Ramayana 2 — पृष्ठ 271–280
वाल्मीकि रामायण — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 271–280
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१०८४ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे शरीरसे आवेष्टित कर रक्खा है । तुम सब लोग मिलकर इसे बन्धनसे बाहर करके प्राणसंकटसे बचाओ ( अर्थात् श्रीराम-चन्द्रजीके साथ वैर बाँधना महान् सर्पके शरीरसे आवेष्टित होने के समान है । इस भावको व्यक्त करनेके कारण यहाँ निदर्शना अलङ्कार व्यंग्य है ) ॥ १८ ॥
यावद्धि केशग्रहणात् सुहृद्भिः समेत्य सर्वैः परिपूर्ण कामैः । निगृह्य राजा परिरक्षितव्यो भूतैर्यथा भीमबलैर्गृहीतः ॥ १ ९ ॥ ' इस राजासे अबतक आपलोगों की सभी कामनाएँ पूर्ण हुई हैं । आप सब लोग इसके हितैत्री सुहृद् हैं । अतः जैसे भयंकर बलशाली भूतोंसे गृहीत हुए पुरुषको उसके हितैषी आत्मीयजन उसके प्रति बलात्कार करके भी उसकी रक्षा करते हैं, उसी प्रकार आप सब लोग एकमत होकर - आवश्यकता हो तो इसके केश पकड़कर भी इसे अनुचित मार्गपर जानेसे रोकें और सब प्रकारसे इसकी रक्षा करें ॥। १ ९ ॥ सुवारिणा राघव सागरेण प्रच्छाद्यमानस्तरसा भवद्भिः । युक्तस्त्वयं तारयितुं समेत्य काकुत्स्थपातालमुखे पतन् सः ॥ २० ॥
‘ उत्तम चरित्ररूपी जलसे परिपूर्ण श्रीरघुनाथरूपी समुद्र इसे डुबो रहा है अथवा यों समझो कि यह श्रीरामरूपी पाताल-के गहरे गर्त में गिर रहा है । ऐसी दशामें तुम सब लोगोंको मिलकर इसका उद्धार करना चाहिये ॥ २० ॥
इदं पुरस्यास्य सराक्षसस्य राज्ञश्च पश्यं ससुहृज्जनस्य । सम्यग्ध वाक्यं स्वमतं ब्रवीमि नरेन्द्रपुत्राय ददातु मैथिलीम् ॥ २१ ॥
“ मैं तो राक्षसोंसहित इस सारे नगरके और सुहृदों सहित स्वयं महाराजके हितके लिये अपनी यही उत्तम सम्मति देता हूँ कि ' ये राजकुमार श्रीरामके हाथोंमें मिथिलेश कुमारी सीता-को सौंप दें ॥ २१ ॥
परस्य वीर्य स्वबलं च बुद्ध्वा स्थानं क्षयं चैव तथैव वृद्धिम् । तथा स्वपक्षेऽप्यनुमृश्य बुद्ध्या वदेत् क्षमं स्वामिहितं स मन्त्री ॥ २२ ॥
' वास्तवमें सच्चा मन्त्री वही है जो अपने और शत्रु पक्ष के बल - पराक्रमको समझकर तथा दोनों पक्षोंकी स्थिति, हानि और वृद्धिका अपने बुद्धिके द्वारा विचार करके जो स्वामीके लिये हितकर और उचित हो वही बात कहे ' ॥ २२ ॥
इस्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये युद्धकाण्डे चतुर्दशः सर्गः ॥ १४ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्ड में चौदहवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ १४ ॥
पञ्चदशः सर्गः इन्द्रजित्द्वारा विभीषणका उपहास तथा विभीषणका उसे फटकारकर सभामें अपनी उचित सम्मति देना बृहस्पतेस्तुल्यमतेर्वचस्त-निशम्य यत्नेन विभीषणस्य । ततो महात्मा वचनं बभाषे तत्रेन्द्र जिन्नैर्ऋतयूथमुख्यः ॥ १ ॥
विभीषण बृहस्पति के समान बुद्धिमान् थे । उनके वचनों-को जैसे - तैसे बड़े कष्टसे सुनकर राक्षसयूथपतियोंमें प्रधान महाकाय इन्द्रजित्ने वहाँ यह बात कही ॥ १ ॥
किं नाम ते तात कनिष्ठ वाक्य-मनर्थकं वै बहुभीतवच्च । अस्मिन् कुले योऽपि भवेन्न जातः सोऽपीदृशं नैव वदेन्न कुर्यात् ॥ २ ॥
' मेरे छोटे चाचा! आप बहुत डरे हुएकी भाँति यह कसी निरर्थक बात कह रहे हैं? जिसने इस कुलमें जन्म न लिया होगा, वह पुरुष भी न तो ऐसी बात कहेगा और न ऐसा काम ही करेगा ॥ २ ॥
सत्वेन वीर्येण पराक्रमेण धैर्येण शौर्येण च तेजसा च । एकः कुलेऽस्मिन् पुरुषो विमुक्तो विभीषणस्तात कनिष्ठ एषः ॥ ३ ॥
' पिताजी! हमारे इस राक्षसकुलमें एकमात्र ये छोटे चाचा विभीषण ही बल, वीर्य, पराक्रम, धैर्य, शौर्य और तेज-से रहित हैं ॥ ३ ॥
किं नाम तौ मानुषराजपुत्रा-वस्माकमेकेन हि राक्षसेन । सुप्राकृतेनापि निहन्तुमे शक्यौ कुतो भीषयसे स्म भीरो ॥ ४ ॥
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युद्धकाण्डे पञ्चदशः सर्गः १०८५ " वे दोनों मानव राजकुमार क्या हैं? उन्हें तो हमारा एक साधारण - सा राक्षस भी मार सकता है; फिर मेरे डरपोक चाचा! आप हमें क्यों डरा रहे हैं? ॥ ४ ॥
त्रिलोकनाथो ननु देवराजः शक्रो मया भूमितले निविष्टः । भयार्पिताश्चापि दिशः प्रपन्नाः सर्वे तदा देवगणाः समग्राः ॥ ५ ॥
" मैंने तीनों लोकोंके स्वामी देवराज इन्द्रको भी स्वर्गसे हटाकर इस भूतलपर ला बिठाया था । उस समय सारे देवता ओंने भयभीत हो भागकर सम्पूर्ण दिशाओंकी शरण ली श्री ॥ ५ ॥
ऐरावतो निःखनमुन्नदन् स निपातितो भूमितले मया तु । विकृष्य दन्तौ तु मया प्रसा वित्रासिता देवगणाः समग्राः ॥ ६ ॥
' मैंने हठपूर्वक ऐरावत हाथीके दोनों दाँत उखाड़कर उसे स्वर्गसे पृथ्वीपर गिरा दिया था । उस समय वह जोर - जोर-से चिग्धाड़ रहा था । अपने इस पराक्रमद्वारा मैंने सम्पूर्ण देवताओंको आतङ्क में डाल दिया था ॥ ६ ॥
सोऽहं सुराणामपि दर्पन्ता दैत्योत्तमानामपि शोककर्ता । कथं नरेन्द्रात्मजयोर्न शको मनुष्ययोः प्राकृतयोः सुवीर्यः ॥ ७ ॥
' जो देवताओंके भी दर्पका दलन कर सकता है, बड़े - बड़े दैत्यों को भी शोकमग्न कर देनेवाला है तथा जो उत्तम बल-पराक्रमसे सम्पन्न है, वही मुझ - जैसा वीर मनुष्य - जातिके दो साधारण राजकुमारोंका सामना कैसे नहीं कर सकता है? ॥ ७ ॥
दुरासदस्य महौजसस्तद् वचनं निशम्य । ततो महार्थे वचनं बभाषे विभीषणः शस्त्रभृतां वरिष्ठः ॥ ८ ॥
इन्द्रतुल्य तेजस्वी महापराक्रमी दुर्जय वीर इन्द्रजित् की यह बात सुनकर शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ विभीषण ने ये महान् अर्थ-से युक्त वचन कहे - ॥ ८ ॥
न तात मन्त्रे तव निश्चयोऽस्ति बालस्त्वमद्याप्यविपक्व बुद्धिः तस्मात् त्वयाप्यात्मविनाशनाय वचोऽर्थहीनं बहु विप्रलप्तम् ॥ ९ ॥
' तात! अभी तुम बालक हो । तुम्हारी बुद्धि कच्ची है । हुआ है । इसीलिये तुम भी अपने ही बिनाशके लिये बहुत-सी निरर्थक बातें बक गये हो ॥ ९ ॥
रावणस्य त्वमिन्द्रजिन्मित्रमुखोऽसि शत्रुः । यस्येदृशं राघवतो विनाशं निशम्य मोहादनुमन्यसे त्वम् ॥ १० ॥
' इन्द्रजित्! तुम रावणके पुत्र कहलाकर भी ऊपरसे ही उसके मित्र हो । भीतरसे तो तुम पिताके शत्रु ही जान पड़ते हो । यही कारण है कि तुम श्रीरघुनाथजीके द्वारा राक्षसराजके विनाशकी बातें सुनकर भी मोहवश उन्हींकी हाँ में हाँ मिला रहे हो ॥ १० ॥
त्वमेव वध्यश्व सुदुर्मतिश्च स चापि वध्यो य इहानयत् त्वाम् । बालं दृढं साहसिकं च योऽद्य प्रावेशयन्मन्त्रकृतां समीपम् ॥ ११ ॥
' तुम्हारी बुद्धि बहुत ही खोटी है । तुम स्वयं तो मार डालनेके योग्य हो ही, जो तुम्हें यहाँ बुला लाया वह भी वधके ही योग्य है । जिसने आज तुम जैसे अत्यन्त दुःसाहसी बालकको इन सलाहकारोंके समीप आने दिया है, वह प्राणदण्ड-का ही अपराधी है ॥ ११ ॥
मूढोऽप्रगल्भोऽविनयोपपन्न-स्तीक्ष्णस्वभावोऽल्पमतिर्दुरात्मा । मूर्खस्त्वमत्यन्तसुदुर्मतिश्च त्वमिन्द्रजिद् बालतया ब्रवीषि ॥ १२ ॥
' इन्द्रजित्! तुम अविवेकी हो । तुम्हारी बुद्धि परिपक्व नहीं है । विनय तो तुम्हें छूतक नहीं गयी है । तुम्हारा स्वभाव बड़ा तीखा और बुद्धि बहुत थोड़ी है । तुम अत्यन्त दुर्बुद्धि, दुरात्मा और मूर्ख हो । इसीलिये बालकोंकी - सी बे सिर - पैर की बातें करते हो ॥ १२ ॥
ब्रह्मदण्डप्रतिमप्रकाशा-नर्चिष्मतः कालनिकाशरूपान् । सहेत बाणान् यमदण्ड कल्पान् समक्षमुक्तान् युधि राघवेण ॥ १३ ॥
. ' भगवान् श्रीरामके द्वारा युद्धके मुहानेपर शत्रुओंके समक्ष छोड़े गये तेजस्वी बाण साक्षात् ब्रह्मदण्डके समान प्रकाशित होते हैं, कालके समान जान पड़ते हैं और यमदण्डके समान भयंकर होते हैं । भला, उन्हें कौन सह सकता है? ॥ १३ ॥
धनानि रत्नानि सुभूषणानि वासांसि दिव्यानि मणींश्च चित्रान् । सीतां च रामाय निवेद्य देवीं तुम्हारे मनमें कर्तव्य और अकर्तव्यका यथार्थ निश्चय नहीं सेम राजन्निह वीतशोकाः ॥ १४ ॥
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१०८६ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे ' अतः राजन्! हमलोग धन, रत्न, सुन्दर आभूषण, में समर्पित करके ही शोकरहित होकर इस नगर में निवास कर दिव्य वस्त्र, विचित्र मणि और देवी सीताको श्रीरामकी सेवा- सकते हैं ' ॥ १४ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये युद्धकाण्डे पञ्चदशः सर्गः ॥ १५ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्धरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्ड में पंद्रहवाँ स पूरा हुआ ॥ १५ ॥
षोडशः सर्गः रावण के द्वारा विभीषणका तिरस्कार और विभीषणका भी उसे फटकारकर चल देना
सुनिविष्टं हितं वाक्यमुक्तवन्तं विभीषणम् ।
अब्रवीत् परुषं वाक्यं रावणः कालचोदितः ॥ १ ॥
रावणके सिरपर काल मँडरा रहा था, इसलिये उसने सुन्दर अर्थसे युक्त और हितकर बात कहनेपर भी विभीषणसे कठोर वाणी में कहा ॥ १ ॥
वसेत् सह सपत्नेन क्रुद्धेनाशीविषेण च ।
न तु मित्रप्रवादेन संवसेच्छत्रुसेविना ॥ २ ॥
' भाई! शत्रु और कुपित विवधर सर्पके साथ रहना पड़े तो रह ले; परंतु जो मित्र कहलाकर भी शत्रुकी सेवा कर रहा हो, उसके साथ कदापि न रहे ॥ २ ।
जानामि शीलं ज्ञातीनां सर्वलोकेषु राक्षस ।
हृष्यन्ति व्यसनेष्वेते ज्ञातीनां ज्ञातयः सदा ॥ ३ ॥
' राक्षस! सम्पूर्ण लोकों में सजातीय बन्धुओंका जो स्वभाव होता है, उसे मैं अच्छी तरह जानता हूँ । जातिवाले सर्वदा अपने अन्य सजातीयोंकी आपत्तियों में ही हर्ष मानते हैं ॥ ३ ॥
प्रधानं साधकं वैद्यं धर्मशीलं च राक्षस ।
ज्ञातयोऽप्यवमन्यन्ते शूरं परिभवन्ति च ॥ ४ ॥
' निशाचर! जो ज्येष्ठ होनेके कारण राज्य पाकर सबमें प्रधान हो गया हो, राज्यकार्यको अच्छी तरह चला रहा हो और विद्वान्, धर्मशील तथा शूरवीर हो, उसे भी कुटुम्बीजन अपमानित करते हैं और अवसर पाकर उसे नीचा दिखानेकी भी चेष्टा करते हैं ॥ ४ ॥
नित्यमन्योन्यसंहृष्टा व्यसनेष्वाततायिनः ।
प्रच्छन्नहृदया घोरा ज्ञातयस्तु भयावहाः ॥ ५ ॥
‘ जातिवाले सदा एक दूसरेपर संकट आनेपर हर्षका अनुभव करते हैं । वे बड़े आततायी होते हैं— मौका पड़नेपर आग लगाने, जहर देने, शस्त्र चलाने, धन हड़पने और क्षेत्र तथा स्त्रीका अपहरण करनेमें भी नहीं हिचकते हैं । अपना मनोभाव छिपाये रहते हैं; अतएव क्रूर और भयंकर होते हैं ॥ ५ ॥
श्रूयन्ते हस्तिभिर्गीताः श्लोकाः पद्मवने पुरा ।
पाशहस्तान् नरान् दृष्ट्रा शृणुष्व गदतो मम ॥ ६ ॥
' पूर्वकालकी बात है, पद्मवनमें हाथियोंने अपने हृदय के उद्गार प्रकट किये थे, जो अब भी श्लोकोंके रूपमें गाये और सुने जाते हैं । एक बार कुछ लोगों को हाथमें फंदा लिये आते देख हाथियोंने जो बातें कही थीं, उन्हें बता रहा हूँ, मुझसे सुनो ॥ ६ ॥
नाग्निर्नान्यानि शस्त्राणि न नः पाशा भयावहाः ।
घोराः स्वार्थप्रयुक्तास्तु ज्ञातयो नो भयावहाः ॥ ७ ॥
“ हमें अग्नि, दूसरे - दूसरे शस्त्र तथा पाश भय नहीं दे सकते । हमारे लिये तो अपने स्वार्थी जाति - भाई ही भयानक और खतरेकी वस्तु हैं ॥ ७ ॥
उपायमेते वक्ष्यन्ति ग्रहणे नात्र संशयः ।
कृत्स्नाद् भयाज्ज्ञातिभयं कुकष्टं विहितं च नः ॥ ८ ॥
" ये ही हमारे पकड़े जानेका उपाय बता देंगे, इसमें संशय नहीं, अतः सम्पूर्ण भयोंकी अपेक्षा हमें अपने जाति-भाइयोंसे प्राप्त होनेवाला भय ही अधिक कष्टदायक जान पड़ता है ' ॥ ८ ॥
विद्यते गोषु सम्पन्नं विद्यते ज्ञातितो भयम् ।
विद्यते स्त्रीषु चापल्यं विद्यते ब्राह्मणे तपः ॥ ९ ॥
‘ जैसे गौओंमें हव्य - कव्यकी सम्पत्ति दूध होता है, स्त्रियों में चपलता होती है और ब्राह्मणमें तपस्या रहा करती है, उसी प्रकार जाति भाइयोंसे भय अवश्य प्राप्त होता है ॥ ९ ॥
ततो नेष्टमिदं सौम्य यदहं लोकसत्कृतः ।
ऐश्वर्यमभिजातश्च रिपूणां मूर्ध्नि च स्थितः ॥ १० ॥
' अतः सौम्य! आज जो सारा संसार मेरा सम्मान करता है और मैं जो ऐश्वर्यवान्, कुलीन और शत्रुओंके सिरपर स्थित हूँ, यह सब तुम्हें अभीष्ट नहीं है ॥ १० ॥
यथा पुष्करपत्रेषु पतितास्तोयबिन्दवः ।
न श्लेषमभिगच्छन्ति तथानार्येषु सौहृदम् ॥ ११ ॥
‘ जैसे कमलके पत्तेपर गिरी हुई पानी की बूँदें उसमें सटती नहीं हैं, उसी प्रकार अनार्योंके हृदयमें सौहार्द नहीं टिकता है ॥ ११ ॥
यथा शरदि मेघानां सिञ्चतामपि गर्जताम् ।
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युद्धकाण्डे षोडशः सर्गः १०८७. न भवत्यम्बुसंक्लेदस्तथानार्येषु सौहृदम् ॥ १२ ॥
' जैसे शरद् ऋतु में गर्जते और बरसते हुए मेघोंके जल-से धरती गीली नहीं होती है, उसी प्रकार अनायोंके हृदयमें स्नेहजनित आर्द्रता नहीं होती है ॥ १२ ॥
यथा मधुकरस्तर्षाद् रसं विन्दन्न तिष्ठति ।
तथा त्वमपि तत्रैव तथानार्येषु सौहृदम् ॥ १३ ॥
‘ जैसे भौंरा बड़ी चाहसे फूलोंका रस पीता हुआ भी वहाँ ठहरता नहीं है, उसी प्रकार अनार्यों में सुहृज्जनोचित स्नेह नहीं टिक पाता है । तुम भी ऐसे ही अनार्य हो । १३ ॥
यथा मधुकरस्तर्षात् काशपुष्पं पिवन्नपि ।
रसमत्र न विन्देत तथानार्येषु सौहृदम् ॥ १४ ॥
' जैसे भ्रमर रसकी इच्छासे काशके फूलका पान करे तो उसमें रस नहीं पा सकता, उसी प्रकार अनार्योंमें जो स्नेह होता है, वह किसीके लिये लाभदायक नहीं होता ॥ १४ ॥
यथा पूर्व गजः स्नात्वा गृह्य हस्तेन वै रजः ।
दूषयत्यात्मनो देहं तथानार्येषु सौहृदम् ॥ १५ ॥
‘ जैसे हाथी पहले स्नान करके फिर सूँड़से धूल उछालकर अपने शरीरको गँदला कर लेता है, उसी प्रकार दुर्जनोंकी मैत्री दूषित होती है || १५ ||
योऽन्यस्त्वेवंविधं ब्रूयाद् वाक्यमेतन्निशाचर ।
अस्मिन् मुहूर्तेन भवेत् त्वां तु धिक् कुलपांसन ॥ १६ ॥
' कुलकलङ्क निशाचर! तुझे धिक्कार है । यदि तेरे सिवा दूसरा कोई ऐसी बातें कहता तो उसे इसी मुहूर्त में अपने प्राणों-से हाथ धोना पड़ता ' ॥ १६ ॥
इत्युक्तः परुषं वाक्यं न्यायवादी विभीषणः ।
उत्पपात गदापाणिश्चतुर्भिः सह राक्षसैः ॥ १७ ॥
विभीषण न्यायानुकूल बातें कह रहे थे तो भी रावणने जब उनसे ऐसे कठोर वचन कहे, तब वे हाथमें गदा लेकर अन्य चार राक्षसोंके साथ उसी समय उछलकर आकाशमें चले गये ॥ १७ ॥
अब्रवीच्च तदा वाक्यं जातक्रोधो विभीषणः ।
अन्तरिक्षगतः श्रीमान् भ्राता वै राक्षसाधिपम् ॥ १८ ॥
उस समय अन्तरिक्षमें खड़े हुए तेजस्वी भ्राता विभीषण-ने कुपित होकर राक्षसराज रावणसे कहा – ॥ १८ ॥।
सत्वं भ्रान्तोऽसि मे राजन् ब्रूहि मां यद् यदिच्छसि ।
ज्येष्ठो मान्यः पितृसमो न च धर्मपथे स्थितः ।
इदं हि परुषं वाक्यं न क्षमाम्यग्रजस्य ते ॥ १ ९ ॥
“ राजन्! तुम्हारी बुद्धि भ्रममें पड़ी हुई है । तुम धर्मके मार्गपर नहीं हो । यों तो मेरे बड़े भाई होने के कारण तुम पिताके समान आदरणीय हो । इसलिये मुझे जो - जो चाहो, कह लो; परंतु अग्रज होनेपर भी तुम्हारे इस कठोर वचनको कदापि नहीं सह सकता ॥ १ ९ ॥
सुनीतं हितकामेन वाक्यमुक्तं दशानन ।
न गृह्णन्त्यकृतात्मानः कालस्य वशमागताः ॥ २० ॥
“ दशानन! जो अजितेन्द्रिय पुरुष कालके वशीभूत हो जाते हैं, वे हितकी कामनासे कहे हुए सुन्दर नीतियुक्त वचनों को भी नहीं ग्रहण करते हैं ॥ २० ॥
सुलभाः पुरुषा राजन् सततं प्रियवादिनः ।
अप्रियस्य च पथ्यस्य वक्ता श्रोता च दुर्लभः ॥ २१ ॥
' राजन्! सदा प्रिय लगनेवाली मीठी - मीठी बातें कहने-वाले लोग तो सुगमतासे मिल सकते हैं; परंतु जो सुननेमें अप्रिय किंतु परिणाममें हितकर हो, ऐसी बात कहने और सुननेवाले दुर्लभ होते हैं ॥ २१ ॥
बद्धं कालस्य पाशेन सर्वभूतापहारिणः ।
न नश्यन्तमुपेक्षे त्वां प्रदीप्तं शरणं यथा ॥ २२ ॥
' तुम समस्त प्राणियों का संहार करनेवाले कालके पाशमें बँध चुके हो । जिसमें आग लग गयी हो, उस घरकी भाँति नष्ट हो रहे हो । ऐसी दशामें मैं तुम्हारी उपेक्षा नहीं कर सकता था, इसीलिये तुम्हें हितकी बात सुझा दी थी ॥ २२ ॥
दीप्तपावकसंकाशैः शितैः काञ्चनभूषणैः ।
न त्वामिच्छाम्यहं द्रष्टुं रामेण निहतं शरैः ॥ २३ ॥
' श्रीराम सुवर्णभूषित बाण प्रज्वलित अग्निके समान तेजस्वी और तीखे हैं । मैं श्रीरामके द्वारा उन बाणोंसे तुम्हारी मृत्यु नहीं देखना चाहता था, इसीलिये तुम्हें समझानेकी चेष्टा की थी ॥ २३ ॥
शूराश्च बलवन्तश्च कृतास्त्राश्च नरा रणे ।
कालाभिपन्नाः सीदन्ति यथा वालुकसेतवः ॥ २४ ॥
' कालके वशीभूत होनेपर बड़े - बड़े शूर - वीर, बलवान् और अस्त्रवेत्ता भी बालूकी भीति या बाँधके समान नष्ट हो जाते हैं । तन्मर्षयतु यच्चोक्तं गुरुत्वाद्धितमिच्छता ।
आत्मानं सर्वथा रक्ष पुरीं चेमां सराक्षसाम् ।
स्वस्ति तेऽस्तु गमिष्यामि सुखी भव मया विना ॥२५ ॥
' राक्षसराज! मैं तुम्हारा हित चाहता हूँ । इसीलिये जो कुछ भी कहा है, वह यदि तुम्हें अच्छा नहीं लगा तो उसके लिये मुझे क्षमा कर दो; क्योंकि तुम मेरे बड़े भाई हो । अब तुम अपनी तथा राक्षसोंसहित इस समस्त लङ्कापुरीकी सब प्रकारसे रक्षा करो । तुम्हारा कल्याण हो । अब मैं यहाँसे चला जाऊँगा । तुम मेरे बिना सुखी हो जाओ ॥ २५ ॥
निवार्यमाणस्य मया हितैषिणा न रोचते ते वचनं निशाचर । परान्तकाले हि गतायुषो नरा हितंन गृह्णन्ति सुहृद्भिरीरितम् ॥ २६ ॥
' निशाचरराज! मैं तुम्हारा हितैषी हूँ । इसीलिये मैंने
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श्रीमद्वाल्मीकीय रामायणे १०८८ तुम्हें बार - बार अनुचित मार्गपर चलनेसे रोका है, किंतु तुम्हें मेरी समाप्त हो जाती है, वे जीवनके अन्तकालमें अपने सुहृदोंकी बात अच्छी नहीं लगती है । वास्तव में जिन लोगोंकी आयु कही हुई हितकर बात भी नहीं मानते हैं ' || २६ || इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये युद्धकाण्डे षोडशः सर्गः ॥ १६ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्धरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्ड में सोलहवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ १६ ॥
सप्तदशः सर्गः विभीषणका श्रीर।मकी शरण में आना और श्रीरामका अपने मन्त्रियोंके साथ उन्हें आश्रय देनेके विषय में विचार करना
इत्युक्त्वा परुषं वाक्यं रावणं रावणानुजः ।
आजगाम मुहूर्तेन यत्र रामः सलक्ष्मणः ॥ १ ॥
रावणसे ऐसे कठोर वचन कहकर उसके छोटे भाई विभीषण दो ही घड़ी में उस स्थानपर आ गये, जहाँ लक्ष्मण-सहित श्रीराम विराजमान थे ॥ १ ॥
तं मेरुशिखराकारं दीप्तामिव शतह्रदाम् ।
गगनस्थं महीस्थास्ते ददृशुर्वानराधिपाः ॥ २ ॥
विभीषणका शरीर सुमेरु पर्वतके शिखरके समान ऊँचा था । वे आकाश में चमकती हुई बिजलीके समान जान पड़ते थे । पृथ्वीपर खड़े हुए वानरयूथपतियोंने उन्हें आकाश में स्थित देखा || २ ||
ते चाप्यनुचरास्तस्य चत्वारो भीमविक्रमाः ।
तेऽपि वर्मायुधोपेता भूषणोत्तमभूषिताः ॥ ३ ॥
उनके साथ जो चार अनुचर थे । वे भी बड़ा भयंकर पराक्रम प्रकट करनेवाले थे । उन्होंने भी कवच धारण करके अस्त्र - शस्त्र ले रक्खे थे और वे सब के सब उत्तम आभूषणोंसे विभूषित थे || ३ |
स च मेघाचलप्रख्यो वज्रायुधसमप्रभः ।
वरायुधधरो वीरो दिव्याभरणभूषितः ॥ ४ ॥
ar विभीषण भी मेघ और पर्वतके समान जान पड़ते थे । वज्रधारी इन्द्रके समान तेजस्वी, उत्तम आयुधधारी और दिव्य आभूषणोंसे अलंकृत थे ॥ ४ ॥
तमात्मपञ्चमं दृष्ट्वा सुग्रीवो वानराधिपः ।
वानरैः सह दुर्धर्षश्चिन्तयामास बुद्धिमान् ॥ ५ ॥
उन चारों राक्षसोंके साथ पाँचवें विभीषणको देखकर दुर्धर्षं एवं बुद्धिमान् वीर वानरराज सुग्रीवने वानरोंके साथ विचार किया ॥ ५ ॥
चिन्तयित्वा मुहूर्त तु वानरांस्तानुवाच ह ।
हनुमत्प्रमुखान् सर्वानिदं वचनमुत्तमम् ॥ ६ ॥
थोड़ी देरतक सोचकर उन्होंने हनुमान् आदि सब वानरों-से यह उत्तम बात कही - ॥ ६ ॥
एष सर्वायुधोपेतश्चतुर्भिः सह राक्षसैः ।
राक्षसोऽभ्येति पश्यध्वमस्मान् हन्तुं न संशयः ॥ ७ ॥
' देखो, सब प्रकारके अस्त्र - शस्त्रोंसे सम्पन्न यह राक्षस दूसरे चार निशाचरोंके साथ आ रहा है । इसमें संदेह नहीं कि यह हमें मारनेके लिये ही आता है ' ॥ ७ ॥
सुग्रीवस्य वचः श्रुत्वा सर्वे ते वानरोत्तमाः ।
शालानुद्यम्य शैलांश्च इदं वचनमब्रुवन् ॥ ८ ॥
सुग्रीव की यह बात सुनकर वे सभी श्रेष्ठ वानर सालवृक्ष और पर्वतकी शिलाएँ उठाकर इस प्रकार बोले- ॥ ८ ॥
शीघ्रं व्यादिश नो राजन् वधायैषां दुरात्मनाम् ।
निपतन्ति हता यावद् धरण्यामल्पचेतनाः ॥ ९ ॥
' राजन्! आप शीघ्र ही हमें इन दुरात्माओंके वधकी आज्ञा दीजिये, जिससे ये मन्दमति निशाचर मरकर ही इस पृथ्वीपर गिरें ' ॥ ९ ॥
तेषां सम्भाषमाणानामन्योन्यं स विभीषणः ।
उत्तरं तीरमासाद्य खस्थ एव व्यतिष्ठत ॥ १० ॥
आपसमें वे इस प्रकार बात कर ही रहे थे कि विभीषण समुद्रके उत्तर तटपर आकर आकाशमें ही खड़े हो गये ॥१० ॥
स उवाच महाप्राज्ञः स्वरेण महता महान् ।
सुग्रीवं तांश्च सम्प्रेक्ष्य खस्थ एव विभीषणः ॥ ११ ॥
महाबुद्धिमान् महापुरुष विभीषणने आकाशमें ही स्थित रहकर सुग्रीव तथा उन वानरोंकी ओर देखते हुए उच्च स्वर-से कहा- ॥ ११ ॥
रावणो नाम दुर्वृत्तो राक्षसो राक्षसेश्वरः ।
तस्याहमनुजो भ्राता विभीषण इति श्रुतः ॥ १२ ॥
' रावण नामका जो दुराचारी राक्षस निशाचरोंका राजा
है, उसीका मैं छोटा भाई हूँ । मेरा नाम विभीषण है ॥ १२ ॥
तेन सीता जनस्थानाद्धृता हत्वा जटायुषम् ।
रुद्धा च विवशा दीना राक्षसीभिः सुरक्षिता ॥ १३ ॥
' रावणने जटायुको मारकर जनस्थानसे सीताका अपहरण
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। हैं रहे दे परिचय अपना स्वरसे उच्च विभीषण होकर स्थित आकाशमें
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युद्धकाण्डे सप्तदशः सर्गः १०८ ९ किया था । उसीने दीन एवं असहाय सीताको रोक रक्खा है । इन दिनों सीता राक्षसियोंके पहरेमें रहती हैं ॥ १३ ॥
तमहं हेतुभिर्वाक्यैर्विविधैश्व न्यदर्शयम् ।
साधु निर्यात्यतां सीता रामायेति पुनः पुनः ॥ १४ ॥
" मैंने भाँति - भाँति युक्तिसंगत वचनोंद्वारा उसे बारंबार समझाया कि तुम श्रीरामचन्द्रजीकी सेवामें सीताको सादर लौटा दो — इसमें भलाई है ॥ १४ ॥
स च न प्रतिजग्राह रावणः कालचोदितः ।
उच्यमानं हितं वाक्यं विपरीत इवौषधम् ॥ १५ ॥
' यद्यपि मैंने यह बात उसके हितके लिये ही कही थी, तथापि कालसे प्रेरित होनेके कारण रावणने मेरी बात नहीं मानी । ठीक उसी प्रकार, जैसे मरणासन्न पुरुष औषध नहीं लेता ॥ १५ ॥
सोऽहं परुषितस्तेन दासवच्चावमानितः ।
त्यक्त्वा पुत्रांश्च दारांश्च राघवं शरणं गतः ॥ १६ ॥
“ यही नहीं, उसने मुझे बहुत - सी कठोर बातें सुनायीं और दासकी भाँति मेरा अपमान किया । इसलिये मैं अपने स्त्री-पुत्रोंको वहीं छोड़कर श्रीरघुनाथजीकी शरणमें आया हूँ ॥१६ ॥
निवेदयत मां क्षिप्रं सर्वलोकशरण्याय ‘ वानरो! जो समस्त महात्मा श्रीरामचन्द्रजीके सूचना दो और उनसे उपस्थित हुआ है ' ॥ १७ एतत्तु वचनं श्रुत्वा लक्ष्मणस्याग्रतो रामं विभीषणकी यह बात ही भगवान् श्रीराम के पास
राघवाय महात्मने ।
विभीषणमुपस्थितम् ॥ १७ ॥
लोर्कोको शरण देनेवाले हैं, उन पास जाकर शीघ्र मेरे आगमन की कहो – ' शरणार्थी विभीषण सेवामें ॥
सुग्रीवो लघुविक्रमः ।
संरब्धमिदमब्रवीत् ॥ १८ ॥
सुनकर शीघ्रगामी सुग्रीवने तुरंत जाकर लक्ष्मणके सामने ही कुछ आवेशके साथ इस प्रकार कहा- ॥ १८ ॥
प्रविष्टः शत्रुसैन्यं हि प्राप्तः शत्रुरतर्कितः ।
निहन्यादन्तरं लब्ध्वा उलूको वायसानिव ॥ १ ९ ॥
' प्रभो! आज कोई वैरी, जो राक्षस होनेके कारण पहले हमारे शत्रु रावणकी सेना में सम्मिलित हुआ था, अब अकस्मात् हमारी सेनामें प्रवेश पानेके लिये आ गया है । वह मौका पाकर हमें उसी तरह मार डालेगा, जैसे उल्लू कौओंका काम तमाम कर देता है ॥ १ ९ ॥
मन्त्रे व्यूहे नये चारे युक्तो भवितुमर्हसि ।
वानराणां च भद्रं ते परेषां च परंतप ॥ २० ॥
' शत्रुओंको संताप देनेवाले रघुनन्दन! अतः आपको अपने वानरसैनिकोंपर अनुग्रह और शत्रुओंका निग्रह करनेके वा ० रा ० ५.८. ११-लिये कार्याकार्य के विचार, सेनाकी मोर्चेबंदी, नीतियुक्त उपायों-के प्रयोग तथा गुप्तचरोंकी नियुक्ति आदिके विषयमें सतत सावधान रहना चाहिये । ऐसा करनेसे ही आपका भला होगा ॥ २० ॥
अन्तर्धानगता होते राक्षसाः कामरूपिणः ।
शूराश्च निकृतिज्ञाश्च तेषां जातु न विश्वसेत् ॥ २१ ॥
" ये राक्षसलोग मनमाना रूप धारण कर सकते हैं । इनमें अन्तर्धान होने की भी शक्ति होती है । शूरवीर और मायावी तो ये होते ही हैं । इसलिये इनका कभी विश्वास नहीं करना चाहिये ॥ २१ ॥
प्रणिधी राक्षसेन्द्रस्य रावणस्य भवेदयम् ।
अनुप्रविश्य सोऽस्मासु भेदं कुर्यान्न संशयः ॥ २२ ॥
' सम्भव है यह राक्षसराज रावणका कोई गुप्तचर हो । यदि ऐसा हुआ तो हमलोगों में घुसकर यह फूट पैदा कर देगा, इसमें संदेह नहीं ॥ २२ ॥
अथ वा स्वयमेवैष च्छिद्रमासाद्य बुद्धिमान् ।
अनुप्रविश्य विश्वस्ते कदाचित् प्रहरेदपि ॥ २३ ॥
' अथवा यह बुद्धिमान् राक्षस छिद्र पाकर हमारी विश्वस्त सेनाके भीतर घुसकर कभी स्वयं ही हमलोगों पर प्रहार कर बैठेगा, इस बातकी भी सम्भावना है ॥ २३ ॥
मित्राटविबलं चैव मौलभृत्यबलं तथा ।
सर्वमेतद् बलं ग्राह्यं वर्जयित्वा द्विषद्वलम् ॥ २४ ॥
" मित्रोंकी, जंगली जातियोंकी तथा परम्परागत भृत्योंकी जो सेनाएँ हैं, इन सबका संग्रह तो किया जा सकता है; किंतु जो शत्रुपक्षसे मिले हुए हों, ऐसे सैनिकोंका संग्रह कदापि नहीं करना चाहिये || २४ ॥
प्रकृत्या राक्षसो ह्येष भ्रातामित्रस्य वै प्रभो ।
आगतश्च रिपुः साक्षात् कथमस्मिंश्च विश्वसेत् ॥ २५ ॥
' प्रभो! यह स्वभावसे तो राक्षस है ही, अपनेको शत्रुका भाई भी बता रहा है । इस दृष्टिसे यह साक्षात् हमारा शत्रु यहाँ आ पहुँचा है; फिर इसपर कैसे विश्वास किया जा सकता ॥ २५ ॥
रावणस्यानुजो भ्राता विभीषण इति श्रुतः ।
चतुर्भिः सह रक्षोभिर्भवन्तं शरणं गतः ॥ २६ ॥
' रावणका छोटा भाई, जो विभीषण के नामसे प्रसिद्ध है, चार राक्षसोंके साथ आपकी शरण में आया है ॥ २६ ॥
रावणेन प्रणीतं हि तमवेहि विभीषणम् ।
तस्याहं निग्रहं मन्ये क्षमं क्षमवतां वर ॥ २७ ॥
" आप उस विभीषणको रावणका भेजा हुआ ही समझें । उचित व्यापार करनेवालोंमें श्रेष्ठ रघुनन्दन । मैं तो उसको कैद कर लेना ही उचित समझता हूँ ॥ २७ ॥
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१० ९ ० श्रीमद्वाल्मीकीय रामायणे
राक्षसो जिह्मया बुद्धया संदिष्टोऽयमिहागतः ।
प्रहतु मायया छनो विश्वस्ते त्वयि चानघ ॥ २८ ॥
' निष्पाप श्रीराम! मुझे तो ऐसा जान पड़ता है कि यह राक्षस रावण के कहने से ही यहाँ आया है । इसकी बुद्धिमें कुटिलता भरी है । यह मायासे छिपा रहेगा तथा जब आप इसपर पूरा विश्वास करके इसकी ओरसे निश्चिन्त हो जायँगे, तब यह आपहीपर चोट कर बैठेगा । इसी उद्देश्यसे इसका यहाँ आना हुआ है ॥ २८ ॥
वध्यतामेष तीव्रेण दण्डेन सचिवैः सह ।
रावणस्य नृशंसस्य भ्राता ह्येष विभीषणः ॥ २ ९ ॥
" यह महाकर रावणका भाई है, इसलिये इसे कठोर दण्ड देकर इसके मन्त्रियों सहित मार डालना चाहिये ' ॥ २ ९ ॥
एवमुक्त्वा तु तं रामं संरब्धो वाहिनीपतिः ।
वाक्यशो वाक्यकुशलं ततो मौनमुपागमत् ॥ ३० ॥
बातचीतकी कला जाननेवाले एवं रोषमें भरे हुए सेनापति सुग्रीव प्रवचनकुशल श्रीरामसे ऐसी बातें कहकर चुप हो गये ॥ ३० ॥
सुग्रीवस्य तु तद्वाक्यं श्रुत्वा रामो महाबलः ।
समीपस्थानुवाचेदं हनुमत्प्रमुखान् कपीन् ॥ ३१ ॥
सुग्रीवका वह वचन सुनकर महाबली श्रीराम अपने निकट बैठे हुए हनुमान् आदि वानरोंसे इस प्रकार बोले— ॥३१ ॥
यदुक्तं कपिराजेन रावणावरजं प्रति ।
वाक्यं हेतुमदत्यर्थ भवद्भिरपि च श्रुतम् ॥ ३२ ॥
‘ वानरो! वानरराज सुग्रीवने रावणके छोटे भाई विभीषण-के विषय में जो अत्यन्त युक्तियुक्त बातें कही हैं, वे तुम लोगोंने भी सुनी हैं ॥ ३२ ॥
सुहृदामर्थकृच्छ्रेषु युक्तं बुद्धिमता सदा ।
समर्थनोपसं देष्टुं शाश्वतीं भूतिमिच्छता ॥ ३३ ॥
‘ मित्रोंकी स्थायी उन्नति चाहनेवाले बुद्धिमान् एवं समर्थ पुरुषको कर्तव्याकर्तव्य के विषयमें संशय उपस्थित होनेपर सदा ही अपनी सम्मति देनी चाहिये ' ॥ ३३ ॥
इत्येवं परिपृष्टास्ते स्वं स्वं मतमतन्द्रिताः ।
सोपचारं तदा राममूचुः प्रियचिकीर्षवः ॥ ३४ ॥
इस प्रकार सलाह पूछी जानेपर श्रीरामका प्रिय करनेकी इच्छा रखनेवाले वे सब वानर आलस्य छोड़ उत्साहित हो सादर अपना - अपना मत प्रकट करने लगे ॥ ३४ ॥
अज्ञातं नास्ति ते किंचित् त्रिषु लोकेषु राघव ।
आत्मानं पूजयन् राम पृच्छस्यस्मान् सुहृत्तया ॥ ३५ ॥
“ घुनन्दन! तीनों लोकोंमें कोई ऐसी बात नहीं है, जो आपको ज्ञात न हो, तथापि हम आपके अपने ही अङ्ग हैं, अतः आप मित्रभावसे हमारा सम्मान बढ़ाते हुए हमसे सलाह पूछते हैं ॥ ३५ ॥
त्वं हि सत्यव्रतः शूरो धार्मिको दृढविक्रमः ।
परीक्ष्यकारी स्मृतिमान् निस्सृष्टात्मा सुहृत्सु च ॥ ३६ ॥
" आप सत्यवती, शूरवीर, धर्मात्मा, सुदृढ़ पराक्रमी, जाँच-बूझकर काम करनेवाले, स्मरणशक्तिसे सम्पन्न और मित्रों पर विश्वास करके उन्हीं के हाथोंमें अपने - आपको सौंप देनेवाले हैं ॥ ३६ ॥
तस्मादेकैकशस्तावद् ब्रुवन्तु सचिवास्तव ।
हेतुतो मतिसम्पन्नाः समर्थाश्च पुनः पुनः ॥ ३७ ॥
“ इसलिये आपके सभी बुद्धिमान् एवं सामर्थ्यशाली सचिव एक - एक करके बारी - बारीसे अपने युक्तियुक्त विचार प्रकट करें ' ॥ ३७ ॥
इत्युक्ते राघवायाथ मतिमानङ्गदो ऽग्रतः ।
विभीषणपरीक्षार्थमुवाच वचनं हरिः ॥ ३८ ॥
वानरोंके ऐसा कहनेपर सबसे पहले बुद्धिमान् वानर अङ्गद विभीषणकी परीक्षाके लिये सुझाव देते हुए श्रीरघुनाथजी से बोले - ॥ ३८ ॥
शत्रोः सकाशात् सम्प्राप्तः सर्वथा तर्क्स एव हि ।
विश्वासनीयः सहसा न कर्तव्यो विभीषणः ॥ ३ ९ ॥
' भगवन्! विभीषण शत्रुके पाससे आया है, इसलिये उसपर अभी शङ्का ही करनी चाहिये । उसे सहसा विश्वासपात्र नहीं बना लेना चाहिये ॥ ३ ९ ॥
छादयित्वाऽऽत्मभावं हि चरन्ति शठबुद्धयः ।
प्रहरन्ति च रन्ध्रेषु सोऽनर्थः सुमहान् भवेत् ॥ ४० ॥
बहुत - से शठतापूर्ण विचार रखनेवाले लोग अपने मनो-भावको छिपाकर विचरते रहते हैं और मौका पाते ही प्रहार कर बैठते हैं । इससे बहुत बड़ा अनर्थ हो जाता है ॥ ४० ॥
अर्थानथों विनिश्चित्य व्यवसायं भजेत ह ।
गुणतः संग्रहं कुर्याद् दोषतस्तु विसर्जयेत् ॥ ४१ ॥
' अतः गुण - दोषका विचार करके पहले यह निश्चय कर लेना चाहिये कि इस व्यक्तिसे अर्थकी प्राप्ति होगी या अनर्थकी ( यह हितका साधन करेगा या अहितका ) । यदि उसमें गुण हों तो उसे स्वीकार करे और यदि दोष दिखायी दें तो त्याग दे ॥ ४१ ॥
यदि दोषो महांस्तस्मिंस्त्यज्यतामविशङ्कितम् ।
गुणान् वापि बहून् ज्ञात्वा संग्रहः क्रियतां नृप ॥ ४२ ॥
' महाराज! यदि उसमें महान् दोष हो तो निःसंदेह उसका त्याग कर देना ही उचित है । गुणों की दृष्टिसे यदि उसमें बहुत - से सद्गुणोंके होनेका पता लगे, तभी उस व्यक्तिको अपनाना चाहिये ' ॥ ४२ ॥
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युद्धकाण्डे सप्तदशः सर्गः १० ९ १
शरभस्त्वथ निश्चित्य साथै वचनमब्रवीत् ।
क्षिप्रमस्मिन् नरव्याघ्र चारः प्रतिविधीयताम् ॥ ४३ ॥
तदनन्तर शरभने सोच - विचारकर यह सार्थक बात कही-' पुरुषसिंह! इस विभीषणके ऊपर शीघ्र ही कोई गुप्तचर नियुक्त कर दिया जाय ॥ ४३ ॥
प्रणिधाय हि चारेण यथावत् सूक्ष्मबुद्धिना ।
परीक्ष्य च ततः कार्यो यथान्यायं परिग्रहः ॥ ४४ ॥
' सूक्ष्म बुद्धिवाले गुप्तचरको भेजकर उसके द्वारा यथावत्-रूपसे उसकी परीक्षा कर ली जाय । इसके बाद यथोचित रीति से उसका संग्रह करना चाहिये ' ॥ ४४ ॥
जाम्बवांस्त्वथ सम्प्रेक्ष्य शास्त्रबुद्ध या विचक्षणः ।
वाक्यं विज्ञापयामास गुणवद् दोषवर्जितम् ॥ ४५ ॥
इसके बाद परम चतुर जाम्बवान्ने शास्त्रीय बुद्धिसे विचार करके ये गुणयुक्त दोषरहित वचन कहे ॥ ४५ ॥
बद्धवैराच्च पापाच्च राक्षसेन्द्राद् विभीषणः ।
अदेशकाले सम्प्राप्तः सर्वथा शङ्कयतामयम् ॥ ४६ ॥
' राक्षसराज रावण बड़ा पापी है । उसने हमारे साथ वैर बाँध रक्खा है और यह विभीषण उसीके पाससे आ रहा है ।
वास्तवमें न तो इसके आनेका यह समय है और न स्थान ही ।
इसलिये इसके विषय में सब प्रकारसे सशङ्क ही रहना चाहिये ' ॥
ततो मैन्दस्तु सम्प्रेक्ष्य नयापनयकोविदः ।
वाक्यं वचनसम्पन्नो बभाषे हेतुमत्तरम् ॥ ४७ ॥
तदनन्तर नीति और अनीतिके ज्ञाता तथा वाग्वैभवसे सम्पन्न मैन्दने सोच - विचारकर यह युक्तियुक्त उत्तम बात कही ॥ ४७ ॥
अनुजो नाम तस्यैष रावणस्य विभीषणः ।
पृच्छयतां मधुरेणायं शनैर्नरपतीश्वर ॥ ४८ ॥
' महाराज! यह विभीषण रावणका छोटा भाई ही तो है, इसलिये इससे मधुर व्यवहारके साथ धीरे - धीरे सब बातें पूछनी चाहिये ॥ ४८ ॥
भावमस्य तु विज्ञाय तत्त्वतस्तं करिष्यसि ।
यदि दुष्टो न दुष्टो वा बुद्धिपूर्व नरर्षभ ॥ ४ ९ ॥
‘ नरश्रेष्ठ! फिर इसके भावको समझकर आप बुद्धिपूर्वक यह ठीक - ठीक निश्चय करें कि यह दुष्ट है या नहीं । उसके बाद जैसा उचित हो, वैसा करना चाहिये ' ॥ ४ ९ ॥
अथ संस्कारसम्पन्नो हनूमान् सचिवोत्तमः ।
उवाच वचनं श्लक्ष्णमर्थवन्मधुरं लघु ॥ ५० ॥
तत्पश्चात् सचिवोंमें श्रेष्ठ और सम्पूर्ण शास्त्रों के ज्ञानजनित संस्कारसे युक्त हनुमानजीने ये श्रवणमधुर, सार्थक, सुन्दर और संक्षिप्त वचन कहे ॥ ५० ॥
न भवन्तं मतिश्रेष्ठं समर्थ वदतां वरम् ।
अतिशाययितुं शक्तो बृहस्पतिरपि ब्रुवन् ॥ ५१ ॥
" प्रभो! आप बुद्धिमानोंमें उत्तम, सामर्थ्यशाली और वक्ताओंमें श्रेष्ठ हैं । यदि बृहस्पति भी भाषण दें तो वे अपने-को आपसे बढ़कर वक्ता नहीं सिद्ध कर सकते ॥ ५१ ॥
न वादान्नापि संघर्षान्नाधिक्यान्न च कामतः ।
वक्ष्यामि वचनं राजन् यथार्थ राम गौरवात् ॥ ५२ ॥
' महाराज श्रीराम! मैं जो कुछ निवेदन करूँगा, वह वाद - विवाद या तर्क, स्पर्धा, अधिक बुद्धिमत्ताके अभिमान अथवा किसी प्रकारकी कामनासे नहीं करूँगा । मैं तो कार्यकी गुरुतापर दृष्टि रखकर जो यथार्थ समझँगा, वही बात कहूँगा ॥ ५२ ॥
अर्थानर्थनिमित्तं हि यदुक्तं सचिवैस्तव ।
तत्र दोषं प्रपश्यामि क्रिया नह्युपपद्यते ॥ ५३ ॥
' आपके मन्त्रियोंने जो अर्थ और अनर्थके निर्णयके लिये गुण - दोष की परीक्षा करनेका सुझाव दिया है, उसमें मुझे दोष दिखायी देता है; क्योंकि इस समय परीक्षा लेना कदापि सम्भव नहीं है ॥ ५३ ॥
ऋते नियोगात् सामर्थ्यमवबोद्धुं न शक्यते ।
सहसा विनियोगोऽपि दोषवान् प्रतिभाति मे ॥ ५४ ॥
' विभीषण आश्रय देनेके योग्य हैं या नहीं — इसका निर्णय उसे किसी काममें नियुक्त किये बिना नहीं हो सकता और सहसा उसे किसी काममें लगा देना भी मुझे सदोष ही प्रतीत होता है ॥ ५४ ॥
चारप्रणिहितं युक्तं यदुक्तं सचिवैस्तव ।
अर्थस्यासम्भवात् तत्र कारणं नोपपद्यते ॥ ५५ ॥
" आपके मन्त्रियोंने जो गुप्तचर नियुक्त करनेकी बात कही है, उसका कोई प्रयोजन न होनेसे वैसा करनेका कोई युक्तियुक्त कारण नहीं दिखायी देता । ( जो दूर रहता हो और जिसका वृत्तान्त ज्ञात न हो, उसीके लिये गुप्तचरकी नियुक्ति की जाती है । जो सामने खड़ा है और स्पष्टरूपसे अपना वृत्तान्त बता रहा है, उसके लिये गुप्तचर भेजनेकी क्या आवश्यकता है ) ॥ ५५ ॥
अदेशकाले सम्प्राप्त इत्ययं यद् विभीषणः ।
विवक्षा तत्र मेऽस्तीयं तां निबोध यथामति ॥ ५६ ॥
" इसके सिवा जो यह कहा गया है कि विभीषणका इस समय यहाँ आना देश - कालके अनुरूप नहीं है । उसके विषय में भी मैं अपनी बुद्धिके अनुसार कुछ कहना चाहता हूँ । आप सुनें ॥ ५६ ॥
एष देशश्च कालश्च भवतीह यथा तथा ।
पुरुषात् पुरुषं प्राप्य तथा दोषगुणावपि ॥ ५७ ॥