श्रीगणेशाय नमः।

वाल्मीकि रामायण — खण्ड २ — पृष्ठ 181–190

वाल्मीकि रामायण — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 181–190

पृष्ठ 181

वाल्मीकि रामायण — खण्ड २, पृष्ठ 181 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

१००२ श्रीमवाल्मीकीयरामायणे निशाचराणामधिपोऽनुजस्य

विभीषणस्योत्तमवाक्यमिष्टम् ।

जग्राह बुद्धया सुरलोकशत्रु-महावलो राक्षसराजमुख्यः ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आरामायण अपने छोटे भाई विभीषण के इस उत्तम और प्रिय वचनको सुनकर निशाचरोंके स्वामी तथा देवलोकके शत्रु महाबली राक्षसराज रावणने बुद्धिसे सोच - विचारकर उसे २८ ॥ स्वीकार कर लिया ॥ २८ ॥

आदिकाव्ये सुन्दरकाण्डे द्विपञ्चाशः सर्गः ॥ ५२ ॥

आदिकाव्यके सुन्दरकाण्ड में बावनवाँ सगँ पूरा हुआ ॥ ५२ ॥

त्रिपञ्चाशः सर्गः राक्षसोंका हनुमानजी की पूँछमें आग लगाकर उन्हें नगर में घुमाना

तस्य तद् वचनं श्रुत्वा दशग्रीवो महात्मनः ।

देशकालहितं वाक्यं भ्रातुरुत्तरमब्रवीत् ॥ १ ॥

छोटे भाई महात्मा विभीषणकी बात देश और कालके लिये उपयुक्त एवं हितकर थी । उसको सुनकर दशाननने इस प्रकार उत्तर दिया- ॥ १ ॥

सम्यगुक्तं हि भवता दूतवध्या विगर्हिता ।

अवश्यं तु वधायान्यः क्रियतामस्य निग्रहः ॥ २ ॥

' विभीषण! तुम्हारा कहना ठीक है । वास्तवमें दूतके वकी बड़ी निन्दा की गयी है; परंतु वधके अतिरिक्त दूसरा कोई दण्ड इसे अवश्य देना चाहिये ॥ २ ॥

कपीनां किल लाङ्गलमिष्टं भवति भूषणम् ।

तदस्य दीप्यतां शीघ्रं तेन दग्धेन गच्छतु ॥ ३ ॥

' वानरोंको अपनी पूँछ बड़ी प्यारी होती है । वही इनका आभूषण है । अतः जितना जल्दी हो सके, इसकी पूँछ जला दो । जली पूँछ लेकर ही यह यहाँसे जाय ॥ ३ ॥

ततः पश्यन्त्वमुं दीनमङ्गवैरूप्यकर्शितम् ।

सुमित्रज्ञातयः सर्वे बान्धवाः ससुहृज्जनाः ॥ ४ ॥

' वहाँ इसके मित्र, कुटुम्बी, भाई - बन्धु तथा हितैषी सुहृद् इसे अङ्ग भङ्गके कारण पीड़ित एवं दीन अवस्था में देखें ' ॥ ४ ॥

आशापयद् राक्षसेन्द्रः पुरं सर्वे सचत्वरम् ।

लाङ्गलेन प्रदीप्तेन रक्षोभिः परिणीयताम् ॥ ५ ॥

फिर राक्षसराज रावणने यह आज्ञा दी कि ' राक्षसगण इसकी पूँछ में आग लगाकर इसे सड़कों और चौराहों सहित समूचे नगर में घुमा ' ॥ ५ ॥

तस्य तद् वचनं श्रुत्वा राक्षसाः कोपकर्कशाः ।

वेष्टन्ते तस्य लाङ्गलं जीर्णैः कार्पासिकैः पटैः ॥ ६ ॥

स्वामीका यह आदेश सुनकर क्रोध के कारण कठोरता

संवेष्टयमाने लाङ्गले व्यवर्धत महाकपिः ।

शुष्कमिन्धनमासाद्य वनेष्विव हुताशनम् ॥ ७ ॥

जब उनकी पूँछमें वस्त्र लपेटा जाने लगा, उस समय वनोंमें सूखी लकड़ी पाकर भभक उठनेवाली आगकी भाँति उन महाकपिका शरीर चढ़कर बहुत बड़ा हो गया ॥ ७ ॥

तैलेन परिषिच्याथ तेऽग्नि तत्रोपपादयन् ।

लाङ्गूलेन प्रदीप्तेन राक्षसांस्तानताडयत् ॥ ८ ॥

रोषामपरीतात्मा बालसूर्यसमाननः । राक्षसोंने वस्त्र लपेटने के पश्चात् उनकी पूँछपर तेल छिड़क दिया और आग लगा दी । तब हनुमान्जीका हृदय रोषसे भर गया । उनका मुख प्रातःकालके सूर्य की भाँति अरुण आभासे उद्भासित हो उठा और वे अपनी जलती हुई पूँछसे ही राक्षसोंको पीटने लगे ॥ ८३ ॥

स भूयः संगतैः करे राक्षसैर्हरिपुङ्गवः ॥ ९ ॥

सहस्त्रीबालवृद्धाश्च जग्मुः प्रीतिं निशाचराः । तब क्रूर राक्षसोंने मिलकर पुनः उन वानरशिरोमणिको कसकर बाँध दिया । यह देख स्त्रियों, बालकों और वृद्धों-सहित समस्त निशाचर बड़े प्रसन्न हुए || ९ ३ || निबद्धः कृतवान् वीरस्तत्कालसदृशीं मतिम् ॥ १० ॥

कामं खलु न मे शक्ता निबद्धस्यापि राक्षसाः ।

छित्त्वा पाशान् समुत्पत्य हन्यामहमिमान् पुनः ॥ ११ ॥

तब वीरवर हनुमानजी बँधे बँधे ही उस समय के योग्य विचार करने लगे- ' यद्यपि मैं बँधा हुआ हूँ तो भी इन राक्षसोंका मुझपर जोर नहीं चल सकता । इन बन्धनोंको तोड़कर मैं ऊपर उछल जाऊँगा और पुनः इन्हें मार सकूँगा ॥ १०-११ ॥

यदि भर्तृहितार्थाय चरन्तं भर्तृशासनात् ।

निबध्नन्ते दुरात्मानो न तु मे निष्कृतिः कृता ॥ १२ ॥

" मैं अपने स्वामी श्रीरामके हितके लिये विचर रहा हूँ, तो भी ये दुरात्मा राक्षस यदि अपने राजाके आदेशसे मुझे पूर्ण बर्ताव करनेवाले राक्षस हनुमानजी की पूँछमें पुराने बाँध रहे हैं तो इससे मैं जो कुछ कर चुका हूँ, उसका बदला सूती कपड़े लपेटने लगे ॥ ६ ॥ नहीं पूरा हो सका है ॥ १२ ॥

पृष्ठ 182

वाल्मीकि रामायण — खण्ड २, पृष्ठ 182 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

सुन्दरकाण्डे त्रिपञ्चाशः सर्गः २००३

सर्वेषामेव पर्याप्तो राक्षसानामहं युधि ।

किं तु रामस्य प्रीत्यर्थे विषहिष्येऽहमीदृशम् ॥ १३ ॥

' मैं युद्धस्थलमें अकेला ही इन समस्त राक्षसों का संहार करनेमें पूर्णतः समर्थ हूँ, किंतु इस समय श्रीरामचन्द्रजी की प्रसन्नता के लिये मैं ऐसे बन्धनको चुपचाप सह लूँगा ॥

लङ्का चारयितव्या मे पुनरेव भवेदिति ।

रात्रौ नहि सुदृष्टा मे दुर्ग कर्मविधानतः ॥ १४ ॥

‘ ऐसा करनेसे मुझे पुनः समूची लङ्कामें विचरने और इसके निरीक्षण करनेका अवसर मिलेगा; क्योंकि रातमें घूमने के कारण मैंने दुर्गरचनाकी विधिपर दृष्टि रखते हुए इसका अच्छी तरह अवलोकन नहीं किया था ॥ १४ ॥

अवश्यमेव द्रष्टव्या मया लङ्का निशाक्षये ।

कामं बध्नन्तु मे भूयः पुच्छस्योद्दीपनेन च ॥ १५ ॥

पीडां कुर्वन्ति रक्षांसि न मेऽस्ति मनसः श्रमः । ' अतः सबेरा हो जानेपर मुझे अवश्य ही लङ्का देखनी है । भले ही ये राक्षस मुझे बारंबार बाँधे और पूँछ में आग लगाकर पीड़ा पहुँचायें । मेरे मनमें इसके कारण तनिक भी कष्ट नहीं होगा ' ॥ १५३ ॥

ततस्ते संवृताकारं सत्त्ववन्तं महाकपिम् ॥ १६ ॥

परिगृह्य ययुर्हष्टा राक्षसाः कपिकुञ्जरम् ।

शङ्खभेरीनिनादैश्व घोषयन्तः स्वकर्मभिः ॥ १७ ॥

राक्षसाः क्रूरकर्माणश्चारयन्ति स्म तां पुरीम् । तदनन्तर वे क्रूरकर्मा राक्षस अपने दिव्य आकारको छिपाये रखनेवाले सत्त्वगुणशाली महान् वानरवीर कपिकुञ्जर हनुमानजीको पकड़कर बड़े हर्ष के साथ ले चले और शङ्ख एवं भेरी बजाकर उनके ( रावण - द्रोह आदि ) अपराधोंकी घोषणा करते हुए उन्हें लङ्कापुरीमें सब ओर घुमाने लगे ॥ १६-१७३ ॥ अन्वीयमानो रक्षोभिर्ययौ सुखमरिंदमः ॥ १८ ॥

हनूमांश्चारयामास राक्षसानां महापुरीम् ।

अथापश्यद् विमानानि विचित्राणि महाकपिः ॥ १ ९ ॥

शत्रुदमन हनुमान जी बड़ी मौजसे आगे बढ़ने लगे । समस्त राक्षस उनके पीछे - पीछे चल रहे थे । महाकपि हनुमान् जी राक्षसोंकी उस विशाल पुरीमें विचरते हुए उसे देखने लगे । उन्होंने वहाँ बड़े विचित्र विमान देखे ॥ १८-१९ ॥

संवृतान् भूमिभागांश्च सुविभक्तांश्च चत्वरान् ।

रथ्याश्च गृहसम्बाधाः कपिः शृङ्गाटकानि च ॥ २० ॥

तथा रथ्योपरध्याश्च तथैव च गृहान्तरान् । परकोटेसे घिरे हुए कितने ही भूभाग, पृथक - पृथक बने हुए सुन्दर चबूतरे, घनीभूत गृहपंक्तियों से घिरी हुई सड़कें, चौराहे, छोटी - बड़ी गलियाँ और घरोंके मध्यभाग - इन सबको वे बड़े गौर से देखने लगे ॥ २०३ ॥

चत्वरेषु चतुष्केषु राजमार्गे तथैव च ॥ २१ ॥

घोषयन्ति कपिं सर्वे चार इत्येव राक्षसाः । सब राक्षस उन्हें चौराहोंपर, चार खंभेवाले मण्डपों में तथा सड़कों पर घुमाने और जासूस कहकर उनका परिचय देने लगे ॥ २ ९ ३ ॥ स्त्रीबालवृद्धा निर्जग्मुस्तत्र तत्र कुतूहलात् ॥ २२ ॥

तं प्रदीपितलाङ्गूलं हनूमन्तं दिदृक्षवः । भिन्न - भिन्न स्थानोंमें जलती पूँछवाले हनुमानजीको देखने के लिये वहाँ बहुत - से बालक, वृद्ध और स्त्रियाँ कौतूहल-वश घर से बाहर निकल आती थीं ॥ २२३ ॥

दीप्यमाने ततस्तस्य लाङ्गूलाग्रे हनूमतः ॥ २३ ॥

राक्षस्यस्ता विरूपाक्ष्यः शंसुर्देव्यास्तदप्रियम् । हनुमानजी की पूँछमें जब आग लगायी जा रही थी, उस समय भयंकर नेत्रोंवाली राक्षसियोंने सीतादेवी के पास जाकर उनसे यह अप्रिय समाचार कहा ॥ २३३ ॥

यस्त्वया कृतसंवादः सीते ताम्रमुखः कपिः ॥ २४ ॥

लाङ्गूलेन प्रदीप्तेन स एष परिणीयते । ' सीते! जिस लाल मुँहवाले बन्दरने तुम्हारे साथ बात-चीत की थी, उसकी पूँछ में आग लगाकर उसे सारे नगरमें घुमाया जा रहा है ' ॥ २४३ ॥

श्रुत्वा तद् वचनं क्रूरमात्मापहरणोपमम् ॥ २५ ॥

वैदेही शोक संतप्ता हुताशनमुपागमत् । अपने अपहरणकी ही भाँति दुःख देनेवाली यह क्रूरता-पूर्ण बात सुनकर विदेहनन्दिनी सीता शोकसे संतप्त हो उठीं और मन - ही - मन अग्निदेवकी उपासना करने लगीं ॥ २५३ ॥

मङ्गलाभिमुखी तस्य सा तदासीन्महाकपेः ॥ २६ ॥

उपतस्थे विशालाक्षी प्रयता हव्यवाहनम् । उस समय विशाललोचना पवित्रहृदया सीता महाकपि हनुमानजी के लिये मङ्गलकामना करती हुई अग्निदेवकी उपासनामें संलग्न हो गयीं और इस प्रकार बोलीं ॥ २६३ ॥

यद्यस्ति पतिशुश्रूषा यद्यस्ति चरितं तपः ।

यदि वा त्वेकपत्नीत्वं शीतो भव हनूमतः ॥ २७ ॥

" अग्निदेव! यदि मैंने पतिकी सेवा की है और यदि मुझमें कुछ भी तपस्या तथा पातिव्रत्यका बल है तो तुम हनुमान के लिये शीतल हो जाओ ॥ २७ ॥

यदि किंचिदनुक्रोशस्तस्य मय्यस्ति धीमतः ।

यदि वा भाग्यशेषो मे शीतो भव हनूमतः ॥ २८ ॥

" यदि बुद्धिमान् भगवान् श्रीरामके मनमें मेरे प्रति

पृष्ठ 183

वाल्मीकि रामायण — खण्ड २, पृष्ठ 183 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

१००४ श्रीमवाल्मीकीय रामायणे किंचिन्मात्र भी दया है अथवा यदि मेरा सौभाग्य शेष है तो तुम हनुमान के लिये शीतल हो जाओ ॥ २८ ॥

यदि मां वृत्तसम्पन्नां तत्समागमलालसाम् स विजानाति धर्मात्मा शीतो भव हनुमतः ' यदि धर्मात्मा श्रीरघुनाथजी मुझे सदाचारसे और अपने से मिलनेके लिये उत्सुक जानते हैं तो तुम के लिये शीतल हो जाओ ॥ २ ९ ॥ यदि मां तारयेदार्यः सुग्रीवः सत्यसंगरः अस्माद् दुःखाम्बुसंरोधाच्छीतो भव हनूमतः

।

॥ २ ९ ॥

सम्पन्न

हनुमान्-।

॥ ३० ॥

‘ यदि सस्यप्रतिज्ञ आर्य सुग्रीव इस दुःख के महासागर से मेरा उद्धार कर सकें तो तुम हनुमान के लिये शीतल हो जाओ ' ॥ ३० ॥

ततस्तीक्ष्णाचिरव्यग्रः प्रदक्षिणशिखोऽनलः ।

जज्वाल मृगशावाक्ष्याः शंसन्निव शुभं कपेः ॥ ३१ ॥

मृगनयनी सीता के इस प्रकार प्रार्थना करनेपर तीखी लपटोंवाले अग्निदेव मानो उन्हें हनुमान के मङ्गलकी सूचना देते हुए शान्तभावसे जलने लगे । उनकी शिखा प्रदक्षिण भावसे उठने लगी ॥ ३१ ॥

हनूमजनकश्चैव पुच्छानयुतोऽनिलः ।

aat स्वास्थ्यकरो देव्याः प्रालेयानिलशीतलः ॥ ३२ ॥

हनुमान् के पिता वायुदेवता भी उनकी पूँछमें लगी हुई आगसे युक्त हो बर्फीली हवाके समान शीतल और देवी सीता के लिये स्वास्थ्यकारी ( सुखद ) होकर बहने लगे ॥ ३२ ॥

दह्यमाने च लाङ्गले चिन्तयामास वानरः ।

प्रदीप्तोऽग्निरयं कस्मान्न मां दहति सर्वतः ॥ ३३ ॥

उधर पूँछमें आग लगायी जानेपर हनुमानजी सोचने लगे- ' अहो! यह आग सब ओरसे प्रज्वलित होनेपर भी मुझे जलाती क्यों नहीं है १ ॥ ३३ ॥

दृश्यते च महाज्वालः करोति च न मे रुजम् ।

शिशिरस्येव सम्पातो लाङ्गूलाम्रे प्रतिष्ठितः ॥ ३४ ॥

" इसमें इतनी ऊँची ज्वाला उठती दिखायी देती है, तथापि यह आग मुझे पीड़ा नहीं दे रही है । मालूम होता है मेरी पूँछके अग्रभागमें बर्फका ढेर - सा रख दिया गया है । ३४ ।

अथ वा तदिदं व्यक्तं यद् दृष्टं प्लवता मया ।

रामप्रभावादाश्चर्य पर्वतः सरितां पतौ ॥ ३५ ॥

' अथवा उस दिन समुद्रको लाँघते समय मैंने सागर में श्रीरामचन्द्र जी के प्रभावसे पर्वतके प्रकट होने की जो आश्चर्य-जनक घटना देखी थी, उसी तरह आज यह अग्निकी शीतलता भी व्यक्त हुई है ॥ ३५ ॥

यदि तावत् समुद्रस्य मैनाकस्य च धीमतः ।

रामार्थ सम्भ्रमस्तादक्किमग्निर्न करिष्यति ॥ ३६ ॥

' यदि श्रीरामके उपकारके लिये समुद्र और बुद्धिमान् मैना के मनमें वैसी आदरपूर्ण उतावली देखी गयी तो क्या अग्निदेव उन भगवान् के उपकार के लिये शीतलता नहीं प्रकट करेंगे १ ॥ ३६ ॥

सीतायाश्चानृशंस्येन तेजसा राघवस्य च ।

पितुश्च मम सख्येन न मां दहति पावकः ॥ ३७ ॥

' निश्चय ही भगवती सीताकी दया, श्रीरघुनाथजीके तेज तथा मेरे पिताकी मैत्रीके प्रभावसे अग्निदेव मुझे जला नहीं रहे हैं ' || ३७ || भूयः स चिन्तयामास मुहूर्त कपिकुञ्जरः कथमस्मद्विधस्येह बन्धनं राक्षसाधमैः प्रतिक्रियास्य युक्ता स्यात् सति मह्यं पराक्रमे तदनन्तर कपिकुञ्जर हनुमान्ने पुनः एक इस प्रकार विचार किया ' मेरे जैसे पुरुषका यहाँ निशाचरोंद्वारा बाँधा जाना कैसे उचित हो सकता है

।

॥ ३८ ॥

। मुहूर्तत इन नीच ? पराक्रम रहते हुए मुझे अवश्य इसका प्रतीकार करना चाहिये ' ३८३ ततश्छित्त्वा च तान् पाशान् वेगवान् वै महाकपिः ॥ ३ ९ ॥ उत्पपाताथ वेगेन ननाद च महाकपिः । यह सोचकर वे वेगशाली महाकपि हनुमान् ( जिन्हें राक्षसोंने पकड़ रखा था ) उन बन्धनोंको तोड़कर बड़े वेग से ऊपरको उछले और गर्जना करने लगे ( उस समय भी उनका शरीर रस्सियों में बँधा हुआ ही था ) ॥ ३ ९ ३ ॥ पुरद्वारं ततः श्रीमान्शलभ्टङ्गमिवोन्नतम् ॥ ४० ॥

विभक्तरक्षः सम्बाधमाससादानिलात्मजः 1 उछलकर वे श्रीमान् पवनकुमार पर्वत - शिखर के समान ऊँचे नगरद्वारपर जा पहुँचे, जहाँ राक्षसोंकी भीड़ नहीं थी ॥ ४०३ ॥

स भूत्वा शैलसंकाशः क्षणेन पुनरात्मवान् ॥ ४१ ॥

स्वतां परमां प्राप्तो बन्धनान्यवशातयत् ।

विमुक्तश्चाभवच्छ्रीमान् पुनः पर्वतसंनिभः ॥ ४२ ॥

पर्वताकार होकर भी वे मनस्वी हनुमान् पुनः क्षणभरमें बहुत ही छोटे और पतले हो गये । इस प्रकार उन्होंने अपने सारे बन्धनोंको निकाल फेंका । उन बन्धनोंसे मुक्त होते ही तेजस्वी हनुमान् जी फिर पर्वत के समान विशालकाय हो गये ॥ ४१-४२ ॥ वीक्षमाणश्च ददृशे परिघं तोरणाश्रितम् ।

स तं गृह्य महाबाहुः कालायस परिष्कृतम् ।

रक्षिणस्तान् पुनः सर्वान् सूदयामास मारुतिः ॥ ४३ ॥

उस समय उन्होंने जब इधर - उधर दृष्टि डाली, तब उन्हें फाटक के सहारे रक्खा हुआ एक परिघ दिखायी दिया ।

पृष्ठ 184

वाल्मीकि रामायण — खण्ड २, पृष्ठ 184 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

सुन्दरकाण्डे चतुःपञ्चाशः सर्गः १००५ काले लोहेके बने हुए उस परिघको लेकर महाबाहु पवन- उन राक्षसों को मारकर रणभूमिमें प्रचण्ड पराक्रम प्रकट पुत्रने वहाँके समस्त रक्षकोंको फिर मार गिराया ॥ ४३ ॥ करनेवाले हनुमानजी पुनः लङ्कापुरीका निरीक्षण करने लगे ।

स तान् निद्दत्वा रणचण्डविक्रमः उस समय जलती हुई पूँछसे जो ज्वालाओंकी माला - सी समीक्षमाणः पुनरेव लङ्काम् । उठ रही थी, उससे अलंकृत हुए वे वानरवीर तेज: -प्रदीप्तलाङ्गलकृतार्चिमाली पुञ्जसे देदीप्यमान सूर्यदेव के समान प्रकाशित हो रहे प्रकाशितादित्य इवार्चिमाली ॥ ४४ ॥ थे ॥ ४४ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये सुन्दरकाण्डे त्रिपञ्चाशः सर्गः ॥ ५३ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आरामायण आदिकाव्यके सुन्दरकाण्ड में तिरपनवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ५३ ॥

+60+ चतुःपञ्चाशः सर्गः लङ्कापुरीका दहन और राक्षसोंका विलाप

वीक्षमाणस्ततो लङ्कां कपिः कृतमनोरथः ।

वर्धमानसमुत्साहः कार्यशेषमचिन्तयत् ॥ १ ॥

हनुमानजी के सभी मनोरथ पूर्ण हो गये थे । उनका उत्साह बढ़ता जा रहा था । अतः वे लङ्काका निरीक्षण करते हुए शेष कार्यके सम्बन्धमें विचार करने लगे ॥ १ ॥

किं नु खल्ववशिष्टं मे कर्तव्यमिह साम्प्रतम् ।

यदेषां रक्षसां भूयः संतापजननं भवेत् ॥ २ ॥

' अब इस समय लङ्कामें मेरे लिये कौन - सा ऐसा कार्य बाकी रह गया है, जो इन राक्षसको अधिक संताप देनेवाला हो ॥ २ ॥

वनं तावत्प्रमथितं प्रकृष्टा राक्षसा हताः ।

बलैकदेशः क्षपितः शेषं दुर्गविनाशनम् ॥ ३ ॥

‘ प्रमदावनको तो मैंने पहले ही उजाड़ दिया था, बड़े-बड़े राक्षसोंको भी मौत के घाट उतार दिया और रावणकी सेनाके भी एक अंशका संहार कर डाला । अब दुर्गका विध्वंस करना शेष रह गया ॥ ३ ॥

दुर्गे विनाशिते कर्म भवेत् सुखपरिश्रमम् ।

अल्पयत्नेन कार्येऽस्मिन् मम स्यात् सफलः श्रमः ॥४ ॥

' दुर्गका विनाश हो जानेपर मेरे द्वारा समुद्र - लङ्घन आदि कर्मके लिये किया गया प्रयास सुखद एवं सफल होगा ॥ मैंने सीताजीकी खोजके लिये जो परिश्रम किया है, वह थोड़े - से ही प्रयत्नद्वारा सिद्ध होनेवाले लङ्कादहनसे सफल हो जायगा ॥ ४ ॥

यो ह्ययं मम लाङ्गले दीप्यते हव्यवाहनः ।

अस्य संतर्पणं न्याय्यं कर्तुमेभिर्गृहोत्तमैः ॥ ५ ॥

' मेरी पूँछमें जो ये अग्निदेव देदीप्यमान हो रहे हैं, इन्हें इन श्रेष्ठ गृहोंकी आहुति देकर तृप्त करना न्यायसंगत जान पड़ता है ' ॥ ५ ॥

ततः प्रदीप्तलाङ्गलः सविद्युदिव तोयदः ।

भवनाग्रेषु लङ्काया विचचार महाकपिः ॥ ६ ॥

ऐसा सोचकर जलती हुईं पूँछके कारण बिजलीसहित मेघकी भाँति शोभा पानेवाले कपिश्रेष्ठ हनुमानजी लङ्काके महलोंपर घूमने लगे ॥ ६ ॥

गृहाद् गृहं राक्षसानामुद्यानानि च वानरः ।

वीक्षमाणो ह्यसंत्रस्तः प्रासादांश्च चचार सः ॥ ७ ॥

वे वानरवीर राक्षसोंके एक घरसे दूसरे घरपर पहुँचकर उद्यानों और राजभवनोंको देखते हुए निर्भय होकर विचरने लगे ॥ ७ ॥

अवप्लुत्य महावेगः प्रहस्तस्य निवेशनम् ।

अग्निं तत्र विनिक्षिप्य श्वसनेन समो बली ॥ ८ ॥

ततोऽन्यत् पुप्लुवे वेश्म महापाइर्वस्य वीर्यवान् ।

मुमोच हनुमानग्नि कालानलशिखोपमम् ॥ ९ ॥

घूमते - घूमते वायुके समान बलवान् और महान् वेगशाली हनुमान् उछलकर प्रहस्तके महलपर जा पहुँचे और उसमें आग लगाकर दूसरे घर पर कूद पड़े । वह महापार्श्वका निवासस्थान था । पराक्रमी हनुमान्ने उसमें भी कालाग्निकी लपटोंके समान प्रज्वलित होनेवाली आग फैला दी ॥ ८ - ९ ॥

वज्रदंष्ट्रस्य च तथा पुप्लुवे स महाकपिः ।

शुकस्य च महातेजाः सारणस्य च धीमतः ॥ १० ॥

तत्पश्चात् वे महातेजस्वी महाकपि क्रमशः वज्रदंष्ट्र, शुक और बुद्धिमान् सारणके घरोंपर कूदे और उनमें आग लगाकर आगे बढ़ गये ॥ १० ॥

तथा चेन्द्रजितो वेश्म ददाह हरियूथपः ।

जम्बुमालेः सुमालेश्च ददाह भवनं ततः ॥ ११ ॥

इसके बाद वानरयूथपति हनुमान्ने इन्द्र विजयी मेघनादका घर जलाया । फिर जम्बुमाली और सुमालीके घरोंको फूँक दिया ॥ ११ ॥

पृष्ठ 185

वाल्मीकि रामायण — खण्ड २, पृष्ठ 185 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

१००६ श्रीमवाल्मीकीयरामायणे

रश्मिकेतोश्व भवनं सूर्यशत्रोस्तथैव च ।

कर्णस्य दंष्ट्रस्य रोमशस्य च रक्षसः ॥ १२ ॥

युद्धोन्मत्तस्य मत्तस्य ध्वजग्रीवस्य रक्षसः ।

विधुजिहस्य घोरस्य तथा हस्तिमुखस्य च ॥ १३ ॥

करालस्य विशालस्य शोणिताक्षस्य चैव हि ।

कुम्भकर्णस्य भवनं मकराक्षस्य चैव हि ॥ १४ ॥

नरान्तकस्य कुम्भस्य निकुम्भस्य दुरात्मनः ।

यशशत्रोश्च भवनं ब्रह्मशत्रोस्तथैव च ॥ १५ ॥

तदनन्तर रश्मिकेतु, सूर्यशत्रु, ह्रस्वकर्ण, दंष्ट्र, राक्षस रोमश, रणोन्मत्त मत्त, ध्वजग्रीव, भयानक विद्युजिद्द, हस्तिमुख, कराल, विशाल, शोणिताक्ष, कुम्भकर्ण, मकराक्ष, नरान्तक, कुम्भ, दुरात्मा निकुम्भ, यज्ञशत्रु और ब्रह्मशत्रु आदि राक्षसोंके घरोंमें जा - जाकर उन्होंने आग लगायी ॥

वर्जयित्वा महातेजा विभीषणगृहं प्रति ।

क्रममाणः क्रमेणैव ददाह हरिपुङ्गवः ॥ १६ ॥

उस समय महातेजस्वी कपिश्रेष्ठ हनुमान्ने केवल विभीषणका घर छोड़कर अन्य सब घरों में क्रमशः पहुँचकर उन सबमें आग लगा दी ॥ १६ ॥

तेषु तेषु महार्हेषु भवनेषु महायशाः ।

गृहेष्वृद्धिमतामृद्धिं ददाह कपिकुञ्जरः ॥ १७ ॥

महायशस्वी कपिकुञ्जर पवनकुमारने विभिन्न बहुमूल्य भवनों में जा - जाकर समृद्धिशाली राक्षसों के घरोंकी सारी सम्पत्ति जलाकर भस्म कर डाली ॥ १७ ॥

सर्वेषां समतिक्रम्य राक्षसेन्द्रस्य वीर्यवान् ।

आससादाथ लक्ष्मीवान् रावणस्य निवेशनम् ॥ १८ ॥

सबके घरोंको लाँघते हुए शोभाशाली पराक्रमी हनुमान् राक्षसराज रावण के महलपर जा पहुँचे ॥ १८ ॥

ततस्तस्मिन् गृहे मुख्ये नानारत्नविभूषिते ।

मेरुमन्दर संकाशे नानामङ्गलशोभिते ॥ १ ९ ॥

प्रदीप्तमग्निमुत्सृज्य लाङ्गला प्रतिष्ठितम् ।

ननाद हनुमान वीरो युगान्तजलदो यथा ॥ २० ॥

वही लङ्का सब महलों में श्रेष्ठ, भाँति - भाँति के रत्नोंसे विभूषित, मेरुपर्वतके समान ऊँचा और नाना प्रकारके माङ्गलिक उत्सर्वोसे सुशोभित था । अपनी पूँछके अग्रभागमें प्रतिष्ठित हुईं प्रज्वलित अग्निको उस महलमें छोड़कर वीरवर हनुमान् प्रलयकालके मेघकी भाँति भयानक गर्जना करने लगे ॥ १ ९ -२० ॥

श्वसनेन च संयोगादतिवेगो महाबलः ।

कालाग्निरिव जज्वाल प्रावर्धत हुताशनः ॥ २१ ॥

हवाका सहारा पाकर वह प्रबल आग बड़े वेगसे बढ़ने लगी और कालाग्निके समान प्रज्वलित हो उठी ॥ २१ ॥

प्रदीप्तमग्नि पवनस्तेषु वेश्मसु चारयन् ।

तानि काञ्चनजालानि मुक्तामणिमयानि च ॥ २२ ॥

भवनानि व्यशीर्यन्त रत्नवन्ति महान्ति च ।

तानि भग्नविमानानि निपेतुर्वसुधातले ॥ २३ ॥

वायु उस प्रज्वलित अग्निको सभी घरोंमें फैलाने लगी । सोनेकी खिड़कियोंसे सुशोभित, मोती और मणिर्योद्वारा निर्मित तथा रत्नों से विभूषित ऊँचे - ऊँचे प्रासाद एवं सतमहले भवन फट - फटकर पृथ्वीपर गिरने लगे । २२-२३ ॥

भवनानीव सिद्धानामम्बरात् पुण्यसंक्षये ।

संजज्ञे तुमुलः शब्दो राक्षसानां प्रधावताम् ॥ २४ ॥

स्वे स्वेगृहपरित्राणे भग्नोत्साहोज्झितश्रियाम् । वे गिरते हुए भवन पुण्यका क्षय नीचे गिरनेवाले सिद्धों के घरोंके समान उस समय राक्षस अपने - अपने घरोंको आग बुझाने के लिये इधर - उधर दौड़ने लगे जाता रहा और उनकी श्री नष्ट हो गयी तुमुल आर्तनाद चारों ओर गूँजने लगा ॥ नूनमेषोऽग्निरायातः कपिरूपेण हा होनेपर आकाशसे जान पड़ते थे । बचाने - उनकी । उनका उत्साह थी । उन सबका २४३ ॥ इति ॥ २५ ॥

क्रन्दन्त्यः सहसा पेतुः स्तनंधयधराः स्त्रियः । वे कहते थे- ' हाय! यह वानरके रूपमें साक्षात् अग्नि देवता ही आ पहुँचा है । ' कितनी ही स्त्रियाँ गोद में बच्चे लिये सहसा क्रन्दन करती हुई नीचे गिर पड़ीं ॥ २५३ ॥

काचिदपिरीताङ्गयो हर्म्येभ्यो मुक्तमूर्धजाः ॥ २६ ॥

पतन्त्यो रेजिरेऽभ्रेभ्यः सौदामन्य इवाम्बरात् । कुछ राक्षसियोंके सारे अङ्ग आगकी लपेटमें आ गये, वे बाल बिखेरे अट्टालिकाओंसे नीचे गिर पड़ीं । गिरते समय वे आकाश में स्थित मेघोंसे गिरनेवाली बिजलियोंके समान प्रकाशित होती थीं ॥ २६३ ॥

वज्रविद्रुमवैदूर्यमुक्तारजतसंहतान् ॥ २७ ॥

विचित्रान् भवनाद्धातूः स्यन्दमानान् ददर्श सः । हनुमानजीने देखा जलते हुए घरोंसे हीरा, मूँगा, नीलम, मोती तथा सोने, चाँदी आदि विचित्र - विचित्र धातुओंकी राशि पिघल पिघलकर बही जा रही है ॥ २७३ ॥

नाग्निस्तृप्यति काष्ठानां तृणानां च यथा तथा ॥ २८ ॥

इनूमान राक्षसेन्द्राणां वधे किंचिन्न तृप्यति ।

न हनूमद्विशस्तानां राक्षसानां वसुन्धरा ॥ २ ९ ॥

जैसे आग सूखे काठ और तिनकोंको जलाने से कभी तृप्त नहीं होती, उसी प्रकार हनुमान् बड़े - बड़े राक्षसोंके वध करने से तनिक भी तृप्त नहीं होते थे और हनुमानजी के मारे हुए राक्षसोंको अपनी गोद में धारण करनेसे इस वसुन्धरा-का भी जी नहीं भरता था ॥ २८-२९ ॥

पृष्ठ 186

वाल्मीकि रामायण — खण्ड २, पृष्ठ 186 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

सुन्दरकाण्डे चतुःपञ्चाशः सर्गः १००७

हनूमता वेगवता वानरेण महात्मना ।

लङ्कापुरं प्रदग्धं तद् रुद्रेण त्रिपुरं यथा ॥ ३० ॥

जैसे भगवान् रुद्रने पूर्वकालमें त्रिपुरको दग्ध किया था, उसी प्रकार वेगशाली वानरवीर महात्मा हनुमानजीने लङ्कापुरीको जला दिया ॥ ३० ॥

ततः स लङ्कापुर पर्वता समुत्थितो भीमपराक्रमोऽग्निः । प्रसार्य चूडावलयं प्रदीप्तो हनूमता वेगवतोपसृष्टः ॥ ३१ ॥

तत्पश्चात् लङ्कापुरी के पर्वत शिखर पर आग लगी, वहाँ अग्निदेवका बड़ा भयानक पराक्रम प्रकट हुआ । वेगशाली हनुमान जी की लगायी हुई वह आग चारों ओर अपने ज्वाला-मण्डलको फैलाकर बड़े जोरसे प्रज्वलित हो उठी ॥ ३१ ॥

युगान्तकालानलतुल्यरूपः समारुतोऽग्निर्ववृधे दिवस्पृक् । विधूमरमिर्भवनेषु को रक्षःशरीराज्य समर्पितार्चिः ॥ ३२ ॥

हवाका सहारा पाकर वह आग इतनी बढ़ गयी कि उसका रूप प्रलयकालीन अग्निके समान दिखायी देने लगा । उसकी ऊँची लपटें मानो स्वर्गलोकका स्पर्श कर रही थीं । लङ्काके भवनोंमें लगी हुई उस आगकी ज्वालामें धूमका नाम भी नहीं था । राक्षसोंके शरीररूपी घीकी आहुति पाकर उसकी ज्वालाएँ उत्तरोत्तर बढ़ रही थीं ॥ ३२ ॥

आदित्य कोटीसदृशः सुतेजा

लङ्कां समस्तां परिवार्य तिष्ठन् ।

शब्दैरनेकैरशनिप्ररूढै-भिन्दन्निवाण्डं प्रबभौ महाग्निः ॥ ३३ ॥

समूची लङ्कापुरीको अपनी लपटोंमें लपेटकर फैली हुई वह प्रचण्ड आग करोड़ों सूर्योंके समान प्रज्वलित हो रही थी । मकानों और पर्वतोंके फटने आदिसे होनेवाले नाना प्रकारके धड़ाकों के शब्द बिजली की कड़कको भी मात करते थे, उस समय वह विशाल अग्नि ब्रह्माण्डको फोड़ती हुई - सी प्रकाशित हो रही थी ॥ ३३ ॥

तत्राम्बरादग्निरतिप्रवृद्धो रूक्षप्रभः किंशुकपुष्पचूडः । निर्वाणधूमाकुलराजयश्च नीलोत्पलाभाः प्रचकाशिरेऽभ्राः ॥ ३४ ॥

वहाँ धरती से आकाशतक फैली हुई अत्यन्त बढ़ी चढ़ी आगकी प्रभा बड़ी तीखी प्रतीत होती थी 1 । उसकी लपटें टेसूके फूलकी भाँति लाल दिखायी देती थीं । नीचेसे जिनका सम्बन्ध टूट गया था, वे आकाशमें फैली हुईं धूम-पंक्तियाँ नील कमल के समान रंगवाले मेघोंकी भाँति प्रकाशित हो रही थीं ॥ ३४ ॥

वज्री महेन्द्रस्त्रिदशेश्वरो वा साक्षाद्यमो वा वरुणोऽनिलो वा । रौद्रोऽग्निरक धनदश्च सोमो न वानरोऽयं स्वयमेव कालः ॥ ३५ ॥

किं ब्रह्मणः सर्वपितामहस्य धातुश्चतुराननस्य । इहागतो वानररूपधारी रक्षोपसंहारकर प्रकोषः ॥ ३६ ॥

किं वैष्णवं वा कपिरूपमेत्य रक्षोविनाशाय परं सुतेजः । अचिन्त्यमव्यक्तमनन्तमेकं स्वमायया साम्प्रतमागतं वा ॥ ३७ ॥

विशिष्टा रक्षोगणास्तत्र समेत्य सर्वे । सप्राणिसङ्घां सगृहां सवृक्षां दग्धां पुरीं तां सहसा समीक्ष्य ॥ ३८ ॥

प्राणियोंके समुदाय, गृह और वृक्षोंसहित समस्त लङ्कापुरीको सहसा दग्ध हुई देख बड़े - बड़े राक्षस झुंड - के-झुंड एकत्र हो गये और वे सब - के - सब परस्पर इस प्रकार कहने लगे- ' यह देवताओंका राजा वज्रधारी इन्द्र अथवा साक्षात् यमराज तो नहीं है? वरुण, वायु, रुद्र, अग्नि, सूर्य, कुबेर या चन्द्रमामैसे तो कोई नहीं है? यह वानर नहीं साक्षात् काल ही है 1 । क्या सम्पूर्ण जगत् के पितामह चतुर्मुख ब्रह्माजीका प्रचण्ड कोप ही वानरका रूप धारण करके राक्षसों का संहार करने के लिये यहाँ उपस्थित हुआ है? अथवा भगवान् विष्णुका महान् तेज जो अचिन्त्य, अव्यक्त, अनन्त और अद्वितीय है, अपनी मायासे वानरका शरीर ग्रहण करके राक्षसों के विनाशके लिये तो इस समय नहीं आया है? ' । ततस्तु लङ्का सहसा प्रदग्धा सराक्षसा साश्वरथा सनागा । सपक्षिसङ्घा समृगा सवृक्षा रुरोद दीना तुमुलं सशब्दम् ॥ ३ ९ ॥ इस प्रकार घोड़े, हाथी, रथ, पशु, पक्षी, वृक्ष तथा कितने ही राक्षसों सहित लङ्कापुरी सहसा दग्ध हो गयी । वहाँके निवासी दीनभावसे तुमुल नाद करते हुए फूट - फूटकर रोने लगे ॥ ३ ९ ॥ हातात हा पुत्रक कान्त मित्र हा जीवितेशाङ्ग हतं सुपुण्यम् । रक्षोभिरेवं बहुधा ब्रुवद्भिः शब्दः कृतो घोरतरः सुभीमः ॥ ४० ॥

पृष्ठ 187

वाल्मीकि रामायण — खण्ड २, पृष्ठ 187 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

१००८ श्रीमद्वाल्मीकीय रामायणे वे बोले - ' हाय रे बप्पा! हाय बेटा! हा स्वामिन्! हा मित्र! हा प्राणनाथ । हमारे सब पुण्य नष्ट हो गये । ' इस तरह भाँति - भाँति से विलाप करते हुए राक्षसोंने बड़ा भयंकर एवं घोर आर्तनाद किया ॥ ४० ॥

हुताशनज्वालसमावृता सा हतप्रवीरा परिवृत्तयोधा । हनुमतः क्रोधबलाभिभूता बभूव शापोपहतेव लङ्का ॥ ४१ ॥

हनुमान् जीके क्रोध बल से अभिभूत हुई लङ्कापुरी आगकी ज्वालासे घिर गयी थी । उसके प्रमुख प्रमुख वीर मार डाले गये थे । समस्त योद्धा तितर - बितर और उद्विग्न हो गये थे । इस प्रकार वह पुरी शापसे आक्रान्त हुई - सी जान पड़ती थी ॥ ४१ ॥

ससम्भ्रमं त्रस्तविषण्णराक्षसां समुज्ज्वलज्ज्वाल हुताशनाङ्किताम् । ददर्श लङ्कां हनुमान् महामनाः स्वयंभुरोषोपहतामिवाव निम् ॥ ४२ ॥

महामनस्वी हनुमान्ने लङ्कापुरीको स्वयम्भू ब्रह्माजीके रोषसे नष्ट हुई पृथ्वीके समान देखा । वहाँके समस्त राक्षस बड़ी घबराहटमें पड़कर त्रस्त और विषादग्रस्त हो गये थे । अत्यन्त प्रज्वलित ज्वालामालाओंसे अलंकृत अग्निदेवने उसपर अपनी छाप लगा दी थी ॥ ४२ ॥

भक्त्वा वनं पादपरत्नसंकुलं हत्वा तु रक्षांसि महान्ति संयुगे । दग्ध्वा पुरीं तां गृहरत्नमालिनी तस्थौ हनूमान् पवनात्मजः कपिः ॥ ४३ ॥

पवनकुमार वानरवीर हनुमानजी उत्तमोत्तम वृक्षों से भरे हुए वनको उजाड़कर, युद्धमें बड़े - बड़े राक्षसों को मारकर तथा सुन्दर महलोंसे सुशोभित लङ्कापुरीको जलाकर शान्त हो गये ॥ ४३ ॥

स राक्षसांस्तान सुबहंश्च हत्वा वनं च भक्त्वा बहुपादपं तत् । विसृज्य रक्षोभवनेषु चाग्नि जगाम रामं मनसा महात्मा ॥ ४४ ॥

महात्मा हनुमान् बहुत - से राक्षसों का वध और बहुसंख्यक वृक्षोंसे भरे हुए प्रमदावनका विध्वंस करके निशाचरोंके घरोंमें आग लगाकर मन ही मन श्रीरामचन्द्रजीका स्मरण करने लगे ॥ ४४ ॥

ततस्तु तं वानरवीर मुख्यं महाबलं मारुततुल्यवेगम् । महामतिं वायुसुतं वरिष्ठं प्रतुष्टुवुर्देवगणाच सर्वे ॥ ४५ ॥

तदनन्तर सम्पूर्ण देवताओंने वानरवीरोंमें प्रधान, महाबलवान्, वायुके समान वेगवान्, परम बुद्धिमान् और वायुदेवताके श्रेष्ठ पुत्र हनुमान् जीका स्तवन किया ॥ ४५ ॥

देवाश्च सर्वे मुनिपुङ्गवाश्च गन्धर्वविद्याधरपन्नगाश्च 1 भूतानि सर्वाणि महान्ति तत्र जग्मुः परां प्रीतिमतुल्यरूपाम् ॥ ४६ ॥

उनके इस कार्यसे सभी देवता, मुनिवर, गन्धर्व, विद्याधर, नाग तथा सम्पूर्ण महान् प्राणी अत्यन्त प्रसन्न हुए । उनके उस हर्षकी कहीं तुलना नहीं थी । ४६ ॥

भक्त्वा वनं महातेजा हत्वा रक्षांसि संयुगे ।

दग्ध्वा लङ्कापुरी भीमां रराज स महाकपिः ॥ ४७ ॥

महातेजस्वी महाकपि पवनकुमार प्रमदावन को उजाड़कर, युद्ध में राक्षसोंको मारकर और भयंकर लङ्कापुरीको जलाकर बड़ी शोभा पाने लगे ॥ ४७ ॥

गृहात विचित्रे प्रतिष्ठितो वानरराजसिंहः । प्रदीप्त लाङ्गलकृतार्चिमाली व्यराजतादित्य इवार्चिमाली ॥ ४८ ॥

श्रेष्ठ भवनों विचित्र शिखरपर खड़े हुए वानरराज-सिंह हनुमान् अपनी जलती पूँछसे उठती हुई ज्वाला-मालाओं से अलंकृत हो तेजःपुञ्जसे देदीप्यमान सूर्यदेव के समान प्रकाशित होने लगे ॥ ४८ ॥

लङ्कां समस्तां सम्पीड्य लाङ्गला ग्निं महाकपिः ।

निर्वापयामास तदा समुद्रे हरिपुङ्गवः ॥ ४ ९ ॥

इस प्रकार सारी लङ्कापुरीको पीड़ा दे वानरशिरोमणि महाकपि हनुमान्ने उस समय समुद्र के जलमें अपनी पूँछकी आग बुझायी ॥ ४ ९ ॥

ततो देवाः सगन्धर्वाः सिद्धाश्च परमर्षयः ।

दृष्ट्वा लङ्कां प्रदग्धां तां विस्मयं परमं गताः ॥ ५० ॥

तत्पश्चात् लङ्कापुरीको दग्ध हुई देख देवता, गन्धर्व, सिद्ध और महर्षि बड़े विस्मित हुए ॥ ५० ॥

तं दृष्ट्वा वानरश्रेष्ठं हनूमन्तं महाकपिम् ।

कालाग्निरिति संचिन्त्य सर्वभूतानि तत्रसुः ॥ ५१ ॥

उस समय वानरश्रेष्ठ महाकपि हनुमान्को देख ' ये कालाग्नि हैं ' ऐसा मानकर समस्त प्राणी भयसे थर्रा उठे ॥५१ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये सुन्दरकाण्डे चतुःपञ्चाशः सर्गः ॥ ५४ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्धरामायण आदिकाव्य के सुन्दरकाण्डमें चौवनवाँ सगँ पूरा हुआ ॥ ५४ ॥

पृष्ठ 188

वाल्मीकि रामायण — खण्ड २, पृष्ठ 188 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

सुन्दरकाण्डे पञ्चपञ्चाशः सर्गः १०० ९ पञ्चपञ्चाशः सर्गः सीताजी के लिये हनुमानजीकी

संदीप्यमानां वित्रस्तां त्रस्तरक्षोगणां पुरीम् ।

अवेक्ष्य हनुमालङ्कां चिन्तयामास वानरः ॥ १ ॥

वानरवीर हनुमानजीने जब देखा कि सारी लङ्कापुरी जल रही है, वहाँ के निवासियोंपर त्रास छा गया है और राक्षसगण अत्यन्त भयभीत हो गये हैं, तब उनके मनमें सीता के दग्ध होने की आशङ्का से बड़ी चिन्ता हुई ॥ १ ॥

तस्याभूत् सुमहांस्त्रासः कुत्सा चात्मन्यजायत ।

लङ्कां प्रदहता कर्म किंखित् कृतमिदं मया ॥ २ ॥

साथ ही उनपर महान् त्रास छा गया और उन्हें अपने प्रति घृणा - सी होने लगी । वे मन ही मन कहने लगे- ' हाय! मैंने लङ्काको जलाते समय यह कैसा कुत्सित कर्म कर डाला १ ॥ २ ॥

धन्याः खलु महात्मानो ये बुद्ध्या कोपमुत्थितम् ।

निरुन्धन्ति महात्मानो दीप्तमग्निमिवाम्भसा ॥ ३ ॥

' जो महामनस्वी महात्मा पुरुष उठे हुए कोपको अपनी बुद्धिके द्वारा उसी प्रकार रोक देते हैं, जैसे साधारण लोग जलसे प्रज्वलित अग्निको शान्त कर देते हैं, वे ही इस संसार-मैं धन्य है ॥ ३ ॥

क्रुद्धः पापं न कुर्यात् कः क्रुद्धो हन्याद् गुरूनपि ।

क्रुद्धः परुषया वाचा नरः साधूनधिक्षिपेत् ॥ ४ ॥

" क्रोधसे भर जानेपर कौन पुरुष पाप नहीं करता? क्रोध-के वशीभूत हुआ मनुष्य गुरुजनोंकी भी हत्या कर सकता है । क्रोधी मानव साधु पुरुषोंपर भी कटुवचनोंद्वारा आक्षेप करने लगता है ॥ ४ ॥

वाच्यावाच्यं प्रकुपितो न विजानाति कर्हिचित् ।

नाकार्यमस्ति क्रुद्धस्य नावाच्यं विद्यते कचित् ॥ ५ ॥

" अधिक कुपित हुआ मनुष्य कभी इस बातका विचार नहीं करता कि मुँइसे क्या कहना चाहिये और क्या नहीं? क्रोधो के लिये कोई ऐसा बुरा काम नहीं, जिसे वह न कर सके और कोई ऐसी बुरी बात नहीं, जिसे वह मुँहसे न निकाल सके ॥ ५ ॥

यः समुत्पतितं क्रोधं क्षमयैव निरस्यति ।

यथोरगस्त्वचं जीर्णा स वै पुरुष उच्यते ॥ ६ ॥

' जो हृदय में उत्पन्न हुए क्रोधको क्षमाके द्वारा उसी तरह निकाल देता है, जैसे साँप अपनी पुरानी केंचुलको छोड़ देता है, वही पुरुष कहलाता है ॥ ६ ॥

• धिगस्तु मां सुदुर्बुद्धिं निर्लज्जं पापकृत्तमम् ।

अचिन्तयित्वा तां सीतामग्निदं खामिघातकम् ॥ ७ ॥

' मेरी बुद्धि बड़ी खोटी है, मैं निर्लज और महान् पापा-चारी हूँ । मैंने सीताकी रक्षाका कोई विचार न करके लङ्का में वा ० रा ० ५.८. १-चिन्ता और उसका निवारण आग लगा दी और इस तरह अपने स्वामीकी ही हत्या कर डाली । मुझे धिक्कार है ॥ ७ ॥

यदि दग्धा त्वियं सर्वा नूनमार्यापि जानकी ।

दग्धा तेन मया भर्तुर्हतं कार्यमजानता ॥ ८ ॥

' यदि यह सारी लङ्का जल गयी तो आर्या जानकी भी निश्चय ही उसमें दग्ध हो गयी होंगी । ऐसा करके मैंने अन-जानमें अपने स्वामीका सारा काम ही चौपट कर डाला ॥ ८ ॥

यदर्थमयमारम्भस्तत्कार्यमवसादितम् 1 मया हि दहता लङ्कां न सीता परिरक्षिता ॥ ९ ॥

" जिस कार्य की सिद्धि के लिये यह सारा उद्योग किया गया था, वह कार्य ही मैंने नष्ट कर दिया; क्योंकि लङ्का जलाते समय मैंने सीताकी रक्षा नहीं की ॥ ९ ॥

ईषत्कार्यमिदं कार्यं कृतमासीन्न संशयः ।

तस्य क्रोधाभिभूतेन मया मूलक्षयः कृतः ॥ १० ॥

" इसमें संदेह नहीं कि यह लङ्का - दहन एक छोटा - सा कार्य शेष रह गया था, जिसे मैंने पूर्ण किया; परंतु क्रोधसे पागल होने के कारण मैंने श्रीरामचन्द्रजी के कार्यकी तो जड़ काट डाली ॥ १० ॥

विनष्टा जानकी व्यक्त न हादग्धः प्रदृश्यते ।

लङ्कायाः कश्चिदुद्देशः सर्वा भस्मीकृता पुरी ॥ ११ ॥

' लङ्काका कोई भी भाग ऐसा नहीं दिखायी देता, जहाँ आग न लगी हो । सारी पुरी ही मैंने भस्म कर डाली है, अतः जानकी नष्ट हो गयी, यह बात स्वतः स्पष्ट हो जाती है ॥ ११ ॥

यदि तद्वितं कार्य मया प्रज्ञाविपर्ययात् ।

इहैव प्राणसंन्यासो ममापि ह्यद्य रोचते ॥ १२ ॥

' यदि अपनी विपरीत बुद्धिके कारण मैंने सारा काम चौपट कर दिया तो यहीं आज मेरे प्राणका भी विसर्जन हो जाना चाहिये । यही मुझे अच्छा जान पड़ता है ॥ १२ ॥

किमग्नौ पिताम्यद्य आहोखिद् वडवामुखे ।

शरीरमिह सत्त्वानां दद्मि सागरवासिनाम् ॥ १३ ॥

' क्या मैं अब जलती आगमें कूद पहूँ या वडवानल के मुखमें? अथवा समुद्र में निवास करनेवाले जल - जन्तुओंको ही यहाँ अपना शरीर समर्पित कर दूँ ॥ १३ ॥

कथं नु जीवता शक्यो मया द्रष्टुं हरीश्वरः ।

तौ वा पुरुषशार्दूलौ कार्य सर्वस्वघातिना ॥ १४ ॥

' जब मैंने सारा कार्य ही नष्ट कर दिया, तब अब जीते - जी कैसे वानरराज सुग्रीव अथवा उन दोनों पुरुषसिंह श्रीराम और लक्ष्मणका दर्शन कर सकता हूँ या उन्हें अपना मुँह दिखा सकता हूँ? ॥ १४ ॥

पृष्ठ 189

वाल्मीकि रामायण — खण्ड २, पृष्ठ 189 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

१०१० श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे

मया खलु तदेवेदं शेषदोषात् प्रदर्शितम् ।

प्रथितं त्रिषु लोकेषु कपित्वमनवस्थितम् ॥ १५ ॥

" मैंने रोषके दोष से तीनों लोकों में विख्यात इस वानरो चित चपलताका ही यहाँ प्रदर्शन किया है ॥ १५ ॥

धिगस्तु राजसं भावमनीशमनवस्थितम् ।

ईश्वरेणापि यद् रागान्मया सीता न रक्षिता ॥ १६ ॥

' यह राजस भाव कार्य - साघन में असमर्थ और अव्यवस्थित है, इसे धिक्कार है; क्योंकि इस रजोगुणमूलक क्रोधके ही कारण समर्थ होते हुए भी मैंने सीताकी रक्षा नहीं की ॥१६ ॥

विनशयां तु सीतायां तावुभौ विनशिष्यतः ।

तयोर्विनाशे सुग्रीवः सबन्धुर्विनशिष्यति ॥ १७ ॥

" सीता के नष्ट हो जाने से वे दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मण भी नष्ट हो जायँगे । उन दोनों का नाश होनेपर बन्धु बान्धवों सहित सुग्रीव भी जीवित नहीं रहेंगे ॥ १७ ॥

एतदेव वचः श्रुत्वा भरतो भ्रातृवत्सलः ।

धर्मात्मा सहशत्रुघ्नः कथं शक्ष्यति जीवितुम् ॥ १८ ॥

' फिर इसी समाचारको सुन लेनेपर भ्रातृवत्सल धर्मात्मा भरत और शत्रुघ्न भी कैसे जीवन धारण कर सकेंगे? ॥ १८ ॥

इक्ष्वाकुवंशे धर्मिष्ठे गते नाशमसंशयम् ।

भविष्यन्ति प्रजाः सर्वाः शोकसंतापपीडिताः ॥ १ ९ ॥

' इस प्रकार धर्मनिष्ठ इक्ष्वाकुवंशके नष्ट हो जानेपर सारी प्रजा भी शोक - संतापसे पीड़ित हो जायगी, इसमें संशय नहीं है ॥ १ ९ ॥

तदहं भाग्यरहितो लुप्तधर्मार्थसंग्रहः ।

रोषदोषपरीतात्मा व्यक्तं लोकविनाशनः ॥ २० ॥

' अतः सीताकी रक्षा न करनेके कारण मैंने धर्म और अर्थके संग्रहको नष्ट कर दिया, अतएव मैं बड़ा भाग्यहीन हूँ । मेरा हृदय रोषदोषके वशीभूत हो गया है, इसलिये मैं अवश्य ही समस्त लोकका विनाशक हो गया हूँ — मुझे सम्पूर्ण जगत् के विनाशके पापका भागी होना पड़ेगा ' ॥२० ॥

इति चिन्तयतस्तस्य निमित्तान्युपपेदिरे ।

पूर्वमप्युपलब्धानि साक्षात् पुनरचिन्तयत् ॥ २१ ॥

इस प्रकार चिन्तामें पड़े हुए हनुमान्जीको कई शुभ शकुन दिखायी पड़े, जिनके अच्छे फलोंका वे पहले भी प्रत्यक्ष अनुभव कर चुके थे; अतः वे फिर इस प्रकार सोचने लगे-- ॥ २१ ॥

अथ वा चारुसर्वाङ्गी रक्षिता स्वेन तेजसा ।

न नशिष्यति कल्याणी नाग्निरग्नौ प्रवर्तते ॥ २२ ॥

' अथवा सम्भव है सर्वाङ्गसुन्दरी सीता अपने ही तेजसे सुरक्षित हों । कल्याणी जनकनन्दिनीका नाश कदापि नहीं होगा; क्योंकि आग आगको नहीं जलाती है ॥ २२ ॥

नहि धर्मात्मनस्तस्य भार्याममिततेजसः ।

स्वचरित्राभिगुप्तां तां स्प्रष्टुमर्हति पावकः ॥ २३ ॥

" सीता अमिततेजस्वी धर्मात्मा भगवान् श्रीरामकी पत्नी हैं । वे अपने चरित्र के बलसे - पातिव्रत्य के प्रभावसे सुरक्षित हैं । आग उन्हें छू भी नहीं सकती ॥ २३ ॥

नूनं रामप्रभावेण वैदेह्याः सुकृतेन च ।

यन्मां दहनकर्मायं नादहव्यवाहनः ॥ २४ ॥

' अवश्य श्रीरामके प्रभाव तथा विदेहनन्दिनी सीताके पुण्यबलसे ही यह दाहक अग्नि मुझे नहीं जला सकी है ॥ २४ ॥

त्रयाणां भरतादीनां भ्रातॄणां देवता च या ।

रामस्य च मनःकान्ता सा कथं विनशिष्यति ॥ २५ ॥

" फिर जो भरत आदि तीनों भाइयोंकी आराध्य देवी और श्रीरामचन्द्रजी की हृदयवल्लभा हैं, वे आगसे कैसे नष्ट हो सकेंगी ॥ २५ ॥

यद् वा दहनकर्मायं सर्वत्र प्रभुरव्ययः ।

न मे दद्दति लाङ्गलं कथमार्यो प्रधक्ष्यति ॥ २६ ॥

" यह दाहक एवं अविनाशी अग्नि सर्वत्र अपना प्रभाव रखती है, सबको जला सकती है, तो भी यह जिनके प्रभावसे मेरी पूँछको नहीं जला पाती है, उन्हीं साक्षात् माता जानकी-को कैसे जला सकेगी? ' ॥ २६ ॥

पुनश्चाचिन्तयत् तत्र हनूमान् विस्मितस्तदा ।

हिरण्यनाभस्य गिरेर्जलमध्ये प्रदर्शनम् ॥ २७ ॥

उस समय हनुमान् जीने वहाँ विस्मित होकर पुनः उस घटनाको स्मरण किया, जब कि समुद्र के जलमें उन्हें मैनाक पर्वतका दर्शन हुआ था ॥ २७ ॥

तपसा सत्यवाक्येन अनम्यत्वाच्च भर्तरि ।

असौ विनिर्दहेदग्निं न तामग्निः प्रधक्ष्यति ॥ २८ ॥

वे सोचने लगे ' तपस्या, सत्य भाषण तथा पतिमें अनन्य भक्तिके कारण आर्या सीता ही अग्निको जला सकती हैं, आग उन्हें नहीं जला सकती ' ॥ २८ ॥

स तथा चिन्तयंस्तत्र देव्या धर्मपरिग्रहम् ।

शुश्राव हनुमांस्तत्र चारणानां महात्मनाम् ॥ २ ९ ॥

इस प्रकार भगवती सीताकी धर्मपरायणताका विचार करते हुए हनुमान् जीने वहाँ महात्मा चारणोंके मुख से निकली हुई ये बातें सुनीं ॥ २ ९ ॥

अहो खलु कृतं कर्म दुर्विगाहं हनूमता ।

अग्नि विसृजता तीक्ष्णं भीमं राक्षससद्मनि ॥ ३० ॥

" अहो! हनुमान् जीने राक्षसों के घरोंमें दुःसह एवं भयंकर आग लगाकर बड़ा ही अद्भुत और दुष्कर कार्य किया है ॥ ३० ॥

प्रपलायितरक्षः स्त्रीबालवृद्धसमाकुला 1 जनकोलाहलाध्माता क्रन्दन्तीवाद्रिकन्दरैः ॥ ३१ ॥

दग्धेयं नगरी लङ्का साट्टप्राकारतोरणा ।

जानकी न च दग्धेति विस्मयोऽद्भुत एव नः ॥ ३२ ॥

' घरमेंसे भागे हुए राक्षसों, स्त्रियों, बालकों और वृद्धोंसे

पृष्ठ 190

वाल्मीकि रामायण — खण्ड २, पृष्ठ 190 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

सुन्दरकाण्डे षट्पञ्चाशः सर्गः १०११ भरी हुई सारी लङ्का जन- कोलाहलसे परिपूर्ण हो चीत्कार करती अनेक बारके प्रत्यक्ष अनुभव किये हुए शुभ शकुनों, हुई - सी जान पड़ती है । पर्वतकी कन्दराओं, अटारियों, पर- महान् गुणदायक कारणों तथा चारणों के कहे हुए पूर्वोक्त कोटों और नगरके फाटकोंसहित यह सारी लङ्का नगरी दग्ध वचनोंद्वारा सीताजीके जीवित होने का निश्चय कर के हनुमानजी-हो गयी; परंतु सीतापर आँच नहीं आयी । यह हमारे लिये के मनमें बड़ी प्रसन्नता हुई || ३४ ॥ बड़ी अद्भुत और आश्चर्य की बात है ' ॥ ३१-३२ ॥ ततः कपिः प्राप्तमनोरथार्थ-इति शुश्राव हनुमान् वाचं ताममृतोपमाम् । स्तामक्षतां राजसुतां विदित्वा । बभूव चास्य मनसो हर्षस्तत्कालसम्भवः ॥ ३३ ॥ प्रत्यक्षतस्तां पुनरेव दृष्ट्वा

हनुमान् जीने जब चारणोंके कहे हुए ये अमृत के समान प्रतिप्रयाणाय मतिं चकार ॥ ३५ ॥

मधुर वचन सुने, तब उनके हृदयमें तत्काल हर्षोल्लास छा राजकुमारी सीताको कोई क्षति नहीं पहुँची है, यह जान-गया ॥ ३३ ॥ कर कपिवर हनुमानजीने अपना सम्पूर्ण मनोरथ सफल

स निमित्तैश्च दृष्टार्थैः कारणैश्च महागुणैः । समझा और पुनः उनका प्रत्यक्ष दर्शन करके लौट जानेका ऋषिवाक्यैश्च हनुमानभवत् प्रीतमानसः ॥ ३४ ॥ विचार किया ॥ ३५ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये सुन्दरकाण्डे पञ्चपञ्चाशः सर्गः ॥ ५५ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्धरामायण आदिकाव्यके सुन्दरकाण्डमें पचपनवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ५५ ॥

सर्गः षट्पञ्चाशः हनुमान्जीका पुनः सीताजी से मिलकर लौटना और समुद्रको लाँघना

ततस्तु शिंशपामूळे जानकीं पर्यवस्थिताम् ।

अभिवाद्याब्रवीद् दिष्ट्या पश्यामि त्वामिहाक्षताम् ॥ १ ॥

तदनन्तर हनुमानजी अशोकवृक्षके नीचे बैठी हुई जानकीजीके पाठ गये और उन्हें प्रणाम करके बोले-" आयें! सौभाग्यकी बात है कि इस समय मैं आपको सकुशल देख रहा हूँ ' ॥१ ॥

ततस्तं प्रस्थितं सीता वीक्षमाणा पुनः पुनः ।

भर्तुः स्नेहान्विता वाक्यं हनूमन्तमभाषत ॥ २ ॥

सीता अपने पति के स्नेहमें डूबी हुई थीं । वे हनुमानजीको प्रस्थान करनेके लिये उद्यत जान उन्हें बारंबार देखती हुई बोलीं- ॥ २ ॥

यदि त्वं मन्यसे तात वसैकाहमिहानघ ।

क्वचित् सुसंवृते देशे विश्रान्तः श्वो गमिष्यसि ॥ ३ ॥

' तात! निष्पाप वानरवीर! यदि तुम उचित समझो तो एक दिन और यहाँ किसी गुप्त स्थानमें ठहर जाओ, आज विश्राम करके कल चले जाना ॥ ३ ॥

मम चैवाल्पभाग्यायाः सांनिध्यात् तव वानर ।

शोकस्यास्याप्रमेयस्य मुहूर्त स्यादपि क्षयः ॥ ४ ॥

' वानरप्रवर! तुम्हारे निकट रहनेसे मुझ मन्दभागिनीका अपार शोक भी थोड़ी देरके लिये कम हो जायगा ॥ ४ ॥

गते हि हरिशार्दूल पुनः सम्प्राप्तये त्वयि ।

प्राणेष्वपि न विश्वासो मम वानरपुङ्गव ॥ ५ ॥

' कपिश्रेष्ठ! वानरशिरोमणे! जब तुम चले जाओगे, तब फिर तुम्हारे आनेतक मेरे प्राण रहेंगे या नहीं, इसका कोई विश्वास नहीं है ॥ ५ ॥

अदर्शनं च ते वीर भूयो मां दारयिष्यति ।

दुःखाद् दुःखतरं प्राप्तां दुर्मनः शोककर्शिताम् ॥ ६ ॥

' वीर! मुझपर दुःख - पर - दुःख पड़ते गये हैं । मैं मानसिक शोकसे दिन - दिन दुर्बल होती जा रही हूँ । अब तुम्हारा दर्शन न होना मेरे हृदयको और भी विदीर्ण करता रहेगा ॥

अयं च वीर संदेहस्तिष्ठतीव ममाग्रतः ।

सुमहत्सु सहायेषु हयृक्षेषु महाबलः ॥ ७ ॥

कथं नु खलु दुष्पारं संतरिष्यति सागरम् ।

तानि यृक्षसैन्यानि तौ वा नरवरात्मजौ ॥ ८ ॥

' वीर! मेरे सामने यह संदेह अभीतक बना ही हुआ है कि बड़े - बड़े वानरों और रीछोंके सहायक होनेपर भी महाबली सुग्रीव इस दुर्लङ्घय समुद्रको कैसे पार करेंगे? उनकी सेनाके वे वानर और भालू तथा वे दोनों राजकुमार श्रीराम और लक्ष्मण भी इस महासागरको कैसे लाँघ सकेंगे? ॥ ७-८ ॥

त्रयाणामेव भूतानां सागरस्यापि लङ्घने ।

शक्तिः स्याद् वैनतेयस्य तव वा मारुतस्य वा ॥ ९ ॥

' तीन ही प्राणियोंमें इस समुद्रको लाँघनेकी शक्ति है--तुममें, गरुड़ में अथवा वायुदेवतामें ॥ ९ ॥

तदत्र कार्यनिर्बन्धे समुत्पन्ने दुरासदे ।

किं पश्यसि समाधानं त्वं हि कार्यविशारदः ॥ १० ॥

‘ इस कार्यसम्बन्धी दुष्कर प्रतिबन्धके उपस्थित होनेपर तुम्हें क्या समाधान दिखायी देता है? बताओ, क्योंकि तुम कार्यकुशल हो ॥ १० ॥

काममस्य त्वमेवैकः कार्यस्य परिसाधने ।