Ramayana 2 — पृष्ठ 161–170

वाल्मीकि रामायण — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 161–170

पृष्ठ 161

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९ ८४ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे

तयोर्वेगवतोर्वेगं निहत्य स महाबलः ।

निपपात पुनर्भूमौ सुपर्ण इव वेगितः ॥ ३१ ॥

उन दोनों वेगवान् वीरोंके वेगको विफल करके महाबली हनुमानजी वेगशाली गरुड़ के समान पुनः पृथ्वीपर कूद पड़े ॥ ३१ ॥

स सालवृक्षमासाद्य समुत्पाट्य च वानरः ।

तावुभौ राक्षसौ वीरौ जघान पवनात्मजः ॥ ३२ ॥

वहाँ वानरशिरोमणि पवनकुमारने एक साल - वृक्ष के पास जाकर उसे उखाड़ लिया और उसीके द्वारा उन दोनों राक्षसवीरों को मार डाला ॥ ३२ ॥

ततस्तांस्त्रीन् हताज्ञात्वा वानरेण तरस्विना ।

अभिपेदे महावेगः प्रहस्य प्रघसो बली ॥ ३३ ॥

भासकर्णश्च संक्रुद्धः शूलमादाय वीर्यवान् ।

एकतः कपिशार्दूलं यशस्विनमवस्थितौ ॥ ३४ ॥

उन वेगशाली वानरवीरके द्वारा उन तीनों राक्षसोंको मारा गया देख महान् वेगस युक्त बलवान् वीर प्रस हँसता हुआ उनके पास आया । दूसरी ओरसे पराक्रमी वीर भासकर्ण भी अत्यन्त क्रोधमें भरकर शूल हाथमें लिये वहाँ आ पहुँचा । वे दोनों यशस्वी कपिश्रेष्ठ हनुमान्जीके निकट एक ही ओर खड़े हो गये । ३३-३४ ॥

पट्टिशेन शिताग्रेण प्रघसः प्रत्यपोथयत् ।

भासकर्णश्च शूलेन राक्षसः कपिकुञ्जरम् ॥ ३५ ॥

प्रघसने तेज धारवाले पट्टिशसे तथा राक्षस भासकर्णने शूलसे कपिकुञ्जर हनुमान् जीपर प्रहार किया ॥ ३५ ॥

स ताभ्यां विक्षतैर्गात्रैरसृग्दिग्धतनूरुहः ।

अभवद् वानरः क्रुद्धो बालसूर्यसमप्रभः ॥ ३६ ॥

उन दोनोंके प्रहारोंसे हनुमानजी के शरीर में कई जगह घाव हो गये और उनके शरीरकी रोमावली रक्तसे रँग गयी । उस समय क्रोधमें भरे हुए वानरवीर हनुमान् प्रातः-कालके सूर्यकी भाँति अरुण कान्तिसे प्रकाशित हो रहे थे । समुत्पाट्य गिरेः शृङ्गं समृगव्यालपादपम् ।

जघान हनुमान् वीरो राक्षसौ कपिकुञ्जरः ।

गिरिशृङ्गसुनिष्पिष्टौ तिलशस्तौ बभूवतुः ॥ ३७ ॥

तब मृग, सर्प और वृक्षोंसहित एक पर्वत - शिखरको उखाड़कर कपिश्रेष्ठ वीर हनुमान्ने उन दोनों राक्षसोंपर दे मारा । पर्वत - शिखर के आघातसे वे दोनों पिस गये और उनके शरीर तिलके समान खण्ड - खण्ड हो गये ॥ ३७ ॥

ततस्तेष्ववसन्नेषु सेनापतिषु पञ्चसु ।

बलं तद्द्वशेषं तु नाशयामास वानरः ॥ ३८ ॥

इस प्रकार उन पाँचों सेनापतियों के नष्ट हो जानेपर हनुमानजीने उनकी बची - खुची सेनाका भी संहार आरम्भ किया ॥ ३८ ॥

अश्वैरश्वान् गजैर्नागान् योधैर्योधान् रथैरथान् ।

स कपिर्नाशयामास सहस्राक्ष इवासुरान् ॥ ३ ९ ॥

जैसे देवराज इन्द्र असुरोंका विनाश करते हैं, उसी प्रकार उन वानरवीरने घोड़ोंसे घोड़ोंका, हाथियोंसे हाथियोंका, योद्धाओंसे योद्धाओंका और रथोंसे रथोंका संहार कर डाला ॥ ३ ९ ॥

हयैर्नागैस्तुरंगैश्च भग्नाक्षैश्च महारथैः ।

हतैश्च राक्षसैर्भूमी रुद्धमार्ग समन्ततः ॥ ४० ॥

मरे हुए हाथियों और तीव्रगामी घोड़ोंसे, टूटी हुई धुरीवाले विशाल रथोंसे तथा मारे गये राक्षसोंकी लाशों से वहाँकी सारी भूमि चारों ओरसे इस तरह पट गयी थी कि आने - जाने का रास्ता बंद हो गया था ॥ ४० ॥

ततः कपिस्तान् ध्वजिनीपतीन् रणे निहत्य वीरान् सबलान् सवाहनान् । तथैव वीरः परिगृह्य तोरणं कृतक्षणः काल इव प्रजाक्षये ॥ ४१ ॥

इस प्रकार सेना और वाहनोंसहित उन पाँचों वीर सेनापतियोंको रणभूमिमें मौत के घाट उतारकर महावीर वानर हनुमानजी पुनः युद्धके लिये अवसर पाकर पहले की ही भाँति फाटकपर जाकर खड़े हो गये । उस समय वे प्रजाका संहार करने के लिये उद्यत हुए कालके समान जान पड़ते थे ॥ ४१ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये सुन्दरकाण्डे षट्चत्वारिंशः सर्गः ॥ ४६ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मिंत आरामायण आदिकाव्यके सुन्दरकाण्डमें छियालीसवाँ सर्गं पूरा हुआ ॥ ४६ ॥

सप्तचत्वारिंशः सर्गः रावणपुत्र अक्षकुमारका पराक्रम और वध सेनापतीन् पञ्च स तु प्रमापितान् बैठे हुए पुत्र अक्षकुमार की ओर देखा, जो युद्धमें उद्धत

हनूमता सानुचरान् सवाहनान् । और उसके लिये उत्कण्ठित रहनेवाला था ॥ १ ॥

निशम्य राजा समरोद्धतोन्मुखं स तस्य दृष्ट्यर्पणसम्प्रचोदितः कुमारम प्रसमैक्षताक्षम् ॥ १ ॥ प्रतापवान् काञ्चनचित्रकार्मुकः ।

हनुमान् जीके द्वारा अपने पाँच सेनापतियों को सेवकों और समुत्पपाताथ सदस्युदीरितो वाहनों सहित मारा गया सुनकर राजा रावणने अपने सामने द्विजातिमुख्यैर्हविषेव पावकः ॥ २ ॥

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सुन्दरकाण्डे सप्तचत्वारिंशः सर्गः ९ ८५ पिता के दृष्टिपात मात्र से प्रेरित हो वह प्रतापी वीर युद्धके लिये उत्साहपूर्वक उठा । उसका धनुष सुवर्णजटित होनेके कारण विचित्र शोभा धारण करता था । जैसे श्रेष्ठ ब्राह्मणों-द्वारा यज्ञशाला में हविष्यकी आहुति देनेपर अग्निदेव प्रज्वलित हो उठते हैं, उसी प्रकार वह भी सभा में उठकर खड़ा हो गया ॥ २ ॥

ततो महान् बालदिवाकरप्रभं प्रतप्तजाम्बूनद जालसंततम् । रथं समास्थाय ययौ स वीर्यवान् महाहरिं तं प्रति नैर्ऋतर्षभः ॥ ३ ॥

वह महापराक्रमी राक्षसशिरोमणि अक्ष प्रातःकालीन सूर्यके समान कान्तिमान् तथा तपाये हुए सुवर्णके जालसे आच्छादित रथपर आरूढ़ हो उन महाकपि हनुमानजी के पास चल दिया ॥ ३ ॥

ततस्तपः संग्रह संच यार्जितं प्रतप्तजाम्बूनदजालचित्रितम् । पताकिनं रत्नविभूषितध्वजं मनोजवाष्टाश्ववरैः सुयोजितम् ॥ ४ ॥

सुरासुराधृष्यमसङ्गचारिणं तडित्प्रभं व्योमचरं समाहितम् । सतूणमष्टासिनिबद्धबन्धुरं यथाक्रमावेशितशक्तितोमरम् ॥ ५ ॥

विराजमानं प्रतिपूर्णवस्तुना सहेमदाम्ना शशिसूर्यवर्चसा । दिवाकराभं रथमास्थितस्ततः स निर्जगामामरतुल्यविक्रमः ॥ ६ ॥

वह रथ उसे बड़ी भारी तपस्याओंके संग्रहसे प्राप्त हुआ था । उसमें तपे हुए जाम्बूनद ( सुवर्ण ) की जाली जड़ी हुई थी । पताका फहरा रही थी । उसका ध्वजदण्ड रत्नोंसे विभूषित था । उसमें मनके समान वेगवाले भाठ घोड़े अच्छी तरह जुते हुए थे । देवता और असुर कोई भी उस रथको नष्ट नहीं कर सकते थे । उसकी गति कहीं रुकती नहीं थी । वह बिजली के समान प्रकाशित होता और आकाशमें भी चलता था । उस रथको सब सामग्रियों-से सुसज्जित किया गया था । उसमें तरकस रक्खे गये थे । आठ तलवारोंके बँधे रहने से वह और भी सुन्दर दिखायी देता था । उसमें यथास्थान शक्ति और तोमर आदि अस्त्र-शस्त्र क्रमसे रक्खे गये थे । चन्द्रमा और सूर्यके समान दीप्तिमान् तथा सोनेकी रस्सी से युक्त युद्ध के समस्त उपकरणों-से सुशोभित उस सूर्य तुल्य तेजस्वी रथपर बैठकर देवताओंके तुल्य पराक्रमी अक्षकुमार राजमहलसे बाहर निकला ॥४-६ ॥ स पूरयन् खं च महीं च साचलां तुरङ्गमातङ्गमहारथस्वनैः । वा ० रा ० ५.७.१६-बलैः समेतैः सहतोरणस्थितं समर्थमासीनमुपागमत् कपिम् ॥ ७ ॥

घोड़े, हाथी और बड़े - बड़े रथोंकी भयंकर आवाजसे पर्वतसहित पृथ्वी तथा आकाशको गुँजाता हुआ वह बड़ी भारी सेना साथ लेकर वाटिकाके द्वारपर बैठे हुए शक्तिशाली वीर वानर हनुमान् जी के पास जा पहुँचा ॥ ७ ॥

स तं समासाद्य हरिं छरीक्षणो युगान्तकालाग्निमिव प्रजाक्षये । अवस्थितं विस्मितजातसम्भ्रमं समैक्षताक्षो बहुमानचक्षुषा ॥ ८ ॥

सिंहके समान भयंकर नेत्रवाले अक्षने वहाँ पहुँचकर लोकसंहार के समय प्रज्वलित हुई प्रलयाग्निके समान स्थित और विस्मय एवं सम्भ्रम में पड़े हुए हनुमान्जीको अत्यन्त गर्वभरी दृष्टि से देखा ॥ ८ ॥

स तस्य वेगं च कपेर्महात्मनः पराक्रमं चारिषु रावणात्मजः । विचारयन् स्वं च बलं महाबलो युगक्षये सूर्य इवाभिवर्धत ॥ ९ ॥

उन महात्मा कपिश्रेष्ठ के वेग तथा शत्रुओंके प्रति उनके पराक्रमका और अपने बलका भी विचार करके वह महाबली रावणकुमार प्रलयकालके सूर्य की भाँति बढ़ने लगा ॥ ९ ॥

स जातमन्युः प्रसमीक्ष्य विक्रमं स्थितः स्थिरः संयति दुर्निवारणम् । समाहितात्मा हनुमन्तमाहवे प्रचोदयामास शितैः शरैस्त्रिभिः ॥ १० ॥

हनुमानजी के पराक्रमपर दृष्टिपात करके उसे क्रोध आ गया । अतः स्थिरतापूर्वक स्थित हो उसने एकाग्रचित्त से तीन तीखे बाणोंद्वारा रणदुर्जय हनुमान्जीको युद्ध के लिये प्रेरित किया ॥ १० ॥

ततः कपिं तं प्रसमीक्ष्य गर्वितं जितश्रमं शत्रुपराजयोचितम् । अवेक्षताक्षः समुदीर्णमानसं सबाणपाणिः प्रगृहीतकार्मुकः ॥ ११ ॥

तदनन्तर हाथमें धनुष और बाण लिये अक्षने यह जान-कर कि ' ये खेद या थकावटको जीत चुके हैं, शत्रुओं को पराजित करने की योग्यता रखते हैं और युद्ध के लिये इनके मनका उत्साह बढ़ा हुआ है; इसीलिये ये गर्वीले दिखायी देते हैं उनकी ओर दृष्टिपात किया ॥ ११ ॥

स हेमनिष्काङ्गदचारुकुण्डलः समाससादाशुपराक्रमः कपिम् । तयोर्बभूवाप्रतिमः समागमः सुरासुराणामपि सम्भ्रमप्रदः ॥ १२ ॥

गलेमें सुवर्णके निष्क ( पदक ), बाँहोंमें बाजूबंद और

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९ ८६ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे कानों में मनोहर कुण्डल धारण किये वह शीघ्रपराक्रमी रावण-कुमार हनुमानजी के पास आया । उस समय उन दोनों वीरों-में जो टक्कर हुई, उसकी कहीं तुलना नहीं थी । उनका युद्ध देवताओं और असुरोंके मनमें भी घबराहट पैदा कर देने-वाला था ॥ १२ ॥

रास भूमिर्न तताप भानुमान् ववौ न वायुः प्रचचाल चाचलः । कपेः कुमारस्य च वीर्य संयुगं ननाद च द्यौरुदधिश्च चुक्षुभे ॥ १३ ॥

कपिश्रेष्ठ हनुमान् और अक्षकुमारका वह संग्राम देखकर भूतलके सारे प्राणी चीख उठे । सूर्यका ताप कम हो गया । वायुकी गति रुक गयी । पर्वत हिलने लगे । आकाशमें भयंकर शब्द होने लगा और समुद्र में तूफान आ गया ॥ १३ ॥

स तस्य वीरः सुमुखान् पतत्रिणः

सुवर्णपुङ्खान् सविषानिवोरगान् ।

समाधिसंयोगविमोक्षतत्त्ववि-च्छरानथ त्रीन् कपिमूर्म्य ताडयत् ॥ १४ ॥

अक्षकुमार निशाना साधने, बाणको धनुषपर चढ़ाने और उसे लक्ष्यकी ओर छोड़ने में बड़ा प्रवीण था । उस वीरने विषधर सर्पोंके समान भयंकर, सुवर्णमय पंखोंसे युक्त, सुन्दर अग्रभागवाले तथा पत्रयुक्त तीन बाण हनुमानजी के मस्तकमें मारे ॥ १४ ॥

स तैः शरैर्मूर्ध्नि समं निपातितैः क्षरन्नसृग्दिग्धविवृत्तनेत्रः 1 नवोदितादित्यनिभः शरांशुमान राजतादित्य इवांशुमालिकः ॥ १५ ॥

उन तीनोंकी चोट हनुमान् जीके माथेमें एक साथ ही लगी, इससे खूनकी धारा गिरने लगी । वे उस रक्तसे नहा उठे और उनकी आँखें घूमने लगीं । उस समय बाणरूपी किरणोंसे युक्त हो वे तुरंतके उगे हुए अंशुमाली सूर्य के समान शोभा पाने लगे ॥ १५ ॥

ततः प्लवङ्गाधिपमन्त्रिसत्तमः समीक्ष्य तं राजवरात्मजं रणे । उदग्र चित्रायुधचित्रकार्मुकं जहर्ष चापूर्यत चाहवोन्मुखः ॥ १६ ॥

तदनन्तर वानरराजके श्रेष्ठ मन्त्री हनुमानजी राक्षसराज रावण के राजकुमार अक्षको अति उत्तम विचित्र आयुध एवं अद्भुत धनुष धारण किये देख हर्ष और उत्साहसे भर गये और युद्धके लिये उत्कण्ठित हो अपने शरीरको बढ़ाने लगे ॥ स मन्दराग्रस्थ इवांशुमाली विवृद्धकोपो बलवीर्यसंवृतः । कुमारमक्षं सबलं सवाहनं ददाह नेत्राग्निमरीचिभिस्तदा ॥ १७ ॥

हनुमान् जीका क्रोध बहुत बढ़ा हुआ था । वे बल और पराक्रमसे सम्पन्न थे, अतः मन्दराचलके शिखर पर प्रकाशित होनेवाले सूर्यदेवके समान वे अपनी नेत्राग्निमयी किरणोंसे उस समय सेना और सवारियोंसहित राजकुमार अक्षको दग्ध-सा करने लगे ॥ १७ ॥

ततः स वाणासनशक्रकार्मुकः शरवर्षो युधि राक्षसाम्बुदः । शरान् मुमोचाशु हरीश्वराचले बलाहको वृष्टिमिवाचलोत्तमे ॥ १८ ॥

तत्र जैसे बादल श्रेष्ठ पर्वतपर जल बरसाता है, उसी प्रकार युद्धस्थलमें अपने शरासनरूपी इन्द्र - धनुषसे युक्त वह राक्षसरूपी मेघ बाणवर्षी होकर कपिश्रेष्ठ हनुमानरूपी पर्वतपर बड़े वेगसे बाणोंकी वृष्टि करने लगा ॥ १८ ॥

कपिस्ततस्तं रणचण्डविक्रमं प्रवृद्धते जो बलवीर्य सायकम् । कुमारमक्षं प्रसमीक्ष्य संयुगे ननाद हर्षाद् घनतुल्यनिःस्वनः ॥ १ ९ ॥ रणभूमिमें अक्षकुमारका पराक्रम बड़ा प्रचण्ड दिखायी देता था । उसके तेज, बल, पराक्रम और बाण सभी बढ़े - चढ़े थे । युद्धस्थलमें उसकी ओर दृष्टिपात करके हनुमान् जीने हर्ष और उत्साह में भरकर मेघके समान भयानक गर्जना की ॥ १ ९ ॥ स बालभावाद् युधि वीर्य दर्पितः प्रवृद्धमन्युः क्षतजोपमेक्षणः । समाससादाप्रतिमं रणे कपिं गजो महाकूपमिवावृतं तृणैः ॥ २० ॥

समराङ्गणमें बलके घमंडमें भरे हुए अक्षकुमारको उनकी गर्जना सुनकर बड़ा क्रोध हुआ । उसकी आँखें रक्त के समान लाल हो गयीं । वह अपने बालोचित अज्ञान के कारण अनु-म पराक्रमी हनुमानजीका सामना करने के लिये आगे बढ़ा । ठीक उसी तरह, जैसे कोई हाथी तिनकोंसे ढके हुए विशाल कूपकी ओर अग्रसर होता है ॥ २० ॥

स तेन बाणैः प्रसभं निपातितै-चकार नादं घननादनिःस्वनः । समुत्सहेनाशु नभः समारुजन् भुजोरुविक्षेपण घोरदर्शनः ॥ २१ ॥

उसके बलपूर्वक चलाये हुए बाणोंसे विद्ध होकर हनुमान् जीने तुरंत ही उत्साहपूर्वक आकाशको विदीर्ण करते हुए - से मेघ के समान गम्भीर स्वर से भीषण गर्जना की । उस समय दोनों भुजाओं और जाँघोंको चलानेके कारण वे बड़े भयंकर दिखायी देते थे ॥ २१ ॥

तमुत्पतन्तं समभिद्रवद् बली स राक्षसानां प्रवरः प्रतापवान् ।

पृष्ठ 164

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सुन्दरकाण्डे सप्तचत्वारिंशः सर्गः ९ ८७ रथी रथश्रेष्ठतरः किरञ्छरैः पयोधरः शैलमिवाश्मवृष्टिभिः ॥ २२ ॥

उन्हें आकाशमें उछलते देख रथियोंमें श्रेष्ठ और रथपर चढ़े हुए उस बलवान्, प्रतापी एवं राक्षसशिरोमणि वीरने बाणों की वर्षा करते हुए उनका पीछा किया । उस समय वह ऐसा जान पड़ता था मानो कोई मेघ किसी पर्वतपर ओले और पत्थरोंकी वर्षा कर रहा हो ॥ २२ ॥

सताञ्छरांस्तस्य हरिर्विमोक्षयं-विचार वीरः पथि वायुसेविते । शरान्तरे मारुतवद् विनिष्पतन् मनोजवः संयति भीमविक्रमः ॥ २३ ॥

उस युद्धस्थलमें मनके समान वेगवाले वीर हनुमानजी भयंकर पराक्रम प्रकट करने लगे । वे अक्षकुमारके उन बाणों को व्यर्थ करते हुए वायुके पथपर विचरते और दो बाणों के बीचसे हवाकी भाँति निकल जाते थे ॥ २३ ॥

तमात्तबाणासनमाहवोन्मुखं खमास्तृणन्तं विविधैः शरोत्तमैः । अवेक्षताक्षं बहुमानचक्षुषा जगाम चिन्तां स च मारुतात्मजः ॥ २४ ॥

भक्षकुमार हाथमें धनुष लिये युद्धके लिये उन्मुख हो नाना प्रकारके उत्तम बाणोंद्वारा आकाशको आच्छादित किये देता था । पवनकुमार हनुमान्ने उसे बड़े आदरकी दृष्टिसे देखा और वे मन - ही - मन कुछ सोचने लगे ॥ २४ ॥

ततः शरैर्भिन्नभुजान्तरः कपिः कुमारवर्येण महात्मना नदन् । महाभुजः कर्मविशेषतत्त्वविद् विचिन्तयामास रणे पराक्रमम् ॥ २५ ॥

इतने ही में महामना वीर अक्षकुमारने अपने बाणोंद्वारा कपिश्रेष्ठ हनुमानजी की दोनों भुजाओंके मध्यभाग - छाती में गहरा आघात किया । वे महाबाहु वानरवीर समयोचित कर्तव्यविशेषको ठीक - ठीक जानते थे; अतः वे रणक्षेत्र में उस चोटको सहकर सिंहनाद करते हुए उसके पराक्रम के विषय में इस प्रकार विचार करने लगे - ॥ २५ ॥

अबालवद् बालदिवाकरप्रभः करोत्ययं कर्म महन्महाबलः । न चास्य सर्वाइव कर्मशालिनः प्रमापणे मे मतिरत्र जायते ॥ २६ ॥

' यह महाबली अक्षकुमार बालसूर्यके समान तेजस्वी है । और बालक होकर भी बड़ोंके समान महान् कर्म कर रहा है । युद्धसम्बन्धी समस्त कर्मोंमें कुशल होनेके कारण अद्भुत शोभा पानेवाले इस वीरको यहाँ मार डालनेकी मेरी इच्छा नहीं हो रही है ॥ २६ ॥

अयं महात्मा च महांश्च वीर्यतः समाहितश्चातिसद्दश्च संयुगे । असंशयं कर्मगुणोदयादयं नागयक्षैर्मुनिभिश्च पूजितः ॥ २७ ॥

" यह महामनस्वी राक्षसकुमार बल - पराक्रमकी दृष्टि महान् है । युद्ध में सावधान एवं एकाग्रचित्त है तथा शत्रुके वेगको सहन करने में अत्यन्त समर्थ है । अपने कर्म और गुणोंकी उत्कृष्टता के कारण यह नागों पक्षों और मुनियोंके द्वारा भी प्रशंसित हुआ होगा, इसमें संशय नहीं है ॥ २७ ॥

पराक्रमोत्साह विवृद्धमानसः समीक्षते मां प्रमुखोऽग्रतः स्थितः । पराक्रमो ह्यस्य मनांसि कम्पयेत् सुरासुराणामपि शीघ्रकारिणः ॥ २८ ॥

' पराक्रम और उत्साह से इसका मन बढ़ा हुआ है । यह युद्ध के मुहाने पर मेरे सामने खड़ा हो मुझे ही देख रहा है । शीघ्रतापूर्वक युद्ध करनेवाले इस वीरका पराक्रम देवताओं और असुरोंके हृदयको भी कम्पित कर सकता है ॥ २८ ॥

न खल्वयं नाभिभवेदुपेक्षितः पराक्रमो ह्यस्य रणे विवर्धते । प्रमापणं ह्यस्य ममाद्य रोचते न वर्धमानोऽग्निरूपेक्षितुं क्षमः ॥ २ ९ ॥ " किंतु यदि इसकी उपेक्षा की गयी तो यह मुझे परास्त किये बिना नहीं रहेगा; क्योंकि संग्राम में इसका पराक्रम बढ़ता जा रहा है । अतः अब इसे मार डालना ही मुझे अच्छा जान पड़ता है । बढ़ती हुई आगकी उपेक्षा करना कदापि उचित नहीं है ' ॥ २ ९ ॥ इति प्रवेगं तु परस्य तर्कयन् स्वकर्मयोगं च विधाय वीर्यवान् । चकार वेगं तु महाबलस्तदा मति च चक्रेऽस्य वधे तदानीम् ॥ ३० ॥

इस प्रकार शत्रुके वेगका विचार कर उसके प्रतीकार के लिये अपने कर्तव्यका निश्चय करके महान् बल और पराक्रमसे सम्पन्न हनुमान् जीने उस समय अपना वेग बढ़ाया और उस शत्रुको मार डालने का विचार किया ॥ ३० ॥

स तस्य तानष्ट वरान् महाहयान् समाहितान् भारसहान् विवर्तने । जघान वीरः पथि वायु सेविते तलप्रहारैः पवनात्मजः कपिः ॥ ३१ ॥

तत्पश्चात् आकाश में विचरते हुए वीर वानर पवनकुमारने थप्पड़ोंकी मारसे अक्षकुमार के उन आठों उत्तम और विशाल घोड़ों को, जो भार सहन करने में समर्थ और नाना प्रकार के पैंतरे बदलने की कला में सुशिक्षित थे, यमलोक पहुँचा दिया ॥

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९ ८८ श्रीमवाल्मीकीय रामायणे ततस्तलेनाभिहतो महारथः स तस्य पिङ्गाधिपमन्त्रिनिर्जितः । स भग्ननीडः परिवृत्तकूबरः पपात भूमौ हतवाजिरम्बरात् ॥ ३२ ॥

तदनन्तर वानरराज सुग्रीवके मन्त्री हनुमानजीने अक्ष-कुमार के उस विशाल रथको भी अभिभूत कर दिया, उन्होंने हाथसे ही पीटकर रथकी बैठक तोड़ डाली और उसके हरसे-को उलट दिया । घोड़े तो पहले ही मर चुके थे, अतः वह महान् रथ आकाशसे पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥ ३२ ॥

स तं परित्यज्य महारथो रथं सकार्मुकः खङ्गधरः खमुत्पतन् । ततोऽभियोगादृषिरुग्रवीर्यवान् विहाय देहं मरुतामिवालयम् ॥ ३३ ॥

उस समय महारथी अक्षकुमार धनुष और तलवार ले रथ छोड़कर अन्तरिक्ष में ही उड़ने लगा । ठीक वैसे ही, जैसे कोई उग्रशक्ति से सम्पन्न महर्षि योगमार्गसे शरीर त्यागकर स्वर्गलोककी ओर चला जा रहा हो ॥ ३३ ॥

कपिस्ततस्तं विचरन्तमम्बरे पतत्त्रिराजानिलसिद्धसेविते । समेत्य तं मारुतवेगविक्रमः क्रमेण जग्राह च पादयोर्दृढम् ॥ ३४ ॥

तब वायुके समान वेग और पराक्रमवाले कपिवर हनुमान् जीने पक्षिराज गरुड, वायु तथा सिद्धोंसे सेवित व्योम-मार्ग में विचरते हुए उस राक्षसके पास पहुँचकर क्रमशः उसके दोनों पैर दृढ़तापूर्वक पकड़ लिये ॥ ३४ ॥

स तं समाविध्य सहस्रशः कपि-महोरगं गृह्य इवाण्डजेश्वरः । मुमोच वेगात् पितृतुल्यविक्रमो महीतले संयति वानरोत्तमः ॥ ३५ ॥

फिर तो अपने पिता वायु देवताके तुल्य पराक्रमी वानर-शिरोमणि हनुमान् ने जिस प्रकार गरुड़ बड़े - बड़े सर्पों को घुमाते हैं, उसी तरह उसे हजारों बार घुमाकर बड़े वेगसे उस युद्ध-भूमिमें पटक दिया ॥ ३५ ॥

स भग्नबाहूरुकटी पयोधरः क्षरन्नसृनिर्मथितास्थिलोचनः । सम्भिन्नसंधिः प्रविकीर्ण बन्धनो इतः क्षितौ वायुसुतेन राक्षसः ॥ ३६ ॥

नीचे गिरते ही उसकी भुजा, जाँघ, कमर और छाती के टुकड़े - टुकड़े हो गये, खूनकी धारा बहने लगी, शरीरकी हड्डियाँ चूर - चूर हो गयीं, आँखें बाहर निकल आयीं, अस्थियोंके जोड़ टूट गये और नस - नाड़ियोंके बन्धन शिथिल हो गये । इस तरह वह राक्षस पवनकुमार हनुमानजीके हाथसे मारा गया ॥ ३६ ॥

महाकपिर्भूमितले निपीड्य तं चकार रक्षोऽधिपतेर्महद्भयम् । महर्षिभिश्चक्रचरैः समागतैः

समेत्य भूतैश्च सयक्षपन्नगैः ।

सुरैश्व सेन्द्रैर्भृशजातविस्मयै-हते कुमारे स कपिर्निरीक्षितः ॥ ३७ ॥

अक्ष कुमारको पृथ्वीपर पटककर महाकपि हनुमानजी ने राक्षसराज रावणके हृदयमें बहुत बड़ा भय उत्पन्न कर दिया । उसके मारे जानेपर नक्षत्र - मण्डल में विचरनेवाले महर्षियों, यक्षों, नागों, भूतों तथा इन्द्रसहित देवताओंने वहाँ एकत्र होकर बड़े विस्मयके साथ हनुमान् जीका दर्शन किया ॥ ३७ ॥

निहत्य तं वज्रिसुतोपमं रणे कुमारमक्षं क्षतजोपमेक्षणम् । तदेव वीरोऽभिजगाम तोरणं कृतक्षणः काल श्व प्रजाक्षये ॥ ३८ ॥

युद्ध में इन्द्रपुत्र जयन्तके समान पराक्रमी और लाल - लाल आँखवाले अक्षकुमारका काम तमाम करके वीरवर हनुमान्-जी प्रजाके संहार के लिये उद्यत हुए कालकी भाँति पुनः युद्ध-की प्रतीक्षा करते हुए वाटिका के उसी द्वारपर जा पहुँचे ॥ ३८ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये सुन्दरकाण्डे सप्तचत्वारिंशः सर्गः ॥ ४७ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आरामायण आदिकाम्यके सुन्दरकाण्ड में सैंतालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ४७ ॥

अष्टचत्वारिंशः सर्गः इन्द्रजित् और हनुमान् जीका युद्ध, उसके दिव्यास्त्रके बन्धन में बँधकर हनुमान जी का रावणके दरबार में उपस्थित होना ततस्तु रक्षोऽधिपतिर्महात्मा तदनन्तर हनुमान जीके द्वारा अक्षकुमारके मारे जानेपर हनूमताक्षे निहते कुमारे । राक्षसों का स्वामी महाकाय रावण अपने मनको किसी तरह मनः समाधाय स देवकल्पं सुस्थिर करके रोषसे जल उठा और देवताओंके तुल्य पराक्रमी समादिदेशेन्द्रजितं सरोषः ॥ १ ॥ कुमार इन्द्रजित् ( मेघनाद ) को इस प्रकार आज्ञा दी - ॥

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सुन्दरकाण्डे अष्टचत्वारिंशः सर्गः ९ ८ ९ त्वमस्त्रविच्छस्त्रभृतां वरिष्ठः सुरासुराणामपि शोकदाता । सुरेषु सेन्द्रेषु च दृष्टकर्मा पितामहाराधनसंचितास्त्रः ॥ २ ॥

' बेटा! तुमने ब्रह्माजी की आराधना करके अनेक प्रकार-के अस्त्रों का ज्ञान प्राप्त किया है । तुम अस्त्रवेत्ता, शस्त्र-धारियोंमें श्रेष्ठ तथा देवताओं और असुरोंको भी शोक प्रदान करनेवाले हो । इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवताओंके समुदायमें तुम्हारा पराक्रम देखा गया है । २ ॥

त्वदस्त्रबलमासाद्य ससुराः समरुद्गणाः ।

न शेकुः समरे स्थातुं सुरेश्वरसमाश्रिताः ॥ ३ ॥

' इन्द्रके आश्रयमें रहनेवाले देवता और मरुद्गण भी समरभूमिमें तुम्हारे अस्त्र बलका सामना होनेपर टिक नहीं सके हैं ॥ ३ ॥

न कश्चित् त्रिषु लोकेषु संयुगेन गतश्रमः ।

भुजवीर्याभिगुप्तश्च तपसा चाभिरक्षितः ।

देशकालप्रधानश्च त्वमेव मतिसत्तमः ॥ ४ ॥

' तीनों लोकों में तुम्हारे सिवा दूसरा कोई ऐसा नहीं है, जो युद्धसे थकता न हो । तुम अपने बाहुबलसे तो सुरक्षित हो ही, तपस्या के बलसे भी पूर्णतः निरापद हो । देश-कालका ज्ञान रखनेवालोंमें प्रधान और बुद्धिकी दृष्टि से भी सर्वश्रेष्ठ तुम्हीं हो ॥ ४ ॥

न तेऽस्त्यशक्यं समरेषु कर्मणां न तेऽस्त्य कार्य मतिपूर्वमन्त्रणे । न सोऽस्ति कश्चित् त्रिषु संग्रहेषु न वेद यस्तेऽस्त्रबलं बलं च ॥ ५ ॥

' युद्ध में तुम्हारे वीरोचित कर्मोंके द्वारा कुछ भी असाध्य नहीं है । शास्त्रानुकूल बुद्धिपूर्वक राजकार्य का विचार करते समय तुम्हारे लिये कुछ भी असम्भव नहीं है । तुम्हारा कोई भी विचार ऐसा नहीं होता, जो कार्यका साधक न हो । त्रिलोकी-में एक भी ऐसा वीर नहीं है, जो तुम्हारी शारीरिक शक्ति और अस्त्र बलको न जानता हो ॥ ५ ॥

ममानुरूपं तपसो बलं च ते पराक्रमश्चास्त्रबलं च संयुगे । न त्वां समासाद्य रणावमर्दे मनः श्रमं गच्छति निश्चितार्थम् ॥ ६ ॥

' तुम्हारा तपोबल, युद्धविषयक पराक्रम और अस्त्र-बल मेरे ही समान है । युद्धस्थलमें तुमको पाकर मेरा मन कभी खेद या विषादको नहीं प्राप्त होता; क्योंकि इसे यह निश्चित विश्वास रहता है कि विजय तुम्हारे पक्षमें होगी ॥६ ॥

निहताः किंकराः सर्वे जम्बुमाली च राक्षसः ।

अमात्यपुत्रा वीराश्च पश्ञ्च सेनाग्रगामिनः ॥ ७ ॥

' देखो, किंकर नामवाले समस्त राक्षस मार डाले गये । जम्बुमाली नामका राक्षस भी जीवित न रह सका, मन्त्री के सातों वीर पुत्र तथा मेरे पाँच सेनापति भी कालके गाल में चले गये ॥ ७ ॥

बलानि सुसमृद्धानि साश्वनागरथानि च ।

सहोदरस्ते दयितः कुमारोऽक्षश्च सूदितः ।

न तु तेष्वेव मे सारो यस्त्वय्यरिनिषूदन ॥ ८ ॥

' उनके साथ ही हाथी, घोड़े और रथोसहित मेरी बहुत - सी बल - वीर्यसे सम्पन्न सेनाएँ भी नष्ट हो गयीं और तुम्हारा प्रिय बन्धु कुमार अक्ष भी मार डाला गया । शत्रु-सूदन! मुझमें जो तीनों लोकोंपर विजय पाने की शक्ति है, वह तुम्हीं में है । पहले जो लोग मारे गये हैं, उनमें वह शक्ति नहीं थी ( इसलिये तुम्हारी विजय निश्चित है ) ॥ ८ ॥

इदं च दृष्ट्वा निहतं महद् बलं कपेः प्रभावं च पराक्रमं च । त्वमात्मनश्चापि निरीक्ष्य सारं कुरुष्व वेगं खबलानुरूपम् ॥ ९ ॥

' इस प्रकार अपनी विशाल सेनाका संहार और उस वानरका प्रभाव एवं पराक्रम देखकर तुम अपने बलका भी विचार कर लो; फिर अपनी शक्ति के अनुसार उद्योग करो ॥ बलावमर्दस्त्वयि संनिकृष्टे यथा गते शाम्यति शान्तरात्रौ 1 । तथा समीक्ष्यात्मबलं परं च समारभखास्त्रभृतां वरिष्ठ ॥ १० ॥

' शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ वीर! तुम्हारे सब शत्रु शान्त हो चुके हैं । तुम अपने और पराये बलका विचार करके ऐसा प्रयत्न करो, जिससे युद्धभूमिके निकट तुम्हारे पहुँचते ही मेरी सेनाका विनाश रुक जाय ॥ १० ॥

न वीर सेना गणशो व्यवन्ति न वज्रमादाय विशालसारम् । न मारुतस्यास्ति गतिप्रमाणं न चाग्निकल्पः करणेन हन्तुम् ॥ ११ ॥

' वीरवर! तुम्हें अपने साथ सेना नहीं ले जानी चाहिये; क्योंकि वे सेनाएँ समूह - की- समूह या तो भाग जाती हैं या मारी जाती हैं । इसी तरह अधिक तीक्ष्णता और कठोरता से युक्त वज्र लेकर भी जाने की कोई आवश्यकता नहीं है ( क्योंकि उसके ऊपर वह भी व्यर्थ सिद्ध हो चुका है ) । उस वायुपुत्र हनुमान्की गति अथवा शक्तिका कोई माप - तोल या सीमा नहीं है । वह अग्नि - तुल्य तेजस्वी वानर किसी साधनविशेष-से नहीं मारा जा सकता ॥ ११ ॥

तमेवमर्थ प्रसमीक्ष्य लम्यक् स्वकर्मसाम्याद्धि समाहितात्मा । स्मरंश्च दिव्यं धनुषोऽस्य वीर्य व्रजाक्षतं कर्म समारभस्व ॥ १२ ॥

पृष्ठ 167

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श्रीमवाल्मीकीय रामायणे ' इन सब बातोंका अच्छी तरह विचार करके प्रतिपक्षीमें अपने समान ही पराक्रम समझ कर तुम अपने चित्तको एकाग्र कर लो - सावधान हो जाओ । अपने इस धनुष के दिव्य प्रभावको याद रखते हुए आगे बढ़ो और ऐसा पराक्रम करके दिखाओ, जो खाली न जाय ॥ १२ ॥

न खल्वियं मतिश्रेष्ठ यत्त्वां सम्प्रेषयाम्यहम् ।

इयं च राजधर्माणां क्षत्रस्य च मतिर्मता ॥ १३ ॥

' उत्तम बुद्धिवाले वीर! मैं तुम्हें जो ऐसे संकटमें भेज रहा हूँ, यह यद्यपि ( स्नेहकी दृष्टिसे ) उचित नहीं है, तथापि मेरा यह विचार राजनीति और क्षत्रिय धर्म के अनुकूल है ॥ १३ ॥

नानाशास्त्रेषु संग्रामे वैशारद्यमरिंदम ।

अवश्यमेव बोद्धव्यं काम्यश्च विजयो रणे ॥ १४ ॥

' शत्रुदमन | वीर पुरुषको संग्राममें नाना प्रकार के शस्त्र-की कुशलता अवश्य प्राप्त करनी चाहिये, साथ ही युद्धमें विजय पाने की भी अभिलाषा रखनी चाहिये ' ॥ १४ ॥

ततः पितुस्तद्वचनं निशम्य प्रदक्षिणं दक्ष सुतप्रभावः । चकार भर्तारमतित्वरेण रणाय वीरः प्रतिपन्नबुद्धिः ॥ १५ ॥

अपने पिता राक्षसराज रावणके इस वचनको सुनकर देवताओंके समान प्रभावशाली वीर मेघनादने युद्ध के लिये निश्चित विचार करके जल्दीसे अपने स्वामी रावणकी परिक्रमा की ॥ १५ ॥

ततस्तैः स्वगणैरिष्ठैरिन्द्रजित् प्रतिपूजितः ।

युद्धोद्धतकृतोत्साहः संग्रामं सम्प्रपद्यत ॥ १६ ॥

तत्पश्चात् सभा में बैठे हुए अपने दलके प्रिय राक्षसों-द्वारा भूरि - भूरि प्रशंसित हो इन्द्रजित् विकट युद्ध के लिये मन में उत्साह भरकर संग्रामभूमि की ओर जानेको उद्यत हुआ ।

श्रीमान् पद्मविशालाक्षो राक्षसाधिपतेः सुतः ।

निर्जगाम महातेजाः समुद्र इव पर्वणि ॥ १७ ॥

उस समय प्रफुल्ल कमलदल के समान विशाल नेत्रोंवाला राक्षसराज रावणका पुत्र महातेजस्वी श्रीमान् इन्द्रजित् पर्वके दिन उमड़े हुए समुद्र के समान विशेष हर्ष और उत्साहसे पूर्ण हो राजमहल से बाहर निकला ॥ १७ ॥

स पक्षिराजोपमतुल्यवेगै-त्रैश्चतुर्भिः स तु तीक्ष्णदंष्ट्रैः । रथं समायुक्तम सह्यवेगः समारुरोहेन्द्रजिदिन्द्र कल्पः ॥ १८ ॥

जिसका वेग शत्रुओंके लिये असह्य था, वह इन्द्रके समान पराक्रमी मेघनाद पक्षिराज गरुड़ के समान तीव्र गति तथा तीखे दाढ़ोंवाले चार सिंहोंसे जुते हुए उत्तम रथपर आरूढ़ हुआ ॥ १८ ॥

सरथी धन्धिनां श्रेष्ठः शस्त्रशोऽस्त्रविदां वरः ।

रथेनाभिययौ क्षिप्रं हनूमान् यत्र सोऽभवत् ॥ १ ९ ॥

अस्त्र - शस्त्रोंका ज्ञाता, अस्त्रवेत्ताओं में अग्रगण्य और धनुर्धरोंमें श्रेष्ठ वह रथी वीर रथके द्वारा शीघ्र उस स्थानपर गया, जहाँ हनुमान् जी उसकी प्रतीक्षा में बैठे थे ॥ १ ९ ॥

स तस्य रथनिर्घोषं ज्यास्वनं कार्मुकस्य च ।

निशम्य हरिवीरोऽसौ सम्प्रहृष्टतरोऽभवत् ॥ २० ॥

उसके रथकी घर्घराहट और धनुषकी प्रत्यञ्चाका गम्भीर घोष सुनकर वानरवीर हनुमानजी अत्यन्त हर्ष और उत्साहसे भर गये ॥ २० ॥

इन्द्रजिच्चापमादाय शितशल्यांश्च सायकान् ।

हनूमन्तमभिप्रेत्य जगाम रणपण्डितः ॥ २१ ॥

इन्द्रजित् युद्ध की कला में प्रवीण था । वह धनुष और तीखे अग्रभागवाले सायकों को लेकर हनुमान् जीको लक्ष्य करके आगे बढ़ा ॥ २१ ॥

तस्मिंस्ततः संयति जातहर्षे

रणाय निर्गच्छति बाणपाणी ।

दिशश्च सर्वाः कलुषा बभूवु-मृगाश्च रौद्रा बहुधा विनेदुः ॥ २२ ॥

हृदयमें हर्ष और उत्साह तथा हाथोंमें बाण लेकर वह ज्यों ही युद्धके लिये निकला, त्यों ही सम्पूर्ण दिशाएँ मलिन हो गयीं और भयानक पशु नाना प्रकारसे आर्तनाद करने लगे ॥ २२ ॥

समागतास्तत्र तु नागयक्षा महषर्यश्चक्रचराश्च सिद्धाः । नभः समावृत्य च पक्षिसङ्घा विनेदुरुच्चैः परमप्रहृष्टाः ॥ २३ ॥

उस समय वहाँ नाग, यक्ष, महर्षि और नक्षत्र - मण्डल में विचरनेवाले सिद्धगण भी आ गये । साथ ही पक्षियोंके समुदाय भी आकाशको आच्छादित करके अत्यन्त हर्षमें भरकर उच्चस्वरसे चहचहाने लगे ॥ २३ ॥

आयान्तं स रथं दृष्ट्वा तूर्णमिन्द्रध्वजं कपिः ।

ननाद च महानादं व्यवर्धत च वेगवान् ॥ २४ ॥

इन्द्राकार चिह्नवाली ध्यासे सुशोभित रथपर बैठकर शीघ्रतापूर्वक आते हुए मेघनादको देखकर वेगशाली वानर-वीर हनुमान्ने बड़े जोर से गर्जना की और अपने शरीरको बढ़ाया ॥ २४ ॥

इन्द्रजित् स रथं दिव्यमाश्रितश्चित्रकार्मुकः ।

धनुर्विस्फारयामास तडिदूर्जितनिःस्वनम् ॥ २५ ॥

उस दिव्य रथपर बैठकर विचित्र धनुष धारण करनेवाले इन्द्रजित्ने बिजलीकी गड़गड़ाहट के समान टंकार करनेवाले अपने धनुषको खींचा ॥ २५ ॥

पृष्ठ 168

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सुन्दरकाण्डे अष्टचत्वारिंशः सर्गः ९९ १ ततः समेतावतितीक्ष्णवे महाबलौ तौ रणनिर्विशङ्कौ । कपिश्च रक्षोऽधिपते स्तनूजः सुरासुरेन्द्राविव बद्धवैरौ ॥ २६ ॥

फिर तो अत्यन्त दुःसह वेग और महान् बलसे सम्पन्न हो युद्ध में निर्भय होकर आगे बढ़नेवाले वे दोनों वीर कपिवर हनुमान् तथा राक्षसराजकुमार मेघनाद परस्पर वैर बाँधकर देवराज इन्द्र और दैत्यराज बलिकी भाँति एक दूसरेसे भिड़ गये ॥ २६ ॥

स तस्य वीरस्य महारथस्य

धनुष्मतः संयति सम्मतस्य ।

शरप्रवेगं व्यहनत् प्रवृद्ध-चचार मार्गे पितुरप्रमेयः ॥ २७ ॥

अप्रमेय शक्तिशाली हनुमानजी विशाल शरीर धारण करके अपने पिता वायुके मार्गपर विचरने और युद्ध में सम्मानित होनेवाले उस धनुर्धर महारथी राक्षसवीर के बाणोंके महान् वेगको व्यर्थ करने लगे ॥ २७ ॥

ततः शरानायततीक्ष्णशल्यान् सुपत्रिणः काञ्चनचित्रपुङ्खान् । मुमोच वीरः परवीरहन्ता सुसंततान् वज्रसमानवेगान् ॥ २८ ॥

इतनेही में शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले इन्द्रजित्ने बड़ी और तीखी नोक तथा सुन्दर परोंवाले, सोनेकी विचित्र पंखों से सुशोभित और वज्रके समान वेगशाली बाणोंको लगा-तार छोड़ना आरम्भ किया ॥ २८ ॥

ततः स तत्स्यन्दननिःस्वनं च मृदङ्गभेरीपटहस्वनं च । विकृष्यमाणस्य च कार्मुकस्य निशम्य घोषं पुनरुत्पपात ॥ २ ९ ॥ उस समय उसके रथकी घर्घराहट, मृदङ्ग, भेरी और पटह आदि बाजोंके शब्द एवं खींचे जाते हुए धनुषकी टंकार सुनकर हनुमान् जी फिर ऊपर की ओर उछले ॥ २ ९ ॥

शराणामन्तरेष्वाशु व्यावर्तत महाकपिः ।

हरिस्तस्याभिलक्ष्यस्य मोक्षयंल्लक्ष्यसंग्रहम् ॥ ३० ॥

ऊपर जाकर वे महाकपि वानरवीर लक्ष्य बेघनेमें प्रसिद्ध मेघनाद के साधे हुए निशानेको व्यर्थ करते हुए उसके छोड़े हुए बाणोंके बीचसे शीघ्रतापूर्वक निकलकर अपने को बचाने लगे ॥ ३० ॥

शराणामग्रतस्तस्य पुनः समभिवर्तत ।

प्रसार्य हस्तौ हनुमानुत्पपातानिलात्मजः ॥ ३१ ॥

वे पवनकुमार हनुमान् बारंबार उसके बाणोंके सामने आकर खड़े हो जाते और फिर दोनों हाथ फैलाकर बात - की-बातमें उड़ जाते थे ॥ ३१ ॥

तावुभौ वेगसम्पन्नौ रणकर्मविशारदौ ।

सर्वभूतमनोग्राि चक्रतुर्युद्धमुत्तमम् ॥ ३२ ॥

वे दोनों वीर महान् वेगसे सम्पन्न तथा युद्ध करने की कलामें चतुर थे 1 । वे सम्पूर्ण भूतों के चित्तको आकर्षित करने -वाला उत्तम युद्ध करने लगे ॥ ३२ ॥

हनूमतो वेद म राक्षसोऽन्तरं न मारुतिस्तस्य महात्मनोऽन्तरम् । परस्परं निर्विषहौ बभूवतुः समेत्य तौ देवसमानविक्रमौ ॥ ३३ ॥

वह राक्षस हनुमान्जीपर प्रहार करनेका अवसर नहीं पाता था और पवनकुमार हनुमान् जी भी उस महामनस्वी वीरको घर दबानेका मौका नहीं पाते थे । देवताओंके समान पराक्रमी वे दोनों वीर परस्पर भिड़कर एक दूसरे के लिये दुःसह हो उठे थे ॥ ३३ ॥

ततस्तु लक्ष्ये स विहन्यमाने शरेष्वमोघेषु च सम्पतत्सु । जगाम चिन्तां महतीं महात्मा समाधिसंयोगसमाहितात्मा ॥ ३४ ॥

लक्ष्यवेधके लिये चलाये हुए मेघनाद के वे अमोघ बाण भी जब व्यर्थ होकर गिर पड़े, तब लक्ष्यपर बाणका संधान करने में सदा एकाग्रचित्त रहनेवाले उस महामनस्वी वीरको बड़ी चिन्ता हुईं ॥ ३४ ॥

ततो मर्ति राक्षसराजसूनु-चकार तस्मिन् हरिवीरमुख्ये । अवध्यतां तस्य कपेः समीक्ष्य कथं निगच्छेदिति निग्रहार्थम् ॥ ३५ ॥

उन कपिश्रेष्ठको अवश्य समझकर राक्षसराजकुमार मेघ-नाद वानरवीरोंमें प्रमुख हनुमानजी के विषयमें यह विचार करने लगा कि ' इन्हें किसी तरह कैद कर लेना चाहिये, परंतु ये मेरी पकड़में आ कैसे सकते हैं? ' ॥ ३५ ॥

ततः पैतामहं वीरः सोऽस्त्रमस्त्रविदां वरः ।

संदधे सुमहातेजास्तं हरिप्रवरं प्रति ॥ ३६ ॥

फिर तो अस्त्रवेत्ताओं में श्रेष्ठ उस महातेजस्वी वीरने उन कपिश्रेष्ठको लक्ष्य करके अपने धनुषपर ब्रह्माजीके दिये हुए अस्त्रका संघान किया ॥ ३६ ॥

अवध्योऽयमिति ज्ञात्वा तमस्त्रेणास्त्रतत्त्ववित् ।

निजग्राह महाबाहुं मारुतात्मजमिन्द्रजित् ॥ ३७ ॥

अस्त्रतत्व के ज्ञाता इन्द्रजित्ने महाबाहु पवनकुमारको अवध्य जानकर उन्हें उस अस्त्रसे बाँध लिया ॥ ३७ ॥

तेन बद्धस्ततोऽस्त्रेण राक्षसेन स वानरः ।

अभवन्निर्विचेष्टश्च पपात च महीतले ॥ ३८ ॥

राक्षसद्वारा उस अस्त्रसे बाँध लिये जानेपर वानरवीर हनुमानजी निश्चेष्ट होकर पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ ३८ ॥

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९९ २ श्रीमद्द्वाल्मीकीयरामायणे ततोऽथ बुद्ध्वा स तदस्त्रबन्धं स निश्चितार्थः परवीरहन्ता प्रभोः प्रभावाद् विगताल्पवेगः । समीक्ष्यकारी विनिवृत्तचेष्टः । पितामहानुग्रहमात्मनश्च परैः प्रसह्याभिगतैर्निगृह्य • विचिन्तयामास हरिप्रवीरः ॥ ३ ९ ॥ ननाद तैस्तैः परिभर्त्स्यमानः ॥ ४५ ॥

अपने को ब्रह्मास्त्र से बँधा हुआ जानकर भी उन्हीं भगवान् ऐसा निश्चय करके विचारपूर्वक ब्रह्मा के प्रभावसे हनुमानजी को थोड़ी - सी भी पीड़ाका अनुभव नहीं हुआ । वे प्रमुख वानरवीर अपने ऊपर ब्रह्माजी के महान् अनुग्रहका विचार करने लगे ॥ ३ ९ ॥

ततः स्वायम्भुवैर्मन्त्रैर्ब्रह्मास्त्रं चाभिमन्त्रितम् ।

हनूमांश्चिन्तयामास वरदानं पितामहात् ॥ ४० ॥

जिन मन्त्रोंके देवता साक्षात् स्वयम्भू ब्रह्मा हैं, उनसे अभिमन्त्रित हुए उस ब्रह्मास्त्रको देखकर हनुमान्जीको पितामह ब्रह्मासे अपने लिये मिले हुए वरदानका स्मरण हो आया ( ब्रह्माजीने उन्हें वर दिया था कि मेरा अस्त्र तुम्हें एक ही मुहूर्तमें अपने बन्धन से मुक्त कर देगा ) ॥ ४० ॥

न मेऽस्य बन्धस्य च शक्तिरस्ति विमोक्षणे लोकगुरोः प्रभावात् । इत्येवमेवं विहितोऽत्रबन्धो मयाऽऽत्मयोनेरनुवर्तितव्यः ॥ ४१ ॥

फिर वे सोचने लगे ' लोकगुरु ब्रह्मा के प्रभावसे मुझमें इस अस्त्रके बन्धनसे छुटकारा पाने की शक्ति नहीं है — ऐसा मान-कर ही इन्द्रजित्ने मुझे इस प्रकार बाँधा है, तथापि मुझे भगवान् ब्रह्मा के सम्मानार्थ इस अस्त्रबन्धनका अनुसरण करना चाहिये ' ॥ ४१ ॥

स वीर्यमस्त्रस्य कपिर्विचार्य पितामहानुग्रहमात्मनश्च विमोक्षशकिं परिचिन्तयित्वा पितामहाशामनुवर्तते कपिश्रेष्ठ हनुमानजीने उस अस्त्रकी शक्ति, पितामहकी कृपा तथा अपने में उसके बन्धन से I स्म ॥ ४२ ॥

अपने ऊपर छूट जाने की सामर्थ्य — इन तीनोंपर विचार करके अन्त में ब्रह्माजी की आशाका ही अनुसरण किया ॥ ४२ ॥

अस्त्रेणापि हि बद्धस्य भयं मम न जायते ।

पितामहमहेन्द्राभ्यां रक्षितस्यानिलेन च ॥ ४३ ॥

उनके मनमें यह बात आयी कि ' इस अस्त्रसे बँघ जानेपर भी मुझे कोई भय नहीं है; क्योंकि ब्रह्मा, इन्द्र और वायुदेवता तीनों मेरी रक्षा करते हैं ॥ ४३ ॥

ग्रहणे चापि रक्षोभिर्महन्मे गुणदर्शनम् ।

राक्षसेन्द्रेण संवादस्तस्माद् गृहन्तु मां परे ॥ ४४ ॥

' राक्षसोंद्वारा पकड़े जाने में भी मुझे महान् लाभ हो दिखायी देता है; क्योंकि इससे मुझे राक्षसराज रावणके साथ

बातचीत करने का अवसर मिलेगा । अतः शत्रु मुझे पकड़-कर ले चलें ' ॥ ४४ ॥

कार्य करनेवाले शत्रु-वीरोंके संहारक हनुमानजी निश्चेष्ट हो गये । फिर तो सभी शत्रु निकट आकर उन्हें बलपूर्वक पकड़ने और डाँट बताने लगे 1 । उस समय हनुमानूजी, मानो कष्ट पा रहे हों, इस प्रकार चीखते और कटकटाते थे ॥ ४५ ॥

ततस्ते राक्षसा दृष्ट्वा विनिश्चेष्टमरिंदमम् ।

बबन्धुः शणवल्कैश्च द्रुमचीरैश्च संहतैः ॥ ४६ ॥

राक्षसोंने देखा अब यह हाथ - पैर नहीं हिलाता, तब वे शत्रुहन्ता हनुमानजीको सुतरी और वृक्षोंके वल्कलको घटकर बनाये गये रस्सों से बाँधने लगे ॥ ४६ ॥

स रोचयामास परैश्च बन्धं प्रसह्य वीरैरभिगणं च । कौतूहलान्मां यदि राक्षसेन्द्रो द्रष्टुं व्यवस्येदिति निश्चितार्थः ॥ ४७ ॥

शत्रुवीरोंने जो उन्हें हठपूर्वक बाँधा और उनका तिरस्कार किया, यह सब कुछ उस समय उन्हें अच्छा लगा । उनके मनमें यह निश्चित विचार हो गया था कि ऐसी अवस्थामें राक्षसराज रावण सम्भवतः कौतूहलवश मुझे देखनेकी इच्छा करेगा ( इसीलिये वे सब कुछ सह रहे थे ) ॥ ४७ ॥

स बद्धस्तेन वल्केन विमुक्तोऽस्त्रेण वीर्यवान् ।

अस्त्रबन्धः स चान्यं हि न बन्धमनुवर्तते ॥ ४८ ॥

वल्कल के रस्सेसे बँध जानेपर पराक्रमी हनुमान् ब्रह्मास्त्र-के बन्धन से मुक्त हो गये; क्योंकि उस अस्त्रका बन्धन किसी दूसरे बन्धनके साथ नहीं रहता ॥ ४८ ॥

अथेन्द्रजित् तं द्रुमचीरबद्धं

विचार्य वीरः कपिसत्तमं तम् ।

विमुक्तमस्त्रेण जगाम चिन्ता-मन्येन बद्धोऽप्यनुवर्तते ऽस्त्रम् ॥ ४ ९ ॥

अहो महत् कर्म कृतं निरर्थ न राक्षसैर्मन्त्र गतिर्विमृष्टा । पुनश्च नास्त्रे विहतेऽस्त्रमन्यत् प्रवर्तते संशयिताः स्म सर्वे ॥ ५० ॥

वीर इन्द्रजित्ने जब देखा कि यह वानरशिरोमणि तो केवल वृक्षोंके वल्कलसे बँधा है, दिव्यास्त्र के बन्धन से मुक्त हो चुका है, तब उसे बड़ी चिन्ता हुई । वह सोचने लगा- ' दूसरी वस्तुओंसे बँधा हुआ होनेपर भी यह अस्त्र-बन्धन में बँधे हुए की भाँति बर्ताव कर रहा है । ओह! इन राक्षसोंने मेरा किया हुआ बहुत बड़ा काम चौपट कर दिया । इन्होंने मन्त्रकी शक्तिपर विचार नहीं किया ।

पृष्ठ 170

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