श्रीगणेशाय नमः।
वाल्मीकि रामायण — खण्ड २ — पृष्ठ 221–230
वाल्मीकि रामायण — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 221–230
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१०४० श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे और मधु पीजिये । यह सब आपकी ही सम्पत्ति है । महाबली वीर! आप हमारे युवराज और इस वनके स्वामी हैं ॥ ७ ॥
मौर्थ्यात् पूर्व कृतो रोषस्तद् भवान् क्षन्तुमर्हति ।
यथैव हि पिता तेऽभूत् पूर्व हरिगणेश्वरः ॥ ८ ॥
तथा त्वमपि सुग्रीवो नान्यस्तु हरिसत्तम । ‘ कपिश्रेष्ठ! मैंने पहले मूर्खतावश जो रोष प्रकट किया था, उसे आप क्षमा करें; क्योंकि पूर्वकालमें जैसे आपके पिता वानरोंके राजा थे, उसी प्रकार आप और सुग्रीव भी
हैं । आपलोगोंके सिवा दूसरा कोई हमारा स्वामी नहीं है । ८३ ।
आख्यातं हि मया गत्वा पितृव्यस्य तवानघ ॥ ९ ॥
इहोपयानं सर्वेषामेतेषां वनचारिणाम् ।
भवदागमनं श्रुत्वा सहैभिर्वनचारिभिः ॥ १० ॥
प्रहृष्टो न तु रुष्टोऽसौ वनं श्रुत्वा प्रधर्षितम् । ' निष्पाप युवराज! मैंने यहाँसे जाकर आपके चाचा सुग्रीवसे इन सब वानरोंके यहाँ पधारनेका हाल कहा था । इन वानरोंके साथ आपका आगमन सुनकर वे बहुत प्रसन्न हुए । इस वनके विध्वंसका समाचार सुनकर भी उन्हें रोष नहीं हुआ ॥ ९ -१०३ ॥ प्रहृष्टो मां पितृव्यस्ते सुग्रीवो वानरेश्वरः ॥ ११ ॥
शीघ्रं प्रेषय सर्वास्तानिति होवाच पार्थिवः । ‘ आपके चाचा वानरराज सुग्रीवने बड़े इर्षके साथ मुझसे कहा है कि उन सबको शीघ्र यहाँ भेजो ' ॥ ११३ ॥
श्रुत्वा दधिमुखस्यैतद् वचनं श्लक्ष्णमङ्गदः ॥ १२ ॥
अब्रवीत् तान् हरिश्रेष्ठो वाक्यं वाक्यविशारदः । दधिमुखकी यह बात सुनकर बातचीत करनेमें कुशल कपिश्रेष्ठ अङ्गदने उन सबसे मधुर वाणीमें कहा- ॥ १२३ ॥
शङ्के श्रुतोऽयं वृतान्तो रामेण हरियूथपाः ॥ १३ ॥
अयं च हर्षादाख्याति तेन जानामि हेतुना ।
तत् क्षमं नेह नः स्थातुं कृते कार्ये परंतपाः ॥ १४ ॥
' वानरयूथपतियो! जान पड़ता है भगवान् श्रीरामने हम लोगोके लौटनेका समाचार सुन लिया; क्योंकि ये बहुत प्रसन्न होकर वहाँकी बात सुना रहे हैं । इसीसे मुझे ऐसा ज्ञात होता है । अतः शत्रुओं को संताप देनेवाले वीरो! कार्य पूरा हो जानेपर अब हमलोगोंको यहाँ अधिक नहीं ठहरना चाहिये ॥ १३-१४ ॥
पीत्वा मधु यथाकामं विक्रान्ता वनचारिणः ।
किं शेषं गमनं तत्र सुग्रीवो यत्र वानरः ॥ १५ ॥
' पराक्रमी वानर इच्छानुसार मधु पी चुके । अब यहाँ कौन - सा कार्य शेष है । इसलिये वहीं चलना चाहिये, जहाँ वानरराज सुग्रीव हैं ॥ १५ ॥
सर्वे यथा मां वक्ष्यन्ति समेत्य हरिपुङ्गवाः ।
तथास्मि कर्ता कर्तव्ये भवद्भिः परवानहम् ॥ १६ ॥
' वानरपुङ्गवो! आप सब लोग मिलकर मुझसे जैसा कहेंगे, मैं वैसा ही करूँगा; क्योंकि कर्तव्य के विषय में मैं आप लोगों के अधीन हूँ ॥ १६ ॥
नाशापयितुमीशोऽहं युवराजोऽस्मि यद्यपि ।
अयुक्तं कृतकर्माणो यूयं धर्षयितुं बलात् ॥ १७ ॥
' यद्यपि मैं युवराज हूँ तो भी आपलोगोंपर हुक्म नहीं चला सकता । आपलोग बहुत बड़ा कार्य पूरा करके आये हैं, अतः बलपूर्वक आपपर शासन चलाना कदापि उचित नहीं है ' ॥ १७ ॥
ब्रुवतश्चाङ्गदस्यैवं श्रुत्वा वचनमुत्तमम् ।
प्रहृष्टमनसो वाक्यमिदमूचुर्वनौकसः ॥ १८ ॥
उस समय इस तरह बोलते हुए अङ्गदका उत्तम वचन सुनकर सब वानरोंका चित्त प्रसन्न हो गया और वे इस प्रकार बोले - ॥ १८ ॥
एवं वक्ष्यति को राजन् प्रभुः सन् वानरर्षभ ।
ऐश्वर्यमदमत्तो हि सर्वोऽहमिति मन्यते ॥ १ ९ ॥
' राजन्! कपिश्रेष्ठ! स्वामी होकर भी अपने अधीन रहनेवाले लोगोंसे कौन इस तरहकी बात करेगा? प्रायः सब लोग ऐश्वर्य के मद से उन्मत्त हो अहंकारवश अपनेको ही सर्वोपरि मानने लगते हैं ॥ १ ९ ॥
तव चेदं सुसदृशं वाक्यं नान्यस्य कस्यचित् ।
सन्नतिर्हि तवाख्याति भविष्यच्छुभयोग्यताम् ॥ २० ॥
' आपकी यह बात आपके ही योग्य है । दूसरे किसी के मुँहसे प्रायः ऐसी बात नहीं निकलती । यह नम्रता आपकी भावी शुभयोग्यता का परिचय दे रही है ॥ २० ॥
सर्वे वयमपि प्राप्तास्तत्र गन्तुं कृतक्षणाः ।
स यत्र हरिवीराणां सुग्रीवः पतिरव्ययः ॥ २१ ॥
' हम सब लोग भी जहाँ वानरवीरोंके अविनाशी पति सुग्रीव विराजमान हैं, वहाँ चलने के लिये उत्साहित हो यहाँ आपके समीप आये हैं ॥ २१ ॥
त्वया नुकैईरिभिर्नैव शक्यं पदात् पदम् ।
क्वचिद् गन्तुं हरिश्रेष्ठ ब्रूमः सत्यमिदं तु ते ॥ २२ ॥
' वानरश्रेष्ठ! आपकी आज्ञा प्राप्त हुए बिना हम वानर-गण कहीं एक पग भी नहीं जा सकते, यह आपसे सच्ची बात कहते हैं ' ॥ २२ ॥
एवं तु वदतां तेषामङ्गदः प्रत्यभाषत ।
साधु गच्छाम इत्युक्त्वा खमुत्पेतुर्महाबलाः ॥ २३ ॥
वे वानरगण जब ऐसी बातें कहने लगे, तब अङ्गद
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सुन्दरकाण्डे चतुःषष्टितमः सर्गः १०४ ९ बोले- बहुत अच्छा, अब हमलोग चलें । ' इतना कहकर सदा रक्षा की है, कोई जनक किशोरीका दर्शन किये बिना वे महाबली वानर आकाश में उड़ चले ॥ २३ ॥ विध्वंस नहीं कर सकता था ॥ ३१ ॥
उत्पतन्तमनुत्पेतुः सर्वे ते हरियूथपाः ।
कृत्वाऽऽकाशं निराकाशं यन्त्रोत्क्षिप्ता इवोपलाः ॥ २४ ॥
आगे - आगे अङ्गद और उनके पीछे वे समस्त वानर-यूथपति उड़ने लगे । वे आकाशको आच्छादित करके गुलेल -से फेंके गये पत्थरों की भाँति तीव्रगति से जा रहे थे ॥ २४ ॥
अङ्गदं पुरतः कृत्वा इनूमन्तं च वानरम् ।
ds म्बरं सहसोत्पत्य वेगवन्तः प्लवङ्गमाः ॥ २५ ॥
विनदन्तो महानादं घना वातेरिता यथा । अङ्गद और वानरवीर हनुमान्को आगे करके सभी वेगवान् वानर सहसा आकाश में उछलकर वायुसे उड़ाये गये बादलोंकी भाँति बड़े जोर - जोर से गर्जना करते हुए किष्किन्धा-के निकट जा पहुँचे || २५३ ॥ अङ्गदे समनुप्राप्ते सुग्रीवो वानरेश्वरः ॥ २६ ॥
उवाच शोकसंतप्तं रामं कमललोचनम् । अङ्गदके निकट पहुँचते ही वानरराज सुग्रीवने शोक संतप्त कमलनयन श्रीरामसे कहा- ॥ २६३ ॥
समाश्वसिहि भद्रं ते दृष्टा देवी न संशयः ॥ २७ ॥
नागन्तुमिह शक्यं तैरतीतसमयैरिह । ' प्रभो! धैर्य धारण कीजिये । आपका कल्याण हो । सीतादेवीका पता लग गया है, इसमें संशय नहीं है; क्योंकि कृतकार्य हुए बिना दिये हुए समयकी अवधिको बिताकर ये वानर कदापि यहाँ नहीं आ सकते थे ॥ २७३ ॥
अङ्गदस्य प्रहर्षाश्च जानामि शुभदर्शन ॥ २८ ॥
न मत्सकाशमागच्छेत् कृत्ये हि विनिपातिते ।
युवराजो महाबाहुः लवतामङ्गदो वरः ॥ २ ९ ॥
" शुभदर्शन श्रीराम! अङ्गदकी अत्यन्त प्रसन्नता से भी मुझे इसी बात की सूचना मिल रही है । यदि काम बिगाड़ दिया गया होता तो वानरोंमें श्रेष्ठ युवराज महाबाहु अङ्गद मेरे पास कदापि लौटकर नहीं आते ॥ २८-२९ ॥
यद्यप्यकृतकृत्यानामीदृशः स्यादुपक्रमः ।
भवेत् तु दीनवदनो भ्रान्तविप्लुतमानसः ॥ ३० ॥
' यद्यपि कार्य सिद्ध न होनेपर भी इस तरह लोगोंका अपने घर लौटना देखा गया है, तथापि उस दशामें अङ्गदके मुखपर उदासी छायी होती और उनके चित्तमें घबराहटके कारण उथल - पुथल मचा होता ॥ ३० ॥
पितृपैतामहं चैतत् पूर्वकैरभिरक्षितम् ।
न मे मधुवनं हन्याददृष्ट्वा जनकात्मजाम् ॥ ३१ ॥
कौसल्या सुप्रजा राम समाश्वसिहि सुव्रत ।
दृष्टा देवी न संदेहो न चान्येन हनूमता ॥ ३२ ॥
' उत्तम व्रतका पालन करनेवाले श्रीराम! आपको पाकर माता कौसल्या उत्तम संतानकी जननी हुई हैं । आप धैर्य धारण कीजिये । इसमें कोई संदेह नहीं कि देवी सीताका दर्शन हो गया । किसी औरने नहीं, हनुमानजीने ही उनका दर्शन किया है ॥ ३२ ॥
नान्यः कर्मणो हेतुः साधनेऽस्य हनूमतः ।
हनूमतीह सिद्धिश्च मतिश्च मतिसत्तम ॥ ३३ ॥
व्यवसायश्च शौर्ये च श्रुतं चापि प्रतिष्ठितम् ।
जाम्बवान् यत्र नेता स्यादङ्गदश्च हरीश्वरः ॥ ३४ ॥
हनूमांश्चाप्यधिष्ठाता न तत्र गतिरन्यथा । ' मतिमानों में श्रेष्ठ रघुनन्दन । इस कार्यको सिद्ध करने में हनुमान् जीके सिवा और कोई कारण बना हो, ऐसा सम्भव नहीं है । वानरशिरोमणि हनुमान में ही कार्यसिद्धिकी शक्ति और बुद्धि है । उन्हींमें उद्योग, पराक्रम और शास्त्रज्ञान भी प्रतिष्ठित है | जिस दलके नेता जाम्बवान् और महाबली अङ्गद हों तथा अधिष्ठाता हनुमान् हो, उस दलको विपरीत परिणाम-असफलता मिले, यह सम्भव नहीं है । ३३-३४३ ॥ मा भूश्चिन्तासमायुक्तः सम्प्रत्यमितविक्रम ॥ ३५ ॥
यदा हि दर्पितोदयाः संगताः काननौकसः ।
नैषामकृतकार्याणामीदृशः स्यादुपक्रमः ॥ ३६ ॥
वनभङ्गेन जानामि मधूनां भक्षणेन च । ' अमित पराक्रमी श्रीराम! अब आप चिन्ता न करें । ये वनवासी वानर जो इतने अहंकार में भरे हुए आ रहे हैं, कार्य सिद्ध हुए बिना इनका इस तरह आना सम्भव नहीं था । इनके मधु पीने और वन उजाइनेसे भी मुझे ऐसा ही प्रतीत होता है ' || ३५-३६३ ॥ ततः किलकिलाशब्दं शुश्रावासन्नमम्बरे ॥ ३७ ॥
हनूमत्कर्मदृप्तानां नदतां काननौकसाम् ।
किष्किन्धामुपयातानां सिद्धिं कथयतामिव ॥ ३८ ॥
वे इस प्रकार कह ही रहे थे कि उन्हें आकाशमें निकटसे वानरोंकी किलकारियाँ सुनायी दीं । हनुमानजी के पराक्रमपर गर्व करके किष्किन्धाके पास आ गर्जना करनेवाले वे वनवासी वानर मानो सिद्धिकी सूचना दे रहे थे ॥ ३७-३८ ॥
ततः श्रुत्वा निनादं तं कपीनां कपिसत्तमः ।
आयताञ्चितलाङ्गलः सोऽभवद्धृष्टमानसः ॥ ३ ९ ॥
८ ' मेरे बाप - दादोंके इस मधुवनका, जिसकी पूर्वजोंने भी उन वानरोंका वह सिंहनाद सुनकर कपिश्रेष्ठ सुग्रीवका वा ० रा ० ५.८. ५-
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१०४२ श्रीमद्वाल्मीकीय रामायणे हृदय हर्पसे खिल उठा । उन्होंने अपनी पूँछ लंबी एवं ऊँची कर दी ॥ ३ ९ ॥
आजग्मुस्तेऽपि हरयो रामदर्शनकाङ्क्षिणः ।
अङ्गदं पुरतः कृत्वा हनूमन्तं च वानरम् ॥ ४० ॥
इतने में ही श्रीरामचन्द्र जी के दर्शनकी इच्छासे अङ्गद और वानरवीर हनुमान्को आगे करके वे सब वानर वहाँ आपहुँचे ॥ ४० ॥
तेऽङ्गदप्रमुखा वीराः प्रहृष्टाश्च मुदान्विताः ।
निपेतुर्हरिराजस्य समीपे राघवस्य च ॥ ४१ ॥
वे अङ्गद आदि वीर आनन्द और उत्साहसे भरकर वानरराज सुग्रीव तथा रघुनाथजी के समीप आवाशसे नीचे उतरे ॥ ४१ ॥
हनूमांश्च महाबाहुः प्रणम्य शिरसा ततः ।
नियतामक्षतां देवीं राघवाय न्यवेदयत् ॥ ४२ ॥
महाबाहु हनुमान्ने श्रीरघुनाथजीके चरणोंमें मस्तक रखकर प्रणाम किया और उन्हें यह बताया कि ' देवी सीता इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये पातिव्रत्यके कठोर नियमोंका पालन करती हुई शरीर से सकुशल हैं ' ॥ ४२ ॥
दृष्टा देवीति हनुमवदनादमृतोपमम् ।
आकर्ण्य वचनं रामो हर्षमाप सलक्ष्मणः ॥ ४३ ॥
" मैंने देवी सीताका दर्शन किया है ' हनुमानजी के मुख से यह अमृत के समान मधुर वचन सुनकर लक्ष्मणसहित श्रीराम-को बड़ी प्रसन्नता हुई ॥ ४३ ॥
निश्चितार्थ ततस्तस्मिन् सुग्रीवं पवनात्मजे ।
लक्ष्मणः प्रीतिमान् प्रीतं बहुमानादवैक्षत ॥ ४४ ॥
पवनपुत्र हनुमान के विषय में सुग्रीवने पहले से ही निश्चय कर लिया था कि उन्हीं के द्वारा कार्य सिद्ध हुआ है । इसलिये प्रसन्न हुए लक्ष्मणने प्रीतियुक्त सुग्रीवकी ओर बड़े आदर से देखा ॥ ४४ ॥
प्रीत्या च परयोपेतो राघवः परवीरहा ।
बहुमानेन महता हनूमन्तमवैक्षत ॥ ४५ ॥
शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले श्रीरघुनाथजीने परम प्रत और महान् सम्मानके साथ हनुमान्जीकी ओर देखा ॥४५ ॥
सुन्दरकाण्डे चतुःषष्टितमः सर्गः ॥ ६४ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आरामायण आदिकाव्यके सुन्दरकाण्ड में चौंसठवाँ सगँ पूरा हुआ ॥ ६४ ॥
पञ्चषष्टितमः सर्गः हनुमानजी का श्रीराम को
ततः प्रस्त्रवणं शैलं ते गत्वा चित्रकाननम् ।
प्रणम्य शिरसा रामं लक्ष्मणं च महाबलम् ॥ १ ॥
युवराजं पुरस्कृत्य सुग्रीवमभिवाद्य च ।
प्रवृत्तिमथ सीतायाः प्रवक्तुमुपचक्रमुः ॥ २ ॥
तदनन्तर विचित्र काननोंसे सुशोभित प्रस्रवण पर्वतपर जाकर युवराज अङ्गदको आगे करके श्रीराम, महाबली लक्ष्मण तथा सुग्रीवको मस्तक झुकाकर प्रणाम करने के अनन्तर सब वानरोंने सीताका समाचार बताना आरम्भ किया ॥ १-२ ॥
रावणान्तःपुरे रोधं राक्षसीभिश्च तर्जनम् ।
रामे समनुरागं च यथा च नियमः कृतः ॥ ३ ॥
एतदाख्याय ते सर्व हरयो रामसंनिधौ ।
वैदेहीमक्षतां श्रुत्वा रामस्तूत्तरमब्रवीत् ॥ ४ ॥
' सीता देवी रावण के अन्तःपुर में रोक रक्खी गयी हैं । राक्षसियाँ उन्हें धमकाती रहती हैं । श्रीरामके प्रति उनका अनन्य अनुराग है । रावणने सीताके जीवित रहने के लिये केवल दो मास की अवधि दे रक्खी है । इस समय विदेह-सीताका समाचार सुनाना कुमारीको कोई क्षति नहीं पहुँची है — वे सकुशल हैं । " श्रीरामचन्द्रजी के निकट ये सब बातें बताकर वे वानर चुप हो गये । विदेहकुमारीके सकुशल होनेका वृत्तान्त सुनकर श्रीरामने आगेकी बात पूछते हुए कहा-- ॥ ३-४ ॥
क्व सीता वर्तते देवी कथं च मयि वर्तते ।
एतन्मे सर्वमाख्यात वैदेहीं प्रति वानराः ॥ ५ ॥
' वानरो! देवी सीता कहाँ हैं? मेरे प्रति उनका कैसा भाव है? विदेहकुमारीके विषयमें ये सारी बातें मुझसे कहो ' ॥ ५ ॥
रामस्य गदितं श्रुत्वा हरयो रामसंनिधौ ।
चोदयन्ति हनूमन्तं सीतावृत्तान्तकोविदम् ॥ ६ ॥
श्रीरामचन्द्रजीका यह कथन सुनकर वे वानर श्रीरामके निकट सीता के वृत्तान्तको अच्छी तरह जाननेवाले हनुमानजी -को उत्तर देने के लिये प्रेरित करने लगे ॥ ६ ॥
श्रुत्वा तु वचनं तेषां हनूमान् मारुतात्मजः ।
प्रणम्य शिरसा देव्यै सीतायै तां दिशं प्रति ॥ ७ ॥
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सुन्दरकाण्डे पञ्चषष्टितमः सर्गः १०४३ उन वानरोंकी बात सुनकर पवनपुत्र हनुमान् जी ने पहले देवी सीता के उद्देश्यसे दक्षिण दिशा की ओर मस्तक झुकाकर प्रणाम किया ॥ ७ ॥
उवाच वाक्यं वाक्यशः सीताया दर्शनं यथा ।
तं मणिकाञ्चनं दिव्यं दीप्यमानं स्वतेजसा ॥ ८ ॥
दत्त्वा रामाय हनुमांस्ततः प्राञ्जलिरब्रवीत् । फिर बातचीतकी कलाको जाननेवाले उन वानरवीरने सीताजीका दर्शन जिस प्रकार हुआ था, वह साग वृत्तान्त कह सुनाया । तत्पश्चात् अपने तेजसे प्रकाशित होनेवाली उस दिव्य काञ्चनमणिको भगवान् श्रीरामके हाथमें देकर हनुमानजी हाथ जोड़कर बोले - ॥ ८३ ॥
समुद्रं लङ्घयित्वाहं शतयोजनमायतम् ॥ ९ ॥
अगच्छं जानकी सीतां मार्गमाणो दिदृक्षया । " प्रभो! मैं जनकनन्दिनी सीता के दर्शनकी इच्छासे उनका पता लगाता हुआ सौ योजन विस्तृत समुद्रको लाँघकर उसके दक्षिण किनारे पर जा पहुँचा ॥ ९ ३ ॥ तत्र लङ्केति नगरी रावणस्य दुरात्मनः ॥ १० ॥
दक्षिणस्य समुद्रस्य तीरे वसति दक्षिणे । ‘ वहीं दुरात्मा रावणकी नगरी लङ्का है । वह समुद्रके दक्षिण तटपर बसी हुई है ॥ १०३ ॥
तत्र सीता मया दृष्टा रावणान्तःपुरे सती ॥ ११ ॥
त्वयि संन्यस्य जीवन्ती रामा राम मनोरथम् ।
दृष्टा मे राक्षसीमध्ये तर्ज्यमाना मुहुर्मुहुः ॥ १२ ॥
राक्षसीभिर्विरूपाभी रक्षिता प्रमदावने । ‘ श्रीराम! लङ्कामें पहुँचकर मैंने रावणके अन्तःपुरमें प्रमदावनके भीतर राक्षसियोंके बीचमें बैठी हुई सती - साध्वी सुन्दरी देवी सीताका दर्शन किया । वे अपनी सारी अभिलाषाओंको आपमें ही केन्द्रित करके किसी तरह जीवन धारण कर रही हैं । विकराल रूपवाली राक्षसियाँ उनकी रखवाली करती हैं और बारंबार उन्हें डाँटती- फटकारती रहती हैं ॥ ११-१२३ ॥ दुःखमापद्यते देवी त्वया वीर सुखोचिता ॥ १३ ॥
रावणान्तःपुरे रुद्धा राक्षसीभिः सुरक्षिता ।
एकवेणीधरा दीना त्वयि चिन्तापरायणा ॥ १४ ॥
‘ वीरवर! देवी सीता आपके साथ सुख भोगने के योग्य हैं, परंतु इस समय बड़े दुःखसे दिन बिता रही हैं । उन्हें रावण के अन्तःपुरमें रोक रक्खा गया है और वे राक्षसियोंके पहरे में रहती हैं । सिरपर एक वेणी धारण किये दुखी हो सदा आपकी चिन्तामें डूबी रहती हैं ।
अधःशय्या विवर्णाङ्गी पद्मिनीव हिमागमे ।
रावणाद् विनिवृत्तार्था मर्तव्य कृतनिश्चया ॥ १५ ॥
" वे नीचे भूमिपर सोती हैं । जैसे जाड़े के दिनोंमें पाला पड़नेके कारण कमलिनी सूख जाती है, उसी प्रकार उनके अङ्गोंकी कान्ति फीकी पड़ गयी है । रावणसे उनका कोई प्रयोजन नहीं है । उन्होंने प्राण त्याग देनेका निश्चय कर लिया है ॥ १५ ॥
देवी कथंचित् काकुत्स्थ त्वन्मना मार्गिता मया ।
इक्ष्वाकुवशविख्यातिं शनैः कीर्तयतानघ ॥ १६ ॥
सा मया नरशार्दूल शनैर्विश्वासिता तदा ।
ततः सम्भाषिता देवी सर्वमर्थे च दर्शिता ॥ १७ ॥
' ककुत्स्थ कुलभूषण! उनका मन निरन्तर आपमें ही लगा रहता है । निष्पाप नरश्रेष्ठ! मैंने बड़ा प्रयत्न करके किसी तरह महारानी सीताका पता लगाया और धीरे - धीरे इक्ष्वाकु वंशकी कीर्तिका वर्णन करते हुए किसी प्रकार उनके हृदयमें अपने प्रति विश्वास उत्पन्न किया । तत्पश्चात् देवी से वार्तालाप करके मैंने यहाँकी सब बातें उन्हें बतलायीं ॥ रामसुग्रीवसख्यं च श्रुत्वा हर्षमुपागता । नियतः समुदाचारो भक्तिश्चास्याः सदा त्वयि । १८ । ' आपकी सुग्रीवके साथ मित्रताका समाचार सुनकर उन्हें बड़ा हर्ष हुआ । उनका उच्चकोटिका आचार - विचार ( पातिव्रत्य ) सुदृढ़ है । वे सदा आपमें ही भक्ति रखती हैं ॥ १८ ॥
एवं मया महाभाग दृष्टा जनकनन्दिनी ।
उग्रेण तपसा युक्ता त्वद्भक्त्या पुरुषर्षभ ॥ १ ९ ॥
' महाभाग! पुरुषोत्तम! इस प्रकार जनकनन्दिनी को मैंने आपकी भक्ति से प्रेरित होकर कठोर तपस्या करते देखा है ॥ १ ९ ॥
अभिज्ञानं च मे दत्तं यथावृत्तं तवान्तिके ।
चित्रकूटे महाप्राज्ञ वायसं प्रति राघव ॥ २० ॥
' महामते । रघुनन्दन चित्रकूट में आपके पा देवी के रहते समय एक कौएको लेकर जो घटना घटित हुई थी, उस वृत्तान्तको उन्होंने पहचान के रूपमें मुझसे कहा था ॥ २० ॥
विज्ञाप्यः पुनरप्येष रामो वायुसुत त्वया ।
अखिलेन यथा दृष्टमिति मामाह जानकी ॥ २१ ॥
अयं चास्मै प्रदातव्यो यत्नात् सुपरिरक्षितः । ' जानकीजीने आते समय मुझसे कहा – ' वायुनन्दन! तुम यहाँ जैसी मेरी हालत देख चुके हो, वह सब भगवान् श्रीरामको बताना और इस मणिको बड़े यत्नसे सुरक्षितरूपमें ले जाकर उनके हाथमें देना ॥ २१३ ॥
ब्रुवता वचनान्येवं सुग्रीवस्योपशृण्वतः ॥ २२ ॥
एष चूडामणिः श्रीमान् मया ते यत्नरक्षितः ।
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१०४४ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे मनःशिलायास्तिलकं तत् स्मरस्येति चाब्रवीत् । २३ ।
एष निर्यातितः श्रीमान् मया ते वारिसम्भवः ।
एनं दृष्ट्वा प्रमोदिष्ये व्यसने त्वामिवानघ ॥ २४ ॥
“ ऐसे समय में देना, जब कि सुग्रीव भी निकट बैठकर तुम्हारी कही हुई बातें सुन रहे हों । साथ ही मेरी ये बातें भी उनसे निवेदन करना - प्रभो! आपकी दी हुई यह कान्तिमती चूडामणि मैंने बड़े यत्नले सुरक्षित रक्खी थी । जलसे प्रकट हुए इस दीप्तिमान् रत्नको मैंने आपकी सेवामें लौटाया है । निष्पाप रघुनन्दन । संकट के समय इसे देखकर मैं उसी प्रकार आनन्दमग्न हो जाती थी, जैसे आपके दर्शनसे आनन्दित होती हूँ । आपने मेरे ललाटमें जो
मैनसिलका तिलक लगाया था, इसको स्मरण कीजिये ।
ये बातें जानकी जी ने कही थीं ॥ २२-२४ ॥
जीवितं धारयिष्यामि मासं दशरथात्मज ।
ऊर्ध्व मासान्न जीवेयं रक्षसां वशमागता ॥ २५ ॥
' उन्होंने यह भी कहा - ' दशरथनन्दन! मैं एक मास और जीवन धारण करूँगी । उसके बाद राक्षसों के में पड़कर प्राण त्याग दूँगी – किसी तरह जीवित नहीं रह सकूँगी ' ॥ २५ ॥
' इति मामब्रवीत् सीता कृशाङ्गी धर्मचारिणी ।
रावणान्तःपुरे रुद्धा मृगीवोत्फुल्ललोचना ॥ ३६ ॥
' इस प्रकार दुबले - पतले शरीरवाली धर्मपरायणा सीताने मुझे आपसे कहने के लिये यह संदेश दिया था । वे रावण के अन्तःपुरमें कैद हैं और भयके मारे आँख फाड़ - फाड़कर इधर - उधर देखनेवाली हरिणीके समान वे सशङ्क दृष्टिसे सब ओर देखा करती हैं ॥ २६ ॥
एतदेव मयाऽऽख्यातं सर्व राघव यद् यथा ।
सर्वथा सागरजले संतारः प्रविधीयताम् ॥ २७ ॥
रघुनन्दन! यही वहाँका वृत्तान्त है, जो सब का सब मैंने आपकी सेवामें निवेदन कर दिया । अब सब प्रकार से समुद्रको पार करनेका प्रयत्न कीजिये ' ॥ २७ ॥
तो जाताश्वासौ राजपुत्रौ विदित्वा तच्चाभिज्ञानं राघवाय प्रदाय । देव्या चाख्यातं सर्वमेवानुपूर्व्याद् वाचा सम्पूर्ण वायुपुत्रः शशंस ॥ २८ ॥
राजकुमार श्रीराम और लक्ष्मणको कुछ आश्वासन मिल गया, ऐसा जानकर तथा वह पहचान श्रीरघुनाथजी के हाथमें देकर वायुपुत्र हनुमान्ने देवी सीताकी कही हुई सारी बातें क्रमशः अपनी वाणीद्वारा पूर्णरूपसे कह सुनायीं ॥ २८ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये सुन्दरकाण्डे पञ्चषष्टितमः सर्गः ॥ ६५ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षंरामायण आदिकाव्यके सुन्दरकाण्ड में पैंसठवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ६५ ॥
षट्षष्टितमः सर्गः चूडामणिको देखकर और सीताका समाचार पाकर श्रीरामका उनके लिये विलाप
एवमुक्तो हनुमता रामो दशरथात्मजः ।
तं मणि हृदये कृत्वा रुरोद सहलक्ष्मणः ॥ १ ॥
हनुमानजी के ऐसा कहनेपर दशरथनन्दन श्रीराम उस मणिको अपनी छाती से लगाकर रोने लगे । साथ ही लक्ष्मण भी रो पड़े ॥ १ ॥
तं तु दृष्ट्रा मणिश्रेष्ठं राघवः शोककर्शितः ।
नेत्राभ्यामश्रुपूर्णाभ्यां सुग्रीवमिदमब्रवीत् ॥ २ ॥
उस श्रेष्ठ मणिकी ओर देखकर शेकसे व्याकुल हुए श्रीरघुनाथजी अपने दोनों नेत्रोंमें आँसू भरकर सुग्रीवसे इस प्रकार बोले— ॥ २ ॥
यथैव धेनुः स्त्रवति स्नेहाद् वत्सस्य वत्सला ।
तथा ममापि हृदयं मणिश्रेष्ठस्य दर्शनात् ॥ ३ ॥
" मित्र! जैसे वत्सला धेनु अपने बछड़े के स्नेहसे थनोंसे दूध झरने लगती है, उसी प्रकार इस उत्तम मणिको देखकर आज मेरा हृदय भी द्रवीभूत हो रहा है ॥ ३ ॥
मणिरत्नमिदं दत्तं वैदेह्याः श्वशुरेण मे ।
वधूकाले यथा बद्धमधिकं मूर्ध्नि शोभते ॥ ४ ॥
' मेरे श्वशुर राजा जनकने विवाह के समय वैदेहीको यह मणिरत्न दिया था, जो उसके मस्तकपर आबद्ध होकर बड़ी शोभा पाता था ॥ ४ ॥
अयं हि जलसम्भूतो मणिः प्रवरपूजितः ।
यज्ञे परमतुष्टेन दत्तः शक्रेण धीमता ॥ ५ ॥
' जलसे प्रकट हुई यह मणि श्रेष्ठ देवताओंद्वारा पूजित है । किसी यज्ञमें बहुत संतुष्ट हुए बुद्धिमान् इन्द्रने राजा जनकको यह मणि दी थी ॥ ५ ॥
इमं दृष्ट्रा मणिश्रेष्ठं तथा तातस्य दर्शनम् ।
अद्यास्म्यवगतः सौम्य वैदेहस्य तथा विभोः ॥ ६ ॥
' सौम्य! इस मणिरत्नका दर्शन करके आज मुझे मानो
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सुन्दरकाण्डे सप्तषष्टितमः सर्गः १०४५ अपने पूज्य पिताका और विदेहराज महाराज जनकका भी दर्शन मिल गया हो, ऐसा अनुभव हो रहा है ॥ ६ ॥
अयं हि शोभते तस्याः प्रियाया मूर्ध्नि मे मणिः ।
अद्यास्य दर्शनेनाहं प्राप्तां तामिव चिन्तये ॥ ७ ॥
" यह मणि सदा मेरी प्रिया सीता के सीमन्तपर शोभा पाती थी । आज इसे देखकर ऐसा जान पड़ता है मानो सीता ही मुझे मिल गयी ॥ ७ ॥
किमाह सीता वैदेही ब्रूहि सौम्य पुनः पुनः ।
परासुमिव तोयेन सिञ्चन्ती वाक्यवारिणा ॥ ८ ॥
' सौम्य पवनकुमार! जैसे बेहोश हुए मनुष्यको होशमें लानेके लिये उसपर जलके छींटे दिये जाते हैं, उसी प्रकार विदेहनन्दिनी सीताने मूच्छित हुए - से मुझ रामको अपने वाक्यरूपी शीतल जलसे सींचते हुए क्या - क्या कहा है? यह बारंबार बताओ ' ॥ ८ ॥
इतस्तु किं दुःखतरं यदिमं वारिसम्भवम् ।
मणि पश्यामि सौमित्र वैदेहीमागतां विना ॥ ९ ॥
( अब वे लक्ष्मणसे बोले - ) ' सुमित्रानन्दन | सीताके यहाँ आये बिना ही जो जलसे उत्पन्न हुई इस मणिको मैं देख रहा हूँ | इससे बढ़कर दुःखकी बात और क्या हो सकती है ' ॥ ९ ॥
चिरं जीवति वैदेही यदि मासं धरिष्यति ।
क्षणं वीर न जीवेयं विना तामसितेक्षणाम् ॥ १० ॥
( फिर वे हनुमानजी से बोले ) ' वीर पवनकुमार! यदि विदेद्दनन्दिनी सीता एक मासतक जीवन धारण कर लेगी, तब तो वह बहुत समयतक जी रही है । मैं तो कजरारे नेत्रोंवाली जानकी के बिना अब एक क्षण भी जीवित नहीं रह सकता ॥ १० ॥
नय मामपि तं देशं यत्र दृष्टा मम प्रिया ।
न तिष्ठेयं क्षणमपि प्रवृत्तिमुपलभ्य च ॥ ११ ॥
' तुमने जहाँ मेरी प्रियाको देखा है, उसी देश में मुझे भी ले चलो । उसका समाचार पाकर अब मैं एक क्षण भी यहाँ नहीं रुक सकता ॥ ११ ॥
कथं सा मम सुश्रोणी भीरुभीरुः सती तदा ।
भयावहानां घोराणां मध्ये तिष्ठति रक्षसाम् ॥ १२ ॥
' हाय! मेरी सती - साध्वी सुमध्यमा सीता बड़ी भीरु है । वह उन घोर रूपधारी भयंकर राक्षसों के बीचमें कैसे रहती होगी १ ॥ १२ ॥
शारदस्तिमिरोन्मुक्तो नूनं चन्द्र इवाम्बुदैः ।
आवृतो वदनं तस्या न विराजति साम्प्रतम् ॥ १३ ॥
' निश्चय ही अन्धकारसे मुक्त किंतु बादलोंसे ढके हुए शरत्कालीन चन्द्रमाके समान सीताका मुख इस समय शोभा नहीं पा रहा होगा ॥ १३ ॥
किमाह सीता हनुमंस्तत्त्वतः कथयस्व मे ।
एतेन खलु जीविष्ये भेषजेनातुरो यथा ॥ १४ ॥
' हनुमन् | मुझे ठीक - ठीक बताओ, सीताने क्या - क्या कहा है? जैसे रोगी दवा लेनेसे जीता है, उसी प्रकार मैं सीता के इस संदेश वाक्यको सुनकर ही जीवन धारण करूँगा ॥ १४ ॥
मधुरा मधुरालापा किमाह मम भामिनी ।
मद्विहीना वरारोहा हनुमन् कथयस्व मे ।
दुःखाद् दुःखतरं प्राप्य कथं जीवति जानकी ॥ १५ ॥
' हनुमन् | मुझसे बिछुड़ी हुई मेरी सुन्दर कटिप्रदेश-वाली मधुरभाषिणी सुन्दरी प्रियतमा जनकनन्दिनी सीताने मेरे लिये कौन - सा संदेश दिया है? वह दुःख - पर-दुःख उठाकर भी कैसे जीवन धारण कर रही है? ' ॥१५ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकी आदिकाव्ये सुन्दरकाण्डे षट्षष्टितमः सर्गः ॥ ६६ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आरामायण आदिकाव्यके सुन्दरकाण्डमें छाछठवाँ सर्गं पूरा हुआ ॥ ६६ ॥
सप्तषष्टितमः सर्गः हनुमान् जीका भगवान् श्रीरामको सीताका संदेश सुनाना एवमुक्तस्तु हनुमान् राघवेण महात्मना । वे बोले - ' पुरुषोत्तम! जानकीदेवीने पहले चित्रकूट-सीताया भाषितं सर्वं न्यवेदयत राघवे ॥ १ ॥ पर बीती हुई एक घटनाका यथावत् रूपसे वर्णन किया था ।
महात्मा श्रीरघुनाथजीके ऐसा कहनेपर हनुमानजीने उसे उन्होंने पहचान के तौरपर इस प्रकार कहा था ॥ २ ॥
सीताजी की कही हुई सब बातें उनसे निवेदन कर दीं ॥१ ॥ सुखसुता त्वया साधें जानकी पूर्वमुत्थिता ।
देवी जानकी पुरुषर्षभ । वायसः सहसोत्पत्य विददार स्तनान्तरम् ॥ ३ ॥
इदमुक्तवती पूर्ववृत्तमभिज्ञानं चित्रकूटे यथातथम् ॥ २ ॥ ' पहले चित्रकूट में कभी जानकी देवी आपके साथ सुख-
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१०४६ श्रीमवाल्मीकीय रामायणे पूर्वक सोयी थीं । वे सोकर आपसे पहले उठ गयीं । उस समय किसी कौए ने सहसा उड़कर उनकी छाती में चोंच मार दी ॥ ३ ॥
पर्यायेण च सुप्तस्त्वं देव्यङ्के भरताग्रज ।
पुनश्च किल पक्षी स देव्या जनयति व्यथा ॥ ४ ॥
' भरताग्रज! आपलोग बारी - बारी से एक दूसरेके अङ्कर्मे सिर रखकर सोते थे । जब आप देवी के अङ्क में मस्तक रखकर सोये थे, उस समय पुनः उसी पक्षीने आकर देवीको कष्ट देना आरम्भ किया ॥ ४ ॥
ततः पुनरुपागम्य विददार भृशं किल ।
ततस्त्वं बोधितस्तस्याः शोणितेन समुक्षितः ॥ ५ ॥
' कहते हैं उसने फिर आकर जोरसे चोंच मार दी । तब देवीके शरीरसे रक्त बहने लगा और उससे भीग जाने के कारण आप जाग उठे ॥ ५ ॥
वायसेन च तेनैवं सततं बाध्यमानया ।
बोधितः किल देव्या त्वं सुखसुप्तः परंतप ॥ ६ ॥
' शत्रुओंको संताप देनेवाले रघुनन्दन । उस कौए ने जब लगातार इस तरह पीड़ा दी, तब देवी सीताने सुखसे सोये हुए आपको जगा दिया ॥ ६ ॥
तां च दृष्ट्रा महाबाहो दारितां च स्तनान्तरे ।
आशीविष इव क्रुद्धस्ततो वाक्यं त्वमूचिवान् ॥ ७ ॥
' महाबाहो! उनकी छातीमें घाव हुआ देख आप विषधर सपके समान कुपित हो उठे और इस प्रकार बोले - ॥ ७ ॥
नखाः केन ते भीरु दारितं वै स्तनान्तरम् ।
कः क्रीडति सरोषेण पञ्चवक्त्रेण भोगिना ॥ ८ ॥
“ भीरु! किसने अपने नखके अग्रभागसे तुम्हारी छाती में घाव कर दिया है? कौन कुपित हुए पाँच मुँहवाले सर्पके साथ खेल रहा है? ' ॥ ८ ॥
निरीक्षमाणः सहसा वायसं समुदेक्षथाः ।
नखैः सरुधिरैस्तीक्ष्णैस्तामेवाभिमुखं स्थितम् ॥ ९ ॥
' ऐसा कहकर आपने जब सहसा इधर - उधर दृष्टि डाली, तब उस कौए को देखा । उसके तीखे पंजे खूनमें रँगे हुए थे और वह सीता देवीकी ओर मुँह करके ही कहीं बैठा था ॥ ९ ॥
सुतः किल स शक्रस्य वायसः पततां वरः ।
धरान्तरगतः शीघ्रं पवनस्य गतौ समः ॥ १० ॥
" सुना है, उड़नेवालोंमें श्रेष्ठ वह कौआ साक्षात् इन्द्रका पुत्र था, जो उन दिनों पृथ्वीपर विचर रहा था । वह वायु-देवताके समान शीघ्रगामी था ॥ १० ॥
ततस्तस्मिन् महाबाहो कोपसंवर्तितेक्षणः ।
वायसे त्वं व्यधाः क्रूरां मति मतिमतां वर ॥ ११ ॥
" मतिमानों में श्रेष्ठ महाबाहो! उस समय आपके नेत्र क्रोधसे घूमने लगे और आपने उस कौएको कठोर दण्ड देनेका विचार किया ॥ ११ ॥
स दर्भसंस्तराद् गृह्य ब्रह्मास्त्रेण न्ययोजयः ।
स दीप्त इव कालाग्निर्जज्वालाभिमुखं खगम् ॥ १२ ॥
' आपने अपनी चटाई मेंसे एक कुशा निकालकर हाथमें ले लिया और उसे ब्रह्मास्त्र से अभिमन्त्रित किया । फिर तो वह कुरा प्रलयकालकी अग्निके समान प्रज्वलित हो उठा । उसका लक्ष्य वह कौआ ही था ॥ १२ ॥
सत्वं प्रदीप्तं चिक्षेप दर्भ तं वायसं प्रति ।
ततस्तु वायसं दीप्तः स दर्भोऽनुजगाम ह ॥ १३ ॥
' आपने उस जलते हुए कुशको कौएकी ओर छोड़ दिया । फिर तो वह दीप्तिमान् दर्भ उस कौएका पीछा करने लगा ॥ १३ ॥
भीतैश्च सम्परित्यक्तः सुरैः सर्वैश्च वायसः ।
त्रीलोकान् सम्परिक्रम्य त्रातारं नाधिगच्छति ॥ १४ ॥
' आपके भय से डरे हुए समस्त देवताओंने भी उस कौएको त्याग दिया । वह तीनों लोकोंमें चक्कर लगाता फिरा, किंतु कहीं भी उसे कोई रक्षक नहीं मिला ॥ १४ ॥
पुनरप्यागतस्तत्र त्वत्सकाशमरिंदम ।
त्वं तं निपतितं भूमौ शरण्यः शरणागतम् ॥ १५ ॥
वधार्हमपि काकुत्स्थ कृपया परिपालयः । ' शत्रुदमन श्रीराम! सब ओरसे निराश होकर वह कौआ फिर वहीं आपकी शरण में आया । शरण में आकर पृथ्वीपर पड़े हुए उस कौएको आपने शरणमें ले लिया; क्योंकि आप शरणागतवत्सल हैं । यद्यपि वह वधके योग्य था तो भी आपने कृपापूर्वक उसकी रक्षा की ॥ १५३ ॥
मोघमस्त्रं न शक्यं तु कर्तुमित्येव राघव ॥ १६ ॥
भवांस्तस्याक्षिकाकस्य हिनस्ति स्म स दक्षिणम् । ' रघुनन्दन! उस ब्रह्मास्त्रको व्यर्थ नहीं किया जा सकता था, इसलिये आपने उस कौएकी दाहिनी आँख फोड़ डाली ॥ १६३ ॥
राम त्वां स नमस्कृत्य राशो दशरथस्य च ॥ १७ ॥
विसृष्टस्तु तदा काकः प्रतिपेदे स्वमालयम् । ' श्रीराम | तदनन्तर आपसे विदा ले वह कौआ भूतल-पर आपको और स्वर्ग में राजा दशरथको नमस्कार करके अपने घरको चला गया ॥ १७३ ॥
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सुन्दरकाण्डे सप्तषष्टितमः सर्गः १०४७ एवमविदां श्रेष्ठः सत्त्ववाञ्छीलवानपि ॥ १८ ॥
किमर्थमस्त्रं रक्षःसु न योजयसि राघव । ' ( सीता कहती हैं - ) ' रघुनन्दन! इस प्रकार अस्त्र-वेत्ताओं में श्रेष्ठ, शक्तिशाली और शीलवान् होते हुए भी आप राक्षसोंपर अपने अस्त्रका प्रयोग क्यों नहीं करते हैं? ॥ १८३ ॥
न दानवा न गन्धर्वा नासुरा न मरुद्गणाः ॥ १ ९ ॥ तव राम रणे शक्तास्तथा प्रतिसमासितुम् । “ श्रीराम! दानव, गन्धर्व, असुर और देवता कोई भी समराङ्गणमें आपका सामना नहीं कर सकते ॥ १ ९ ३ ॥ तव वीर्यवतः कश्चिन्मयि यद्यस्ति सम्भ्रमः ॥ २० ॥
क्षिप्रं सुनिशितैर्बाणैर्हन्यतां युधि रावणः । “ आप बल - पराक्रमसे सम्पन्न हैं । यदि मेरे प्रति आपका कुछ भी आदर है तो आप शीघ्र ही अपने तीखे बार्णोसे रणभूमिमें रावणको मार डालिये ॥ २०३ ॥
भ्रातुरादेशमाज्ञाय लक्ष्मणो वा परंतपः ॥ २१ ॥
स किमर्थं नरवरो न मां रक्षति राघवः । “ हनुमन्! अथवा अपने भाईकी आज्ञा लेकर शत्रुओं-को संताप देनेवाले रघुकुलतिलक नरश्रेष्ठ लक्ष्मण क्यों नहीं मेरी रक्षा करते हैं? ॥ २१३ ॥
शक्तौ तौ पुरुषव्याघ्रौ वाय्वग्निसमतेजसौ ॥ २२ ॥
सुराणामपि दुर्धर्षो किमर्थ मामुपेक्षतः । “ वे दोनों पुरुषसिंह श्रीराम और लक्ष्मण वायु तथा अग्नि के तुल्य तेजस्वी एवं शक्तिशाली हैं, देवताओंके लिये भी दुर्जय हैं; फिर किसलिये मेरी उपेक्षा कर रहे हैं? ॥ २२३ ॥
मैव दुष्कृतं किंचिन्महदस्ति न संशयः ॥ २३ ॥
समर्थौ सहितौ यन्मां न रक्षेते परंतपौ । " इसमें संदेह नहीं कि मेरा ही कोई ऐसा महान् पाप है, जिसके कारण वे दोनों शत्रुसंतापी वीर एक साथ रहकर समर्थ होते हुए मेरी रक्षा नही कर रहे हैं ' ॥ २३३ ॥
वैदेह्या वचनं श्रुत्वा करुणं साधुभाषितम् ॥ २४ ॥
पुनरप्यहमाय तामिदं वचनमब्रुवम् । ' घुनन्दन | विदेहनन्दिनीका करुणाजनक उत्तम वचन सुनकर मैंने पुनः आर्या सीतासे यह बात कहो - ॥२४३ ॥
त्वच्छोकविमुखो रामो देवि सत्येन ते शपे ॥ २५ ॥
रामे दुःखाभिभूते च लक्ष्मणः परितप्यते । “ देवि! मैं सत्यकी शपथ खाकर कहता हूँ कि श्रीरामचन्द्रजी तुम्हारे शोकके कारण ही सब कार्योंसे विरत हो रहे हैं । श्रीरामके दुखी होनेसे लक्ष्मण भी संतप्त हो रहे हैं ॥ २५३ ॥
कथंचिद् भवती दृष्टा न कालः परिशोचितुम् ॥ २६ ॥
अस्मिन् मुहूर्ते दुःखानामन्तं द्रक्ष्यसि भामिनि । ' किसी तरह आपका दर्शन हो गया ( आपके निवास-स्थानका पता लग गया ), अतः अब शोक करनेका अवसर नहीं है । भामिनि! आप इसी मुहूर्तमें अपने सारे दुःखका अन्त हुआ देखेंगी ॥ २६३ ॥
तावुभौ नरशार्दूलौ राजपुत्रौ परंतपौ ॥ २७ ॥
त्वद्दर्शनकृतोत्साही लङ्कां भस्मीकरिष्यतः । ' शत्रुओं को संताप देनेवाले वे दोनों नरश्रेष्ठ राजकुमार आपके दर्शन के लिये उत्साहित हो लङ्कापुरीको जलाकर भस्म कर देंगे || २७३ ॥ इत्वा च समरे रौद्रं रावणं सहबान्धवम् ॥ २८ ॥
राघवस्त्वां वरारोहे स्वपुरीं नयिता ध्रुवम् । ‘ वरारोहे! समराङ्गणमें रौद्र राक्षस रावणको बन्धु-बान्धवसहित मारकर रघुनाथजी अवश्य ही आपको अपनी पुरीमें ले जायँगे ॥ २८३ ॥
यत् तु रामो विजानीयादभिज्ञानमनिन्दिते ॥ २ ९ ॥ प्रीतिसंजननं तस्य प्रदातुं तत् त्वमर्हसि । ‘ सती - साध्वी देवि | अब आप मुझे कोई ऐसी पहचान दीजिये, जिसे श्रीरामचन्द्रजी जानते हों और जो उनके मनको प्रसन्न करनेवाला हो ॥ २ ९ ३ ॥ साभिवीक्ष्य दिशः सर्वा वेण्युद्रथनमुत्तमम् ॥ ३० ॥
मुक्त्वा वस्त्राद् ददौ मह्यं मणिमेतं महाबल । ' महाबली वीर! तब उन्होंने चारों ओर देखकर वेणीमें बाँधने योग्य इस उत्तम मणिको अपने वस्त्रसे खोलकर मुझे दे दिया ॥ ३०३ ॥
प्रतिगृह्य मणि दोर्भ्यां तव हेतो रघुप्रिय ॥ ३१ ॥
शिरसा सम्प्रणम्यैनामहमागमने त्वरे । " रघुवंशियोंके प्रियतम श्रीराम! आपके लिये इस मणिको दोनों हाथोंमें लेकर मैंने सीतादेवीको मस्तक झुकाकर प्रणाम किया और यहाँ आनेके लिये मैं उतावला हो उठा ॥ ३ ९ ३ ॥ गमने च कृतोत्साहमवेक्ष्य वरवर्णिनी ॥ ३२ ॥
विवर्धमानं च हि मामुवाच जनकात्मजा ।
अश्रुपूर्णमुखी दीना बाष्पगद्गदभाषिणी ॥ ३३ ॥
ममोत्पतनसम्भ्रान्ता शोक वेगसमाहता ।
मामुवाच ततः सीता सभाग्योऽसि महाकपे ॥ ३४ ॥
यद् द्रक्ष्यसि महाबाहुं रामं कमललोचनम् ।
लक्ष्मणं च महाबाहुं देवरं मे यशखिनम् ॥ ३५ ॥
‘ लौटने के लिये उत्साहित हो मुझे अपने शरीरको बढ़ाते