Ramayana 2 — पृष्ठ 331–340

वाल्मीकि रामायण — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 331–340

पृष्ठ 331

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११३८ श्रीमद्वाल्मीकीय रामायणे

अचिरान्मोक्ष्यते सीते देवि ते जघनं गताम् ।

धृतामेकां बहून् मासान् वेणीं रामो महाबलः ॥ ३४ ॥

" देवि सीते! कई महीनोंसे तुम्हारे केशोंकी एक ही वेणी जटाके रूपमें परिणत हो जो कटिप्रदेशतक लटक रही है, उसे महाबली श्रीराम शीघ्र ही अपने हाथोंसे खोलेंगे ॥ ३४ ॥

तस्य दृष्ट्वा मुखं देवि पूर्णचन्द्रमिवोदितम् ।

मोक्ष्यसे शोकजं वारि निर्मोकमिव पन्नगी ॥ ३५ ॥

" देवि! जैसे नागिन केंचुल छोड़ती है, उसी प्रकार तुम उदित हुए पूर्णचन्द्र के समान अपने पतिका मुदित मुख देख-कर शोकके आँसू बहाना छोड़ दोगी ॥ ३५ ॥

रावणं समरे हत्वा नचिरादेव मैथिलि ।

त्वया समग्रः प्रियया सुखार्हो लप्स्यते सुखम् ॥ ३६ ॥

' मिथिलेशकुमारी! समराङ्गणमें शीघ्र ही रावणका वध करके सुख भोगनेके योग्य श्रीराम सफलमनोरथ हो तुझ प्रियतमा के साथ मनोवाञ्छित सुख प्राप्त करेंगे । ३६ ॥

सभाजिता त्वं रामेण मोदिष्यसि महात्मना ।

सुवर्षेण समायुक्ता यथा सस्येन मेदिनी ॥ ३७ ॥

' जैसे पृथ्वी उत्तम वर्षांसे अभिषिक्त होनेपर हरी - भरी खेतीसे लहलहा उठती है, उसी प्रकार तुम महात्मा श्रीरामसे सम्मानित हो आनन्दमग्न हो जाओगी ॥ ३७ ॥

गिरिवरमभितो हय इव मण्डलमाशु यः करोति । तमिह शरणमभ्युपैहि देवि दिवसकरं प्रभवो हायं प्रजानाम् ॥ ३८ ॥

" देवि! जो गिरिवर मेरुके चारों ओर घूमते हुए अश्वकी भाँति शीघ्रतापूर्वक मण्डलाकार - गति से चलते हैं, उन्हीं भगवान् सूर्यकी ( जो तुम्हारे कुलके देवता हैं ) तुम यहाँ शरण लो; क्योंकि ये प्रजाजनोंको सुख देने तथा उनका दुःख दूर करने में समर्थ हैं ' ॥ ३८ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये युद्धकाण्डे त्रयस्त्रिंशः सर्गः ॥ ३३ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्धरामायण आदिकाव्यके सुन्दरकाण्ड में तैंतीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ३३ ॥

चतुस्त्रिंशः सर्गः सीताके अनुरोध से सरमाका उन्हें मन्त्रियोंसहित रावणका निश्चित विचार बताना

अथ तां जातसंतापां तेन वाक्येन मोहिताम् ।

सरमा ह्लादयामास महीं दग्धामिवाम्भसा ॥ १ ॥

रावण के पूर्वोक्त वचनसे मोहित एवं संतप्त हुई सीताको सरमाने अपनी वाणीद्वारा उसी प्रकार आह्लाद प्रदान किया, जैसे ग्रीष्मऋतुके तापसे दग्ध हुई पृथ्वीको वर्षाकालकी मेघमाला अपने जलसे आह्लादित कर देती है ॥ १ ॥

ततस्तस्या हितं सख्याश्चिकीर्षन्ती सखी वचः ।

उवाच काले कालज्ञा स्मितपूर्वाभिभाषिणी ॥ २ ॥

तदनन्तर समयको पहचानने और मुसकराकर बात करनेवाली सखी सरमा अपनी प्रिय सखी सीताका हित करनेकी इच्छा रखकर यह समयोचित वचन बोली - ॥ २ ॥

उत्सहेयमहं गत्वा त्वद्वाक्यमसितेक्षणे ।

निवेद्य कुशलं रामे प्रतिच्छन्ना निवर्तितुम् ॥ ३ ॥

' कजरारे नेत्रोंवाली सखी! मुझमें यह साहस और उत्साह है कि मैं श्रीराम के पास जाकर तुम्हारा संदेश और कुशल- समाचार निवेदन कर दूँ और फिर छिपी हुई वहाँसे लौट आऊँ ॥ ३ ॥

नहि मे क्रममाणाया निरालम्बे विहायसि ।

समर्थो गतिमन्येतुं पवनो गरुडोऽपि वा ॥ ४ ॥

" निराधार आकाश में तीव्र वेगसे जाती हुई मेरी गतिका अनुसरण करने में वायु अथवा गरुड़ भी समर्थ नहीं हैं ' ॥ ४ ॥

एवं ब्रुवाणां तां सीता सरमामिदमब्रवीत् ।

मधुरं श्लक्ष्णया वाचा पूर्वशोकाभिपन्नया ॥ ५ ॥

ऐसी बात कहती हुई सरमासे सीताने उस स्नेहभरी मधुर वाणीद्वारा जो पहले शोकसे व्याप्त थी, इस प्रकार कहा ॥ ५ ॥

समर्था गगनं गन्तुमपि च त्वं रसातलम् ।

अवगच्छाद्य कर्तव्यं कर्तव्यं ते मदन्तरे ॥ ६ ॥

' सरमे! तुम आकाश और पाताल सभी जगह जानेमें समर्थ हो । मेरे लिये जो कर्तव्य तुम्हें करना है, उसे अब बता रही हूँ, सुनो और समझो ॥ ६ ॥

मत्प्रियं यदि कर्तव्यं यदि बुद्धिः स्थिरा तव ।

ज्ञातुमिच्छामि तं गत्वा किं करोतीति रावणः ॥ ७ ॥

" यदि तुम्हें मेरा प्रिय कार्य करना है और यदि इस विषय में तुम्हारी बुद्धि स्थिर है तो मैं यह जानना चाहती हूँ कि रावण यहाँसे जाकर क्या कर रहा है? ॥ ७ ॥

स हि मायाबलः क्रूरो रावणः शत्रुरावणः ।

मां मोहयति दुष्टात्मा पीतमात्रेव वारुणी ॥ ८ ॥

' शत्रुओंको रुलानेवाला रावण मायाबलसे सम्पन्न है । वह दुष्टात्मा मुझे उसी प्रकार मोहित कर रहा है, जैसे वारुणी अधिक मात्रामें पी लेनेपर वह पीनेवालेको मोहित ( अचेत ) कर देती है ॥ ८ ॥

पृष्ठ 332

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युद्धकाण्डे चतुस्त्रिंशः सर्गः ११३ ९

तर्जापयति मां नित्यं भर्त्तापयति चासकृत् ।

राक्षसीभिः सुघोराभिर्यो मां रक्षति नित्यशः ॥ ९ ॥

" वह राक्षस अत्यन्त भयानक राक्षसियोंद्वारा प्रतिदिन मुझे डाँट बताता है, धमकाता है और सदा मेरी रखवाली करता है ॥ ९ ॥

उद्विग्ना शङ्किता चास्मि न स्वस्थं च मनो मम ।

तद्भयाच्चाहमुद्विग्ना अशोकवनिकां गता ॥ १० ॥

“ मैं सदा उससे उद्विग्न और शङ्कित रहती हूँ । मेरा चित्त स्वस्थ नहीं हो पाता । मैं उसीके भयसे व्याकुल होकर अशोकवाटिका में चली आयी थी ॥ १० ॥

यदि नाम कथा तस्य निश्चितं वापि यद् भवेत् ।

निवेदयेथाः सर्वे तद् वरो मे स्यादनुग्रहः ॥ ११ ॥

‘ यदि मन्त्रियोंके साथ उसकी बातचीत चल रही है तो वहाँ जो कुछ निश्चय हो अथवा रावणका जो निश्चित विचार हो, वह सब मुझे बताती रहो । यह मुझपर तुम्हारी बहुत बड़ी कृपा होगी ' ॥ ११ ॥

साप्येवं ब्रुवतीं सीतां सरमा मृदुभाषिणी ।

उवाच वदनं तस्याः स्पृशन्ती वाष्पविक्लवम् ॥ १२ ॥

ऐसी बातें कहती हुई सीतासे मधुरभाषिणी सरमाने उनके आँसुओंसे भीगे हुए मुखमण्डलको हाथसे पोंछते हुए इस प्रकार कहा- ॥ १२ ॥

एष ते यद्यभिप्रायस्तस्माद् गच्छामि जानकि ।

गृह्य शत्रोरभिप्रायमुपावर्तामि मैथिलि ॥ १३ ॥

" मिथिलेश कुमारी जनकनन्दिनि । यदि तुम्हारी यही इच्छा है तो मैं जाती हूँ और शत्रुके अभिप्रायको जानकर अभी लौटती हूँ ' ॥ १३ ॥

एवमुक्त्वा ततो गत्वा समीपं तस्य रक्षसः ।

शुश्राव कथितं तस्य रावणस्य समन्त्रिणः ॥ १४ ॥

ऐसा कहकर सरमाने उस राक्षसके समीप जाकर मन्त्रियों सहित रावणकी कही हुई सारी बातें सुनीं ॥ १४ ॥

साश्रुत्वा निश्चयं तस्य निश्चयज्ञा दुरात्मनः ।

पुनरेवागमत् क्षिप्रमशोकवनिकां शुभाम् ॥ १५ ॥

उस दुरात्माके निश्चयको सुनकर उसने अच्छी तरह समझ लिया और फिर वह शीघ्र ही सुन्दर अशोकवाटिका में लौट आयी || १५ |

सा प्रविष्टा ततस्तत्र ददर्श जनकात्मजाम् ।

प्रतीक्षमाणां स्वामेव भ्रष्टपद्मामिव श्रियम् ॥ १६ ॥

वहाँ प्रवेश करके उसने अपनी ही प्रतीक्षा में बैठी हुई जनककिशोरी को देखा, जो उस लक्ष्मीके समान जान पड़ती थीं, जिसके हाथका कमल कहीं गिर गया हो ॥ १६ ॥

तां तु सीता पुनः प्राप्तां सरमां प्रियभाषिणीम् ।

परिष्वज्य च सुस्निग्धं ददौ च स्वयमासनम् ॥ १७ ॥

फिर लौटकर आयी हुई प्रियभाषिणी सरमाको बड़े स्नेहसे गले लगाकर सीताने स्वयं उसे बैठने के लिये आसन दिया और कहा ॥ १७ ॥

इहासीना सुखं सर्वमाख्याहि मम तत्त्वतः ।

क्रूरस्य निश्चयं तस्य रावणस्य दुरात्मनः ॥ १८ ॥

' सखी! यहाँ सुखसे बैठकर सारी बातें ठीक - ठीक बताओ । उस क्रूर एवं दुरात्मा रावणने क्या निश्चय किया ' ।

एवमुक्ता तु सरमा सीतया वेपमानया ।

कथितं सर्वमाचष्ट रावणस्य समन्त्रिणः ॥ १ ९ ॥

काँपती हुई सीताके इस प्रकार पूछने पर सरमाने मन्त्रियों सहित रावणकी कही हुई सारी बातें बतायीं ॥ १ ९ ॥।

जनन्या राक्षसेन्द्रो वै त्वन्मोक्षार्थ बृहद्वचः ।

अतिस्निग्धेन वैदेहि मन्त्रिवृद्धेन चोदितः ॥ २० ॥

' विदेहनन्दिनि! राक्षसराज रावणकी माताने तथा रावण के प्रति अत्यन्त स्नेह रखनेवाले एक बूढ़े मन्त्रीने भी बड़ी - बड़ी बातें कहकर तुम्हें छोड़ देनेके लिये रावणको प्रेरित किया ॥ २० ॥

दीयतामभिसत्कृत्य मनुजेन्द्राय मैथिली ।

निदर्शनं ते पर्याप्तं जनस्थाने यदद्भुतम् ॥ २१ ॥

' राक्षसराज! तुम महाराज श्रीराम को सत्कारपूर्वक उनकी पत्नी सीता लौटा दो । जनस्थानमें जो अद्भुत घटना घटित हुई थी, वही श्रीरामके पराक्रमको समझने के लिये पर्याप्त प्रमाण एवं उदाहरण है ॥ २१ ॥

लङ्घनं च समुद्रस्य दर्शनं च हनूमतः ।

वधं च रक्षसां युद्धे कः कुर्यान्मानुषो युधि ॥ २२ ॥

" ( उनके सेवकों में भी अद्भुत शक्ति है ) हनुमान्ने जो समुद्रको लाँघा, सीतासे भेंट की और युद्ध में बहुत - से राक्षसों का वध किया यह सब कार्य दूसरा कौन मनुष्य कर सकता है? ' ॥२२ ॥

एवं स मन्त्रिवृद्धैश्च मात्रा च बहुवोधितः ।

न त्वमुत्सहते मोक्तमर्थमर्थपरो यथा ॥ २३ ॥

' इस प्रकार बूढ़े मन्त्रियों तथा माताके बहुत समझानेपर भी वह तुम्हें उसी तरह छोड़नेकी इच्छा नहीं करता है, जैसे धनका लोभी धनको त्यागना नहीं चाहता है है ॥॥ २३ ॥

नोत्सहत्यमृतो मोक्तं युद्धे त्वामिति मैथिलि ।

सामात्यस्य नृशंसस्य निश्चयो ह्येष वर्तते ॥ २४ ॥

' मिथिलेशकुमारी! वह युद्ध में मरे बिना तुम्हें छोड़नेका साहस नहीं कर सकता । मन्त्रियों सहित उस नृशंस निशाचरका यही निश्चय है || २४ ॥

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१ ९ ४० श्रीमद्वाल्मीकीय रामायणे

तदेषा सुस्थिरा बुद्धिर्मृत्युलोभादुपस्थिता ।

भयान्न शक्तस्त्वां मोक्कुमनिरस्तः स संयुगे ॥ २५ ॥

राक्षसानां च सर्वेषामात्मनश्च वधेन हि । ' रावणके सिरपर काल नाच रहा है । इसलिये उसके मनमें मृत्युके प्रति लोभ पैदा हो गया है । यही कारण है कि तुम्हें न लौटाने के निश्चयपर उसकी बुद्धि सुस्थिर हो गयी है । वह जबतक युद्धमें राक्षसों के संहार और अपने व के द्वारा ( नष्ट ) नहीं हो जायगा; केवल भय दिखानेसे तुम्हें नहीं छोड़ सकता ॥ २५३ ॥

निहत्य रावणं संख्ये सर्वथा निशितैः शरैः ।

प्रतिनेष्यति रामस्त्वामयोध्यामसितेक्षणे ॥ २६ ॥

' कजरारे नेत्रोंवाली सीते! इसका परिणाम यही होगा कि भगवान् श्रीराम अपने सर्वथा तीखे बाणोंसे युद्धस्थलमें रावणका वध करके तुम्हें अयोध्याको ले जायेंगे ' ॥ २६ ॥

एतस्मिन्नन्तरे शब्दो भेरीशङ्खसमाकुलः ।

श्रुतो वै सर्वसैन्यानां कम्पयन् धरणीतलम् ॥ २७ ॥

इसी समय भेरीनाद और शङ्खध्वनिसे मिला हुआ समस्त सैनिकों का महान् कोलाहल सुनायी दिया, जो भूकम्प पैदा कर रहा था ॥ २७ ॥

श्रुत्वा तु तं वानरसैन्यनादं लङ्कागता राक्षसराजभृत्याः । दैत्यपरीतचेष्टाः श्रेयो न पश्यन्ति नृपस्य दोषात् ॥ २८ ॥

वानरसैनिकों के उस भीषण सिंहनादको सुनकर लङ्कामें रहनेवाले राक्षसराज रावणके सेवक हतोत्साह हो गये । उनकी सारी चेष्टा दीनतासे व्याप्त हो गयी । रावण के दोषसे उन्हें भी कोई कल्याणका उपाय नहीं दिखायी देता था ॥ २८ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये युद्धकाण्डे चतुस्त्रिंशः सर्गः ॥ ३४ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्ड में चौंतीसवाँ सगँ पूरा हुआ ॥ ३४ ॥

पञ्चत्रिंशः सर्गः माल्यवानका रावणको श्रीरामसे

तेन शङ्खविमिश्रेण भेरीशब्देन नादिना ।

उपयाति महाबाहू रामः परपुरंजयः ॥ १ ॥

शत्रुनगरीपर विजय पानेवाले महाबाहु श्रीरामने शङ्ख-ध्वनिसे मिश्रित हो तुमुल नाद करनेवाली भेरीकी आवाजके साथ लङ्कापर आक्रमण किया ॥ १ ॥

तं निनादं निशम्याथ रावणो राक्षसेश्वरः ।

मुहूर्त ध्यानमास्थाय सचिवानभ्युदैक्षत ॥ २ ॥

उस भेरीनादको सुनकर राक्षसराज रावणने दो घड़ीतक कुछ सोच - विचार करनेके पश्चात् अपने मन्त्रियोंकी ओर देखा || २ ||

अथ तान् सचिवांस्तत्र सर्वानाभाष्य रावणः ।

सभां संनादयन् सर्वामित्युवाच महाबलः ॥ ३ ॥

जगत्संतापनः क्रूरोऽगर्हयन् राक्षसेश्वरः । उन सब मन्त्रियोंको सम्बोधित करके जगत्को संताप देनेवाले, महाबली, क्रूर राक्षसराज रावणने सारी सभाको प्रतिध्वनित करके किसीपर आक्षेप न करते हुए कहा ॥ ३३ ॥

तरणं सागरस्यास्य विक्रमं बलपौरुषम् ॥ ४ ॥

यदुक्तवन्तो रामस्य भवन्तस्तन्मया श्रुतम् ।

भवतश्चाप्यहं वेद्मि युद्धे सत्यपराक्रमान् ।

तूष्णीकानीक्षतोऽन्योन्यं विदित्वा रामविक्रमम् ॥ ५ ॥

' आपलोगोंने रामके पराक्रम, बल - पौरुष तथा समुद्र-लङ्घनकी जो बात बतायी है, वह सब मैंने सुन ली; परंतु मैं संधि करनेके लिये समझाना तो आपलोगों को भी, जो इस समय रामके पराक्रमकी बातें जानकर चुपचाप एक दूसरेका मुँह देख रहे हैं, संग्रामभूमिमें सत्यपराक्रमी वीर समझता हूँ ' ॥ ४-५ ॥

ततस्तु सुमहाप्राज्ञो माल्यवान् नाम राक्षसः ।

रावणस्य वचः श्रुत्वा इति मातामहोऽब्रवीत् ॥ ६ ॥

रावण के इस आक्षेपपूर्ण वचनको सुननेके पश्चात् महाबुद्धिमान् माल्यवान् नामक राक्षसने, जो रावणका नाना था, इस प्रकार कहा ॥ ६ ॥

विद्यास्वभिविनीतो यो राजा राजन् नयानुगः ।

स शास्ति चिरमैश्वर्यमरींश्च कुरुते वशे ॥ ७ ॥

' राजन्! जो राजा चौदहों विद्याओंमें सुशिक्षित और नीतिका अनुसरण करनेवाला होता है, वह दीर्घकालतक राज्यका शासन करता है । वह शत्रुओंको भी वश में कर लेता है ॥ ७ ॥

संदधानो हि कालेन विगृहंश्चारिभिः सह ।

पक्षे वर्धनं कुर्वन्महदैश्वर्यमश्नुते ॥ ८ ॥

' जो समय के अनुसार आवश्यक होनेपर शत्रुओंके साथ संधि और विग्रह करता है तथा अपने पक्षकी वृद्धि में लगा रहता है, वह महान् ऐश्वर्यका भागी होता है ॥ ८ ॥

हीयमानेन कर्तव्यो राज्ञा संधिः समेन च ।

न शत्रुमवमन्येत ज्यायान् कुर्वीत विग्रहम् ॥ ९ ॥

पृष्ठ 334

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युद्धकाण्डे पञ्चत्रिंशः सर्गः ११४१ ' जिस राजाकी शक्ति क्षीण हो रही हो अथवा जो " शत्रुके समान ही शक्ति रखता हो, उसे संधि कर लेनी चाहिये । अपनेसे अधिक या समान शक्तिवाले शत्रुका कभी अपमान न करे 1 । यदि स्वयं ही शक्ति में बढ़ा - चढ़ा हो, तभी शत्रुके साथ वह युद्ध ठाने ॥ ९ ॥

तन्मह्यं रोचते संधिः सह रामेण रावण ।

यदर्थमभियुक्तोऽसि सीता तस्मै प्रदीयताम् ॥ १० ॥

इसलिये रावण! मुझे तो श्रीरामके साथ संधि करना ही अच्छा लगता है । जिसके लिये तुम्हारे ऊपर आक्रमण हो रहा है, वह सीता तुम श्रीरामको लौटा दो ॥ १० ॥

तस्य देवर्षयः सर्वे गन्धर्वाश्च जयैषिणः ।

विरोधं मा गमस्तेन संधिस्ते तेन रोचताम् ॥ ११ ॥

' देखो, देवता, ऋषि और गन्धर्व सभी श्रीरामकी विजय चाहते हैं, अतः तुम उनसे विरोध न करो । उनके साथ संधि कर लेने की ही इच्छा करो ॥ ११ ॥

असृजद् भगवान् पक्षौ द्वावेव हि पितामहः ।

सुराणामसुराणां च धर्माधर्मौ तदाश्रयौ ॥ १२ ॥

' भगवान् ब्रह्माने सुर और असुर ही पक्ष सृष्टि की है । धर्म और अधर्म ही इनके आश्रय हैं ॥ १२ ॥

धर्मो हि श्रूयते पक्ष अमराणां महात्मनाम् ।

अधर्मो रक्षसां पक्षो ह्यसुराणां च राक्षस ॥ १३ ॥

' सुना जाता है महात्मा देवताओंका पक्ष धर्म है ।

राक्षसराज! राक्षसों और असुरोंका पक्ष अधर्म है ॥ १३ ॥

धर्मो वै ग्रसतेऽधर्म यदा कृतमभूद् युगम् ।

अधर्मो ग्रसते धर्मे यदा तिष्यः प्रवर्तते ॥ १४ ॥

‘ जब सत्ययुग होता है, तब धर्मं बलवान् होकर अधर्मको ग्रस लेता है और जब कलियुग आता है, तब अधर्म ही धर्मको दबा देता है ॥ १४ ॥

तत् त्वया चरता लोकान् धर्मोऽपि निहतो महान् ।

अधर्मः प्रगृहीतश्च तेनास्मद् बलिनः परे ॥ १५ ॥

" तुभने दिग्विजय के लिये सब लोकोंमें भ्रमण करते हुए महान् धर्मका नाश किया है और अधर्मको गले लगाया है, इसलिये हमारे शत्रु हमसे प्रबल हैं ॥ १५ ॥

स प्रमादात् प्रवृद्धस्तेऽधर्मोऽहिर्ग्रसते हि नः ।

विवर्धयति पक्षं च सुराणां सुरभावनः ॥ १६ ॥

' तुम्हारे प्रमादसे बढ़ा हुआ अधर्मरूपी अजगर अब हमें निगल जाना चाहता है और देवताओंद्वारा पालित धर्म उनके पक्षकी वृद्धि कर रहा है ॥ १६ ॥

विषयेषु प्रसक्तेन यत्किचित्कारिणा त्वया ।

ऋषीणामग्निकल्पानामुद्वेगो जनितो महान् ॥ १७ ॥

' विषयों में आसक्त होकर जो कुछ भी कर डालनेवाले तुमने जो मनमाना आचरण किया है, इससे अग्निके समान तेजस्वी ऋषियोंको बड़ा ही उद्वेग प्राप्त हुआ है ॥ १७ ॥

तेषां प्रभावो दुर्धर्षः प्रदीप्त इव पावकः ।

तपसा भावितात्मानो धर्मस्यानुग्रहे रताः ॥ १८ ॥

' उनका प्रभाव प्रज्वलित अग्नि के समान दुर्धर्ष है । वे ऋषि - मुनि तपस्या के द्वारा अपने अन्तःकरणको शुद्ध करके धर्मके ही संग्रह में तत्पर रहते हैं ॥ १८ ॥

मुख्यैर्यज्ञैर्यजन्त्येते तैस्तैर्यत्ते द्विजातयः ।

जुह्वत्यग्नश्च विधिवद् वेदांश्चोच्चैरधीयते ॥ १ ९ ॥

" ये द्विजगण मुख्य - मुख्य यज्ञोंद्वारा यजन करते, विधिवत् अग्निमें आहुति देते और उच्चस्वरसे वेदोंका पाठ करते हैं ॥ १ ९ ॥

अभिभूय च रक्षांसि ब्रह्मघोषानुदीरयन् ।

दिशो विप्रद्रुताः सर्वाः स्तनयित्नुरिवोष्णगे ॥ २० ॥

' उन्होंने राक्षसोंको अभिभूत करके वेदमन्त्रोंकी ध्वनिका विस्तार किया है, इसलिये ग्रीष्म ऋतु मेघकी भाँति राक्षस सम्पूर्ण दिशाओं में भाग खड़े हुए हैं ॥ २० ॥

ऋषीणामग्निकल्पानामग्निहोत्रसमुत्थितः आदत्ते रक्षसां तेजो धूमो व्याप्य दिशो दश ॥ २१ ॥

' अग्नितुल्य तेजस्वी ऋषियोंके अग्निहोत्रसे प्रकट हुआ धूम दसों दिशाओं में व्याप्त होकर राक्षसोंके तेजको हर लेता है ।

तेषु तेषु च देशेषु पुण्येष्वेव दृढव्रतैः ।

चर्यमाणं तपस्तीव्रं संतापयति राक्षसान् ॥ २२ ॥

' भिन्न - भिन्न देशों में पुण्य कर्मोंमें ही लगे रहकर दृढतापूर्वक उत्तम व्रतका पालन करनेवाले ऋषिलोग जो तीव्र तपस्या करते हैं, वही राक्षसोंको संताप दे रही है ॥ २२ ॥

देवदानवयक्षेभ्यो गृहीतश्च वरस्त्वया ।

मनुष्या वानरा ऋक्षा गोलाङ्गूला महाबलाः ।

बलवन्त इहागम्य गर्जन्ति दृढविक्रमाः ॥ २३ ॥

" तुमने देवताओं, दानवों और यक्षोंसे ही अवध्य होनेका वर प्राप्त किया है, मनुष्य आदिसे नहीं । परंतु यहाँ तो मनुष्य, वानर, रीछ और लंगूर आकर गरज रहे हैं । वे सब - के - सब हैं भी बड़े बलवान्, सैनिकशक्तिसे सम्पन्न तथा सुदृढ़ पराक्रमी ॥ २३ ॥

उत्पातान् विविधान् दृष्ट्वा घोरान् बहुविधान् बहून् ।

विनाशमनुपश्यामि सर्वेषां रक्षसामहम् ॥ २४ ॥

' नाना प्रकार के बहुत - से भयंकर उत्पातोंको लक्ष्य करके मैं तो इन समस्त राक्षसोंके विनाशका ही अवसर उपस्थित देख रहा हूँ ॥ २४ ॥

खराभिस्तनिता घोरा मेघाः प्रतिभयंकराः ।

पृष्ठ 335

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११४२ श्रीमद्वाल्मीकीय रामायणे शोणितेनाभिवर्षन्ति लङ्कामुष्णेन सर्वतः ॥ २५ ॥

' घोर एवं भयंकर मेघ प्रचण्ड गर्जन तर्जन के साथ लङ्कापर सब ओरसे गर्म खूनकी वर्षा कर रहे हैं ॥ २५ ॥

रुदतां वाहनानां च प्रपतन्त्यश्रुविन्दवः ।

रजोध्वस्ता विवर्णाश्च न प्रभान्ति यथापुरम् ॥ २६ ॥

' घोड़े - हाथी आदि वाहन रो रहे हैं और उनके नेत्रोंसे अश्रुविन्दु झर रहे हैं । दिशाएँ धूल भर जानेसे मलिन हो अब पहले की भाँति प्रकाशित नहीं हो रही हैं ॥ २६ ॥

व्याला गोमायवो गृधा वाश्यन्ति च सुभैरवम् ।

प्रविश्य लङ्कामारामे समवायांश्च कुर्वते ॥ २७ ॥

मांसभक्षी हिंसक पशु, गीदड़ और गीध भयंकर बोली बोलते हैं तथा लङ्काके उपवन में घुसकर झुंड बनाकर बैठते हैं ॥ २७ ॥

कालिकाः पाण्डुरैर्दन्तैः प्रहसन्त्यग्रतः स्थिताः ।

स्त्रियः खप्नेषु मुष्णन्त्यो गृहाणि प्रतिभाष्य च ॥ २८ ॥

' सपने में काले रंग की स्त्रियाँ अपने पीले दाँत दिखाती हुई सामने आकर खड़ी हो जाती और प्रतिकूल बातें कहकर घर के सामान चुराती हुई जोर - जोर से हँसती हैं ॥ २८ ॥

ग्रहाणां बलिकर्माणि श्वानः पर्युपभुञ्जते ।

खरा गोषु प्रजायन्ते मूषका नकुलेषु च ॥ २ ९ ॥

' घरों में जो बलिकर्म किये जाते हैं, उस बलि - सामग्रीको कुत्ते खा जाते हैं । गौओंसे गधे और नेवलोंसे चूहे पैदा होते हैं ॥ २ ९ ॥

माजरा द्वीपिभिः सार्धं सूकराः शुनकैः सह ।

किंनरा राक्षसैश्चापि समेयुर्मानुषैः सह ॥ ३० ॥

' बाघके साथ बिलाव, कुत्तोंके साथ सूअर तथा राक्षसों और मनुष्यों के साथ किन्नर समागम करते हैं ॥ ३० ॥

पाण्डुरा रक्तपादाश्च विहगाः कालचोदिताः ।

राक्षसानां विनाशाय कपोता विचरन्ति च ॥ ३१ ॥

' जिनकी पाँखें सफेद और पंजे लाल हैं, वे कबूतर पक्षी दैवसे प्रेरित हो राक्षसोंका भावी विनाश सूचित करने के लिये यहाँ सब ओर विचरते हैं ॥ ३१ ॥

चीचीकूचीति वाशन्त्यः शारिका वेश्मसु स्थिताः ।

पतन्ति ग्रथिताश्चापि निर्जिताः कलहैषिभिः ॥ ३२ ॥

' घरोमं रहनेवाली सारिकाएँ कलहकी इच्छावाले दूसरे पक्षियोंसे चें - चें करती हुई गुँथ जाती हैं और उनसे पराजित हो पृथ्वीपर गिर पड़ती हैं ॥ ३२ ॥

पक्षिणश्च मृगाः सर्वे प्रत्यादित्यं रुदन्ति ते ।

करलो विकटो मुण्डः पुरुषः कृष्णपिङ्गलः ॥ ३३ ॥

कालो गृहाणि सर्वेषां काले कालेऽन्ववेक्षते । " पक्षी और मृग सभी सूर्य की ओर मुँह करके रोते हैं । विकराल, विकट, काले और भूरे रंगके मूड़ मुद्दाये हुए पुरुषका रूप धारण करके काल समय- समयपर हम सबके घरोंकी ओर देखता है ॥ ३३३ ॥

एतान्यन्यानि दुष्टानि निमित्तान्युत्पतन्ति च ॥ ३४ ॥

विष्णुं मन्यामहे रामं मानुषं रूपमास्थितम् ।

नहि मानुषमात्रोऽसौ राघवो दृढविक्रमः ॥ ३५ ॥

येन बद्धः समुद्रे च सेतुः स परमाद्भुतः ।

कुरुष्व नरराजेन संधि रामेण रावण ।

ज्ञात्वावधार्य कर्माणि क्रियतामायतिक्षमम् ॥ ३६ ॥

" ये तथा और भी बहुत - से अपशकुन हो रहे हैं । मैं ऐसा समझता हूँ कि साक्षात् भगवान् विष्णु ही मानवरूप धारण करके राम होकर आये हैं । जिन्होंने समुद्र में अत्यन्त अद्भुत सेतु बाँधा है, वे दृढपराक्रमी रघुवीर साधारण मनुष्यमात्र नहीं हैं । रावण! तुम नरराज श्रीराम के साथ संधि कर लो । श्रीरामके अलौकिक कर्मों और लङ्कामें होनेवाले उत्पातोंको जानकर जो कार्य भविष्य में सुख देनेवाला हो, उसका निश्चय करके वही करो ' ॥ ३४-३६ ॥ इदं वचस्तस्य निगद्य माल्यवान् परीक्ष्य रक्षोधिपतेर्मनः पुनः । अनुत्तमेषूत्तमपौरुषो बली बभूव तूष्णीं समवेक्ष्य रावणम् ॥ ३७ ॥

यह बात कहकर तथा राक्षसराज रावणके मनोभावकी परीक्षा करके उत्तम मन्त्रियोंमें श्रेष्ठ पौरुषशाली महाबली माल्यवान् रावण की ओर देखता हुआ चुप हो गया ॥ ३७ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये युद्धकाण्डे पञ्चत्रिंशः सर्गः ॥ ३५ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्धरामायण आदिकाव्य के युद्धकाण्ड में पैंतीसवाँ सगँ पूरा हुआ ॥ ३५ ॥

षट्त्रिंशः सर्गः माल्यवानूपर आक्षेप और नगरकी रक्षाका प्रबन्ध करके रावणका अपने अन्तःपुरमें जाना तत् तु माल्यवतो वाक्यं हितमुक्तं दशाननः । इसलिये माल्यवान् की कही हुई हितकर बात को भी वह न मर्षयति दुष्टात्मा कालस्य वशमागतः ॥ १ ॥ सहन नहीं कर सका ॥ १ ॥

दुष्टात्मा दशमुख रावण कालके अधीन हो रहा था, स बद्ध्वा भ्रुकुटिं वक्त्रे क्रोधस्य वशमागतः ।

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युद्धकाण्डे षट्त्रिंशः सर्गः ११४३ अमर्षात् परिवृत्ताक्षो माल्यवन्तमथाब्रवीत् ॥ २ ॥

वह क्रोधके वशीभूत हो गया । अमर्षसे उसके नेत्र घूमने लगे । उसने भौंहें टेढ़ी करके माल्यवान्से कहा – ॥

हितबुद्धया यदहितं वचः परुषमुच्यते ।

परपक्षं प्रविश्यैव नैतच्छ्रोत्रगतं मम ॥ ३ ॥

' तुमने शत्रुका पक्ष लेकर हित - बुद्धि से जो मेरे अहित-की कठोर बात कही है, वह पूरी तौरसे मेरे कानोंतक नहीं पहुँची ॥ ३ ॥

मानुषं कृपणं राममेकं शाखामृगाश्रयम् ।

समर्थ मन्यसे केन त्यक्तं पित्रा वनाश्रयम् ॥ ४ ॥

' बेचारा राम एक मनुष्य ही तो है, जिसने सहारा लिया कुछ बंदरोंका । पिताके त्याग देनेसे उसने नकी शरण ली है । उसमें कौन - सी ऐसी विशेषता है, जिससे तुम उसे बड़ा सामर्थ्यशाली मान रहे हो ॥ ४ ॥

रक्षसामीश्वरं मां च देवानां च भयंकरम् ।

हीनं मां मन्यसे केन अहीनं सर्वविक्रमैः ॥ ५ ॥

" मैं राक्षसों का स्वामी तथा सभी प्रकारके पराक्रमोंसे सम्पन्न हूँ, देवताओंके मनमें भी भय उत्पन्न करता हूँ; फिर किस कारणसे तुम मुझे रामकी अपेक्षा हीन समझते हो? || ५ |

वीरद्वेषेण वा शङ्के पक्षपातेन वा रिपोः ।

त्वयाहं परुषाण्युक्तो परप्रोत्साहनेन वा ॥ ६ ॥

' तुमने जो मुझे कठोर बातें सुनायी हैं, उनके विषय में मुझे शङ्का है कि तुम या तो मुझ जैसे वीरसे द्वेष रखते हो या शत्रुसे मिले हुए हो अथवा शत्रुओंने ऐसा कहने या करनेके लिये तुम्हें प्रोत्साहन दिया है ॥ ६ ॥

प्रभवन्तं पदस्थं हि परुषं कोऽभिभाषते ।

पण्डितः शास्त्रतत्त्वज्ञो विना प्रोत्साहनेन वा ॥ ७ ॥

' जो प्रभावशाली होने के साथ ही अपने राज्यपर प्रतिष्ठित है, ऐसे पुरुषको कौन शास्त्रतत्त्वज्ञ विद्वान् शत्रुका प्रोत्साहन पाये बिना कटुवचन सुना सकता है? ॥ ७ ॥

आनीय च वनात् सीतां पद्महीनामिव श्रियम् ।

किमर्थ प्रतिदास्यामि राघवस्य भयादहम् ॥ ८ ॥

' कमलहीन कमलाकी भाँति सुन्दरी सीताको वनसे ले आकर अब केवल रामके भयसे मैं कैसे लौटा हूँ? ॥ ८ ॥

वृतं वानरकोटीभिः ससुग्रीवं सलक्ष्मणम् ।

पश्य कैश्चिदहोभिश्च राघवं निहतं मया ॥ ९ ॥

' करोड़ों वानरोंसे घिरे हुए सुग्रीव और लक्ष्मणसहित

द्वन्द्वे यस्य न तिष्ठन्ति दैवतान्यपि संयुगे ।

स कस्माद रावणो युद्धे भयमाहारयिष्यति ॥ १० ॥

' जिसके सामने द्वन्द्वयुद्धमें देवता भी नहीं ठहर पाते हैं, वही रावण युद्ध में किससे भयभीत होगा ॥ १० ॥

द्विधा भज्येयमप्येवं न नमेयं तु कस्यचित् ।

एष मे सहजो दोषः स्वभावो दुरतिक्रमः ॥ ११ ॥

" मैं बीचसे दो टूक हो जाऊँगा, पर किसीके सामने झुक नहीं सकूँगा, यह मेरा सहज दोष है और स्वभाव किसीके लिये भी दुर्लङ्घथ होता है ॥ ११ ॥

यदि तावत् समुद्रे तु सेतुर्बद्धो यदृच्छया ।

रामेण विस्मयः कोऽत्र येन ते भयमागतम् ॥ १२ ॥

' यदि रामने दैववश समुद्रपर सेतु बाँध लिया तो इसमें विस्मयकी कौन बात है, जिससे तुम्हें इतना भय हो गया है? ॥ १२ ॥

स तु तीर्त्वार्णवं रामः सह वानरसेनया ।

प्रतिजानामि ते सत्यं न जीवन् प्रतियास्यति ॥ १३ ॥

" मैं तुम्हारे आगे सच्ची प्रतिज्ञा करके कहता हूँ कि समुद्र पार करके बानरसेनासहित आये हुए राम यहाँ से जीवित नहीं लौट सकेंगे ' ॥ १३ ॥

एवं ब्रुवाणं संरब्धं रुष्टं विज्ञाय रावणम् ।

व्रीडितो माल्यवान् वाक्यं नोत्तरं प्रत्यपद्यत ॥ १४ ॥

ऐसी बातें कहते हुए रावणको क्रोधसे भरा हुआ एवं रुष्ट जानकर माल्यवान् बहुत लंजित हुआ और उसने कोई उत्तर नहीं दिया ॥ १४ ॥

जयाशिषा तु राजानं वर्धयित्वा यथोचितम् ।

माल्यवानभ्यनुज्ञातो जगाम स्वं निवेशनम् ॥ १५ ॥

माल्यवान् ने महाराजकी जय हो ' इस विजयसूचक आशीर्वादसे राजाको यथोचित बढ़ावा दिया और उससे आज्ञा लेकर वह अपने घर चला गया ॥ १५ ॥

रावणस्तु सहामात्यो मन्त्रयित्वा विमृश्य च ।

लङ्कायास्तु तदा गुप्तिं कारयामास राक्षसः ॥ १६ ॥

तदनन्तर मन्त्रियों सहित राक्षस रावणने परस्पर विचार-विमर्श करके तत्काल लङ्काकी रक्षाका प्रबन्ध किया ॥ १६ ॥

व्यादिदेश च पूर्वस्यां प्रहस्तं द्वारि राक्षसम् ।

दक्षिणस्यां महावीर्यौ महापार्श्वमहोदरौ ॥ १७ ॥

पश्चिमायामथ द्वारि पुत्रमिन्द्रजितं तदा ।

व्यादिदेश महामायं राक्षसैर्बहुभिर्वृतम् ॥ १८ ॥

उसने पूर्व द्वारपर उसकी रक्षाके लिये राक्षस प्रहस्तको रामको मैं कुछ ही दिनोंमें मार डालूँगा, यह तुम अपनी तैनात किया, दक्षिण द्वारपर महापराक्रमी महापार्श्व और आँखों देख लेना ॥ ९ ॥ महोदरको नियुक्त किया तथा पश्चिम द्वारपर अपने पुत्र इन्द्रजित् को

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१ ९ ४४ श्रीमवाल्मीकीय रामायणे रक्खा, जो महान् मायाबी था । वह बहुत - से राक्षसोंद्वारा घिरा हुआ था ॥ १७-१८ ॥

उत्तरस्यां पुरद्वारि व्यादिश्य शुकसारणौ ।

स्वयं चात्र गमिष्यामि मन्त्रिणस्तानुवाच ह ॥ १ ९ ॥

तदनन्तर नगरके उत्तर द्वारपर शुक और सारणको रक्षा के लिये जानेकी आज्ञा दे मन्त्रियोंसे रावणने कहा- मैं स्वयं भी उत्तर द्वारपर जाऊँगा ' ॥ १ ९ ॥

राक्षसं तु विरूपाक्षं महावीर्यपराक्रमम् ।

मध्यमेऽस्थापयद् गुल्मे बहुभिः सह राक्षसैः ॥ २० ॥

नगर के बीच की छावनीपर उसने बहुसंख्यक राक्षसोंके साथ महान् बल - पराक्रम से सम्पन्न राक्षस विरूपाक्षको स्थापित किया ॥ २० ॥

एवं विधानं लङ्कायां कृत्वा राक्षसपुंगवः ।

कृतकृत्यमिवात्मानं मन्यते कालचोदितः ॥ २१ ॥

इस प्रकार लङ्कामें पुरीकी रक्षाका प्रबन्ध करके काल-प्रेरित राक्षसशिरोमणि रावण अपने आपको कृतकृत्य मानने लगा ॥ २१ ॥

विसर्जयामास ततः स मन्त्रिणो विधानमाज्ञाप्य पुरस्य पुष्कलम् । जयाशिषा मन्त्रिगणेन पूजितो विवेश सोऽन्तःपुरमृद्धिमन्महत् ॥ २२ ॥

इस तरह नगरके संरक्षणकी प्रचुर व्यवस्थाके लिये आज्ञा देकर रावणने सब मन्त्रियों को विदा कर दिया और स्वयं भी उनके विजयसूचक आशीर्वाद से सम्मानित हो अपने समृद्धिशाली एवं विशाल अन्तःपुरमें चला गया ॥ २२ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये युद्धकाण्डे षट्त्रिंशः सर्गः ॥ ३६ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आपरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्ड में छत्तीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ३६ ॥

सप्तत्रिंशः सर्गः विभीषणका श्रीरामसे रावणद्वारा किये गये लङ्काकी रक्षाके प्रबन्धका वर्णन तथा श्रीरामद्वारा लङ्काके विभिन्न द्वारोंपर आक्रमण करनेके लिये अपने सेनापतियों की नियुक्ति

नरवानर राजान स तु वायुसुतः कपिः ।

जाम्बवानृक्षराजश्च राक्षसश्च विभीषणः ॥ १ ॥

अङ्गदो वालिपुत्रश्च सौमित्रिः शरभः कपिः ।

सुषेणः सहदायादो मैन्दो द्विविद एव च ॥ २ ॥

गजो गवाक्षः कुमुदो नलोऽथ पनसस्तथा ।

अमित्रविषयं प्राप्ताः समवेताः समर्थयन् ॥ ३ ॥

शत्रुके देशमें पहुँचे हुए नरराज श्रीराम, सुमित्राकुमार लक्ष्मण, वानरराज सुग्रीव, वायुपुत्र हनुमान्, ऋक्षराज जाम्बवान् राक्षस विभीषण, वालिपुत्र अङ्गद, शरभ, बन्धु बान्धवोंसहित सुषेण, मैन्द, द्विविद, गज, गवाक्ष, कुमुद, नल और पनस - ये सब आपस में मिलकर विचार करने लगे- ॥ १-३ ॥

इयं सा लक्ष्यते लङ्का पुरी रावणपालिता ।

सासुरोरगगन्धर्वैरमरैरपि दुर्जया ॥ ४ ॥

" यही वह लङ्कापुरी दिखायी देती है, जिसका पालन रावण करता है । असुर, नाग और गन्धवसहित सम्पूर्ण देवताओंके लिये भी इसपर विजय पाना अत्यन्त कठिन है ॥ ४ ॥

कार्यसिद्धि पुरस्कृत्य मन्त्रयध्वं विनिर्णये ।

नित्यं संनिहितो यत्र रावणो राक्षसाधिपः ॥ ५ ॥

' राक्षसराज रावण इस पुरीमें सदा निवास करता है । अब आपलोग इसपर विजय पानेके उपायोंका निर्णय करनेके लिये परस्पर विचार करें ' ॥ ५ ॥

अथ तेषु वाणेषु रावणावरजोऽब्रवीत् ।

वाक्यमग्राम्यपदवत् पुष्कलार्थ विभीषणः ॥ ६ ॥

उन सबके इस प्रकार कहनेपर रावणके छोटे भाई विभीषण-ने संस्कारयुक्त पद और प्रचुर अर्थसे भरी हुई वाणी में कहा I ॥ ६ ॥

अनलः पनसश्चैव सम्पातिः प्रमतिस्तथा ।

गत्वा लङ्कां ममामात्याः पुरीं पुनरिहागताः ॥ ७ ॥

' मेरे मन्त्री अनल, पनस, सम्पाति और प्रमति – ये चारों लङ्कापुरीमें जाकर फिर यहाँ लौट आये हैं ॥ ७ ॥

भूत्वा शकुनयः सर्वे प्रविष्टश्च रिपोर्बलम् ।

विधानं विहितं यच्च तद् दृष्ट्वा समुपस्थिताः ॥ ८ ॥

" ये सब लोग पक्षीका रूप धारण करके शत्रुकी सेनामें गये थे और वहाँ जो व्यवस्था की गयी है, उसे अपनी आँखों देखकर फिर यहाँ उपस्थित हुए हैं ॥ ८ ॥

संविधानं यथाहुस्ते रावणस्य दुरात्मनः ।

राम तद्वतः सर्व याथातथ्येन मे शृणु ॥ ९ ॥

' श्रीराम! इन्होंने दुरात्मा रावणके द्वारा किये गये नगर-रक्षाके प्रबन्धका जैसा वर्णन किया है, उसे मैं ठीक - ठीक बताता हूँ । आप वह सब मुझसे सुनिये ॥ ९ ॥

पूर्व प्रहस्तः सबलो द्वारमासाद्य तिष्ठति ।

दक्षिणं च महावीर्यो महापार्श्वमहोदरौ ॥ १० ॥

“ सेनासहित प्रहस्त नगरके पूर्वद्वारका आश्रय लेकर खड़ा

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युद्धकाण्डे सप्तत्रिंशः सर्गः ११४ ९ है । महापराक्रमी महापार्श्व और महोदर दक्षिण द्वारपर खड़े हैं ॥ १० ॥

इन्द्रजित् पश्चिमं द्वारं राक्षसैर्वहुभिर्वृतः ।

पट्टिशासिधनुष्मद्भिः शूलमुद्रपाणिभिः ॥ ११ ॥

नानाप्रहरणैः शूरैरावृतो रावणात्मजः । ' बहुसंख्यक राक्षसों से घिरा हुआ इन्द्रजित् नगरके पश्चिम द्वापर खड़ा है । उसके साथी राक्षस पडिश, खड्ग, धनुष, शूल और मुद्गर आदि अस्त्र - शस्त्र हाथोंमें लिये हुए हैं । नाना प्रकार के आयुध धारण करनेवाले शूरवीरोंसे घिरा हुआ वह रावणकुमार पश्चिमद्वारकी रक्षाके लिये डटा है ॥ ११३ ॥

राक्षसानां सहस्रैस्तु बहुभिः शस्त्रपाणिभिः ॥ १२ ॥

युक्तः परमसंविग्नो राक्षसैः सह मन्त्रवित् ।

उत्तरं नगरद्वारं रावणः स्वयमास्थितः ॥ १३ ॥

' स्वयं मन्त्रवेत्ता रावण शुक, सारण आदि कई सहस्र शस्त्रधारी राक्षसोंके साथ नगरके उत्तर द्वारपर सावधानीके साथ खड़ा है । वह मन - ही - मन अत्यन्त उद्विग्न जान पड़ता है ॥ १२-१३ ॥

विरूपाक्षस्तु महता शूलखड्गधनुष्मता ।

बलेन राक्षसैः सार्धं मध्यमं गुल्ममाश्रितः ॥ १४ ॥

' विरूपाक्ष शूल, खड्ग और धनुष धारण करनेवाली विशाल राक्षससेनाके साथ नगरके बीच की छावनीपर खड़ा है ॥ १४ ॥

एतानेवंविधान् गुल्मालङ्कायां समुदीक्ष्य ते ।

मामका मन्त्रिणः सर्वे शीघ्रं पुनरिहागताः ॥ १५ ॥

‘ इस प्रकार मेरे सारे मन्त्री लङ्कामें विभिन्न स्थानों पर नियुक्त हुई इन सेनाओंका निरीक्षण करके फिर शीघ्र यहाँ लौटे हैं ॥ १५ ॥

गजानां दशसाहस्रं रथानामयुतं तथा ।

हयानामयुते द्वे च साग्रकोटिश्च रक्षसाम् ॥ १६ ॥

' रावण की सेना में दस हजार हाथी, दस हजार रथ, बीस हजार घोड़े और एक करोड़से भी ऊपर पैदल राक्षस हैं ।

विक्रान्ता बलवन्तश्च संयुगेष्वाततायिनः ।

इष्टा राक्षसराजस्य नित्यमेते निशाचराः ॥ १७ ॥

‘ वे सभी बड़े वीर, बल - पराक्रमसे सम्पन्न और युद्धमें आततायी हैं । ये सभी निशाचर राक्षसराज रावणको सदा ही प्रिय हैं ॥ १७ ॥

एकैकस्यात्र युद्धार्थे राक्षसस्य विशाम्पते ।

परीवारः सहस्राणां सहस्रमुपतिष्ठते ॥ १८ ॥

' प्रजानाथ! इनमेंसे एक - एक राक्षसके पास युद्धके लिये दस - दस लाख का परिवार उपस्थित है ' ॥ १८ ॥

एतां प्रवृत्ति लङ्कायां मन्त्रिप्रोतां विभीषणः ।

एवमुक्त्वा महाबाहू राक्षसांस्तानदर्शयत् ॥ १ ९ ॥

वा ० रा ० ५.८.१८-लङ्कायां सचिवैः सर्वे रामाय प्रत्यवेदयत् । महाबाहु विभीषणने मन्त्रियोंद्वारा बताये गये लङ्काविषयक समाचारको इस प्रकार बताकर उन मन्त्रीस्वरूप राक्षसों को भी श्रीरामसे मिलाया और उनके द्वारा लङ्काका सारा वृत्तान्त पुनः उनसे कहलाया ॥ १ ९ ३ ॥ रामं कमलपत्राक्षमिदमुत्तरमब्रवीत् ॥ २० ॥

रावणावरजः श्रीमान् रामप्रियचिकीर्षया । तदनन्तर रावणके छोटे भाई श्रीमान् विभीषण ने कमलनयन श्रीरामसे उनका प्रिय करनेके लिये स्वयं भी यह उत्तम बात कही -- ॥ २०३ ॥

कुबेरं तु यदा राम रावणः प्रतियुद्धयति ॥ २१ ॥

षष्टिः शतसहस्राणि तदा निर्यान्ति राक्षसाः ।

पराक्रमेण वीर्येण तेजसा सत्त्वगौरवात् ।

सदृशा ह्यत्र दर्पेण रावणस्य दुरात्मनः ॥ २२ ॥

' श्रीराम! जब रावणने कुबेरके साथ युद्ध किया था, उस समय साठ लाख राक्षस उसके साथ गये थे । वे सब - के-सब बल, पराक्रम, तेज, धैर्य की अधिकता और दर्पकी दृष्टिसे दुरात्मा रावणके ही समान थे । २१-२२ ॥

अत्र मन्युर्न कर्तव्यः कोपये त्वां न भीषये ।

समर्थो ह्यसि वीर्येण सुराणामपि निग्रहे ॥ २३ ॥

" मैंने जो रावणकी शक्तिका वर्णन किया है, इसको लेकर न तो आपको अपने मन में दीनता लानी चाहिये और न मुझ-पर रोष ही करना चाहिये । मैं आपको डराता नहीं, शत्रुके प्रति आपके क्रोधको उभाड़ रहा हूँ; क्योंकि आप अपने बल-पराक्रमद्वारा देवताओंका भी दमन करनेमें समर्थ हैं || २३ ||

तद्भवांश्चतुरङ्गेण बलेन महता वृतम् ।

व्यूह्येदं वानरानीकं निर्मथिष्यसि रावणम् ॥ २४ ॥

‘ इसलिये आप इस वानरसेनाका व्यूह बनाकर ही विशाल चतुरङ्गिणी सेनासे घिरे हुए रावण का विनाश कर सकेंगे ' । २४ ।

रावणावरजे वाक्यमेवं ब्रुवति राघवः ।

शत्रूणां प्रतिघातार्थमिदं वचनमब्रवीत् ॥ २५ ॥

विभीषणके ऐसी बात कहनेपर भगवान् श्रीरामने शत्रुओंको परास्त करने के लिये इस प्रकार कहा– ॥ २५ ॥

पूर्वद्वारं तु लङ्काया नीलो वानरपुङ्गवः ।

प्रहस्तं प्रतियोद्धा स्याद् वानरैर्बहुभिर्वृतः ॥ २६ ॥

' बहुसंख्यक वानरोंसे घिरे हुए कपिश्रेष्ठ नील पूर्व द्वारपर जाकर प्रहस्त का सामना करें ॥ २६ ॥

अङ्गदो बालिपुत्रस्तु बलेन महता वृतः ।

दक्षिणे वाधतां द्वारे महापार्श्वमहोदरौ ॥ २७ ॥

‘ विशाल वाहिनीसे युक्त वालिकुमार अङ्गद दक्षिण द्वारपर स्थित हो महापार्श्व और महोदरके कार्यमें बाधा दें ॥ २७ ॥

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११४६ श्रीमद्वाल्मीकीय रामायणे

हनूमान् पश्चिमद्वारं निष्पीड्य पवनात्मजः ।

प्रविशत्वप्रमेयात्मा बहुभिः कपिभिर्वृतः ॥ २८ ॥

' पवनकुमार हनुमान् अप्रमेय आत्मबलसे सम्पन्न हैं । ये बहुत - से वानरोंके साथ लङ्काके पश्चिम फाटक में प्रवेश करें ॥ २८ ॥

दैत्यदानवसङ्घानामृषीणां च महात्मनाम् ।

विप्रकारप्रियः क्षुद्रो वरदानबलान्वितः ॥ २ ९ ॥

परिक्रमति यः सर्वाल्लोकान् संतापयन् प्रजाः ।

तस्याहं राक्षसेन्द्रस्य स्वयमेव वधे धृतः ॥ ३० ॥

उत्तरं नगरद्वारमहं सौमित्रिणा सह ।

निपीड्याभिप्रवेक्ष्यामि सवलो यत्र रावणः ॥ ३१ ॥

‘ दैत्यों, दानवसमूहों तथा महात्मा ऋषियोंका अपकार करना ही जिसे प्रिय लगता है, जिसका स्वभाव क्षुद्र है, जो वरदानकी शक्तिसे सम्पन्न है और प्रजाजनोंको संताप देता हुआ सम्पूर्ण लोकों में घूमता रहता है, उस राक्षसराज रावणके वध-का दृढ़ निश्चय लेकर मैं स्वयं ही सुमित्राकुमार लक्ष्मणके साथ नगरके उत्तर फाटकपर आक्रमण करके उसके भीतर प्रवेश करूँगा, —— जहाँ सेनासहित रावण विद्यमान है । २ ९ –३१ ॥

वानरेन्द्रश्च बलवानृक्षराजश्च वीर्यवान् ।

राक्षसेन्द्रानुजश्चैव गुल्मे भवतु मध्यमे ॥ ३२ ॥

' बलवान् वानरराज सुग्रीव, रीछोंके पराक्रमी राजा जाम्बवान् तथा राक्षसराज रावणके छोटे भाई विभीषण - ये लोग नगर के बीच के मोर्चेपर आक्रमण करें ॥ ३२ ॥

न चैव मानुषं रूपं कार्य हरिभिराहवे ।

एषा भवतु नः संज्ञा युद्धेऽस्मिन् वानरे बले ॥ ३३ ॥

" वानरोंको युद्धमें मनुष्यका रूप नहीं धारण करना चाहिये । इस युद्धमें वानरोंकी सेनाका हमारे लिये यही संकेत या चिह्न होगा ॥ ३३ ॥

वानरा एव नश्चिह्नं स्वजनेऽस्मिन् भविष्यति ।

वयं तु मानुषेणैव सप्त योत्स्यामहे परान् ॥ ३४ ॥

" इस स्वजनवर्ग में वानर ही हमारे चिह्न होंगे । केवल हम सात व्यक्ति ही मनुष्यरूपमें रहकर शत्रुओंके साथ युद्ध करेंगे || ३४ ॥

अहमेव सह भ्रात्रा लक्ष्मणेन महौजसा ।

आत्मना पञ्चमश्चायं सखा मम विभीषणः ॥ ३५ ॥

“ मैं अपने महातेजस्वी भाई लक्ष्मणके साथ रहूँगा और ये मेरे मित्र विभीषण अपने चार मन्त्रियों के साथ पाँचवें होंगे ( इस प्रकार हम सात व्यक्ति मनुष्यरूपमें रहकर युद्ध करेंगे ) " स रामः कृत्यसिद्धयर्थमेवमुक्त्वा विभीषणम् ।

सुवेलारोहणे बुद्धिं चकार मतिमान् प्रभुः ।

रमणीयतरं दृष्ट्वा सुवेलस्य गिरेस्तटम् ॥ ३६ ॥

अपने विजयरूपी प्रयोजनकी सिद्धिके लिये विभीषण ऐसा कहकर बुद्धिमान् भगवान् श्रीरामने सुवेल पर्वतपर चढ़ने-का विचार किया । सुवेलपर्वतका तटप्रान्त बड़ा ही रमणीय था, उसे देखकर उन्हें बड़ी प्रसन्नता हुई ॥ ३६ ॥

ततस्तु रामो महता बलेन प्रच्छाद्य सर्वा पृथिवीं महात्मा । प्रहृष्टरूपोऽभिजगाम लङ्कां कृत्वा मतिं सोऽरिवधे महात्मा ॥ ३७ ॥

तदनन्तर महामना महात्मा श्रीराम अपनी विशाल सेना के द्वारा वहाँकी सारी पृथ्वीको आच्छादित करके शत्रुवधका निश्चय किये बड़े हर्ष और उत्साहसे लङ्काकी ओर चले ॥ ३७ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये युद्धकाण्डे सप्तत्रिंशः सर्गः ॥ ३७ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्ड में सैंतीसवाँ सगँ पूरा हुआ ॥ ३७ ॥

अष्टात्रिंशः सर्गः श्रीरामका प्रमुख वानरों के साथ सुवेल

स तु कृत्वा सुवेलस्य मतिमारोहणं प्रति ।

लक्ष्मणानुगतो रामः सुग्रीवमिदमब्रवीत् ॥ १ ॥

विभीषणं च धर्मज्ञमनुरक्तं निशाचरम् ।

मन्त्र च विधिशं च श्लक्ष्णया परया गिरा ॥ २ ॥

सुवेल पर्यंतपर चढ़नेका विचार करके जिनके पीछे लक्ष्मण-जी चल रहे थे, वे भगवान् श्रीराम सुग्रीवसे और धर्मके ज्ञाता, मन्त्रवेत्ता, विधिज्ञ एवं अनुरागी निशाचर विभीषणसे भी उत्तम एवं मधुर वाणीमें बोले – ॥ १-२ ॥ सुवेलं साधु शैलेन्द्रमिमं धातुशतैश्चितम् । पर्वतपर चढ़कर वहाँ रातमें निवास करना अध्यारोहामहे सर्वे वत्स्यामोऽत्र निशामिमाम् ॥ ३ ॥

‘ मित्रो! यह पर्वतराज सुवेल सैकड़ों धातुओंसे भलीभाँति भरा हुआ है है ॥ हम सब लोग इसपर चढ़ें और आजकी इस रात में यहीं निवास करें ॥ ३ ॥

लङ्कां चालोकयिष्यामो निलयं तस्य रक्षसः ।

येन मे मरणान्ताय हृता भार्या दुरात्मना ॥ ४ ॥

' यहाँसे हमलोग उस राक्षसकी निवासभूत लङ्कापुरीका भी अवलोकन करेंगे, जिस दुरात्माने अपनी मृत्युके लिये ही मेरी भार्याका अपहरण किया है ॥ ४ ॥

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युद्धकाण्डे अष्टात्रिंशः सर्गः ११४७

येन धर्मो न विज्ञातो न वृत्तं न कुलं तथा ।

राक्षस्या नीचया बुद्धया येन तद् गर्हितं कृतम् ॥ ५ ॥

" जिसने न तो धर्मको जाना है, न सदाचारको ही कुछ समझा है और न कुलका ही विचार किया है; केवल राक्ष-सोचित नीच बुद्धिके कारण ही वह निन्दित कर्म किया है || ५ ||

तस्मिन् मे वर्तते रोषः कीर्तिते राक्षसाधमे ।

यस्यापराधान्नीचस्य वधं द्रक्ष्यामि रक्षसाम् ॥ ६ ॥

' उस नीच राक्षसका नाम लेते ही उसपर मेरा रोष जाग उठता है । केवल उसी अधम निशाचरके अपराधसे मैं समस्त राक्षसोंका वध देखूँगा ॥ ६ ॥

एको हि कुरुते पापं कालपाशवशं गतः ।

नीचेनात्मापचारेण कुलं तेन विनश्यति ॥ ७ ॥

' कालके पाशमें बँधा हुआ एक ही पुरुष पाप करता है, किंतु उस नीचके अपने ही दोषसे सारा कुल नष्ट हो जाता है ' ॥ ७ ॥

एवं सम्मन्त्रयन्नेव सक्रोधो रावणं प्रति ।

रामः सुवेलं वासाय चित्रसानुमुपारुहत् ॥ ८ ॥

इस प्रकार चिन्तन करते हुए ही श्रीराम रावणके प्रति कुपित हो विचित्र शिखरवाले सुवेल पर्वतपर निवास करनेके लिये चढ़ गये ॥ ८ ॥

पृष्ठतो लक्ष्मणश्चैनमन्वगच्छत् समाहितः ।

सशरं चापमुद्यम्य सुमहद्विक्रमे रतः ॥ ९ ॥

उनके पीछे लक्ष्मण भी महान् पराक्रममें तत्पर एवं एकाग्रचित्त हो धनुष - बाण लिये हुए उस पर्वतपर आरूढ़ हो गये ॥ ९ ॥

तमन्वारोहत् सुग्रीवः सामात्यः सविभीषणः ।

हनुमानङ्गदो नीलो मैन्दो द्विविद एव च ॥ १० ॥

गजो गवाक्षो गवयः शरभो गन्धमादनः ।

पनसः कुमुदश्चैव हरो रम्भश्च यूथपः ॥ ११ ॥

जाम्बवांश्च सुषेणश्च ऋषभश्च महामतिः ।

दुर्मुखश्च महातेजास्तथा शतवलिः कपिः ॥ १२ ॥

एते चान्ये च बहवो वानराः शीघ्रगामिनः ।

ते वायुवेगप्रवणास्तं गिरिं गिरिचारिणः ॥ १३ ॥

तत्पश्चात् सुग्रीव, मन्त्रियोंसहित विभीषण, हनुमान्, अङ्गद, नील, मैन्द, द्विविद, गज, गवाक्ष, गवय, शरभ, गन्धमादन, पनस, कुमुद, हर, यूथपति रम्भ, जाम्बवान्, सुषेण, महामति ऋषभ, महातेजस्वी दुर्मुख तथा कपिवर शतवलि – ये और दूसरे भी बहुत - से शीघ्रगामी वानर जो वायुके समान वेगसे चलनेवाले तथा पर्वतोंपर ही विचरनेवाले थे, उस सुबेलगिरिपर चढ़ गये ॥ १० - १३ ॥

अध्यारोहन्त शतशः सुवेलं यत्र राघवः ।

ते त्वदीर्घेण कालेन गिरिमारुह्य सर्वतः ॥ १४ ॥

सुवेल पर्वतपर जहाँ श्रीरघुनाथजी विराजमान थे, वे सैकड़ों वानर थोड़ी ही देर में चढ़ गये और चढ़कर सब ओर विचरने लगे ॥ १४ ॥

ददृशुः शिखरे तस्य विषक्तामिव खे पुरीम् ।

तां शुभां प्रवरद्वारां प्राकारवरशोभिताम् ॥ १५ ॥

लङ्कां राक्षससम्पूर्णा ददृशुर्हरियूथपाः । उन वानरयूथपतियोंने सुवेलपर्वत के शिखरपर खड़े हो उस सुन्दर लङ्कापुरीका निरीक्षण किया, जो आकाशमें ही बनी हुई - सी जान पड़ती थी । उसके फाटक बड़े मनोहर थे । उत्तम परकोटे उस नगरीकी शोभा बढ़ाते थे तथा वह पुरी राक्षसोंसे भरी - पूरी थी ॥ १५३ ॥

प्राकारवरसंस्थैश्च तथा नीलैश्च राक्षसैः ॥ १६ ॥

ददृशुस्ते हरिश्रेष्ठाः प्राकारमपरं कृतम् ॥ १७ ॥

उत्तम परकोटोंपर खड़े हुए नीलवर्णके राक्षस ऐसे जान पड़ते थे, मानो उन परकोटोंपर दूसरा परकोटा बना दिया गया हो । उन श्रेष्ठ वानरोंने वह सब कुछ देखा ॥ १६-१७ ॥

दृष्ट्ा वानराः सर्वे राक्षसान् युद्धकाङ्क्षिणः ।

मुमुचुर्विविधान् नादांस्तस्य रामस्य पश्यतः ॥ १८ ॥

युद्धकी इच्छा रखनेवाले राक्षसों को देखकर वे सब वानर श्रीरामके देखते - देखते नाना प्रकारसे सिंहनाद करने लगे ॥

ततोऽस्तमगमत् सूर्यः संध्यया प्रतिरञ्जितः ।

पूर्णचन्द्रप्रदीप्ता च क्षपा समतिवर्तत ॥ १ ९ ॥

तदनन्तर संध्याकी लालीसे रँगे हुए सूर्यदेव अस्ताचल-को चले गये और पूर्णचन्द्रमासे प्रकाशित उजेली रात वहाँ सब ओर छा गयी ॥ १ ९ ॥ ततः स रामो हरिवाहिनीपति-विभीषणेन प्रतिनन्द्य सत्कृतः । सलक्ष्मणो यूथपयूथसंयुतः सुवेलपृष्ठे न्यवसद् यथासुखम् ॥२० ॥

तत्पश्चात् विभीषणद्वारा सादर सम्मानित हो वानरसेनाके स्वामी श्रीरामने अपने भाई लक्ष्मण और यूथपतियोंके समुदाय-के साथ सुवेलपर्वत के पृष्ठभाग पर सुखपूर्वक निवास किया | २० | इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये युद्धकाण्डेऽष्टात्रिंशः सर्गः ॥ ३८ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें अड़तीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ३८ ॥