Ramayana 2 — पृष्ठ 211–220
वाल्मीकि रामायण — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 211–220
पृष्ठ 211
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
१०३० श्रीमवाल्मीकीयरामायणे
अनुरक्ता हि वैदेही रामे सर्वात्मना शुभा ।
अनन्यचित्ता रामेण पौलोमीव पुरन्दरे ॥ २४ ॥
' कल्याणी सीता श्रीराममें सम्पूर्ण हृदयसे अनुरक्त हैं, जैसे शची देवराज इन्द्र में अनन्य प्रेम रखती हैं, उसी प्रकार सीताका चित्त अनन्यभावसे श्रीरामके ही चिन्तनमें लगा हुआ है ॥ २४ ॥
तदेकवासः संवीता रजोध्वस्ता तथैव च ।
सा मया राक्षसीमध्ये तर्ज्यमाना मुहुर्मुहुः ॥ २५ ॥
राक्षसीभिर्विरूपाभिर्दृष्टा हि प्रमदावने ।
एकवेणीधरा दीना भर्तृचिन्तापरायणा ॥ २६ ॥
" वे एक ही साड़ी पहने धूलि - धूसरित हो रही हैं । राक्षसियोंके बीच में रहती हैं और उन्हें बारंबार उनकी डाँट-फटकार सुननी पड़ती है । इस अवस्था में कुरूप राक्षसियों से घिरी हुई सीताको मैंने प्रमदावन में देखा है । वे एक ही वेणी धारण किये दीनभावसे केवल अपने पतिदेव के चिन्तनमें लगी रहती हैं ॥ २५-२६ ॥
अधःशय्या विवर्णाङ्गी पद्मिनीव हिमोदये ।
रावणाद् विनिवृत्तार्था मर्तव्य कृतनिश्चया ॥ २७ ॥
" वे नीचे भूमिपर सोती हैं । हेमन्तऋतुमें कमलिनीकी भाँति उनके अङ्गोंकी कान्ति फीकी पड़ गयी है । रावणसे उनका कोई प्रयोजन नहीं है । वे मरनेका निश्चय किये बैठी हैं ॥ २७ ॥
कथंचिन्मृगशावाक्षी विश्वासमुपपादिता ।
ततः सम्भाषिता चैव सर्वमर्थे प्रकाशिता ॥ २८ ॥
' उन मृगनयनी सीताको मैंने बड़ी कठिनाई से किसी तरह अपना विश्वास दिलाया । तब उनसे बातचीतका इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये अवसर मिला और सारी बातें मैं उनके समक्ष रख सका ॥
रामसुग्रीवसख्यं च श्रुत्वा प्रीतिमुपागता ।
नियतः समुदाचारो भक्तिर्भर्तरि चोत्तमा ॥ २ ९ ॥
' श्रीराम और सुग्रीव की मित्रताकी बात सुनकर उन्हें बड़ी प्रसन्नता हुई । सीताजी में सुदृढ़ सदाचार ( पातिव्रत्य ) विद्यमान है । अपने पतिके प्रति उनके हृदयमें उत्तम भक्ति है ॥ २ ९ ॥
यन्न हन्ति दशग्रीवं स महात्मा दशाननः ।
निमित्तमात्रं रामस्तु वधे तस्य भविष्यति ॥ ३० ॥
' सीता स्वयं ही जो रावणको नहीं मार डालती हैं, इससे जान पड़ता है कि दशमुख रावण महात्मा है— तपोबल से सम्पन्न होने के कारण शाप पानेके अयोग्य है ।
( तथापि सीताहरण के पापसे वह नष्टप्राय ही है ) ।
श्रीरामचन्द्रजी उसके वधमें केवल निमित्तमात्र होंगे ॥ ३० ॥
सा प्रकृत्यैव तन्वङ्गी तद्वियोगाच्च कर्शिता ।
प्रतिपत्पाठशीलस्य विद्येव तनुतां गता ॥ ३१ ॥
' भगवती सीता एक तो स्वभावसे ही दुबली - पतली हैं, दूसरे श्रीरामचन्द्रजी के वियोगसे और भी कृश हो गयी हैं । जैसे प्रतिपदा के दिन स्वाध्याय करनेवाले विद्यार्थी की विद्या क्षीण हो जाती है, उसी प्रकार उनका शरीर भी अत्यन्त दुर्बल हो गया है ॥ ३१ ॥
पवमास्ते महाभागा सीता शोकपरायणा ।
यदत्र प्रतिकर्तव्यं तत् सर्वमुपकल्प्यताम् ॥ ३२ ॥
" इस प्रकार महाभागा सीता सदा शोक में डूबी रहती हैं । अतः इस समय जो प्रतीकार करना हो, वह सब आपलोग करें ' ॥ ३२ ॥
सुन्दरकाण्डे एकोनषष्टितमः सर्गः ॥ ५ ९ ॥ इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षंरामायण आदिकाव्यके सुन्दरकाण्डमें उनसठवाँ सगँ पूरा हुआ ॥ ५ ९ ॥ षष्टितमः सर्गः अङ्गदका लङ्काको जीतकर सीताको ले आनेका उत्साहपूर्ण विचार और जाम्बवान् के द्वारा उसका निवारण
तस्य तद् वचनं श्रुत्वा वालिसूनुरभाषत ।
अश्विपुत्रौ महावेगौ बलवन्तौ लवंगमौ ॥ १ ॥
हनुमानजी की यह बात सुनकर वालिपुत्र अङ्गदने कहा – ' अश्विनीकुमार के पुत्र ये मैन्द और द्विविद दोनों वानर अत्यन्त वेगशाली और बलवान् हैं ॥ १ ॥
पितामहवरोत्सेकात् परमं दर्पमास्थितौ ।
अश्विनोर्मानार्थ हि सर्वलोकपितामहः ॥ २ ॥
सर्वावध्यत्वमतुल मनयोर्दत्तवान् पुरा 1 वत्सेकेन मत्तौ च प्रमथ्य महतीं चमूम् ॥ ३ ॥
सुराणाममृतं वीरौ पीतवन्तौ महाबलौ । " पूर्वकालमें ब्रह्माजी का वर मिलने से इनका अभिमान बढ़ गया और ये बड़े घमंड में भर गये थे । सम्पूर्ण लोकोंके पितामह ब्रह्माजीने अश्विनीकुमारोंका मान रखने के लिये पहले इन दोनोंको यह अनुपम वरदान दिया था कि
पृष्ठ 212
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
सुन्दरकाण्डे षष्टितमः सर्गः १०३१ तुम्हें कोई भी मार नहीं सकता । उस वर के अभिमानसे मत्त हो इन दोनों महाबली वीरोंने देवताओंकी विशाल सेनाको मथकर अमृत पी लिया था ॥ २३३ ॥
एतावेव हि संक्रुद्धौ सवाजिरथकुञ्जराम् ॥ ४ ॥
लङ्कां नाशयितुं शकौ सर्वे तिष्ठन्तु वानराः । “ ये ही दोनों यदि क्रोधमें भर जायँ तो हाथी, घोड़े और रथसहित समूची लङ्काका नाश कर सकते हैं । भले ही और सब वानर बैठे रहें ॥ ४३ ॥
अहमेकोऽपि पर्याप्तः सराक्षसगणां पुरीम् ॥ ५ ॥
तां लङ्कां तरसा हन्तुं रावणं च महाबलम् ।
किं पुनः सहितो वीरैर्बलवद्भिः कृतात्मभिः ॥ ६ ॥
कृतास्त्रैः प्लवगैः शकैर्भवद्भिर्विजयैषिभिः । “ मैं अकेला भी राक्षसगणोंसहित समस्त लङ्कापुरीका वेगपूर्वक विध्वंस करने तथा महाबली रावणको मार डालने के लिये पर्याप्त हूँ । फिर यदि सम्पूर्ण अस्त्रोंको जाननेवाले आप जैसे वीर, बलवान्, शुद्धात्मा, शक्तिशाली और विजयाभिलाषी वानरोंकी सहायता मिल जाय, तब तो कहना ही क्या है? ॥ ५-६३ ॥ वायुसूनोर्बलेनैव दग्धा लङ्केति नः श्रुतम् ॥ ७ ॥
दृष्ट्वा देवी न चानीता इति तत्र निवेदितुम् ।
न युक्तमिव पश्यामि भवद्भिः ख्यातपौरुषैः ॥ ८ ॥
' वायुपुत्र हनुमानजीने अकेले जाकर अपने पराक्रमसे ही लङ्काको फूँक डाला — यह बात हम सब लोगोंने सुन ही ली । आप जैसे ख्यातनामा पुरुषार्थी वीर्गेके रहते हुए मुझे भगवान् श्रीरामके सामने यह निवेदन करना उचित नहीं जान पड़ता कि ' हमने सीतादेवीका दर्शन तो किया, किंतु उन्हें ला नहीं सके ' ॥ ७-८ ॥
नहि वः पुत्रने कश्चिन्नापि कश्चित् पराक्रमे ।
तुल्यः सामरदैत्येषु लोकेषु हरिसत्तमाः ॥ ९ ॥
' वानर शिरोमणियो! देवताओं और दैत्योंसहित सम्पूर्ण लोकोंमें कोई भी ऐसा वीर नहीं है, जो दूरतककी छलाँग मारने और पराक्रम दिखाने में आपलोगोंकी समानता कर सके ॥ ९ ॥
जित्वा लङ्कां सरक्षौघां हत्वा तं रावणं रणे ।
सीतामादाय गच्छामः सिद्धार्था हृष्टमानसाः ॥ १० ॥
' अतः निशाचरसमुदायसहित लङ्काको जीतकर, युद्धमें रावणका वध करके, सीताको साथ ले, सफलमनोरथ एवं प्रसन्नचित्त होकर हमलोग श्रीरामचन्द्रजी के पास चलें ॥ १० ॥
तेष्वेवं हतवीरेषु राक्षसेषु हनूमता ।
किमन्यदत्र कर्तव्यं गृहीत्वा याम जानकीम् ॥ ११ ॥
' जब हनुमान् जीने राक्षसोंके प्रमुख वीरोंको मार डाला है, ऐसी परिस्थिति में हमारा इसके सिवा और क्या कर्तव्य हो सकता है कि हम जनकनन्दिनी सीताको साथ लेकर ही चलें ॥ ११ ॥
रामलक्ष्मणयोर्मध्ये न्यस्याम जनकात्मजाम् ।
किं व्यलीकैस्तु तान् सर्वान् वानरान् वानरर्षभान् ॥
वयमेव हि गत्वा तान् हत्वा राक्षसपुङ्गवान् ।
राघवं द्रष्टुममः सुग्रीवं सहलक्ष्मणम् ॥ १३ ॥
' कपिवरो! हम जनक किशोरीको ले चलकर श्रीराम और लक्ष्मण के बीच में खड़ी कर दें । किष्किन्धामें जुटे हुए उन सब वानरों को कष्ट देनेकी क्या आवश्यकता है । हमलोग ही लङ्कामें चलकर वहाँके मुख्य - मुख्य राक्षसों का वध कर डालें, उसके बाद लौटकर श्रीराम, लक्ष्मण तथा सुग्रीवका दर्शन करें ' ॥ १२-१३ ॥
तमेवं कृतसंकल्पं जाम्बवान् हरिसत्तमः ।
उवाच परमप्रीतो वाक्यमर्थवदर्शवित् ॥ १४ ॥
अङ्गदका ऐसा संकल्प जानकर वानर- भालुओं में श्रेष्ठ और अर्थतत्त्वके ज्ञाता जाम्बवान्ने अत्यन्त प्रसन्न होकर यह सार्थक बात कही ॥ १४ ॥
नैषा बुद्धिर्महाबुद्धे यद् ब्रवीषि महाकपे ।
विचेतुं वयमाज्ञप्ता दक्षिणां दिशमुत्तमाम् ॥ १५ ॥
नानेतुं कपिराजेन नैव रामेण धीमता । ' महाकपे! तुम बड़े बुद्धिमान् हो तथापि इस समय जो कुछ कह रहे हो, यह बुद्धिमानीकी बात नहीं है; क्योंकि वानरराज सुग्रीव तथा परम बुद्धिमान् भगवान् श्रीरामने हमें उत्तम दक्षिण दिशामें केवल सीताको खोजने की आज्ञा दी है, साथ ले आने की नहीं ॥ १५३ ॥
कथंचिन्निर्जितां सीतामस्माभिर्नाभिरोचयेत् ॥ १६ ॥
राघवो नृपशार्दूलः कुलं व्यपदिशन् स्वकम् । " यदि हमलोग किसी तरह सीताको जीतकर उनके पास ले भी चलें तो नृपश्रेष्ठ श्रीराम अपने कुलके व्यवहारका स्मरण करते हुए हमारे इस कार्यको पसंद नहीं करेंगे १६३ प्रतिज्ञाय स्वयं राजा सीताविजयमग्रतः ॥ १७ ॥
सर्वेषां कपिमुख्यानां कथं मिथ्या करिष्यति । " राजा श्रीरामने सभी प्रमुख वानरवीरोंके सामने स्वयं ही सीताको जीतकर लाने की प्रतिज्ञा की है, उसे वे मिथ्या कैसे करेंगे? ॥ १७३ ॥
विफलं कर्म च कृतं भवेत् तुष्टिर्न तस्य च ॥ १८ ॥
वृथा च दर्शितं वीर्ये भवेद् वानरपुङ्गवाः । ' अतः वानरशिरोमणियो! ऐसी अवस्थामें हमारा किया - कराया कार्य निष्फल हो जायगा । भगवान् श्रीरामको संतोष भी नहीं होगा और हमारा पराक्रम दिखाना भी व्यर्थ सिद्ध होगा || १८३ ॥
पृष्ठ 213
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
१०३२ श्रीमदवाल्मीकीय रामायणे तस्माद् गच्छाम वै सर्वे यत्र रामः सलक्ष्मणः । यथा तु रामस्य मतिर्निविष्टा सुग्रीवश्च महातेजाः कार्यस्यास्य निवेदने ॥ १ ९ ॥ तथा भवान् पश्यतु कार्यसिद्धिम् ॥ २० ॥
' इसलिये हम सब लोग इस कार्यकी सूचना देने के लिये ' राजकुमार! तुम जैसा देखते या सोचते हो, यह वहीं चलें, जहाँ लक्ष्मणसहित भगवान् श्रीराम और महातेजस्वी विचार हमलोगों के योग्य ही है- हम इसे न कर सकें, ऐसी सुग्रीव विद्यमान हैं ॥ १ ९ ॥ बात नहीं है; तथापि इस विषय में भगवान् श्रीरामका जैसा न तावदेषा मतिरक्षमा नो निश्चय हो, उसी के अनुसार तुम्हें कार्यसिद्धिपर दृष्टि रखनी
यथा भवान् पश्यति राजपुत्र । ' चाहिये ' ॥ २० ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये सुन्दरकाण्डे षष्टितमः सर्गः ॥ ६० ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके सुन्दरकाण्डमें साठवाँ सर्गं पूरा हुआ ॥ ६० ॥
एकषष्टितमः सर्गः वानरोंका मधुवनमें जाकर वहाँके मधु एवं फलोंका मनमाना उपभोग करना और वनरक्षकको घसीटना
ततो जाम्बवतो वाक्यमगृह्णन्त वनौकसः ।
अङ्गदप्रमुखा वीरा हनूमांश्च महाकपिः ॥ १ ॥
तदनन्तर अङ्गद आदि सभी वीर वानरों और महाकपि हनुमान्ने भी जाम्बवान्की बात मान ली ॥ १ ॥
प्रीतिमन्तस्ततः सर्वे वायुपुत्रपुरःसराः ।
महेन्द्राप्रात् समुत्पत्य पुप्लुवुः प्लवगर्षभाः ॥ २ ॥
फिर वे सब श्रेष्ठ वानर पवनपुत्र हनुमान्को आगे करके मन - ही - मन प्रसन्नताका अनुभव करते हुए महेन्द्रगिरिके शिखरसे उछलते - कूदते चल दिये ॥ २ ॥
मेरुमन्दरसंकाशा मत्ता इव महागजाः ।
छादयन्त इवाकाशं महाकाया महाबलाः ॥ ३ ॥
वे मेरु पर्वतके समान विशालकाय और बड़े - बड़े मद-मत्तगजराजों के समान महाबली वानर आकाशको आच्छादित करते हुए - से जा रहे थे ॥ ३ ॥
सभाज्यमानं भूतैस्तमात्मवन्तं महाबलम् ।
हनुमन्तं महावेगं वहन्त इव दृष्टिभिः ॥ ४ ॥
उस समय सिद्ध आदि भूतगण अत्यन्त वेगशाली महा-बली बुद्धिमान् हनुमान्जीकी भूरि - भूरि प्रशंसा कर रहे थे और अपलक नेत्रोंसे उनकी ओर इस तरह देख रहे थे, मानो अपनी दृष्टियोंद्वारा ही उन्हें ढो रहे हों ॥ ४ ॥
राघवे चार्थनिर्वृत्ति कर्तुं च परमं यशः ।
समाधाय समृद्धार्थाः कर्मसिद्धिभिरुन्नताः ॥ ५ ॥
प्रियाख्यानोन्मुखाः सर्वे सर्वे युद्धाभिनन्दिनः ।
सर्वे रामप्रतीकारे निश्चितार्था मनखिनः ॥ ६ ॥
श्रीरघुनाथजी के कार्यकी सिद्धि करनेका उत्तम यश पाकर उन वानरोंका मनोरथ सफल हो गया था । उस कार्यकी सिद्धि हो जाने से उनका उत्साह बढ़ा हुआ था । वे सभी भगवान् श्रीरामको प्रिय संवाद सुनानेके लिये उत्सुक थे । सभी युद्धका अभिनन्दन करनेवाले थे । श्रीरामचन्द्रजी के द्वारा रावणका पराभव हो ऐसा सबने निश्चय कर लिया था तथा वे सब - के - सब मनस्वी वीर थे ॥ ५-६ ॥
लवमानाः खमाप्लुत्य ततस्ते काननौकसः ।
नन्दनोपममा से दुर्वनं द्रुमशतायुतम् ॥ ७ ॥
आकाशमै छलाँग मारते हुए वे वनवासी वानर सैकड़ों वृक्षोंसे भरे हुए एक सुन्दर वनमें जा पहुँचे, जो नन्दनवनके समान मनोहर था ॥ ७ ॥
यत् तन्मधुवनं नाम सुग्रीवस्याभिरक्षितम् ।
अधृष्यं सर्वभूतानां सर्वभूतमनोहरम् ॥ ८ ॥
उसका नाम मधुवन था । सुग्रीवका वह मधुवन सर्वथा सुरक्षित था । समस्त प्राणियों में से कोई मी उसको हानि नहीं पहुँचा सकता था । उसे देखकर सभी प्राणियोंका मन लुभा जाता था ॥ ८ ॥
यद् रक्षति महावीरः सदा दधिमुखः कपिः ।
मातुलः कपिमुख्यस्य सुग्रीवस्य महात्मनः ॥ ९ ॥
कपिश्रेष्ठ महात्मा सुग्रीवके मामा महावीर दधिमुख नामक वानर सदा उस वनकी रक्षा करते थे ॥ ९ ॥
ते तद् वनमुपागम्य बभूवुः परमोत्कटाः ।
वानरा वानरेन्द्रस्य मनःकान्तं महावनम् ॥ १० ॥
वानरराज सुग्रीवके उस मनोरम महावनके पास पहुँच-कर वे सभी वानर वहाँका मधु पीने और फल खाने आदिके लिये अत्यन्त उत्कण्ठित हो गये ॥ १० ॥
पृष्ठ 214
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
सुन्दरकाण्डे एकषष्टितमः सर्गः १०३३
ततस्ते वानरा हृष्टा दृष्ट्वा मधुवनं महत् ।
कुमारमभ्ययाचन्त मधूनि मधुपिङ्गलाः ॥ ११ ॥
तब हर्षसे भरे हुए तथा मधुके समान पिङ्गल वर्णवाले उन वानरोंने उस महान् मधुवनको देखकर कुमार अङ्गदसे मधुपान करने की आज्ञा माँगी ॥ ११ ॥
ततः कुमारस्तान् वृद्धाञ्जाम्बवत्प्रमुखान् कपीन् ।
अनुमान्य ददौ तेषां निसर्ग मधुभक्षणे ॥ १२ ॥
उस समय कुमार अङ्गदने जाम्बवान् आदि बड़े - बूढ़े वानरोंकी अनुमति लेकर उन सबको मधु पीनेकी आज्ञा दे दी ॥ १२ ॥
ते निसृष्टाः कुमारेण धीमता वालिसूनुना ।
हरयः समपद्यन्त द्रुमान् मधुकराकुलान् ॥ १३ ॥
बुद्धिमान् वालिपुत्र राजकुमार अङ्गदकी आज्ञा पाकर वे वानर भौरों के झुंडसे भरे हुए वृक्षोंपर चढ़ गये ॥ १३ ॥
भक्षयन्तः सुगन्धीनि मूलानि च फलानि च ।
जग्मुः प्रहर्ष ते सर्वे बभूवुश्च मदोत्कटाः ॥ १४ ॥
वहाँके सुगन्धित फल- मूलका भक्षण करते हुए उन सबको बड़ी प्रसन्नता हुई । वे सभी मदसे उन्मत्त हो गये ॥ १४ ॥
ततश्चानुमताः सर्वे सुसंहृष्टा वनौकसः ।
मुदिताश्च ततस्ते च प्रनृत्यन्ति ततस्ततः ॥ १५ ॥
युवराजकी अनुमति मिल जानेसे सभी वानरोंको बड़ा हर्ष हुआ । वे आनन्दमग्न होकर इधर - उधर नाचने लगे ॥ गायन्ति केचित् प्रहसन्ति केचि -नृत्यन्ति के चित् प्रणमन्ति केचित् । पतन्ति केचित् प्रचरन्ति केचित् लवन्ति केचित् प्रलपन्ति केचित् ॥ १६ ॥
कोई गाते, कोई हँसते, कोई नाचते, कोई नमस्कार करते, कोई गिरते पड़ते, कोई जोर - जोर से चलते, कोई उछलते - कूदते और कोई प्रलाप करते थे ॥ १६ ॥
परस्परं केचिदुपाश्रयन्ति परस्परं केचिदतिब्रुवन्ति । द्रुमाद् द्रुमं केचिदभिद्रवन्ति क्षिती नगाश्रान्निपतन्ति केचित् ॥ १७ ॥
कोई एक दूसरे के पास जाकर मिलते, कोई आपस में विवाद करते, कोई एक वृक्षसे दूसरे वृक्षपर दौड़ जाते और कोई वृक्षोंकी डालियोंसे पृथ्वीपर कूद पड़ते थे ॥ १७ ॥
महीतलात् केचिदुदीर्णवेगा महाद्रुमान्राण्यभिसम्पतन्ति 1 वा ० रा ० ५.८.४ ---गायन्तमन्यः प्रहसन्नुपैति हसन्तमन्यः प्ररुदन्नुवैति ॥ १८ ॥
कितने ही प्रचण्ड वेगवाले वानर पृथ्वीसे दौड़कर बड़े-बड़े वृक्षोंकी चोटियोंतक पहुँच जाते थे । कोई गातात दूसरा उसके पास हँसता हुआ जाता था । कोई हँसते हुए-के पास जोर - जोर से रोता हुआ पहुँचता था ॥ १८ ॥
तुदन्तमन्यः समाकुलं तत् कपिसैन्यमासीत् । न चात्र कश्चिन्न बभूव मत्तो न चात्र कश्चिन्न बभूव दृप्तः ॥ १ ९ ॥ कोई दूसरे को पीड़ा देता तो दूसरा उसके पास बड़े जोर-से गर्जना करता हुआ आता था । इस प्रकार वह सारी वानर-सेना मदोन्मत्त होकर उसके अनुरूप चेष्टा कर रही थी । वानरोंके उस समुदाय में कोई भी ऐसा नहीं था, जो मतवाला न हो गया हो और कोई भी ऐसा नहीं था, जो दर्पसे भर न गया हो ॥ १ ९ ॥ ततो वनं तत् परिभक्ष्यमाणं द्रुमांश्च विध्वंसितपत्रपुष्पान् । समीक्ष्य कोपाद दधिवक्त्रनामा निवारयामास कपिः कपींस्तान् ॥ २० ॥
तदनन्तर मधुवनके फल - मूल आदिका भक्षण होता और वहाँके वृक्षोंके पत्तों एवं फूलोंको नष्ट किया जाता देख दधि-मुख नामक वानरको बड़ा क्रोध हुआ और उन्होंने उन वानरोंको वैसा करने से रोका ॥ २० ॥
स तैः प्रवृद्धैः परिभर्त्स्यमानो वनस्य गोप्ता हरिवृद्धवीरः । चकार भूयो मतिमुग्रतेजा वनस्य रक्षां प्रति वानरेभ्यः ॥ २१ ॥
जिनपर अधिक नशा चढ़ गया था, उन बड़े - बड़े वानरों-ने वनकी रक्षा करनेवाले उस वृद्ध वानरवीरको उलटे डाँट बतानी शुरू की, तथापि उम्र तेजस्वी दधिमुखने पुनः उन वानरोंसे वनकी रक्षा करनेका विचार किया ॥ २१ ॥
उवाच कांश्चित् परुषाण्यभीत-मसकमन्यांश्च तलैर्जघान । समेत्य कैश्चित् कलहं चकार तथैव साम्नोपजगाम कांश्चित् ॥ २२ ॥
उन्होंने निर्भय होकर किन्हीं - किन्हीं को कड़ी बातें सुनायीं । कितनोंको थप्पड़ोंसे मारा । बहुतों के साथ भिड़कर झगड़ा किया और किन्हीं - किन्हीं के प्रति शान्तिपूर्ण उपायसे ही काम लिया ॥ २२ ॥
स तैर्मादप्रतिवार्य वेगे-बलाच्च तेन प्रतिवार्यमाणैः ।
पृष्ठ 215
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
१०३४ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे प्रधर्षणे त्यक्तभयेः समेत्य प्रकृष्यते चाप्यनवेक्ष्य दोषम् ॥ २३ ॥
मदके कारण जिनके वेगको रोकना असम्भव हो गया था, उन वानरोंको जब दधिमुख बलपूर्वक रोकने की चेष्टा करने लगे, तब वे सब मिलकर उन्हें बलपूर्वक इधर - उधर घसीटने लगे । वनरक्षकपर आक्रमण करनेसे राजदण्ड प्राप्त होगा, इसकी ओर उनकी दृष्टि नहीं गयी । अतएव वे सब निर्भय होकर उन्हें इधर - उधर खींचने लगे ॥ २३ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये
नखैस्तुदन्तो दशनैर्दशन्त-स्तलैश्च पादैश्च समापयन्तः ।
मदात् कपिं ते कपयः समन्ता-महावनं निर्विषयं च चक्रुः ॥ २४ ॥
मदके प्रभावसे वे वानर कपिवर दधिमुखको नखोंसे बकोटने, दाँतोंसे काटने और थप्पड़ों तथा लातोंसे मार - मार-कर अधमरा करने लगे । इस प्रकार उन्होंने उस विशाल वनको सब ओरसे फल आदिसे शून्य कर दिया ॥ २४ ॥
सुन्दरकाण्डे एकषष्टितमः सर्गः ॥ ६१ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके सुन्दरकाण्डमें इकसठवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ६१ ॥
द्विषष्टितमः सर्गः वानरोंद्वारा मधुवनके रक्षकों और दधिमुखका पराभव तथा सेवकोंसहित दधिमुखका सुग्रीव के पास जाना
तानुवाच हरिश्रेष्ठो हनूमान् वानरर्षभः ।
अव्यग्रमनसो यूयं मधु सेवत वानराः ॥ १ ॥
अहमावर्जयिष्यामि युष्माकं परिपन्थिनः । उस समय वानरशिरोमणि कपिवर हनुमान् ने अपने साथियों-से कहा - " वानरो! तुम सब लोग बेखटके मधुका पान करो । मैं तुम्हारे विरोधियोंको रोकूँगा ' ॥ १३ ॥
श्रुत्वा हनूमतो वाक्यं हरीणां प्रवरोऽङ्गदः ॥ २ ॥
प्रत्युवाच प्रसन्नात्मा पिबन्तु हरयो मधु ।
अवश्यं कृतकार्यस्य वाक्यं हनुमतो मया ॥ ३ ॥
अकार्यमपि कर्तव्यं किमङ्गं पुनरीदृशम् । हनुमान् जीकी बात सुनकर वानरप्रवर अङ्गदने भी प्रसन्न-चित्त होकर कहा - ' वानरगण अपनी इच्छा के अनुसार मधुपान करें । हनुमानजी इस समय कार्य सिद्ध करके लौटे हैं, अतः इनकी बात स्वीकार करनेके योग्य न हो तो भी मुझे अवश्य माननी चाहिये । फिर ऐसी बात के लिये तो कहना ही क्या है? ' ॥ २-३३ ॥ अङ्गदस्य मुखाच्छ्रुत्वा वचनं वानरर्षभाः ॥ ४ ॥
साधु साध्विति संहृष्टा वानराः प्रत्यपूजयन् । अङ्गदके मुखसे ऐसी बात सुनकर सभी श्रेष्ठ वानर हर्षसे खिल उठे और ' साधु - साधु ' कहते हुए उनकी प्रशंसा करने लगे ॥ ४३ ॥
पूजयित्वाङ्गदं सर्वे वानरा वानरर्षभम् ॥ ५ ॥
जग्मुर्मधुवनं यत्र नदीवेग इव द्रुमम् । वानरशिरोमणि अङ्गदको प्रशंसा करके वे सब वानर जहाँ मधुवन था, उस मार्गपर उसी तरह दौड़े गये, जैसे नदी के जलका वेग तटवर्ती वृक्षकी ओर जाता है ॥ ५३ ॥
ते प्रविष्टा मधुवनं पालानाक्रम्य शक्तितः ॥ ६ ॥
अतिसर्गाच्च पटवो दृष्ट्वा श्रुत्वा च मैथिलीम् ।
पपुः सर्वे मधु तदा रसवत् फलमाददुः ॥ ७ ॥
मिथिलेश कुमारी सीताको हनुमान्जी तो देखकर आये थे और अन्य वानरोंने उन्हीं के मुखसे यह सुन लिया था कि वे लङ्का में हैं, अतः उन सबका उत्साह बढ़ा हुआ था । इधर युवराज अङ्गदका आदेश भी मिल गया था, इसलिये वे सामर्थ्यशाली सभी वानर वनरक्षकोंपर पूरी शक्तिसे आक्रमण करके मधुवन में घुस गये और वहाँ इच्छानुसार मधु पीने तथा रसीले फल खाने लगे ॥ ६-७ ॥
उत्पत्य च ततः सर्वे वनपालान् समागतान् ।
ते ताडयन्तः शतशः सक्ता मधुवने तदा ॥ ८ ॥
रोकने के लिये अपने पास आये हुए रक्षकोंको वे सब वानर सैकड़ों की संख्या में जुटकर उछल - उछलकर मारते थे और मधुवनके मधु पीने एवं फल खाने में लगे हुए थे ॥८ ॥
मधूनि द्रोणमात्राणि बाहुभिः परिगृह्य ते ।
पिबन्ति कपयः केचित् सङ्घशस्तत्र हृष्टवत् ॥ ९ ॥
कितने ही वानर झुंड के झुंड एकत्र हो वहाँ अपनी भुजाओंद्वारा एक - एक द्रोणं मधुसे भरे हुए छत्तोंको पकड़ लेते और सहर्ष पी जाते थे ॥ ९ ॥
१. आठ आढक या बत्तीस सेरके मापको द्रोण कहते हैं । यह प्राचीनकालमें प्रचलित था ।
पृष्ठ 216
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
सुन्दरकाण्डे द्विषष्टितमः सर्गः १०३५
घ्नन्ति स्म सहिताः सर्वे भक्षयन्ति तथापरे ।
केचित् पीत्वापविध्यन्ति मधूनि मधुपिङ्गलाः ॥ १० ॥
मधूच्छिष्टेन केचिच्च जघ्नुरन्योन्यमुत्कटाः ।
अपरे वृक्षमूलेषु शाखा गृह्य व्यवस्थिताः ॥ ११ ॥
मधुके समान पिङ्गल वर्णवाले वे सब वानर एक साथ होकर मधुके छत्तों को पीटते, दूसरे वानर उस मधुको पीते और कितने ही पीकर बचे हुए मधुको फेंक देते थे । कितने ही मदमत्त हो एक दूसरे को मोमसे मारते थे और कितने ही वानर वृक्षोंके नीचे डालियाँ पकड़कर खड़े हो गये थे ॥ १०-११ ॥
अत्यर्थे च मदग्लानाः पर्णान्यास्तीर्य शेरते ।
उन्मत्तवेगाः प्लवगा मधुमत्ताच हृष्टवत् ॥ १२ ॥
कितने ही वानर मदके कारण अत्यन्त ग्लानिका अनुभव कर रहे थे । उनका वेग उन्मत्त पुरुषोंके समान देखा जाता था । वे मधु पी - पीकर मतवाले हो गये थे, अतः बड़े हर्ष के साथ पत्ते बिछाकर सो गये ॥ १२ ॥
क्षिपन्त्यपि तथान्योन्यं स्खलन्ति च तथापरे ।
केचित् क्ष्वेडान् प्रकुर्वन्ति केचित् कूजन्ति हृष्टवत् ॥१३ ॥
कोई एक दूसरेपर मधु फेंकते, कोई लड़खड़ाकर गिरते, कोई गरजते और कोई हर्षके साथ पक्षियोंकी भाँति कलरव करते थे ॥ १३ ॥
हरयो मधुना मत्ताः केचित् सुप्ता महीतले ।
धृष्टाः केचिद्ध सन्त्यन्ये केचित् कुर्वन्ति चेतरत् ॥ १४ ॥
मधुसे मतवाले हुए कितने ही वानर पृथ्वीपर सो गये थे । कुछ ढीठ वानर हँसते और कुछ रोदन करते थे ॥१४ ॥
कृत्वा केचिद् वदन्त्यन्ये केचिद् बुध्यन्ति चेतरत् ।
astra मधुपालाः स्युः प्रेष्या दधिमुखस्य तु ॥ १५ ॥
तेऽपि तैर्वानरैर्भीमैः प्रतिषिद्धा दिशो गताः ।
जानुभिश्च प्रघृष्टशश्च देवमार्ग च दर्शिताः ॥ १६ ॥
कुछ वानर दूसरा काम करके दूसरा बताते थे और कुछ उस बातका दूसरा ही अर्थ समझते थे । उस वनमें जो दधिमुखके सेवक मधुकी रक्षामें नियुक्त थे, वे भी उन भयंकर वानरोंद्वारा रोके या पीटे जानेपर सभी दिशाओं में भाग गये । उनमें से कई रखवालोंको अङ्गदके दलवालोंने जमीनपर पटककर घुटनोंसे खूब रगड़ा और कितनोंको पैर पकड़कर आकाश में उछाल दिया था अथवा उन्हें पीठके बल गिराकर आकाश दिखा दिया था ॥ १५-१६ ॥ अब्रुवन् परमोद्विग्ना गत्वा दधिमुखं वचः ।
हनूमता दत्तवरैर्हतं मधुवनं बलात् ।
वयं च जानुभिर्धृष्टा देवमार्गे च दर्शिताः ॥ १७ ॥
वे सब सेवक अत्यन्त उद्विग्न हो दधिमुखके पास जाकर बोले- ' प्रभो! हनुमानजी के बढ़ावा देनेसे उनके दलके सभी वानरोंने बलपूर्वक मधुवनका विध्वंस कर डाला, हमलोगों को गिराकर घुटनोंसे रगड़ा और हमें पीठ के बल पटककर आकाशका दर्शन करा दिया ' ॥ १७ ॥
तदा दधिमुखः क्रुद्धो वनपस्तत्र वानरः ।
हतं मधुवनं श्रुत्वा सान्त्वयामास तान् हरीन् ॥ १८ ॥
तब उस वनके प्रधान रक्षक दधिमुख नामक वानर मधुवनके विध्वंसका समाचार सुन कर वहाँ कुपित हो उठे और उन वानरोंको सान्त्वना देते हुए बोले - ॥ १८ ॥
एतागच्छत गच्छामो वानरानतिदर्पितान् ।
बलेनावारयिष्यामि प्रभुञ्जानान् मधूत्तमम् ॥ १ ९ ॥
' आओ - आओ, चलें इन वानरोंके पास । इनका घमंड बहुत बढ़ गया है । मधुवनके उत्तम मधुको लूटकर खानेवाले इन सबको मैं बलपूर्वक रोकूँगा ' ॥ १ ९ ॥
श्रुत्वा दधिमुखस्येदं वचनं वानरर्षभाः ।
नवरा मधुवनं तेनैव सहिता ययुः ॥ २० ॥
दधिमुखका यह वचन सुनकर वे वीर कपिश्रेष्ठ पुनः उन्हीं के साथ मधुवनको गये ॥ २० ॥
मध्ये चैषां दधिमुखः सुप्रगृह्य महातरुम् ।
समभ्यधावन् वेगेन सर्वे ते च प्लवंगमाः ॥ २१ ॥
इनके बीचमें खड़े हुए दधिमुखने एक विशाल वृक्ष हाथमें लेकर बड़े वेगसे हनुमान्जीके दलपर घावा किया । साथ ही वे सब वानर भी उन मधु पीनेवाले वानरोंपर टूट पड़े ॥ २१ ॥
ते शिलाः पादपांश्चैव पाषाणानपि वानराः ।
गृहीत्वाभ्यागमन क्रुद्धा यत्र ते कपिकुञ्जराः ॥ २२ ॥
क्रोधसे भरे हुए वे वानर शिला, वृक्ष और पाषाण लिये उस स्थानपर आये, जहाँ वे हनुमान् आदि कपिश्रेष्ठ मधुका सेवन कर रहे थे ॥ २२ ॥
बलान्निवारयन्तश्च आसेदुर्हरयो हरीन् ।
संदष्टौष्ठपुटाः क्रुद्धा भर्त्सयन्तो मुहुर्मुहुः ॥ २३ ॥
अपने ओठोंको दाँतोंसे दबाते और क्रोधपूर्वक बारंबार धमकाते हुए ये सब वानर उन वानरोंको बलपूर्वक रोकने के लिये उनके पास आ पहुँचे ॥ २३ ॥
अथ दृष्ट्रा दधिमुखं क्रुद्धं वानरपुङ्गवाः ।
अभ्यधावन्त वेगेन हनुमत्प्रमुखास्तदा ॥ २४ ॥
दधिमुखको कुपित हुआ देख हनुमान् आदि सभी श्रेष्ठ वानर उस समय बड़े वेगसे उनकी ओर दौड़े ॥ २४ ॥
सवृक्षं तं महाबाहुमापतन्तं महाबलम् ।
पृष्ठ 217
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
१०३६ श्रीमद्वाल्मीकीय रामायणे वेगवन्तं विजग्राह बाहुभ्यां कुपितोऽङ्गदः ॥ २५ ॥
वृक्ष लेकर आते हुए वेगशाली महाबली महाबाहु दधिमुखको कुपित हुए अङ्गदने दोनों हाथोंसे पकड़ लिया ॥ २५ ॥
मदान्धो न कृपां चक्रे आर्यकोऽयं ममेति सः ।
अथैनं निष्पिपेषाशु वेगेन वसुधातले ॥ २६ ॥
वे मधु पीकर मदान्ध हो रहे थे, अतः ' ये मेरे नाना हैं ' ऐसा समझकर उन्होंने उनपर दया नहीं दिखायी । वे तुरंत बड़े वेगसे पृथ्वीपर पटककर उन्हें रगड़ने लगे ॥ २६ ॥
स भग्नबाहूरुमुखो विह्वलः शोणितोक्षितः ।
प्रमुमोह महावीरो मुहूर्त कपिकुञ्जरः ॥ २७ ॥
उनकी भुजाएँ, जाँघें और मुँह सभी टूट - फूट गये । वे खूनसे नहा गये और व्याकुल हो उठे । वे महावीर कपिकुञ्जर दधिमुख वहाँ दो घड़ीतक मूर्छित पड़े रहे ॥२७ ॥
स कथंचिद् विमुक्तस्तैर्वानरैर्वानरर्षभः ।
उवाचैकान्तमागत्य स्वान् भृत्यान् समुपागतान् ॥ २८ ॥
उन वानरोंके हाथसे किसी तरह छुटकारा मिलनेपर वानरश्रेष्ठ दधिमुख एकान्तमें आये और वहाँ एकत्र हुए अपने सेवकोंसे बोले – ॥ २८ ॥
एतागच्छत गच्छामो भर्ता नो यत्र वानरः ।
सुग्रीवो विपुलश्रीवः सह रामेण तिष्ठति ॥ २ ९ ॥
' आओ - आओ, अब वहाँ चलें, जहाँ हमारे स्वामी मोटी गर्दनवाले सुग्रीव श्रीरामचन्द्रजी के साथ विराजमान हैं ॥ २ ९ ॥
सर्व चैवाङ्गदे दोषं श्रावयिष्याम पार्थिवे ।
अमर्षी वचनं श्रुत्वा घातयिष्यति वानरान् ॥ ३० ॥
' राजा के पास चलकर सारा दोष अङ्गदके माथे मढ़ देंगे । सुग्रीव बड़े क्रोधी हैं । मेरी बात सुनकर वे इन सभी वानरोंको मरवा डालेंगे ॥ ३० ॥
इष्टं मधुवनं ह्येतत् सुग्रीवस्य महात्मनः ।
पितृपैतामहं दिव्यं देवैरपि दुरासदम् ॥ ३१ ॥
' महात्मा सुग्रीवको यह मधुवन बहुत ही प्रिय है । यह उनके बाप - दादोंका दिव्य वन है । इसमें प्रवेश करना देवताओंके लिये भी कठिन है ॥ ३१ ॥
स वानरानिमान् सर्वान् मधुलुब्धान् गतायुषः ।
घातयिष्यति दण्डेन सुग्रीवः ससुहृज्जनान् ॥ ३२ ॥
' मधुके लोभी इन सभी वानरोंकी आयु समाप्त हो चली है । सुग्रीव इन्हें कठोर दण्ड देकर इनके सुहृदोंसहित इन सबको मरवा डालेंगे ॥ ३२ ॥
वध्या ह्येते दुरात्मानो नृपाशापरिपन्थिनः ।
अमर्षप्रभवो रोषः सफलो मे भविष्यति ॥ ३३ ॥
' राजाकी आशाका उल्लङ्घन करनेवाले ये दुरात्मा राजद्रोही वानर वधके ही योग्य हैं । इनका वध होनेपर ही मेरा अमर्षजनित रोष सफल होगा ' ॥ ३३ ॥।
एवमुक्त्वा दधिमुखो वनपालान् महाबलः ।
जगाम सहसोत्पत्य वनपालैः समन्वितः ॥ ३४ ॥
वनके रक्षकोंसे ऐसा कहकर उन्हें साथ ले महाबली दधिमुख सहसा उछलकर आकाशमार्गसे चले ॥ ३४ ॥
निमेषान्तरमात्रेण स हि प्राप्तो वनालयः ।
सहस्रांशुसुतो धीमान् सुग्रीवो यत्र वानरः ॥ ३५ ॥
और पलक मारते - मारते वे उस स्थानपर जा पहुँचे, जहाँ बुद्धिमान् सूर्यपुत्र वानरराज सुग्रीव विराजमान थे ॥ ३५ ॥
रामं च लक्ष्मणं चैव दृष्ट्वा सुग्रीवमेव च ।
समप्रतिष्ठां जगतीमाकाशानिपपात ह ॥ ३६ ॥
श्रीराम, लक्ष्मण और सुग्रीवको दूरसे ही देखकर वे आकाशसे समतल भूमिपर कूद पड़े ॥ ३६ ॥
सनिपत्य महावीरः सर्वैस्तैः परिवारितः ।
हरिर्दधिमुखः पालैः पालानां परमेश्वरः ॥ ३७ ॥
स दीनवदनो भूत्वा कृत्वा शिरसि चाञ्जलिम् ।
सुग्रीवस्याशु तौ मूर्ध्ना चरणौ प्रत्यपीडयत् ॥ ३८ ॥
वनरक्षकोंके स्वामी महावीर वानर दधिमुख पृथ्वीपर उतरकर उन रक्षकोंसे घिरे हुए उदास मुख किये सुग्रीवके पास गये और सिरपर अञ्जलि बाँधे उनके चरणों में मस्तक झुकाकर उन्होंने प्रणाम किया ॥ ३७-३८ ॥ इस्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये सुन्दरकाण्डे द्विषष्टितमः सर्गः ॥ ६२ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके सुन्दरकाण्ड में बासठवाँ सगँ पूरा हुआ ॥ ६२ ॥
8 + 9 + -
पृष्ठ 218
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
सुन्दरकाण्डे त्रिषष्टितमः सर्गः १०३७ त्रिषष्टितमः सर्गः दधिमुखसे मधुवनके विध्वंसका समाचार सुनकर सुग्रीवका हनुमान् आदि वानरोंकी सफलता के विषयमें अनुमान
ततो मूर्ध्ना निपतितं वानरं वानरर्षभः ।
वो द्विग्नहृदयो वाक्यमेतदुवाच ह ॥ १ ॥
वानर दधिमुखको माथा टेक प्रणाम करते देख वानर-शिरोमणि सुग्रीवका हृदय उद्विग्न हो उठा । वे उनसे इस प्रकार बोले- ॥ १ ॥
उत्तिष्ठोत्तिष्ठ कस्मात् त्वं पादयोः पतितो मम ।
अभयं ते प्रदास्यामि सत्यमेवाभिधीयताम् ॥ २ ॥
' उठो - उठो । तुम मेरे पैरोंपर कैसे पड़े हो? मैं तुम्हें
अभयदान देता हूँ । तुम सच्ची बात बताओ ॥ २ ॥
किं सम्भ्रमाद्धितं कृत्स्नं ब्रूहि यद् वकुमर्हसि ।
कच्चिन्मधुवने स्वस्ति श्रोतुमिच्छामि वानर ॥ ३ ॥
“ कहो, किसके भयसे यहाँ आये हो । जो पूर्णतः हितकर बात हो, उसे बताओ; क्योंकि तुम सब कुछ कहने के योग्य हो । मधुवनमें कुशल तो है न? वानर! मैं तुम्हारे मुखसे यह सब सुनना चाहता हूँ ' ॥ ३ ॥
स समाश्वासितस्तेन सुग्रीवेण महात्मना ।
उत्थाय स महाप्राज्ञो वाक्यं दधिमुखोऽब्रवीत् ॥ ४ ॥
महात्मा सुग्रीवके इस प्रकार आश्वासन देनेपर मद्दा-बुद्धिमान् दधिमुख खड़े होकर बोले – ॥ ४ ॥
नैवर्क्षरजसा राजन् न त्वया न च वालिना ।
वनं निसृष्टपूर्व ते नाशितं तत्तु वानरैः ॥ ५ ॥
' राजन् | आपके पिता ऋक्षरजाने वालीने और आपने भी पहले कभी जिस वनके मनमाने उपभोगके लिये किसीको आज्ञा नहीं दी थी, उसीका हनूमान् आदि वानरोंने आज नाश कर दिया ॥ ५ ॥
न्यवारयमहं सर्वान् सहैभिर्वनचारिभिः ।
अचिन्तयित्वा मां हृष्टा भक्षयन्ति पिबन्ति च ॥ ६ ॥
' मैंने इन वनरक्षक वानरोंके साथ उन सबको रोकनेकी बहुत चेष्टा की, परंतु वे मुझे कुछ भी न समझकर बड़े हर्ष के साथ फल खाते और मधु पीते हैं ॥ ६ ॥
एभिः प्रधर्षणायां च वारितं वनपालकैः ।
मामप्यचिन्तयन् देव भक्षयन्ति वनौकसः ॥ ७ ॥
“ देव! इन हनुमान् आदि वानरोंने जब मधुवनमें लूट मचाना आरम्भ किया, तब हमारे इन वनरक्षकोंने उन सबको रोकनेकी चेष्टा की; परंतु वे वानर इनको और मुझे भी कुछ नहीं गिनते हुए वहाँके फल आदिका भक्षण कर रहे हैं ॥ ७ ॥
शिष्टमत्रापविध्यन्ति भक्षयन्ति तथापरे ।
निवार्यमाणास्ते सर्वे भ्रुकुटिं दर्शयन्ति हि ॥ ८ ॥
' दूसरे, वानर वहाँ खाते - पीते तो हैं ही, उनके सामने जो कुछ बच जाता है, उसे उठाकर फेंक देते हैं और जब हमलोग रोकते हैं, तब वे सब हमें टेढ़ी भौंहें दिखाते हैं ॥८ ॥
इमे हि संरब्धतरास्तदा तैः सम्प्रधर्षिताः ।
निवार्यन्ते वनात् तस्मात् क्रुद्धैर्वानरपुङ्गवैः ॥ ९ ॥
' जब ये रक्षक उनपर अधिक कुपित हुए, तब उन्होंने इनपर आक्रमण कर दिया । इतना ही नहीं, क्रोधसे भरे हुए उन वानरपुङ्गवोंने इन रक्षकोंको उस वन से बाहर निकाल दिया ॥ ९ ॥
ततस्तैर्बहुभिर्वीरैर्वानरैर्वानरर्षभाः संरक्तनयनैः क्रोधाद्धरयः सम्प्रधर्षिताः ॥ १० ॥
' बाहर निकालकर उन बहुसंख्यक वीर वानरोंने क्रोधसे लाल आँखें करके वनकी रक्षा करनेवाले इन श्रेष्ठ वानरोंको घर दबाया ॥ १० ॥
पाणिभिर्निहताः केचित् केचिज्जानुभिराहताः ।
प्रकृष्टाश्च तदा कामं देवमार्गे च दर्शिताः ॥ ११ ॥
' किन्हीं को थप्पड़ोंसे मारा, किन्हीं को घुटनोंसे रगड़ दिया, बहुतोंको इच्छानुसार घसीटा और कितनोंको पीठके बल पटककर आसमान दिखा दिया ॥ ११ ॥
एवमेते हताः शूरास्त्वयि विद्यति भर्तरि ।
कृत्स्नं मधुवनं चैव प्रकामं तैश्व भक्ष्यते ॥ १२ ॥
" प्रभो! आप जैसे स्वामीके रहते हुए ये शूरवीर वनरक्षक उनके द्वारा इस तरह मारे - पीटे गये हैं और वे अपराधी वानर अपनी इच्छा के अनुसार सारे मधुवनका उपभोग कर रहे हैं ' ॥ १२ ॥
एवं विज्ञाप्यमानं तं सुग्रीवं वानरर्षभम् ।
अपृच्छत् तं महाप्राज्ञो लक्ष्मणः परवीरहा ॥ १३ ॥
वानरशिरोमणि सुग्रीवको जब इस प्रकार मधुवनके लूटे जानेका वृत्तान्त बताया जा रहा था, उस समय शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले परम बुद्धिमान् लक्ष्मणने उनसे पूछा – ॥ १३ ॥
किमयं वानरो राजन् वनपः प्रत्युपस्थितः ।
पृष्ठ 219
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
१०३८ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे किं चार्थमभिनिर्दिश्य दुःखितो वाक्यमब्रवीत् ॥ १४ ॥ जाम्बवान् यत्र नेता स्यादङ्गदश्च महाबलः ॥ २१ ॥
' राजन्! वनकी रक्षा करनेवाला यह वानर यहाँ किस लिये उपस्थित हुआ है? और किस विषयकी ओर संकेत करके इसने दुखी होकर बात की है ११ ॥ १४ ॥
एवमुक्तस्तु सुग्रीवो लक्ष्मणेन महात्मना ।
लक्ष्मणं प्रत्युवाचेदं वाक्यं वाक्यविशारदः ॥ १५ ॥
महात्मा लक्ष्मणके इस प्रकार पूछनेपर बातचीत करनेमें कुशल सुग्रीवने उन्हें यों उत्तर दिया- ॥ १५ ॥
आर्य लक्ष्मण सम्प्राह वीरो दधिमुखः कपिः ।
अङ्गदप्रमुखैर्वीरैर्भक्षितं मधु वानरैः ॥ १६ ॥
' आर्य लक्ष्मण | वीर वानर दधिमुखने मुझसे यह कहा है कि ' अङ्गद आदि वीर वानरोंने मधुवनका सारा मधु खा - पी लिया है ' ॥ १६ ॥
नैषामकृतकार्याणामीदृशः स्याद् व्यतिक्रमः ।
वनं यदभिपन्नास्ते साधितं कर्म तद् ध्रुवम् ॥ १७ ॥
' इसकी बात सुनकर मुझे यह अनुमान होता है कि वे जिस कार्य के लिये गये थे, उसे अवश्य ही उन्होंने पूरा कर लिया है 1 । तभी उन्होंने मधुवनपर आक्रमण किया है । यदि वे अपना कार्य सिद्ध करके न आये होते तो उनके द्वारा ऐसा अपराध नहीं बना होता – वे मेरे मधुवनको लूटने का साहस नहीं कर सकते थे ॥ १७ ॥
वारयन्तो भृशं प्राप्ताः पाला जानुभिराहताः ।
तथा न गणितश्चायं कपिर्दधिमुखो बली ॥ १८ ॥
पतिर्मम वनस्यायमस्माभिः स्थापितः स्वयम् ।
दृष्टा देवी न संदेहो न चान्येन हनूमता ॥ १ ९ ॥
' जब रक्षक उन्हें बारंबार रोकनेके लिये आये, तब उन्होंने इन सबको पटककर घुटनोंसे रगड़ा है तथा इन बलवान् वानर दधिमुखको भी कुछ नहीं समझा है । ये ही मेरे उस वनके मालिक या प्रधान रक्षक हैं । मैंने स्वयं ही इन्हें इस कार्य में नियुक्त किया है ( फिर भी उन्होंने इनकी बात नहीं मानी है ) । इससे जान पड़ता है, उन्होंने देवी सीताका दर्शन अवश्य कर लिया । इसमें कोई संदेह नहीं है । यह काम और किसीका नहीं, हनुमान्जीका ही है ( उन्होंने ही सीताका दर्शन किया है ) ॥ १८-१९ ॥
नान्यः साधने हेतुः कर्मणोऽस्य हनूमतः ।
कार्यसिद्धिर्हनुमति मतिश्च हरिपुङ्गवे ॥ २० ॥
व्यवसायश्च वीर्य च श्रुतं चापि प्रतिष्ठितम् । ' इस कार्यको सिद्ध करने में हनुमानजी के सिवा और कोई कारण बना हो, ऐसा सम्भव नहीं है । वानरशिरोमणि हनुमान् में ही कार्य सिद्धिकी शक्ति और बुद्धि है । उन्हीं में उद्योग, पराक्रम और शास्त्रज्ञान भी प्रतिष्ठित है ॥ २०३ ॥
हनूमांश्चाप्यधिष्ठाता न तत्र गतिरन्यथा । " जिस दलके नेता जाम्बवान् और महाबली अङ्गद हों तथा अधिष्ठाता हनुमान् हो, उस दलको विपरीत परिणाम-असफलता मिले, यह सम्भव नहीं है || २१३ ॥ अङ्गदप्रमुखै वीरैर्हतं मधुवनं किल ॥ २२ ॥
विचित्य दक्षिणामा शामागतै हरिपुङ्गवैः ।
आगतैश्चाप्रधृष्यं तद्धतं मधुवनं हि तैः ॥ २३ ॥
धर्षितं च वनं कृत्स्नमुपयुक्तं तु वानरैः ।
पातिता वनपालास्ते तदा जानुभिराहताः ॥ २४ ॥
एतदर्थमयं प्राप्तो वक्तुं मधुरवागिह ।
नाम्ना दधिमुखो नाम हरिः प्रख्यातविक्रमः ॥ २५ ॥
' दक्षिण दिशा से सीताजीका पता लगाकर लौटे हुए अङ्गद आदि वीर वानरपुङ्गवोंने उस मधुवनपर प्रहार किया है, जिसे पददलित करना किसीके लिये भी असम्भव था । उन्होंने मधुवनको नष्ट किया, उजाड़ा और सब वानरोंने मिलकर समूचे वनका मनमाने ढंगसे उपभोग किया । इतना ही नहीं, उन्होंने वनके रक्षकोंको भी दे मारा और उन्हें अपने घुटनोंसे मार - मारकर घायल किया । इसी बातको बतानेके लिये ये विख्यात पराक्रमी वानर दधिमुख, जो बड़े मधुरभाषी हैं, यहाँ आये हैं ॥ २२-२५ ॥
दृष्ट्रा सीता महाबाहो सौमित्रे पश्य तत्त्वतः ।
अभिगम्य यथा सर्वे पिबन्ति मधु वानराः ॥ २६ ॥
' महाबाहु सुमित्रानन्दन! इस बातको आप ठीक समझें कि अब सीताका पता लग गया; क्योंकि वे सभी वानर उस वनमें जाकर मधु पी रहे हैं ॥ २६ ॥
न चाप्यदृष्ट्वा वैदेहीं विश्रुताः पुरुषर्षभ ।
वनं दत्तवरं दिव्यं धर्षयेयुर्वनौकसः ॥ २७ ॥
' पुरुषप्रवर! विदेहनन्दिनीका दर्शन किये बिना उस दिव्य वनका, जो देवताओंसे मेरे पूर्वजको वरदान के रूपमें प्राप्त हुआ है, वे विख्यात वानर कभी विध्वंस नहीं कर सकते थे ' ॥ २७ ॥
ततः प्रहृष्टो धर्मात्मा लक्ष्मणः सहराघवः ।
श्रुत्वा कर्णसुखां वाणीं सुग्रीववदनाच्च्युताम् ॥ २८ ॥
प्राहृष्यत भृशं रामो लक्ष्मणश्च महायशाः । सुग्रीवके मुख से निकली हुई कानोको सुख देनेवाली यह बात सुनकर धर्मात्मा लक्ष्मण श्रीरामचन्द्रजी के साथ बहुत प्रसन्न हुए । श्रीरामके हर्षकी सीमा न रही और महायशस्वी लक्ष्मण भी हर्षसे खिल उठे ॥ २८३ ॥
श्रुत्वा दधिमुखस्यैवं सुग्रीवस्तु प्रहृष्य च ॥ २ ९ ॥ वनपाल पुनर्वाक्यं सुग्रीवः प्रत्यभाषत ।
पृष्ठ 220
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
सुन्दरकाण्डे चतुःषष्टितमः सर्गः १०३ ९ दधिमुखकी उपर्युक्त बात सुनकर सुग्रीवको बड़ा हर्ष हुआ । उन्होंने अपने वनरक्षकको फिर इस प्रकार उत्तर दिया- ॥ २ ९ ३ ॥ प्रीतोऽस्मि सोऽहं यद्भुतं वनं तैः कृतकर्मभिः ॥ ३० ॥
धर्षितं मर्षणीयं च चेष्टितं कृतकर्मणाम् ।
गच्छ शीघ्रं मधुवनं संरक्षस्व त्वमेव हि ।
शीघ्रं प्रेषय सर्वास्तान् हनूमत्प्रमुखान् कपीन् ॥ ३१ ॥
' मामा! अपना कार्य सिद्ध करके लौटे हुए उन वानरोंने जो मेरे मधुवनका उपभोग किया है, उससे मैं बहुत प्रसन्न हुआ हूँ; अतः तुम्हें भी कृतकृत्य होकर आये हुए उन कपियोंकी ढिठाई तथा उद्दण्डतापूर्ण चेष्टाओंको क्षमा कर देना चाहिये । अब शीघ्र जाओ और तुम्हीं उस मधुवनकी रक्षा करो । साथ ही हनुमान् आदि सब वानरोंको जल्दी यहाँ भेजो ॥ ३०-३१ ॥ इच्छामि शीघ्रं हनुमत्प्रधाना-शाखामृगांस्तान् मृगराजदर्पान् । इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये प्रष्टुं कृतार्थान् सह राघवाभ्यां श्रोतुं च सीताधिगमे प्रयत्नम् ॥ ३२ ॥
“ मैं सिंह के समान दर्पसे भरे हुए उन हनुमान् आदि वानरोंसे शीघ्र मिलना चाहता हूँ और इन दोनों रघुवंशी बन्धुओं के साथ मैं उन कृतार्थ होकर लौटे हुए वीरोंसे यह पूछना तथा सुनना चाहता हूँ कि सीताकी प्राप्तिके लिये क्या प्रयत्न किया जाय ' ॥ ३२ ॥
प्रीतिस्फीताक्षौ सम्प्रहृष्टौ कुमारौ दृष्ट्रा सिद्धार्थों वानराणां च राजा । अङ्गः प्रहृष्टेः कार्य सिद्धिं विदित्वा बाहोरासन्नामतिमात्रं ननन्द ॥ ३३ ॥
वे दोनों राजकुमार श्रीराम और लक्ष्मण पूर्वोक्त समाचारसे अपनेको सफलमनोरथ मानकर हर्षसे पुलकित हो गये थे । उनकी आँखें प्रसन्नतासे खिल उठी थीं । उन्हें इस तरह प्रसन्न देख तथा अपने हर्षोत्फुल्ल अङ्गोंसे कार्य-सिद्धिको हाथोंमें आयी हुई जान वानरराज सुग्रीव अत्यन्त आनन्द में निमग्न हो गये ॥ ३३ ॥
सुन्दरकाण्डे त्रिषष्टितमः सर्गः ॥ ६३ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आरामायण आदिकाव्यके सुन्दरकाण्ड में तिरसठवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ६३ ॥
चतुःषष्टितमः सर्गः दधिमुखसे सुग्रीव का संदेश सुनकर अङ्गद - हनुमान् आदि वानरोंका किष्किन्धा में पहुँचना और हनुमान्जीका श्रीरामको प्रणाम करके
सुग्रीवेणैवमुक्तस्तु हृष्टो दधिमुखः कपिः ।
राघवं लक्ष्मणं चैव सुग्रीवं चाभ्यवादयत् ॥ १ ॥
सुग्रीव के ऐसा कहने पर प्रसन्नचित्त वानर दधिमुखने श्रीराम, लक्ष्मण और सुग्रीवको प्रणाम किया ॥ १ ॥
स प्रणम्य च सुग्रीवं राघवौ च महाबलौ ।
वानरैः सहितः शूरैर्दिवमेवोत्पपात ह ॥ २ ॥
सुग्रीव तथा उन महाबली रघुवंशी बन्धुओंको प्रणाम करके वे शूरवीर वानरोंके साथ आकाशमार्गसे उड़ चले ॥२ ॥
स यथैवागतः पूर्वे तथैव त्वरितं गतः ।
निपत्य गगनाद् भूमौ तद् वनं प्रविवेश ह ॥ ३ ॥
जैसे पहले आये थे, उतनी ही शीघ्रता से वे वहाँ जा पहुँचे और आकाशसे पृथ्वीपर उतरकर उन्होंने उस मधुवनमें प्रवेश किया ॥ ३ ॥
स प्रविष्टो मधुवनं ददर्श हरियूथपान् ।
विमदानुद्धतान् सर्वान् मेहमानान् मधूदकम् ॥ ४ ॥
मधुवन में प्रविष्ट होकर उन्होंने देखा कि समस्त वानर-सीता देवीके दर्शनका समाचार बताना यूथपति जो पहले उद्दण्ड हो रहे थे, अब मदरहित हो गये हैं-- इनका नशा उतर गया है और ये मधुमिश्रित जलका मेहन ( मूत्रेन्द्रियद्वारा त्याग ) कर रहे हैं ॥ ४ ॥
स तानुपागमद् वीरो बद्ध्वा करपुटाञ्जलिम् ।
उवाच वचनं श्लक्ष्णमिदं हृष्टवदङ्गदम् ॥ ५ ॥
वीर दधिमुख उनके पास गये और दोनों हाथोंकी अञ्जलि बाँध अङ्गदसे हर्षयुक्त मधुर वाणीमें इस प्रकार बोले – ॥ ५ ॥
सौम्य रोषो न कर्तव्यो यदेभिः परिवारणम् ।
अशानाद् रक्षिभिः क्रोधाद्भवन्तः प्रतिषेधिताः ॥ ६ ॥
" सौम्य! इन रक्षकोंने जो अज्ञानवश आपको रोका था, क्रोधपूर्वक आपलोगों को मधु पीनेसे मना किया था, इसके लिये आप अपने मनमें क्रोध न करें ॥ ६ ॥
श्रान्तो दूरादनुप्राप्तो भक्षयस्व स्वकं मधु ।
युवराजस्त्वमीशश्च वनस्यास्य महाबल ॥ ७ ॥
" आपलोग दूरसे थके - माँदे आये हैं, अतः फल खाइये