Ramayana 2 — पृष्ठ 241–250

वाल्मीकि रामायण — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 241–250

पृष्ठ 241

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१०५४ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे जो क्षत्रिय मन्द ( क्रोधशून्य ) होते हैं, उनसे कोई चेष्टा नहीं बन पाती; परंतु जो शत्रुके प्रति आवश्यक रोषसे भरा होता है, उससे सब डरते हैं ॥ १ ९ ॥

लङ्घनार्थं च घोरस्य समुद्रस्य नदीपतेः ।

सहास्माभिरिहोपेतः सूक्ष्मबुद्धिर्विचारय ॥ २० ॥

‘ नदियोंके स्वामी घोर समुद्रको पार करनेके लिये क्या उपाय किया जाय, इस विषय में आप हमारे साथ बैठकर विचार कीजिये; क्योंकि आपकी बुद्धि बड़ी सूक्ष्म है ॥ २० ॥

लङ्घिते तत्र तैः सैन्यैर्जितमित्येव निश्चिनु ।

सर्व तीर्णं च मे सैन्यं जितमित्यवधार्यताम् ॥ २१ ॥

" यदि हमारे सैनिक समुद्रको लाँघ गये तो यही निश्चय रखिये कि अपनी जीत अवश्य होगी । सारी सेनाका समुद्रके उस पार पहुँच जाना ही अपनी विजय समझिये ॥ २१ ॥

इमे हि हरयः शूराः समरे कामरूपिणः ।

तानरीन् विधमिष्यन्ति शिलापादपवृष्टिभिः ॥ २२ ॥

“ ये वानर संग्राममें बड़े शूरवीर हैं और इच्छानुसार रूप धारण कर सकते हैं । ये पत्थरों और पेड़ोंकी वर्षा करके ही उन शत्रुओंका संहार कर डालेंगे ॥ २२ ॥

कथंचित् परिपश्यामि लङ्घितं वरुणालयम् ।

हतमित्येव तं मन्ये युद्धे शत्रुनिबर्हण ॥ २३ ॥

' शत्रुसूदन श्रीराम! यदि किसी प्रकार मैं इस वानर-सेनाको समुद्रके उस पार पहुँची देख सकूँ तो मैं रावणको युद्धमें मरा हुआ ही समझता हूँ ॥ २३ ॥

किमुक्त्वा बहुधा चापि सर्वथा विजयी भवान् ।

निमित्तानि च पश्यामि मनो मे सम्प्रहृष्यति ॥ २४ ॥

' बहुत कहनेसे क्या लाभ? मेरा तो विश्वास है कि आप सर्वथा विजयी होंगे; क्योंकि मुझे ऐसे ही शकुन दिखायी देते हैं और मेरा हृदय भी हर्ष एवं उत्साहसे भरा है ' ॥ २४ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये युद्धकाण्डे द्वितीयः सर्गः ॥ २ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आषैरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें दूसरा सगँ पूरा हुआ ॥ २ ॥

761 तृतीयः सर्गः हनुमान जीका लंका के दुर्ग, फाटक, सेना - विभाग और संक्रम आदिका वर्णन करके भगवान् श्रीरामसे सेनाको कूच करने की

सुग्रीवस्य वचः श्रुत्वा हेतुमत् परमार्थवत् ।

प्रतिजग्राह काकुत्स्थो हनूमन्तमथाब्रवीत् ॥ १ ॥

सुग्रीवके ये युक्तियुक्त और उत्तम अभिप्रायसे पूर्ण वचन सुनकर श्रीरामचन्द्रजीने उन्हें स्वीकार किया और फिर हनुमानजी से कहा ॥ १ ॥

तपसा सेतुबन्धेन सागरोच्छोषणेन च ।

सर्वथापि समर्थोऽस्मि सागरस्यास्य लङ्घने ॥ २ ॥

“ मैं तपस्यासे पुल बाँधकर और समुद्रको सुखाकर सब प्रकारसे महासागरको लाँघ जानेमें समर्थ हूँ ॥ २ ॥

कति दुर्गाणि दुर्गाया लङ्कायास्तद् ब्रवीष्व मे ।

ज्ञातुमिच्छामि तत् सर्वे दर्शनादिव वानर ॥ ३ ॥

‘ वानरवीर! तुम मुझे यह तो बताओ कि उस दुर्गम लङ्कापुरीके कितने दुर्ग हैं । मैं देखे हुएके समान उसका सारा विवरण स्पष्टरूपसे जानना चाहता हूँ ॥ ३ ॥

बलस्य परिमाणं च द्वारदुर्गक्रियामपि ।

गुप्तिकर्म च लङ्काया रक्षसां सदनानि च ॥ ४ ॥

यथासुखं यथावच्च लङ्कायामसि दृष्टवान् ।

सर्वमाचक्ष्व तत्त्वेन सर्वथा कुशलो ह्यसि ॥ ५ ॥

" तुमने रावणकी सेनाका परिमाण, पुरीके दरवाजोंको आज्ञा देनेके लिये प्रार्थना करना दुर्गम बनानेके साधन, लङ्काकी रक्षाके उपाय तथा राक्षसोंके भवन – इन सबको सुखपूर्वक यथावत् रूपसे वहाँ देखा है । अतः इन सबका ठीक - ठीक वर्णन करो; क्योंकि तुम सब प्रकारसे कुशल हो ' ॥। ४-५ ॥

श्रुत्वा रामस्य वचनं हनूमान् मारुतात्मजः ।

वाक्यं वाक्यविदां श्रेष्ठो रामं पुनरथाब्रवीत् ॥ ६ ॥

श्रीरघुनाथजीका यह वचन सुनकर वाणीके मर्म को समझनेवाले विद्वानोंमें श्रेष्ठ पवनकुमार हनुमान्ने श्रीरामसे फिर कहा ॥ ६ ॥

श्रूयतां सर्वमाख्यास्ये दुर्गकर्म विधानतः ।

गुप्ता पुरी यथा लङ्का रक्षिता च यथा बलैः ॥ ७ ॥

राक्षसाश्च यथा स्निग्धा रावणस्य च तेजसा ।

परां समृद्धिं लङ्कायाः सागरस्य च भीमताम् ॥ ८ ॥

विभागं च बलौघस्य निर्देशं वाहनस्य च ।

एवमुक्त्वा कपिश्रेष्ठः कथयामास तत्त्वतः ॥ ९ ॥

‘ भगवन्! सुनिये । मैं सब बातें बता रहा हूँ । लङ्का दुर्ग किस विधिसे बने हैं, किस प्रकार लङ्कापुरीकी रक्षाकी व्यवस्था की गयी है, किस तरह वह सेनाओंसे सुरक्षित है, रावण के तेजसे प्रभावित हो राक्षस उसके प्रति कैसा स्नेह रखते

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युद्धकाण्डे तृतीयः सर्गः १०५५ हैं, लङ्काकी समृद्धि कितनी उत्तम है, समुद्र कितना भयंकर है, पैदल सैनिकोंका विभाग करके कहाँ कितने सैनिक रखे गये हैं और वहाँके वाहनोंकी कितनी संख्या है — इन सब बातोंका मैं वर्णन करूँगा । ऐसा कहकर कपिश्रेष्ठ हनुमान्ने वहाँकी बातोंको ठीक - ठीक बताना आरम्भ किया ॥ ७ - ९ ॥

हृष्टप्रमुदिता लङ्का मत्तद्विपसमाकुला ।

महती रथसम्पूर्णा रक्षोगणनिषेविता ॥ १० ॥

“ प्रभो! लङ्कापुरी हर्ष और आमोद - प्रमोदसे पूर्ण है । वह विशाल पुरी मतवाले हाथियोंसे व्याप्त तथा असंख्य रथोंसे भरी हुई है । राक्षसों के समुदाय सदा उसमें निवास करते हैं ॥

पा महापरिघवन्ति च ।

चत्वारि विपुलान्यस्या द्वाराणि सुमहान्ति च ॥ ११ ॥

' उस पुरीके चार बड़े - बड़े दरवाजे हैं, जो बहुत लंबे-चौड़े हैं । उनमें बहुत मजबूत किवाड़ लगे हैं और मोटी - मोटी अलाएँ हैं ॥ ११ ॥

तत्रेषूपलयन्त्राणि बलवन्ति महान्ति च ।

आगतं प्रतिसैन्यं तैस्तत्र प्रतिनिवार्यते ॥ १२ ॥

' उन दरवाजों पर बड़े विशाल और प्रबल यन्त्र लगे हैं । जो तीर और पत्थरोंके गोले बरसाते हैं । उनके द्वारा आक्रमण करनेवाली शत्रुसेनाको आगे बढ़नेसे रोका जाता है ॥ १२ ॥

द्वारेषु संस्कृता भीमाः कालायसमयाः शिताः ।

शतशो रचिता वीरैः शतघ्न्यो रक्षसां गणैः ॥ १३ ॥

" जिन्हें वीर राक्षसगणोंने बनाया है, जो काले लोहेकी बनी हुई, भयंकर और तीखी हैं तथा जिनका अच्छी तरह संस्कार किया गया है, ऐसी सैकड़ों शतध्नियाँ ( लोहेके काँटों-से भरी हुई चार हाथ लंबी गदाएँ ) उन दरवाजोंपर सजाकर रक्खी गयी हैं ॥ १३ ॥

सौवर्णस्तु महांस्तस्याः प्राकारो दुष्प्रधर्षणः ।

मणिविद्रुमवैदूर्यमुकाविरचितान्तरः ॥ १४ ॥

" उस पुरीके चारों ओर सोनेका बना हुआ बहुत ऊँचा परकोटा है, जिसको तोड़ना बहुत ही कठिन है । उसमें मणि, मूँगे, नीलम और मोतियोंका काम किया गया है ॥ १४ ॥

सर्वतश्च महाभीमाः शीततोया महाशुभाः ।

अगाधा ग्राहवत्यश्च परिखा मीनसेविताः ॥ १५ ॥

“ परकोटोंके चारों ओर महाभयंकर, शत्रुओंका महान् अमङ्गल करनेवाली, ठंडे जलसे भरी हुई और अगाध गहराईसे युक्त कई खाइयाँ बनी हुई हैं, जिनमें ग्राह और बड़े - बड़े मत्स्य निवास करते हैं ॥ १५ ॥

१. शतघ्नी च चतुर्हस्ता लोहकंटकिनी गदा । इति वैजयन्ती ।

द्वारेषु तासां चत्वारः संक्रमाः परमायताः ।

यन्त्रैरुपेता बहुभिर्महद्भिर्गृहपङ्क्तिभिः ॥ १६ ॥

' उक्त चारों दरवाजोंके सामने उन खाइयोंपर मचानोंके रूपमें चार संक्रमे ( लकड़ीके पुल ) हैं, जो बहुत ही विस्तृत । उनमें बहुत - से बड़े - बड़े यन्त्र लगे हुए हैं और उनके आस - पास परकोटेपर बने हुए मकानोंकी पंक्तियाँ हैं ॥ १६ ॥

त्रायते संक्रमास्तत्र परसैन्यागते सति ।

यन्त्रैस्तैरवकीर्यन्ते परिखासु समन्ततः ॥ १७ ॥

' जब शत्रुकी सेना आती है, तब यन्त्रोंके द्वारा उन संक्रमोंकी रक्षा की जाती है तथा उन यन्त्रोंके द्वारा ही उन्हें सब ओर खाइयोंमें गिरा दिया जाता है और वहाँ पहुँची हुई शत्रु सेनाओं को भी सब ओर फेंक दिया जाता है ॥ १७ ॥

एकस्त्वकम्प्यो बलवान् संक्रमः सुमहादृढः ।

काञ्चनैर्बहुभिः स्तम्भैर्वेदिकाभिश्च शोभितः ॥ १८ ॥

' उनमें से एक संक्रम तो बड़ा ही सुदृढ़ और अभेद्य है । वहाँ बहुत बड़ी सेना रहती है और वह सोनेके अनेक खंभों तथा चबूतरोंसे सुशोभित है ॥ १८ ॥

स्वयं प्रकृतिमापन्नो युयुत्सू राम रावणः ।

उत्थितश्चाप्रमत्तश्च बलानामनुदर्शने ॥ १ ९ ॥

" घुनाथजी! रावण युद्धके लिये उत्सुक होता हुआ स्वयं कभी क्षुब्ध नहीं होता स्वस्थ एवं धीर बना रहता है । वह सेनाओं के बारंबार निरीक्षणके लिये सदा सावधान एवं उद्यत रहता है ॥ १ ९ ॥

लङ्का पुनर्निरालम्बा देवदुर्गा भयावहा ।

नादेयं पार्वतं वान्यं कृत्रिमं च चतुर्विधम् ॥ २० ॥

' लङ्कापर चढ़ाई करनेके लिये कोई अवलम्ब नहीं है । वह पुरी देवताओंके लिये भी दुर्गम और बड़ी भयावनी है । उसके चारों ओर नदी, पर्वत, वन और कृत्रिम ( खाई, परकोटा आदि ) ये चार प्रकारके दुर्ग हैं ॥ २० ॥

स्थिता पारे समुद्रस्य दूरपारस्य राघव ।

नौपथश्चापि नास्त्यत्र निरुद्देशश्च सर्वतः ॥ २१ ॥

' घुनन्दन! वह बहुत दूरतक फैले हुए समुद्रके दक्षिण किनारे पर बसी हुई है । वहाँ जानेके लिये नावका भी मार्ग नहीं है; क्योंकि उसमें लक्ष्यका भी किसी प्रकार पता रहना सम्भव नहीं है || २१ | शैला रचिता दुर्गा सा पूर्देवपुरोपमा । १. मालूम होता है ' संक्रम ' इस प्रकारके पुल थे, जिन्हें जब आवश्यकता होती, तभी यन्त्रद्वारा गिरा दिया जाता था । इसी से शत्रुकी सेना आनेपर उसे खाई में गिरा देनेकी बात कही गयी है ।

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१०५६ श्रीमवाल्मीकीय रामायणे वाजिवाणसम्पूर्णा लङ्का परमदुर्जया ॥ २२ ॥

' वह दुर्गम पुरी पर्वतके शिखरपर बसायी गयी है और देवपुरीके समान सुन्दर दिखायी देती है, हाथी, घोड़ोंसे भरी हुई वह लङ्का अत्यन्त दुर्जय है ॥ २२ ॥

परिखाश्च शतघ्न्यश्च यन्त्राणि विविधानि च ।

शोभयन्ति पुरीं लङ्कां रावणस्य दुरात्मनः ॥ २३ ॥

" खाइयाँ, शतघ्नियाँ और तरह - तरह के यन्त्र दुरात्मा रावणकी उस लङ्कानगरी की शोभा बढ़ाते हैं ॥ २३ ॥

अयुतं रक्षसामत्र पूर्वद्वारं समाश्रितम् ।

शूलहस्ता दुराधर्षाः सर्वे खड्गाग्रयोधिनः ॥ २४ ॥

‘ लङ्काके पूर्व द्वारपर दस हजार राक्षस रहते हैं, जो सब - के-सब हाथोंमें शूल धारण करते हैं । वे अत्यन्त दुर्जय और युद्ध-के मुहाने पर तलवारोंसे जूझनेवाले हैं ॥ २४ ॥

नियुतं रक्षसामत्र दक्षिणद्वारमाश्रितम् ।

चतुरङ्गेण सैन्येन योधास्तत्राप्यनुत्तमाः ॥ २५ ॥

' लङ्काके दक्षिण द्वारपर चतुरंगिणी सेनाके साथ एक लाख राक्षस योद्धा डटे रहते हैं । वहाँके सैनिक भी बड़े बहादुर हैं ॥ २५ ॥

प्रयुतं रक्षसामत्र पश्चिमद्वारमाश्रितम् ।

चर्मखतधराः सर्वे तथा सर्वास्त्रकोविदाः ॥ २६ ॥

' पुरीके पश्चिम द्वारपर दस लाख राक्षस निवास करते हैं । वे सब - के - सब ढाल और तलवार धारण करते हैं तथा सम्पूर्ण अस्त्रोंके ज्ञानमें निपुण हैं ॥ २६ ॥

म्यर्बुदं रक्षसामत्र उत्तरद्वारमाश्रितम् ।

रथिनश्चाश्ववाहाश्च कुलपुत्राः सुपूजिताः ॥ २७ ॥

" उस पुरीके उत्तर द्वारपर एक अर्बुद ( दस करोड़ ) राक्षस रहते हैं । जिनमें से कुछ तो रथी हैं और कुछ घुड़-सवार । वे सभी उत्तम कुलमें उत्पन्न और अपनी वीरताके लिये प्रशंसित हैं ॥ २७ ॥

शतशोऽथ सहस्राणि मध्यमं स्कन्धमाश्रिताः ।

यातुधाना दुराधर्षाः साग्रकोटिश्च रक्षसाम् ॥ २८ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये ' ङ्का मध्यभागी छावनी में सैकड़ों सहस्र दुर्जय राक्षस रहते हैं, जिनकी संख्या एक करोड़से अधिक है । ते मया संक्रमा भग्नाः परिखाश्चावपूरिताः ।

दग्धा च नगरी लङ्का प्राकाराश्चावसादिताः ।

बलैकदेशः क्षपितो राक्षसानां महात्मनाम् ॥ २ ९ ॥

" किंतु मैंने उन सब संक्रमोंको तोड़ डाला है, खाइयाँ पाट दी हैं, लङ्कापुरीको जला दिया है और उसके परकोटोंको भी धराशायी कर दिया है । इतना ही नहीं, वहाँके विशाल-काय राक्षसोंकी सेनाका एक चौथाई भाग नष्ट कर डाला है ।

येन केन तु मार्गेण तराम वरुणालयम् ।

हतेति नगरी लङ्का वानरैरुपधार्यताम् ॥ ३० ॥

" हमलोग किसी - न - किसी मार्ग या उपायसे एक बार समुद्रको पार कर लें; फिर तो लङ्काको वानरोंके द्वारा नष्ट हुई ही समझिये ॥ ३० ॥

अङ्गदो द्विविदो मैन्दो जाम्बवान् पनसो नलः ।

नीलः सेनापतिश्चैव बलशेषेण किं तव ॥ ३१ ॥

' अङ्गद, द्विविद, मैन्द, जाम्बवान्, पनस, नल और सेनापति नील- इतने ही वानर लङ्काविजय करनेके लिये पर्याप्त हैं । बाकी सेना लेकर आपको क्या करना है? ॥ ३१ ॥

लवमाना हि गत्वा तां रावणस्य महापुरीम् ।

सपर्वतवनां भित्त्वा सखातां च सतोरणाम् ।

सप्राकारां सभवनामानयिष्यन्ति राघव ॥ ३२ ॥

' घुनन्दन! ये अङ्गद आदि वीर आकाशमें उछलते-कूदते हुए रावणकी महापुरी लङ्कामें पहुँचकर उसे पर्वत, वन, खाई, दरवाजे, परकोटे और मकानोंसहित नष्ट करके सीताजी-को यहाँ ले आयेंगे ॥ ३२ ॥

एवमाज्ञापय क्षिप्रं बलानां सर्वसंग्रहम् ।

मुहूर्तेन तु युक्तेन प्रस्थानमभिरोचय ॥ ३३ ॥

' ऐसा समझकर आप शीघ्र ही समस्त सैनिकोंको सम्पूर्ण आवश्यक वस्तुओंका संग्रह करके कूच करनेकी आज्ञा दीजिये और उचित मुहूर्तसे प्रस्थानकी इच्छा कीजिये ॥ ३३ ॥

आदिकाव्ये युद्धकाण्डे तृतीयः सर्गः ॥ ३ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्धरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्ड में तीसरा सगँ पूरा हुआ ॥ ३ ॥

चतुर्थः सर्गः श्रीराम आदिके साथ वानर सेनाका प्रस्थान और समुद्र - तटपर उसका पड़ाव श्रुत्वा हनूमतो वाक्यं यथावदनुपूर्वशः । हनुमानजी के वचनोंको क्रमशः यथावत् रूपसे सुनकर ततोऽब्रवीन्महातेजा रामः सत्यपराक्रमः ॥ १ ॥ सत्यपराक्रमी महातेजस्वी भगवान् श्रीरामने कहा ॥ १ ॥

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युद्धकाण्डे चतुर्थः सर्गः १०५७

यन्निवेदयसे लङ्कां पुरीं भीमस्य रक्षसः ।

क्षिप्रमेनां वधिष्यामि सत्यमेतद् ब्रवीमि ते ॥ २ ॥

' हनुमन्! मैं तुमसे सच कहता हूँ तुमने उस भयानक राक्षसकी जिस लङ्कापुरीका वर्णन किया है, उसे मैं शीघ्र ही नष्ट कर डालूँगा || २ |

अस्मिन् मुहूर्ते सुग्रीव प्रयाणमभिरोचय ।

युक्तो मुहूर्ते विजये प्राप्तो मध्यं दिवाकरः ॥ ३ ॥

" सुग्रीव! तुम इसी मुहूर्तमें प्रस्थानकी तैयारी करो । सूर्यदेव दिनके मध्य भागमें जा पहुँचे हैं । इसलिये इस विजय नामक मुहूर्त में हमारी यात्रा उपयुक्त होगी ॥ ३ ॥

सीतां हत्वा तु तद् यातु क्वासौ यास्यति जीवितः ।

सीता श्रुत्वाभियानं मे आशामेष्यति जीविते ।

जीवितान्तेऽमृतं स्पृष्ट्वा पीत्वामृतमिवातुरः ॥ ४ ॥

' रावण सीताको हरकर ले जाय; किंतु वह जीवित बचकर कहाँ जायगा? सिद्ध आदिके मुँहसे लङ्कापर मेरी चढ़ाईका समाचार सुनकर सीताको अपने जीवनकी आशा बँध जायगी; ठीक उसी तरह जैसे जीवनका अन्त उपस्थित होनेपर यदि रोगी अमृतका ( अमृतत्वके साधनभूत दिव्य ओषधिका ) स्पर्श कर अथवा अमृतोपम द्रवभूत ओषधिको पी ले तो उसे जीनेकी आशा हो जाती है ॥ ४ ॥

उत्तराफाल्गुनी द्य श्वस्तु हस्तेन योक्ष्यते ।

अभिप्रयाम सुग्रीव सर्वानीकसमावृताः ॥ ५ ॥

' आज उत्तराफाल्गुनी नामक नक्षत्र है । कल चन्द्रमाका हस्त नक्षत्रसे योग होगा । इसलिये सुग्रीव! हमलोग आज ही सारी सेनाओंके साथ यात्रा कर दें ॥ ५ ॥

निमित्तानि च पश्यामि यानि प्रादुर्भवन्ति वै ।

निहत्य रावणं सीतामानयिष्यामि जानकीम् ॥ ६ ॥

‘ इस समय जो शकुन प्रकट हो रहे हैं और जिन्हें मैं देख रहा हूँ, उनसे यह विश्वास होता है कि मैं अवश्य ही रावणका वध करके जनकनन्दिनी सीताको ले आऊँगा ॥ ६ ॥

उपरिष्टाद्धि नयनं स्फुरमाणमिमं मम ।

विजयं समनुप्राप्तं शंसतीव मनोरथम् ॥ ७ ॥

" इसके सिवा मेरी दाहिनी आँखका ऊपरी भाग फड़क १. दिनमें दोपहरीके समय अभिजित् मुहूर्त होता है, इसी रहा है । वह भी मानो मेरी विजय प्राप्ति और मनोरथसिद्धि-को सूचित कर रहा है ' || ७ ||

ततो वानरराजेन लक्ष्मणेन सुपूजितः ।

उवाच रामो धर्मात्मा पुनरप्यर्थकोविदः ॥ ८ ॥

यह सुनकर वानरराज सुग्रीव तथा लक्ष्मणने भी उनका बड़ा आदर किया । तत्पश्चात् अर्थवेत्ता ( नीतिनिपुण ) धर्मात्मा श्रीरामने फिर कहा- ॥ ८ ॥

अग्रे यातु बलस्यास्य नीलो मार्गमवेक्षितुम् ।

वृतः शतसहस्रेण वानराणां तरखिनाम् ॥ ९ ॥

" इस सेना के आगे - आगे एक लाख वेगवान् वानरों से घिरे हुए सेनापति नील मार्ग देखनेके लिये चलें ॥ ९ ॥

फलमूलवता नील शीतकाननवारिणा ।

पथा मधुमता चाशु सेनां सेनापते नय ॥ १० ॥

" सेनापति नील! तुम सारी सेनाको ऐसे मार्गसे शीघ्रता-पूर्वक ले चलो, जिसमें फल - मूलकी अधिकता हो, शीतल छायासे युक्त सघन वन हो, ठंडा जल मिल सके और मधु भी उपलब्ध हो सके ॥ १० ॥

दूषयेयुर्दुरात्मानः पथि मूलफलोदकम् ।

राक्षसाः पथि रक्षेथास्तेभ्यस्त्वं नित्यमुद्यतः ॥ ११ ॥

" सम्भव है दुरात्मा राक्षस रास्तेके फल - मूल और जलको विष आदिसे दूषित कर दें, अतः तुम मार्ग में सतत सावधान रहकर उनसे इन वस्तुओंकी रक्षा करना ॥ ११ ॥

निम्नेषु वनदुर्गेषु वनेषु च वनौकसः ।

अभिप्लुत्याभिपश्येयुः परेषां निहितं बलम् ॥ १२ ॥

" वानरोंको चाहिये कि जहाँ गड्ढे, दुर्गम वन और साधारण जंगल हों, वहाँ सब ओर कूद - फाँदकर यह देखते रहें कि कहीं शत्रुओंकी सेना तो नहीं छिपी है ( ऐसा न हो कि हम आगे निकल जायँ और शत्रु अकस्मात् पीछेसे आक्रमण कर दे ) ॥

यत्तु फल्गु वलं किंचित् तदत्रैवोपपद्यताम् ।

एतद्धि कृत्यं घोरं नो विक्रमेण प्रयुज्यताम् ॥ १३ ॥

' जिस सेनामें बाल, वृद्ध आदिके कारण दुर्बलता हो, वह यहाँ किष्किन्धा में ही रह जाय; क्योंकि हमारा यह युद्धरूपी कृत्य बड़ा भयंकर है, अतः इसके लिये बल - विक्रमसम्पन्न सेनाको ही यात्रा करनी चाहिये ॥ १३ ॥

सागरौघनिभं भीममग्रानीकं महाबलाः । को विजय मुहूर्त भी कहते हैं । यह यात्रा के लिये बहुत उत्तम कपिसिंहाः प्रकर्षन्तु शतशोऽथ सहस्रशः ॥ १४ ॥

माना गया है । यद्यपि ' भुक्तौ दक्षिणयात्रायां प्रतिष्ठायां द्विजन्मनि । " सैकड़ों और हजारों महाबली कपिकेसरी वीर महासागर-आधाने च ध्वजारोहे मृत्युदः स्यात् सदाभिजित् ॥ ' इस ज्योतिष- की जलराशिके समान भयंकर एवं अपार वानर सेनाके अग्र-रत्नाकरके वचन के अनुसार उक्त मुहूर्तमें दक्षिणयात्र निषिद्ध है, भागको अपने साथ आगे बढ़ाये चलें ॥ १४ ॥

तथापि किष्किन्धासे लङ्का दक्षिणपूर्वके कोणमें होने के कारण वह गजश्च गिरिसंकाशो गवयश्च महाबलः ।

दोष यहाँ नहीं प्राप्त होता है । गवाक्षश्चाग्रतो यातु गवां दृप्त इवर्षभः ॥ १५ ॥

वा ० रा ० ५.८.७

पृष्ठ 245

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१०५८ श्रीमवाल्मीकीय रामायणे ‘ पर्वतके समान विशालकाय गज, महाबली गवय तथा मतवाले साँड़की भाँति पराक्रमी गवाक्ष सेनाके आगे - आगे चलें ॥

यातु वानरवाहिन्या वानरः प्लवतां पतिः ।

पालयन् दक्षिणं पार्श्वमृषभो वानरर्षभः ॥ १६ ॥

' उछल - कूदकर चलनेवाले कपियोंके पालक वानर-शिरोमणि ऋषभ इस वानर सेना के दाहिने भागकी रक्षा करते हुए चलें ॥ १६ ॥

गन्धहस्तीव दुर्धर्षस्तरखी गन्धमादनः ।

यातु वानरवाहिन्याः सव्यं पार्श्वमधिष्ठितः ॥ १७ ॥

' गन्धहस्त के समान दुर्जय और वेगशाली वानर गन्ध-मादन इस वानर - वाहिनीके वामभागमें रहकर इसकी रक्षा करते हुए आगे बढ़ें ॥ १७ ॥

यास्यामि बलमध्येऽहं बलौघमभिहर्षयन् ।

अधिरुह्य हनूमन्तमैरावतमिवेश्वरः ॥ १८ ॥

' जैसे देवराज इन्द्र ऐरावत हाथीपर आरूढ़ होते हैं, उसी प्रकार मैं हनुमानके कंधेपर चढ़कर सेनाके बीचमें रहकर सारी सेनाका हर्ष बढ़ाता हुआ चलूँगा ॥ १८ ॥

अङ्गदेनैष संयातु लक्ष्मणश्चान्तकोपमः ।

सार्वभौमेन भूतेशो द्रविणाधिपतिर्यथा ॥ १ ९ ॥

' जैसे धनाध्यक्ष कुबेर सार्वभौम नामक दिग्गजकी पीठपर बैठकर यात्रा करते हैं, उसी प्रकार कालके समान पराक्रमी लक्ष्मण अंगदपर आरूढ़ होकर यात्रा करें ॥ १ ९ ॥

जाम्बवांश्च सुषेणश्च वेगदर्शी च वानरः ।

ऋक्षराजो महाबाहुः कुक्षिं रक्षन्तु ते त्रयः ॥ २० ॥

‘ महाबाहु ऋक्षराज जाम्बवान्, सुषेण और वानर वेगदर्शी-ये तीनों वानर सेनाके पृष्ठभागकी रक्षा करें ॥ २० ॥

राघवस्य वचः श्रुत्वा सुग्रीवो वाहिनीपतिः ।

व्यादिदेश महावीर्यो वानरान् वानरर्षभः ॥ २१ ॥

रघुनाथजीका यह वचन सुनकर महापराक्रमी वानर-शिरोमणि सेनापति सुग्रीवने उन वानरोंको यथोचित आज्ञा दी ।

ते वानरगणाः सर्वे समुत्पत्य महौजसः ।

गुहाभ्यः शिखरेभ्यश्च आशु पुप्लुविरे तदा ॥ २२ ॥

तब वे समस्त महाबली वानरगण अपनी गुफाओं और शिखरोंसे शीघ्र ही निकलकर उछलते - कूदते हुए चलने लगे ॥

ततो वानरराजेन लक्ष्मणेन च पूजितः ।

जगाम रामो धर्मात्मा ससैन्यो दक्षिणां दिशम् ॥ २३ ॥

तत्पश्चात् वानरराज सुग्रीव और लक्ष्मणके सादर अनुरोध करनेपर सेनासहित धर्मात्मा श्रीरामचन्द्रजी दक्षिण दिशा की ओर प्रस्थित हुए || २३ ||

शतैः शतसहस्त्रैश्च कोटिभिश्चायुतैरपि ।

वारणाभैश्च हरिभिर्ययौ परिवृतस्तदा ॥ २४ ॥

उस समय सैकड़ों, हजारों, लाखों और करोड़ों वानरोंसे, जो हाथी के समान विशालकाय थे, घिरे हुए श्रीरघुनाथजी आगे बढ़ने लगे || २४ ॥

तं यान्तमनुयान्ती सा महती हरिवाहिनी ।

हृष्टाः प्रमुदिताः सर्वे सुग्रीवेणापि पालिताः ॥ २५ ॥

यात्रा करते हुए श्रीरामके पीछे वह विशाल वानर-वाहिनी चलने लगी । उस सेनाके सभी वीर सुग्रीवसे पालित होनेके कारण हृष्ट - पुष्ट एवं प्रसन्न थे ॥ २५ ॥

आप्लवन्तः प्लवन्तश्च गर्जन्तश्च लवंगमाः ।

क्ष्वेलन्तो निनदन्तश्च जग्मुर्वै दक्षिणां दिशम् ॥ २६ ॥

उनमें से कुछ वानर उस सेनाकी रक्षाके लिये उछलते-कूदते हुए चारों ओर चक्कर लगाते थे, कुछ मार्गशोधन के लिये कूदते - फाँदते आगे बढ़ जाते थे, कुछ वानर मेघोंके समान गर्जते, कुछ सिंहोंके समान दहाड़ते और कुछ किल-कारियाँ भरते हुए दक्षिण दिशा की ओर अग्रसर रहे थे ।

भक्षयन्तः सुगन्धीनि मधूनि च फलानि च ।

उद्वहन्तो महावृक्षान् मञ्जरीपुञ्जधारिणः ॥ २७ ॥

वे सुगन्धित मधु पीते और मीठे फल खाते हुए मञ्जरी-पुञ्ज धारण करनेवाले विशाल वृक्षोंको उखाड़कर कंधोंपर लिये चल रहे थे ॥ २७ ॥

अन्योन्यं सहसा हप्ता निर्वहन्ति क्षिपन्ति च ।

पतन्तश्चोत्पतन्त्यन्ये पातयन्त्यपरे परान् ॥ २८ ॥

कुछ मतवाले वानर विनोदके लिये एक दूसरेको ढो रहे थे । कोई अपने ऊपर चढ़े हुए वानरको झटककर दूर फेंक देते थे । कोई चलते - चलते ऊपरको उछल पड़ते थे और दूसरे वानर दूसरों - दूसरोंको ऊपरसे धक्के देकर नीचे गिरा देते थे ॥ २८ ॥

रावणो नो निहन्तव्यः सर्वे च रजनीचराः ।

इति गर्जन्ति हरयो राघवस्य समीपतः ॥ २ ९ ॥

श्रीरघुनाथजी के समीप चलते हुए वानर यह कहते हुए

गर्जना करते थे कि " हमें रावणको मार डालना चाहिये ।

समस्त निशाचरोंका भी संहार कर देना चाहिये ' ॥ २ ९ ॥

पुरस्तादृषभो नीलो वीरः कुमुद एव च ।

पन्थानं शोधयन्ति स्म वानरैर्बहुभिः सह ॥ ३० ॥

सबसे आगे ऋषभ, नील और वीर कुमुद - — ये बहु-संख्यक वानरोंके साथ रास्ता ठीक करते जाते थे ॥ ३० ॥

मध्ये तु राजा सुग्रीवो रामो लक्ष्मण एव च ।

बलिभिर्बहुभिर्भीमैर्वृतः शत्रुनिबर्हणः ॥ ३१ ॥

सेनाके मध्यभागमें राजा सुग्रीव, श्रीराम और लक्ष्मण-

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युद्धकाण्डे चतुर्थः सर्गः २०५ ९ ये तीनों शत्रुसूदन वीर अनेक बलशाली एवं भयंकर वानरोंसे समुद्रके जलप्रवाहकी भाँति अपार एवं भयंकर दिखायी देने-घिरे हुए चल रहे थे || ३१ ॥ वाली वह विशाल वानर सेना भयभीत -सी होकर नगरों के

हरिः शतबलिर्वीरः कोटिभिर्दशभिर्वृतः ।

सर्वामेको ह्यवष्टभ्य ररक्ष हरिवाहिनीम् ॥ ३२ ॥

शतबलि नामका एक वीर वानर दस करोड़ वानरोंके साथ अकेला ही सारी सेनाको अपने नियन्त्रणमें रखकर उसकी रक्षा करता था ॥ ३२ ॥

कोटीशतपरीवारः केसरी पनसो गजः ।

अर्कश्च बहुभिः पार्श्वमेकं तस्याभिरक्षति ॥ ३३ ॥

सौ करोड़ वानरोंसे घिरे हुए केसरी और पनस — ये सेनाके एक ( दक्षिण ) भागकी तथा बहुतसे वानर सैनिकोंको साथ लिये गज और अर्क —–— ये उस वानर सेनाके दूसरे ( वाम ) भागकी रक्षा करते थे ॥ ३३ ॥

सुषेणो जाम्बवांश्चैव ऋक्षैर्बहुभिरावृतौ ।

सुग्रीवं पुरतः कृत्वा जघनं संररक्षतुः ॥ ३४ ॥

बहुसंख्यक भालुओंसे घिरे हुए सुषेण और जाम्बवान्– ये दोनों सुग्रीवको आगे करके सेनाके पिछले भागकी रक्षा कर रहे थे || ३४ ॥

तेषां सेनापतिर्वीरो नीलो वानरपुंगवः ।

सम्पतन् प्लवतां श्रेष्ठस्तद् वलं पर्यवारयत् ॥ ३५ ॥

उन सबके सेनापति कपिश्रेष्ठ वानरशिरोमणि वीरवर नील उस सेनाकी सब ओरसे रक्षा एवं नियन्त्रण कर रहे थे ॥ ३५ ॥

दरीमुखः प्रजङ्घश्व जम्भोऽथ रभसः कपिः ।

ययुर्वीरास्त्वरयन्तः प्लवंगमान् ॥ ३६ ॥

दरीमुख, प्रजङ्घ, जम्भ और रभस ये वीर सब ओरसे वानरोंको शीघ्र आगे बढ़ने की प्रेरणा देते हुए चल रहे थे ।

एवं ते हरिशार्दूला गच्छन्ति बलदर्पिताः ।

अपश्यन्त गिरिश्रेष्ठं सहां गिरिशतायुतम् ॥ ३७ ॥

इस प्रकार वे बलोन्मत्त कपि - केसरी वीर बराबर आगे बढ़ते गये । चलते - चलते उन्होंने पर्वतश्रेष्ठ सह्यगिरिको देखा, जिसके आस - पास और भी सैकड़ों पर्वत थे ॥ ३७ ॥

सरांसि च सुफुल्लानि तटाकानि वराणि च ।

रामस्य शासनं ज्ञात्वा भीमकोपस्य भीतवत् ॥ ३८ ॥

वर्जयन् नागराभ्याशांस्तथा जनपदानपि ।

सागरौघनिभं भीमं तद् वानरवलं महत् ॥ ३ ९ ॥

निःससर्प महाघोरं भीमघोष मवार्णवम् । रास्तेमें उन्हें बहुत - से सुन्दर सरोवर और तालाब दिखायी दिये, जिनमें मनोहर कमल खिले हुए थे श्रीरामचन्द्रजीकी आज्ञा थी कि रास्ते में कोई किसी प्रकारका उपद्रव न करे । भयंकर कोपवाले श्रीरामचन्द्रजीके इस आदेशको जानकर समीपवर्ती स्थानों और जनपदोंको दूरसे ही छोड़ती चली जा रही थी । विकट गर्जना करनेके कारण भयानक शब्दवाले समुद्र की भाँति वह महाघोर जान पड़ती थी । ३८-३९ ३ ॥ तस्य दाशरथेः पार्श्वे शूरास्ते कपिकुञ्जराः ॥ ४० ॥

तूर्णमापुप्लुवुः सर्वे सदश्वा इव चोदिताः । वे सभी शूरवीर कपिकुञ्जर हाँके गये अच्छे घोड़ोंकी भाँति उछलते - कूदते हुए तुरंत ही दशरथनन्दन श्रीरामके पास पहुँच जाते थे ॥ ४०३ ॥

कपिभ्यामुद्यमानौ तौ शुशुभाते नरर्षभौ ॥ ४१ ॥

महद्भ्यामिव संस्पृष्टौ ग्रहाभ्यां चन्द्रभास्करौ । हनुमान् और अंगद — इन दो वानर वीरोंद्वारा ढोये जाते हुए वे नरश्रेष्ठ श्रीराम और लक्ष्मण शुक्र और बृहस्पति -इन दो महाग्रहोंसे संयुक्त हुए चन्द्रमा और सूर्यके समान शोभा पा रहे थे ॥ ४१३ ॥

ततो वानरराजेन लक्ष्मणेन सुपूजितः ॥ ४२ ॥

जगाम रामो धर्मात्मा ससैन्यो दक्षिणां दिशम् । उस समय वानरराज सुग्रीव और लक्ष्मणसे सम्मानित हुए धर्मात्मा श्रीराम सेनासहित दक्षिण दिशाकी ओर बढ़े जा रहे थे || ४२३ || तमङ्गदगतो रामं लक्ष्मणः शुभया गिरा ॥ ४३ ॥

उवाच परिपूर्णार्थ पूर्णार्थप्रतिभानवान् । लक्ष्मणजी अंगदके कंधेपर बैठे हुए थे । वे शकुनोंके द्वारा कार्यसिद्धिकी बात अच्छी तरह जान लेते थे । उन्होंने पूर्ण-काम भगवान् श्रीरामसे मङ्गलमयी वाणीमें कहा ॥ ४३३ ॥

हृतामवाप्य वैदेहीं क्षिप्रं हत्वा च रावणम् ॥ ४४ ॥

समृद्धार्थः समृद्धार्थामयोध्यां प्रतियास्यसि ।

महान्ति च निमित्तानि दिवि भूमौ च राघव ॥ ४५ ॥

शुभानि तव पश्यामि सर्वाण्येवार्थसिद्धये । “ घुनन्दन! मुझे पृथ्वी और आकाशमें बहुत अच्छे-अच्छे शकुन दिखायी देते हैं । ये सब आपके मनोरथकी सिद्धिको सूचित करते हैं । इनसे निश्चय होता है कि आप शीघ्र ही रावणको मारकर हरी हुई सीताजीको प्राप्त करेंगे और सफलमनोरथ होकर समृद्धिशालिनी अयोध्याको पधारेंगे ॥ अनुवाति शिवो वायुः सेनां मृदुहितः सुखः ॥ ४६ ॥

पूर्ण वल्गुखराश्चेमे प्रवदन्ति मृगद्विजाः ।

प्रसन्नाश्च दिशः सर्वा विमलश्व दिवाकरः ॥ ४७ ॥

उशना च प्रसन्नार्चिरतु त्वां भार्गवो गतः ।

ब्रह्मराशिविशुद्धश्च शुद्धाश्च परमर्षयः ।

अर्चिष्मन्तः प्रकाशन्ते ध्रुवं सर्वे प्रदक्षिणम् ॥ ४८ ॥

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२०६० श्रीमदवाल्मीकीय रामायणे ‘ देखिये सेनाके पीछे शीतल, मन्द, हितकर और सुखमय समीर चल रहा है । ये पशु और पक्षी पूर्ण मधुर स्वरमें अपनी अपनी बोली बोल रहे हैं । सब दिशाएँ प्रसन्न हैं । सूर्यदेव निर्मल दिखायी दे रहे हैं । भृगुनन्दन शुक्र भी अपनी उज्ज्वल प्रभासे प्रकाशित हो आपके पीछेकी दिशामें प्रकाशित हो रहे हैं । जहाँ सप्तर्षियोंका समुदाय शोभा पाता है, वह ध्रुवतारा भी निर्मल दिखायी देता है । शुद्ध और प्रकाशमान समस्त सप्तर्षिगण ध्रुवको अपने दाहिने रखकर उनकी परिक्रमा करते हैं ॥ ४६–४८ ॥

त्रिशङ्कुर्विमलो भाति राजर्षिः सपुरोहितः ।

पितामहः पुरोऽस्माकमिक्ष्वाकूणां महात्मनाम् ॥ ४ ९ ॥

" हमारे साथ ही महामना इक्ष्वाकुवंशियोंके पितामह राजर्षि त्रिशंकु अपने पुरोहित वसिष्ठजी के साथ हमलोगोंके सामने ही निर्मल कान्तिसे प्रकाशित हो रहे हैं ॥ ४ ९ ॥

विमले च प्रकाशेते विशाखे निरुपद्रवे ।

नक्षत्रं परमस्माकमिक्ष्वाकूणां महात्मनाम् ॥ ५० ॥

‘ हम महामनस्वी इक्ष्वाकुवंशियोंके लिये जो सबसे उत्तम है, वह विशाखानामक युगल नक्षत्र निर्मल एवं उपद्रवशून्य ( मंगल आदि दुष्ट ग्रहों की आक्रान्तिसे रहित ) होकर प्रकाशित हो रहा है ॥ ५० ॥

नैर्ऋतं नैर्ऋतानां च नक्षत्रमतिपीड्यते ।

मूलो मूलवता स्पृष्टो धूप्यते धूमकेतुना ॥ ५१ ॥

' राक्षसोंका नक्षत्र मूल, जिसके देवता निर्ऋति हैं, अत्यन्त पीड़ित हो रहा है । उस मूलके नियामक धूमकेतुसे आक्रान्त होकर वह संतापका भागी हो रहा है ॥ ५१ ॥

सर्व चैतद् विनाशाय राक्षसानामुपस्थितम् ।

काले कालगृहीतानां नक्षत्रं ग्रहपीडितम् ॥ ५२ ॥

‘ यह सब कुछ राक्षसोंके विनाशके लिये ही उपस्थित हुआ है; क्योंकि जो लोग कालपाशमें बँधे होते हैं, उन्हींका नक्षत्र समयानुसार ग्रहोंसे पीड़ित होता है ॥ ५२ ॥

प्रसन्नाः सुरसाश्चापो वनानि फलवन्ति च ।

प्रवान्ति नाधिका गन्धा यथर्तुकुसुमा द्रुमाः ॥ ५३ ॥

' जल स्वच्छ और उत्तम रससे पूर्ण दिखायी देता है, जंगलोंमें पर्याप्त फल उपलब्ध होते हैं, सुगन्धित वायु अधिक तीव्रगति से नहीं बह रही है और वृक्षोंमें ऋतुओंके अनुसार फूल लगे हुए हैं ॥ ५३ ॥

व्यूढानि कपिसैन्यानि प्रकाशन्तेऽधिकं प्रभो ।

देवानामिव सैन्यानि संग्रामे तारकामये ।

एवमार्य समीक्ष्यैतत् प्रीतो भवितुमर्हसि ॥ ५४ ॥

जिस तरह उत्साहसे सम्पन्न थीं, इसी प्रकार आज ये वानर-सेनाएँ भी हैं । आर्य! ऐसे शुभ लक्षण देखकर आपको प्रसन्न होना चाहिये ' ॥ ५४ ॥

इति भ्रातरमाश्वास्य हृष्टः सौमित्रिरब्रवीत् ।

अथावृत्य महीं कृत्स्नां जगाम हरिवाहिनी ॥ ५५ ॥

अपने भाई श्रीरामको आश्वासन देते हुए हर्षसे भरे सुमित्राकुमार लक्ष्मण जब इस प्रकार कह रहे थे, उस समय वानरोंकी सेना वहाँकी सारी भूमिको घेरकर आगे बढ़ने लगी ॥ ५५ ॥

ऋक्षवानरशार्दूलैर्नखदंष्ट्रायुधैरपि 1 करायैश्चरणायैश्च वानरैरुद्धतं रजः ॥ ५६ ॥

उस सेनामें कुछ रीछ थे और कुछ सिंहके समान पराक्रमी वानर । नख और दाँत ही उनके शस्त्र थे । वे सभी वानर सैनिक हाथों और पैरोंकी अंगुलियोंसे बड़ी धूल उड़ा रहे थे ॥ ५६ ॥

भीममन्तर्दधे लोकं निवार्य सवितुः प्रभाम् ।

सपर्वतवनाकाशं दक्षिणां हरिवाहिनी ॥ ५७ ॥

छादयन्ती ययौ भीमा द्यामिवाम्बुदसंततिः । उनकी उड़ायी हुई उस भयंकर धूलने सूर्यकी प्रभा-को ढककर सम्पूर्ण जगत्को छिपा सा दिया । वह भयानक वानरसेना पर्वत, वन और आकाशसहित दक्षिण दिशाको आच्छादित - सी करती हुई उसी तरह आगे बढ़ रही थी, जैसे मेघोंकी घटा आकाशको ढककर अग्रसर होती है ॥ ५७१ ॥

उत्तरन्त्याश्च सेनायाः सततं बहुयोजनम् ॥ ५८ ॥

नदीस्रोतांसि सर्वाणि सस्यन्दुर्विपरीतवत् । वह वानरी सेना जब किसी नदीको पार करती थी, उस समय लगातार कई योजनोंतक उसकी समस्त धाराएँ उल्टी बहने लगती थीं ॥ ५८३ ॥

सरांसि विमलाम्भांसि द्रुमाकीर्णाश्च पर्वतान् ॥ ५ ९ ॥

समान् भूमिप्रदेशांश्च वनानि फलवन्ति च ।

मध्येन च समन्ताच्च तिर्यक् चाधश्च साविशत् ॥ ६० ॥

समावृत्य महीं कृत्स्नां जगाम महती चमूः । वह विशाल सेना निर्मल जलवाले सरोवर, वृक्षोंसे ढके हुए पर्वत, भूमिके समतल प्रदेश और फलोंसे भरे हुए वन-इन सभी स्थानोंके मध्यमें, इधर - उधर तथा ऊपर - नीचे सब ओरकी सारी भूमिको घेरकर चल रही थी ॥ ५ ९ -६०३ ॥ ते हृष्टवदनाः सर्वे जग्मुर्मारुतरंहसः ॥ ६१ ॥

हरयो राघवस्यार्थे समारोपितविक्रमाः । उस सेनाके सभी वानर प्रसन्नमुख तथा वायुके समान " प्रभो! व्यूहबद्ध वानरी सेना बड़ी शोभासम्पन्न जान वेगवाले थे । रघुनाथजी की कार्यसिद्धिके लिये उनका पराक्रम पड़ती है । तारकामय संग्रामके अवसरपर देवताओंकी सेनाएँ उबला पड़ता था ॥ ६१३ ॥

पृष्ठ 248

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युद्धकाण्डे चतुर्थः सर्गः १०६१ हर्ष वीर्य बलोद्रेकान् दर्शयन्तः परस्परम् ॥ ६२ ॥

यौवनोत्सेकजाद् दर्पाद् विविधांश्च कुरध्वनि । वे जवानीके जोश और अभिमानजनित दके कारण रास्तेमें एक दूसरेको उत्साह, पराक्रम तथा नाना प्रकार के बल - सम्बन्धी उत्कर्ष दिखा रहे थे ॥ ६२३ ॥

तत्र केचिद् द्रुतं जग्मुरुत्पेतुश्च तथापरे ॥ ६३ ॥

केचित् किलकिलां चक्रर्वानरा वनगोचराः ।

प्रास्फोटयंश्च पुच्छानि संनिजघ्नुः पदान्यपि ॥ ६४ ॥

उनमेंसे कोई तो बड़ी तेजीसे भूतलपर चलते थे और दूसरे उछलकर आकाशमें उड़ जाते थे । कितने ही वन-वासी वानर किलकारियाँ भरते, पृथ्वीपर अपनी पूँछ फट-कारते और पैर पटकते थे ॥ ६३-६४ ॥

भुजान् विक्षिप्य शैलांश्च द्रुमानन्ये बभञ्जिरे ।

आरोहन्तश्च शृङ्गाणि गिरीणां गिरिगोचराः ॥ ६५ ॥

कितने ही अपनी बाँहें फैलाकर पर्वत - शिखरों और वृक्षोंको तोड़ डालते थे तथा पर्वतोंपर विचरनेवाले बहुतेरे वानर पहाड़ोंकी चोटियोंपर चढ़ जाते थे । ६५ ॥

महानादान् प्रमुञ्चन्ति क्ष्वेडामन्ये प्रचक्रिरे ।

ऊरुवेगैश्व ममृदुर्लताजालान्यनेकशः ॥ ६६ ॥

कोई बड़े जोरसे गर्जते और कोई सिंहनाद करते थे । कितने ही अपनी जाँधोंके वेगसे अनेकानेक लता - समूहों को मसल डालते थे ॥ ६६ ॥

जृम्भमाणाश्च विक्रान्ता विचिक्रीडः शिलादुमैः ।

ततः शतसहस्त्रैश्च कोटिभिश्च सहस्रशः ॥ ६७ ॥

वानराणां सुघोराणां श्रीमत्परिवृता मही । वे सभी वानर बड़े पराक्रमी थे । अँगड़ाई लेते हुए पत्थर की चट्टानों और बड़े - बड़े वृक्षोंसे खेल करते थे । उन सहस्रों, लाखों और करोड़ों बानरोंसे घिरी हुई सारी पृथ्वी

बड़ी शोभा पाती थी । ६७३ ॥

सा स्म याति दिवारात्रं महती हरिवाहिनी ॥ ६८ ॥

प्रहृष्टमुदिताः सर्वे सुग्रीवेणाभिपालिताः ।

वानरास्त्वरिता यान्ति सर्वे युद्धाभिनन्दिनः ।

प्रमोक्षयिषवः सीतां मुहूर्त क्वापि नावसन् ॥ ६ ९ ॥

इस प्रकार वह विशाल वानरसेना दिन - रात चलती रही । सुग्रीवसे सुरक्षित सभी वानर हृष्ट - पुष्ट और प्रसन्न थे । सभी बड़ी उतावलीके साथ चल रहे थे । सभी युद्धका अभिनन्दन करनेवाले थे और सभी सीताजीको रावणकी कैदसे छुड़ाना चाहते थे । इसलिये उन्होंने रास्तेमें कहीं दो घड़ी भी विश्राम नहीं लिया ॥ ६८-६९ ॥

ततः पादपसम्बाधं नानावनसमायुतम् ।

सह्यपर्वतमासाद्य वानरास्ते समारुहन् ॥ ७० ॥

चलते - चलते घने वृक्षोंसे व्याप्त और अनेकानेक काननों-से संयुक्त सह्य पर्वतके पास पहुँचकर वे सब वानर उसके ऊपर चढ़ गये ॥ ७० ॥

काननानि विचित्राणि नदीप्रस्स्रवणानि च ।

पश्यन्नपि ययौ रामः सह्यस्य मलयस्य च ॥ ७१ ॥

श्रीरामचन्द्रजी सह्य और मलयके विचित्र काननों, नदियों तथा झरनोंकी शोभा देखते हुए यात्रा कर रहे थे ॥ ७१ ॥

चम्पकांस्तिलकांश्चूतानशोकान् सिन्दुवारकान् ।

तिनिशान् करवीरांश्च भञ्जन्ति स्म प्लवंगमाः ॥ ७२ ॥

वे वानर मार्ग में मिले हुए चम्पा, तिलक, आम, अशोक, सिन्दुवार, तिनिश और करवीर आदि वृक्षोंको तोड़ देते थे ॥ ७२ ॥

अङ्कोलांश्च करञ्जांश्च पुक्षन्यग्रोधपादपान् ।

जम्बूकामलकान् नीपान् भञ्जन्ति स्म लवंगमाः ॥ ७३ ॥

उछल - उछलकर चलनेवाले वे वानरसैनिक रास्तेके अंकोल, करंज, पाकर, बरगद, जामुन, आँवले और नीप आदि वृक्षों-को भी तोड़ डालते थे ॥ ७३ ॥

प्रस्तरेषु च रम्येषु विविधाः काननद्रुमाः ।

वायुवेगप्रचलिताः पुष्पैरवकिरन्ति तान् ॥ ७४ ॥

रमणीय पत्थरोंपर उगे हुए नाना प्रकारके जंगली वृक्ष वायुके झोंकेसे झूम - झूमकर उन वानरोंपर फूलोंकी वर्षा करते थे ॥ ७४ ॥

मारुतः सुखसंस्पर्शो वाति चन्दनशीतलः ।

षट्पदैरनुकूजद्भिर्वनेषु मधुगन्धिषु ॥ ७५ ॥

मधुसे सुगन्धित वनोंमें गुनगुनाते हुए भौंरोंके साथ चन्दनके समान शीतल, मन्द, सुगन्ध वायु चल रही थी ।

अधिकं शैलराजस्तु धातुभिस्तु विभूषितः ।

धातुभ्यः प्रसृतो रेणुर्वायुवेगेन घट्टितः ॥ ७६ ॥

सुमहद्वानरानीकं छादयामास सर्वतः । वह पर्वतराज गैरिक आदि धातुओंसे विभूषित हो बड़ी शोभा पा रहा था । उन धातुओंसे फैली हुई धूल वायुके वेगसे उड़कर उस विशाल वानरसेनाको सब ओरसे आच्छादित कर देती थी || ७६३ ॥ गिरिप्रस्थेषु रम्येषु सर्वतः सम्प्रपुष्पिताः ॥ ७७ ॥

केतक्यः सिन्दुवाराश्च वासन्त्यश्च मनोरमाः ।

माधव्यो गन्धपूर्णाश्च कुन्दगुल्माश्च पुष्पिताः ॥ ७८ ॥

रमणीय पर्वतशिखरों पर सब ओर खिली हुई केतकी, सिन्दुवार और वासन्ती लताएँ बड़ी मनोरम जान पड़ती थीं । प्रफुल्ल माधवी लताएँ सुगन्धसे भरी थीं और कुन्दकी झाड़ियाँ भी फूलोंसे लदी हुई थीं ॥ ७७-७८ ॥

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१०६२ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे

चिरिबिल्वा मधूकाश्च वञ्जुला बकुलास्तथा ।

रञ्जकास्तिलकाचैव नागवृक्षाश्च पुष्पिताः ॥ ७ ९ ॥

चिरिबिल्व, मधूक ( महुआ ), वज्जुल, बकुल, रंजक, तिलक और नागकेसरके वृक्ष भी वहाँ खिले हुए थे ॥७९ ॥

चूताः पाटलिकाञ्चैव कोविदाराश्च पुष्पिताः ।

मुचुलिन्दार्जुनाश्चैव शिंशपाः कुटजास्तथा ॥ ८० ॥

हिन्ताला स्तिनिशाचैव चूर्णका नीपकास्तथा ।

नीलाशोकाश्च सरला अङ्कोलाः पद्मकास्तथा ॥ ८१ ॥

आम, पाडर और कोविदार भी फूलोंसे लदे थे । मुचु-लिन्द, अर्जुन, शिंशपा, कुटज, हिंताल, तिनिश, चूर्णक, कदम्ब, नीलाशोक, सरल, अंकोल और पद्मक भी सुन्दर फूलों-से सुशोभित थे ॥ ८०-८१ ॥

प्रीयमाणैः लवंगैस्तु सर्वे पर्याकुलीकृताः ।

वाप्यस्तस्मिन् गिरौ रम्याः पल्वलानि तथैव च ॥ ८२ ॥

चक्रवाकानुचरिताः कारण्डवनिषेविताः ।

प्रवैः क्रौञ्चैश्च संकीर्णा वराहमृगसेविताः ॥ ८३ ॥

प्रसन्नतासे भरे हुए वानरोंने उन सब वृक्षोंको घेर लिया था । उस पर्वतपर बहुत - सी रमणीय बावड़ियाँ तथा छोटे - छोटे जलाशय थे, जहाँ चकवे विचरते और जलकुक्कुट निवास करते थे । जलकाक और क्रौञ्च भरे हुए थे तथा सूअर और हिरन उनमें पानी पीते थे ॥ ८२-८३ ॥

ऋक्षैस्तरक्षुभिः सिंहः शार्दूलैश्च भयावहैः ।

व्यालैश्च बहुभिर्भीमैः सेव्यमानाः समन्ततः ॥ ८४ ॥

रीछ, तरक्षु ( लकड़बग्घे ), सिंह, भयंकर बाघ तथा बहुसंख्यक दुष्ट हाथी, जो बड़े भीषण थे, सब ओरसे आ-आकर उन जलाशयों का सेवन करते थे ॥ ८४ ॥

पनैः सौगन्धिकैः फुल्लैः कुमुदैश्चोत्पलैस्तथा ।

वारिजैर्विविधैः पुष्पै रम्यास्तत्र जलाशयाः ॥ ८५ ॥

खिले हुए सुगन्धित कमल, कुमुद, उत्पल तथा जलमें होनेवाले भाँति - भाँति के अन्य पुष्पोंसे वहाँके जलाशय बड़े रमणीय दिखायी देते थे ॥ ८५ ॥

तस्य सानुषु कूजन्ति नानाद्विजगणास्तथा ।

स्नात्वा पीत्वोदकाम्यत्र जले क्रीडन्ति वानराः ॥ ८६ ॥

उस पर्वत के शिखरोंपर नाना प्रकारके पक्षी कलरव करते थे । वानर उन जलाशयोंमें नहाते, पानी पीते और जलमें क्रीड़ा करते थे ॥ ८६ ॥

अन्योन्यं लावयन्ति स्म शैलमारुह्य वानराः ।

फलान्यमृतगन्धीनि मूलानि कुसुमानि च ॥ ८७ ॥

बभञ्जुर्वानरास्तत्र पादपानां मदोत्कटाः ।

द्रोणमात्रप्रमाणानि लम्बमानानि वानराः ॥ ८८ ॥

ययुः पिवन्तः स्वस्थास्ते मधूनि मधु पिङ्गलाः । वे आपस में एक दूसरेपर पानी भी उछालते थे । कुछ वानर पर्वतपर चढ़कर वहाँके वृक्षोंके अमृततुल्य मीठे फलों, मूलों और फूलोंको तोड़ते थे । मधुके समान वर्णवाले कितने ही मदमत्त वानर वृक्षोंमें लटके और एक - एक द्रोण शहद से भरे हुए मधुके छत्तोंको तोड़कर उनका मधु पी लेते और स्वस्थ ( संतुष्ट ) होकर चलते थे ॥ ८७-८८३ ॥ पादपानवभञ्जन्तो विकर्षन्तस्तथा लताः ॥ ८ ९ ॥ विधमन्तो गिरिवरान् प्रययुः प्लवगर्षभाः । पेड़ोंको तोड़ते, लताओं को खींचते और बड़े - बड़े पर्वतोंको प्रतिध्वनित करते हुए वे श्रेष्ठ वानर तीव्र गतिसे आगे बढ़ रहे थे ॥ ८ ९ ३ ॥ वृक्षेभ्योऽन्ये तु कपयो नदन्तो मधु दर्पिताः ॥ ९ ० ॥ अन्ये वृक्षान् प्रपद्यन्ते प्रपिवन्त्यपि चापरे । दूसरे वानर दर्पमें भरकर वृक्षोंसे मधुके छत्ते उतार लेते और जोर - जोरसे गर्जना करते थे । कुछ वानर वृक्षोंपर चढ़ जाते और कुछ मधु पीने लगते थे ॥ ९ ०३ ॥

बभूव वसुधा तैस्तु सम्पूर्णा हरिपुङ्गवैः ।

यथा कलमकेदारैः पक्वैरिव वसुंधरा ॥ ९ १ ॥

उन वानरशिरोमणियोंसे भरी हुई वहाँकी भूमि पके हुए बालवाले कलमी धानोंकी क्यारियोंसे ढकी हुई धरती के समान सुशोभित हो रही थी ॥ ९ १ ॥

महेन्द्रमथ सम्प्राप्य रामो राजीवलोचनः ।

आरुरोह महाबाहुः शिखरं द्रुमभूषितम् ॥ ९ २ ॥

कमलनयन महाबाहु श्रीरामचन्द्रजी महेन्द्र पर्वतके पास पहुँचकर भाँति - भाँति के वृक्षोंसे सुशोभित उसके शिखरपर चढ़ गये ॥ ९ २ ॥

ततः शिखरमारुह्य रामो दशरथात्मजः ।

कूर्ममीनसमाकीर्णमपश्यत् सलिलाशयम् ॥ ९ ३ ॥

महेन्द्र पर्वत शिखरपर आरूढ़ हो दशरथनन्दन भगवान् श्रीरामने कछुओं और मत्स्योंसे भरे हुए समुद्रको देखा ॥

ते सहां समतिक्रम्य मलयं च महागिरिम् ।

आसेदुरानुपूर्व्येण समुद्रं भीमनिःस्वनम् ॥ ९ ४ ॥

इस प्रकार वे सह्य तथा मलयको लाँघकर क्रमशः महेन्द्र पर्वतके समीपवर्ती समुद्रके तटपर जा पहुँचे, जहाँ बड़ा भयंकर शब्द हो रहा था ॥ ९ ४ ॥

अवरुह्य जगामाशु वेलावनमनुत्तमम् ।

रामो रमयतां श्रेष्ठः ससुग्रीवः सलक्ष्मणः ॥ ९ ५ ॥

उस पर्वतसे उतरकर भक्तोंके मनको रमानेवालोंमें श्रेष्ठ भगवान् श्रीराम सुग्रीव और लक्ष्मणके साथ शीघ्र ही सागर-तटवर्ती परम उत्तम वनमें जा पहुँचे ॥ ९ ५ ॥

पृष्ठ 250

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युद्धकाण्डे चतुर्थः सर्गः १०६३

अथ धौतोपलतलां तोयौघैः सहसोत्थितैः ।

वेलामासाद्य विपुलां रामो वचनमब्रवीत् ॥ ९ ६ ॥

जहाँ सहसा उठी हुई जलकी तरङ्गोंसे प्रस्तरकी शिलाएँ धुल गयी थीं, उस विस्तृत सिन्धुतटपर पहुँचकर श्रीरामने कहा ॥ ९ ६ ॥

एते वयमनुप्राप्ताः सुग्रीव वरुणालयम् ।

इदानीं विचिन्ता सा या नः पूर्वमुपस्थिता ॥ ९ ७ ॥

" सुग्रीव! लो, हम सब लोग समुद्र के किनारे तो आ गये । अब यहाँ मनमें फिर वही चिन्ता उत्पन्न हो गयी, जो हमारे सामने पहले उपस्थित थी ॥ ९ ७ ॥

अतः परमतीरोऽयं सागरः सरितां पतिः ।

न चायमुपायेन शक्यस्तरितुमर्णवः ॥ ९ ८ ॥

" इससे आगे तो यह सरिताओंका स्वामी महासागर ही विद्यमान है, जिसका कहीं पार नहीं दिखायी देता । अब बिना किसी समुचित उपायके सागरको पार करना असम्भव है ।

तदिहैव निवेशोऽस्तु मन्त्रः प्रस्तूयतामिह ।

यथेदं वानरवलं परं पारमवाप्नुयात् ॥ ९९ ॥

“ इसलिये यहाँ सेनाका पड़ाव पड़ जाय और हमलोग यहाँ बैठकर यह विचार आरम्भ करें कि किस प्रकार यह वानर सेना समुद्रके उस पारतक पहुँच सकती है ' ॥ ९९ ॥

इतीव स महाबाहुः सीताहरणकर्शितः ।

रामः सागरमासाद्य वासमाज्ञापयत् तदा ॥ १०० ॥

इस प्रकार सीताहरण के शोकसे दुर्बल हुए महाबाहु श्रीरामने समुद्र के किनारे पहुँचकर उस समय सारी सेनाको वहाँ ठहरनेकी आज्ञा दी ॥ १०० ॥

सर्वाः सेना निवेश्यन्तां वेलायां हरिपुङ्गव ।

सम्प्राप्तो मन्त्रकालो नः सागरस्येह लङ्घने ॥ १०१ ॥

वे बोले कपिश्रेष्ठ! समस्त सेनाओं को समुद्र के तटपर ठहराया जाय । अब यहाँ हमारे लिये समुद्र - लङ्घन के उपाय पर विचार करने का अवसर प्राप्त हुआ है ॥ १०१ ॥

स्वां स्वां सेनां समुत्सृज्य मा च कश्चित् कुतो व्रजेत् ।

गच्छन्तु वानराः शूरा ज्ञेयं छन्नं भयं च नः ॥ १०२ ॥

‘ इस समय कोई भी सेनापति किसी भी कारण से अपनी अपनी सेनाको छोड़कर कहीं अन्यत्र न जाय । समस्त शूर-वीर वानर सेनाकी रक्षाके लिये यथास्थान चले जायँ । सबको यह जान लेना चाहिये कि हमलोगोंपर राक्षसोंकी माया से गुप्त भय आ सकता है ' || १०२ ॥

रामस्य वचनं श्रुत्वा सुग्रीवः सहलक्ष्मणः ।

सेनां निवेशयत् तीरे सागरस्य द्रुमायुते ॥ १०३ ॥

श्रीरामचन्द्रजीका यह वचन सुनकर लक्ष्मणसहित सुग्रीव-ने वृक्षावलियोंसे सुशोभित सागर - तटपर सेनाको ठहरा दिया ।

विरराज समीपस्थं सागरस्य च तद् बलम् ।

मधुपाण्डुजलः श्रीमान् द्वितीय इव सागरः ॥ १०४ ॥

समुद्र के पास ठहरी हुई वह विशाल वानर सेना मधुके समान पिङ्गलवर्णके जलसे भरे हुए दूसरे सागरकी - सी शोभा धारण करती थी ॥ १०४ ॥

वेलावनमुपागम्य ततस्ते हरिपुङ्गवाः ।

निविष्टाश्च परं पारं काङ्गमाणा महोदधेः ॥ १०५ ॥

सागर - तटवर्ती वनमें पहुँचकर वे सभी श्रेष्ठ वानर समुद्र के उस पार जानेकी अभिलाषा मनमें लिये वहीं ठहर गये ॥ १०५ ॥

तेषां निविशमानानां सैन्यसंनाहनिःखनः ।

अन्तर्धाय महानादमर्णवस्य शुश्रुवे ॥१०६ ॥

वहाँ डेरा डालते हुए उन श्रीराम आदिकी सेनाओंके संचरण से जो महान् कोलाहल हुआ, वह महासागर की गम्भीर गर्जनाको भी दबाकर सुनायी देने लगा ॥ १०६ ॥

सा वानराणां ध्वजिनी सुग्रीवेणाभिपालिता ।

त्रिधा निविष्टा महती रामस्यार्थपराभवत् ॥१०७ ॥

सुग्रीवद्वारा सुरक्षित वह वानरोंकी विशाल सेना श्रीराम-चन्द्रजीके कार्य साधनमें तत्पर हो रीछ, लंगूर और वानरोंके भेदसे तीन भागों में विभक्त होकर ठहर गयी ॥ १०७ ॥

सा महार्णवमासाद्य हृष्टा वानरवाहिनी ।

वायुवेगसमाधूतं पश्यमाना महार्णवम् ॥ १०८ ॥

महासागर के तटपर पहुँचकर वह वानर सेना वायुके वेग-से कम्पित हुए समुद्रकी शोभा देखती हुई बड़े हर्षका अनुभव करती थी ॥ १०८ ॥

दूरपारमसम्बाधं रक्षोगणनिषेवितम् ।

पश्यन्तो वरुणावासं निषेदुर्हरियूथपाः ॥ १० ९ ॥

जिसका दूसरा तट बहुत दूर था और बीचमें कोई आश्रय नहीं था तथा जिसमें राक्षसों के समुदाय निवास करते थे, उस वरुणालय समुद्रको देखते हुए वे वानरयूथपति उसके तटपर बैठे रहे ॥ १० ९ ॥

चण्डनग्राहघोरं क्षपादौ दिवसक्षये ।

हसन्तमिव फेनोधैर्नृत्यन्तमिव चोमिभिः ॥ ११० ॥

चन्द्रोदये समुद्भूतं प्रतिचन्द्रसमाकुलम् ।

austre महाग्राहैः कीर्ण तिमितिमिंगिलैः ॥१११ ॥

क्रोध में भरे हुए नाकोंके कारण समुद्र बड़ा भयंकर दिखायी देता था । दिनके अन्त और रातके आरम्भमें— प्रदोषके समय चन्द्रोदय होनेपर उसमें ज्वार आ गया था । उस समय वह फेन - समूहों के कारण हँसता और उत्ताल तरङ्गों-के कारण नाचता - सा प्रतीत होता था । चन्द्रमाके प्रतिविम्बोंसे भरा - सा जान पड़ता था । प्रचण्ड वायुके समान वेगशाली बड़े - बड़े ग्राहों से और तिमि नामक महामत्स्योंको भी निगल