श्रीगणेशाय नमः।
वाल्मीकि रामायण — खण्ड २ — पृष्ठ 291–300
वाल्मीकि रामायण — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 291–300
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११०२ श्रीमवाल्मीकीय रामायणे इस प्रकार उस समय वहाँ तीन रात लेटे रहकर सशङ्खशुक्तिकाजालं समीनमकरं तथा ॥ १ ९ ॥ नीतिके ज्ञाता, धर्मवत्सल श्रीरामचन्द्रजी सरिताओंके स्वामी समुद्रकी उपासना करते रहे; परंतु नियमपूर्वक रहते हुए श्रीरामके द्वारा यथोचित पूजा और सत्कार पाकर भी उस मन्दमति महासागरने उन्हें अपने आधिदैविक रूपका दर्शन नहीं कराया — वह उनके समक्ष प्रकट नहीं हुआ । ११-१२ ॥
समुद्रस्य ततः क्रुद्धो रामो रक्तान्तलोचनः ।
समीपस्थमुवाचेदं लक्ष्मणं शुभलक्षणम् ॥ १३ ॥
तब अरुणनेत्रप्रान्तवाले भगवान् श्रीराम समुद्रपर कुपित हो उठे और पास ही खड़े हुए शुभलक्षणयुक्त लक्ष्मणसे इस प्रकार बोले ॥ १३ ॥
अवलेपः समुद्रस्य न दर्शयति यः स्वयम् ।
प्रशमश्च क्षमा चैव आर्जवं प्रियवादिता ॥ १४ ॥
असामर्थ्यफला होते निर्गुणेषु सतां गुणाः । " समुद्रको अपने ऊपर बड़ा अहङ्कार है, जिससे वह स्वयं मेरे सामने प्रकट नहीं हो रहा है । शान्ति, क्षमा, सरलता और मधुर भाषण – ये जो सत्पुरुषोंके गुण हैं, इनका गुणहीनोंके प्रति प्रयोग करनेपर यही परिणाम होता है कि वे उस गुणवान् पुरुषको भी असमर्थ समझ लेते हैं ॥ आत्मप्रशंसिनं दुष्टं धृष्टं विपरिधावकम् ॥ १५ ॥
सर्वत्रोत्सृष्टदण्डं च लोकः सत्कुरुते नरम् । ‘ जो अपनी प्रशंसा करनेवाला, दुष्ट, धृष्ट, सर्वत्र धावा करनेवाला और अच्छे - बुरे सभी लोगोंपर कठोर दण्डका प्रयोग करनेवाला होता है, उस मनुष्यका सब लोग सत्कार करते हैं ॥ १५३ ॥
न साम्ना शक्यते कीर्तिर्न साम्ना शक्यते यशः ॥ १६ ॥
प्राप्त लक्ष्मण लोकेऽस्मिञ्जयो वा रणमूर्धनि । ' लक्ष्मण! सामनीति ( शान्ति ) के द्वारा इस लोक में न तो कीर्ति प्राप्त की जा सकती है, न यशका प्रसार हो सकता है और न संग्राममें विजय ही पायी जा सकती है ॥ अद्य मद्वाणनिर्भग्नै र्मकरैर्मकरालयम् ॥१७ ॥
निरुद्धतोयं सौमित्रे लवद्भिः पश्य सर्वतः । ' सुमित्रानन्दन! आज मेरे बाणोंसे खण्ड - खण्ड हो मगर और मत्स्य सब ओर उतराकर बहने लगेंगे और उनकी अद्य युद्धेन महता समुद्रं परिशोषये " आज महान् युद्ध ठानकर शङ्खों और समुदाय तथा मत्स्यों और मगरोंसहित समुद्रको सुखाये देता हूँ ॥ १ ९ ३ ॥ क्षमया हि समायुक्तं मामयं मकरालयः असमर्थ विजानाति धिक् क्षमामीदृशे जने ‘ मगरोंका निवासभूत यह समुद्र मुझे क्षमासे । सीपियोंके मैं अभी ॥ २० ॥
। युक्त देख असमर्थ समझने लगा है । ऐसे मूखके प्रति की गयी क्षमाको धिक्कार है || २०३ ॥ न दर्शयति साम्ना मे सागरो रूपमात्मनः ॥ २१ ॥
चापमानय सौमित्रे शरांश्चाशीविषोपमान् ।
समुद्रं शोषयिष्यामि पद्भ्यां यान्तु प्लवंगमाः ॥ २२ ॥
' सुमित्रानन्दन! सामनीतिका आश्रय लेनेसे यह समुद्र मेरे सामने अपना रूप नहीं प्रकट कर रहा है, इसलिये धनुष तथा विषधर सर्पोंके समान भयंकर बाण ले आओ । मैं समुद्रको सुखा डालूँगा; फिर वानरलोग पैदल ही लङ्कापुरीको चलें ॥ २१-२२ ॥ अद्याक्षोभ्यमपि क्रुद्धः क्षोभयिष्यामि सागरम् 1
।
वेलासु कृतमर्यादं सहस्रोर्मिसमाकुलम् ॥ २३ ॥
निर्मर्यादं करिष्यामि सायकैर्वरुणालयम् ।
महार्णवं क्षोभयिष्ये महादानवसंकुलम् ॥ २४ ॥
' यद्यपि समुद्रको अक्षोभ्य कहा गया है; फिर भी आज कुपित होकर मैं इसे विक्षुब्ध कर दूँगा । इसमें सहस्रों तरङ्गे उठती रहती हैं; फिर भी यह सदा अपने तटकी मर्यादा ( सीमा ) में ही रहता है । किंतु अपने बाणोंसे मारकर मैं इसकी मर्यादा नष्ट कर दूँगा । बड़े - बड़े दानवोंसे भरे हुए इस महासागरमें हलचल मचा दूँगा – तूफान ला दूँगा ' ॥
एवमुक्त्वा धनुष्पाणिः क्रोधविस्फारितेक्षणः ।
बभूव रामो दुर्धर्षो युगान्ताग्निरिव ज्वलन् ॥ २५ ॥
यों कहकर दुर्धर्ष वीर भगवान् श्रीरामने हाथमें धनुष ले लिया । वे क्रोधसे आँखें फाड़ - फाड़कर देखने लगे और प्रलयाग्निके समान प्रज्वलित हो उठे ॥ २५ ॥
सम्पीड्य च धनुर्घोरं कम्पयित्वा शरैर्जगत् । लाशोंसे इस मकरालय ( समुद्र ) का जल आच्छादित हो मुमोच विशिखानुग्रान् वज्रानिव शतक्रतुः ॥ २६ ॥
जायगा । तुम यह दृश्य आज अपनी आँखों देख लो ॥ १७३ ॥ उन्होंने अपने भयंकर धनुषको धीरेसे दबाकर उसपर
भोगिनां पश्य भोगानि मया भिन्नानि लक्ष्मण ॥ १८ ॥ प्रत्यचा चढ़ा दी और उसकी टङ्कारसे सारे जगत्को कम्पित
महाभोगानि मत्स्यानां करिणां च करानिह । करते हुए बड़े भयंकर बाण छोड़े, मानो इन्द्रने बहुत - से लक्ष्मण! तुम देखो कि मैं यहाँ जलमें रहनेवाले वज्रोंका प्रहार किया हो ॥ २६ ॥
सर्पोंके ' शरीर, मत्स्योंके विशाल कलेवर और जल - हस्तियोंके ते ज्वलन्तो महावेगास्तेजसा सायकोत्तमाः । झुण्ड - दण्डके } किस तरह टुकड़े - टुकड़े कर डालता हूँ ॥ प्रविशन्ति समुद्रस्य जलं वित्रस्तपन्नगम् ॥ २७ ॥
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युद्धकाण्डे द्वाविंशः सर्गः ११०३ तेजसे प्रज्वलित होते हुए वे महान् वेगशाली श्रेष्ठ बाण समुद्रके जल में घुस गये । वहाँ रहनेवाले सर्प भयसे थर्रा उठे ॥ २७ ॥
तोयवेगः समुद्रस्य समीनमकरो महान् ।
स बभूव महाघोरः समारुतरवस्तथा ॥ २८ ॥
' मत्स्यों और मगरोंसहित महासागर के जलका महान् वेग सहसा अत्यन्त भयंकर हो गया । वहाँ तूफानका कोलाहल छा गया ॥ २८ ॥
महोर्मिमालाविततः शङ्खशुक्तिसमावृतः ।
सधूमः परिवृत्तोमिः सहसासीन्महोदधिः ॥ २ ९ ॥
बड़ी - बड़ी तरङ्ग - मालाओंसे सारा समुद्र व्याप्त हो उठा । शङ्ख और सीपियाँ पानीके ऊपर छा गयीं । वहाँ धुआँ उठने लगा और सारे महासागर में सहसा बड़ी - बड़ी लहरें चक्कर काटने लगीं ॥ २ ९ ॥
व्यथिताः पन्नगाश्चासन् दीप्तास्या दीप्तलोचनाः ।
दानवाश्च महावीर्याः पातालतलवासिनः ॥ ३० ॥
चमकीले फन और दीप्तिशाली नेत्रोंवाले सर्प व्यथित हो उठे तथा पातालमें रहनेवाले महापराक्रमी दानव भी व्याकुल हो गये ॥ ३० ॥
ऊर्मयः सिन्धुराजस्य सनक्रमकरास्तथा ।
विन्ध्यमन्दरसंकाशाः समुत्पेतुः सहस्रशः ॥ ३१ ॥
सिन्धुराजकी सहस्रों लहरें जो विन्ध्याचल और मन्दराचल के समान विशाल एवं विस्तृत थीं, नाकों और मकरोंको साथ लिये ऊपरको उठने लगीं ॥ ३१ ॥
आघूर्णित तरङ्गौघः सम्भ्रान्तोरगराक्षसः ।
उद्वर्तितमहाग्राहः सघोषो वरुणालयः ॥ ३२ ॥
सागरकी उत्ताल तरङ्ग - मालाएँ झूमने और चक्कर काटने लगीं । वहाँ निवास करनेवाले नाग और राक्षस घबरा गये । बड़े - बड़े ग्राह ऊपरको उछलने लगे तथा वरुण के निवासभूत उस समुद्र में सब ओर भारी कोलाहल मच गया ॥ ३२ ॥
ततस्तु तं राघवमुग्रवेगं प्रकर्षमाणं धनुरप्रमेयम् । सौमित्रिरुत्पत्य विनिःश्वसन्तं मामेति चोक्त्वा धनुराललम्बे ॥ ३३ ॥
तदनन्तर श्रीरघुनाथजी रोपसे लंबी साँस लेते हुए अपने भयंकर वेगशाली अनुपम धनुषको पुनः खींचने लगे । यह देख सुमित्राकुमार लक्ष्मण उछलकर उनके पास जा पहुँचे और ' बस, बस, अब नहीं, अब नहीं ' ऐसा कहते हुए उन्होंने उनका धनुष पकड़ लिया ॥ ३३ ॥
एतद्विनापि स्वाय सम्पत्स्यते वीरतमस्य कार्यम् । भवद्विधाः क्रोधवशं न यान्ति दीर्घ भवान् पश्यतु साधुवृत्तम् ॥ ३४ ॥
( फिर वे बोले - ) ' भैया! आप वीर शिरोमणि हैं । इस समुद्रको नष्ट किये बिना भी आपका कार्य सम्पन्न हो जायगा । आप जैसे महापुरुष क्रोधके अधीन नहीं होते हैं । अब आप सुदीर्घकालतक उपयोगमें लाये जानेवाले किसी अच्छे उपायपर दृष्टि डालें कोई दूसरी उत्तम युक्ति सोचें ॥ अन्तर्हितैश्चापि तथान्तरिक्षे
ब्रह्मर्षिभिश्चैव सुरर्षिभिश्च ।
शब्दः कृतः कष्टमिति ब्रुवद्भि-ममेति चोक्त्वा महता खरेण ॥ ३५ ॥
इसी समय अन्तरिक्षमें अव्यक्तरूपसे स्थित महर्षियों और देवर्षियोंने भी " हाय! यह तो बड़े कटकी बात है ' ऐसा कहते हुए ' अब नहीं, अब नहीं ' कहकर बड़े जोरसे कोलाहल किया || ३५ ॥ इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये युद्धकाण्डे एकविंशः सर्गः ॥ २१ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आषरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें इक्कीसवाँ पूरा हुआ ॥ २१ ॥
द्वाविंशः सर्गः समुद्रकी सलाहके अनुसार नलके द्वारा सागरपर सौ योजन लंबे पुलका निर्माण तथा उसके द्वारा श्रीराम आदिसहित वानरसेनाका उस पार पहुँचकर पड़ाव डालना अथोवाच रघुश्रेष्ठः सागरं दारुणं वचः । शरनिर्दग्धतोयस्य परिशुष्कस्य सागर । अद्य त्वां शोषयिष्यामि सपातालं महार्णव ॥ १ ॥ मया निहतसत्त्वस्य पांसुरुत्पद्यते महान् ॥ २ ॥
तब रघुकुलतिलक श्रीरामने समुद्रसे कठोर शब्दों में कहा-- " सागर! मेरे बाणोंसे तुम्हारी सारी जलराशि दग्ध हो ‘ महासागर! आज मैं पातालसहित तुझे सुखा डालूँगा ॥ १ ॥ जायगी, तू सूख जायगा और तेरे भीतर रहनेवाले सब जीव
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११०४ श्रीमद्वाल्मीकीय रामायणे नष्ट हो जायँगे । उस दशामें तेरे यहाँ जलके स्थान में विशाल बालुकाराशि पैदा हो जायगी ॥ २ ॥
मत्कार्मुकविसृष्टेन शरवर्षेण सागर ।
परं तीरं गमिष्यन्ति पद्भिरेव लवंगमाः ॥ ३ ॥
' समुद्र! मेरे धनुषद्वारा की गयी बाण वर्षासे जब तेरी ऐसी दशा हो जायगी, तब वानरलोग पैदल ही चलकर तेरे उस पार पहुँच जायँगे ॥ ३ ॥
विचिन्वन्नाभिजानासि पौरुषं नापि विक्रमम् ।
दानवालय संतापं मत्तो नाम गमिष्यसि ॥ ४ ॥
' दानवोंके निवासस्थान! तू केवल चारों ओरसे बहकर आयी हुई जलराशिका संग्रह करता है । तुझे मेरे बल और पराक्रमका पता नहीं है । किंतु याद रख, ( इस उपेक्षाके कारण ) तुझे मुझसे भारी संताप प्राप्त होगा ' ॥ ४ ॥
ब्राह्मणास्त्रेण संयोज्य ब्रह्मदण्डनिभं शरम् ।
संयोज्य धनुषि श्रेष्ठे विचकर्ष महाबलः ॥ ५ ॥
यों कहकर महाबली श्रीरामने एक ब्रह्मदण्डके समान भयंकर बाणको ब्रह्मास्त्रसे अभिमन्त्रित करके अपने श्रेष्ठ धनुष-पर चढ़ाकर खींचा ॥ ५ ॥
तस्मिन् विकृष्टे सहसा राघवेण शरासने ।
रोदसी सम्पफालेव पर्वताश्च चकम्पिरे ॥ ६ ॥
श्रीरघुनाथजीके द्वारा सहसा उस धनुषके खींचे जाते ही पृथ्वी और आकाश मानो फटने लगे और पर्वत डगमगा उठे ॥ ६ ॥
तमश्च लोकमावत्रे दिशश्च न चकाशिरे ।
प्रतिचुक्षुभिरे चाशु सरांसि सरितस्तथा ॥ ७ ॥
सारे संसार में अन्धकार छा गया । किसीको दिशाओंका ज्ञान न रहा । सरिताओं और सरोवरोंमें तत्काल हलचल पैदा हो गयी ॥ ७ ॥
तिर्यक् च सह नक्षत्रैः संगतौ चन्द्रभास्करौ ।
भास्करांशुभिरादीप्तं तमसा च समावृतम् ॥ ८ ॥
चन्द्रमा और सूर्य नक्षत्रोंके साथ तिर्यक्- गति से चलने लगे । सूर्यकी किरणोंसे प्रकाशित होनेपर भी आकाशमें अन्धकार छा गया ॥ ८ ॥
प्रचकाशे तदाऽऽकाशमुल्काशतविदीपितम् ।
अन्तरिक्षाच्च निर्घाता निर्जग्मुरतुलखनाः ॥ ९ ॥
उस समय आकाश में सैकड़ों उल्काएँ प्रज्वलित होकर उसे प्रकाशित करने लगीं तथा अन्तरिक्षसे अनुपम एवं भारी गड़गड़ाहट के साथ वज्रपात होने लगे ॥ ९ ॥
ववुर्दिव्यमारुतपङ्कयः ।
बभञ्ज च तदा वृक्षाञ्जलदानुद्वहन्मुहुः ॥ १० ॥
आरुजंश्चैव शैलाग्राशिखराणि वभञ्ज च । परिवह आदि वायुभेदों का समूह बड़े वेग से बहने लगा । वह मेघोंकी घटाको उड़ाता हुआ बारंबार वृक्षोंको तोड़ने, बड़े-बड़े पर्वतोंसे टकराने और उनके शिखरोंको खण्डित करके गिराने लगा ॥ १०३ ॥
दिवि च स्म महामेघाः संहताः समहास्वनाः ॥ ११ ॥
मुमुचुर्वैद्युतानन महाशनयस्तदा ।
यानि भूतानि दृश्यानि चुक्रुशुश्वाशनेः समम् ॥ १२ ॥
अदृश्यानि च भूतानि मुमुचुर्भैरवस्वनम् । आकाश महान् वेगशाली विशाल वज्र भारी गड़गड़ाहट-के साथ टकराकर उस समय वैद्युत अग्निकी वर्षा करने लगे । जो प्राणी दिखायी दे रहे थे और जो नहीं दिखायी देते थे, वे सब बिजलीकी कड़कके समान भयंकर शब्द करने लगे ॥ ११-१२३ ॥ शिशिरे चाभिभूतानि संत्रस्तान्युद्विजन्ति च ॥ १३ ॥
सम्प्रविव्यथिरे चापि न च पस्पन्दिरे भयात् । उनमें से कितने ही अभिभूत होकर धराशायी हो गये । कितने ही भयभीत और उद्विग्न हो उठे । कोई व्यथासे व्याकुल हो गये और कितने ही भयके मारे जडवत् हो गये ॥ १३३ ॥
सह भूतैः सतोयोर्मिः सनागः सहराक्षसः ॥ १४ ॥
सहसाभूत् ततो वेगाद् भीमवेगो महोदधिः ।
योजनं व्यतिचक्राम वेलामन्यत्र सम्प्लवात् ॥ १५ ॥
समुद्र अपने भीतर रहनेवाले प्राणियों, तरङ्गों, सर्पों और राक्षसों सहित सहसा भयानक वेगसे युक्त हो गया और प्रलय-कालके बिना ही तीव्रगतिसे अपनी मर्यादा लाँघकर एक - एक योजन आगे बढ़ गया ॥ १४-१५ ॥
तं तथा समतिक्रान्तं नातिचक्राम राघवः ।
समुद्धतममित्रघ्नो रामो नदनदीपतिम् ॥ १६ ॥
इस प्रकार नदों और नदियोंके स्वामी उस उद्धत समुद्र के मर्यादा लाँघकर बढ़ जानेपर भी शत्रुसूदन श्रीरामचन्द्रजी अपने स्थानसे पीछे नहीं हटे ॥ १६ ॥
ततो मध्यात् समुद्रस्य सागरः स्वयमुत्थितः ।
उदयाद्रिमहाशैलान्मेरोरिव दिवाकरः ॥ १७ ॥
तब समुद्र के बीचसे सागर स्वयं मूर्तिमान् होकर प्रकट हुआ, मानो महाशैल मेरुपर्वतके अङ्गभूत उदयाचल से सूर्यदेव उदित हुए हों ॥ १७ ॥
पन्नगैः सह दीप्तास्यैः समुद्रः प्रत्यदृश्यत ।
स्निग्धवैदूर्यसंकाशो जाम्बूनदविभूषणः ॥ १८ ॥
चमकीले मुखवाले सर्पों के साथ समुद्रका दर्शन हुआ । उसका वर्ण स्निग्ध वैदूर्यमणिके समान श्याम था । उसने जाम्बूनदनामक सुवर्णके बने हुए आभूषण पहन रक्खे थे ।
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शासन समुद्रका श्रीरामद्वारा
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युद्धकाण्डे द्वाविंशः सर्गः ११०५
रक्तमाल्याम्बरधरः पद्मपत्रनिभेक्षणः ।
सर्वपुष्पमयीं दिव्यां शिरसा धारयन् स्रजम् ॥ १ ९ ॥
लाल रंगके फूलोंकी माला तथा लाल ही वस्त्र धारण किये थे । उसके नेत्र प्रफुल्ल कमलदलके समान सुन्दर थे । उसने सिरपर एक दिव्य पुष्पमाला धारण कर रक्खी थी, जो सब प्रकार के फूलोंसे बनायी गयी थी ॥ १ ९ ॥
जातरूपमयैश्चैव तपनीयविभूषणैः ।
आत्मजानां च रत्नानां भूषितो भूषणोत्तमैः ॥ २० ॥
सुवर्ण और तपे हुए काञ्चनके आभूषण उसकी शोभा बढ़ाते थे । वह अपने ही भीतर उत्पन्न हुए रत्नोंके उत्तम आभूषणोंसे विभूषित था ॥ २० ॥
धातुभिर्मण्डितः शैलो विविधैर्हिमवानिव ।
एकावलीमध्यगतं तरलं पाण्डरप्रभम् ॥ २१ ॥
विपुलेनोरसा बिभ्रत्कौस्तुभस्य सहोदरम् । इसीलिये नाना प्रकार के धातुओंसे अलंकृत हिमवान् पर्वत-के समान शोभा पाता था । वह अपने विशाल वक्षःस्थलपर कौस्तुभ मणिके सहोदर ( सदृश ) एक श्वेत प्रभासे युक्त मुख्य रत्न धारण किये हुए था, जो मोतियोंकी इकहरी मालाके मध्यभागमें प्रकाशित हो रहा था ॥ २१३ ॥
आघूर्णिततरङ्गौघः कालिकानिलसंकुलः ॥ २२ ॥
गङ्गासिन्धुप्रधानाभिरापगाभिः समावृतः । चञ्चल तरङ्गे उसे घेरे हुए थीं । मेघमाला और वायुसे वह व्याप्त था तथा गङ्गा और सिन्धु आदि नदियाँ उसे सब ओरसे घेरकर खड़ी थीं ॥ २२३ ॥
उद्वर्तितमहाग्राहः सम्भ्रान्तोरगराक्षसः ॥ २३ ॥
देवतानां सुरूपाभिर्नानारूपाभिरीश्वरः ।
सागरः समुपक्रम्य पूर्वमामन्त्र्य वीर्यवान् ॥ २४ ॥
अब्रवीत् प्राञ्जलिर्वाक्यं राघवं शरपाणिनम् ॥ २५ ॥
उसके भीतर बड़े - बड़े ग्राह् उद्भ्रान्त हो रहे थे, नाग और राक्षस घबराये हुए थे । देवताओंके समान सुन्दर रूप धारण करके आयी हुई विभिन्न रूपवाली नदियोंके साथ शक्ति-शाली नदीपति समुद्रने निकट आकर पहले धनुर्धर श्रीरघुनाथ-जीको सम्बोधित किया और फिर हाथ जोड़कर कहा—- २३-२५
पृथिवी वायुराकाशमापो ज्योतिश्च राघव ।
स्वभावे सौम्य तिष्ठन्ति शाश्वतं मार्गमाश्रिताः ॥ २६ ॥
' सौम्य रघुनन्दन! पृथ्वी, वायु, आकाश, जल और तेज - ये सर्वदा अपने स्वभावमें स्थित रहते हैं, अपने सनातन मार्गको कभी नहीं छोड़ते - सदा उसीके आश्रित रहते हैं ॥ २६ ॥
तत्स्वभावो ममाप्येष यदगाधोऽहमप्लवः ।
विकारस्तु भवेद् गाध एतत् ते प्रवदाम्यहम् ॥ २७ ॥
बा ० रा ० ५.८. १३– ' मेरा भी यह स्वभाव ही है जो मैं अगाध और अथाह हूँ — कोई मेरे पार नहीं जा सकता । यदि मेरी थाह
मिल जाय तो यह विकार - मेरे स्वभावका व्यतिक्रम ही होगा ।
इसलिये मैं आपसे पार होने का यह उपाय बताता हूँ ॥ २७ ॥
न कामान्न च लोभाद् वा न भयात् पार्थिवात्मज ।
ग्राहनक्राकुलजलं स्तम्भयेयं कथंचन ॥ २८ ॥
' राजकुमार! मैं मगर और नाके आदि से भरे हुए अपने जलको किसी कामनासे, लोभसे अथवा भयसे किसी तरह स्तम्भित नहीं होने दूँगा ॥ २८ ॥
विधाये येन गन्तासि विषहिष्येऽप्यहं तथा ।
न ग्राहा विधमिष्यन्ति यावत्सेना तरिष्यति ।
हरीणां तरणे राम करिष्यामि यथा स्थलम् ॥ २ ९ ॥
' श्रीराम! मैं ऐसा उपाय बताऊँगा, जिससे आप मेरे पार चले जायँगे, ग्राह वानरोंको कष्ट नहीं देंगे, सारी सेना पार उतर जायगी और मुझे भी खेद नहीं होगा । मैं आसानीसे सब कुछ सह लूँगा । वानरोंके पार जानेके लिये जिस प्रकार पुल बन जाय, वैसा प्रयत्न ' करूँगा ' ॥ २ ९ ॥
तमब्रवीत् तदा रामः शृणु मे वरुणालय ।
अमोघोऽयं महाबाणः कस्मिन् देशे निपात्यताम् ॥३० ॥
तब श्रीरामचन्द्रजीने उससे कहा- ' वरुणालय! मेरी बात सुनो । मेरा यह विशाल बाण अमोघ है । बताओ, इसे किस स्थानपर छोड़ा जाय ' ॥ ३० ॥
रामस्य वचनं श्रुत्वा तं च दृष्ट्वा महाशरम् ।
महोदधिर्महातेजा राघवं वाक्यमब्रवीत् ॥ ३१ ॥
श्रीरामचन्द्रजीका यह वचन सुनकर और उस महान् बाणको देखकर महातेजस्वी महासागरने रघुनाथजीसे कहा- ॥
उत्तरेणावकाशोऽस्ति कश्चित् पुण्यतरो मम ।
द्रुमकुल्य इति ख्यातो लोके ख्यातो यथा भवान् ॥ ३२ ॥
' प्रभो! जैसे जगत्में आप सर्वत्र विख्यात एवं पुण्यात्मा हैं, उसी प्रकार मेरे उत्तरकी ओर द्रुमकुल्य नामसे विख्यात एक बड़ा ही पवित्र देश है ॥ ३२ ॥
उग्रदर्शनक बहवस्तत्र दस्यवः ।
आभीरप्रमुखाः पापाः पिबन्ति सलिलं मम ॥ ३३ ॥
‘ वहाँ आभीर आदि जातियोंके बहुत - से मनुष्य निवास करते हैं, जिनके रूप और कर्म बड़े ही भयानक हैं । वे सब-के - सब पापी और लुटेरे हैं । वे लोग मेरा जल पीते हैं ॥३३ ॥
तैर्न तत्स्पर्शनं पापं सहेयं पापकर्मभिः ।
अमोघः क्रियतां राम अयं तत्र शरोत्तमः ॥ ३४ ॥
' उन पापाचारियोंका स्पर्श मुझे प्राप्त होता रहता है, इस
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११०६ श्रीमद्वाल्मीकीय रामायणे पापको मैं नहीं सह सकता । श्रीराम! आप अपने इस उत्तम बाणको वहीं सफल कीजिये ॥ ३४ ॥
तस्य तद् वचनं श्रुत्वा सागरस्य महात्मनः ।
मुमोच तं शरं दीप्तं परं सागरदर्शनात् ॥ ३५ ॥
महामना समुद्रका यह वचन सुनकर सागरके दिखाये अनुसार उसी देश में श्रीरामचन्द्रजीने वह अत्यन्त प्रज्वलित बाण छोड़ दिया ॥ ३५ ॥
तेन तन्मरुकान्तारं पृथिव्यां किल विश्रुतम् ।
निपातितः शरो यत्र वज्राशनिसमप्रभः ॥ ३६ ॥
वह वज्र और अशनि के समान तेजस्वी बाण जिस स्थान -पर गिरा था, वह स्थान उस बाणके कारण ही पृथ्वीमें दुर्गम मरुभूमिके नामसे प्रसिद्ध हुआ ॥ ३६ ॥
ननाद च तदा तत्र वसुधा शल्यपीडिता ।
तस्माद् व्रणमुखात् तोयमुत्पपात रसातलात् ॥ ३७ ॥
उस बाणसे पीड़ित होकर उस समय वसुधा आर्तनाद कर उठी । उसकी चोटसे जो छेद हुआ, उसमें होकर रसातल-का जल ऊपरको उछलने लगा ॥ ३७ ॥
स बभूव तदा कृपो व्रण इत्येव विश्रुतः ।
सततं चोत्थितं तोयं समुद्रस्येव दृश्यते ॥ ३८ ॥
वह छिद्र कुएँके समान हो गया और व्रणके नामसे प्रसिद्ध हुआ । उस कुएँसे सदा निकलता हुआ जल समुद्रके जलकी भाँति ही दिखायी देता है ॥ ३८ ॥
अवदारणशब्दश्च दारुणः समपद्यत ।
तस्मात् तद् वाणपातेन अपः कुक्षिष्वशोषयत् ॥ ३ ९ ॥
उस समय वहाँ भूमिके विदीर्ण होनेका भयंकर शब्द सुनायी पड़ा । उस बाणको गिराकर वहाँके भूतलकी कुक्षिमें ( तालाब - पोखरे आदिमें ) वर्तमान जलको श्रीरामने सुखा दिया ॥ ३ ९ ॥
विख्यातं त्रिषु लोकेषु मरुकान्तारमेव च ।
शोषयित्वा तु तं कुक्षि रामो दशरथात्मजः ॥ ४० ॥
वरं तस्मै ददौ विद्वान मरवेऽमरविक्रमः ॥ ४१ ॥
तबसे वह स्थान तीनों लोकोंमें मरुकान्तारके नामसे ही विख्यात हो गया । जो पहले समुद्रका कुक्षिप्रदेश था, उसे सुखाकर देवोपम पराक्रमी विद्वान् दशरथनन्दन श्रीरामने उस मरुभूमिको वरदान दिया ॥ ४०-४१ ॥
पशव्यश्चाल्प रोगश्च फलमूलरसायुतः ।
बहुक्षीरः सुगन्धिर्विविधौषधिः ॥ ४२ ॥
दूधकी भी बहुतायत होगी । यहाँ सुगन्ध छायी रहेगी और अनेक प्रकारकी ओषधियाँ उत्पन्न होंगी ' ॥ ४२ ॥
एवमेतैश्च संयुक्तो बहुभिः संयुतो मरुः ।
रामस्य वरदानाच्च शिवः पन्था बभूव ह ॥ ४३ ॥
इस प्रकार भगवान् श्रीरामके वरदानसे वह मरूप्रदेश इस तरहके बहुसंख्यक गुणोंसे सम्पन्न हो सबके लिये मङ्गल-कारी मार्ग बन गया ॥ ४३ ॥
तस्मिन् दग्धे तदा कुक्षौ समुद्रः सरितां पतिः ।
राघवं सर्वशास्त्रज्ञमिदं वचनमब्रवीत् ॥ ४४ ॥
उस कुक्षिस्थानके दग्ध हो जानेपर सरिताओंके स्वामी समुद्रने सम्पूर्ण शास्त्रोंके ज्ञाता श्रीरघुनाथजीसे कहा – ॥ ४४ ॥
अयं सौम्य नलो नाम तनयो विश्वकर्मणः ।
पित्रा दत्तवरः श्रीमान् प्रीतिमान् विश्वकर्मणः ॥ ४५ ॥
" सौम्य! आपकी सेना में जो यह नल नामक कान्तिमान् वानर है, साक्षात् विश्वकर्माका पुत्र है । इसे इसके पिताने यह वर दिया है कि " तुम मेरे ही समान समस्त शिल्पकला में निपुण होओगे । ' प्रभो! आप भी तो इस विश्वके स्रष्टा विश्व-कर्मा हैं । इस नलके हृदयमें आपके प्रति बड़ा प्रेम है || ४५ ||
एव सेतुं महोत्साहः करोतु मयि वानरः ।
तमहं धारयिष्यामि यथा ह्येष पिता तथा ॥ ४६ ॥
" यह महान् उत्साही वानर अपने पिताके समान ही शिल्प-कर्ममें समर्थ है, अतः यह मेरे ऊपर पुलका निर्माण करे । मैं उस पुलको धारण करूँगा ' ॥ ४६ ॥
एवमुक्त्वोदधिर्नष्टः समुत्थाय नलस्ततः ।
अब्रवीद् वानरश्रेष्ठो वाक्यं रामं महाबलम् ॥ ४७ ॥
यों कहकर समुद्र अदृश्य हो गया । तब वानरश्रेष्ठ नल उठकर महाबली भगवान् श्रीरामसे बोला- ॥ ४७ ॥
अहं सेतुं करिष्यामि विस्तीर्णे मकरालये ।
पितुः सामर्थ्यमासाद्य तत्त्वमाह महोदधिः ॥ ४८ ॥
' प्रभो! मैं पिताकी दी हुई शक्तिको पाकर इस विस्तृत समुद्रपर सेतुका निर्माण करूँगा । महासागरने ठीक कहा है ॥ ४८ ॥
दण्ड एव वरो लोके पुरुषस्येति मे मतिः ।
धिक् क्षमामकृतज्ञेषु सान्त्वं दानमथापि वा ॥ ४ ९ ॥
" संसार में पुरुषके लिये अकृतज्ञोंके प्रति दण्डनीतिका प्रयोग ही सबसे बड़ा अर्थसाधक है, ऐसा मेरा विश्वास होता है । वैसे लोगों के प्रति क्षमा, सान्त्वना और दाननीतिके
बहुस्नेहो लिये हितकारी होगी । यहाँ प्रयोगको धिक्कार है ॥ ४ ९ ॥
‘ यह मरुभूमि पशुओंके रोग कम होंगे । यह भूमि फल, मूल और रसोंसे सम्पन्न अयं हि सागरो भीमः सेतुकर्मदिदृक्षया । होगी । यहाँ घी आदि चिकने पदार्थ अधिक सुलभ होंगे, ददौ दण्डभयाद् गाधं राघवाय महोदधिः ॥ ५० ॥
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युद्धकाण्डे द्वात्रिंशः सर्गः ११०७ " इस भयानक समुद्रको राजा सगरके पुत्रोंने ही बढ़ाया है । फिर भी इसने कृतज्ञतासे नहीं, दण्डके भयसे ही सेतु कर्म देखनेकी इच्छा मनमें लाकर श्रीरघुनाथजी को अपनी थाह दी है ॥ ५० ॥
मम मातुर्वरो दत्तो मन्दरे विश्वकर्मणा ।
मया तु सदृशः पुत्रस्तव देवि भविष्यति ॥ ५१ ॥
' मन्दराचलपर विश्वकर्माजी ने मेरी माताको यह वर दिया था कि ' देवि! तुम्हारे गर्भसे मेरे ही समान पुत्र होगा ' ॥५१ ॥
और सस्तस्य पुत्रोऽहं सदृशो विश्वकर्मणा ।
स्मारितोऽस्म्यहमेतेन तत्त्वमाह महोदधिः ।
न चाप्यहमनुक्तो वः प्रब्रूयामात्मनो गुणान् ॥ ५२ ॥
" इस प्रकार मैं विश्वकर्माका औरस पुत्र हूँ और शिल्प-कर्म उन्हीं के समान हूँ । इस समुद्रने आज मुझे इन सब बातोंका स्मरण दिला दिया है । महासागरने जो कुछ कहा है, ठीक है । मैं बिना पूछे आपलोगोंसे अपने गुणों को नहीं बता सकता था, इसीलिये अबतक चुप था ॥ ५२ ॥
समर्थश्वाप्यहं सेतुं कर्तुं वै वरुणालये ।
तस्मादद्यैव बध्नन्तु सेतुं वानरपुङ्गवाः ॥ ५३ ॥
“ मैं महासागरपर पुल बाँधने में समर्थ हूँ, अतः सब वानर आज ही पुल बाँधनेका कार्य आरम्भ कर दें ' ॥५३ ॥
ततो विसृष्टा रामेण सर्वतो हरिपुङ्गवाः ।
उत्पेततुर्महारण्यं हृष्टाः शतसहस्रशः ॥ ५४ ॥
तब भगवान् श्रीरामके भेजनेसे लाखों बड़े - बड़े वानर हर्ष और उत्साह में भरकर सब ओर उछलते हुए गये और बड़े - बड़े जंगलों में घुस गये ॥ ५४ ॥
ते नगान् नगसंकाशाः शाखामृगगणर्षभाः ।
बभञ्जः पादपांस्तत्र प्रचकर्षुश्च सागरम् ॥ ५५ ॥
वे पर्वतके समान विशालकाय वानरशिरोमणि पर्वत-शिखरों और वृक्षोंको तोड़ देते और उन्हें समुद्रतक खींच लाते थे ॥ ५५ ॥
ते सालैश्वाश्वकर्णैश्च धवैर्वशैश्च वानराः ।
कुटजैरर्जुनैस्तालैस्तिलकैस्तिनिशैरपि ॥ ५६ ॥
बिल्वकैः सप्तपर्णैश्च कर्णिकारैश्च पुष्पितैः ।
चूतैश्चाशोकवृक्षैश्च सागरं समपूरयन् ॥ ५७ ॥
वे साल, अश्वकर्णं, धव, बाँस, कुटज, अर्जुन, ताल, तिलक, तिनिश, बेल, छितवन, खिले हुए कनेर, आम और अशोक आदि वृक्षोंसे समुद्रको पाटने लगे ॥ ५६-५७ ॥
समूलांश्च विमूलांश्च पादपान् हरिसत्तमाः ।
इन्द्रकेतून द्यम्य प्रजहुर्वानरास्तरून् ॥ ५८ ॥
वे श्रेष्ठ वानर वहाँके वृक्षोंको जड़से उखाड़ लाते या जड़के ऊपरसे भी तोड़ लाते थे । इन्द्रध्वजके समान ऊँचे-ऊँचे वृक्षोंको उठाये लिये चले आते थे ॥ ५८ ॥
तालान् दाडिमगुल्मांश्च नारिकेलविभीतकान् ।
करीरान् बकुलान् निम्बान् समाजहरितस्ततः ॥ ५ ९ ॥
ताड़ों, अनारकी झाड़ियों, नारियल और बहेड़ेके वृक्षों, करीर, बकुल तथा नीमको भी इधर - उधरसे तोड़ - तोड़कर लाने लगे ॥ ५ ९ ॥
हस्तिमात्रान् महाकायाः पाषाणांश्च महाबलाः ।
पर्वतांश्च समुत्पाट्य यन्त्रैः परिवहन्ति च ॥ ६० ॥
महाकाय महाबली वानर हाथीके समान बड़ी - बड़ी शिलाओं और पर्वतोंको उखाड़कर यन्त्रों ( विभिन्न साधनों ) द्वारा समुद्रतटपर ले आते थे ॥ ६० ॥
प्रक्षिप्यमाणैरचलैः सहसा जलमुद्धृतम् ।
समुत्ससर्प चाकाशमवासर्पत् ततः पुनः ॥ ६१ ॥
शिलाखण्डों को फेंकनेसे समुद्रका जल सहसा आकाशमें उठ जाता और फिर वहाँसे नीचेको गिर जाता था ॥ ६१ ॥
समुद्रं क्षोभयामासुर्निपतन्तः समन्ततः ।
सूत्राण्यन्ये प्रगृह्णन्ति ह्यायतं शतयोजनम् ॥ ६२ ॥
उन वानरोंने सब मचा दी । कुछ दूसरे हुए थे ॥ ६२ ॥
नलश्चक्रे महासेतुं स तदा क्रियते नल नदों और सेतु का निर्माण कर रहे ओर पत्थर गिराकर समुद्र में हलचल वानर सौ योजन लंबा सूत पकड़े
मध्ये नदनदीपतेः ।
सेतुर्वानरैर्घोरकर्मभिः ॥ ६३ ॥
नदियोंके स्वामी समुद्र के बीचमें महान् थे । भयंकर कर्म करनेवाले वानरोंने मिल - जुलकर उस समय सेतुनिर्माणका कार्य आरम्भ किया था ॥ ६३ ॥
दण्डानन्ये प्रगृह्णन्ति विचिन्वन्ति तथापरे ।
वानरैः शतशस्तत्र रामस्याज्ञापुरःसरैः ॥ ६४ ॥
मेघाभैः पर्वताभैश्व तृणैः काष्ठैर्बबन्धिरे ।
पुष्पिताग्रैश्च तरुभिः सेतुं बध्नन्ति वानराः ॥ ६५ ॥
कोई नापनेके लिये दण्ड पकड़ते थे तो कोई सामग्री जुटाते थे । श्रीरामचन्द्रजीकी आज्ञा शिरोधार्य करके सैकड़ों वानर जो पर्वतों और मेघोंके समान प्रतीत होते थे, वहाँ तिनकों और काष्ठोंद्वारा भिन्न - भिन्न स्थानोंमें पुल बाँध रहे थे । जिनके अग्रभाग फूलोंसे लदे थे, ऐसे वृक्षोंद्वारा भी वे वानर सेतु बाँधते थे ॥ ६४-६५ ॥
पाषाणांश्च गिरिप्रख्यान् गिरीणां शिखराणि च ।
दृश्यन्ते परिधावन्तो गृह्य दानवसंनिभाः ॥ ६६ ॥
पर्वतों जैसी बड़ी - बड़ी चट्टानें और पर्वत शिखर लेकर सब ओर दौड़ते वानर दानवोंके समान दिखायी देते थे ।
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११०८ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे
शिलानां क्षिप्यमाणानां शैलानां तत्र पात्यताम् ।
बभूव तुमुलः शब्दस्तदा तस्मिन् महोदधौ ॥ ६७ ॥
उस समय उस महासागरमें फेंकी जाती हुई शिलाओं और गिराये जाते हुए पहाड़ोंके गिरनेसे बड़ा भीषण शब्द हो रहा था ॥ ६७ ॥
कृतानि प्रथमेनाह्ना योजनानि चतुर्दश ।
प्रहृष्टैर्गजसंकाशैस्त्वरमाणैः प्लवङ्गमैः ॥ ६८ ॥
हाथी के समान विशालकाय वानर बड़े उत्साह और तेजी के साथ काममें लगे हुए थे । पहले दिन उन्होंने चौदह योजन लंबा पुल बाँधा ॥ ६८ ॥
द्वितीयेन तथैवाह्ना योजनानि तु विंशतिः ।
कृतानि प्लवगैस्तूर्ण भीमकायैर्महाबलैः ॥ ६ ९ ॥
फिर दूसरे दिन भयंकर शरीरवाले महाबली वानरोंने तेजीसे काम करके बीस योजन लंबा पुल बाँध दिया ॥ ६ ९ ॥
अह्ना तृतीयेन तथा योजनानि तु सागरे ।
त्वरमाणैर्महाकायैरेकविंशतिरेव च ॥ ७० ॥
तीसरे दिन शीघ्रतापूर्वक काममें जुटे हुए महाकाय कपियोंने समुद्र में इक्कीस योजन लंबा पुल बाँध दिया ॥ ७० ॥
चतुर्थेन तथा चाह्ना द्वाविंशतिरथापि वा ।
योजनानि महावेगैः कृतानि त्वरितैस्ततः ॥ ७१ ॥
चौथे दिन महान् वेगशाली और शीघ्रकारी वानरोंने बाईस योजन लंबा पुल और बाँध दिया ॥ ७१ ॥
पञ्चमेन तथा चाहा प्लवगैः क्षिप्रकारिभिः ।
योजनानि त्रयोविंशत् सुवेलमधिकृत्य वै ॥ ७२ ॥
तथा पाँचवें दिन शीघ्रता करनेवाले उन वानर वीरोंने सुवेल पर्वतके निकटतक तेईस योजन लंबा पुल बाँधा ॥ ७२ ॥
स वानरवरः श्रीमान् विश्वकर्मात्मजो बली ।
बबन्ध सागरे सेतुं यथा चास्य पिता तथा ॥ ७३ ॥
इस प्रकार विश्वकर्माके बलवान् पुत्र कान्तिमान् कपिश्रेष्ठ नलने समुद्र में सौ योजन लंबा पुल तैयार कर दिया । इस कार्यमें वे अपने पिताके समान ही प्रतिभाशाली थे ॥ ७३ ॥
स नलेन कृतः सेतुः सागरे मकरालये ।
शुशुभे सुभगः श्रीमान् स्वातीपथ इवाम्बरे ॥ ७४ ॥
मकरालय समुद्रमें नलके द्वारा निर्मित हुआ वह सुन्दर और शोभाशाली सेतु आकाशमें स्वातीपथ ( छाया-( पथ ) के समान सुशोभित होता था ॥ ७४ ॥
ततो देवाः सगन्धर्वाः सिद्धाश्च परमर्षयः ।
आगम्य गगने तस्थुर्द्रष्टुकामास्तदद्भुतम् ॥ ७५ ॥
उस समय देवता, गन्धर्व, सिद्ध और महर्षि उस अद्भुत कार्य को देखने के लिये आकाशमें आकर खड़े थे ।
दशयोजनविस्तीर्ण शतयोजनमायतम् ।
ददृशुर्देवगन्धर्वा नलसेतुं सुदुष्करम् ॥ ७६ ॥
नलके बनाये हुए सौ योजन लंबे और दस योजन चौड़े उस पुलको देवताओं और गन्धर्वोंने देखा, जिसे बनाना बहुत ही कठिन काम था ॥ ७६ ॥
आप्लवन्तः लवन्तश्च गर्जन्तश्च लवंगमाः ।
तमचिन्त्यमसहांच ह्यद्भुतं लोमहर्षणम् ॥ ७७ ॥
ददृशुः सर्वभूतानि सागरे, सेतुबन्धनम् । वानरलोग भी इधर - उधर उछल - कूदकर गर्जना करते हुए उस अचिन्त्य, असह्य, अद्भुत और रोमाञ्चकारी पुलको देख रहे थे । समस्त प्राणियोंने ही समुद्र में सेतु बाँधने का वह कार्य देखा ॥ ७७३ ॥
तानि कोटिसहस्राणि वानराणां महौजसाम् ॥ ७८ ॥
वध्नन्तः सागरे सेतुं जग्मुः पारं महोदधेः । इस प्रकार उन सहस्र कोटि ( एक खरब ) महाबली एवं उत्साही वानरोंका दल पुल बाँधते - बाँधते ही समुद्रके उस पार पहुँच गया ॥ ७८३ ॥
विशालः सुकृतः श्रीमान् सुभूमिः सुसमाहितः ॥ ७ ९ ॥ अशोभत महान् सेतुः सीमन्त इव सागरे । वह पुल बड़ा ही विशाल, सुन्दरतासे बनाया हुआ, शोभासम्पन्न, समतल और सुसम्बद्ध था । वह महान् सेतु सागरमें सीमन्तके समान शोभा पाता था ॥ ७ ९ ३ ॥ ततः पारे समुद्रस्य गदापाणिर्विभीषणः ॥ ८० ॥
परेषामभिघातार्थमतिष्ठत् सचिवैः सह । पुल तैयार हो जानेपर अपने सचिवोंके साथ विभीषण गदा हाथमें लेकर समुद्रके दूसरे तटपर खड़े हो गये, जिससे शत्रुपक्षीय राक्षस यदि पुल तोड़नेके लिये आवें तो उन्हें दण्ड दिया जा सके ॥ ८०३ ॥
सुग्रीवस्तु ततः प्राह रामं सत्यपराक्रमम् ॥ ८१ ॥
हनूमन्तं त्वमारोह अङ्गदं त्वथ लक्ष्मणः ।
अयं हि विपुलो वीर सागरो मकरालयः ॥ ८२ ॥
वैहायसी युवामेतौ वानरौ धारयिष्यतः । तदनन्तर सुग्रीवने सत्यपराक्रमी श्रीरामसे कहा-वीरवर! आप हनुमान के कंधेपर चढ़ जाइये और लक्ष्मण अङ्गदकी पीठपर सवार हो लें; क्योंकि यह मकरालय समुद्र बहुत लंबा - चौड़ा है । ये दोनों वानर आकाश मार्ग से चलनेवाले हैं । अतः ये ही दोनों आप दोनों भाइयोंको धारण कर सकेंगे ' ॥ ८१-८२३ ॥ अग्रतस्तस्य सैन्यस्य श्रीमान् रामः सलक्ष्मणः ॥ ८३ ॥
जगाम धन्वी धर्मात्मा सुग्रीवेण समन्वितः । इस प्रकार धनुर्धर एवं धर्मात्मा भगवान् श्रीराम
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युद्धकाण्डे त्रयोविंशः सर्गः ११० ९
लक्ष्मण और सुग्रीवके साथ उस सेनाके आगे - आगे चले ।
अन्ये मध्येन गच्छन्ति पार्श्वतोऽन्ये प्लवंगमाः ॥ ८४ ॥
सलिलं प्रपतन्त्यन्ये मार्गमन्ये प्रपेदिरे ।
केचिद् वैहायसगताः सुपर्णा इव पुप्लुवुः ॥ ८५ ॥
दूसरे वानर सेनाके बीच में और अगल - बगलमें होकर चलने लगे । कितने ही वानर जलमें कूद पड़ते और तैरते हुए चलते थे । दूसरे पुलका मार्ग पकड़कर जाते थे और कितने ही आकाशमें उछलकर गरुड़ के समान उड़ते थे ॥ ८४-८५ ॥
घोषेण महता घोषं सागरस्य समुच्छ्रितम् ।
भीममन्तर्दधे भीमा तरन्ती हरिवाहिनी ॥ ८६ ॥
इस प्रकार पार जाती हुई उस भयंकर वानर सेनाने अपने महान् घोषसे समुद्रकी बढ़ी हुई भीषण गर्जनाको भी दबा दिया ॥ ८६ ॥
वानराणां हि सा तीर्णा वाहिनी नलसेतुना ।
तीरे निविविशे राज्ञो बहुमूलफलोदके ॥ ८७ ॥
धीरे - धीरे वानरों की सारी सेना नलके बनाये हुए पुलसे समुद्रके उस पार पहुँच गयी । राजा सुग्रीवने फल, मूल और जलकी अधिकता देख सागरके तटपर ही सेनाका पड़ाव डाला ॥ ८७ ॥
तदद्भुतं राघवकर्म दुष्करं समीक्ष्य देवाः सह सिद्धचारणैः । उपेत्य रामं सहसा महर्षिभि स्तमभ्यषिञ्चन् सुशुभैर्जलैः पृथक् ॥ ८८ ॥
भगवान् श्रीरामका वह अद्भुत और दुष्कर कर्म देखकर सिद्ध, चारण और महर्षियोंके साथ देवतालोग उनके पास आये तथा उन्होंने अलग - अलग पवित्र एवं शुभ जलसे उनका अभिषेक किया ॥ ८८ ॥
जयस्व शत्रून् नरदेव मेदिनीं ससागरां पालय शाश्वतीः समाः । इतीव रामं नरदेवसत्कृतं शुभैर्वचोभिर्विविधैर पूजयन् ॥ ८ ९ ॥ फिर बोले – “ नरदेव! तुम शत्रुओंपर विजय प्राप्त करो और समुद्रपर्यन्त सारी पृथ्वीका सदा पालन करते रहो । ' इस प्रकार भाँति - भाँति के मङ्गलसूचक वचनोंद्वारा राजसम्मानित श्रीरामका उन्होंने अभिनन्दन किया ॥ ८ ९ ॥ इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये युद्धकाण्डे द्वाविंशः सर्गः ॥ २२ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें बाईसवाँ सगँ पूरा हुआ ॥ २२ ॥
त्रयोविंशः सर्गः श्रीरामका लक्ष्मण से उत्पातसूचक लक्षणोंका वर्णन और लङ्कापर आक्रमण
निमित्तानि निमित्तज्ञो दृष्ट्रा लक्ष्मणपूर्वजः ।
सौमित्रिं सम्परिष्वज्य इदं वचनमब्रवीत् ॥ १ ॥
उत्पातसूचक लक्षणोंके ज्ञाता तथा लक्ष्मणके बड़े भाई श्रीरामने बहुत - से अपशकुन देखकर सुमित्राकुमार लक्ष्मणको हृदयसे लगाया और इस प्रकार कहा – ॥ १ ॥
परिगृह्योदकं शीतं वनानि फलवन्ति च ।
बलौघं संविभज्येमं व्यूह्य तिष्ठेम लक्ष्मण ॥ २ ॥
' लक्ष्मण! जहाँ शीतल जलकी सुविधा हो और फलोंसे भरे हुए, जंगल हों, उन स्थानोंका आश्रय लेकर हम अपने सैन्यसमूहको कई भागोंमें बाँट दें और इसे व्यूहबद्ध करके इसकी रक्षा के लिये सदा सावधान रहें ॥ २ ॥
लोकक्षयकरं भीमं भयं पश्याम्युपस्थितम् ।
प्रवीराणामृक्षवानररक्षसाम् ॥ ३ ॥
" मैं देखता हूँ समस्त लोकोंका संहार करनेवाला भीषण भय उपस्थित हुआ है, जो रीछों वानरों और राक्षसोंके प्रमुख वीरोंके विनाशका सूचक हैं ॥ ३ ॥
वाताश्च कलुषा चान्ति कम्पते च वसुंधरा ।
पर्वताग्राणि वेपन्ते पतन्ति च महीरुहाः ॥ ४ ॥
' धूलसे भरी हुई प्रचण्ड वायु चल रही है । धरती काँपती है । पर्वतोंके शिखर हिल रहे हैं और पेड़ गिर रहे हैं ॥ ४ ॥
मेघाः क्रव्यादसंकाशाः परुषाः परुषखनाः ।
क्रूराः क्रूरं प्रवर्षन्ति मिश्रं शोणितविन्दुभिः ॥ ५ ॥
' मेघोंकी घटा घिर आयी है, जो मांसभक्षी राक्षसोंके समान दिखायी देती है । वे मेघ देखने में तो क्रूर हैं, ही इनकी गर्जना भी बड़ी कठोर है । ये क्रूरतापूर्वक रक्तकी बूँदोंसे मिले हुए जलकी वर्षा करते हैं ॥ ५ ॥
रक्तचन्दनसंकाशा संध्या परमदारुणा ।
ज्वलतः प्रपतत्येतदादित्यादग्निमण्डलम् ॥ ६ ॥
" यह संध्या लाल चन्दन के समान कान्ति धारण करके बड़ी भयंकर दिखायी देती है । प्रज्वलित सूर्यसे ये आगकी ज्वालाएँ टूट - टूटकर गिर रही हैं ॥ ६ ॥
दीना दीनस्वराः क्रूराः सर्वतो मृगपक्षिणः ।
प्रत्यादित्यं विनर्दन्ति जनयन्तो महद्भयम् ॥ ७ ॥