Ramayana 2 — पृष्ठ 301–310

वाल्मीकि रामायण — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 301–310

पृष्ठ 301

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१११० श्रीमद्वाल्मीकीय रामायणे ‘ क्रूर पशु और पक्षी दीन आकार धारण कर सूर्य की ओर मुँह करके दीनतापूर्ण स्वरमें चीत्कार करते हुए महान् भय उत्पन्न कर रहे हैं ॥ ७ ॥

रजन्यामप्रकाशस्तु संतापयति चन्द्रमाः ।

कृष्णरक्तांशुपर्यन्तो लोकक्षय इवोदितः ॥ ८ ॥

' रातमें भी चन्द्रमा पूर्णतः प्रकाशित नहीं होते और अपने स्वभाव के विपरीत ताप दे रहे हैं । ये काली और लाल किरणोंसे व्याप्त हो इस तरह उदित हुए हैं, मानो जगत्के प्रलयका काल आ पहुँचा हो ॥ ८ ॥

ह्रस्वो रुक्षोऽप्रशस्तश्च परिवेषस्तु लोहितः ।

आदित्ये विमले नीलं लक्ष्म लक्ष्मण दृश्यते ॥ ९ ॥

' लक्ष्मण! निर्मल सूर्यमण्डलमें नीला चिह्न दिखायी देता है 1 । सूर्यके चारों ओर ऐसा घेरा पड़ा है, जो छोटा, रूखा, अशुभ तथा लाल है ॥ ९ ॥

रजसा महता चापि नक्षत्राणि हतानि च ।

युगान्तमिव लोकानां पश्य शंसन्ति लक्ष्मण ॥ १० ॥

‘ सुमित्रानन्दन! देखो ये तारे बड़ी भारी धूलिराशिसे आच्छादित हो हतप्रभ हो गये हैं, अतएव जगत्के भावी संहारकी सूचना दे रहे हैं ॥ १० ॥

काकाः श्येनास्तथा नीचा गृध्राः परिपतन्ति च ।

शिवाश्चाप्यशुभान् नादान् नदन्ति सुमहाभयान् ॥ ११ ॥

' कौए, बाज तथा अधम गीध चारों ओर उड़ रहे हैं और सियारिनें अशुभसूचक महाभयंकर बोली बोल रही हैं ॥ ११ ॥

शैलैः शूलैश्च खङ्गैश्च विमुक्तैः कपिराक्षसैः ।

भविष्यत्यावृता भूमिर्मासशोणितकर्दमा ॥ १२ ॥

' जान पड़ता है वानरों और राक्षसोंके चलाये हुए शिला-खण्डों, शूलों और तलवारोंसे यह सारी भूमि पट जायगी तथा यहाँ मांस और रक्तकी कीच जम जायगी ॥ १२ ॥

क्षिप्रमद्यैव दुर्धर्षा पुरीं रावणपालिताम् ।

अभियाम जवेनैव सर्वैर्हरिभिरावृताः ॥ १३ ॥

' हमलोग आज ही जितनी जल्दी हो सके, इस रावण-पालित दुर्जय नगरी लङ्कापर समस्त वानरोंके साथ वेगपूर्वक धावा बोल दें ' ॥ १३ ॥

इत्येवमुक्त्वा धन्वी स रामः संग्रामधर्षणः ।

प्रतस्थे पुरतो रामो लङ्कामभिमुखो विभुः ॥ १४ ॥

ऐसा कहकर संग्रामविजयी भगवान् श्रीराम हाथमें धनुष लिये सबसे आगे लङ्कापुरीकी ओर प्रस्थित हुए ॥ १४ ॥

सविभीषणसुग्रीवाः सर्वे ते वानरर्षभाः ।

प्रतस्थिरे विनर्दन्तो धृतानां द्विषतां वधे ॥ १५ ॥

फिर विभीषण और सुग्रीवके साथ वे सभी श्रेष्ठ वानर गर्जना करते हुए युद्धका ही निश्चय रखनेवाले शत्रुओंका वध करनेके लिये आगे बढ़े ॥ १५ ॥

राघवस्य प्रियार्थे तु सुतरां वीर्यशालिनाम् ।

हरीणां कर्मचेष्टभिस्तुतोष रघुनन्दनः ॥ १६ ॥

वे सब - के - सब रघुनाथजीका प्रिय करना चाहते थे । उन बलशाली वानरोंके कर्मों और चेष्टाओंसे रघुकुलनन्दन श्रीराम-को बड़ा संतोष हुआ || १६ ॥ इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये युद्धकाण्डे त्रयोविंशः सर्गः ॥ २३ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्ड में तेईसवाँ स पूरा हुआ ॥ २३ ॥

चतुर्विंशः सर्गः श्रीरामका लक्ष्मणसे लङ्काकी शोभाका वर्णन करके सेनाको व्यूहबद्ध खड़ी होनेके लिये आदेश देना, श्रीरामकी आज्ञा से बन्धनमुक्त हुए शुकका रावणके पास जाकर उनकी सैन्यशक्तिकी प्रबलता बताना तथा रावणका अपने बलकी डींग हाँकना

सा वीरसमिती राज्ञा विरराज व्यवस्थिता ।

शशिना शुभनक्षत्रा पौर्णमासीव शारदी ॥ १ ॥

सुग्रीवने उस वीर वानरसेनाकी यथोचित व्यवस्था की थी । उनके कारण वह वैसी ही शोभा पाती थी, जैसे चन्द्रमा और शुभ नक्षत्रोंसे युक्त शरत्कालको पूर्णिमा सुशोभित हो रही हो ॥ १ ॥

प्रचचाल च वेगेन त्रस्ता चैव वसुंधरा ।

पीड्यमाना बलौघेन तेन सागरवर्चसा ॥ २ ॥

वह विशाल सैन्य समूह समुद्र के समान जान पड़ता था । उसके भारसे दबी हुई वसुधा भयभीत हो उठी और उसके वेगसे डोलने लगी ॥ २ ॥

ततः शुश्रुवुराक्रुष्टं लङ्कायां काननौकसः ।

भेरीमृदङ्गसंघुष्टं तुमुलं लोमहर्षणम् ॥ ३ ॥

तदनन्तर वानरोंने लङ्कामें महान् कोलाहल सुना, जो भेरी और मृदङ्गके गम्भीर घोषसे मिलकर बड़ा ही भयंकर और रोमाञ्चकारी जान पड़ता था ॥ ३ ॥

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युद्धकाण्डे चतुर्विंशः सर्गः ११११

बभूवुस्तेन घोषेण संहृष्टा हरियूथपाः ।

अमृष्यमाणास्तद् घोषं विनेदुर्घोषवत्तरम् ॥ ४ ॥

उस तुमुलनादको सुनकर वानरयूथपति हर्ष और उत्साह-में भर गये और उसे न सह सकने के कारण उससे भी बढ़कर जोर - जोर से गर्जना करने लगे ॥ ४ ॥

राक्षसास्तत् लवंगानां शुश्रुवुस्तेऽपि गर्जितम् ।

नर्दतामिव दृप्तानां मेघानामम्बरे स्वनम् ॥ ५ ॥

राक्षसोंने वानरोंकी वह गर्जना सुनी, जो दर्पमें भरकर सिंहनाद कर रहे थे । उनकी आवाज आकाशमें मेघोंकी गर्जना-के समान जान पड़ती थी ॥ ५ ॥

दृष्ट्रा दाशरथिर्लङ्कां चित्रध्वजपताकिनीम् ।

जगाम मनसा सीतां दूयमानेन चेतसा ॥ ६ ॥

दशरथनन्दन श्रीरामने विचित्र ध्वजा - पताकाओंसे सुशो-भित लङ्कापुरीको देखकर व्यथितचित्तसे मन - ही - मन सीताका स्मरण किया || ६ ||

अत्र सा मृगशावाक्षी रावणेनोपरुध्यते ।

अभिभूता ग्रहेणेव लोहिताङ्गेन रोहिणी ॥ ७ ॥

वे भीतर - ही - भीतर कहने लगे - ' हाय! यहीं वह मृग-लोचना सीता रावणके कैदमें पड़ी है । उसकी दशा मंगलग्रहसे आक्रान्त हुई रोहिणी के समान हो रही है ' ॥ ७ ॥

दीर्घमुष्णं च निःश्वस्य समुद्रीक्ष्य च लक्ष्मणम् ।

उवाच वचनं वीर स्तत्कालहितमात्मनः ॥ ८ ॥

मन - ही - मन ऐसा कहकर वीर श्रीराम गरम - गरम लंबी साँस खींचकर लक्ष्मणकी ओर देखते हुए अपने लिये समया-नुकूल हितकर वचन बोले – ॥ ८ ॥

आलिखन्तीमिवाकाशमुत्थितां पश्य लक्ष्मण ।

मनसेव कृतां लङ्कां नगाये विश्वकर्मणा ॥ ९ ॥

' लक्ष्मण! इस लङ्काकी ओर तो देखो । यह अपनी ऊँचाई से आकाशमें रेखा खींचती हुई - सी जान पड़ती है । जान पड़ता है पूर्वकालमें विश्वकर्माने अपने मनसे ही इस पर्वत -शिखरपर लङ्कापुरीका निर्माण किया है ॥ ९ ॥

विमानैर्बहुभिर्लङ्का संकीर्णा रचिता पुरा ।

विष्णोः पदमिवाकाशं छादितं पाण्डुभिर्घनैः ॥ १० ॥

“ पूर्वकालमें यह पुरी अनेक सतमंजले मकानोंसे भरी - पूरी बनायी गयी थी । इसके श्वेत एवं सघन विमानाकार भवनोंसे भगवान् विष्णु के चरणस्थापनका स्थानभूत आकाश आच्छादित - सा हो गया ॥ १० ॥

पुष्पितैः शोभिता लङ्का वनैश्चित्ररथोपमैः ।

नानापतगसंघुष्टफलपुष्पोपगैः शुभैः ॥ ११ ॥

" फूलोंसे भरे हुए चैत्ररथ बनके सदृश सुन्दर काननोंसे लङ्कापुरी सुशोभित हो रही है । उन काननोंमें नाना प्रकारके पक्षी कलरव कर रहे हैं तथा फलों और फूलोंकी प्राप्ति कराने-के कारण वे बड़े सुन्दर जान पड़ते हैं ॥ ११ ॥

पश्य मत्तविहंगानि प्रलीनभ्रमराणि च ।

कोकिलाकुलखण्डानि दोधवीति शिवोऽनिलः ॥ १२ ॥

' देखो, यह शीतल सुखद वायु इन वनोंको, जिनमें मत-वाले पक्षी चहचहा रहे हैं, भौंरे पत्तों और फूलोंमें लीन हो रहे हैं तथा जिनके प्रत्येक खण्ड कोकिलोंके समूह एवं संगीतसे व्याप्त है, बारंबार कम्पित कर रहा है ' ॥ १२ ॥

इति दाशरथी रामो लक्ष्मणं समभाषत ।

बलं च तत्र विभजच्छास्त्रदृष्टेन कर्मणा ॥ १३ ॥

दशरथनन्दन भगवान् श्रीरामने लक्ष्मणसे ऐसा कहा और युद्ध के शास्त्रीय नियमानुसार सेनाका विभाग किया ॥ १३ ॥

शशास कपिसेनां तां बलादादाय वीर्यवान् ।

अङ्गदः सह नीलेन तिष्ठेदुरसि दुर्जयः ॥ १४ ॥

उस समय श्रीरामने वानरसैनिकोंको यह आदेश दिया-‘ इस विशाल सेनामेंसे अपनी सेनाको साथ लेकर दुर्जय एवं पराक्रमी वीर अङ्गद नीलके साथ वानरसेना के पुरुषव्यूह में हृदय-के स्थानमें स्थित हों ॥ १४ ॥

तिष्ठेद् वानरवाहिन्या वानरौघसमावृतः ।

आश्रितो दक्षिणं पार्श्वमृषभो नाम वानरः ॥ १५ ॥

" इसी तरह ऋषभ नामक वानर कपियोंके समुदायसे घिरे रहकर इस वानर - वाहिनीके दाहिने पार्श्वमें खड़े रहें ॥ १५ ॥

गन्धहस्तीव दुर्धर्षस्तरस्वी गन्धमादनः ।

तिष्ठेद् वानरवाहिन्याः सव्यं पार्श्वमधिष्ठितः ॥ १६ ॥

" जो गन्धहस्त के समान दुर्जय एवं वेगशाली हैं, वे कपि-श्रेष्ठ गन्धमादन वानरसेना के वाम पार्श्व में खड़े हों ॥ १६ ॥

मूर्ध्नि स्थास्याम्यहं यत्तो लक्ष्मणेन समन्वितः ।

जाम्बवांश्च सुषेणश्च वेगदर्शी च वानरः ॥ १७ ॥

ऋक्षमुख्या महात्मानः कुक्षिं रक्षन्तु ते त्रयः । " मैं लक्ष्मणके साथ सावधान रहकर इस व्यूहके मस्तक के स्थानमें खड़ा होऊँगा । जाम्बवान्, सुषेण और वानर वेगदर्शी-तीन महामनस्वी वीर जो रीछोंकी सेना के प्रधान हैं, वे सैन्य-व्यूह के कुक्षिभागकी रक्षा करें ॥ १७३ ॥

जघनं कपिसेनायाः कपिराजोऽभिरक्षतु ।

पश्चार्धमिव लोकस्य प्रचेतास्तेजसा वृतः ॥ १८ ॥

" वानरराज सुग्रीव वानरवाहिनी के पिछले भागकी रक्षा में उसी प्रकार लगे रहें, जैसे तेजस्वी वरुण इस जगत्की पश्चिम दिशाका संरक्षण करते हैं ' ॥ १८ ॥

सुविभक्तमहाव्यूहा महावानररक्षिता ।

पृष्ठ 303

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१११२ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे अनीकिनीसा विबभैौ यथा द्यौः साभ्रसम्प्लवा ॥ १ ९ ॥ इस प्रकार सुन्दरतासे विभक्त हो विशाल व्यूहमें बद्ध हुई वह सेना, जिसकी बड़े - बड़े वानर रक्षा करते थे, मेघोंसे घिरे हुए आकाशके समान जान पड़ती थी ॥ १ ९ ॥

प्रगृह्य गिरिशृङ्गाणि महतश्च महीरुहान् ।

आसेदुर्वानरा लङ्कां मिमर्दयिषवो रणे ॥ २० ॥

बानरलोग पर्वतोंके शिखर और बड़े - बड़े वृक्ष लेकर युद्धके लिये लङ्कापर चढ़ आये । वे उस पुरीको पददलित करके धूलमें मिला देना चाहते थे ॥ २० ॥

शिखरैर्विकिरामैनां लङ्कां मुष्टिभिरेव वा ।

इति स्म दधिरे सर्वे मनांसि हरिपुङ्गवाः ॥ २१ ॥

सभी वानरयूथपति ये ही मनसूत्रे बाँधते थे कि हम लङ्का-पर पर्वत - शिखरोंकी वर्षा करें और लङ्कावासियोंको मुक्कोंसे मार - मारकर यमलोक पहुँचा दें ॥ २१ ॥

ततो रामो महातेजाः सुग्रीवमिदमब्रवीत् ।

सुविभक्तानि सैन्यानि शुक एष विमुच्यताम् ॥ २२ ॥

तदनन्तर महातेजस्वी रामने सुग्रीवसे कहा – “ हमलोगोंने अपनी सेनाओंको सुन्दर ढंगसे विभक्त करके उन्हें व्यू हबद्ध कर लिया है, अतः अब इस शुकको छोड़ दिया जाय ॥ २२ ॥

रामस्य तु वचः श्रुत्वा वानरेन्द्रो महाबलः ।

मोचयामास तं दूतं शुकं रामस्य शासनात् ॥ २३ ॥

श्रीरामचन्द्रजीका यह वचन सुनकर महाबली वानरराजने उनके आदेश से रावणदूत शुकको बन्धनमुक्त करा दिया ॥

मोचितो रामवाक्येन वानरैश्व निपीडितः ।

परमसंत्रस्तो रक्षोधिपमुपागमत् ॥ २४ ॥

शुकः श्रीरामचन्द्रजीकी आज्ञासे छुटकारा पाकर वानरोंसे पीड़ित होनेके कारण अत्यन्त भयभीत हुआ शुक राक्षसराजके पास गया ॥ २४ ॥

रावणः प्रहसन्नेव शुकं वाक्यमुवाच ह ।

किमिमीते सितौ पक्षौ लूनपक्षश्च दृश्यसे ॥ २५ ॥

कच्चिन्नानेकचित्तानां तेषां त्वं वशमागतः । उस समय रावणने हँसते हुए - से ही शुकसे कहा— “ ये तुम्हारी दोनों पाँखें बाँध क्यों दी गयी हैं । इससे तुम इस तरह दिखायी देते हो मानो तुम्हारे पंख नोच लिये गये हों । कहीं तुम उन चञ्चलचित्तवाले वानरोंके चंगुल में तो नहीं फँस गये थे? ' || २५३ ॥

ततः स भयसंविग्नस्तेन राज्ञाभिचोदितः ।

वचनं प्रत्युवाचेदं राक्षसाधिपमुत्तमम् ॥ २६ ॥

राजा रावणके इस प्रकार पूछनेपर भयसे ध्वराये हुए शुकने उस समय उस श्रेष्ठ राक्षसराजको इस प्रकार उत्तर दिया – ॥ २६ ॥

सागरस्योत्तरे तीरेऽब्रुवं ते वचनं तथा ।

यथा संदेशमक्लिष्टं सान्त्वयञ्लक्ष्णया गिरा ॥ २७ ॥

' महाराज! मैंने समुद्रके उत्तर तटपर पहुँचकर आपका संदेश बहुत स्पष्ट शब्दों में मधुर वाणीद्वार सान्त्वना देते हुए सुनाया ॥ २७ ॥

क्रुद्धैस्तैरहमुत्प्लुत्य दृष्टमात्रः लवंगमैः ।

गृहीतोऽस्म्यपि चारब्धो हन्तुं लोप्तु ं च मुष्टिभिः ॥ २८ ॥

' किंतु मुझपर दृष्टि पड़ते ही कुपित हुए वानरोंने उछल-कर मुझे पकड़ लिया और घूसोंसे मारना एवं पाँखें नोचना आरम्भ किया ॥ २८ ॥

न ते संभाषितुं शक्याः सम्प्रश्नोऽत्र न विद्यते ।

प्रकृत्या कोपनास्तीक्ष्णा वानरा राक्षसाधिप ॥ २ ९ ॥

‘ राक्षसराज! ये वानर स्वभावसे ही क्रोधी और तीखे हैं । उनसे बात भी नहीं की जा सकती थी । फिर यह पूछनेका अवसर कहाँ था कि तुम मुझे क्यों मार रहे हो? ॥ २ ९ ॥

स च हन्ता विराधस्य कबन्धस्य खरस्य च ।

सुग्रीवसहितो रामः सीतायाः पदमागतः ॥ ३० ॥

' जो विराध, कबन्ध और खरका वध कर चुके हैं, वे श्रीराम सुग्रीवके साथ सीताके स्थानका पता पाकर उनका उद्धार करनेके लिये आये हैं ॥ ३० ॥

स कृत्वा सागरे सेतुं तीर्त्वा च लवणोदधिम् ।

एष रक्षांसि निर्धूय धन्वी तिष्टति राघवः ॥ ३१ ॥

वे रघुनाथजी समुद्रपर पुल बाँध लवणसागरको पार करके राक्षसोंको तिनकोंके समान समझकर धनुष हाथमें लिये यहाँ पास ही खड़े हैं ॥ ३१ ॥

ऋक्षवानरसङ्घानामनीकानि सहस्रशः ।

गिरिमेघनिकाशानां छादयन्ति वसुंधराम् ॥ ३२ ॥

' पर्वत और मेघोंके समान विशालकाय रीछों और वानर - समूहों की सहस्रों सेनाएँ इस पृथ्वीपर छा गयी हैं ॥ ३२ ॥

राक्षसानां बलैौघस्य वानरेन्द्रबलस्य च ।

नैतयोर्विद्य संधिर्देवदानवयोरिव ॥ ३३ ॥

' देवता और दानवोंमें जैसे मेल होना असम्भव है, उसी प्रकार राक्षसों और वानरराज सुग्रीवके सैनिकोंमें संधि नहीं हो सकती ॥ ३३ ॥

पुरा प्राकारमायान्ति क्षिप्रमेकतरं कुरु ।

सीतां चास्मै प्रयच्छाशु युद्धं वापि प्रदीयताम् ॥ ३४ ॥

‘ अतः जबतक वे लङ्कापुरीकी चहारदिवारीपर नहीं चढ़ आते, उसके पहले ही आप शीघ्रतापूर्वक दोमेंसे एक काम कर डालिये या तो तुरंत ही उन्हें सीताको लौटा दीजिये या फिर सामने खड़े होकर युद्ध कीजिये ' ॥ ३४ ॥

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युद्धकाण्डे पञ्चविंशः सर्गः १११३

शुकस्य वचनं श्रुत्वा रावणो वाक्यमब्रवीत् ।

रोपसंरक्तनयनो निर्दहन्निव चक्षुषा ॥ ३५ ॥

शुककी यह बात सुनकर रावणकी आँखें रोषसे लाल हो गयीं । वह इस तरह घूर घूरकर देखने लगा, मानो

अपनी दृष्टिसे उसको दग्ध कर देगा । वह बोला ॥ ३५ ॥

यदि मां प्रति युद्धेरन् देवगन्धर्वदानवाः ।

नैव सीतां प्रदास्यामि सर्वलोकभयादपि ॥ ३६ ॥

' यदि देवता, गन्धर्व और दानव भी मुझसे युद्ध करनेको तैयार हो जायँ तथा सारे संसारके लोग मुझे भय दिखाने लगें तो भी मैं सीताको नहीं लौटाऊँगा ॥ ३६ ॥

कदा समभिधावन्ति मामका राघवं शराः ।

वसन्ते पुष्पितं मत्ता भ्रमरा इव पादपम् ॥ ३७ ॥

‘ जैसे मतवाले भ्रमर वसन्त ऋतुमें फूलोंसे भरे हुए वृक्षपर टूट पड़ते हैं, उसी प्रकार मेरे बाण कब उस रघुवंशीपर धावा करेंगे? ॥ ३७ ॥

कदा शोणितदिग्धाङ्गं दीप्तैः कार्मुकविच्युतैः ।

शरैरादीपयिष्यामि उल्काभिरिव कुञ्जरम् ॥ ३८ ॥

‘ वह अवसर कब आयेगा जब मेरे धनुषसे छूटे हुए तेजस्वी बाणोंद्वारा घायल होकर रामका शरीर लहूलुहान हो जायगा और जैसे जलती हुई लुकारीसे लोग हाथीको जलाते हैं, उसी तरह मैं उन बाणोंसे रामको दग्ध कर डालूँगा ।

तच्चास्य बलमादास्ये बलेन महता वृतः ।

ज्योतिषामिव सर्वेषां प्रभामुद्यन् दिवाकरः ॥ ३ ९ ॥

जैसे " सूर्य अपने उदयके साथ ही समस्त नक्षत्रोंकी प्रभा हर लेते हैं, उसी प्रकार मैं विशाल सेनाके साथ रणभूमिमें खड़ा हो रामकी समस्त वानर सेनाको आत्मसात् कर लूँगा ॥ ३ ९ ॥

सागरस्येव मे वेगो मारुतस्येव मे बलम् ।

न च दाशरथिर्वेद तेन मां योद्धुमिच्छति ॥ ४० ॥

दशरथकुमार रामने अभी समरभूमिमें समुद्रके समान मेरे वेग और वायुके समान मेरे बलका अनुभव नहीं किया है, इसलिये वह मेरे साथ युद्ध करना चाहता है ॥ ४० ॥

न मे तूणीशयान् वाणान् सविषानिव पन्नगान् ।

रामः पश्यति संग्रामे तेन मां योदुमिच्छति ॥ ४१ ॥

' मेरे तरकसमें सोये हुए बाण विषधर सर्पोंके समान भयंकर हैं । रामने संग्राममें उन बाणोंको देखा ही नहीं है; इसलिये वह मुझसे जूझना चाहता है । ४१ ॥

न जानाति पुरा वीर्य मम युद्धे स राघवः ।

मम चापमयों वीणां शरकोणैः प्रवादिताम् ॥ ४२ ॥

ज्याशब्दतुमुलां घोरामार्तगीतमहास्वनाम् ।

नाराचतलसंनादां नदीमहितवाहिनीम् ।

अवगाह्य महारङ्गं वादयिष्याम्यहं रणे ॥ ४३ ॥

“ पहले कभी युद्धमें रामका मेरे बल पराक्रमसे पाला नहीं पड़ा है, इसीलिये वह मेरे साथ लड़नेका हौसला रखता है । मेरा धनुष एक सुन्दर वीणा है, जो बागोंके कोनोंसे बजायी जाती है । उसकी प्रत्यञ्चासे जो टङ्कारध्वनि उठती है, वही उसकी भयंकर स्वरलहरी है । आतकी चीत्कार और पुकार ही उसपर उच्चस्वरसे गाया जानेवाला गीत है । नाराचोंको छोड़ते समय जो चट - चट शब्द होता है, वही मानो हथेलीपर दिया जानेवाला ताल है । बहती हुई नदीके समान जो शत्रुओंकी वाहिनी है, वही मानो उस संगीतोत्सवके लिये विशाल रंगभूमि है । मैं समराङ्गणमें उस रंगभूमिके भीतर प्रवेश करके अपनी वह भयंकर वीणा बजाऊँगा ॥ ४२-४३ ॥ न वासवेनापि सहस्रचक्षुषा युद्धेऽस्मि शक्यो वरुणेन वा स्वयम् । यमेन वा धर्षयितुं शराग्निना महाहवे वैश्रवणेन वा पुनः ॥ ४४ ॥

' यदि महासमरमें सहस्रनेत्रधारी इन्द्र अथवा साक्षात् वरुण या स्वयं यमराज अथवा मेरे बड़े भाई कुबेर ही आ जायँ तो वे भी अपनी वाणाग्निसे मुझे पराजित नहीं कर सकते ' ॥ ४४ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये युद्धकाण्डे चतुर्विंशः सर्गः ॥ २४ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्ड में चौबीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ २४ ॥

पञ्चविंशः सर्गः रावणका शुक और सारणको गुप्तरूपसे वानरसेनामें भेजना, विभीषणद्वारा उनका पकड़ा जाना, श्रीरामकी कृपासे छुटकारा पाना तथा श्रीरामका संदेश लेकर लङ्का में लौटकर उनका रावणको समझाना सबले सागरं तीर्णे रामे दशरथात्मजे । दशरथनन्दन भगवान् श्रीराम जब सेनासहित समुद्र अमात्यौ रावणः श्रीमानब्रवीच्छुकसारणौ ॥ १ ॥ पार कर चुके, तब श्रीमान् रावणने अपने दोनों

वा ० रा ० ५.८. १४-

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१११४ श्रीमवाल्मीकीय रामायणे मन्त्री शुक और सारणसे फिर कहा – ॥ १ ॥

समग्र सागरं तीर्ण दुस्तरं वानरं बलम् ।

अभूतपूर्व रामेण सागरे सेतुबन्धनम् ॥ २ ॥

यद्यपि समुद्रको पार करना अत्यन्त कठिन था भी सारी वानरसेना उसे लाँघकर इस पार चली आयी । रोमके द्वारा सागरपर सेतुका बाँधा जाना अभूतपूर्व कार्य है ॥ २ ॥

सागरे सेतुबन्धं तं न श्रद्दध्यां कथंचन ।

अवश्यं चापि संख्येयं तन्मया वानरं बलम् ॥ ३ ॥

‘ लोगोंके मुँहसे सुननेपर भी मुझे किसी तरह यह विश्वास नहीं होता कि समुद्रपर पुल बाँधा गया होगा । वानरसेना कितनी है? इसका ज्ञान मुझे अवश्य प्राप्त करना चाहिये ॥ ३ ॥

भवन्तौ वानरं सैन्यं प्रविश्यानुपलक्षितौ ।

परिमाणं च वीर्य च ये च मुख्याः प्लवंगमाः ॥ ४ ॥

मन्त्रिणो ये च रामस्य सुग्रीवस्य च सम्मताः ।

ये पूर्वमभिवर्तन्ते ये च शूराः प्लवंगमाः ॥ ५ ॥

स च सेतुर्यथा वद्धः सागरे सलिलार्णवे निवेशं च यथा तेषां वानराणां महात्मनाम् ॥ ६ ॥

रामस्य व्यवसायं च वीर्य प्रहरणानि च ।

लक्ष्मणस्य च वीरस्य तत्त्वतो ज्ञातुमर्हथः ॥ ७ ॥

कश्च सेनापतिस्तेषां वानराणां महात्मनाम् ।

तच्च ज्ञात्वा यथातत्त्वं शीघ्रमागन्तुमर्हथः ॥ ८ ॥

“ तुम दोनों इस तरह वानर सेनामें प्रवेश करो कि तुम्हें कोई पहचान न सके । वहाँ जाकर यह पता लगाओ कि वानरोंकी संख्या कितनी है? उनकी शक्ति कैसी है? उनमें मुख्य - मुख्य वानर कौन - कौनसे हैं । श्रीराम और सुग्रीवके मनोऽनुकूल मन्त्री कौन - कौन हैं? कौन - कौन शूरवीर वानर सेना के आगे रहते हैं? अगाध जलराशिसे भरे हुए समुद्र में वह पुल किस तरह बाँधा गया? महामनस्वी वानरोंकी छावनी कैसे पड़ी है? श्रीराम और वीर लक्ष्मणका निश्चय क्या है? – वे क्या करना चाहते हैं? उनके बल-पराक्रम कैसे हैं? उन दोनोंके पास कौन - कौनसे अस्त्र - शस्त्र ? और उन महामना वानरोंका प्रधान सेनापति कौन है? इन सब बातोंकी तुमलोग ठीक - ठीक जानकारी प्राप्त करो और सबका यथार्थ ज्ञान हो जानेपर शीघ्र लौट आओ ॥४-८ ॥

इति प्रतिसमादिष्टौ राक्षसौ शुकसारणौ ।

हरिरूपधरौ वीरौ प्रविष्टौ वानरं बलम् ॥ ९ ॥

ऐसा आदेश पाकर दोनों वीर राक्षस शुक और सारण वानररूप धारण करके उस वानरी सेनामें घुस गये ॥ ९ ॥

ततस्तद् वानरं सैन्यमचिन्त्यं लोमहर्षणम् ।

संख्यातुं नाध्यगच्छेतां तदा तौ शुकसारणौ ॥ १० ॥

वानरोंकी वह सेना कितनी है? यह गिनना तो दूर रहा; मनसे उसका अंदाजा लगाना भी असम्भव था । उस अपार सेनाको देखकर रोंगटे खड़े हो जाते थे । उस समय शुक और सारण किसी तरह भी उसकी गणना नहीं कर सके । तत् स्थितं पर्वताग्रेषु निर्झरेषु गुहासु च ।

समुद्रस्य च तीरेषु वनेषूपवनेषु च ।

तरमाणं च तीर्णे च तर्तुकामं च सर्वशः ॥ ११ ॥

वह सेना पर्वतके शिखरोंपर, झरनोंके आसपास, गुफाओंमें, समुद्र के किनारे तथा वनों और उपवनोंमें भी फैली हुई थी । उसका कुछ भाग समुद्र पार कर रहा था, कुछ पार कर चुका था और कुछ सब प्रकारसे समुद्रको पार करनेकी तैयारी में लगा था ॥ ११ ॥

निविष्टं निविशच्चैव भीमनादं महाबलम् ।

तद्वलार्णवमक्षोभ्यं ददृशाते निशाचरौ ॥ १२ ॥

भयंकर कोलाहल करनेवाली वह विशाल सेना कुछ स्थानों पर छावनी डाल चुकी थी और कुछ जगहों पर डालती जा रही थी । दोनों निशाचरोंने देखा, वह वानर-वाहिनी समुद्र के समान अक्षोभ्य थी ॥ १२ ॥

तौ ददर्श महातेजाः प्रतिच्छन्नौ विभीषणः ।

आचचक्षे स रामाय गृहीत्वा शुकसारणौ ॥ १३ ॥

वानरवेशमें छिपकर सेनाका निरीक्षण करते हुए दोनों राक्षस शुक और सारणको महातेजस्वी विभीषणने देखा, देखते ही पहचाना और उन दोनोंको पकड़कर श्रीरामचन्द्र-जीसे कहा – ॥ १३ ॥

तस्यैतौ राक्षसेन्द्रस्य मन्त्रिणौ शुकसारणौ ।

लङ्कायाः समनुप्राप्तौ चारौ परपुरंजय ॥ १४ ॥

' शत्रुनगरीपर विजय पानेवाले नरेश्वर! ये दोनों लङ्का आये हुए गुप्तचर एवं राक्षसराज रावणके मन्त्री शुक तथा सारण हैं ' || १४ ||

तौ दृष्ट्वा व्यथितौ रामं निराशौ जीविते तथा ।

कृताञ्जलिपुटौ भीतौ वचनं चेदमूचतुः ॥ १५ ॥

वे दोनों राक्षस श्रीरामचन्द्रजीको देखकर अत्यन्त व्यथित हुए और जीवनसे निराश हो गये । उन दोनोंके मनमें भय समा गया । वे हाथ जोड़कर इस प्रकार बोले – ॥ १५ ॥

आवामिहागतौ सौम्य रावणप्रहितावुभौ ।

परिज्ञातुं बलं सर्वे तदिदं रघुनन्दन ॥ १६ ॥

' सौम्य! रघुनन्दन! हम दोनोंको रावणने भेजा है और हम इस सारी सेनाके विषय में आवश्यक जानकारी प्राप्त करनेके लिये आये हैं ' ॥ १६ ॥

तयोस्तद् वचनं श्रुत्वा रामो दशरथात्मजः ।

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युद्धकाण्डे पञ्चविंशः सर्गः १११५ अब्रवीत् प्रहसन् वाक्यं सर्वभूतहिते रतः ॥ १७ ॥

उन दोनोंकी वह बात सुनकर सम्पूर्ण प्राणियोंके हितमें लगे रहनेवाले दशरथनन्दन भगवान् श्रीराम हँसते हुए बोले ॥ १७ ॥

यदि दृष्टं बलं सर्व वयं वा सुसमाहिताः ।

यथोक्तं वा कृतं कार्य छन्दतः प्रतिगम्यताम् ॥ १८ ॥

“ यदि तुमने सारी सेना देख ली हो, हमारी सैनिक शक्तिका ज्ञान प्राप्त कर लिया हो तथा रावणके कथनानुसार सब काम पूरा कर लिया हो तो अब तुम दोनों अपनी इच्छा के अनुसार प्रसन्नतापूर्वक लौट जाओ ॥ १८ ॥

अथ किंचिददृष्टं वा भूयस्तद् द्रष्टुमर्हथः ।

विभीषणो वा कात्र्त्स्न्येन पुनः संदर्शयिष्यति ॥ १ ९ ॥

' अथवा यदि अभी कुछ देखना बाकी रह गया हो तो फिर देख लो । विभीषण तुम्हें सब कुछ पुनः पूर्णरूपसे दिखा देंगे ॥१ ९ ॥

न चेदं ग्रहणं प्राप्य भेतव्यं जीवितं प्रति ।

न्यस्तशस्त्रौ गृहीतौ च न दूतौ वधमर्हथः ॥ २० ॥

" इस समय जो तुम पकड़ लिये गये हो, इससे तुम्हें अपने जीवन के विषय में कोई भय नहीं होना चाहिये; क्योंकि शस्त्र-हीन अवस्थामें पकड़े गये तुम दोनों दूत वधके योग्य नहीं हो ॥ २० ॥

प्रच्छन्नौ च विमुञ्चेमा चारौ रात्रिचरावुभौ ।

शत्रुपक्षस्य सततं विभीषण विकर्षिणौ ॥ २१ ॥

' विभीषण! ये दोनों राक्षस रावणके गुप्तचर हैं और छिपकर यहाँका भेद लेनेके लिये आये हैं । ये अपने शत्रुपक्ष ( वानरसेना ) में फूट डालनेका प्रयास कर रहे हैं । अब तो इनका भण्डा फूट ही गया; अतः इन्हें छोड़ दो ॥ २१ ॥

प्रविश्य महतीं लङ्कां भवद्भयां धनदानुजः ।

वक्तव्यो रक्षसां राजा यथोक्तं वचनं मम ॥ २२ ॥

" शुक और सारण! जब तुम दोनों लङ्कामें पहुँचो, तब कुबेरके छोटे भाई राक्षसराज रावणको मेरी ओरसे यह संदेश सुना देना ॥ २२ ॥

यद् बलं त्वं समाश्रित्य सीतां मे हृतवानसि ।

तद् दर्शय यथाकामं ससैन्यश्च सबान्धवः ॥ २३ ॥

‘ रावण! जिस बलके भरोसे तुमने मेरी सीताका अपहरण किया है, उसे अब सेना और बन्धुजनोंसहित आकर इच्छा-नुसार दिखाओ ॥ २३ ॥

श्वः काल्ये नगरीं लङ्कां सप्राकारां सतोरणाम् ।

रक्षसां च बलं पश्य शरैर्विध्वंसितं मया ॥ २४ ॥

' कल प्रातःकाल ही तुम परकोटे और दरवाजोंके सहित लङ्कापुरी तथा राक्षसी सेनाका मेरे बाणोंसे विध्वंस होता देखोगे ॥

क्रोधं भीममहं मोक्ष्ये ससैन्ये त्वयि रावण ।

श्वः काल्ये वज्रवान् वज्रं दानवेष्विव वासवः ॥ २५ ॥

' रावण! जैसे वज्रधारी इन्द्र दानवोंपर अपना वज्र छोड़ते हैं, उसी प्रकार मैं कल सवेरे ही सेनासहित तुमपर अपना भयंकर क्रोध छोडूंगा ' ॥ २५ ॥

इति प्रतिसमादिष्टौ राक्षसौ शुकसारणौ ।

जयेति प्रतिनन्द्यैनं राघवं धर्मवत्सलम् ॥ २६ ॥

आगम्य नगरीं लङ्कामतां राक्षसाधिपम् । भगवान् श्रीरामका यह संदेश पाकर दोनों राक्षस शुक और सारण धर्मवत्सल श्रीरघुनाथजीका ' आपकी जय हो ' ' आप चिरंजीवी हों ' इत्यादि वचनोंद्वारा अभिनन्दन करके लङ्कापुरी-में आकर राक्षसराज रावणसे बोले - ॥ २६ ॥

विभीषणगृहीतौ तु वधार्थ राक्षसेश्वर ॥ २७ ॥

दृष्ट्रा धर्मात्मना मुक्तौ रामेणामिततेजसा । ' राक्षसेश्वर! हमें तो विभीषणने वध करनेके लिये पकड़ लिया था; किंतु जब अमित तेजस्वी धर्मात्मा श्रीरामने देखा, तब हमें छुड़वा दिया ॥ २७३ ॥

एकस्थानगता यत्र चत्वारः पुरुषर्षभाः ॥ २८ ॥

लोकपालसमाः शूराः कृतास्त्रा दृढविक्रमाः ।

रामो दाशरथिः श्रीमालक्ष्मणश्च विभीषणः ॥ २ ९ ॥

सुग्रीवश्च महातेजा महेन्द्रसमविक्रमः ।

एते शक्ताः पुरीं लङ्कां सप्राकारां सतोरणाम् ॥ ३० ॥

उत्पाट्य संक्रामयितुं सर्वे तिष्ठन्तु वानराः । ' दशरथनन्दन श्रीराम, श्रीमान् लक्ष्मण, विभीषण तथा महेन्द्रतुल्य पराक्रमी महातेजस्वी सुग्रीव — ये चारों वीर लोकपालों-के समान शौर्यशाली, दृढ़ पराक्रमी और अस्त्र - शस्त्रोंके ज्ञाता हैं । जहाँ ये चारों पुरुषप्रवर एक जगह एकत्र हो गये हैं, वहाँ विजय निश्चित है । और सब वानर अलग रहें तो भी ये चार ही परकोटे और दरवाजोंके सहित सारी लङ्कापुरीको उखाड़-कर फेंक सकते हैं ॥ २८-३०३ ॥ यादृशं तद्धि रामस्य रूपं प्रहरणानि च ॥ ३१ ॥

वधिष्यति पुरीं लङ्कामेकस्तिष्ठन्तु ते त्रयः । “ श्रीरामचन्द्रजीका जैसा रूप है और जैसे उनके अस्त्र-शस्त्र हैं, उनसे तो यही मालूम होता है कि वे अकेले ही सारी लङ्कापुरीका वध कर डालेंगे । भले ही वे बाकी तीन वीर भी बैठे ही रहें ॥ ३१३ ॥

रामलक्ष्मणगुप्ता सा सुग्रीवेण च वाहिनी ।

बभूव दुर्धर्षतरा सर्वैरपि सुरासुरैः ॥ ३२ ॥

‘ महाराज! श्रीराम, लक्ष्मण और सुग्रीवसे सुरक्षित वह वानरोंकी सेना तो समस्त देवताओं और असुरोंके लिये भी अत्यन्त दुर्जय है ॥ ३२ ॥

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१११६ श्रीमद्वाल्मीकीय रामायणे प्रहृष्टयोधा ध्वजिनी महात्मनां ' महामनस्वी वानर इस समय युद्ध करनेके लिये उत्सुक वनौकसां सम्प्रति योद्धुमिच्छताम् । हैं । उनकी सेना के सभी वीर योद्धा बड़े प्रसन्न हैं । अतः अलं विरोधेन शमो विधीयतां उनके साथ विरोध करनेसे आपको कोई लाभ नहीं होगा । इसलिये संधि कर लीजिये और श्रीरामचन्द्रजीकी सेवामें प्रदीयतां दाशरथाय मैथिली ॥ ३३ ॥ सीताको लौटा दीजिये ' ॥ ३३ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये युद्धकाण्डे पञ्चविंशः सर्गः ॥ २५ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के युद्धकाण्ड में पचीसवाँ सगं पूरा हुआ ॥ २५ ॥

षड्विंशः सर्गः सारणका रावणको पृथक - पृथक्

तद्वचः सत्यमक्लीबं सारणेनाभिभाषितम् ।

निशम्य रावणो राजा प्रत्यभाषत सारणम् ॥ १ ॥

( शुक और ) सारणके ये सच्चे और जोशीले शब्द सुन-कर रावणने सारणसे कहा -- ॥ १ ॥

यदि मामभियुञ्जीरन्न देवगन्धर्वदानवाः ।

नैव सीतामहं दद्यां सर्वलोकभयादपि ॥ २ ॥

' यदि देवता, गन्धर्व और दानव भी मुझसे युद्ध करने आ जायँ और समस्त लोक भय दिखाने लगे तो भी मैं सीता को नहीं दूँगा || २ ||

त्वं तु सौम्य परित्रस्तो हरिभिः पीडितो भृशम् ।

प्रतिप्रदानमद्यैव सीतायाः साधु मन्यसे ॥ ३ ॥

कोहि नाम सपत्नो मां समरे जेतुमर्हति । " सौम्य! जान पड़ता है कि तुम्हें बंदरोंने बहुत तंग किया है । इसीसे भयभीत होकर तुम आज ही सीताको लौटा देना ठीक समझने लगे हो । भला कौन ऐसा शत्रु है, जो समराङ्गणमें मुझे जीत सके ' ॥ ३३ ॥

इत्युक्त्वा परुषं वाक्यं रावणो राक्षसाधिपः ॥ ४ ॥

आरुरोह ततः श्रीमान् प्रासादं हिमपाण्डुरम् ।

बहुतालसमुत्सेधं रावणोऽथ दिदृक्षया ॥ ५ ॥

ऐसा कठोर वचन कहकर श्रीमान् राक्षसराज रावण वानरोंकी सेनाका निरीक्षण करनेके लिये अपनी कई ताल ऊँची और बर्फ के समान श्वेत रंगकी अट्टालिकापर चढ़ गया । ४-५ ।

ताभ्यां चराभ्यां सहितो रावणः क्रोधमूर्चिछतः ।

पश्यमानः समुद्रं तं पर्वतांश्च वनानि च ॥ ६ ॥

ददर्श पृथिवीदेशं सुसम्पूर्ण लवंगमैः । उस समय रावण क्रोधसे तमतमा उठा था । उसने उन दोनों गुप्तचरोंके साथ जब समुद्र, पर्वत और वनोंपर दृष्टिपात किया, तब पृथ्वीका सारा प्रदेश वानरोंसे भरा दिखायी दिया ॥ ६३ ॥

वानरयूथपतियोंका परिचय देना तदपारमसां च वानराणां महाबलम् ॥ ७ ॥

आलोक्य रावणो राजा परिपप्रच्छ सारणम् । वानरोंकी वह विशाल सेना अपार और असह्य थी । उसे देखकर राजा रावणने सारणसे पूछा ॥ ७३ ॥

एषां के वानरा मुख्याः के शूराः के महाबलाः ॥ ८ ॥

' सारण! इन वानरोंमें कौन - कौनसे मुख्य हैं? कौन शूर-वीर हैं और कौन बलमें बहुत बढ़े- चढ़े हैं? ॥ ८ ॥

के पूर्वमभिवर्तन्ते महोत्साहाः समन्ततः ।

केषां श्रुणोति सुग्रीवः के वा यूथपयूथपाः ॥ ९ ॥

सारणाचक्ष्व मे सर्व किंप्रभावाः प्लवंगमाः । " कौन - कौनसे वानर महान् उत्साहसे सम्पन्न होकर युद्धमें आगे - आगे रहते हैं? सुग्रीव किनकी बातें सुनते हैं और कौन यूथपतियोंके भी यूथपति हैं? सारण! ये सारी बातें मुझे बताओ । साथ ही यह भी कहो कि उन वानरोंका प्रभाव कैसा है? ' ॥ ९ ३ ॥ सारणो राक्षसेन्द्रस्य वचनं परिपृच्छतः ॥ १० ॥

आवभाषेऽथ मुख्यज्ञो मुख्यांस्तत्र वनौकसः । इस प्रकार पूछते हुए राक्षसराज रावणका वचन सुनकर मुख्य - मुख्य वानरोंको जाननेवाले सारणने उन मुख्य वानरोंका परिचय देते हुए कहा – ॥ १०३ ॥

एष योऽभिमुखो लङ्कां नर्दस्तिष्टति वानरः ॥ ११ ॥

यूथपानां सहस्राणां शतेन परिवारितः ।

यस्य घोषेण महता सप्राकारा सतोरणा ॥ १२ ॥

लङ्का प्रतिहता सर्वा सशैलवनकानना ।

सर्वशाखामृगेन्द्रस्य सुग्रीवस्य महात्मनः ॥ १३ ॥

बलाने तिष्ठते वीरो नीलो नामैष यूथपः । ' महाराज! यह जो लङ्काकी ओर मुख करके खड़ा है और गरज रहा है, एक लाख यूथपोंसे घिरा हुआ है तथा जिसकी गर्जनाके अत्यन्त गम्भीर घोषसे परकोटे, दरवाजे, पर्वत और वनोंके सहित सारी लङ्का प्रतिहत हो गूँज उठी है,

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युद्धकाण्डे षड्विंशः सर्गः १११७ इसका नाम नील है । यह वीर यूथपतियोंमेंसे है । समस्त वानरों के राजा महामना सुग्रीवकी सेना के आगे यही खड़ा होता है ॥ ११-१३३ ॥ बाह्र प्रगृह्य यः पद्भ्यां महीं गच्छति वीर्यवान् ॥ १४ ॥

लङ्कामभिमुखः कोपादभीक्ष्णं च विजृम्भते ।

गिरिश्टङ्गप्रतीकाशः पद्मकिंजल्कसंनिभः ॥ १५ ॥

स्फोटयत्यतिसंरब्धो लाङ्गूलं च पुनः पुनः ।

यस्य लाङ्गलशब्देन स्वनन्ति प्रदिशो दश ॥ १६ ॥

एष वानर राजेन सुग्रीवेणाभिषेचितः ।

युवराजोऽङ्गदो नाम त्वामाह्वयति संयुगे ॥ १७ ॥

‘ जो पराक्रमी वानर दोनों उठी हुई बाँहाँको एक दूसरी-से पकड़कर दोनों पैरोंसे पृथ्वीपर टहल रहा है, लङ्काकी ओर मुख करके क्रोधपूर्वक देखता है और बारंबार अँगड़ाई लेता है, जिसका शरीर पर्वतशिखरके समान ऊँचा है, जिसकी कान्ति कमलकेसरके समान सुनहले रंगकी है, जो रोषसे भर कर बारंबार अपनी पूँछ पटक रहा है तथा जिसकी पूँछके पटकनेकी आवाजसे दसों दिशाएँ गूँज उठती हैं, यह युव-राज अङ्गद है । वानरराज सुग्रीवने इसका युवराज के पद पर अभिषेक किया है । यह अपने साथ युद्धके लिये आपको लल-कारता है ॥ १४-१७ ॥

वालिनः सदृशः पुत्रः सुग्रीवस्य सदा प्रियः ।

राघवार्थे पराक्रान्तः शक्रार्थे वरुणो यथा ॥ १८ ॥

' वालीका यह पुत्र अपने पिताके समान ही बलशाली है । सुग्रीवको यह सदा ही प्रिय है । जैसे वरुण इन्द्रके लिये पराक्रम प्रकट करते हैं, उसी प्रकार यह श्रीरामचन्द्रजीके लिये अपना पुरुषार्थ प्रकट करनेके लिये उद्यत है ॥ १८ ॥

एतस्य सा मतिः सर्वा यद् दृष्टा जनकात्मजा ।

हनूमता वेगवता राघवस्य हितैषिणा ॥ १ ९ ॥

' श्रीरघुनाथजीका हित चाहनेवाले वेगशाली हनुमानजीने जो यहाँ आकर जनकनन्दिनी सीताका दर्शन किया, उसके भीतर इस अङ्गदकी ही सारी बुद्धि काम कर रही थी ॥ १ ९ ॥

बहूनि वानरेन्द्राणामेष यूथानि वीर्यवान् ।

परिगृह्याभियाति त्वां स्वेनानीकेन मर्दितुम् ॥ २० ॥

‘ पराक्रमी अङ्गद वानरशिरोमणियोंके बहुत - से यूथ लिये अपनी सेनाके साथ आपको कुचल डालनेके लिये आ रहा है ॥ २० ॥

अनुवालिसुतस्यापि बन महता वृतः ।

वीरस्तिष्ठति संग्रामे सेतुहेतुरयं नलः ॥ २१ ॥

' अङ्गदके पीछे संग्रामभूमिमें जो वीर विशाल सेनासे घिरा हुआ खड़ा है, इसका नाम नल है । यही सेतु निर्माणका प्रधान हेतु है ॥ २१ ॥

ये तु विष्टभ्य गात्राणि क्ष्वेडयन्ति नदन्ति च ।

उत्थाय च विजृम्भते क्रोधेन हरिपुङ्गवाः ॥ २२ ॥

एते दुष्प्रसहा घोराश्चण्डाश्चण्ड पराक्रमाः ।

अष्टौ शतसहस्राणि दशकोटिशतानि च ।

य एनमनुगच्छन्ति वीराश्चन्दनवासिनः ॥ २३ ॥

एवैवाशंसते लङ्कां स्वेनानीकेन मर्दितुम् । ' जो अपने अङ्गोंको सुस्थिर करके सिंहनाद करते और गर्जते हैं तथा जो कपिश्रेष्ठ वीर अपने आसनोंसे उठकर क्रोध-पूर्वक अँगड़ाई लेते हैं, इनके वेगको सह लेना अत्यन्त कठिन है । ये बड़े भयंकर, अत्यन्त क्रोधी और प्रचण्ड पराक्रमी हैं । इनकी संख्या दस अरब और आठ लाख है । ये सब वानर तथा चन्दनवनमें निवास करनेवाले वीर वानर इस यूथ-पति नलका ही अनुसरण करते हैं । यह नल भी अपनी सेना-द्वारा लङ्कापुरीको कुचल देनेका हौसला रखता है ॥२२-२३३ ॥ श्वेतो रजतसंकाशश्चपलो भीमविक्रमः ॥ २४ ॥

बुद्धिमान् वानरः शूरस्त्रिषु लोकेषु विश्रुतः ।

तूर्ण सुग्रीवमागम्य पुनर्गच्छति वानरः ॥ २५ ॥

विभजन् वानरी सेनामनीकानि प्रहर्षयन् । " यह जो चाँदीके समान सफेद रंगका चञ्चल वानर दिखायी देता है, इसका नाम श्वेत है । यह भयंकर पराक्रम करनेवाला, बुद्धिमान्, शूरवीर और तीनों लोकोंमें विख्यात है । श्वेत बड़ी तेजीसे सुग्रीवके पास आकर फिर लौट जाता है । यह वानरीसेनाका विभाग करता और सैनिकों में हर्ष तथा उत्साह भरता है ॥ २४-२५३ ॥ यः पुरा गोमतीतीरे रम्यं पर्येति पर्वतम् ॥ २६ ॥

नाम्ना संरोचनो नाम नानानगयुतो गिरिः ।

तत्र राज्यं प्रशास्त्येष कुमुदो नाम यूथपः ॥ २७ ॥

“ गोमती तटपर जो नाना प्रकारके वृक्षोंसे युक्त संरोचन नामक पर्वत है, उसी रमणीय पर्वतके चारों ओर जो पहले विचरा करता था और वहीं अपने वानरराज्यका शासन करता था, वही यह कुमुदनामक यूथपति है ॥ २६-२७ ॥

योऽसौ शतसहस्राणि सहर्ष परिकर्षति ।

यस्य वाला बहुव्यामा दीर्घलाङ्गलमाश्रिताः ॥ २८ ॥

ताम्राः पीताः सिताः श्वेताः प्रकीर्णा घोरदर्शनाः ।

अदीनो वानरश्चण्डः संग्राममभिकाङ्क्षति ।

एषोऽप्याशंसते लङ्कां स्वेनानीकेन मर्दितुम् ॥ २ ९ ॥

" वह जो लाखों वानर सैनिकों को सहर्ष अपने साथ खींचे लाता है, जिसकी लंबी दुममें बहुत बड़े - बड़े लाल, पीले, भूरे और सफेद रंगके वाल फैले हुए हैं और देखने में बड़े भयंकर हैं तथा जो कभी दीनता न दिखाकर सदा युद्धकी ही इच्छा रखता है, उस वानरका नाम चण्ड है । यह चण्ड भी अपनी सेनाद्वारा लङ्काको कुचल देनेकी इच्छा रखता है ॥ २८-२९ ॥

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१११८ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे

यस्त्वेष सिंहसंकाशः कपिलो दीर्घकेसरः ।

निभृतः प्रेक्षते लङ्कां दिधक्षन्निव चक्षुषा ॥ ३० ॥

विन्ध्यं कृष्णगिरिं सह्यं पर्वतं च सुदर्शनम् ।

राजन् सततमध्यास्ते स रम्भो नाम यूथपः ।

शतं शतसहस्राणां त्रिंशच्च हरिपुङ्गवाः ॥ ३१ ॥

यं यान्तं वानरा घोराश्चण्डाश्चण्ड पराक्रमाः ।

परिवार्यानुगच्छन्ति लङ्कां मर्दितुमोजसा ॥ ३२ ॥

' राजन्! जो सिंहके समान पराक्रमी और कपिल वर्णका है, जिसकी गर्दन में लंबे - लंबे वाल हैं और जो ध्यान लगाकर लङ्काकी ओर इस प्रकार देख रहा है, मानो इसे भस्म कर देगा, वह रम्भनामक यूथपति है । वह निरन्तर विन्ध्य, कृष्ण-गिरि, सह्य और सुदर्शन आदि पर्वतोंपर रहा करता है । जब वह युद्धके लिये चलता है, उस समय उसके पीछे एक करोड़ तीस श्रेष्ठ भयंकर, अत्यन्त क्रोधी और प्रचण्ड पराक्रमी वानर चलते । वे सब - के - सब अपने बलसे लङ्काको मसल डालनेके लिये रम्भको सब ओरसे घेरे हुए आ रहे हैं । ३०-३२ ॥

यस्तु कर्णौ विवृणुते जृम्भते च पुनः पुनः ।

न तु संविजते मृत्योर्न च सेनां प्रधावति ॥ ३३ ॥

प्रकम्पते च रोषेण तिर्यक् च पुनरीक्षते ।

पश्य लाङ्गलविक्षेपं क्ष्वेडत्येष महाबलः ॥ ३४ ॥

" जो कानोंको फैलाता है, बारंबार जँभाई लेता है, मृत्युसे भी नहीं डरता है और सेनाके पीछे न जाकर अर्थात् सेनाका भरोसा न करके अकेले ही युद्ध करना चाहता है, रोषसे काँप रहा है, तिरछी नजरसे देखता है और पूँछ

फटकारकर सिंहनाद करता है, इसका नाम शरभ है ।

देखिये, यह महाबली वानर कैसी गर्जना करता है ॥३३-३४ ॥

महाजवो वीतभयो रम्यं साल्वेयपर्वतम् ।

राजन् सततमध्यास्ते शरभो नाम यूथपः ॥ ३५ ॥

‘ इसका वेग महान् है । भय तो इसे छू तक नहीं गया है । राजन्! यह यूथपति शरभ सदा रमणीय साल्वेय पर्वतपर

निवास करता है । ३५ ॥

एतस्य बलिनः सर्वे विहारा नाम यूथपाः ।

राजछतसहस्राणि चत्वारिंशत्तथैव च ॥ ३६ ॥

" इसके पास जो यूथपति हैं, उन सबकी ' विहार ' संज्ञा है । वे बड़े बलवान् हैं । राजन्! उनकी संख्या एक लाख चालीस हजार है ॥ ३६ ॥

यस्तु मेघ इवाकाशं महानावृत्य तिष्ठति ।

मध्ये वानरवीराणां सुराणामिव वासवः ॥ ३७ ॥

भेरीणामिव संनादो यस्यैव श्रूयते महान् ।

घोषः शाखामृगेन्द्राणां संग्राममभिकाङ्क्षताम् ॥ ३८ ॥

एष पर्वतमध्यास्ते पारियात्रमनुत्तमम् ।

युद्धे दुष्प्रसहो नित्यं पनसो नाम यूथपः ॥ ३ ९ ॥

एनं शतसहस्राणां शतार्ध पर्युपासते ।

यूथपा यूथपश्रेष्ठं येषां यूथानि भागशः ॥ ४० ॥

' जो विशाल वानर मेघ के समान आकाशको घेरे हुए खड़ा है तथा वानरवीरोंके बीच में ऐसा जान पड़ता है, जैसे देवताओंमें इन्द्र हों, युद्धकी इच्छावाले वानरोंके बीचमें जिसकी गम्भीर गर्जना ऐसी सुनायी देती है, मानो बहुत - सी भेरियोंका तुमुल नाद हो रहा हो, तथा जो युद्धमें दुःसह है, वह ' पनस ' नामसे प्रसिद्ध यूथपति है । यह पनस परम उत्तम परियात्र पर्वतपर निवास करता है । यूथपतियोंमें श्रेष्ठ पनसकी सेवामें पचास लाख यूथपति रहते हैं, जिनके अपने - अपने यूथ अलग - अलग हैं ॥ ३७-४० ॥

यस्तु भीमां प्रवल्गन्तीं चमूं तिष्ठति शोभयन् ।

स्थितां तीरे समुद्रस्य द्वितीय इव सागरः ॥ ४१ ॥

एष दर्दुरसंकाशो विनतो नाम यूथपः ।

पिबंश्वरति यो वेणां नदीनामुत्तमां नदीम् ॥ ४२ ॥

षष्टिः शतसहस्राणि बलमस्य लवंगमाः । " जो समुद्र के तटपर स्थित हुई इस उछलती - कूदती भीषण सेनाको दूसरे मूर्तिमान् समुद्रकी भाँति सुशोभित करता हुआ खड़ा है, वह दर्दुरे पर्वतके समान विशाल-काय वानर विनत नामसे प्रसिद्ध यूथपति है । वह नदियों में

श्रेष्ठ वेणा नदीका पानी पीता हुआ विचरता है ।

वानर उसके सैनिक हैं ॥ ४१-४२३ ॥

त्वामाह्वयति युद्धाय क्रोधनो नाम वानरः ॥ ४३ ॥

विक्रान्ता बलवन्तश्च यथा यूथानि भागशः । " जो युद्धके लिये सदा आपको ललकारता रहता है तथा जिसके पास बल- विक्रमशाली अनेक यूथपति रहते हैं । और उन यूथपतियोंके पास पृथक् - पृथक् बहुत - से वह ' क्रोधन ' नामसे प्रसिद्ध वानर है ॥ ४३३ ॥

यस्तु गैरिकवर्णाभं वपुः पुष्यति वानरः अवमत्य सदा सर्वान् वानरान् बलदर्पितः गवयो नाम तेजस्वी त्वां क्रोधादभिवर्तते एनं शतसहस्राणि सप्ततिः पर्युपासते एषैवाशंसते लङ्कां स्वेनानीकेन मर्दितुम् यूथ हैं, ॥ ४४ ॥

॥ ४५ ॥

॥ ४६ ॥

" वह जो गेरुके समान लाल रंगके शरीरका पोषण करता है, उस तेजस्वी वानरका नाम गवय ' है । उसे अपने बलपर बड़ा घमंड है । वह सदा सब वानरोंका तिरस्कार किया करता है । देखिये, कितने रोषसे वह आपकी ओर बढ़ा आ रहा है । इसकी सेवामें सत्तर लाख वानर रहते हैं । यह भी अपनी सेनाके द्वारा लङ्काको धूलमें मिला देनेकी इच्छा रखता है ॥ ४४-४६ ॥ एते दुष्प्रसहा वीरा येषां संख्या न विद्यते ।

पृष्ठ 310

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युद्धकाण्डे सप्तविंशः सर्गः १११ ९ यूथपा यूथपश्रेष्ठास्तेषां यूथानि भागशः ॥ ४७ ॥ करना भी असम्भव है । यूथपतियोंमें श्रेष्ठ जो यूथप हैं,

“ ये सारे - के - सारे वानर दुःसह वीर हैं । इनकी गणना उन सबके अलग - अलग यूथ हैं ' || ४७ || इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये युद्धकाण्डे षड्विंशः सर्गः ॥ २६ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें छब्बीसवाँ सगँ पूरा हुआ ॥ २६ ॥

सप्तविंशः सर्गः वानरसेना के प्रधान

तांस्तु ते सम्प्रवक्ष्यामि प्रेक्षमाणस्य यूथपान् ।

राघवार्थे पराक्रान्ता ये न रक्षन्ति जीवितम् ॥ १ ॥

( सारणने कहा- ) ( राक्षसराज! आप वानरसेनाका निरीक्षण कर रहे हैं, इसलिये मैं आपको उन यूथपतियों का परिचय दे रहा हूँ, जो श्रीरघुनाथजीके लिये पराक्रम करनेको उद्यत हैं और अपने प्राणोंका मोह नहीं रखते हैं ॥ १ ॥

स्निग्धा यस्य बहुव्यामा दीर्घलाङ्गलमाश्रिताः ।

ताम्राः पीताः सिताः श्वेताः प्रकीर्णा घोरकर्मणः ॥ २ ॥

प्रगृहीताः प्रकाशन्ते सूर्यस्येव मरीचयः ।

पृथिव्यां चानुकृष्यन्ते हरो नामैष वानरः ॥ ३ ॥

यं पृष्ठतोऽनुगच्छन्ति शतशोऽथ सहस्रशः ।

वृक्षानुद्यम्य सहसा लङ्कारोहणतत्पराः ॥ ४ ॥

यूथपा हरिराजस्य किंकराः समुपस्थिताः । ' इधर यह हर नामका वानर है । भयंकर कर्म करनेवाले इस वानरकी लंबी पूँछपर लाल, पीले, भूरे और सफेद रंगके साढ़े तीन - तीन हाथ बड़े - बड़े चिकने रोएँ हैं । ये इधर - उधर फैले हुए रोम उठे होनेके कारण सूर्यकी किरणोंके समान चमक रहे हैं तथा चलते समय भूमिपर लोटते रहते हैं । इसके पीछे वानरराजके किंकर रूप सैकड़ों और हजारों यूथपति उपस्थित हो वृक्ष उठाये सहसा लङ्कापर आक्रमण करनेके लिये चले आ रहे हैं ॥ २-४३ ॥ नीलानिव महामेघांस्तिष्ठतो यांस्तु पश्यसि ॥ ५ ॥

असिताञ्जनसंकाशान् युद्धे सत्यपराक्रमान् ।

असंख्येयाननिर्देशान् परं पारमिवोदधेः ॥ ६ ॥

पर्वतेषु च ये केचिद् विषयेषु नदीषु च ।

एते त्वामभिवर्तन्ते राजन्नृक्षाः सुदारुणाः ॥ ७ ॥

एषां मध्ये स्थितो राजन् भीमाक्षो भीमदर्शनः ।

पर्जन्य इव जीमूतैः समन्तात् परिवारितः ॥ ८ ॥

ऋक्षवन्तं गिरिश्रेष्ठमध्यास्ते नर्मदां पिबन् ।

सर्वक्षणामधिपतिर्धूम्रो नामैष यूथपः ॥ ९ ॥

' उधर नील महामेघ और अञ्जनके समान काले रंगके जिन रीछोंको आप खड़े देख रहे हैं, वे युद्ध में सच्चा पराक्रम प्रकट करनेवाले हैं । समुद्रके दूसरे तटपर स्थित हुए यूथपतियोंका परिचय बालुका- कणोंके समान इनकी गणना नहीं की जा सकती, इसीलिये पृथक् - पृथक् नाम लेकर इनके विषयमें कुछ बताना सम्भव नहीं है । ये सब पर्वतों, विभिन्न देशों और नदियोंके तोंपर रहते हैं । राजन्! ये अत्यन्त भयंकर स्वभाववाले रीछ आपपर चढ़े आ रहे हैं । इनके बीचमें इनका राजा खड़ा है, जिसकी आँखें बड़ी भयानक और जो दूसरोंके देखने में भी बड़ा भयंकर जान पड़ता है । वह काले मेघोंसे घिरे हुए इन्द्रकी भाँति चारों ओरसे इन रीछोंद्वारा घिरा हुआ है । इसका नाम धूम्र है । यह समस्त रीछोंका राजा और यूथपति है । यह रीछराज धूम्र पर्वतश्रेष्ठ ऋक्षवान्पर रहता और नर्मदाका जल पीता है ॥ ५ - ९ ॥

यवीयानस्य तु भ्राता पश्यैनं पर्वतोपमम् ।

भ्रात्रा समानो रूपेण विशिष्टस्तु पराक्रमे ॥ १० ॥

स एष जाम्बवान् नाम महायूथपयूथपः ।

प्रशान्तो गुरुवर्ती च सम्प्रहारेष्वमर्षणः ॥ ११ ॥

" इस धूम्रके छोटे भाई जाम्बवान् हैं, जो महान् यूथपतियोंके भी यूथपति हैं । देखिये ये कैसे पर्वताकार दिखायी देते हैं । ये रूपमें तो अपने भाईके समान ही हैं; किंतु पराक्रम में उससे भी बढ़कर हैं । इनका स्वभाव शान्त है । ये बड़े भाई तथा गुरुजनोंकी आज्ञाके अधीन रहते हैं और उनकी सेवा करते हैं । युद्धके अवसरोंपर इनका रोष और अमर्ष बहुत बढ़ जाता है ॥ १०-११ ॥

एतेन साह्यं तु महत् कृतं शक्रस्य धीमता ।

दैवासुरे जाम्बवता लब्धाश्च बहवो वराः ॥ १२ ॥

" इन बुद्धिमान् जाम्बवान्ने देवासुर संग्राममें इन्द्रकी बहुत बड़ी सहायता की थी और उनसे इन्हें बहुत - से वर भी प्राप्त हुए थे ॥ १२ ॥

आरुह्य पर्वताग्रेभ्यो महाभ्रविपुलाः शिलाः ।

मुञ्चन्ति विपुलाकारान मृत्योरुद्विजन्ति च ॥ १३ ॥

राक्षसानां च सदृशाः पिशाचानां च रोमशाः ।

एतस्य सैन्या बहवो विचरन्त्यमितौजसः ॥ १४ ॥

" इनके बहुत - से सैनिक विचरते हैं, जिनके बल - पराक्रमकी कोई सीमा नहीं है । इन सबके शरीर बड़ी - बड़ी रोमावलियोंसे