श्रीगणेशाय नमः।

वाल्मीकि रामायण — खण्ड २ — पृष्ठ 171–180

वाल्मीकि रामायण — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 171–180

पृष्ठ 171

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रावणकी सभा में हनुमान्

पृष्ठ 172

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सुन्दरकाण्डे एकोनपञ्चाशः सर्गः ९९ ३ यह अस्त्र जब एक बार व्यर्थ हो जाता है, तब पुनः दूसरी बार इसका प्रयोग नहीं हो सकता । अब तो विजयी होकर भी हम सब लोग संशयमें पड़ गये ॥ ४ ९ -५० ॥

अत्रेण हनुमान मुको नात्मानमवबुध्यते ।

कृष्यमाणस्तु रक्षोभिस्तैश्च बन्धैर्निपीडितः ॥ ५१ ॥

हन्यमानस्ततः क्रूरै राक्षसैः कालमुष्टिभिः ।

समीपं राक्षसेन्द्रस्य प्राकृष्यत स वानरः ॥ ५२ ॥

हनुमानजी यद्यपि अस्त्र के बन्धन से मुक्त हो गये थे तो भी उन्होंने ऐसा बर्ताव किया, मानो वे इस बातको जानते ही न हो । क्रूर राक्षस उन्हें बन्धनोंसे पीड़ा देते और कठोर मुक्कोंसे मारते हुए खींचकर ले चले । इस तरह वे वानरवीर राक्षसराज रावण के पास पहुँचाये गये॥५१-५२ ॥ अथेन्द्रजित् तं प्रसमीक्ष्य मुक्त-मस्त्रेण वद्धं द्रुमवीरसूत्रैः । व्यदर्शयत् तत्र महाबलं तं हरिप्रवीरं सगणाय राज्ञे ॥ ५३ ॥

तब इन्द्रजित्ने उन महाबली वानरवीरको ब्रह्मास्त्र मुक्त तथा वृक्षके वल्कर्लोकी रस्सियोंसे बँधा देख उन्हें वहाँ सभासद्गणों सहित राजा रावणको दिखाया ॥ ५३ ॥

तं मत्तमिव मातङ्कं बद्धं कपिवरोत्तमम् ।

राक्षसा राक्षसेन्द्राय रावणाय न्यवेदयन् ॥ ५४ ॥

मतवाले हाथी के समान बँधे हुए उन वानरशिरोमणिको राक्षसोंने राक्षसराज रावणकी सेवा में समर्पित कर दिया ॥ ५४ ॥

कोऽयं कस्य कुतो वापि किं कार्य को ऽभ्युपाश्रयः ।

इति राक्षसवीराणां दृष्ट्वा संजज्ञिरे कथाः ॥ ५५ ॥

उन्हें देखकर राक्षसवीर आपसमें कहने लगे-- ' यह कौन है? किसका पुत्र या सेवक है? कहाँसे आया है? यहाँ इसका क्या काम है? तथा इसे सहारा देनेवाला कौन है? ॥ ५५ ॥

हन्यतां दह्यतां वापि भक्ष्यतामिति चापरे ।

राक्षसास्तत्र संक्रुद्धाः परस्परमथाब्रुवन् ॥ ५६ ॥

कुछ दूसरे राक्षस जो अत्यन्त क्रोधसे भरे थे, परस्पर इस प्रकार बोले- ' इस वानरको मार डालो, जला डालो या खा डालो ' || ५६ ॥ अतीत्य मार्ग सहसा महात्मा स तत्र रक्षोऽधिपपादमूले । ददर्श राशः परिचारवृद्धान् गृहं महारत्नविभूषितं च ॥ ५७ ॥

महात्मा हनुमान जी सारा रास्ता तै करके जब सहसा राक्षसराज रावणके पास पहुँच गये, तब उन्होंने उसके चरणोंके समीप बहुत - से बड़े - बूढ़े सेवकोंको और बहुमूल्य रत्रोंसे विभूषित सभाभवनको भी देखा ॥ ५७ ॥

स ददर्श महातेजा रावणः कपिसत्तमम् ।

रक्षोभिर्विकृताकारैः कृष्यमाणमितस्ततः ॥ ५८ ॥

उस समय महातेजस्वी रावणने विकट आकारवाले. राक्षसों के द्वारा इधर - उधर घसीटे जाते हुए कपिश्रेष्ठ हनुमानजीको देखा ॥ ५८ ॥

राक्षसाधिपतिं चापि ददर्श कपिसत्तमः ।

तेजोबलसमायुक्तं तपन्तमिव भास्करम् ॥ ५ ९ ॥

कपिश्रेष्ठ हनुमान्ने भी राक्षसराज रावणको तपते हुए सूर्यके समान तेज और बलसे सम्पन्न देखा ॥ ५ ९ ॥ स रोषसंवर्तितताम्रदृष्टि-दशाननस्तं कपिमन्ववेक्ष्य । अथोपविष्टान् कुलशीलवृद्धान् समादिशत् तं प्रति मुख्यमन्त्रीन् ॥ ६० ॥

हनुमान् जीको देखकर दशमुख रावणकी आँखें रोषसे चञ्चल और लाल हो गयीं । उसने वहाँ बैठे हुए कुलीन, सुशील और मुख्य मन्त्रियोंको उनसे परिचय पूछने के लिये आज्ञा दी ॥ ६० ॥

यथाक्रमं तैः स कपिश्च पृष्टः कार्यार्थमर्थस्य च मूलमादौ । निवेदयामास हरीश्वरस्य दूतः सकाशादहमागतोऽस्मि ॥ ६१ ॥

उन सबने पहले क्रमशः कपिवर हनुमान् से उनका कार्य, प्रयोजन तथा उसके मूल कारण के विषयमें पूछा । तब उन्होंने यह बताया कि ' मैं वानरराज सुग्रीवके पाससे उनका दूत होकर आया हूँ ' ॥ ६१ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये सुन्दरकाण्डेऽष्टचत्वारिंशः सर्गः ॥ ४८ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षंरामायण आदिकाव्य के सुन्दरकाण्डमें अड़तालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ४८ ॥

एकोनपञ्चाशः सर्गः रावण के प्रभावशाली स्वरूपको देखकर हनुमानजी के मनमें अनेक प्रकार के विचारोंका उठना ततः स कर्मणा तस्य विस्मितो भीमविक्रमः । इन्द्रजित् के उस नीतिपूर्ण कर्मसे विस्मित तथा रावण के हनूमान् क्रोधताम्राक्षो रक्षोऽधिपमवैक्षत ॥ १ ॥ सीताहरण आदि कमसे कुपित हो रोषसे लाल आँखें

वा ० रा ० ५. ७. १७--

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९९ ४ श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण किये भयंकर पराक्रमी हनुमान्जीने राक्षसराज रावणकी ओर देखा ॥ १ ॥

भ्राजमानं महार्हेण काञ्चनेन विराजता ।

मुक्ताजालवृतेनाथ मुकुटेन महाद्युतिम् ॥ २ ॥

वह महातेजस्वी राक्षसराज सोने के बने हुए बहुमूल्य एवं दीप्तिमान्मुकुटसे, जिसमें मोतियोंका काम किया हुआ था, उद्भासित हो रहा था ॥ २ ॥

वज्रसंयोगसंयुकैर्महार्हमणिविग्रहैः हैमैराभरणैश्चित्रैर्मन सेव प्रकल्पितेः ॥ ३ ॥

उसके विभिन्न अङ्गों सोनेके विचित्र आभूषण ऐसे सुन्दर लगते थे मानो मानसिक संकल्पद्वारा बनाये गये हों । उनमें हीरे तथा बहुमूल्य मणिरत्न जड़े हुए थे, उन आभूषणोंसे रावणकी अद्भुत शोभा होती थी ॥ ३ ॥

महाक्षौमसंवीतं रक्तचन्दनरूषितम् ।

स्वनुलिप्तं विचित्राभिर्विविधाभिश्च भक्तिभिः ॥ ४ ॥

बहुमूल्य रेशमी वस्त्र उसके शरीरकी शोभा बढ़ा रहे थे । वह लाल चन्दनसे चर्चित था और भाँति - भाँति की विचित्र रचनाओंसे युक्त सुन्दर अङ्गरागोंसे उसका सारा अङ्ग सुशोभित हो रहा था ॥ ४ ॥

विचित्रं दर्शनीयैश्व रक्ताक्षैर्भीमदर्शनैः ।

दीप्ततीक्ष्णमहादंष्ट्रं प्रलम्बं दशनच्छदैः ॥ ५ ॥

उसकी आँखें देखने योग्य, लाल - लाल और भयावनी थीं; उनसे और चमकीली तीखी एवं बड़ी - बड़ी दाढ़ों तथा लंबे लंबे ओठोंके कारण उसकी विचित्र शोभा होती थी ॥ ५ ॥

शिरोभिर्दशभिर्वीरो भ्राजमानं महौजसम् ।

नानाव्यालसमाकीर्णैः शिखरैरिव मन्दरम् ॥ ६ ॥

वीर इनुमान्जीने देखा, अपने दस मस्त कोंसे सुशोभित महाबली रावण नाना प्रकार के सर्पोंसे भरे हुए अनेक शिखरोंद्वारा शोभा पानेवाले मन्दराचलके समान प्रतीत हो रहा है || ६ ||

नीलाञ्जनचयप्रख्यं हारेणोरसि राजता ।

पूर्णचन्द्राभवक्त्रेण सबालार्कमिवाम्बुदम् ॥ ७ ॥

उसका शरीर काले कोयले के ढेरकी भाँति काला था और वक्षःस्थल चमकीले हारसे विभूषित था । वह पूर्ण चन्द्र के समान मनोरम मुखद्वारा प्रातःकालके सूर्यसे युक्त मेघकी भाँति शोभा पा रहा था ॥ ७ ॥

बाहुभिर्बद्ध केयूरैश्चन्दनोत्तमरूषितैः भ्राजमानाङ्गदै भीमः पञ्चशीर्षैरिवोरगैः ॥ ८ ॥

जिनमें केयूर बँधे थे, उत्तम चन्दनका लेप हुआ था और चमकीले अङ्गद शोभा दे रहे थे, उन भयंकर भुजाओंसे सुशोभित रावण ऐसा जान पड़ता था, मानो पाँच सिरवाले अनेक सर्पोंसे सेवित हो रहा हो ॥ ८ ॥

महति स्फाटिके चित्रे रत्नसंयोगचित्रिते ।

उत्तमास्तरणास्तीर्णे सूपविष्टं वरासने ॥ ९ ॥

वह स्फटिकमणिके बने हुए विशाल एवं सुन्दर सिंहासनपर, जो नाना प्रकारके रत्नोंके संयोग से चित्रित, विचित्र तथा सुन्दर बिछौनोंसे आच्छादित था, बैठा हुआ था ॥ ९ ॥

अलंकृताभिरत्यर्थ प्रमदाभिः समन्ततः ।

वालव्यजन हस्ताभिरारात्समुपसेवितम् ॥ १० ॥

वस्त्र और आभूषणोंसे खूब सजी हुई बहुत - सी युवतियाँ हाथमें चँवर लिये सब ओरसे आसपास खड़ी हो उसकी सेवा करती थीं ॥ १० ॥

दुर्धरेण प्रहस्तेन महापार्श्वेन रक्षसा ।

मन्त्रिभिर्मन्त्रतत्त्वज्ञैर्निकुम्भेन च मन्त्रिणा ॥ ११ ॥

उपोपविष्टं रक्षोभिश्चतुर्भिर्बलदर्पितम् ।

कृत्स्नं परिवृतं लोकं चतुर्भिरिव सागरैः ॥ १२ ॥

मन्त्र तत्वको जाननेवाले दुर्धर, प्रहस्त, महापार्श्व तथा निकुम्भ- ये चार राक्षसजातीय मन्त्री उसके पास बैठे थे । उन चारों राक्षसोंसे घिरा हुआ बलाभिमानी रावण चार समुद्रोंसे घिरे हुए समस्त भूलोककी भाँति शोभा

पा रहा था ।॥ ११-१२ ॥

मन्त्रिभिर्मन्त्रतत्त्वज्ञैरन्यैश्व शुभदर्शिभिः ।

आश्वास्यमानं सचिवैः सुरैरिव सुरेश्वरम् ॥ १३ ॥

जैसे देवता देवराज इन्द्रको सान्त्वना देते हैं, उसी प्रकार मन्त्रतत्त्व के ज्ञाता मन्त्री तथा दूसरे दूसरे शुभचिन्तक सचिव उसे आश्वासन दे रहे थे ॥ १३ ॥

अपश्यद् राक्षसपतिं हनूमानतितेजसम् ।

वेष्टितं मेरुशिखरे सतोयमिव तोयदम् ॥ १४ ॥

इस प्रकार हनुमानजीने मन्त्रियोंसे घिरे हुए अत्यन्त तेजस्वी, सिंहासनारूढ राक्षसराज रावणको मेरुशिखर पर विराजमान सजल जलधर के समान देखा ॥ १४ ॥

स तैः सम्पीड्यमानोऽपि रक्षोभिर्भीमविक्रमैः ।

विस्मयं परमं गत्वा रक्षोऽधिपमवैक्षत ॥ १५ ॥

उन भयानक पराक्रमी राक्षसोंसे पीड़ित होनेपर भी हनुमानजी अत्यन्त विस्मित होकर राक्षसराज रावणको बढ़े गौर से देखते रहे ॥ १५ ॥

भ्राजमानं ततो दृष्ट्रा हनुमान् राक्षसेश्वरम् ।

मनसा चिन्तयामास तेजसा तस्य मोहितः ॥ १६ ॥

उस दीप्तिशाली राक्षसराजको अच्छी तरह देखकर उसके तेजसे मोहित हो हनुमानजी मन - ही - मन इस प्रकार विचार करने लगे - ॥ १६ ॥

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सुन्दरकाण्डे पञ्चाशः सर्गः ९९ ५

अहो रूपमहो धैर्यमहो सत्त्वमहो द्युतिः ।

अहो राक्षसराजस्य सर्वलक्षणयुक्तता ॥ १७ ॥

‘ अहो! इस राक्षसराजका रूप कैसा अद्भुत है! कैसा अनोखा धैर्य है! कैसी अनुपम शक्ति है! और कैसा आश्चर्यजनक तेज है! इसका सम्पूर्ण राजोचित लक्षणोंसे सम्पन्न होना कितने आश्चर्यकी बात है! ॥ १७ ॥

यद्यधर्मो न बलवान् स्यादयं राक्षसेश्वरः ।

स्यादयं सुरलोकस्य सशक्रस्यापि रक्षिता ॥ १८ ॥

" यदि इसमें प्रबल अधर्म न होता तो यह राक्षसराज रावण इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवलोकका संरक्षक हो सकता था । इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये

अस्य क्रूरैर्नृशंसैश्च कर्मभिर्लोक कुत्सितैः ।

सर्वे बिभ्यति खल्वस्माल्लोकाः सामरदानवाः ॥ १ ९ ॥

अयं ह्युत्सहते क्रुद्धः कर्तुमेकार्णवं जगत् ।

इति चिन्तां बहुविधामकरोन्मतिमान् कपिः ।

दृष्ट्वा राक्षसराजस्य प्रभावममितौजसः ॥ २० ॥

' इसके लोकनिन्दित क्रूरतापूर्ण निष्ठुर कर्मोंके कारण देवताओं और दानवोंसहित सम्पूर्ण लोक इससे भयभीत रहते हैं । यह कुपित होनेपर समस्त जगत्‌को एकार्णवमें निमग्न कर सकता है— संसार में प्रलय मचा सकता है । ' अमिततेजस्वी राक्षसराजके प्रभावको देखकर वे बुद्धिमान् वानरवीर ऐसी अनेक प्रकारकी चिन्ताएँ करते रहे ॥ १ ९ -२० ॥ सुन्दरकाण्डे एकोनपञ्चाशः सर्गः ॥ ४ ९ ॥ इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित रामायण आदिकाव्यके सुन्दरकाण्डमें उनचासवाँ सर्गं पूरा हुआ ॥ ४० ॥

पञ्चाशः सर्गः रावणका प्रहस्तके द्वारा हनुमानजीसे हनुमान्का अपनेको

तमुद्वीक्ष्य महाबाहुः पिङ्गाक्षं पुरतः स्थितम् ।

रोषेण महताऽऽविष्टशेो रावणो लोकरावणः ॥ १ ॥

समस्त लोर्कोको रुलानेवाला महाबाहु रावण भूरी आँखवाले हनुमान्जीको सामने खड़ा देख महान् रोषसे भर गया ॥ १ ॥

शङ्काहतात्मा दध्यौ स कपीन्द्रं तेजसा वृतम् ।

किमेष भगवान् नन्दी भवेत् साक्षादिहागतः ॥ २ ॥

येन शप्तोऽस्मि कैलासे मया प्रहसिते पुरा ।

सोऽयं वानर मूर्तिः स्यात्किं खिद् बाणोऽपि वासुरः ॥३ ॥

साथ ही तरह - तरह की आशङ्काओंसे उसका दिल बैठ गया । अतः वह तेजस्वी वानरराजके विषयमें विचार करने लगा — ' क्या इस वानरके रूपमें साक्षात् भगवान् नन्दी यहाँ पधारे हुए हैं, जिन्होंने पूर्वकालमें कैलास पर्वतपर जब कि मैंने उनका उपहास किया था, मुझे शाप दे दिया था? वे ही तो वानरका स्वरूप धारण करके यहाँ नहीं आये हैं? अथवा इस रूपमें बाणासुरका आगमन तो नहीं हुआ है? ' ॥ २३ ॥

स राजा रोषताम्राक्षः प्रहस्तं मन्त्रिसत्तमम् ।

कालयुक्तमुवाचेदं वचो विपुलमर्थवत् ॥ ४ ॥

इस तरह तर्क - वितर्क करते हुए राजा रावणने क्रोधसे लाल आँखें करके मन्त्रिवर प्रहस्तसे समयानुकूल गम्भीर एवं अर्थयुक्त बात कही ॥ ४ ॥

दुरात्मा पृच्छयतामेष कुतः किं वास्य कारणम् ।

वनभङ्गे च कोऽस्यार्थो राक्षसानां च तर्जने ॥ ५ ॥

लङ्कामें आनेका कारण पुछवाना और श्रीरामका दूत बताना ' अमात्य! इस दुरात्मासे पूछो तो सही, यह कहाँसे आया है? इसके आनेका क्या कारण है? प्रमदावन को उजाड़ने तथा राक्षसों को मारनेमें इसका क्या उद्देश्य था? ॥

मत्पुरीमप्रधृष्यां वै गमने किं प्रयोजनम् ।

आयोधने वा किं कार्य पृच्छयतामेष दुर्मतिः ॥ ६ ॥

' मेरी दुर्जय पुरीमें जो इसका आना हुआ है, इसमें इसका क्या प्रयोजन है? अथवा इसने जो राक्षसोंके साथ युद्ध छेड़ दिया है, उसमें इसका क्या उद्देश्य है? ये सारी बातें इस दुर्बुद्धि वानरसे पूछो ' ॥ ६ ॥

रावणस्य वचः श्रुत्वा प्रहस्तो वाक्यमब्रवीत् ।

समाश्वसिहि भद्रं ते न भीः कार्या त्वया कपे ॥ ७ ॥

रावण की बात सुनकर प्रहस्तने हनुमानजी से कहा—

' वानर! तुम घबराओ न, धैर्य रक्खो । तुम्हारा भला हो ।

तुम्हें डरनेकी आवश्यकता नहीं है ॥ ७ ॥

यदि तावत् त्वमिन्द्रेण प्रेषितो रावणालयम् ।

तत्त्वमाख्याहि मा ते भूद् द्भयं वानर मोक्ष्यसे ॥ ८ ॥

' यदि तुम्हें इन्द्रने महाराज रावणकी नगरीमें भेजा है । तो ठीक - ठीक बता दो । वानर! डरो न । छोड़ दिये जाओगे ॥ ८ ॥

यदि वैश्रवणस्य त्वं यमस्य वरुणस्य च ।

चारुरूपमिदं कृत्वा प्रविष्टो नः पुरीमिमाम् ॥ ९ ॥

' अथवा यदि तुम कुबेर, यम या वरुण के दूत हो और

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९९ ६ श्रीमद्वाल्मीकीय रामायणे यह सुन्दर रूप धारण करके हमारी इस पुरीमें घुस आये हो तो यह भी बता दो ॥ ९ ॥

विष्णुना प्रेषितो वापि दूतो विजयकाङ्क्षिणा ।

नहि ते वानरं तेजो रूपमात्रं तु वानरम् ॥ १० ॥

" अथवा विजयकी अभिलाषा रखनेवाले विष्णुने तुम्हें

दूत बनाकर भेजा है? तुम्हारा तेज वानरोंका - सा नहीं है ।

केवल रूपमात्र वानरका है ॥ १० ॥

तत्वतः कथयखाद्य ततो वानर मोक्ष्यसे ।

अनृतं वदतश्चापि दुर्लभं तव जीवितम् ॥ ११ ॥

" वानर! इस समय सच्ची बात कह दो, फिर तुम छोड़ दिये जाओगे । यदि झूठ बोलोगे तो तुम्हारा जीना असम्भव हो जायगा ॥ ११ ॥

अथ वा यन्निमित्तस्ते प्रवेशो रावणालये ।

एवमुक्तो हरिवरस्तदा रक्षोगणेश्वरम् ॥ १२ ॥

अनवीनास्मि शक्रस्य यमस्य वरुणस्य च ।

धनदेन न मे सख्यं विष्णुना नास्मि चोदितः ॥ १३ ॥

' अथवा और सब बातें छोड़ो । तुम्हारा इस रावणके नगर में आने का क्या उद्देश्य है? यही बता । ' प्रहस्त के इस प्रकार पूछने पर उस समय वानरश्रेष्ठ हनुमान्ने राक्षसों के स्वामी रावणसे कहा – ' मैं इन्द्र, यम अथवा वरुणका दूत नहीं हूँ । कुबेरके साथ भी मेरी मैत्री नहीं है और भगवान् विष्णुने भी मुझे यहाँ नहीं भेजा है ॥ १२-१३ ॥

जातिरेव मम त्वेषा वानरोऽहमिहागतः ।

दर्शने राक्षसेन्द्रस्य तदिदं दुर्लभं मया ॥ १४ ॥

वनं राक्षसराजस्य दर्शनार्थे विनाशितम् ।

ततस्ते राक्षसाः प्राप्ता बलिनो युद्धकाङ्क्षिणः ॥ १५ ॥

रक्षणार्थं च देहस्य प्रतियुद्धा मया रणे । ' मैं जन्मसे ही वानर हूँ और राक्षस रावण से मिलने के उद्देश्यसे ही मैंने उनके इस दुर्लभ वनको उजाड़ा है । इसके बाद तुम्हारे बलवान् राक्षस युद्ध की इच्छासे मेरे पास आये और मैंने अपने शरीर की रक्षा के लिये रणभूमिमें उनका सामना किया ॥ १४-१५३ ॥ अपाशैर्न शक्योऽहं बद्धुं देवासुरैरपि ॥ २६ ॥

पितामहादेष वरो ममापि हि समागतः । ' देवता अथवा असुर भी मुझे अस्त्र अथवा पाशसे बाँध नहीं सकते । इसके लिये मुझे भी ब्रह्माजीसे वरदान मिल चुका है ॥ १६३ ॥

राजानं द्रष्टुकामेन मयास्त्रमनुवर्तितम् ॥ १७ ॥

विमुक्तोऽप्यहमस्त्रेण राक्षसैस्त्वभिवेदितः । ' राक्षसराजको देखने की इच्छा से ही मैंने असे बँधना स्वीकार किया है । यद्यपि इस समय मैं अस्त्रसे मुक्त हूँ तथापि इन राक्षसोंने मुझे बँधा समझकर ही यहाँ लाकर तुम्हें सौंपा है ॥ १७३ ॥

केनचिद् राम कार्येण आगतोऽस्मि तवान्तिकम् ॥ १८ ॥

दूतोऽहमिति विज्ञाय राघवस्यामितौजसः ।

श्रूयतामेव वचनं मम पथ्यमिदं प्रभो ॥ १ ९ ॥

' भगवान् श्रीरामचन्द्रजीका कुछ कार्य है, जिसके लिये मैं तुम्हारे पास आया हूँ । प्रभो! मैं अमित तेजस्वी श्री. रघुनाथजीका दूत हूँ, ऐसा समझकर मेरे इस हितकारी वचन-को अवश्य सुनो ' ॥ १८-१९ ॥ इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये सुन्दरकाण्डे पञ्चाशः सर्गः ॥ ५० ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्धरामायण आदिकाव्य के सुन्दरकाण्ड में पचासवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ५० ॥

एकपञ्चाशः सर्गः हनुमान जी का श्रीरामके प्रभावका

तं समीक्ष्य महासत्त्वं सत्त्ववान् हरिसप्तमः ।

वा r यमर्थवदव्य स्तमुवाच दशाननम् ॥ १ ॥

महाबली दशमुख रावणकी ओर देखते हुए शक्तिशाली वानरशिरोमणि हनुमान्ने शान्तभावसे यह अर्थयुक्त बात कही - ॥ १ ॥

अहं सुग्रीवसंदेशादिह प्राप्तस्तवान्तिके ।

राक्षसेश हरीशस्त्वां भ्राता कुशलमब्रवीत् ॥ २ ॥

' राक्षसराज! मैं सुग्रीवका संदेश लेकर यहाँ तुम्हारे पास आया हूँ । वानररान सुग्रीव तुम्हारे भाई हैं । इसी नाते उन्होंने तुम्हारा कुशल- समाचार पूछा है ॥ २ ॥

वर्णन करते हुए रावणको समझाना

भ्रातुः शृणु समादेशं सुग्रीवस्य महात्मनः ।

धर्मार्थसहितं वाक्यमिह चामुत्र च क्षमम् ॥ ३ ॥

' अब तुम अपने भाई महात्मा सुग्रीवका संदेश - धर्म और अर्थयुक्त वचन, जो इहलोक और परलोकमें भी लाभ-दायक है, सुनो ॥ ३ ॥

राजा दशरथो नाम रथकुञ्जरवाजिमान् ।

पितेव बन्धुकस्य सुरेश्वरसमद्युतिः ॥ ४ ॥

' अभी हाल में ही दशरथनामसे प्रसिद्ध एक राजा हो गये हैं, जो पिताकी भाँति प्रजाके हितैषी, इन्द्रके समान तेजस्वी तथा रथ, हाथी, घोड़े आदिसे सम्पन्न थे ॥ ४ ॥

पृष्ठ 176

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सुन्दरकाण्डे एकपञ्चाशः सर्गः ९९ ७

ज्येष्ठस्तस्य महाबाहुः पुत्रः प्रियतरः प्रभुः ।

पितुर्निदेशान्निष्क्रान्तः प्रविष्टो दण्डकावनम् ॥ ५ ॥

लक्ष्मणेन सह भ्रात्रा सीतया सह भार्यया ।

रामो नाम महातेजा धर्म्य पन्थानमाश्रितः ॥ ६ ॥

' उनके परम प्रिय ज्येष्ठ पुत्र. महातेजस्वी, प्रभावशाली महाबाहु श्रीरामचन्द्रजी पिताकी आज्ञा से धर्ममार्गका आश्रय लेकर अपनी पत्नी सीता और भाई लक्ष्मणके साथ दण्ड-कारण्यमें आये थे ॥ ५-६ ॥

तस्य भार्या जनस्थाने भ्रष्टा सीतेति विश्रुता ।

वैदेहस्य सुता राज्ञो जनकस्य महात्मनः ॥ ७ ॥

" सीता विदेहदेशके राजा महात्मा जनककी पुत्री हैं ।

जनस्थान में आनेपर श्रीरामपत्नी सीता कहीं खो गयी हैं ॥ ७ ॥

मार्गमाणस्तु तां देवीं राजपुत्रः सहानुजः ।

ऋष्यमूकमनुप्राप्तः सुग्रीवेण च संगतः ॥ ८ ॥

' राजकुमार श्रीराम अपने भाई के साथ उन्हीं सीतादेवी की खोज करते हुए ऋष्यमूक पर्वतपर आये और सुग्रीवसे मिले ॥ ८ ॥

तस्य तेन प्रतिज्ञातं सीतायाः परिमार्गणम् ।

सुग्रीवस्यापि रामेण हरिराज्यं निवेदितुम् ॥ ९ ॥

' सुग्रीवने उनसे सीताको ढूँढ़ निकालनेकी प्रतिज्ञा की और श्रीरामने सुग्रीवको वानरोंका राज्य दिलाने का वचन दिया ॥ ९ ॥

ततस्तेन मृधे हत्वा राजपुत्रेण वालिनम् ।

सुग्रीवः स्थापित राज्ये हयृक्षाणां गणेश्वरः ॥ १० ॥

८ ' तत्पश्चात् राजकुमार श्रीरामचन्द्रजीने युद्ध में वालीको मारकर सुग्रीवको किष्किन्धाके राज्यपर स्थापित कर दिया । इस समय सुग्रीव वानरों और भालुओं के समुदाय के स्वामी हैं ॥ १० ॥

त्वया विज्ञातपूर्वश्च वाली वानरपुङ्गवः ।

स तेन निहतः संख्ये शरेणैकेन वानरः ॥ ११ ॥

' वानरराज वाली को तो तुम पहले से ही जानते हो । उस वानरवीरको युद्धभूमिमें श्रीरामने एक ही बाणसे मार गिराया था ॥ ११ ॥

स सीतामार्गणे व्यग्रः सुग्रीवः सत्यसंगरः ।

हरीन् सम्प्रेषयामास दिशः सर्वा हरीश्वरः ॥ १२ ॥

' अब सत्यप्रतिज्ञ सुग्रीव सीताको खोज निकालने के लिये व्यग्र हो उठे हैं । उन वानरराजने समस्त दिशाओंमें वानरों को भेजा है ॥ १२ ॥

तां हरीणां सहस्राणि शतानि नियुतानि च ।

दिक्षु सर्वासु मार्गन्ते ह्यधश्चोपरि चाम्बरे ॥ १३ ॥

' इस समय सैकड़ों, हजारों और लाखों वानर सम्पूर्ण दिशाओं तथा आकाश और पाताल में भी सीताजीकी खोज कर रहे हैं ॥ १३ ॥

वैनतेयसमाः केचित् केचित् तत्रानिलोपमाः ।

असङ्गगतयः शीघ्रा हरिवीरा महाबलाः ॥ १४ ॥

' उन वानरवीरोंमेंसे कोई गरुड़ के समान वेगवान् हैं तो कोई वायुके समान । उनकी गति कहीं नहीं रुकती । वे कपि-वीर शीघ्रगामी और महान् बली हैं ॥ १४ ॥

अहं तु हनुमान्नाम मारुतस्यैौरसः सुतः ।

सीतायास्तु कृते तूर्ण शतयोजनमायतम् ॥ १५ ॥

समुद्रं लङ्घयित्वैव त्वां दिदृक्षुरिहागतः ।

भ्रमता च मया दृष्टा गृहे ते जनकात्मजा ॥ १६ ॥

' मेरा नाम हनुमान् है । मैं वायुदेवताका औरस पुत्र हूँ । सीताका पता लगाने और तुमसे मिलने के लिये सौ योजन विस्तृत समुद्रको लाँघकर तीव्र गतिसे यहाँ आया हूँ । घूमते-घूमते तुम्हारे अन्तःपुरमें मैंने जनकनन्दिनी सीताको देखा है ॥ १५-१६ ॥

तद् भवान् दृष्टधर्मार्थ स्तपः कृतपरिग्रहः ।

परदारान् महाप्राज्ञ नोपरोद्धुं त्वमर्हसि ॥ १७ ॥

' महामते! तुम धर्म और अर्थके तरवको जानते हो । तुमने बड़े भारी तपका संग्रह किया है । अतः दूसरेकी स्त्रीको अपने घर में रोक रखना तुम्हारे लिये कदापि उचित नहीं है ॥ १७ ॥

नहि धर्मविरुद्धेषु बह्नपायेषु कर्मसु ।

मूलघातिषु सज्जन्ते बुद्धिमन्तो भवद्विधाः ॥ १८ ॥

' धर्मविरुद्ध कार्यों में बहुत - से अनर्थ भरे रहते हैं । वे कर्ताका जड़मूलसे नाश कर डालते हैं । अतः तुम - जैसे बुद्धिमान् पुरुष ऐसे कार्यों में नहीं प्रवृत्त होते ॥ १८ ॥

कश्च लक्ष्मणमुक्कानां रामकोपानुवर्तिनाम् ।

शराणामग्रतः स्थातुं शक्तो देवासुरेष्वपि ॥ १ ९ ॥

' देवताओं और असुरोंमें भी कौन ऐसा वीर है, जो श्रीरामचन्द्रजीके क्रोध करनेके पश्चात् लक्ष्मणके छोड़े हुए बाणोंके सामने ठहर सके ॥ १ ९ ॥

न चापि त्रिषु लोकेषु राजन् विद्येत कश्चन ।

राघवस्य व्यलीकं यः कृत्वा सुखमवाप्नुयात् ॥ २० ॥

' राजन्! तीनों लोकों में एक भी ऐसा प्राणी नहीं है, जो भगवान् श्रीरामका अपराध करके सुखी रह सके ॥ २० ॥

तत् त्रिकालहितं वाक्यं धर्म्यमर्थानुयायि च ।

मन्यख नरदेवाय जानकी प्रतिदीयताम् ॥ २१ ॥

' इसलिये मेरी धर्म और अर्थके अनुकूल बात, जो तीनों कालों में हितकर है, मान लो और जानकीजीको श्रीरामचन्द्र-जीके पास लौटा दो ॥ २१ ॥

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९९ ८ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे

टहीयं मया देवी लब्धं यदिह दुर्लभम् ।

उत्तरं कर्म यच्छेषं निमित्तं तत्र राघवः ॥ २२ ॥

" मैंने इन देवी सीताका दर्शन कर लिया । जो दुर्लभ वस्तु थी, उसे यहाँ पा लिया । इसके बाद जो कार्य शेष है, उसके साधनमें श्रीरघुनाथजी ही निमित्त हैं ॥ २२ ॥

लक्षितेयं मया सीता तथा शोकपरायणा ।

गृहे यां नाभिजानासि पञ्चास्यामिव पन्नगीम् ॥ २३ ॥

" मैंने यहाँ सीताकी अवस्थाको लक्ष्य किया है । वे निरन्तर शोक में डूबी रहती हैं । सीता तुम्हारे घरमें पाँच फनवाली नागिन के समान निवास करती हैं, जिन्हें तुम नहीं जानते हो ॥ २३ ॥

नेयं जरयितुं शक्या सासुरैरमरैरपि ।

विषसंस्पृष्टमत्यर्थ भुक्तमन्नमिवौजसा ॥ २४ ॥

' जैसे अत्यन्त विषमिश्रित अन्नको खाकर कोई उसे बलपूर्वक नहीं पचा सकता, उसी प्रकार सीताजीको अपनी शक्ति से पचा लेना देवताओं और असुरोंके लिये भी असम्भव है ॥ २४ ॥

तपः संतापलब्धस्ते सोऽयं धर्मपरिग्रहः ।

न स नाशयितुं न्याय्य आत्मप्राणपरिग्रहः ॥ २५ ॥

' तुमने तपस्याका कष्ट उठाकर धर्मके फलस्वरूप जो यह ऐश्वर्यका संग्रह किया है तथा शरीर और प्राणोंको चिर-कालतक धारण करने की शक्ति प्राप्त की है, उसका विनाश करना उचित नहीं ॥ २५ ॥

अवश्यतां तपोभिर्या भवान् समनुपश्यति ।

आत्मनः सासुरैर्देवैर्हेतुस्तत्राप्ययं महान् ॥ २६ ॥

' तुम तपस्या के प्रभाव से देवताओं और असुरोंद्वारा जो अपनी अवध्यता देख रहे हो, उसमें भी तपस्याजनित यह धर्म ही महान् कारण है ( अथवा उस अवध्यता के होते हुए भी तुम्हारे वधका दूसरा महान् कारण उपस्थित है ) ॥ २६ । सुग्रीवो न च देवोऽयं न यक्षो न च राक्षसः ।

मानुषो राघवो राजन् सुग्रीवश्च हरीश्वरः ।

तस्मात् प्राणपरित्राणं कथं राजन् करिष्यसि ॥ २७ ॥

' राक्षसराज! सुग्रीव और श्रीरामचन्द्रजी न तो देवता हैं, न यक्ष हैं और न राक्षस ही हैं । श्रीरघुनाथजी मनुष्य हैं और सुग्रीव वानरोंके राजा । अतः उनके हाथसे तुम अपने प्राणों की रक्षा कैसे करोगे? ॥ २७ ॥

न तु धर्मोपसंहारमधर्मफल संहितम् ।

तदेव फलमन्वेति धर्मश्चाधर्मनाशनः ॥ २८ ॥

' जो पुरुष प्रबल अधर्म के फलसे बँधा हुआ है, उसे धर्मका फल नहीं मिलता । वह उस अधर्मफलको ही पाता है । हाँ, यदि उस अधर्मके बाद किसी प्रबल धर्मका अनुष्ठान किया गया हो तो वह पहले के अधर्मका नाशक होता है # ॥ २८ ॥

प्राप्तं धर्मफलं तावद् भवता नात्र संशयः ।

फलमस्याप्यधर्मस्य क्षिप्रमेव प्रपत्स्यसे ॥ २ ९ ॥

' तुमने पहले जो धर्म किया था, उसका पूरा - पूरा फल यहाँ पा लिया, अब इस सीताहरणरूपी अधर्मका फल भी तुम्हें शीघ्र ही मिलेगा ॥ २ ९ ॥

जनस्थानवधं बुद्ध्वा वालिनश्च वधं तथा ।

रामसुग्रीवसख्यं च बुद्ध्यस्व हितमात्मनः ॥ ३० ॥

' जनस्थानके राक्षसों का संहार, वालीका वध और श्रीराम तथा सुग्रीवकी मैत्री — इन तीनों कार्यों को अच्छी तरह समझ लो । उसके बाद अपने हितका विचार करो ॥ ३० ॥

कामं खल्वहमप्येकः सवाजिरथकुञ्जराम् ।

लङ्कां नाशयितुं शक्तस्तस्यैष तु न निश्चयः ॥ ३१ ॥

' यद्यपि मैं अकेला ही हाथी, घोड़े और रथोसहित समूची लङ्काका नाश कर सकता हूँ, तथापि श्रीरघुनाथजीका ऐसा विचार नहीं है— उन्होंने मुझे इस कार्यके लिये आज्ञा नहीं दी है ॥ ३१ ॥

रामेण हि प्रतिज्ञातं हयृक्षगणसंनिधौ ।

उत्सादनममित्राणां सीता यैस्तु प्रधर्षिता ॥ ३२ ॥

' जिन लोगोंने सीताका तिरस्कार किया है, उन शत्रुओं-का स्वयं ही संहार करने के लिये श्रीरामचन्द्रजीने वानरों और भालुओंके सामने प्रतिज्ञा की है ॥ ३२ ॥

अपकुर्वन् हि रामस्य साक्षादपि पुरंदरः ।

न सुखं प्राप्नुयादन्यः किं पुनस्त्वद्विधो जनः ॥ ३३ ॥

' भगवान् श्रीरामका अपराध करके साक्षात् इन्द्र भी सुख नहीं पा सकते, फिर तुम्हारे जैसे साधारण लोगोंकी बात ही क्या है? ॥ ३३ ॥

यां सीतेत्यभिजानासि येयं तिष्ठति ते गृहे ।

कालरात्रीति तां विद्धि सर्वलङ्काविनाशिनीम् ॥ ३४ ॥

' जिनको तुम सीता के नामसे जानते हो और जो इस समय तुम्हारे अन्तः पुरमें मौजूद हैं, उन्हें सम्पूर्ण लङ्काका विनाश करनेवाली कालरात्रि समझो ॥ ३४ ॥

तदलं कालपाशेन सीताविग्रहरूपिणा ।

स्वयं स्कन्धावसक्तेन क्षेममात्मनि चिन्त्यताम् ॥ ३५ ॥

" सीताका शरीर धारण करके तुम्हारे पास कालकी फाँसी आ पहुँची है, उसमें स्वयं गला फँसाना ठीक नहीं है; अतः अपने कल्याण की चिन्ता करो ॥ ३५ ॥

* जैसा कि श्रुतिका वचन है- ' धर्मेण पापमपनुदति । " अर्थात् धर्मसे मनुष्य अपने पापको दूर करता है । स्मृतियोंमें बताये गये प्रायश्चित्त कृच्छ्रत्रत आदि भी इसी बात के समर्थक 1

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सुन्दरकाण्डे द्विपञ्चाशः सर्गः ९९९

सीतायास्तेजसा दग्धां रामकोपप्रदीपिताम् ।

दह्यमानामिमां पश्य पुरीं सादृप्रतोलिकाम् ॥ ३६ ॥

' देखो, अट्टालिकाओं और गलियोंसहित यह लङ्कापुरी सीताजी के तेज और श्रीराम की क्रोधाग्निसे जलकर भस्म होने जा रही है ( बचा सको तो बचाओ ) ॥ ३६ ॥

स्वानि मित्राणि मन्त्री च ज्ञातीन् भ्रातृन् सुतान् हितान् ।

भोगान् दारांभ लङ्कां च मा विनाशमुपानय ॥ ३७ ॥

" इन मित्रों, मन्त्रियों, कुटुम्बीजनों, भाइयों, पुत्रों, हितकारियों, स्त्रियों, सुख - भोगके साधनों तथा समूची लङ्का-को मौत के मुखमें न झोंको ॥ ३७ ॥

सत्यं राक्षसराजेन्द्र शृणुष्व वचनं मम ।

रामदासस्य दूतस्य वानरस्य विशेषतः ॥ ३८ ॥

' राक्षसोंके राजाधिराज! मैं भगवान् श्रीरामका दास हूँ,

दूत हूँ और विशेषतः वानर हूँ । मेरी सच्ची बात सुनो - ॥

सर्वोल्लोकान् सुसंहत्य सभूतान् सचराचरान् ।

पुनरेव तथा स्रष्टुं शक्तो रामो महायशाः ॥ ३ ९ ॥

' महायशस्वी श्रीरामचन्द्रजी चराचर प्राणियों सहित सम्पूर्ण लोकों का संहार करके फिर उनका नये सिरेसे निर्माण करने की शक्ति रखते हैं ॥ ३ ९ ॥ देवासुरनरेन्द्रेषु यक्षरक्षोरगे विद्याधरेषु नागेषु गन्धर्वेषु मृगेषु च

च ।

॥ ४० ॥

सिद्धेषु किंनरेन्द्रेषु पतत्त्रिषु च सर्वतः ।

सर्वत्र सर्वभूतेषु सर्वकालेषु नास्ति सः ॥ ४१ ॥

यो रामं प्रति युध्येत विष्णुतुल्यपराक्रमम् । ' भगवान् श्रीराम श्रीविष्णुके तुल्य पराक्रमी हैं । देवता, असुर, मनुष्य, यक्ष, राक्षस, सर्प, विद्याधर, नाग, गन्धर्व, मृग, सिद्ध, किंनर, पक्षी एवं अन्य समस्त प्राणियों में कहीं किसी समय कोई भी ऐसा नहीं है, जो श्रीरघुनाथजी के साथ लोहा ले सके || ४०-४१३ ॥

सर्वलोकेश्वरस्येह कृत्वा विप्रियमीदृशम् ।

रामस्य राजसिंहस्य दुर्लभं तव जीवितम् ॥ ४२ ॥

' सम्पूर्ण लोकोंके अधीश्वर राजसिंह श्रीरामका ऐसा महान् अपराध करके तुम्हारा जीवित रहना कठिन है ॥ ४२ ॥

देवाश्व दैत्याश्च निशाचरेन्द्र गन्धर्वविद्याधर नागयक्षाः । रामस्य लोकनायकस्य स्थातुं न शक्ताः समरेषु सर्वे ॥ ४३ ॥

' निशाचरराज! श्रीरामचन्द्रजी तीनों लोकोंके स्वामी हैं । देवता, दैत्य, गन्धर्व, विद्याधर, नाग तथा यक्ष- ये सब मिलकर भी युद्ध में उनके सामने नहीं टिक सकते ॥ ४३ ॥

ब्रह्मा स्वयम्भूश्चतुराननो वा रुद्रस्त्रिनेत्रस्त्रिपुरान्तको वा । इन्द्री महेन्द्रः सुरनायको वा स्थातुं न शक्ता युधि राघवस्य ॥ ४४ ॥

' चार मुखोंवाले स्वयम्भू ब्रह्मा, तीन नेत्रोंवाले त्रिपुर-नाशक रुद्र अथवा देवताओंके स्वामी महान् ऐश्वर्यशाली इन्द्र भी समराङ्गणमें श्रीरघुनाथजी के सामने नहीं ठहर सकते ' ॥ ४४ ॥

स सौष्ठवोपेतमदीनवादिनः कपेर्निशम्याप्रतिमोऽप्रियं वचः । दशाननः कोपविवृत्तलोचनः समादिशत् तस्य वधं महाकपेः ॥ ४५ ॥

वीरभाव से निर्भयतापूर्वक भाषण करनेवाले महाकपि हनुमान्जीकी बातें बड़ी सुन्दर एवं युक्तियुक्त थीं, तथापि वे रावणको अप्रिय लगीं । उन्हें सुनकर अनुपम शक्तिशाली दशानन रावणने क्रोधसे आँखें तरेरकर सेवकको उनके वध के लिये आज्ञा दी ॥ ४५ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये सुन्दरकाण्डे एकपञ्चाशः सर्गः ॥ ५१ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के सुन्दरकाण्डमें इक्यावनवाँ सगँ पूरा हुआ ॥ ५१ ॥

द्विपञ्चाशः सर्गः विभीषणका दूतके वधको अनुचित बताकर उसे दूसरा कोई दण्ड देने के लिये कहना तथा रावणका उनके

स तस्य वचनं श्रुत्वा वानरस्य महात्मनः ।

आज्ञापयद् वधं तस्य रावणः क्रोधमूर्चिछतः ॥ १ ॥

वानरशिरोमणि महात्मा हनुमान्जीका वचन सुनकर क्रोधसे तमतमाये हुए रावणने अपने सेवकोंको आज्ञा दी— ' इस वानरका वध कर डालो ' ॥ १ ॥

वधे तस्य समाशते रावणेन दुरात्मना । अनुरोधको स्वीकार कर लेना निवेदितवतो दौत्यं नानुमेने विभीषणः ॥ २ ॥

दुरात्मा रावणने जब उनके वधकी आज्ञा दी, तब विभीषण भी वहीं थे । उन्होंने उस आज्ञाका अनुमोदन नहीं किया; क्योंकि हनुमानजी अपनेको सुग्रीव एवं श्रीरामका दूत बता चुके थे ॥ २ ॥

तं रक्षोऽधिपति क्रुद्धं तच्च कार्यमुपस्थितम् ।

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१००० श्रीमद्वाल्मीकीय रामायणे विदित्वा चिन्तयामास कार्य कार्यविधौ स्थितः ॥ ३ ॥

एक ओर राक्षसराज रावण क्रोधसे भरा हुआ था, दूसरी ओर वह दूतके वधका कार्य उपस्थित था । यह सब जानकर यथोचित कार्य के सम्पादनमें लगे हुए विभीषणने समयोचित कर्तव्यका निश्चय किया ॥ ३ ॥

निश्चितार्थस्ततः साम्ना पूज्यं शत्रुजिदग्रजम् ।

उवाच हितमत्यर्थे वाक्यं वाक्यविशारदः ॥ ४ ॥

निश्चय हो जानेपर वार्तालापकुशल विभीषणने पूजनीय ज्येष्ठ भ्राता शत्रुविजयी रावणसे शान्तिपूर्वक यह हितकर वचन कहा ॥ ४ ॥

क्षमस्व रोषं त्यज राक्षसेन्द्र प्रसीद मे वाक्यमिदं शृणुष्व । वधं न कुर्वन्ति परावरशा दूतस्य सन्तो वसुधाधिपेन्द्राः ॥ ५ ॥

' राक्षसराज! क्षमा कीजिये, क्रोधको त्याग दीजिये, प्रसन्न होइये और मेरी यह बात सुनिये । ऊँच - नीचका ज्ञान रखनेवाले श्रेष्ठ राजा लोग दूतका वध नहीं करते हैं ॥ ५ ॥

राजन् धर्मविरुद्धं च लोकवृत्तेश्च गर्हितम् ।

तव चासदृशं वीर कपेरस्य प्रमापणम् ॥ ६ ॥

' वीर महाराज! इस वानरको मारना धर्मके विरुद्ध और लोकाचारकी दृष्टि से भी निन्दित है । आप जैसे वीर के लिये तो यह कदापि उचित नहीं है ॥ ६ ॥

धर्मशश्व कृतशश्व राजधर्मविशारदः ।

परावरशो भूतानां त्वमेव परमार्थवित् ॥ ७ ॥

गृह्यन्ते यदि रोषेण त्वादृशोऽपि विचक्षणाः ।

ततः शास्त्रविपश्चित्त्वं श्रम एव हि केवलम् ॥ ८ ॥

' आप धर्मके ज्ञाता, उपकारको माननेवाले और राजधर्म के विशेषज्ञ हैं, भले - बुरेका ज्ञान रखनेवाले और परमार्थके ज्ञाता है । यदि आप जैसे विद्वान् भी रोषके वशीभूत हो जायँ तब तो समस्त शास्त्रोंका पाण्डित्य प्राप्त करना केवल श्रम ही होगा ॥ ७-८ ॥

तस्मात् प्रसीद शत्रुघ्न राक्षसेन्द्र दुरासद ।

युक्तायुक्तं विनिश्चित्य दूतदण्डो विधीयताम् ॥ ९ ॥

' अतः शत्रुओंका संहार करनेवाले दुर्जय राक्षसराज! आप प्रसन्न होइये और उचित - अनुचितका विचार करके दूतके योग्य किसी दण्डका विधान कीजिये ' ॥ ९ ॥

विभीषणवचः श्रुत्वा रावणो राक्षसेश्वरः ।

कोपेन महताऽऽविष्टो वाक्यमुत्तरमब्रवीत् ॥ १० ॥

विभीषणकी बात सुनकर राक्षसोंका स्वामी रावण महान् कोपसे भरकर उन्हें उत्तर देता हुआ बोला- ॥१० ॥

न पापानां बधे पापं विद्यते शत्रुसूदन ।

तस्मादिमं वधिष्यामि वानरं पापकारिणम् ॥ ११ ॥

' शत्रुसूदन! पापियोंका वध करनेमें पाप नहीं है । इस वानरने वाटिकाका विध्वंस तथा राक्षसका वध करके पाप किया है । इसलिये अवश्य ही इसका वध करूँगा ' ॥ ११ ॥

अधर्ममूलं बहुदोषयुक्त-मनार्यजुष्टं वचनं निशम्य । उवाच वाक्यं परमार्थतत्त्वं विभीषणो बुद्धिमतां वरिष्ठः ॥ १२ ॥

गणका वचन अनेक दोषोंसे युक्त और पापका मूल था । वह श्रेष्ठ पुरुषोंके योग्य नहीं था । उसे सुनकर बुद्धिमानों में श्रेष्ठ विभीषणने उत्तम कर्तव्यका निश्चय कराने-वाली बात कही ॥ १२ ॥

प्रसीद लङ्केश्वर राक्षसेन्द्र धर्मार्थतत्त्वं वचनं शृणुष्व । दूता न वध्याः समयेषु राजन् सर्वेषु सर्वत्र वदन्ति सन्तः ॥ १३ ॥

' लङ्केश्वर! प्रसन्न होइये । राक्षसराज! मेरे धर्म और अर्थतत्त्वसे युक्त वचनको ध्यान देकर सुनिये । राजन्! सत्पुरुषोंका कथन है कि दूत कहीं किसी समय भी वध करने योग्य नहीं होते ॥ १३ ॥

असंशयं शत्रुरयं प्रवृद्धः कृतं नाप्रियमप्रमेयम् । न दूतवध्यां प्रवदन्ति सन्तो दूतस्य दृष्टा बहवो हि दण्डाः ॥ १४ ॥

" इसमें संदेह नहीं कि यह बहुत बड़ा शत्रु है; क्योंकि इसने वह अपराध किया है जिसकी कहीं तुलना नहीं है, तथापि सत्पुरुष दूतका वध करना उचित नहीं बताते हैं । दूतके लिये अन्य प्रकारके बहुत - से दण्ड देखे गये हैं ॥ १४ ॥

वैरूप्यमङ्गेषु कशाभिघातो मण्ड्यं तथा लक्षणसंनिपातः । पतान् हि दूते प्रवदन्ति दण्डान् वधस्तु दूतस्य न नः श्रुतोऽस्ति ॥ १५ ॥

' किसी अङ्गको भङ्ग या विकृत कर देना, कोड़े से पिटवाना, सिर मुड़वा देना तथा शरीर में कोई चिह्न दाग

देना – ये ही दण्ड दूतके लिये उचित बताये गये हैं ।

उसके लिये वधका दण्ड । मैंने कभी नहीं सुना है ॥ १५ ॥

कथं च धर्मार्थविनीतबुद्धिः परावरप्रत्ययनिश्चितार्थः 1 भवद्विधः कोपवशे हि तिष्ठेत् कोपं न गच्छन्ति हि सत्यवन्तः ॥ १६ ॥

पृष्ठ 180

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सुन्दरकाण्डे द्विपञ्चाशः सर्गः १००१ ' आपकी बुद्धि धर्म और अर्थकी शिक्षासे युक्त है । आप ऊँच - नीच का विचार करके कर्तव्यका निश्चय करनेवाले हैं । आप जैसा नीतिज्ञ पुरुष कोपके अधीन कैसे हो सकता है? क्योंकि शक्तिशाली पुरुष क्रोध नहीं करते हैं ॥ १६ ॥

न धर्मवादे न च लोकवृत्ते

न शास्त्रबुद्धिग्रहणेषु वापि ।

विद्येत कश्चित्तव वीर तुल्य-स्त्वं ह्युत्तमः सर्वसुरासुराणाम् ॥ १७ ॥

" वीर! धर्मकी व्याख्या करने, लोकाचारका पालन करने अथवा शास्त्रीय सिद्धान्तको समझने में आपके समान दूसरा कोई नहीं है । आप सम्पूर्ण देवताओं और असुरोंमें श्रेष्ठ हैं ॥ १७ ॥

पराक्रमोत्साहमनस्विनां च सुरासुराणामपि दुर्जयेन । त्वयाप्रमेयेण सुरेन्द्र संघा जिताश्च युद्धेष्वसकृन्नरेन्द्राः ॥ १८ ॥

' पराक्रम और उत्साह से सम्पन्न जो मनस्वी देवता और असुर हैं, उनके लिये भी आपपर विजय पाना अत्यन्त कठिन है । आप अप्रमेय शक्तिशाली हैं । आपने अनेक युद्धों में बारंबार देवेश्वरों तथा नरेशोंको पराजित किया है । इत्थंविधस्यामरदैत्यशत्रोः शूरस्य वीरस्य तवाजितस्य । कुर्वन्ति वीरा मनसाप्यलीकं प्राणैर्विमुक्ता न तु भोः पुरा ते ॥ १ ९ ॥ “ देवताओं और दैत्योंसे भी शत्रुता रखनेवाले ऐसे आप अपराजित शूरवीरका पहले कभी शत्रुपक्षी वीर मनसे भी पराभव नहीं कर सके हैं । जिन्होंने सिर उठाया, वे तत्काल प्राणोंसे हाथ धो बैठे ॥ १ ९ ॥

न चाप्यस्य कपेर्घाते कंचित् पश्याम्यहं गुणम् ।

तेष्वयं पात्यतां दण्डो यैरयं प्रेषितः कपिः ॥ २० ॥

' इस वानरको मारने में मुझे कोई लाभ नहीं दिखायी देता । जिन्होंने इसे भेजा है, उन्हींको यह प्राणदण्ड दिया जाय ॥ २० ॥

साधुर्वा यदि वासाधुः परैरेष समर्पितः ।

ब्रुवन् परार्थ परवान् न दूतो वधमर्हति ॥ २१ ॥

" यह भला हो या बुरा, शत्रुओंने इसे भेजा है; अतः यह उन्हीं के स्वार्थकी बात करता है । दूत सदा पराधीन होता है, अतः वह वधकै योग्य नहीं होता है ॥ २१ ॥

अपि चास्मिन् हते नान्यं राजन् पश्यामि खेचरम् ।

इह यः पुनरागच्छेत् परं पारं महोदधेः ॥ २२ ॥

' राजन्! इसके मारे जानेपर मैं दूसरे किसी ऐसे वा ० रा ० ५. ७. १८-आकाशचारी प्राणीको नहीं देखता, जो शत्रुके समीपसे महासागर के इस पार फिर आ सके ( ऐसी दशा में शत्रुकी गतिविधिका आपको पता नहीं लग सकेगा ) ॥ २२ ॥

तस्मान्नास्य वधे यत्नः कार्यः परपुरंजय ।

भवान् सेन्द्रेषु देवेषु यत्नमास्थातुमर्हति ॥ २३ ॥

' अतः शत्रुनगरीपर विजय पानेवाले महाराज! आपको इस दूतके वध के लिये कोई प्रयत्न नहीं करना चाहिये । आप तो इस योग्य हैं कि इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवताओंपर चढ़ाई कर सकें ॥ २३ ॥

अस्मिन् विनष्टे नहि भूतमन्यं

पश्यामि यस्तौ नरराजपुत्रौ ।

युद्धाय युद्धप्रिय दुर्विनीता-बुद्योजयेद् वै भवता विरुद्धौ ॥ २४ ॥

' युद्धप्रेमी महाराज! इसके नष्ट हो जानेपर मैं दूसरे किसी प्राणीको ऐसा नहीं देखता, जो आपसे विरोध करनेवाले उन दोनों स्वतन्त्र प्रकृतिके राजकुमारोंको युद्ध के लिये तैयार कर सके ॥ २४ ॥

पराक्रमोत्साहमनस्विनां च सुरासुराणामपि दुर्जयेन । त्वया मनोनन्दन नैर्ऋतानां युद्धाय निर्नाशयितुं न युक्तम् ॥ २५ ॥

' राक्षसों के हृदयको आनन्दित करनेवाले वीर! आप देवताओं और दैत्योंके लिये भी दुर्जय हैं; अतः पराक्रम और उत्साहसे भरे हुए हृदयवाले इन राक्षसोंके मनमें जो युद्ध करनेका हौसला बढ़ा हुआ है, उसे नष्ट कर देना आपके लिये कदापि उचित नहीं है ॥ २५ ॥

हिताश्च शूराश्च समाहिताश्च कुलेषु जाताश्च महागुणेषु । मनस्विनः शस्त्रभृतां वरिष्ठाः कोपप्रशस्ताः सुभृताश्च योधाः ॥ २६ ॥

तदेकदेशेन बलस्य तावत् केचित् तवा देशकृतोऽद्य यान्तु । तौ राजपुत्रावुपगृह्य ढ परेषु ते भावयितुं प्रभावम् ॥ २७ ॥

' मेरी राय तो यह है कि उन विरह- दुःखसे विकलचित्त राजकुमारोंको कैद करके शत्रुओंपर आपका प्रभाव डालने— दबदबा जमाने के लिये आपकी आज्ञासे थोड़ी - सी सेनाके साथ कुछ ऐसे योद्धा यहाँसे यात्रा करें, जो हितैषी, शूरवीर, सावधान, अधिक गुणवाले महान् कुलमें उत्पन्न, मनस्वी, शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ, अपने रोष और जोशके लिये प्रशंसित तथा अधिक वेतन देकर अच्छी तरह पाले - पोसे गये हों ' ॥