Ramayana 2 — पृष्ठ 191–200

वाल्मीकि रामायण — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 191–200

पृष्ठ 191

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१०१२ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे पर्याप्तः परवीरघ्न यशस्यस्ते फलोदयः ॥ ११ ॥ श्रीरामके हाथसे मारा जायगा, यह आप अपनी आँखों

' शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले कपिश्रेष्ठ! इसमें संदेह देखेंगी ॥ १ ९ ॥ नहीं कि इस कार्यको सिद्ध करने में तुम अकेले ही पूर्ण निहते राक्षसेन्द्रे च सपुत्रामात्यवान्धवे । समर्थ हो; परंतु तुम्हारेद्वारा जो विजयरूप फलकी प्राप्ति त्वं समेष्यसि रामेण शशाङ्केनेव रोहिणी ॥ २० ॥

होगी, उससे तुम्हारा ही यश बढ़ेगा, भगवान् श्रीराम- ' पुत्र, मन्त्री और भाई बन्धुओंसहित राक्षसराज रावणके का नहीं ॥ ११ ॥ मारे जानेपर आप श्रीरामचन्द्रजीके साथ उसी प्रकार

बलैस्तु संकुलां कृत्वा लङ्कां परबलार्दनः । मिलेंगी, जैसे रोहिणी चन्द्रमासे मिलती है ॥ २० ॥

मां नयेद्यदि काकुत्स्थस्तत् तस्य सदृशं भवेत् ॥ १२ ॥ क्षिप्रमेष्यति काकुत्स्थो हयृक्षप्रवरैर्युतः ।

' परंतु शत्रु सेनाको पीड़ा देनेवाले श्रीरामचन्द्रजी यदि यस्ते युधि विजित्यारी छोकं व्यपनयिष्यति लङ्काको अपनी सेनासे पददलित करके मुझे यहाँसे ले चलें ' वानरों और ॥ २१ ॥

तो वह उनके योग्य पराक्रम होगा ॥ १२ ॥

तद् यथा तस्य विक्रान्तमनुरूपं महात्मनः ।

भवत्याद्दवशूरस्य तथा त्वमुपपादय ॥ १३ ॥

' अतः तुम ऐसा उपाय करो, जिससे युद्धवीर महात्मा श्रीरामचन्द्रजीका उनके योग्य पराक्रम प्रकट हो ' ॥ १३ ॥

तदर्थोपहितं वाक्यं प्रश्रितं हेतुसंहितम् ।

निशम्य हनुमान वीरो वाक्यमुत्तरमब्रवीत् ॥ १४ ॥

सीताजीकी यह बात स्नेहयुक्त तथा विशेष अभिप्रायसे भरी हुई थी । इसे सुनकर वीर हनुमान् ने इस प्रकार उत्तर दिया- ॥ १४ ॥

देवि हयृक्ष सैन्यानामीश्वरः लवतां वरः ।

सुग्रीवः सत्त्वसम्पन्नस्तवार्थे कृतनिश्चयः ॥ १५ ॥

' देवि! वानर और भालुओंकी सेनाओंके स्वामी कपिश्रेष्ठ सुग्रीव बड़े शक्तिशाली पुरुष हैं । वे तुम्हारे उद्धार के लिये प्रतिज्ञा कर चुके हैं ॥ १५ ॥

स वानरसहस्राणां कोटीभिरभिसंवृतः ।

क्षिप्रमेष्यति वैदेहि सुग्रीवः प्लवगाधिपः ॥ १६ ॥

' विदेद्दनन्दिनि । अतः वे वानरराज सुग्रीव सहस्रों कोटि वानरोंसे घिरे हुए तुरंत यहाँ आयेंगे ॥ १६ ॥

तौ च वीरौ नरवरौ सहितौ रामलक्ष्मणौ ।

आगम्य नगरीं लङ्कां सायकैर्विधमिष्यतः ॥ १७ ॥

" साथ ही वे दोनों वीर नरश्रेष्ठ श्रीराम और लक्ष्मण भी एक साथ आकर अपने सायकोंसे इस लङ्कापुरीका विध्वंस कर डालेंगे || १७ |

सगणं राक्षसं हत्वा नचिराद् रघुनन्दनः ।

त्वामादाय वरारोहे खां पुरीं प्रति यास्यति ॥ १८ ॥

' वरारोहे! राक्षसराज रावणको उसके सैनिकों सहित कालके गाल में डालकर श्रीरघुनाथजी आपको साथ ले शीघ्र ही अपनी पुरीको पधारेंगे ॥ १८ ॥

समाश्वसिहि भद्रं ते भव त्वं कालकाङ्क्षिणी ।

क्षिप्रं द्रक्ष्यसि रामेण निहतं रावणं रणे ॥ १ ९ ॥

" इसलिये आप धैर्य धारण करें । आपका भला हो । आप समयकी प्रतीक्षा करें । रावण शीघ्र ही रणभूमिमें भालुओंके प्रमुख वीरोंके साथ श्रीरामचन्द्रजी शीघ्र ही यहाँ पधारेंगे और युद्धमें शत्रुओंको जीतकर आपका सारा शोक दूर कर देंगे ' ॥ २१ ॥

एवमाश्वास्य वैदेहीं हनूमान् मारुतात्मजः ।

गमनाय मतिं कृत्वा वैदेहीमभ्यवादयत् ॥ २२ ॥

विदेहनन्दिनी सीताको इस प्रकार आश्वासन दे वहाँसे जानेका विचार करके पवनकुमार हनुमान्ने उन्हें प्रणाम किया ॥ २२ ॥

राक्षसान् प्रवरान् हत्वा नाम विश्राव्य चात्मनः ।

समाश्वास्य च वैदे दर्शयित्वा परं बलम् ॥ २३ ॥

नगरीमाकुलां कृत्वा वञ्चयित्वा च रावणम् ।

दर्शयित्वा बलं घोरं वैदेहीमभिवाद्य च ॥ २४ ॥

प्रतिगन्तुं मनश्चक्रे पुनर्मध्येन सागरम् । वे बड़े - बड़े राक्षसों को मारकर अपने महान् बलका परिचय दे वहाँ ख्याति प्राप्त कर चुके थे । उन्होंने सीताको आश्वासन दे, लङ्कापुरीको व्याकुल करके, रावणको चकमा देकर उसे अपना भयानक बल दिखा, वैदेहीको प्रणाम

करके पुनः समुद्रके बीचसे होकर लौट जानेका विचार किया ।

ततः स कपिशार्दूलः स्वामिसंदर्शनोत्सुकः ॥ २५ ॥

आरुरोह गिरिश्रेष्ठमरिष्टमरिमर्दनः । ( अब यहाँ उनके लिये कोई कार्य बाकी नहीं रह गया था; अतः ) अपने स्वामी श्रीरामचन्द्रजीके दर्शन के लिये उत्सुक हो वे शत्रुमर्दन कपिश्रेष्ठ हनुमान् पर्वतोंमें उत्तम अरिष्ट गिरिपर चढ़ गये ॥ २५३ ॥

तुङ्गपद्मकजुष्टाभिर्नीलाभिर्वनराजिभिः ॥ २६ ॥

सोत्तरीयमिवाम्भोदैः शृङ्गान्तरविलम्बिभिः । ऊँचे - ऊँचे पद्मकों —— पद्म के समान वर्णवाले वृक्षोंसे सेवित नीली वनश्रेणियाँ मानो उस पर्वतका परिधान वस्त्र थीं । शिखरोंपर लटके हुए श्याम मेघ उसके लिये उत्तरीय वस्त्र ( चादर ) - से प्रतीत होते थे । २६३ ॥ बोध्यमानमिव प्रीत्या दिवाकरकरैः शुभैः ॥ २७ ॥

उन्मिषन्तमिवोद्भूतैर्लोचनैरिव धातुभिः ।

तोयौघनिःस्वनैर्मन्द्रः प्राधीतमिव पर्वतम् ॥ २८ ॥

सूर्य की कल्याणमयी किरणें प्रेमपूर्वक उसे जगाती - सी

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सुन्दरकाण्डे षट्पञ्चाशः सर्गः १०१३ जान पड़ती थीं । नाना प्रकारके धातु मानो उसके खुले हुए नेत्र थे, जिनसे वह सब कुछ देखता हुआ - सा स्थित था । पर्वतीय नदियोंकी जलराशिके गम्भीर घोष से ऐसा लगता था, मानो वह पर्वत सखर वेदपाठ कर रहा हो ॥। २७-२८ ।

प्रगीतमिव विस्पष्टं नानाप्रस्रवणस्वनैः ।

देवदारुभिरुद्भूतैरूर्ध्वबाहुमिव स्थितम् ॥ २ ९ ॥

अनेकानेक झरनोंके कलकल नादसे वह अरिष्टगिरि स्पष्टतया गीत - सा गा रहा था । ऊँचे - ऊँचे देवदारु वृक्षोंके कारण मानो हाथ ऊपर उठाये खड़ा था ॥ २ ९ ॥

प्रपातजलनिर्घोषैः प्राकुष्टमिव सर्वतः ।

वेपमानमिव श्यामैः कम्पमानैः शरद्वनैः ॥ ३० ॥

सब ओर जल प्रपातोंकी गम्भीर ध्वनिसे व्याप्त होनेके कारण चिल्लाता या हल्ला मचाता - सा जान पड़ता था । झूमते हुए सरकंडों के श्याम वनोंसे वह काँपता - सा प्रतीत होता था ॥ ३० ॥

वेणुभिर्मारुतोद्धूतैः कूजन्तमिव कीचकैः ।

निःश्वसन्तमिवामर्षाद् घोरैराशीविषोत्तमैः ॥ ३१ ॥

वायुके झोंके खाकर हिलते और मधुरध्वनि करते बाँसोंसे उपलक्षित होनेवाला वह पर्वत मानो बाँसुरी बजा रहा था । भयानक विषधर सपके फुंकारसे लंबी साँस खींचता सा जान पड़ता था ॥ ३१ ॥

नीहारकृत गम्भीरैर्ध्यायन्तमिव गहरैः ।

मेघपादनिभैः पादैः प्रक्रान्तमिव सर्वतः ॥ ३२ ॥

कुहरे के कारण गहरी प्रतीत होनेवाली निश्चल गुफाओं-द्वारा वह ध्यान - सा कर रहा था । उठते हुए मेघ के समान शोभा पानेवाले पार्श्ववर्ती पर्वतोद्वारा सब ओर विचरता - सा प्रतीत होता था ॥ ३२ ॥

जम्भमाणमिवाकाशे शिखरैरभ्रमालिभिः ।

कूटैश्च बहुधा कीर्ण शोभितं बहुकन्दरैः ॥ ३३ ॥

मैत्रमालाओंसे अलंकृत शिखरोंद्वारा वह आकाशमें अँगड़ाई - सी ले रहा था । अनेकानेक शृङ्खोंसे व्याप्त तथा बहुत - सी कन्दराओंसे सुशोभित था ॥ ३३ ॥

सालतालैश्च कर्णैश्च वंशैश्च बहुभिर्वृतम् ।

लतावितानैर्विततैः पुष्पवद्भिरलंकृतम् ॥ ३४ ॥

साल, ताल, कर्ण और बहुसंख्यक बाँसके वृक्ष उसे सब ओरसे घेरे हुए थे । फूर्लोके भारसे लदे और फैले हुए लता- वितान उस पर्वत के अलंकार थे ॥ ३४ ॥

नानामृगगणैः कीर्णे धातुनिष्यन्दभूषितम् ।

बहुप्रस्रवणोपेतं शिलासंचयसंकटम् ॥ ३५ ॥

नाना प्रकार के पशु वहाँ सब ओर भरे हुए थे । विविध धातुओंके पिघलनेसे उसकी बड़ी शोभा हो रही थी । वह पर्वत बहुसंख्यक झरनोंसे विभूषित तथा राशि - राशि शिलाओंसे भरा हुआ था ॥ ३५ ॥

महर्षि यक्षगन्धर्वकिन रोरगसेवितम् 1 लतापादपसम्बाधं सिंहाधिष्ठितकन्दरम् ॥ ३६ ॥

महर्षि, यक्ष, गन्धर्व, किन्नर और नागगण वहाँ निवास करते थे । लताओं और वृक्षोंद्वारा वह सब ओरसे आच्छादित था । उसकी कन्दराओंमें सिंह दहाड़ रहे थे ।

व्याघ्रादिभिः समाकीर्ण स्वादुमूलफलद्रुमम् ।

आरुरोहानिलसुतः पर्वतं लवगोत्तमः ॥ ३७ ॥

रामदर्शनशीघ्रेण प्रहर्षेणाभिचोदितः । व्याघ्र आदि हिंसक जन्तु भी वहाँ सब ओर फैले हुए थे । स्वादिष्ट फलोंसे लदे हुए वृक्ष और मधुर कन्द - मूल आदिकी वहाँ बहुतायत थी । ऐसे रमणीय पर्वतपर वानर-शिरोमणि पवनकुमार हनुमान् जी श्रीरामचन्द्रजी के दर्शनकी शीघ्रता और अत्यन्त हर्षसे प्रेरित होकर चढ़ गये ॥ ३७३ ॥

तेन पादतलकान्ता रम्येषु गिरिसानुषु ॥ ३८ ॥

सघोषाः समशीर्यन्त शिलाचूर्णीकृतास्ततः । उस पर्वतके रमणीय शिखरोंपर जो शिलाएँ थीं, वे उनके पैरोंके आधातसे भारी आवाजके साथ चूर - चूर होकर बिखर जाती थीं ॥ ३८३ ॥

स तमारुह्य शैलेन्द्रं व्यवर्धत महाकपिः ॥ ३ ९ ॥ दक्षिणादुत्तरं पारं प्रार्थयँल्लवणाम्भसः । उस शैलराज अरिष्टपर आरूढ़ हो महाकपि हनुमान् जीने समुद्र के दक्षिण तटसे उत्तर तटपर जानेकी इच्छासे अपने शरीरको बहुत बड़ा बना लिया ॥ ३ ९ ३ ॥ अधिरुह्य ततो वीरः पर्वतं पवनात्मजः ॥ ४० ॥

ददर्श सागरं भीमं भीमोर गनिषेवितम् । उस पर्वत पर आरूढ़ होने के पश्चात् वीरवर पवनकुमारने भयानक सर्पोंसे सेवित उस भीषण महासागरकी ओर दृष्टिपात किया ॥ ४०३ ॥

स मारुत इवाकाशं मारुतस्यात्मसम्भवः ॥ ४१ ॥

प्रपेदे हरिशार्दूलो दक्षिणादुत्तरां दिशम् । वायुदेवताके औरस पुत्र कपिश्रेष्ठ हनुमान् जैसे वायु आकाशमै तीव्रगति से प्रवाहित होती है, उसी प्रकार दक्षिणसे उत्तर दिशा की ओर बड़े वेगसे ( उछलकर ) चले ॥ ४१३ ॥

स तदा पीडितस्तेन कपिना पर्वतोत्तमः ॥ ४२ ॥

रास विविधैर्भूतैः प्राविशद् वसुधातलम् ।

कम्पमानैश्च शिखरैः पतद्भिरपि च द्रुमैः ॥ ४३ ॥

हनुमान् जी के पैरोंका दबाव पड़नेके कारण उस श्रेष्ठ पर्वतसे बड़ी भयंकर आवाज हुई और वह अपने काँपते हुए शिखरों, टूटकर गिरते हुए वृक्षों तथा भाँति - भाँतिके प्राणियों सहित तत्काल धरती में धँस गया ॥ ४२-४३ ॥

तस्योरुवेगोन्मथिताः पादपाः पुष्पशालिनः ।

निपेतुर्भूतले भग्नाः शक्रायुधहता इव ॥ ४४ ॥

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१०१४ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे उनके महान् वेगसे कम्पित हो फूलोंसे लदे हुए बहुसंख्यक वृक्ष इस प्रकार पृथ्वीपर गिर पड़े, मानो उन्हें वज्र मार गया हो ॥ ४४ ॥

कन्दरोदरसंस्थानां पीडितानां महौजसाम् ।

सिंहानां निनदो भीमो नभो भिन्दन् हि शुश्रुवे ॥४५ ॥

उस समय उस पर्वतकी कन्दराओंमें रहकर दबे हुए महाबली सिंहोंका भयंकर नाद आकाशको फाड़ता हुआ - सा सुनायी दे रहा था ॥ ४५ ॥

त्रस्तव्याविद्धवसना विद्याधर्यः समुत्पेतुः भयकै कारण जिनके आभूषण उलट - पलट गये पर्वतसे ऊपर की ओर उड़ अतिप्रमाणा बलिनो निपीडितशिरोग्रीवा

व्याकुलीकृतभूषणाः ।

सहसा धरणीधरात् ॥ ४६ ॥

वस्त्र ढीले पड़ गये थे और थे, वे विद्याधरियाँ सहसा उस चलीं ॥ ४६ ॥

दीप्तजिह्ना महाविषाः ।

व्यवेष्टन्त महाहयः ॥ ४७ ॥

बड़े - बड़े आकार और चमकीली जीभवाले महाविषैले बलवान् सर्प अपने फन तथा गलेको दबाकर कुण्डलाकार हो गये ॥ ४७ ॥

किंनरोर गगन्धर्वयक्ष विद्याधरास्तथा I पीडितं तं नगवरं त्यक्त्वा गगनमास्थिताः ॥ ४८ ॥

किन्नर, नाग, गन्धर्व, यक्ष और विद्याधर उस धँसते हुए पर्वतको छोड़कर आकाश में स्थित हो गये ॥ ४८ ॥

स च भूमिधरः श्रीमान् बलिना तेन पीडितः ।

सवृक्षशिखरोदग्रः प्रविवेश रसातलम् ॥ ४ ९ ॥

बलवान् हनुमान् जीके वेगसे दबकर वह शोभाशाली महीधर वृक्षों और ऊँचे शिखरों सहित रसातल में चला गया ॥

दशयोजनविस्तारस्त्रिंशद्योजनमुच्छ्रितः ।

धरण्यां समतां यातः स बभूव धराधरः ॥ ५० ॥

अरिष्ट पर्यंत तीस योजन ऊँचा और दस योजन चौड़ा था । फिर भी उनके पैरोंसे दबकर भूमिके बराबर हो गया ॥ ५० ॥

सलिलङ्घयिषुर्भीमं सलीलं लवणार्णवम् ।

कल्लोलास्फालवेलान्तमुत्पपात नभो हरिः ॥ ५१ ॥

जिसकी ऊँची - ऊँची तर उठकर अपने किनारोंका चुम्बन करती थीं, उस खारे पानी के भयानक समुद्रको लीलापूर्वक लाँघ जानेकी इच्छासे हनुमानजी आकाशमें उड़ चले ॥ ५१ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये सुन्दरकाण्डे षट्पञ्चाशः सर्गः ॥ ५६ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आरामायण आदिकाव्यके सुन्दरकाण्डमें छप्पनयाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ५६ ॥

सप्तपञ्चाशः सर्गः हनुमानजी का समुद्रको लाँघकर जाम्बवान् और अङ्गद आदि सुहृदोंसे मिलना

आप्लुत्य च महावेगः पक्षवानिव पर्वतः ।

भुजङ्गयक्षगन्धर्व प्रबुद्धकमलोत्पलम् ॥ १ ॥

स चन्द्रकुमुदं रम्यं सार्ककारण्डवं शुभम् ।

तिष्यश्रवणकादम्बमभ्रशैवलशाद्वलम् ॥ २ ॥

पुनर्वसुमहामनं लोहिताङ्गमहाग्रहम् ।

ऐरावतमहाद्वीपं स्वातीहं सविलासितम् ॥ ३ ॥

वातसंघात जालो र्मिचन्द्रांशुशिशिराम्बुमत् ।

हनूमानपरिश्रान्तः पुप्लुवे गगनार्णवम् ॥ ४ ॥

पङ्खधारी पर्वतके समान महान् वेगशाली हनुमान्जी बिना थके - माँदे उस सुन्दर एवं रमणीय आकाशरूपी समुद्र-को पार करने लगे, जिसमें नाग, यक्ष और गन्धर्व खिले हुए कमल और उत्पलके समान थे । चन्द्रमा कुमुद और सूर्य जलकुक्कुटके समान थे । पुष्य और श्रवण नक्षत्र कलहंस तथा बादल सेवार और घासके तुल्य थे । पुनर्वसु विशाल मत्स्य और मंगल बड़े भारी ग्राहके सदृश थे । ऐरावत हाथी वहाँ महान् द्वीप - सा प्रतीत होता था । वह आकाशरूपी समुद्र स्वातीरूपी इसके विलाससे सुशोभित था तथा वायु-समूहरूप तरङ्गों और चन्द्रमाकी किरणरूप शीतल जलसे भरा हुआ था ॥ १-४ ॥

ग्रसमान इवाकाशं ताराधिपमिवोल्लिखन् ।

हरन्निव सनक्षत्रं गगनं सार्कमण्डलम् ॥ ५ ॥

अपारमपरिश्रान्तश्चाम्बुधिं समगाहत ।

हनूमान् मेघजालानि विकर्षन्निव गच्छति ॥ ६ ॥

हनुमानजी आकाशको अपना ग्रास बनाते हुए, चन्द्र-मण्डलको नखोंसे खरोंचते हुए, नक्षत्रों तथा सूर्यमण्डलसहित अन्तरिक्षको समेटते हुए और बादलोंके समूहको खींचते हुए - से अनायास ही अपार महासागरके पार चले जा रहे थे ॥ ५-६ ॥

पाण्डुरारुणवर्णानि नीलमाञ्जिष्टकानि च ।

हरितारुणवर्णानि महाभ्राणि चकाशिरे ॥ ७ ॥

उस समय आसमान में सफेद, लाल, नीले, मंजीठके रंगके, हरे और अरुण वर्णके बड़े - बड़े मेथ शोभा पा रहे थे ॥ ७ ॥

प्रविशन्नभ्रजालानि निष्क्रमंश्च पुनः पुनः ।

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समुद्रको लाँघकर लङ्कासे लौटते हुए मारुति

पृष्ठ 195

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सप्तपञ्चाशः सर्गः १०१५ सुन्दरकाण्डे प्रकाशश्चाप्रकाशश्च चन्द्रमा इव दृश्यते ॥ ८ ॥

वे कभी उन मेघ - समूहोंमें प्रवेश करते और कभी बाहर निकलते थे । बारंबार ऐसा करते हुए हनुमानजी छिपते और प्रकाशित होते हुए चन्द्रमाके समान दृष्टिगोचर हो रहे थे ॥ ८ ॥

विविधा भ्रघनापन्नगोचरो धवलाम्बरः ।

दृश्यादृश्यतनुर्वीरस्तथा चन्द्रायते ऽम्बरे ॥ ९ ॥

नाना प्रकार के मेघों की घटाओंके भीतर होकर जाते हुए घवलाम्बरधारी वीरवर हनुमान्जीका शरीर कभी दीखता था और कभी अदृश्य हो जाता था; अतः वे आकाश में बादलोंकी आइमें छिपते और प्रकाशित होते चन्द्रमाके समान जान पड़ते थे ॥ ९ ॥

ताक्ष्यमाणो गगने स बभौ वायुनन्दनः ।

दारयन् मेघवृन्दानि निष्पतं पुनः पुनः ॥ १० ॥

बारंबार मेघ - समूहों को विदीर्ण करने और उनमें होकर निकलने के कारण वे पवनकुमार हनुमान् आकाशमें गरुड़के समान प्रतीत होते थे ॥ १० ॥

नदन् नादेन महता मेघस्वनमहास्वनः ।

प्रवरान् राक्षसान् हत्वा नाम विश्राव्य चात्मनः ॥११ ॥

आकुलां नगरीं कृत्वा व्यथयित्वा च रावणम् ।

अर्दयित्वा महावीरान् वैदेहीमभिवाद्य च ॥ १२ ॥

आजगाम महातेजाः पुनर्मध्येन सागरम् । इस प्रकार महातेजस्वी हनुमान् अपने महान् सिंहनादसे मेघोंकी गम्भीर गर्जनाको भी मात करते हुए आगे बढ़ रहे थे । वे प्रमुख राक्षसोंको मारकर अपना नाम प्रसिद्ध कर चुके थे । बड़े - बड़े वीरोंको रौंदकर उन्होंने लङ्कानगरीको व्याकुल तथा रावणको व्यथित कर दिया था । तत्पश्चात् विदेहनन्दिनी सीताको नमस्कार करके वे चले और तीव्र गतिसे पुनः समुद्रके मध्यभागमें आ पहुँचे ॥११-१२३ ॥ पर्वतेन्द्रं सुनाभं च समुपस्पृश्य वीर्यवान् ॥ १३ ॥

ज्यामुक्त इव नाराचो महावेगोऽभ्युपागमत् । वहाँ पर्वतराज सुनाभ ( मैनाक ) का स्पर्श करके वे पराक्रमी एवं महान् वेगशाली वानर - वीर धनुषसे छूटे हुए बाणकी भाँति आगे बढ़ गये ॥ १३३ ॥

स किंचिदारात् सम्प्राप्तः समालोक्य महागिरिम् ॥१४ ॥

महेन्द्रं मेघसंकाशं ननाद स महाकपिः । उत्तर तट के कुछ निकट पहुँचनेपर महागिरि महेन्द्रपर दृष्टि पड़ते ही उन महाकपिने मेघ के समान बड़े जोरसे गर्जना की ॥ १४३ ॥

स पूरयामास कपिर्दिशो दश समन्ततः ॥ १५ ॥

नदन् नादेन महता मेघवनमहाखनः । उस समय मेघकी भाँति गम्भीर स्वर से बड़ी भारी गर्जना करके उन वानरवीरने सब ओरसे दसों दिशाओं को कोलाहल-पूर्ण कर दिया ॥ १५३ ॥

स तं देशमनुप्राप्तः सुहृद्दर्शनलालसः ॥ १६ ॥

ननाद सुमहानादं लाङ्गलं चाप्यकम्पयत् । फिर वे अपने मित्रोंको देखने के लिये उत्सुक होकर उनके विश्रामस्थान की ओर बढ़े और पूँछ हिलाने एवं जोर-जोरसे सिंहनाद करने लगे ॥ १६३ ॥

तस्य नानद्यमानस्य सुपर्णाचरिते पथि ॥ १७ ॥

फलतीवास्य घोषेण गगनं सार्कमण्डलम् । जहाँ गरुड़ चलते हैं, उसी मार्गपर बारंबार सिंहनाद करते हुए हनुमानजीके गम्भीर घोष सूर्यमण्ड आकाश मानो फटा जा रहा था ॥ १७३ ॥

ये तु तत्रोत्तरे कूले समुद्रस्य महाबलाः ॥ १८ ॥

पूर्व संविष्ठिताः शूरा वायुपुत्रदिदृक्षवः ।

महतो वायुनुन्नस्य तोयदस्येव निःखनम् ।

शुश्रुवुस्ते तदा घोषमूरुवेगं हनूमतः ॥ १ ९ ॥

उस समय वायुपुत्र हनुमान के दर्शनकी इच्छा से जो शूरवीर महाबली वानर समुद्रके उत्तर तटपर पहले से ही बैठे थे, उन्होंने वायुसे टकराये हुए महान् मेघकी गर्जना के समान हनुमान्जीका जोर - जोर से सिंहनाद सुना ॥ १८-१९ ॥

ते दीनमनसः सर्वे शुश्रुवुः काननौकसः ।

वानरेन्द्रस्य निर्घोषं पर्जन्यनिनदोपमम् ॥ २० ॥

अनिष्टकी आशङ्का से जिनके मनमें दीनता छा गयी थी, उन समस्त वनवासी वानरोंने उन वानरश्रेष्ठ हनुमान्का मेघ-गर्जना के समान सिंहनाद सुना ॥ २० ॥

निशम्य नदतो नादं वानरास्ते समन्ततः ।

सर्वे सुहृद्दर्शनकाङ्क्षिणः ॥ २१ ॥

बभूवुरुत्सुकाः गर्जते हुए पवन कुमारका वह सिंहनाद सुनकर सब ओर बैठे हुए वे समस्त वानर अपने सुहृद् हनुमान् जीको देखनेकी अभिलाषासे उत्कण्ठित हो गये ॥ २१ ॥

जाम्बवान् स हरिश्रेष्ठः प्रीतिसंहृष्टमानसः ।

उपामन्त्रय हरीन् सर्वानिदं वचनमब्रवीत् ॥ २२ ॥

वानर - भालुओं में श्रेष्ठ जाम्बवान् के मनमें बड़ी प्रसन्नता हुई । वे हर्षसे खिल उठे और सब वानरोंको निकट बुलाकर इस प्रकार बोले -- ॥ २२ ॥

सर्वथा कृतकार्योऽसौ हनूमान् नात्र संशयः ।

न ह्यस्याकृतकार्यस्य नाद एवंविधो भवेत् ॥ २३ ॥

' इसमें संदेह नहीं कि हनुमान् जी सब प्रकारसे अपना कार्य सिद्ध करके आ रहे हैं । कृतकार्य हुए बिना इनकी ऐसी गर्जना नहीं हो सकती ॥ २३ ॥

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१०१६ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे

तस्य बाहूरुवेगं च निनादं च महात्मनः ।

निशम्य हरयो हृष्टाः समुत्पेतुर्यतस्ततः ॥ २४ ॥

महात्मा हनुमान जी की भुजाओं और जाँघोंका महान् वेग देख तथा उनका सिंहनाद सुन सभी वानर हर्षमें भरकर इधर-उधर उछलने - कूदने लगे ॥ २४ ॥

ते नगाप्रान्नगाश्राणि शिखराच्छिखराणि च ।

प्रहृष्टाः समपद्यन्त हनूमन्तं दिदृक्षवः ॥ २५ ॥

हनुमान्जीको देखनेकी इच्छासे वे प्रसन्नतापूर्वक एक वृक्षसे दूसरे वृक्षोंपर तथा एक शिखरसे दूसरे शिखरोंपर चढ़ने लगे ॥

ते प्रीताः पादपाग्रेषु गृह्य शाखामवस्थिताः ।

वासांसि च प्रकाशानि समाविध्यन्त वानराः ॥ २६ ॥

वृक्षोंकी सबसे ऊँची शाखापर खड़े होकर वे प्रीति-युक्त वानर अपने स्पष्ट दिखायी देनेवाले वस्त्र हिलाने लगे ॥ २६ ॥

गिरिगहर संलीनो यथा गर्जति मारुतः ।

एवं जगर्ज बलवान् हनूमान् मारुतात्मजः ॥ २७ ॥

जैसे पर्वतकी गुफाओं में अवरुद्ध हुई वायु बड़े जोर शब्द करती है, उसी प्रकार बलवान् पवनकुमार हनुमान्ने गर्जना की ॥ २७ ॥

तमभ्रघनसंकाशमापतन्तं महाकपिम् ।

दृष्ट्वा ते वानराः सर्वे तस्थुः प्राञ्जलयस्तदा ॥ २८ ॥

मेघोंकी घटा समान पास आते हुए महाकपि हनुमान्को देखकर वे सब वानर उस समय हाथ जोड़कर खड़े हो गये ॥ २८ ॥

ततस्तु वेगवान वीरो गिरेर्गिरिनिभः कपिः ।

निपपात गिरेस्तस्य शिखरे पादपाकुले ॥ २ ९ ॥

तत्पश्चात् पर्वतके समान विशाल शरीरवाले वेगशाली वीरवानर हनुमान् जो अरिष्ट पर्वतसे उछलकर चले थे, वृक्षोंसे भरे हुए महेन्द्र गिरिके शिखर पर कूद पड़े ॥ २ ९ ॥

हर्षेणापूर्यमाणोऽस रम्ये पर्वत निर्झरे ।

छिन्नपक्ष इवाकाशात् पपात धरणीधरः ॥ ३० ॥

हर्षसे भरे हुए हनुमानजी पर्वतके रमणीय झरनेके निकट पंख कटे हुए पर्वतके समान आकाशसे नीचे आ गये ॥ ३० ॥

ततस्ते प्रीतमनसः सर्वे वानरपुङ्गवाः ।

हनूमन्तं महात्मानं परिवार्योपतस्थिरे ॥ ३१ ॥

उस समय वे सभी श्रेष्ठ वानर प्रसन्नचित्त हो महात्मा हनुमानजीको चारों ओरसे घेरकर खड़े हो गये ॥ ३१ ॥

परिवार्य च ते सर्वे परां प्रीतिमुपागताः ।

प्रहृष्टवदनाः सर्वे तमागतमुपागमन् ॥ ३२ ॥

उपायनानि चादाय मूलानि च फलानि च ।

प्रत्यर्चयन् हरिश्रेष्ठं हरयो मारुतात्मजम् ॥ ३३ ॥

उन्हें घेरकर खड़े होने से उन सबको बड़ी प्रसन्नता हुई । वे सब वानर प्रसन्नमुख होकर तुरंतके आये हुए पवनकुमार कविश्रेष्ठ हनुमान् के पास भाँति - भाँति की भेंट-सामग्री तथा फल - मूल लेकर आये और उनका स्वागत-सत्कार करने लगे || ३२-३३ ॥

विनेदुर्मुदिताः केचित् केचित् किलकिलां तथा ।

हृष्टाः पादपशाखाश्च आनिन्युर्वानरर्षभाः ॥ ३४ ॥

कोई आनन्दमग्न होकर गर्जने लगे, कोई किलकारियाँ भरने लगे और कितने ही श्रेष्ठ वानर हर्षसे भरकर हनुमान् जी-के बैठने के लिये वृक्षोंकी शाखाएँ तोड़ लाये ॥ ३४ ॥

हनूमांस्तु गुरून वृद्धाआम्बवत्प्रमुखांस्तदा ।

कुमारमङ्गदं चैव सोऽवन्दत महाकपिः ॥ ३५ ॥

महाकपि हनुमान् जीने जाम्बवान् आदि वृद्ध गुरुजनों तथा कुमार अङ्गदको प्रणाम किया ॥ ३५ ॥

स ताभ्यां पूजितः पूज्यः कपिभिश्च प्रसादितः ।

दृष्टा देवीति विक्रान्तः संक्षेपेण न्यवेदयत् ॥ ३६ ॥

फिर जाम्बवान् और अङ्गदने भी आदरणीय हनुमान् जी-का आदर - सत्कार किया तथा दूसरे दूसरे वानरोंने भी उनका सम्मान करके उनको संतुष्ट किया । तत्पश्चात् उन पराक्रमी वानरवीरने संक्षेपमें निवेदन किया- ' मुझे सीतादेवीका दर्शन हो गया ' ॥ ३६ ॥

निषसाद च हस्तेन गृहीत्वा वालिनः सुतम् ।

रमणीये वनोद्देशे महेन्द्रस्य गिरेस्तदा ॥ ३७ ॥

हनूमानब्रवीत् पृष्टस्तदा तान् वानरर्षभान् ।

अशोकवनिका संस्था दृष्टा सा जनकात्मजा ॥ ३८ ॥

तदनन्तर वालिकुमार अङ्गदका हाथ अपने हाथमें लेकर हनुमान् जी महेन्द्रगिरिके रमणीय वनप्रान्तमें जा बैठे और सबके पूछने पर उन वानरशिरोमणियोसे इस प्रकार बोले—

' जनकनन्दिनी सीता लङ्काके अशोकवन में निवास करती हैं ।

वहीं मैंने उनका दर्शन किया है ॥ ३७-३८ ॥

रक्ष्यमाणा सुघोराभी राक्षसीभिरनिन्दिता ।

एकवेणीधरा बाला रामदर्शनलालसा ॥ ३ ९ ॥

उपवासपरिश्रान्ता मलिना जटिला कृशा । ' अत्यन्त भयंकर आकारवाली राक्षसियाँ उनकी रखवाली करती हैं । साध्वी सीता बड़ी भोली - भाली हैं । वे एक वेणी धारण किये वहाँ रहती हैं और श्रीरामचन्द्रजी के दर्शन के लिये बहुत ही उत्सुक हैं । उपवासके कारण बहुत थक गयी हैं, दुर्बल और मलिन हो रही हैं तथा उनके केश जटाके रूपमें परिणत हो गये हैं ' ॥ ३ ९ ३ ॥

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सुन्दरकाण्डे अष्टपञ्चाशः सर्गः १०१७ ततो दृष्टेति वचनं महार्थममृतोपमम् ॥ ४० ॥

निशम्य मारुतेः सर्वे मुदिता वानराभवन् । उस समय ‘ सीताका दर्शन हो गया ' यह वचन वानरों-को अमृत समान प्रतीत हुआ । यह उनके महान् प्रयोजन-की सिद्धिका सूचक था । हनुमान्जीके मुखसे यह शुभ संवाद सुनकर सब वानर बड़े प्रसन्न हुए ॥ ४०३ ॥

वेडन्त्यन्ये नदन्त्यन्ये गर्जन्त्यन्ये महाबलाः ॥ ४१ ॥

चक्रुः किलकिलामन्ये प्रतिगर्जन्ति चापरे । कोई हर्षनाद और कोई सिंहनाद करने लगे । दूसरे महाबली वानर गर्जने लगे । कितने ही किलकारियाँ भरने लगे और दूसरे वानर एककी गर्जनाके उत्तर में स्वयं भी गर्जना करने लगे ॥ ४१३ ॥

केचिदुच्छ्रितलाङ्गलाः प्रहृष्टाः कपिकुञ्जराः ॥ ४२ ॥

आयताञ्चितदीर्घाणि लाङ्गलानि प्रविव्यधुः । बहुत - से कपिकुञ्जर हर्ष से उल्लसित हो अपनी पूँछ ऊपर उठाकर नाचने लगे । कितने ही अपनी लंबी और मोटी पूँछें घुमाने या हिलाने लगे ॥ ४२३ ॥

अपरे तु इनूमन्तं श्रीमन्तं वानरोत्तमम् ॥ ४३ ॥

आप्लुत्य गिरिश्टङ्गेषु संस्पृशन्ति स्म हर्षिताः । कितने ही वानर हर्षोल्लाससे भरकर छलाँगे भरते हुए पर्वतशिखरोंपर वानरशिरोमणि श्रीमान् हनुमान् को छूने लगे ॥ ४३३ ॥

उक्तवाक्यं हनूमन्तमङ्गदस्तु तदाब्रवीत् ॥ ४४ ॥

सर्वेषां हरिवीराणां मध्ये वाचमनुत्तमाम् । हनुमानजी की उपर्युक्त बात सुनकर अङ्गदने उस समय समस्त वानरवीरोंके बीचमें यह परम उत्तम बात कही ॥ ४४३ ॥

सत्त्वे वीर्ये न ते कश्चित् समो वानर विद्यते ॥ ४५ ॥

यदवप्लुत्य विस्तीर्ण सागरं पुनरागतः । ' वानरश्रेष्ठ! बल और पराक्रममें तुम्हारे समान कोई नहीं है; क्योंकि तुम इस विशाल समुद्रको लाँघकर फिर इस पार लौट आये ॥ ४५३ ॥

जीवितस्य प्रदाता नस्त्वमेको वानरोत्तम ॥ ४६ ॥

त्वत्प्रसादात् समेष्यामः सिद्धार्था राघवेण ह । ' कपिशिरोमणे! एकमात्र तुम्हीं हमलोगोंके जीवनदाता हो । तुम्हारे प्रसादसे ही हम सब लोग सफलमनोरथ होकर श्रीरामचन्द्र जीसे मिलेंगे ॥ ४६३ ॥

अहो स्वामिनि ते भक्तिरहो वीर्यमहो धृतिः ॥ ४७ ॥

दिष्टया दृष्टा त्वया देवी रामपत्नी यशस्विनी । दिष्टया त्यक्ष्यति काकुत्स्थः शोकं सीतावियोगजम् । ४८ । " अपने स्वामी श्रीरघुनाथजीके प्रति तुम्हारी भक्ति अद्भुत । तुम्हारा पराक्रम और धैर्य भी आश्चर्यजनक है । बड़े सौभाग्य की बात है कि तुम श्रीरामचन्द्रजीकी यशस्विनी पत्नी सीतादेवी का दर्शन कर आये, अब भगवान् श्रीराम सीताके वियोगसे उत्पन्न हुए शोकको त्याग देंगे, यह भी सौभाग्यका ही विषय है ' ॥ ४७-४८ ॥

ततोऽङ्गदं हनूमन्तं जाम्बवन्तं च वानराः ।

परिवार्य प्रमुदिता भेजिरे विपुलाः शिलाः ॥ ४ ९ ॥

उपविष्टा गिरेस्तस्य शिलासु विपुलासु ते ।

श्रोतुकामाः समुद्रस्य लङ्घनं वानरोत्तमाः ॥ ५० ॥

दर्शनं चापि लङ्कायाः सीताया रावणस्य च ।

तस्थुः प्राञ्जलयः सर्वे हनूमद्वदनोन्मुखाः ॥ ५१ ॥

तत्पश्चात् सभी श्रेष्ठ वानर समुद्रलङ्घन, लङ्का, रावण एवं सीताके दर्शनका समाचार सुनने के लिये एकत्र हुए तथा अङ्गद, हनुमान् और जाम्बवान् को चारों ओरसे घेरकर पर्वतकी बड़ी-बड़ी शिलाओं पर आनन्दपूर्वक बैठ गये । वे सब - के - सब हाथ जोड़े हुए थे और उन सबकी आँखें हनुमान्जीके मुखपर लगी थीं ॥ ४ ९ -५१ ॥

तस्थौ तत्राङ्गदः श्रीमान् वानरैर्बहुभिर्वृतः ।

उपास्यमानो विबुधैर्दिवि देवपतिर्यथा ॥ ५२ ॥

जैसे देवराज इन्द्र स्वर्गमें देवताओंद्वारा सेवित होकर बैठते हैं, उसी प्रकार बहुतेरे वानरोंसे घिरे हुए श्रीमान् अङ्गद वहाँ बीचमें विराजमान हुए ॥ ५२ ॥

हनूमता कीर्तिमता यशस्विना तथाङ्गदेनाङ्गदनद्धबाहुना 1 मुदा ताध्यासितमुन्नतं मह न्महीधरा ज्वलितं श्रियाभवत् ॥ ५३ ॥

कीर्तिमान् एवं यशस्वी हनुमानजी तथा बाँहों में भुजबंद धारण किये अङ्गदके प्रसन्नतापूर्वक बैठनेसे वह ऊँचा एवं महान् पर्वतशिखर दिव्य कान्तिसे प्रकाशित हो उठा ॥ ५३ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये सुन्दरकाण्डे सप्तपञ्चाशः सर्गः ॥ ५७ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्धरामायण आदिकाव्यके सुन्दरकाण्डमें सत्तावनवाँ सगँ पूरा हुआ ॥ ५७ ॥

अष्टपञ्चाशः सर्गः 71 जाम्बवान् के पूछने पर हनुमान्जीका अपनी लङ्कायात्राका सारा वृत्तान्त सुनाना ततस्तस्य गिरेः शृङ्गे महेन्द्रस्य महाबलाः । तदनन्तर हनुमान् आदि महाबली वानर महेन्द्रगिरि के हनुमत्प्रमुखाः प्रीतिं हरयो जग्मुरुत्तमाम् ॥ १ ॥ शिखरपर परस्पर मिलकर बड़े प्रसन्न हुए ॥ १ ॥

वा ० रा ० ५.८.२-

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१०१८ श्रीमद्वाल्मीकीय रामायणे

प्रीतिमत्सूपविष्टेषु वानरेषु महात्मसु ।

तं ततः प्रतिसंहृष्टः प्रीतियुक्तं महाकपिम् ॥ २ ॥

जाम्बवान् कार्यवृत्तान्तमपृच्छदनिलात्मजम् ।

कथं दृष्टा त्वया देवी कथं वा तत्र वर्तते ॥ ३ ॥

तस्यां चापि कथं वृत्तः क्रूरकर्मा दशाननः ।

तत्त्वतः सर्वमेतन्नः प्रब्रूहि त्वं महाकपे ॥ ४ ॥

जब सभी महामनस्वी वानर वहाँ प्रसन्नतापूर्वक बैठ गये, तब हर्षमें भरे हुए जाम्बवान्ने उन पवनकुमार महाकपि हनुमान से प्रेमपूर्वक कार्यसिद्धिका समाचार पूछा-' महाकपे | तुमने देवी सीताको कैसे देखा? वे वहाँ किस प्रकार रहती हैं? और क्रूरकर्मा दशानन उनके प्रति कैसा बर्ताव करता है? ये सब बातें तुम हमें ठीक - ठीक बताओ ॥ २-४ ॥

सम्मार्गिता कथं देवी किं च सा प्रत्यभाषत ।

श्रुतार्थाश्चिन्तयिष्यामो भूयः कार्यविनिश्चयम् ॥ ५ ॥

' तुमने देवी सीताको किस प्रकार ढूँढ़ निकाला और उन्होंने तुमसे क्या कहा? इन सब बातोंको सुनकर हम लोग आगे के कार्यक्रमका निश्चितरूपसे विचार करेंगे ॥ ५ ॥

यश्चार्थस्तत्र वक्तव्यो गतैरस्माभिरात्मवान् ।

रक्षितव्यं च यत्तत्र तद् भवान् व्याकरोतु नः ॥ ६ ॥

‘ वहाँ किष्किन्धामें चलनेपर हमलोगोंको कौन - सी बात कहनी चाहिये और किस बातको गुप्त रखना चाहिये? तुम बुद्धिमान् हो, इसलिये तुम्हीं इन सब बातोंपर प्रकाश डालो ' ॥ ६ ॥

स नियुक्तस्ततस्तेन सम्प्रहृष्टतनूरुहः ।

नमस्यशिरसा देव्यै सीतायै प्रत्यभाषत ॥ ७ ॥

जाम्बवान् के इस प्रकार पूछनेपर हनुमानजी के शरीर में रोमाञ्च हो आया । उन्होंने सीतादेवीको मन - ही - मन मस्तक झुकाकर प्रणाम किया और इस प्रकार कहा – ॥ ७ ॥

प्रत्यक्षमेव भवतां महेन्द्राप्रान् खमाप्लुतः ।

उदधेर्दक्षिणं पारं काङ्क्षमाणः समाहितः ॥ ८ ॥

" मैं आपलोगों के सामने ही समुद्रके दक्षिण तटपर जाने की इच्छा से सावधान हो महेन्द्रपर्वत के शिखरसे आकाश में उछला था ॥ ८ ॥

गच्छतश्च हि मे घोरं विघ्नरूपमिवाभवत् ।

काञ्चनं शिखरं दिव्यं पश्यामि सुमनोहरम् ॥ ९ ॥

स्थितं पन्थानमावृत्य मेने विघ्नं च तं नगम् । " आगे बढ़ते ही मैंने देखा एक परम मनोहर दिव्य सुवर्णमय शिखर प्रकट हुआ है, जो मेरी राह रोककर खड़ा

है । वह मेरी यात्राके लिये भयानक विघ्न - सा प्रतीत हुआ ।

मैंने उसे मूर्तिमान् विघ्न ही माना ॥ ९ ३ ॥

उपसंगम्य तं दिव्यं काञ्चनं नगमुत्तमम् ॥ १० ॥

कृता मे मनसा बुद्धिर्भेतव्योऽयं मयेति च । ' उस दिव्य उत्तम सुवर्णमय पर्वतके निकट पहुँचने पर मैंने मन - ही - मन यह विचार किया कि मैं इसे विदीर्ण कर डालूँ ॥ १०३ ॥

प्रहतस्य मया तस्य लाङ्गलेन महागिरेः ॥ ११ ॥

शिखरं सूर्यसंकाशं व्यशीर्यत सहस्रधा । " फिर तो मैंने अपनी पूँछसे उसपर प्रहार किया । उसकी टक्कर लगते ही उस महान् पर्वतके सूर्यतुल्य तेजस्वी शिखरके सहस्रों टुकड़े हो गये ॥ ११३ ॥

व्यवसायं च तं बुद्ध्वा स होवाच महागिरिः ॥ १२ ॥

पुत्रेति मधुरां वार्णो मनः प्रह्लादयन्निव ।

पितृव्यं चापि मां विद्धि सखायं मातरिश्वनः ॥ १३ ॥

' मेरे उस निश्चय को समझकर महागिरि मैनाकने मनको आह्लादित - सा करते हुए मधुर वाणीमें ' पुत्र ' कहकर मुझे पुकारा और कहा -'मुझे अपना चाचा समझो । मैं तुम्हारे पिता वायुदेवताका मित्र हूँ ॥ १२-१३ ॥

मैनाकमिति विख्यातं निवसन्तं महोदधौ ।

पक्षवन्तः पुरा पुत्र बभूवुः पर्वतोत्तमाः ॥ १४ ॥

" मेरा नाम मैनाक है और मैं यहाँ महासागर में निवास करता हूँ । बेटा! पूर्वकालमें सभी श्रेष्ठ पर्वत पङ्खधारी हुआ करते थे ॥ १४ ॥

छन्दतः पृथिवीं चेरुर्बाधमानाः समन्ततः ।

श्रुत्वा नगानां चरितं महेन्द्रः पाकशासनः ॥ १५ ॥

वज्रेण भगवान् पक्षौ चिच्छेदैषां सहस्रशः ।

अहं तु मोचितस्तस्मात् तव पित्रा महात्मना ॥ १६ ॥

" वे समस्त प्रजाको पीड़ा देते हुए अपनी इच्छा के अनुसार सब ओर विचरते रहते थे । पर्वतोंका ऐसा आचरण सुनकर पाकशासन भगवान् इन्द्रने वज्रसे इन सहस्रों पर्वतों. के पङ्ख काट डाले; परंतु उस समय तुम्हारे महात्मा पिताने मुझे इन्द्र के हाथसे बचा लिया ॥ १५-१६ ॥

मारुतेन तदा वत्स प्रक्षिप्तो वरुणालये ।

राघवस्य मया साह्ये वर्तितव्यमरिंदम ॥ १७ ॥

रामो धर्मभृतां श्रेष्ठो महेन्द्रसमविक्रमः । “ बेटा! उस समय वायुदेवताने मुझे समुद्रमें लाकर डाल दिया था ( जिससे मेरे पल बच गये ); अतः शत्रुदमन वीर! मुझे श्रीरघुनाथजीकी सहायता के कार्य में अवश्य तत्पर होना चाहिये; क्योंकि भगवान् श्रीराम धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ तथा इन्द्रतुल्य पराक्रमी हैं ' ॥ १७३ ॥

एतच्छ्रुत्वा मया तस्य मैनाकस्य महात्मनः ॥ १८ ॥

कार्यमावेद्य च गिरेरुद्धतं वै मनो मम ।

तेन चाहमनुज्ञातो मैनाकेन महात्मना ॥ १ ९ ॥

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सुन्दरकाण्डे अष्टपञ्चाशः सर्गः १०१ ९ ' महामना मैनाककी यह बात सुनकर मैंने अपना कार्य उन्हें बताया और उनकी आज्ञा लेकर फिर मेरा मन वहाँसे आगे जानेको उत्साहित हुआ । महाकाय मैनाकने उस समय मुझे जाने की आज्ञा दे दी ॥ १८-१९ ॥

स चाप्यन्तर्हितः शैलो मानुषेण वपुष्मता ।

शरीरेण महाशैलः शैलेन च महोदधौ ॥ २० ॥

' वह महान् पर्वत भी अपने मानवशरीरसे तो अन्तर्द्दित हो गया; परंतु पर्वतरूपसे महासागर में ही स्थित रहा ॥ २० ॥

उत्तमं जवमास्थाय शेषमध्वानमास्थितः ।

ततोऽहं सुचिरं कालं जवेनाभ्यगमं पथि ॥ २१ ॥

" फिर मैं उत्तम वेगका आश्रय ले शेष मार्गपर आगे बढ़ा और दीर्घकालतक बड़े वेग से उस पथपर चलता रहा ॥ २१ ॥

ततः पश्याम्यहं देवीं सुरसां नागमातरम् ।

समुद्रमध्ये सा देवी वचनं चेदमब्रवीत् ॥ २२ ॥

‘ तत्पश्चात् बीच समुद्रमें मुझे नागमाता सुरसा देवीका दर्शन हुआ । देवी सुरक्षा मुझसे इस प्रकार बोलीं ॥ २२ ॥

मम भक्ष्यः प्रदिष्टस्त्वममरैर्हरिसत्तम ।

ततस्त्वां भक्षयिष्यामि विहितस्त्वं हि मे सुरैः ॥ २३ ॥

‘ “ कपिश्रेष्ठ | देवताओंने तुम्हें मेरा भक्ष्य बताया है, इसलिये मैं तुम्हें भक्षण करूँगी; क्योंकि सारे देवताओंने आज तुम्हें ही मेरा आहार नियत किया है ' ॥ २३ ॥

एवमुक्तः सुरसया प्राञ्जलिः प्रणतः स्थितः ।

विवर्णवदनो भूत्वा वाक्यं चेदमुदीरयम् ॥ २४ ॥

‘ सुरसाके ऐसा कहनेपर मैं हाथ जोड़कर विनीतभाव से उसके सामने खड़ा हो गया और उदासमुख होकर यो बोला ॥ २४ ॥

रामो दाशरथिः श्रीमान् प्रविष्टो दण्डकावनम् ।

लक्ष्मणेन सह भ्रात्रा सीतया च परंतपः ॥ २५ ॥

" देवि! शत्रुओं को संताप देनेवाले दशरथनन्दन श्रीमान् राम अपने भाई लक्ष्मण और पत्नी सीताके साथ दण्डकारण्य-में आये थे ॥ २५ ॥

तस्य सीता हृता भार्या रावणेन दुरात्मना ।

तस्याः सकाशं दूतोऽहं गमिष्ये रामशासनात् ॥ २६ ॥

" वहाँ दुरात्मा रावणने उनकी पत्नी सीताको हर लिया । मैं इस समय श्रीरामचन्द्रजीकी आज्ञासे दूत होकर उन्हीं सीतादेवी के पास जा रहा हूँ ॥ २६ ॥

कर्तुमर्हसि रामस्य साहाय्यं विषये सती ।

अथवा मैथिलीं दृष्ट्वा रामं चाक्लिष्टकारिणम् ॥ २७ ॥

आगमिष्यामि ते वक्त्रं सत्यं प्रतिशृणोमि ते । " " तुम भी श्रीरामचन्द्रजी के ही राज्यमें रहती हो, इस लिये तुम्हें उनकी सहायता करनी चाहिये । अथवा मैं मिथिलेश-कुमारी सीता तथा अनायास ही महान् कर्म करनेवाले श्रीरामचन्द्रजीका दर्शन करके तुम्हारे मुखमें आ जाऊँगा, यह तुमसे सच्ची प्रतिज्ञा करके कहता हूँ ' ॥ २७३ ॥

एवमुक्ता मया सा तु सुरसा कामरूपिणी ॥ २८ ॥

अब्रवीन्नातिवर्तेत कश्चिदेष वरो मम । ' मेरे ऐसा कहने पर इच्छानुसार रूप धारण करनेवाली सुरसा बोली - " मुझे यह वर मिला हुआ है कि मेरे आहार के रूपमें निकट आया हुआ कोई भी प्राणी मुझे टालकर आगे नहीं जा सकता ' ॥ २८३ ॥

एवमुक्तः सुरसया दशयोजनमायतः ॥ २ ९ ॥

ततोऽर्धगुणविस्तारो बभूवाहं क्षणेन तु ।

मत्प्रमाणाधिकं चैव व्यादितं तु मुखं तया ॥ ३० ॥

' जब सुरसाने ऐसा कहा— उस समय मेरा शरीर दस योजन बड़ा था, किंतु एक ही क्षणमें मैं उससे ड्योढ़ा बड़ा हो गया । तब सुरसाने भी अपने मुँहको मेरे शरीर की अपेक्षा अधिक फैला लिया ॥ २ ९ -३० ॥

तद् दृष्ट्वा व्यादितं त्वास्यं ह्रस्वं ह्यकरवं पुनः ।

तस्मिन् मुहूर्ते च पुनर्वभूवाङ्गुष्ठसम्मितः ॥ ३१ ॥

' उसके फैले हुए मुँहको देखकर मैंने फिर अपने स्वरूप-को छोटा कर लिया । उसी मुहूर्तमें मेरा शरीर अँगूठे के बराबर हो गया ॥ ३१ ॥

अभिपत्याशु तद्वक्त्रं निर्गतोऽहं ततः क्षणात् ।

अब्रवीत् सुरसा देवी स्वेन रूपेण मां पुनः ॥ ३२ ॥

" फिर तो मैं सुरसाके मुँहमें शीघ्र ही घुस गया और तत्क्षण बाहर निकल आया । उस समय सुरसा देवीने अपने दिव्य रूपमें स्थित होकर मुझसे कहा -- ॥ ३२ ॥

अर्थसिद्धौ हरिश्रेष्ठ गच्छ सौम्य यथासुखम् ।

समानय व वैदेहीं राघवेण महात्मना ॥ ३३ ॥

“ सौम्य! कपिश्रेष्ठ! अब तुम कार्यसिद्धि के लिये सुख-पूर्वक यात्रा करो और विदेहनन्दिनी सीताको महात्मा रघुनाथ-जीसे मिलाओ ॥ ३३ ॥

सुखी भव महाबाहो प्रीतास्मि तव वानर ।

ततोऽहं साधुसाध्वीति सर्वभूतैः प्रशंसितः ॥ ३४ ॥

" " महाबाहु वानर! तुम सुखी रहो । मैं तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ । ' उस समय सभी प्राणियोंने साधु - साधु ' कहकर मेरी भूरि - भूरि प्रशंसा की ॥ ३४ ॥

ततोऽन्तरिक्षं विपुलं प्लुतोऽहं गरुडो यथा ।

छाया में निगृहीता च न च पश्यामि किंचन ॥ ३५ ॥