Ramayana 2 — पृष्ठ 151–160

वाल्मीकि रामायण — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 151–160

पृष्ठ 151

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९ ७४ श्रीमदवाल्मीकीय रामायणे युद्ध करनेका अवसर मुझे कैसे प्राप्त होगा? तथा दशमुख रावण समरमें अपनी सेनाको और मुझे भी तुलनात्मक दृष्टिसे देखकर कैसे यह समझ सकेगा कि कौन सबल है १ ॥ ततः समासाद्य रणे दशाननं समत्रिवर्ग सबलं सयायिनम् । हृदि स्थितं तस्य मतं बलं च सुखेन मत्वाहमितः पुनर्वजे ॥ ९ ॥

' उस युद्ध में मन्त्री, सेना और सहायकों सहित रावणका सामना करके मैं उसके हार्दिक अभिप्राय तथा सैनिक-शक्तिका अनायास ही पता लगा लूँगा । उसके बाद यहाँ से जाऊँगा ॥ ९ ॥

इदमस्य नृशंसस्य नन्दनोपममुत्तमम् ।

वनं नेत्रमनः कान्तं नानाद्रुमलतायुतम् ॥ १० ॥

" इस निर्दयी रावणका यह सुन्दर उपवन नेत्रोंको आनन्द देनेवाला और मनोरम है । नाना प्रकारके वृक्षों और लताओंसे व्याप्त होनेके कारण यह नन्दनवन के समान उत्तम प्रतीत होता है ॥ १० ॥

इदं विध्वंसयिष्यामि शुष्कं वनमिवानलः ।

अस्मिन् भग्ने ततः कोपं करिष्यति स रावणः ॥ ११ ॥

' जैसे आग सूखे वनको जला डालती है, उसी प्रकार मैं भी आज इस उपवनका विध्वंस कर डालूँगा । इसके भग्न हो जानेपर रावण अवश्य मुझपर क्रोध करेगा ॥ ११ ॥

ततो महत्साश्वमहारथद्विपं बलं समानेष्यति राक्षसाधिपः । त्रिशूलकालायसपट्टिशायुधं ततो महद्युद्धमिदं भविष्यति ॥ १२ ॥

' तत्पश्चात् वह राक्षसराज हाथी, घोड़े तथा विशाल रथोंसे युक्त और त्रिशूल, कालायस एवं पट्टिश आदि

अस्त्र - शस्त्रोंसे सुसजित बहुत बड़ी सेना लेकर आयेगा ।

फिर तो यहाँ महान् संग्राम छिड़ जायगा ॥ १२ ॥

अहं च तैः संयति चण्डविक्रमैः समेत्य रक्षोभिरभङ्गविक्रमः । निहत्य तद् रावणचोदितं बलं सुखं गमिष्यामि हरीश्वरालयम् ॥ १३ ॥

' उस युद्धमें मेरी गति रुक नहीं सकती । मेरा पराक्रम कुण्ठित नहीं हो सकता । मैं प्रचण्ड पराक्रम दिखानेवाले उन राक्षसों से भिड़ जाऊँगा और रावणकी भेजी हुई उस सारी सेनाको मौत के घाट उतारकर सुखपूर्वक सुग्रीव के निवासस्थान किष्किन्धापुरीको लौट जाऊँगा ' ॥ १३ ॥

ततो मारुतवत् क्रुद्धो मारुतिर्भीमविक्रमः ।

ऊरुवेगेन महता द्रुमान् क्षेप्तुमथारभत् ॥ १४ ॥

ऐसा सोचकर भयानक पुरुषार्थ प्रकट करने वाले पवनकुमार हनुमानजी कोधसे भर गये और वायुके समान बड़े भारी वेगसे वृक्षोंको उखाड़ उखाड़कर फेंकने लगे ॥१४ ॥

ततस्तद्धनुमान वीरो बभञ्ज प्रमदावनम् ।

मत्तद्विजसमाघुष्टं नानाद्रुमलतायुतम् ॥ १५ ॥

तदनन्तर वीर हनुमान्ने मतवाले पक्षियोंके कलरवसे मुखरित और नाना प्रकार के वृक्षों एवं लताओंसे भरे - पूरे उस प्रमदावन ( अंतःपुर के उपवन ) को उजाड़ डाला । १५ ।

तद्वनं मथितैर्वृक्षैर्भिन्नैश्च सलिलाशयैः ।

चूर्णितैः पर्वतायैश्व बभूवा प्रियदर्शनम् ॥ १६ ॥

वहाँके वृक्षोंको खण्ड - खण्ड कर दिया । जलाशयोंको मथ डाला और पर्वत - शिखर्रोको चूर - चूर कर डाला । इससे वह सुन्दर वन कुछ ही क्षणोंमें अभव्य दिखायी देने लगा ॥ १६ ॥

नानाशकुन्तविरुतैः प्रभिन्नसलिलाशयैः ।

ताम्रैः किसलयैः क्लान्तैः पलान्तद्रुमलतायुतैः ॥ १७ ॥

म बभौ तद् वनं तत्र दावानलहतं यथा ।

व्याकुलावरणा रेजुर्विहला इव ता लताः ॥ १८ ॥

नाना प्रकार के पक्षी वहाँ भयके मारे चें - चें करने लगे, जलाशय के घाट टूट - फूट गये, तामे के समान वृक्षोंके लाल-लाल पल्लव मुरझा गये तथा वहाँके वृक्ष और बताएँ भी रौंद डाली गयीं । इन सब कारणों से वह प्रमदावन वहाँ ऐसा जान पड़ता था, मानो दावानलसे झुलस गया हो । वहाँकी लताएँ अपने आवरणोंके नष्ट - भ्रष्ट हो जानेसे घबरायी हुई स्त्रियों के समान प्रतीत होती थीं । १७-१८ ॥ लतागृहैश्चित्रगृहैश्च सादितै-लैर्मृगेरार्तरवैश्च पक्षिभिः । शिला गृहैरुन्मथितैस्तथा गृहैः प्रणष्टरूपं तदभून्महद् वनम् ॥ १ ९ ॥ लतामण्डप और चित्रशालाएँ उजाड़ हो गयीं । पाले हुए हिंसक जन्तु, मृग तथा तरह - तरह के पक्षी आर्तनाद करने लगे । प्रस्तर निर्मित प्रासाद तथा अन्य साधारण गृह भी तहस - नहस हो गये । इससे उस महान् प्रमदावनका सारा रूप - सौन्दर्य नष्ट हो गया ॥ १ ९ ॥ सा विलाशोक लताग्रताना वनस्थली शोकलताप्रताना । जाता दशास्यप्रमदावनस्य कर्बलाद्धि प्रमदावनस्य ॥ २० ॥

दशमुख रावणकी स्त्रियोंकी रक्षा करनेवाले तथा अन्तःपुर के क्रीडाविहार के लिये उपयोगी उस विशाल कानन-की भूमि, जहाँ चञ्चल अशोक - लताओंके समूह शोभा पाते थे, कपिवर हनुमानजी के बलप्रयोगसे श्रीहीन होकर शोचनीय लताओंके विस्तारसे युक्त हो गयी ( उसकी दुरवस्था देख-

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सर्गः ९ ७५ सुन्दरकाण्डे द्विचत्वारिंशः दुःख होता था ) ॥ २० ॥ इस प्रकार महामना राजा रावणके मनको विशेष कष्ट

कर दर्शकके मनमें पहुँचानेवाला कार्य करके अनेक महाबलियोंके साथ अकेले ततः स कृत्वा जगतीपते महान ही युद्ध करनेका हौसला लेकर कपिश्रेष्ठ हनुमानजी प्रमदावन-महद् व्यलीकं मनसो महात्मनः । आ गये । उस समय वे अपने अद्भुत तेजसे युयुत्सुरेको बहुभिर्महाबलैः के फाटकपर ज्वलंस्तोरणमाश्रितः कपिः ॥ २१ ॥ प्रकाशित हो रहे थे ॥ २१ ॥

श्रिया आदिकाव्ये सुन्दरकाण्डे एकचत्वारिंशः सर्गः ॥ ४१ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये के सुन्दरकाण्ड में इकतालीसवाँ सगँ पूरा हुआ ॥ ४१ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आरामायण आदिकाव्य द्विचत्वारिंशः सर्गः राक्षसियों के मुखसे एक वानरके द्वारा प्रमदावनके विध्वंसका समाचार सुनकर रावणका किंकर नामक राक्षसों को भेजना और हनुमान्जीके द्वारा उन सबका संहार च । बताओ । तुम्हें डरना नहीं चाहिये । इसने तुम्हारे साथ क्या ततः पक्षिनिनादेन वृक्षभङ्गखनेन ॥ १ ॥ बातें की थीं? ' ॥ ६-७ ॥

बभूवुत्रास सम्भ्रान्ताः सर्वे लङ्कानिवासिनः अथाब्रवीत् तदा साध्वी सीता सर्वाङ्गशोभना । उधर पक्षियोंके कोलाहल और वृक्षोंके टूटने की आवाज विज्ञाने का गतिर्मम ॥ ८ ॥

सुनकर समस्त लङ्कानिवासी भयसे घबरा उठे ॥ १ ॥ रक्षसां कामरूपाणां

। तब सर्वाङ्गसुन्दरी साध्वी सीताने कहा- ' इच्छानुसार विद्रुताश्च भयत्रस्ता विनेदुर्मृगपक्षिणः रूप धारण करनेवाले राक्षसों को समझने या पहचाननेका मेरे रक्षसां च निमित्तानि क्रूराणि प्रतिपेदिरे ॥ २ ॥

पशु और पक्षी भयभीत होकर भागने तथा आर्तनाद करने लगे | राक्षसोंके सामने भयंकर अपशकुन प्रकट होने लगे ॥ २ ॥

ततो गतायां निद्रायां राक्षस्यो विकृताननाः ।

तद् वनं ददृशुर्भग्नं तं च वीरं महाकपिम् ॥ ३ ॥

प्रमदावनमें सोयी हुई विकराल मुखवाली राक्षसियोंकी निद्रा टूट गयी । उन्होंने उठनेपर उस वनको उजड़ा हुआ देखा । साथ ही उनकी दृष्टि उन वीर महाकपि हनुमानजी पर भी पड़ी ॥ ३ ॥

स ता दृष्ट्रा महाबाहुर्महासत्त्वो महाबलः ।

चकार सुमहद्रूपं राक्षसीनां भयावहम् ॥ ४ ॥

महाबली, महान् साहसी एवं महाबाहु हनुमानजीने जब उन राक्षसियोंको देखा, तब उन्हें डरानेवाला विशाल रूप धारण कर लिया ॥ ४ ॥

ततस्तु गिरिसंकाशमतिकायं महाबलम् ।

राक्षस्यो वानरं दृष्ट्वा पप्रच्छुर्जनकात्मजाम् ॥ ५ ॥

पर्वतके समान बड़े शरीरवाले महाबली वानरको देखकर वे राक्षसियाँ जनकनन्दिनी सीतासे पूछने लगीं ॥५ ॥

कोऽयं कस्य कुतो वायं किंनिमित्तमिहागतः ।

कथं त्वया सहानेन संवादः कृत इत्युत ॥ ६ ॥

आचक्ष्व नो विशालाक्षि मा भूत्ते सुभगे भयम् ।

संवादमसितापाङ्गि त्वया किं कृतवानयम् ॥ ७ ॥

' विशाललो चने! यह कौन है? किसका है? और कहाँसे किसलिये यहाँ आया है? इसने तुम्हारे साथ क्यों बातचीत की है? कजरारे नेत्रप्रान्तवाली सुन्दरि! ये सब बातें हमें पास क्या उपाय है १ ॥ ८ ॥

यूयमेवास्य जानीत योऽयं यद् वा करिष्यति ।

अहिरेव ह्यहेः पादान् विजानाति न संशयः ॥ ९ ॥

" तुम्हीं जानो यह कौन है और क्या करेगा? साँपके पैरों-को साँप ही पहचानता है, इसमें संशय नहीं है ॥ ९ ॥

अहमप्यतिभीतास्मि नैव जानामि को हायम् ।

वेद्मि राक्षसमेवैनं कामरूपिणमागतम् ॥ १० ॥

“ मैं भी इसे देखकर बहुत डरी हुई हूँ । मुझे नहीं मालूम कि यह कौन है? मैं तो इसे इच्छानुसार रूप धारण करके आया हुआ कोई राक्षस ही समझती हूँ ' ॥ १० ॥

वैदेह्या वचनं श्रुत्वा राक्षस्यो विद्रुता द्रुतम् ।

स्थिताः काश्चिद्गताः काश्चिद् रावणाय निवेदितुम् ॥ ११ ॥

विदेद्दनन्दिनी सीता की यह बात सुनकर राक्षसियाँ बड़े वेगसे भागीं । उनमें से कुछ तो वहीं खड़ी हो गयीं और कुछ रावणको सूचना देनेके लिये चली गयीं ॥ ११ ॥

रावणस्य समीपे तु राक्षस्यो विकृताननाः ।

विरूपं वानरं भीमं रावणाय न्यवेदिषुः ॥ १२ ॥

रावणके समीप जाकर उन विकराल मुखवाली राक्षसियों-ने रावणको यह सूचना दी कि कोई विकटरूपधारी भयंकर वानर प्रमदावनमें आ पहुँचा है ॥ १२ ॥

अशोकवनिकामध्ये राजन् भीमवपुः कपिः ।

सीतया कृतसंवाद स्तिष्ठत्यमितविक्रमः ॥ १३ ॥

वे बोलीं- ' राजन्! अशोकवाटिकामें एक वानर आया है, जिसका शरीर बड़ा भयंकर है । उसने सीतासे बात-चीत की है । वह महापराक्रमी वानर अभी वहीं मौजूद है ॥

पृष्ठ 153

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९ ७६ श्रीमद्वाल्मीकीय रामायणे

न च तं जानकी सीता हरि हरिणलोचना ।

अस्माभिर्बहुधा पृष्टा निवेदयितुमिच्छति ॥ १४ ॥

' हमने बहुत पूछा तो भी जनककिशोरी मृगनयनी सीता उस वानरके विषय में हमें कुछ बताना नहीं चाहती हैं ॥ १४ ॥

वासवस्य भवेद् दूतो दूतो वैश्रवणस्य वा ।

प्रेषितो वापि रामेण सीतान्वेषणकाङ्क्षया ॥ १५ ॥

' सम्भव है वह इन्द्र या कुबेरका दूत हो अथवा श्रीराम ने ही उसे सीता की खोजके लिये भेजा हो ॥ १५ ॥

तेनैवाद्भुतरूपेण यत्तत्तव मनोहरम् ।

नानामृगगणाकीर्ण प्रसृष्टं प्रमदावनम् ॥ १६ ॥

' अद्भुतं रूप धारण करनेवाले उस वानरने आपके मनोहर प्रमदावनको, जिसमें नाना प्रकार के पशु - पक्षी रहा करते थे, उजाड़ दिया ॥ १६ ॥

न तत्र कश्चिदुद्देशो यस्तेन न विनाशितः ।

यत्र सा जानकी देवी स तेन न विनाशितः ॥ १७ ॥

' प्रमदावनका कोई भी ऐसा भाग नहीं है, जिसको उसने नष्ट न कर डाला हो । केवल वह स्थान जहाँ जानकी देवी रहती हैं, उसने नष्ट नहीं किया है ॥ १७ ॥

जानकी रक्षणार्थ वा श्रमाद् वा नोपलक्ष्यते ।

अथवा कः श्रमस्तस्य सैव तेनाभिरक्षिता ॥ १८ ॥

' जानकीजी की रक्षा के लिये उसने उस स्थानको बच्चा दिया है या परिश्रमसे थककर — यह निश्चित रूपसे नहीं जान पड़ता है । अथवा उसे परिश्रम तो क्या हुआ होगा? उसने उस स्थानको बचाकर सीताकी ही रक्षा की है ॥ १८ ॥

चारुपल्लवपत्राढ्यं यं सीता स्वयमास्थिता ।

प्रवृद्धः शिंशपावृक्षः स च तेनाभिरक्षितः ॥ १ ९ ॥

' मनोहर पल्लवों और पत्तोंसे भरा हुआ वह विशाल अशोक वृक्ष, जिसके नीचे सीताका निवास है, उसने सुरक्षित रख छोड़ा है ॥ १ ९ ॥

तस्योप्ररूपस्यो त्वं दण्डमाशातुमर्हसि ।

सीता सम्भाषिता येन वनं तेन विनाशितम् ॥ २० ॥

‘ जिसने सीतासे वार्तालाप किया और उस वनको उजाड़ डाला, उस उग्र रूपधारी वानरको आप कोई कठोर दण्ड देनेकी आशा प्रदान करें ॥ २० ॥

मनःपरिगृहीतां तां तव रक्षोगणेश्वर ।

कः सीतामभिभाषेत यो न स्यात् त्यक्तजीवितः ॥ २१ ॥

' राक्षसराज! जिन्हें आपने अपने हृदय में स्थान दिया है, उन सीता देवी से कौन बातें कर सकता है? जिसने अपने प्राणोंका मोह नहीं छोड़ा है, वह उनसे वार्तालाप कैसे कर सकता है ११ ॥ २१ ॥

राक्षसीनां वचः श्रुत्वा रावणो राक्षसेश्वरः ।

चिताग्निरिव जज्वाल कोपसंवर्तितेक्षणः ॥ २२ ॥

राक्षसियोंकी यह बात सुनकर राक्षसोंका राजा रावण प्रज्वलित चिताकी भाँति क्रोधसे जल उठा । उसके नेत्र रोषसे घूमने लगे ॥ २२ ॥

तस्य क्रुद्धस्य नेत्राभ्यां प्रापतन्नश्रुबिन्दवः ।

दीप्ताभ्यामिव दीपाभ्यां सार्चिषः स्नेह बिन्दवः ॥ २३ ॥

क्रोधमें भरे हुए रावणकी आँखोंसे आँसूकी बूँदें टपकने लग, मानो जलते हुए दो दीपकोंसे आग की लपटोंके साथ तेलकी बूँदें झर रही हों ॥ २३ ॥

आत्मनः सदृशान् वीरान् किंकरान्नाम राक्षसान् ।

व्यादिदेश महातेजा निग्रहार्थे हनूमतः ॥ २४ ॥

उस महातेजस्वी निशाचरने हनुमानजीको कैद करने के लिये अपने ही समान वीर किंकर नामधारी राक्षसोंको जाने-की आज्ञा दी ॥ २४ ॥

तेषामशीतिसाहस्रं किंकराणां तरखिनाम् ।

निर्ययुर्भवनात् तस्मात् कूटमुद्गरपाणयः ॥ २५ ॥

राजाकी आज्ञा पाकर असी हजार वेगवान् किंकर हाथोंमें कूट और मुद्गर लिये उस महल से बाहर निकले ॥ २५ ॥

महोदरा महादंष्ट्रा घोररूपा महाबलाः ।

युद्धाभिमनसः सर्वे हनूमद्ग्रहणोन्मुखाः ॥ २६ ॥

उनकी दाढ़े विशाल, पेट बड़ा और रूप भयानक था । वे सब के सब महान् बली, युद्धके अभिलाषी और हनुमान्-जीको पकड़नेके लिये उत्सुक थे ॥ २६ ॥

ते कपिं तं समासाद्य तोरणस्थमवस्थितम् ।

अभिपेतुर्महावेगाः पतङ्गा इव पावकम् ॥ २७ ॥

प्रमदावन के फाटकपर खड़े हुए उन वानरवीर के पास पहुँचकर वे महान् वेगशाली निशाचर उनपर चारों ओर से इस प्रकार झपटे, जैसे फतिंगे आगपर टूट पड़े हों ॥ २७ ॥

ते गदाभिर्विचित्राभिः परिधैः काञ्चनाङ्गदैः ।

आजग्मुर्वानरश्रेष्ठं शरैरादित्यसंनिभैः ॥ २८ ॥

वे विचित्र गदाओं, सोनेसे मढ़े हुए परिधों और सूर्य समान प्रज्वलित बाणोंके साथ वानरश्रेष्ठ हनुमानूपर चढ़ आये ॥ २८ ॥

मुद्गरैः पट्टिशैः शूलैः प्रासतोमरपाणयः ।

परिवार्य हनूमन्तं सहसा तस्थुरग्रतः ॥ २ ९ ॥

हाथमें प्रास और तोमर लिये मुद्गर, पट्टिश और शूलोंसे सुसजित हो वे सहसा हनुमान्को चारों ओरसे घेरकर उनके सामने खड़े हो गये ॥ २ ९ ॥

हनूमानपि तेजस्वी श्रीमान् पर्वतसंनिभः ।

क्षितावाविद्धय लाङ्गलं ननाद च महाध्वनिम् ॥ ३० ॥

तब पर्वत के समान विशाल शरीरवाले तेजस्वी श्रीमान् हनुमान् भी अपनी पूँछको पृथ्वीपर पटककर बड़े जोरसे गर्जने लगे ॥ ३० ॥

स भूत्वा तु महाकायो हनूमान् मारुतात्मजः ।

पुच्छ मास्फोटयामास लङ्कां शब्देन पूरयन् ॥ ३१ ॥

पृष्ठ 154

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सुन्दरकाण्डे द्विचत्वारिंशः सर्गः ९ ७७ पवनपुत्र हनुमान् अत्यन्त विशाल शरीर धारण करके अपनी पूँछ फटकारने और उसके शब्दसे लङ्काको प्रतिध्वनित करने लगे ॥ ३१ ॥

तस्यास्फोटितशब्देन महता चानुनादिना ।

पेतुर्विदङ्गा गगनादुच्चैश्चेदमघोषयत् ॥ ३२ ॥

उनकी पूँछ फटकारनेका गम्भीर घोष बहुत दूर तक गूँज उठता था । उससे भयभीत हो पक्षी आकाशसे गिर पड़ते थे । उस समय हनुमान् जीने उच्च स्वरसे इस प्रकार घोषणा की - ॥ ३२ ॥

जयत्यतिबलो रामो लक्ष्मणश्च महाबलः ।

राजा जयति सुग्रीवो राघवेणाभिपालितः ॥ ३३ ॥

दासोऽहं कोसलेन्द्रस्य रामस्याक्लिष्टकर्मणः ।

हनूमा शत्रुसैन्यानां निहन्ता मारुतात्मजः ॥ ३४ ॥

न रावणसहस्रं मे युद्धे प्रतिबलं भवेत् ।

शिलाभिश्च प्रहरतः पादपैश्च सहस्रशः ॥ ३५ ॥

अर्दयित्वा पुरीं लङ्कामभिवाद्य च मैथिलीम् ।

समृद्धार्थो गमिष्यामि मिषतां सर्वरक्षसाम् ॥ ३६ ॥

' अत्यन्त बलवान् भगवान् श्रीराम तथा महाबली लक्ष्मण-की जय हो । श्रीरघुनाथजीके द्वारा सुरक्षित राजा सुग्रीवकी भी जय हो । मैं अनायास ही महान् पराक्रम करने वाले कोसलनरेश श्रीरामचन्द्रजीका दास हूँ । मेरा नाम हनुमान् है । मैं वायुका पुत्र तथा शत्रुसेनाका संहार करनेवाला हूँ । जब मैं हजारों वृक्ष और पत्थरोंसे प्रहार करने लगूँगा, उस समय सहस्रों रावण मिलकर भी युद्धमें मेरे बलकी समानता अथवा मेरा सामना नहीं कर सकते । मैं लङ्कापुरीको तहस - नहस कर डालूँगा और मिथिलेशकुमारी सीताको प्रणाम करने के अनन्तर सब राक्षसोंके देखते - देखते अपना कार्य सिद्ध करके जाऊँगा ' ॥ ३३ – ३६ ॥

तस्य संवादशब्देन तेऽभवन् भयशङ्किताः ।

दहशुश्च हनूमन्तं संध्यामेघमिवोन्नतम् ॥ ३७ ॥

हनुमान जी की इस गर्जना से समस्त राक्षसोंपर भय एवं आतङ्क छा गया । उन सबने हनुमानजीको देखा । वे संध्या-कालके ऊँचे मेघ के समान लाल एवं विशालकाय दिखायी देते थे ॥ ३७ ॥

स्वामिसं देशनिःशङ्कास्ततस्ते राक्षसाः कपिम् ।

चित्रैः प्रहरणैभीमैरभिपेतुस्ततस्ततः ॥ ३८ ॥

हनुमानजीने अपने स्वामीका नाम लेकर स्वयं ही अपना परिचय दे दिया था, इसलिये राक्षसोंको उन्हें पहचानने में कोई संदेह नहीं रहा । वे नाना प्रकार के भयंकर अस्त्र - शस्त्रों-का प्रहार करते हुए चारों ओरसे उनपर टूट पड़े ॥ ३८ ॥

स तैः परिवृतः शूरैः सर्वतः स महाबलः ।

आससादायसं भीमं परिघं तोरणाश्रितम् ॥ ३ ९ ॥

उन शूरवीर राक्षसोंद्वारा सब ओर से घिर जानेपर महा-बली हनुमान्ने फाटकपर रक्खा हुआ एक भयंकर लोहेका परिघ उठा लिया ॥ ३ ९ ॥

स तं परिघमादाय जघान रजनीचरान् ।

सपन्न गमिवादाय स्फुरन्तं विनतासुतः ॥ ४० ॥

जैसे विनतानन्दन गरुड़ने छटपटाते हुए सर्पको पंजमें दाब रक्खा हो, उसी प्रकार उस परिधको हाथमें लेकर हनुमानजीने उन निशाचरोंका संहार आरम्भ किया ॥ ४० ॥

विचचाराम्बरे वीरः परिगृह्य च मारुतिः ।

सूदयामास वज्रेण दैत्यानिव सहस्रदृक् ॥ ४१ ॥

वीर पवनकुमार उस परिघको लेकर आकाश में विचरने लगे 1 । जैसे सहस्रनेत्रधारी इन्द्र अपने वज्र से दैत्योंका वध करते हैं, उसी प्रकार उन्होंने उस परिघसे सामने आये हुए समस्त राक्षसों को मार डाला ॥ ४१ ॥

स हत्वा राक्षसान् वीरः किंकरान् मारुतात्मजः ।

युद्धाकाङ्क्षी महावीरस्तोरणं समवस्थितः ॥ ४२ ॥

उन किंकर नामधारी राक्षसों का वध करके महावीर पवनपुत्र हनुमानजी युद्ध की इच्छासे पुनः उस फाटक पर खड़े हो गये ॥ ४२ ॥

ततस्तस्माद् भयान्मुक्ताः कतिचित्तत्र राक्षसाः ।

निहतान् किंकरान् सर्वान् रावणाय न्यवेदयन् ॥ ४३ ॥

तदनन्तर वहाँ उस भयसे मुक्त हुए कुछ राक्षसोंने जाकर रावण को यह समाचार निवेदन किया कि समस्त किंकर नामक राक्षस मार डाले गये ॥ ४३ ॥

स राक्षसानां निहतं महाबलं निशम्य राजा परिवृत्तलोचनः । समादिदेशाप्रतिमं पराक्रमे प्रहस्तपुत्रं समरे सुदुर्जयम् ॥ ४४ ॥

राक्षसोंकी उस विशाल सेनाको मारी गयी सुनकर राक्षस-राज रावणकी आँखें चढ़ गयीं और उसने प्रहस्त के पुत्रको जिसके पराक्रमकी कहीं तुलना नहीं थी तथा युद्ध में जिसे परास्त करना नितान्त कठिन था, हनुमानजी का सामना करनेके लिये भेजा ॥ ४४ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये सुन्दरकाण्डे द्विचत्वारिंशः सर्गः ॥ ४२ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आरामायण आदिकाव्यके सुन्दरकाण्डमें बयालीसवाँ सगँ पूरा हुआ ॥ ४२ ॥

वा ० रा ० ५.७. १५-

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९ ७८ श्रीमवाल्मीकीय रामायणे त्रिचत्वारिंशः सर्गः हनुमान्जीके द्वारा चैत्यप्रासादका

ततः स किंकरान् हत्वा हनूमान् ध्यानमास्थितः ।

वनं भग्नं मया चैत्यप्रासादो न विनाशितः ॥ १ ॥

इधर किंकरोंका वध करके हनुमान् जी यह सोचने लगे कि ' मैंने वनको तो उजाड़ दिया, परंतु इस चैत्यंप्रासादको नष्ट नहीं किया है ॥ १ ॥

तस्मात् प्रासादमद्यैवमिमं विध्वंसयाम्यहम् ।

इति संचिन्त्य हनुमान् मनसा दर्शयन् बलम् ॥ २ ॥

चैत्यप्रासादमुत्प्लुत्य मेरुशृङ्गमिवोन्नतम् ।

आरुरोह हरिश्रेष्ठो हनूमान् मारुतात्मजः ॥ ३ ॥

‘ अतः आज इस चैत्यप्रासादका भी विध्वंस किये देता हूँ | मन - ही - मन ऐसा विचारकर पवनपुत्र वानरश्रेष्ठ हनुमान्-जी अपने यलका प्रदर्शन करते हुए मेरुपर्वतके शिखरकी भाँति ऊँचे उस चैत्यप्रासादपर उछलकर चढ़ गये ॥ २-३ ॥

आरुह्य गिरिसंकाशं प्रासादं हरियूथपः ।

बभौ स सुमहातेजाः प्रतिसूर्य इवोदितः ॥ ४ ॥

उस पर्वताकार प्रासादपर चढ़कर महातेजस्वी वानर-यूथपति हनुमान् तुरंतके उगे हुए दूसरे सूर्यकी भाँति शोभा पाने लगे ॥ ४ ॥

सम्प्रधृष्य तु दुर्धर्षश्चैत्य प्रासादमुन्नतम् ।

हनूमान् प्रज्वललक्ष्म्या पारियात्रोपमोऽभवत् ॥ ५ ॥

उस ऊँचे प्रासादपर आक्रमण करके दुर्धर्ष वीर हनुमान्-जी अपनी सहज शोभासे उद्भासित होते हुए पारियात्र पर्वत-के समान प्रतीत होने लगे ॥ ५ ॥

सभूत्वा सुमहाकायः प्रभावान् मारुतात्मजः ।

धृष्टमास्फोटयामास लङ्कां शब्देन पूरयन् ॥ ६ ॥

वे तेजस्वी पवनकुमार विशाल शरीर धारण करके लङ्काको प्रतिध्वनित करते हुए धृष्टतापूर्वक उस प्रासादको तोड़ने - फोड़ने लगे ॥ ६ ॥

तस्यास्फोटितशब्देन महता श्रोत्रघातिना ।

पेतुर्वि हंगमास्तत्र चैत्यपालाच मोहिताः ॥ ७ ॥

जोर - जोर से होनेवाला वह तोड़ - फोड़का शब्द कानोंसे टकराकर उन्हें बहरा किये देता था । इससे मूर्छित हो वहाँके पक्षी और प्रासादरक्षक भी पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ ७ ॥

अस्त्रविजयतां रामो लक्ष्मणश्च महाबलः ।

राजा जयति सुग्रीवो राघवेणाभिपालितः ॥ ८ ॥

दासोऽहं कोसलेन्द्रस्य रामस्याक्लिष्टकर्मणः ।

हनूमान् शत्रुसैन्यानां निहन्ता मारुतात्मजः ॥ ९ ॥

न रावणसहस्रं मे युद्धे प्रतिबलं भवेत् । १. लङ्कामें राक्षसों के कुलदेवताका जो स्थान था, उसीका नाम चैत्यप्रासाद रक्खा गया था । विध्वंस तथा उसके रक्षकों का वध शिलाभिश्च प्रहरतः पादपैश्च सहस्रशः ॥ १० ॥

धर्षयित्वा पुरीं लङ्कामभिवाद्य च मैथिलीम् ।

समृद्धार्थो गमिष्यामि मिषतां सर्वरक्षसाम् ॥ ११ ॥

उस समय हनुमान् जीने पुनः यह घोषणा की — ' अस्त्र-वेत्ता भगवान् श्रीराम तथा महाबली लक्ष्मणकी जय हो । श्रीरघुनाथजीके द्वारा सुरक्षित राजा सुग्रीवकी भी जय हो । मैं अनायास ही महान् पराक्रम करनेवाले कोसलनरेश श्रीराम-चन्द्रजीका दास हूँ । मेरा नाम हनुमान् है । मैं वायुका पुत्र तथा शत्रुसेनाका संहार करनेवाला हूँ । जब मैं हजारों वृक्षों और पत्थरोंसे प्रहार करने लगूँगा, उस समय सहस्रों रावण मिलकर भी युद्धमें मेरे बलकी समानता अथवा मेरा सामना नहीं कर सकते । मैं लङ्कापुरीको तहस - नहस कर डालूँगा और मिथिलेश कुमारी सीताको प्रणाम करने के अनन्तर सब राक्षसोंके देखते - देखते अपना कार्य सिद्ध करके जाऊँगा'८- ११

एवमुक्त्वा महाकायची त्यस्थो हरियूथपः ।

ननाद भीमनिर्ह्रादो रक्षसां जनयन् भयम् ॥ १२ ॥

ऐसा कहकर चैत्यप्रासादपर खड़े हुए विशालकाय वानरयूथपति हनुमान् राक्षोंके मनमें भय उत्पन्न करते हुए भयानक आवाजमें गर्जना करने लगे ॥ १२ ॥

तेन नादेन महता चैत्यपालाः शतं ययुः । गृहीत्वा विविधानस्त्रान् प्रासान् खड्गान् परश्वधान् १३ उस भीषण गर्जनासे प्रभावित हो सैकड़ों प्रासादरक्षक नाना प्रकार के प्रास, खड्ग और फरसे लिये वहाँ आये ॥ १३ ॥

विसृजन्तो महाकाया मारुतिं पर्यवारयन् ।

ते गदाभिर्विचित्राभिः परिधैः काञ्चनाङ्गदैः ॥ १४ ॥

आजग्मुर्वानरश्रेष्ठं बाणैश्वादित्यसंनिभैः । उन विशालकाय राक्षसोंने उन सब अस्त्रोंका प्रहार करते हुए वहाँ पवनकुमार हनुमान्जीको घेर लिया । विचित्र गदाओं, सोनेके पत्र जड़े हुए परिधों और सूर्यतुल्य तेजस्वी बाणोंसे सुसज्जित हो वे सब - के - सब उन वानरश्रेष्ठ हनुमानूपर चढ़ आये ॥ १४३ ॥

आवर्त इव गङ्गायास्तोयस्य विपुलो महान् ॥ १५ ॥

परिक्षिप्य हरिश्रेष्ठं स बभौ रक्षसां गणः । वानरश्रेष्ठ हनुमान्को चारों ओर से घेरकर खड़ा हुआ राक्षसोंका वह महान् समुदाय गङ्गाजीके जलमें उठी हुई बड़ी भारी भँवरके समान जान पड़ता था ॥ १५३ ॥

ततो वातात्मजः क्रुद्धो भीमरूपं समास्थितः ॥ १६ ॥

प्रासादस्य महांस्तस्य स्तम्भं हेमपरिष्कृतम् ।

उत्पाठयित्वा वेगेन हनूमान् मारुतात्मजः ॥ १७ ॥

ततस्तं भ्रामयामास शतधारं महाबलः ।

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सुन्दरकाण्डे चतुश्चत्वारिंशः सर्गः ९ ७ ९ तत्र चाग्निः समभवत् प्रासादश्वाप्यदात ॥ १८ ॥

तब राक्षसों को इस प्रकार आक्रमण करते देख पवन कुमार हनुमान्ने कुपित हो बड़ा भयंकर रूप धारण किया । उन महावीर ने उस प्रासाद के एक सुवर्णभूषित खंभेको, जिसमें सौ धारें थीं, बड़े वेग से उखाड़ लिया । उखाड़कर उन महाबली वीरने उसे घुमाना आरम्भ किया । घुमानेपर उससे आग प्रकट हो गयी, जिससे वह प्रासाद जलने लगा । १६-१८ ।

दह्यमानं ततो दृष्ट्वा प्रासादं हरियूथपः ।

स राक्षसशतं हत्वा वज्रेणेन्द्र इवासुरान् ॥ १ ९ ॥

अन्तरिक्षस्थितः श्रीमानिदं वचनमब्रवीत् । प्रासादको जलते देख वानरयूथपति हनुमान्ने वज्रसे असुरोंका संहार करनेवाले इन्द्रकी भाँति उन सैकड़ों राक्षसों-को उस खंभे से ही मार डाला और आकाशमें खड़े होकर उन तेजस्वी वीरने इस प्रकार कहा- ॥ १ ९ ३ ॥ मादृशानां सहस्राणि विसृष्टानि महात्मनाम् ॥ २० ॥

बलिनां वानरेन्द्राणां सुग्रीववशवर्तिनाम् । ' राक्षसो! सुग्रीवके वशमें रहनेवाले मेरे - जैसे सहस्रों विशालकाय बलवान् वानरश्रेष्ठ सब ओर भेजे गये हैं ॥ २०३ ॥

अन्ति वसुधां कृत्स्नां वयमन्ये च वानराः ॥ २१ ॥

दशनागबलाः केचित् केचिद् दशगुणोत्तराः ।

केचिन्नागसहस्रस्य बभूवुस्तुल्यविक्रमाः ॥ २२ ॥

' हम तथा दूसरे सभी वानर समूची पृथ्वीपर घूम रहे हैं । किन्हीं में दस हाथियोंका बल है तो किन्हीं में सौ हाथियोंका । कितने ही वानर एक सहस्र हाथियोंके समान बल - विक्रमसे सम्पन्न हैं ॥ २१-२२ ॥

सन्ति चौघबलाः केचित् सन्ति वायुबलोपमाः ।

अप्रमेयवलाः केचित् तत्रासन हरियूथपाः ॥ २३ ॥

‘ किन्हींका बल जलके महान् प्रवाहकी भाँति असह्य है । कितने ही वायुके समान बलवान् हैं और कितने ही वानर-यूथपति अपने भीतर असीम बल धारण करते हैं ॥ २३ ॥

ईग्विधैस्तु हरिभिर्वृतो दन्तनखायुधैः ।

शतैः शतसहस्रैश्च कोटिभिश्रायुतैरपि ॥ २४ ॥

आगमिष्यति सुग्रीवः सर्वेषां वो निषूदनः । " दाँत और नख ही जिनके आयुध हैं ऐसे अनन्त बलशाली सैकड़ों, हजारों, लाखों और करोड़ों वानरोंसे घिरे हुए वानर-राज सुग्रीव यहाँ पधारेंगे, जो तुम सब निशाचरोंका संहार करने में समर्थ हैं ॥ २४३ ॥

नेयमस्ति पुरी लङ्का न यूयं न च रावणः ।

यस्य त्विक्ष्वाकुवीरेण बद्धं वैरं महात्मना ॥ २५ ॥

' अब न तो यह लङ्कापुरी रहेगी, न तुमलोग रहोगे और न वह रावण ही रह सकेगा, जिसने इक्ष्वाकुवंशी वीर महात्मा श्रीरामके साथ वैर बाँध रक्खा है ' ॥ २५ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये सुन्दरकाण्डे त्रिचत्वारिंशः सर्गः ॥ ४३ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आरामायण आदिकाव्यके सुन्दरकाण्ड में तैंतालीसवाँ सगँ परा हुआ ॥ ४३ ॥

चतुश्चत्वारिंशः सर्गः प्रहस्त - पुत्र जम्बुमालीका वध

संदिष्ट राक्षसेन्द्रेण प्रहस्तस्य सुतो बली ।

जम्बुमाली महादंष्ट्रो निर्जगाम धनुर्धरः ॥ १ ॥

राक्षसराज रावण की आज्ञा पाकर प्रहस्तका बलवान् पुत्र जम्बुमाली, जिसकी दाढ़े बहुत बड़ी थीं, हाथमें धनुष लिये राजमहल से बाहर निकला ॥ १ ॥

रक्तमाल्याम्बरधरः स्रग्वी रुचिरकुण्डलः ।

महान् विवृत्तनयनश्चण्डः समरदुर्जयः ॥ २ ॥

वह लाल रंग के फूलोंकी माला और लाल रंगके ही वस्त्र पहने हुए था । उसके गले में हार और कानोंमें सुन्दर कुण्डल शोभा दे रहे थे । उसकी आँखें घूम रही थीं । वह विशाल-काय, क्रोधी और संग्राममें दुर्जय था ॥ २ ॥

धनुः शक्रधनुःप्रख्यं महद् रुचिरसायकम् ।

विस्फारयाणो वेगेन वज्राशनिसमखनम् ॥ ३ ॥

उसका धनुष इन्द्रधनुषके समान विशाल था । उसके द्वारा छोड़े जानेवाले बाण भी बड़े सुन्दर थे । जब वह वेग-से उस धनुषको खींचता, तब उससे वज्र और अशनिके समान गड़गड़ाहट पैदा होती थी ॥ ३ ॥

तस्य विस्फारघोषेण धनुषो महता दिशः ।

प्रदिशश्च नभश्चैव सहसा समपूर्यत ॥ ४ ॥

उस धनुषकी महती टंकार - ध्वनिसे सम्पूर्ण दिशाएँ, विदिशाएँ और आकाश सभी सहसा गूँज उठे ॥ ४ ॥

रथेन खरयुक्तेन तमागतमुदीक्ष्य सः ।

हनूमान् वेगसम्पन्नो जहर्ष च ननाद च ॥ ५ ॥

वह गधे जुते हुए रथपर बैठकर आया था । उसे देख-कर वेगशाली हनुमान्जी बड़े प्रसन्न हुए और जोर - जोर से गर्जना करने लगे ॥ ५ ॥

तं तोरणविटङ्कस्थं हनूमन्तं महाकपिम् ।

जम्बुमाली महातेजा विव्याध निशितैः शरैः ॥ ६ ॥

महातेजस्वी जम्बुमालीने महाकपि हनुमानजीको फाटक-के छज्जेपर खड़ा देख उन्हें तीखे बाणोंसे बींधना आरम्भ कर दिया ॥ ६ ॥

अर्धचन्द्रेण वदने शिरस्येकेन कर्णिना ।

बाह्वोर्विव्याध नाराचैर्दशभिस्तु कपीश्वरम् ॥ ७ ॥

उसने अर्द्धचन्द्रनामक बाणसे उनके मुखपर, कर्णीनामक

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९ ८० भीमवाल्मीकीयरामायणे एक बाणसे मस्तकपर और दस नाराचोंसे उन कपीश्वर की दोनों भुजाओं पर गहरी चोट की ॥ ७ ॥

तस्य तच्छुशुभे ताम्रं शरेणाभिहतं मुखम् ।

शरदीवाम्बुजं फुल्लं विद्धं भास्कररश्मिना ॥ ८ ॥

उसके बाणसे घायल हुआ हनुमानजी का लाल मुँह शरद ऋतु में सूर्य की किरणोंसे विद्ध हो खिले हुए लाल कमल-के समान शोभा पा रहा था ॥ ८ ॥

तत्तस्य रक्तं रक्तेन रञ्जितं शुशुभे मुखम् ।

यथा ss काशे महापद्मं सिक्तं काञ्चनबिन्दुभिः ॥ ९ ॥

रक्त से रञ्जित हुआ उनका वह रक्तवर्णका मुख ऐसी शोभा पा रहा था, मानो आकाश में लाल रंगके विशाल कमलको सुवर्णमय जलकी बूदोंसे सींच दिया गया हो- -उस पर सोनेका पानी चढ़ा दिया गया हो ॥ ९ ॥

चुकोप बाणाभिहतो राक्षसस्य महाकपिः ।

ततः पार्श्वेऽतिविपुलां ददर्श महतीं शिलाम् ॥ १० ॥

तरसा तां समुत्पाट्य चिक्षेप जववद् बली । राक्षस जम्बुमालीके बाणोंकी चोट खाकर महाकपि हनुमान्जी कुपित हो उठे । उन्होंने अपने पास ही पत्थरकी एक बहुत बड़ी चट्टान पड़ी देखी और उसे वेगसे उठाकर उन बलवान् वीरने बड़े जोर से उस राक्षसकी ओर फेंका ॥ १०३ ॥

तां शरैर्दशभिः क्रुद्धस्ताडयामास राक्षसः ॥ ११ ॥

विपन्नं कर्म तद् दृष्ट्वा हनूमांश्चण्ड विक्रमः ।

सालं विपुलमुत्पाट्य भ्रामयामास वीर्यवान् ॥ १२ ॥

किंतु क्रोधमें भरे उस राक्षसने दस बाण मारकर उस प्रस्तर - शिलाको तोड़ - फोड़ डाला । अपने उस कर्मको व्यर्थ हुआ देख प्रचण्ड पराक्रमी और बलशाली हनुमान्ने एक विशाल सालका वृक्ष उखाड़कर उसे घुमाना आरम्भ किया ॥ ११-१२ ॥

भ्रामयन्तं कपिं दृष्ट्वा सालवृक्षं महाबलम् ।

चिक्षेप सुबहून बाणाअम्बुमाली महाबलः ॥ १३ ॥

उन महान् बलशाली वानरवीरको सालका वृक्ष घुमाते देख महाबली जम्बुमालीने उनके ऊपर बहुत - से बाणोंकी वर्षा की ॥ १३ ॥

सालं चतुर्भिश्चिच्छेद वानरं पञ्चभिर्भुजे ।

उरस्येकेन वाणेन दशभिस्तु स्तनान्तरे ॥ १४ ॥

उसने चार बाणोंसे सालवृक्षको काट गिराया, पाँचसे हनुमानजी की भुजाओं में, एक बाणसे उनकी छाती में और दस बाणोंसे उनके दोनों स्तनोंके मध्यभागमें चोट पहुँचायी ॥

स शरैः पूरिततनुः क्रोधेन महता वृतः ।

तमेव परिघं गृह्य भ्रामयामास वेगितः ॥ १५ ॥

बाणोंसे हनुमानजी का सारा शरीर भर गया । फिर तो उन्हें बड़ा क्रोध हुआ और उन्होंने उसी परिषको उठाकर उसे बड़े वेग से घुमाना आरम्भ किया ॥ १५ ॥

अतिवेगोऽतिवेगेन भ्रामयित्वा बलोत्कटः ।

परिघं पातयामास जम्बुमा लेर्महोरसि ॥ १६ ॥

अत्यन्त वेगवान् और उत्कट बलशाली हनुमान्ने बड़े वेगसे घुमाकर उस परिघको जम्बुमालीकी विशाल छातीपर दे मारा ॥ १६ ॥

तस्य चैव शिरो नास्ति न बाहू जानुनी न च ।

न धनुर्न रथो नाश्वास्तत्रादृश्यन्त नेषवः ॥ १७ ॥

फिर तो न उसके मस्तकका पता लगा और न दोनों भुजाओं तथा घुटनों का ही । न धनुष बचा न रथ, न वहाँ घोड़े दिखायी दिये और न बाण ही ॥ १७ ॥

स हतस्तरसा तेन जम्बुमाली महारथः ।

पपात निहतो भूमौ चूर्णिताङ्ग इव द्रुमः ॥ १८ ॥

उस परिघसे वेगपूर्वक मारा गया महारथी जम्बुमाली चूर - चूर हुए वृक्षकी भाँति पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥ १८ ॥

जम्बुमालि सुनिहतं किंकरांश्च महाबलान् ।

चुकोध रावणः श्रुत्वा क्रोधसंरक्तलोचनः ॥ १ ९ ॥

जम्बुमाली तथा महाबली किंकरों के मारे जानेका समाचार

सुनकर रावणको बड़ा क्रोध हुआ । उसकी आँखें रोषसे रक्त-वर्णकी हो गयीं ॥ १ ९ ॥

स रोषसंवर्तितताम्रलोचनः प्रहस्तपुत्रे निहते महाबले । अमात्यपुत्रानतिवीर्य विक्रमान् समादिदेशाशु निशाचरेश्वरः ॥ २० ॥

महाबली प्रहस्त पुत्र जम्बुमालीके मारे जानेपर निशाचर-राज रावण के नेत्र रोषसे लाल होकर घूमने लगे । उसने तुरंत ही अपने मन्त्रीके पुत्रोंको, जो बड़े बलवान् और पराक्रमी थे, युद्ध के लिये जानेकी आज्ञा दी ॥ २० ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये भादिकाव्ये सुन्दरकाण्डे चतुश्चत्वारिंशः सर्गः ॥ ४४ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आवरामायण आदिकाव्यके सुन्दरकाण्डमें चौवालीसवाँ सगँ परा हुआ ॥ ४४ ॥

पञ्चचत्वारिंशः सर्गः मन्त्री के सात पुत्रोंका वध ततस्ते राक्षसेन्द्रेण चोदिता मन्त्रिणः सुताः । बेटे, जो अग्नि के समान तेजस्वी थे, उस राजमहल से निर्ययुर्भवनात् तस्मात् सप्त सप्तार्चिवर्चसः ॥ १ ॥ बाहर निकले ॥ १ ॥

राक्षसोंके राजा रावणकी आज्ञा पाकर मन्त्री के सात महद्बलपरीवारा धनुष्मन्तो महाबलाः ।

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सुन्दरकाण्डे पञ्चचत्वारिंशः सर्गः ९ ८१ कृतास्त्रास्त्रविदां श्रेष्ठाः परस्परजयैषिणः ॥ २ ॥

उनके साथ बहुत बड़ी सेना थी । वे अत्यन्त बलवान्, धनुर्धर, अस्त्रवेत्ताओं में श्रेष्ठ तथा परस्पर होड़ लगाकर शत्रु पर विजय पानेकी इच्छा रखनेवाले थे ॥ २ ॥

हेमजालपरिक्षितैर्ध्वजवद्भिः पताकिभिः ।

तोयदस्वन निघोषैर्वाजियुकैर्महारथैः ॥ ३ ॥

तप्तकाञ्चनचित्राणि चापान्यमितविक्रमाः ।

विस्फारयन्तः संहृष्टास्तडिद्वन्त इवाम्बुदाः ॥ ४ ॥

उनके घोड़े जुते हुए विशाल रथ सोनेकी जालीसे के हुए थे । उनपर ध्वजा - पताकाएँ फहरा रही थीं और उनके पहियोंके चलनेसे मेघोंकी गम्भीर गर्जना के समान ध्वनि होती थी । ऐसे रथोंपर सवार हो वे अमित पराक्रमी मन्त्रकुमार तपाये हुए खोनेसे चित्रित अपने धनुषों की टङ्कार करते हुए बड़े हर्ष और उत्साह के साथ आगे बढ़े । उस समय वे सब - के - सब विद्युत्सहित मेघके समान शोभा पाते थे ॥ ३-४ ॥

जनन्यस्तास्ततस्तेषां विदित्वा किंकरान् हतान् ।

बभूवुः शोकसम्भ्रान्ताः सबान्धवसुहृज्जनाः ॥ ५ ॥

तब पहले जो किंकर नामक राक्षस मारे गये थे, उनकी मृत्युका समाचार पाकर इन सबकी माताएँ अमङ्गलकी आशङ्कासे भाई - बन्धु और सुहृदोंसहित शोकसे घबरा उठीं ॥ ५ ॥

ते परस्पर संघर्षात् तप्तकाञ्चनभूषणाः ।

अभिपेतुर्हनूमन्तं तोरणस्थमवस्थितम् ॥ ६ ॥

तपाये हुए सोनेके आभूषणोंसे विभूषित वे सातों वीर परस्पर होड़ - सी लगाकर फाटकपर खड़े हुए हनुमानजी-पर टूट पड़े ॥ ६ ॥

सृजन्तो बाणवृष्टि ते रथगर्जितनिःखनाः ।

प्रावृट्काल इवाम्भोदा विचेरुर्नैर्ऋताम्बुदाः ॥ ७ ॥

जैसे वर्षाकालमें मेघ वर्षा करते हुए विचरते हैं, उसी प्रकार वे राक्षसरूपी बादल बाणोंकी वर्षा करते हुए वहाँ विचरण करने लगे । रथोंकी घर्घराहट ही उनकी गर्जना थी ॥ ७ ॥

अवकीर्णस्ततस्ताभिर्ह नूमाञ्शरवृष्टिभिः 1 अभवत् संवृताकारः शैलराडिव वृष्टिभिः ॥ ८ ॥

तदनन्तर राक्षसोंद्वारा की गयी उस बाण - वर्षासे हनुमान् जी उसी तरह आच्छादित हो गये, जैसे कोई गिरिराज जलकी वर्षा से ढक गया हो ॥ ८ ॥

स शरान् वञ्चयामास तेषामाशुचरः कपिः ।

रथवेगांश्च वीराणां विचरन् विमलेऽम्बरे ॥ ९ ॥

उस समय निर्मल आकाश में शीघ्रतापूर्वक विचरते हुए कपिवर हनुमान् उन राक्षसवीरोंके बाणों तथा रथके वेगको व्यर्थ करते हुए अपने - आपको बचाने लगे ॥ ९ ॥

स तैः क्रीडन् धनुष्मद्भिर्व्यानि वीरः प्रकाशते ।

धनुष्मद्भिर्यथा मेघैर्मारुतः प्रभुरम्बरे ॥ १० ॥

जैसे व्योममण्डल में शक्तिशाली वायुदेव इन्द्रधनुष-युक्त मेघों के साथ क्रीडा करते हैं, उसी प्रकार वीर पवन-कुमार उन धनुर्धर वीरोंके साथ खेल - सा करते हुए आकाश में अद्भुत शोभा पा रहे थे ॥ १० ॥

सकृत्वा निनदं घोरं त्रासयंस्तां महाचमूम् ।

चकार हनुमान् वेगं तेषु रक्षः सु वीर्यवान् ॥ ११ ॥

पराक्रमी हनुमान्ने राक्षसोंकी उस विशाल वाहिनीको भयभीत करते हुए घोर गर्जना की और उन राक्षसोंपर बड़े वेग से आक्रमण किया ॥ ११ ॥

तलेनाभिहनत् कांश्चित् पादैः कांश्चित् परं तपः ।

मुष्टिभिश्वाहनत् कांश्चिन्नखैः कांश्चिद् व्यदारयत् ॥ १२ ॥

शत्रुओंको संताप देनेवाले उन वानरवीरने किन्हींको थप्पड़से ही मार गिराया, किन्हींको पैरोंसे कुचल डाला, किन्हींका घूँसोंसे काम तमाम किया और किन्हींको नखोंसे फाड़ डाला ॥ १२ ॥

प्रममाथोरसा चिरुभ्यामपरानपि ।

केचित् तस्यैव नादेन तत्रैव पतिता भुवि ॥ १३ ॥

कुछ लोगोंको छातीसे दबाकर उनका कचूमर निकाल दिया और किन्हीं- किन्हींको दोनों जाँघोंसे दबोचकर मसल डाला । कितने ही निशाचर उनकी गर्जना से ही प्राणहीन होकर वहीं पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ १३ ॥

ततस्तेष्ववपन्नेषु भूमौ निपतितेषु च ।

तत्सैन्यमगमत् सर्व दिशो दश भयार्दितम् ॥ १४ ॥

इस प्रकार जब मन्त्रीके सारे पुत्र मारे जाकर धराशायी हो गये, तब उनकी बची - खुची सारी सेना भयभीत होकर दसों दिशाओं में भाग गयी ॥ १४ ॥

विनेदुर्विखरं नागा निपेतुर्भुवि वाजिनः ।

भग्ननीडध्वजच्छत्रैर्भूश्च कीर्णाभवद् रथैः ॥ १५ ॥

उस समय हाथी वेदना के मारे बुरी तरहसे चिग्वाड़ रहे थे, घोड़े धरतीपर मरे पड़े थे तथा जिनके बैठक, ध्वज और छत्र आदि खण्डित हो गये थे, ऐसे टूटे हुए रथोंसे समूची रणभूमि पट गयी थी ॥ १५ ॥

स्रवता रुधिरेणाथ स्रवन्त्यो दर्शिताः पथि ।

विविधैश्व स्वनैर्लङ्का ननाद विकृतं तदा ॥ १६ ॥

मार्गमें खूनकी नदियाँ बहती दिखायी दीं तथा लङ्कापुरी राक्षसोंके विविध शब्दोंके कारण मानो उस समय विकृत स्वरसे चीत्कार कर रही थी ॥ १६ ॥

स तान् प्रवृद्धान् विनिहत्य राक्षसान्

महाबलश्चण्ड पराक्रमः कपिः ।

युयुत्सुरन्यैः पुनरेव राक्षसै-स्तदेव वीरोऽभिजगाम तोरणम् ॥ १७ ॥

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९ ८२ श्रीमदवाल्मीकीय रामायणे प्रचण्ड पराक्रमी और महाबली वानरवीर हनुमानजी राक्षसों के साथ युद्ध करनेकी इच्छा से फिर उसी फाटकपर उन बढ़े- चढ़े राक्षसों को मौत के घाट उतारकर दूसरे जा पहुँचे ॥ १७ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये सुन्दरकाण्डे पञ्चचत्वारिंशः सर्गः ॥ ४५ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आरामायण आदिकाव्यके सुन्दरकाण्ड में पैंतालीसवाँ सर्गं परा हुआ ॥ ४५ ॥

षट्चत्वारिंशः सर्गः रावणके पाँच सेनापतियोंका वध

हतान् मन्त्रिसुतान् बुद्ध्वा वानरेण महात्मना ।

रावणः संवृताकारश्चकार मतिमुत्तमाम् ॥ १ ॥

महात्मा हनुमानजीके द्वारा मन्त्रीके पुत्र भी मारे गये – यह जानकर रावणने भयभीत होनेपर भी अपने आकारको प्रयत्नपूर्वक छिपाया और उत्तम बुद्धिका आश्रय ले आगे के कर्तव्यका निश्चय किया ॥ १ ॥

स विरूपाक्षयूपाक्षौ दुर्धरं चैव राक्षसम् ।

प्रघसं भासकर्णे च पञ्च सेनाग्रनायकान् ॥ २ ॥

संदिदेश दशग्रीवो वीरान् नयविशारदान् ।

हनूमद्ग्रहणेऽव्यग्रान् वायुवेगसमान् युधि ॥ ३ ॥

दशग्रीवने विरूपाक्ष, यूपाक्ष, दुर्धर, प्रघस और भासकर्ण – इन पाँच सेनापतियोंको, जो बड़े वीर, नीति-निपुण, धैर्यवान् तथा युद्धमें वायुके समान वेगशाली थे, हनुमानजीको पकड़ने के लिये आज्ञा दी ॥ २-३ ॥

यात सेनाप्रगाः सर्वे महाबलपरिग्रहाः ।

सवाजिरथमातङ्गाः स कपिः शास्यतामिति ॥ ४ ॥

उसने कहा – ' सेना के अग्रगामी वीरो! तुमलोग घोड़े, रथ और हाथियोंसहित बड़ी भारी सेना साथ लेकर जाओ और उस वानरको बलपूर्वक पकड़कर उसे अच्छी तरह शिक्षा दो ॥ ४ ॥

यत्तैश्च • खलु भाव्यं स्यात् तमासाद्य वनालयम् ।

कर्म चापि समाधेयं देशकालाविरोधितम् ॥ ५ ॥

' उस वनचारी वानर के पास पहुँचकर तुम सब लोगोंको सावधान और अत्यन्त प्रयत्नशील हो जाना चाहिये तथा काम वही करना चाहिये, जो देश और कालके अनुरूप हो ॥ ५ ॥

न ह्यहं तं कपिं मन्ये कर्मणा प्रति तर्कयन् ।

सर्वथा तन्महद् भूतं महाबलपरिग्रहम् ॥ 11

' जब मैं उसके अलौकिक कर्मको देखते हुए उसके स्वरूपपर विचार करता हूँ, तब वह मुझे वानर नहीं जान पड़ता है । वह सर्वथा कोई महान् प्राणी है, जो महान् बलसे सम्पन्न है ॥ ६ ॥

वानरोऽयमिति ज्ञात्वा नहि शुद्धयति मे मनः ।

नैवाहं तं कपिं मन्ये यथेयं प्रस्तुता कथा ॥ ७ ॥

" यह वानर है ' ऐसा समझकर मेरा मन उसकी ओरसे शुद्ध ( विश्वस्त ) नहीं हो रहा है । यह जैसा प्रसङ्ग उपस्थित है, या जैसी बातें चल रही हैं. उन्हें देखते हुए मैं उसे वानर नहीं मानता हूँ ॥ ७ ॥

भवेदिन्द्रेण वा सृष्टमस्मदर्थं तपोबलात् ।

सनागयक्षगन्धर्वदेवासुरमहर्षयः ॥ ८ ॥

युष्माभिः प्रहितैः सर्वैर्मया सह विनिर्जिताः ।

तैरवश्यं विधातव्यं व्यलीकं किंचिदेव नः ॥ ९ ॥

" सम्भव है इन्द्रने हमलोगों का विनाश करनेके लिये अपने तपोबलसे इसकी सृष्टि की हो । मेरी आज्ञासे तुम सब लोगोंने मेरे साथ रहकर नागसहित यक्ष, गन्धर्वों, देवताओं, असुरों और महर्षियों को भी अनेक बार पराजित किया है; अतः वे अवश्य हमारा कुछ अनिष्ट करना चाहेंगे ॥

तदेव नात्र संदेहः प्रसह्य परिगृह्यताम् ।

यात सेनाप्रगाः सर्वे महाबलपरिग्रहाः ॥ १० ॥

सवाजिरथमातङ्गाः स कपिः शास्यतामिति । ' अतः यह उन्हींका रचा हुआ प्राणी है, इसमें संदेह नहीं । तुमलोग उसे हठपूर्वक पकड़ ले आओ । मेरी सेनाके अग्रगामी वीरो! तुम हाथी, घोड़े और रथसहित बड़ी भारी सेना साथ लेकर जाओ और उस वानरको अच्छी तरह शिक्षा दो ॥ १०३ ॥

नावमन्यो कपिर्धीरपराक्रमः ॥ ११ ॥

दृष्टा हि हरयः पूर्वे मया विपुलविक्रमाः । " वानर समझकर तुम्हें उसकी अवहेलना नहीं करनी चाहिये; क्योंकि वह घीर और पराक्रमी है । मैंने पहले बड़े - बड़े पराक्रमी वानर और भालू देखे हैं ॥ ११३ ॥

वाली च सह सुग्रीवो जाम्बवांश्च महाबलः ॥ १२ ॥

नीलः सेनापतिश्चैव ये चान्ये द्विविदादयः । " जिनके नाम इस प्रकार है - वाली, सुग्रीव, महाबली जाम्बवान्, सेनापति नील तथा द्विविद आदि अन्य वानर ॥ १२३ ॥

नैव तेषां गतिर्भीमा न तेजो न पराक्रमः ॥ १३ ॥

न मतिर्न बलोत्साहो न रूपपरिकल्पनम् । " किंतु उनका वेग ऐसा भयंकर नहीं है और न उनमें ऐसा तेज, पराक्रम, बुद्धि, बल, उत्साह तथा रूप धारण करने की शक्ति ही है ॥ १३३ ॥

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सुन्दरकाण्डे षट्चत्वारिंशः सर्गः ९ ८३ महत्त्वमिदं ज्ञेयं कपिरूपं व्यवस्थितम् ॥ १४ ॥

प्रयत्नं महदास्थाय क्रियतामस्य निग्रहः । ' वानर के रूपमें यह कोई बड़ा शक्तिशाली जीव प्रकट हुआ है, ऐसा जानना चाहिये । अतः तुमलोग महान् प्रयत्न करके उसे कैद करो ॥ १४३ ॥

कामं लोकास्त्रयः सेन्द्राः ससुरासुरमानवाः ॥ १५ ॥

भवतामग्रतः स्थातुं न पर्याप्ता रणाजिरे । ' भले ही इन्द्रसहित देवता, असुर, मनुष्य एवं तीनों लोक उतर आयें, रणभूमिमें तुम्हारे सामने ठहर नहीं सकते ॥ १५३ ॥

तथापि तु नयशेन जयमाकाङ्क्षता रणे ॥ १६ ॥

आत्मा रक्ष्यः प्रयत्नेन युद्धसिद्धिर्हि चञ्चला । " तथापि समराङ्गण में विजयकी इच्छा रखनेवाले नीतिज्ञ पुरुषको यत्नपूर्वक अपनी रक्षा करनी चाहिये; क्योंकि युद्ध में सफलता अनिश्चित होती है ' ॥ १६३ ॥

ते स्वामिवचनं सर्वे प्रतिगृह्य महौजसः ॥ १७ ॥

समुत्पेतुर्महावेगा हुताशसमतेजसः ।

रथैश्व मत्तैर्नागैश्च वाजिभिश्च महाजवैः ॥ १८ ॥

शस्त्रैश्च विविधैस्तीक्ष्णैः सर्वैश्चोपहिता बलैः । स्वामीकी आज्ञा स्वीकार करके वे सब - के - सब अग्निके समान तेजस्वी, महान् वेगशाली और अत्यन्त बलवान् राक्षस तेज चलनेवाले घोड़ों, मतवाले हाथियों तथा विशाल रथोंपर बैठकर युद्ध के लिये चल दिये । वे सब प्रकार के तीखे शस्त्रों और सेनाओंसे सम्पन्न थे ॥ १७-१८३ ॥ ततस्तु ददृशुर्वीरा दीप्यमानं महाकपिम् ॥ १ ९९ ॥

रश्मिमन्तमिवोद्यन्तं स्वतेजोरश्मिमालिनम् ।

तोरणस्थं महावेगं महासत्त्वं महाबलम् ॥ २० ॥

महामति महोत्साहं महाकायं महाभुजम् । आगे जानेपर उन वीरोंने देखा महाकपि हनुमानजी फाटक पर खड़े हैं और अपनी तेजोमयी किरणोंसे मण्डित हो उदयकालके सूर्यकी भाँति देदीप्यमान हो रहे हैं । उनकी शक्ति, बल, वेग, बुद्धि, उत्साह, शरीर और भुजाएँ सभी महान् थीं ॥ १ ९ -२०३ ॥ तं समीक्ष्यैव ते सर्वे दिक्षु सर्वास्ववस्थिताः ॥ २१ ॥

तैस्तैः प्रहरणैर्भीमैरभिपेतुस्ततस्ततः । उन्हें देखते ही वे सब राक्षस, जो सभी दिशाओंमें खड़े थे, भयंकर अस्त्र - शस्त्रोंकी वर्षा करते हुए चारों ओरसे उनपर टूट पड़े ॥ २ ९ ३ ॥

तस्य पञ्चायसास्तीक्ष्णाः सिताः पीतमुखाः शराः ।

शिरस्युत्पलपत्राभा दुर्धरेण निपातिताः ॥ २२ ॥

निकट पहुँचने पर पहले दुर्धरने हनुमानजी के मस्तकपर लोहे के बने हुए पाँच बाण मारे । वे सभी बाण मर्मभेदी और पैनी धारवाले थे । उनके अग्रभागपर सोनेका पानी दिया गया था । जिससे वे पीतमुख दिखायी देते थे । वे पाँचों बाण उनके सिरपर प्रफुल्लकमलदल के समान शोभा पा रहे थे ॥ २२ ॥

स तैः पञ्चभिराविद्धः शरैः शिरसि वानरः ।

उत्पपात नदन् व्योम्नि दिशो दश विनादयन् ॥ २३ ॥

मस्तकमें उन पाँच बाणसे गहरी चोट खाकर वानर-वीर हनुमान् जी अपनी भीषण गर्जनासे दसों दिशाओंको प्रतिध्वनित करते हुए आकाशमें ऊपरकी ओर उछल पड़े ॥

ततस्तु दुर्धरो वीरः सरथः सज्जकार्मुकः ।

किरञ्शरशतै नै कैरभिपेदे महाबलः ॥ २४ ॥

तब रथ में बैठे हुए महाबली वीर दुर्धरने धनुष चढ़ाये कई सौ बार्णोंकी वर्षा करते हुए उनका पीछा किया ॥ २४ ॥

स कपिर्वारयामास तं व्योम्नि शरवर्षिणम् ।

वृष्टिमन्तं पयोदान्ते पयोदमिव मारुतः ॥ २५ ॥

आकाशमें खड़े हुए उन वानरवीरने बाणोंकी वर्षा करते हुए दुर्धर को अपने हुंकारमात्रसे उसी प्रकार रोक दिया, जैसे वर्षा ॠतुके अन्त में वृष्टि करनेवाले बादलको वायु रोक देती है ॥ २५ ॥

अर्धमानस्ततस्तेन दुर्धरेणानिलात्मजः ।

चकार निनदं भूयो व्यवर्धत च वीर्यवान् ॥ २६ ॥

जब दुर्धर अपने बाणोंसे अधिक पीड़ा देने लगा, तब वे परम पराक्रमी पवनकुमार पुनः विकट गर्जना करने और अपने शरीरको बढ़ाने लगे ॥ २६ ॥

स दूरं सहसोत्पत्य दुर्धरस्य रथे हरिः ।

निपपात महावेगो विद्युद्राशिर्गिराविव ॥ २७ ॥

तत्पश्चात् वे महावेगशाली वानरवीर बहुत दूरतक ऊँचे उछलकर सहसा दुर्धर के रथपर कूद पड़े, मानो किसी पर्वत पर बिजलीका समूह गिर पड़ा हो ॥ २७ ॥

ततः स मथिताष्टाश्वं रथं भग्नाक्षकूबरम् ।

विहाय न्यपतद् भूमौ दुर्धरत्यक्तजीवितः ॥ २८ ॥

उनके भारसे रथके आठों घोड़ोंका कचूमर निकल गया, धुरी और कूबर टूट गये तथा दुर्धर प्राणहीन हो उस रथको छोड़कर पृथ्वी पर गिर पड़ा ॥ २८ ॥

तं विरूपाक्षयूपाक्षौ दृष्ट्रा निपतितं भुवि ।

तौ जातरोषौ दुर्धर्षावुत्पेततुररिंदमौ ॥ २ ९ ॥

दुर्धरको धराशायी हुआ देख शत्रुओंका दमन करनेवाले दुर्धर्ष वीर विरूपाक्ष और यूपाक्षको बड़ा क्रोध हुआ । वे दोनों आकाश में उछले ॥ २ ९ ॥

स ताभ्यां सहसोत्प्लुत्य विष्ठितो विमलेऽम्बरे ।

मुद्गराभ्यां महाबाहुर्वक्षस्यभिहतः कपिः ॥ ३० ॥

उन दोनोंने सहसा उछलकर निर्मल आकाशमें खड़े हुए महाबाहु कपिवर हनुमानजी की छातीमें मुद्गरोंसे प्रहार किया ॥ ३० ॥