Ramayana 2 — पृष्ठ 231–240

वाल्मीकि रामायण — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 231–240

पृष्ठ 231

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१०४८ श्रीमवाल्मीकीय रामायणे देख सुन्दरी जनकनन्दिनी सीता बहुत दुखी गयीं । उनके मुखपर आँसुओं की धारा बह चली । मेरी उछलने-की तैयारीसे वे घबरा गयीं और शोकके वेगसे आहत हो उठीं । उस समय उनका स्वर अश्रुगद्गद हो गया था । वे मुझसे कहने लगीं - ' महाकपे! तुम बड़े सौभाग्यशाली हो, जो मेरे महाबाहु प्रियतम कमलनयन श्रीरामको तथा मेरे यशस्वी देवर महाबाहु लक्ष्मणको भी अपनी आँखोंसे देखोगे ' ॥ ३२ -- ३५ ॥

सीतयाप्येवमुक्तोऽहमब्रुवं मैथिलीं तथा ।

पृष्ठमारोह मे देवि क्षिप्रं जनकनन्दिनि ॥ ३६ ॥

यावत्ते दर्शयाम्यद्य ससुग्रीवं सलक्ष्मणम् ।

राघवं च महाभागे भर्तारमसितेक्षणे ॥ ३७ ॥

' सीताजी के ऐसा कहने पर मैंने उन मिथिलेशकुमारीसे कहा --- - " देवि! जनकनन्दिनी! आप शीघ्र मेरी पीठपर चढ़ जाइये । महाभागे! श्यामलोचने! मैं अभी सुग्रीव और लक्ष्मणसहित आपके पतिदेव श्रीरघुनाथजीका आपको

दर्शन कराता हूँ ' । ३६-३७ ॥

साम्रवीन्मां ततो देवी नैष धर्मो महाकपे ।

यत्ते पृष्ठं सिषेवेऽहं स्ववशा हरिपुङ्गव ॥ ३८ ॥

' यह सुनकर सीतादेवी मुझसे बोलीं- ' महाकपे! वानर-शिरोमणे | मेरा यह धर्म नहीं है कि मैं अपने वशमें होती हुई भी स्वेच्छासे तुम्हारी पीठका आश्रय लूँ ॥ ३८ ॥

पुरा व यदहं वीर स्पृष्टा गात्रेषु रक्षसा ।

तत्राहं किं करिष्यामि कालेनोपनिपीडिता ॥ ३ ९ ॥

गच्छ त्वं कपिशार्दूल यत्र तौ नृपतेः सुतौ । वीर! पहले जो राक्षस रावण के द्वारा मेरे अङ्गका स्पर्श हो गया, उस समय वहाँ मैं क्या कर सकती थी? मुझे तो कालने ही पीड़ित कर रक्खा था । अतः वानर प्रवर! जहाँ वे दोनों राजकुमार हैं, वहाँ तुम जाओ ' ॥ ३ ९ ३ ॥ इत्येवं सा समाभाष्य भूयः संदेष्टुमा स्थिता ॥ ४० ॥

हनूमन् सिंह संकाशौ तावुभौ रामलक्ष्मणौ ।

सुग्रीवं च सहामात्यं सर्वान् ब्रूया अनामयम् ॥ ४१ ॥

" ऐसा कहकर वे फिर मुझे संदेश देने लगीं-' हनुमन्! सिंह के समान पराक्रमी उन दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मणसे, मन्त्रियोंसहित सुग्रीवसे तथा अन्य सब लोगों से भी मेरा कुशल- समाचार कहना और उनका पूछना ॥ ४०-४१ ॥

यथा च स महाबाहुर्मी तारयति राघवः ।

अस्माद्दुःखाम्बुसंरोधात् तत् त्वमाख्यातुमर्हसि ॥४२ ॥

" " तुम वहाँ ऐसी बात कहना, जिससे महाबाहु रघुनाथ-जी इस दुःखसागरसे मेरा उद्धार करें ॥ ४२ ॥

इदं च तीव्रं मम शोकवेगं रक्षोभिरेभिः परिभर्त्सनं च । ब्रूयास्तु रामस्य गतः समीपं शिवश्च तेऽध्वास्तु हरिप्रवीर ॥ ४३ ॥

" वानरों के प्रमुख वीर! मेरे इस तीव्र शोक - वेगको तथा इन राक्षसोंद्वारा जो मुझे डराया धमकाया जाता है,

इसको भी उन श्रीरामचन्द्रजीके पास जाकर कहना ।

तुम्हारा मार्ग मङ्गलमय हो ' ॥ ४३ ॥

एतत् तवार्या नृप संयता सा सीता वचः प्राह विषादपूर्वम् । एतच्च बुद्ध्वा गदितं यथा त्वं श्रद्धत्स्व सीतां कुशलां समग्राम् ॥ ४४ ॥

' नरेश्वर! आपकी प्रियतमा संयमशीला आर्या सीताने बड़े विषाद के साथ ये सारी बातें कही हैं । मेरी कही हुई इन सब बातोंपर विचार करके आप विश्वास करें कि सतीशिरोमणि सीता सकुशल हैं ' ॥ ४४ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये सुन्दरकाण्डे सप्तषष्टितमः सर्गः ॥ ६७ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आरामायण आदिकाव्य के सुन्दरकाण्ड में सरसठवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ६७ ॥

अष्टषष्टितमः सर्गः हनुमानजी का सीताके संदेह और अपनेद्वारा उनके निवारणका वृत्तान्त बताना अथाहमुत्तरं देव्या पुनरुक्तः ससम्भ्रमम् । कारण देवी सीताने मेरा सत्कार करके जानेके लिये उतावले तव स्नेहान्नरव्याघ्र सौहार्दादनुमान्य च ॥ १ ॥ हुए मुझसे पुनः यह उत्तम बात कही ॥ १ ॥

' पुरुषसिंह रघुनन्दन! आपके प्रति स्नेह और सौहार्द के एवं बहुविधं वाच्यो रामो दाशरथिस्त्वया ।

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सुन्दरकाण्डे अष्टषष्टितमः सर्गः १०४ ९ यथा मां प्राप्नुयाच्छीघ्रं हत्वा रावणमाहवे ॥ २ ॥

“ “ पवनकुमार | तुम दशरथनन्दन भगवान् श्रीरामसे अनेक प्रकारसे ऐसी बातें कहना, जिससे वे समराङ्गणमें शीघ्र ही रावणका वध करके मुझे प्राप्त कर लें ॥ २ ॥

यदि वा मन्यसे वीर वसैकाद्दमरिंदम ।

कस्मिंश्चित् संवृते देशे विश्रान्तः श्वो गमिष्यसि ॥३ ॥

" शत्रुओं का दमन करनेवाले वीर! यदि तुम ठीक समझो

तो यहाँ किसी गुप्त स्थानमें एक दिनके लिये ठहर जाओ ।

आज विश्राम करके कल सबेरे यहाँ से चले जाना ॥ ३ ॥

मम चाप्यल्पभाग्यायाः सांनिध्यात् तव वानर ।

अस्य शोकविपाकस्य मुहूर्त स्याद् विमोक्षणम् ॥ ४ ॥

" वानर! तुम्हारे निकट रहनेसे मुझ मन्दभागिनीको इस शोकविपाकसे थोड़ी देर के लिये भी छुटकारा मिल जाय ॥४ ॥

गते हि त्वयि विक्रान्ते पुनरागमनाय वै 1 प्राणानामपि संदेहो मम स्थान्नात्र संशयः ॥ ५ ॥

“ तुम पराक्रमी वीर हो । जब पुनः आनेके लिये यहाँसे चले जाओगे, तब मेरे प्राणोंके लिये भी संदेह उपस्थित हो जायगा । इसमें संशय नहीं है ॥ ५ ॥

तवादर्शनजः शोको भूयो मां परितापयेत् ।

दुखाद् दुःखपराभूतां दुर्गतां दुःखभागिनीम् ॥ ६ ॥

" तुम्हें न देखने से होनेवाला शोक दुःख - पर - दुःख उठाने-से पराभव तथा दुर्गतिमें पड़ी हुई मुझ दुखियाको और भी संताप देता रहेगा ॥ ६ ॥

अयं च वीर संदेहस्तिष्ठतीव ममाग्रतः ।

सुमहांस्त्वत्सहायेषु हयृक्षेषु हरीश्वर ॥ ७ ॥

कथं नु खलु दुष्पारं तरिष्यन्ति महोदधिम् ।

तानि हर्यक्ष सैन्यानि तौ वा नरवरात्मजौ । ८ ॥

" वीर! वानरराज! मेरे सामने यह महान् संदेह - सा खड़ा हो गया है कि तुम जिनके सहायक हो, उन वानरों और भालुओं के होते हुए भी रीछों और वानरोंकी वे सेनाएँ तथा वे दोनों राजकुमार श्रीराम और लक्ष्मण इस अपार पारावार-को कैसे पार करेंगे १ ॥ ७-८ ॥

त्रयाणामेव भूतानां सागरस्यास्य लङ्घने ।

शक्तिः स्याद् वैनतेयस्य वायोर्वा तव चानघ ॥ ९ ॥

“ निष्पाप पवनकुमार! तीन ही भूतोंमें इस समुद्रको लाँघनेकी शक्ति देखी जाती है— विनतानन्दन गरुड़ में, वायु-देवतामें और तुममें ॥ ९ ॥

तदस्मिन् कार्यनियोंगे वीरैवं दुरतिक्रमे ।

किं पश्यसि समाधानं ब्रूहि कार्यविदां वर ॥ १० ॥

वा ० रा ० ५.८.६-" वीर! जब इस प्रकार इस कार्यका साधन दुष्कर हो गया है, तब इसकी सिद्धिके लिये तुम कौन - सा समाधान ( उपाय ) देखते हो | कार्यसिद्धि के उपाय जाननेवालोंमें तुम श्रेष्ठ हो, अतः मेरी बातका उत्तर दो ॥ १० ॥

काममस्य त्वमेवैकः कार्यस्य परिसाधने ।

पर्याप्तः परवीरघ्न यशस्यस्ते बलोदयः ॥ ११ ॥

" विपक्षी वीरोंका नाश करनेवाले कपिश्रेष्ठ! इसमें संदेह नहीं कि इस कार्यकी सिद्धि के लिये तुम अकेले ही बहुत हो, तथापि तुम्हारे बलका यह उद्रेक तुम्हारे लिये ही यशकी वृद्धि करनेवाला होगा ( श्रीराम के लिये नहीं ) ॥ ११ ॥

बलैः समग्रैर्यदि मां हत्वा रावणमाहवे ।

विजयी स्वपुरी रामो नयेत् तत् स्याद् यशस्करम् ॥ १२ ॥

“ यदि श्रीराम अपनी सम्पूर्ण सेना के साथ यहाँ आकर युद्ध में रावण को मार डालें और विजयी होकर मुझे अपनी पुरीको ले चलें तो यह उनके लिये यशकी वृद्धि करनेवाला होगा ॥ १२ ॥

यथाहं तस्य वीरस्य वनादुपधिना हृता ।

रक्षसा तद्भयादेव तथा नार्हति राघवः ॥ १३ ॥

" जिस प्रकार राक्षस रावणने वीरवर भगवान् श्रीरामके भयसे ही उनके सामने न जाकर छलपूर्वक वनसे मेरा अप-हरण किया था, उस तरह श्रीरघुनाथजीको मुझे नहीं प्राप्त करना चाहिये ( वे रावणको मारकर ही मुझे ले चलें ) ॥१३ ॥

बलैस्तु संकुलां कृत्वा लङ्कां परबलार्दनः ।

मां नयेद्यदि काकुत्स्थस्तत् तस्य सदृशं भवेत् ॥ १४ ॥

“ “ शत्रु सेनाका संहार करने वाले ककुत्स्थ कुलभूषण श्रीराम यदि अपने सैनिकोंद्वारा लङ्काको पददलित करके मुझे अपने साथ ले जायें तो यह उनके योग्य पराक्रम होगा ॥ १४ ॥

तद् यथा तस्य विक्रान्तमनुरूपं महात्मनः ।

भवत्याहवशूरस्य तथा त्वमुपपादय ॥ १५ ॥

" महात्मा श्रीराम संग्राममें शौर्य प्रकट करनेवाले हैं, अतः जिस प्रकार उनके अनुरूप पराक्रम प्रकट हो सके, वैसा ही उपाय तुम करो ' ॥ १५ ॥

तदर्थोपहितं वाक्यं प्रश्रितं हेतुसंहितम् ।

निशम्याहं ततः शेषं वाक्यमुत्तरमब्रवम् ॥ १६ ॥

" सीतादेवी के उस अभिप्राययुक्त, विनयपूर्ण और युक्ति-संगत वचनको सुनकर अन्तमें मैंने उन्हें इस प्रकार उत्तर दिया - ॥ १६ ॥

देवि हर्यक्ष सैन्यानामीश्वरः प्लवतां वरः ।

सुग्रीवः सत्त्वसम्पन्नस्त्वदर्थे कृतनिश्चयः ॥ १७ ॥

" देवि । वानर और भालुओंकी सेनाके स्वामी कपिश्रेष्ठ

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१०५० श्रीमद्वाल्मीकीय रामायणे सुग्रीव बड़े शक्तिशाली हैं । वे आपका उद्धार करनेके लिये दृढ़ निश्चय कर चुके हैं ॥ १७ ॥

तस्य विक्रमसम्पन्नाः सत्त्ववन्तो महाबलाः ।

मनःसंकल्पसदृशा निदेशे हरयः स्थिताः ॥ १८ ॥

" उनके पास पराक्रमी, शक्तिशाली और महाबली वानर हैं, जो मन के संकल्प के समान तीव्र गति से चलते हैं । वे सब - के - सब सदा उनकी आज्ञा के अधीन रहते हैं ॥ १८ ॥

येषां नोपरि नाधस्तान तिर्यक् सज्जते गतिः ।

न च कर्मसु सीदन्ति महत्स्वमिततेजसः ॥ १ ९ ॥

“ नीचे, ऊपर और अगल - बगलमें कहीं भी उनकी गति नहीं रुकती है । वे अमिततेजस्वी वानर बड़े - से - बड़े कार्य आ पड़नेवर भी कभी शिथिल नहीं होते हैं ॥ १ ९ ॥

असकृत् तैर्महाभागैर्वानरैर्बलसंयुतैः ।

प्रदक्षिणीकृता भूमिर्वायुमार्गानुसारिभिः ॥ २० ॥

" वायुमार्ग ( आकाश ) का अनुसरण करनेवाले उन महाभाग बलवान् वानरोंने अनेक बार इस पृथ्वी की परिक्रमा की है ॥ २० ॥

मद्विशिष्टाइच तुल्याइच सन्ति तत्र वनौकसः ।

मत्तः प्रत्यवरः कश्चिन्नास्ति सुग्रीवसंनिधौ ॥ २१ ॥

“ वहाँ मुझसे बढ़कर तथा मेरे समान शक्तिशाली बहुत - से वानर हैं । सुग्रीवके पास कोई ऐसा वानर नहीं है, जो मुझ से किसी बात में कम हो ॥ २१ ॥

अहं तावदिह प्राप्तः किं पुनस्ते महाबलाः ।

नहि प्रकृष्टाः प्रेष्यन्ते प्रेष्यन्ते हीतरे जनाः ॥ २२ ॥

" " जब मैं ही यहाँ आ गया, तब फिर उन महाबली वानरों के आने में क्या संदेह हो सकता है? आप जानती होंगी कि दूत या घावन बनाकर वे ही लोग भेजे जाते हैं, जो निम्न-श्रेणीके होते हैं । अच्छी श्रेणी के लोग नहीं भेजे जाते ॥ २२ ॥

तदलं परितापेन देवि मन्युरपैतु ते ।

एकोत्पातेन ते लङ्कामेष्यन्ति हरियूथपाः ॥ २३ ॥

" अतः देवि! अब संताप करने की आवश्यकता नहीं है । आपका मानसिक दुःख दूर हो जाना चाहिये । वे वानर-यूथपति एक ही छलाँग लङ्कामें पहुँच जायँगे ॥ २३ ॥

मम पृष्ठगतौ तौ च चन्द्रसूर्याविवोदितौ ।

त्वत्सकाशं महाभागे नृसिंहावागमिष्यतः ॥ २४ ॥

“ महाभागे! वे पुरुषसिंह श्रीराम और लक्ष्मण भी उदयाचलपर उदित होनेवाले चन्द्रमा और सूर्यकी भाँति मेरी पीठपर बैठकर आपके पास आ जायँगे ॥ २४ ॥

अरिघ्नं सिंहसंकाशं क्षिप्रं द्रक्ष्यसि राघवम् ।

लक्ष्मणं च धनुष्मन्तं लङ्काद्वारमुपागतम् ॥ २५ ॥

" आप शीघ्र ही देखेंगी कि सिंहके समान पराक्रमी शत्रु-नाशक श्रीराम और लक्ष्मण हाथमें धनुष लिये लङ्काके द्वार-पर आ पहुँचे हैं ॥ २५ ॥

नखदंष्ट्रायुधान् वीरान् सिंहशार्दूलविक्रमान् । वानरान् वारणेन्द्राभान् क्षिप्रं द्रक्ष्यसि संगतान् । २६ । " नख और दाढ़े ही जिनके आयुध हैं, जो सिंह और वाचके समान पराक्रमी हैं तथा बड़े - बड़े गजराजोंके समान जिनकी विशाल काया है, उन वीर वानरोंको आप शीघ्र ही यहाँ एकत्र हुआ देखेंगी ॥ २६ ॥

शैलाम्बुदनि काशानां लङ्कामलयसानुषु ।

नर्दतां कपिमुख्यानां नचिराच्छ्रोष्य से स्वनम् ॥ २७ ॥

" लङ्कावत मलयपर्वत के शिखरोंपर पहाड़ों और मेघों के समान विशाल शरीरवाले प्रधान प्रधान वानर आकर गर्जना करेंगे और आप शीघ्र ही उनका सिंहनाद सुनेंगी ॥ २७ ॥

निवृत्तवनवासं च त्वया सार्धमरिंदमम् ।

अभिषिक्तमयोध्यायां क्षिप्रं द्रक्ष्यसि राघवम् ॥ २८ ॥

" आपको जल्दी ही यह देखनेका भी सौभाग्य प्राप्त होगा कि शत्रुओं का दमन करनेवाले श्रीरघुनाथजी वनवास की अवधि पूरी करके आपके साथ अयोध्या में जाकर वहाँके राज्य-पर अभिषिक्त हो गये हैं ' ॥ २८ ॥

ततो मया वाग्भिरदीनभाषिणी शिवाभिरिष्टाभिरभिप्रसादिता । वाह शान्ति मम मैथिलात्मजा तवातिशोकेन तथातिपीडिता ॥ २ ९ ॥ " आपके अत्यन्त शोकसे बहुत ही पीड़ित होनेपर भी जिनकी वाणी में कभी दीनता नहीं आने पाती, उन मिथिलेश-कुमारीको जब मैंने प्रिय एवं मङ्गलमय वचनद्वारा सान्त्वना देकर प्रसन्न किया, तब उनके मनको कुछ शान्ति मिली ' ॥ २ ९ ॥ इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये सुन्दरकाण्डेऽष्टषष्टितमः सर्गः ॥ ६८ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आरामायण आदिकाव्यके सुन्दरकाण्डमें अड़सठवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ६८ ॥

सुन्दरकाण्डं सम्पूर्णम्

पृष्ठ 234

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पृष्ठ 235

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।हैं रहे कर अनुरोध लिये होनेके आरूढ रथपर श्रीरामसे भगवान् 144 मातलि सारथि -इन्द्र

पृष्ठ 236

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॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः ॥ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम् युद्धकाण्डम् प्रथमः सर्गः हनुमानजी की प्रशंसा करके श्रीरामका उन्हें हृदयसे लगाना और समुद्रको पार करने के

श्रुत्वा हनूमतो वाक्यं यथावदभिभाषितम् ।

रामः प्रीतिसमायुक्तो वाक्यमुत्तरमब्रवीत् ॥ १ ॥

हनुमान्जीके द्वारा यथावत्रूपसे कहे हुए इन वचनोंको सुनकर भगवान् श्रीराम बड़े प्रसन्न हुए और इस प्रकार उत्तम वचन बोले- ॥ १ ॥

कृतं हनूमता कार्य सुमहद् भुवि दुर्लभम् ।

मनसापि यदन्येन न शक्यं धरणीतले ॥ २ ॥

' हनुमान्ने बड़ा भारी कार्य किया है । भूतलपर ऐसा कार्य होना कठिन है । इस भूमण्डलमें दूसरा कोई तो ऐसा कार्य करने की बात मनके द्वारा सोच भी नहीं सकता ॥ २ ॥

नहि तं परिपश्यामि यस्तरेत महोदधिम् ।

अन्यत्र गरुडाद् वायोरन्यत्र च हनूमतः ॥ ३ ॥

' गरुड़, वायु और हनुमान्को छोड़कर दूसरे किसी को मैं ऐसा नहीं देखता, जो महासागरको लाँघ सके ॥ ३ ॥

देवदानवयक्षाणां गन्धर्वोरगरक्षसाम् ।

अप्रधृष्यां पुरीं लङ्कां रावणेन सुरक्षिताम् ॥ ४ ॥

प्रविष्टः सत्त्वमाश्रित्य जीवन को नाम निष्क्रमेत् । ' देवता, दानव, यक्ष, गन्धर्व, नाग और राक्षस इनमें से किसीके लिये भी जिसपर आक्रमण करना असम्भव है तथा जो रावणके द्वारा भलीभाँति सुरक्षित है, उस लङ्कापुरीमें अपने बलके भरोसे प्रवेश करके कौन वहाँसे जीवित निकल सकता है? ॥ ४३ ॥

को विशेत् सुदुराधर्षो राक्षसैश्च सुरक्षिताम् ॥ ५ ॥

यो वीर्यबलसम्पन्नो न समः स्याद्धनूमतः । ' जो हनुमान् के समान बल - पराक्रमसे सम्पन्न न हो, ऐसा कौन पुरुष राक्षसोंद्वारा सुरक्षित अत्यन्त दुर्जय लङ्कामें प्रवेश कर सकता है ॥ ५३ ॥

भृत्यकार्य हनुमता सुग्रीवस्य कृतं महत् ।

एवं विधाय स्वबलं सदृशं विक्रमस्य च ॥ ६ ॥

लिये चिन्तित होना " हनुमान्ने समुद्र - लङ्घन आदि कार्योंके द्वारा अपने पराक्रमके अनुरूप बल प्रकट करके एक सच्चे सेवकके योग्य सुग्रीवका बहुत बड़ा कार्यं सम्पन्न किया है ॥ ६ ॥

यो हि भृत्यो नियुक्तः सन् भर्त्रा कर्मणि दुष्करे ।

कुर्यात् तदनुरागेण तमाहुः पुरुषोत्तमम् ॥ ७ ॥

" जो सेवक स्वामीके द्वारा किसी दुष्कर कार्यमें नियुक्त होनेपर उसे पूरा करके तदनुरूप दूसरे कार्यको भी ( यदि वह मुख्य कार्यका विरोधी न हो ) सम्पन्न करता है, वह सेवकोंमें उत्तम कहा गया है ॥ ७ ॥

यो नियुक्तः परं कार्य न कुर्यान्नृपतेः प्रियम् ।

भृत्यो युक्तः समर्थश्च तमाहुर्मध्यमं नरम् ॥ ८ ॥

" जो एक कार्य में नियुक्त होकर योग्यता और सामर्थ्य होनेपर भी स्वामीके दूसरे प्रिय कार्यको नहीं करता ( स्वामीने जितना कहा है, उतना ही करके लौट आता है ) वह मध्यम श्रेणीका सेवक बताया गया है ॥ ८ ॥

नियुक्तो नृपतेः कार्य न कुर्याद् यः समाहितः ।

भृत्यो युक्तः समर्थश्च तमाहुः पुरुषाधमम् ॥ ९ ॥

' जो सेवक मालिकके किसी कार्य में नियुक्त होकर अपने में योग्यता और सामर्थ्य के होते हुए भी उसे सावधानीसे पूरा नहीं करता, वह अधम कोटिका कहा गया है ॥ ९ ॥

तन्नियोगे नियुक्तेन कृतं कृत्यं हनूमता ।

न चात्मा लघुतां नीतः सुग्रीवश्चापि तोषितः ॥ १० ॥

' हनुमान्ने स्वामीके एक कार्यमें नियुक्त होकर उसके साथ ही दूसरे महत्त्वपूर्ण कार्योंको भी पूरा किया, अपने गौरवमें भी कमी नहीं आने दी अपने - आपको दूसरों की दृष्टिमें छोटा नहीं बनने दिया और सुग्रीवको भी पूर्णतः संतुष्ट कर दिया ॥ १० ॥

अहं च रघुवंशश्व लक्ष्मणश्च महाबलः ।

वैदेह्या दर्शनेनाद्य धर्मतः परिरक्षिताः ॥ ११ ॥

पृष्ठ 237

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१०५२ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे ' आज हनुमान्ने विदेहनन्दिनी सीताका पता लगाकर उन्हें अपनी आँखों देखकर धर्मके अनुसार मेरी, समस्त रघुवंशकी और महाबली लक्ष्मण की भी रक्षा है ॥ ११ ॥

इदं तु मम दीनस्य मनो भूयः प्रकर्षति ।

यदिहास्य प्रियाख्यातुर्न कुर्मि सदृशं प्रियम् ॥ १२ ॥

‘ आज मेरे पास पुरस्कार देने योग्य वस्तुका अभाव है, यह बात मेरे मनमें बड़ी कसक पैदा कर रही है कि यहाँ जिसने मुझे ऐसा प्रिय संवाद सुनाया, उसका मैं कोई वैसा ही प्रिय कार्य नहीं कर पा रहा हूँ ॥ १२ ॥

एष सर्वस्वभूतस्तु परिष्वङ्गो हनूमतः ।

मया कालमिमं प्राप्य दत्तस्तस्य महात्मनः ॥ १३ ॥

" इस समय इन महात्मा हनुमान्को मैं केवल अपना प्रगाढ़ आलिङ्गन प्रदान करता हूँ, क्योंकि यही मेरा सर्वस्व है ' ॥ १३ ॥

इत्युक्त्वा प्रीतिहृष्टाङ्गो रामस्तं परिषस्वजे ।

कृतात्मानं कृतकार्यमुपागतम् ॥ १४ ॥

हनूमन्तं ऐसा कहते - कहते रघुनाथजीके अङ्ग - प्रत्यङ्ग प्रेमसे पुलकित हो गये और उन्होंने अपनी आज्ञाके पालनमें सफलता पाकर लौटे हुए पवित्रात्मा हनुमानजीको हृदयसे लगा लिया ॥ १४ ॥

ध्यात्वा पुनरुवाचेदं वचनं रघुसत्तमः ।

हरीणामीश्वरस्यापि सुग्रीवस्योपशृण्वतः ॥ १५ ॥

फिर थोड़ी देरतक विचार करके रघुवंशशिरोमणि श्रीराम-ने वानरराज सुग्रीवको सुनाकर यह बात कही ॥ १५ ॥

सर्वथा सुकृतं तावत् सीतायाः परिमार्गणम् ।

सागरं तु समासाद्य पुनर्नष्टं मनो मम ॥ १६ ॥

' बन्धुओ! सीताकी खोजका काम तो सुचारुरूपसे सम्पन्न हो गया; किंतु समुद्रतककी दुस्तरताका विचार करके मेरे मनका उत्साह फिर नष्ट हो गया ॥ १६ ॥

कथं नाम समुद्रस्य दुष्पारस्य महाम्भसः ।

हरयो दक्षिणं पारं गमिष्यन्ति समागताः ॥ १७ ॥

' महान् जलराशिसे परिपूर्ण समुद्रको पार करना बड़ा ही कठिन काम है । यहाँ एकत्र हुए ये वानर समुद्रके दक्षिण तटपर कैसे पहुँचेंगे ॥ १७ ॥

यद्यप्येष तु वृत्तान्तो वैदेह्या गदितो मम ।

समुद्रपारगमने हरीणां किमिवोत्तरम् ॥ १८ ॥

' मेरी सीताने भी यही संदेह उठाया था, जिसका वृत्तान्त अभी - अभी मुझसे कहा गया है । इन वानरोंके समुद्रके पार जानेके विषय में जो प्रश्न खड़ा हुआ है, उसका वास्तविक उत्तर क्या है? ' || १८ |

इत्युक्त्वा शोकसम्भ्रान्तो रामः शत्रुनिबर्हणः ।

हनूमन्तं महाबाहुस्ततो ध्यानमुपागमत् ॥ १ ९ ॥

हनुमानजीसे ऐसा कहकर शत्रुसूदन महाबाहु श्रीराम शोकाकुल होकर बड़ी चिन्तामें पड़ गये ॥ १ ९ ॥ इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये युद्धकाण्डे प्रथमः सर्गः ॥ १ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्ड में पहला सगँ पूरा हुआ ॥ १ ॥

द्वितीयः सर्गः सुग्रीवका श्रीरामको

तं तु शोकपरिधूनं रामं दशरथात्मजम् ।

उवाच वचनं श्रीमान् सुग्रीवः शोकनाशनम् ॥ १ ॥

इस प्रकार शोकसे संतप्त हुए दशरथनन्दन श्रीरामसे सुग्रीवने उनके शोकका निवारण करनेवाली बात कही ॥१ ॥

किं त्वया तप्यते वीर यथान्यः प्राकृतस्तथा ।

मैवं भूस्त्यज संतापं कृतघ्न इव सौहृदम् ॥ २ ॥

' वीरवर! आप दूसरे साधारण मनुष्योंकी भाँति क्यों संताप कर रहे हैं? आप इस तरह चिन्तित न हों । जैसे कृतघ्न पुरुष सौहार्द को त्याग देता है, उसी तरह आप भी इस संतापको छोड़ दें ॥ २ ॥

संतापस्य च ते स्थानं नहि पश्यामि राघव ।

प्रवृत्तावुपलब्धायां ज्ञाते च निलये रिपोः ॥ ३ ॥

उत्साह प्रदान करना " रघुनन्दन! जब सीताका समाचार मिल गया और शत्रु-के निवास स्थान का पता लग गया, तब मुझे आपके इस दुःख • और चिन्ताका कोई कारण नहीं दिखायी देता ॥ ३ ॥

मतिमाञ्शास्त्रवित् प्राज्ञः पण्डितश्चासि राघव ।

त्यजेमां प्राकृतां बुद्धिं कृतात्मेवार्थदूषिणीम् ॥ ४ ॥

' रघुकुलभूषण आप बुद्धिमान्, शास्त्रोंके ज्ञाता, विचारकुशल और पण्डित हैं, अतः कृतात्मा पुरुषकी भाँति इस अर्थदूषक प्राकृत बुद्धिका परित्याग कर दीजिये ॥ ४ ॥

समुद्रं लङ्घयित्वा तु महानक्रसमाकुलम् ।

लङ्कामारोहयिष्यामो हनिष्यामश्च रिपुम् ॥ ५ ॥

' बड़े - बड़े नाकोंसे भरे हुए समुद्रको लाँघकर हमलोग लङ्कापर चढ़ाई करेंगे और आपके शत्रुको नष्ट कर डालेंगे ।

पृष्ठ 238

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श्रीराम सुग्रीवको लङ्कापर चढ़ाई करनेके लिये उत्साहित कर रहे हैं

पृष्ठ 239

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पृष्ठ 240

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युद्धकाण्डे द्वितीयः सर्गः १०५३

निरुत्साहस्य दीनस्य शोकपर्याकुलात्मनः ।

सर्वार्था व्यवसीदन्ति व्यसनं चाधिगच्छति ॥ ६ ॥

' जो पुरुष उत्साहशून्य, दीन और मन - ही - मन शोकसे व्याकुल रहता है, उसके सारे काम बिगड़ जाते हैं और वह बड़ी विपत्ति में पड़ जाता है ॥ ६ ॥

इमे शूराः समर्थाश्च सर्वतो हरियूथपाः ।

त्वत्प्रियार्थ कृतोत्साहाः प्रवेष्टुमपि पावकम् ।

एषां हर्षेण जानामि तर्कश्चापि दृढो मम ॥ ७ ॥

“ ये वानरयूथपति सब प्रकारसे समर्थं एवं शूरवीर हैं । आपका प्रिय करनेके लिये इनके मनमें बड़ा उत्साह है । ये आपके लिये जलती आगमें भी प्रवेश कर सकते हैं । समुद्रको लाँघने और रावणको मारनेका प्रसंग चलनेपर इनका मुँह प्रसन्नतासे खिल जाता है । इनके इस हर्ष और उत्साहसे ही बताता हूँ तथा इस विषय में मेरा अपना तर्क ( निश्चय ) भी सुदृढ़ है ॥ ७ ॥

विक्रमेण समानेष्ये सीतां हत्वा यथा रिपुम् ।

रावणं पापकर्माणं तथा त्वं कर्तुमर्हसि ॥ ८ ॥

' आप ऐसा कीजिये, जिससे हमलोग पराक्रमपूर्वक अपने शत्रु पापाचारी रावणका वध करके सीताको यहाँ ले आवें ॥

सेतुरत्र यथा वद्ध्येद् यथा पश्येम तां पुरीम् ।

तस्य राक्षसराजस्य तथा त्वं कुरु राघव ॥ ९ ॥

‘ रघुनन्दन! आप ऐसा कोई उपाय कीजिये, जिससे समुद्रपर सेतु बँध सके और हम उस राक्षसराजकी लङ्कापुरीको देख सकें ॥ ९ ॥

तां हि पुरीं लङ्कां त्रिकूटशिखरे स्थिताम् ।

हतं च रावणं युद्धे दर्शनादवधारय ॥ १० ॥

' त्रिकूट पर्वत के शिखरपर बसी हुई लङ्कापुरी एक बार दीख जाय तो आप यह निश्चित समझिये कि युद्धमें रावण दिखायी दिया और मारा गया ॥ १० ॥

अबद्ध्वा सागरे सेतुं घोरे च वरुणालये ।

लङ्का न मर्दितुं शक्या सेन्द्रैरपि सुरासुरैः ॥ ११ ॥

‘ वरुणके निवासभूत घोर समुद्रपर पुल बाँधे बिना तो इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवता और असुर भी लङ्काको पददलित नहीं कर सकते ॥ ११ ॥

सेतुबन्धः समुद्रे च यावल्लङ्कासमीपतः ।

सर्व तीर्ण च मे सैन्यं जितमित्युपधारय ।

इमे हि समरे वीरा हरयः कामरूपिणः ॥ १२ ॥

' अतः जब लङ्का निकटतक समुद्रपर पुल बँध जायगा, तब हमारी सारी सेना उस पार चली जायगी । फिर तो आप यही समझिये कि अपनी जीत हो गयी; क्योंकि इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले ये वानर युद्धमें बड़ी वीरता दिखाने-वाले हैं ॥ १२ ॥

तदलं विक्लवां बुद्धिं राजन् सर्वार्थनाशिनीम् ।

पुरुषस्य हि लोकेऽस्मिञ्शोकः शौर्यापकर्षणः ॥ १३ ॥

' अतः राजन्! आप इस व्याकुल बुद्धिका आश्रय न लें-बुद्धिकी इस व्याकुलताको त्याग दें; क्योंकि यह समस्त कार्यों को बिगाड़ देनेवाली है और शोक इस जगत् में पुरुषके शौर्यको नष्ट कर देता है ॥ १३ ॥

यत् तु कार्ये मनुष्येण शौटीर्यमवलम्ब्यताम् ।

तदलंकरणायैव कर्तुर्भवति सत्वरम् ॥ १४ ॥

" मनुष्यको जिसका आश्रय लेना चाहिये, उस शौर्यका ही वह अवलम्बन करे; क्योंकि वह कर्ताको शीघ्र ही अलंकृत कर देता है — उसके अभीष्ट फलकी सिद्धि करा देता है ॥ १४ ॥

अस्मिन् काले महाप्राज्ञ सत्त्वमातिष्ठ तेजसा ।

शूराणां हि मनुष्याणां त्वद्विधानां महात्मनाम् ।

विनष्टे वा प्रणष्टे वा शोकः सर्वार्थनाशनः ॥ १५ ॥

' अतः महाप्राज्ञ श्रीराम! आप इस समय तेजके साथ ही धैर्यका आश्रय लें । कोई वस्तु खो गयी हो या नष्ट हो गयी हो, उसके लिये आप - जैसे शूरवीर महात्मा पुरुषोंको शोक नहीं करना चाहिये; क्योंकि शोक सब कामको बिगाड़ देता है ॥ १५ ॥

तत्त्वं बुद्धिमतां श्रेष्ठः सर्वशास्त्रार्थकोविदः ।

मद्विधैः सचिवैः सार्धमरिं जेतुं समर्हसि ॥ १६ ॥

' आप बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ और सम्पूर्ण शास्त्रोंके मर्मज्ञ हैं । अतः हम जैसे मन्त्रियों एवं सहायकोंके साथ रहकर अवश्य ही शत्रु पर विजय प्राप्त कर सकते हैं ॥ १६ ॥

नहि पश्याम्यहं कंचित् त्रिषु लोकेषु राघव ।

गृहीतधनुषो यस्ते तिष्ठेदभिमुखो रणे ॥ १७ ॥

" रघुनन्दन! मुझे तो तीनों लोकोंमें ऐसा कोई वीर नहीं दिखायी देता, जो रणभूमिमें धनुष लेकर खड़े हुए आपके सामने ठहर सके ॥ १७ ॥

वानरेषु समासक्तं न ते कार्य विपत्स्यते ।, अचिराद् द्रक्ष्यसे सीतां तीर्त्वा सागरमक्षयम् ॥ १८ ॥

" वानरोंपर जिसका भार रक्खा गया है, आपका वह कार्य बिगड़ने नहीं पायेगा । आप शीघ्र ही इस अक्षय समुद्रको पार करके सीताका दर्शन करेंगे ॥ १८ ॥

तदलं शोकमालम्ब्य क्रोधमालम्ब भूपते ।

निश्चेष्टाः क्षत्रिया मन्दाः सर्वे चण्डस्य बिभ्यति ॥ १ ९ ॥

' पृथ्वीनाथ! अपने हृदयमें शोकको स्थान देना व्यर्थ है । इस समय तो आप शत्रुओंके प्रति क्रोध धारण कीजिये ।