Ramayana 2 — पृष्ठ 321–330
वाल्मीकि रामायण — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 321–330
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श्रीमद्वाल्मीकीय रामायणे ११३०
विद्युजिह्वं च मायाज्ञमत्रवीद् राक्षसाधिपः ।
मोहयिष्यावहे सीतां मायया जनकात्मजाम् ॥ ७ ॥
उस समय राक्षसराज रावणने माया जाननेवाले विद्युजिह्न से कहा – ' हम दोनों मायाद्वारा जनकनन्दिनी सीताको मोहित करेंगे ॥ ७ ॥
शिरो मायामयं गृह्य राघवस्य निशाचर ।
मां त्वं समुपतिष्ठस्व महच्च सशरं धनुः ॥ ८ ॥
' निशाचर! तुम श्रीरामचन्द्रजीका मायानिर्मित मस्तक लेकर एक महान् धनुष - बाणके साथ मेरे पास आओ ' ॥ ८ ॥
एवमुक्तस्तथेत्याह विद्युजिह्नो निशाचरः ।
दर्शयामास तां मायां सुप्रयुक्तां स रावणे ॥ ९ ॥
रावणकी यह आज्ञा पाकर निशाचर विद्युजिह्वने कहा— ' बहुत अच्छा ' । फिर उसने रावणको बड़ी कुशलतासे प्रकट की हुई अपनी माया दिखायी ॥ ९ ॥
तस्य तुष्टोऽभवद् राजा प्रददौ च विभूषणम् ।
अशोकवनिकायां च सीतादर्शनलालसः ॥ १० ॥
नैर्ऋतानामधिपतिः संविवेश महाबलः । इससे राजा रावण उसपर बहुत प्रसन्न हुआ और उसे अपना आभूषण उतारकर दे दिया । फिर वह महाबली राक्षसराज सीताजीको देखनेके लिये अशोकवाटिकामें गया ॥ ततो दीनामदैन्याह ददर्श धनदानुजः ॥ ११ ॥
अधोमुखीं शोकपरामुपविष्टां महीतले ।
भर्तारं समनुध्यान्तीमशोकवनिकां गताम् ॥ १२ ॥
कुबेरके छोटे भाई रावणने वहाँ सीताको दीन दशामें पड़ी देखा, जो उस दीनता के योग्य नहीं थीं । वे अशोक-वाटिकामें रहकर भी शोकमग्न थीं और सिर नीचा किये पृथ्वीपर बैठकर अपने पतिदेवका चिन्तन कर रही थीं ॥ ११-१२ ॥
उपास्यमानां घोराभी राक्षसीभिर दूरतः ।
उपसृत्य ततः सीतां प्रहर्ष नाम कीर्तयन् ॥ १३ ॥
इदं च वचनं धृष्टमुवाच जनकात्मजाम् । उनके आसपास बहुत - सी भयंकर राक्षसियाँ बैठी थीं छिन्नं ते सर्वथा मूलं दर्पश्च निहतो मया ॥ १५ ॥
व्यसनेनात्मनः सीते मम भार्या भविष्यसि ।
विसृजैतां मर्ति मूढे किं मृतेन करिष्यसि ॥ १६ ॥
' तुम्हारी जड़ थी, सर्वथा कट गयी । तुम्हारे दर्पको मैंने चूर्ण कर दिया । अब अपने ऊपर आये हुए इस संकटसे ही विवश होकर तुम स्वयं मेरी भार्या बन जाओगी । मूढ़ सीते! अब यह रामविषयक चिन्तन छोड़ दो । उस मरे हुए रामको लेकर क्या करोगी ॥ १५-१६ ॥ भवस्व भद्रे भार्याणां सर्वासामीश्वरी मम ।
अल्पपुण्ये निवृत्तार्थे मूढे पण्डितमानिनि ।
शृणु भर्तृवधं सीते घोरं वृत्रवधं यथा ॥ १७ ॥
' भद्रे! मेरी सब रानियों की स्वामिनी बन जाओ । मूढे! तुम अपनेको बड़ी बुद्धिमती समझती थी न । तुम्हारा पुण्य बहुत कम हो गया था । इसीलिये ऐसा हुआ है । अब रामके मारे जानेसे तुम्हारा जो उनकी प्राप्तिरूप प्रयोजन था, वह / समाप्त हो गया । सीते! यदि सुनना चाहो तो वृत्रासुरके वधकी भयंकर घटना के समान अपने पतिके मारे जानेका घोर समाचार सुन लो ॥ १७ ॥
समायातः समुद्रान्तं हन्तुं मां किल राघवः ।
वानरेन्द्रप्रणीतेन बलेन महता वृतः ॥ १८ ॥
‘ कहा जाता है राम मुझे मारनेके लिये समुद्र के किनारे-तक आये थे । उनके साथ वानरराज सुग्रीवकी लायी हुई विशाल सेना भी थी ॥ १८ ॥
संनिविष्टः समुद्रस्य पीड्य तीरमथोत्तरम् ।
बलेन महता रामो व्रजत्यस्तं दिवाकरे ॥ १ ९ ॥
' उस विशाल सेनाके द्वारा राम समुद्रके उत्तर तटको दबाकर ठहरे । उस समय सूर्यदेव अस्ताचलको चले गये थे ।
अथाध्वनि परिश्रान्तमर्धरात्रे स्थितं बलम् ।
सुखसुप्तं समासाद्य चरितं प्रथमं चरैः ॥ २० ॥
' जब आधी रात हुई, उस समय रास्तेकी थकी - माँदी । सो गयी थी । उस अवस्थामें वहाँ रावणने बड़े हर्ष के साथ अपना नाम बताते हुए जनककिशोरी सारी सेना सुखपूर्वक उसका भलीभाँति निरीक्षण सीताके पास जाकर धृष्टतापूर्ण वचनोंमें कहा ॥ १३३ ॥ पहुँचकर मेरे गुप्तचरोंने पहले तो
विमन्यसे ॥ १४ ॥ किया ॥ २० ॥
सान्ध्यमाना मया भद्रे यमाश्रित्य तत्प्रहस्तप्रणीतेन बलेन महता मम ।
खरहन्ता स ते भर्ता राघवः समरे हतः । बलमस्य हतं रात्रौ यत्र रामः सलक्ष्मणः ॥ २१ ॥
' भद्रे! मेरे बार - बार सान्त्वना देने और प्रार्थना करनेपर सेनापतित्वमें वहाँ गयी हुई मेरी बहुत भी तुम जिनका आश्रय लेकर मेरी बात नहीं मानती थीं, " फिर प्रहस्तके तुम्हारे पतिदेव श्रीराम समरभूमिमें बड़ी सेनाने रातमें, जहाँ राम और लक्ष्मण थे, उस वानर-खरका वध करनेवाले वे सेनाको नष्ट कर दिया ॥ २१ ॥
मारे गये ॥ १४३ ॥
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युद्धकाण्डे एकत्रिंशः सर्गः ११३१
पट्टिशान् परिघांश्चक्रानृष्टीन् दण्डान् महायुधान् ।
वाणजालानि शूलानि भाखरान् कूटमुद्गरान् ॥ २२ ॥
यष्टीश्च तोमरान् प्रासांश्चक्राणि मुसलानि च ।
उद्यम्योद्यम्य रक्षोभिर्वानरेषु निपातिताः ॥ २३ ॥
' उस समय राक्षसोंने पट्टिश, परिघ, चक्र, ऋष्टि, दण्ड, बड़े - बड़े आयुध, बाणोंके समूह, त्रिशूल, चमकीले कूट और मुद्गर, डंडे, तोमर, प्रास तथा मूसल उठा - उठाकर वानरोंपर प्रहार किया था ॥ २२-२३ ॥
अथ सुप्तस्य रामस्य प्रहस्तेन प्रमाथिना ।
असक्तं कृतहस्तेन शिरश्छिन्नं महासिना ॥ २४ ॥
' तदनन्तर शत्रुओंको मथ डालनेवाले प्रहस्तने, जिसके हाथ खूब सधे हुए हैं, बहुत बड़ी तलवार हाथमें लेकर उससे बिना किसी रुकावट के रामका मस्तक काट डाला ॥ २४ ॥
विभीषणः समुत्पत्य निगृहीतो यदृच्छया ।
दिशः प्रव्राजितः सैन्यैर्लक्ष्मणः प्लवगैः सह ॥ २५ ॥
" फिर अकस्मात् उछलकर उसने विभीषणको पकड़ लिया और वानरसैनिकों सहित लक्ष्मणको विभिन्न दिशाओंमें भाग जानेको विवश किया ॥ २५ ॥
सुग्रीवो ग्रीवया सीते भग्नया लवगाधिपः ।
निरस्तहनुकः सीते हनूमान् राक्षसैर्हतः ॥ २६ ॥
' सीते! वानरराज सुग्रीवकी ग्रीवा काट दी गयी, हनुमान्की हनु ( ठोढ़ी ) नष्ट करके उसे राक्षसोंने मार डाला ॥ २६ ॥
जाम्बवानथ जानुभ्यामुत्पतन् निहतो युधि ।
पट्टिशैर्बहुभिश्छिन्नो निकृत्तः पादपो यथा ॥ २७ ॥
‘ जाम्बवान् ऊपरको उछल रहे थे, उसी समय युद्धस्थलमें राक्षसोंने बहुत - से पट्टिशोंद्वारा उनके दोनों घुटनोंपर प्रहार किया । वे छिन्न - भिन्न होकर कटे हुए पेड़की भाँति धराशायी हो गये ॥ २७ ॥
मैन्दश्च द्विविदश्वोभौ तौ वानरवरर्षभौ ।
निःश्वसन्तौ रुदन्तौ च रुधिरेण परिप्लुतौ ॥ २८ ॥
असिना व्यायतौ छिन्नौ मध्ये हारिनिषूदनौ । " मैन्द और द्विविद दोनों श्रेष्ठ वानर खूनसे लथपथ होकर पड़े हैं । वे लंबी साँसें खींचते और रोते थे । उसी अवस्थामें उन दोनों विशालकाय शत्रुसूदन वानरोंको तलवारद्वारा बीचसे ही काट डाला गया है ॥ २८३ ॥
अनुश्वसिति मेदिन्यां पनसः पनसो यथा ॥ २ ९ ॥
नाराचैर्बहुभिश्छिन्नः शेते दर्या दरीमुखः ।
कुमुदस्तु महातेजा निष्कूजन् सायकैर्हतः ॥ ३० ॥
' पनस नामका वानर पककर फटे हुए पनस ( कटहल ) के समान पृथ्वीपर पड़ा पड़ा अन्तिम साँसें ले रहा है । दरीमुख अनेक नाराचोंसे छिन्न - भिन्न हो किसी दरी ( कन्दरा ) में पड़ा सो रहा है । महातेजस्वी कुमुद सायकोंसे घायल हो चीखता - चिल्लाता हुआ मर गया ॥ २ ९ -३० ।
अङ्गदो बहुभिरिछन्नः शरैरासाद्य राक्षसैः ।
परितो रुधिरोद्वारी क्षितौ निपतितोऽङ्गदः ॥ ३१ ॥
' अङ्गदधारी अङ्गदपर आक्रमण करके बहुत - से राक्षसोंने उन्हें बाणोंद्वारा छिन्न - भिन्न कर दिया है । वे सब अङ्गोंसे रक्त बहाते हुए पृथ्वीपर पड़े हैं ॥ ३१ ॥
हरयो मथिता नागै रथजालैस्तथापरे ।
शयाना मृदितास्तत्र वायुवेगैरिवाम्बुदाः ॥ ३२ ॥
" जैसे बादल वायुके वेगसे फट जाते हैं, उसी प्रकार बड़े - बड़े हाथियों तथा रथसमूहोंने वहाँ सोये हुए वानरों को रौंदकर मथ डाला ॥ ३२ ॥
प्रसृताश्च परे त्रस्ता हन्यमाना जघन्यतः ।
अनुद्रुतास्तु रक्षोभिः सिंहैरिव महाद्विपाः ॥ ३३ ॥
" जैसे सिंहके खदेड़ने से बड़े - बड़े हाथी भागते हैं, उसी प्रकार राक्षसों के पीछा करनेपर बहुत - से वानर पीठपर बाणों की मार खाते हुए भाग गये हैं ॥ ३३ ॥
सागरे पतिताः केचित् केचिद् गगनमाश्रिताः ।
ऋक्षा वृक्षानुपारूढा वानरीं वृत्तिमाश्रिताः ॥ ३४ ॥
" कोई समुद्र में कूद पड़े और कोई आकाशमें उड़ गये हैं । बहुत - से रीछ वानरी वृत्तिका आश्रय ले पेड़ोंपर चढ़ गये हैं || ३४ ॥
सागरस्य च तीरेषु शैलेषु च वनेषु च ।
पिङ्गलास्ते विरूपाक्षै राक्षसैर्बहवो हताः ॥ ३५ ॥
' विकराल नेत्रोंवाले राक्षसोंने इन बहुसंख्यक भूरे बंदरों को समुद्रतट, पर्वत और वनोंमें खदेड़ - खदेड़कर मार डाला है || ३५ ॥
एवं तव हतो भर्ता ससैन्यो मम सेनया ।
क्षतजार्द्र रजोध्वस्तमिदं चास्याहृतं शिरः ॥ ३६ ॥
‘ इस प्रकार मेरी सेनाने सैनिकोंसहित तुम्हारे पतिको मौत के घाट उतार दिया । खूनसे भीगा और धूलमें सना हुआ उनका यह मस्तक यहाँ लाया गया है ' ॥ ३६ ॥
ततः परमदुर्धर्षो रावणो राक्षसेश्वरः ।
सीतायामुपशण्वत्यां राक्षसीमिदमब्रवीत् ॥ ३७ ॥
ऐसा कहकर अत्यन्त दुर्जय राक्षसराज रावणने सीता सुनते - सुनते एक राक्षसीसे कहा ॥ ३७ ॥
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११३२ श्रीमद्वाल्मीकीय रामायणे
राक्षसं क्रूरकर्माणं विधुजिह्वं समानय ।
येन तद्राघवशिरः संग्रामात् स्वयमाहृतम् ॥ ३८ ॥
" तुम क्रूरकर्मा राक्षस विद्युजिह्वको बुला ले आओ, जो स्वयं संग्रामभूमि से रामका सिर यहाँ ले आया है ' ॥ ३८ ॥
विद्युजिहस्तदा गृह्य शिरस्तत्सशरासनम् ।
प्रणामं शिरसा कृत्वा रावणस्याग्रतः स्थितः ॥ ३ ९ ॥
तमब्रवीत् ततो राजा रावणो राक्षसं स्थितम् ।
विधुजिहं महाजिह्वं समीपपरिवर्तिनम् ॥ ४० ॥
तब विद्युजिह्व धनुषसहित उस मस्तकको लेकर आया और सिर झुका रावणको प्रणाम करके उसके सामने खड़ा हो गया । उस समय अपने पास खड़े हुए विशाल जिह्वावाले राक्षस विद्युजिहसे राजा रावण बोला- ॥ ३ ९ -४० ॥
अग्रतः कुरु सीतायाः शीघ्रं दाशरथेः शिरः ।
अवस्थां पश्चिमां भर्तुः कृपणा साधु पश्यतु ॥ ४१ ॥
' तुम दशरथकुमार रामका मस्तक शीघ्र ही सीता के आगे रख दो, जिससे यह बेचारी अपने पतिकी अन्तिम अवस्थाका अच्छी तरह दर्शन कर ले ' ॥ ४१ ॥
एवमुक्तं तु तद् रक्षः शिरस्तत् प्रियदर्शनम् ।
उपनिक्षिप्य सीतायाः क्षिप्रमन्तरधीयत ॥ ४२ ॥
रावण के ऐसा कहने पर वह राक्षस उस सुन्दर मस्तकको सीताके निकट रखकर तत्काल अदृश्य हो गया ॥ ४२ ॥
रावणश्चापि चिक्षेप भास्वरं कार्मुकं महत् ।
त्रिषु लोकेषु विख्यातं रामस्यैतदिति ब्रुवन् ॥ ४३ ॥
रावणने भी उस विशाल चमकीले धनुषको यह कहकर सीताके सामने डाल दिया कि यही रामका त्रिभुवनविख्यात धनुष है ॥ ४३ ॥
इदं तत् तव रामस्य कार्मुकं ज्यासमावृतम् ।
इह प्रहस्तेनानीतं तं हत्वा निशि मानुषम् ॥ ४४ ॥
फिर बोला - ' सीते! यही तुम्हारे रामका प्रत्यञ्चा-सहित धनुष है । रातके समय उस मनुष्यको मारकर प्रहस्त इस धनुष को यहाँ ले आया है ' ॥ ४४ ॥
स विद्युजिह्वेन सहैव तच्छिरो धनुश्च भूमौ विनिकीर्यमाणः । विदेहराजस्य सुतां यशखिनीं ततोऽब्रवीत् तां भव मे वशानुगा ॥ ४५ ॥
जब विद्युजिने मस्तक वहाँ रक्खा, उसके साथ ही रावणने वह धनुष पृथ्वीपर डाल दिया । तत्पश्चात् वह विदेहराजकुमारी यशस्विनी सीतासे बोला- ' अब तुम मेरे ' वशमें हो जाओ ' ॥ ४५ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये युद्धकाण्डे एकत्रिंशः सर्गः ॥ ३१ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें इकतीसवाँ सगँ पूरा हुआ ॥ ३१ ॥
द्वात्रिंशः सर्गः श्रीरामके मारे जानेका विश्वास करके सीताका विलाप तथा रावणका सभामें जाकर मन्त्रियोंके सलाह से युद्धविषयक उद्योग करना
सा सीता तच्छिरो दृष्ट्वा तच्च कार्मुकमुत्तमम् ।
सुग्रीवप्रतिसंसर्गमाख्यातं च हनूमता ॥ १ ॥
नयने मुखवर्ण च भर्तुस्तत्सदृशं मुखम् ।
केशान् केशान्तदेशं च तं च चूडामणिं शुभम् ॥ २ ॥
एतैः सर्वैरभिज्ञानैरभिज्ञाय सुदुःखिता ।
विजगऽत्र कैकेयीं क्रोशन्ती कुररी यथा ॥ ३ ॥
सीताजीने उस मस्तक और उस उत्तम धनुषको देखकर तथा हनुमानजीकी कही हुई सुग्रीवके साथ मैत्री सम्बन्ध होने-की बात याद करके अपने पतिके - जैसे ही नेत्र, मुखका वर्ण, मुखाकृति, केश, ललाट और उस सुन्दर चूडामणिको लक्ष्य किया । इन सब चिह्नोंसे पतिको पहचानकर वे बहुत दुखी हुई और कुररीकी भाँति रो - रोकर कैकेयीकी निन्दा करने
लगीं ॥। १-३ ॥
सकामा भव कैकेय हतोऽयं कुलनन्दनः ।
कुलमुत्सादितं सर्वं त्वया कलहशीलया ॥ ४ ॥
" कैकेय! अब तुम सफलमनोरथ हो जाओ, रघुकुलको आनन्दित करनेवाले ये मेरे पतिदेव मारे गये । तुम स्वभावसे ही कलहकारिणी हो । तुमने समस्त रघुकुलका संहार कर डाला ॥ ४ ॥
आर्येण किं नु कैकेय्याः कृतं रामेण विप्रियम् ।
यन्मया चीरवसनं दत्त्वा प्रव्राजितो वनम् ॥ ५ ॥
' आर्य श्रीरामने कैकेयीका कौन - सा अपराध किया था,
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युद्धकाण्डे द्वात्रिंशः सर्गः ११३३ जिससे उसने इन्हें चीरवस्त्र देकर मेरे साथ वनमें भेज दिया था ' ॥ ५ ॥
एवमुक्त्वा तु वैदेही वेपमाना तपखिनी ।
जगाम जगतीं बाला छिन्ना तु कदली यथा ॥ ६ ॥
ऐसा कहकर दुःखकी मारी तपस्विनी वैदेही बाला थरथर काँपती हुई कटी कदलीके समान पृथ्वीपर गिर पड़ीं ॥ ६ ॥
सा मुहूर्तात् समाश्वस्य परिलभ्याथ चेतनाम् ।
तच्छिरः समुपास्थाय विललापायतेक्षणा ॥ ७ ॥
फिर दो घड़ीमें उनकी चेतना लौटी और वे विशाल-लोचना सीता कुछ धीरज धारणकर उस मस्तकको अपने निकट रखकर विलाप करने लगीं ॥ ७ ॥
हा हतास्मि महाबाहो वीरव्रतमनुव्रत ।
इमां ते पश्चिमवस्थां गतास्मि विधवा कृता ॥ ८ ॥
" हाय! महाबाहो! मैं मारी गयी । आप वीरव्रत-का पालन करनेवाले थे । आपकी इस अन्तिम अवस्थाको मुझे अपनी आँखोंसे देखना पड़ा । आपने मुझे विधवा बना दिया ॥ ८ ॥
प्रथमं मरणं नार्या भर्तुर्वैगुण्यमुच्यते ।
सुवृत्तः साधुवृत्तायाः संवृत्तस्त्वं ममाग्रतः ॥ ९ ॥
‘ स्त्रीसे पहले पतिका मरना उसके लिये महान् अनर्थकारी दोष बताया जाता है 1 । मुझ सती- साध्वीके रहते हुए मेरे सामने आप - जैसे सदाचारी पतिका निधन हुआ, यह मेरे लिये महान् दुःखकी बात है ॥ ९ ॥
महद् दुःखं प्रपन्नाया मग्नायाः शोकसागरे ।
यो हि मामुद्यतस्त्रातुं सोऽपि त्वं विनिपातितः ॥ १० ॥
“ मैं महान् संकटमें पड़ी हूँ, शोकके समुद्रमें डूबी हूँ, जो मेरा उद्धार करने के लिये उद्यत थे, उन आप जैसे वीरको भी शत्रुओंने मार गिराया ॥ १० ॥
साश्वश्रम कौसल्या त्वया पुत्रेण राघव ।
वत्सेनेव यथा धेनुर्विवत्सा वत्सला कृता ॥ ११ ॥
‘ रघुनन्दन! जैसे कोई बछड़ेके प्रति स्नेहसे भरी हुई गायको उस बछड़ेसे विलग कर दे, यही दशा मेरी सास कौसल्याकी हुई है । वे दयामयी जननी आप - जैसे पुत्रसे बिछुड़ गयीं ॥ ११ ॥
उद्दिष्टं दीर्घमायुस्ते दैवज्ञैरपि राघव ।
अनृतं वचनं तेषामल्पायुरसि राघव ॥ १२ ॥
" घुवीर! ज्योतिषियोंने तो आपकी आयु बहुत बड़ी बतायी थी, किंतु उनकी बात झूठी सिद्ध हुई । रघुनन्दन! आप बड़े अल्पायु निकले ॥ १२ ॥
अथवा नश्यति प्रज्ञा प्राशस्यापि सतस्तव ।
पचत्येनं तथा कालो भूतानां प्रभवो ह्ययम् ॥ १३ ॥
' अथवा बुद्धिमान् होकर भी आपकी बुद्धि मारी गयी । तभी तो आप सोते हुए ही शत्रुके वशमें पड़ गये अथवा यह काल ही समस्त प्राणियोंके उद्भवमें हेतु है । अतः वही प्राणि-मात्रको पकाता है — उन्हें शुभाशुभ कर्मों के फलसे संयुक्त
करता है है ॥ । १३ ॥
अदृष्टं मृत्युमापन्नः कस्मात् त्वं नयशास्त्रवित् ।
व्यसनानामुपायज्ञः कुशलो ह्यसि वर्जने ॥ १४ ॥
' आप तो नीतिशास्त्र के विद्वान् थे । संकटसे बचनेके उपायोंको जानते थे और व्यसनोंके निवारणमें कुशल थे तो भी कैसे आपको ऐसी मृत्यु प्राप्त हुई, जो दूसरे किसी वीर पुरुष-को प्राप्त होती नहीं देखी गयी थी? ॥ १४ ॥
तथा त्वं सम्परिष्वज्य रौद्रयातिनृशंसया ।
कालरात्र्या ममाच्छिद्य हृतः कमललोचन ॥ १५ ॥
‘ कमलनयन! भीषण और अत्यन्त क्रूर कालरात्रि आपको हृदयसे लगाकर मुझसे हठात् छीन ले गयी ॥ १५ ॥
इह शेषे महाबाहो मां विहाय तपस्विनीम् ।
प्रियामित्र यथा नारीं पृथिवीं पुरुषर्षभ ॥ १६ ॥
‘ पुरुषोत्तम! महाबाहो! आप मुझ तपस्विनीको त्यागकर अपनी प्रियतमा नारीकी भाँति इस पृथ्वीका आलिङ्गन करके यहाँ सो रहे हैं ॥ १६ ॥
अर्चितं सततं यत्नाद् गन्धमाल्यैर्मया तव ।
इदं ते मत्प्रियं वीर धनुः काञ्चनभूषितम् ॥ १७ ॥
“ वीर! जिसका मैं प्रयत्नपूर्वक गन्ध और पुष्पमाला आदिके द्वारा नित्यप्रति पूजन करती थी तथा जो मुझे बहुत प्रिय था, यह आपका वही स्वर्णभूषित धनुष है ॥ १७ ॥
पित्रा दशरथेन त्वं श्वशुरेण ममानघ ।
सर्वैश्च पितृभिः सार्धं नूनं स्वर्गे समागतः ॥ १८ ॥
' निष्पाप रघुनन्दन! निश्चय ही आप स्वर्गमें जाकर मेरे श्वशुर तथा अपने पिता महाराज दशरथसे और अन्य सब पितरोंसे भी मिले होंगे ॥ १८ ॥
दिवि नक्षत्रभूतं च महत्कर्मकृतं तथा ।
पुण्यं राजर्षिवंशं त्वमात्मनः समुपेक्षसे ॥ १ ९ ॥
" आप पिताकी आज्ञा का पालनरूपी महान् कर्म करके अद्भुत पुण्यका उपार्जन कर यहाँसे अपने उस राजर्षिकुलकी उपेक्षा करके ( उसे छोड़कर ) जा रहे हैं, जो आकाशमें
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११३४ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे नक्षत्र बनकर प्रकाशित होता है ( आपको ऐसा नहीं करना चाहिये ) ॥ १ ९ ॥
किं मां न प्रेक्षसे राजन् किं वा न प्रतिभावसे ।
बालां बालेन सम्प्राप्तां भार्या मां सहचारिणीम् ॥ २० ॥
' राजन्! आपने अपनी छोटी अवस्था में ही जब कि मेरी भी छोटी ही अवस्था थी, मुझे पत्नीरूपमें प्राप्त किया । मैं सदा आपके साथ विचरनेवाली सहधर्मिणी हूँ । आप मेरी ओर क्यों नहीं देखते हैं अथवा मेरी बातका उत्तर क्यों नहीं देते हैं? ॥
संश्रुतं गृह्णता पाणि चरिष्यामीति यत् त्वया ।
स्मर तन्नाम काकुत्स्थ नय मामपि दुःखिताम् ॥ २१ ॥
' काकुत्स्थ! मेरा पाणिग्रहण करते समय जो आपने प्रतिज्ञा की थी कि मैं तुम्हारे साथ धर्माचरण करूँगा, उसका स्मरण कीजिये और मुझ दुःखिनीको भी साथ ही ले चलिये ॥२१ ॥
कस्मान्मामपहाय त्वं गतो गतिमतां वर ।
अस्माल्लोकादमुं लोकं त्यक्त्वा मामपि दुःखिताम् ॥ २२ ॥
“ गतिमानोंमें श्रेष्ठ रघुनन्दन! आप मुझे अपने साथ वनमें लाकर और यहाँ मुझ दुःखिनीको छोड़कर इस लोकसे परलोक-को क्यों चले गये? ॥ २२ ॥
कल्याणै रुचिरं गात्रं परिष्वक्तं मयैव तु ।
क्रव्यादैस्तच्छरीरं ते नूनं विपरिकृष्यते ॥ २३ ॥
मैंने ही अनेक मङ्गलमय उपचारोंसे सुन्दर आपके जिस श्रीविग्रहका आलिङ्गन किया था, आज उसीको मांसभक्षी हिंसक जन्तु अवश्य इधर - उधर घसीट रहे होंगे ॥ २३ ॥
अग्निष्टोमादिभिर्यज्ञैरिष्टवानाप्तदक्षिणैः 1 अग्निहोत्रेण संस्कारं केन त्वं न तु लप्स्यसे ॥ २४ ॥
' आपने तो पर्याप्त दक्षिणाओंसे युक्त अग्निष्टोम आदि यज्ञद्वारा भगवान् यज्ञपुरुषकी आराधना की है; फिर क्या कारण है कि अग्निहोत्री अग्निसे दाह - संस्कारका सुयोग आपको नहीं मिल रहा है ॥ २४ ॥
प्रव्रज्यामुपपन्नानां त्रयाणामेकमागतम् ।
परिप्रेक्ष्यति कौसल्या लक्ष्मणं शोकलालसा ॥ २५ ॥
" हम तीन व्यक्ति एक साथ वनमें आये थे; परंतु अब शोकाकुल हुई माता कौसल्या केवल एक व्यक्ति लक्ष्मण को ही घर लौटा हुआ देख सकेंगी ॥ २५ ॥
स तस्याः परिपृच्छन्त्या वधं मित्रबलस्य ते ।
तव चाख्यास्यते नूनं निशायां राक्षसैर्वधम् ॥ २६ ॥
१. इक्ष्वाकुवंशके राजा त्रिशंकु आकाश में नक्षत्र होकर प्रकाशित होते हैं, उन्हीके क'रण क्षत्रिन्याय से समस्त कुलको ही नक्षत्रकुल बताया है । ' उनके पूछने पर लक्ष्मण उन्हें रात्रिके समय राक्षसोंके हाथसे आपके मित्रकी सेनाके तथा सोते हुए आपके भी वध -का समाचार अवश्य सुनायेंगे || २६ ॥
सा त्वां सुप्तं हतं ज्ञात्वा च रक्षोगृहं गताम् ।
हृदयेनावदीर्णेन न भविष्यति राघव ॥ २७ ॥
" रघुनन्दन! जब उन्हें यह ज्ञात होगा कि आप सोते समय मारे गये और मैं राक्षसके घरमें हर लायी गयी हूँ तो उनका हृदय विदीर्ण हो जायगा और वे अपने प्राण त्याग देंगी ॥ २७ ॥
मम हेतोरनार्याया अनघः पार्थिवात्मजः ।
रामः सागरमुत्तीर्य वीर्यवान् गोष्पदे हतः ॥ २८ ॥
• हाय! मुझ अनार्याके लिये निष्पाप राजकुमार श्रीराम, जो महान् पराक्रमी थे, समुद्रलङ्घन - जैसा महान् कर्म करके भी गायकी खुरी के बराबर जलमें डूब गये - बिना युद्ध किये सोते समय मारे गये ॥ २८ ॥
भहं दाशरथेनोढा मोहात् स्वकुलपांसनी ।
आर्यपुत्रस्य रामस्य भार्या मृत्युरजायत ॥ २ ९ ॥
' हाय! दशरथनन्दन श्रीराम मुझ जैसी कुलकलङ्किनी नारीको मोहवश ब्याह लाये । पत्नी ही आर्यपुत्र श्रीराम के लिये मृत्युरूप बन गयी ॥ २ ९ ॥
नूनमन्यां मया जाति वारितं दानमुत्तमम् ।
याहमद्यैव शोचामि भार्या सर्वातिथेरिह ॥ ३० ॥
" जिनके यहाँ सब लोग याचक बनकर आते थे एवं सभी अतिथि जिन्हें प्रिय थे, उन्हीं श्रीरामकी पत्नी होकर जो मैं आज शोक कर रही हूँ, इससे जान पड़ता है कि मैंने दूसरे जन्ममें निश्चय ही उत्तम दानधर्म में बाधा डाली थी ॥ ३० ॥
साधु घातय मां क्षिप्रं रामस्योपरि रावण ।
समानय पति पत्न्या कुरु कल्याणमुत्तमम् ॥ ३१ ॥
' रावण! मुझे भी श्रीरामके शवके ऊपर रखकर मेरा वध करा डालो; इस प्रकार पतिको पत्नीसे मिला दो; यह उत्तम कल्याणकारी कार्य है, इसे अवश्य करो ॥ ३१ ॥
शिरसा मे शिरश्चास्य कायं कायेन योजय ।
रावणानुगमिष्यामि गतिं भर्तुर्महात्मनः ॥ ३२ ॥
‘ रावण! मेरे सिरसे पतिके सिरका और मेरे शरीरसे उनके शरीर का संयोग करा दो । इस प्रकार मैं अपने महात्मा पतिकी गतिका ही अनुसरण करूँगी ' ॥ ३२ ॥
इतीव दुःखसंतप्ता विललापायतेक्षणा ।
भर्तुः शिरो धनुश्चैव ददर्श जनकात्मजा ॥ ३३ ॥
इस प्रकार दुःखसे संतप्त हुई बिशाललोचना जनकनन्दिनी
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युद्धकाण्डे त्रयस्त्रिंशः सर्गः ११३५ सीता पतिके मस्तक तथा धनुषको देखने और विलाप करने लगीं ॥ ३३ ॥
एवं लालप्यमानायां सीतायां तत्र राक्षसः ।
अभिचक्राम भर्तारमनीकस्थः कृताञ्जलिः ॥ ३४ ॥
जब सीता इस तरह विलाप कर रही थीं, उसी समय वहाँ रावणकी सेनाका एक राक्षस हाथ जोड़े हुए अपने स्वामी-के पास आया ॥ ३४ ॥
विजयस्वार्यपुत्रेति सोऽभिवाद्य प्रसाद्य च ।
न्यवेदयदनुप्राप्तं प्रहस्तं वाहिनीपतिम् ॥ ३५ ॥
उसने ' आर्यपुत्र महाराजकी जय हो ' कहकर रावणका अभिवादन किया और उसे प्रसन्न करके यह सूचना दी कि ' सेनापति प्रहस्त पधारे हैं ॥ ३५ ॥
अमात्यैः सहितः सर्वैः प्रहस्तस्त्वामुपस्थितः ।
तेन दर्शनकामेन अहं प्रस्थापितः प्रभो ॥ ३६ ॥
' प्रभो! सब मन्त्रियोंके साथ प्रहस्त महाराजकी सेवामें उपस्थित हुए हैं । वे आपका दर्शन करना चाहते हैं, इसीलिये उन्होंने मुझे यहाँ भेजा है ॥ ३६ ॥
नूनमस्ति महाराज राजभावात् क्षमान्वित ।
किंचिदात्यकिं कार्य तेषां त्वं दर्शनं कुरु ॥ ३७ ॥
' क्षमाशील महाराज! निश्चय ही कोई अत्यन्त आवश्यक राजकीय कार्य आ पड़ा है, अतः आप उन्हें दर्शन देनेका कष्ट करें? ' || ३७ ॥
एतच्छ्रुत्वा दशग्रीवो राक्षसप्रतिवेदितम् ।
अशोकवनिकां त्यक्त्वा मन्त्रिणां दर्शनं ययौ ॥ ३८ ॥
राक्षसकी कही हुई यह बात सुनकर दशग्रीव रावण अशोकवाटिका छोड़कर मन्त्रियोंसे मिलनेके लिये चला गया ॥ ३८ ॥
स तु सर्व समयैव मन्त्रिभिः कृत्यमात्मनः ।
सभां प्रविश्य विदधे विदित्वा रामविक्रमम् ॥ ३ ९ ॥
उसने मन्त्रियोंसे अपने सारे कृत्यका समर्थन कराया और श्रीरामचन्द्रजीके पराक्रमका पता लगाकर सभाभवन में प्रवेश करके वह प्रस्तुत कार्यकी व्यवस्था करने लगा ॥ ३ ९ ॥
अन्तर्धानं तु तच्छीर्ष तच्च कार्मुकमुत्तमम् ।
जगाम रावणस्यैव निर्याणसमनन्तरम् ॥ ४० ॥
रावणके वहाँसे निकलते ही वह सिर और उत्तम धनुष दोनों अदृश्य हो गये! ४० ॥
राक्षसेन्द्रस्तु तैः सार्धं मन्त्रिभिर्भीमविक्रमैः ।
समर्थयामास तदा रामकार्यविनिश्चयम् ॥ ४१ ॥
राक्षसराज रावणने अपने उन भयानक मन्त्रियोंके साथ बैठकर रामके प्रति किये जानेवाले तत्कालोचित कर्तव्यका निश्चय किया ॥ ४१ ॥
अविदूरस्थितान् सर्वान् बलाध्यक्षान् हितैषिणः ।
अब्रवीत् कालसदृशं रावणो राक्षसाधिपः ॥ ४२ ॥
फिर राक्षसराज रावणने पास ही खड़े हुए अपने हितैषी सेनापतियोंसे इस प्रकार समयानुकूल बात कही ॥ ४२ ॥
शीघ्रं भेरीनिनादेन स्फुटं कोणाहतेन मे ।
समानयध्वं सैन्यानि वक्तव्यं च न कारणम् ॥ ४३ ॥
" तुम सब लोग शीघ्र ही डंडेसे पीट - पीटकर धौंसा बजाते हुए समस्त सैनिकोंको एकत्र करो; परंतु उन्हें इसका कारण नहीं बताना चाहिये ' ॥ ४३ ॥
ततस्तथेति प्रतिगृह्य तद्वच स्तदैव दूताः सहसा महद् बलम् । समानयंश्चैव समागतं च न्यवेदयन् भर्तरि युद्धकाङ्क्षिणि ॥ ४४ ॥
तब दूतोंने ' तथास्तु ' कहकर रावणकी आज्ञा स्वीकार की और उसी समय सहसा विशाल सेनाको एकत्र कर दिया; फिर युद्धकी अभिलाषा रखनेवाले अपने स्वामीको यह सूचना दी कि ' सारी सेना आ गयी ' ॥ ४४ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये युद्धकाण्डे द्वात्रिंशः सर्गः ॥ ३२ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आरामायण आदिकाव्यके सुन्दरकाण्ड में बत्तीसवाँ सगँ पूरा हुआ ॥ ३२ ॥
त्रयस्त्रिंशः सर्गः सरमाका सीताको सान्त्वना देना, रावणकी मायाका भेद खोलना, श्रीराम के आगमनका प्रिय समाचार सुनाना और उनके विजयी होनेका विश्वास दिलाना तु मोहितां दृष्ट्वा सरमा नाम राक्षसी । की राक्षसी उनके पास उसी तरह आयी, जैसे प्रेम रखनेवाली सीतां वैदेहीं प्रियां प्रणयिनी सखीम् ॥ १ ॥ सखी अपनी प्यारी सखीके पास जाती है ॥ १ ॥
आससादाथ विदेहनन्दिनी सीताको मोहमें पड़ी हुई देख सरमा नाम- मोहितां राक्षसेन्द्रेण सीतां परमदुःखिताम् ।
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१ ९ ३६ श्रीमवाल्मीकीय रामायणे आश्वासयामास तदा सरमा मृदुभाषिणी ॥ २ ॥
सीता राक्षसराजकी मायासे मोहित हो बड़े दुःखमें पड़ गयी थीं । उस समय मृदुभाषिणी सरमाने उन्हें अपने वचनों-द्वारा सान्त्वना दी ॥ २ ॥
सा हि तत्र कृता मित्रं सीतया रक्ष्यमाणया ।
रक्षन्ती रावणादिष्टा सानुक्रोशा दृढव्रता ॥ ३ ॥
सरमा रावणकी आज्ञासे सीताजीकी रक्षा करती थी । उसने अपनी रक्षणीया सीताके साथ मैत्री कर ली थी । वह बड़ी दयालु और दृढ़ संकल्प थी ॥ ३ ॥
सा ददर्श सखी सीतां सरमा नष्टचेतनाम् ।
उपावृत्योत्थितां ध्वस्तां वडवामिव पांसुषु ॥ ४ ॥
सरमाने सखी सीताको देखा । उनकी चेतना नष्ट - सी हो रही थी । जैसे परिश्रमसे थकी हुई घोड़ी धरतीकी धूलमें लोटकर खड़ी हुई हो, उसी प्रकार सीता भी पृथ्वीपर लोटकर रोने और विलाप करनेके कारण धूलिधूसरित हो रही थीं ॥ तां समाश्वासयामास सखीस्नेहेन सुव्रताम् ।
समाश्वसिहि वैदेहि मा भूत् ते मनसो व्यथा ।
उक्ता यद् रावणेन त्वं प्रत्युक्तश्च स्वयं त्वया ॥ ५ ॥
सखीस्नेहेन तद् भीरु मया सर्व प्रतिश्रुतम् ।
लीनया गहने शून्ये भयमुत्सृज्य रावणात् ।
तव हेतोर्विशालाक्षि नहि मे रावणाद् भयम् ॥ ६ ॥
उसने एक सखीके स्नेहसे उत्तम व्रतका पालन करने-वाली सीताको आश्वासन दिया- ' विदेहनन्दिनी! धैर्य धारण करो । तुम्हारे मनमें व्यथा नहीं होनी चाहिये । भीरु! रावणने तुमसे जो कुछ कहा है और स्वयं तुमने उसे जो उत्तर दिया है, वह सब मैंने सखीके प्रति स्नेह होने के कारण सुन लिया है । विशाललोचने! तुम्हारे लिये मैं रावणका भय छोड़कर अशोक वाटिकाके सूने गहन स्थानमें छिपकर सारी बातें सुन रही थी । मुझे रावणसे कोई डर नहीं है ॥ ५-६ ॥
स सम्भ्रान्तश्च निष्क्रान्तो यत्कृते राक्षसेश्वरः ।
तत्र मे विदितं सर्वमभिनिष्क्रम्य मैथिलि ॥ ७ ॥
‘ मिथिलेशकुमारी! राक्षसराज रावण जिस कारण यहाँसे घबराकर निकल गया है, उसका भी मैं वहाँ जाकर पूर्णरूपसे पता लगा आयी हूँ ॥ ७ ॥
न शक्यं सौप्तिकं कर्तु रामस्य विदितात्मनः ।
वधश्च पुरुषव्याघ्रे तस्मिन् नैवोपपद्यते ॥ ८ ॥
‘ भगवान् श्रीराम अपने स्वरूपको जाननेवाले सर्वज्ञ परमात्मा हैं । उनका सोते समय वध करना किसीके लिये भी सर्वथा असम्भव है । पुरुषसिंह श्रीरामके विषयमें इस तरह उनके वध होनेकी बात युक्तिसंगत नहीं जान पड़ती ॥ ८ ॥
न त्वेवं वानरा हन्तुं शक्याः पादपयोधिनः ।
सुरा देवर्षभेणेव रामेण हि सुरक्षिताः ॥ ९ ॥
" वानरलोग वृक्षोंके द्वारा युद्ध करनेवाले हैं । उनका भी इस तरह मारा जाना कदापि सम्भव नहीं है; क्योंकि जैसे देवतालोग देवराज इन्द्रसे पालित होते हैं, उसी वानर श्रीरामचन्द्रजीसे भली भाँति सुरक्षित हैं ॥ ९ ॥
दीर्घवृत्तभुजः श्रीमान् महोरस्कः प्रतापवान् धन्वी संनहनोपेतो धर्मात्मा भुवि विश्रुतः विक्रान्तो रक्षिता नित्यमात्मनश्च परस्य च लक्ष्मणेन सह भ्रात्रा कुलीनो नयशास्त्रवित् हन्ता परबलौघानामचिन्त्यबलपौरुषः न हतो राघवः श्रीमान् सीते शत्रुनिबर्हणः ' सीते! श्रीमान् राम गोलाकार बड़ी - बड़ी प्रकार ये
।
॥ १० ॥
।
॥ ११ ॥
।
॥ १२ ॥
भुजाओंसे सुशोभित, चौड़ी छातीवाले, प्रतापी, धनुर्धर, सुगठित शरीरसे युक्त और भूमण्डलमें सुविख्यात धर्मात्मा हैं । उनमें महान् पराक्रम है । वे भाई लक्ष्मणकी सहायतासे अपनी तथा दूसरे-की भी रक्षा करने में समर्थ हैं । नीतिशास्त्र के ज्ञाता और कुलीन हैं । उनके बल और पौरुष अचिन्त्य हैं । वे शत्रुपक्षके सैन्यसमूहों का संहार करनेकी शक्ति रखते हैं । शत्रुसूदन श्रीराम कदापि मारे नहीं गये हैं ॥ १०-१२ ॥
अयुक्तबुद्धिकृत्येन सर्वभूतविरोधिना ।
एवं प्रयुक्ता रौद्रेण माया मायाविना त्वयि ॥ १३ ॥
' रावणकी बुद्धि और कर्म दोनों ही बुरे हैं । वह समस्त प्राणियोंका विरोधी, क्रूर और मायावी है । उसने तुमपर यह माया-का प्रयोग किया था ( वह मस्तक और धनुष मायाद्वारा रचे गये थे ) ॥ १३ ॥
शोकस्ते विगतः सर्वकल्याणं त्वामुपस्थितम् ।
ध्रुवं त्वां भजते लक्ष्मीः प्रियं ते भवति शृणु ॥ १४ ॥
' अब तुम्हारे शोकके दिन बीत गये । सब प्रकार से कल्याणका अवसर उपस्थित हुआ है । निश्चय ही लक्ष्मी तुम्हारा सेवन करती हैं । तुम्हारा प्रिय कार्य होने जा रहा है । उसे बताती हूँ, सुनो ॥ १४ ॥
उत्तीर्य सागरं रामः सह वानरसेनया ।
संनिविष्टः समुद्रस्य तीरमासाद्य दक्षिणम् ॥ १५ ॥
' श्रीरामचन्द्रजी वानरसेनाके साथ समुद्रको लाँघकर इस पार आ गये हैं । उन्होंने सागरके दक्षिणतटपर पड़ाव डाला है ॥ १५ ॥
दृष्टो मे परिपूर्णार्थः काकुत्स्थः सहलक्ष्मणः ।
सहितैः सागरान्तस्थैर्बलैस्तिष्ठति रक्षितः ॥ १६ ॥
" मैंने स्वयं लक्ष्मणसहित पूर्णकाम श्रीरामका दर्शन किया है । वे समुद्रतटपर ठहरी हुई अपनी संगठित सेनाओंद्वारा सर्वथा सुरक्षित हैं ॥ १६ ॥
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अशोक वन में सीताकी अपनी सखी सरमासे बातचीत
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युद्धकाण्डे त्रयस्त्रिंशः सर्गः ११३७
अनेन प्रेषिता ये च राक्षसा लघुविक्रमाः ।
राघवस्तीर्ण इत्येवं प्रवृत्तिस्तैरिहाहृता ॥ १७ ॥
' रावणने जो - जो शीघ्रगामी राक्षस भेजे थे, वे सब यहाँ यही समाचार लाये हैं कि ‘ श्रीरघुनाथजी समुद्रको पार करके आ गये ' ॥ १७ ॥
सतां श्रुत्वा विशालाक्षि प्रवृत्ति राक्षसाधिपः ।
एष मन्त्रयते सर्वैः सचिवैः सह रावणः ॥ १८ ॥
' विशाललोचने! इस समाचारको सुनकर यह राक्षसराज रावण अपने सभी मन्त्रियोंके साथ गुप्त परामर्श कर रहा ' है ' ॥ १८ ॥
इति ब्रुवाणा सरमा राक्षसी सीतया सह ।
सर्वोद्योगेन सैन्यानां शब्दं शुश्राव भैरवम् ॥ १ ९ ॥
जब राक्षसी सरमा सीतासे ये बातें कह रही थी, उसी समय उसने युद्ध के लिये पूर्णतः उद्योगशील सैनिकों का भैरव नाद सुना ॥
दण्डनिर्घातवादिन्याः श्रुत्वा भेर्या महास्वनम् ।
उवाच सरमा सीतामिदं मधुरभाषिणी ॥ २० ॥
डंडेकी चोटसे बजने वाले धौंसेका गम्भीर नाद सुनकर मधुरभाषिणी सरमाने सीतासे कहा – ॥ २० ॥
संनाहजननी ह्येषा भैरवा भीरु भेरिका ।
भेरीनादं च गम्भीरं शृणु तोयदनिःस्वनम् ॥ २१ ॥
‘ भीरु! यह भयानक भेरीनाद युद्धके लिये तैयारीकी सूचना दे रहा है । मेघकी गर्जनाके समान रणभेरीका गम्भीर घोष तुम भी सुन लो ॥ २१ ॥
कल्प्यन्ते मत्तमातङ्गा युज्यन्ते रथवाजिनः ।
दृश्यन्ते तुरगारूढाः प्रासहस्ताः सहस्रशः ॥ २२ ॥
' मतवाले हाथी सजाये जा रहे हैं । रथमें घोड़े जोते जा रहे हैं और हजारों घुड़सवार हाथमें भाला लिये दृष्टिगोचर हो रहे हैं ॥ २२ ॥
तत्र तत्र च संनद्धाः सम्पतन्ति सहस्रशः ।
आपूर्यन्ते राजमार्गाः सैन्यैरद्भुतदर्शनैः ॥ २३ ॥
तोयौघैरिव सागरः । ' जहाँ - तहाँसे युद्धके लिये संनद्ध हुए सहस्रों सैनिक दौड़े चले आ रहे हैं । सारी सड़कें अद्भुत वेषमें सजे और बड़े गर्जना करते हुए सैनिकोंसे उसी तरह भरती जा रही हैं जैसे जलके असंख्य प्रवाह सागर में मिल रहे हों ॥ २३३ ॥
शस्त्राणां च प्रसन्नानां चर्मणां वर्मणां तथा ॥ २४ ॥
रथवाजिगजानां च राक्षसेन्द्रानुयायिनाम् ।
सम्भ्रमो रक्षसामेष हृषितानां तरखिनाम् ॥ २५ ॥
प्रभां विसृजतां पश्य नानावर्णसमुत्थिताम् ।
वनं निर्दहतो धर्मे यथा रूपं विभावसोः ॥ २६ ॥
' नाना प्रकार की प्रभा बिखेरनेवाले चमचमाते हुए अस्त्र-वा ० रा ० ५.८. १७-शस्त्रों, ढालों और कवचोंकी वह चमक देखो । राक्षसराज रावणका अनुगमन करनेवाले रथों, घोड़ों, हाथियों तथा रोमाञ्चित हुए वेगशाली राक्षसों में इस समय यह बड़ी हड़बड़ी दिखायी देती है । ग्रीष्म ऋतुमें वनको जलाते हुए दावानलका जैसा जाज्वल्यमान रूप होता है, वैसी ही प्रभा इन अस्त्र - शस्त्र
आदिकी दिखायी देती है । २४-२६ ॥
घण्टानां शृणु निर्घोषं रथानां शृणु निःखनम् ।
हयानां हेषमाणानां शृणु तूर्यध्वनिं तथा ॥ २७ ॥
' हाथियोंपर बजते हुए घण्टोंका गम्भीर घोष सुनो, रथों की घराहट सुनो और हिनहिनाते हुए घोड़ों तथा भाँति - भाँतिके बाजोंकी आवाज भी सुन लो ॥ २७ ॥
राक्षसेन्द्रानुयायिनाम् ।
सम्भ्रमो रक्षसामे तुमुलो लोमहर्षणम् ॥ २८ ॥
श्रीस्त्वां भजति शोकघ्नी रक्षसां भयमागतम् । ' हाथोंमें हथियार लिये रावणके अनुगामी राक्षसोंमें इस समय बड़ी घबराहट है । इससे यह जान लो कि उनपर कोई बड़ा भारी रोमाञ्चकारी भय उपस्थित हुआ है और शोकका
निवारण करनेवाली लक्ष्मी तुम्हारी सेवामें उपस्थित हो रही है ।
रामः कमलपत्राक्षो दैत्यानामिव वासवः ॥ २ ९ ॥
अवजित्य जितक्रोधस्तमचिन्त्यपराक्रमः ।
रावणं समरे हत्वा भर्ता त्वाधिगमिष्यति ॥ ३० ॥
' तुम्हारे पति कमलनयन श्रीराम क्रोधको जीत चुके हैं । उनका पराक्रम अचिन्त्य है । वे दैत्योंको परास्त करनेवाले इन्द्रकी भाँति राक्षसोंको हराकर समराङ्गणमें रावणका वध करके तुम्हें प्राप्त कर लेंगे ॥ २ ९ -३० ॥
विक्रमिष्यति रक्षःसु भर्ता ते सहलक्ष्मणः ।
यथा शत्रुषु शत्रुघ्नो विष्णुना सह वासवः ॥ ३१ ॥
" जैसे शत्रुसूदन इन्द्रने उपेन्द्रकी सहायतासे शत्रुओं पर पराक्रम प्रकट किया था, उसी प्रकार तुम्हारे पतिदेव श्रीराम अपने भाई लक्ष्मणके सहयोगसे राक्षसोंपर अपने बल - विक्रमका प्रदर्शन करेंगे ॥ ३१ ॥
आगतस्य हि रामस्य क्षिप्रमङ्कागतां सतीम् ।
अहं द्रक्ष्यामि सिद्धार्थं त्वां शत्रौ विनिपातिते ॥ ३२ ॥
' शत्रु रावणका संहार हो जानेपर मैं शीघ्र ही तुम जैसी सती - साध्वीको यहाँ पधारे हुए श्रीरघुनाथजी की गोदमें समोद बैठी देखूँगी । अब शीघ्र ही तुम्हारा मनोरथ पूरा होगा ॥ ३२ ॥
अस्त्राण्यानन्दजानि त्वं वर्तयिष्यसि जानकि ।
समागम्य परिष्वक्ता तस्योरसि महोरसः ॥ ३३ ॥
' जनकनन्दिनि! विशाल वक्षःस्थलसे विभूषित श्रीरामके मिलनेपर उनकी छातीसे लगकर तुम शीघ्र ही नेत्रोंसे आमन्द-के आँसू बहाओगी ॥ ३३ ॥