Ramayana 2 — पृष्ठ 261–270
वाल्मीकि रामायण — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 261–270
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१०७४ श्रीमवाल्मीकीयरामायणे ' रसोई घरों में, अग्निशालाओं में तथा वेदाध्ययनके स्थानों में भी साँप देखे जाते हैं और हवन सामग्रियों में चींटियाँ पड़ी दिखायी देती हैं ॥ १६ ॥
गवां पयांसि स्कन्नानि विमदा वरकुञ्जराः ।
दीनमश्वाः प्रहेषन्ते नवग्रासाभिनन्दिनः ॥ १७ ॥
“ गायका दूध सूख गया है, बड़े - बड़े गजराज मदरहित हो गये हैं, घोड़े नये ग्राससे आनन्दित ( भोजनसे संतुष्ट ) होनेपर भी दीनतापूर्ण स्वरमें हिनहिनाते हैं ॥ १७ ॥
खरोष्ट्राश्वतरा राजन् भिन्नरोमाः स्रवन्ति च ।
न स्वभावेऽवतिष्ठन्ते विधानैरपि चिन्तिताः ॥ १८ ॥
' राजन्! गधों, ऊँटों और खच्चरोंके रोंगटे खड़े हो जाते हैं । उनके नेत्रोंसे आँसू गिरने लगते हैं । विधिपूर्वक चिकित्सा की जानेपर भी वे पूर्णतः स्वस्थ हो नहीं पाते हैं ।
वायसाः संघशः क्रूरा व्याहरन्ति समन्ततः ।
समवेताश्च दृश्यन्ते विमानाग्रेषु संघशः ॥ १ ९ ॥
' क्रूर कौए झुंड के झुंड एकत्र होकर कर्कश स्वरमें काँव-काँव करने लगते हैं तथा वे सतमहले मकानोंपर समूह के समूह इकट्ठे हुए देखे जाते हैं ॥ १ ९ ॥
गृधाश्च परिलीयन्ते पुरीमुपरि पिण्डिताः ।
उपपन्नाश्च संध्ये द्वे व्याहरन्त्यशिवं शिवाः ॥ २० ॥
' लङ्कापुरीके ऊपर झुंड के झुंड गीध उसका स्पर्श करते हुए - से मड़राते रहते हैं । दोनों संध्याओंके समय सियारिनें नगरके समीप आकर अमङ्गलसूचक शब्द करती हैं ॥ २० ॥
क्रव्यादानां मृगाणां च पुरीद्वारेषु संघशः ।
श्रूयन्ते विपुला घोषाः सविस्फूर्जितनिःस्वनाः ॥ २१ ॥
' नगरके सभी फाटकों पर समूह के समूह एकत्र हुए मांस-भक्षी पशुओंके जोर - जोरसे किये जानेवाले चीत्कार बिजलीकी गड़गड़ाहट के समान सुनायी पड़ते हैं ॥ २१ ॥
तदेवं प्रस्तुते कार्ये प्रायश्चित्तमिदं क्षमम् ।
रोचये वीर वैदेही राघवाय प्रदीयताम् ॥ २२ ॥
' वीरवर! ऐसी परिस्थितिमें मुझे तो यही प्रायश्चित्त अच्छा जान पड़ता है कि विदेहकुमारी सीता श्रीरामचन्द्रजीको लौटा दी जायँ ॥ २२ ॥
इदं च यदि वा मोहाल्लोभाद् वा व्याहृतं मया ।
तत्रापि च महाराज न दोषं कर्तुमर्हसि ॥ २३ ॥
' महाराज! यदि यह बात मैंने मोह या लोभसे कही हो तो भी आपको मुझमें दोषदृष्टि नहीं करनी चाहिये ॥ २३ ॥
अयं हि दोषः सर्वस्य जनस्यास्योपलक्ष्यते ।
रक्षसां राक्षसीनां च पुरस्यान्तःपुरस्य च ॥ २४ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायण वाल्मीकीये ' सीताका अपहरण तथा इससे होनेवाला अपशकुनरूपी दोष यहाँकी सारी जनता, राक्षस - राक्षसी तथा नगर और अन्तः-पुर - सभीके लिये उपलक्षित होता है ॥ २४ ॥
प्रापणे चास्य मन्त्रस्य निवृत्ताः सर्वमन्त्रिणः ।
अवश्यं च मया वाच्यं यद् दृष्टमथवा श्रुतम् ।
सम्प्रधार्य यथान्यायं तद् भवान् कर्तुमर्हति ॥ २५ ॥
" यह बात आपके कानों तक पहुँचाने में प्रायः सभी मन्त्री संकोच करते हैं; परंतु जो बात मैंने देखी या सुनी है, वह मुझे तो आपके आगे अवश्य निवेदन कर देनी चाहिये; अतः उसपर यथोचित विचार करके आप जैसा उचित समझें, वैसा करें || २५ |
इति स्वमन्त्रिणां मध्ये भ्राता भ्रातरमूचिवान् ।
रावणं रक्षां श्रेष्ठं पथ्यमेतद् विभीषणः ॥ २६ ॥
इस प्रकार भाई विभीषण ने अपने मन्त्रियोंके बीच में बड़े भाई राक्षसराज रावणसे ये हितकारी वचन कहे ॥ २६ ॥
हितं महार्थ मृदु हेतुसंहितं व्यतीतकालायतिसम्प्रतिक्षमम् । निशम्य तद्वाक्यमुपस्थितज्वरः प्रसङ्गवानुत्तरमेतदब्रवीत् ॥ २७ ॥
भयं न पश्यामि कुतश्चिदप्यहं न राघवः प्राप्स्यति जातु मैथिलीम् । सुरैः सहेन्द्रैरपि संगरे कथं ममाग्रतः स्थास्यति लक्ष्मणाग्रजः ॥ २८ ॥
विभीषणकी ये हितकर, महान् अर्थकी साधक, कोमल, युक्तिसंगत तथा भूत, भविष्य और वर्तमान - कालमें भी कार्य-साधनमें समर्थं बातें सुनकर रावणको बुखार चढ़ आया । श्रीराम के साथ वैर बढ़ाने में उसकी आसक्ति हो गयी थी । इसलिये उसने इस प्रकार उत्तर दिया- ' विभीषण! मैं तो कहीं से भी कोई भय नहीं देखता । राम मिथिलेशकुमारी सीताको कभी नहीं पा सकते । इन्द्रसहित देवताओंकी सहायता प्राप्त कर लेनेपर भी लक्ष्मणके बड़े भाई राम मेरे सामने संग्राम में कैसे टिक सकेंगे ११ ॥ २७-२८ ॥ इत्येवमुक्त्वा सुरसैन्यनाशनो महाबलः संयति चण्डविक्रमः । दशाननो भ्रातरमाप्तवादिनं विसर्जयामास तदा विभीषणम् ॥ २ ९ ॥ ऐसा कहकर देवसेनाके नाशक और समराङ्गणमें प्रचण्ड पराक्रम प्रकट करनेवाले महाबली दशाननने अपने यथार्थवादी भाई विभीषणको तत्काल विदा कर दिया ॥ २ ९ ॥ आदिकाव्ये युद्धकाण्डे दशमः सर्गः ॥ १० ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्ड में दसवाँ सगँ पूरा हुआ ॥ १० ॥
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युद्धकाण्डे एकादशः सर्गः १०७५ एकादशः सर्गः रावण और उसके सभासदोंका सभाभवनमें एकत्र होना
स बभूव कृशो राजा मैथिलीकाममोहितः ।
असन्मानाश्च सुहृदां पापः पापेन कर्मणा ॥ १ ॥
राक्षसोंका राजा रावण मिथिलेशकुमारी सीताके प्रति कामसे मोहित हो रहा था, उसके हितैषी सुहृद् विभीषण आदि उसका अनादर करने लगे थे — उसके कुकृत्योंकी निन्दा करते थे तथा वह सीताहरणरूपी जघन्य पाप - कर्मके कारण पापी घोषित किया गया था इन सब कारणोंसे वह अत्यन्त कृश ( चिन्तायुक्त एवं दुर्बल ) हो गया था ॥ १ ॥
अतीव कामसम्पन्नो वैदेहीमनुचिन्तयन् ।
अतीतसमये काले तस्मिन् वै युधि रावणः ।
अमात्यैश्च सुहृद्भिश्च प्राप्तकालममन्यत ॥ २ ॥
वह अत्यन्त कामसे पीड़ित होकर बारंबार विदेहकुमारी-का चिन्तन करता था, इसलिये युद्धका अवसर बीत जानेपर भी उसने उस समय मन्त्रियों और सुहृदोंके साथ सलाह करके युद्धको ही समयोचित कर्तव्य माना ॥ २ ॥
स हेमजालविततं मणिविद्रुमभूषितम् ।
उपगम्य विनीताश्वमारुरोह महारथम् ॥ ३ ॥
वह सोनेकी जालीसे आच्छादित तथा मणि एवं मूँगोंसे विभूषित एक विशाल रथपर, जिसमें सुशिक्षित घोड़े जुते हुए थे जा चढ़ा || ३ ||
तमास्थाय रथश्रेष्ठं महामेघसमखनम् ।
प्रययौ रक्षसां श्रेष्ठो दशग्रीवः सभां प्रति ॥ ४ ॥
महान् मेघकी गर्जनाके समान घर्घराहट पैदा करनेवाले उस उत्तम रथपर आरूढ़ हो राक्षसशिरोमणि दशग्रीव सभा-भवनकी ओर प्रस्थित हुआ ॥ ४ ॥
असिचर्मधरा योधाः सर्वायुधधरास्ततः ।
राक्षसा राक्षसेन्द्रस्य पुरस्तात् सम्प्रतस्थिरे ॥ ५ ॥
उस समय राक्षसराज रावणके आगे - आगे ढाल - तलवार एवं सब प्रकारके आयुध धारण करनेवाले बहुसंख्यक राक्षस योद्धा जा रहे थे ॥ ५ ॥
नानाविकृतवेषाश्च नानाभूषणभूषिताः ।
पार्श्वतः पृष्ठतश्चैनं परिवार्य ययुस्तदा ॥ ६ ॥
इसी तरह भाँति - भाँति के आभूषणोंसे विभूषित और नाना प्रकारके विकराल वेषवाले अगणित निशाचर उसे दायें - बायें और पीछे की ओरसे घेरकर चल रहे थे ॥ ६ ॥
रथैश्वातिरथाः शीघ्रं मत्तैश्व वरवारणैः ।
अनूत्पेतुर्दशग्रीवमाक्रीडद्भिश्व वाजिभिः ॥ ७ ॥
रावणके प्रस्थान करते ही बहुत - से अतिरथी वीर रथों, मतवाले गजराजों और खेल - खेल में तरह - तरह की चालें दिखाने-वाले घोड़ोंपर सवार हो तुरंत उसके पीछे चल दिये ॥ ७ ॥
गदापरिघहस्ताश्च शक्तितोमरपाणयः ।
परश्वधधराश्चान्ये तथान्ये शूलपाणयः ।
ततस्तूर्यसहस्राणां संजज्ञे निःस्वनो महान् ॥ ८ ॥
किन्हीं के हाथोंमें गदा और परिघ शोभा पा रहे थे । कोई शक्ति और तोमर लिये हुए थे । कुछ लोगोंने फरसे धारण कर रक्खे थे तथा अन्य राक्षतों के हाथोंमें शूल चमक रहे थे, फिर तो वहाँ सहस्रों वाद्योंका महान् घोष होने लगा ॥
तुमुलः शङ्खशब्दश्च सभां गच्छति रावणे ।
स नेमिघोषेग महान् सहसाभिनिनादयन् ॥ ९ ॥
राजमार्ग श्रिया जुष्टं प्रतिपेदे महारथः । रावणके सभाभवन की ओर यात्रा करते समय तुमुल शङ्खध्वनि होने लगी । उसका वह विशाल रथ अपने पहियोंकी घर्घराहट से सम्पूर्ण दिशाओंको प्रतिध्वनित करता हुआ सहसा शोभाशाली राजमार्गपर जा पहुँचा ॥ ९ ३ ॥ विमलं चातपत्रं च प्रगृहीतमशोभत ॥ १० ॥
पाण्डुरं राक्षसेन्द्रस्य पूर्णस्ताराधिपो यथा । उस समय राक्षसराज रावणके ऊपर तना हुआ निर्मल श्वेत छत्र पूर्ण चन्द्रमाके समान शोभा पा रहा था ॥ १०३ ॥
हेममञ्जरिगर्भे च शुद्धस्फटिकविग्रहे ॥ ११ ॥
चामरव्यजने तस्य रेजतुः सव्यदक्षिणे । उसके दाहिने और बायें भागमें शुद्ध स्फटिकके डंडेवाले चॅवर और व्यजन, जिनमें सोनेकी मञ्जरियाँ बनी हुई थीं, बड़ी शोभा पा रहे थे ॥ ११३ ॥
ते कृताञ्जलयः सर्वे रथस्थं पृथिवीस्थिताः ॥ १२ ॥
राक्षसा राक्षसश्रेष्ठं शिरोभिस्तं ववन्दिरे । मार्ग में पृथ्वीपर खड़े हुए सभी राक्षस दोनों हाथ जोड़ रथपर बैठे हुए राक्षसशिरोमणि रावणकी सिर झुकाकर वन्दना करते थे ॥ १२३ ॥
राक्षसैः स्तूयमानः सञ्जयाशीर्भिररिंदमः ॥ १३ ॥
आससाद महातेजाः सभां विरचितां तदा । राक्षसोंद्वारा की गयी स्तुति, जय - जयकार और आशीर्वाद सुनता हुआ शत्रुदमन महातेजस्वी रावण उस समय विश्वकर्मा-द्वारा निर्मित राजसभामें पहुँचा ॥ १३३ ॥
सुवर्णरजतास्तीर्णा विशुद्धस्फटिकान्तराम् ॥ १४ ॥
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१०७६ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे
विराजमानो वपुषा रुक्मपट्टोत्तरच्छदाम् ।
तां पिशाचशतैः षडभिरभिगुप्तां सदाप्रभाम् ॥ १५ ॥
प्रविवेश महातेजाः सुकृतां विश्वकर्मणा । उस सभा के फर्श में सोने - चाँदीका काम किया हुआ था तथा बीच - बीच में विशुद्ध स्फटिक भी जड़ा गया था । उसमें सोनेके कामवाले रेशमी वस्त्रोंकी चादरें बिछी हुई थीं । वह सभा सदा अपनी प्रभासे उद्भासित होती रहती थी । छः सौ पिशाच उसकी रक्षा करते थे । विश्वकर्माने उसे बहुत ही सुन्दर बनाया था । अपने शरीरसे सुशोभित होनेवाले महा-तेजस्वी रावणने उस सभा में प्रवेश किया ॥ १४-१५३ ॥ तस्यां तु वैदूर्यमयं प्रियकाजिनसंवृतम् ॥ १६ ॥
महत्सोपाश्रयं भेजे रावणः परमासनम् ।
ततः शशासेश्वरवदूत लघुपराक्रमान् ॥१७ ॥
उस सभाभवन में वैदूर्यमणि ( नीलम ) का बना हुआ एक विशाल और उत्तम सिंहासन था, जिसपर अत्यन्त मुलायम चमड़ेवाले ' प्रियक ' नामक मृगका चर्म बिछा था और उसपर मसनँद भी रखा हुआ था । रावण उसीपर बैठ गया । फिर उसने अपने शीघ्रगामी दूतको आज्ञा दी – ॥
समानयत मे क्षिप्रमिहैतान् राक्षसानिति ।
कृत्यमस्ति महज्जाने कर्तव्यमिति शत्रुभिः ॥ १८ ॥
' तुमलोग शीघ्र ही यहाँ बैठनेवाले सुविख्यात राक्षसोंको मेरे पास बुला ले आओ; क्योंकि शत्रुओंके साथ करने योग्य महान् कार्य मुझपर आ पड़ा है । इस बातको मैं अच्छी तरह समझ रहा हूँ ( अतः इसपर विचार करनेके लिये सब सभा-सदका यहाँ आना अत्यन्त आवश्यक है ) ॥ १८ ॥
राक्षसास्तद्वचः श्रुत्वा लङ्कायां परिचक्रमुः ।
विहार शयनेषु च ।
उद्यानेषु च रक्षांसि चोदयन्तो ह्यभीतवत् ॥ १ ९ ॥
रावणका यह आदेश सुनकर वे राक्षस लङ्कामें सब ओर चक्कर लगाने लगे । एक - एक घर, विहारस्थान, शयनागार और उद्यानमें जा - जाकर बड़ी निर्भयतासे उन सब राक्षसों को राजसभामें चलने के लिये प्रेरित करने लगे ॥ १ ९ ॥
ते रथान्तवरा एक हप्तानेके दृढान् हयान् ।
नागानेकेऽधिरुरुहुर्जग्मुश्चैके पदातयः ॥ २० ॥
तब उन राक्षसों में से कोई रथपर चढ़कर चले, कोई मतवाले हाथियोंपर और कोई मजबूत घोड़ोंपर सवार होकर अपने - अपने स्थानसे प्रस्थित हुए । बहुत - से राक्षस पैदल ही चल दिये ॥ २० ॥
सा पुरी परमाकीर्णा रथकुञ्जरवाजिभिः ।
सम्पतद्भिर्विरुरुचे गरुत्मद्भिरिवाम्बरम् ॥ २१ ॥
उस समय दौड़ते हुए रथों, हाथियों और घोड़ोंसे व्याप्त हुई वह पुरी बहुसंख्यक गरुड़ोंसे आच्छादित हुए आकाश-की भाँति शोभा पा रही थी ॥ २१ ॥
ते वाहनान्यवस्थाय यानानि विविधानि च ।
सभां पद्भिः प्रविविशुः सिंहा गिरिगुहामित्र ॥ २२ ॥
गन्तव्य स्थानतक पहुँचकर अपने - अपने वाहनों और नाना प्रकार की सवारियोंको बाहर ही रखकर वे सब सभासद् पैदल ही उस सभाभवनमें प्रविष्ट हुए, मानो बहुत - से सिंह किसी पर्वतकी कन्दरामें घुस रहे हों ॥ २२ ॥
राज्ञः पादौ गृहीत्वा तु राज्ञा ते प्रतिपूजिताः ।
पीठेष्वन्ये वृण्वन्ये भूमौ केचिदुपाविशन् ॥ २३ ॥
वहाँ पहुँचकर उन सबने राजा के पाँव पकड़े तथा राजाने भी उनका सत्कार किया । तत्पश्चात् कुछ लोग सोनेके सिंहासनों पर, कुछ लोग कुशकी चटाइयोंपर और कुछ लोग साधारण बिछौनोंसे ढकी हुई भूमिपर ही बैठ गये ॥ २३ ॥
ते समेत्य सभायां वै राक्षसा राजशासनात् ।
रावणं राक्षसाधिपम् ॥ २४ ॥
यथार्हमुपतस्थुस्ते राजाकी आज्ञासे उस सभा में एकत्र होकर वे सब राक्षस राक्षसराज रावणके आसपास यथायोग्य आसनोंपर बैठ गये ॥
मन्त्रिणश्च यथामुख्या निश्चितार्थेषु पण्डिताः ।
अमात्याश्च गुणोपेताः सर्वशा बुद्धिदर्शनाः ॥ २५ ॥
समीयुस्तत्र शतशः शूराश्च बहवस्तथा ।
सभायां वर्णायां सर्वार्थस्य सुखाय वै ॥ २६ ॥
यथायोग्य भिन्न - भिन्न विषयोंके लिये उचित सम्मति देने-वाले मुख्य - मुख्य मन्त्री, कर्तव्य - निश्चय में पाण्डित्य का परिचय देनेवाले सचिव, बुद्धिदर्शी, सर्वज्ञ, सद्गुण सम्पन्न उपमन्त्री तथा और भी बहुत - से शूरवीर सम्पूर्ण अर्थों के निश्चयके लिये और सुखप्राप्ति के उपायपर विचार करनेके लिये उस सुनहरी कान्तिवाली सभाके भीतर सैकड़ोंकी संख्या में उपस्थित थे ॥ ततो महात्मा विपुलं सुयुग्यं रथं वरं हेमविचित्रिताङ्गम् । शुभं समास्थाय ययौ यशस्वी विभीषणः संसदमजस्य ॥ २७ ॥
तत्पश्चात् यशस्वी महात्मा विभीषण भी एक सुवर्णजटित, सुन्दर अश्वोंसे युक्त, विशाल श्रेष्ठ एवं शुभकारक रथपर आरूढ़ हो अपने बड़े भाईकी सभा में जा पहुँचे ॥ २७ ॥
स पूर्वजायावरजः शशंस नामाथ पश्चाच्चरणौ ववन्दे । शुकः प्रहस्तश्च तथैव तेभ्यो ददौ यथा पृथगासनानि ॥ २८ ॥
छोटे भाई विभीषण ने पहले अपना नाम बताया, फिर बड़े भाईके चरणोंमें मस्तक झुकाया । इसी तरह शुक और
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युद्धकाण्डे द्वादशः सर्गः १०७७ प्रहस्तने भी किया । तब रावणने उन सबको यथायोग्य पृथक-पृथक् आसन दिये ॥ २८ ॥
सुवर्णनानामणिभूषणानां सुवाससां संसदि राक्षसानाम् । तेषां परार्थ्यागुरुचन्दनानां स्रजां च गन्धाः प्रववुः समन्तात् ॥ २ ९ ॥ सुवर्ण एवं नाना प्रकारकी मणियों के आभूषणोंसे विभूषित उन सुन्दर वस्त्रधारी राक्षसोंकी उस सभामें सब ओर बहुमूल्य अगुरु, चन्दन तथा पुष्पहारोंकी सुगन्ध छा रही थी ॥ २ ९ ॥ न चुकुशुर्नानृतमाह कश्चित् सभासदो नापि जजल्पुरुच्चैः । संसिद्धार्थाः सर्व एवोग्रवीर्या भर्तुः सर्वे ददृशुश्चाननं ते ॥ ३० ॥
उस समय उस सभाका कोई भी सदस्य असत्य नहीं बोलता था । वे सभी सभासद् न तो चिल्लाते थे और न जोर - जोर से बातें ही करते थे । वे सब के सब सफलमनोरथ एवं भयंकर पराक्रमी थे और सभी अपने स्वामी रावणके मुँह-की ओर देख रहे थे ॥ ३० ॥
स रावणः शस्त्रभृतां मनस्विनां महाबलानां समितौ मनस्वी । तस्यां सभायां प्रभया चकाशे मध्ये वसूनामिव वज्रहस्तः ॥ ३१ ॥
उस सभा में शस्त्रधारी महाबली मनस्वी वीरोंका समागम होने पर उनके बीच में बैठा हुआ मनस्वी रावण अपनी प्रभासे उसी प्रकार प्रकाशित हो रहा था, जैसे वसुओंके बीच में वज्र-धारी इन्द्र देदीप्यमान होते हैं ॥ ३१ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये युद्धकाण्डे एकादशः सर्गः ॥ ११ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्ड में ग्यारहवाँ सगँ पूरा हुआ ॥ ११ ॥
द्वादशः सर्गः नगरकी रक्षा के लिये सैनिकोंकी नियुक्ति, रावणका सीताके प्रति अपनी आसक्ति बताकर उनके हरणका प्रसंग बताना और भावी कर्तव्य के लिये सभासदोंकी सम्मति माँगना, कुम्भकर्ण का पहले तो उसे फटकारना, फिर समस्त
सतां परिषदं कृत्स्नां समीक्ष्य समितिंजयः ।
प्रचोदयामास तदा प्रहस्तं वाहिनीपतिम् ॥ १ ॥
शत्रुविजयी रावणने उस सम्पूर्ण सभाकी ओर दृष्टिपात करके सेनापति प्रहस्तको उस समय इस प्रकार आदेश दिया ॥ १ ॥
सेनापते यथा ते स्युः कृतविद्याश्चतुर्विधाः ।
योधा नगररक्षायां तथा व्यादेष्टुमर्हसि ॥ २ ॥
“ सेनापते! तुम सैनिकों को ऐसी आज्ञा दो, जिससे तुम्हारे अस्त्रविद्या में पारंगत रथी, घुड़सवार, हाथीसवार और पैदल योद्धा नगरकी रक्षा में तत्पर रहें ' ॥ २ ॥
स प्रहस्तः प्रणीतात्मा चिकीर्षन् राजशासनम् ।
विनिक्षिपद् बलं सर्व वहिरन्तश्च मन्दिरे ॥ ३ ॥
अपने मनको वशमें रखनेवाले प्रहस्तने राजाके आदेश-का पालन करने की इच्छासे सारी सेनाको नगर के बाहर और भीतर यथायोग्य स्थानों पर नियुक्त कर दिया ॥ ३ ।
ततो विनिक्षिप्य बलं सर्वे नगरगुप्तये ।
प्रहस्तः प्रमुखे राज्ञो निषसाद जगाद च ॥ ४ ॥
नगरकी रक्षाके लिये सारी सेनाको तैनात करके प्रहस्त राजा रावणके सामने आ बैठा और इस प्रकार बोला – ॥ ४ ॥
शत्रुओंके वधका स्वयं ही भार उठाना
विहितं बहिरन्तश्च बलं बलवतस्तव ।
कुरुष्वाविमनाः क्षिप्रं यदभिप्रेतमस्ति ते ॥ ५ ॥
' राक्षसराज! आप महाबली महाराजकी सेनाको मैंने नगरके बाहर और भीतर यथास्थान नियुक्त कर दिया है । अब आप स्वस्थचित्त होकर शीघ्र ही अपने अभीष्ट कार्यका सम्पादन कीजिये ॥ ५ ॥
प्रहस्तस्य वचः श्रुत्वा राजा राज्यहितैषिणः ।
सुखेप्सुः सुहृदां मध्ये व्याजहार स रावणः ॥ ६ ॥
राज्यका हित चाहनेवाले प्रहस्तकी यह बात सुनकर अपने सुखकी इच्छा रखनेवाले रावणने सुहृदोंके बीच में यह बात कही ॥ ६ ॥
प्रियाप्रिये सुखे दुःखे लाभालाभे हिताहिते ।
धर्मकामार्थकृच्छ्रेषु यूयमर्हथ वेदितुम् ॥ ७ ॥
' सभासदो! धर्म, अर्थ और कामविषयक संकट उपस्थित होनेपर आपलोग प्रिय - अप्रिय, सुख - दुःख, लाभ-हानि और हिताहितका विचार करने में समर्थ हैं ॥ ७ ॥
सर्वकृत्यानि युष्माभिः समारब्धानि सर्वदा ।
मन्त्रकर्मनियुक्तानि न जातु विफलानि मे ॥ ८ ॥
' आपलोगोंने सदा परस्पर विचार करके जिन - जिन कार्यों-
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१०७८ श्रीमवाल्मीकीयरामायणे का आरम्भ किया है, वे सब - के - सब मेरे लिये कभी निष्फल नहीं हुए हैं ॥ ८ ॥
ससोमग्रहनक्षत्रैर्मरुद्भिरिव वासवः ।
भवद्भिरहमत्यर्थे वृतः श्रियमवाप्नुयाम् ॥ ९ ॥
' जैसे चन्द्रमा, ग्रह और नक्षत्रों सहित मरुद्गणोंसे घिरे हुए इन्द्र स्वर्गकी सम्पत्तिका उपभोग करते हैं, उसी भाँति आपलोगों से घिरा रहकर मैं भी लङ्काकी प्रचुर राजलक्ष्मीका सुख भोगता रहूँ — यही मेरी अभिलाषा है ॥ ९ ॥
अहं तु खलु सर्वान् वः समर्थयितुमुद्यतः ।
कुम्भकर्णस्य तु स्वप्नान्नममर्थमचोदयम् ॥ १० ॥
' मैंने जो काम किया है, उसे मैं पहले ही आप सबके सामने रखकर आपके द्वारा उसका समर्थन चाहता था, परंतु उस समय कुम्भकर्ण सोये हुए थे, इसलिये मैंने इसकी चर्चा नहीं चलायी ॥ १० ॥
अयं हि सुप्तः षण्मासान् कुम्भकर्णो महाबलः ।
सर्वशस्त्रभृतां मुख्यः स इदानीं समुत्थितः ॥ ११ ॥
' समस्त शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ महाबली कुम्भकर्ण छः महीने-से सो रहे थे । अभी इनकी नींद खुली है ॥ ११ ॥
इयं च दण्डकारण्याद् रामस्य महिषी प्रिया ।
रक्षोभिश्वरितोद्देशादानीता जनकात्मजा ॥ १२ ॥
मैं दण्डकारण्यसे, जो राक्षसोंके विचरनेका स्थान है, रामकी प्यारी रानी जनकदुलारी सीताको हर लाया हूँ ॥ १२ ॥
सा मे न शय्यामारोदुमिच्छत्यलसगामिनी ।
त्रिषु लोकेषु चान्या मे न सीतासदृशी तथा ॥ १३ ॥
" किंतु वह मन्दगामिनी सीता मेरी शय्यापर आरूढ़ होना नहीं चाहती है । मेरी दृष्टिमें तीनों लोकोंके भीतर सीता-के समान सुन्दरी दूसरी कोई स्त्री नहीं है ॥ १३ ॥
तनुमध्या पृथुश्रोणी शरदिन्दुनिभानना ।
हेमबिम्बनिभा सौम्या मायेव मयनिर्मिता ॥ १४ ॥
' उसके शरीरका मध्यभाग अत्यन्त सूक्ष्म है, कटिके पीछे-का भाग स्थूल है, मुख शरत्कालके चन्द्रमाको लजित करता है, वह सौम्य रूप और स्वभाववाली सीता सोनेकी बनी हुई प्रतिमा - सी जान पड़ती है । ऐसा लगता है, जैसे वह मया सुरकी रची हुई कोई माया हो ॥ १४ ॥
सुलोहिततली लक्ष्णौ चरणौ सुप्रतिष्ठितौ ।
दृष्ट्ा ताम्रनखौ तस्या दीप्यते मे शरीरजः ॥ १५ ॥
' उसके चरणोंके तलवे लाल रंगके हैं । दोनों पैर सुन्दर, चिकने और सुडौल हैं तथा उनके नख ताँबे - जैसे लाल हैं । सीताके उन चरणों को देखकर मेरी कामाग्नि प्रज्वलित हो उठती है ॥ १५ ॥
हुताग्नेरर्चिसंकाशामेनां सौरीमिव प्रभाम् ।
उन्नसं विमलं वल्गु वदनं चारुलोचनम् ॥ १६ ॥
पश्यंस्तदवशस्तस्याः कामस्य वशमेयिवान् । ' जिसमें घीकी आहुति डाली गयी हो, उस अग्निकी लपट और सूर्यकी प्रभाके समान इस तेजस्विनी सीताको देखकर तथा ऊँची नाक और विशाल नेत्रोंसे सुशोभित उसके निर्मल एवं मनोहर मुखका अवलोकन करके मैं अपने वशमें नहीं रह गया हूँ । कामने मुझे अपने अधीन कर लिया है ॥ १६३ ॥
क्रोधहर्षमान दुर्वर्णकर च ॥ १७ ॥
शोक संतापनित्येन कामेन कलुषीकृतः । ' जो क्रोध और हर्ष दोनों अवस्थाओं में समानरूपसे बना रहता है, शरीरकी कान्तिको फीकी कर देता है और शोक तथा संतापके समय भी कभी मनसे दूर नहीं होता, उस कामने मेरे हृदयको कलुषित ( व्याकुल ) कर दिया है ॥ १७३ ॥
सातु संवत्सरं कालं मामयाचत भामिनी ॥ १८ ॥
प्रतीक्षमाणा भर्तारं राममायतलोचना ।
तन्मया चारुनेत्रायाः प्रतिज्ञातं वचः शुभम् ॥ १ ९ ॥
' विशाल नेत्रोंवाली माननीय सीताने मुझसे एक वर्षका समय माँगा है । इस बीचमें वह अपने पति श्रीरामकी प्रतीक्षा करेगी । मैंने मनोहर नेत्रोंवाली सीताके उस सुन्दर वचनको सुनकर उसे पूर्ण करनेकी प्रतिज्ञा कर ली है ॥ १८-१९ ॥
श्रान्तोऽहं सततं कामाद् यातो हय इवाध्वनि ।
कथं सागरमक्षोभ्यं तरिष्यन्ति वनौकसः ॥ २० ॥
बहुसत्वझपाकीर्ण तौ वा दशरथात्मजौ । ‘ जैसे बड़े मार्गमें चलते - चलते घोड़ा थक जाता है, उसी प्रकार मैं भी कामपीड़ासे थकावटका अनुभव कर रहा हूँ । वैसे तो मुझे शत्रुओंकी ओरसे कोई डर नहीं है; क्योंकि वे वनवासी वानर अथवा वे दोनों दशरथकुमार श्रीराम और लक्ष्मण असंख्य जल - जन्तुओं तथा मत्स्योंसे भरे हुए अलध्य महासागर को कैसे पार कर सकेंगे? ॥ २०३ ॥
अथवा कपिनैकेन कृतं नः कदनं महत् ॥ २१ ॥
दुर्ज्ञेयाः कार्यगतयो ब्रूत यस्य यथामति ।
मानुषान्नो भयं नास्ति तथापि तु विमृश्यताम् ॥ २२ ॥
" अथवा एक ही वानरने आकर हमारे यहाँ महान् * यहाँ रावणने सभासदों के सामने अपनी झूठी उदारता दिखाने के लिये सर्वथा असत्य कहा है । सीताजीने कभी अपने मुँह-से यह नहीं कहा था कि ' मुझे एक वर्षका समय दो । यदि उतने दिनोंतक श्रीराम नहीं आये तो मैं तुम्हारी हो जाऊँगी । ' सीताने तो सदा तिरस्कारपूर्वक उसके जघन्य प्रस्तावको ठुकराया ही था । इसने स्वयं ही अपनी ओरसे उन्हें एक वर्षका अवसर दिया था । ( देखिये अरण्यकाण्ड सर्ग ५६ श्लोक २४-२५ )
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युद्धकाण्डे द्वादशः सर्गः १०७ ९ संहार मचा दिया था । इसलिये कार्यसिद्धिके उपायोंको समझ में जाकर शान्त हो गया, तब वे पुनः उस कुण्डको नहीं लेना अत्यन्त कठिन है । अतः जिसको अपनी बुद्धिके अनुसार जैसा उचित जान पड़े, वह वैसा ही बतावे । तुम सब लोग अपने विचार अवश्य व्यक्त करो । यद्यपि हमें मनुष्यसे कोई भय नहीं है, तथापि तुम्हें विजयके उपायपर विचार तो करना ही चाहिये ॥ २१-२२ ॥
तदा देवासुरे युद्धे युष्माभिः सहितोऽजयम् ।
ते मे भवन्तश्च तथा सुग्रीवप्रमुखान् हरीन् ॥ २३ ॥
परे पारे समुद्रस्य पुरस्कृत्य नृपात्मजौ ।
सीतायाः पदवीं प्राप्य सम्प्राप्तौ वरुणालयम् ॥ २४ ॥
' उन दिनों जब देवताओं और असुरोंका युद्ध चल रहा था, उसमें आप सब लोगों की सहायता से ही मैंने विजय प्राप्त की थी । आज भी आप मेरे उसी प्रकार सहायक हैं । वे दोनों राजकुमार सीताका पता पाकर सुग्रीव आदि वानरोंको साथ लिये समुद्रके उस तटतक पहुँच चुके हैं ॥ २३-२४ ॥
अदेया च यथा सीता वध्यौ दशरथात्मजौ ।
भवद्भिर्मन्यतां मन्त्रः सुनीतं चाभिधीयताम् ॥ २५ ॥
‘ अब आपलोग आपसमें सलाह कीजिये और कोई ऐसी सुन्दर नीति बताइये, जिससे सीताको लौटाना न पड़े तथा वे दोनों दशरथकुमार मारे जायँ ॥ २५ ॥
नहि शक्तिं प्रपश्यामि जगत्यन्यस्य कस्यचित् ।
सागरं वानरैस्तीर्त्वा निश्चयेन जयो मम ॥ २६ ॥
‘ वानरोंके साथ समुद्रको पार करके यहाँतक आनेकी शक्ति जगत्में रामके सिवा और किसीमें नहीं देखता हूँ ( किंतु राम और वानर यहाँ आकर भी मेरा कुछ बिगाड़ नहीं सकते ), अतः यह निश्चय है कि जीत मेरी ही होगी ' ॥ २६ ॥
तस्य कामपरीतस्य निशम्य परिदेवितम् ।
कुम्भकर्णः प्रचुक्रोध वचनं चेदमब्रवीत् ॥ २७ ॥
कामातुर रावणका यह खेदपूर्ण प्रलाप सुनकर कुम्भकर्ण-को क्रोध आ गया और उसने इस प्रकार कहा -- ॥ २७ ॥
यदा तु रामस्य सलक्ष्मणस्य प्रसह्य सीता खलु सा इहाहृता । सकृत् समीक्ष्यैव सुनिश्चितं तदा भजेत चित्तं यमुनेव यामुनम् ॥ २८ ॥
' जब तुम लक्ष्मणसहित श्रीरामके आश्रमसे एक बार स्वयं ही मनमाना विचार करके सीताको यहाँ बलपूर्वक हर लाये थे, उसी समय तुम्हारे चित्तको हमलोगोंके साथ इस विषयमें सुनिश्चित विचार कर लेना चाहिये था । ठीक उसी तरह जैसे यमुना जब पृथ्वीपर उतरनेको उद्यत हुईं, तभी उन्होंने यमनोत्री पर्वतके कुण्डविशेषको अपने जलसे पूर्ण किया था ( पृथ्वीपर उतर जानेके बाद उनका वेग जब समुद्र-भर सकतीं, उसी प्रकार तुमने भी जब विचार करनेका अवसर था, तब हमारे साथ बैठकर विचार किया नहीं । अब अवसर बिताकर सारा काम तुम विचार करने चले हो ) ॥ २८ ॥
सर्वमेतन्महाराज कृतमप्रतिमं विधीयेत सहास्माभिरादावेवास्य ' महाराज! तुमने जो यह छलपूर्वक आदि कार्य किया है, यह सब तुम्हारे है । इस पापकर्मको करनेसे पहले ही परामर्श कर लेना चाहिये था ॥ २ ९ ॥ न्यायेन राजकार्याणि यः करोति बिगड़ जानेके बाद
तव ।
कर्मणः ॥ २ ९ ॥
छिपकर परस्त्री - हरण लिये बहुत अनुचित आपको हमारे साथ
दशानन ।
न स संतप्यते पश्चान्निश्चितार्थमतिर्नृपः ॥ ३० ॥
' दशानन! जो राजा सब राजकार्य न्यायपूर्वक करता है, उसकी बुद्धि निश्चयपूर्ण होनेके कारण उसे पीछे पछताना नहीं पड़ता है ॥ ३० ॥
अनुपायेन कर्माणि विपरीतानि यानि च ।
क्रियमाणानि दुष्यन्ति हवींष्यप्रयतेष्विव ॥ ३१ ॥
' जो कर्म उचित उपायका अवलम्बन किये बिना ही किये जाते हैं तथा जो लोक और शास्त्र के विपरीत होते हैं, वे पाप-कर्म उसी तरह दोषकी प्राप्ति कराते हैं, जैसे अपवित्र आभि-चारिक यज्ञों में होमे गये हविष्य ॥ ३१ ॥
यः पश्चात् पूर्वकार्याणि कर्माण्यभिचिकीर्षति ।
पूर्व चापरकार्याणि स न वेद नयानयो ॥ ३२ ॥
' जो पहले करने योग्य कार्योंको पीछे करना चाहता है और पीछे करने योग्य काम पहले ही कर डालता है, वह नीति और अनीतिको नहीं जानता ॥ ३२ ॥
चपलस्य तु कृत्येषु प्रसमीक्ष्याधिकं बलम् ।
छिद्रमन्ये प्रपद्यन्ते क्रौञ्चस्य खमिव द्विजाः ॥ ३३ ॥
' शत्रुलोग अपने विपक्षीके बलको अपनेसे अधिक देख-कर भी यदि वह हर काममें चपल ( जल्दबाज ) है तो उसका दमन करने के लिये उसी तरह उसके छिद्र ढूँढ़ते रहते हैं, जैसे पक्षी दुर्लय क्रौञ्च पर्वतको लाँघकर आगे बढ़ने के लिये उसके ( उस ) छिद्रको आश्रय लेते हैं ( जिसे कुमार कार्तिकेयने अपनी शक्तिका प्रहार करके बनाया था ) ॥ ३३ ॥
त्वयेदं महदारब्धं कार्यमप्रतिचिन्तितम् ।
दिष्ट्या त्वां नावधीद् रामो विषमिश्रमिवामिषम् ॥ ३४ ॥
' महाराज! तुमने भावी परिणामका विचार किये बिना १. कुमार कार्तिकेयने अपनी शक्तिके द्वारा क्रौञ्चपर्वतको विदीर्ण करके उसमें छेद कर दिया था --- यह प्रसंग महाभारत में आया है । ( देखिये शल्यप ० ४६ । ८४ )
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१०८० श्रीमद्वाल्मीकीय रामायणे ही यह बहुत बड़ा दुष्कर्म आरम्भ किया है 1 । जैसे विपमिश्रित भोजन खानेवालेके प्राण हर लेता है, उसी प्रकार श्रीराम चन्द्रजी तुम्हारा वध कर डालेंगे । उन्होंने अभीतक तुम्हें मार नहीं डाला, इसे अपने लिये सौभाग्यकी बात समझो ॥ ३४ ॥
तस्मात् त्वया समारब्धं कर्म ह्यप्रतिमं परैः ।
अहं समीकरिष्यामि हत्वा शत्रूंस्तवानघ ॥ ३५ ॥
' अनघ! यद्यपि तुमने शत्रुओंके साथ अनुचित कर्म आरम्भ किया है, तथापि मैं तुम्हारे शत्रुओंका संहार करके सबको ठीक कर दूँगा ॥ ३५ ॥
अहमुत्सादयिष्यामि शत्रु स्तव निशाचर ।
यदि शक्रविवस्वन्तौ यदि पावकमारुतौ ।
तावहं योधयिष्यामि कुबेरवरुणावपि ॥ ३६ ॥
' निशाचर! तुम्हारे शत्रु यदि इन्द्र, सूर्य, अग्नि, वायु, कुबेर और वरुण भी हों तो मैं उनके साथ युद्ध करूँगा और तुम्हारे सभी शत्रुओंको उखाड़ फेंकूँगा ॥ ३६ ॥
गिरिमात्रशरीरस्य महापरिघयोधिनः ।
नर्दतस्तीक्ष्णदंष्ट्रस्य विभीयाद् वै पुरंदरः ॥ ३७ ॥
" मैं पर्वतके समान विशाल एवं तीखी दाढ़ोंसे युक्त शरीर धारण करके महान् परिघ हाथमें ले समरभूमिमें जूझता हुआ जब गर्जना करूँगा, उस समय देवराज इन्द्र भी भयभीत हो जायँगे ॥ ३७ ॥
पुनम स द्वितीयेन शरेण निहनिष्यति ।
ततोऽहं तस्य पास्यामि रुधिरं काममाश्वस ॥ ३८ ॥
' राम मुझे एक बाणसे मारकर दूसरे बाणसे मारने लगेंगे, उसी बीचमें मैं उनका खून पी लूँगा । इसलिये तुम पूर्णतः निश्चिन्त हो जाओ ॥ ३८ ॥
वधेन वै दाशरथेः सुखावहं जयं तवाहर्तुमहं यतिष्ये । हत्वा च रामं सह लक्ष्मणेन खादामि सर्वान् हरियूथमुख्यान् ॥ ३ ९ ॥ “ मैं दशरथनन्दन श्रीरामका वध करके तुम्हारे लिये सुख-दायिनी विजय सुलभ करानेका प्रयत्न करूँगा । लक्ष्मणसहित रामको मारकर समस्त वानरयूथपतियोंको खा जाऊँगा ॥ ३ ९ ॥ रमस्व कामं पिब चाय्यवारुणीं कुरुष्व कार्याणि हितानि विज्वरः । मया तु रामे गमिते यमक्षयं चिराय सीता वशगा भविष्यति ॥ ४० ॥
' तुम मौजसे विहार करो । उत्तम वारुणीका पान करो और निश्चिन्त होकर अपने लिये हितकर कार्य करते रहो । मेरे द्वारा रामके यमलोक भेज दिये जानेपर सीता चिरकालके लिये तुम्हारे अधीन हो जायगी ' ॥ ४० ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये युद्धकाण्डे द्वादशः सर्गः ॥ १२ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आरामायण आदिकाव्य के युद्धकाण्ड में बारहवाँ सगँ पूरा हुआ ॥ १.२ ॥ त्रयोदशः सर्गः महापार्श्वका रात्रणको सीतापर बलात्कार के लिये उकसाना और रावणका शापके कारण अपनेको ऐसा करने में असमर्थ बताना तथा अपने पराक्रमके गीत गाना
रावणं क्रुद्धमाशाय महापार्श्वो महाबलः ।
मुहूर्तमनुसंचिन्त्य प्राञ्जलिर्वाक्यमब्रवीत् ॥ १ ॥
तब रावणको कुपित हुआ जान महाबली महापार्श्वने दो घड़ीतक कुछ सोच - विचार करनेके बाद हाथ जोड़कर कहा- ॥ १ ॥
यः खल्वपि वनं प्राप्य मृगव्यालनिषेवितम् ।
न पिवेन्मधु सम्प्राप्य स नरो बालिशो भवेत् ॥ २ ॥
‘ जो हिंसक पशुओं और सर्पोंसे भरे हुए दुर्गम वनमें जाकर वहाँ पीने योग्य मधु पाकर भी उसे पीता नहीं है, वह पुरुष मूर्ख ही है ॥ २ ॥
ईश्वरस्येश्वरः कोऽस्ति तव शत्रुनिबर्हण ।
रमस्व सह वैदेह्या शत्रूनाक्रम्य मूर्धसु ॥ ३ ॥
' शत्रुसूदन महाराज! आप तो स्वयं ही ईश्वर हैं । आप-का ईश्वर कौन है? आप शत्रुओंके सिरपर पैर रखकर विदेह-कुमारी सीताके साथ रमण कीजिये ॥ ३ ॥
बलात् कुक्कुटवृत्तेन प्रवर्तस्व महाबल ।
आक्रम्याक्रम्य सीतां वै तांभुङ्क्ष्व च रमख च ॥ ४ ॥
' महाबली वीर! आप कुक्कुटोंके बर्तावको अपनाकर सीताके साथ बलात्कार कीजिये । बारंबार आक्रमण करके उनके साथ रमण एवं उपभोग कीजिये ॥ ४ ॥
लब्धकामस्य ते पश्चादागमिष्यति किं भयम् ।
प्राप्तमप्राप्तकालं वा सर्व प्रतिविधास्यसे ॥ ५ ॥
" जब आपका मनोरथ सफल हो जायगा, तब फिर आपपर कौन - सा भय आयेगा? यदि वर्तमान एवं भविष्यकालमें कोई भय आया भी तो उस समस्त भयका यथोचित प्रतीकार किया जायगा ॥ ५ ॥
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युद्धकाण्डे त्रयोदशः सर्गः २०८१
कुम्भकर्णः सहास्माभिरिन्द्रजिच्च महाबलः ।
प्रतिषेधयितुं शक्तौ सवज्रमपि वज्रिणम् ॥ ६ ॥
‘ हमलोगोंके साथ यदि महाबली कुम्भकर्ण और इन्द्रजित् खड़े हो जायँ तो ये दोनों वज्रधारी इन्द्रको भी आगे बढ़ने से रोक सकते हैं ॥ ६ ॥
उपप्रदानं सान्त्वं वा भेदं वा कुशलैः कृतम् ।
समतिक्रम्य दण्डेन सिद्धिमर्थेषु रोचये ॥ ७ ॥
मैं तो नीतिनिपुण पुरुषोंके द्वारा प्रयुक्त साम, दान और भेदको छोड़कर केवल दण्डके द्वारा काम बना लेना ही अच्छा समझता हूँ ॥ ७ ॥
इह प्राप्तान् वयं सर्वाञ्छयूँ स्तव महाबल ।
वशे शस्त्रप्रतापेन करिष्यामो न संशयः ॥ ८ ॥
' महाबली राक्षसराज! यहाँ आपके जो भी शत्रु आयेंगे, उन्हें हमलोग अपने शस्त्रोंके प्रतापसे वशमें कर लेंगे, इसमें संशय नहीं है ' ॥ ८ ॥
एवमुक्तस्तदा राजा महापार्श्वेन रावणः ।
तस्य सम्पूजयन् वाक्यमिदं वचनमब्रवीत् ॥ ९ ॥
महापार्श्वके ऐसा कहनेपर उस समय लङ्काके राजा रावण-ने उसके वचनोंकी प्रशंसा करते हुए इस प्रकार कहा – ||
महापार्श्व निबोध त्वं रहस्यं किंचिदात्मनः ।
चिरवृत्तं तदाख्यास्ये यदवाप्तं पुरा मया ॥ १० ॥
' महापार्श्व! बहुत दिन हुए पूर्वकालमें एक गुप्त घटना घटित हुई थी मुझे शाप प्राप्त हुआ था । अपने जीवन के उस गुप्त रहस्यको आज मैं बता रहा हूँ, उसे सुनो ॥ १० ॥
पितामहस्य भवनं गच्छन्तीं पुञ्जिकस्थलाम् ।
चञ्चूर्यमाणामद्राक्षमाकाशेऽग्निशिखामिव ॥ ११ ॥
‘ एक बार मैंने आकाशमें अग्नि - शिखाके समान प्रकाशित होती हुई पुञ्जिकस्थला नामकी अप्सराको देखा, जो पितामह ब्रह्माजीके भवनकी ओर जा रही थी । वह अप्सरा मेरे भयसे लुकती - छिपती आगे बढ़ रही थी ॥ ११ ॥
सा प्रसह्य मया भुक्ता कृता विवसना ततः ।
स्वयम्भूभवनं प्राप्ता लोलिता नलिनी यथा ॥ १२ ॥
“ मैंने बलपूर्वक उसके वस्त्र उतार दिये और हठात् उसका उपभोग किया । इसके बाद वह ब्रह्माजीके भवनमें गयी । उसकी दशा हाथीद्वारा मसलकर फेंकी हुई कमलिनीके समान हो रही थी ॥ १२ ॥
तच्च तस्य तथा मन्ये ज्ञातमासीन्महात्मनः ।
अथ संकुपितो वेधा मामिदं वाक्यमब्रवीत् ॥ १३ ॥
“ मैं समझता हूँ कि मेरेद्वारा उसकी जो दुर्दशा की गयी थी, वह पितामह ब्रह्माजीको ज्ञात हो गयी । इससे वे अत्यन्त वा ० रा ० ५.८. १०-कुपित हो उठे और मुझसे इस प्रकार बोले- ॥ १३ ॥
अद्यप्रभृति यामन्यां बलान्नारीं गमिष्यसि ।
तदा ते शतधा मूर्धा फलिष्यति न संशयः ॥ १४ ॥
“ आजसे यदि तू किसी दूसरी नारीके साथ बलपूर्वक समागम करेगा तो तेरे मस्तक के सौ टुकड़े हो जायँगे, इसमें संशय नहीं है ' ॥ १४ ॥
इत्यहं तस्य शापस्य भीतः प्रसभमेव ताम् ।
नारोहये बलात् सीतां वैदेहीं शयने शुभे ॥ १५ ॥
" इस तरह मैं ब्रह्माजी के शापसे भयभीत हूँ । इसीलिये अपनी शुभ शय्यापर विदेहकुमारी सीताको हठात् एवं बल-पूर्वक नहीं चढ़ाता हूँ ॥ १५ ॥
सागरस्येव मे वेगो मारुतस्येव मे गतिः ।
नैतद् दाशरथिर्वेद ह्यासादयति तेन माम् ॥ १६ ॥
' मेरा वेग समुद्रके समान है और मेरी गति वायुके तुल्य है । इस बातको दशरथनन्दन राम नहीं जानते हैं, इससे वे मुझपर चढ़ाई करते हैं ॥ १६ ॥
कोहि सिंहमिवासीनं सुप्तं गिरिगुहाशये ।
क्रुद्धं मृत्युमिवासीनं प्रबोधयितुमिच्छति ॥ १७ ॥
' अन्यथा पर्वतकी कन्दरा में सुखपूर्वक सोये हुए सिंहके समान तथा कुपित होकर बैठी हुई मृत्युके तुल्य भयंकर मुझ रावणको कौन जगाना चाहेगा? ॥ १७ ॥
न मत्तो निर्गतान् वाणान् द्विजिहान् पन्नगानिव ।
रामः पश्यति संग्रामे तेन मामभिगच्छति ॥ १८ ॥
' मेरे धनुषसे छूटे हुए दो जीभवाले सर्पोंके समान भयंकर बाणों को समराङ्गणमें श्रीरामने कभी देखा नहीं है, इसीलिये वे मुझपर चढ़े आ रहे हैं ॥ १८ ॥
क्षिप्रं वज्रसमैर्वाणैः शतधा कार्मुकच्युतैः ।
राममादीपयिष्यामि उल्काभिरिव कुञ्जरम् ॥ १ ९ ॥
" मैं अपने धनुषसे शीघ्रतापूर्वक छूटे हुए सैकड़ों वज्र-सदृश बाणोंद्वारा रामको उसी प्रकार जला डालूँगा, जैसे लोग उल्काओं द्वारा हाथीको उसे भगानेके लिये जलाते हैं ॥ १ ९ ॥
तच्चास्य बलमादास्ये बलेन महता वृतः ।
उदितः सविता काले नक्षत्राणां प्रभामिव ॥ २० ॥
' जैसे प्रातः काल उदित हुए सूर्यदेव नक्षत्रोंकी प्रभाको छीन लेते हैं, उसी प्रकार अपनी विशाल सेनासे घिरा हुआ मैं उनकी उस वानर सेनाको आत्मसात् कर लूँगा ॥ २० ॥
न वासवेनापि सहस्रचक्षुषा युधास्मि शक्यो वरुणेन वा पुनः । मया त्वियं बाहुबलेन निर्जिता पुरा पुरी वैश्रवणेन पालिता ॥ २१ ॥
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१०८२ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे “ युद्धमें तो हजार नेत्रोंवाले इन्द्र और वरुण भी मेरा हुई इस लङ्कापुरीको मैंने अपने बाहुबलसे ही जी सामना नहीं कर सकते । पूर्वकालमें कुबेरके द्वारा पालित था ' ॥ २१ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये युद्धकाण्डे त्रयोदशः सर्गः ॥ १३ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्ड में तेरहवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ १३ ॥
चतुर्दशः सर्गः विभीषणका रामको अजेय बताकर उनके निशाचरेन्द्रस्य निशम्य वाक्यं
स कुम्भकर्णस्य च गर्जितानि ।
विभीषणो राक्षसराजमुख्य-मुवाच वाक्यं हितमर्थयुक्तम् ॥ १ ॥
राक्षसराज रावणके इन वचनों और कुम्भकर्णकी गर्जनाओं को सुनकर विभीषणने रावणसे ये सार्थक और हितकारी वचन कहे ॥ १ ॥
वृतो हि बाह्रन्तरभोगराशि-श्चिन्ताविषः सुस्मिततीक्ष्णदंष्ट्रः । पञ्चाङ्गुलीपञ्चशिरोऽतिकायः सीतामहाहिस्तव केन राजन् ॥ २ ॥
" राजन्! सीता नामधारी विशालकाय महान् सर्पको किसने आपके गलेमें बाँध दिया है? उसके हृदयका भाग ही उस सर्पका शरीर है, चिन्ता ही विष है, सुन्दर मुस्कान ही तीखी दाढ़ हैं और प्रत्येक हाथकी पाँच - पाँच अङ्गुलियाँ ही इस सर्पके पाँच सिर हैं ॥ २ ॥
यावन्न लङ्कां समभिद्रवन्ति बलीमुखाः पर्वतकूटमात्राः । दंष्ट्रायुधाश्चैव नखायुधाश्च प्रदीयतां दाशरथाय मैथिली ॥ ३ ॥
' जबतक पर्वत - शिखरके समान ऊँचे वानर, जिनके दाँत और नख ही आयुध हैं, लङ्कापर चढ़ाई नहीं करते, तभीतक आप दशरथनन्दन श्रीरामके हाथमें मिथिलेशकुमारी सीताको सौंप दीजिये ॥ ३ ॥
यावन्न गृह्णन्ति शिरांसि बाणा रामेरिता राक्षसपुंगवानाम् । वायुसमानवेगाः प्रदीयतां दाशरथाय मैथिली ॥ ४ ॥
' जबतक श्रीरामचन्द्रजीके चलाये हुए वायुके समान बेगशाली तथा वज्रतुल्य बाण राक्षसशिरोमणियोंके सिर नहीं काट रहे हैं, तभीतक आप दशरथनन्दन श्रीरामकी सेवामें सीताजीको समर्पित कर दीजिये ॥ ४ ॥
पास सीताको लौटा देनेकी सम्मति देना न कुम्भकर्णेन्द्रजितौ च राजं-स्तथा महापार्श्वमहोदरौ वा । निकुम्भकुम्भौ च तथातिकायः स्थातुं समर्था युधि राघवस्य ॥ ५ ॥
' राजन्! ये कुम्भकर्ण, इन्द्रजित् महापार्श्व, महोदर, निकुम्भ, कुम्भ और अतिकाय — कोई भी समराङ्गणमें श्रीरघुनाथजीके सामने नहीं ठहर सकते हैं ॥ ५ ॥
जीवंस्तु रामस्य न मोक्ष्यसे त्वं
गुप्तः सवित्राप्यथवा मरुद्भिः ।
न वासवस्याङ्कगतो न मृत्यो-नभो न पातालमनुप्रविष्टः ॥ ६ ॥
' यदि सूर्य या वायु आपकी रक्षा करें, इन्द्र या यम आपको गोदमें छिपा लें अथवा आप आकाश या पातालमें घुस जायँ तो भी श्रीरामके हाथसे जीवित नहीं बच सकेंगे ' ॥ निशम्य वाक्यं तु विभीषणस्य ततः प्रहस्तो वचनं बभाषे । न नो भयं विद्म न दैवतेभ्यो न दानवेभ्योऽप्यथवा कदाचित् ॥ ७ ॥
विभीषणकी यह बात सुनकर प्रहस्तने कहा- ' हम देवताओं अथवा दानवोंसे कभी नहीं डरते । भय क्या वस्तु है? यह हम जानते ही नहीं हैं ॥ ७ ॥
न यक्षगन्धर्व महोरगेभ्यो भयं न संख्ये पतगोरगेभ्यः । कथं नु रामाद् भविता भयं नो नरेन्द्रपुत्रात् समरे कदाचित् ॥ ८ ॥
' हमें युद्धमें यक्ष, गन्धर्वों, बड़े - बड़े नागों, पक्षियों और सर्पोंसे भी भय नहीं होता है; फिर समराङ्गणमें राजकुमार रामसे हमें कभी भी कैसे भय होगा? ' ॥ ८ ॥
प्रहस्तवाक्यं त्वहितं निशम्य विभीषणो राजहितानुकाङ्क्षी । ततो महार्थ वचनं बभाषे धर्मार्थकामेषु निविष्टबुद्धिः ॥ ९ ॥
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युद्धकाण्डे चतुर्दशः सर्गः १०८३ विभीषण राजा रावणके सच्चे हितैषी थे । उनकी बुद्धि-का धर्म, अर्थ और काम में अच्छा प्रवेश था । उन्होंने प्रहस्त-के अहितकर वचन सुनकर यह महान् अर्थसे युक्त बात कही ॥ ९ ॥
प्रहस्त राजा च महोदरश्च त्वं कुम्भकर्णश्च यथार्थजातम् । ब्रवीत रामं प्रति तन्न शक्यं यथा गतिः स्वर्गमधर्मबुद्धेः ॥ १० ॥
' प्रहस्त! महाराज रावण, महोदर, तुम और कुम्भकर्ण-श्रीरामके प्रति जो कुछ कह रहे हो, वह सब तुम्हारे किये नहीं हो सकता । ठीक उसी तरह, जैसे पापात्मा पुरुषकी स्वर्ग में पहुँच नहीं हो सकती है ॥ १० ॥
वधस्तु रामस्य मया त्वया च प्रहस्त सर्वैरपि राक्षसैर्वा । कथं भवेदर्थविशारदस्य महार्णवं तर्तुमिवालवस्य ॥ ११ ॥
' प्रहस्त! श्रीराम अर्थविशारद हैं समस्त कार्योंके साधनमें कुशल हैं । जैसे बिना जहाज या नौकाके कोई महा-सागरको पार नहीं कर सकता, उसी प्रकार मुझसे, तुमसे अथवा समस्त राक्षसोंसे भी श्रीरामका वध होना कैसे सम्भव है? ॥ ११ ॥
धर्मप्रधानस्य महारथस्य इक्ष्वाकुवंशप्रभवस्य राक्षः । पुरोऽस्य देवाश्च तथाविधस्य कृत्येषु शक्तस्य भवन्ति मूढाः ॥ १२ ॥
' श्रीराम धर्मको ही प्रधान वस्तु मानते हैं । उनका प्रादुर्भाव इक्ष्वाकुकुल में हुआ है । वे सभी कार्योंके सम्पादन में समर्थ और महारथी वीर हैं ( उन्होंने विराध, कबन्ध और वाली जैसे वीरोंको बात की बात में यमलोक भेज दिया था ) । ऐसे प्रसिद्ध पराक्रमी राजा श्रीरामसे सामना पड़नेपर तो देवता भी अपनी हेकड़ी भूल जायँगे ( फिर हमारी तुम्हारी तो बात ही क्या है? ) ॥ १२ ॥
तीक्ष्णा न तावत् तत्र कङ्कपत्रा दुरासदा राघवविप्रमुक्ताः । भित्वा शरीरं प्रविशन्ति बाणाः प्रहस्त तेनैव विकत्थसे त्वम् ॥ १३ ॥
' प्रहस्त! अभीतक श्रीरामके चलाये हुए कङ्कपत्रयुक्त, दुर्जय एवं तीखे बाण तुम्हारे शरीरको विदीर्ण करके भीतर नहीं घुसे हैं; इसीलिये तुम बढ़ - बढ़कर बोल रहे हो ॥ १३ ॥
भित्त्वा न तावत् प्रविशन्ति कार्य प्राणान्तिकास्तेऽशनितुल्यवेगाः । शिताः शरा राघवविप्रमुक्ताः प्रहस्त तेनैव विकत्थसे त्वम् ॥ १४ ॥
‘ प्रहस्त! श्रीरामके बाण वज्रके समान वेगशाली होते हैं । वे प्राणोंका अन्त करके ही छोड़ते हैं । श्रीरघुनाथजीके धनुष-से छूटे हुए वे तीखे बाण तुम्हारे शरीरको फोड़कर अंदर नहीं घुसे हैं; इसीलिये तुम इतनी शेखी बघारते हो ॥ १४ ॥
न रावणो नातिबलस्त्रिशीर्षो न कुम्भकर्णस्य सुतो निकुम्भः । न चेन्द्रजिद् दाशरथिं प्रवोढुं त्वं वा रणे शक्रसमं समर्थः ॥ १५ ॥
‘ रावण, महाबली त्रिशिरा, कुम्भकर्ण कुमार निकुम्भ और इन्द्रविजयी मेघनाद भी समराङ्गणमें इन्द्रतुल्य तेजस्वी दशरथ-नन्दन श्रीरामका वेग सहन करने में समर्थ नहीं हैं ॥ १५ ॥
देवान्तको वापि नरान्तको वा तथातिकायोऽतिरथो महात्मा । अकम्पनश्चाद्रिसमानसारः स्थातुं न शक्ता युधि राघवस्य ॥ १६ ॥
' देवान्तक, नरान्तक, अतिकाय, महाकाय अतिरथ तथा पर्वतके समान शक्तिशाली अकम्पन भी युद्धभूमिमें श्रीरघुनाथ-जीके सामने नहीं ठहर सकते हैं । १६ ॥ अयं च राजा व्यसनाभिभूतो मित्रैर मित्रप्रतिमैर्भवद्भिः 1 अन्वास्यते राक्षसनाशनार्थे तीक्ष्णः प्रकृत्या ह्यसमीक्षकारी ॥ १७ ॥
“ ये महाराज रावण तो व्यसनोंके वशीभूत हैं, इसलिये सोच - विचारकर काम नहीं करते हैं । इसके सिवा ये स्वभावसे ही कठोर हैं तथा राक्षसोंके सत्यानाशके लिये तुम - जैसे शत्रु-तुल्य मित्रकी सेवामें उपस्थित रहते हैं ॥ १७ ॥
अनन्तभोगेन सहस्रमूर्ध्ना नागेन भीमेन महाबलेन । बलात् परिक्षिप्तमिमं भवन्तो राजानमुत्क्षिप्य विमोचयन्तु ॥ १८ ॥
' अनन्त शारीरिक बलसे सम्पन्न, सहस्र फनवाले और महान् बलशाली भयंकर नागने इस राजाको बलपूर्वक अपने
१. राजाओं में सात व्यसन माने गये हैं-वाग्दण्डयोस्तु पारुष्यमर्थ दूषणमेव च ।
पानं स्त्री मृगया द्यूतं व्यसनं सप्तधा प्रभो ॥
( कामन्दक नीतिका वचन गोविन्दराजकी टोका रामायण-भूषण से ) वाणी और दण्डकी कठोरता, धनका अपव्यय, मद्यपान, स्त्री, मृगया और द्यूतये राजाके सात प्रकारके व्यसन है ।