Ramayana 2 — पृष्ठ 141–150

वाल्मीकि रामायण — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 141–150

पृष्ठ 141

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९ ६४ श्रीमवाल्मीकीयरामायणे शीघ्र ही प्रिय करना चाहता था । अतः स्नेहपूर्ण हृदयसे ही मैंने ऐसी बात कही है ॥ ७ ॥

लङ्काया दुष्प्रवेशत्वाद् दुस्तरत्वान्महोदधेः ।

सामर्थ्यादात्मनश्चैव मयैतत् समुदीरितम् ॥ ८ ॥

' दूसरा कारण यह है कि लङ्कामें प्रवेश करना सबके लिये अत्यन्त कठिन है । तीसरा कारण है, महासागरको पार करनेकी कठिनाई । इन सब कारणोंसे तथा अपने में आपको ले जानेकी शक्ति होनेसे मैंने ऐसा प्रस्ताव किया था ॥

इच्छामि त्वां समानेतुमद्यैव रघुनन्दिना ।

गुरुस्नेहेन भतया च नान्यथा तदुदाहृतम् ॥ ९ ॥

" मैं आज ही आपको श्रीरघुनाथजी से मिला देना चाहता था । अतः अपने परमाराध्य गुरु श्रीरामके प्रति स्नेह और आपके प्रति भक्तिके कारण ही मैंने ऐसी बात कही थी, किसी और उद्देश्यसे नहीं ॥ ९ ॥

यदिनोत्सहसे यातुं मया सार्धमनिन्दिते ।

अभिज्ञानं प्रयच्छ त्वं जानीयाद् राघवो हि यत् ॥१० ॥

' किंतु सती - साध्वी देवि! यदि आपके मनमें मेरे साथ चलनेका उत्साह नहीं है तो आप अपनी कोई पहचान ही दे दीजिये, जिससे श्रीरामचन्द्रजी यह जान लें कि मैंने आपका दर्शन किया है ' ॥ १० ॥

एवमुक्ता हनुमता सीता सुरसुतोपमा ।

उवाच वचनं मन्दं बाष्पप्रग्रथिताक्षरम् ॥ ११ ॥

हनुमानजी के ऐसा कहने पर देवकन्या के समान तेजस्विनी सीता अश्रुगद्गदवाणी में घीरे धीरे इस प्रकार बोलीं – ॥ ११ ॥

इदं श्रेष्ठमभिज्ञानं ब्रूयास्त्वं तु मम प्रियम् ।

शैलस्य चित्रकूटस्य पादे पूर्वोत्तरे पदे ॥ १२ ॥

तापसाश्रमवासिन्याः प्राज्य मूलफलोदके ।

तस्मिन् सिद्धाश्रिते देशे मन्दाकिन्यविदूरतः ॥ १३ ॥

तस्योपवनखण्डेषु नानापुष्प सुगन्धिषु ।

विहृत्य सलिले क्लिन्नो ममाङ्के समुपाविशः ॥ १४ ॥

' वानरश्रेष्ठ! तुम मेरे प्रियतमसे यह उत्तम पहचान बताना - नाथ! चित्रकूट पर्वत के उत्तर - पूर्ववाले भागपर, जो मन्दाकिनी नदीके समीप है तथा जहाँ फल - मूल और जलकी अधिकता है, उस सिद्धसेवित प्रदेश में तापसाश्रम के भीतर जब मैं निवास करती थी, उन्हीं दिनों नाना प्रकारके फूलों-की सुगन्धसे वासित उस आश्रमके उपवन में जलविहार करके आप भीगे हुए आये और मेरी गोद में बैठ गये ॥ १२-१४ ॥

ततो मांससमायुक्तो वायसः पर्यतुण्डयत् ।

तमहं लोष्टमुद्यम्य वारयामि स्म वायसम् ॥ १५ ॥

दारयन् स च मां काकस्तत्रैव परिलीयते ।

न चाप्युपारमन्मांसाद् भक्षार्थी बलिभोजनः ॥ १६ ॥

' तदनन्तर ( किसी दूसरे समय ) एक मांसलोलुप कौआ आकर मुझपर चोंच मारने लगा । मैंने ढेला उठा-कर उसे हटाने की चेष्टा की, परंतु मुझे बार - बार चोंच मार-कर वह कौआ वहीं कहीं छिप जाता था । उस बलिभोजी कौएको खानेकी इच्छा थी, इसलिये वह मेरा मांस नोचने से निवृत्त नहीं होता था ॥ १५-१६ ॥

उत्कर्षन्त्यां च रशनां क्रुद्धायां मयि पक्षिणे ।

स्रंसमाने च वसने ततो दृष्टा त्वया ह्यहम् ॥ १७ ॥

“ मैं उस पक्षीपर बहुत कुपित थी । अतः अपने लहँगे-को दृढ़तापूर्वक कसने के लिये कटिसूत्र ( नारे ) को खींचने लगी । उस समय मेरा वस्त्र कुछ नीचे खिसक गया और उसी अवस्थामें आपने मुझे देख लिया ॥ १७ ॥

त्वया विहसिता चाहं क्रुद्धा संलजिता तदा ।

भक्ष्यगृद्धेन काकेन दारिता त्वामुपागता ॥ १८ ॥

“ देखकर आफ्ने मेरी हँसी उड़ायी । इससे मैं पहले तो कुपित हुई और फिर लज्जित हो गयी । इतनेही में उस भक्ष्य - लोलुप कौए ने फिर चोंच मारकर मुझे क्षत - विक्षत कर दिया और उसी अवस्था में मैं आपके पास आयी ॥ १८ ॥

ततः श्रान्ताहमुत्सङ्गमासीनस्य तवाविशम् ।

क्रुध्यन्तीव प्रहृष्टेन त्वयाहं परिसान्त्विता ॥ १ ९ ॥

" आप वहाँ बैठे हुए थे । मैं उस कौएकी हरकतसे तंग आ गयी थी । अतः थककर आपकी गोद में आ बैठी । उस समय मैं कुपित - सी हो रही थी और आपने प्रसन्न होकर मुझे सान्त्वना दी ॥ १ ९ ॥

बाष्पपूर्णमुखी मन्दं चक्षुषी परिमार्जती ।

लक्षिताहं त्वया नाथ वायसेन प्रकोपिता ॥ २० ॥

“ नाथ! कौए ने मुझे कुपित कर दिया था । मेरे मुख-पर आँसुओंकी धारा बह रही थी और मैं धीरे - धीरे आँखें पोंछ रही थी । आपने मेरी उस अवस्थाको लक्ष्य किया ' ॥

परिश्रमाच्च सुप्ता हे राघवाङ्केऽस्म्यहं चिरम् ।

पर्यायेण प्रसुप्तश्च ममाङ्के भरताग्रजः ॥ २१ ॥

' हनुमान्! मैं थक जानेके कारण उस दिन बहुत देरतक श्रीरघुनाथजीकी गोद में सोयी रही । फिर उनकी बारी आयी और वे भरतके बड़े भाई मेरी गोद में सिर रखकर सो रहे ॥ २१ ॥

स तत्र पुनरेवाथ वायसः समुपागमत् ।

ततः सुप्तप्रबुद्धां मां राघवाङ्कात् समुत्थिताम् ।

वायसः सहसागम्य विददार स्तनान्तरे ॥ २२ ॥

" इसी समय वह कौआ फिर वहाँ आया । मैं सोकर जगने के बाद श्रीरघुनाथजीकी गोदसे उठकर बैठी ही थी कि उस कौएने सहसा झपटकर मेरी छाती में चोंच मार दी ॥२२ ॥

पुनः पुनरथोत्पत्य विद्दार स मां भृशम् ।

ततः समुत्थितो रामो मुक्कैः शोणितविन्दुभिः ॥ २३ ॥

‘ उसने बारंबार उड़कर मुझे अत्यन्त घायल कर दिया ।

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सुन्दरकाण्डे अष्टात्रिंशः सर्गः ९ ६५ मेरे शरीरसे रक्तकी बूँदें झरने लगीं, इससे श्रीरामचन्द्रजीकी स पित्रा च परित्यक्तः सर्वैश्च परमर्षिभिः । नींद खुल गयी और वे जागकर उठ बैठे ॥ २३ ॥

स मां दृष्ट्वा महाबाहुर्वितुम्नां स्तनयोस्तदा ।

आशीविष इव क्रुद्धः श्वसन् वाक्यमभाषत ॥ २४ ॥

' मेरी छाती में घाव हुआ देख महाबाहु श्रीराम उस समय कुपित हो उठे और फुफकारते हुए विषधर सर्पके समान जोर - जोर से साँस लेते हुए बोले - ॥ २४ ॥

केन ते नागनासोरु विक्षतं वै स्तनान्तरम् ।

कः क्रीडति सरोषेण पञ्चवक्त्रेण भोगिना ॥ २५ ॥

" हाथी की सूँड़के समान जाँघोंवाली सुन्दरी । किसने तुम्हारी छातीको क्षत - विक्षत किया है? कौन रोषसे भरे हुए पाँच मुखवाले सर्प के साथ खेल रहा है? ' ॥ २५ ।

वीक्षमाणस्ततस्तं वै वायसं समवैक्षत ।

नखैः सरुधिरैस्तीक्ष्णैर्मामेवाभिमुखं स्थितम् ॥ २६ ॥

' इतना कहकर जब उन्होंने इधर - उधर दृष्टि डाली, तब

उस कौए को देखा, जो मेरी ओर ही मुँह किये बैठा था ।

उसके तीखे पंजे खूनसे रँग गये थे ॥ २६ ॥

पुत्रः किल स शक्रस्य वायसः पततां वरः ।

घरान्तरं गतः शीघ्रं पवनस्य गतौ समः ॥ २७ ॥

' वह पक्षियोंमें श्रेष्ठ कौआ इन्द्रका पुत्र था । उसकी गति वायुके समान तीव्र थी । वह शीघ्र ही स्वर्गसे उड़कर पृथ्वीपर आ पहुँचा था ॥ २७ ॥

ततस्तस्मिन् महाबाहुः कोपसंवर्तितेक्षणः ।

वायसे कृतवान् क्रूपं मतिं मतिमतां वरः ॥ २८ ॥

‘ उस समय बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ महाबाहु श्रीरामके नेत्र क्रोधसे घूमने लगे । उन्होंने उस कौएको कठोर दण्ड देनेका विचार किया ॥ २८ ॥

सदर्भसंस्तराद् गृह्य ब्रह्मणोऽस्त्रेण योजयत् ।

स दीप्त इव कालाग्निर्जज्वालाभिमुखो द्विजम् ॥ २ ९ ॥

' श्रीरामने कुशकी चटाई से एक कुश निकाला और उसे ब्रह्मास्त्र के मन्त्रसे अभिमन्त्रित किया । अभिमन्त्रित करते ही वह कालाग्निके समान प्रज्वलित हो उठा । उसका लक्ष्य वह पक्षी ही था ॥ २ ९ ॥

स तं प्रदीप्तं चिक्षेप दर्भे तं वायसं प्रति ।

ततस्तु वायसंदर्भः सोऽम्बरेऽनुजगाम ह ॥ ३० ॥

' श्रीरघुनाथजीने वह प्रज्वलित कुश उस कौएकी ओर छोड़ा । फिर तो वह आकाशमें उसका पीछा करने लगा ॥ ३० ॥

अनुसृष्टस्तदा काको जगाम विविधां गतिम् ।

त्राणकाम इमं लोकं सर्व वै विचचार ह ॥ ३१ ॥

' वह कौआ कई प्रकारकी उड़ानें लगाता अपने प्राण बचाने के लिये इस सम्पूर्ण जगत् में भागता फिरा, किंतु उस बाणने कहीं भी उसका पीछा न छोड़ा ॥ ३१ ॥

त्रीलोकान् सम्परिक्रम्य तमेव शरणं गतः ॥ ३२ ॥

" उसके पिता इन्द्र तथा समस्त श्रेष्ठ महर्षियोंने भी उसका परित्याग कर दिया । तीनों लोकोंमें घूमकर अन्तमें वह पुनः भगवान् श्रीरामकी ही शरणमें आया ॥ ३२ ॥

स तं निपतितं भूमौ शरण्यः शरणागतम् ।

वधामपि काकुत्स्थः कृपया पर्यपालयत् ॥ ३३ ॥

' रघुनाथजी शरणागतवत्सल हैं । उनकी शरण में आकर जब वह पृथ्वीपर गिर पड़ा, तब उन्हें उसपर दया आ गयी; अतः वधके योग्य होनेपर भी उस कौएको उन्होंने मारा नहीं, उबारा ॥ ३३ ॥

परिद्यनं विवर्णे च पतमानं तमब्रवीत् ।

मोघमस्त्रं न शक्यं तु ब्राह्मं कर्तुं तदुच्यताम् ॥ ३४ ॥

' उसकी शक्ति क्षीण हो चुकी थी और वह उदास होकर सामने गिरा था । इस अवस्थामें उसको लक्ष्य करके भगवान् बोले- ' ब्रह्मास्त्रको तो व्यर्थ किया नहीं जा सकता । अतः बताओ, इसके द्वारा तुम्हारा कौन - सा अङ्ग भङ्ग किया जाय ' ॥ ३४ ॥

ततस्तस्याक्षि काकस्य हिनस्ति स्म स दक्षिणम् ।

दत्त्वा तु दक्षिणं नेत्रं प्राणेभ्यः परिरक्षितः ॥ ३५ ॥

" फिर उसकी सम्मति के अनुसार श्रीरामने उस अस्त्रसे उस कौएकी दाहिनी आँख नष्ट कर दी । इस प्रकार दायाँ नेत्र देकर वह अपने प्राण बचा सका ॥ ३५ ॥

स रामाय नमस्कृत्वा राशे दशरथाय च ।

विसृष्टस्तेन वीरेण प्रतिपेदे स्वमालयम् ॥ ३६ ॥

' तदनन्तर दशरथनन्दन राजा रामको नमस्कार करके उन वीरशिरोमणिसे विदा लेकर वह अपने निवासस्थानको चला गया ॥ ३६ ॥

मत्कृते काकमात्रेऽपि ब्रह्मास्त्रं समुदीरितम् ।

कस्माद् यो माहरत् त्वत्तः क्षमसे तं महीपते ॥ ३७ ॥

' कपिश्रेष्ठ! तुम मेरे स्वामीसे जाकर कहना - ' प्राण-नाथ! पृथ्वीपते! आपने मेरे लिये एक साधारण अपराध करनेवाले कौए पर भी ब्रह्मास्त्रका प्रयोग किया था; फिर जो आपके पाससे मुझे हर ले आया, उसको आप कैसे क्षमा कर रहे हैं? ॥ ३७ ॥

स कुरुष्व महोत्साहां कृपां मयि नरर्षभ ।

त्वया नाथवती नाथ हानाथा इव दृश्यते ॥ ३८ ॥

" नरश्रेष्ठ! मेरे ऊपर महान् उत्साहसे पूर्ण कृपा कीजिये ।

प्राणनाथ! जो सदा आपसे सनाथ है, वह सीता आज अनाथ-सी दिखायी देती है ॥ ३८ ॥

आनृशंस्यं परो धर्मस्त्वत्त एव मया श्रुतम् ।

जानामि त्वां महावीर्य महोत्साहं महाबलम् ॥ ३ ९ ॥

“ दया करना सबसे बड़ा धर्म है, यह मैंने आपसे ही

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९ ६६ श्रीमवाल्मीकीय रामायणे सुना है । मैं आपको अच्छी तरह जानती हूँ । आपका बल, पराक्रम और उत्साह महान् है ॥ ३ ९ ॥

अपारवारमक्षोभ्यं गाम्भीर्यात् सागरोपमम् ।

भर्तारं ससमुद्राया धरण्या वासवोपमम् ॥ ४० ॥

" आपका कहीं आर - पार नहीं है - आप असीम हैं । आपको कोई क्षुब्ध या पराजित नहीं कर सकता । आप गम्भीरता में समुद्र के समान हैं । समुद्रपर्यन्त सारी पृथ्वी के

स्वामी हैं तथा इन्द्रके समान तेजस्वी हैं । मैं आपके प्रभाव-को जानती हूँ ॥ ४० ॥

एवमविदां श्रेष्ठो बलवान् सत्त्ववानपि ।

किमर्थमत्रं रक्षःसु न योजयसि राघव ॥ ४१ ॥

" रघुनन्दन! इस प्रकार अस्त्रवेत्ताओंमें श्रेष्ठ, बलवान् और शक्तिशाली होते हुए भी आप राक्षसोंपर अपने अस्त्रोंका प्रयोग क्यों नहीं करते हैं १ ' ॥ ४१ ॥

न नागा नापि गन्धर्वा न सुरा न मरुद्गणाः ।

रामस्य समरे वेगं शक्ताः प्रतिसमीहितुम् ॥ ४२ ॥

' पवनकुमार! नाग, गन्धर्व, देवता और मरुद्गण --कोई भी समराङ्गणमें श्रीरामचन्द्रजीका वेग नहीं सह सकते ॥ ४२ ॥

तस्य वीर्यवतः कच्चिद यद्यस्ति मयि सम्भ्रमः ।

किमर्थं न शरैस्तीक्ष्णैः क्षयं नयति राक्षसान् ॥ ४३ ॥

' उन परम पराक्रमी श्रीरामके हृदय में यदि मेरे लिये कुछ व्याकुलता है तो वे अपने तीखे सायकोंसे इन राक्षसोका संहार क्यों नहीं कर डालते ९ ॥ ४३ ॥

भ्रातुरादेशमादाय लक्ष्मणो वा परंतपः ।

कस्य हेतोर्न मां वीरः परित्राति महाबलः ॥ ४४ ॥

' अथवा शत्रुओंको संताप देनेवाले महाबली वीर लक्ष्मण ही अपने बड़े भाई की आज्ञा लेकर मेरा उद्धार क्यों नहीं करते हैं? ॥ ४४ ॥

यदि तौ पुरुषव्याघ्रौ वाविन्द्रसमतेजसा ।

सुराणामपि दुर्धर्षौ किमर्थ मामुपेक्षतः ॥ ४५ ॥

' वे दोनों पुरुषसिंह वायु तथा इन्द्रके समान तेजस्वी हैं । यदि वे देवताओंके लिये भी दुर्जय हैं तो किस लिये मेरी उपेक्षा करते हैं? ॥ ४५ ॥

ममैव दुष्कृतं किंचिन्महदस्ति न संशयः ।

समर्थावपि तौ यन्मां नावेक्षेते परंतपौ ॥ ४६ ॥

' निःसंदेह मेरा ही कोई महान् पाप उदित हुआ है, जिससे वे दोनों शत्रुसंतापी वीर मेरा उद्धार करनेमें समर्थ होते हुए भी मुझपर कृपादृष्टि नहीं कर रहे हैं ' ॥ ४६ ॥

वैदेह्या वचनं श्रुत्वा करुणं साश्रु भाषितम् ।

अथाब्रवीन्महातेजा हनूमान् हरियूथपः ॥ ४७ ॥

विदेहकुमारी सीताने आँसू बहाते हुए जब यह करुणा-युक्त बात कही, तब इसे सुनकर वानरयूथपति महातेजस्वी हनुमान् इस प्रकार बोले - ॥ ४७ ॥

स्वच्छकविमुखो रामो देवि सत्येन ते शपे ।

रामे दुःखाभिपन्ने तु लक्ष्मणः परितप्यते ॥ ४८ ॥

' देवि! मैं सत्यकी शपथ खाकर आपसे कहता हूँ कि श्रीरामचन्द्रजी आपके विरह - शोक से पीड़ित हो अन्य सब कार्योंसे विमुख हो गये हैं — केवल आपका ही चिन्तन करते रहते हैं । श्रीरामके दुखी होनेसे लक्ष्मण भी सदा संतप्त रहते हैं ॥ ४८ ॥

कथंचिद् भवती दृष्टा न कालः परिशोचितुम् ।

इमं मुहूर्त दुःखानामन्तं द्रक्ष्यसि शोभने ॥ ४ ९ ॥

' किसी तरह आपका दर्शन हो गया । अब शोक करनेका अवसर नहीं है । शोभने! इसी घड़ीसे आप अपने दुःखों का अन्त होता देखेंगी ॥ ४ ९ ॥

तावुभौ पुरुषव्याघ्रौ राजपुत्रौ महाबलौ ।

त्वद्दर्शन हतोत्साही लोकान् भस्मीकरिष्यतः ॥ ५० ॥

' वे दोनों पुरुषसिंह राजकुमार बड़े बलवान् हैं तथा आपको देखने के लिये उनके मनमें विशेष उत्साह है । अतः वे समस्त राक्षस जगत् को भस्म कर डालेंगे ॥ ५० ॥

हत्वा च समरकूरं रावणं सहबान्धवम् ।

राघवस्त्वां विशालाक्षि स्वां पुरीं प्रति नेष्यति ॥ ५१ ॥

' विशाललोचने! रघुनाथजी समराङ्गणमें क्रूरता प्रकट करनेवाले रावण को उसके बन्धु बान्धवसहित मारकर आपको अपनी पुरी में ले जायँगे ॥ ५१ ॥

ब्रूहि यद राघवो वाच्यो लक्ष्मणश्च महाबलः ।

सुग्रीवो वापि तेजखी हरयो वा समागताः ॥ ५२ ॥

' अब भगवान् श्रीराम, महाबली लक्ष्मण, तेजस्वी सुग्रीव तथा वहाँ एकत्र हुए वानरोंके प्रति आपको जो कुछ कहना हो, वह कहिये ' ॥ ५२ ॥

इत्युक्तवति तस्मिंश्च सीता पुनरथाब्रवीत् ।

कौसल्या लोकभर्तारं सुषुवे यं मनस्विनी ॥ ५३ ॥

तं ममार्थे सुखं पृच्छ शिरसा चाभिवादय । हनुमानजी के ऐसा कहनेपर देवी सीताने फिर कहा--' कपिश्रेष्ठ! मनस्विनी कौसल्या देवीने जिन्हें जन्म दिया है तथा जो सम्पूर्ण जगत् के स्वामी हैं, उन श्रीरघुनाथजीको मेरी ओरसे मस्तक झुकाकर प्रणाम करना और उनका कुशल-समाचार पूछना ॥ ५३३ ॥

स्रजश्च सर्वरत्नानि प्रिया याश्च वराङ्गनाः ॥ ५४ ॥

ऐश्वर्ये च विशालायां पृथिव्यामपि दुर्लभम् ।

पितरं मातरं चैव सम्मान्याभिप्रसाद्य च ॥ ५५ ॥

अनुप्रव्रजितो रामं सुमित्रा येन सुप्रजाः ।

आनुकूल्येन धर्मात्मा त्यक्त्वा सुखमनुत्तमम् ॥ ५६ ॥

अनुगच्छति काकुत्स्थं भ्रातरं पालयन् वने ।

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सुन्दरकाण्डे अष्टात्रिंशः सर्गः ९ ६७ सिंहस्कन्धो महाबाहुर्मनस्वी प्रियदर्शनः ॥ ५७ ॥

पितृवद् वर्तते रामे मातृवन्मां समाचरत् ।

ह्रियमाणां तदा वीरो न तु मां वेद लक्ष्मणः ॥ ५८ ॥

वृद्धोपसेवी लक्ष्मीवाञ्शको न बहुभाषिता ।

राजपुत्रप्रियश्रेष्ठः सदृशः श्वशुरम्य मे ॥ ५ ९ ॥

मत्तः प्रियतरो नित्यं भ्राता रामस्य लक्ष्मणः ।

नियुक्तो धुरि यस्यां तु तामुद्वहति वीर्यवान् ॥ ६० ॥

यं दृष्ट्वा राघवो नैव वृत्तमार्यमनुस्मरत् ।

सममार्थाय कुशलं वक्तव्यो वचनान्मम ॥ ६१ ॥

मृदुर्नित्यं शुचिर्दक्षः प्रियो रामस्य लक्ष्मणः ।

यथा हि वानरश्रेष्ठ दुःखक्षयकरो भवेत् ॥ ६२ ॥

तत्पश्चात् विशाल भूमण्डलमें भी जिसका मिलना कठिन है ऐसे उत्तम ऐश्वर्यका, भाँति - भाँति के हारों, सब प्रकार के रत्नों तथा मनोहर सुन्दरी स्त्रियोंका भी परित्याग कर पिता माताको सम्मानित एवं राजी करके जो श्रीरामचन्द्रजीके साथ वनमें चले आये, जिनके कारण सुमित्रा देवी उत्तम संतानवाली कही जाती हैं, जिनका चित्त सदा धर्मेंमें लगा रहता है, जो सर्वोत्तम सुखको त्यागकर वनमें बड़े भाई श्रीरामकी रक्षा करते हुए सदा उनके अनुकूल चलते हैं, जिनके कंधे सिंहके समान और भुजाएँ बड़ी - बड़ी हैं, जो देखने में प्रिय लगते और मनको वशमें रखते हैं, जिनका श्रीरामके प्रति पिताके समान और मेरे प्रति माता के समान भाव तथा बर्ताव रहता है, जिन वीर लक्ष्मणको उस समय मेरे हरे जाने की बात नहीं मालूम हो सकी थी, जो बड़े - बूढ़ों की सेवामें संलग्न रहनेवाले, शोभाशाली, शक्तिमान् तथा कम बोलनेवाले हैं, राजकुमार श्रीराम के प्रिय व्यक्तियों में जिनका सबसे ऊँचा स्थान है, जो मेरे श्वशुरके सदृश पराक्रमी हैं तथा श्रीरघुनाथ-जीका जिन छोटे भाई लक्ष्मण के प्रति सदा मुझसे भी अधिक प्रेम रहता है, जो पराक्रमी वीर अपने ऊपर डाले हुए कार्यभारको बड़ी योग्यताके साथ वहन करते हैं तथा जिन्हें देखकर श्रीरघुनाथजी अपने मरे हुए पिताको भी भूल गये हैं ( अर्थात् जो पिताके समान श्रीरामके पालनमें दत्तचित्त रहते हैं ) । उन लक्ष्मणसे भी तुम मेरी ओरसे कुशल पूछना और वानरश्रेष्ठ! मेरे कथनानुसार उनसे ऐसी बातें कहना, जिन्हें सुनकर नित्य कोमल, पवित्र, दक्ष तथा श्रीराम के प्रिय बन्धु लक्ष्मण मेरा दुःख दूर करने को तैयार हो जायँ ॥

मस्मिन् कार्यनिर्वाहे प्रमाणं हरियूथप ।

राघवस्त्वत्समारम्भान्मयि यत्नपरो भवेत् ॥ ६३ ॥

' वानरयूथपते! अधिक क्या कहूँ? जिस तरह यह कार्य सिद्ध हो सके, वही उपाय तुम्हें करना चाहिये । इस विषय में तुम्हीं प्रमाण हो इसका सारा भार तुम्हारे मेरे उद्धार के लिये प्रयत्नशील हो सकते हैं ॥ ६३ ॥

इदं ब्रूयाश्च मे नाथं शूरं रामं पुनः पुनः ।

जीवितं धारयिष्यामि मासं दशरथात्मज ॥ ६४ ॥

ऊर्ध्व मासान्न जीवेयं सत्येनाहं ब्रवीमि ते । ' तुम मेरे स्वामी शूरवीर भगवान् श्रीरामसे बारंबार कहना --- ' दशरथनन्दन! मेरे जीवनकी अवधिके लिये जो मास नियत हैं, उनमें से जितना शेष है, उतने ही समयतक मैं जीवन धारण करूँगी । उन अवशिष्ट दो महीनोंके बाद जीवित नहीं रह सकती । यह मैं आपसे सत्यकी शपथ खाकर कह रही हूँ || ६४३ ॥

रावणेनोपरुद्धां मां निकृत्या पापकर्मणा ।

श्रातुमर्हसि वीर त्वं पातालादिव कौशिकीम् ॥ ६५ ॥

' वीर । पापाचारी रावणने मुझे कैद कर रक्खा है । अतः राक्षसियोंद्वारा शठतापूर्वक मुझे बड़ी पीड़ा दी जाती है । जैसे भगवान् विष्णुने इन्द्रकी लक्ष्मीका पातालसे उद्धार किया था, उसी प्रकार आप यहाँ से मेरा उद्धार करें ' ॥६५ ॥

ततो वागतं मुक्त्वा दिव्यं चूडामणि शुभम् ।

प्रदेयो राघवायेति सीता हनुमते ददी ॥ ६६ ॥

ऐसा कहकर सीताने कपड़े में बँधी हुई सुन्दर दिव्य चूड़ामणिको खोलकर निकाला और ' इसे श्रीरामचन्द्रजीको दे देना ' ऐसा कहकर हनुमान् जीके हाथपर रख दिया ॥

प्रतिगृह्य ततो वीरो मणिरत्नमनुत्तमम् ।

अङ्गुल्या योजयामास नास्य प्राभवद् भुजः ॥ ६७ ॥

उस परम उत्तम मणिरत्नको लेकर वीर हनुमानजीने उसे अपनी अङ्गुली में डाल लिया । उनकी बाँह अत्यन्त सूक्ष्म होनेपर भी उसके छेदमें न आ सकी ( इससे जान पड़ता है कि हनुमानजीने अपना विशाल रूप दिखाने के बाद फिर सूक्ष्म रूप धारण कर लिया था ) ॥ ६७ ॥

मणिरत्नं कपिवरः प्रतिगृह्याभिवाद्य च ।

सीतां प्रदक्षिणं कृत्वा प्रणतः पार्श्वतः स्थितः ॥ ६८ ॥

वह मणिरत्न लेकर कपिवर हनुमान्ने सीताको प्रणाम किया और उनकी प्रदक्षिणा करके वे विनीतभाव से उनके पास खड़े हो गये ॥ ६८ ॥

हर्षेण महता युक्तः सीतादर्शनजेन सः ।

हृदयेन गतो रामं लक्ष्मणं च सलक्षणम् ॥ ६ ९ ॥

सीताजीका दर्शन होने से उन्हें महान् हर्ष प्राप्त हुआ था । वे मन - ही - मन भगवान् श्रीराम और शुभ लक्षण सम्पन्न

लक्ष्मणके पास पहुँच गये थे । उन दोनोंका चिन्तन करने लगे थे ॥

मणिवरमुपगृह्य तं महा जनकनृपात्मजया धृतं प्रभावात् । गिरिवरपवनावधूतमुक्तः सुखितमनाः प्रतिसंक्रमं प्रपेदे ॥ ७० ॥

ही ऊपर है । तुम्हारे प्रोत्साहन देनेसे ही श्रीरघुनाथजी राजा जनककी पुत्री सीताने अपने विशेष प्रभावसे जिसे

पृष्ठ 145

वाल्मीकि रामायण — खण्ड २, पृष्ठ 145 का मूल पृष्ठ
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९ ६८ श्रीमवाल्मीकीय रामायणे छिपाकर धारण कर रक्खा था, उस बहुमूल्य मणि रत्न को प्रबल वायुके वेगसे कम्पित होकर पुनः उसके प्रभाव से मुक्त लेकर हनुमानजी मन - ही - मन उस पुरुषके समान सुखी एवं हो गया हो । तदनन्तर उन्होंने वहाँसे लौट जानेकी प्रसन्न हुए, जो किसी श्रेष्ठ पर्वत के ऊपरी भागसे उठी हुई तैयारी की ॥ ७० ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये सुन्दरकाण्डेऽष्टात्रिंशः सर्गः ॥ ३८ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्धरामायण आदिकाव्यके सुन्दरकाण्डमें अड़तीसवाँ सगँ पूरा हुआ ॥ ३८ ॥

एकोनचत्वारिंशः सर्गः चूड़ामणि लेकर जाते हुए हनुमानजी से सीताका श्रीराम आदिको उत्साहित करने के लिये कहना तथा समुद्र - तरण के विषयमें शङ्कित हुई सीताको वानरोंका पराक्रम बताकर हनुमान्जीका आश्वासन देना

मणि दत्त्वा ततः सीता हनूमन्तमथाब्रवीत् ।

अभिज्ञानमभिज्ञातमेतद् रामस्य तत्त्वतः ॥ १ ॥

मणि देनेके पश्चात् सीता हनुमान् जीसे बोलीं- ' मेरे इस चिह्नको भगवान् श्रीरामचन्द्रजी भलीभाँति पहचानते हैं ।

मणि दृष्ट्वा तु रामो वै त्रयाणां संस्मरिष्यति ।

वीरो जनन्या मम च राज्ञो दशरथस्य च ॥ २ ॥

' इस मणिको देखकर वीर श्रीराम निश्चय ही तीन व्यक्तियोंका - मेरी माताका, मेरा तथा महाराज दशरथका एक साथ ही स्मरण करेंगे ॥ २ ॥

स भूयस्त्वं समुत्साहचोदितो हरिसत्तम ।

अस्मिन् कार्यसमुत्साहे प्रचिन्तय यदुत्तरम् ॥ ३ ॥

' कपिश्रेष्ठ! तुम पुनः विशेष उत्साहसे प्रेरित हो इस कार्य की सिद्धि के लिये जो भावी कर्तव्य हो, उसे सोचो ॥ ३ ॥

त्वमस्मिन् कार्यनियोंगे प्रमाणं हरिसत्तम ।

तस्य चिन्तय यो यत्नो दुःखक्षयकरो भवेत् ॥ ४ ॥

' वानरशिरोमणे! इस कार्यको निभानेमें तुम्हीं प्रमाण हो — तुमपर ही सारा भार है । तुम इसके लिये कोई ऐसा उपाय सोचो, जो मेरे दुःखका निवारण करनेवाला हो ॥

हनूमन् यत्नमास्थाय दुःखक्षयकरो भव ।

स तथेति प्रतिज्ञाय मारुतिर्भीमविक्रमः ॥ ५ ॥

शिरसा ss वन्द्य वैदेहीं गमनायोपचक्रमे । " हनूमन्! तुम विशेष प्रयत्न करके मेरा दुःख दूर करनेमें सहायक बनो । ' तब ' बहुत अच्छा ' कहकर सीताजी -की आज्ञाके अनुसार कार्यं करने की प्रतिज्ञा करके वे भयंकर पराक्रमी पवनकुमार विदेहनन्दिनी के चरणोंमें मस्तक झुका-कर वहाँसे जानेको तैयार हुए ॥ ५३ ॥

ज्ञात्वा सम्प्रस्थितं देवी वानरं पवनात्मजम् ॥ ६ ॥

बाष्पगद्गदया वाचा मैथिली वाक्यमब्रवीत् । पवनपुत्र वानरवीर हनुमानको वहाँसे लौटनेके लिये उद्यत जान मिथिलेशकुमारीका गला भर आया और वे अश्रु-गद्गद वाणीमें बोलीं – ॥ ६३ ॥

हनूमन् कुशलं ब्रूयाः सहितौ रामलक्ष्मणौ ॥ ७ ॥

सुग्रीवं च सहामात्यं सर्वान् वृद्धांश्च वानरान् ।

ब्रूयास्त्वं वानरश्रेष्ठ कुशलं धर्मसंहितम् ॥ ८ ॥

' हनूमन्! तुम श्रीराम और लक्ष्मण दोनों को एक साथ ही मेरा कुशल- समाचार बताना और उनका कुशल - मङ्गल पूछना । वानरश्रेष्ठ! फिर मन्त्रियोंसहित सुग्रीव तथा अन्य सब बड़े - बूढ़े वानरोंसे धर्मयुक्त कुशल- समाचार कहना और पूछना ॥ ७-८ ॥

यथा च स महाबाहुर्मा तारयति राघवः ।

अस्माद् दुःखाम्बुसंरोधात् त्वं समाधातुमर्हसि ॥ ९ ॥

' महाबाहु श्रीरघुनाथजी जिस प्रकार इस दुःखके समुद्रसे मेरा उद्धार करें, वैसा ही यत्न तुम्हें करना चाहिये ॥

जीवन्तीं मां यथा रामः सम्भावयति कीर्तिमान् ।

तत् त्वया हनुमन् वाच्यं वाचा धर्ममवाप्नुहि ॥ १० ॥

' हनुमन्! यशस्वी रघुनाथजी जिस प्रकार मेरे जीते - जी यहाँ आकर मुझसे मिलें — मुझे सँभालें वैसी ही बातें तुम उनसे कहो और ऐसा करके वाणीके द्वारा धर्माचरणका फल प्राप्त करो ॥ १० ॥

नित्यमुत्साहयुक्तस्य वाचः श्रुत्वा मयेरिताः ।

वर्धिष्यते दाशरथेः पौरुषं मदवाप्तये ॥ ११ ॥

' यो तो दशरथनन्दन भगवान् श्रीराम सदा ही उत्साह-से भरे रहते हैं, तथापि मेरी कही हुई बातें सुनकर मेरी प्राप्तिके लिये उनका पुरुषार्थ और भी बढ़ेगा ॥ ११ ॥

मत्संदेशयुता वाचस्त्वत्तः श्रुत्वैव राघवः ।

पराक्रमे मर्ति वीरो विधिवत् संविधास्यति ॥ १२ ॥

' तुम्हारे मुखसे मेरे संदेशसे युक्त बातें सुनकर ही वीर रघुनाथजी पराक्रम करने में विधिवत् अपना मन लगायेंगे ' ।

सीतायास्तद्वचः श्रुत्वा हनूमान् मारुतात्मजः ।

शिरस्यञ्जलिमाधाय वाक्यमुत्तरमब्रवीत् ॥ १३ ॥

सीताकी यह बात सुनकर पवनकुमार हनुमान्ने माथेपर अञ्जलि बाँधकर विनयपूर्वक उनकी बातका उत्तर दिया- । १३ ।

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सुन्दरकाण्डे एकोनचत्वारिंशः सर्गः ९ ६ ९

क्षिप्रमेध्यति काकुत्स्थो हर्य क्षप्रवरैर्वृतः ।

यस्ते युधि विजित्याशोकं व्यपनयिष्यति ॥ १४ ॥

' देवि! जो युद्ध में सारे शत्रुओंको जीतकर आपके शोक-का निवारण करेंगे, वे ककुत्स्थ कुलभूषण भगवान् श्रीराम श्रेष्ठ वानरों और भालुओंके साथ शीघ्र ही यहाँ पधारेंगे । १४ ।

नहि पश्यामि मर्त्येषु नासुरेषु सुरेषु वा ।

यस्तस्य वमतो वाणान् स्थातुमुत्सहतेऽग्रतः ॥ १५ ॥

“ मैं मनुष्यों, असुरों अथवा देवताओंमें भी किसीको ऐसा नहीं देखता, जो बालों की वर्षा करते हुए भगवान् श्रीराम के सामने ठहर सके ॥ १५ ॥

अध्यर्कमपि पर्जन्यमपि वैवस्वतं यमम् ।

स हि सोढुं रणे शक्तस्तव हेतोविंशेषतः ॥ १६ ॥

' भगवान् श्रीराम विशेषतः आपके लिये तो युद्धमें सूर्य, इन्द्र और सूर्यपुत्र यमका भी सामना कर सकते हैं ॥ १६ ॥

स हि सागरपर्यन्तां महीं साधितुमर्हति ।

त्वन्निमित्तो हि रामस्य जयो जनकनन्दिनि ॥ १७ ॥

' वे समुद्रपर्यन्त सारी पृथ्वी को भी जीत लेने योग्य हैं । जनकनन्दिनि! आपके लिये युद्ध करते समय श्रीरामचन्द्रजी-को निश्चय ही विजय प्राप्त होगी ' ॥ १७ ॥

तस्य तद्वचनं श्रुत्वा सम्यक् सत्यं सुभाषितम् ।

जानकी बहु मेने तं वचनं चेदमब्रवीत् ॥ १८ ॥

हनुमान जी का कथन युक्तियुक्त, सत्य और सुन्दर था । उसे सुनकर जनकनन्दिनीने उनका बड़ा आदर किया और वे उनसे फिर कुछ कहने को उद्यत हुई ॥ १८ ॥

ततस्तं प्रस्थितं सीता वीक्षमाणा पुनः पुनः ।

भर्तृस्नेहान्वितं वाक्यं सौहार्दादनुमानयत् ॥ १ ९ ॥

तदनन्तर वहाँ से प्रस्थित हुए हनुमान्जीकी ओर बार-बार देखती हुई सीताने सौहार्दवश स्वामी के प्रति स्नेहसे युक्त सम्मानपूर्ण बात कही - ॥ १ ९ ॥

यदि वा मन्यसे वीर वसैकाहमरिंदम ।

कस्मिंश्चित् संवृते देशे विश्रान्तः श्वो गमिष्यसि ॥ २० ॥

' शत्रुओंका दमन करनेवाले वीर । यदि तुम ठीक

समझो तो यहाँ एक दिन किसी गुप्त स्थानमें निवास करो ।

इस तरह एक दिन विश्राम करके कल चले जाना ॥ २० ॥

मम चैवाल्पभाग्यायाः सांनिध्यात् तव वानर ।

अस्य शोकस्य महतो मुहूर्त मोक्षणं भवेत् ॥ २१ ॥

' वानरवीर! तुम्हारे निकट रहनेसे मुझ मन्दभागिनीके महान् शोकका थोड़ी देर के लिये निवारण हो जायगा ॥ २१ ॥

ततो हि हरिशार्दूल पुनरागमनाय तु ।

प्राणानामपि संदेहो मम स्यान्नात्र संशयः ॥ २२ ॥

' कपिश्रेष्ठ! विश्रामके पश्चात् यहाँसे यात्रा करनेके अनन्तर यदि फिर तुमलोगों के आने में संदेह या विलम्ब हुआ तो मेरे प्राणोंपर भी संकट आ जायगा, इसमें संशय नहीं है ॥

वा ० रा ० ५. ७. १४-तवादर्शनजः शोको भूयो मां परितापयेत् ।

दुःखाद्दुःखपरामृष्टां दीपयन्निव वानर । २३ ॥

" वानरवीर! मैं दुःख - पर - दुःख उठा रही हूँ । तुम्हारे चले जानेपर तुम्हें न देख पानेका शोक मुझे पुनः दग्ध करता हुआ - सा संताप देता रहेगा ॥ २३ ॥

अयं च वीर संदेह स्तिष्ठतीव ममाग्रतः ।

सुमहांस्त्वत्सहायेषु हर्यु क्षेषु हरीश्वर ॥ २४ ॥

कथं नु खलु दुष्पारं तरिष्यन्ति महोदधिम् ।

तानि हर्यक्ष सैन्यानि तौ वा नरवरात्मजौ ॥ २५ ॥

' वीर वानरेश्वर! तुम्हारे साथी रोछों और वानरोंके विषय में मेरे सामने अब भी यह महान् संदेह तो विद्यमान ही है कि वे रीछ और ' वानरोंकी सेनाएँ तथा वे दोनों राजकुमार श्रीराम और लक्ष्मण इस दुष्पार महासागरको कैसे पार करेंगे ॥ २४-२५ ॥ त्रयाणामेव भूतानां सागरस्येह लङ्घने शक्तिः स्याद्वैनतेयस्य तव वा मारुतस्य वा ॥ २६ ॥

' इस संसार में समुद्रको लाँघने की शक्ति तो केवल तीन

प्राणियों में ही देखी गयी है । तुममें, गरुड़ में अथवा वायु-देवतामें ॥ २६ ॥

तदस्मिन् कार्यनिर्योगे वीरैवं दुरतिक्रमे ।

किं पश्यसे समाधानं त्वं हि कार्यविदां वरः ॥ २७ ॥

' वीर! इस प्रकार इस समुद्रलङ्घनरूपी कार्यको निभाना अत्यन्त कठिन हो गया है । ऐसी दशा में तुम्हें कार्यसिद्धिका कौन - सा उपाय दिखायी देता है? यह बताओ; क्योंकि कार्य-सिद्धिका उपाय जाननेवाले लोगों में तुम सबसे श्रेष्ठ हो ॥ २७ ॥

काममस्य त्वमेवैकः कार्यस्य परिसाधने ।

पर्याप्तः परवीरघ्न यशस्यस्ते फलोदयः ॥ २८ ॥

' शत्रुवीरों का संहार करने वाले पवनकुमार | इसमें संदेह नहीं कि तुम अकेले ही मेरे उद्धाररूपी कार्यको सिद्ध करने में पूर्णतः समर्थ हो; परंतु ऐसा करनेसे जो विजयरूप फल प्राप्त होगा, उसका यश केवल तुम्हींको मिलेगा, भगवान् श्रीरामको नहीं ॥ २८ ॥

बलैः समग्रैर्युधि मां रावणं जित्य संयुगे ।

विजयी खपुरं यायात् तत्तस्य सदृशं भवेत् ॥ २ ९ ॥

' यदि रघुनाथजी सारी सेनाके साथ रावणको युद्ध में पराजित करके विजयी हो मुझे साथ ले अपनी पुरीको पधारें तो वह उनके अनुरूप कार्य होगा ॥ २ ९ ॥

बलैस्तु संकुलां कृत्वा लङ्कां परबलार्दनः ।

मां नयेद यदि काकुत्स्थ स्तत् तस्य सदृशं भवेत् ॥ ३० ॥

' शत्रु सेनाका संहार करनेवाले श्रीराम यदि अपनी सेनाओंद्वारा लङ्काको पददलित करके मुझे अपने साथ ले चलें तो वही उनके योग्य होगा ॥ ३० ॥

तद्यथा तस्य विक्रान्तमनुरूपं महात्मनः ।

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९ ७० श्रीमद्वाल्मीकीय रामायणे भवेदाहवशूरस्य तथा त्वमुपपादय ॥ ३१ ॥

' अतः तुम ऐसा उपाय करो जिससे समरशूर महात्मा श्रीरामका उनके अनुरूप पराक्रम प्रकट हो ' ॥ ३१ ॥

तदर्थोपहितं वाक्यं प्रश्रितं हेतुसंहितम् ।

निशम्य हनुमात्रशेषं वाक्यमुत्तरमब्रवीत् ॥ ३२ ॥

देवी सीता की उपर्युक्त बात अर्थयुक्त, स्नेहयुक्त तथा युक्तियुक्त थी । उनकी उस अवशिष्ट बात को सुनकर हनुमान्-जीने इस प्रकार उत्तर दिया- ॥ ३२ ॥

देवि हयृक्ष सैन्यानामीश्वरः लवतां वरः ।

सुग्रीवः सत्य सम्पन्नस्तवार्थे कृतनिश्चयः ॥ ३३ ॥

" देवि! वानर और भालुओं की सेना के स्वामी कपिश्रेष्ठ सुग्रीव सत्यवादी हैं । वे आपके उद्धारके लिये दृढ़ निश्चय कर चुके हैं ॥ ३३ ॥

स वानरसहस्राणां कोटीभिरभिसंवृतः ।

क्षिप्रमेष्यति वैदेहि राक्षसानां निबर्हणः ॥ ३४ ॥

' विदेद्दनन्दिनि । उनमें राक्षसोंका संहार करनेकी शक्ति है । वे सहस्रों कोटि वानरोंकी सेना साथ लेकर शीघ्र ही लङ्कापर चढ़ाई करेंगे ॥ ३४ ॥

तस्य विक्रम सम्पन्नाः सत्त्ववन्तो महाबलाः ।

मनःसंकल्पसम्पाता निदेशे हरयः स्थिताः ॥ ३५ ॥

‘ उनके पास पराक्रमी, धैर्यशाली, महाबली और मानसिक संकल्प के समान बहुत दूरतक उछलकर जानेवाले बहुत - से वानर हैं, जो उनकी आज्ञाका पालन करनेके लिये सदा तैयार रहते हैं ॥ ३५ ॥

येषां नोपरि नास्तान्न तिर्यक् सज्जते गतिः ।

न च कर्मसु सीदन्ति महत्स्वमिततेजसः ॥ ३६ ॥

" जिनकी ऊपर - नीचे तथा इधर - उधर कहीं भी गति नहीं रुकती । वे बड़े - से - बड़े कार्योंके आ पड़नेपर भी कभी

हिम्मत नहीं हारते । उनमें महान् तेज है ॥ ३६ ॥

असकृत् तैर्महोत्साहैः ससागरधराधरा ।

प्रदक्षिणीकृता भूमिर्वायुमार्गानुसारिभिः ॥ ३७ ॥

‘ उन्होंने अत्यन्त उत्साइसे पूर्ण होकर वायुपथ ( आकाश ) का अनुसरण करते हुए समुद्र और पर्वतों सहित इस पृथ्वीकी अनेक बार परिक्रमा की है ॥ ३७ ॥

मद्विशिष्टश्च तुल्याश्च सन्ति तत्र वनौकसः ।

मत्तः प्रत्यवरः कश्चिन्नास्ति सुग्रीवसंनिधौ ॥ ३८ ॥

" सुग्रीवकी सेना में मेरे समान तथा मुझसे भी बढ़कर पराक्रमी वानर । उनके पास कोई भी ऐसा वानर नहीं है जो बल - पराक्रममें मुझसे कम हो ॥ ३८ ॥

अहं तावदिह प्राप्तः किं पुनस्ते महाबलाः ।

नहि प्रकृष्टाः प्रेष्यन्ते प्रेष्यन्ते हीतरे जनाः ॥ ३ ९ ॥

" जब मैं ही यहाँ आ गया, तब अन्य महाबली वीरोंके आने में क्या संदेह है? जो श्रेष्ठ पुरुष होते हैं, उन्हें संदेश-वाहक दूत बनाकर नहीं भेजा जाता । साधारण कोटिके लोग ही भेजे जाते हैं ॥ ३ ९ ॥

तदलं परितापेन देवि शोको व्यपैतु ते ।

एकोन्पातेन ते लङ्कामेष्यन्ति हरियूथपाः ॥ ४० ॥

' अतः देवि! आपको संताप करने की आवश्यकता नहीं है । आपका शोक दूर हो जाना चाहिये । वानरयूथपति एक ही छलाँगमें लङ्का पहुँच जायँगे ॥ ४० ॥

मम पृष्ठगतौ तौ च चन्द्रसूर्याविवोदितौ ।

त्वत्सकाशं महासङ्घौ नृसिहावागमिष्यतः ॥ ४१ ॥

' उदयकालके सूर्य और चन्द्रमाकी भाँति शोभा पानेवाले और महान् वानर - समुदाय के साथ रहनेवाले वे दोनों पुरुष-सिंह श्रीराम और लक्ष्मण मेरी पीठपर बैठकर आपके पास आ पहुँचेंगे ॥ ४१ ॥

तौ हि वीरौ नरवरौ सहितौ रामलक्ष्मणौ ।

आगम्य नगरीं लङ्कां सायकैर्विधमिष्यतः ॥ ४२ ॥

" वे दोनों नरश्रेष्ठ वीर श्रीराम और लक्ष्मण एक साथ आकर अपने सायकों से लङ्कापुरीका विध्वंस कर डालेंगे ॥४२ ॥

सगणं रावणं हत्वा राघवो रघुनन्दनः ।

त्वामादाय वरारोहे स्वपुरीं प्रति यास्यति ॥ ४३ ॥

' वरारोहे! रघुकुलको आनन्दित करनेवाले श्रीरघुनाथ-जी रावणको उसके सैनिकों सहित मारकर आपको साथ ले अपनी पुरीको लौटेंगे ॥ ४३ ॥

तदाश्वसिहि भद्रं वे भव त्वं कालकाङ्क्षिणी ।

नचिराद् द्रक्ष्य से रामं प्रज्वलन्तमिवानलम् ॥ ४४ ॥

' इसलिये आप धैर्य धारण करें । आपका कल्याण हो । आप समयकी प्रतीक्षा करें । प्रज्वलित अग्निके समान तेजस्वी श्रीरघुनाथजी आपको शीघ्र ही दर्शन देंगे ॥ ४४ ॥

निहते राक्षसेन्द्रे च सपुत्रामात्यबान्धवे ।

त्वं समेष्यसि रामेण शशाङ्केनेव रोहिणी ॥ ४५ ॥

' पुत्र, मन्त्री और बन्धुवान्धवसहित राक्षसराज रावण-के मारे जानेपर आप श्रीरामचन्द्रजीसे उसी प्रकार मिलेंगी, जैसे रोहिणी चन्द्रमा से मिलती है ॥ ४५ ॥

क्षिप्रं त्वं देवि शोकस्य पारं द्रक्ष्यसि मैथिलि ।

रावणं चैव रामेण द्रक्ष्यसे निहतं बलात् ॥ ४६ ॥

' देवि! मिथिलेशकुमारी! आप शीघ्र ही अपने शोक-का अन्त हुआ देखेंगी । आपको यह भी दृष्टिगोचर होगा कि श्रीरामचन्द्रजीने रावणको बलपूर्वक मार डाला है ' ॥ ४६ ॥

एवमाश्वास्य वैदेहीं हनूमान् मारुतात्मजः ।

गमनाय मतिं कृत्वा वैदेहीं पुनरब्रवीत् ॥ ४७ ॥

विदेइनन्दिनी सीताको इस प्रकार आश्वासन दे पवन-कुमार हनुमानजीने वहाँसे लौटने का निश्चय करके उनसे फिर कहा -- ॥ ४७ ॥

तमरिघ्नं कृतात्मानं क्षिप्रं द्रक्ष्यसि राघवम् ।

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सुन्दरकाण्डे चत्वारिंशः सर्गः ९ ७१ लक्ष्मणं च धनुष्पाणि लङ्काद्वारमुपागतम् ॥ ४८ ॥

' देवि! आप शीघ्र ही देखेंगी कि शुद्ध हृदयवाले शत्रु-नाशक श्रीरघुनाथजी तथा लक्ष्मण हाथमें धनुष लिये लङ्काके द्वारपर आ पहुँचे हैं ॥ ४८ ॥

नखदंष्ट्रायुधान् वीरान् सिंहशार्दूलविक्रमान् ।

वानरान् वारणेन्द्राभान् क्षिप्रं द्रक्ष्यसि संगतान् ॥ ४ ९ ॥

' नख और दाढ़ ही जिनके अस्त्र - शस्त्र हैं तथा जो सिंह और व्याघ्रके समान पराक्रमी एवं गजराजोंके समान विशाल-काय हैं, ऐसे वानरों को भी आप शीघ्र ही एकत्र हुआ देखेंगी ॥ ४ ९ ॥

शैलाम्बुदमिकाशानां लङ्कामलयसानुषु ।

नईतां कपिमुख्यानामायें यूथान्यनेकशः ॥ ५० ॥

' आयें! पर्वत और मेत्रके समान विशालकाय मुख्य-मुख्य वानरोंके बहुत - से झुंड लङ्कावर्ती मलयपर्वत के शिखरों पर गर्जते दिखायी देंगे ॥ ५० ॥

स तु मर्मणि घोरेण ताडितो मन्मथेषुणा ।

न शर्म लभते रामः सिंहार्दित इव द्विपः ॥ ५१ ॥

' श्रीराम चन्द्रजी के मर्मस्थलमें कामदेवके भयंकर बाजोंसे चोट पहुँची है । इसलिये वे सिंहसे पीड़ित हुए गजराजकी भाँति चैन नहीं पाते हैं ॥ ५१ ॥

रुद मा देवि शोकेन मा भूत् ते मनसो भयम् ।

शचीव भर्त्रा शक्रेण सङ्गमेष्यसि शोभने ॥ ५२ ॥

' देवि! आप शोकके कारण रोदन न करें । आपके मनका भय दूर हो जाय । शोभने! जैसे शची देवराज इन्द्र-से मिलती हैं, उसी प्रकार आप अपने पतिदेवसे मिलेंगी ॥ ५२ ॥

रामाद् विशिष्टः कोऽन्योऽस्ति कश्चित् सौमित्रिणा समः ।

अग्निमारुतकल्पौ तौ भ्रातरौ तव संश्रयौ ॥ ५३ ॥

' भला, श्रीरामचन्द्रजीसे बढ़कर दूसरा कौन है? तथा लक्ष्मणजी के समान भी कौन हो सकता है? अग्नि और वायुके तुल्य तेजस्वी वे दोनों भाई आपके आश्रय हैं ( आपको कोई चिन्ता नहीं करनी चाहिये ) ॥ ५३ ॥

नास्मिंश्विरं वत्स्यसि देवि देशे रक्षोगणैरभ्युषितेऽतिरौद्रे न ते चिरादागमनं प्रियस्य क्षमस्व मत्संगमकालमात्रम् ॥ ५४ ॥

' देवि! राक्षसों द्वारा सेवित इस अत्यन्त भयंकर देशमें आपको अधिक दिनोंतक नहीं रहना पड़ेगा । आपके प्रियतम-के आनेमें विलम्ब नहीं होगा । जबतक मेरी उनसे भेंट न हो, उतने समय तक के विलम्बको आप क्षमा करें ' ॥ ५४ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये सुन्दरकाण्डे एकोनचत्वारिंशः सर्गः ॥ ३ ९ ॥ इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आरामायण आदिकाव्यके सुन्दरकाण्डमें उन्तालीसवाँ सगँ पूरा हुआ ॥ ३ ९ ॥ चत्वारिंशः सर्गः सीताका श्रीरामसे कहने के लिये पुनः संदेश देना तथा हनुमान्जीका उन्हें आश्वासन दे उत्तर दिशाकी ओर जाना

श्रुत्वा तु वचनं तस्य वायुस्नोर्महात्मनः ।

उवाचात्महितं वाक्यं सीता सुरसुतोपमा ॥ १ ॥

वायुपुत्र महात्मा हनुमान्जीका वचन सुनकर देवकन्या के समान तेजस्विनी सीताने अपने हित के विचार से इस प्रकार कहा ॥ १ ॥

त्वां दृष्ट्रा प्रियवकारं सम्प्रहृष्यामि वानर ।

अर्धसंजातसस्येव वृष्टि प्राप्य वसुंधरा ॥ २ ॥

" वानरवीर! तुमने मुझे बड़ा ही प्रिय संवाद सुनाया है । तुम्हें देखकर हर्षके मारे मेरे शरीरमें रोमाञ्च हो आया है । ठीक उसी तरह, आधी जमी हुई खेतीवाली यथा तं पुरुषव्याघ्रं गात्रैः संस्पृशेयं सकामाहं तथा " मुझपर ऐसी दया करो, दुर्बल हुए अपने अङ्गद्वारा स्पर्श कर सकूँ ॥ ३ ॥

जैसे वर्षाका पानी पड़ने से भूमि हरी - भरी हो जाती है ॥

शोकाभिकर्शितैः ।

कुरु दयां मयि ॥ ३ ॥

जिससे मैं शोकके कारण नरश्रेष्ठ श्रीरामका प्रेमपूर्वक

अभिज्ञानं च रामस्य दद्या हरिगणोत्तम ।

क्षिप्तामिषीकां काकस्य कोपादेकाक्षिशातनीम् ॥ ४ ॥

' वानरश्रेष्ठ! श्रीरामने क्रोधवश जो कौएकी एक आँखको फोड़नेवाली सींकका बाण चलाया था, उस प्रसङ्गकी तुम पहचान के रूपमें उन्हें याद दिलाना ॥ ४ ॥

मनःशिलायास्तिलको गण्डपाइवे निवेशितः ।

स्वा प्रणष्टे तिलके तं किल स्मर्तुमर्हसि ॥ ५ ॥

' मेरी ओर से यह भी कहना कि प्राणनाथ! पहले की उस बात को भी याद कीजिये, जब कि मेरे कपोलमें लगे हुए तिलकके मिट जानेपर आपने अपने हाथसे मैन्सिलका तिलक लगाया था ॥ ५ ॥

स वीर्यवान् कथं सीतां हृतां समनुमन्यसे ।

वसन्तीं रक्षसां मध्ये महेन्द्रवरुणोपम ॥ ६ ॥

' महेन्द्र और वरुणके समान पराक्रमी प्रियतम! आप बलवान् होकर भी अपहृत होकर राक्षसोंके घर में निवास करनेवाली मुझ सीताका तिरस्कार कैसे सहन करते हैं? ॥६ ॥

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९ ७२ श्रीमद्वाल्मीकीय रामायणे एप चूडामणिर्दिव्यो मया सुपरिरक्षितः । एतं दृष्ट्वा प्रहृष्यामि व्यसने त्वामिवानघ तावुभौ पुरुषव्याघ्रौ राजपुत्रावनिन्दितौ । ' निष्पाप प्राणेश्वर । इस दिव्य चूड़ामणिको ॥ ७ ॥ स्वद्दर्शनकृतोत्साहो लङ्कां भस्मीकरिष्यतः ॥ १५ ॥

बड़े यज्ञसे सुरक्षित रक्खा था और संकट मैंने " वे दोनों भाई पुरुषसिंह राजकुमार श्रीराम और देखकर मानो मुझे आपका ही दर्शन के समय इसे लक्ष्मण सर्वत्र प्रशंसित वीर हैं । आपके दर्शन के लिये तरह मैं हर्ष का अनुभव करती थी ॥ ७ ॥ हो गया हो, इस उत्साहित होकर वे लङ्कापुरीको भस्म कर डालेंगे ॥ १५ ॥

एष निर्यातितः श्रीमान् मया ते वारिसम्भवः । हत्वा तु समरे रक्षो रावणं सहबान्धवैः । अतः परं न शक्ष्यामि जीवितुं शोकलालसा ॥ ८ ॥ त्वां विशालाक्षि खां पुरीं प्रति नेष्यतः ॥ १६ ॥

' समुद्र के जलसे उत्पन्न हुआ यह कान्तिमान् मणिरत्न ' विशाललोचने राक्षस रावणको समराङ्गणमें उसके आज आपको लौटा रही हूँ । अब शोकसे आतुर बन्धु बान्धवसहित मारकर वे दोनों रघुवंशी बन्धु आपको कारण मैं अधिक समय तक जीवित नहीं होने के अपनी पुरीमें ले जायँगे ॥ १६ ॥

असह्यानि रह सकूँगी ॥ ८ ॥ यत्तु रामो विजानीयादभिज्ञानमनिन्दिते

च दुःखानि वाचश्च हृदयच्छिदः ॥ राक्षसैः सह संवासं त्वत्कृते मर्षयाम्यहम् ॥ ९ ॥ प्रीतिसंजननं भूयस्तस्य त्वं दातुमर्हसि ॥ १७ ॥

“ दुःसह दुःख, हृदयको छेदनेवाली ' सती - साध्वी देवि! जिसे श्रीरामचन्द्रजी जान सकें राक्षसियों के साथ निवास - यह सब कुछ बातें और और जो उनके हृदयमें प्रेम एवं प्रसन्नताका संचार करने-ही सह रही हूँ ॥ ९ ॥ मैं आपके लिये वाली हो, ऐसी कोई और भी पहचान आपके पास हो तो

धारयिष्यामि मासं तु जीवितं वह उनके लिये आप मुझे दें ' ॥ १७ ॥

मादूर्ध्वं न जीविष्ये शत्रुसूदन । साब्रवीद् दत्तमेवाहो मयाभिज्ञानमुत्तमम् त्वया हीना नृपात्मज ॥ १० ॥ एतदेव हि रामस्य ।

" राजकुमार! शत्रुसूदन! मैं आपकी प्रतीक्षा में किसी श्रद्धेयं दृष्ट्वा यत्नेन भूषणम् ॥ १८ ॥

तरह एक मासतक जीवन धारण करूँगी । इसके बाद हनुमन् वाक्यं तव वीर भविष्यति ।

आपके बिना मैं जीवित नहीं रह सकूँगी ॥ १० ॥

घोरो राक्षसराजोऽयं दृष्टिश्च न सुखा मयि ।

त्वां च श्रुत्वा विषज्जन्तं न जीवेयमपि क्षणम् ॥ ११ ॥

' यह राक्षसराज रावण बड़ा क्रूर है । मेरे प्रति इसकी दृष्टि भी अच्छी नहीं है । अब यदि आपको भी विलम्ब करते सुन लूँगी तो मैं क्षणभर भी जीवित नहीं रह सकती ' ॥ ११ ॥

वैदेह्या वचनं श्रुत्वा करुणं साधुभाषितम् ।

अथाब्रवीन्महातेजा हनूमान् मारुतात्मजः ॥ १२ ॥

सीताजीके यह आँसू बहाते कहे हुए करुणाजनक वचन सुनकर महातेजस्वी पवनकुमार हनुमानजी बोले- ॥

स्वच्छोकविमुखो रामो देवि सत्येन ते शपे ।

रामे शोकाभिभूते तु लक्ष्मणः परितप्यते ॥ १३ ॥

" देवि! मैं सत्यकी शपथ खाकर कहता हूँ कि श्रीरघुनाथजी आपके शोकसे ही सब कामोंसे विमुख हो रहे हैं । श्रीरामके शोकातुर होनेसे लक्ष्मण भी बहुत दुखी रहते हैं ॥ १३ ॥

दृष्टा कथंचिद् भवती न कालः परिदेवितुम् ।

इमं मुहूर्त दुःखानामन्तं प्रक्ष्यसि भामिनि ॥ १४ ॥

' अब किसी तरह आपका दर्शन हो गया, इसलिये रोने - धोने या शोक करनेका अवसर नहीं रहा । भामिनि! आप इसी मुहूर्तमें तब सीताजीने कहा - ' कपिश्रेष्ठ! मैंने तुम्हें उत्तम से. उत्तम पहचान तो दे ही दी । वीर हनुमन् । इसी • आभूषणको यत्नपूर्वक देख लेनेपर श्रीरामके लिये तुम्हारी सारी बातें विश्वसनीय हो जायँगी ' ॥ १८३ ॥

स तं मणिवरं गृह्य श्रीमान् लवगसत्तमः प्रणम्य शिरसा ॥ १ ९ ॥ देवीं गमनायोपचक्रमे । उस श्रेष्ठ मणिको लेकर वानर शिरोमणि श्रीमान् हनुमान् देवी सीताको सिर झुका प्रणाम करने के पश्चात् वहाँसे जानेको उद्यत हुए । १ ९ ३ ॥ तमुत्पातकृतोत्साद्दमवेक्ष्य हरियूथपम् ॥ २० ॥

वर्धमानं महावेगमुवाच जनकात्मजा

अश्रुपूर्णमुखी दीना बाष्पगद्गदया ।

गिरा ॥ २१ ॥

वानरयूथपति महावेगशाली हनुमान्को वहाँसे छलाँग मारने के लिये उत्साहित हो बढ़ते देख जनकनन्दिनी सीता के

मुखपर आँसुओं की धारा बहने लगी । वे दुखी हो अश्रु-गद्गद वाणीमें बोलीं ॥ २०-२१ ॥

हनूमन् सिंहसंकाशौ भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ ।

सुग्रीवं च सहामात्यं सर्वान् ब्रूया अनामयम् ॥ २२ ॥

' हनूमन्! सिंहके समान पराक्रमी दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मणसे तथा मन्त्रियों सहित सुग्रीव एवं अन्य सब वानरोंसे मेरा कुशल- मङ्गल कहना ॥ २२ ॥

यथा च स महाबाहुर्मी तारयति राघवः । अपने सारे दुःखोंका अन्त हुआ अस्माद् दुःखाम्बुसंरोधात् देखेंगी ॥ १४ ॥ त्वं समाधातुमर्हसि ॥ २३ ॥

' महाबाहु श्रीरघुनाथजीको तुम्हें इस प्रकार रुमझाना

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सुन्दरकाण्डे एकचत्वारिंशः सर्गः ९ ७३ चाहिये, जिससे वे दुःख के इस महासागर से मेरा उद्धार करें ॥ स राजपुत्र्या प्रतिवेदितार्थः इदं च तीव्रं मम शोकवेगं कपिः कृतार्थः परिहृष्टचेताः । रक्षोभिरेभिः परिभर्त्सनं च । तदल्पशेषं प्रसमीक्ष्य कार्य रामस्य गतः समीपं दिशं ख़ुदीचीं मनसा जगाम ॥ २५ ॥

व्यास्तु शिवश्च तेऽध्वास्तु हरिप्रवीर ॥ २४ ॥ राजकुमारी सीताके उक्त अभिप्रायको जानकर कपिवर

" वानरोंके प्रमुख वीर! मेरा यह दुःसह शोक - वेग हनुमान्ने अपनेको कृतार्थ समझा और प्रसन्नचित्त होकर और इन राक्षसोंकी यह डॉट - डपट भी तुम श्रीराम के समीप थोड़े - से शेष रहे कार्यका विचार करते हुए वहाँसे उत्तर जाकर कहना । जाओ, तुम्हारा मार्ग मङ्गलमय हो ' || २४ || दिशा की ओर प्रस्थान किया ॥ २५ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये सुन्दरकाण्डे चत्वारिंशः सर्गः ॥ ४० ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आयँरामायण आदिकाव्यके सुन्दरकाण्डमें चालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ४० ॥

एकचत्वारिंशः सर्गः हनुमानजी के द्वारा प्रमदावन (

स च वाग्भिः प्रशस्ताभिर्गमिष्यन् पूजितस्तया ।

तस्माद् देशादपाक्रम्य चिन्तयामास वानरः ॥ १ ॥

सीताजी से उत्तम वचनोंद्वारा समादर पाकर वानरवीर इनुमानजी जब वहाँसे जाने लगे, तब उस स्थान से दूसरी जगह हटकर वे इस प्रकार विचार करने लगे ॥ १ ॥

अल्पशेषमिदं कार्य दृष्टेयमसितेक्षणा ।

श्रीनुपायानतिक्रम्य चतुर्थ छह दृश्यते ॥ २ ॥

' मैंने कजरारे नेत्रोंवाली सीताजीका दर्शन तो कर लिया, अब मेरे इस कार्यका थोड़ा सा अंश ( शत्रुकी शक्तिका पता लगाना ) शेष रह गया है । इसके लिये चार उपाय हैं साम, दान, भेद और दण्ड । यहाँ साम आदि तीन उपायोंको लाँघकर केवल चौथे उपाय ( दण्ड ) का प्रयोग ही उपयोगी दिखायी देता है ॥ २ ॥

न साम रक्षःसु गुणाय कल्पते न दानमर्थोपचितेषु युज्यते । न भेदसाध्या बलदर्पिता जनाः पराक्रमस्त्वेष ममेह रोचते ॥ ३ ॥

' राक्षसों के प्रति सामनीतिका प्रयोग करने से कोई लाभ नहीं होता । इनके पास धन भी बहुत है, अतः इन्हें दान देनेका भी कोई उपयोग नहीं है । इसके सिवा ये बलके अभिमान में चूर रहते हैं. अतः भेदनीतिके द्वारा भी इन्हें वशमें नहीं किया जा सकता । ऐसी दशामें मुझे यहाँ पराक्रम दिखाना ही उचित जान पड़ता है ॥ ३ ॥

न चात्य कार्यस्य पराक्रमाहते विनिश्वयः कश्चिदिहोपपद्यते । हतप्रवीराश्च रणे तु राक्षसाः कथंचिदीयुर्यदिहाद्य मार्दवम् ॥ ४ ॥

" इस कार्यकी सिद्धि के लिये पराक्रमके सिवा यहाँ और किसी उपायका अवलम्बन ठीक नहीं जँचता । यदि अशोकवाटिका ) का विध्वंस युद्ध में राक्षसों के मुख्य - मुख्य वीर मारे जायँ तो ये लोग किसी तरह कुछ नरम पड़ सकते हैं ॥ ४ ॥

कार्ये कर्मणि निर्वृत्ते यो बहुन्यपि साधयेत् ।

पूर्वकार्याविरोधेन स कार्य कर्तुमर्हति ॥ ५ ॥

' जो पुरुष प्रधान कार्यके सम्पन्न हो जानेपर दूसरे-दूसरे बहुत से कार्यों को भी सिद्ध कर लेता है और पहले के कार्यों में बाधा नहीं आने देता, वही कार्यको सुचारु रूपमें कर सकता है ॥ ५ ॥

न ह्येकः साधको हेतुः स्वल्पस्यापीह कर्मणः ।

यो हार्थे बहुधा वेद स समर्थोऽर्थसाधने ॥ ६ ॥

' छोटे - से - छोटे कर्मकी भी सिद्धिके लिये कोई एक साधक हेतु नहीं हुआ करता । जो पुरुष किसी कार्य या प्रयोजनको अनेक प्रकारसे सिद्ध करनेकी कला जानता हो, वही कार्य साधनमें समर्थ हो सकता है ॥ ६ ॥

इहैव तावत्कृतनिश्चयो हं व्रजेयमद्य प्लवगेश्वरालयम् । परात्मसम्मर्दविशेषतत्त्ववित् ततः कृतं स्यान्मम भर्तृशासनम् ॥ ७ ॥

' यदि इसी यात्रामें मैं इस बातको ठीक - ठीक समझ लूँ कि अपने और शत्रुपक्षमें युद्ध होनेपर कौन प्रबल होगा और कौन निर्बल, तत्पश्चात् भविष्य के कार्यका भी निश्चय करके आज सुग्रीवके पास चलूँ तो मेरे द्वारा स्वामीकी आशाका पूर्णरूपसे पालन हुआ समझा जायगा ॥ ७ ॥

कथं नु खल्वद्य भवेत् सुखागतं प्रसह्य युद्धं मम राक्षसैः सह । तथैव खल्वात्मबलं च सारवत् समानयेन्मां च रणे दशाननः ॥ ८ ॥

" परंतु आज मेरा यहाँतक आना सुखद अथवा शुभ परिणामका जनक कैसे होगा? राक्षसोंके साथ हठात्