संहार कर डाला, उनसे कौन शत्रु

भयभीत न होगा? ॥। १६ ॥

न स शक्यस्तुलयितुं व्यसनैः पुरुषर्षभः ।

अहं तस्यानुभावशा शक्रस्येव पुलोमजा ॥ १७ ॥

' श्रीरामचन्द्रजी पुरुषोंमें श्रेष्ठ हैं । वे संकटोंसे तोले या बिचलित किये जायँ, यह सर्वथा असम्भव है । जैसे पुलोम-कन्या शची इन्द्र के प्रभावको जानती हैं, उसी तरह मैं श्री-रघुनाथजीकी शक्ति - सामर्थ्यको अच्छी तरह जानती हूँ || १७ ||

शरजालांशुमान्छूरः कपे रामदिवाकरः ।

शत्रुरक्षोमयं तोयमुपशोषं नयिष्यति ॥ १८ ॥

' कपिवर! शूरवीर भगवान् श्रीराम सूर्यके समान हैं । उनके याणसमूह ही उनकी किरणें हैं । वे उनके द्वारा शत्रुभूत राक्षसरूपी जलको शीघ्र ही सोख लेंगे ' ॥ १८ ॥

इति संजल्पमानां तां रामार्थे शोककर्शिताम् ।

अश्रुसम्पूर्णवदनामुवाच हनुमान् कपिः ॥ १ ९ ॥

इतना कहते - कहते सीताके मुखपर आँसुओं की धारा वह चली । वे श्रीरामचन्द्रजी के लिये शोकसे पीड़ित हो रही थीं । उस समय कविवर हनुमान् जीने उनसे कहा- ॥ १ ९ ॥

श्रुत्वैव च वचो मह्यं क्षिप्रमेष्यति राघवः ।

चमूं प्रकर्षन् महतीं हयृक्षगण संकुलाम् ॥ २० ॥

' देवि! आप धैर्य धारण करें । मेरा वचन सुनते ही श्रीरघुनाथजी वानर और भालुओंकी विशाल सेना लेकर शीघ्र यहाँके लिये प्रस्थान कर देंगे ॥ २० ॥

अथवा मोचयिष्यामि त्वामद्यैव सराक्षसात् ।

अस्माद् दुःखादुपारोह मम पृष्ठमनिन्दिते ॥ २१ ॥

' अथवा मैं अभी आपको इस राक्षसजनित दुःखसे छुटकारा दिला दूँगा । सती - साध्वी देवि! आप मेरी पीठपर बैठ जाइये ॥ २१ ॥

त्वां तु पृष्ठगतां कृत्वा संतरिष्यामि सागरम् ।

शक्तिरस्ति हि मे वोढुं लङ्कामपि सरावणाम् ॥२२ ॥

' आपको पीठ पर बैठाकर मैं समुद्रको लाँघ जाऊँगा । मुझमें रावणसहित सारी लङ्काको भी ढो ले जानेकी शक्ति है ॥ २२ ॥

अहं प्रस्त्रवणस्थाय राघवायाद्य मैथिलि ।

प्रापयिष्यामि शक्राय हव्यं हुतमिवानलः ॥ २३ ॥

' मिथिलेश कुमारी! रघुनाथजी प्रस्रवणगिरिपर रहते हैं । मैं आज ही आपको उनके पास पहुँचा दूँगा । ठीक उसी तरह, जैसे अग्निदेव हवन किये गये हविष्यको इन्द्रकी सेवा में ले जाते हैं ॥ २३ ॥

द्रक्ष्यस्यचैव वैदेहि राघवं सहलक्ष्मणम् ।

व्यवसायसमायुक्तं विष्णुं दैत्यवधे यथा ॥ २४ ॥

' विदेइनन्दिनि । दैत्योंके वधके लिये उत्साह रखनेवाले भगवान् विष्णुकी भाँति राक्षसोंके संहारके लिये सचेष्ट हुए श्रीराम और लक्ष्मणका आप आज ही दर्शन करेंगी ॥ २४ ॥

त्वदर्शन कृतोत्साहमाश्रमस्थं महाबलम् ।

पुरंदरमिवासीनं नगराजस्य मूर्धनि ॥ २५ ॥

' आपके दर्शनका उत्साह मनमें लिये महाबली श्रीराम पर्वत शिखरपर अपने आश्रम में उसी प्रकार बैठे हैं, जैसे देवराज इन्द्र गजराज ऐरावतकी पीठपर विराजमान होते हैं ॥ २५ ॥

पृष्ठमारोह मे देवि मा विकाङ्क्षस्व शोभने ।

योगमन्विच्छ रामेण शशाङ्केनेव रोहिणी ॥ २६ ॥

' देवि! आप मेरी पीठपर बैठिये 1 । शोभने । मेरे कथन-की उपेक्षा न कीजिये । चन्द्रमासे मिलनेवाली रोहिणीकी भाँति आप श्रीरामचन्द्रजी के साथ मिलने का निश्चय कीजिये ॥

कथयन्तीव शशिना संगमिष्यसि रोहिणी ।

मत्पृष्ठमधिरोह त्वं तराकाशं महार्णवम् ॥ २७ ॥

' मुझे भगवान् श्रीरामसे मिलना है, इतना कहते ही आप चन्द्रमासे रोहिणी की भाँति श्रीरघुनाथजी से मिल जायँगी । आप मेरी पीठपर आरूढ़ होइये और आकाशमार्ग से ही महासागरको पार कीजिये ॥ २७ ॥

नहि मे सम्प्रयातस्य त्वामितो नयतोऽङ्गने ।

अनुगन्तुं गतिं शक्ताः सर्वे लङ्कानिवासिनः ॥ २८ ॥

' कल्याणि! मैं आपको लेकर जब यहाँसे चलूँगा, उस समय समूचे लङ्का निवासी मिलकर भी मेरा पीछा नहीं कर सकते ॥ २८ ॥

प्राप्तस्तथैवाहमसंशयम् ।

यास्यामि पश्य वैदेहि त्वामुद्यम्य विहायसम् ॥ २ ९ ॥

' विदेहनन्दिनि! जिस प्रकार मैं यहाँ आया हूँ, उसी तरह आपको लेकर आकाशमार्गसे चला जाऊँगा, इसमें संदेह नहीं है । आप मेरा पराक्रम देखिये ' ॥ २ ९ ॥

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सुन्दरकाण्डे सप्तत्रिंशः सर्गः ९ ६१

मैथिली तु हरिश्रेष्ठाच्छ्रुत्वा वचनमद्भुतम् ।

हर्षविस्मितसर्वाङ्गी हनूमन्तमथाब्रवीत् ॥ ३० ॥

वानरश्रेष्ठ हनुमान के मुखसे यह अद्भुत वचन सुनकर मिथिलेश कुमारी सीताके सारे शरीर में हर्ष और विस्मयके

कारण रोमाञ्च हो आया । उन्होंने हनुमान् जीसे कहा ॥३० ॥

हनूमन् दूरमध्वानं कथं मां नेतुमिच्छसि ।

तदेव खलु ते मन्ये कपित्वं हरियूथप ॥ ३१ ॥

' वानरयूथपति हनुमान्! तुम इतने दूर के मार्गपर मुझे कैसे ले चलना चाहते हो? तुम्हारे इस दुःसाहसको मैं वानरोचित चपलता ही समझती हूँ ॥ ३१ ॥

कथं चाल्पशरीरस्त्वं मामितो नेतुमिच्छसि ।

सकाशं मानवेन्द्रस्य भर्तुर्मे प्लवगर्षभ ॥ ३२ ॥

' वानरशिरोमणे! तुम्हारा शरीर तो बहुत छोटा है । फिर तुम मुझे मेरे स्वामी महाराज श्रीरामके पास ले जानेकी इच्छा कैसे करते हो? ' ॥ ३२ ॥

सीतायास्तु वचः श्रुत्वा हनूमान् मारुतात्मजः ।

चिन्तयामास लक्ष्मीवान् नवं परिभवं कृतम् ॥ ३३ ॥

सीताजीकी यह बात सुनकर शोभाशाली पवनकुमार हनुमान् ने इसे अपने लिये नया तिरस्कार ही माना ॥ ३३ ॥

न मे जानाति सत्त्वं वा प्रभावं वासितेक्षणा ।

तस्मात् पश्यतु वैदेही यद्रूपं मम कामतः ॥ ३४ ॥

वे सोचने लगे — ‘ कजरारे नेत्रोंवाली विदेइनन्दिनी सीता मेरे बल और प्रभावको नहीं जानतीं । इसलिये आज मेरे उस रूपको, जिसे मैं इच्छानुसार धारण कर लेता हूँ, ये देख लें ' ॥ ३४ ॥

इति संचिन्त्य हनुमांस्तदा लवगसप्तमः ।

दर्शयामास सीतायाः स्वरूपमरिमर्दनः ॥ ३५ ॥

ऐसा विचार करके शत्रुमर्दन वानर शिरोमणि इनुमान्ने उस समय सीताको अपना स्वरूप दिखाया ॥ ३५ ॥

सतस्मात् पादपाद् धीमानाप्लुत्य प्लवगर्षभः ।

ततो वर्धितुमारेभे सीताप्रत्ययकारणात् ॥ ३६ ॥

वे बुद्धिमान् कपिवर उस वृक्षसे नीचे कूद पड़े और सीताजीको विश्वास दिलाने के लिये बढ़ने लगे ॥ ३६ ॥

मेरुमन्दरसंकाशो बभौ दीप्तानलप्रभः ।

अग्रतो व्यवतस्थे च सीताया वानरर्षभः ॥ ३७ ॥

बात - की- बातमें उनका शरीर मेरुपर्वतके समान ऊँचा हो गया । वे प्रज्वलित अग्निके समान तेजस्वी प्रतीत होने लगे | इस तरह विशाल रूप धारण करके वे वानरश्रेष्ठ हनुमान् सीताजी के सामने खड़े हो गये ॥ ३७ ॥

हरिः पर्वतसंकाशस्ताम्रवक्त्रो महाबलः ।

वज्रदंष्ट्रनखो भीमो वैदेहीमिदमब्रवीत् ॥ ३८ ॥

तत्पश्चात् पर्वतके समान विशालकाय, तामेके समान लाल मुख तथा वज्रके समान दाढ़ और नखवाले भयानक महाबली वा ० रा ० ५.७.१३-वानरवीर हनुमान् विदेहनन्दिनीसे इस प्रकार बोले- । ३८ ।

सपर्वतवनोद्देशां सादृप्राकारतोरणाम् ।

लङ्कामिमां सनाथां वा नयितुं शक्तिरस्ति मे ॥ ३ ९ ॥

' देवि! मुझमें पर्वत, वन, अट्टालिका, चहारदिवारी और नगरद्वारसहित इस लङ्कापुरीको रावण के साथ ही उठा ले जानेकी शक्ति है ॥ ३ ९ ॥

तदवस्थाप्यतां बुद्धिरलं देवि विकाङ्क्षया ।

विशोकं कुरु वैदेहि राघवं सहलक्ष्मणम् ॥ ४० ॥

' अतः आप मेरे साथ चलनेका निश्चय कर लीजिये । आपकी आशङ्का व्यर्थ है । देवि! विदेद्दनन्दिनि! आप मेरे साथ चलकर लक्ष्मणसहित श्रीरघुनाथजीका शोक दूर कीजिये ' ॥ ४० ॥

तं दृष्ट्राचलसंकाशमुवाच जनकात्मजा ।

पद्मपत्रविशालाक्षी मारुतस्यैौरसं सुतम् ॥ ४१ ॥

वायुके औरस पुत्र हनुमानजीको पर्वत के समान विशाल शरीर धारण किये देख प्रफुल्ल कमलदल के समान बड़े - बड़े नेत्रोंवाली जनककिशोरीने उनसे कहा- ॥ ४१ ॥

तव सत्त्वं बलं चैव विजानामि महाकपे ।

वायोरिव गतिश्चापि तेजश्चाग्नेरिवाद्भुतम् ॥ ४२ ॥

' महाकपे! मैं तुम्हारी शक्ति और पराक्रमको जानती हूँ । वायुके समान तुम्हारी गति और अग्नि के समान तुम्हारा अद्भुत तेज है ॥ ४२ ॥

प्राकृतोऽन्यः कथं चेमां भूमिमागन्तुमर्हति ।

उदधेरप्रमेयस्य पारं वानरयूथप ॥ ४३ ॥

' वानरयूथपते! दूसरा कोई साधारण वानर अपार महासागर के पार की इस भूमिमें कैसे आ सकता है? ॥ ४३ ॥

जानामि गमने शक्ति नयने चापि ते मम ।

अवश्यं सम्प्रधार्याशु कार्यसिद्धिरिवात्मनः ॥ ४४ ॥

' मैं जानती हूँ, तुम समुद्र पार करने और मुझे ले जाने-में भी समर्थ हो, तथापि तुम्हारी तरह मुझे भी अपनी कार्य-सिद्धि के विषयमें अवश्य भलीभाँति विचार कर लेना चाहिये ॥ ४४ ॥

अयुक्तं तु कपिश्रेष्ठ मया गन्तुं त्वया सह ।

वायुवेगवेगस्य वेगो मां मोहयेत् तव ॥ ४५ ॥

' कपिश्रेष्ठ! तुम्हारे साथ मेरा जाना किसी भी दृष्टिसे उचित नहीं है; क्योंकि तुम्हारा वेग वायुके वेगके समान तीव्र है । जाते समय यह वेग मुझे मूर्छित कर सकता है ॥ ४५ ॥

अहमाकाशमासक्ता उपर्युपरि सागरम् ।

प्रपतेयं हि ते पृष्ठाद् भूयो वेगेन गच्छतः ॥ ४६ ॥

“ मैं समुद्र के ऊपर - ऊपर आकाशमें पहुँच जानेपर अधिक वेगसे चलते हुए तुम्हारे पृष्ठभागसे नीचे गिर सकती हूँ ॥

पतिता सागरे चाहं तिमिनक्रझषाकुले ।

भवेयमाशु विवशा यादसामन्नमुत्तमम् ॥ ४७ ॥

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९ ६२ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे ' इस तरह समुद्रमें, जो तिमि नामक बड़े - बड़े मत्स्यो, नाकों और मछलियोंसे भरा हुआ है, गिरकर विवश हो मैं शीघ्र ही जल - जन्तुओं का उत्तम आहार बन जाऊँगी ॥ ४७ ॥

न च शक्ष्ये त्वया सार्धं गन्तुं शत्रुविनाशन ।

कलत्रवति संदेहस्त्वयि स्यादप्यसंशयम् ॥ ४८ ॥

' इसलिये शत्रुनाशन वीर! मैं तुम्हारे साथ नहीं चल सकूँगी । एक स्त्रीको साथ लेकर जब तुम जाने लगोगे, उस समय राक्षसों को तुमपर संदेह होगा, इसमें संशय नहीं है ।

ह्रियमाणां तु मां दृष्ट्रा राक्षसा भीमविक्रमाः ।

अनुगच्छेयुरादिष्टा रावणेन दुरात्मना ॥ ४ ९ ॥

' मुझे हरकर ले जायी जाती देख दुरात्मा रावणकी आज्ञासे भयंकर पराक्रमी राक्षस तुम्हारा पीछा करेंगे ॥४ ९ ॥

तैस्त्वं परिवृतः शूरैः शूलमुद्गरपाणिभिः ।

भवेस्त्वं संशयं प्राप्तो मया वीर कलत्रवान् ॥ ५० ॥

" वीर! उस समय मुझ जैसी रक्षणीया अबलाके साथ होने के कारण तुम हाथोंमें शूल और मुद्गर धारण करनेवाले उन शौर्यशाली राक्षसोंसे घिरकर प्राणसंशयकी अवस्था में पहुँच जाओगे ॥ ५० ॥

सायुधा बहवो व्योम्नि राक्षसास्त्वं निरायुधः ।

कथं शक्ष्यसि संयातुं मां चैव परिरक्षितुम् ॥ ५१ ॥

' आकाश में अस्त्र - शस्त्रधारी बहुत - से राक्षस तुमपर आक्रमण करेंगे और तुम्हारे हाथमें कोई भी अस्त्र न होगा । उस दशामें तुम उन सबके साथ युद्ध और मेरी रक्षा दोनों कार्य कैसे कर सकोगे? ॥ ५१ ॥

युध्यमानस्य रक्षोभिस्ततस्तैः क्रूरकर्मभिः ।

प्रपतेयं हि ते पृष्ठाद् भयार्ता कपिसत्तम ॥ ५२ ॥

' कपिश्रेष्ठ! उन क्रूरकर्मा राक्षसों के साथ जब तुम युद्ध करने लगोगे, उस समय मैं भयसे पीड़ित होकर तुम्हारी पीठसे अवश्य ही गिर जाऊँगी ॥ ५२ ॥

अथ रक्षांसि भीमानि महान्ति बलवन्ति च ।

कथंचित् साम्पराये त्वां जयेयुः कपिसत्तम ॥ ५३ ॥

अथवा युध्यमानस्य पतेयं विमुखस्य ते ।

पतितां च गृहीत्वा मां नयेयुः पापराक्षसाः ॥ ५४ ॥

" कपिश्रेष्ठ! यदि कहीं वे महान् बलवान् भयानक राक्षस किसी तरह तुम्हें युद्धमें जीत लें अथवा युद्ध करते समय मेरी रक्षाकी ओर तुम्हारा ध्यान न रहनेसे यदि मैं गिर गयी तो वे पापी राक्षस मुझ गिरी हुई अबलाको फिर पकड़ ले जायँगे ॥ ५३-५४ ॥

मां वा हरेयुस्त्वद्धस्ताद् विशसेयुरथापि वा ।

अनवस्थौ हि दृश्येते युद्धे जयपराजयौ ॥ ५५ ॥

' अथवा यह भी सम्भव है कि वे निशाचर मुझे तुम्हारे हाथसे छीन ले जायँ या मेरा वध ही कर डालें; क्योंकि युद्ध-में विजय और पराजयको अनिश्चित ही देखा जाता है ॥५५ ॥

अहं वापि विपद्येयं रक्षोभिरभितर्जिता ।

त्वत्प्रयत्नो हरिश्रेष्ठ भवेन्निष्फल एव तु ॥ ५६ ॥

' अथवा वानरशिरोमणे! यदि राक्षसोंकी अधिक डॉट पड़ने पर मेरे प्राण निकल गये तो फिर तुम्हारा यह सारा प्रयत्न निष्फल ही हो जायगा ॥ ५६ ॥

कामं त्वमपि पर्याप्तो निहन्तुं सर्वराक्षसान् ।

राघवस्य यशो दीयेत् त्वया शस्तैस्तु राक्षसैः ॥ ५७ ॥

' यद्यपि तुम भी सम्पूर्ण राक्षसोंका संहार करने में समर्थ हो तथापि तुम्हारे द्वारा राक्षसों का वध हो जानेपर श्रीरघुनाथ-जीके सुयशमें बाधा आयेगी ( लोग यही कहेंगे कि श्रीराम स्वयं कुछ भी न कर सके ) ॥ ५७ ॥

अथवाऽऽदाय रक्षांसि न्यसेयुः संवृते हि माम् ।

यत्र ते नाभिजानीयुर्हरयो नापि राघवः ॥ ५८ ॥

' अथवा यह भी सम्भव है कि राक्षसलोग मुझे ले जाकर किसी ऐसे गुप्त स्थानमें रख दें, जहाँ न तो वानरोंको मेरा पता लगे और न श्रीरघुनाथजीको ही ॥ ५८ ॥

आरम्भस्तु मदर्थोऽयं ततस्तव निरर्थकः ।

त्वया हि सह रामस्य महानागमने गुणः ॥ ५ ९ ॥

' यदि ऐसा हुआ तो मेरे लिये किया गया तुम्हारा यह सारा उद्योग व्यर्थ हो जायगा । यदि तुम्हारे साथ श्रीराम-चन्द्रजी यहाँ पधारें तो उनके आनेसे बहुत बड़ा लाभ होगा ।

मयि जीवितमायत्तं राघवस्यामितौजसः ।

भ्रातॄणां च महाबाहो तव राजकुलस्य च ॥ ६० ॥

" महाबाहो! अमित पराक्रमी श्रीरघुनाथजीका, उनके भाइयोंका, तुम्हारा तथा वानरराज सुग्रीवके कुलका जीवन मुझपर ही निर्भर है ॥ ६० ॥

तौ निराशौ मदर्थे च शोकसंतापकर्शितौ ।

सह सर्वर्क्षहरिभिस्त्यक्ष्यतः प्राणसंग्रहम् ॥ ६१ ॥

" शोक और संतापसे पीड़ित हुए वे दोनों भाई जब मेरी प्राप्तिकी ओरसे निराश हो जायँगे, तब सम्पूर्ण रीछों और वानरोंके साथ अपने प्राणोंका परित्याग कर देंगे ॥ ६१ ॥

भर्तुर्भक पुरस्कृत्य रामादन्यस्य वानर ।

नाहं स्प्रष्टुं खतो गात्रमिच्छेयं वानरोत्तम ॥ ६२ ॥

' वानरश्रेष्ठ | ( तुम्हारे साथ न चल सकनेका एक प्रधान कारण और भी है ) वानरवीर! पतिभक्ति की ओर दृष्टि रखकर मैं भगवान् श्रीरामके सिवा दूसरे किसी पुरुष के शरीरका स्वेच्छासे स्पर्श करना नहीं चाहती ॥६२ ॥

यदहं गात्रसंस्पर्श रावणस्य गता बलात् ।

अनीशा किं करिष्यामि विनाथा विवशा सती ॥ ६३ ॥

" रावण के शरीर से जो मेरा स्पर्श हो गया है, वह तो उसके बलात्कार के कारण हुआ है । उस समय मैं असमर्थ, • अनाथ और बेबस थी, क्या करती ॥ ६३ ॥

+ यदि रामो दशग्रीवमिह हत्वा सराक्षसम् ।

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वाल्मीकि रामायण — खण्ड २, पृष्ठ 140 का मूल पृष्ठ
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सुन्दरकाण्डे अष्टात्रिंशः सर्गः ९ ६३ मामितो गृह्य गच्छेत तत् तस्य सदृशं भवेत् ॥ ६४ ॥ हैं । उस समय उन्हें देखकर उनका वेग कौन सह

' यदि श्रीरघुनाथजी यहाँ राक्षसों सहित दशमुख रावण-का वध करके मुझे यहाँसे ले चलें तो वह उनके योग्य कार्य होगा ॥ ६४ ॥

श्रुताश्च दृष्टा हि मया पराक्रमा महात्मनस्तस्य रणावमर्दिनः । न देवगन्धर्वभुजङ्गराक्षसा भवन्ति रामेण समाहि संयुगे ॥ ६५ ॥

' मैंने युद्ध में शत्रुओंका मर्दन करनेवाले महात्मा श्रीराम-के पराक्रम अनेक बार देखे और सुने हैं । देवता, गन्धर्व, नाग और राक्षस सब मिलकर भी संग्राममें उनकी समानता नहीं कर सकते || ६५ ॥ समीक्ष्य तं संयति चित्रकार्मुकं महावलं वासवतुल्यविक्रमम् । सलक्ष्मण को विषहेत राघवं हुताशनं दीप्तमिवानिलेरितम् ॥ ६६ ॥

' युद्धस्थल में विचित्र धनुष धारण करनेवाले इन्द्रतुल्य पराक्रमी महाबली श्रीरघुनाथजी लक्ष्मणके साथ रह वायुका सहारा पाकर प्रज्वलित हुए अग्निकी भाँति उद्दीत हो उठते सकता है? ॥ ६६ ॥

सलक्ष्मणं राघवमाजिमर्दनं दिशागजं मत्तमिव व्यवस्थितम् । सहेत को वानरमुख्य संयुगे युगान्त सूर्यप्रतिमं शरार्चिषम् ॥ ६७ ॥

' वानर शिरोमणे! समराङ्गण में अपने बाणरूपी तेजसे प्रलयकालीन सूर्यके समान प्रकाशित होनेवाले और मतवाले दिग्गजकी भाँति खड़े हुए रणमर्दन श्रीराम और लक्ष्मणका सामना कौन कर सकता है? ॥ ६७ ॥

स मे कपिश्रेष्ठ सलक्ष्मणं प्रियं यूथपं क्षिप्रमिहोपपादय । चिराय रामं प्रति शोककर्शितां कुरुष्व मां वानरवीर हर्षिताम् ॥ ६८ ॥

" इसलिये कपिश्रेष्ठ! वानरवीर! तुम प्रयत्न करके यूथपति सुग्रीव और लक्ष्मणसहित मेरे प्रियतम श्रीरामचन्द्रजी-को शीघ्र यहाँ बुढा ले आओ । मैं श्रीरामके लिये चिरकालसे शोकाकुल हो रही हूँ । तुम उनके शुभागमनसे मुझे हर्ष प्रदान करो ' ॥ ६८ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये सुन्दरकाण्डे सप्तत्रिंशः सर्गः ॥ ३७ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षंरामायण आदिकाव्यके सुन्दरकाण्ड में सैंतीसवाँ सर्गं पूरा हुआ ॥ ३७ ॥

अष्टात्रिंशः सर्गः सीताजी का हनुमानजीको पहचानके रूपमें चित्रकूट पर्वतपर घटित हुए एक कौएके प्रसंगको सुनाना, भगवान् श्रीरामको शीघ्र बुला लानेके लिये अनुरोध करना और चूड़ामणि देना

ततः स कपिशार्दूलस्तेन वाक्येन तोषितः ।

सीतामुवाच तच्छ्रुत्वा वाक्यं वाक्यविशारदः ॥ १ ॥

सीता के इस वचनसे कपिश्रेष्ठ हनुमानजीको बड़ी प्रसन्नता हुई । वे बातचीत में कुशल थे । उन्होंने पूर्वोक्त बातें सुनकर सीतासे कहा ॥ १ ॥

युक्तरूपं त्वया देवि भाषितं शुभदर्शने ।

सदृशं स्त्रीखभावस्य साध्वीनां विनयस्य च ॥ २ ॥

' देवि! आपका कहना बिल्कुल ठीक और युक्तिसंगत है । शुभदर्शने! आपकी यह बात नारी स्वभावके तथा पतिव्रताओंकी विनयशीलता के अनुरूप है ॥ २ ॥

स्त्रीत्वान्न त्वं समर्थासि सागरं व्यतिवर्तितुम् ।

मामधिष्ठाय विस्तीर्ण शतयोजनमायतम् ॥ ३ ॥

" इसमें संदेह नहीं कि आप अबला होनेके कारण मेरी पीठपर बैठकर सौ योजन विस्तृत समुद्र के पार जाने में समर्थ नहीं हैं ॥ ३ ॥

द्वितीयं कारणं यच्च ब्रवीषि विनयान्विते ।

रामादन्यस्य नामि संसर्गमिति जानकि ॥ ४ ॥

एतत् ते देवि सदृशं पत्म्यास्तस्य महात्मनः ।

का हान्या त्वामृते देवि ब्रूयाद् वचनमीदृशम् ॥५ ॥

" जनकनन्दिनि! आपने जो दूसरा कारण बताते हुए कहा है कि मेरे लिये श्रीरामचन्द्रजीके सिवा दूसरे किसी पुरुषका स्वेच्छापूर्वक स्पर्श करना उचित नहीं है, यह आपके ही योग्य है । देवि! महात्मा श्रीरामकी धर्मपत्नीके मुखसे. ऐसी बात निकल सकती है । आपको छोड़कर दूसरी कौन स्त्री ऐसा वचन कह सकती है ॥ ४-५ ॥

श्रोष्यते चैव काकुत्स्थः सर्वे निरवशेषतः ।

चेष्टितं यत् त्वया देवि भाषितं च ममाग्रतः ॥ ६ ॥

‘ देवि! मेरे सामने आपने जो - जो पवित्र चेष्टाएँ कीं और जैसी जैसी उत्तम बातें कही हैं, वे सब पूर्णरूप से श्रीरामचन्द्रजी मुझसे सुनेंगे ॥ ६ ॥

कारणैर्बहुभिर्देवि रामप्रियचिकीर्षया ।

स्नेहप्रस्कन्नमनसा मयैतत् समुदीरितम् ॥ ७ ॥

' देवि! मैंने जो आपको अपने साथ ले जानेका आग्रह किया, उसके बहुतसे कारण हैं । एक तो मैं श्रीरामचन्द्रजीका