Ramayana 2 — पृष्ठ 201–210

वाल्मीकि रामायण — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 201–210

पृष्ठ 201

वाल्मीकि रामायण — खण्ड २, पृष्ठ 201 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

१०२० श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे ' तत्पश्चात् मैं गरुड़की भाँति उस विशाल आकाशमें फिर उड़ने लगा । उस समय किसीने मेरी परछाई पकड़ ली, किंतु मैं किसी को देख नहीं पाता था ॥ ३५ ॥

सोऽहं विगतवेगस्तु दिशो दश विलोकयन् ।

न किंचित् तत्र पश्यामि येन मे विहता गतिः ॥ ३६ ॥

' छाया पकड़ी जानेसे मेरा वेग अवरुद्ध हो गया, अतः मैं दसों दिशाओंकी ओर देखने लगा; परंतु जिसने मेरी गति रोक दी थी, ऐसा कोई प्राणी मुझे वहाँ नहीं दिखायी दिया ॥ ३६ ॥

अथ मे बुद्धिरुत्पन्ना किंनाम गमने मम ।

ईशो विघ्न उत्पन्नो रूपमत्र न दृश्यते ॥ ३७ ॥

' तब मेरे मन में यह चिन्ता हुई कि मेरी यात्रा में ऐसा कौन - सा विघ्न पैदा हो गया, जिसका यहाँ रूप नहीं दिखायी दे रहा है ॥ ३७ ॥

अधोभागे तु मे दृष्टिः शोचतः पतिता तदा ।

तत्राद्राक्षमहं भीमां राक्षसीं सलिलेशयाम् ॥ ३८ ॥

" इसी सोच में पड़े - पड़े मैंने जब नीचे की ओर दृष्टि डाली, तब मुझे एक भयानक राक्षसी दिखायी दी, जो जलमें निवास करती थी ॥ ३८ ॥

प्रहस्य च महानादमुक्तोऽहं भीमया तया ।

अवस्थितमसम्भ्रान्तमिदं वाक्यमशोभनम् ॥ ३ ९ ॥

' उस भीषण निशाचरीने बड़े जोरसे अट्टहास करके निर्भय खड़े हुए मुझसे गरज- गरजकर यह अमङ्गल जनक बात कही - ॥ ३ ९ ॥

कासि गन्ता महाकाय क्षुधिताया ममेप्सितः ।

भक्षः प्रीणय मे देहं चिरमाहारवर्जितम् ॥ ४० ॥

" विशालकाय वानर! कहाँ जाओगे? मैं भूखी हुई हूँ । तुम मेरे लिये मनोवाञ्छित भोजन हो । आओ, चिरकालसे निराहार पड़े हुए मेरे शरीर और प्राणोंको तृप्त करो ' ॥ ४० ॥

वाढमित्येव तां वाणीं प्रत्यगृह्वामहं ततः ।

आस्यप्रमाणाधिकं तस्याः कायमपूरयम् ॥ ४१ ॥

' तब मैंने ' बहुत अच्छा ' कहकर उसकी बात मान ली ' और अपने शरीरको उसके मुखके प्रमाणसे बहुत अधिक बढ़ा लिया ॥ ४१ ॥

तस्याश्चास्यं महद् भीमं वर्धते मम भक्षणे ।

न तु मां सानु बुबुधे मम वा विकृतं कृतम् ॥ ४२ ॥

" परंतु उसका विशाल और भयानक मुख भी मुझे भक्षण करने के लिये बढ़ने लगा । उसने मुझे या मेरे प्रभाव को नहीं जाना तथा मैंने जो छल किया था, वह भी उसकी समझमें नहीं आया ॥ ४२ ॥

ततोऽहं विपुलं रूपं संक्षिप्य निमिषान्तरात् ।

तस्या हृदयमादाय प्रपतामि नभःस्थलम् ॥ ४३ ॥

" फिर तो पलक मारते - मारते मैंने अपने विशाल रूपको अत्यन्त छोटा बना लिया और उसका कलेजा निकालकर आकाशमें उड़ गया ॥ ४३ ॥

सा विसृष्टभुजा भीमा पपात लवणाम्भसि ।

मया पर्वतसंकाशा निकृत्तहृदया सती ॥ ४४ ॥

' मेरे द्वारा कलेजेके काट लिये जानेपर पर्वतके समान भयानक शरीरवाली वह दुष्टा राक्षसी अपनी दोनों बाँहें शिथिल हो जाने के कारण समुद्र के जलमें गिर पड़ी ॥ ४४ ॥

शृणोमिखगतानां च वाचः सौम्या महात्मनाम् ।

राक्षसी सिंहिका भीमा क्षिप्रं हनुमता हता ॥ ४५ ॥

' उस समय मुझे आकाशचारी सिद्ध महात्माओंकी यह सौम्य वाणी सुनायी दी — ' अहो | इस सिंहिका नामवाली भयानक राक्षसीको हनुमानजीने शीघ्र ही मार डाला ' ॥ ४५ ॥

तां हत्वा पुनरेवाहं कृत्यमात्ययिकं स्मरन् ।

गत्वा च महदध्वानं पश्यामि नगमण्डितम् ॥ ४६ ॥

दक्षिणं तीरमुदधेर्लङ्का यत्र गता पुरी । ' उसे मारकर मैंने फिर अपने उस आवश्यक कार्यपर ध्यान दिया, जिसकी पूर्तिमें अधिक विलम्ब हो चुका था । उस विशाल मार्गको समाप्त करके मैंने पर्वतमालाओंसे मण्डित समुद्रका वह दक्षिण किनारा देखा, जहाँ लङ्कापुरी बसी हुई है ॥ ४६३ ॥

अस्तं दिनकरे याते रक्षसां निलयं पुरीम् ॥ ४७ ॥

प्रविष्टोऽहमविज्ञातो रक्षोभिर्भीमविक्रमैः । ' सूर्यदेवके अस्ताचलको चले जानेपर मैंने राक्षसोंकी निवासस्थानभूता लङ्कापुरी में प्रवेश किया, किंतु वे भयानक पराक्रमी राक्षस मेरे विषयमें कुछ भी जान न सके ॥ ४७३ ॥

तत्र प्रविशतश्वापि कल्पान्तघनसप्रभा ॥ ४८ ॥

अट्टहासं विमुञ्चन्ती नारी काप्युत्थिता पुरः । ' मेरे प्रवेश करते ही प्रलयकालके मेघकी भाँति काली कान्तिवाली एक स्त्री अट्टहास करती हुई मेरे सामने खड़ी हो गयी ॥ ४८३ ॥

जिघांसन्तीं ततस्तां तु ज्वलदग्निशिरोरुहाम् ॥ ४ ९ ॥

सव्यमुष्टिप्रहारेण पराजित्य भैरवम् ।

प्रदोषकाले प्रविशं भीतयाहं तयोदितः ॥ ५० ॥

' उसके सिर के बाल प्रज्वलित अग्निके समान दिखायी देते थे । वह मुझे मार डालना चाहती थी । यह देख मैंने बायें हाथके मुक्केसे प्रहार करके उस भयंकर निशाचरीको परास्त कर दिया और प्रदोषकालमें पुरी के

पृष्ठ 202

वाल्मीकि रामायण — खण्ड २, पृष्ठ 202 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

सुन्दरकाण्डे अष्टपञ्चाशः सर्गः १०२१ भीतर प्रविष्ट हुआ । उस समय उस डरी हुई निशाचरीने मुझसे इस प्रकार कहा – ॥ ४ ९ -५० ॥

अहं लङ्कापुरी वीर निर्जिता विक्रमेण ते ।

यस्मात् तस्माद् विजेतासि सर्वरक्षांस्यशेषतः ॥ ५१ ॥

" वीर! मैं साक्षात् लङ्कापुरी हूँ । तुमने अपने पराक्रमसे मुझे जीत लिया है, इसलिये तुम समस्त राक्षसोंपर पूर्णतः ' विजय प्राप्त कर लोगे ' ॥ ५१ ॥

तत्राहं सर्व रात्रं तु विचरञ्जनकात्मजाम् ।

रावणान्तःपुरगतो न चापश्यं सुमध्यमाम् ॥ ५२ ॥

" वहाँ सारी रात नगरमें घर - घर घूमने और रावणके अन्तःपुरमें पहुँचनेपर भी मैंने सुन्दर कटिप्रदेशवाली जनकनन्दिनी सीताको नहीं देखा ॥ ५२ ॥

ततः सीतामपश्यंस्तु रावणस्य निवेशने ।

शोकसागरमासाद्य न पारमुपलक्षये ॥ ५३ ॥

' रावण के महलमें सीताको न देखनेपर मैं शोक - सागर में डूब गया । उस समय मुझे उस शोकका कहीं पार नहीं दिखायी देता था ॥ ५३ ॥

शोचता च मया दृष्टं प्राकारेणाभिसंवृतम् ।

काञ्चनेन विकृष्टेन गृहोपवनमुत्तमम् ॥ ५४ ॥

' सोचमें पड़े - पड़े ही मैंने एक उत्तम गृहोद्यान देखा, जो सोने के बने हुए सुन्दर परकोटेसे घिरा हुआ था ॥ ५४ ॥

सप्राकारमवप्लुत्य पश्यामि बहुपादपम् ।

अशोकवनिकामध्ये शिशपापादपो महान् ॥ ५५ ॥

' तब उस परकोटेको लाँघकर मैंने उस गृहोद्यानको देखा, जो बहुसंख्यक वृक्षोंसे भरा हुआ था । उस अशोक-वाटिका के बीच में मुझे एक बहुत ऊँचा अशोक वृक्ष दिखायी दिया || ५५ ॥

तमारुह्य च पश्यामि काञ्चनं कदलीवनम् ।

अदूराच्छिशपावृक्षात् पश्यामि वरवर्णिनीम् ॥ ५६ ॥

' उसपर चढ़कर मैंने सुवर्णमय कदलीवन देखा तथा उस अशोक वृक्षके पास ही मुझे सर्वाङ्गसुन्दरी सीताजीका दर्शन हुआ || ५६ ॥

श्यामां कमलपत्राक्षीमुपवासकृशाननाम् ।

तदेकवासः संवीतां रजोध्वस्तशिरोरुहाम् ॥ ५७ ॥

' वे सदा सोलह वर्षकी - सी अवस्थासे युक्त दिखायी देती हैं । उनके नेत्र प्रफुल्ल कमलदल के समान सुन्दर हैं । सीताजी उपवास करनेके कारण अत्यन्त दुर्बल हो गयी हैं और उनकी यह दुर्बलता उनका मुख देखते ही स्पष्ट हो जाती हैं । वे एक ही वस्त्र पहने हुए हैं और उनके केश धूळसे धूसर हो गये हैं ॥ ५७ ॥

शोक संतापदीनाङ्गीं सीतां भर्तृहिते स्थिताम् ।

राक्षसीभिर्विरूपाभिः क्रूराभिरभिसंवृताम् ॥ ५८ ॥

मांसशोणितभक्ष्याभिर्व्याघ्रीभिर्हरिणीं यथा । ' उनके सारे अङ्ग शोक - संतापसे दीन दिखायी देते हैं । वे अपने स्वामीके हित - चिन्तनमें तत्पर हैं । रक्त - मांसका भोजन करनेवाली क्रूर एवं कुरूप राक्षसियाँ उन्हें चारों ओरसे घेरकर उनकी रखवाली करती हैं । ठीक उसी तरह जैसे बहुत - सी बाधिनें किसी हरिणीको घेरे हुए खड़ी हो ॥ सा मया राक्षसीमध्ये तर्ज्यमाना मुहुर्मुहुः ॥ ५ ९ ॥

एकवेणीधरा दीना भर्तृचिन्तापरायणा ।

भूमिशय्या विवर्णाङ्गी पद्मिनीव हिमागमे ॥ ६० ॥

" मैंने देखा, वे राक्षसियोंके बीचमें बैठी थीं और राक्षसियाँ उन्हें बारंबार धमका रही थीं । वे सिरपर एक ही वेणी धारण किये दीनभावसे अपने पति के चिन्तनमें तल्लीन हो रही थीं । धरती ही उनकी शय्या है । जैसे हेमन्त ऋतु आनेपर कमलिनी सूखकर श्रीहीन हो जाती है, उसी प्रकार उनके सारे अङ्ग कान्तिहीन हो गये हैं ॥ ५ ९ -६० ॥

रावणाद् विनिवृत्तार्था मर्तव्ये कृतनिश्चया ।

कथंचिन्मृगशावाक्षी तूर्णमासादिता मया ॥ ६१ ॥

' रावण की ओरसे उनका हार्दिक भाव सर्वथा दूर है । वे मरनेका निश्चय कर चुकी हैं । उसी अवस्थामें मैं किसी तरह शीघ्रतापूर्वक मृगनयनी सीताके पास पहुँच सका ॥ ६१ ॥

तां दृष्ट्रा तादृशीं नारीं रामपत्नीं यशस्विनीम् ।

तत्रैव शिंशपावृक्षे पश्यन्नहमवस्थितः ॥ ६२ ॥

' वैसी अवस्था में पड़ी हुई उन यशस्विनी नारी श्रीरामपत्नी सीताको अशोकवृक्षके नीचे बैठी देख मैं भी उस वृक्षपर स्थित हो गया और उन्हें वहींसे निहारने लगा ॥ ६२ ॥

ततो हलहलाशब्दं काञ्चीनूपुरमिश्रितम् ।

शृणोम्यधिकगम्भीरं रावणस्य निवेशने ॥ ६३ ॥

" इतनेही में रावण के महलमें करधनी और नूपुरोंकी झनकारसे मिला हुआ अधिक गम्भीर कोलाहल सुनायी पड़ा ॥ ६३ ॥

ततोऽहं परमोद्विग्नः स्वरूपं प्रत्य संहरम् ।

अहं च शिंशपावृक्षे पक्षीव गहने स्थितः ॥ ६४ ॥

" फिर तो मैंने अत्यन्त उद्विग्न होकर अपने स्वरूपको समेट लिया -छोटा बना लिया और पक्षीके समान उस गहन शिंशपा ( अशोक ) वृक्षमें छिपा बैठा रहा ॥ ६४ ॥

ततो रावणदाराश्च रावणश्च महाबलः ।

तं देशमनुसम्प्राप्तो यत्र सीताभवत् स्थिता ॥ ६५ ॥

" इतनेही में रावणकी स्त्रियाँ और महाबली रावण ये

पृष्ठ 203

वाल्मीकि रामायण — खण्ड २, पृष्ठ 203 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

१०२२ श्रीमवाल्मीकीय रामायणे सब - के - सब उस स्थानपर आ पहुँचे, जहाँ सीतादेवी

विराजमान थीं । ६५ ॥

तं दृष्ट्रा वरारोहा सीता रक्षोगणेश्वरम् ।

संकुच्योरू स्तनौ पीनौ बाहुभ्यां परिरभ्य च ॥ ६६ ॥

' राक्षसों के स्वामी रावणको देखते ही सुन्दर कटि-प्रदेशवाली सीता अपनी जाँघोंको सिकोड़कर और उभरे हुए दोनों स्तनोंको भुजाओंसे ढककर बैठ गयीं ॥ ६६ ॥

वित्रस्तां परमोद्विग्नां वीक्ष्यमाणामितस्ततः ।

त्राणं कंचिदपश्यन्तीं वेपमानां तपस्विनीम् ॥ ६७ ॥

तामुवाच दशग्रीवः सीतां परमदुःखिताम् ।

अवाक्शिराः प्रपतितो बहुमन्यख मामिति ॥ ६८ ॥

' वे अत्यन्त भयभीत और उद्विग्न होकर इधर - उधर देखने लगीं । उन्हें कोई भी अपना रक्षक नहीं दिखायी देता था । भयसे काँपती हुई अत्यन्त दुःखिनी तपस्विनी सीता के सामने जा दशमुख रावण नीचे सिर किये उनके चरणोंमें गिर पड़ा और इस प्रकार बोला- ' विदेहकुमारी!

I तुम्हारा • सेवक हूँ । तुम मुझे अधिक आदर दो ' ॥ ६७-६८ ॥

यदि त्वं तु मां दर्पान्नाभिनन्दसि गर्विते ।

द्विमासानन्तरं सीते पास्यामि रुधिरं तव ॥ ६ ९ ॥

' ( इतनेपर भी अपने प्रति उनकी उपेक्षा देख वह कुपित होकर बोला – ) ' गर्वीली सीते! यदि तू घमंडमें आकर मेरा अभिनन्दन नहीं करेगी तो आजसे दो महीने के बाद मैं तेरा खून पी जाऊँगा ' ॥ ६ ९ ॥

एतच्छ्रुत्वा वचस्तस्य रावणस्य दुरात्मनः ।

उवाच परमक्रुद्धा सीता वचनमुत्तमम् ॥ ७० ॥

' दुरात्मा रावणकी यह बात सुनकर सीताने अत्यन्त कुपित हो यह उत्तम वचन कहा ॥ ७० ॥

राक्षसाधम रामस्य भार्याममिततेजसः ।

इक्ष्वाकुवंशनाथस्य स्नुषां दशरथस्य च ॥ ७१ ॥

अवाच्यं वदतो जिह्वा कथं न पतिता तव । " नीच निशाचर । अमिततेजस्वी भगवान् श्रीरामकी पत्नी और इक्ष्वाकुकुलके स्वामी महाराज दशरथकी पुत्र-वधू से यह न कहने योग्य बात कहते समय तेरी जीभ क्यों नहीं गिर गयी? ॥ ७१३ ॥

किंस्विवीर्य तवानार्य यो मां भर्तुर संनिधौ ॥ ७२ ॥

अपहृत्यागतः पाप तेनादृष्टो महात्मना । “ दुष्ट पापी! तुझमें क्या पराक्रम है? मेरे पतिदेव जब निकट नहीं थे, तब तू उन महात्माकी दृष्टिसे छिपकर चोरी - चोरी मुझे हर लाया ॥ ७२३ ॥

न त्वं रामस्य सदृशो दास्येऽप्यस्य न युज्यसे ॥ ७३ ॥

अजेयः सत्यवाक् शूरो रणश्लाघीच राघवः । “ तू भगवान् श्रीरामकी समानता नहीं कर सकता । तू तो उनका दास होने योग्य भी नहीं है । श्रीरघुनाथजी सर्वथा अजेय, सत्यभाषी, शूरवीर और युद्ध के अभिलाषी एवं प्रशंसक हैं ॥ ७३३ ॥

जानक्या परुषं वाक्यमेवमुक्तो दशाननः ॥ ७४ ॥

जज्वाल सहसा कोपाच्चितास्थ इव पावकः ।

विवृत्य नयने क्रूरे मुष्टिमुद्यम्य दक्षिणम् ॥ ७५ ॥

मैथिलीं हन्तुमारब्धः स्त्रीभिर्हाहाकृतं तदा ।

स्त्रीणां मध्यात् समुत्पत्य तस्य भार्या दुरात्मनः ॥ ७६ ॥

वरा मन्दोदरी नाम तया स प्रतिषेधितः ।

उक्तश्च मधुरां वाणीं तया स मदनार्दितः ॥ ७७ ॥

' जनकनन्दिनीके ऐसी कठोर बात कहनेपर दशमुख रावण चितामें लगी हुई आगकी भाँति सहसा क्रोधसे जल उठा और अपनी क्रूर आँखें फाड़ - फाड़कर देखता हुआ दाहिना मुक्का तानकर मिथिलेश कुमारीको मारनेके लिये तैयार हो गया । यह देख उस समय वहाँ खड़ी हुई स्त्रियाँ हाहाकार करने लगीं । इतनेही में उन स्त्रियोंके बीचसे उस दुरात्माकी सुन्दरी भार्या मन्दोदरी झपटकर आगे आयी और उसने रावणको ऐसा करने से रोका । साथ ही, उस कामपीड़ित निशाचरसे मधुर वाणी में कहा --- ॥ ७४-७७ ॥

सीतया तव किं कार्य महेन्द्रसमविक्रम ।

मया सह रमखाद्य मद्विशिष्टा न जानकी ॥ ७८ ॥

" " महेन्द्र के समान पराक्रमी राक्षसराज! सीतासे तुम्हें क्या काम है? आज मेरे साथ रमण करो । जनकनन्दिनी सीता मुझसे अधिक सुन्दरी नहीं है ॥ ७८ ॥

देवगन्धर्व कन्याभिर्यक्षकन्याभिरेव च ।

सार्धं प्रभो रमस्वेति सीतया किं करिष्यसि ॥ ७ ९ ॥

" प्रभो! देवताओं, गन्धर्वों और यक्षोंकी कन्याएँ हैं, इनके साथ रमण करो; सीताको लेकर क्या करोगे? ' ॥

ततस्ताभिः समेताभिर्नारीभिः स महाबलः ।

उत्थाप्य सहसा नीतो भवनं स्वं निशाचरः ॥ ८० ॥

' तदनन्तर वे सब स्त्रियाँ मिलकर उस महाबली निशाचर रावणको सहसा वहाँसे उठाकर अपने महल में

ले गयीं । ८० ॥

याते तस्मिन् दशग्रीवे राक्षस्यो विकृताननाः ।

सीतां निर्भयामासुर्वाक्यैः करैः सुदारुणैः ॥ ८१ ॥

' दशमुख रावण के चले जानेपर विकराल मुखवाली राक्षसियाँ अत्यन्त दारुण क्रूरतापूर्ण वचनद्वारा सीताको डराने - धमकाने लगीं ॥। ८१ ॥

तृणवद् भाषितं तासां गणयामास जानकी ।

गर्जितं च तथा तासां सीतां प्राप्य निरर्थकम् ॥ ८२ ॥

पृष्ठ 204

वाल्मीकि रामायण — खण्ड २, पृष्ठ 204 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

सुन्दरकाण्डे अष्टपञ्चाशः सर्गः १०२३ " परंतु जानकीने उनकी बातोंको तिनके के समान तुच्छ समझा । उनका सारा गर्जन - तर्जन सीताके पास पहुँचकर व्यर्थ हो गया ॥ ८२ ॥

वृथा गर्जितनिश्रेष्ठा राक्षस्यः पिशिताशनाः ।

रावणाय शशंसुस्ताः सीताव्यवसितं महत् ॥ ८३ ॥

‘ इस प्रकार गर्जना और सारी चेष्टाओंके व्यर्थ हो जाने पर उन मांसभक्षिणी राक्षसियोंने रावण के पास जाकर उसे सीताजीका महान् निश्चय कह सुनाया ॥ ८३ ॥

ततस्ताः सहिताः सर्वा विहताशा निरुद्यमाः ।

परिक्लिश्य समस्तास्ता निद्रावशमुपागताः ॥ ८४ ॥

' फिर वे सब की सब उन्हें अनेक प्रकारसे कष्ट दे हताश तथा उद्योगशून्य हो निद्रा के वशीभूत होकर सो गयीं ॥ ८४ ॥

तासु चैव प्रसुप्तासु सीता भर्तृहिते रता ।

विलप्य करुणं दीना प्रशुशोच सुदुःखिता ॥ ८५ ॥

' उन सबके सो जानेपर पतिके हित में तत्पर रहने वाली सीताजी करुणापूर्वक विलापकर अत्यन्त दीन और दुखी हो शोक करने लगीं ॥ ८५ ॥

तासां मध्यात् समुत्थाय त्रिजटा वाक्यमब्रवीत् ।

आत्मानं खादत क्षिप्रं न सीतामसितेक्षणाम् ॥ ८६ ॥

जनकस्यात्मजां साध्वीं स्नुषां दशरथस्य च । ' उन राक्षसियों के बीचसे त्रिजटा नामवाली राक्षसी उठी और अन्य निशाचरियोंसे इस प्रकार बोली- ' अरी! तुम सब अपने आपको ही जल्दी - जल्दी खा जाओ, कजरारे नेत्रोंवाली सीताको नहीं; ये राजा दशरथकी पुत्रवधू और जनककी लाड़ली सती - साध्वी सीता इस योग्य नहीं हैं ॥ ८६३ ॥

स्वप्नो ह्यद्य मया दृष्टशे दारुणो रोमहर्षणः ॥ ८७ ॥

रक्षसां च विनाशाय भर्तुरस्या जयाय च । " " आज अभी मैंने बड़ा भयंकर तथा रोंगटे खड़े कर देनेवाला स्वप्न देखा है; वह राक्षसोंके विनाश तथा इन सीता देवी के पतिकी विजयका सूचक है ॥ ८७३ ॥

अलमस्मान् परित्रातुं राघवाद् राक्षसीगणम् ॥ ८८ ॥

अभियाचाम वैदेहीमेतद्धि मम रोचते । “ ये सीता ही श्रीरघुनाथजी के रोषसे हमारी और इन सब राक्षसियोंकी रक्षा करनेमें समर्थ हैं; अतः हमलोग विदेह नन्दिनी से अपने अपराधोंके लिये क्षमा - याचना करें - यही मुझे अच्छा लगता है । ८८३ ॥ यदि ह्येवंविधः खप्नो दुःखितायाः प्रदृश्यते ॥ ८ ९ ॥ सा दुःखैर्विविधैर्मुक्ता सुखमाप्नोत्यनुत्तमम् । “ यदि किसी दुःखिनी के विषय में ऐसा स्वप्न देखा जाता है तो वह अनेक विध दुःखोंसे छूट कर पर म उत्तम सुख पाती है ८ ९ ३ प्रणिपात प्रसन्ना हि मैथिली जनकात्मजा ॥ ९ ० ॥ अलमेषा परित्रातुं राक्षस्यो महतो भयात् । " राक्षसियो! केवल प्रणाम करने मात्र से मिथिलेशकुमारी जानकी प्रसन्न हो जायँगी और ये महान् भयसे मेरी रक्षा करेंगी ' ॥ ९ ०३ ॥ ततः सा हीमती बाला भर्तुर्विजयहर्षिता ॥ ९ १ ॥ अवोचद् यदि तत् तथ्यं भवेयं शरणं हि वः । ' तब लज्जावती बाला सीता पतिकी विजयकी सम्भावनासे प्रसन्न हो बोलीं- ' यदि यह बात सच होगी तो मैं अवश्य तुमलोगों की रक्षा करूंगी ' ॥ ९९ ३ ॥ तां चाहं तादृशीं दृष्ट्वा सीताया दारुणां दशाम् ॥ ९ २ ॥

चिन्तयामास विश्रान्तो न च मे निर्वृतं मनः ।

सम्भाषणार्थे च मया जानक्याश्चिन्तितो विधिः ॥ ९ ३ ॥

' कुछ विश्राम के पश्चात् मैं सीताकी वैसी दारुण दशा देखकर बड़ी चिन्तामें पड़ गया । मेरे मनको शान्ति नहीं मिलती थी । फिर मैंने जानकीजी के साथ वार्तालाप करनेके लिये एक उपाय सोचा ॥ ९ २ - ९ ३ ॥

इक्ष्वाकु कुलवंशस्तु स्तुतो मम पुरस्कृतः ।

श्रुत्वा तु गदितां वाचं राजर्षिगणभूषिताम् ॥ ९ ४ ॥

प्रत्यभाषत मां देवी बाष्पैः पिहितलोचना । ' पहले मैंने इक्ष्वाकुवंशकी प्रशंसा की । राजर्षियोंकी स्तुति से विभूषित मेरी वह वाणी सुनकर देवी सीता के नेत्रोंमें आँसू भर आया और वे मुझसे बोलीं- ॥ ९ ४३ ॥। कस्त्वं केन कथं चेह प्राप्तो वानरपुङ्गव ॥ ९ ५ ॥ काच रामेण ते प्रीतिस्तन्मे शंसितुमर्हसि । " कपिश्रेष्ठ | तुम कौन हो? किसने तुम्हें भेजा है? यहाँ कैसे आये हो? और भगवान् श्रीरामके साथ तुम्हारा कैसा प्रेम है? यह सब मुझे बताओ ' ॥ ९ ५३ ॥ तस्यास्तद् वचनं श्रुत्वा अहमप्यनुवं वचः ॥ ९ ६ ॥

देवि रामस्य भर्तुस्ते सहायो भीमविक्रमः ।

सुग्रीवो नाम विक्रान्तो वानरेन्द्रो महाबलः ॥ ९ ७ ॥

' उनका वह वचन सुनकर मैंने भी कहा - देवि! तुम्हारे पतिदेव श्रीरामके सहायक एक भयंकर पराक्रमी बल-विक्रम सम्पन्न महाबली वानरराज हैं, जिनका नाम सुग्रीव है ॥ ९ ६ - ९ ७ ॥

तस्य मां विद्धि भृत्यं त्वं हनूमन्तमिहागतम् ।

भर्त्रा सम्प्रहितस्तुभ्यं रामेणाक्लिष्टकर्मणा ॥ ९ ८ ॥

" उन्हीं का मुझे सेवक समझो । मेरा नाम हनुमान् है । अनायास ही महान् कर्म करनेवाले तुम्हारे पति श्रीरामने भेजा है । इसलिये मैं यहाँ आया हूँ ॥ ९ ८ ॥

इदं तु पुरुषव्याघ्रः श्रीमान् दाशरथिः स्वयम् ।

अङ्गुलीयमभिज्ञानमदात् तुभ्यं यशखिनि ॥ ९९ ॥

पृष्ठ 205

वाल्मीकि रामायण — खण्ड २, पृष्ठ 205 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

१०२४ श्रीमवाल्मीकीय रामायणे " यशस्विनि! पुरुषसिंह दशरथनन्दन साक्षात् श्रीमान् रामने पहचान के लिये यह अँगूठी तुम्हें दी है ॥ ९९ ॥

तदिच्छामि त्वयाशतं देवि किं करवाण्यहम् ।

रामलक्ष्मणयोः पार्श्व नयामि त्वां किमुत्तरम् ॥ १०० ॥

" देवि! मैं चाहता हूँ कि आप मुझे आज्ञा दें कि मैं आपकी क्या सेवा करूँ? आप कहें तो मैं अभी आपको • श्रीराम और लक्ष्मण के पास पहुँचा दूँ । इस विषय में आपका क्या उत्तर है? ' ॥ १०० ॥

एतच्छ्रुत्वा विदित्वा व सीता जनकनन्दिनी ।

आह रावणमुत्पाटय राघवो मां नयत्विति ॥ १०१ ॥

' मेरी यह बात सुनकर और सोच - समझकर जनकनन्दिनी सीताने कहा -'मेरी इच्छा है कि श्रीरघुनाथजी रावणका संहार करके मुझे यहाँसे ले चलें ' ॥ १०१ ॥

प्रणम्य शिरसा देवीमहमार्यामनिन्दिताम् ।

राघवस्य मनोह्लादमभिज्ञानमयाचिषम् ॥ १०२ ॥

" तब मैंने उन सती - साध्वी देवी आर्या सीताको सिर झुकाकर प्रणाम किया और कोई ऐसी पहचान माँगी, जो श्रीरघुनाथजी के मनको आनन्द प्रदान करनेवाली हो ॥ १०२ ॥

अथ मामब्रवीत् सीता गृह्यतामयमुत्तमः ।

मणिर्येन महाबाहू रामस्त्वां बहु मन्यते ॥ १०३ ॥

' मेरे माँगनेपर सीताजीने कहा- ' लो, यह उत्तम चूडा-मणि है, जिसे पाकर महाबाहु श्रीराम तुम्हारा विशेष आदर करेंगे ' ॥ १०३ ॥

इत्युक्त्वा तु वरारोहा मणिप्रवरमुत्तमम् ।

प्रायच्छत् परमोद्विग्ना वाचा मां संदिदेश ह ॥ १०४ ॥

' ऐसा कहकर सुन्दरी सीताने मुझे वह परम उत्तम चूडा-मणि दी और अत्यन्त उद्विग्न होकर वाणीद्वारा अपना संदेश कहा ॥ १०४ ॥

ततस्तस्यै प्रणम्याहं राजपुत्र्यै समाहितः ।

प्रदक्षिणं परिक्राममिहाभ्युद्गतमानसः ॥ १०५ ॥

' तब मन - ही - मन यहाँ आनेके लिये उत्सुक हो एकाग्र चित्त होकर मैंने राजकुमारी सीताको प्रणाम किया और उनकी दक्षिणावर्त परिक्रमा की ॥ १०५ ॥

उत्तरं पुनरेवाह निश्चित्य मनसा तदा ।

हनूमन् मम वृत्तान्तं वक्तुमर्हसि राघवे ॥ १०६ ॥

यथा श्रुत्वैव नचिरात् तावुभौ रामलक्ष्मणौ ।

सुग्रीव सहितौ वीरावुपेयातां तथा कुरु ॥ १०७ ॥

‘ उस समय उन्होंने मनसे कुछ निश्चय करके पुनः मुझे उत्तर दिया- ' हनुमन्! तुम श्रीरघुनाथजीको मेरा सारा वृत्तान्त सुनाना और ऐसा प्रयत्न करना, जिससे सुग्रीवसहित वे दोनों वीरबन्धु श्रीराम और लक्ष्मण मेरा हाल सुनते ही अविलम्ब यहाँ आ जायँ ॥ १०६-१०७ ॥

यदन्यथा भवेदेतद् द्वौ मासौ जीवितं मम ।

न मां द्रक्ष्यति काकुत्स्थो म्रिये साहमनाथवत् ॥ १०८ ॥

“ यदि इसके विपरीत हुआ तो दो महीने तक मेरा जीवन

और शेष है । उसके बाद श्रीरघुनाथजी मुझे नहीं देख सकेंगे ।

मैं अनाथकी भाँति मर जाऊँगी ' ॥ १०८ ॥

तच्छ्रुत्वा करुणं वाक्यं क्रोधो मामभ्यवर्तत ।

उत्तरं च मया दृष्टं कार्यशेषमनन्तरम् ॥ १० ९ ॥

' उनका यह करुणाजनक वचन सुनकर राक्षसों के प्रति मेरा क्रोध बहुत बढ़ गया । फिर मैंने शेष बचे हुए भाव कार्यपर विचार किया ॥ १० ९ ॥

ततोऽवर्धत मे कायस्तदा पर्वतसंनिभः ।

युद्धाकाङ्क्षी वनं तस्य विनाशयितुमारभे ॥११० ॥

' तदनन्तर मेरा शरीर बढ़ने लगा और तत्काल पर्वतके समान हो गया । मैंने युद्धकी इच्छासे रावणके उस वनको उजाड़ना आरम्भ किया ॥ ११० ॥

तद् भग्नं वनखण्डं तु भ्रान्तत्रस्तमृगद्विजम् ।

प्रतिबुद्धय निरीक्षन्ते राक्षस्यो विकृताननाः ॥ १११ ॥

' जहाँके पशु और पक्षी घबराये और डरे हुए थे, उस उजड़े हुए वनखण्डको वहाँ सोकर उठी हुईं विकराल मुख-वाली राक्षसियोंने देखा ॥ १११ ॥

मां च दृष्ट्वा वने तस्मिन् समागम्य ततस्ततः ।

ताः समभ्यागताः क्षिप्रं रावणायाचचक्षिरे ॥ ११२ ॥

' उस वन में मुझे देखकर वे सब इधर - उधर से जुट गयीं और तुरंत रावण के पास जाकर उन्होंने वनविध्वंसका सारा समाचार कहा ॥ ११२ ॥

राजन् वनमिदं दुर्गे तव भग्नं दुरात्मना ।

वानरेण ह्यविज्ञाय तव वीर्य महाबल ॥११३ ॥

“ महाबली राक्षसराज! एक दुरात्मा वानरने आपके बल - पराक्रमको कुछ भी न समझकर इस दुर्गम प्रमदावनको उजाड़ डाला है ॥ ११३ ॥

तस्य दुर्बुद्धिता राजंस्तव विप्रियकारिणः ।

वधमाज्ञापय क्षिप्रं यथासौ न पुनर्वजेत् ॥ ११४ ॥

“ महाराज! यह उसकी दुर्बुद्धि ही है, जो उसने आप-का अपराध किया । आप शीघ्र ही उसके वघकी आज्ञा दें, जिससे वह फिर बचकर चला न जाय ' ॥ ११४ ॥

तच्छ्रुत्वा राक्षसेन्द्रेण विसृष्टा बहुदुर्जयाः ।

राक्षसाः किंकरा नाम रावणस्य मनोऽनुगाः ॥११५ ॥

पृष्ठ 206

वाल्मीकि रामायण — खण्ड २, पृष्ठ 206 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

सुन्दरकाण्डे अष्टपञ्चाशः सर्गः १०२५ ' यह सुनकर राक्षसराजने अपने मनके अनुकूल चलने- तानहं सहसैन्यान् वै सर्वानेवाभ्यसूदयम् । वाले किंकर नामक राक्षसोंको भेजा, जिनपर विजय पाना अत्यन्त कठिन था ॥ ११५ ॥

तेषामशीतिसाहस्रं शूलमुद्गरपाणिनाम् ।

मया तस्मिन् वनोद्देशे परिघेण निषूदितम् ॥ ११६ ॥

' वे हाथों में शूल और मुद्गर लेकर आये थे । उनकी संख्या अस्सी हजार थी; परंतु मैंने उस वनप्रान्त में एक परिघसे ही उन सबका संहार कर डाला ॥ ११६ ॥

तेषां तु हतशिष्टा ये ते गता लघुविक्रमाः ।

निहतं च मया सैन्यं रावणायाचचक्षिरे ॥ ११७ ॥

‘ उनमें जो मरनेसे बच गये, वे जल्दी - जल्दी पैर बढ़ाते हुए भाग गये । उन्होंने रावणको मेरेद्वारा सारी सेनाके मारे जाने का समाचार बताया ॥ ११७ ॥

ततो मे बुद्धिरुत्पन्ना चैत्यप्रासादमुत्तमम् ।

तत्र स्थान राक्षसान् हत्वा शतं स्तम्भेन वै पुनः ॥ ११८ ॥

ललामभूतो लङ्काया मया विध्वंसितो रुषा । ‘ तत्पश्चात् मेरे मनमें एक नया विचार उत्पन्न हुआ और मैंने क्रोधपूर्वक वहाँ उत्तम चैत्यप्रासादको, जो लङ्काका सबसे सुन्दर भवन था तथा जिसमें सौ खम्भे लगे हुए थे, वहाँके राक्षसों का संहार करके तोड़ - फोड़ डाला ॥ ११८३ ॥

ततः प्रहस्तस्य सुतं जम्बुमालिनमादिशत् ॥ ११ ९ ॥ राक्षसैर्बहुभिः सार्धं घोररूपैर्भयानकैः । ' तब रावणने घोर रूपवाले भयानक राक्षसों के साथ जिनकी संख्या बहुत अधिक थी, प्रहस्त के बेटे जम्बुमालीको युद्ध के लिये भेजा ॥ ११ ९ ३ ॥ तमहं बलसम्पन्नं राक्षसं रणकोविदम् ॥ १२० ॥

परिघेणातिघोरेण सूदयामि सहानुगम् । ' वह राक्षस बड़ा बलवान् तथा युद्ध की कलामें कुशल था तो भी मैंने अत्यन्त घोर परिघसे मारकर सेवकों सहित उसे कालके गालमें डाल दिया ॥ १२०३ ॥

तच्छ्रुत्वा राक्षसेन्द्रस्तु मन्त्रिपुत्रान् महाबलान् ॥१२१ ॥

पदातिबलसम्पन्नान् प्रेषयामास रावणः ।

परिघेणैव तान् सर्वान् नयामि यमसादनम् ॥ १२२ ॥

" यह सुनकर राक्षसराज रावणने पैदल सेनाके साथ अपने मन्त्री के पुत्रोंको भेजा, जो बड़े बलवान् थे; किंतु मैंने परिघसे ही उन सबको यमलोक भेज दिया ॥ १२१-१२२ ॥

मन्त्रिपुत्रान् हताश्रुत्वा समरे लघुविक्रमान् ।

पञ्च सेनाग्रगाञ्छूरान् प्रेषयामास रावणः ॥ १२३ ॥

' समराङ्गण में शीघ्रतापूर्वक पराक्रम प्रकट करनेवाले मन्त्रि-कुमारोंको मारा गया सुनकर रावणने पाँच शूरवीर सेना-पतियोंको भेजा ॥ १२३ ॥

वा ० रा ० ५.८. ३-ततः पुनर्दशग्रीवः पुत्रमक्षं महाबलम् ॥ १२४ ॥

बहुभी राक्षसैः सार्धं प्रेषयामास संयुगे । ' उन सबको भी मैंने सेनासहित मौत के घाट उतार दिया । तब दशमुख रावणने अपने पुत्र महाबली अक्षकुमार-को बहुसंख्यक राक्षसों के साथ युद्ध के लिये भेजा || १२४३ ॥ तं तु मन्दोदरीपुत्रं कुमारं रणपण्डितम् ॥ १२५ ॥

सहसा खं समुद्यन्तं पादयोश्च गृहीतवान् ।

तमासीनं शतगुणं भ्रामयित्वा व्यपेषयम् ॥ १२६ ॥

' मन्दोदरीका वह पुत्र युद्धकी कलामें बड़ा प्रवीण था । वह आकाशमै उड़ रहा था । उसी समय मैंने सहसा उसके दोनों पैर पकड़ लिये और सौ बार घुमाकर उसे पृथ्वीपर पटक दिया । इस तरह वहाँ पड़े हुए कुमार अक्षको मैंने पीस डाला ॥ १२५-१२६ ॥

तमक्षमागतं भग्नं निशम्य स दशाननः ।

ततश्चेन्द्रजितं नाम द्वितीयं रावणः सुतम् ॥ १२७ ॥

व्यादिदेश सुसंक्रुद्धो बलिनं युद्धदुर्मदम् । ' अक्षकुमार युद्धभूमिमें आया और मारा गया - यह सुनकर दशमुख रावणने अत्यन्त कुपित हो अपने दूसरे पुत्र इन्द्रजित् को, जो बड़ा ही रणदुर्मद और बलवान् था, भेजा ॥ १२७३ ॥

तच्चाप्यहं बलं सर्व तं च राक्षसपुङ्गवम् ॥ १२८ ॥

नष्टोजसं रणे कृत्वा परं हर्षमुपागतः । ' उसके साथ आयी हुई सारी सेनाको और उस राक्षस-शिरोमणिको भी युद्ध में हतोत्साह करके मुझे बड़ा हर्ष हुआ ॥ १२८३ ॥

महतापि महाबाहुः प्रत्ययेन महाबलः ॥ १२ ९ ॥ प्रहितो रावणेनैष सह वीरैर्मदोद्धतैः । ' रावणने इस महाबली महाबाहु वीरको अनेक मदमत्त वीरोंके साथ बड़े विश्वाससे भेजा था ॥ १२ ९ ३ ॥ सोऽविषह्यं हि मां बुद्ध्वा स्वसैन्यं चावमर्दितम् ॥ १३० ॥

ब्रह्मणोऽस्त्रेण स तु मां प्रबद्ध्वा चातिवेगिनः ।

रज्जुभिश्वापि बध्नन्ति ततो मां तत्र राक्षसाः ॥ १३१ ॥

' इन्द्रजित्ने देखा, मेरी सारी सेना कुचल डाली गयी, तब उसने समझ लिया कि इस वानरका सामना करना असम्भव है । अतः उसने बड़े वेग से ब्रह्मास्त्र चलाकर मुझे बाँध लिया । फिर तो वहाँ राक्षसोंने मुझे रस्सियों से भी बाँधा ॥ १३०-१३१ ॥

रावणस्य समीपं व गृहीत्वा मामुपागमन् ।

दृष्ट्रा सम्भाषितश्चाहं रावणेन दुरात्मना ॥ १३२ ॥

पृष्ठ 207

वाल्मीकि रामायण — खण्ड २, पृष्ठ 207 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

१०२६ श्रीमबूवाल्मीकीय रामायणे

पृष्ठश्च लङ्कागमनं राक्षसानां च तं वधम् ।

तत्सर्वे च रणे तत्र सीतार्थमुपजल्पितम् ॥ १३३ ॥

" इस तरह मुझे पकड़कर वे सब रावण के समीप ले आये । दुरात्मा रावणने मुझे देखकर वार्तालाप आरम्भ किया और पूछा- ' तू लङ्कामें क्यों आया? तथा राक्षसों का वध तूने क्यों किया? ' मैंने वहाँ उत्तर दिया, ' यह सब कुछ मैंने सीताजी के लिये किया है ॥ १३२-१३३ ॥

तस्यास्तु दर्शनाकाङ्क्षी प्राप्तस्त्वद्भवनं विभो ।

मारुतस्यैौरसः पुत्रो वानरो हनुमानहम् ॥ १३४ ॥

रामदूतं च मां विद्धि सुग्रीवसचिव कपिम् ।

सोऽहं दौत्येन रामस्य त्वत्सकाशमिहागतः ॥१३५ ॥

' प्रभो! जनकनन्दिनीके दर्शनकी इच्छा से ही मैं तुम्हारे महलमें आया हूँ । मैं वायुदेवताका औरस पुत्र हूँ, जातिका वानर हूँ और हनुमान् मेरा नाम है । मुझे श्रीरामचन्द्रजीका दूत और सुग्रीवका मन्त्री समझो । श्रीरामचन्द्रजीका दूत-कार्य करनेके लिये ही मैं यहाँ तुम्हारे पास आया हूँ ॥ १३४-१३५ ॥

शृणु चापि समादेशं यदहं प्रब्रवीमि ते ।

राक्षसेश हरीशस्त्वां वाक्यमाह समाहितम् ॥ १३६ ॥

" तुम मेरे स्वामीका संदेश, जो मैं तुम्हें बता रहा हूँ, सुनो । राक्षसराज! वानरराज सुग्रीवने तुमसे एकाग्रतापूर्वक जो बात कही है, उसपर ध्यान दो ॥ १३६ ॥

सुग्रीवश्च महाभागः स त्वां कौशलमब्रवीत् ।

धर्मार्थकामसहितं हितं पथ्यमुवाच ह ॥ १३७ ॥

“ महाभाग सुग्रीवने तुम्हारी कुशल पूछी है और तुम्हें सुनाने के लिये यह धर्म, अर्थ एवं कामसे युक्त हितकर तथा लाभदायक बात कही है -- ॥ १३७ ॥

वसतो ऋष्यमूके में पर्वते विपुलद्रुमे ।

राघव विक्रान्तो मित्रत्वं समुपागतः ॥ १३८ ॥

" जब मैं बहुसंख्यक वृक्षोंसे हरे - भरे ऋष्यमूक पर्वतपर निवास करता था, उन दिनों रणमें महान् पराक्रम प्रकट करनेवाले रघुनाथजीने मेरे साथ मित्रता स्थापित की थी ॥ १३८ ॥

तेन मे कथितं राजन् भार्या मे रक्षसा हृता ।

तत्र साहाय्यहेतो में समयं कर्तुमर्हसि ॥ १३ ९ ॥

“ “ राजन्! उन्होंने मुझे बताया कि ' राक्षस रावणने मेरी पत्नीको हर लिया है । उसके उद्धारके कार्यमें सहायता करने के लिये तुम मेरे सामने प्रतिज्ञा करो ' ॥ १३ ९ ॥

वालिना हृतराज्येन सुग्रीवेण सह प्रभुः ।

निसाक्षिकं सख्यं राघवः सहलक्ष्मणः ॥ १४० ॥

" वालीने जिनका राज्य छीन लिया था, उन सुग्रीवके साथ ( अर्थात् मेरे साथ ) लक्ष्मणसहित भगवान् श्रीरामने अग्निको साक्षी बनाकर मित्रता की है ॥ १४० ॥

तेन वालिनमाहत्य शरेणैकेन संयुगे ।

वानराणां महाराजः कृतः सम्प्लवतां प्रभुः ॥ १४१ ॥

“ श्रीरघुनाथजीने युद्धस्थल में एक ही बाणसे वालीको मारकर सुग्रीवको ( मुझको ) उछलने - कूदनेवाले वानरोंका महाराज बना दिया है ॥ १४१ ॥

तस्य साहाय्यमस्माभिः कार्य सर्वात्मना त्विह ।

तेन प्रस्थापितस्तुभ्यं समीपमिह धर्मतः ॥ १४२ ॥

" अतः हमलोगों को सम्पूर्ण हृदयसे उनकी सहायता करनी है । यही सोचकर सुग्रीवने धर्मानुसार मुझे तुम्हारे पास भेजा है ॥ १४२ ॥

क्षिप्रमानीयतां सीता दीयतां राघवस्य च ।

यावन्न हरयो वीरा विधमन्ति बलं तव ॥ १४३ ॥

" उनका कहना है कि तुम तुरंत सीताको ले आओ और जबतक वीर वानर तुम्हारी सेनाका संहार नहीं करते हैं तभीतक उन्हें श्रीरघुनाथजीको सौंप दो ॥ १४३ ॥

वानराणां प्रभावोऽयं न केन विदितः पुरा ।

देवतानां सकाशं च ये गच्छन्ति निमन्त्रिताः ॥ १४४ ॥

" कौन ऐसा वीर है जिसे वानरोंका यह प्रभाव पहले से ही ज्ञात नहीं है । ये वे ही वानर हैं, जो युद्ध के लिये निमन्त्रित होकर देवताओंके पास भी उनकी सहायता के लिये जाते हैं ' ॥ १४४ ॥

इति वानरराजस्त्वामाहेत्यभिहितो मया ।

मामैक्षत ततो रुष्टश्चक्षुषा प्रदहन्निव ॥ १४५ ॥

' इस प्रकार वानरराज सुग्रीवने तुमसे संदेश कहा है । मेरे इतना कहते ही रावणने रुष्ट होकर मुझे इस तरह देखा, मानो अपनी दृष्टिसे मुझे दग्ध कर डालेगा ॥ १४५ ॥

तेन वध्योऽहमाशप्तो रक्षसा रौद्रकर्मणा ।

मत्प्रभावमविज्ञाय रावणेन दुरात्मना ॥ १४६ ॥

" भयंकर कर्म करनेवाले दुरात्मा राक्षस रावणने मेरे प्रभावको न जानकर अपने सेवकोंको आज्ञा दे दी कि इस वानरका ( मेरा ) वध कर दिया जाय ॥ १४६ ॥

ततो विभीषणो नाम तस्य भ्राता महामतिः ।

तेन राक्षसराजश्च याचितो मम कारणात् ॥ १४७ ॥

' तब उसके परम बुद्धिमान् भाई विभीषणने मेरे लिये राक्षसराज रावणसे प्रार्थना करते हुए कहा ॥ १४७ ॥

नैवं राक्षसशार्दूल त्यज्यतामेष निश्चयः ।

राजशास्त्र व्यपेतो हि मार्गः संलक्ष्यते त्वया ॥ १४८ ॥

" राक्षस शिरोमणे! ऐसा करना उचित नहीं है । आप

पृष्ठ 208

वाल्मीकि रामायण — खण्ड २, पृष्ठ 208 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

सुन्दरकाण्डे अष्टपञ्चाशः सर्गः १०२७ अपने इस निश्चयको त्याग दीजिये । आपकी दृष्टि इस समय राजनीति के विरुद्ध मार्गपर जा रही है ॥ १४८ ॥

दूतवध्या न दृष्टा हि राजशास्त्रेषु राक्षस ।

दूतेन वेदितव्यं च यथाभिहितवादिना ॥ १४ ९ ॥

“ राक्षसराज! राजनीति - सम्बन्धी शास्त्रोंमें कहीं भी दूतके वधका विधान नहीं है । दूत तो वही कहता है, जैसा कहने लिये उसे बताया गया होता है । उसका कर्तव्य है कि वह अपने स्वामी के अभिप्रायका ज्ञान करा दे ॥ १४ ९ ॥

सुमहत्यपराधेऽपि दूतस्यातुलविक्रम ।

विरूपकरणं दृष्टं न वधोऽस्ति हि शास्त्रतः ॥ १५० ॥

" अनुपम पराक्रमी वीर! दूतका महान् अपराध होनेपर भी शास्त्रमें उसके वघका दण्ड नहीं देखा गया है । उसके किसी अङ्गको विकृत कर देनामात्र ही बताया गया है ' ॥ १५० ॥

विभीषणेनैवमुक्तो रावणः संदिदेश तान् ।

राक्षसानेतदेवाद्य लाङ्गलं दह्यतामिति ॥ १५१ ॥

" विभीषण के ऐसा कहने पर रावणने उन राक्षसोंको आज्ञा दी- ' अच्छा तो आज इसकी यह पूँछ ही जला दो ' ॥ १५१ ॥

ततस्तस्य वचः श्रुत्वा मम पुच्छं समन्ततः ।

वेष्टितं शणवल्कैश्व पट्टेः कार्पास कैस्तथा ॥ १५२ ॥

" उसकी यह आज्ञा सुनकर राक्षसोंने मेरी पूँछ में सब ओरसे सुतरीकी रस्सियाँ तथा रेशमी और सूती कपड़े लपेट दिये ॥ १५२ ॥

राक्षसाः सिद्धसंनाहास्ततस्ते चण्डविक्रमाः ।

तदादीप्यन्त मे पुच्छं हनन्तः काष्ठमुष्टिभिः ॥ १५३ ॥

" इस प्रकार बाँध देनेके पश्चात् उन प्रचण्ड पराक्रमी राक्षसने काठके डंडों और मुक्कोंसे मारते हुए मेरी पूँछमें आग लगा दी || १५३ ॥

बद्धस्य बहुभिः पाशैर्यन्त्रितस्य च राक्षसैः ।

न मे पीडाभवत् काचिद् दिदृक्षोर्नगरीं दिवा ॥ १५४ ॥

" मैं दिनमें लङ्कापुरीको अच्छी तरह देखना चाहता था, इसलिये राक्षसोंद्वारा बहुत - सी रस्सियों से बाँधे और कसे जानेपर भी मुझे कोई पीड़ा नहीं हुई ॥ १५४ ॥

ततस्ते राक्षसाः शूरा बद्धं मामग्निसंवृतम् ।

अघोषयन् राजमार्गे नगरद्वारमागताः ॥ १५५ ॥

` तत्पश्चात् नगरद्वारपर आकर वे शूरवीर राक्षस पूँछमें लगी हुई आगसे घिरे और बँधे हुए मुझको सड़कपर घुमाते हुए सब ओर मेरे अपराधकी घोषणा करने लगे ॥ १५५ ॥

ततोऽहं सुमहद्रूपं संक्षिप्य पुनरात्मनः ।

विमोचयित्वा तं बन्धं प्रकृतिस्थः स्थितः पुनः ॥ १५६ ॥

' इतनेही में अपने उस विशाल रूपको संकुचित करके मैंने अपने आपको उस बन्धन से छुड़ा लिया और फिर स्वाभाविक रूपमें आकर मैं वहाँ खड़ा हो गया ॥ १५६ ॥

आयसं परिघं गृह्य तानि रक्षांस्यसूक्ष्यम् ।

ततस्तन्नगरद्वारं वेगेन प्लुतवानहम् ॥ १५७ ॥

" फिर फाटक पर रक्खे हुए एक लोहे के परिघको उठाकर मैंने उन सब राक्षसों को मार डाला ' इसके बाद बड़े वेग से कूदकर मैं उस नगरद्वारपर चढ़ गया ॥ १५७ ॥

पुच्छेन च प्रदीप्तेन तां पुरीं सादृगोपुराम् ।

दहाम्यहम सम्भ्रान्तो युगान्ताग्निरिव प्रजाः ॥ १५८ ॥

' तत्पश्चात् समस्त प्रजाको दग्ध करनेवाली प्रलयाग्निके समान मैं बिना किसी घबराहटके अट्टालिका और गोपुरसहित उस पुरीको अपनी जलती हुई पूँछकी आग से जलाने लगा ॥ १५८ ॥

विनष्टा जानकी व्यक्तं न ह्यदग्धः प्रदृश्यते ।

लङ्कायाः कश्चिदुद्देशः सर्वा भस्मीकृता पुरी ॥ १५ ९ ॥

दहता च मया लङ्कां दग्धा सीता न संशयः ।

रामस्य च महत्कार्य मयेदं विफलीकृतम् ॥ १६० ॥

" फिर मैंने सोचा ' लङ्काका कोई भी स्थान ऐसा नहीं दिखायी देता है, जो जला हुआ न हो, सारी नगरी जलकर भस्म हो गयी है । अतः अवश्य ही जानकीजी भी नष्ट हो गयी होंगी । इसमें संदेह नहीं कि लङ्काको जलाते जलाते मैंने सीताजीको भी जला दिया और इस प्रकार भगवान् श्रीराम के इस महान कार्यको मैंने निष्फल कर दिया ' ॥ १५ ९ -१६० ॥

इत शोकसमाविष्टश्चिन्तामहमुपागतः ।

ततोऽहं वाचमभीषं चारणानां शुभाक्षराम् ॥१६१ ॥

जानकी न च दग्धेति विस्मयोदन्तभाषिणाम् । ' इस तरह शोकाकुल होकर मैं बड़ी चिन्तामें पड़ गया । इतनेही में आश्चर्ययुक्त वृत्तान्तका वर्णन करनेवाले चारणोंकी शुभ अक्षरोंसे विभूषित यह वाणी मेरे कानोंमें पड़ी कि जानकी-जी इस आगसे नहीं जली हैं ॥ १६१३ ॥

ततो मे बुद्धिरुत्पन्ना श्रुत्वा तामद्भुतां गिरम् ॥ १६२ ॥

अदग्धा जानकीत्येव निमित्तैश्चोपलक्षितम् ।

दीप्यमाने तु लाङ्गूले न मां दहति पावकः ॥ १६३ ॥

हृदयं च प्रहृष्टं मे वाताः सुरभिगन्धिनः । ' उस अद्भुत वाणीको सुनकर मेरे मन में यह विचार उत्पन्न हुआ - " शुभ शकुनोंसे भी यही जान पड़ता है कि जानकीजी नहीं जली हैं; क्योंकि पूँछ में आग लग जाने पर भी अग्निदेव मुझे जला नहीं रहे हैं । मेरे हृदय में महान् हर्ष

पृष्ठ 209

वाल्मीकि रामायण — खण्ड २, पृष्ठ 209 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

१०२८ श्रीमद्वाल्मीकीय रामायणे भरा हुआ है और उत्तम सुगन्धसे युक्त मन्द मन्द वायु चल रही है ' || १६२१६३३ ॥ तैर्निमित्तैश्च दृष्टार्थैः कारणैश्च महागुणैः ॥ १६४ ॥

ऋषिवाक्यैश्च दृष्टार्थैरभवं हृष्टमानसः । ' जिन के फलोंका मुझे प्रत्यक्ष अनुभव हो चुका था, उन उत्तम शकुनों, महान् गुणशाली कारणों तथा ऋषियों ( चारणों ) की प्रत्यक्ष देखी हुई बातों से भी सीताजीके सकुशल होनेका विश्वास करके मेरा मन हर्षसे भर गया ॥ १६४३ ॥

पुनर्दृष्टा च वैदेही विसृष्टश्च तया पुनः ॥ १६५ ॥

ततः पर्वतमासाद्य तत्रारिष्टमहं पुनः ।

प्रतिप्लवनमारेभे युष्मदर्शनकाङ्क्षया ॥१६६ ॥

' तत्पश्चात् मैंने पुनः विदेहनन्दिनीका दर्शन किया और फिर उनसे विदा लेकर मैं अरिष्ट पर्वतपर आ गया । वहींसे आपलोगोंके दर्शनकी इच्छासे मैंने प्रतिप्लवन ( दुबारा आकाश में उड़ना ) आरम्भ किया ॥ १६५-१६६ ॥

ततः श्वसनचन्द्रार्कसिद्धगन्धर्वसेवितम् ।

पन्थानमहमाक्रम्य भवतो दृष्टवानिह ॥ १६७ ॥

' तत्पश्चात् वायु, चन्द्रमा, सूर्य, सिद्ध और गन्धबैँसे सेवित मार्गका आश्रय ले यहाँ पहुँचकर मैंने आपलोगोंका दर्शन किया है ॥ १६७ ॥

राघवस्य प्रसादेन भवतां चैव तेजसा ।

सुग्रीवस्य च कार्यार्थ मया सर्वमनुष्ठितम् ॥ १६८ ॥

' श्रीरामचन्द्रजीकी कृपा और आपलोगोंके प्रभावसे मैंने सुग्रीवके कार्यकी सिद्धिके लिये सब कुछ किया है ॥ १६८ ॥

एतत् सर्वे मया तत्र यथावदुपपादितम् ।

तत्र यन्न कृतं शेषं तत् सर्व क्रियतामिति ॥ १६ ९ ॥

" यह सारा कार्य मैंने वहाँ यथोचित रूपसे सम्पन्न किया है । जो कार्य नहीं किया है अथवा जो शेष रह गया है, वह सब आपलोग पूर्ण करें ' ॥ १६ ९ ॥ इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये सुन्दरकाण्डेऽष्टपञ्चाशः सर्गः ॥ ५८ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्ष रामायण आदिकान्यके सुन्दरकाण्ड में अट्ठावनवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ५८ ॥

एकोनषष्टितमः सर्गः हनुमान जी का सीताकी दुरवस्था बताकर वानरोंको

एतदाख्याय तत् सर्व हनूमान् मारुतात्मजः ।

भूयः समुपचक्राम वचनं वकुमुत्तरम् ॥ १ ॥

यह सब वृत्तान्त बताकर पवनकुमार हनुमानजीने पुनः उत्तम बातें कहनी आरम्भ कीं -- ॥ १ ॥

सफलो राघवोद्योगः सुग्रीवस्य च सम्भ्रमः ।

शीलमासाद्य सीताया मम च प्रीणितं मनः ॥ २ ॥

' कपिवरो! श्रीरामचन्द्रजीका उद्योग और सुग्रीवका उत्साह सफल हुआ । सीताजीका उत्तम शील - स्वभाव ( पातिव्रत्य ) देखकर मेरा मन अत्यन्त संतुष्ट हुआ है ॥ २ ॥

आर्यायाः सदृशं शीलं सीतायाः प्लवगर्षभाः ।

तपसा धारयेल्लोकान् क्रुद्धा वा निर्दहेदपि ॥ ३ ॥

' वानरशिरोमणियो! जिस नारीका शील - स्वभाव आर्या सीताके समान होगा, वह अपनी तपस्यासे सम्पूर्ण लोकको धारण कर सकती है अथवा कुपित होनेपर तीनों लोकों को जला सकती है ॥ ३ ॥

सर्वथातिप्रकृष्टोऽसौ रावणो राक्षसेश्वरः ।

यस्य तां स्पृशतो गात्रं तपसा न विनाशितम् ॥ ४ ॥

' राक्षसराज रावण सर्वथा महान् तपोबलसे सम्पन्न जान पड़ता है । जिसका अङ्ग सीताका स्पर्श करते लङ्कापर आक्रमण करनेके लिये उत्तेजित करना समय उनकी तपस्यासे नष्ट नहीं हो गया ॥ ४ ॥

न तदग्निशिखा कुर्यात् संस्पृष्टा पाणिना सती ।

जमकस्य सुता कुर्याद् यत् क्रोधकलुषीकृता ॥ ५ ॥

' हाथ से छू जानेपर आगकी लपट भी वह काम नहीं कर सकती, जो क्रोध दिलानेपर जनकनन्दिनी सीता कर सकती हैं ॥ ५ ॥

जाम्बवत्प्रमुखान् सर्वाननुज्ञाप्य महाकपीन् ।

अस्मिन्नेवंगते कार्ये भवतां च निवेदिते ।

न्याय्यं स्म सह वैदेह्या द्रष्टुं तौ पार्थिवात्मजौ ॥ ६ ॥

' इस कार्य में मुझे जहाँतक सफलता मिली है, वह सब इस रूपमें मैंने आपलोगोंको बता दिया । अब जाम्बवान् आदि सभी महाकपियोंकी सम्मति लेकर हम ( सीताको रावण के कारावाससे लौटाकर ) सीताके साथ ही श्रीरामचन्द्रजी और लक्ष्मणका दर्शन करें, यही न्यायसङ्गत जान पड़ता है ॥ ६ ॥

अहमेकोऽपि पर्याप्तः सराक्षसगणां पुरीम् ।

तां लङ्कां तरसा हन्तुं रावणं च महाबलम् ॥ ७ ॥

किं पुनः सहितो वीरैर्बलवद्भिः कृतात्मभिः ।

कृतास्त्रैः प्लवगैः शकैर्भवद्भिर्विजयैषिभिः ॥ ८ ॥

' मैं अकेला भी राक्षसगणसहित समस्त लङ्कापुरीका

पृष्ठ 210

वाल्मीकि रामायण — खण्ड २, पृष्ठ 210 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

सुन्दरकाण्डे एकोनषष्टितमः सर्गः १०२ ९ वेगपूर्वक विध्वंस करने तथा महाबली रावणको मार डालनेके लिये पर्याप्त हूँ । फिर यदि सम्पूर्ण अस्त्रोंको जाननेवाले आप-जैसे वीर, बलवान्, शुद्धात्मा, शक्तिशाली और विजया-भिलाषी वानरोंकी सहायता मिल जाय, तब तो कहना ही क्या है ॥ ७-८ ॥

अहं तु रावणं युद्धे ससैन्यं सपुरःसरम् ।

सहपुत्रं वधिष्यामि सहोदरयुतं युधि ॥ ९ ॥

' युद्धस्थलमें सेना, अग्रगामी सैनिक, पुत्र और सगे भाइयोसहित रावणका तो मैं ही वध कर डालूँगा ॥ ९ ॥

ब्राह्ममस्त्रं च रौद्रं च वायव्यं वारुणं तथा ।

यदि शक्रजितोऽस्त्राणि दुर्निरीक्ष्याणि संयुगे ।

तान्यहं निहनिष्यामि विधमिष्यामि राक्षसान् ॥ १० ॥

' यद्यपि इन्द्रजित् के ब्राह्म अस्त्र, रौद्र, वायव्य तथा वारुण आदि अस्त्र युद्ध में दुर्लक्ष्य होते हैं — किसीकी दृष्टिमें नहीं आते हैं, तथापि मैं ब्रह्माजीके वरदानसे उनका निवारण कर दूँगा और राक्षसों का संहार कर डालूँगा ॥ १० ॥

भवतामभ्यनुज्ञातो विक्रमो मे रुणद्धि तम् ।

मयाला विसृष्टा हि शैलवृष्टिर्निरन्तरा ॥ ११ ॥

देवानपि रणे हन्यात् किं पुनस्तान् निशाचरान् । ' यदि आपलोगोंकी आज्ञा मिल जाय तो मेरा पराक्रम रावणको कुण्ठित कर देगा । मेरेद्वारा लगातार बरसाये जानेवाले पत्थरोंकी अनुपम वृष्टि रणभूमिमें देवताओं को भी मौत के घाट उतार देगी । फिर उन निशाचरोंकी तो बात ही क्या है? ॥ ११३ ॥

भवतामननुज्ञातो विक्रमो मे रुणद्धि माम् ॥ १२ ॥

सागरोऽप्यतियाद् वेलां मन्दरः प्रचलेदपि ।

न जाम्बवन्तं समरे कम्पयेदरिवाहिनी ॥ १३ ॥

' आपलोगोंकी आज्ञा न होने के कारण ही मेरा पुरुषार्थ मुझे रोक रहा है । समुद्र अपनी मर्यादाको लाँघ जाय और मन्दराचल अपने स्थानसे छूट जाय, परंतु समराङ्गण में शत्रुओंकी सेना जाम्बवान्को विचलित कर दे, यह कभी सम्भव नहीं है ॥ १२-१३ ॥

सर्वराक्षसङ्घानां राक्षसा ये च पूर्वजाः ।

अलमेको s पि नाशाय वीरो वालिसुतः कपिः ॥ १४ ॥

' सम्पूर्ण राक्षसों और उनके पूर्वजों को भी यमलोक पहुँचाने के लिये वालीके वीर पुत्र कपिश्रेष्ठ अङ्गद अकेले काफी हैं ॥ १४ ॥

gar स्योरुवेगेन नीलस्य च महात्मनः ।

मन्दरोऽन्यवशीर्येत किं पुनर्युधि राक्षसाः ॥ १५ ॥

" वानरवीर महात्मा नीलके महान् वेगसे मन्दराचल भी विदीर्ण हो सकता है; फिर युद्ध में राक्षसोंका नाश करना उनके लिये कौन बड़ी बात है १ ॥ १५ ॥

सदेवासुरयक्षेषु गन्धर्वोरगपक्षिषु ।

मैन्दस्य प्रतियोद्धारं शंसत द्विविदस्य वा ॥ १६ ॥

' तुम सब - के - सब बताओ तो सही —- देवता, असुर, यक्ष, गन्धर्व, नाग और पक्षियोंमें भी कौन ऐसा वीर है, जो मैन्द अथवा द्विविदके साथ लोहा ले सके १ ॥ १६ ॥

अश्विपुत्रौ महावेगावेतौ प्लवगसत्तमौ ।

एतयोः प्रतियोद्धारं न पश्यामि रणाजिरे ॥ १७ ॥

" ये दोनों वानरशिरोमणि महान् वेगशाली तथा अश्विनीकुमारोंके पुत्र हैं । समराङ्गण में इन दोनोंका सामना करनेवाला मुझे कोई नहीं दिखायी देता ॥ १७ ॥

मयैव निहता लङ्का दग्धा भस्मीकृता पुरी ।

राजमार्गेषु सर्वेषु नाम विश्रावितं मया ॥ १८ ॥

' मैंने अकेले ही लङ्कावासियोंको मार गिराया, नगरमें आग लगा दी और सारी पुरीको जलाकर भस्म कर दिया । इतना ही नहीं, वहाँकी सब सड़कोंपर मैंने अपने नामका डंका पीट दिया ॥ १८ ॥

जयत्यतिबलो रामो लक्ष्मणश्च महाबलः ।

राजा जयति सुग्रीवो राघवेणाभिपालितः ॥ १ ९ ॥

अहं कोसलराजस्य दासः पवनसम्भवः ।

हनूमानिति सर्वत्र नाम विश्रावितं मया ॥ २० ॥

' अत्यन्त बलशाली श्रीराम और महाबली लक्ष्मणकी जय हो । श्रीरघुनाथजीके द्वारा सुरक्षित राजा सुग्रीवकी भी जय हो । मैं कोसलनरेश श्रीरामचन्द्रजीका दास और वायुदेवताका पुत्र हूँ । हनुमान् मेरा नाम है— इस प्रकार सर्वत्र अपने नामकी घोषणा कर दी है ॥ १ ९ -२० ॥

अशोकवनिकामध्ये रावणस्य दुरात्मनः ।

अधस्ताच्छिशपामूले साध्वी करुणमास्थिता ॥ २१ ॥

' दुरात्मा रावणकी अशोकवाटिकाके मध्यभागमें एक अशोक वृक्षके नीचे साध्वी सीता बड़ी दयनीय अवस्था में रहती हैं ॥ २१ ॥

राक्षसीभिः परिवृता शोकसंतापकर्शिता ।

मेघरेखापरिवृता चन्द्ररेखेव निष्प्रभा ॥ २२ ॥

" राक्षसियोंसे घिरी हुई होने के कारण वे शोक संतापसे दुर्बल होती जा रही हैं । बादलोंकी पंक्ति से घिरी हुई चन्द्रलेखाकी भाँति श्रीहीन हो गयी हैं ॥ २२ ॥

अचिन्तयन्ती वैदेही रावणं बलदर्पितम् ।

पतिव्रता च सुश्रोणी अवष्टब्धा च जानकी ॥ २३ ॥

' सुन्दर कटिप्रदेशवाली विदेहनन्दिनी जानकी पतिव्रता हैं । वे बलके घमंड में भरे रहनेवाले रावणको कुछ भी नहीं समझती हैं तो भी उसीकी कैद में पड़ी हैं ॥ २३ ॥