श्रीगणेशाय नमः।

वाल्मीकि रामायण — खण्ड २ — पृष्ठ 311–320

वाल्मीकि रामायण — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 311–320

पृष्ठ 311

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११२० श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे भरे हुए हैं । ये राक्षसों और पिशाचोंके समान क्रूर हैं और बड़े - बड़े पर्वत - शिखरों पर चढ़कर वहाँसे महान् मेघों के समान

विशाल एवं विस्तृत शिलाखण्ड शत्रुओंपर छोड़ते हैं ।

इन्हें मृत्युसे कभी भय नहीं होता ॥ १३-१४ ॥

य पनमभिसंरब्धं लवमानमवस्थितम् ।

प्रेक्षन्ते वानराः सर्वे स्थिता यूथपयूथपम् ॥ १५ ॥

एष राजन् सहस्राक्षं पर्युपास्ते हरीश्वरः ।

बलेन बलसंयुक्तो दम्भो नामैष यूथपः ॥ १६ ॥

' जो खेल - खेल में ही कभी उछलता और कभी खड़ा होता है, वहाँ खड़े हुए सब वानर जिसकी ओर आश्चर्य-पूर्वक देखते हैं, जो यूथपतियोंका भी सरदार है और रोपसे भरा दिखायी देता है, यह दम्भ नामसे प्रसिद्ध यूथपति है । इसके पास बहुत बड़ी सेना है । राजन्! यह वानरराज दम्भ अपनी सेनाद्वारा ही सहस्राक्ष इन्द्रकी उपासना करता है — उनकी सहायताके लिये सेनाएँ भेजता रहता है ॥१५-१६ ॥

यः स्थितं योजने शैलं गच्छन् पाश्र्वेन सेवते ।

ऊर्ध्व तथैव कायेन गतः प्राप्नोति योजनम् ॥ १७ ॥

यस्मात् तु परमं रूपं चतुष्पात्सु न विद्यते ।

श्रुतः संनादनो नाम वानराणां पितामहः ॥ १८ ॥

येन युद्धं तदा दत्तं रणे शक्रस्य धीमता ।

पराजयश्च न प्राप्तः सोऽयं यूथपयूथपः ॥ १ ९ ॥

‘ जो चलते समय एक योजन दूर खड़े हुए पर्वतको भी अपने पार्श्वभागसे छू लेता है और एक योजन ऊँचेकी वस्तुतक अपने शरीरसे ही पहुँचकर उसे ग्रहण कर लेता है, चौपायोंमें जिससे बड़ा रूप कहीं नहीं है, वह वानर संनादन नामसे विख्यात है । उसे वानरोंका पितामह कहा जाता है । उस बुद्धिमान् वानरने किसी समय इन्द्रको अपने साथ युद्धका अवसर दिया था, किंतु वह उनसे परास्त नहीं हुआ था, वही यह यूथपतियों का भी सरदार है ॥ १७-१९ ॥

यस्य विक्रममाणस्य शक्रस्येव पराक्रमः ।

एष गन्धर्वकन्यायामुत्पन्नः कृष्णवर्त्मना ॥ २० ॥

तदा देवासुरे युद्धे साह्यार्थ त्रिदिवौकसाम् ।

यत्र वैश्रवणो राजा जम्बूमुपनिषेवते ॥ २१ ॥

यो राजा पर्वतेन्द्राणां बहुकिंनरसेविनाम् ।

विहारसुखदो नित्यं भ्रातुस्ते राक्षसाधिप ॥ २२ ॥

तत्रैष रमते श्रीमान् बलवान् वानरोत्तमः ।

युद्धेष्वकत्थनो नित्यं कथनो नाम यूथपः ॥ २३ ॥

वृतः कोटिसहस्रेण हरीणां समवस्थितः ।

एवैवाशंसते लङ्कां स्वेनानीकेन मर्दितुम् ॥ २४ ॥

" युद्ध के लिये जाते समय जिसका पराक्रम इन्द्रके समान दृष्टिगोचर होता है तथा देवताओं और असुरों के युद्धमें कन्याके गर्भसे उत्पन्न किया था, वही यह क्रथन नामक यूथपति है । राक्षसराज! बहुत - से किन्नर जिनका सेवन करते हैं, उन बड़े - बड़े पर्वतों का जो राजा है और आपके भाई कुबेरको सदा विहारका सुख प्रदान करता है तथा जिस-पर उगे हुए जामुनके वृक्षके नीचे राजाधिराज कुबेर बैठा करते हैं, उसी पर्वतपर यह तेजस्वी बलवान् वानरशिरोमणि श्रीमान् क्रथन भी रमण करता है । यह युद्धमें कभी अपनी प्रशंसा नहीं करता और दस अरब वानरोंसे घिरा रहता है । यह भी अपनी सेना द्वारा लङ्काको रौंद डालनेका हौसला रखता है | २०-२४ ॥

यो गङ्गामनुपर्येति त्रासयन् गजयूथपान् ।

हस्तिनां वानराणां च पूर्ववैरमनुस्मरन् ॥ २५ ॥

एष यूथपतिर्नेता गर्जन् गिरिगुहाशयः ।

गजान् रोधयते वन्यानारुजंश्च महीरुहान् ॥ २६ ॥

हरीणां वाहिनीमुख्यो नदीं हैमवतीमनु ।

उशीरवी जाश्रित्य मन्दरं पर्वतोत्तमम् ॥ २७ ॥

रमते वानरश्रेष्ठो दिवि शक्र इव स्वयम् ।

एनं शतसहस्राणां सहस्रमभिवर्तते ॥ २८ ॥

वीर्यविक्रमदृप्तानां नर्दतां बाहुशालिनाम् ।

स एष नेता चैतेषां वानराणां महात्मनाम् ॥ २ ९ ॥

स एष दुर्धरो राजन् प्रमाथी नाम यूथपः ।

वातेनेवोद्धतं मेघं यमेनमनुपश्यसि ॥ ३० ॥

अनीकमपि संरब्धं वानराणां तरखिनाम् ।

उद्धतमरुणाभासं पवनेन समन्ततः ॥ ३१ ॥

विवर्तमानं बहुशो यत्रैतद्बहुलं रजः । " जो हाथियों और वानरोंके पुराने वैरका स्मरण करके गजयूथपतियोंको भयभीत करता हुआ । गङ्गांके किनारे विचरा करता है, जंगली पेड़ों को तोड़ - उखाड़वार उनके द्वारा हाथियोंको आगे बढ़नेसे रोक देता है, पर्वतोंची कन्दरामें सोता और जोर - जोर से गर्जना करता है, वानरयूथोंका स्वामी तथा संचालक है, वानरों की सेनामें जिसे प्रमुख वीर माना जाता है, जो गङ्गातटपर विद्यमान उशीरबीज नामक पर्वत तथा गिरिश्रेष्ठ मन्दराचलका आश्रय लेकर रहता एवं रमण करता है और जो वानरोंमें उसी प्रकार श्रेष्ठ स्थान रखता है जैसे स्वर्गके देवताओंमें साक्षात् इन्द्र, वही यह दुर्जय वीर प्रमाथी नामक यूथपति है । इसके साथ बल और पराक्रमपर गर्व रखकर गर्जना करनेवाले दस करोड़ वानर रहते हैं, जो अपने बाहुबलसे सुशोभित होते हैं । १. हनुमान् जी के पिता वानरराज के सरीने शम्बसादन नामक राक्षसको, जो हाथीका रूप धारण करके देवताओंकी सहायता के लिये जिसे अग्निदेवने एक गन्धर्व- था । इसीसे पूर्वकालमें आया था, मार डाला हाथियोंसे वानरोंका र बँध गया था ।

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युद्धकाण्डे सप्तविंशः सर्गः ११२१ यह प्रमाथी इन सभी महात्मा वानरोंका नेता है । वायुके वेगसे उठे हुए मेधकी भाँति जिस वानरकी ओर आप बारं बार देख रहे हैं, जिससे सम्बन्ध रखनेवाले वेगशाली वानरों-की सेना भी रोषसे भरी दिखायी देती है तथा जिसकी सेना-द्वारा उड़ायी गयी धूमिल रंगकी बहुत बड़ी धूलिराशि वायुसे सब ओर फैलकर जिसके निकट गिर रही है, वही यह प्रमाथी नामक वीर है ॥ २५-३१३ ॥ एतेऽसितमुखा घोरा गोलाङ्गला महाबलाः ॥ ३२ ॥

शतं शतसहस्राणि दृष्ट्रा वै सेतुबन्धनम् ।

गोलाङ्गलं महाराज गवाक्षं नाम यूथपम् ॥ ३३ ॥

परिवार्याभिनर्दन्ते लङ्कां मर्दितुमोजसा । ‘ ये काले मुँहवाले लंगूरजातिके वानर हैं । इनमें महान् बल है । इन भयंकर वानरोंकी संख्या एक करोड़ है । महा-राज! जिसने सेतु बाँधनेमें सहायता की है, उस लंगूरजाति-के गवाक्ष नामक यूथपतिको चारों ओरसे घेरकर ये वानर चल रहे हैं और लङ्काको बलपूर्वक कुचल डालनेके लिये जोर जोरसे गर्जना करते हैं ॥ ३२-३३३ ॥ भ्रमराचरिता यत्र सर्वकालफलद्रुमाः ॥ ३४ ॥

यं सूर्यस्तुल्यवर्णाभमनुपर्येति पर्वतम् ।

यस्य भासा सदा भान्ति तद्वर्णा मृगपक्षिणः ॥ ३५ ॥

यस्य प्रस्थं महात्मानो न त्यजन्ति महर्षयः ।

सर्वकामफला वृक्षाः सदा फलसमन्विताः ॥ ३६ ॥

मधूनि च महार्हाणि यस्मिन् पर्वतसत्तमे ।

तत्रैव रमते राजन् रम्ये काञ्चनपर्वते ॥ ३७ ॥

मुख्यो वानरमुख्यानां केसरी नाम यूथपः । ‘ जिस पर्यंतपर सभी ऋतुओंमें फल देनेवाले वृक्ष भ्रमरोंसे सेवित दिखायी देते हैं, सूर्यदेव अपने ही समान वर्णवाले जिस पर्वतकी प्रतिदिन परिक्रमा करते हैं, जिसकी कान्तिसे वहाँके मृग और पक्षी सदा सुनहरे रंगके प्रतीत होते हैं, महात्मा महर्षिगण जिसके शिखरका कभी त्याग नहीं करते हैं, जहाँके सभी वृक्ष सम्पूर्णं मनोवाञ्छित वस्तुओंको फलके रूपमें प्रदान करते हैं और उनमें सदा फल लगे रहते हैं, जिस श्रेष्ठ शैलपर बहुमूल्य मधु उपलब्ध होते हैं, उसी रमणीय सुवर्णमय पर्वत महामेरुपर ये प्रमुख वानरोंमें प्रधान यूथपति केसरी रमण करते हैं ॥ ३४-३७३ ॥ षष्टिगिरिसहस्राणि रम्याः काञ्चनपर्वताः ॥ ३८ ॥

तेषां मध्ये गिरिवरस्त्वमिवानघ रक्षसाम् । ‘ साठ हजार जो रमणीय सुवर्णमय पर्यंत हैं, उनके बीच में एक श्रेष्ठ पर्वत है, जिसका नाम है सावर्णिमेरु । निष्पाप निशाचरपते! जैसे राक्षसोंमें आप श्रेष्ठ हैं, उसी प्रकार पर्वतों में वह सावर्णिमेरु उत्तम है ॥ ३८३ ॥

तत्रैके कपिलाः श्वेतास्ताम्रास्या मधुपिङ्गलाः ॥ ३ ९ ॥

निवसन्त्यन्तिम गिरौ तीक्ष्णदंष्ट्रा नखायुधाः ।

सिंहा इव चतुर्दंष्ट्रा व्याघ्रा इव दुरासदाः ॥ ४० ॥

वा ० रा ० ५.८. १५–

सर्वे वैश्वानरसमा ज्वलदाशीविषोपमाः ।

सुदीर्घाञ्चितलाङ्गूला मत्तमातङ्गसंनिभाः ॥ ४१ ॥

महापर्वतसंकाशा महाजीमूतनिःखनाः ।

वृत्तपिङ्गलनेत्राहि महाभीमगतिस्वनाः ॥ ४२ ॥

मर्दयन्तीव ते सर्वे तस्थुर्लङ्कां समीक्ष्य ते । " वहाँ जो पर्वतका अन्तिम शिखर है, उसपर कपिल ( भूरे ), श्वेत, लाल मुँहवाले और मधुके समान पिङ्गल वर्ण-वाले वानर निवास करते हैं, जिनके दाँत बड़े तीखे हैं और नख ही उनके आयुध हैं । वे सब सिंह के समान चार दाँतों-वाले, व्याघ्रके समान दुर्जय, अग्नि के समान तेजस्वी और प्रज्वलित मुखवाले विषधर सर्पके समान क्रोधी होते हैं । उनकी पूँछ बहुत बड़ी ऊपरको उठी हुई और सुन्दर होती है । वे मतवाले हाथीके समान पराक्रमी, महान् पर्वतके समान, ऊँचे और सुदृढ़ शरीरवाले तथा महान् मेत्रके समान गम्भीर गर्जना करनेवाले हैं । उनके नेत्र गोल - गोल एवं पिङ्गल वर्णके होते हैं । उनके चलनेपर बड़ा भयानक शब्द होता है । वे सभी यहाँ आकर इस तरह खड़े हैं, मानो आपकी लङ्काको देखते ही मसल डालेंगे || ३ ९ -- ४२३ ॥ एष चैषामधिपतिर्मध्ये तिष्ठति वीर्यवान् ॥ ४३ ॥

जयार्थी नित्यमादित्यमुपतिष्ठति वीर्यवान् ।

नाम्ना पृथिव्यां विख्यातो राजञ्शतबलीति यः ॥ ४४ ॥

‘ देखिये उनके बीचमें यह उनका पराक्रमी सेनापति खड़ा है । यह बड़ा बलवान् है और विजयकी प्राप्तिके लिये सदा सूर्यदेवकी उपासना करता है । राजन्! यह वीर इस भूमण्डल-में शतबलिके नामसे विख्यात है ॥ ४३-४४ ॥

एषैवाशंसते लङ्कां स्वेनानीकेन मर्दितुम् ।

विक्रान्तो वलवाञ्छूरः पौरुषे स्वे व्यवस्थितः ॥ ४५ ॥

रामप्रियार्थ प्राणानां दयां न कुरुते हरिः । ' बलवान्, पराक्रमी तथा शूरवीर यह शतबलि भी अपने ही पुरुषार्थके भरोसे युद्धके लिये खड़ा है और अपनी सेना-द्वारा लङ्कापुरीको मसल डालना चाहता है । यह वानरवीर श्रीरामचन्द्रजीका प्रिय करनेके लिये अपने प्राणोंपर भी दया नहीं करता है || ४५३ ॥ गजो गवाक्षो गवयो नलो नीलश्च वानरः ॥ ४६ ॥

एकैकमेव योधानां कोटिभिर्दशभिर्वृतः । ' गज, गवाक्ष, गवय, नल और नील- इनमेंसे एक - एक सेनापति दस - दस करोड़ योद्धाओंसे घिरा हुआ है ॥ ४६३ ॥

तथान्ये वानरश्रेष्ठा विन्ध्यपर्वतवासिनः ।

न शक्यन्ते बहुत्वात् तु संख्यातुं लघुविक्रमाः ॥ ४७ ॥

' इसी तरह विन्ध्यपर्वतपर निवास करनेवाले और भी बहुत - से शीघ्र पराक्रमी श्रेष्ठ वानर हैं, जो अधिक होने के कारण गिने नहीं जा सकते ॥ ४७ ॥

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४१२२ श्रीमद्वाल्मीकीय रामायणे सर्वे महाराज महाप्रभावाः ' महाराज! ये सभी वानर बड़े प्रभावशाली हैं । सभीके सर्वे महाशैलनिकाशकायाः । शरीर बड़े - बड़े पर्वतोंके समान विशाल हैं और सभी क्षणभर-सर्वे समर्थाः पृथिवीं क्षणेन में भूमण्डलके समस्त पर्वतोंको चूर - चूर करके सब ओर कर्तु प्रविध्वस्तविकीर्णशैलाम् ॥ ४८ ॥ बिखेर देनेकी शक्ति रखते हैं ' ॥ ४८ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये युद्धकाण्डे सप्तविंशः सर्गः ॥ २७ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्ड में सत्ताईसवाँ सर्गं परा हुआ ॥ २७ ॥

1814 अष्टाविंशः सर्गः शुकके द्वारा सुग्रीव के मन्त्रियोंका, मैन्द और द्विविदका, हनुमान्का, श्रीराम, लक्ष्मण, विभीषण और सुग्रीवका परिचय देकर वानरसेनाकी संख्याका निरूपण करना

सारणस्य वचः श्रुत्वा रावणं राक्षसाधिपम् ।

बलमादिश्य तत् सर्वं शुको वाक्यमथाब्रवीत् ॥ १ ॥

उस सारी वानरीसेनाका परिचय देकर जब सारण चुप हो गया, तब उसका कथन सुनकर शुकने राक्षसराज रावणसे कहा- ॥ १ ॥

स्थितान् पश्यसि यानेतान् मत्तानिव महाद्विपान् ।

न्यग्रोधानिव गाङ्गेयान् सालान् हैमवतानिव ॥ २ ॥

एते दुष्प्रसहा राजन् बलिनः कामरूपिणः ।

दैत्यदानवसंकाशा युद्धे देवपराक्रमाः ॥ ३ ॥

' राजन्! जिन्हें आप मतवाले महागजराजोंके समान वहाँ खड़ा देख रहे हैं, जो गङ्गातटके वटवृक्षों और हिमालय के शालवृक्षोंके समान जान पड़ते हैं, इनका वेग दुस्सह है । ये इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले और बलवान् हैं । दैत्यों और दानवोंके समान शक्तिशाली तथा युद्धमें देवताओंके समान पराक्रम प्रकट करनेवाले हैं ॥ २-३ ॥

एषां कोटिसहस्राणि नव पञ्च च सप्त च ।

तथा शङ्कुसहस्राणि तथा वृन्दशतानि च ॥ ४ ॥

एते सुग्रीवसचिवाः किष्किन्धानिलयाः सदा ।

हरयो देवगन्धर्वैरुत्पन्नाः कामरूपिणः ॥ ५ ॥

' इनकी संख्या इक्कीस कोटि सहस्र, सहस्र शङ्कु और सौ वृन्द है * । ये सब - के - सब वानर सदा किष्किन्धामें रहनेवाले सुग्रीवके मन्त्री हैं । इनकी उत्पत्ति देवताओं और गन्धबैँसे हुई है । ये सभी इच्छानुसार रूप धारण करने में समर्थ हैं । ४-५ ॥

यौ तौ पश्यसि तिष्ठन्तौ कुमारौ देवरूपिणौ ।

मैन्दश्च द्विविदश्चैव ताभ्यां नास्ति समो युधि ॥ ६ ॥

ब्रह्मणा समनुज्ञातावमृतप्राशिनावुभौ ।

आशंसेते यथा लङ्कामेतौ मर्दितुमोजसा ॥ ७ ॥

* इन संख्याओं का स्पष्टीकरण इसी सर्गके अन्त में दी हुई परिभाषा के अनुसार समझना चाहिये । ' राजन्! आप इन वानरों में देवताओंके समान रूपवाले जिन दो वानरोंको खड़ा देख रहे हैं उनके नाम हैं मैन्द और द्विविद । युद्धमें उनकी बराबरी करनेवाला कोई नहीं है । ब्रह्माजीकी आज्ञासे उन दोनोंने अमृतपान किया है । ये दोनों वीर अपने बल पराक्रमसे लङ्काको कुचल डालने की इच्छा रखते हैं ॥ ६-७ ॥

यं तु पश्यसि तिष्ठन्तं प्रभिन्नमिव कुञ्जरम् ।

यो बलात् क्षोभयेत् क्रुद्धः समुद्रमपि वानरः ॥ ८ ॥

एषोऽभिगन्ता लङ्कायां वैदेह्यास्तव च प्रभो ।

एनं पश्य पुरा दृष्टं वानरं पुनरागतम् ॥ ९ ॥

ज्येष्ठः केसरिणः पुत्रो वातात्मज इति श्रुतः ।

हनूमानिति विख्यातो लङ्घितो येन सागरः ॥ १० ॥

" इधर जिसे आप मदकी धारा बहानेवाले मतवाले हाथी-की भाँति खड़ा देख रहे हैं, जो वानर कुपित होनेपर समुद्रको भी विक्षुब्ध कर सकता है, जो लङ्कामें आपके पास और विदेहनन्दिनी सीतासे भी मिलकर गया था, उसे देखिये । पहलेका देखा हुआ यह वानर फिर आया है । यह केसरीका बड़ा पुत्र है । पवनपुत्रके भी नामसे विख्यात है । उसे लोग

हनुमान् कहते हैं । इसीने पहले समुद्र लाँघा था ॥ ८–१० ॥

कामरूपो हरिश्रेष्ठो बलरूपसमन्वितः ।

अनिवार्यगतिश्चैव यथा सततगः प्रभुः ॥ ११ ॥

' बल और रूपसे सम्पन्न यह श्रेष्ठ वानर अपनी इच्छा के अनुसार रूप धारण कर सकता है । इसकी गति कहीं नहीं रुकती । यह वायुके समान सर्वत्र जा सकता है ॥। ११ ॥

उद्यन्तं भास्करं दृष्ट्वा बालः किल बुभुक्षितः ।

त्रियोजनसहस्रं तु अध्वानमवतीर्य हि ॥ १२ ॥

आदित्य माहरिष्यामि न मे क्षुत् प्रतियास्यति ।

इति निश्चित्य मनसा पुप्लुवे बलदर्पितः ॥ १३ ॥

' जब यह बालक था उस समयकी बात है, एक दिन इसको बहुत भूख लगी थी । उस समय उगते हुए सूर्य को

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युद्धकाण्डे अष्टाविंशः सर्गः ११२३ देखकर यह तीन हजार योजन ऊँचा उछल गया था । उस समय मन - ही - मन यह निश्चय करके कि ' यहाँके फल आदिसे मेरी भूख नहीं जायगी, इसलिये सूर्यको ( जो आकाशका दिव्य फल है ) ले आऊँगा ' यह बलाभिमानी वानर ऊपरको उछला था ॥ १२-१३ ॥

अनाधृष्यतमं देवमपि देवर्षिराक्षसैः ।

अनासाद्यैव पतितो भास्करोदयने गिरौ ॥ १४ ॥

‘ देवर्षि और राक्षस भी जिन्हें परास्त नहीं कर सकते, उन सूर्यदेवतक न पहुँचकर यह वानर उदयगिरिपर ही गिर पड़ा ॥ १४ ॥

पतितस्य कपेरस्य हनुरेका शिलातले ।

किंचिद् भिन्ना दृढहनुर्हनूमानेव तेन वै ॥ १५ ॥

' वहाँके शिलाखण्डपर गिरनेके कारण इस वानरकी एक हनु ( ठोढ़ी ) कुछ कट गयी; साथ ही अत्यन्त दृढ़ हो गयी, इसलिये यह ' हनुमान् ' नामसे प्रसिद्ध हुआ ॥ १५ ॥

सत्यमागमयोगेन ममैष विदितो हरिः ।

नास्य शक्यं बलं रूपं प्रभावो वानुभाषितुम् ॥ १६ ॥

एष आशंसते लङ्कामेको मथितुमोजसा । येन जाज्वल्यतेऽसौ वै धूमकेतुस्तवाद्य वै 1 लङ्कायां निहितश्चापि कथं विस्मरसे कपिम् ॥ १७ ॥

' विश्वसनीय व्यक्तियोंके सम्पर्कसे मैंने इस वानरका वृत्तान्त ठीक - ठीक जाना है । इसके बल, रूप और प्रभावका पूर्णरूपसे वर्णन करना किसीके लिये भी असम्भव है । यह अकेला ही सारी लङ्काको मसल देना चाहता है । जिसे आपने लङ्कामें रोक रक्खा था, उस अग्निको भी जिसने अपनी पूँछद्वारा प्रज्वलित करके सारी लङ्का जला डाली, उस वानरको आप भूलते कैसे हैं १ ॥ १६-१७ ॥

यश्चैषोऽनन्तरः शूरः श्यामः पद्मनिभेक्षणः ।

इक्ष्वाकूणामतिरथो लोके विश्रुतपौरुषः ॥ १८ ॥

' हनुमानजी के पास ही जो कमलके समान नेत्रवाले साँवले शूरवीर विराज रहे हैं, वे इक्ष्वाकुवंशके अतिरथी हैं । इनका पौरुष सम्पूर्ण लोकों में प्रसिद्ध है ॥ १८ ॥

यस्मिन् न चलते धर्मो यो धर्म नातिवर्तते ।

यो ब्राह्ममस्त्रं वेदांश्व वेद वेदविदां वरः ॥ १ ९ ॥

' धर्मं उनसे कभी अलग नहीं होता । ये धर्मका कभी उल्लङ्घन नहीं करते तथा ब्रह्मास्त्र और वेद दोनोंके ज्ञाता हैं । वेदवेत्ताओंमें इनका बहुत ऊँचा स्थान है ॥ १ ९ ॥

यो भिन्द्याद् गगनं बाणैर्मेदिनीं वापि दारयेत् ।

यस्य मृत्योरिव क्रोधः शक्रस्येव पराक्रमः ॥ २० ॥

" ये अपने बाणोंसे आकाशका भी भेदन कर सकते हैं, पृथ्वीको भी विदीर्ण करनेकी क्षमता रखते हैं । इनका क्रोध मृत्युके समान और पराक्रम इन्द्रके तुल्य है ॥ २० ॥

यस्य भार्या जनस्थानात् सीता चापि हृता त्वया ।

स एष रामस्त्वां राजन् योद्धुं समभिवर्तते ॥ २१ ॥

' राजन्! जिनकी भार्या सीताको आप जनस्थानसे हर लाये हैं, वे ही ये श्रीराम आपसे युद्ध करनेके लिये सामने आकर खड़े हैं ॥ २१ ॥

यस्यैष दक्षिणे पार्श्वे शुद्धजाम्बूनदप्रभः ।

विशालवक्षास्ताम्राक्षो नीलकुञ्चितमूर्धजः ॥ २२ ॥

एषो हि लक्ष्मणो नाम भ्रातुः प्रियहिते रतः ।

नये युद्धे च कुशलः सर्वशस्त्रभृतां वरः ॥ २३ ॥

" उनके दाहिने भागमें जो ये शुद्ध सुवर्णके समान कान्तिमान्, विशाल वक्षःस्थलसे सुशोभित, कुछ - कुछ लाल नेत्रवाले तथा मस्तकपर काले - काले घुँघराले केश धारण करनेवाले हैं, इनका नाम लक्ष्मण है । ये अपने भाईके प्रिय और हितमें लगे रहनेवाले हैं, राजनीति और युद्ध में कुशल हैं तथा सम्पूर्ण शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ हैं ॥ २२-२३ ॥

अमर्षी दुर्जयोजेता विक्रान्तश्च जयी बली ।

रामस्य दक्षिणो बाहुर्नित्यं प्राणो बहिश्वरः ॥ २४ ॥

" ये अमर्षशील, दुर्जय, विजयी, पराक्रमी, शत्रुको पराजित करनेवाले तथा बलवान् हैं । लक्ष्मण सदा ही श्रीराम के दाहिने हाथ और बाहर विचरनेवाले प्राण हैं ॥ २४ ॥

नह्येष राघवस्यार्थे जीवितं परिरक्षति ।

एबैवाशंसते युद्धे निहन्तुं सर्वराक्षसान् ॥ २५ ॥

" इन्हें श्रीरघुनाथजी के लिये अपने प्राणोंकी रक्षाका भी ध्यान नहीं रहता । ये अकेले ही युद्धमें सम्पूर्ण राक्षसोंका संहार कर देनेकी इच्छा रखते हैं ॥ २५ ॥

यस्तु सव्यमसौ पक्षं रामस्याश्रित्य तिष्ठति ।

रक्षोगणपरिक्षिप्तो राजा ह्येष विभीषणः ॥ २६ ॥

श्रीमता राजराजेन लङ्कायामभिषेचितः ।

त्वामसौ प्रतिसंरब्धो युद्धायैषोऽभिवर्तते ॥ २७ ॥

' श्रीरामचन्द्रजीकी बायीं ओर जो राक्षसोंसे घिरे हुए खड़े हैं, ये राजा विभीषण हैं । राजाधिराज श्रीरामने इन्हें लङ्काके राज्यपर अभिषिक्त कर दिया है । अब ये आपपर कुपित होकर युद्धके लिये सामने आ गये हैं ॥ २६-२७ ॥

यं तु पश्यसि तिष्ठन्तं मध्ये गिरिमिवाचलम् ।

सर्वशाखामृगेन्द्राणां भर्तारममितौजसम् ॥ २८ ॥

' जिन्हें आप सब वानरोंके बीचमें पर्वतके समान अविचल भावसे खड़ा देखते हैं, वे समस्त वानरोंके स्वामी अमित तेजस्वी सुग्रीव हैं ॥ २८ ॥

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११२४ श्रीमद्वाल्मीकीय रामायणे

ते जसा यशसा बुद्ध्या बलेनाभिजनेन च ।

यः कपीनतिबभ्राज हिमवानिव पर्वतः ॥ २ ९ ॥

' जैसे हिमालय सब पर्वतों में श्रेष्ठ है, उसी प्रकार वे तेज, यश, बुद्धि, बल और कुलकी दृष्टिसे समस्त वानरों में सर्वोपरि विराजमान हैं ॥ २ ९ ॥

किष्किन्धां यः समध्यास्ते गुहां सगहनद्रुमाम् ।

दुर्गा पर्वतदुर्गम्यां प्रधानैः सह यूथपैः ॥ ३० ॥

" ये गहन वृक्षोंसे युक्त किष्किन्धा नामक दुर्गम गुफा में निवास करते हैं । पर्वतोंके कारण उसमें प्रवेश करना अत्यन्त कठिन है । इनके साथ वहाँ प्रधान प्रधान यूथपति भी रहते हैं ॥ ३० ॥

• यस्यैषा काञ्चनी माला शोभते शतपुष्करा ।

कान्ता देवमनुष्याणां यस्यां लक्ष्मीः प्रतिष्ठिता ॥ ३१ ॥

" इनके गलेमें जो सौ कमलोंकी सुवर्णमयी माला सुशोभित है, उसमें सर्वदा लक्ष्मीदेवीका निवास है । उसे देवता और मनुष्य सभी पाना चाहते हैं ॥ ३१ ॥

एतां मालां च तारां च कपिराज्यं च शाश्वतम् ।

सुग्रीवो वालिनं हत्वा रामेण प्रतिपादितः ॥ ३२ ॥

‘ भगवान् श्रीरामने वालीको मारकर यह माला, तारा और वानरोंका राज्य – ये सब वस्तुएँ सुग्रीवको समर्पित कर दीं ॥ ३२ ॥

शतं शतसहस्राणां कोटिमाहुर्मनीषिणः ।

शतं कोटिसहस्राणां शङ्कुरित्यभिधीयते ॥ ३३ ॥

" मनीषी पुरुष सौ लाखकी संख्याको एक कोटि कहते हैं और सो सहस्र कोटि ( एक नील ) को एक शङ्क कहा जाता है ॥ ३३ ॥

शतं सहस्राणां महाशङ्कुरिति स्मृतः ।

महाशङ्कुसहस्राणां शतं वृन्दमिहोच्यते ॥ ३४ ॥

" एक लाख शङ्कुको महाशङ्कु नाम दिया गया है ।

एक लाख महाशङ्कुको वृन्द कहते हैं ॥ ३४ ॥

शतं वृन्दसहस्राणां महावृन्दमिति स्मृतम् ।

महावृन्दसहस्राणां शतं पद्ममिहोच्यते ॥ ३५ ॥

“ एक लाख वृन्दका नाम महावृन्द है । एक लाख महावृन्दको पद्म कहते हैं ॥ ३५ ॥

शतं पद्मसहस्राणां महापद्ममिति स्मृतम् ।

महापद्मसहस्राणां शतं खर्वमिहोच्यते ॥ ३६ ॥

" एक लाख पद्मको महापद्म माना गया है । एक लाख महापद्मको खर्व कहते हैं ॥ ३६ ॥

शतं खर्वसहस्राणां महाखर्वमिति स्मृतम् ।

महाखर्वसहस्राणां समुद्रमभिधीयते ।

शतं समुद्र साहस्रमोघ इत्यभिधीयते ॥ ३७ ॥

शतमोघसहस्राणां महौघा इति विश्रुतः । ' एक लाख खर्वका महाखर्व होता है । एक सहस्र महाखर्वको समुद्र कहते हैं । एक लाख समुद्रको ओघ कहते हैं और एक लाख ओघकी महौघ संज्ञा है ॥ ३७३ ॥

एवं कोटिसहस्रेण शङ्कनां च शतेन च ।

महाशङ्कुसहस्रेण तथा वृन्दशतेन च ॥ ३८ ॥

महावृन्दसहस्रेण तथा पद्मशतेन च ।

महापद्मसहस्रेण तथा खर्वशतेन च ॥ ३ ९ ॥

समुद्रेण च तेनैव महौघेन तथैव च ।

एष कोटिमहौघेन समुद्रसदृशेन च ॥ ४० ॥

विभीषणेन वीरेण सचिवैः परिवारितः । सुग्रीवो वानरेन्द्रस्त्वां युद्धार्थमनुवर्तते 1 महाबलवृतो नित्यं महाबलपराक्रमः ॥ ४१ ॥

' इस प्रकार सहस्र कोटि, शङ्कु, सहस्र महाशङ्कु, सौ वृन्द, सहस्र महावृन्द, सौ पद्म, सहस्र महापद्म, सौ खर्व, समुद्र, सौ महौ तथा समुद्र - सदृश ( सौ ) कोटि महौघ सैनिकोंसे, वीर विभीषणसे तथा अपने सचिवोंसे घिरे हुए वानरराज सुग्रीव आपको युद्धके लिये ललकारते हुए सामने आ रहे हैं । विशाल सेनासे घिरे हुए सुग्रीव महान् बल और पराक्रमसे सम्पन्न हैं ॥ ३८-४१ ॥ इमां महाराज समीक्ष्य वाहिनी-मुपस्थितां प्रज्वलितग्रहोपमाम् । ततः प्रयत्नः परमो विधीयतां यथा जयः स्यान्न परैः पराभवः ॥ ४२ ॥

' महाराज! यह सेना एक प्रकाशमान ग्रहके समान है । इसे उपस्थित देख आप कोई ऐसा उपाय करें, जिससे आपकी विजय हो और शत्रुओंके सामने आपको नीचा न देखना पड़े ' || ४२ ॥ इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये युद्धकाण्डेऽष्टाविंशः सर्गः ॥ २८ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्वरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्ड में अट्ठाईसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ २८ ॥

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युद्धकाण्डे एकोनत्रिंशः सर्गः ११२५ एकोनत्रिंशः सर्गः रावणका शुक और सारणको फटकारकर अपने दरबारसे निकाल देना, उसके भेजे हुए गुप्तचरोंका श्रीरामकी दयासे वानरोंके चंगुल से छूटकर लङ्कामें आना

शुकेन तु समादिष्टान् दृष्ट्वा स हरियूथपान् ।

लक्ष्मणं च महावीर्य भुजं रामस्य दक्षिणम् ॥ १ ॥

समीपस्थं च रामस्य भ्रातरं च विभीषणम् ।

सर्ववानरराजं च सुग्रीवं भीमविक्रमम् ॥ २ ॥

अङ्गदं चापि बलिनं वज्रहस्तात्मजात्मजम् ।

हनूमन्तं च विक्रान्तं जाम्बवन्तं च दुर्जयम् ॥ ३ ॥

सुषेणं कुमुदं नीलं नलं च प्लवगर्षभम् ।

गजं गवाक्षं शरभं मैन्दं च द्विविदं तथा ॥ ४ ॥

शुकके बताये अनुसार रावणने समस्त यूथपतियों को देखकर श्रीरामकी दाहिनी बाँह महापराक्रमी लक्ष्मणको, - श्रीरामके निकट बैठे हुए अपने भाई विभीषणको समस्त वानरोंके राजा भयंकर पराक्रमी सुग्रीवको, इन्द्रपुत्र वालीके बेटे बलवान् अङ्गदको बल - विक्रमशाली हनुमान्को, दुर्जय वीर जाम्बवान्को तथा सुषेण, कुमुद, नील, वानरश्रेष्ठ नल, गज, गवाक्ष, शरभ, मैन्द एवं द्विविदको भी देखा ॥ १४ ॥

किंचिदाविग्नहृदयो जातक्रोधश्च रावणः ।

भर्त्सयामास तौ वीरौ कथान्ते शुकसारणौ ॥ ५ ॥

उन सबको देखकर रावणका हृदय कुछ उद्विग्न हो उठा । उसे क्रोध आ गया और उसने बात समाप्त होनेपर वीर शुक और सारणको फटकारा ॥ ५ ॥

अधोमुखौ तौ प्रणतावब्रवीच्छुकसारणौ ।

रोषगद्गदया वाचा संरब्धं परुषं तथा ॥ ६ ॥

बेचारे शुक और सारण विनीत भावसे नीचे मुँह किये खड़े रहे और रावणने रोषगद्गद वाणीमें क्रोधपूर्वक यह कठोर बात कही ॥ ६ ॥

न तावत् सदृशं नाम सचिवैरुपजीविभिः ।

विप्रियं नृपतेर्वकु निग्रहे प्रग्रहे प्रभोः ॥ ७ ॥

" राजा निग्रह और अनुग्रह करनेमें भी समर्थ होता है । उसके सहारे जीविका चलानेवाले मन्त्रियोंको ऐसी कोई बात नहीं कहनी चाहिये, जो उसे अप्रिय लगे ॥ ७ ।

रिपूणां प्रतिकूलानां युद्धार्थमभिवर्तताम् ।

उभाभ्यां सदृशं नाम वक्तुमप्रस्तवे स्तवम् ॥ ८ ॥

अपने विरोधी हैं और युद्ध के लिये सामने आये शत्रु हैं, उनकी बिना किसी प्रसङ्गके ही स्तुति करना क्या तुम दोनोंके लिये उचित था? ॥ ८ ॥

आचार्या गुरवो वृद्धा वृथा वां पर्युपासिताः ।

सारं यद् राजशास्त्राणामनुजीव्यं न गृह्यते ॥ ९ ॥

' तुमलोगोंने आचार्य, गुरु और वृद्धोंकी व्यर्थ ही सेवा की है; क्योंकि राजनीतिका जो संग्रहणीय सार है, उसे तुम नहीं ग्रहण कर सके ॥ ९ ॥

गृहीतो वा न विज्ञातो भारोऽज्ञानस्य वाह्यते ।

ईदृशैः सचिवैर्युक्तो मूर्खेर्दिष्टया धराम्यहम् ॥ १० ॥

' यदि तुमने उसे ग्रहण भी किया हो तो भी इस समय तुम्हें उसका ज्ञान नहीं रह गया है — तुमने उसे भुला दिया है । तुमलोग केवल अज्ञानका बोझ ढो रहे हो । ऐसे मूर्ख मन्त्रियोंके सम्पर्क में रहते हुए भी जो मैं अपने राज्यको सुरक्षित रख सका हूँ, यह सौभाग्यकी ही बात है ॥१० ॥

किं नु मृत्योर्भयं नास्ति मां वक्तु ं

परुषं वचः ।

यस्य मे शासतो जिह्वा प्रयच्छति शुभाशुभम् ॥ ११ ॥

" मैं इस राज्यका शासक हूँ । मेरी जिह्वा ही तुम्हें शुभ या अशुभ की प्राप्ति करा सकती है — मैं वाणीमात्रसे तुमपर निग्रह और अनुग्रह कर सकता हूँ; फिर भी तुम दोनोंने मेरे सामने कठोर बात कहने का साहस किया । क्या तुम्हें मृत्युका भय नहीं है? ॥। ११ ॥

अप्येव दहनं स्पृष्ट्वा वने तिष्ठन्ति पादपाः ।

राजदण्डपरामृष्टास्तिष्ठन्ते नापराधिनः ॥ १२ ॥

' वनमें दावानलका स्पर्श करके भी वहाँके वृक्ष खड़े रह जायँ, यह सम्भव है; परंतु राजदण्डके अधिकारी

अपराधी नहीं टिक सकते । वे सर्वथा नष्ट हो जाते हैं ॥ १२ ॥

हन्यामहं त्विमौ पापौ शत्रुपक्षप्रशंसिनौ ।

यदि पूर्वोपकारैमें क्रोधो न मृदुतां व्रजेत् ॥ १३ ॥

' यदि इनके पहलेके उपकारोंको याद करके मेरा क्रोध नरम न पड़ जाता तो शत्रुपक्षकी प्रशंसा करनेवाले इन दोनों पापियोंको मैं अभी मार डालता ॥ १३ ॥

अपध्वंसत नश्यध्वं संनिकर्षादितो मम ।

नहि वां हन्तुमिच्छामि स्मराम्युपकृतानि वाम् ।

हतावेव कृतघ्नौ द्वौ मयि स्नेहपराङ्मुखौ ॥ १४ ॥

' अब तुम दोनों मेरी सभामें प्रवेशके अधिकारसे वञ्चित । मेरे पाससे चले जाओ; फिर कभी मुझे अपना मुँह न दिखाना । मैं तुम दोनोंका वध करना नहीं चाहता; क्योंकि तुम दोनोंके किये हुए उपकारों को सदा स्मरण रखता हूँ । तुम दोनों मेरे स्नेहसे विमुख और कृतघ्न हो, अतः मरे हुएके ही समान हो ' ॥ १४ ॥

एवमुक्तौ तु सव्रीडौ तौ दृष्ट्वा शुकसारणौ ।

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११२६ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे रावणं जयशब्देन प्रतिनन्द्याभिनिःसृतौ ॥ १५ ॥

उसके ऐसा कहनेपर शुक और सारण बहुत लजित हुए और जय - जयकार के द्वारा रावणका अभिनन्दन करके वहाँसे निकल गये ॥ १५ ॥

अब्रवीच्च दशग्रीवः समीपस्थं महोदरम् ।

उपस्थापय मे शीघ्रं चारानिति निशाचरः ।

महोदर स्तथोक्तस्तु शीघ्रमाज्ञापयच्चरान् ॥ १६ ॥

इसके पश्चात् दशमुख रावणने अपने पास बैठे हुए महोदरसे कहा – “ मेरे सामने शीघ्र ही गुप्तचरोंको उपस्थित होनेकी आज्ञा दो । " यह आदेश पाकर निशाचर महोदरने शीघ्र ही गुप्तचरोंको हाजिर होनेकी आज्ञा दी ॥ १६ ॥

ततश्चाराः संत्वरिताः प्राप्ताः पार्थिवशासनात् ।

उपस्थिताः प्राञ्जलयो वर्धयित्वा जयाशिषः ॥ १७ ॥

राजाकी आज्ञा पाकर गुप्तचर उसी समय विजयसूचक आशीर्वाद दे हाथ जोड़े सेवामें उपस्थित हुए । १७ ॥ तानब्रवीत् ततो वाक्यं रावणो राक्षसाधिपः । चारान् प्रत्यायिकाञ्शूरान् धीरान् विगतसाध्वसान् । १८ । वे सभी गुप्तचर विश्वासपात्र, शूरवीर, धीर एवं निर्भय थे । राक्षसराज रावणने उनसे यह बात कही ॥ १८ ॥

इतो गच्छत रामस्य व्यवसायं परीक्षितुम् ।

मन्त्रेष्वभ्यन्तरा येऽस्य प्रीत्या तेन समागताः ॥ १ ९ ॥

‘ तुमलोग अभी वानरसेनामें रामका क्या निश्चय है, यह जाननेके लिये तथा गुप्तमन्त्रणा में भाग लेनेवाले जो उनके अन्तरङ्ग मन्त्री हैं और जो लोग प्रेमपूर्वक उनसे मिले हैं— उनके मित्र हो गये हैं; उन सबके भी निश्चित विचार क्या हैं, इसकी जाँच करने के लिये यहाँसे जाओ ॥ १ ९ ॥

कथं स्वपिति जागर्ति किमद्य च करिष्यति ।

विज्ञाय सर्वमागन्तव्यमशेषतः ॥ २० ॥

वे ' कैसे सोते हैं? किस तरह जागते हैं और आज क्या करेंगे? – इन सब बातोंका पूर्णरूपसे अच्छी तरह पता लगाकर लौट आओ ॥ २० ॥

चारेण विदितः शत्रुः पण्डितैर्वसुधाधिपैः ।

युद्धे स्वल्पेन यत्नेन समासाद्य निरस्यते ॥ २१ ॥

" गुप्तचरके द्वारा यदि शत्रुकी गतिविधिका पता चल जा तो बुद्धिमान् राजा थोड़े - से ही प्रयत्नके द्वारा युद्धमें उसे घर दबाते और मार भगाते हैं ' ॥ २१ ॥

चारास्तु ते तथेत्युक्त्वा प्रहृष्टा राक्षसेश्वरम् ।

शार्दूलमग्रतः कृत्वा ततश्चक्रुः प्रदक्षिणम् ॥ २२ ॥

तब ‘ बहुत अच्छा ' कहकर हर्षमें भरे हुए गुप्तचरोंने शार्दूलको आगे करके राक्षसराज रावणकी परिक्रमा की ॥२२ ॥

ततस्तं तु महात्मानं चारा राक्षससत्तमम् ।

कृत्वा प्रदक्षिणं जग्मुर्यत्र रामः सलक्ष्मणः ॥ २३ ॥

इस प्रकार वे गुप्तचर राक्षसशिरोमणि महाकाय रावणकी परिक्रमा करके उस स्थानपर गये, जहाँ लक्ष्मणसहित श्रीराम विराजमान थे || २३ ॥

ते सुवेलस्य शैलस्य समीपे रामलक्ष्मणौ ।

प्रच्छन्ना ददृशुर्गत्वा ससुग्रीवविभीषणौ ॥ २४ ॥

सुवेल पर्वतके निकट जाकर उन गुप्तचरोंने छिपे रहकर श्रीराम, लक्ष्मण, सुग्रीव और विभीषणको देखा ॥ २४ ॥

प्रेक्षमाणाश्चमूं तां च बभूवुर्भयविह्वलाः ।

ते तु धर्मात्मना दृष्टा राक्षसेन्द्रेण राक्षसाः ॥ २५ ॥

वानरोंकी उस सेनाको देखकर वे भयसे व्याकुल हो उठे । इतनेहीमें धर्मात्मा राक्षसराज विभीषणने उन सब राक्षसों को देख लिया ॥ २५ ॥

विभीषणेन तत्रस्था निगृहीता यदृच्छया ।

शार्दूलो ग्राहितस्त्वेकः पापोऽयमिति राक्षसः ॥ २६ ॥

तब उन्होंने अकस्मात् वहाँ आये हुए राक्षसोंको फट-कारा और अकेले शार्दूलको यह सोचकर पकड़वा लिया कि यह राक्षस बड़ा पापी है ॥ २६ ॥

मोचितः सोऽपि रामेण वध्यमानः प्लवंगमैः ।

आनृशंस्येन रामेण मोचिता राक्षसाः परे ॥ २७ ॥

फिर तो वानर उसे पीटने लगे । तब भगवान् श्रीरामने दयावश उसे तथा अन्य राक्षसोंको भी छुड़ा दिया ॥ २७ ॥

वानरैरर्दितास्ते तु विक्रान्तैर्लघुविक्रमैः ।

पुनर्लङ्कामनुप्राप्ताः श्वसन्तो नष्टचेतसः ॥ २८ ॥

बल - विक्रम सम्पन्न शीघ्र पराक्रमी वानरोंसे पीड़ित हो उन राक्षसोंके होश उड़ गये और वे हाँफते - हाँफते फिर लङ्का जा पहुँचे ॥ २८ ॥

ततो दशग्रीवमुपस्थितास्ते चारा बहिर्नित्यचरा निशाचराः । गिरेः सुवेलस्य समीपवासिनं न्यवेदयन् रामबलं महाबलाः ॥ २ ९ ॥ तदनन्तर रावणकी सेवामें उपस्थित हो चरके वेशमें सदा बाहर विचरनेवाले उन महाबली निशाचरोंने यह सूचना दी कि श्रीरामचन्द्रजीकी सेना सुवेल पर्वतके निकट डेरा डाले पड़ी है ॥ २ ९ ॥ इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये युद्धकाण्डे एकोनत्रिंशः सर्गः ॥ २ ९ ॥ इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें उन्तीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ २ ९ ॥

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युद्धकाण्डे त्रिंशः सर्गः ११२७ त्रिंशः सर्गः रावणके भेजे हुए गुप्तचरों एवं शार्दूलका उससे वानर सेनाका समाचार बताना और मुख्य - मुख्य वीरोंका परिचय देना

ततस्तमक्षोभ्यबलं लङ्काधिपतये चराः ।

सुवेले राघवं शैले निविष्टं प्रत्यवेदयन् ॥ १ ॥

गुप्तचरोंने लङ्कापति रावणको यह बताया कि श्रीरामचन्द्र-जीकी सेना सुवेल पर्वतके पास आकर ठहरी है और वह सर्वथा अजेय है ॥ १ ॥

चाराणां रावणः श्रुत्वा प्राप्तं रामं महाबलम् ।

जातोद्वेगोऽभवत् किंचिच्छार्दूलं वाक्यमब्रवीत् ॥ २ ॥

गुप्तचरोंके मुँह से यह सुनकर कि महाबली श्रीराम आ

पहुँचे हैं, रावणको कुछ भय हो गया । वह शार्दूलसे बोला – ॥

अयथावच्च ते वर्णो दीनश्चासि निशाचर ।

नासि कच्चिदमित्राणां क्रुद्धानां वशमागतः ॥ ३ ॥

' निशाचर! तुम्हारे शरीरकी कान्ति पहले जैसी नहीं रह गयी है । तुम दीन ( दुखी ) दिखायी दे रहे हो । कहीं कुपित हुए शत्रुओंके वशमें तो नहीं पड़ गये थे? ' ॥ ३ ॥

इति तेनानुशिष्टस्तु वाचं मन्दमुदीरयन् ।

तदा राक्षसशार्दूलं शार्दूलो भयविक्लवः ॥ ४ ॥

उसके इस प्रकार पूछनेपर भयसे घबराये हुए शार्दूलने राक्षसप्रवर रावणसे मन्द स्वरमें कहा ॥ ४ ॥

न ते चारयितुं शक्या राजन् वानरपुङ्गवाः ।

विक्रान्ता बलवन्तश्च राघवेण च रक्षिताः ॥ ५ ॥

“ राजन्! उन श्रेष्ठ वानरोंकी गतिविधिका पता गुप्तचरों द्वारा नहीं लगाया जा सकता । वे बड़े पराक्रमी, बलवान् तथा श्रीरामचन्द्रजीके द्वारा सुरक्षित हैं ॥ ५ ॥

नापि सम्भाषितुं शक्याः सम्प्रश्नोऽत्र न लभ्यते ।

सर्वतो रक्ष्यते पन्था वानरैः पर्वतोपमैः ॥ ६ ॥

" उनसे वार्तालाप करना भी असम्भव है; अतः ' आष कौन हैं, आपका क्या विचार है ' इत्यादि प्रश्नोंके लिये वहाँ अवकाश ही नहीं मिलता । पर्वतोंके समान विशालकाय वानर सब ओरसे मार्गकी रक्षा करते हैं; अतः वहाँ प्रवेश होना भी कठिन ही है ॥ ६ ॥

प्रविष्टमात्रे ज्ञातोऽहं बले तस्मिन् विचारिते ।

बलाद् गृहीतो रक्षोभिर्वहुधास्मि विचारितः ॥ ७ ॥

' उस सेनामें प्रवेश करके ज्यों ही उसकी गतिविधिका विचार करना आरम्भ किया, त्यों ही विभीषणके साथी राक्षसों-ने मुझे पहचानकर बलपूर्वक पकड़ लिया और बारंबार इधर-उधर घुमाया ॥ ७ ॥

जानुभिर्मुष्टिभिर्दन्तैस्तलैश्चाभिहतो भृशम् ।

परिणीतोऽस्मि हरिभिर्बलमध्ये अमर्षणैः ॥ ८ ॥

" उस सेनाके बीच अमर्षसे भरे हुए वानरोंने घुटनों, मुक्कों, दाँतों और थप्पड़ोंसे मुझे बहुत मारा और सारी सेना-में मेरे अपराधकी घोषणा करते हुए सब ओर मुझे घुमाया ॥ ८ ॥

परिणीय च सर्वत्र नीतोऽहं रामसंसदि ।

रुधिरस्त्राविदीनाङ्गो विह्वलश्वलितेन्द्रियः ॥ ९ ॥

' सर्वत्र घुमाकर मुझे श्रीरामके दरबारमें ले जाया गया । उस समय मेरे शरीरसे खून निकल रहा था और अङ्ग अङ्गमें दीनता छा रही थी । मैं व्याकुल हो गया था । मेरी इन्द्रियाँ विचलित हो रही थीं ॥ ९ ॥

हरिभिर्वध्यमानश्च याचमानः कृताञ्जलिः ।

राघवेण परित्रातो मा मेति च यदृच्छया ॥ १० ॥

" वानर पीट रहे थे और मैं हाथ जोड़कर रक्षाके लिये याचना कर रहा था । उस दशामें श्रीरामने अकस्मात् ' मत मारो, मत मारो ' कहकर मेरी रक्षा की । १० ॥

एष शैलशिलाभिस्तु पूरयित्वा महार्णवम् ।

द्वारमाश्रित्य लङ्काया रामस्तिष्ठति सायुधः ॥ ११ ॥

' श्रीराम पर्वतीय शिलाखण्डद्वारा समुद्रको पाटकर लङ्का-के दरवाजेपर आ धमके हैं और हाथमें धनुष लिये खड़े हैं ॥ ११ ॥

गरुडव्यूहमास्थाय सर्वतो हरिभिर्वृतः ।

मां विसृज्य महातेजा लङ्कामेवातिवर्तते ॥ १२ ॥

" वे महातेजस्वी रघुनाथजी गरुड़व्यूहका आश्रय ले वानरों-के बीच में विराजमान हैं और मुझे विदा करके वे लङ्कापर चढ़े

चले आ रहे हैं । १२ ॥

पुरा प्राकारमायाति क्षिप्रमेकतरं कुरु ।

सीतां वापि प्रयच्छाशु युद्धं वापि प्रदीयताम् ॥ १३ ॥

' जबतक वे लङ्काके परकोटेतक पहुँचें, उसके पहले ही आप शीघ्रतापूर्वक दो में से एक काम अवश्य कर डालिये या तो उन्हें सीताजीको लौटा दीजिये या युद्धस्थलमें खड़े होकर उनका सामना कीजिये ' ॥ १३ ॥

मनसा तत् तदा प्रेक्ष्य तच्छ्रुत्वा राक्षसाधिपः ।

शार्दूलं सुमहद्वाक्यमथोवाच स रावणः ॥ १४ ॥

उसकी बात सुनकर मन - ही - मन उसपर विचार करने के

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११२८ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे पश्चात् राक्षसराज रावणने शार्दूलसे यह महत्त्वपूर्ण बात कही ॥ १४ ॥

यदि मां प्रतियुध्यन्ते देवगन्धर्वदानवाः ।

नैव सीतां प्रदास्यामि सर्वलोकभयादपि ॥ १५ ॥

' यदि देवता, गन्धर्व और दानव मुझसे युद्ध करें और सम्पूर्ण लोक मुझे भय देने लगे तो भी मैं सीताको नहीं लौटाऊँगा ' ॥ १५ ॥

एवमुक्त्वा महातेजा रावणः पुनरब्रवीत् ।

चरिता भवता सेना केऽत्र शूराः लवंगमाः ॥ १६ ॥

ऐसा कहकर महातेजस्वी रावण फिर बोला- ' तुम तो वानरोंकी सेनामें विचरण कर चुके हो; उसमें कौन - कौन - से वानर अधिक शूरवीर हैं? ॥ १६ ॥

किंप्रभाः कीदृशाः सौम्य वानरा ये दुरासदाः ।

कस्य पुत्राश्च पौत्राश्च तत्त्वमाख्याहि राक्षस ॥ १७ ॥

' सौम्य! जो दुर्जय वानर हैं, वे कैसे हैं? उनका प्रभाव कैसा है? तथा वे किसके पुत्र और पौत्र हैं? राक्षस! ये सब बातें ठीक - ठीक बताओ ॥ १७ ॥

तथात्र प्रतिपत्स्यामि ज्ञात्वा तेषां बलाबलम् ।

अवश्यं खलु संख्यानं कर्तव्यं युद्धमिच्छता ॥ १८ ॥

" उन वानरोंका बलाबल जानकर तदनुसार कर्तव्यका निश्चय करूँगा । युद्धकी इच्छा रखनेवाले पुरुषको अपने तथा शत्रुपक्षकी सेनाकी गणना — उसके विषयकी आवश्यक जानकारी ' अवश्य करनी चाहिये ' ॥ १८ ॥

अथैवमुक्तः शार्दूलो रावणेनोत्तमश्वरः ।

इदं वचनमारेभे वक्तुं रावणसंनिधौ ॥ १ ९ ॥

रावणके इस प्रकार पूछनेपर श्रेष्ठ गुप्तचर शार्दूलने उसके समीप यों कहना आरम्भ किया -- ॥ १ ९ ॥

अथर्क्षरजसः पुत्रो युधि राजन् सुदुर्जयः ।

गद्गदस्याथ पुत्रोऽत्र जाम्बवानिति विश्रुतः ॥ २० ॥

' राजन्! उस वानरसेनामें जाम्बवान् नामसे प्रसिद्ध एक

वीर है, जिसको युद्ध में परास्त करना बहुत ही कठिन है ।

वह ऋक्षरजा तथा गद्गदका पुत्र है ॥ २० ॥

गद्गदस्याथ पुत्रोऽन्यो गुरुपुत्रः शतक्रतोः ।

कदनं यस्य पुत्रेण कृतमेकेन रक्षसाम् ॥ २१ ॥

" गदका एक दूसरा पुत्र भी है ( जिसका नाम धूम्र है ) । इन्द्रके गुरु बृहस्पतिका पुत्र केसरी है, जिसके पुत्र हनुमान्ने अकेले ही यहाँ आकर पहले बहुत से राक्षसोंका संहार कर डाला था ॥ २१ ॥

सुषेणश्चात्र धर्मात्मा पुत्रो धर्मस्य वीर्यवान् ।

सौम्यः सोमात्मजश्चात्र राजन् दधिमुखः कपिः ॥ २२ ॥

' धर्मात्मा और पराक्रमी सुषेण धर्मका पुत्र है । राजन्! दधिमुख नामक सौम्य वानर चन्द्रमाका बेटा है ॥ २२ ॥

सुमुखो दुर्मुखश्चात्र वेगदर्शी च वानरः ।

मृत्युर्वानररूपेण नूनं सृष्टः स्वयंभुवा ॥ २३ ॥

' सुमुख, दुर्मुख और वेगदर्शी नामक वानर -- ये मृत्यु के पुत्र हैं । निश्चय ही स्वयम्भू ब्रह्माने मृत्युकी ही इन वानरोंके रूपमें सृष्टि की है ॥ २३ ॥

पुत्रो हुतवहस्यात्र नीलः सेनापतिः स्वयम् ।

अनिलस्य तु पुत्रोऽत्र हनूमानिति विश्रुतः ॥ २४ ॥

" स्वयं सेनापति नील अग्निका पुत्र है । सुविख्यात वीर हनुमान् वायुका बेटा है ॥ २४ ॥

नप्ता शक्रस्य दुर्धर्षो बलवानङ्गदो युवा ।

मैन्दश्च द्विविदश्वोभौ बलिनावश्विसम्भवौ ॥ २५ ॥

' बलवान् एवं दुर्जय वीर अङ्गद इन्द्रका नाती है । वह अभी नौजवान है । बलवान् वानर मैन्द और द्विविद -- ये दोनों अश्विनीकुमारोंके पुत्र हैं ॥ २५ ॥

पुत्रा वैवस्वतस्याथ पञ्च कालान्तकोपमाः ।

गजो गवाक्षो गवयः शरभो गन्धमादनः ॥ २६ ॥

' गज, गवाक्ष, गवय, शरभ और गन्धमादन — ये पाँच यमराजके पुत्र हैं और काल एवं अन्तकके समान पराक्रमी हैं ॥ २६ ॥

दश वानरकोट्यश्च शूराणां युद्धकाङ्क्षिणाम् ।

श्रीमतां देवपुत्राणां शेषं नाख्यातुमुत्सहे ॥ २७ ॥

" इस प्रकार देवताओंसे उत्पन्न हुए तेजस्वी शूरवीर वानरों की संख्या दस करोड़ है । वे सब - के - सब युद्धकी इच्छा रखनेवाले हैं । इनके अतिरिक्त जो शेष वानर हैं, उनके विषय-मैं मैं कुछ नहीं कह सकता; क्योंकि उनकी गणना असम्भव

है ॥। २७ ॥

पुत्रो दशरथस्यैष सिंहसंहननो युवा ।

दूषणो निहतो येन खरश्च त्रिशिरास्तथा ॥ २८ ॥

' दशरथनन्दन श्रीरामका श्रीविग्रह सिंहके समान सुगठित है । इनकी युवावस्था है । इन्होंने अकेले ही खर - दूषण और त्रिशिराका संहार किया था ॥ २८ ॥

नास्ति रामस्य सदृशे विक्रमे भुवि कश्चन ।

विराधो निहतो येन कबन्धश्चान्तकोपमः ॥ २ ९ ॥

' इस भूमण्डल में श्रीरामचन्द्रजीके समान पराक्रमी वीर दूसरा कोई नहीं है । इन्होंने ही विराधका और कालके समान विकराल कबन्धका भी वध किया था ॥ २ ९ ॥

वक्तुं न शक्तो रामस्य गुणान् कश्चिन्नरः क्षितौ ।

जनस्थानगता येन तावन्तो राक्षसा हताः ॥ ३० ॥

पृष्ठ 320

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युद्धकाण्डे एकत्रिंशः सर्गः ११२ ९ " इस भूतलपर कोई भी मनुष्य ऐसा नहीं है, जो श्रीराम-के गुणों का पूर्णरूपसे वर्णन कर सके । श्रीरामने ही जनस्थान-में उतने राक्षसों का संहार किया था ॥ ३० ॥

लक्ष्मणश्चात्र धर्मात्मा मातंगानामिवर्षभः ।

यस्य वाणपथं प्राप्य न जीवेदपि वासवः ॥ ३१ ॥

' धर्मात्मा लक्ष्मण भी श्रेष्ठ गजराजके समान पराक्रमी हैं, उनके बाणोंका निशाना बन जानेपर देवराज इन्द्र भी जीवित नहीं रह सकते ॥ ३१ ॥

श्वेतो ज्योतिर्मुखश्चात्र भास्करस्यात्मसम्भवौ ।

वरुणस्याथ पुत्रोऽथ हेमकूटः प्लवंगमः ॥ ३२ ॥

" इनके सिवा उस सेनामें श्वेत और ज्योतिर्मुख – ये दो वानर भगवान् सूर्यके औरस पुत्र हैं । हेमकूट नामका वानर वरुणका पुत्र बताया जाता है ॥ ३२ ॥

विश्वकर्मसुतो वीरो नलः प्लवगसत्तमः ।

विक्रान्तो वेगवानत्र वसुपुत्रः स दुर्धरः ॥ ३३ ॥

' वानरशिरोमणि वीरवर नल विश्वकर्माके पुत्र हैं । वेगशाली और पराक्रमी दुर्धर वसु देवताका पुत्र है ॥ ३३ ॥

राक्षसानां वरिष्ठश्च तव भ्राता विभीषणः ।

प्रतिगृह्य पुरीं लङ्कां राघवस्य हिते रतः ॥ ३४ ॥

' आपके भाई राक्षसशिरोमणि विभीषण भी लङ्कापुरीका राज्य लेकर श्रीरघुनाथजीके ही हितसाधनमें तत्पर रहते हैं ॥

इति सर्व समाख्यातं तथा वै वानरं बलम् ।

सुवेऽधिष्ठितं शैले शेषकार्ये भवान् गतिः ॥ ३५ ॥

' इस प्रकार मैंने सुवेल पर्वतपर ठहरी हुई वानर सेनाका पूरा - पूरा वर्णन कर दिया । अब जो शेष कार्य है, वह आपके ही हाथ है ' * ॥ ३५ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये युद्धकाण्डे त्रिंशः सर्गः ॥ ३० ॥

इस प्रकार श्रीबाल्मीकि निर्मित आर्परामायण आदिकाव्य के युद्धकाण्ड में तीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ३० ॥

एकत्रिंशः सर्गः मायारचित श्रीरामका कटा मस्तक दिखाकर

ततस्तमक्षोभ्यवलं लङ्कायां नृपतेश्चराः ।

सुवेले राघवं शैले निविष्टं प्रत्यवेदयन् ॥ १ ॥

चाराणां रावणः श्रुत्वा प्राप्तं रामं महाबलम् ।

जातोद्वेगोऽभवत् किंचित् सचिवानिदमब्रवीत् ॥ २ ॥

राक्षसराज रावणके गुप्तचरोंने जब लङ्कामें लौटकर यह बताया कि श्रीरामचन्द्रजीकी सेना सुवेल पर्वतपर आकर ठहरी है और उसपर विजय पाना असम्भव है, तब उन गुप्तचरोंकी बात सुनकर और महाबली श्रीराम आ गये, यह जानकर रावणको कुछ उद्वेग हुआ । उसने अपने मन्त्रियोंसे इस प्रकार कहा- ॥ १-२ ॥

मन्त्रिणः शीघ्रमायान्तु सर्वे वै सुसमाहिताः ।

अयं नो मन्त्रकालो हि सम्प्राप्त इति राक्षसाः ॥ ३ ॥

" मेरे सभी मन्त्री एकाग्रचित्त होकर शीघ्र यहाँ आ जायँ । राक्षसो! यह हमारे लिये गुप्त मन्त्रणा करनेका अवसर आ गया है ' ॥ ३ ॥

रावणद्वारा सीताको मोहमें डालने का प्रयत्न

तस्य तच्छासनं श्रुत्वा मन्त्रिणोऽभ्यागमन् द्रुतम् ।

ततः स मन्त्रयामास राक्षसैः सचिवैः सह ॥ ४ ॥

रावणका आदेश सुनकर समस्त मन्त्री शीघ्रतापूर्वक वहाँ आ गये । तब रावणने उन राक्षसजातीय सचिवोंके साथ बैठकर आवश्यक कर्तव्यपर विचार किया ॥ ४ ॥

मन्त्रयित्वा तु दुर्धर्षः क्षमं यत् तदनन्तरम् ।

विसर्जयित्वा सचिवान् प्रविवेश स्वमालयम् ॥ ५ ॥

दुर्धर्ष वीर रावणने जो उचित कर्तव्य था, उसके विषय में शीघ्र ही विचार - विमर्श करके उन सचिवोंको विदा कर दिया और अपने भवनमें प्रवेश किया ॥ ५ ॥

ततो राक्षसमादाय विद्युज्जिह्वं महाबलम् ।

मायाविनं महामायं प्राविशद् यत्र मैथिली ॥ ६ ॥

फिर उसने महाबली, महामायावी, मायाविशारद राक्षस विद्युजिह्नको साथ लेकर उस प्रमदावन में प्रवेश किया, जहाँ मिथिलेशकुमारी सीता विद्यमान थीं ॥ ६ ॥

* इस सर्गमें जो वानरोंके जन्मका वर्णन किया गया है, वह प्रायः बालकाण्डके सत्रहवें सर्गमें किये गये वर्णनसे विरुद्ध है । वहाँ वरुणसे सुषेण, पर्जन्यसे शरभ और कुबेरसे गन्धमादनकी उत्पत्ति कही गयी है । परंतु इस सर्गमें सुषेणको धर्मका तथा शरभ और गन्धमादनको वैवस्वत यमका पुत्र कहा गया है । इस विरोधका परिहार यही है कि यहाँ कहे गये सुषेण आि बालकाण्डवर्णित सुषेण आदिसे भिन्न हैं । वा ० रा ० ५.८. १६–