Ramayana 2 — पृष्ठ 281–290
वाल्मीकि रामायण — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 281–290
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१० ९ २ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे
दौरात्म्यं रावणे दृष्ट्रा विक्रमं च तथा त्वयि ।
युक्तमागमनं ह्यत्र सदृशं तस्य बुद्धितः ॥ ५८ ॥
‘ उसके यहाँ आनेका यही उत्तम देश और काल है, यह बात जिस तरह सिद्ध होती है, वैसा बता रहा हूँ । विभीषण एक नीच पुरुषके पाससे चलकर एक श्रेष्ठ पुरुषके पास आया है । उसने दोनोंके दोषों और गुणोंका भी विवेचन किया है । तत्पश्चात् रावणमें दुष्टता और आपमें पराक्रम देख वह रावण को छोड़कर आपके पास आ गया है । इसलिये उसका यहाँ आगमन सर्वथा उचित और उसकी उत्तम बुद्धिके अनुरूप है ॥ ५७-५८ ॥
अज्ञातरूपैः पुरुषैः स राजन् पृच्छयतामिति ।
यदुक्तमत्र मे प्रेक्षा काचिदस्ति समीक्षिता ॥ ५ ९ ॥
“ राजन्! किसी मन्त्रीके द्वारा जो यह कहा गया है कि अपरिचित पुरुषोंद्वारा इससे सारी बातें पूछी जायँ । उसके विषयमें मेरा जाँच - बूझकर निश्चित किया हुआ विचार है, जिसे आपके सामने रखता हूँ ॥ ५ ९ ॥
पृच्छयमानो विशङ्केत सहसा बुद्धिमान् वचः ।
तत्र मित्रं प्रदुष्येत मिथ्या पृष्टं सुखागतम् ॥ ६० ॥
‘ यदि कोई अपरिचित व्यक्ति यह पूछेगा कि तुम कौन हो, कहाँसे आये हो? किसलिये आये हो? इत्यादि, तब कोई बुद्धिमान् पुरुष सहसा उस पूछनेवालेपर संदेह करने लगेगा और यदि उसे यह मालूम हो जायगा कि सब कुछ जानते हुए भी मुझसे झूठे ही पूछा जा रहा है, तब सुखके लिये आये हुए उस नवागत मित्रका हृदय कलुषित हो जायगा ( इस प्रकार हमें एक मित्रके लाभसे वञ्चित होना पड़ेगा ) ॥ ६० ॥
अशक्यं सहसा राजन् भावो बोद्धुं परस्य वै 1 अन्तरेण स्वरैर्भिन्नैर्नैपुण्यं पश्यतां भृशम् ॥ ६१ ॥
‘ इसके सिवा महाराज! किसी दूसरेके मनकी बातको सहसा समझ लेना असम्भव है । बीच - बीचमें स्वरभेदसे आप होता । इसका मुख भी प्रसन्न है । इसलिये मेरे मनमें इसके प्रति कोई संदेह नहीं है ॥ ६२ ॥
अशङ्कितमतिः स्वस्थो न शठः परिसर्पति ।
न चास्य दुष्टवागस्ति तस्मान्मे नास्ति संशयः ॥ ६३ ॥
' दुष्ट पुरुष कभी निःशङ्क एवं स्वस्थचित्त होकर सामने नहीं आ सकता । इसके सिवा इसकी वाणी भी दोषयुक्त नहीं है । अतः मुझे इसके विषयमें कोई संदेह नहीं है ॥ ६३ ॥
आकारश्छाद्यमानोऽपि न शक्यो विनिगूहितुम् ।
बलाद्धि विवृणोत्येव भावमन्तर्गतं नृणाम् ॥ ६४ ॥
" कोई अपने आकारको कितना ही क्यों न छिपाये, उसके भीतरका भाव कभी छिप नहीं सकता । बाहरका आकार पुरुषों-के आन्तरिक भावको बलात् प्रकट कर देता है ॥ ६४ ॥
देशकालोपपन्नं च कार्य कार्यविदां वर ।
सफलं कुरुते क्षिप्रं प्रयोगेणाभिसंहितम् ॥ ६५ ॥
' कार्यवेत्ताओंमें श्रेष्ठ रघुनन्दन! विभीषणका यहाँ आग-मनरूप जो कार्य है, वह देश - कालके अनुरूप ही है । ऐसा कार्य यदि योग्य पुरुषके द्वारा सम्पादित हो तो अपने - आपको शीघ्र सफल बनाता है ॥ ६५ ॥
उद्योगं तव सम्प्रेक्ष्य मिध्यावृत्तं च रावणम् ।
वालिनं च हतं श्रुत्वा सुग्रीवं चाभिषेचितम् ॥ ६६ ॥
राज्यं प्रार्थयमानस्तु बुद्धिपूर्वमिहागतः ।
एतावत् तु पुरस्कृत्य युज्यते तस्य संग्रहः ॥ ६७ ॥
‘ आपके उद्योग, रावणके मिथ्याचार, वालीके वध और सुग्रीवके राज्याभिषेकका समाचार जान - सुनकर राज्य पाने की इच्छासे यह समझ - बूझकर ही यहाँ आपके पास आया है ( इसके मनमें यह विश्वास है कि शरणागतवत्सल दयालु श्रीराम अवश्य ही मेरी रक्षा करेंगे और राज्य भी दे देंगे ) । इन्हीं सब बातोंको दृष्टिमें रखकर विभीषणका संग्रह करना उसे अपना लेना मुझे उचित जान पड़ता है ॥ ६६-६७ ॥ अच्छी तरह यह निश्चय कर लें कि यह साधुभावसे आया है यथाशक्ति मयोक्तं तु राक्षसस्यार्जवं प्रति । या असाधुभावसे ॥ ६१ ॥ प्रमाणं त्वं हि शेषस्य श्रुत्वा बुद्धिमतां वर ॥ ६८ ॥
न त्वस्य ब्रुवतो जातु लक्ष्यते दुष्टभावता । “ बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ रघुनाथ! इस प्रकार इस राक्षसकी प्रसन्नं वदनं चापि तस्मान्मे नास्ति संशयः ॥ ६२ ॥ सरलता और निर्दोषताके विषय में मैंने यथाशक्ति निवेदन किया ।
“ इसकी बातचीतसे भी कभी इसका दुर्भाव नहीं लक्षित इसे सुनकर आगे आप जैसा उचित समझें, वैसा करें ' ॥ ६८ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये युद्धकाण्डे सप्तदशः सर्गः ॥ १७ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें सत्रहवाँ सगँ पूरा हुआ ॥ १७ ॥
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युद्धकाण्डे अष्टादशः सर्गः १० ९ ३ अष्टादशः सर्गः भगवान् श्रीरामका शरणागतकी रक्षाका महत्व एवं अपना व्रत बताकर विभीषण से मिलना
अथ रामः प्रसन्नात्मा श्रुत्वा वायुसुतस्य ह ।
प्रत्यभाषत दुर्धर्षः श्रुतवानात्मनि स्थितम् ॥ १ ॥
वायुनन्दन हनुमान्जीके मुखसे अपने मनमें बैठी हुई बात सुनकर दुर्जय वीर भगवान् श्रीरामका चित्त प्रसन्न हो गया । वे इस प्रकार बोले— ॥ १ ॥
ममापि च विवक्षास्ति काचित् प्रति विभीषणम् ।
श्रोतुमिच्छामि तत् सर्वं भवद्भिः श्रेयसि स्थितैः ॥ २ ॥
‘ मित्रो! विभीषणके सम्बन्ध में मैं भी कुछ कहना चाहता
हूँ । आप सब लोग मेरे हितसाधनमें संलग्न रहनेवाले हैं ।
अतः मेरी इच्छा है कि आप भी उसे सुन लें ॥ २ ॥
मित्रभावेन सम्प्राप्तं न त्यजेयं कथंचन ।
दोषो यद्यपि तस्य स्यात् सतामेतद्गर्हितम् ॥ ३ ॥
' जो मित्रभावसे मेरे पास आ गया हो, उसे मैं किसी तरह त्याग नहीं सकता । सम्भव है उसमें कुछ दोष भी हों, परंतु दोषीको आश्रय देना भी सत्पुरुषोंके लिये निन्दित नहीं है ( अतः विभीषणको मैं अवश्य अपनाऊँगा ) ॥ ३ ॥
सुग्रीवस्त्वथ तद्वाक्यमाभाष्य च विमृश्य च ।
ततः शुभतरं वाक्यमुवाच हरिपुङ्गवः ॥ ४ ॥
वानरराज सुग्रीवने भगवान् श्रीरामके इस कथनको सुनकर स्वयं भी उसे दोहराया और उसपर विचार करके यह परम सुन्दर बात कही ॥ ४ ॥
स दुष्टो वाप्यदुष्टो वा किमेष रजनीचरः ।
ईदृशं व्यसनं प्राप्तं भ्रातरं यः परित्यजेत् ॥ ५ ॥
को नाम स भवेत् तस्य यमेष न परित्यजेत् । " प्रभो! यह दुष्ट हो या अदुष्ट, इससे क्या? है तो यह निशाचर ही । फिर जो पुरुष ऐसे संकटमें पड़े हुए अपने भाई को छोड़ सकता है, उसका दूसरा ऐसा कौन सम्बन्धी होगा, जिसे वह त्याग न सके ' ॥ ५३ ॥
वानराधिपतेर्वाक्यं श्रुत्वा सर्वानुदीक्ष्य तु ॥ ६ ॥
ईषदुत्स्मयमानस्तु लक्ष्मणं पुण्यलक्षणम् ।
इति होवाच काकुत्स्थो वाक्यं सत्यपराक्रमः ॥ ७ ॥
वानरराज सुग्रीव की यह बात सुनकर सत्यपराक्रमी श्री-रघुनाथजी सबकी ओर देखकर कुछ मुस्कराये और पवित्र लक्षणवाले लक्ष्मणसे इस प्रकार बोले- ॥ ६-७ ॥
अनधीत्य च शास्त्राणि वृद्धाननुपसेव्य च ।
न शक्यमीदृशं वक्तुं यदुवाच हरीश्वरः ॥ ८ ॥
" सुमित्रानन्दन! इस समय वानरराजने जैसी बात कही है, वैसी कोई भी पुरुष शास्त्रोंका अध्ययन और गुरुजनोंकी सेवा किये बिना नहीं कह सकता ॥ ८ ॥
अस्ति सूक्ष्मतरं किंचिद् यथात्र प्रतिभाति मा ।
प्रत्यक्षं लौकिकं चापि वर्तते सर्वराजसु ॥ ९ ॥
' परंतु सुग्रीव! तुमने विभीषणमें जो भाईके परित्यागरूप दोषकी उद्भावना की है, उस विषयमें मुझे एक ऐसे अत्यन्त सूक्ष्म अर्थकी प्रतीति हो रही है, जो समस्त राजाओंमें प्रत्यक्ष देखा गया है और सभी लोगोंमें प्रसिद्ध है ( मैं उसीको सब लोगोंसे कहना चाहता हूँ ) ॥ ९ ॥
अमित्रास्तत्कुलीनाश्च प्रातिदेश्याश्च कीर्तिताः ।
व्यसनेषु प्रहर्तारस्तस्मादयमिहागतः ॥ १० ॥
' राजाओं के छिद्र दो प्रकारके बताये गये हैं — एक तो उसी कुलमें उत्पन्न हुए जाति - भाई और दूसरे पड़ोसी देशोंके निवासी । ये संकटमें पड़नेपर अपने विरोधी राजा या राजपुत्र-पर प्रहार कर बैठते हैं । इसी भयसे यह विभीषण यहाँ आया है ( इसे भी अपने जाति - भाइयोंसे भय है ) ॥ १० ॥
अपापास्तत्कुलीनाश्च मानयन्ति खकान् हितान् ।
एष प्रायो नरेन्द्राणां शङ्कनीयस्तु शोभनः ॥ ११ ॥
" जिनके मनमें पाप नहीं है, ऐसे एक कुलमें उत्पन्न हुए भाई - बन्धु अपने कुटुम्बीजनोंको हितैषी मानते हैं, परंतु यही सजातीय बन्धु अच्छा होनेपर भी प्रायः राजाओंके लिये शङ्क-नीय होता है ( रावण भी विभीषणको शङ्काकी दृष्टिसे देखने लगा है; इसलिये इसका अपनी रक्षाके लिये यहाँ आना अनुचित नहीं है । अतः तुम्हें इसके ऊपर भाईके त्यागका दोष नहीं लगाना चाहिये ) ॥ ११ ॥
यस्तु दोषस्त्वया प्रोक्तो ह्यादानेऽरिबलस्य च ।
तत्र ते कीर्तयिष्यामि यथाशास्त्रमिदं शृणु ॥ १२ ॥
" तुमने शत्रुपक्षीय सैनिकको अपनानेमें जो यह दोष बताया है कि वह अवसर देखकर प्रहार कर बैठता है, उसके विषय में मैं तुम्हें यह नीतिशास्त्र के अनुकूल उत्तर दे रहा हूँ, सुनो ॥ १२ ॥
न वयं तत्कुलीनाश्च राज्यकाङ्क्षी च राक्षसः ।
पण्डिता हि भविष्यन्ति तस्माद् ग्राह्यो विभीषणः ॥ १३ ॥
' हमलोग इसके कुटुम्बी तो हैं नहीं ( अतः हमसे स्वार्थ-हानिकी आशङ्का इसे नहीं है ) और यह राक्षस राज्य पानेका अभिलाषी है ( इसलिये भी यह हमारा त्याग नहीं कर सकता ) । इन राक्षसोंमें बहुत - से लोग बड़े विद्वान् भी होते
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१० ९ ४ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे हैं; ( अतः वे मित्र होनेपर बड़े कामके सिद्ध होंगे ) इसलिये सुग्रीवका वह वचन सुनकर और उसपर भलीभाँति विभीषणको अपने पक्षमें मिला लेना चाहिये ॥ १३ ॥ विचार करके श्रीरामने उन वानरशिरोमणिसे यह परम मङ्गल-अव्यग्राश्च प्रहृष्टाश्च ते भविष्यन्ति संगताः ।
प्रणादश्च महानेषोऽन्योन्यस्य भयमागतम् ।
इति भेदं गमिष्यन्ति तस्माद् ग्राह्यो विभीषणः ॥ १४ ॥
' हमसे मिल जानेपर ये विभीषण आदि निश्चिन्त एवं प्रसन्न हो जायँगे । इनकी जो यह शरणागतिके लिये प्रबल पुकार है, इससे मालूम होता है, राक्षसोंमें एक दूसरेसे भय बना हुआ है । इसी कारणसे इनमें परस्पर फूट होगी और ये नष्ट हो जायँगे । इसलिये भी विभीषणको ग्रहण कर लेना चाहिये ॥ १४ ॥
न सर्वे भ्रातरस्तात भवन्ति भरतोपमाः ।
मद्विधा वा पितुः पुत्राः सुहृदो वा भवद्विधाः ॥ १५ ॥
' तात सुग्रीव! संसारमें सब भाई भरत के ही समान नहीं होते । बापके सब बेटे मेरे ही- जैसे नहीं होते और सभी मित्र तुम्हारे ही समान नहीं हुआ करते हैं ' ॥ १५ ॥
एवमुक्तस्तु रामेण सुग्रीवः सहलक्ष्मणः ।
उत्थायेदं महाप्राज्ञः प्रणतो वाक्यमब्रवीत् ॥ १६ ॥
श्रीरामके ऐसा कहनेपर लक्ष्मणसहित महाबुद्धिमान् सुग्रीवने उठकर उन्हें प्रणाम किया और इस प्रकार कहा – ॥
रावणेन प्रणिहितं तमवेहि निशाचरम् ।
तस्याहं निग्रहं मन्ये क्षमं क्षमवतां वर ॥ १७ ॥
" उचित कार्य करनेवालोंमें श्रेष्ठ रघुनन्दन! आप उस राक्षसको रावणका भेजा हुआ ही समझें । मैं तो उसे कैद कर लेना ही ठीक समझता हूँ ॥ १७ ॥
राक्षसो जिह्मया बुद्ध्या संदिष्टोऽयमिहागतः ।
प्रहर्तुं त्वयि विश्वस्ते विश्वस्ते मयि वानघ ॥ १८ ॥
लक्ष्मणे वा महाबाहो स वध्यः सचिवैः सह ।
रावणस्य नृशंसस्य भ्राता ह्येष विभीषणः ॥ १ ९ ॥
मयी बात कही ॥ २१ ॥
स दुष्टो वाप्यदुष्टो वा किमेष रजनीचरः ।
सूक्ष्ममप्यहितं कर्तुं मम शक्तः कथंचन ॥ २२ ॥
' वानरराज! विभीषण दुष्ट हो या साधु । क्या यह निशाचर किसी तरह भी मेरा सूक्ष्म से सूक्ष्मरूपमें भी अहित कर सकता है? || २२ ॥
पिशाचान् दानवान् यक्षान् पृथिव्यां चैव राक्षसान् ।
अङ्गल्यग्रेण तान् हन्यामिच्छन् हरिगणेश्वर ॥ २३ ॥
' वानरयूथपते! यदि मैं चाहूँ तो पृथ्वीपर जितने भी पिशाच, दानव, यक्ष और राक्षस हैं, उन सबको एक अंगुलि-के अग्रभागसे मार सकता हूँ ॥ २३ ॥
श्रूयते हि कपोतेन शत्रुः शरणमागतः ।
अर्चितश्च यथान्यायं स्वैश्च मांसैर्निमन्त्रितः ॥ २४ ॥
" सुना जाता है कि एक कबूतरने अपनी शरणमें आये हुए अपने ही शत्रु एक व्याधका यथोचित आतिथ्य सत्कार किया था और उसे निमन्त्रण दे अपने शरीरके मांसका भोजन कराया था ॥ २४ ॥
स हि तं प्रतिजग्राह भार्याहर्तारमागतम् ।
कपोतो वानरश्रेष्ठ किं पुनर्मद्विधो जनः ॥ २५ ॥
' उस व्याधने उस कबूतरकी भार्या कबूतरीको पकड़ लिया था तो भी अपने घर आनेपर कबूतरने उसका आदर किया; फिर मेरे जैसा मनुष्य शरणागतपर अनुग्रह करे, इसके लिये तो कहना ही क्या है? ॥ २५ ॥
ऋषेः कण्वस्य पुत्रेण कण्डुना परमर्षिणा ।
शृणु गाथा पुरा गीता धर्मिष्ठा सत्यवादिना ॥ २६ ॥
" पूर्वकालमें कण्व मुनिके पुत्र सत्यवादी महर्षि कण्डु एक धर्मविषयक गाथाका गान किया था । उसे बताता हूँ, ‘ निष्पाप श्रीराम! यह निशाचर रावणके कहने से मनमें सुनो ॥ २६ ॥
कुटिल विचार लेकर ही यहाँ आया है । जब हमलोग इसपर बद्धाञ्जलिपुटं दीनं याचन्तं शरणागतम् । विश्वास करके इसकी ओरसे निश्चिन्त हो जायँगे, उस समय यह आपपर, मुझपर अथवा लक्ष्मणपर भी प्रहार कर सकता है । इसलिये महाबाहो! क्रूर रावणके भाई इस विभीषणका मन्त्रियोंसहित बध कर देना ही उचित है ' ॥ १८-१९ ॥
एवमुक्त्वा रघुश्रेष्ठं सुग्रीवो वाहिनीपतिः ।
वाक्यज्ञो वाक्यकुशलं ततो मौनमुपागमत् ॥ २० ॥
न हन्यादानृशंस्यार्थमपि शत्रु परंतप ॥ २७ ॥
' परंतप! यदि शत्रु भी शरण में आये और दीनभावसे हाथ जोड़कर दयाकी याचना करे तो उसपर प्रहार नहीं करना चाहिये ॥ २७ ॥
आर्तो वा यदि वा दृप्तः परेषां शरणं गतः ।
श्रीरामसे ऐसा कहकर बात- अरिः प्राणान् परित्यज्य रक्षितव्यः कृतात्मना ॥ २८ ॥
प्रवचनकुशल रघुकुलतिलक चीतकी कला जाननेवाले सेनापति सुग्रीव मौन हो गये ॥ २० ॥ ' शत्रु दुखी हो या अभिमानी, यदि वह अपने विपक्षी-रामः श्रुत्वा विमृश्य च । की शरणमें जाय तो शुद्ध हृदयवाले श्रेष्ठ पुरुषको अपने प्राणों-स सुग्रीवस्य तद्वाक्यं ॥ २१ ॥ का मोह छोड़कर उसकी रक्षा करनी चाहिये ॥ २८ ॥
ततः शुभतरं वाक्यमुवाच हरिपुङ्गवम्
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युद्धकाण्डे एकोनविंशः सर्गः १० ९ ५
स चेद्भयाद् वा मोहाद् वा कामाद् वापि न रक्षति ।
स्वया शक्त्या यथान्यायं तत् पापं लोकगर्हितम् ॥ २ ९ ॥
" यदि वह भय, मोह अथवा किसी कामनासे न्यायानुसार यथाशक्ति उसकी रक्षा नहीं करता तो उसके उस पाप कर्मकी लोकमें बड़ी निन्दा होती है ॥ २ ९ ॥
विनष्टः पश्यतस्तस्य रक्षिणः शरणं गतः ।
आनाय सुकृतं तस्य सर्व गच्छेदरक्षितः ॥ ३० ॥
' यदि शरण में आया हुआ पुरुष संरक्षण न पाकर उस रक्षकके देखते - देखते नष्ट हो जाय तो वह उसके सारे पुण्यको अपने साथ ले जाता है ॥ ३० ॥
एवं दोषो महानत्र प्रपन्नानामरक्षणे ।
अस्वर्ग्य चायशस्यं च बलवीर्यविनाशनम् ॥ ३१ ॥
" इस प्रकार शरणागतकी रक्षा न करनेमें महान् दोष बताया गया है । शरणागतका त्याग स्वर्ग और सुयशकी प्राप्ति-को मिटा देता है और मनुष्यके बल और वीर्यका नाश करता है ॥ ३१ ॥
करिष्यामि यथार्थे तु कण्डोर्वचनमुत्तमम् ।
धर्मिष्ठं च यशस्यं च स्वर्ग्यं स्यात् तु फलोदये ॥ ३२ ॥
“ इसलिये मैं तो महर्षि कण्डुके उस यथार्थ और उत्तम वचनका ही पालन करूँगा; क्योंकि वह परिणाममें धर्म, यश और स्वर्गकी प्राप्ति करानेवाला है ॥ ३२ ॥
सकृदेव प्रपन्नाय तवास्मीति च याचते ।
अभयं सर्वभूतेभ्यो ददाम्येतद् व्रतं मम ॥ ३३ ॥
' जो एक बार भी शरण में आकर ' मैं तुम्हारा हूँ ' ऐसा कहकर मुझसे रक्षाकी प्रार्थना करता है, उसे मैं समस्त प्राणियों -से अभय कर देता हूँ । यह मेरा सदाके लिये व्रत है ॥३३ ॥
आनयैनं हरिश्रेष्ठ दत्तमस्याभयं मया ।
विभीषणो वा सुग्रीव यदि वा रावणः स्वयम् ॥ ३४ ॥
' अतः कपिश्रेष्ठ सुग्रीव! वह विभीषण हो या स्वयं
रावण आ गया हो । तुम उसे ले आओ । मैंने उसे अभय-दान दे दिया ॥ ३४ ॥
रामस्य तु वचः श्रुत्वा सुग्रीवः प्लवगेश्वरः ।
प्रत्यभाषत काकुत्स्थं सौहार्देनाभिपूरितः ॥ ३५ ॥
भगवान् श्रीरामका यह वचन सुनकर वानरराज सुग्रीवने सौहार्द से भरकर उनसे कहा – ॥ ३५ ॥
किमत्र चित्रं धर्मज्ञ लोकनाथशिखामणे ।
यत् त्वमार्य प्रभाषेथाः सत्त्ववान् सत्पथे स्थितः ॥ ३६ ॥
' धर्मज्ञ! लोकेश्वरशिरोमणे! आपने जो यह श्रेष्ठ धर्मकी बात कही है, इसमें क्या आश्चर्य है? क्योंकि आप महान् शक्तिशाली और सन्मार्गपर स्थित हैं ॥ ३६ ॥
मम चाप्यन्तरात्मायं शुद्धं वेत्ति विभीषणम् ।
अनुमानाच्च भावाच्च सर्वतः सुपरीक्षितः ॥ ३७ ॥
" यह मेरी अन्तरात्मा भी विभीषणको शुद्ध समझती है । हनुमानजी ने भी अनुमान और भावसे उनकी भीतर - बाहर सब ओरसे भलीभाँति परीक्षा कर ली है ॥ ३७ ॥
तस्मात् क्षिप्रं सहास्माभिस्तुल्यो भवतु राघव ।
विभीषणो महाप्राज्ञः सखित्वं चाभ्युपैतु नः ॥ ३८ ॥
" अतः रघुनन्दन! अब विभीषण शीघ्र ही यहाँ हमारे-जैसे होकर रहें और हमारी मित्रता प्राप्त करें ॥ ३८ ॥
ततस्तु सुग्रीववचो निशम्य त-द्धरीश्वरेणाभिहितं नरेश्वरः । विभीषणेनाशु जगाम संगमं पतत्रिराजेन यथा पुरंदरः ॥ ३ ९ ॥ तदनन्तर वानरराज सुग्रीवकी कही हुई वह बात सुनकर राजा श्रीराम शीघ्र आगे बढ़कर विभीषण से मिले, मानो देवराज इन्द्र पक्षिराज गरुड़से मिल रहे हों ॥ ३ ९ ॥ इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये युद्धकाण्डेऽष्टादशः सर्गः ॥ १८ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आवरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्ड में अठारहवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ १८ ॥
एकोनविंशः सर्गः विभीषणका आकाश से उतरकर भगवान् श्रीरामके चरणोंकी शरण लेना, उनके पूछने पर रावणकी शक्तिका परिचय देना और श्रीरामका रावण वधकी प्रतिज्ञा करके विभीषणको लङ्काके राज्यपर अभिषिक्त कर उनकी सम्मति से समुद्रतटपर धरना देनेके लिये बैठना राघवेणाभये दत्ते संनतो रावणानुजः । बुद्धिमान् विभीषणने नीचे उतरनेके लिये पृथ्वीकी ओर विभीषणो महाप्राज्ञो भूमिं समवलोकयत् ॥ १ ॥ देखा ॥ १ ॥
इस प्रकार श्रीरघुनाथजीके अभय देनेपर विनयशील महा- खात् पपातावनिं हृष्टो भक्तैरनुचरः सह ।
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१० ९ ६ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे स तु रामस्य धर्मात्मा निपपात विभीषणः ॥ २ ॥ राम सेनापतिस्तस्य प्रहस्तो यदि ते श्रुतः ।
पादयोर्निपपाताथ चतुर्भिः सह राक्षसैः । कैलासे येन समरे मणिभद्रः पराजितः ॥ ११ ॥
वे अपने भक्त सेवकोंके साथ हर्षसे भरकर पृथ्वीपर उतर आये । उतरकर चारों राक्षसोंके साथ विभीषण श्रीरामचन्द्रजीके चरणों में गिर पड़े ॥ २३ ॥
अब्रवीच्च तदा वाक्यं रामं प्रति विभीषणः धर्मयुक्तं च युक्तं च साम्प्रतं सम्प्रहर्षणम् उस समय विभीषणने श्रीरामसे धर्मानुकूल, समयोचित और हर्षवर्द्धक बात कही ॥ ३३ ॥
अनुजो रावणस्याहं तेन चास्म्यवमानितः भवन्तं सर्वभूतानां शरण्यं शरणं गतः आकाशसे धर्मात्मा ॥ ३ ॥
। युक्तियुक्त, ॥ ४ ॥
। ' भगवन्! मैं रावणका छोटा भाई हूँ । रावणने मेरा अपमान किया है । आप समस्त प्राणियोंको शरण देनेवाले हैं, इसलिये मैंने आपकी शरण ली है ॥ ४३ ॥
परित्यक्ता मया लङ्का मित्राणि च धनानि च ॥ ५ ॥
भवद्गतं हि मे राज्यं जीवितं च सुखानि च । " अपने सभी मित्र, धन और लङ्कापुरीको मैं छोड़ आया हूँ । अब मेरा राज्य, जीवन और सुख सब आपके ही अधीन है ' ॥ ५३ ॥
तस्य तद्वचनं श्रुत्वा रामो वचनमब्रवीत् ॥ ६ ॥
वचसा सान्त्वयित्वैनं लोचनाभ्यां पिबन्निव । विभीषणके ये वचन सुनकर श्रीरामने मधुर वाणीद्वारा उन्हें सान्त्वना दी और नेत्रोंसे मानो उन्हें पी जायँगे, इस प्रकार प्रेमपूर्वक उनकी ओर देखते हुए कहा— ॥ ६३ ॥
आख्याहि मम तत्त्वेन राक्षसानां बलाबलम् ॥ ७ ॥
एवमुक्तं तदा रक्षो रामेणाक्लिष्टकर्मणा ।
रावणस्य बलं सर्वमाख्यातुमुपचक्रमे ॥ ८ ॥
' विभीषण! तुम मुझे ठीक - ठीक राक्षसोंका बलाबल बताओ । ' अनायास ही महान् कर्म करनेवाले श्रीरामके ऐसा कहनेपर राक्षस विभीषणने रावणके सम्पूर्ण बलका परिचय देना
आरम्भ किया । ७-८ ॥
अवध्यः सर्वभूतानां गन्धर्वोरगपक्षिणाम् ।
राजपुत्र दशग्रीवो वरदानात् स्वयम्भुवः ॥ ९ ॥
' राजकुमार! ब्रह्माजीके वरदानके प्रभावसे दशमुख रावण ( केवल मनुष्यको छोड़कर ) गन्धर्व, नाग और पक्षी आदि सभी प्राणियोंके लिये अवध्य है ॥ ९ ॥
रावणानन्तरो भ्राता मम ज्येष्ठश्च वीर्यवान् ।
कुम्भकर्णो महातेजाः शक्रप्रतिबलो युधि ॥ १० ॥
“ श्रीराम! रावणके सेनापतिका नाम प्रहस्त है । शायद आपने भी उसका नाम सुना होगा । उसने कैलासपर घटित हुए युद्धमें कुबेरके सेनापति मणिभद्रको भी पराजित कर दिया था ॥ ११ ॥
बद्धगोधाङ्गुलित्राणस्त्ववध्यकवचो युधि ।
धनुरादाय यस्तिष्ठन्नदृश्यो भवतीन्द्रजित् ॥ १२ ॥
' रावणका पुत्र जो इन्द्रजित् है, वह गोहके चमड़ेके बने हुए दस्ताने पहनकर अवध्य कवच धारण करके हाथमें धनुष-ले जब युद्धमें खड़ा होता है, उस समय अदृश्य हो जाता है ॥ १२ ॥
संग्रामे सुमहद्व्यूहे तर्पयित्वा हुताशनम् ।
अन्तर्धानगतः श्रीमानिन्द्रजिद्धन्ति राघव ॥ १३ ॥
“ घुनन्दन! श्रीमान् इन्द्र जित्ने अग्निदेवको तृप्त करके ऐसी शक्ति प्राप्त कर ली है कि वह विशाल व्यूहसे युक्त संग्राममें अदृश्य होकर शत्रुओंपर प्रहार करता है ॥ १३ ॥
महोदर महापाश्च राक्षसश्चाप्यकम्पनः ।
अनीकपास्तु तस्यैते लोकपालसमा युधि ॥ १४ ॥
' महोदर, महापार्श्व और अकम्पन — ये तीनों राक्षस रावणके सेनापति हैं और युद्धमें लोकपालोंके समान पराक्रम प्रकट करते हैं ॥ १४ ॥
दशकोटिसहस्राणि रक्षसां कामरूपिणाम् ।
मांसशोणितभक्ष्याणां लङ्कापुरनिवासिनाम् ॥ १५ ॥
स तैस्तु सहितो राजा लोकपालानयोधयत् ।
सह देवैस्तु ते भग्ना रावणेन दुरात्मना ॥ १६ ॥
' लङ्कामें रक्त और मांसका भोजन करनेवाले और इच्छा-नुसार रूप धारण करनेमें समर्थं जो दस कोटि सहस्र ( एक खरब ) राक्षस निवास करते हैं, उन्हें साथ लेकर राजा रावण-ने लोकपालोंसे युद्ध किया था । उस समय देवताओं सहित वे सब लोकपाल दुरात्मा रावणसे पराजित हो भाग खड़े हुए'१५-१६
विभीषणस्य तु वचस्तच्छ्रुत्वा रघुसत्तमः ।
अन्वीक्ष्य मनसा सर्वमिदं वचनमब्रवीत् ॥ १७ ॥
विभीषणकी वह बात सुनकर रघुकुलतिलक श्रीरामने मन-ही मन उस सबपर बारंबार विचार किया और इस प्रकार कहा – ॥ १७ ॥
यानि कर्मापदानानि रावणस्य विभीषण ।
आख्यातानि च तत्त्वेन ह्यवगच्छामि तान्यहम् ॥ १८ ॥
' रावणसे छोटा और मुझसे बड़ा जो मेरा भाई कुम्भकर्ण ' विभीषण! तुमने रावणके युद्धविषयक जिन - जिन है, वह महातेजस्वी और पराक्रमी है । युद्धमें वह इन्द्रके पराक्रमोंका वर्णन किया है, उन्हें मैं अच्छी तरह जानता समान बलशाली है ॥ १० ॥ हूँ ॥ १८ ॥
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युद्धकाण्डे एकोनविंशः सर्गः
अहं हत्वा दशग्रीवं सप्रहस्तं सहात्मजम् ।
राजानं त्वां करिष्यामि सत्यमेतच्छृणोतु मे ॥ १ ९ ॥
" परंतु सुनो । मैं सच कहता हूँ कि प्रहस्त और पुत्रोंके सहित रावणका वध करके मैं तुम्हें लङ्काका राजा बनाऊँगा ॥ १ ९ ॥
रसातलं वा प्रविशेत् पातालं वापि रावणः ।
पितामहसकाशं वा न मे जीवन विमोक्ष्यते ॥ २० ॥
' रावण रसातल या पातालमें प्रवेश कर जाय अथवा पितामह ब्रह्माजी के पास चला जाय तो भी वह अब मेरे हाथसे जीवित नहीं छूट सकेगा ॥ २० ॥
अहत्वा रावणं संख्ये सपुत्रजनबान्धवम् ।
अयोध्यां न प्रवेक्ष्यामि त्रिभिस्तैर्भ्रातृभिः शपे ॥ २१ ॥
“ मैं अपने तीनों भाइयोंकी सौगन्ध खाकर कहता हूँ कि युद्ध में पुत्र, भृत्यजन और बन्धु बान्धवसहित रावणका वध किये बिना अयोध्यापुरीमें प्रवेश नहीं करूँगा ' ॥ २१ ॥
श्रुत्वा तु वचनं तस्य रामस्याक्लिष्टकर्मणः ।
शिरसाऽऽवन्ध धर्मात्मा वक्तुमेवं प्रचक्रमे ॥ २२ ॥
अनायास ही महान् कर्म करनेवाले श्रीरामचन्द्रजीके ये वचन सुनकर धर्मात्मा विभीषणने मस्तक झुकाकर उन्हें प्रणाम किया और फिर इस प्रकार कहना आरम्भ किया ॥ २२ ॥
राक्षसानां वधे साह्यं लङ्कायाश्च प्रधर्षणे ।
करिष्यामि यथाप्राणं प्रवेक्ष्यामि च वाहिनीम् ॥ २३ ॥
" प्रभो! राक्षसों के संहारमें और लङ्कापुरीपर करके उसे जीतनेमें मैं आपकी यथाशक्ति सहायता आक्रमण प्राणोंकी बाजी लगाकर युद्धके लिये रावणकी सेनामें करूँगा भी प्रवेश तथा करूँगा ' ॥ २३ ॥
इति ब्रुवाणं रामस्तु परिष्वज्य विभीषणम् । अब्रवील्लक्ष्मणं प्रीतः समुद्राजलमानय तेन चेमं महाप्राज्ञमभिषिञ्च ॥ २४ ॥
विभीषणम् ।
राजानं रक्षसां क्षिप्रं प्रसन्ने मयि मानद ॥ २५ ॥
विभीषणके ऐसा कहनेपर भगवान् श्रीरामने उन्हें हृदयसे लगा लिया और प्रसन्न होकर लक्ष्मणसे कहा - ' दूसरोंको मान देनेवाले सुमित्रानन्दन! तुम समुद्रसे जल ले आओ और उसके द्वारा इन परम बुद्धिमान् राक्षसराज विभीषणका लङ्काके राज्यपर शीघ्र ही अभिषेक कर दो । मेरे प्रसन्न होनेपर इन्हें यह लाभ मिलना ही चाहिये ॥ २४-२५ ॥
एवमुक्तस्तु सौमित्रिरभ्यषिञ्चद् विभीषणम् ।
मध्ये वानरमुख्यानां राजानं राजशासनात् ॥ २६ ॥
उनके ऐसा कहनेपर सुमित्राकुमार लक्ष्मणने मुख्य - मुख्य वानरोंके बीच महाराज श्रीरामके आदेश से विभीषण का राक्षसों के राजाके पदपर अभिषेक कर दिया ॥ २६ ॥
तं प्रसादं तु रामस्य दृष्ट्वा सद्यः प्लवङ्गमाः । वा ० रा ० ५.८. १२-१० ९ ७ प्रचुक्रुशुर्महात्मानं साधुसाध्विति चाब्रुवन् ॥ २७ ॥
भगवान् श्रीरामका यह तात्कालिक प्रसाद ( अनुग्रह ) देखकर सब वानर हर्षध्वनि करने और महात्मा श्रीरामको साधुवाद देने लगे ॥ २७ ॥
अब्रवीच्च हनूमांश्च सुग्रीवश्च विभीषणम् ।
कथं सागरमक्षोभ्यं तराम वरुणालयम् ।
सैन्यैः परिवृताः सर्वे वानराणां महौजसाम् ॥ २८ ॥
तत्पश्चात् हनुमान् और सुग्रीवने विभीषणसे पूछा ' राक्षस-राज! हम सब लोग इस अक्षोभ्य समुद्रको महाबली वानरोंकी सेनाओंके साथ किस प्रकार पार कर सकेंगे? ॥ २८ ॥
उपायैरभिगच्छाम यथा नदनदीपतिम् ।
तराम तरसा सर्वे ससैन्या वरुणालयम् ॥ २ ९ ॥
' जिस उपाय से हम सब लोग सेनासहित नदों और नदियों-के स्वामी वरुणालय समुद्रके पार जा सकें, वह बताओ ' || २ ९ ||
एवमुक्तस्तु धर्मात्मा प्रत्युवाच विभीषणः ।
समुद्रं राघवो राजा शरणं गन्तुमर्हति ॥ ३० ॥
उनके इस प्रकार पूछनेपर धर्मात्मा विभीषण ने यो उत्तर दिया- ' रघुवंशी राजा श्रीरामको समुद्रकी शरण लेनी चाहिये ॥
खानितः सगरेणायमप्रमेयो महोदधिः ।
कर्तुमर्हति रामस्य ज्ञातेः कार्य महोदधिः ॥ ३१ ॥
" इस अपार महासागरको राजा सगरने खुदवाया था । श्रीरामचन्द्रजी सगरके वंशज हैं । इसलिये समुद्रको इनका काम अवश्य करना चाहिये ' ॥ ३१ ॥
एवं विभीषणेनोक्तो राक्षसेन विपश्चिता ।
आजगामाथ सुग्रीवो यत्र रामः सलक्ष्मणः ॥ ३२ ॥
विद्वान् राक्षस विभीषणके ऐसा कहनेपर सुग्रीव उस स्थान -पर आये, जहाँ लक्ष्मणसहित श्रीराम विद्यमान थे ॥ ३२ ॥
ततश्चाख्यातुमारेभे विभीषणवचः शुभम् ।
सुग्रीवो विपुलग्रीवः सागरस्योपवेशनम् ॥ ३३ ॥
वहाँ विशाल ग्रीवावाले सुग्रीवने समुद्रपर धरना देनेके विषयमें जो विभीषणका शुभ वचन था, उसे कहना आरम्भ किया ॥ ३३ ॥
प्रकृत्या धर्मशीलस्य रामस्यास्याप्यरोचत ।
सलक्ष्मणं महातेजाः सुग्रीवं च हरीश्वरम् ॥ ३४ ॥
सत्क्रियार्थं क्रियादक्षं स्मितपूर्वमभाषत । भगवान् श्रीराम स्वभावसे ही धर्मशील थे, अतः उन्हें भी विभीषणकी यह बात अच्छी लगी । वे महातेजस्वी रघुनाथ-जी लक्ष्मणसहित कार्यदक्ष वानरराज सुग्रीवका सत्कार करते हुए उनसे मुसकराकर बोले— ॥ ३४३ ॥
विभीषणस्य मन्त्रोऽयं मम लक्ष्मण रोचते ॥ ३५ ॥
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१० ९ ८ श्रीमवाल्मीकीय रामायणे
सुग्रीवः पण्डितो नित्यं भवान् मन्त्रविचक्षणः ।
उभाभ्यां सम्प्रधार्यार्थ रोचते यत् तदुच्यताम् ॥ ३६ ॥
' लक्ष्मण! विभीषणकी यह सम्मति मुझे भी अच्छी लगती है; परंतु सुग्रीव राजनीतिके बड़े पंण्डित हैं और तुम भी समयोचित सलाह देने में सदा ही कुशल हो । इसलिये तुम दोनों प्रस्तुत कार्यपर अच्छी तरह विचार करके जो ठीक जान पड़े, वह बताओ ' ॥ ३५-३६ ॥
एवमुक्तौ ततो वीरावुभौ सुग्रीवलक्ष्मणौ ।
समुदाचारसंयुक्तमिदं वचनमूचतुः ॥ ३७ ॥
भगवान् श्रीरामके ऐसा कहनेपर वे दोनों वीर सुग्रीव और लक्ष्मण उनसे आदरपूर्वक बोले— ॥ ३७ ॥
किमर्थ नौ नरव्याघ्र न रोचिष्यति राघव ।
विभीषणेन यत् तूक्तमस्मिन् काले सुखावहम् ॥ ३८ ॥
' पुरुषसिंह रघुनन्दन! इस समय विभीषणने जो सुख-दायक बात कही है, वह हम दोनोंको क्यों नहीं अच्छी लगेगी १ ॥ ३८ ॥
अवद्ध्वा सागरे सेतुं घोरेऽस्मिन् वरुणालये ।
लङ्का नासादितुं शक्या सेन्द्रैरपि सुरासुरैः ॥ ३ ९ ॥
" इस भयंकर समुद्र में पुल बाँधे बिना इन्द्रसहित देवता और असुर भी इधरसे लङ्कापुरीमें नहीं पहुँच सकते ॥ ३ ९ ॥ विभीषणस्य शूरस्य यथार्थ क्रियतां वचः ।
अलं कालात्ययं कृत्वा सागरोऽयं नियुज्यताम् ।
यथा सैन्येन गच्छाम पुरीं रावणपालिताम् ॥ ४० ॥
" इसलिये आप शूरवीर विभीषण के यथार्थं वचनके अनुसार ही कार्य करें । अब अधिक विलम्ब करना ठीक नहीं है । इस समुद्रसे यह अनुरोध किया जाय कि वह हमारी सहायता करे, जिससे हम सेनाके साथ रावणपालित लङ्कापुरीमें पहुँच सकें ' ॥ ४० ॥
एवमुक्तः कुशास्तीर्णे तीरे नदनदीपतेः ।
संविवेश तदा राम्रो वेद्यामिव हुताशनः ॥ ४१ ॥
उन दोनोंके ऐसा कहनेपर श्रीरामचन्द्रजी उस समय समुद्र के तटपर कुश बिछाकर उसके ऊपर उसी तरह बैठे, जैसे वेदीपर अग्निदेव प्रतिष्ठित होते हैं ॥ ४१ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये युद्धकाण्डे एकोनविंशः सर्गः ॥ १ ९ ॥ इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आवरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्ड में उन्नीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ १ ९ ॥ विंशः सर्गः शार्दूल के कहने से रावणका शुक्रको दूत बनाकर सुग्रीवके पास संदेश भेजना, वहाँ वानरोंद्वारा उसकी दुर्दशा, श्रीराम की कृपासे उसका संकटसे छूटना और सुग्रीवका रावणके लिये उत्तर देना
ततो विनिष्टां ध्वजिनीं सुग्रीवेणाभिपालिताम् ।
ददर्श राक्षसोऽभ्येत्य शार्दूलो नाम वीर्यवान् ॥ १ ॥
चारो राक्षसराजस्य रावणस्य दुरात्मनः ।
तां दृष्ट्वा सर्वतोऽव्यां प्रतिगम्य स राक्षसः ॥ २ ॥
आविश्य लङ्कां वेगेन राजानमिदमब्रवीत् । इसी बीचमें दुरात्मा राक्षसराज रावणके गुप्तचर पराक्रमी राक्षस शार्दूलने वहाँ आकर सागर - तटपर छावनी डाले पड़ी हुई सुग्रीवद्वारा सुरक्षित वानरी सेनाको देखा । सब ओर शान्तभाव-से स्थित हुई उस विशाल सेनाको देखकर वह राक्षस लौट गया और जल्दीसे लङ्कापुरीमें जाकर राजा रावणसे य बोला- ॥ १-२३ ॥ एष वै वानरक्षघो लङ्कां समभिवर्तते ॥ ३ ॥
अगाधश्चाप्रमेयश्च द्वितीय इव सागरः । ' महाराज! लङ्काकी ओर वानरों और भालुओंका एक पुत्रौ दशरथस्येमौ भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ ॥ ४ ॥
उत्तम रूपसम्पन्नौ सीतायाः पदमागतौ । ' राजा दशरथके ये पुत्र दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मण बड़े ही रूपवान् और श्रेष्ठ वीर हैं । वे सीताका उद्धार करनेके लिये आ रहे हैं ॥ ४३ ॥
पतौ सागरमासाद्य संनिविष्टौ महाद्युते ॥ ५ ॥
बलं चाकाशमावृत्य सर्वतो दशयोजनम् ।
महाराज क्षिप्रं वेदितुमर्हसि ॥ ६ ॥
तत्त्वभूतं ' महातेजस्वी महाराज! ये दोनों रघुवंशी बन्धु भी इस समय समुद्र - तटपर ही आकर ठहरे हुए हैं । वानरोंकी वह सेना सब ओरसे दस योजन तकके खाली स्थानको घेरकर वहाँ ठहरी हुई है । यह बिल्कुल ठीक बात है । आप शीघ्र ही इस विषय में विशेष जानकारी प्राप्त करें ॥ ५-६ ॥ क्षिप्रमर्हन्ति वेदितुम् । प्रवाह - सा बढ़ा चला आ रहा है । वह दूसरे समुद्रके समान तव दूता महाराज वात्र प्रयुज्यताम् ॥ ७ ॥
अगाध और असीम है ॥ ३३ ॥ उपप्रदानं सान्त्वं वा भेदो
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युद्धकाण्डे विंशः सर्गः १० ९९ ' राक्षससम्राट्! आपके दूत शीघ्र सारी बातोंका पता लगा लेने के योग्य हैं, अतः उन्हें भेजें । तत्पश्चात् जैसा उचित समझें, वैसा करें-- चाहे उन्हें सीताको लौटा दें, चाहे सुग्रीवसे मीठी - मीठी बातें करके उन्हें अपने पक्षमें मिला लें अथवा सुग्रीव और श्रीराम में फूट डलवा दें ' ॥ ७ ॥
शार्दूलस्य वचः श्रुत्वा रावणो राक्षसेश्वरः ।
उवाच सहसा व्यग्रः सम्प्रधार्यार्थमात्मनः ।
शुकं साधु तदा रक्षो वाक्यमर्थविदां वरम् ॥ ८ ॥
शार्दूलकी बात सुनकर राक्षसराज रावण सहसा व्यग्र हो उठा और अपने कर्तव्यका निश्चय करके अर्थवेत्ताओं में श्रेष्ठ शुक नामक राक्षससे यह उत्तम वचन बोला- ॥ ८ ॥
सुग्रीवं ब्रूहि गत्वाऽऽशु राजानं वचनान्मम ।
यथासंदेशमक्कीचं लक्ष्णया परया गिरा ॥ ९ ॥
' दूत! तुम मेरे कहने से शीघ्र ही वानरराज सुग्रीव के पास जाओ और मधुर एवं उत्तम वाणीद्वारा निर्भीकतापूर्वक उनसे मेरा यह संदेश कहो - ॥ ९ ॥
त्वं वै महाराजकुलप्रसूतो महाबलश्चर्क्षरजः सुतश्च न कश्चनार्थस्तव नास्त्यनर्थ-स्तथापि मे भ्रातृसमो हरीश ॥ १० ॥
" वानरराज! आप वानरोंके महाराजके कुलमें उत्पन्न हुए हैं । आदरणीय ऋक्षरजाके पुत्र हैं और स्वयं भी बड़े बलवान् हैं । मैं आपको अपने भाईके समान समझता हूँ । यदि मुझसे आपका कोई लाभ नहीं हुआ है तो मेरे द्वारा आपकी कोई हानि भी नहीं हुई है ॥ १० ॥
अहं यद्यहरं भार्या राजपुत्रस्य धीमतः ।
किं तत्र तव सुग्रीव किष्किन्धां प्रति गम्यताम् ॥ ११ ॥
“ सुग्रीव! यदि मैं बुद्धिमान् राजपुत्र रामकी स्त्रीको हर लाया हूँ तो इसमें आपकी क्या हानि है! अतः आप किष्किन्धाको लौट जाइये ॥ ११ ॥
नहीयं हरिभिर्लङ्का प्राप्तुं शक्या कथंचन ।
देवैरपि सगन्धर्वैः किं पुनर्नरवानरैः ॥ १२ ॥
" हमारी इस लङ्कामें वानरलोग किसी तरह भी नहीं पहुँच सकते । यहाँ देवताओं और गन्धवका भी प्रवेश होना असम्भव है; फिर मनुष्यों और वानरोंकी तो बात ही क्या है? ' ' ॥ १२ ॥
स तदा राक्षसेन्द्रेण संदिष्टो रजनीचरः ।
शुको विहंगमो भूत्वा तूर्णमाप्लुत्य चाम्बरम् ॥ १३ ॥
राक्षसराज रावणके इस प्रकार संदेश देनेपर उस समय निशाचर शुक तोता नामक पक्षीका रूप धारण करके तुरंत आकाशमें उड़ चला ॥। १३ ॥
स गत्वा दूरमध्वानमुपर्युपरि सागरम् ।
संस्थितो ह्यम्बरे वाक्यं सुग्रीवमिदमब्रवीत् ॥ १४ ॥
सर्वमुक्तं यथाऽऽदिष्टं रावणेन दुरात्मना । समुद्र के ऊपर - ही - ऊपर बहुत दूरका रास्ता तै करके वह सुग्रीव के पास जा पहुँचा और आकाशमें ही ठहरकर उसने दुरात्मा रावणकी आज्ञाके अनुसार वे सारी बातें सुग्रीवसे कहीं ॥ १४३ ॥
तत् प्रापयन्तं वचनं तूर्णमाप्लुत्य वानराः ॥ १५ ॥
प्रापद्यन्त तदा क्षिप्रं लोप्तुं हन्तुं च मुष्टिभिः । जिस समय वह संदेश सुना रहा था, उसी समय वानर उछलकर तुरंत उसके पास जा पहुँचे । वे चाहते थे कि हम शीघ्र ही इसकी पाँखें नोच लें और इसे घूसोंसे ही मार डालें ॥ १५३ ॥
सर्वैः प्लवगैः प्रसभं निगृहीतो निशाचरः ॥ १६ ॥
गगनाद् भूतले चाशु प्रतिगृह्यावतारितः । इस निश्चयके साथ सारे वानरोंने उस निशाचरको बल-पूर्वक पकड़ लिया और उसे कैद करके तुरंत आकाशसे भूतल-पर उतारा ॥ १६३ ॥
वानरैः पीड्यमानस्तु शुको वचनमब्रवीत् ॥ १७ ॥
न दूतान् घ्नन्ति काकुत्स्थ वार्यन्तां साधु वानराः ।
यस्तु हित्वा मतं भर्तुः स्वमतं सम्प्रधारयेत् ।
अनुक्तवादी दूतः सन् स दूतो वधमर्हति ॥ १८ ॥
इस प्रकार वानरों के पीड़ा देनेपर शुक पुकार उठा-' घुनन्दन! राजालोग दूतोंका वध नहीं करते हैं, अतः आप इन वानरोंको भलीभाँति रोकिये । जो स्वामीके अभिप्राय-को छोड़कर अपना मत प्रकट करने लगता है, वह दूत बिना कही हुई बात कहनेका अपराधी है; अतः वही वधके योग्य होता है ' ॥ १७-१८ ॥
शुकस्य वचनं रामः श्रुत्वा तु परिदेवितम् ।
उवाच मावधिष्टेति घ्नतः शाखामृगर्षभान् ॥ १ ९ ॥
शुके वचन और विलापको सुनकर भगवान् श्रीरामने उसे पीटने वाले प्रमुख वानरोंको पुकारकर कहा - " इसे मत मारो ' ॥ १ ९ ॥
स च पत्रलघुर्भूत्वा हरिभिर्दर्शितेऽभये ।
अन्तरिक्षे स्थितो भूत्वा पुनर्वचनमब्रवीत् ॥ २० ॥
उस समयतक शुकके पंखोंका भार कुछ हल्का हो गया था; ( क्योंकि वानरोंने उन्हें नोच डाला था ) फिर उनके अभय देनेपर शुक आकाशमें खड़ा हो गया और पुनः बोला ॥ २० ॥
सुग्रीव सत्त्वसम्पन्न महाबलपराक्रम ।
किं मया खलु वक्तव्यो रावणो लोकरावणः ॥ २१ ॥
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११०० श्रीमद्वाल्मीकीय रामायणे ' महान् बल और पराक्रमसे युक्त शक्तिशाली सुग्रीव! समस्त लोकोंको रुलानेवाले रावणको मुझे आपकी ओरसे क्या उत्तर देना चाहिये ' ॥ २१ ॥
स एवमुक्तः प्लवगाधिपस्तदा लवंगमानामृषभो महाबलः । उवाच वाक्यं रजनीचरस्य चारं शुकं शुद्धमदीनसत्त्वः ॥ २२ ॥
शुक के इस प्रकार पूछने पर उस समय कपिशिरोमणि महा-बली उदारचेता वानरराज सुग्रीवने उस निशाचरके दूतसे यह स्पष्ट एवं निश्छल बात कही ॥ २२ ॥
न मेऽसि मित्रं न तथानुकम्प्यो
न चोपकर्तासि न मे प्रियोऽसि ।
अरिश्च रामस्य सहानुबन्ध-स्ततोऽसि वालीव वधार्ह वध्यः ॥ २३ ॥
" ( दूत! तुम रावणसे इस प्रकार कहना - ) वधके योग्य दशानन! तुम न तो मेरे मित्र हो, न दयाके पात्र हो, न मेरे उपकारी हो और न मेरे प्रिय व्यक्तियोंमेंसे ही कोई हो । भगवान् श्रीरामके शत्रु हो, इस कारण अपने सगे - सम्बन्धियों-सहित तुम वालीकी भाँति ही मेरे लिये वध्य हो ॥ २३ ॥
निहन्म्यहं त्वां ससुतं सबन्धुं सज्ञातिवर्ग रजनीचरेश । लङ्कां च सर्वा महता बलेन सर्वैः करिष्यामि समेत्य भस्म ॥ २४ ॥
' निशाचरराज! मैं पुत्र, बन्धु और कुटुम्बीजनोंसहित तुम्हारा संहार करूँगा और बड़ी भारी सेनाके साथ आकर समस्त लङ्कापुरीको भस्म कर डालूँगा ॥ २४ ॥
न मोक्ष्यसे रावण राघवस्य सुरैः सहेन्द्रैरपि मूढ गुप्तः । अन्तर्हितः सूर्यपथं गतोऽपि तथैव पातालमनुप्रविष्टः । गिरीशपादाम्बुजसंगतो वा हतोऽसि रामेण सहानुजस्त्वम् ॥ २५ ॥
‘ मूर्ख रावण! यदि इन्द्र आदि समस्त देवता तुम्हारी रक्षा करें तो भी श्रीरघुनाथजीके हाथसे अब तुम जीवित नहीं छूट सकोगे । तुम अन्तर्धान हो जाओ, आकाशमें चले जाओ, पातालमें घुस जाओ अथवा महादेवजीके चरणारविन्दोंका आश्रय लो; फिर भी अपने भाइयोंसहित तुम अवश्य श्रीराम-चन्द्रजीके हाथोंसे मारे जाओगे ॥ २५ ॥
तस्य ते त्रिषु लोकेषु न पिशाचं न राक्षसम् ।
त्रातारं नानुपश्यामि न गन्धर्वे न चासुरम् ॥ २६ ॥
' तीनों लोकोंमें मुझे कोई भी पिशाच, राक्षस, गन्धर्व या असुर ऐसा नहीं दिखायी देता, जो तुम्हारी रक्षा कर सके । अवधीस्त्वं जरावृद्धं गृध्रराजं जटायुषम् ।
किं नु ते रामसांनिध्ये सकाशे लक्ष्मणस्य च ।
हृता सीता विशालाक्षी यां त्वं गृह्य न बुध्यसे ॥ २७ ॥
' चिरकालके बूढ़े गृधराज जटायुको तुमने क्यों मारा? यदि तुममें बड़ा बल था तो श्रीराम और लक्ष्मणके पाससे तुमने विशाललोचना सीताका अपहरण क्यों नहीं किया? तुम सीता-जीको ले जाकर अपने सिरपर आयी हुई विपत्तिको क्यों नहीं समझ रहे हो? || २७ ॥
महाबलं महात्मानं दुराधर्षे सुरैरपि ।
न बुध्यसे रघुश्रेष्ठं यस्ते प्राणान् हरिष्यति ॥ २८ ॥
' रघुकुलतिलक श्रीराम महाबली, महात्मा और देवताओं-के लिये भी दुर्जय हैं, किंतु तुम उन्हें अभीतक समझ नहीं सके । ( तुमने छिपकर सीताका हरण किया है, परंतु ) वे ( सामने आकर ) तुम्हारे प्राणोंका अपहरण करेंगे ' ॥ २८ ॥
ततोऽब्रवीद् वालिसुतोऽप्यङ्गदो हरिसत्तमः ।
नायं दूतो महाराज चारकः प्रतिभाति मे ॥ २ ९ ॥
तुलितं हि बलं सर्वमनेन तव तिष्ठता ।
गृह्यतां मागमलङ्कामेतद्धि मम रोचते ॥ ३० ॥
तत्पश्चात् वानरशिरोमणि वालिकुमार अङ्गदने कहा-' महाराज! मुझे तो यह दूत नहीं, कोई गुप्तचर प्रतीत होता है । इसने यहाँ खड़े - खड़े आपकी सारी सेनाका माप - तौल कर लिया है-पूरा - पूरा अंदाजा लगा लिया है । अतः इसे पकड़ लिया जाय, लङ्काको न जाने पाये । मुझे यही ठीक जान पड़ता ' है ' ॥ २ ९ -३० ॥
ततो राज्ञा समादिष्टाः समुत्पत्य वलीमुखाः ।
जगृहुश्च बबन्धुश्च विलपन्तमनाथवत् ॥ ३१ ॥
फिर तो राजा सुग्रीवके आदेशसे वानरोंने उछलकर उसे पकड़ लिया और बाँध दिया । वह बेचारा अनाथकी भाँति विलाप करता रहा ॥ ३१ ॥
शुकस्तु वानरैश्वण्डैस्तत्र तैः सम्प्रपीडितः ।
व्याचुक्रोश महात्मानं रामं दशरथात्मजम् ।
लुप्येते मे बलात् पक्षौ भिद्येते मे तथाक्षिणी ॥ ३२ ॥
यां च रात्रिं मरिष्यामि जाये रात्रिं च यामहम् ।
एतस्मिन्नन्तरे काले यन्मया ाशुभं कृतम् ।
सर्वे तदुपपद्येथा जह्यां चेद् यदि जीवितम् ॥ ३३ ॥
उन प्रचण्ड वानरोंसे पीड़ित हो शुकने दशरथनन्दन महात्मा श्रीरामको बड़े जोरसे पुकारा और कहा - " प्रभो! बलपूर्वक मेरी पाँखें नोची और आँखें फोड़ी जा रही हैं । यदि आज मैंने प्राणोंका त्याग किया तो जिस रातमें मेरा जन्म
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युद्धकाण्डे एकविंशः सर्गः ११०१ हुआ था और जिस रातको मैं मरूँगा, जन्म और मरणके इस वानरानब्रवीद् रामो मुच्यतां दूत आगतः ॥ ३४ ॥
मध्यवर्ती कालमें, मैंने जो भी पाप किया है, वह सब आपको उस समय उसका वह विलाप सुनकर श्रीरामने उसका ही लगेगा ' ॥ ३२-३३ ॥ वध नहीं होने दिया । उन्होंने वानरोंसे कहा- छोड़ दो । यह
नाघातयत् तदा रामः श्रुत्वा तत्परिदेवितम् । दूत होकर ही आया था ' ॥ ३४ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये युद्धकाण्डे विंशः सर्गः ॥ २० ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें बीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ २० ॥
एकविंशः सर्गः श्रीरामका समुद्र तटपर कुशा बिछाकर तीन दिनोंतक धरना देनेपर भी समुद्र के दर्शन न देने से कुपित हो उसे बाण मारकर विक्षुब्ध कर देना
ततः सागरवेलायां दर्भानास्तीर्य राघवः ।
अञ्जलिं प्राङ्मुखः कृत्वा प्रतिशिश्ये महोदधेः ॥ १ ॥
तदनन्तर श्रीरघुनाथजी समुद्रके तटपर कुशा बिछा महासागर के समक्ष हाथ जोड़ पूर्वाभिमुख हो वहाँ लेट गये ।
बाहुं भुजङ्गभोगाभमुपधायारिसूदनः ।
जातरूपमयैश्चैव भूषणैर्भूषितं पुरा ॥ २ ॥
उस समय शत्रुसूदन श्रीरामने सर्पके शरीरकी भाँति कोमल और वनवासके पहले सोनेके बने हुए सुन्दर आभूषणोंसे सदा विभूषित रहनेवाली अपनी एक ( दाहिनी ) बाँहको तकिया बना रक्खा था ॥ २ ॥
मणिकाञ्चनकेयूरमुक्ताप्रवरभूषणैः भुजैः परमनारीणामभिमृष्टमनेकधा ॥ ३ ॥
अयोध्या में रहते समय मातृकोटिकी अनेक उत्तम नारियाँ ( धायें ) मणि और सुवर्णके बने हुए केयूरों तथा मोतीके श्रेष्ठ आभूषणोंसे विभूषित अपने कर - कमलोद्वारा नहलाने-धुलाने आदिके समय अनेक बार श्रीरामके उस बाँहको सहलाती और दबाती थीं ॥ ३ ॥
चन्दनागुरुभिश्चैव पुरस्तादभिसेवितम् ।
बालसूर्यप्रकाशैश्च चन्दनैरुपशोभितम् ॥ ४ ॥
पहले चन्दन और अगुरुसे उस बाँहकी सेवा होती थी । प्रातःकाल के सूर्य की - सी कान्तिवाले लाल चन्दन उसकी शोभा बढ़ाते थे ॥ ४ ॥
शयने चोत्तमाङ्गेन सीतायाः शोभितं पुरा ।
तक्षकस्येव सम्भोगं गङ्गाजलनिषेवितम् ॥ ५ ॥
सीताहरण से पहले शयनकालमें सीताका सिर उस बाँकी शोभा बढ़ाता था और श्वेत शय्यापर स्थित एवं लाल चन्दनसे चर्चित हुई वह बाँह गङ्गाजलमें निवास करनेवाले तक्षकके शरीरकी भाँति सुशोभित होती थी ॥ ५ ॥
१. तक्षक नागका रंग लाल माना गया है । ( देखिये महाभारत, आदिपर्व ४४ । २-३ )
संयुगे युगसंकाशं शत्रूणां शोकवर्धनम् ।
सुहृदां नन्दनं दीर्घ सागरान्तव्यपाश्रयम् ॥ ६ ॥
युद्धस्थलमें जूए के समान वह विशाल भुजा शत्रुओंका शोक बढ़ानेवाली और सुहृदोंको दीर्घकालतक आनन्दित करनेवाली थी । समुद्रपर्यन्त अखण्ड भूमण्डलकी रक्षाका भार उनकी उसी भुजापर प्रतिष्ठित था ॥ ६ ॥
अस्यता च पुनः सव्यं ज्याघातविहतत्वचम् ।
दक्षिणो दक्षिणं वाहुं महापरिघसंनिभम् ॥ ७ ॥
गोसहस्रप्रदातारं छुपधाय भुजं महत् ।
अद्य मे तरणं वाथ मरणं सागरस्य वा ॥ ८ ॥
इति रामो धृतिं कृत्वा महाबाहुर्महोदधिम् ।
अधिशिश्ये च विधिवत् प्रयतो नियतो मुनिः ॥ ९ ॥
बायीं ओरको बारंबार बाण चलानेके कारण प्रत्यञ्चाके आघातसे जिसकी त्वचापर रगड़ पड़ गयी थी, जो विशाल परिघके समान सुदृढ़ एवं बलिष्ठ थी तथा जिसके द्वारा उन्होंने सहस्रों गौओं का दान किया था, उस विशाल दाहिनी भुजाका तकिया लगाकर उदारता आदि गुणोंसे युक्त महाबाहु श्रीराम ' आज या तो मैं समुद्र के पार जाऊँगा या मेरेद्वारा समुद्रका संहार होगा ' ऐसा निश्चय करके मौन हो मन, वाणी और शरीरको संयम में रखकर महासागरको अनुकूल करने के उद्देश्यसे विधिपूर्वक धरना देते हुए उस कुशासनपर सो गये ॥ ७ - ९ ॥
तस्य रामस्य सुप्तस्य कुशास्तीर्ण महीतले ।
नियमादप्रमत्तस्य निशास्तिस्रोऽभिजग्मतुः ॥ १० ॥
कुश बिछी हुई भूमिपर सोकर नियमसे असावधान न होते हुए श्रीरामकी वहाँ तीन रातें व्यतीत हो गयीं ॥ १० ॥
स त्रिरात्रोषितस्तत्र नयज्ञो धर्मवत्सलः ।
उपासत तदा रामः सागरं सरितां पतिम् ॥ ११ ॥
न च दर्शयते रूपं मन्दो रामस्य सागरः ।
प्रयतेनापि रामेण यथार्हमभिपूजितः ॥ १२ ॥