Ramayana 2 — पृष्ठ 251–260
वाल्मीकि रामायण — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 251–260
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१०६४ श्रीमदूवाल्मीकीय रामायणे जानेवाले महाभयंकर जलजन्तुओंसे व्याप्त दिखायी देता था ।
दीप्तभोगैरिवाकीर्ण भुजङ्गैर्वरुणालयम् ।
अवगाढं महासत्वैर्नानाशैलसमाकुलम् ॥ ११२ ॥
वह वरुणालय प्रदीप्त फर्णोवाले सर्पों, विशालकाय जल-रों और नाना पर्वतों से व्याप्त जान पड़ता था ॥ ११२ ॥
दुर्ग दुर्ग तमगाधमसुरालयम् ।
मकरैर्नागभोगैश्च विगाढा वातलोलिताः ।
उत्पेतुश्च निपेतुश्च प्रहृष्ट जलराशयः ॥ ११३ ॥
राक्षसोंका निवासभूत वह अगाध महासागर अत्यन्त दुर्गम था । उसे पार करने का कोई मार्ग या साधन दुर्लभ था । उसमें वायुकी प्रेरणासे उठी हुई चञ्चल तरङ्गे, जो मगरों और विशालकाय सर्पोंसे व्याप्त थीं, बड़े उल्लाससे ऊपरको उठती और नीचेको उतर आती थीं ॥ ११३ ॥
अग्निचूर्णमिवाविद्धं भावराम्बु महोरगम् ।
सुरारिनिलयं घोरं पातालविषयं सदा ॥ ११४ ॥
सागरं चाम्बरप्रख्यमम्बरं सागरोपमम् ।
सागरं चाम्बरं चेति निर्विशेषमदृश्यत ॥११५ ॥
समुद्र के जल - कण बड़े चमकीले दिखायी देते थे । उन्हें देखकर ऐसा जान पड़ता था मानो सागर में आगकी चिनगारियाँ बिखेर दी गयी हों । ( फैले हुए नक्षत्रोंके कारण आकाश भी वैसा ही दिखायी देता था । ) समुद्रमें बड़े - बड़े सर्प थे ( आकाश में भी राहु आदि सर्पाकार ही देखे जाते थे ) । समुद्र देवद्रोही दैत्यों और राक्षसोंका आवास स्थान था ( आकाश भी वैसा ही था; क्योंकि वहाँ भी उनका संचरण देखा जाता था ) । दोनों ही देखने में भयंकर और पातालके समान गम्भीर थे । इस प्रकार समुद्र आकाशके समान और आकाश समुद्रके समान जान पड़ता था । समुद्र और आकाशमें कोई अन्तर नहीं दिखायी देता था ॥ ११४- ११५ ॥
सम्पृक्तं नभसाप्यम्भः सम्पृक्तं च नभोऽम्भसा ।
ताग्रपे स्म दृश्येते तारारत्नसमाकुले ॥ ११६ ॥
जल आकाशसे मिला हुआ था और आकाश जलसे, आकाश तारे छिटके हुए थे और समुद्र में मोती । इसलिये दोनों एक - से दिखायी देते थे ॥ ११६ ॥
समुत्पतितमेघस्य वीचिमालाकुलस्य च ।
विशेषो न द्वयोरासीत् सागरस्याम्बरस्य च ॥११७ ॥
आकाश मेघोंकी घटा घिर आयी थी और समुद्र तरङ्ग-मालाओंसे व्याप्त हो रहा था । अतः समुद्र और आकाश दोनों में कोई अन्तर नहीं रह गया था ॥ ११७ ॥
अन्योन्यैरहताः सक्ताः सखनुर्भीमनिःखनाः ।
ऊर्मयः सिन्धुराजस्य महाभेर्य इवाम्बरे ॥ १ ९ ८ ॥
परस्पर टकराकर और सटकर सिन्धुराजकी लहरें आकाशमें बजनेवाली देवताओंकी बड़ी - बड़ी भेरियोंके समान भयानक शब्द करती थीं ॥ ११८ ॥
रत्नौघजलसंनाद विषक्तमिव वायुना ।
उत्पतन्तमिव क्रुद्धं यादोगणसमाकुलम् ॥ ११ ९ ॥
वायुसे प्रेरित हो रत्नोंको उछालनेवाली जलकी तरङ्गोंके कलकल नादसे युक्त और जल - जन्तुओंसे भरा हुआ समुद्र इस प्रकार ऊपरको उछल रहा था, मानो रोषसे भरा हुआ हो ॥ ११ ९ ॥
ददृशुस्ते महात्मानो वाताहतजलाशयम् ।
अनिलोद्धृतमाकाशे प्रवलान्तमिवोर्मिभिः ॥१२० ॥
उन महामनस्वी वानरवीरोंने देखा, समुद्र वायुके थपेड़े खाकर पवनकी प्रेरणासे आकाश में ऊँचे उठकर उत्ताल तरङ्गों-के द्वारा नृत्य - सा कर रहा था ॥ १२० ॥
ततो विस्मयमापन्ना हरयो ददृशुः स्थिताः ।
भ्रान्तोर्मिजालसंनादं प्रलोलमिव सागरम् ॥१२१ ॥
तदनन्तर वहाँ खड़े हुए वानरोंने यह भी देखा कि चक्कर काटते हुए तरङ्ग - समूहोंके कल - कल नादसे युक्त महा-सागर अत्यन्त चञ्चल - सा हो गया है । यह देखकर उन्हें बड़ा आश्चर्यं हुआ ॥ १२१ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये युद्धकाण्डे चतुर्थः सर्गः ॥ ४ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें चौथा सर्गं पूरा हुआ ॥ ४ ॥
पञ्चमः सर्गः श्रीरामका सीताके लिये शोक और विलाप सा तु नीलेन विधिवत्स्वारक्षा सुसमाहिता । मैन्दश्च द्विविदभौ तत्र वानरपुङ्गवैौ । सागरस्योत्तरे तीरे साधु सा विनिवेशिता ॥ १ ॥ विचेरतुश्च तां सेनां रक्षार्थं सर्वतोदिशम् ॥ २ ॥
नीलने, जिसकी विधिवत् रक्षाकी व्यवस्था की गयी थी, मैन्द और द्विविद – ये दो प्रमुख वानरवीर उस सेनाकी उस परम सावधान वानर सेनाको समुद्रके उत्तर तटपर अच्छे ढंगसे ठहराया ॥ १ ॥ रक्षा के लिये सब ओर विचरते रहते थे ॥ २ ॥
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युद्धकाण्डे पञ्चमः सर्गः १०६५ निविष्टायां तु सेनायां तीरे नदनदीपतेः । " मैं और वह वामोरु सीता एक ही भूतलपर सोते हैं । पार्श्वस्थं लक्ष्मणं दृष्ट्वा रामो वचनमब्रवीत् ॥ ३ ॥ प्रियतमाके संयोगकी इच्छा रखनेवाले मुझ विरहीके लिये
समुद्र के किनारे सेनाका पड़ाव पड़ जानेपर श्रीरामचन्द्र- इतना ही बहुत है । इतने से भी मैं जीवित रह सकता जीने अपने पास बैठे हुए लक्ष्मणकी ओर देखकर कहा – ॥ हूँ ॥ १० ॥
शोकश्च किल कालेन गच्छता ह्यपगच्छति । केदारस्येव केदारः सोदकस्य निरूदकः । मम चापश्यतः कान्तामहन्यहनि वर्धते ॥ ४ ॥ - उपस्नेहेन जीवामि जीवन्तीं यच्छृणोमि ताम् ॥ ११ ॥
' सुमित्रानन्दन! कहा जाता है कि शोक बीतते हुए समयके साथ स्वयं भी दूर हो जाता है; परंतु मेरा शोक तो अपनी प्राणवल्लभाको न देखनेके कारण दिनोंदिन बढ़ रहा है ॥ ४ ॥
न मे दुःखं प्रिया दूरे न मे दुःखं हृतेति च ।
एतदेवानुशोचामि वयोऽस्या ह्यतिवर्तते ॥ ५ ॥
' मुझे इस बातका दुःख नहीं है कि मेरी प्रिया मुझसे दूर है । उसका अपहरण हुआ— इसका भी दुःख नहीं है । मैं तो बारंबार इसीलिये शोकमें डूबा रहता हूँ कि उसके जीवित रहनेके लिये जो अवधि नियत कर दी गयी है, वह शीघ्रता-पूर्वक बीती जा रही है ॥ ५ ॥
वाहि वात यतः कान्ता तां स्पृष्ट्वा मामपि स्पृश ।
त्वयि मे गात्रसंस्पर्शश्चन्द्रे दृष्टिसमागमः ॥ ६ ॥
' हवा! तुम वहाँ बह, जहाँ मेरी प्राणवल्लभा है 1 । उसका स्पर्श करके मेरा भी स्पर्श कर 1 उस दशामें तुझसे जो मेरे अङ्गोंका स्पर्श होगा, वह चन्द्रमासे होने-वाले दृष्टिसंयोगकी भाँति मेरे सारे संतापको दूर करनेवाला और आह्लादजनक होगा ॥ ६ ॥
तन्मे दहति गात्राणि विषं पीतमिवाशये ।
हा नाथेति प्रिया सा मां हियमाणा यदब्रवीत् ॥ ७ ॥
' अपहरण होते समय मेरी प्यारी सीताने जो मुझे ' हा नाथ! ' कहकर पुकारा था, वह पीये हुए उदरस्थित विषकी भाँति मेरे सारे अङ्गोंको दग्ध किये देता है ॥ ७ ॥
तद्वियोगेन्धनवता तश्चिन्ताविमलाचिंषा ।
रात्रिंदिवं शरीरं मे दह्यते मदनाग्निना ॥ ८ ॥
' प्रियतमाका वियोग ही जिसका ईंधन है, उसकी चिन्ता ही जिसकी दीप्तिमती लपटें हैं, वह प्रेमाग्नि मेरे शरीरको रात - दिन जलाती रहती है ॥ ८ ॥
अवगाह्यार्णवं स्वप्स्ये सौमित्रे भवता विना ।
एवं च प्रज्वलन कामो न मा सुप्तं जले दहेत् ॥ ९ ॥
‘ सुमित्रानन्दन! तुम यहीं रहो । मैं तुम्हारे बिना अकेला ही समुद्र के भीतर घुसकर सोऊँगा । इस तरह जलमें शयन करनेपर यह प्रज्वलित प्रेमाग्नि मुझे दग्ध नहीं कर सकेगी । बह्वेतत् कामयानस्य शक्यमेतेन जीवितुम् । ‘ जैसे जलसे भरी हुई क्यारीके सम्पर्क से बिना जलकी क्यारीका धान भी जीवित रहता है — सूखता नहीं है, उसी प्रकार मैं जो यह सुनता हूँ कि सीता अभी जीवित है, इसीसे जी रहा हूँ ॥ ११ ॥
कदा नु खलु सुश्रोणों शतपत्रायतेक्षणाम् ।
विजित्य शत्रून् द्रक्ष्यामि सीतां स्फीतामिव श्रियम् ॥ १२ ॥
' कब वह समय आयेगा, जब शत्रुओंको परास्त करके मैं समृद्धिशालिनी राजलक्ष्मीके समान कमलनयनी सुमध्यमा सीता-को देखूँगा ॥ १२ ॥
कदा सुचारुदन्तोष्ठं तस्याः पद्ममिवाननम् ।
ईषदुन्नाम्य पास्यामि रसायनमिवातुरः ॥ १३ ॥
" जैसे रोगी रसायनका पान करता है, उसी प्रकार मैं कब सुन्दर दाँतों और बिम्बसदृश मनोहर ओठोंसे युक्त सीताके प्रफुल्लकमल - जैसे मुखको कुछ ऊपर उठाकर चूमूँगा ॥ १३ ॥
तौ तस्याः सहितौ पीनौ स्तनौ तालफलोपमौ ।
कदा नु खलु सोत्कम्पौ श्लिष्यन्त्या मां भजिष्यतः ॥ १४ ॥
' मेरा आलिङ्गन करती हुई प्रिया सीता के वे परस्पर सटे हुए, तालफलके समान गोल और मोटे दोनों स्तन कब किंचित् कम्पनके साथ मेरा स्पर्श करेंगे ॥ १४ ॥
सा नूनमसितापाङ्गी रक्षोमध्यगता सती ।
मन्नाथा नाथहीनेव त्रातारं नाधिगच्छति ॥ १५ ॥
' कजरारे नेत्रप्रान्तवाली वह सती - साध्वी सीता, जिसका मैं ही नाथ हूँ, आज अनाथकी भाँति राक्षसों के बीचमें पड़-कर निश्चय ही कोई रक्षक नहीं पा रही होगी ॥ १५ ॥
कथं जनकराजस्य दुहिता मम च प्रिया ।
राक्षसीमध्यगा शेते स्नुषा दशरथस्य च ॥ १६ ॥
“ राजा जनककी पुत्री, महाराज दशरथकी पुत्रवधू और मेरी प्रियतमा सीता राक्षसियोंके बीचमें कैसे सोती होगी ९ । १६ ।
अविक्षोभ्याणि रक्षांसि सा विधूयोत्पतिष्यति ।
विधूय जलदान् नीलाञ्शशिलेखा शरत्स्विव ॥ १७ ॥
' वह समय कब आयेगा, जब कि सीता मेरे द्वारा उन दुर्धर्षं राक्षसोंका विनाश करके उसी प्रकार अपना उद्धार करेगी, जैसे शरत्कालमें चन्द्रलेखा काले बादलोंका निवारण करके यदहं सा च वामोरुरेकां धरणिमाश्रितौ ॥ १० ॥ उनके आवरणसे मुक्त हो जाती है ॥ १७ ॥
वा ० रा ० ५.८.८-
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१०६६ श्रीमद्वाल्मीकीय रामायणे
स्वभावतनुका नूनं शोकेनानशनेन च ।
भूयस्तनुतरा सीता देशकालविपर्ययात् ॥ १८ ॥
' स्वभावसे ही दुबले - पतले शरीरवाली सीता विपरीत देश-कालमें पड़ जाने के कारण निश्चय ही शोक और उपवास करके और भी लट गयी होगी ॥ १८ ॥
कदा नु राक्षसेन्द्रस्य निधायोरसि सायकान् ।
शोकं प्रत्याहरिष्यामि शोकमुत्सृज्य मानसम् ॥ १ ९ ॥
" मैं राक्षसराज रावणकी छातीमें अपने सायकोंको धँसाकर अपने मानसिक शोकका निराकरण करके कब सीताका शोक करूँगा ॥ १ ९ ॥
कदा नु खलु मे साध्वी सीतामरसुतोपमा ।
सोत्कण्ठा कण्ठमालम्ब्य मोक्ष्यत्यानन्दजं जलम् ॥२० ॥
" देवकन्या के समान सुन्दरी मेरी सती - साध्वी सीता कब उत्कण्ठापूर्वक मेरे गलेसे लगकर अपने नेत्रोंसे आनन्दके आँसू बहायेगी ॥ २० ॥
कदा शोकमिमं घोरं मैथिलीविप्रयोगजम् ।
सहसा विप्रमोक्ष्यामि वासः शुक्लेतरं यथा ॥ २१ ॥
" ऐसा समय कब आयेगा, जब मैं मिथिलेशकुमारीके वियोगसे होनेवाले इस भयंकर शोकको मलिन वस्त्रकी भाँति सहसा त्याग दूँगा? ' ॥२१ ॥
एवं विलपतस्तस्य तत्र रामस्य धीमतः ।
दिनक्षयान्मन्दवपुर्भास्करोऽस्तमुपागमत् ॥ २२ ॥
बुद्धिमान् श्रीरामचन्द्रजी वहाँ इस प्रकार विलाप कर ही रहे थे कि दिनका अन्त होनेके कारण मन्द किरणोंवाले सूर्यदेव अस्ताचलको जा पहुँचे ॥ २२ ॥
आश्वासितो लक्ष्मणेन रामः संध्यामुपासत ।
स्मरन् कमलपत्राक्षी सीतां शोकाकुलीकृतः ॥ २३ ॥
उस समय लक्ष्मणके धैर्य बँधानेपर शोकसे व्याकुल हुए श्रीरामने कमलनयनी सीताका चिन्तन करते हुए संध्योपासना की ॥ २३ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये युद्धकाण्डे पञ्चमः सर्गः ॥ ५ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्ड में पाँचवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ५ ॥
षष्ठः सर्गः रावणका कर्तव्य निर्णय के लिये अपने मन्त्रियोंसे समुचित सलाह देनेका अनुरोध करना लङ्कायां तु कृतं कर्म घोरं दृष्ट्रा भयावहम् ।
राक्षसेन्द्रो हनुमता शक्रेणेव महात्मना ।
अब्रवीद् राक्षसान् सर्वान् हिया किंचिदवाङ्मुखः ॥ १ ॥
इधर इन्द्रतुल्य पराक्रमी महात्मा हनुमान्जीने लङ्कामें जो अत्यन्त भयावह घोर कर्म किया था, उसे देखकर राक्षस-राज रावणका मुख लज्जासे कुछ नीचेको झुक गया और उसने समस्त राक्षसोंसे इस प्रकार कहा- ॥ १ ॥
धर्षिता च प्रविष्टा च लङ्का दुष्प्रसहा पुरी ।
तेन वानरमात्रेण दृष्टा सीता च जानकी ॥ २ ॥
' निशाचरो! वह हनुमान्, जो एक वानरमात्र है, अकेला ' तुमलोगों का भला हो । अब मैं क्या करूँ? तुम्हें जो कार्य उचित और समर्थ जान पड़े तथा जिसे करनेपर कोई अच्छा परिणाम निकले, उसे बताओ ॥ ४ ॥
मन्त्रमूलं च विजयं प्रवदन्ति मनस्विनः ।
तस्माद् वै रोचये मन्त्रं रामं प्रति महाबलाः ॥ ५ ॥
' महाबली वीरो! मनस्वी पुरुषोंका कहना है कि विजय-का मूल कारण मन्त्रियोंकी दी हुई अच्छी सलाह ही है । इसलिये मैं श्रीरामके विषय में आपलोगोंसे सलाह लेना अच्छा समझता हूँ ॥ ५ ॥
त्रिविधाः पुरुषा लोके उत्तमाधममध्यमाः । इस दुर्धर्ष पुरीमें घुस आया । उसने इसे तहस - नहस कर डाला तेषां तु समवेतानां गुणदोषौ वदाम्यहम् ॥ ६ ॥
और जनककुमारी सीतासे भेंट भी कर लिया ॥ २ ॥
प्रासादो धर्षितश्चैत्यः प्रवरा राक्षसा हताः ।
आविला च पुरी लङ्का सर्वा हनुमता कृता ॥ ३ ॥
" इतना ही नहीं, हनुमान्ने चैत्यप्रासादको धराशायी कर दिया, मुख्य - मुख्य राक्षसों को मार गिराया और सारी लङ्का-पुरीमें खलबली मचा दी ॥ ३ ॥
किं करिष्यामि भद्रं वः किं वो युक्तमनन्तरम् ।
उच्यतां नः समर्थ यत् कृतं च सुकृतं भवेत् ॥ ४ ॥
" संसार में उत्तम, मध्यम और अधम तीन प्रकारके पुरुष होते हैं । मैं उन सबके गुण - दोषोंका वर्णन करता हूँ ॥ ६ ॥
मन्त्रस्त्रिभिर्हि संयुक्तः समर्थैर्मन्त्रनिर्णये ।
मित्रैर्वापि समानार्थैर्वान्धवैरपि वाधिकैः ॥ ७ ॥
सहितो मन्त्रयित्वा यः कर्मारम्भान् प्रवर्तयेत् ।
दैवे च कुरुते यत्नं तमाहुः पुरुषोत्तमम् ॥ ८ ॥
' जिसका मन्त्र आगे बताये जानेवाले तीन लक्षणोंसे युक्त होता है तथा जो पुरुष मन्त्रनिर्णय में समर्थ मित्रों, समान
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युद्धकाण्डे सप्तमः सर्गः १०६७ दुःख - सुखवाले बान्धवों और उनसे भी बढ़कर अपने हित-कारियोंके साथ सलाह करके कार्यका आरम्भ करता है तथा दैवके सहारे प्रयत्न करता है, उसे उत्तम पुरुष कहते हैं ॥ ७-८ ॥
एकोऽर्थ विमृशेदेको धर्मे प्रकुरुते मनः ।
एकः कार्याणि कुरुते तमाहुर्मध्यमं नरम् ॥ ९ ॥
" जो अकेला ही अपने कर्तव्यका विचार करता है, अकेला ही धर्ममें मन लगाता है और अकेला ही सब काम करता है, उसे मध्यम श्रेणीका पुरुष कहा जाता है ॥ ९ ॥
गुणदोषो न निश्चित्य त्यक्त्वा दैवव्यपाश्रयम् ।
करिष्यामीति यः कार्यमुपेक्षेत् स नराधमः ॥ १० ॥
" जो गुण - दोषका विचार न करके दैवका भी आश्रय छोड़कर केवल ' करूँगा ' इसी बुद्धिसे कार्य आरम्भ करता है और फिर उसकी उपेक्षा कर देता है, वह पुरुषोंमें अधम है ॥ १० ॥
यथे पुरुषा नित्यमुत्तमाधममध्यमाः ।
एवं मन्त्रोऽपि विज्ञेय उत्तमाधममध्यमः ॥ ११ ॥
" जैसे ये पुरुष सदा उत्तम, मध्यम और अधम तीन प्रकारके होते हैं, वैसे ही मन्त्र ( निश्चित किया हुआ विचार ) भी उत्तम, मध्यम और अधम भेदसे तीन प्रकारका समझना चाहिये ॥ ११ ॥
ऐकमत्यमुपागम्य शास्त्र टेन चक्षुषा ।
मन्त्रिणो यत्र निरतास्तमाहुर्मन्त्रमुत्तमम् ॥ १२ ॥
' जिसमें शास्त्रोक्त दृष्टिसे सब मन्त्री एकमत होकर प्रवृत्त होते हैं, उसे उत्तम मन्त्र कहते हैं ॥ १२ ॥
बह्वीरपि मतीर्गत्वा मन्त्रिणामर्थनिर्णयः ।
पुनर्यत्रैकतां प्राप्तः स मन्त्रो मध्यमः स्मृतः ॥ १३ ॥
" जहाँ प्रारम्भमें कई प्रकारका मतभेद होनेपर भी अन्त-में सब मन्त्रियोंका कर्तव्यविषयक निर्णय एक हो जाता है, वह मन्त्र मध्यम माना गया है ॥ १३ ॥
अन्योन्यमतिमास्थाय यत्र सम्प्रतिभाष्यते ।
न चैकमत्ये श्रेयोऽस्ति मन्त्रः सोऽधम उच्यते ॥ १४ ॥
" जहाँ भिन्न - भिन्न बुद्धिका आश्रय ले सब ओरसे स्पर्धा-पूर्वक भाषण किया जाय और एकमत होनेपर भी जिससे कल्याणकी सम्भावना न हो, वह मन्त्र या निश्चय अधम कहलाता है ॥ १४ ॥
तस्मात् सुमन्त्रितं साधु भवन्तो मतिसत्तमाः ।
कार्य सम्प्रतिपद्यन्तमेतत् कृत्यं मतं मम ॥ १५ ॥
' आप सब लोग परम बुद्धिमान् हैं; इसलिये अच्छी तरह सलाह करके कोई एक कार्य निश्चित करें । उसीको मैं अपना कर्तव्य समझँगा ॥ १५ ॥
वानराणां हि धीराणां सहस्रैः परिवारितः ।
रामोऽभ्येति पुरीं लङ्कामस्माकमुपरोधकः ॥ १६ ॥
" ( ऐसे निश्चयकी आवश्यकता इसलिये पड़ी है कि ) राम सहस्रों धीरवीर वानरोंके साथ हमारी लङ्कापुरीपर चढ़ाई करनेके लिये आ रहे हैं ॥ १६ ॥
तरिष्यति च सुव्यक्तं राघवः सागरं सुखम् ।
तरसा युक्तरूपेण सानुजः सबलानुगः ॥ १७ ॥
" यह बात भी भलीभाँति स्पष्ट हो चुकी है कि वे रघुवंशी राम अपने समुचित बलके द्वारा भाई, सेना और सेवकों सहित सुखपूर्वक समुद्रको पार कर लेंगे ॥ १७ ॥
समुद्रमुच्छोषयति वीर्येणान्यत्करोति तस्मिन्नेवंविधे कार्ये विरुद्धे वानरैः हितं पुरे च सैन्ये च सर्व सम्मन्त्रयतां " वे या तो समुद्रको ही सुखा डालेंगे या कोई दूसरा ही उपाय करेंगे । ऐसी स्थितिमें आ पड़ने पर नगर और सेनाके लिये वैसी सलाह आपलोग दीजिये ' ॥ १८ ॥
वा ।
सह ।
मम ॥ १८ ॥
अपने पराक्रमसे वानरोंसे विरोध भी हितकर हो, इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये युद्धकाण्डे षष्ठः सर्गः ॥ ६ ॥
इस प्रकार श्री वाल्मीकि निर्मित आरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्ड में छठा सर्ग पूरा हुआ ॥ ६ ॥
सप्तमः सर्गः राक्षसोंका रावण और इन्द्रजित् के बल पराक्रमका वर्णन रामपर विजय पाने का विश्वास दिलाना इत्युक्ता राक्षसेन्द्रेण राक्षसास्ते महाबलाः । बलाबलको ही समझते ऊचुः प्राञ्जलयः सर्वे रावणं राक्षसेश्वरम् ॥ १ ॥ नीति की दृष्टिसे महामूर्ख
द्विपत्पक्षमविज्ञाय नीतिवाह्यस्त्वबुद्धयः । उनसे पूर्वोक्त बातें कहीं राक्षसों को न तो नीतिका ज्ञान था और न वे शत्रुपक्षके बोले – ॥ १३ ॥
करते हुए उसे थे । वे बलवान् बहुत थे; किंतु थे । इसलिये जब राक्षसराज रावणने , तब वे सब - के - सब हाथ जोड़कर उससे
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१०६८ श्रीमवाल्मीकीय रामायणे राजन् परिघशक्त्यृष्टिशूलपट्टिशकुन्तलम् ॥ २ ॥
सुमन बलं कस्मादविषादं भजते भवान् । ' राजन्! हमारे पास परिघ, शक्ति, ऋष्टि, शूल, पट्टिश और भालोंसे लैस बहुत बड़ी सेना मौजूद है; फिर आप विवाद क्यों करते हैं ॥ २३ ॥
त्वया भोगवतीं गत्वा निर्जिताः पन्नगा युधि ॥ ३ ॥
कैलासशिखरावासी यक्षैर्बहुभिरावृतः ।
सुमहत् कदनं कृत्वा वश्यस्ते धनदः कृतः ॥ ४ ॥
' आपने तो भोगवती पुरीमें जाकर नागों को भी युद्ध में परास्त कर दिया था । बहुसंख्यक यक्षोंसे घिरे हुए कैलास-शिखरके निवासी कुबेरको भी युद्ध में भारी मार - काट मचाकर वशमें कर लिया था ॥ ३-४ ॥
स महेश्वरसख्येन श्लाघमानस्त्वया विभो ।
निर्जितः समरे रोषाल्लोकपालो महाबलः ॥ ५ ॥
" प्रभो! महाबली लोकपाल कुबेर महादेवजीके साथ मित्रता होनेके कारण आपके साथ बड़ी स्पर्धा रखते थे; परंतु आपने समराङ्गणमें रोषपूर्वक उन्हें हरा दिया ॥ ५ ॥
विनिपात्य च यक्षौघान् विक्षोभ्य विनिगृह्य च ।
त्वया कैलासशिखराद् विमानमिदमाहृतम् ॥ ६ ॥
" यक्षोंकी सेनाको विचलित करके बंदी बना लिया और कितनोंको धराशायी करके कैलासशिखरसे आप उनका यह विमान छीन लाये थे ॥ ६ ॥
मयेन दानवेन्द्रेण त्वद्भयात् सख्यमिच्छता ।
दुहिता तव भार्यार्थे दत्ता राक्षसपुङ्गव ॥ ७ ॥
' राक्षसशिरोमणे! दानवराज मयने आपसे भयभीत होकर ही आपको अपना मित्र बना लेनेकी इच्छा की और इसी उद्देश्यसे आपको धर्मपत्नीके रूपमें अपनी पुत्री समर्पित कर दी ॥ ७ ॥
दानवेन्द्रो महाबाहो वीर्योत्सिक्तो दुरासदः ।
विगृह्य वशमानीतः कुम्भीनस्याः सुखावहः ॥ ८ ॥
‘ महाबाहो! अपने पराक्रमका घमंड रखनेवाले दुर्जय दानवराज मधुको भी, जो आपकी बहिन कुम्भीनसीको सुख देनेवाला उसका पति है, आपने युद्ध छेड़कर वशमें कर लिया ॥
निर्जितास्ते महाबाहो नागा गत्वा रसातलम् ।
वासुकिस्तक्षकः शङ्खो जटी च वशमाहृताः ॥ ९ ॥
' विशालबाहु वीर! आपने रसातलपर चढ़ाई करके वासुकि, तक्षक, शङ्ख और जटी आदि नागको युद्धमें जीता और अपने अधीन कर लिया ॥ ९ ॥
अक्षया बलवन्तश्च शूरा लब्धवराः पुनः ।
त्वया संवत्सरं युद्ध्वा समरे दानवा विभो ॥ १० ॥
स्वबलं समुपाश्रित्य नीता वशमरिंदम ।
मायाश्चाधिगतास्तत्र वह्नयो वै राक्षसाधिप ॥ ११ ॥
प्रभो! शत्रुदमन राक्षसराज! दानवलोग बड़े ही बलवान्, किसीसे नष्ट न होनेवाले, शूरवीर तथा वर पाकर अद्भुत शक्तिसे सम्पन्न हो गये थे; परंतु आपने समराङ्गण-में एक वर्षतक युद्ध करके अपने ही बलके भरोसे उन सबको अपने अधीन कर लिया और वहाँ उनसे बहुत - सी मायाएँ भी प्राप्त कीं ॥ १०-११ ॥
शूराश्च बलवन्तश्च वरुणस्य सुता रणे ।
निर्जितास्ते महाभाग चतुर्विधबलानुगाः ॥ १२ ॥
' महाभाग! आपने वरुणके शूरवीर और बलवान् पुत्रों-को भी उनकी चतुरंगिणी सेनासहित युद्ध में परास्त कर दिया था ॥ १२ ॥
मृत्युदण्डमहाग्राहं शाल्मलीद्रुममण्डितम् ।
कालपाशमहावीचि यमकिंकरपन्नगम् ॥ १३ ॥
महाज्वरेण दुर्धर्ष यमलोकमहार्णवम् ।
अवगाह्य त्वया राजन् यमस्य बलसागरम् ॥ १४ ॥
जयश्च विपुलः प्राप्तो मृत्युश्च प्रतिषेधितः ।
सुयुद्धेन च ते सर्वे लोकस्तत्र सुतोषिताः ॥ १५ ॥
' राजन्! मृत्युका दण्ड ही जिसमें महान् ग्राहके समान है, जो यम यातना - सम्बन्धी शाल्मलि आदि वृक्षोंसे मण्डित है, कालपाशरूपी उत्ताल तरङ्गे जिसकी शोभा बढ़ाती हैं, यमदूत-रूपी सर्प जिसमें निवास करते हैं तथा जो महान् ज्वरके कारण दुर्जय है, उस यमलोकरूपी महासागरमें प्रवेश करके आपने यमराजकी सागर - जैसी सेनाको मथ डाला, मृत्युको रोक दिया और महान् विजय प्राप्त की । यही नहीं, युद्धकी उत्तम कला-से आपने वहाँके सब लोगोंको पूर्ण संतुष्ट कर दिया था ॥
क्षत्रियैर्बहुभिर्वीरैः शक्रतुल्यपराक्रमैः ।
आसीद् वसुमती पूर्णा महद्भिरिव पादपैः ॥ १६ ॥
' पहले यह पृथ्वी विशाल वृक्षोंकी भाँति इन्द्रतुल्य पराक्रमी बहुसंख्यक क्षत्रिय वीरोंसे भरी हुई थी । १६ ॥
तेषां वीर्यगुणोत्साहैर्न समो राघवो रणे ।
प्रसह्यते त्वया राजन् हताः समरदुर्जयाः ॥ १७ ॥
' उन वीरोंमें जो पराक्रम, गुण और उत्साह थे, उनकी दृष्टिसे राम रणभूमिमें उनके समान कदापि नहीं है; राजन्! जब आपने उन समरदुर्जय वीरोंको भी बलपूर्वक मार डाला, तब रामपर विजय पाना आपके लिये कौन बड़ी बात है १ ॥
तिष्ठ वा किं महाराज श्रमेण तव वानरान् ।
अयमेको महाबाहुरिन्द्रजित् क्षपयिष्यति ॥ १८ ॥
' अथवा महाराज! आप चुपचाप यहीं बैठे रहें । आपको परिश्रम करनेकी क्या आवश्यकता है । अकेले ये
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युद्धकाण्डे अष्टमः सर्गः १०६ ९ महाबाहु इन्द्रजित् ही सब वानरोंका संहार कर डालेंगे ॥ १८ ॥
अनेन च महाराज माहेश्वरमनुत्तमम् ।
इष्ट्वा यज्ञं वरो लब्धो लोके परमदुर्लभः ॥ १ ९ ॥
' महाराज! इन्होंने परम उत्तम माहेश्वर यज्ञका अनुष्ठान करके वह वर प्राप्त किया है, जो संसारमें दूसरेके लिये अत्यन्त दुर्लभ है ॥ १ ९ ॥
शक्तितोमरमीनं च विनिकीर्णान्त्रशैवलम् ।
गजकच्छपसम्बाधमश्वमण्डूकसंकुलम् ॥ २० ॥
रुद्रादित्यमहाग्राह मरुद्वसुमहोरगम् ।
रथाश्वगजतोयौघं पदातिपुलिनं महत् ॥ २१ ॥
अनेन हि समासाद्य देवानां बलसागरम् ।
गृहीतो दैवतपतिर्लङ्कां चापि प्रवेशितः ॥ २२ ॥
' देवताओंकी सेना समुद्रके समान थी । शक्ति और तोमर ही उसमें मत्स्य थे । निकालकर फेंकी हुई आँतें सेवार-का काम देती थीं । हाथी ही उस सैन्य - सागर में कछुओंके समान भरे थे । घोड़े मेढकोंके समान उसमें सब ओर व्याप्त थे । रुद्रगण और आदित्यगण उस सेनारूपी समुद्रके बड़े - बड़े ग्राह थे । मरुद्गण और वसुगण वहाँके विशाल नाग थे । रथ, हाथी और घोड़े जलराशिके समान थे और पैदल सैनिक उसके विशाल तट थे; परंतु इस इन्द्रजित्ने देवताओंके उस सैन्य - समुद्र में घुसकर देवराज इन्द्रको कैद कर लिया और उन्हें लङ्कापुरीमें लाकर बंद कर दिया ॥ २०-२२ ॥
पितामहनियोगाच्च मुक्तः शम्बरवृत्रहा ।
गतस्त्रिविष्टपं राजन् सर्वदेवनमस्कृतः ॥२३ ॥
' राजन्! फिर ब्रह्माजीके कहनेसे इन्होंने शम्बर और
वृत्रासुर को मारनेवाले सर्वदेववन्दित इन्द्रको मुक्त किया ।
तब वे स्वर्गलोकमें गये ॥ २३ ॥
तमेव त्वं महाराज विसृजेन्द्रजितं सुतम् ।
यावद् वानर सेनां तां सरामां नयति क्षयम् ॥ २४ ॥
' अतः महाराज! इस कामके लिये आप राजकुमार इन्द्र-जित् को ही भेजिये, जिससे ये रामसहित वानर सेनाका यहाँ आनेसे पहले ही संहार कर डालें ॥ २४ ॥
राजन्नापदयुक्तेयमागता प्राकृताजनात् ।
हृदि नैव त्वया कार्या त्वं वधिष्यसि राघवम् ॥ २५ ॥
' राजन्! साधारण नर और वानरोंसे प्राप्त हुई इस आपत्तिके विषय में चिन्ता करना आपके लिये उचित नहीं है ।
आपको तो अपने हृदयमें इसे स्थान ही नहीं देना चाहिये ।
आप अवश्य ही रामका वध कर डालेंगे ' ॥ २५ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये युद्धकाण्डे सप्तमः सर्गः ॥ ७ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें सातवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ७ ॥
अष्टमः सर्गः प्रहस्त, दुर्मुख, वज्रदंष्ट्र, निकुम्भ और मार गिरानेका
ततो नीलाम्बुदप्रख्यः प्रहस्तो नाम राक्षसः ।
अब्रवीत् प्राञ्जलिर्वाक्यं शूरः सेनापतिस्तदा ॥ १ ॥
इसके बाद नील मेघके समान श्यामवर्णवाले शूर सेना-पति प्रहस्त नामक राक्षसने हाथ जोड़कर कहा- ॥ १ ॥
देवदानवगन्धर्वाः पिशाचपतगोरगाः ।
सर्वे धर्षयितुं शक्याः किं पुनर्मानवौ रणे ॥ २ ॥
“ महाराज! हमलोग देवता, दानव, गन्धर्व, पिशाच, पक्षी और सर्प सभीको पराजित कर सकते हैं; फिर उन दो मनुष्योंको रणभूमिमें हराना कौन बड़ी बात है ॥ २ ॥
सर्वे प्रमत्ता विश्वस्ता वञ्चिताः स्म हनूमता ।
नहि मे जीवतो गच्छेज्जीवन् स वनगोचरः ॥ ३ ॥
‘ पहले हमलोग असावधान थे 1 । हमारे मनमें शत्रुओंकी ओरसे कोई खटका नहीं था । इसीलिये हम निश्चिन्त बैठे थे । यही कारण है कि हनुमान् हमें धोखा दे गया । नहीं तो वज्रहनुका रावणके सामने शत्रु सेनाको उत्साह दिखाना मेरे जीते - जी वह वानर यहाँसे जीता - जागता नहीं जा सकता था ॥ ३ ॥
सर्वा सागरपर्यन्तां सशैलवनकाननाम् ।
करोम्यवानरां भूमिमाज्ञापयतु मां भवान् ॥ ४ ॥
" यदि आपकी आज्ञा हो तो पर्वत, वन और काननसहित समुद्रतककी सारी भूमिको मैं वानरोंसे सूनी कर दूँ ॥ ४ ॥
रक्षां चैव विधास्यामि वानराद् रजनीचर ।
नागमिष्यति ते दुःखं किंचिदात्मापराधजम् ॥ ५ ॥
' राक्षसराज! मैं वानरमात्रसे आपकी रक्षा करूँगा, अतः अपनेद्वारा किये गये सीता हरणरूपी अपराधके कारण कोई दुःख आपपर नहीं आने पायेगा ' ॥ ५ ॥
अब्रवीत् तु सुसंक्रुद्धो दुर्मुखो नाम राक्षसः ।
इदं न क्षमणीयं हि सर्वेषां नः प्रधर्षणम् ॥ ६ ॥
तत्पश्चात् दुर्मुख नामक राक्षसने अत्यन्त कुपित होकर
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१०७० श्रीमद्वाल्मीकीय रामायणे कहा - " यह क्षमा करनेयोग्य अपराध नहीं है, क्योंकि इसके द्वारा हम सब लोगोंका तिरस्कार हुआ है ॥ ६ ॥
अयं परिभवो भूयः पुरस्यान्तःपुरस्य च ।
श्रीमतो राक्षसेन्द्रस्य वानरेण प्रधर्षणम् ॥ ७ ॥
" वानरके द्वारा हमलोगोंपर जो आक्रमण हुआ है, यह समस्त लङ्कापुरीका, महाराजके अन्तःपुरका और श्रीमान् राक्षसराज रावणका भी भारी पराभव है ॥ ७ ॥
अस्मिन् मुहूर्ते गत्वैको निवर्तिष्यामि वानरान् ।
प्रविष्टान् सागरं भीममम्बरं वा रसातलम् ॥ ८ ॥
“ मैं अभी इसी मुहूर्तमें अकेला ही जाकर सारे वानरोंको मार भगाऊँगा । भले ही वे भयंकर समुद्रमें, आकाशमें अथवा रसातलमें ही क्यों न घुस गये हों ' ॥ ८ ॥
ततोऽब्रवीत् सुसंक्रुद्धो वज्रदंष्ट्रो महाबलः ।
प्रगृह्य परिघं घोरं मांसशोणितरूषितम् ॥ ९ ॥
इतनेही में महाबली वज्रदंष्ट्र अत्यन्त क्रोधसे भरकर रक्त, मांससे सने हुए भयानक परिघको हाथमें लिये हुए बोला ॥
किं नो हनूमता कार्य कृपणेन तपखिना ।
रामे तिष्ठति दुर्धर्षे सुग्रीवेऽपि सलक्ष्मणे ॥ १० ॥
' दुर्जय वीर राम, सुग्रीव और लक्ष्मणके रहते हुए हमें उस बेचारे तपस्वी हनुमान्से क्या काम है? ॥ १० ॥
अद्य रामं ससुग्रीवं परिघेण सलक्ष्मणम् ।
आगमिष्यामि हत्वैको विक्षोभ्य हरिवाहिनीम् ॥ ११ ॥
' आज मैं अकेला ही वानर सेनामें तहलका मचा दूँगा और इस परिघसे सुग्रीव तथा लक्ष्मणसहित रामका भी काम तमाम करके लौट आऊँगा ॥ ११ ॥
इदं ममापरं वाक्यं शृणु राजन् यदिच्छसि ।
उपायकुशलो ह्येव जयेच्छत्रूनतन्द्रितः ॥ १२ ॥
' राजन्! यदि आपकी इच्छा हो तो आप यह मेरी बिना किसी घबराहट के उन रघुवंशशिरोमणिसे कहें कि हम आपके सैनिक हैं । हमें आपके छोटे भाई भरतने भेजा है । इतना सुनते वे वानर सेनाको उठाकर तुरंत लङ्कापर आक्रमण करनेके लिये वहाँसे चल देंगे ॥ १३-१५ ॥
ततो वयमितस्तूर्ण शूलशक्तिगदाधराः ।
हस्ताश्च त्वरितास्तत्र यामहे ॥ १६ ॥
चापवाणासि ' तत्पश्चात् हमलोग यहाँसे शूल, शक्ति, गदा, धनुष, बाण और खड्ग धारण किये शीघ्र ही मार्गमें उनके पास जा पहुँचें ॥ १६ ॥
आकाशे गणशः स्थित्वा हत्वा तां हरिवाहिनीम् ।
अश्मशस्त्र महावृष्ट्या प्रापयाम यमक्षयम् ॥ १७ ॥
' फिर आकाश में अनेक यूथ बनाकर खड़े हो जायँ और पत्थरों तथा शस्त्र समूहों की बड़ी भारी वर्षा करके उस वानर-सेनाको यमलोक पहुँचा दें ॥ १७ ॥
एवं दुपसर्पता मन रामलक्ष्मणौ ।
अवश्यमपनीतेन जहतामेव जीवितम् ॥ १८ ॥
' यदि इस प्रकार हमारी बातें सुनकर वे दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मण सेनाको कूच करनेकी आज्ञा दे देंगे और वहाँसे चल देंगे तो उन्हें हमारी अनीतिका शिकार होना पड़ेगा; उन्हें हमारे छलपूर्ण प्रहारसे पीड़ित होकर अपने प्राणोंका परित्याग करना पड़ेगा ॥ १८ ॥
कम्भकर्णस्ततो वीरो निकुम्भो नाम वीर्यवान् ।
अब्रवीत् परमक्रुद्धो रावणं लोकरावणम् ॥ १ ९ ॥
तदनन्तर पराक्रमी वीर कुम्भकर्णकुमार निकुम्भ अत्यन्त कुपित होकर समस्त लोकोंको रुलानेवाले रावणसे कहा ॥ १ ९ ॥
सर्वे भवन्तस्तिष्ठन्तु महाराजेन संगताः ।
अहमेको हनिष्यामि राघवं सहलक्ष्मणम् ॥ २० ॥
सुग्रीवं सहनूमन्तं सर्वाश्चैवात्र वानरान् । दूसरी बात सुनें । उपायकुशल पुरुष ही यदि आलस्य छोड़- ' आप सब लोग यहाँ महाराजके साथ चुपचाप बैठे रहें । कर प्रयत्न करे तो वह शत्रुओं पर विजय पा सकता है ॥१२ ॥
कामरूपधराः शूराः सुभीमा भीमदर्शनाः ।
राक्षसा वा सहस्राणि राक्षसाधिप निश्चिताः ॥ १३ ॥
काकुत्स्थमुपसंगम्य विभ्रतो मानुषं वपुः ।
सर्वे सम्भ्रमा भूत्वा ब्रुवन्तु रघुसत्तमम् ॥ १४ ॥
प्रेषिता भरतेनैव भ्रात्रा तव यवीयसा ।
स हि सेनां समुत्थाप्य क्षिप्रमेवोपयास्यति ॥ १५ ॥
मैं अकेला ही राम, लक्ष्मण, सुग्रीव, हनुमान् तथा अन्य सब वानरोंको भी यहाँ मौतके घाट उतार दूँगा ' ॥ २०३ ॥
ततो वज्रहनुर्नाम राक्षसः पर्वतोपमः ॥ २१ ॥
क्रुद्धः परिलिहन सृक्कां जिह्वया वाक्यमब्रवीत् । तब पर्वतके समान विशालकाय वज्रहनु नामक राक्षस कुपित हो जीभ से अपने जबड़ेको चाटता हुआ बोला ॥ स्वैरं कुर्वन्तु कार्याणि भवन्तो विगतज्वराः ॥ २२ ॥
' अतः राक्षसराज! मेरी दूसरी राय यह है कि इच्छा- तां सर्वा हरिवाहिनीम् । नुसार रूप धारण करनेवाले, अत्यन्त भयानक तथा भयंकर एकोऽहं भक्षयिष्यामि दृष्टिवाले सहस्रों शूरवीर राक्षस एक निश्चित विचार करके ' आप सब लोग निश्चिन्त होकर इच्छानुसार अपना - अपना मनुष्यका रूप धारण कर श्रीरामके पास जायँ और सब लोग काम करें । मैं अकेला ही सारी वानर सेनाको खा जाऊँगा ||
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युद्धकाण्डे नवमः सर्गः १०७१३ स्वस्थाः क्रीडन्तु निश्चिन्ताः पिवन्तु मधु वारुणीम् ॥ २३ ॥ ' आपलोग स्वस्थ रहकर क्रीड़ा करें और निश्चिन्त हो
अहमेको वधिष्यामि सुग्रीवं सहलक्ष्मणम् । वारुणी मदिराको पियें । मैं अकेला ही सुग्रीव, लक्ष्मण, अंगद, साङ्गदं च हनूमन्तं सर्वाश्चैवात्र वानरान् ॥ २४ ॥ हनुमान् और अन्य सब वानरोंका भी यहाँ वध कर डालूँगा ' |
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये युद्धकाण्डेऽष्टमः सर्गः ॥ ८ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्ष रामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्ड में आठवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ८ ॥
नवमः सर्गः विभीषणका रावणसे श्रीरामकी अजेयता बताकर सीताको लौटा देनेके लिये अनुरोध करना
ततो निकुम्भो रभसः सूर्यशत्रुर्महाबलः ।
सुप्तघ्नो यज्ञकोपश्च महापार्श्वमहोदरौ ॥ १ ॥
अग्निकेतुश्च दुर्धर्षो रश्मिकेतुश्च राक्षसः ।
इन्द्रजिच्च महातेजा बलवान् रावणात्मजः ॥ २ ॥
प्रहस्तोऽथ विरूपाक्षो वज्रदंष्ट्रो महाबलः ।
धूम्राक्षश्चातिकायश्च दुर्मुखश्चैव राक्षसः ॥ ३ ॥
परिधान पट्टिशाञ्शूलान् प्रासाञ्शक्तिपरश्वधान् ।
चापानि च सुवाणानि खङ्गांश्च विपुलाम्बुभान् ॥ ४ ॥
प्रगृह्य परमक्रुद्धाः समुत्पत्य च राक्षसाः ।
अब्रुवन् रावणं सर्वे प्रदीप्ता इव तेजसा ॥ ५ ॥
तत्पश्चात् निकुम्भ, रभस, महाबली सूर्यशत्रु, सुप्तघ्न, यज्ञकोप, महापार्श्व, महोदर, दुर्जय अग्निकेतु, राक्षस रश्मिकेतु, महातेजस्वी बलवान् रावणकुमार इन्द्रजित्, प्रहस्त, विरूपाक्ष, महाबली वज्रदंष्ट्र, धूम्राक्ष, अतिकाय और निशाचर दुर्मुख – ये सब राक्षस अत्यन्त कुपित हो हाथोंमें परिघ पट्टिश, शूल, प्रास, शक्ति, फरसे, धनुष, बाण तथा पैनी धारवाले बड़े - बड़े खड्ग लिये उछलकर रावणके सामने आये और अपने तेजसे उद्दीप्त से होकर वे सब - के - सब उससे बोले -- ॥ १-५ ॥
अद्य रामं वधिष्यामः सुग्रीवं च सलक्ष्मणम् ।
कृपणं च हनूमन्तं लङ्का येन प्रधर्षिता ॥ ६ ॥
' हमलोग आज ही राम, सुग्रीव, लक्ष्मण और उस कायर हनुमान्को भी मार डालेंगे, जिसने लङ्कापुरी जलायी ' है ' ॥ ६ ॥
तान् गृहीतायुधान् सर्वान् वारयित्वा विभीषणः ।
अब्रवीत् प्राञ्जलिर्वाक्यं पुनः प्रत्युपवेश्य तान् ॥ ७ ॥
हाथोंमें अस्त्र - शस्त्र लिये खड़े हुए उन सब राक्षसोंको जानेके लिये उद्यत देख विभीषणने रोका और पुनः उन्हें बिठाकर दोनों हाथ जोड़ रावणसे कहा ॥ ७ ॥
अप्युपायैस्त्रिभिस्तात योऽर्थः प्राप्तुं न शक्यते ।
तस्य विक्रमकालांस्तान् युक्तानाहुर्मनीषिणः ॥ ८ ॥
' तात! जो मनोरथ साम, दान और भेद - इन तीन उपायोंसे प्राप्त न हो सके, उसीकी प्राप्तिके लिये नीतिशास्त्र के ज्ञाता मनीषी विद्वानोंने पराक्रम करनेके योग्य अवसर बताये हैं ॥ ८ ॥
प्रमत्तेष्वभियुक्तेषु दैवेन प्रहतेषु च ।
विक्रमास्तात सिद्धयन्ति परीक्ष्य विधिना कृताः ॥ ९ ॥
' तात! जो शत्रु असावधान हों, जिनपर दूसरे दूसरे शत्रुओंने आक्रमण किया हो तथा जो महारोग आदिसे ग्रस्त होने के कारण दैवसे मारे गये हों, उन्हींपर भलीभाँति परीक्षा करके विधिपूर्वक किये गये पराक्रम सफल होते हैं ॥ ९ ॥
अप्रमत्तं कथं तं तु विजिगीषु बले स्थितम् ।
जितरोषं दुराधर्ष तं धर्षयितुमिच्छथ ॥ १० ॥
' श्रीरामचन्द्रजी बेखबर नहीं हैं । वे विजयकी इच्छासे आ रहे हैं और उनके साथ सेना भी है । उन्होंने क्रोधको सर्वथा जीत लिया है । अतः वे सर्वथा दुर्जय हैं । ऐसे अजेय वीर-को तुमलोग परास्त करना चाहते हो || १० ||
समुद्रं लङ्घयित्वा तु घोरं नदनदीपतिम् ।
गर्ति हनूमतो लोके को विद्यात् तर्कयेत वा ॥ ११ ॥
बलान्यपरिमेयानि वीर्याणि च निशाचराः ।
परेषां सहसावज्ञा न कर्तव्या कथंचन ॥ १२ ॥
' निशाचरो! नदों और नदियोंके स्वामी भयंकर महा-सागरको जो एक ही छलाँगमें लाँघकर यहाँतक आ पहुँचे थे, उन हनुमान्जीकी गतिको इस संसार में कौन जान सकता है अथवा कौन उसका अनुमान लगा सकता है? शत्रुओंके पास असंख्य सेनाएँ हैं, उनमें असीम बल और पराक्रम है; इस बातको तुमलोग अच्छी तरह जान लो । दूसरोंकी शक्तिको भुलाकर किसी तरह भी सहसा उनकी अवहेलना नहीं करनी चाहिये ॥ ११-१२ ॥
किं च राक्षसराजस्य रामेणापकृतं पुरा ।
आजहार जनस्थानाद् यस्य भार्या यशखिनः ॥ १३ ॥
' श्रीरामचन्द्रजीने पहले राक्षसराज रावणका कौन - सा अपराध किया था, जिससे उन यशस्वी महात्माकी पत्नीको ये जनस्थानसे हर लाये १ ॥ १३ ॥
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१०७२ श्रीमवाल्मीकीय रामायणे
खरो यद्यतिवृत्तस्तु स रामेण हतो रणे ।
अवश्यं प्राणिनां प्राणा रक्षितव्या यथाबलम् ॥ १४ ॥
‘ यदि कहें कि उन्होंने खरको मारा था तो यह ठीक नहीं है; क्योंकि खर अत्याचारी था । उसने स्वयं ही उन्हें मार डालनेके लिये उनपर आक्रमण किया था । इसलिये श्रीरामने रणभूमिमें उसका वध किया; क्योंकि प्रत्येक प्राणी-को यथाशक्ति अपने प्राणोंकी रक्षा अवश्य करनी चाहिये ||
एतन्निमित्तं वैदेही भयं नः सुमहद् भवेत् ।
आहृता सा परित्याज्या कलहार्थे कृते नु किम् ॥ १५ ॥
" यदि इसी कारण से सीताको हरकर लाया गया हो तो उन्हें जल्दी ही लौटा देना चाहिये; अन्यथा हमलोगों पर महान् भय आ सकता है । जिस कर्मका फल केवल कलह है, उसे करनेसे क्या लाभ? ॥ १५ ॥
न तु क्षमं वीर्यवता तेन धर्मानुवर्तिना ।
वैरं निरर्थकं कर्तुं दीयतामस्य मैथिली ॥ १६ ॥
' श्रीराम बड़े धर्मात्मा और पराक्रमी हैं । उनके साथ व्यर्थ वैर करना उचित नहीं है । मिथिलेशकुमारी सीताको उनके पास लौटा देना चाहिये ॥ १६ ॥
यावन्न सगजां साभ्यां बहुरत्नसमाकुलाम् ।
पुरीं दारयते वाणैर्दीयतामस्य मैथिली ॥ १७ ॥
' जबतक हाथी, घोड़े और अनेकों रत्नोंसे भरी हुई लङ्का पुरीका श्रीराम अपने बाणोंद्वारा विध्वंस नहीं कर डालते, तबतक ही मैथिलीको उन्हें लौटा दिया जाय ॥ १७ ॥
यावत् सुघोरा महती दुर्धर्षा हरिवाहिनी ।
नावस्कन्दति नो लङ्कां तावत् सीता प्रदीयताम् ॥ १८ ॥
' जबतक अत्यन्त भयंकर, विशाल और दुर्जय वानर-वाहिनी हमारी लङ्काको पददलित नहीं कर देती, तभीतक सीताको वापस कर दिया जाय ॥ १८ ॥
विनश्येद्धि पुरी लङ्का शूराः सर्वे च राक्षसाः ।
रामस्य दयिता पत्नी न स्वयं यदि दीयते ॥ १ ९ ॥
' यदि श्रीरामकी प्राणवल्लभा सीताको हमलोग स्वयं ही नहीं लौटा देते हैं तो यह लङ्कापुरी नष्ट हो जायगी और समस्त शूरवीर राक्षस मार डाले जायँगे ॥ १ ९ ॥
प्रसादये त्वां बन्धुत्वात् कुरुष्व वचनं मम ।
हितं तथ्यं त्वहं ब्रमि दीयतामस्य मैथिली ॥ २० ॥
' आप मेरे बड़े भाई हैं । अतः मैं आपको विनयपूर्वक प्रसन्न करना चाहता हूँ । आप मेरी बात मान लें । मैं आपके हितके लिये सच्ची बात कहता हूँ- आप श्रीरामचन्द्रजी को उनकी सीता वापस कर दें ॥ २० ॥
पुरा शरत्सूर्यमरीचिसंनिभान् नवाग्रपुङ्खान् सुदृढान् नृपात्मजः । सृजत्यमोघान् विशिखान् वधाय ते प्रदीयतां दाशरथाय मैथिली ॥ २१ ॥
' राजकुमार श्रीराम जबतक आपके वधके लिये शरत्-कालके सूर्यकी किरणोंके समान तेजस्वी, उज्ज्वल अग्रभाग एवं पंखोंसे सुशोभित, सुदृढ़ तथा अमोघ बाणों की वर्षा करें, उसके पहले ही आप उन दशरथनन्दनकी सेवामें मिथिलेश-कुमारी सीताको सौंप दें ॥ २१ ॥
त्यजाशु कोपं सुखधर्मनाशनं भजस्व धर्म रतिकीर्तिवर्धनम् । प्रसीद जीवेम सपुत्रबान्धवाः प्रदीयतां दाशरथाय मैथिली ॥ २२ ॥
' भैया! आप क्रोधको त्याग दें; क्योंकि वह सुख और धर्मका नाश करनेवाला है । धर्मका सेवन कीजिये; क्योंकि वह सुख और सुयशको बढ़ानेवाला है । हमपर प्रसन्न होइये, जिससे हम पुत्र और बन्धु बान्धवसहित जीवित रह सकें । इसी दृष्टिसे मेरी प्रार्थना है कि आप दशरथनन्दन श्रीरामके हाथमें मिथिलेशकुमारी सीताको लौटा दें ॥ २२ ॥
विभीषणवचः श्रुत्वा रावणो राक्षसेश्वरः ।
विसर्जयित्वा तान् सर्वान् प्रविवेश स्वकं गृहम् ॥ २३ ॥
विभीषण की यह बात सुनकर राक्षसराज रावण उन सब सभासदोंको विदा करके अपने महलमें चला गया ॥ २३ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये युद्धकाण्डे नवमः सर्गः ॥ ९ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें नवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ९ ॥
दशमः सर्गः विभीषणका रावण के महलमें जाना, उसे अपशकुनों का भय दिखाकर सीताको लौटा देनेके लिये प्रार्थना करना और रावणका उनकी बात न मानकर उन्हें वहाँसे विदा कर देना ततः प्रत्युषसि प्राप्ते प्राप्तधर्मार्थनिश्चयः । शैलाग्रचयसंकाशं शैलभ्टङ्गमिवोन्नतम् | राक्षसाधिपतेर्वेश्म भीमकर्मा विभीषणः ॥ १ ॥ सुविभक्तमहाकक्षं महाजनपरिग्रहम् ॥ २ ॥
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युद्धकाण्डे दशमः सर्गः १०७३ मतिमद्भिर्महामात्रैरनुरचैरधिष्ठितम् राक्षसैराप्तपर्याप्तैः सर्वतः परिरक्षितम् ॥ ३ ॥
मत्तमातङ्गनिःश्वासैर्व्याकुलीकृतमारुतम् I शङ्खघोष महाघोष तूर्यसम्बाधनादितम् ॥ ४ ॥
प्रमदाजनसम्बाधं प्रजल्पितमहापथम् ।
तप्तकाञ्चननिर्यूहं भूषणोत्तमभूषितम् ॥ ५ ॥
गन्धर्वाणामिवावा समालयं मरुतामिव ।
रत्नसंचयसम्बाधं भवनं भोगिनामिव ॥ ६ ॥
तं महाभ्रमिवादित्यस्तेजोविस्तृतरश्मिवान् ।
अग्रजस्यालयं वीरः प्रविवेश महाद्युतिः ॥ ७ ॥
दूसरे दिन सबेरा होते ही धर्म और अर्थके तत्त्वको जाननेवाले भीमकर्मा महातेजस्वी वीर विभीषण अपने बड़े भाई राक्षसराज रावणके घर गये । वह घर अनेक प्रासादोंके कारण पर्वतशिखरों के समूहकी भाँति शोभा पाता था । उसकी ऊँचाई भी पहाड़की चोटीको लजित करती थी । उसमें अलग - अलग बड़ी - बड़ी कक्षाएँ ( ड्योढ़ियाँ ) सुन्दर ढंगसे बनी हुई थीं । बहुतेरे श्रेष्ठ पुरुषोंका वहाँ आना - जाना लगा रहता था । अनेकानेक बुद्धिमान् महामन्त्री, जो राजा-के प्रति अनुराग रखनेवाले थे, उसमें बैठे थे । विश्व-सनीय, हितैषी तथा कार्यसाधनमें कुशल बहुसंख्यक राक्षस सब ओरसे उस भवनकी रक्षा करते थे । वहाँकी वायु मतवाले हाथियोंके निःश्वाससे मिश्रित हो बवंडर सी जान पड़ती थी । शंख - ध्वनिके समान राक्षसोंका गम्भीर घोष वहाँ गूँजता रहता था । नाना प्रकारके वार्थोके मनोरम शब्द उस भवनको निनादित करते थे । रूप और यौवनके मदसे मतवाली युवतियोंकी वहाँ भीड़ - सी लगी रहती थी । वहाँके बड़े - बड़े मार्ग लोगों के वार्तालापसे मुखरित जान पड़ते थे । उसके फाटक तपाये हुए सुवर्णके बने हुए थे । उत्तम सजावटकी वस्तुओंसे वह महल अच्छी तरह सजा हुआ था, अतएव वह गन्धवोंके आवास और देवताओंके निवास-स्थान- सा मनोरम प्रतीत होता था । रत्नराशिसे परिपूर्ण होने-के कारण वह नागभवन के समान उद्भासित होता था । जैसे तेजसे विस्तृत किरणोंवाले सूर्य महान् मेघोंकी घटामें प्रवेश करते हैं, उसी प्रकार तेजस्वी विभीषणने रावण के उस भवन में पदार्पण किया ॥ १-७ ॥
पुण्यान् पुण्याहघोषांश्च वेदविद्भिरुदाहृतान् ।
शुश्राव सुमहातेजा भ्रातुर्विजयसंश्रितान् ॥ ८ ॥
वहाँ पहुँचकर उन महातेजस्वी विभीषणने अपने भाईकी विजयके उद्देश्यसे वेदवेत्ता ब्राह्मणोंद्वारा किये गये पुण्याह-वाचनके पवित्र घोष सुने ॥ ८ ॥
पूजितान् दधिपात्रैश्च सर्पिर्भिः सुमनोक्षतैः ।
मन्त्रवेदविदो विप्रान् ददर्श स महाबलः ॥ ९ ॥
बा ० रा ० ५.८.९-तत्पश्चात् उन महाबली विभीषणने वेदमन्त्रोंके ज्ञाता ब्राह्मणों का दर्शन किया, जिनके हाथोंमें दही और घीके पात्र थे । फूलों और अक्षतोंसे उन सबकी पूजा की गयी थी ॥ ९ ॥
स पूज्यमानो रक्षोभिर्दीप्यमानं स्वतेजसा ।
आसनस्थं महाबाहुर्ववन्दे धनदानुजम् ॥ १० ॥
वहाँ जानेपर राक्षसाने उनका स्वागत - सत्कार किया । फिर उन महाबाहु विभीषणने अपने तेजसे देदीप्यमान और सिंहा-सनपर विराजमान कुबेरके छोटे भाई रावणको प्रणाम किया ॥ १० ॥
स राजदृष्टिसम्पन्नमासनं हेमभूषितम् ।
जगाम समुदाचारं प्रयुज्या चारकोविदः ॥ ११ ॥
तदनन्तर शिष्टाचार के ज्ञाता विभीषण ' विजयतां महाराजः ( महाराजकी जय हो ) ' इत्यादि रूपसे राजाके प्रति परम्परा-प्राप्त शुभाशंसासूचक वचनका प्रयोग करके राजाके द्वारा दृष्टि संकेतसे बताये गये सुवर्णभूषित सिंहासन पर बैठ गये ॥ ११ ॥
स रावणं महात्मानं विजने मन्त्रिसंनिधौ ।
उवाच हितमत्यर्थे वचनं हेतुनिश्चितम् ॥ १२ ॥
प्रसाद्य भ्रातरं ज्येष्ठं सान्त्वेनोपस्थितक्रमः ।
देशकालार्थ संवादि दृष्टलोकपरावरः ॥ १३ ॥
विभीषण जगत् की भली - बुरी बातोंको अच्छी तरह जानते थे । उन्होंने प्रणाम आदि व्यवहारका यथार्थरूपसे निर्वाह करके सान्त्वनापूर्ण वचनोंद्वारा अपने बड़े भाई महामना रावणको प्रसन्न किया और उससे एकान्त में मन्त्रियोंके निकट देश, काल और प्रयोजनके अनुरूप, युक्तियोंद्वारा निश्चित तथा अत्यन्त हितकारक बात कही ॥ १२-१३ ॥
यदाप्रभृति वैदेही सम्प्राप्तेह परंतप ।
तदाप्रभृति दृश्यन्ते निमित्तान्यशुभानि नः ॥ १४ ॥
' शत्रुओं को संताप देनेवाले महाराज! जबसे विदेहकुमारी सीता यहाँ आयी हैं, तभीसे हमलोगोंको अनेक प्रकारके अमङ्गलसूचक अपशकुन दिखायी दे रहे हैं ॥ १४ ॥
सस्फुलिङ्गः सधूमार्चिः सधूमकलुषोदयः ।
मन्त्रसंधुक्षितोऽप्यग्निर्न सम्यगभिवर्धते ॥ १५ ॥
' मन्त्रों द्वारा विधिपूर्वक धधकानेपर भी आग अच्छी तरह प्रज्वलित नहीं हो रही है । उससे चिनगारियाँ निकलने लगती हैं । उसकी लपट के साथ धुआँ उठने लगता है और मन्थनकालमें जब अग्नि प्रकट होती है, उस समय भी वह धूएँसे मलिन ही रहती है ॥। १५ ॥
अग्निष्टेष्वग्निशालासु तथा ब्रह्मस्थलीषु च ।
सरीसृपाणि दृश्यन्ते हव्येषु च पिपीलिकाः ॥ १६ ॥