श्रीगणेशाय नमः।

वाल्मीकि रामायण — खण्ड २ — पृष्ठ 121–130

वाल्मीकि रामायण — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 121–130

पृष्ठ 121

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हनुमानजीकी जानकीजीसे बात - चीत

पृष्ठ 122

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सुन्दरकाण्डे त्रयस्त्रिंशः सर्गः ९ ४५ अतः श्रीराम - दर्शनकी लालसासे अत्यन्त पीड़ित हो सदा उन्हींका चिन्तन करती हुई उन्हींको देखती और उन्हींकी कथा सुनती हूँ ॥ १२ ॥

मनोरथः स्यादिति चिन्तयामि तथापि बुद्धयापि वितर्कयामि । किं कारणं तस्य हि नास्ति रूपं सुव्यक्तरूपश्च वदत्ययं माम् ॥ १३ ॥

' सोचती हूँ कि सम्भव है यह मेरे मनकी ही कोई भावना हो तथापि बुद्धि से भी तर्क - वितर्क करती हूँ कि यह जो कुछ दिखायी देता है, इसका क्या कारण है? मनोरथ या मन की भावना का कोई स्थूल रूप नहीं होता; परंतु इस वानरका रूप तो स्पष्ट दिखायी दे रहा है और यह मुझसे बातचीत भी करता है ॥ १३ ॥

नमोऽस्तु वाचस्पतये सवज्रिणे स्वयम्भुवे चैव हुताशनाय । अनेन चोक्तं यदिदं ममाग्रतो वनौकसा तच्च तथास्तु नान्यथा ॥ १४ ॥

" मैं वाणीके स्वामी बृहस्पतिको, वज्रधारी इन्द्रको, स्वयम्भू ब्रह्माजीको तथा वाणीके अधिष्ठातृ देवता अग्निको भी नमस्कार करती हूँ । इस वनवासी वानरने मेरे सामने यह जो कुछ कहा है, वह सब सत्य हो, उसमें कुछ भी अन्यथा न हो ' ॥ १४ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये सुन्दरकाण्डे द्वात्रिंशः सर्गः ॥ ३२ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के सुन्दरकाण्ड में बत्तीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ३२ ॥

त्रयस्त्रिंशः सर्गः सीताजीका हनुमानजीको अपना परिचय देते हुए

सोऽवतीर्य द्रुमात् तस्माद् विद्रुमप्रतिमाननः ।

विनीतवेषः कृपणः प्रणिपत्योपसृत्य च ॥ १ ॥

तामब्रवीन्महातेजा हनूमान् मारुतात्मजः ।

शिरस्यञ्जलिमाधाय सीतां मधुरया गिरा ॥ २ ॥

उधर मूँगेके समान लाल मुखवाले महातेजस्वी पवनकुमार हनुमान्जीने उस अशोक वृक्षसे नीचे उतरकर माथेपर अञ्जलि बाँध ली और विनीतभाव से दीनतापूर्वक निकट आकर प्रणाम करनेके अनन्तर सीताजीसे मधुर वाणी में कहा -- ॥ १-२ ॥

का नु पद्मपलाशाक्षि क्लिष्टकौशेयवासिनि ।

द्रुमस्य शाखामालभ्य तिष्ठसि त्वमनिन्दिते ॥ ३ ॥

किमर्थं तव नेत्राभ्यां वारि स्रवति शोकजम् ।

पुण्डरीकपलाशाभ्यां विप्रकीर्णमिवोदकम् ॥ ४ ॥

' प्रफुल्ल कमलदलके समान विशाल नेत्रोंवाली देवि! यह मलिन रेशमी पीताम्बर धारण किये आप कौन हैं? अनिन्दिते! इस वृक्षकी शाखाका सहारा लिये आप यहाँ क्यों खड़ी हैं? कमलके पत्तोंसे झरते हुए जल - बिन्दुओंके समान आपकी आँखोंसे ये शोकके आँसू क्यों गिर रहे हैं? ॥ ३-४ ॥

सुराणामसुराणां च नागगन्धर्वरक्षसाम् ।

यक्षाणां किंनराणां च का त्वं भवसि शोभने ॥ ५ ॥

का त्वं भवसि रुद्राणां मरुतां वा वरानने ।

वसूनां वा वरारोहे देवता प्रतिभासि मे ॥ ६ ॥

' शोभने! आप देवता, असुर, नाग, गन्धर्व, राक्षस, यक्ष, किन्नर, रुद्र, मरुद्गण अथवा वसुओं में से कौन हैं? इनमें से किसकी कन्या अथवा पत्नी हैं? सुमुखि । वरारोहे! मुझे तो आप कोई देवता - सी जान पड़ती हैं ॥ ५-६ ॥ बा ० रा ० २०७० ११ अपने वनगमन और अपहरणका वृत्तान्त बताना

किं नु चन्द्रमसा हीना पतिता विबुधालयात् ।

रोहिणी ज्योतिषां श्रेष्ठा श्रेष्ठा सर्वगुणाधिका ॥ ७ ॥

" क्या आप चन्द्रमासे बिछुड़कर देवलोक से गिरी हुई नक्षत्रों में श्रेष्ठ और गुणोंमें सबसे बढ़ी चढ़ी रोहिणी देवी हैं? ॥

कोपाद वा यदि वा मोहाद् भर्तारमसितेक्षणे ।

वसिष्ठं कोपयित्वा त्वं वासि कल्याण्यरुन्धती ॥ ८ ॥

' अथवा कजरारे नेत्रोंवाली देवि! आप कोप या मोहसे अपने पति वसिष्ठजीको कुपित करके यहाँ आयी हुई कल्याणस्वरूपा सतीशिरोमणि अरुन्धती तो नहीं हैं ॥ ८ ॥

को नु पुत्रः पिता भ्राता भर्ता वा ते सुमध्यमे ।

अस्माल्लोकादमुं लोकं गतं त्वमनुशोचसि ॥ ९ ॥

' सुमध्यमे! आपका पुत्र, पिता, भाई अथवा पति कौन इस लोकसे चलकर परलोकवासी हो गया है, जिसके लिये आप शोक करती हैं ॥ ९ ॥

रोदनादतिनिःश्वासाद् भूमिसंस्पर्शनादपि ।

न त्वां देवीमहं मन्ये राज्ञः संज्ञावधारणात् ॥ १० ॥

व्यञ्जनानि हि ते यानि लक्षणानि च लक्षये ।

महिषी भूमिपालस्य राजकन्या च मे मता ॥ ११ ॥

' रोने, लंबी साँस खींचने तथा पृथ्वीका स्पर्श करने के कारण मैं आपको देवी नहीं मानता । आप बारंबार किसी राजाका नाम ले रही हैं तथा आपके चिह्न और लक्षण जैसे दिखायी देते हैं, उन सबपर दृष्टिपात करनेसे यही अनुमान होता है कि आप किसी राजाकी महारानी तथा feet atest sar हैं ॥ १०-११ ॥

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९ ४६ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे

रावणेन जनस्थानाद् बलात् प्रमथिता यदि ।

सीता त्वमसि भद्रं ते तन्ममाचक्ष्व पृच्छतः ॥१२ ॥

" रावण जनस्थान से जिन्हें बलपूर्वक हर लाया था, वे सीताजी ही यदि आप हों तो आपका कल्याण 1 आप ठीक - ठीक मुझे बताइये । मैं आपके विषयमें जानना चाहता हूँ ॥ १२ ॥

यथा हि तव वै दैन्यं रूपं चाप्यतिमानुषम् ।

तपसा चान्वितो वेषस्त्वं राममहिषी ध्रुवम् ॥ १३ ॥

“ दुःखके कारण आपमें जैसी दीनता आ गयी है, जैसा आपका अलौकिक रूप है तथा जैसा तपस्विनीका सा वेष है, इन सबके द्वारा निश्चय ही आप श्रीरामचन्द्रजीकी महारानी जान पड़ती हैं ' ॥ १३ ॥

सा तस्य वचनं श्रुत्वा रामकीर्तनहर्षिता ।

उवाच वाक्यं वैदेही हनूमन्तं द्रुमाश्रितम् ॥ १४ ॥

हनुमानजी की बात सुनकर विदेइनन्दिनी सीता श्रीरामचन्द्रजीकी चर्चासे बहुत प्रसन्न थीं; अतः वृक्षका सहारा लिये खड़े हुए उन पवनकुमारसे इस प्रकार बोलीं- ॥ १४ ॥

पृथिव्यां राजसिंहानां मुख्यस्य विदितात्मनः ।

स्नुषा दशरथस्याहं शत्रु सैम्यप्रणाशिनः ॥ १५ ॥

दुहिता जनकस्याएं वैदेहस्य महात्मनः ।

सीतेति नाम्ना चोक्ताहं भार्या रामस्य धीमतः ॥ १६ ॥

' कपिवर! जो भूमण्डलके श्रेष्ठ राजाओंमें प्रधान थे, जिनकी सर्वत्र प्रसिद्धि थी तथा जो शत्रुओंकी सेनाका संहार करने में समर्थ थे, उन महाराज दशरथकी मैं पुत्रवधू हूँ, विदेहराज महात्मा जनककी पुत्री हूँ और परम बुद्धिमान्

भगवान् श्रीरामकी धर्मपत्नी हूँ । मेरा नाम सीता है ॥ १५-१६ ॥

समा द्वादश तत्राहं राघवस्य निवेशने ।

भुञ्जाना मानुषान् भोगान् सर्वकामसमृद्धिनी ॥ १७ ॥

' अयोध्या में श्रीरघुनाथजी के अन्तःपुरमें बारह वर्षोंतक मैं सब प्रकारके मानवीय भोग भोगती रही और मेरी सारी अभिलाषाएँ सदैव पूर्ण होती रहीं ॥ १७ ॥

ततस्त्रयोदशे वर्षे राज्ये चेक्ष्वाकुनन्दनम् ।

अभिषेचयितुं राजा सोपाध्यायः प्रचक्रमे ॥ १८ ॥

' तदनन्तर तेरहवें वर्ष में महाराज दशरथने राजगुरु वसिष्ठजी के साथ इक्ष्वाकु कुलभूषण भगवान् श्रीरामके राज्या-भिषेककी तैयारी आरम्भ की ॥ १८ ॥

तस्मिन् सम्म्रियमाणे तु राघवस्याभिषेचने ।

कैकेयी नाम भर्तारमिदं वचनमब्रवीत् ॥ १ ९ ॥

' जब वे श्रीरघुनाथजी के अभिषेक के लिये आवश्यक सामग्रीका संग्रह कर रहे थे, उस समय उनकी कैकेयी नाम-वाली भार्याने पतिसे इस प्रकार कहा- ॥ १ ९ ॥

न पिवेयं न खादेयं प्रत्यहं मम भोजनम् ।

एष मे जीवितस्यान्तो रामो यद्यभिषिच्यते ॥ २० ॥

" अब न तो मैं जलपान करूँगी और न प्रतिदिनका भोजन ही ग्रहण करूँगी । यदि श्रीरामका राज्याभिषेक हुआ तो यही मेरे जीवनका अन्त होगा ॥ २० ॥

यत् तदुक्तं त्वया वाक्यं प्रीत्या नृपतिसत्तम ।

तच्चेन्न वितथं कार्य वनं गच्छतु राघवः ॥ २१ ॥

" नृपश्रेष्ठ! आपने प्रसन्नतापूर्वक मुझे जो वचन दिया है, उसे यदि असत्य नहीं करना है तो श्रीराम वनको चले जायँ ' ॥ २१ ॥

स राजा सत्यवाग् देव्या वरदानमनुस्मरन् ।

मुमोह वचनं श्रुत्वा कैकेय्याः क्रूरमप्रियम् ॥ २२ ॥

' महाराज दशरथ बड़े सत्यवादी थे । उन्होंने कैकेयी-देवीको दो वर देने के लिये कहा था । उस वरदानका स्मरण करके कैकेयी के क्रूर एवं अप्रिय वचनको सुनकर वे मूर्च्छित हो गये ॥ २२ ॥

ततस्तं स्थविरो राजा सत्यधर्मे व्यवस्थितः ।

ज्येष्ठं यशस्विनं पुत्रं रुदन् राज्यमयाचत ॥ २३ ॥

' तदनन्तर सत्यधर्म में स्थित हुए बूढ़े महाराजने अपने यशस्वी ज्येष्ठ पुत्र श्रीरघुनाथजीसे भरत के लिये राज्य माँगा ॥ २३ ॥

स पितुर्वचनं श्रीमानभिषेकात् परं प्रियम् ।

मनसा पूर्वमासाद्य वाचा प्रतिगृहीतवान् ॥ २४ ॥

' श्रीमान् रामको पिताके वचन राज्याभिषेकसे भी बढ़कर प्रिय थे । इसलिये उन्होंने पहले उन वचनोंको मनसे ग्रहण किया, फिर वाणी से भी स्वीकार कर लिया ॥ २४ ॥

दद्यान्न प्रतिगृह्णीयात् सत्यं ब्रूयान्न चानृतम् ।

अपि जोवितहेतोर्हि रामः सत्यपराक्रमः ॥ २५ ॥

' सत्य - पराक्रमी भगवान् श्रीराम केवल देते हैं, लेते नहीं । वे सदा सत्य बोलते हैं, अपने प्राणोंकी रक्षाके लिये भी कभी झूठ नहीं बोल सकते ॥ २५ ॥

स विहायोत्तरीयाणि महार्हाणि महायशाः ।

विसृज्य मनसा राज्यं जनन्यै मां समादिशत् ॥ २६ ॥

' उन महायशस्वी श्रीरघुनाथजीने बहुमूल्य उत्तरीय वस्त्र उतार दिये और मनसे राज्यका त्याग करके मुझे अपनी माता के हवाले कर दिया ॥ २६ ॥

साहं तस्याग्रतस्तूर्ण प्रस्थिता वनचारिणी ।

नहि मे तेन हीनाया वासः खर्गेऽपि रोचते ॥ २७ ॥

" किंतु मैं तुरंत ही उनके आगे - आगे वनकी ओर चल दी; क्योंकि उनके बिना मुझे स्वर्ग में भी रहना अच्छा नहीं लगता ॥ २७ ॥

प्रागेव तु महाभागः सौमित्रिर्मित्रनन्दनः ।

पूर्वजस्यानुयात्रार्थे कुशचीरैरलंकृतः ॥ २८ ॥

' अपने सुहृदोंको आनन्द देनेवाले सुमित्राकुमार महा-

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सुन्दरकाण्डे चतुस्त्रिंशः सर्गः ९ ४७ भाग लक्ष्मण भी अपने बड़े भाईका अनुसरण करने के लिये रक्षसापहृता भार्या रावणेन दुरात्मना ॥ ३० ॥

उनसे भी पहले कुश तथा चीर - वस्त्र धारण करके तैयार " वहाँ दण्डकारण्यमें रहते समय उन अमिततेजस्वी हो गये ॥ २८ ॥ भगवान् श्रीरामकी भार्या मुझ सीताको दुरात्मा राक्षस रावण

ते वयं भर्तुरादेशं बहुमान्य दृढव्रताः । यहाँ हर लाया है ॥ ३० ॥

प्रविष्टाः स्म पुरादृष्टं वनं गम्भीरदर्शनम् ॥ २ ९ ॥ द्वौ मासौ तेन मे कालो जीवितानुग्रहः ' इस प्रकार हम तीनोंने अपने स्वामी महाराज दशरथ- कृतः । की आज्ञाको अधिक आदर देकर दृढ़तापूर्वक उत्तम व्रतका ऊर्ध्व द्वाभ्यां तु मासाभ्यां ततस्त्यक्ष्यामि जीवितम् ॥ पालन करते हुए उस सघन वनमें प्रवेश किया, जिसे पहले ‘ उसने अनुग्रहपूर्वक मेरे जीवन - धारण के लिये दो मास-कभी नहीं देखा था ॥ २ ९ ॥ की अवधि निश्चित कर दी है । उन दो महीनोंके बाद मुझे

वसतो दण्डकारण्ये तस्याहममितौजसः । अपने प्राणोंका परित्याग करना पड़ेगा ' ॥ ३१ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये सुन्दरकाण्डे त्रयस्त्रिंशः सर्गः ॥ ३३ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आरामायण आदिकाव्य के सुन्दरकाण्ड में तैंतीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ३३ ॥

चतुस्त्रिंशः सर्गः सीताजीका हनुमानजी के प्रति संदेह और उसका समाधान तथा हनुमानजी के द्वारा श्रीरामचन्द्रजीके गुणोंका गान

तस्यास्तद्वचनं श्रुत्वा हनूमान् हरिपुङ्गवः ।

दुःखाद् दुःखाभिभूतायाः सान्त्वमुत्तरमब्रवीत् ॥ १ ॥

दुःख - पर- दुःख उठाने के कारण पीड़ित हुई सीताका उपर्युक्त वचन सुनकर वानरशिरोमणि हनुमानजीने उन्हें सान्त्वना देते हुए कहा — ॥ १ ॥

अहं रामस्य संदेशाद् देवि दूतस्तवागतः ।

वैदेहि कुशली रामः स त्वां कौशलमत्रवीत् ॥ २ ॥

" देवि! मैं श्रीरामचन्द्रजीका दूत हूँ और आपके लिये उनका संदेश लेकर आया हूँ । विदेहनन्दिनी! श्रीरामचन्द्रजी सकुशल हैं और उन्होंने आपका कुशल समाचार पूछा है ॥ २ ॥

यो ब्राह्ममस्त्रं वेदांश्च वेद वेदविदां वरः ।

सत्वां दाशरथी रामो देवि कौशलमब्रवीत् ॥ ३ ॥

' देवि! जिन्हें ब्रह्मास्त्र और वेदोंका भी पूर्ण ज्ञान है, वे वेदवेत्ताओंमें श्रेष्ठ दशरथनन्दन श्रीराम स्वयं सकुशल रहकर आपकी भी कुशल पूछ रहे हैं ॥ ३ ॥

लक्ष्मणश्च महातेजा भर्तुस्तेऽनुचरः प्रियः ।

कृतवाञ्छोकसंतप्तः शिरसा तेऽभिवादनम् ॥ ४ ॥

' आपके पति के अनुचर तथा प्रिय महातेजस्वी लक्ष्मण-ने भी शोक संतप्त हो आपके चरणोंमें मस्तक झुकाकर प्रणाम कहलाया है ' ॥ ४ ॥

सातयोः कुशलं देवी निशम्य नरसिंहयोः ।

प्रतिसंहृष्ट सर्वाङ्गी हनूमन्तमथाब्रवीत् ॥ ५ ॥

पुरुषसिंह श्रीराम और लक्ष्मणका समाचार सुनकर देवी सीताके सम्पूर्ण अङ्गोंमें हर्षजनित रोमाञ्च हो आया और वे हनुमानजी से बोलीं- ॥ ५ ॥

कल्याणी बत गाथेयं लौकिकी प्रतिभाति मा ।

एति जीवन्तमानन्दो नरं वर्षशतादपि ॥ ६ ॥

' यदि मनुष्य जीवित रहे तो उसे सौ वर्ष बाद भी आनन्द प्राप्त होता ही है, यह लौकिक कहावत आज मुझे बिल्कुल सत्य एवं कल्याणमयी जान पड़ती है ' ॥ ६ ॥

तयोः समागमे तस्मिन् प्रीतिरुत्पादिताद्भुता ।

परस्परेण चालापं विश्वस्तौ तौ प्रचक्रतुः ॥ ७ ॥

सीता और हनुमान के इस मिलाप ( परस्पर दर्शन ) से दोनोंको ही अद्भुत प्रसन्नता प्राप्त हुई । दोनों विश्वस्त होकर एक - दूसरे से वार्तालाप करने लगे ॥ ७ ॥

तस्यास्तद् वचनं श्रुत्वा हनूमान् मारुतात्मजः ।

सीतायाः शोकतप्तायाः समीपमुपचक्रमे ॥ ८ ॥

शोकसंतप्त सीताकी वे बातें सुनकर पवनकुमार हनुमान्-जी उनके कुछ निकट चले गये ॥ ८ ॥

यथा यथा समीपं स हनूमानुपसर्पति ।

तथा तथा रावणं सा तं सीता परिशङ्कते ॥ ९ ॥

हनुमान् जी ज्यों - ज्यों निकट आते, त्यों - ही - त्यों सीताको यह शङ्का होती कि यह कहीं रावण न हो ॥ ९ ॥

अहो धिग् धिक्कृतमिदं कथितं हि यदस्य मे ।

रूपान्तरमुपागम्य स एवायं हि रावणः ॥ १० ॥

ऐसा विचार आते ही वे मन - ही - मन कहने लगीं— ' अहो! धिक्कार है, जो इसके सामने मैंने अपने मनकी बात कह दी । यह दूसरा रूप धारण करके आया हुआ वह रावण ही है ' ॥ १० ॥

तामशोकस्य शाखां तु विमुक्त्वा शोककर्शिता ।

तस्यामेवानवद्याङ्गी धरण्यां समुपाविशत् ॥ ११ ॥

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९ ४८ श्रीमद्वाल्मीकीय रामायणे फिर तो निर्दोष अङ्गौवाली सीता उस अशोक वृक्षकी शाखाको छोड़ शोकसे कातर हो वहीं जमीनपर बैठ गयीं ॥

अवन्दत महाबाहुस्ततस्तां जनकात्मजाम् ।

सा चैनं भयसंत्रस्ता भूयो नैनमुदैक्षत ॥ १२ ॥

तत्पश्चात् महाबाहु हनुमान्ने जनकनन्दिनी सीताके चरणोंमें प्रणाम किया, किंतु थे भयभीत होने के कारण फिर उनकी ओर देख न सकीं ॥ १२ ॥

' दृष्ट्वा वन्दमानं च सीता शशिनिभानना ।

अब्रवीद् दीर्घमुच्छ्वस्य वानरं मधुरखरा ॥ १३ ॥

वानर हनुमान्को बारंबार वन्दना करते देख चन्द्रमुखी सीता लंबी साँस खींचकर उनसे मधुर वाणी में बोलीं- ॥१३ ॥

मायां प्रविष्टो मायावी यदि त्वं रावणः स्वयम् ।

उत्पादयति मे भूयः संतापं तन्न शोभनम् ॥ १४ ॥

' यदि तुम स्वयं मायावी रावण हो और मायामय शरीर में प्रवेश करके फिर मुझे कष्ट दे रहे हो तो यह तुम्हारे लिये अच्छी बात नहीं है ॥ १४ ॥

स्वं परित्यज्य रूपं यः परिव्राजकरूपवान् ।

जनस्थाने मया दृष्टस्त्वं स एव हि रावणः ॥ १५ ॥

' जिसे मैंने जनस्थानमें देखा था तथा जो अपने यथार्थ रूपको छोड़कर संन्यासीका रूप धारण करके आया था, तुम वही रावण हो ॥ १५ ॥

उपवासकृशां दीनां कामरूप निशाचर ।

संतापयसि मां भूयः संतापं तन्न शोभनम् ॥ १६ ॥

' इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले निशाचर । मैं उपवास करते - करते दुबली हो गयी हूँ और मन - ही - मन दुखी रहती हूँ । इतने पर भी जो तुम फिर मुझे संताप दे रहे हो, यह तुम्हारे लिये अच्छी बात नहीं है ॥ १६ ॥

अथवा नैतदेवं हि यन्मया परिशङ्कितम् ।

मनसो हि मम प्रीतिरुत्पन्ना तव दर्शनात् ॥ १७ ॥

' अथवा जिस बात की मेरे मनमें शङ्का हो रही है, वह न भी हो; क्योंकि तुम्हें देखनेसे मेरे मनमें प्रसन्नता हुई है ।

यदि रामस्य दूतस्त्वमागतो भद्रमस्तु ते ।

पृच्छामि त्वां हरिश्रेष्ठ प्रिया रामकथा हि मे ॥ १८ ॥

' वानरश्रेष्ठ! सचमुच ही यदि तुम भगवान् श्रीरामके दूत हो तो तुम्हारा कल्याण हो । मैं तुमसे उनकी बातें पूछती हूँ; क्योंकि श्रीरामकी चर्चा मुझे बहुत ही प्रिय है ॥ १८ ॥

गुणान् रामस्य कथय प्रियस्य मम वानर ।

चित्तं हरसि मे सौम्य नदीकूलं यथा रयः ॥ १ ९ ॥

' वानर! मेरे प्रियतम श्रीरामके गुणोंका वर्णन करो । सौम्य! जैसे जलका वेग नदीके तटको हर लेता है, उसी प्रकार तुम श्रीरामकी चर्चासे मेरे चित्तको चुराये लेते हो ।

अहो स्वप्नस्य सुखता याहमेव चिराहृता ।

प्रेषितं नाम पश्यामि राघवेण वनौकसम् ॥ २० ॥

' अहो! यह स्वप्न कैसा सुखद हुआ? जिससे यहाँ चिरकालसे हरकर लायी गयी मैं आज भगवान् श्रीरामके भेजे हुए दूत वानरको देख रही हूँ ॥ २० ॥

स्वप्नेऽपि यद्यहं वीरं राघवं सहलक्ष्मणम् ।

पश्येयं नावसीदेयं स्वप्नोऽपि मम मत्सरी ॥ २१ ॥

' यदि मैं लक्ष्मणसहित वीरवर श्रीरघुनाथजीको स्वप्न में भी देख लिया करूँ तो मुझे इतना कष्ट न हो; परंतु स्वप्न भी मुझसे डाह करता है ॥ २१ ॥

नाहं स्वप्नमिमं मन्ये स्वप्ने दृष्ट्वा हि वानरम् ।

न शक्योऽभ्युदयः प्राप्तुं प्राप्तश्चाभ्युदयो मम ॥ २२ ॥

" मैं इसे स्वप्न नहीं समझती; क्योंकि स्वप्न में वानरको देख लेनेपर किसीका अभ्युदय नहीं हो सकता और मैंने यहाँ अभ्युदय प्राप्त किया है ( अभ्युदयकालमें जैसी प्रसन्नता होती है, वैसी ही प्रसन्नता मेरे मनमें छा रही है । ) ॥ २२ ॥

किंनु स्याच्चित्तमोहोऽयं भवेद् वातगतिस्त्वियम् ।

उन्मादजो विकारो वा स्यादयं मृगतृष्णिका ॥ २३ ॥

' अथवा यह मेरे चित्तका मोह तो नहीं है । वात विकारसे होनेवाला भ्रम तो नहीं है । उन्मादका विकार तो नहीं उमड़ आया अथवा यह मृगतृष्णा तो नहीं है! । २३ ॥

अथवा नायमुन्मादो मोहोऽन्युन्मादलक्षणः ।

सम्बुध्ये चाहमात्मानमिमं चापि वनौकसम् ॥ २४ ॥

' अथवा यह उन्मादजनित विकार नहीं है । उन्माद के समान लक्षणवाला मोह भी नहीं है; क्योंकि मैं अपने - आपको देख और समझ रही हूँ तथा इस वानरको भी ठीक - ठीक देखती और समझती हूँ ( उन्माद आदिकी अवस्थाओंमें इस तरह ठीक - ठीक ज्ञान होना सम्भव नहीं है । ) ॥ २४ ॥

इत्येवं बहुधा सीता सम्प्रधार्यं बलाबलम् ।

रक्षसां कामरूपत्वान्मेने तं राक्षसाधिपम् ॥ २५ ॥

एतां बुद्धिं तदा कृत्वा सीता सा तनुमध्यमा ।

न प्रतिव्याजहाराथ वानरं जनकात्मजा ॥ २६ ॥

इस तरह सीता अनेक प्रकारसे राक्षसोंकी प्रबलता और वानरकी निर्बलताका निश्चय करके उन्हें राक्षसराज रावण ही माना; क्योंकि राक्षसों में इच्छानुसार रूप धारण करनेकी शक्ति होती है । ऐसा विचारकर सूक्ष्म कटिप्रदेशवाली जनक-कुमारी सीताने कपिवर हनुमानजी से फिर कुछ नहीं कहा ||

सीताया निश्चितं बुद्ध्वा हनूमान् मारुतात्मजः ।

श्रोत्रानुकूलैर्वचनैस्तदा तां सम्प्रहर्षयन् ॥ २७ ॥

सीता के इस निश्चय को समझकर पवनकुमार हनुमान्जी उस समय कार्नोको सुख पहुँचानेवाले अनुकूल वचनोंद्वारा उनका हर्ष बढ़ाते हुए बोले - ॥ २७ ॥

आदित्य इव तेजस्वी लोककान्तः शशी यथा ।

राजा सर्वस्य लोकस्य देवो वैश्रवणो यथा ॥ २८ ॥

' भगवान् श्रीराम सूर्यके समान तेजस्वी, चन्द्रमाके

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सुन्दरकाण्डे पञ्चत्रिंशः सर्गः ९ ४ ९ समान लोककमनीय तथा देव कुबेरकी भाँति सम्पूर्ण जगत् के लक्ष्मणश्च महातेजाः सुमित्रानन्दवर्धनः ॥ ३४ ॥

राजा है ॥ २८ ॥

विक्रमेणोपपन्नश्च यथा विष्णुर्महायशाः ।

सत्यवादी मधुरवाग् देवो वाचस्पतिर्यथा ॥ २ ९ ॥

' महायशस्वी भगवान् विष्णुके समान पराक्रमी तथा बृहस्पतिजीकी भाँति सत्यवादी एवं मधुरभाषी हैं ।

रूपवान् सुभगः श्रीमान् कंदर्प इव मूर्तिमान् ।

स्थानक्रोधे प्रहर्ता व श्रेष्ठो लोके महारथः ॥ ३० ॥

' रूपवान्, सौभाग्यशाली और कान्तिमान् तो वे इतने हैं, मानो मूर्तिमान् कामदेव हों । वे क्रोधके पात्रपर ही प्रहार करने में समर्थ और संसार के श्रेष्ठ महारथी हैं ॥ ३० ॥

बाहुच्छायामवष्टब्धो यस्य लोको महात्मनः ।

अपक्रम्याश्रमपदान्मृगरूपेण राघवम् ॥ ३१ ॥

शून्ये येनापनीतासि तस्य द्रक्ष्यसि तत्फलम् । ' सम्पूर्ण विश्व उन महात्माकी भुजाओंके आश्रय में— उन्हींकी छत्रछायामें विश्राम करता है । मृगरूपधारी निशाचर-द्वारा श्रीरघुनाथजीको आश्रमसे दूर हटाकर जिसने सूने आश्रममें पहुँचकर आपका अपहरण किया है, उसे उस पापका जो फल मिलनेवाला है, उसको आप अपनी आँखों देखेंगी ॥ ३१३ ॥

अचिराद् रावणं संख्ये यो वधिष्यति वीर्यवान् ॥ ३२ ॥

क्रोधप्रमुक्तैरिषुभिर्ज्वलद्भिरिव पावकैः । ' पराक्रमी श्रीरामचन्द्रजी क्रोधपूर्वक छोड़े गये प्रज्वलित अग्निके समान तेजस्वी बार्णोद्वारा समराङ्गणमें शीघ्र ही रावणका वध करेंगे ॥ ३२३ ॥

तेनाहं प्रेषितो दूतस्त्वत्सकाशमिहागतः ॥ ३३ ॥

त्वद्वियोगेन दुःखार्तः स त्वां कौशलमब्रवीत् । " मैं उन्हींका भेजा हुआ दूत होकर यहाँ आपके पास आया हूँ । भगवान् श्रीराम आपके वियोगजनित दुःखसे पीड़ित हैं । उन्होंने आपके पास अपनी कुशल कहलायी है और आपकी भी कुशल पूछी है ॥ ३३३ ॥

अभिवाद्य महाबाहुः स त्वां कौशलमब्रवीत् । ' सुमित्राका आनन्द बढ़ानेवाले महातेजस्वी महाबाहु लक्ष्मणने भी आपको प्रणाम करके आपकी कुशल पूछी है ॥ रामस्य च सखा देवि सुग्रीवो नाम वानरः ॥ ३५ ॥

राजा वानरमुख्यानां स त्वां कौशलमब्रवीत् ।

नित्यं स्मरति ते रामः ससुग्रीवः सलक्ष्मणः ॥ ३६ ॥

' देवि! श्रीरघुनाथजी के सखा एक सुग्रीव नामक वानर हैं, जो मुख्य - मुख्य वानरोंके राजा हैं, उन्होंने भी आपसे कुशल पूछी है । सुग्रीव और लक्ष्मणसहित श्रीरामचन्द्रजी प्रतिदिन आपका स्मरण करते हैं ॥ ३५-३६ ॥

दिष्टया जीवलि वैदेहि राक्षसीवशमागता ।

नचिराद् द्रक्ष्यसे रामं लक्ष्मणं च महारथम् ॥ ३७ ॥

' विदेइनन्दिनि! राक्षसियों के चंगुलमें फँसकर भी आप अभीतक जीवित हैं, यह बड़े सौभाग्य की बात है । अब आप शीघ्र ही महारथी श्रीराम और लक्ष्मणका दर्शन करेंगी ॥

मध्ये वानरकोटीनां सुग्रीवं चामितौजसम् ।

अहं सुग्रीवसचिवो हनूमान् नाम वानरः ॥ ३८ ॥

" साथ ही करोड़ों वानरोंसे घिरे हुए अमिततेजस्वी सुग्रीवको भी आप देखेंगी । मैं सुग्रीवका मन्त्री हनुमान् नामक वानर हूँ ॥ ३८ ॥

प्रविष्टो नगरीं लङ्कां लङ्घयित्वा महोदधिम् ।

कृत्वा मूर्ध्नि पदन्यासं रावणस्य दुरात्मनः ॥ ३ ९ ॥

" मैंने महासागरको लाँघकर और दुरात्मा रावणके सिरपर पैर रखकर लङ्कापुरीमें प्रवेश किया है ॥ ३ ९ ॥ त्वां द्रष्टुमुपयातोऽहं समाश्रित्य पराक्रमम् ।

नाहमस्मि तथा देवि यथा मामवगच्छसि ।

विशङ्का त्यज्यतामेषा श्रद्धत्ख वदतो मम ॥ ४० ॥

" मैं अपने पराक्रमका भरोसा करके आपका दर्शन करने-के लिये यहाँ उपस्थित हुआ हूँ । देवि! आप मुझे जैसा समझ रही हैं, मैं वैसा नहीं हूँ । आप यह विपरीत आशङ्का छोड़ दीजिये और मेरी बातपर विश्वास कीजिये ' ॥ ४० ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये सुन्दरकाण्डे चतुस्त्रिंशः सर्गः ॥ ३४ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आरामायण आदिकाव्यके सुन्दरकाण्डमें चौंतीसवाँ सगँ पूरा हुआ ॥ ३४ ॥

पञ्चत्रिंशः सर्गः सीताजीके पूछने पर हनुमान् जीका श्रीरामके शारीरिक चिह्नों और गुणोंका वर्णन करना तथा नरवानरकी मित्रताका प्रसङ्ग सुनाकर सीताजीके मनमें विश्वास उत्पन्न करना तां तु रामकथां श्रुत्वा वैदेही वानरर्षभात् । सुनकर विदेहराजकुमारी सीता शान्तिपूर्वक मधुर वाणीमें उवाच वचनं सान्त्वमिदं मधुरया गिरा ॥ १ ॥ बोलीं- ॥ १ ॥

मुखसे श्रीरामचन्द्रजीकी चर्चा क्क ते रामेण संसर्गः कथं जानासि लक्ष्मणम् । वानरश्रेष्ठ हनुमानूजीके

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९ ५० श्रीमवाल्मीकीयरामायणे वानराणां नराणां च कथमासीत् समागमः ॥ २ ॥

' कपिवर! तुम्हारा श्रीरामचन्द्रजीके साथ सम्बन्ध कहाँ हुआ? तुम लक्ष्मणको कैसे जानते हो! मनुष्यों और वानरों का यह मेल किस प्रकार सम्भव हुआ ॥ २ ॥ १

यानि रामस्य चिह्नानि लक्ष्मणस्य च वानर ।

तानि भूयः समाचक्ष्व न मां शोकः समाविशेत् ॥ ३ ॥

" वानर! श्रीराम और लक्ष्मणके जो चिह्न हैं, उनका फिरसे वर्णन करो, जिससे मेरे मनमें किसी प्रकार के शोकका समावेश न हो ॥ ३ ॥

कीदृशं तस्य संस्थानं रूपं तस्य च कीदृशम् ।

कथमूरू कथं बाहू लक्ष्मणस्य च शंस मे ॥ ४ ॥

' मुझे बताओ भगवान् श्रीराम और लक्ष्मणकी आकृति कैसी है? उनका रूप किस तरहका है? उनकी जाँघें और भुजाएँ कैसी हैं? ' ॥ ४ ॥

एवमुक्तस्तु वैदेह्या हनूमान् मारुतात्मजः ।

ततो रामं यथातत्त्वमाख्यातुमुपचक्रमे ॥ ५ ॥

विदेहराजकुमारी सीताके इस प्रकार पूछनेपर पवन-कुमार हनुमानजीने श्रीरामचन्द्रजीके स्वरूपका यथावत् वर्णन आरम्भ किया ॥ ५ ॥

जानन्ती त दिष्टयां मां वैदेहि परिपृच्छसि ।

भर्तुः कमलपत्राक्ष संस्थानं लक्ष्मणस्य च ॥ ६ ॥

' कमल के समान सुन्दर नेत्रोंवाली विदेहराजकुमारी! आप अपने पतिदेव श्रीरामके तथा देवर लक्ष्मणजीके शरीर के विषयमें जानती हुई भी जो मुझसे पूछ रही हैं, यह मेरे लिये बड़े सौभाग्य की बात है ॥ ६ ॥

यानि रामस्य चिह्नानि लक्ष्मणस्य च यानि वै ।

लक्षितानि विशालाक्षि वदतः शृणु तानि मे ॥ ७ ॥

" विशाललोचने! श्रीराम और लक्ष्मणके जिन - जिन चिह्नोंको मैंने लक्ष्य किया है, उन्हें बताता हूँ । मुझसे सुनिये ॥ ७ ॥

रामः कमलपत्राक्षः पूर्णचन्द्रनिभाननः ।

रूपाक्षिण्यसम्पन्नः प्रसूतो जनकात्मजे ॥ ८ ॥

' जनकनन्दिनि । श्रीरामचन्द्रजीके नेत्र प्रफुल्लकमल-दलके समान विशाल एवं सुन्दर हैं । मुख पूर्णिमाके चन्द्रमा के समान मनोहर है । वे जन्मकालसे ही रूप और उदारता आदि गुणोंसे सम्पन्न हैं ॥ ८ ॥

तेजसाऽऽदित्यसंकाशः क्षमया पृथिवीसमः ।

बृहस्पतिसमो बुद्धया यशसा वासवोपमः ॥ ९ ॥

रक्षिता जीवलोकस्य खजनस्य च रक्षिता ।

रक्षिता स्वस्य वृत्तस्य धर्मस्य च परंतपः ॥ १० ॥

' वे तेजमें सूर्य के समान, क्षमामें पृथ्वीके तुल्य, बुद्धिमें बृहस्पतिके सदृश और यशमें इन्द्रके समान हैं । वे सम्पूर्ण जीव - जगत् के तथा स्वजनोंके भी रक्षक हैं । शत्रुओंको संताप देनेवाले श्रीराम अपने सदाचार और धर्मकी रक्षा करते हैं ॥ ९ -१० ॥

रामो भामिनि लोकस्य चातुर्वर्ण्यस्य रक्षिता ।

मर्यादानां च लोकस्य कर्ता कारयिता च सः ॥ ११ ॥

' भामिनि! श्रीरामचन्द्रजी जगत् के चारों वर्णोंकी रक्षा करते हैं । लोकमें धर्मकी मर्यादाओंको बाँधकर उनका पालन करने और करानेवाले भी वे ही हैं ॥ ११ ॥

अर्चिष्मानर्चितोऽत्यर्थ ब्रह्मचर्यव्रते स्थितः ।

साधूनामुपकारशः प्रचारशश्च कर्मणाम् ॥ १२ ॥

" सर्वत्र अत्यन्त भक्तिभाव से उनकी पूजा होती है । ये कान्तिमान् एवं परम प्रकाशस्वरूप हैं, ब्रह्मचर्य व्रत के पालनमें लगे रहते हैं, साधु पुरुषोंका उपकार मानते और आचरणोंद्वारा सत्कर्मों के प्रचारका ढंग जानते हैं ॥ १२ ॥

राजनीत्यां विनीतश्च ब्राह्मणानामुपासकः ।

ज्ञानवान्शीलसम्पन्नो विनीतश्च परंतपः ॥ १३ ॥

' वे राजनीतिमें पूर्ण शिक्षित, ब्राह्मणोंके उपासक, ज्ञानवान्, शीलवान् विनम्र तथा शत्रुओंको संताप देने में समर्थ हैं ॥ १३ ॥

यजुर्वेदविनीतश्च वेदविद्भिः सुपूजितः ।

धनुर्वेदे च वेदे च वेदाङ्गेषु च निष्ठितः ॥ १४ ॥

' उन्हें यजुर्वेद की भी अच्छी शिक्षा मिली है । वेदवेत्ता विद्वानोंने उनका बड़ा सम्मान किया है । वे चारों वेद, धनुर्वेद और छहों वेदाङ्गोंके भी परिनिष्ठित विद्वान् हैं ॥ १४ ॥

विपुलांसो महाबाहुः कम्बुग्रीवः शुभाननः ।

गूढजत्रुः सुताम्राक्षो रामो नाम जनैः श्रुतः ॥ १५ ॥

' उनके कंधे मोटे, भुजाएँ बड़ी - बड़ी, गला शङ्खके समान और मुख सुन्दर है । गलेकी हँसली मांससे ढकी हुई है तथा नेत्रोंमें कुछ - कुछ लालिमा है । वे लोगों में ' श्रीराम ' के नामसे प्रसिद्ध हैं ॥ १५ ॥

दुन्दुभिस्त्रनिर्घोषः स्निग्धवर्णः प्रतापवान् ।

समश्च सुविभकाङ्गो वर्ण श्यामं समाश्रितः ॥ १६ ॥

' उनका स्वर दुन्दुभिके समान गम्भीर और शरीरका रंग सुन्दर एवं चिकना है । उनका प्रताप बहुत बढ़ा - चढ़ा है । उनके सभी अङ्ग सुडौल और बराबर हैं । उनकी कान्ति श्याम है ॥ १६ ॥

त्रिस्थिरस्त्रिप्रलम्बश्च त्रिसमस्त्रिषु चोन्नतः ।

त्रिताम्रस्त्रिषु च स्निग्धो गम्भीर स्त्रिषु नित्यशः ॥ १७ ॥

' उनके तीन अङ्ग ( वक्षःस्थल, कलाई और मुट्ठी ) स्थिर ( सुदृढ़ ) हैं | भौंहें, भुजाएँ और मेढ —ये तीन अङ्ग लंबे हैं । केशोंका अग्रभाग, अण्डकोष और घुटने-ये तीन समान बराबर हैं । वक्षःस्थल, नाभिके किनारेका भाग और उदर – ये तीन उभरे हुए हैं । नेत्रोंके कोने, नख और हाथ - पैर के तलवे – ये तीन लाल हैं । शिश्नका

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सुन्दरकाण्डे पञ्चत्रिंशः सर्गः ९ ५१ अग्रभाग, दोनों पैरोंकी रेखाएँ और सिरके बाल — ये तीन चिकने हैं तथा स्वर, चाल और नाभि ये तीन गम्भीर हैं ॥ १७ ॥

त्रिलीमस्य वनतश्चतुर्व्यङ्गस्त्रशीर्षवान् ।

चतुष्कलश्च तुखश्चतुष्किष्कुश्चतुः समः ॥ १८ ॥

' उनके उदर तथा गलेमें तीन रेखाएँ हैं । तलवोंके मध्यभाग, पैरोंकी रेखाएँ और स्तनोंके अग्रभाग — ये तीन से हुए हैं । गला, पीठ तथा दोनों पिण्डलियाँ – ये चार अङ्ग छोटे । मस्तक में तीन भँवरें हैं । पैरोंके अँगूठे के नीचे तथा ललाटमें चार - चार रेखाएँ हैं । वे चार हाथ ऊँचे हैं । उनके कपोल, भुजाएँ, जाँघें और घुटने -- ये चार अङ्ग बराबर हैं ॥ १८ ॥

चतुर्दशसमद्वन्द्वश्चतुर्दश्चतुर्गतिः महोष्ठहनुनासश्च पञ्चस्निग्धोऽष्टवंशवान् ॥ १ ९ ॥ ' शरीर में जो दो - दोकी संख्या में चौदह अन होते हैं, वे भी उनके परस्पर सम हैं । उनकी चारों कोनोंकी चारों दाढ़ें शास्त्रीय लक्षणोंसे युक्त हैं । वे सिंह, बाघ, हाथी और साँड़ -- इन चारके समान चार प्रकार की गति से चलते हैं । उनके ओठ, ठोढ़ी और नासिका - सभी प्रशस्त हैं । केश, नेत्र, दाँत, त्वचा और पैर के तलवे - इन पाँचों अङ्गोंमें स्निग्धता भरी है । दोनों भुजाएँ, दोनों जाँघें, दोनों पिंडलियाँ, हाथ और पैरोंकी अँगुलियाँ – ये आठ अङ्ग उत्तम लक्षणोंसे सम्पन्न ( लंबे ) हैं ॥ १ ९ ॥

दशपद्मो दशवृहत्त्रिभिर्व्याप्तो द्विशुक्लवान् ।

षडुन्नतो नवतनुस्त्रिभिर्व्याप्नोति राघवः ॥ २० ॥

' उनके नेत्र, मुख - विवर, मुख - मण्डल, जिल्हा, ओठ, तालु, स्तन, नख, हाथ और पैर ये दस अन कमलके समान हैं । छाती, मस्तक, ललाट, गला, भुजाएँ, कंधे, नाभि, चरण, पीठ और कान - ये दस अङ्ग विशाल हैं । वे श्री, यश और प्रताप — इन तीनोंसे व्याप्त हैं । उनके मातृकुल और पितृकुल दोनों अत्यन्त शुद्ध हैं । पार्श्वभाग, उदर, वक्षःस्थल, नासिका, कंधे और ललाट —ये छः अङ्ग ऊँचे हैं । केश, नख, लोम, त्वचा, अंगुलियोंके पोर, शिश्न, बुद्धि और दृष्टि आदि नौ सूक्ष्म ( पतले ) हैं तथा वे श्रीरघुनाथजी पूर्वाह्न, मध्याह्न और अपराह्न – इन तीन कालद्वारा क्रमशः धर्म, अर्थ और कामका अनुष्ठान करते हैं ॥ २० ॥

सत्यधर्मरतः श्रीमान् संग्रहानुग्रहे रतः ।

देशकालविभागशः सर्वलोकप्रियंवदः ॥ २१ ॥

' श्रीरामचन्द्रजी सत्यधर्मके अनुष्ठानमें संलग्न, श्रीसम्पन्न, न्यायसङ्गत धनका संग्रह और प्रजापर अनुग्रह १. भौंह, नथुने, नेत्र, कान, ओठ, स्तन, कोहनी, कलाई, जाँघ, घुटने, अण्डकोष, कमर के दोनों भाग, हाथ और पैर करनेमें तत्पर, देश और कालके विभागको समझने वाले तथा सब लोगों से प्रिय वचन बोलनेवाले हैं ॥ २१ ॥

भ्राता चास्य च वैमात्रः सौमित्रिरमितप्रभः ।

अनुरागेण रूपेण गुणैश्चापि तथाविधः ॥ २२ ॥

" उनके सौतेले भाई सुमित्राकुमार लक्ष्मण भी बड़े तेजस्वी हैं । अनुराग, रूप और सद्गुणोंकी दृष्टि से भी वे श्रीरामचन्द्रजी के ही समान हैं ॥ २२ ॥

स सुवर्णच्छविः श्रीमान् रामः श्यामो महायशाः ।

तावुभौ नरशार्दूलौ त्वद्दर्शनकृतोत्सवी ॥ २३ ॥

विचिन्वन्तौ महीं कृत्स्नामस्माभिः सह संगतौ । ' उन दोनों भाइयों में अन्तर इतना ही है कि लक्ष्मण के शरीरकी कान्ति सुवर्णके समान गौर है और महायशस्वी श्रीरामचन्द्रजीका विग्रह श्याम सुन्दर है । वे दोनों नरश्रेष्ठ आपके दर्शनके लिये उत्कण्ठित हो सारी पृथ्वीपर आपकी ही खोज करते हुए हमलोगों से मिले थे ॥ २३३ ॥

त्वामेव मार्गमाणौ तौ विचरन्तौ वसुंधराम् ॥ २४ ॥

ददर्श तुर्मृगपति पूर्वजेनावरोपितम् । ' आपको ही ढूँढ़ने के लिये पृथ्वीपर विचरते हुए उन दोनों भाइयोंने वानरराज सुग्रीवका साक्षात्कार किया, जो अपने बड़े भाई के द्वारा राज्यसे उतार दिये गये थे ॥ २४३ ॥

ऋष्यमूकस्य मूले तु बहुपादपसंकुले ॥ २५ ॥

भ्रातुर्भयार्तमासीनं सुग्रीवं प्रियदर्शनम् । ' ऋष्यमूक पर्वत के मूलभागमें जो बहुत - से वृक्षोंद्वारा घिरा हुआ है, भाई के भयसे पीड़ित हो बैठे हुए प्रियदर्शन सुग्रीवसे वे दोनों भाई मिले ॥ २५३ ॥

वयं च हरिराजं तं सुग्रीवं सत्यसङ्गरम् ॥ २६ ॥

परिचर्यामहे राज्यात् पूर्वजेनावरोपितम् । ' उन दिनों जिन्हें बड़े भाईने राज्यसे उतार दिया था, उन सत्यप्रतिज्ञ वानरराज सुग्रीवकी सेवा में हम सब लोग रहा करते थे ॥ २६३ ॥

ततस्तौ चीरवसनौ धनुः प्रवर पाणिनी ॥ २७ ॥

ऋष्यमूकस्य शैलस्य रम्यं देशमुपागतौ ।

सतौ दृष्ट्रा नरव्याघ्रौ धन्विनौ वानरर्षभः ॥ २८ ॥

अभिप्लुतो गिरेस्तस्य शिखरं भयमोहितः । ' शरीरपर वल्कलवस्त्र तथा हाथमें धनुष धारण किये वे दोनों भाई जब ऋष्यमूक पर्वत के रमणीय प्रदेशमें आये, तब धनुष धारण करनेवाले उन दोनों नरश्रेष्ठ वीरोंको वहाँ उपस्थित देख वानरशिरोमणि सुग्रीव भयसे घबरा उठे और उछलकर उस पर्वत के उच्चतम शिखरपर जा चढ़े ॥ २७-२८३ ॥ ततः स शिखरे तस्मिन् वानरेन्द्रो व्यवस्थितः ॥ २ ९ ॥ तयोः समीपं मामेव प्रेषयामास सत्वरम् । ' उस शिखर पर बैठने के पश्चात् वानरराज सुग्रीवने मुझे ही शीघ्रतापूर्वक उन दोनों बन्धुओंके पास भेजा ॥ २ ९ ३ ॥

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९ ५२ श्रीमद्वाल्मीकीय रामायणे तावहं पुरुषव्याघ्रौ सुग्रीववचनात् प्रभू ॥ ३० ॥

रूपलक्षणसम्पन्नौ कृताञ्जलिरुपस्थितः । ' सुग्रीव की आज्ञासे उन प्रभावशाली रूपवान् तथा शुभ-लक्षणसम्पन्न दोनों पुरुषसिंह वीरोंकी सेवामें मैं हाथ जोड़कर उपस्थित हुआ ॥ ३०३ ॥

तौ परिज्ञाततत्त्वार्थे मया प्रीतिसमन्वितौ ॥ ३१ ॥

पृष्ठमारोप्य तं देशं प्रापितौ पुरुषर्षभौ । ' मुझसे यथार्थ बातें जानकर उन दोनोंको बड़ी प्रसन्नता हुई । फिर मैं अपनी पीठपर चढ़ाकर उन दोनों पुरुषोत्तम बन्धुओंको उस स्थानपर ले गया ( जहाँ वानरराज सुग्रीव थे ) ॥ निवेदितौ च तत्त्वेन सुग्रीवाय महात्मने ॥ ३२ ॥

तयोरन्योन्य सम्भाषाद् भृशं प्रीतिरजायत । ' वहाँ महात्मा सुग्रीवको मैंने इन दोनों बन्धुओंका यथार्थ परिचय दिया । तत्पश्चात् श्रीराम और सुग्रीवने परस्पर बातें कीं, इससे उन दोनोंमें बड़ा प्रेम हो गया ॥ ३२३ ॥

तत्र तौ कीर्तिसम्पन्नौ हरीश्वरनरेश्वरौ ॥ ३३ ॥

परस्परकृताश्वासी कथया पूर्ववृत्तया । " वहाँ उन दोनों यशस्वी वानरेश्वर और नरेश्वरोंने अपने ऊपर बीती हुई पहले की घटनाएँ सुनार्थी तथा दोनोंने दोनों को आश्वासन दिया ॥ ३३३ ॥

तं ततः सान्त्वयामास सुग्रीवं लक्ष्मणाग्रजः ॥ ३४ ॥

स्त्रीहेतोर्वालिना भ्रात्रा निरस्तं पुरुतेजसा । ' उस समय लक्ष्मणके बड़े भाई श्रीरघुनाथजीने स्त्रीके लिये अपने महातेजस्वी भाई वालीद्वारा घरसे निकाले हुए सुग्रीवको सान्त्वना दी ॥ ३४३ ॥

ततस्त्वन्नाशजं शोकं रामस्याक्लिष्टकर्मणः ॥ ३५ ॥

लक्ष्मणो वानरेन्द्राय सुग्रीवाय न्यवेदयत् । ' तत्पश्चात् अनायास ही महान् कर्म करनेवाले भगवान् श्रीरामको आपके वियोगसे जो शोक हो रहा था, उसे लक्ष्मण-ने वानरराज सुग्रीवको सुनाया ॥ ३५३ ॥

स श्रुत्वा वानरेन्द्रस्तु लक्ष्मणेनेरितं वचः ॥ ३६ ॥

तदाली निष्प्रभोऽत्यर्थे ग्रहग्रस्त इवांशुमान् । ' लक्ष्मणजीकी कही हुई वह बात सुनकर वानरराज सुग्रीव उस समय ग्रहग्रस्त सूर्यके समान अत्यन्त कान्तिहीन हो गये || ३६३ ॥ ततस्त्वद्गात्रशोभीनि रक्षसा हियमाणया ॥ ३७ ॥

यान्याभरणजालानि पातितानि महीतले ।

तानि सर्वाणि रामाय आनीय हरियूथपाः ॥ ३८ ॥

संहृष्टा दर्शयामासुर्गतिं तु न विदुस्तव । ' तदनन्तर वानरयूथपतियोंने आपके शरीरपर शोभा पानेवाले उन सब आभूषणोंको ले आकर बड़ी प्रसन्नता के साथ श्रीरामचन्द्रजीको दिखाया, जिन्हें आपने उस समय grater गिराया था, जब कि राक्षस आपको हरकर लिये जा रहा था । वानरोंने आभूषण तो दिखाये, किंतु उन्हें आपका

पता कुछ भी मालूम नहीं था । ३७-३८३ ॥

तानि रामाय दत्तानि मयैवोपहतानि च ॥ ३ ९ ॥

स्वनवन्त्यवकीर्णानि तस्मिन् विहतचेतसि ।

तान्यङ्के दर्शनीयानि कृत्वा बहुविधं तदा ॥ ४० ॥

तेन देवप्रकाशेन देवेन परिदेवितम् । ' आपके द्वारा गिराये जानेपर वे सब आभूषण झन-झनकी आवाज के साथ जमीनपर गिरे और बिखर गये थे । मैं ही उन सबको बटोरकर ले आया था । उस दिन जब वे गहने श्रीरामचन्द्रजीको दिये गये, उस समय वे उन्हें अपनी गोदमें लेकर अचेत - से हो गये थे । उन दर्शनीय आभूषणों-को छाती से लगाकर देवतुल्य आभावाले भगवान् श्रीरामने

बहुत विलाप किया । ३ ९ -४०३ ॥

पश्यतस्तानि रुदतस्ताम्यतश्च पुनः पुनः ॥ ४१ ॥

प्रादीपयद् दाशरथेस्तदा शोकहुताशनम् ॥ ४२ ॥

शायितं च चिरं तेन दुःखार्तेन महात्मना ।

मयापि विविधैर्वापयैः कृच्छ्रादुत्थापितः पुनः ॥ ४३ ॥

' उन आभूषणों को बारंबार देखते, रोते और तिलमिला उठते थे । उस समय दशरथनन्दन श्रीरामकी शोकाग्नि प्रज्वलित हो उठी । उस दुःखसे आतुर हो वे महात्मा रघुवीर बहुत देर तक मूर्छित अवस्था में पड़े रहे । तब मैंने नाना प्रकार के सान्त्वनापूर्ण वचन कहकर बड़ी कठिनाई से उन्हें उठाया ॥ ४१-४३ ॥

तानि दृष्ट्रा महार्हाणि दर्शयित्वा मुहुर्मुहुः ।

राघवः सहसौमित्रिः सुग्रीवे संन्यवेशयत् ॥ ४४ ॥

' लक्ष्मणसहित श्रीरघुनाथजीने उन बहुमूल्य आभूषणको

बारंबार देखा और दिखाया । फिर वे सब सुग्रीवको दे दिये ॥

स तवादर्शनादार्ये राघवः परितप्यते ।

महता ज्वलता नित्यमग्निनेवाग्निपर्वतः ॥ ४५ ॥

" आयें! आपको न देख पानेके कारण श्रीरघुनाथजीको बड़ा दुःख और संताप हो रहा है । जैसे ज्वालामुखी पर्वत जलती हुई बड़ी भारी आगसे सदा तपता रहता है, उसी प्रकार वे आपकी विरहाग्निसे जल रहे हैं ॥ ४५ ॥

त्वत्कृते तमनिद्रा च शोकश्चिन्ता च राघवम् ।

तापयन्ति महात्मानमग्न्यगारमिवाग्नयः ॥ ४६ ॥

' आपके लिये महात्मा श्रीरघुनाथजीको अनिद्रा ( निरन्तर जागरण ), शोक और चिन्ता — ये तीनों उसी प्रकार संताप देते हैं, जैसे आहवनीय आदि त्रिविध अग्नियाँ अग्निशाला-को तपाती रहती हैं ॥ ४६ ॥

तवादर्शनशोकेन राघवः परिचाल्यते ।

महता भूमिकस्पेन महानिव शिलोच्चयः ॥ ४७ ॥

" देवि! आपको न देख पानेका शोक श्रीरघुनाथजीको

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वाल्मीकि रामायण — खण्ड २, पृष्ठ 130 का मूल पृष्ठ
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सुन्दरकाण्डे पञ्चत्रिंशः सर्गः ९ ५३ उसी प्रकार विचलित कर देता है, जैसे भारी भूकम्पसे महान् पर्वत भी हिल जाता है ॥ ४७ ॥

काननानि सुरम्याणि नदीप्रस्रवणानि च ।

चरन् न रतिमाप्नोति त्वामपश्यन् नृपात्मजे ॥ ४८ ॥

' राजकुमारि! आपको न देखनेके कारण रमणीय काननों, नदियों और झरनोंके पास विचरनेपर भी श्रीरामको सुख नहीं मिलता है ॥ ४८ ॥

स त्वां मनुजशार्दूलः क्षिप्रं प्राप्स्यति राघवः ।

समित्रबान्धवं हत्वा रावणं जनकात्मजे ॥ ४ ९ ॥

' जनकनन्दिनि! पुरुषसिंह भगवान् श्रीराम रावणको उसके मित्र और बन्धुबान्धवसहित मारकर शीघ्र ही आपसे मिलेंगे ॥ ४ ९ ॥

सहितौ रामसुग्रीवावुभावकुरुतां तदा ।

समयं वालिनं हन्तुं तव चान्वेषणं प्रति ॥ ५० ॥

‘ उन दिनों श्रीराम और सुग्रीव जब मित्रभावसे मिले, तब दोनोंने एक - दूसरे की सहायता के लिये प्रतिज्ञा की । श्रीरामने वालीको मारने का और सुग्रीवने आपकी खोज करानेका वचन दिया ॥ ५० ॥

ततस्ताभ्यां कुमाराभ्यां वीराभ्यां स हरीश्वरः ।

किष्किन्धां समुपागम्य वाली युद्धे निपातितः ॥ ५१ ॥

' इसके बाद उन दोनों वीर राजकुमारोंने किष्किन्धामें जाकर वानरराज वालीको युद्धमें मार गिराया ॥ ५१ ॥

ततो निहत्य तरसा रामो वादिनमाहवे ।

सर्वर्क्षहरिसङ्घानां सुग्रीवमकरोत् पतिम् ॥ ५२ ॥

' युद्ध में वेगपूर्वक वालीको मारकर श्रीरामने सुग्रीवको समस्त भालुओं और वानरोंका राजा बना दिया ॥ ५२ ॥

रामसुग्रीवयोरैक्यं देव्येवं समजायत ।

हनूमन्तं च मां विद्धि तयोर्दूतमुपागतम् ॥ ५३ ॥

' देवि! श्रीराम और सुग्रीवमें इस प्रकार मित्रता हुई है । उन दोनोंका दूत बनकर यहाँ आया हूँ । आप मुझे हनुमान् समझें ॥ ५३ ॥

स्वं राज्यं प्राप्य सुग्रीवः स्वानानीय महाकपीन् ।

त्वदर्थं प्रेषयामास दिशो दश महाबलान् ॥ ५४ ॥

' अपना राज्य पानेके अनन्तर सुग्रीवने अपने आश्रयमें रहनेवाले बड़े - बड़े बलवान् वानरोंको बुलाया और उन्हें आपकी खोज के लिये दसों दिशाओं में भेजा ॥ ५४ ॥

आदिष्टा वानरेन्द्रेण सुग्रीवेण महौजसः ।

अद्रिराजप्रतीकाशाः सर्वतः प्रस्थिता महीम् ॥ ५५ ॥

' वानरराज सुग्रीव की आज्ञा पाकर गिरिराजके समान विशालकाय महाबली वानर पृथ्वीपर सब ओर चल दिये ॥

ततस्ते मार्गमाणा वै सुग्रीववचनातुराः ।

चरन्ति वसुधां कृत्स्नां वयमन्ये च वानराः ॥ ५६ ॥

' सुग्रीव की आज्ञासे भयभीत हो हम तथा अन्य वानर बा ० ०० ५.७.१२-आपकी खोज करते हुए समस्त भूमण्डलमें विचर रहे हैं ॥

अङ्गदो नाम लक्ष्मीवान् वालिस्नुर्महाबलः ।

प्रस्थितः कपिशार्दूलस्त्रिभागबलसंवृतः ॥ ५७ ॥

' वाली के शोभाशाली पुत्र महाबली कपिश्रेष्ठ अंगद वानरों-की एक तिहाई सेना साथ लेकर आपकी खोजमें निकले थे ( उन्हीं के दलमें मैं भी था ) ॥ ५७ ॥

तेषां नो विप्रणष्टानां विन्ध्ये पर्वतसत्तमे ।

भृशं शोकपरीतानामहोरात्रगणा गताः ॥ ५८ ॥

' पर्वतश्रेष्ठ विन्ध्य में आकर खो जाने के कारण हमने वहाँ बड़ा कष्ट उठाया और वहीं हमारे बहुत दिन बीत गये ॥

ते वयं कार्यनैराश्यात् कालस्यातिक्रमेण च ।

भयाच्च कपिराजस्य प्राणांस्त्यक्त मुपस्थिताः ॥ ५१ ॥

' अब हमें कार्य सिद्धिकी कोई आशा नहीं रह गयी और निश्चित अवधिसे भी अधिक समय बिता देनेके कारण वानरराज सुग्रीव का भी भय था, इसलिये हम सब लोग अपने प्राण त्याग देनेके लिये उद्यत हो गये ॥ ५ ९ ॥

विचित्य गिरिदुर्गाणि नदीप्रस्रवणानि च ।

अनासाद्य पदं देव्याः प्राणांस्त्यक्त व्यवस्थिताः ॥ ६० ॥

' पर्बतके दुर्गम स्थानोंमें, नदियोंके तटोंपर और झरनों-के आस - पासकी सारी भूमि छान डाली तो भी जब हमें देवी सीता ( आप ) के स्थानका पता न चला, तब हम प्राण त्याग देने को तैयार हो गये ॥ ६० ॥

ततस्तस्य गिरेर्मूर्ध्नि वयं प्रायमुपास्महे ।

er प्रायोपविष्टांश्च सर्वान् वानरपुङ्गवान् ॥ ६१ ॥

भृशं शोकार्णवे मग्नः पर्यदेवयदङ्गदः । ' मरणान्त उपवासका निश्चय करके हम सब - के - सब उस पर्वत के शिखर पर बैठ गये । उस समय समस्त वानर-शिरोमणियको प्राण त्याग देनेके लिये बैठे देख कुमार अङ्गद अत्यन्त शोकके समुद्र में डूब गये और विलाप करने लगे ॥ ६१३ ॥

तव नाशं च वैदेहि वालिनश्च तथा वधम् ॥ ६२ ॥

प्रायोपवेशमस्माकं मरणं च जटायुषः । ' विदेहनन्दिनि! आपका पता न लगने, वालीके मारे जाने, हमलोगोंके मरणान्त उपवास करने तथा जटायुके मरनेकी बातपर विचार करके कुमार अङ्गदको बड़ा दुःख हुआ था ॥ ६२३ ॥

तेषां नः स्वामिसंदेशान्निराशानां मुमूर्षताम् ॥ ६३ ॥

कार्यहेतोरिहायातः शकुनिर्वीर्यवान् महान् ।

गृध्रराजस्य सोदर्यः सम्पातिर्नाम गृधराट् ॥ ६४ ॥

' स्वामी के आज्ञापालनसे निराश होकर हम मरना ही चाहते थे कि दैववश हमारा कार्य सिद्ध करने के लिये गृध्रराज जटायुके बड़े भाई सम्पाति, जो स्वयं भी गीधोंके राजा और महान् बलवान् पक्षी हैं, वहाँ आ पहुँचे ॥ ६३-६४ ॥