Ramayana 2 — पृष्ठ 351–360

वाल्मीकि रामायण — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 351–360

पृष्ठ 351

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११५८ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे निरुद्विग्नास्त्रयो लोका भविष्यन्ति हते त्वयि ॥ ७ ९ ॥ “ मैं मन्त्री, पुत्र और बन्धुबान्धवसहित तुम्हारा वध करूँगा; क्योंकि तुम्हारे मारे जानेसे तीनों लोकोंके प्राणी निर्भय हो जायँगे ॥ ७ ९ ॥

देवदानवयक्षाणां गन्धर्वोरगरक्षसाम् ।

शत्रुमद्यद्धरिष्यामि त्वामृषीणां च कण्टकम् ॥ ८० ॥

" " तुम देवता, दानव, यक्ष, गन्धर्व, नाग और राक्षस--सभीके शत्रु हो । ऋषियोंके लिये तो कंटकरूप ही हो; अतः आज मैं तुम्हें उखाड़ फेंकूँगा ॥ ८० ॥

विभीषणस्य चैश्वर्य भविष्यति हते त्वयि ।

न चेत् सत्कृत्य वैदेहीं प्रणिपत्य प्रदास्यसि ॥ ८१ ॥

“ “ अतः यदि तुम मेरे चरणोंमें गिरकर आदरपूर्वक सीता-को नहीं लौटाओगे तो मेरे हाथसे मारे जाओगे और तुम्हारे मारे जानेपर लङ्काका सारा ऐश्वर्य विभीषणको प्राप्त होगा " । ८१ ।

इत्येवं परुषं वाक्यं ब्रुवाणे हरिपुङ्गवे ।

अमर्षवशमापन्नो निशाचरगणेश्वरः ॥ ८२ ॥

वानरशिरोमणि अङ्गदके ऐसे कठोर वचन कहनेपर निशाचरगणोंका राजा रावण अत्यन्त अमर्षसे भर गया ॥ ८२ ॥

ततः स रोषमापन्नः शशास सचिवांस्तदा ।

गृह्यतामिति दुर्मेधा वध्यतामिति चासकृत् ॥ ८३ ॥

रोषसे भरे हुए रावणने उस समय अपने मन्त्रियोंसे बार-बार कहा - ' पकड़ लो इस दुर्बुद्धि वानरको और मार डालो ' ॥ ८३ ॥

रावणस्य वचः श्रुत्वा दीप्ताग्निमिव तेजसा ।

जगृहस्तं ततो घोराश्चत्वारो रजनीचराः ॥ ८४ ॥

रावणकी यह बात सुनकर चार भयंकर निशाचरोंने प्रज्वलित अग्निके समान तेजस्वी अङ्गदको पकड़ लिया ॥ ८४ ॥

ग्राहयामास तारेयः स्वयमात्मानमात्मवान् ।

बलं दर्शयितुं वीरो यातुधानगणे तदा ॥ ८५ ॥

आत्मबलसे सम्पन्न ताराकुमार अङ्गदने उस समय राक्षसों-को अपना बल दिखानेके लिये स्वयं ही अपने - आपको पकड़ा दिया ॥ ८५ ॥

स तान् बाहुइयासक्तानादाय पतगानिव ।

प्रासादं शैलसंकाशमुत्पपाताङ्गदस्तदा ॥ ८६ ॥

फिर वे पक्षियोंकी तरह अपनी दोनों भुजाओंसे जकड़े हुए उन चारों राक्षसों को लिये दिये ही उछले और उस महलकी छतपर, जो पर्वतशिखरके समान ऊँची थी, चढ़ गये ॥ ८६ ॥

तस्योत्पतनवेगेन निर्धूतास्तत्र राक्षसाः ।

भूमौ निपतिताः सर्वे राक्षसेन्द्रस्य पश्यतः ॥ ८७ ॥

उनके उछलनेके वेगसे झटका खाकर वे सब राक्षस राक्षसराज रावणके देखते - देखते पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ ८७ ॥

ततः प्रासादशिखरं शैलभ्टङ्गमिवोन्नतम् ।

चक्राम राक्षसेन्द्रस्य वालिपुत्रः प्रतापवान् ॥ ८८ ॥

तदनन्तर प्रतापी वालिकुमार अङ्गद राक्षसराजके उस महलकी चोटीपर, जो पर्वतशिखरके समान ऊँची थी, पैर पटकते हुए घूमने लगे ॥ ८८ ॥

पफाल च तदाक्रान्तं दशग्रीवस्य पश्यतः ।

पुरा हिमवतः शृङ्गं वज्रेणेव विदारितम् ॥ ८ ९ ॥

उनके पैरोंसे आक्रान्त होकर वह छत रावणके देखते-देखते फट गयी । ठीक उसी तरह, जैसे पूर्वकालमें वज्रके आघात से हिमालयका शिखर विदीर्ण हो गया था ॥ ८ ९ ॥

भङ्क्त्वा प्रासादशिखरं नाम विश्राव्य चात्मनः ।

विनद्य सुमहानादमुत्पपात विहायसा ॥ ९ ० ॥

इस प्रकार महलकी छत तोड़कर उन्होंने अपना नाम सुनाते हुए बड़े जोरसे सिंहनाद किया और वे आकाशमार्ग से उड़ चले ॥ ९ ० ॥

व्यथयन् राक्षसान् सर्वान् हर्षयंश्चापि वानरान् ।

स वानराणां मध्ये तु रामपार्श्वमुपागतः ॥ ९ १ ॥

राक्षसोंको पीड़ा देते और समस्त वानरोंका हर्ष बढ़ाते हुए वे वानरसेना के बीच श्रीरामचन्द्रजीके पास लौट आये ॥ ९ १ ॥

रावणस्तु परं चक्रे क्रोधं प्रासादधर्षणात् ।

विनाशं चात्मनः पश्यन् निःश्वासपरमोऽभवत् ॥ ९ २ ॥

अपने महलके टूटनेसे रावणको बड़ा क्रोध हुआ, परंतु विनाशकी घड़ी आयी देख वह लंबी साँस छोड़ने लगा ॥ १२ ॥

रामस्तु बहुभिर्हैर्विनदद्भिः लवङ्गमैः ।

वृतो रिपुवधाकाङ्क्षी युद्धायैवाभ्यवर्तत ॥ ९ ३ ॥

इधर श्रीरामचन्द्रजी हर्षसे भरकर गर्जना करते हुए बहु-संख्यक वानरोंसे घिरे रहकर युद्धके लिये ही डटे रहे । वे अपने शत्रुका वध करना चाहते थे ॥ ९ ३ ॥

सुषेणस्तु महावीर्यो गिरिकूटोपमो हरिः ।

बहुभिः संवृतस्तत्र वानरैः कामरूपिभिः ॥ ९ ४ ॥

स तु द्वाराणि संयम्य सुग्रीववचनात् कपिः ।

पर्यक्रामत दुर्धर्षो नक्षत्राणीव चन्द्रमाः ॥ ९ ५ ॥

इसी समय पर्वतशिखरके समान विशालकाय महापराक्रमी दुर्जय वानर वीर सुषेणने इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले बहुसंख्यक वानरोंके साथ लङ्काके सभी दरवाजों को काबू में कर लिया और सुग्रीवकी आज्ञाके अनुसार वे ( अपने सैनिकों की रक्षा करने एवं सभी द्वारोंका समाचार जाननेके लिये ) बारी-बारीसे उन सबपर विचरने लगे, जैसे चन्द्रमा क्रमशः सब नक्षत्रोंपर गमन करते हैं ॥ ९ ४ - ९ ५ ॥

पृष्ठ 352

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युद्धकाण्डे द्विचत्वारिंशः सर्गः ११५ ९

तेषामक्षौहिणिशतं समवेक्ष्य वनौकसाम् ।

लङ्कामुपनिविष्टानां सागरं चाभिवर्तताम् ॥ ९ ६ ॥

राक्षसा विस्मयं जग्मुस्त्रासं जग्मुस्तथापरे ।

अपरे समरे हर्षाद्धमेवोपपेदिरे ॥ ९ ७ ॥

लङ्कापर घेरा डालकर समुद्रतक फैले हुए उन वनवासी वानरोंकी सौ अक्षौहिणी सेनाओंको देख राक्षसोंको बड़ा विस्मय हुआ । बहुत - से निशाचर भयभीत हो गये तथा अन्य कितने ही राक्षस समराङ्गणमें हर्ष और उत्साहसे भर गये ॥ ९ ६ - ९ ७ ॥ कृत्स्नं हि कपिभिर्व्याप्तं प्राकारपरिखान्तरम् ।

दशू राक्षसा दीनाः प्राकारं वानरीकृतम् ।

हाहाकारमकुर्वन्त राक्षसा भयमागताः ॥ ९ ८ ॥

उस समय लङ्काकी चहारदीवारी और खाई सारी की सारी वानरोंसे व्याप्त हो रही थी । इस तरह राक्षसोंने चहारदीवारी-को जब वानराकार हुई देखा, तब वे दीन दुखी और भयभीत हो हाहाकार करने लगे ॥ ९ ८ ॥ तस्मिन् महाभीषणके प्रवृत्ते कोलाहले राक्षसराजयोधाः । प्रगृह्य रक्षांसि महायुधानि युगान्तवाता इव संविचेरुः ॥ ९९ ॥

वह महाभीषण कोलाहल आरम्भ होनेपर राक्षसराज रावण-के योद्धा निशाचर बड़े - बड़े आयुध हाथों में लेकर प्रलयकाल -की प्रचण्ड वायुके समान सब ओर विचरने लगे ॥ ९९ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये युद्धकाण्डे एकचत्वारिंशः सर्गः ॥ ४१ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें इकतालीसवाँ सगँ पूरा हुआ ॥ ४१ ॥

द्विचत्वारिंशः सर्गः लङ्कापर वानरोंकी चढ़ाई तथा

ततस्ते राक्षसास्तत्र गत्वा रावणमन्दिरम् ।

न्यवेदयन् पुरीं रुद्धां रामेण सह वानरैः ॥ १ ॥

तदनन्तर उन राक्षसोंने रावणके महलमें जाकर यह निवेदन किया कि ‘ वानरोंके साथ श्रीरामने लङ्कापुरीको चारों ओरसे घेर लिया है ' ॥ १ ॥

रुद्धां तु नगरीं श्रुत्वा जातक्रोधो निशाचरः ।

विधानं द्विगुणं कृत्वा प्रासादं चाप्यरोहत ॥ २ ॥

लङ्काके घेरे जानेकी बात सुनकर रावणको बड़ा क्रोध हुआ और वह नगरकी रक्षाका पहलेसे भी दुगुना प्रबन्ध करके महलकी अटारीपर चढ़ गया ॥ २ ॥

स ददर्श वृतां लङ्कां सशैलवनकाननाम् ।

असंख्येयैर्हरिगणैः सर्वतो युद्धकाङ्क्षिभिः ॥ ३ ॥

वहीं से उसने देखा कि पर्वत, वन और काननोंसहित सारी लङ्का सब ओरसे असंख्य युद्धाभिलाषी वानरोंद्वारा घिरी हुई है ॥ ३ ॥

स दृष्ट्वा वानरैः सर्वैर्वसुधां कपिलीकृताम् ।

कथं क्षपयितव्याः स्युरिति चिन्तापरोऽभवत् ॥ ४ ॥

इस प्रकार समस्त वानरोंसे आच्छादित वसुधाको कपिल वर्णकी हुई देख वह इस चिन्तामें पड़ गया कि इन सबका विनाश कैसे होगा? ॥ ४ ॥

स चिन्तयित्वा सुचिरं धैर्यमालम्ब्य रावणः ।

राघवं हरियूथांश्च ददर्शायतलोचनः ॥ ५ ॥

बहुत देर तक चिन्ता करने के पश्चात् धैर्यं धारण करके राक्षसोंके साथ उनका घोर युद्ध विशाल नेत्रोंवाले रावणने श्रीराम और वानरसेनाओंकी ओर पुनः देखा ॥ ५ ॥

राघवः सह सैन्येन मुदितो नाम पुप्लुवे ।

लङ्कां ददर्श गुप्तां वै सर्वतो राक्षसैर्वृताम् ॥ ६ ॥

इधर श्रीरामचन्द्रजी अपनी सेनाके साथ प्रसन्नतापूर्वक आगे बढ़े । उन्होंने देखा, लङ्का सब ओरसे राक्षसोंद्वारा आवृत और सुरक्षित है ॥ ६ ॥

दृष्ट्रा दाशरथिर्लङ्कां चित्रध्वजपताकिनीम् ।

जगाम सहसा सीतां दूयमानेन चेतसा ॥ ७ ॥

विचित्र ध्वजा पताकाओं से अलंकृत लङ्कापुरीको देखकर दशरथनन्दन श्रीराम व्यथित चित्तसे मन - ही - मन सीताका स्मरण करने लगे ॥ ७ ॥

अत्र सा मृगशावाक्षी मत्कृते जनकात्मजा ।

पीड्यते शोकसंतप्ता कृशा स्थण्डिलशायिनी ॥ ८ ॥

' हाय! वह मृगशावकनयनी जनकनन्दिनी सीता यहीं मेरे लिये शोकसंतप्त हो पीड़ा सहन करती है और पृथ्वी की वेदीपर सोती है । सुनता हूँ, बहुत दुर्बल हो गयी है ' ॥ ८ ॥

निपीड्यमानां धर्मात्मा वैदेहीमनुचिन्तयन् ।

क्षिप्रमाज्ञापयद् रामो वानरान् द्विषतां वधे ॥ ९ ॥

इस प्रकार राक्षसियों द्वारा पीड़ित विदेहनन्दिनीका बारंबार चिन्तन करते हुए धर्मात्मा श्रीरामने तत्काल बानरोंको शत्रुभूत राक्षसों का वध करनेके लिये आज्ञा दी ॥ ९ ॥

एवमुक्ते तु वचसि रामेणाक्लिष्टकर्मणा ।

पृष्ठ 353

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११६० श्रीमद्वाल्मीकीय रामायणे संघर्षमाणाः प्लवगाः सिंहनादैरनादयन् ॥ १० ॥

अक्लिष्टकर्मा श्रीराम के इस प्रकार आज्ञा देते ही आगे बढ़नेके लिये परस्पर होड़ - सी लगानेवाले वानरोंने अपने सिंहनादोंसे वहाँकी धरती और आकाशको गुँजा दिया ॥

शिखरैर्विकिरामैतां लङ्कां मुष्टिभिरेव वा ।

इति स्म दधिरे सर्वे मनांसि हरियूथपाः ॥ ११ ॥

वे समस्त वानरयूथपति अपने मनमें यह निश्चय किये खड़े थे कि हमलोग पर्वत - शिखरोंकी वर्षा करके लङ्काके महलोंको चूर - चूर कर देंगे अथवा मुक्कोंसे ही मार - मारकर ढहा देंगे || ११ ॥

उद्यम्य गिरिश्टङ्गाणि महान्ति शिखराणि च ।

तरूंश्चोत्पाट्य विधिधांस्तिष्ठन्ति हरियूथपाः ॥ १२ ॥

वे वानरसेनापति पर्वतोंके बड़े - बड़े शिखर उठाकर और नाना प्रकारके वृक्षोंको उखाड़कर प्रहार करनेके लिये खड़े थे ॥

प्रेक्षतो राक्षसेन्द्रस्य तान्यनीकानि भागशः ।

राघवप्रियकामार्थ लङ्कामारुरुहुस्तदा ॥ १३ ॥

राक्षसराज रावणके देखते - देखते विभिन्न भागों में बँटे हुए वे वानर - सैनिक श्रीरघुनाथजीका प्रिय करनेकी इच्छासे तत्काल लङ्काके परकोटोंपर चढ़ गये ॥ १३ ॥

ते ताम्रवक्त्रा हेमाभा रामार्थे त्यक्तजीविताः ।

सालभूधरयोधिनः ॥ १४ ॥

ताँबे - जैसे लाल मुँह और सुवर्णकी - सी कान्तिवाले वे वानर श्रीरामचन्द्रजीके लिये प्राण निछावर करनेको तैयार थे । वे सब - के - सब साल वृक्ष और शैल - शिखरों से युद्ध करने-वाले थे; इसलिये उन्होंने लङ्कापर ही आक्रमण किया || १४ ||

ते दुमैः पर्वतायैश्च मुष्टिभिश्च लवंगमाः ।

प्राकाराग्राण्यसंख्यानि ममन्थुस्तोरणानि च ॥ १५ ॥

वे सभी वानर वृक्षों, पर्वत - शिखरों और मुक्कोंसे असंख्य परकोटों और दरवाजोंको तोड़ने लगे ॥ १५ ॥

परिखान् पूरयन्तश्च प्रसन्नसलिलाशयान् ।

पांसुभिः पर्वताग्रैश्च तृणैः काष्ठैश्च वानराः ॥ १६ ॥

उन वानरोंने स्वच्छ जलसे भरी हुई खाइयोंको धूल, पर्वत - शिखर, घास - फूस और काठोंसे पाट दिया ॥ १६ ॥

ततः सहस्रयूथाश्च कोटियूथाश्च यूथपाः ।

कोटिशताश्चान्ये लङ्कामारुरुहुस्तदा ॥ १७ ॥

फिर तो सहस्र यूथ, कोटि यूथ और सौ कोटि यूथोंको साथ लिये अनेक यूथपति उस समय लङ्काके किलेपर चढ़ गये ॥ १७ ॥

काञ्चनानि प्रमर्दन्तस्तोरणानि प्लवंगमाः ।

कैलासशिखराग्राणि गोपुराणि प्रमथ्य च ॥ १८ ॥

आप्लवन्तः प्लवन्तश्च गर्जन्तश्च प्लवंगमाः ।

लङ्कां तामभिधावन्ति महावारणसंनिभाः ॥ १ ९ ॥

बड़े - बड़े गजराजोंके समान विशालकाय वानर सोने के बने हुए दरवाजोंको धूलमें मिलाते, कैलासशिखरके समान ऊँचे - ऊँचे गोपुरोंको भी ढहाते, उछलते - कूदते एवं गर्जते हुए लङ्कापर धावा बोलने लगे ॥ १८-१९ ॥

जयत्युरुबलो रामो लक्ष्मणश्च महाबलः ।

राजा जयति सुग्रीवो राघवेणाभिपालितः ॥ २० ॥

इत्येवं घोषयन्तश्च गर्जन्तश्च प्लवंगमाः ।

अभ्यधावन्त लङ्कायाः प्राकारं कामरूपिणः ॥ २१ ॥

अत्यन्त ' बलशाली श्रीरामचन्द्रजीकी जय हो, महाबली लक्ष्मणकी जय हो और श्रीरघुनाथजीके द्वारा सुरक्षित राजा सुग्रीवकी भी जय हो ' ऐसी घोषणा करते और गर्जते हुए इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले वानर लङ्काके परकोटेपर

टूट पड़े । २०-२१ ॥

वीरबाहुः सुबाहुश्च नलश्च पनसस्तथा ।

निपीड्योपनिविष्टास्ते प्राकारं हरियूथपाः ।

एतस्मिन्नन्तरे चक्रुः स्कन्धावारनिवेशनम् ॥ २२ ॥

इसी समय वीरबाहु, सुबाहु, नल और पनस — ये वानरयूथपति लङ्काके परकोटेपर चढ़कर बैठ गये और उसी बीचमें उन्होंने वहाँ अपनी सेनाका पड़ाव डाल दिया ॥ २२ ॥

पूर्वद्वारं तु कुमुदः कोटिभिर्दशभिर्वृतः ।

आवृत्य बलवांस्तस्थौ हरिभिर्जितकाशिभिः ॥ २३ ॥

बलवान् कुमुद विजयश्रीसे सुशोभित होनेवाले दस करोड़ वानरोंके साथ ( ईशानकोण में रहकर ) लङ्काके पूर्व ' द्वारको घेरकर खड़ा हो गया ॥ २३ ॥

सहायार्थे तु तस्यैव निविष्टः प्रघसो हरिः ।

पनसश्च महाबाहुर्वानरैरभिसंवृतः ॥ २४ ॥

उसीकी सहायता के लिये अन्य वानरोंके साथ महाबाहु पनस और प्रघस भी आकर डट गये ॥ २४ ॥

दक्षिणद्वारमासाद्य वीरः शतवलिः कपिः ।

आवृत्य बलवांस्तस्थौ विंशत्या कोटिभिर्वृतः ॥ २५ ॥

वीर तबलिने ( आग्नेयकोणमें स्थित हो ) दक्षिण द्वारपर आकर बीस करोड़ वानरोंके साथ उसे घेर लिया और वहीं पड़ाव डाल दिया ॥ २५ ॥

सुषेणः पश्चिमद्वारं गत्वा तारापिता बली ।

आवृत्य बलवांस्तस्थौ कोटिकोटिभिरावृतः ॥ २६ ॥

ताराके बलवान् पिता सुषेण ( नैर्ऋत्यकोणमें स्थित हो ) कोटि - कोटि वानरोंके साथ पश्चिम द्वारपर आक्रमण करके उसे घेरकर खड़े हो गये ॥ २६ ॥

उत्तरद्वारमागम्य रामः सौमित्रिणा सह ।

आवृत्य बलवांस्तस्थौ सुग्रीवश्च हरीश्वरः ॥ २७ ॥

सुमित्राकुमार लक्ष्मणसहित महाबलवान् श्रीराम तथा वानर-राज सुग्रीव उत्तर द्वारको घेरकर खड़े हुए ( सुग्रीव पूर्ववर्णन के १, २, ३, ४ - यहाँ जो पूर्व, दक्षिण, पश्चिम और उत्तर शब्द आये हैं, वे क्रमशः ईशान, अग्नि, नैर्ऋत्य और वायव्यकोणका लक्ष्य करानेवाले हैं; क्योंकि पहले ( ४१ वें सर्गमें ) पूर्व आदि

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युद्धकाण्डे द्विचत्वारिंशः सर्गः ११६१ अनुसार वायव्यकोणमें स्थित हो उत्तर द्वारवर्ती श्रीरामकी सहायता करते थे ) ॥ २७ ॥

गोलाङ्गूलो महाकायो गवाक्षो भीमदर्शनः ।

वृतः कोट्या महा वीर्यस्तस्थौ रामस्य पार्श्वतः ॥ २८ ॥

लंगूर जातिके विशालकाय महापराक्रमी वानर गवाक्ष, जो देखने में बड़े भयंकर थे, एक करोड़ वानरोंके साथ श्रीरामचन्द्रजीके एक बगलमें खड़े हो गये ॥ २८ ॥

ऋक्षाणां भीमकोपानां धूम्रः शत्रुनिवर्हणः ।

वृतः कोट्या महावीर्यस्तस्थौ रामस्य पार्श्वतः ॥ २ ९ ॥

इसी तरह महाबली शत्रुसूदन ऋक्षराज धूम्र एक करोड़ भयानक क्रोधी रीछोंको साथ लेकर श्रीरामचन्द्रजीके दूसरी ओर खड़े हुए ॥ २ ९ ॥

संनद्धस्तु महावीर्यो गदापाणिर्विभीषणः ।

वृतो यत्तैस्तु सचिवैस्तस्थौ यत्र महाबलः ॥ ३० ॥

कवच आदि से सुसज्जित महान् पराक्रमी विभीषण हाथमें गदा लिये अपने सावधान मन्त्रियोंके साथ वहीं आकर डट गये, जहाँ महाबली श्रीराम विद्यमान थे ॥ ३० ॥

गजो गवाक्षो गवयः शरभो गन्धमादनः समन्तात् परिधावन्तो ररक्षुर्हरिवाहिनीम् ॥ ३१ ॥

गज, गवाक्ष, गवय, शरभ और गन्धमादन सब ओर घूम - घूमकर वानर सेनाकी रक्षा करने लगे ॥ ३१ ॥

ततः कोपपरीतात्मा रावणो राक्षसेश्वरः ।

निर्याणं सर्वसैन्यानां द्रुतमाज्ञापयत् तदा ॥ ३२ ॥

इसी समय अत्यन्त क्रोधसे भरे हुए राक्षसराज रावणने अपनी सारी सेनाको तुरंत ही बाहर निकलनेकी आज्ञा दी ॥ ३२ ॥

एतच्छ्रुत्वा तदा वाक्यं रावणस्य मुखेरितम् ।

सहसा भीमनिर्घोषमुद्दुष्टं रजनीचरैः ॥ ३३ ॥

रावणके मुखसे बाहर निकलनेका आदेश सुनते ही राक्षसोंने सहसा बड़ी भयानक गर्जना की ॥ ३३ ॥

ततः प्रबोधिता भेर्यश्चन्द्रपाण्डुरपुष्कराः ।

हेमकोणैरभिहता राक्षसानां समन्ततः ॥ ३४ ॥

फिर तो राक्षसों के यहाँ जिनके मुखभाग चन्द्रमाके समान उज्ज्वल थे और जो सोनेके डंडेसे बजाये या पीटे जाते थे, वे बहुत - से धौंसे एक साथ बज उठे ॥ ३४ ॥

विनेदुश्च महाघोषाः शङ्खाः शतसहस्रशः ।

राक्षसानां सुघोराणां मुखमारुतपूरिताः ॥ ३५ ॥

दरवाजोंपर नील आदि यूथपतियों के आक्रमणकी बात कह दी गयी है । वे कुमुद आदि वानर निकटवतीं ईशान आदि कोणोंमें रहकर पूर्वादि द्वारोंपर आक्रमण करके नील आदि की सहायता करते थे । साथ ही भयानक राक्षसोंके मुखकी वायुसे पूरित हो लाखों गम्भीर घोषवाले शङ्ख बजने लगे ॥ ३५ ॥

वभुः शुभनीलाङ्गाः सशङ्का रजनीचराः ।

विद्युन्मण्डलसंनद्धाः सबलाका इवाम्बुदाः ॥ ३६ ॥

आभूषणोंकी प्रभासे सुशोभित काले शरीरवाले वे निशाचर शङ्ख बजाते समय विद्युत्प्रभासे उद्भासित तथा वक-पंक्तियोंसे युक्त नील मेघोंके समान जान पड़ते थे || ३६ ||

निष्पतन्ति ततः सैन्या हृष्टा रावणचोदिताः ।

समये पूर्यमाणस्य वेगा इव महोदधेः ॥ ३७ ॥

तदनन्तर रावणकी प्रेरणासे उसके सैनिक बड़े हर्षके साथ युद्ध के लिये निकलने लगे, मानो प्रलयकालमें महान् मेघों के जलसे जाते हुए समुद्र के वेग आगे बढ़ रहे हों ॥

ततो वानरसैन्येन मुक्तो नादः समन्ततः ।

मलयः पूरितो येन ससानुप्रस्थकन्दरः ॥ ३८ ॥

तत्पश्चात् वानर सैनिकोंने सब ओर बड़े जोरसे सिंहनाद किया, जिससे छोटे - बड़े शिखरों और कन्दराओं सहित मलय-पर्वत गूँज उठा ॥ ३८ ॥

शङ्खदुन्दुभिनिर्घोषः सिंहनादस्तरस्विनाम् ।

पृथिवीं चान्तरिक्षं च सागरं चाभ्यनादयत् ॥ ३ ९ ॥

गजानां बृंहितैः सार्धं हयानां हेपितैरपि ।

रथानां नेमिनिर्घोषै रक्षसां वदनस्वनैः ॥ ४० ॥

इस प्रकार हाथियोंके चिग्धाड़ने, घोड़ोंके हिनहिनाने, रथोंके पहियोंकी घर्धराहट एवं राक्षसों के मुखसे प्रकट हुई आवाजके साथ ही शङ्ख और दुन्दुभियोंके शब्द तथा वेगवान् वानरोंके निनादसे पृथ्वी, आकाश और समुद्र निनादित हो उठे ॥ ३ ९ -४० ॥

एतस्मिन्नन्तरे घोरः संग्रामः समपद्यत ।

रक्षसां वानराणां च यथा देवासुरे पुरा ॥ ४१ ॥

इतनेही पूर्वकालमें घटित हुए देवासुर संग्रामकी भाँति राक्षसों और वानरोंमें घोर युद्ध होने लगा ॥। ४१ ॥

ते गदाभिः प्रदीप्ताभिः शक्तिशूलपरश्वधैः ।

निजघ्नुर्वानरान् सर्वान् कथयन्तः स्वविक्रमान् ॥ ४२ ॥

वे राक्षस दमकती हुई गदाओं तथा शक्ति, शूल और फरसोंसे समस्त वानरोंको मारने एवं अपने पराक्रमकी घोषणा करने लगे || ४२ ॥

तथा वृक्षैर्महाकायाः पर्वतायैश्च वानराः ।

निजघ्नुस्तानि रक्षांसि नखैर्दन्तैश्च वेगिनः ॥ ४३ ॥

उसी प्रकार वेगशाली विशालकाय वानर भी राक्षसोंपर बड़े-बड़े वृक्षों, पर्वत - शिखरों, नखों और दाँतोंसे चोट करने लगे || वा ० रा ० ५. ९.२-

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११६२ श्रीमद्द्वाल्मीकीयरामायणे

राजा जयति सुग्रीव इति शब्दो महानभूत् ।

राजञ्जयजयेत्युक्त्वा स्वस्वनामकथां ततः ॥ ४४ ॥

वानरसेनामें ' वानरराज सुग्रीवकी जय हो ' यह महान् शब्द होने लगा । उधर राक्षसलोग भी ' महाराज रावणकी जय हो ' ऐसा कहकर अपने - अपने नामका उल्लेख करने लगे ॥ ४४ ॥

राक्षसास्त्वपरे भीमाः प्राकारस्था महीं गतान् ।

वानरान् भिन्दिपालैश्च शूलैश्चैव व्यदारयन् ॥ ४५ ॥

दूसरे बहुत - से भयानक राक्षस जो परकोटेपर चढ़े हुए थे, पृथ्वीपर खड़े हुए वानरोंको भिन्दिपालों और शूलोंसे विदीर्ण करने लगे ॥ ४५ ॥

वानराश्चापि संक्रुद्धाः प्राकारस्थान् महीं गताः ।

राक्षसान् पातयामासुः खमाप्लुत्य खवाहुभिः ॥ ४६ ॥

तब पृथ्वीपर खड़े हुए वानर भी अत्यन्त कुपित हो उठे और आकाशमें उछलकर परकोटेपर बैठे हुए राक्षसों को अपनी बाँहोंसे पकड़ - पकड़कर गिराने लगे ॥ ४६ ॥

स सम्प्रहारस्तुमुलो मांसशोणितकर्दमः ।

रक्षसां वानराणां च सम्बभूवाद्भुतोपमः ॥ ४७ ॥

इस प्रकार राक्षसों और वानरोंमें बड़ा ही अद्भुत घमासान युद्ध हुआ, जिससे वहाँ रक्त और मांस की कीच जम गयी ॥ ४७ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये युद्धकाण्डे द्विचत्वारिंशः सर्गः ॥ ४२ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आरामायण आदिकाव्य के युद्धकाण्डमें बयालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ४२ ॥

त्रिचत्वारिंशः सर्गः द्वन्द्वयुद्ध में वानरोंद्वारा

युध्यतां तु ततस्तेषां वानराणां महात्मनाम् ।

रक्षसां सम्बभूवाथ वलरोषः सुदारुणः ॥ १ ॥

तदनन्तर परस्पर युद्ध करते हुए महामना वानरों और राक्षसोंको एक दूसरेकी सेनाको देखकर बड़ा भयंकर रोष हुआ ॥ १ ॥

ते हयैः काञ्चनापीडैर्गजैश्चाग्निशिखोपमैः ।

रथैश्वादित्यसंकाशैः कवचैश्च मनोरमैः ॥ २ ॥

निर्ययू राक्षसा वीरा नादयन्तो दिशो दश ।

राक्षसा भीमकर्माणो रावणस्य जयैषिणः ॥ ३ ॥

सोनेके आभूषणोंसे विभूषित घोड़ों, हाथियों, अग्निकी ज्वालाके समान देदीप्यमान रथों तथा सूर्यतुल्य तेजस्वी मनोरम कवचों-से युक्त वे वीर राक्षस दसों दिशाओं को अपनी गर्जनासे गुँजाते हुए निकले । भयानक कर्म करनेवाले वे सभी निशाचर रावण-की विजय चाहते थे ॥ २-३ ॥

वानराणामपि चमूर्बृहती जयमिच्छताम् ।

अभ्यधावत तां सेनां रक्षसां घोरकर्मणाम् ॥ ४ ॥

भगवान् श्रीरामकी विजय चाहनेवाले वानरोंकी उस विशाल सेनाने भी घोर कर्म करनेवाले राक्षसोंकी सेनापर धावा किया ॥ ४ ॥

एतस्मिन्नन्तरे तेषामन्योन्यमभिधावताम् ।

रक्षसां वानराणां च द्वन्द्वयुद्धमवर्तत ॥ ५ ॥

इसी समय एक दूसरेपर धावा बोलते हुए राक्षसों और वानरोंमें द्वन्द्वयुद्ध छिड़ गया ॥ ५ ॥

राक्षसोंकी पराजय

अङ्गदेनेन्द्रजित्सार्ध वालिपुत्रेण राक्षसः ।

अयुध्यत महातेजास्त्र्यम्बकेण यथान्धकः ॥ ६ ॥

वालिपुत्र अङ्गदके साथ महातेजस्वी राक्षस इन्द्रजित् उसी तरह भिड़ गया, जैसे त्रिनेत्रधारी महादेवजी के साथ अन्धकासुर लड़ रहा हो ॥ ६ ॥

प्रजङ्गेन च सम्पातिर्नित्यं दुर्धर्षणो रणे ।

जम्बुमालिनमारब्धो हनूमानपि वानरः ॥ ७ ॥

प्रजंघ नामक राक्षसके साथ सदा ही रणदुर्जय वीर सम्पातिने और जम्बुमालीके साथ वानर वीर हनुमानजीने युद्ध आरम्भ किया ॥ ७ ॥

संगतस्तु महाक्रोधो राक्षसो रावणानुजः ।

समरे तीक्ष्णवेगेन शत्रुघ्नेन विभीषणः ॥ ८ ॥

अत्यन्त क्रोध में भरे हुए रावणानुज राक्षस विभीषण समराङ्गणमें प्रचण्ड वेगशाली शत्रुघ्न के साथ उलझ गये ॥ ८ ॥

तपनेन गजः सार्धं राक्षसेन महाबलः ।

निकुम्भेन महातेजा नीलोऽपि समयुध्यत ॥ ९ ॥

महाबली गज तपन नामक राक्षसके साथ लड़ने लगे ।

महातेजस्वी नील भी निकुम्भसे जूझने लगे ॥ ९ ॥

वानरेन्द्रस्तु सुग्रीवः प्रघसेन सुसंगतः ।

संगतः समरे श्रीमान् विरूपाक्षेण लक्ष्मणः ॥ १० ॥

वानरराज सुग्रीव प्रघसके साथ और श्रीमान् लक्ष्मण समरभूमिमें विरूपाक्षके साथ युद्ध करने लगे ॥ १० ॥

अग्निकेतुः सुदुर्धर्षो रश्मिकेतुश्च राक्षसः ।

सुप्तघ्नो यज्ञकोपश्च रामेण सह संगताः ॥ ११ ॥

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युद्धकाण्डे त्रिचत्वारिंशः सर्गः ११६३ दुर्जय वीर अग्निकेतु, रश्मिकेतु, सुप्तधन और यज्ञकोप-ये सब राक्षस श्रीरामचन्द्रजीके साथ जूझने लगे ॥ ११ ॥

वज्रमुष्टिश्व मैन्देन द्विविदेनाशनिप्रभः ।

राक्षसाभ्यां सुघोराभ्यां कपिमुख्यौ समागतौ ॥ १२ ॥

मैन्द के साथ वज्रमुष्टि और द्विविदके साथ अशनिप्रभ युद्ध करने लगे । इस प्रकार इन दोनों भयानक राक्षसोंके साथ वे दोनों कपिशिरोमणि वीर भिड़े हुए थे ॥ १२ ॥

वीरः प्रतपनो घोरो राक्षसो रणदुर्धरः ।

समरे तीक्ष्णवेगेन नलेन समयुध्यत ॥ १३ ॥

प्रतपन नामसे प्रसिद्ध एक घोर राक्षस था, जिसे रणभूमि-में परास्त करना अत्यन्त कठिन था । वह वीर निशाचर समराङ्गणमें प्रचण्ड वेगशाली नलके साथ युद्ध करने लगा । १३ ।

धर्मस्य पुत्रो बलवान् सुषेण इति विश्रुतः ।

स विद्युन्मालिना सार्धमयुध्यत महाकपिः ॥ १४ ॥

धर्मके बलवान् पुत्र महाकपि सुषेण राक्षस विद्युन्मालीके साथ लोहा लेने लगे ॥ १४ ॥

वानराश्चापरे घोरा राक्षसैरपरैः सह ।

इन्द्रं समीयुः सहसा युद्ध्वा च बहुभिः सह ॥ १५ ॥

इसी प्रकार अन्यान्य भयानक वानर बहुतों के साथ युद्ध करनेके पश्चात् दूसरे- दूसरे राक्षसोंके साथ सहसा द्वन्द्वयुद्ध करने लगे ॥ १५ ॥

तत्रासीत् सुमहद् युद्धं तुमुलं रोमहर्षणम् ।

रक्षसां वानराणां च वीराणां जयमिच्छताम् ॥ १६ ॥

वहाँ राक्षस और वानरवीर अपनी - अपनी विजय चाहते थे । उनमें बड़ा भयंकर और रोमाञ्चकारी युद्ध होने लगा ॥

हरिराक्षसदेहेभ्यः प्रभूताः केशशाद्वलाः ।

शरीर संघाटवहाः प्रसुस्रुः शोणितापगाः ॥ १७ ॥

वानरों और राक्षसों के शरीरोंसे निकलकर बहुत - सी खून-की नदियाँ बहने लगीं । उनके सिरके बाल ही वहाँ शैवाल ( सेवार ) के समान जान पड़ते थे । वे नदियाँ सैनिकोंकी लाशरूपी काष्ठसमूहों को बहाये लिये जाती थीं ॥ १७ ॥

आजघानेन्द्रजित् क्रुद्धो वज्रेणेव शतक्रतुः ।

अङ्गदं गदया वीरं शत्रुसैन्यविदारणम् ॥ १८ ॥

जिस प्रकार इन्द्र वज्रसे प्रहार करते हैं, उसी तरह इन्द्रजित् मेघनादने शत्रुसेनाको विदीर्ण करनेवाले वीर अङ्गद-पर गदासे आघात किया ॥ १८ ॥

तस्य काञ्चनचित्राङ्गं रथं सारखं ससारथिम् ।

जघान गदया श्रीमानङ्गदो वेगवान् हरिः ॥ १ ९ ॥

किंतु वेगशाली वानर श्रीमान् अङ्गदने उसकी गदा हाथसे पकड़ ली और उसी गदासे इन्द्रजित् के सुवर्णजटित रथको सारथि और घोड़ों सहित चूर - चूर कर डाला ॥ १ ९ ॥

सम्पातिस्तु प्रजवेन त्रिभिर्बाणैः समाहतः ।

निजघानाश्वकर्णेन प्रजङ्घ रणमूर्धनि ॥ २० ॥

प्रजङ्घने सम्पातिको तीन बाणोंसे घायल कर दिया । तब सम्पातिने भी अश्वकर्ण नामक वृक्षसे युद्ध के मुहानेपर प्रजङ्घको मार डाला ॥ २० ॥

जम्बुमाली रथस्थस्तु रथशक्त्या महाबलः ।

बिभेद समरे क्रुद्धो हनूमन्तं स्तनान्तरे ॥ २१ ॥

महाबली जम्बुमाली रथपर बैठा हुआ था । उसने कुपित होकर समराङ्गणमें एक रथ - शक्तिके द्वारा हनुमानजी की छाती -पर चोट की ॥ २१ ॥

तस्य तं रथमास्थाय हनूमान् मारुतात्मजः ।

प्रममाथ तलेनाशु सह तेनैव रक्षसा ॥ २२ ॥

परंतु पवननन्दन हनुमान् उछलकर उसके उस रथपर चढ़ गये और तुरंत ही थप्पड़से मारकर उन्होंने उस राक्षसके साथ ही उस रथको भी चौपट कर दिया ( जम्बुमाली मर गया ) ॥ २२ ॥

नदन् प्रतपनो घोरो नलं सोऽभ्यनुधावत ।

नलः प्रतपनस्याशु पातयामास चक्षुषी ॥ २३ ॥

भिन्नगात्रः शरैस्तीक्ष्णैः क्षिप्रहस्तेन रक्षसा । दूसरी ओर भयानक राक्षस प्रतपन भीषण गर्जना करके नलकी ओर दौड़ा । शीघ्रतापूर्वक हाथ चलानेवाले उस राक्षस-ने अपने तीखे बाणोंसे नलके शरीरको क्षत - विक्षत कर दिया । तब नलने तत्काल ही उसकी दोनों आँखें निकाल लीं ॥२३३ ॥

ग्रसन्तमिव सैन्यानि प्रघसं वानराधिपः ॥ २४ ॥

' सुग्रीवः सप्तपर्णेन निजघान जवेन च । उधर राक्षस प्रवस वानरसेनाको कालका ग्रास बना रहा था । यह देख वानरराज सुग्रीवने सप्तपर्णनामक वृक्षसे उसे वेगपूर्वक मार गिराया ॥ २४३ ॥

प्रपीड्य शरवर्षेण राक्षसं भीमदर्शनम् ॥ २५ ॥

निजघान विरूपाक्षं शरेणैकेन लक्ष्मणः । लक्ष्मणने पहले बाणोंकी वर्षा करके भयंकर दृष्टिवाले राक्षस विरूपाक्षको बहुत पीड़ा दी । फिर एक बाणसे मारकर उसे मौत के घाट उतार दिया ॥ २५३ ॥

अग्निकेतुश्च दुर्धर्षो रश्मिकेतुश्च राक्षसः ।

सुप्तघ्नो यज्ञकोपश्च रामं निर्बिभिदुः शरैः ॥ २६ ॥

अग्निकेतु, दुर्जय रश्मिकेतु, सुप्तघ्न और यज्ञकोप नामक राक्षसोंने श्रीरामचन्द्रजीको अपने बाणोंसे घायल कर दिया ॥

तेषां चतुर्णा रामस्तु शिरांसि समरे शरैः ।

क्रुद्धश्चतुर्भिश्चिच्छेद् घोरैरग्निशिखोपमैः ॥ २७ ॥

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१ ९ ६४ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे तब श्रीरामने कुपित हो अग्निशिखाके समान भयंकर बाद्वारा समराङ्गणमें उन चारोंके सिर काट लिये ॥ २७ ॥

वज्रमुष्टिस्तु मैन्देन मुष्टिना निहतो रणे ।

पपात सरथः साश्वः सुराट्ट इव भूतले ॥ २८ ॥

उस युद्धस्थलमें मैन्दने वज्रमुष्टिपर मुक्केका प्रहार किया, जिससे वह रथ और घोड़ोंसहित उसी तरह पृथ्वीपर गिर पड़ा, मानो देवताओंका विमान धराशायी हो गया हो ॥ २८ ॥

निकुम्भस्तु रणे नीलं नीलाञ्जनचयप्रभम् ।

निर्बिभेद शरैस्तीक्ष्णैः करैर्मेघमिवांशुमान् ॥ २ ९ ॥

निकुम्भने काले कोयलेके समूहकी भाँति नील वर्णवाले नीलको रणक्षेत्र में अपने पैने बाणोंद्वारा उसी तरह छिन्न - भिन्न कर दिया, जैसे सूर्यदेव अपनी प्रचण्ड किरणोंद्वारा बादलों-को फाड़ देते हैं || २ ९ ॥

पुनः शरशतेनाथ क्षिप्रहस्तो निशाचरः ।

बिभेद समरे नीलं निकुम्भः प्रजहास च ॥ ३० ॥

परंतु शीघ्रतापूर्वक हाथ चलानेवाले उस निशाचरने सम-राङ्गणमें नीलको पुनः सौ बाणोंसे घायल कर दिया । ऐसा करके निकुम्भ जोर - जोर से हँसने लगा ॥ ३० ॥

तस्यैव रथचक्रेण नीलो विष्णुरिवाहवे ।

शिरश्चिच्छेद समरे निकुम्भस्य च सारथेः ॥ ३१ ॥

यह देख नीलने उसीके रथके पहियेसे युद्धस्थलमें निकुम्भ तथा उसके सारथिका उसी तरह सिर काट लिया, जैसे भगवान् विष्णु संग्रामभूमिमें अपने चक्रसे दैत्योंके मस्तक उड़ा देते हैं ॥ ३१ ॥

वज्राशनिसमस्पर्शो द्विविदोऽप्यशनिप्रभम् ।

जघान गिरिशृङ्गेण मिषतां सर्वरक्षसाम् ॥ ३२ ॥

द्विविदका स्पर्श वज्र और अशनिके समान दुःसह था । उन्होंने सब राक्षसोंके देखते - देखते अशनिप्रभ नामक निशाचर-पर एक पर्वतशिखरसे प्रहार किया ॥ ३२ ॥

द्विविदं वानरेन्द्रं तु द्रुमयोधिनमाहवे ।

शरैरशनिसंकाशैः स विव्याधाशनिप्रभः ॥ ३३ ॥

तब अशनिप्रभने युद्धस्थलमें वृक्ष लेकर युद्ध करनेवाले वानरराज द्विविदको वज्रतुल्य तेजस्वी बाणोंद्वारा घायल कर दिया ॥ ३३ ॥

स शरैरभिविद्धाङ्गो द्विविदः क्रोधमूर्चिछतः ।

सालेन सरथं सारखं निजघानाशनिप्रभम् ॥ ३४ ॥

द्विविदका सारा शरीर बाणोंसे क्षत - विक्षत हो गया था, इससे उन्हें बड़ा क्रोध हुआ और उन्होंने एक सालवृक्षसे रथ और घोड़ों सहित अशनिप्रभको मार गिराया ॥ ३४ ॥

विद्युन्माली रथस्थस्तु शरैः काञ्चनभूषणैः ।

सुषेणं ताडयामास ननाद च मुहुर्मुहुः ॥ ३५ ॥

रथपर बैठे हुए विद्युन्मालीने अपने सुवर्णभूषित बाणों-द्वारा सुषेणको बारंबार घायल किया । फिर वह जोर - जोर से गर्जना करने लगा ॥ ३५ ॥

तं रथस्थमथो दृष्ट्रा सुषेणो वानरोत्तमः ।

गिरिशृङ्गेण महता रथमाशु न्यपातयत् ॥ ३६ ॥

उसे रथपर बैठा देख वानरशिरोमणि सुषेणने एक विशाल पर्वत - शिखर चलाकर उसके रथको शीघ्र ही चूर - चूर कर डाला ॥ ३६ ॥

लाघवेन तु संयुक्तो विद्युन्माली निशाचरः ।

अपक्रम्य रथात्तूर्ण गदापाणिः क्षितौ स्थितः ॥ ३७ ॥

निशाचर विद्युन्माली तुरंत ही बड़ी फुर्ती के साथ रथसे नीचे कूद पड़ा और हाथमें गदा लेकर पृथ्वीपर खड़ा हो गया ॥ ३७ ॥

ततः क्रोधसमाविष्टः सुषेणो हरिपुङ्गवः ।

शिलां सुमहतीं गृह्य निशाचरमभिद्रवत् ॥ ३८ ॥

तदनन्तर क्रोधसे भरे हुए वानरशिरोमणि सुषेण एक बहुत बड़ी शिला लेकर उस निशाचरकी ओर दौड़े ॥ ३८ ॥

तमापतन्तं गदया विद्युन्माली निशाचरः ।

वक्षस्यभिजघानाशु सुषेणं हरिपुङ्गवम् ॥ ३ ९ ॥

कपिश्रेष्ठ सुषेणको आक्रमण करते देख निशाचर विद्यु-न्मालीने तत्काल ही गदासे उनकी छातीपर प्रहार किया || ३ ९ ॥।

गदाप्रहारं तं घोरमचिन्त्य प्लवगोत्तमः ।

तां तूष्णीं पातयामास तस्योरसि महामृधे ॥ ४० ॥

गदाके उस भीषण प्रहारकी कुछ भी परवा न करके वानरप्रवर सुषेणने उसी पहलेवाली शिलाको चुपचाप उठा लिया और उस महासमर में उसे विद्युन्मालीकी छातीपर दे मारा ॥ ४० ॥

शिलाप्रहाराभिहतो विद्युन्माली निशाचरः ।

निष्पिष्टहृदयो भूमौ गतासुर्निपपात ह ॥ ४१ ॥

शिला के प्रहारसे घायल हुए निशाचर विद्युन्मालीकी छाती चूर - चूर हो गयी और वह प्राणशून्य होकर पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥ ४१ ॥

एवं तैर्वानरैः शूरैः शूरास्ते रजनीचराः ।

द्वन्द्वे विमथितास्तत्र दैत्या इव दिवौकसैः ॥ ४२ ॥

इस प्रकार वे शूरवीर निशाचर शौर्यसम्पन्न वानर वीरों-द्वारा वहाँ द्वन्द्वयुद्ध में उसी तरह कुचल दिये गये जैसे देवताओं द्वारा दैत्य मथ डाले गये थे ॥ ४२ ॥

भल्लैश्चान्यैर्गदाभिश्च शक्तितोमर सायकैः ।

अपविद्धैश्चापि रथैस्तथा सांग्रामिकैर्हयैः ॥ ४३ ॥

निहतैः कुञ्जरैर्मत्तैस्तथा वानरराक्षसैः ।

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युद्धकाण्डे चतुश्चत्वारिंशः सर्गः १ ९ ६५ भग्नैर्धरणिसंश्रितैः ॥ ४४ ॥

बभूवायोधनं घोरं गोमायुगणसेवितम् ।

कबन्धानि समुत्पेतुर्दिक्षु वानररक्षसाम् ।

विमर्दे तुमुले तस्मिन् देवासुररणोपमे ॥ ४५ ॥

उस समय भालों, अन्यान्य बाणों, गदाओं, शक्तियों, तोमरों, सायकों, टूटे और फेंके हुए रथों, फौजी घोड़ों, मरे हुए मतवाले हाथियों, वानरों, राक्षसों, पहियों तथा टूटे हुए जूओंसे, जो धरतीपर बिखरे पड़े थे, वह युद्धभूमि बड़ी भयानक हो रही थी । गीदड़ोंके समुदाय वहाँ सब ओर विचर रहे थे । देवासुर संग्राम के समान उस भयानक मार - काटमें इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आरामायण आदिकाव्य के वानरों और राक्षसोंके कबन्ध ( मस्तकरहित धड़ ) सम्पूर्ण दिशाओं में उछल रहे थे ॥ ४३-४५ ॥ निहन्यमाना निशाचराः शोणितगन्धमूच्छिताः । पुनः सुयुद्धं तरसा समाश्रिता दिवाकरस्यास्तमयाभिकाङ्क्षिणः ॥ ४६ ॥

उस समय उन वानरशिरोमणियोंद्वारा मारे जाते हुए निशाचर रक्तकी गन्धसे मतवाले हो रहे थे । वे सूर्य के अस्त होनेकी प्रतीक्षा करते हुए पुनः बड़े वेग से घमासान युद्धमें तत्पर हो गये ॥ ४६ ॥

युद्धकाण्डे त्रिचत्वारिंशः सर्गः ॥ ४३ ॥

युद्धकाण्ड में तैंतालीसवाँ सगँ पूरा हुआ ॥ ४३ ॥

चतुश्चत्वारिंशः सर्गः रात में वानरों और राक्षसोंका घोर युद्ध, अङ्गदके द्वारा इन्द्रजित् की पराजय, मायासे अदृश्य हुए इन्द्रजितका नागमय बाणोंद्वारा श्रीराम और लक्ष्मणको बाँधना

युध्यतामेव तेषां तु तदा वानररक्षसाम् ।

रविरस्तं गतो रात्रिः प्रवृत्ता प्राणहारिणी ॥ १ ॥

इस प्रकार उन वानर और राक्षसोंमें युद्ध चल ही रहा था कि सूर्यदेव अस्त हो गये तथा प्राणोंका संहार करनेवाली रात्रिका आगमन हुआ ॥ १ ॥

अन्योन्यं वद्धवैराणां घोराणां जयमिच्छताम् ।

सम्प्रवृत्तं निशायुद्धं तदा वानररक्षसाम् ॥ २ ॥

वानरों और राक्षसों में परस्पर वैर बँध गया था । दोनों ही पक्षोंके योद्धा बड़े भयंकर थे तथा अपनी - अपनी विजय चाहते थे; अतः उस समय उनमें रात्रियुद्ध होने लगा ॥ २ ॥

राक्षसोऽसीति हरयो वानरोऽसीति राक्षसाः ।

अन्योन्यं समरे जघ्नुस्तस्मिंस्तमसि दारुणे ॥ ३ ॥

उस दारुण अन्धकारमें वानरलोग अपने विपक्षीसे पूछते थे, क्या तुम राक्षस हो? और राक्षसलोग भी पूछते थे, क्या तुम वानर हो? इस प्रकार पूछ - पूछकर समराङ्गणमें वे एक दूसरेपर प्रहार करते थे ॥ ३ ॥

हत दारय चैहीति कथं विद्रवसीति च ।

एवं सुतुमुलः शब्दस्तस्मिन् सैन्ये तु शुश्रुवे ॥ ४ ॥

सेनामें सब ओर ' मारो, काटो, आओ तो, क्यों भागे जाते हो ' — ये भयंकर शब्द सुनायी दे रहे थे ॥ ४ ॥

कालाः काञ्चनसंनाहास्तस्मिंस्तमसि राक्षसाः ।

सम्प्रदृश्यन्त शैलेन्द्रा दीप्तोषधिवना इव ॥ ५ ॥

काले - काले राक्षस सुवर्णमय कवचसे विभूषित होकर उस अन्धकारमें ऐसे दिखायी देते थे, मानो चमकती हुई ओषधियोंके वनसे युक्त काले पहाड़ हों ॥ ५ ॥

तस्मिंस्तमसि दुष्पारे राक्षसाः क्रोधमूर्च्छिताः ।

परिपेतुर्महावेगा भक्षयन्तः लवङ्गमान् ॥ ६ ॥

उस अन्धकारसे पार पाना कठिन हो रहा था । उसमें क्रोधसे अधीर हुए महान् वेगशाली राक्षस वानरोंको खाते हुए उनपर सब ओरसे टूट पड़े ॥ ६ ॥

ते हयान् काञ्चनापीडान् ध्वजांश्चाशीविषोपमान् ।

आप्लुत्य दशनैस्तीक्ष्णैर्भीमकोपा व्यदारयन् ॥ ७ ॥

तब वानरोंका कोप बड़ा भयानक हो उठा । वे उछल-उछलकर अपने तीखे दाँतोंद्वारा सुनहरे साजसे सजे हुए राक्षस - दलके घोड़ोंको और विषधर सर्प के समान दिखायी देनेवाले उनके ध्वजों को भी विदीर्ण कर देते थे ॥ ७ ॥

वानरा बलिनो युद्धेऽक्षोभयन् राक्षसीं चमूम् ।

कुञ्जरान् कुञ्जरारोहान् पताकाध्वजिनो रथान् ॥ ८ ॥

चकर्षुश्च ददंशुश्च दशनैः क्रोधमूर्चिछताः । बलवान् वानरोंने युद्ध में राक्षस - सेना के भीतर हलचल मचा दी । वे सब के सब क्रोधसे पागल हो रहे थे; अतः हाथियों एवं हाथीसवारोंको तथा ध्वजा - पताकासे सुशोभित * सूर्यास्त के बाद प्रदोषकालसे लेकर पूरी रातभर राक्षसोंका बल अधिक बढ़ा होता है, इसीलिये वे सूर्यास्त होनेकी प्रतीक्षा कर रहे थे ।

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११६६ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे रथोंको भी खींच लेते और दाँतोंसे काट - काटकर क्षत - विक्षत कर देते थे ॥ ८३ ॥

लक्ष्मणश्चापि रामश्च शरैराशीविषोपमैः ॥ ९ ॥

दृश्याश्यानि रक्षांसि प्रवराणि निजघ्नतुः । बड़े - बड़े राक्षस कभी प्रकट होकर युद्ध करते थे और कभी अदृश्य हो जाते थे; परंतु श्रीराम और लक्ष्मण विषधर सर्पोंके समान अपने बाणोंद्वारा दृश्य और अदृश्य सभी राक्षसों को मार डालते थे ॥ ९ ३ ॥ तुरंगखुरविध्वस्तं रथनेमिसमुत्थितम् ॥ १० ॥

रुरोध कर्णनेत्राणि युध्यतां धरणीरजः । घोड़ों की टापसे चूर्ण होकर रथके पहियोंसे उड़ायी हुई । धरती की धूल योद्धाओंके कान और नेत्र बंद कर देती थी ।

वर्तमाने तथा घोरे संग्रामे लोमहर्षणे ।

रुधिरौघा महाघोरा नद्यस्तत्र विसुस्रुवुः ॥ ११ ॥

इस प्रकार रोमाञ्चकारी भयंकर संग्रामके छिड़ जानेपर " वहाँ रक्तके प्रवाहको बहानेवाली खून की बड़ी भयंकर नदियाँ बहने लगीं ॥ ११ ॥

ततो भेरीमृदङ्गानां पणवानां च निःखनः ।

शङ्खनेमिखनोन्मिश्रः सम्बभूवाद्भुतोपमः ॥ १२ ॥

तदनन्तर भेरी, मृदङ्ग और पणव आदि बाजोंकी ध्वनि होने लगी, जो शङ्खोंके शब्द तथा रथके पहियोंकी घर्घराहटसे मिलकर बड़ी अद्भुत जान पड़ती थी ॥ १२ ॥

हतानां स्तनमानानां राक्षसानां च निःखनः ।

शस्तानां वानराणां च सम्बभूवात्र दारुणः ॥ १३ ॥

घायल होकर कराहते हुए राक्षसों और शस्त्रोंसे क्षत-विक्षत हुए बानरोंका आर्तनाद वहाँ बड़ा भयंकर प्रतीत होता था ॥ १३ ॥

तैर्वानरमुख्यैश्च शक्तिशूलपरश्वधैः ।

निहतैः पर्वताकारै राक्षसैः कामरूपिभिः ॥ १४ ॥

शस्त्रपुष्पोपहारा च तत्रासीद् युद्धमेदिनी ।

दुर्ज्ञेया दुर्निवेशा च शोणितास्रावकर्दमा ॥ १५ ॥

शक्ति, शूल और फरसोंसे मारे गये मुख्य - मुख्य वानरों तथा वानद्वारा कालके गालमें डाले गये इच्छानुसार रूप धारण करनेमें समर्थ पर्वताकार राक्षसोंसे उपलक्षित उस युद्धभूमिमें रक्त के प्रवाहसे कीच हो गयी थी । उसे पहचानना कठिन हो रहा था तथा वहाँ बहरना तो और मुश्किल हो गया था । ऐसा जान पड़ता था उस भूमिको शस्त्ररूषी पुष्पोंका उपहार अर्पित किया गया है ॥ १४-१५ ॥

सा बभूव निशा घोरा हरिराक्षसहारिणी ।

कालरात्रीव भूतानां सर्वेषां दुरतिक्रमा ॥ १६ ॥

वानरों और राक्षसों का संहार करनेवाली वह भयंकर रजनी कालरात्रि के समान समस्त प्राणियोंके लिये दुर्लङ्घय हो गयी थी ॥ १६ ॥

ततस्ते राक्षसास्तत्र तस्मिंस्तमसि दारुणे ।

राममेवाभ्यवर्तन्त संहृष्टाः शरवृष्टिभिः ॥ १७ ॥

तदनन्तर उस दारुण अन्धकारमें वहाँ वे सब राक्षस हर्ष और उत्साह में भरकर बाणोंकी वर्षा करते हुए श्रीरामपर ही धावा करने लगे ॥ १७ ॥

तेषामापततां शब्दः क्रुद्धानामपि गर्जताम् ।

उद्वर्त इव सप्तानां समुद्राणामभूत् खनः ॥ १८ ॥

उस समय कुपित हो गर्जना करते हुए उन आक्रमणकारी राक्षसोंका शब्द प्रलयके समय सातों समुद्रोंके महान् कोलाहल-सा जान पड़ता था ॥ १८ ॥

तेषां रामः शरैः षड्भिः षड् जघान निशाचरान् ।

निमेषान्तरमात्रेण शरैरग्निशिखोपमैः ॥ १ ९ ॥

तब श्रीरामचन्द्रजीने पलक मारते - मारते अग्निज्वालाके समान छः भयानक बाणोंसे कर दिया ॥ १ ९ ॥ यज्ञशत्रुश्च दुर्धर्षो वज्रदंष्ट्रो महाकायस्तौ उनके नाम इस प्रकार महोदर, महाकाय, वज्रदंष्ट्र ते तु रामेण बाणौघैः युद्धादपसृतास्तत्र श्रीरामके बाणसमूहोंसे निम्नाङ्कित छः निशाचरोंको घायल

महापार्श्वमहोदरौ ।

चोभौ शुकसारणौ ॥ २० ॥

हैं - दुर्धर्षं वीर यज्ञशत्रु, महापार्श्व तथा वे दोनों शुक और सारण ॥

सर्वमर्मसु ताडिताः ।

सावशेषायुषोऽभवन् ॥ २१ ॥

मारे मर्मस्थानोंमें चोट पहुँचने के कारण वे छहों राक्षस युद्ध छोड़कर भाग गये; इसीलिये उनकी आयु शेष रह गयी जान बच गयी ॥ २१ ॥

निमेषान्तरमात्रेण घोरैरग्निशिखोपमैः ।

दिशश्चकार विमलाः प्रदिशश्च महारथः ॥ २२ ॥

महारथी श्रीरामने अग्नि- शिखाके समान प्रज्वलित भयंकर वाणोंद्वारा पलक मारते - मारते सम्पूर्ण दिशाओं और उनके कोणको निर्मल ( प्रकाशपूर्ण ) कर दिया ॥ २२ ॥

ये त्वन्ये राक्षसा वीरा रामस्याभिमुखे स्थिताः ।

तेऽपि नष्टाः समासाद्य पतङ्गा इव पावकम् ॥ २३ ॥

दूसरे भी जो - जो राक्षसवीर श्रीरामके सामने खड़े थे, वे भी उसी प्रकार नष्ट हो गये, जैसे आगमें पड़कर पतिंगे जल जाते हैं ॥ २३ ॥

सुवर्णपुङ्खैर्विशिखैः सम्पतद्भिः समन्ततः ।

बभूव रजनी चित्रा खद्योतैरिव शारदी ॥ २४ ॥

चारों ओर सुवर्णमय पङ्खवाले बाण गिर रहे थे । उनकी

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युद्धकाण्डे चतुश्चत्वारिंशः सर्गः ११६७ प्रभासे वह रजनी जुगनुओंसे विचित्र दिखायी देनेवाली शरद् ऋतुकी रात्रिके समान अद्भुत प्रतीत होती थी ॥ २४ ॥

राक्षसानां च निनदैर्भेरीणां चैव निःखनैः ।

सा बभूव निशा घोरा भूयो घोरतराभवत् ॥ २५ ॥

राक्षसोंके सिंहनादों और भेरियोंकी आवाजोंसे वह भयानक रात्रि और भी भयंकर हो उठी थी ॥ २५ ॥

तेन शब्देन महता प्रवृद्धेन समन्ततः ।

त्रिकूटः कंदराकीर्णः प्रव्याहरदिवाचलः ॥ २६ ॥

सब ओर फैले हुए उस महान् शब्दसे प्रतिध्वनित हो कन्दराओंसे व्याप्त त्रिकूट पर्वत मानो किसीकी बातका उत्तर देता - सा जान पड़ता था ॥ २६ ॥

गोलाङ्गूला महाकायास्तमसा तुल्यवर्चसः ।

सम्परिष्वज्य बाहुभ्यां भक्षयन् रजनीचरान् ॥ २७ ॥

लंगूर जातिके विशालकाय बानर जो अन्धकारके समान काले थे, निशाचरोंको दोनों भुजाओं में कसकर मार डालते और उन्हें कुत्ते आदिको खिला देते थे ॥ २७ ॥

अङ्गदस्तु रणे शत्रून् निहन्तुं समुपस्थितः ।

रावणिं निजघानाशु सारथिं च हयानपि ॥ २८ ॥

दूसरी ओर अङ्गद रणभूमिमें शत्रुओं का संहार करनेके लिये आगे बढ़े । उन्होंने रावणपुत्र इन्द्रजित् को घायल कर दिया तथा उसके सारथि और घोड़ोंको भी यमलोक पहुँचा दिया ॥ २८ ॥

इन्द्रजित् तु रथं त्यक्त्वा हताश्वो हतसारथिः ।

अङ्गदे महायस्तस्तत्रैवान्तरधीयत ॥ २ ९ ॥

अङ्गदके द्वारा घोड़े और सारथिके मारे जानेपर महान कष्टमें पड़ा हुआ इन्द्रजित् रथको छोड़कर वहीं अन्तर्धान हो गया ॥ २ ९ ॥

तत् कर्म वालिपुत्रस्य सर्वे देवाः सहर्षिभिः ।

तुष्टुवुः पूजनार्हस्य तौ चोभौ रामलक्ष्मणौ ॥ ३० ॥

प्रशंसा के योग्य वालिकुमार अङ्गदके उस पराक्रमकी ऋषियोंसहित देवताओं तथा दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मणने भी भूरि - भूरि प्रशंसा की ॥ ३० ॥

प्रभावं सर्वभूतानि विदुरिन्द्रजितो युधि ।

ततस्ते तं महात्मानं दृष्ट्वा तुष्टाः प्रधर्षितम् ॥ ३१ ॥

सम्पूर्ण प्राणी युद्ध में इन्द्रजित् के प्रभावको जानते थे; अतः अङ्गदके द्वारा उसको पराजित हुआ देख उन महात्मा अङ्गदपर दृष्टिपात करके सबको बड़ी प्रसन्नता हुई ॥ ३१ ॥

ततः प्रहृष्टाः कपयः ससुग्रीवविभीषणाः ।

साधुसाध्विति नेदुश्च दृष्ट्रा शत्रु पराजितम् ॥ ३२ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये शत्रुको पराजित हुआ देख सुग्रीव और विभीषणसहित सब बानर बड़े प्रसन्न हुए और अङ्गदको साधुवाद देने लगे ॥

इन्द्रजित् तु तदानेन निर्जितो भीमकर्मणा ।

संयुगे बालिपुत्रेण क्रोधं चक्रे सुदारुणम् ॥ ३३ ॥

युद्धस्थलमें भयानक कर्म करनेवाले वालिपुत्र अङ्गदसे पराजित होकर इन्द्रजित्ने बड़ा भयंकर क्रोध प्रकट किया ॥ ३३ ॥

सोऽन्तर्धानगतः पापो रावणी रणकर्शितः ।

ब्रह्मदत्तवरो वीरो रावणिः क्रोधमूच्छितः ॥ ३४ ॥

अदृश्यो निशितान् बाणान् मुमोचाशनिवर्चसः । रावणकुमार वीर इन्द्रजित् ब्रह्माजीसे वर प्राप्त कर चुका था । युद्ध में अधिक कष्ट पाने के कारण वह पापी रावणपुत्र क्रोधसे अचेत - सा हो रहा था; अतः अन्तर्धान - विद्याका आश्रय ले अदृश्य हो उसने वज्रके समान तेजस्वी और तीखे बाण बरसाने आरम्भ किये ॥ ३४३ ॥

रामं च लक्ष्मणं चैव घोरैर्नागमयैः शरैः ॥ ३५ ॥

विभेद समरे क्रुद्धः सर्वगात्रेषु राक्षसः । समराङ्गणमें कुपित हुए इन्द्रजित्ने घोर सर्पमय बाणों-द्वारा श्रीराम और लक्ष्मणको घायल कर दिया । वे दोनों रघुवंशी बन्धु अपने सभी अङ्गों में चोट खाकर क्षत विक्षत -हो रहे थे || ३५३ ॥ मायया संवृतस्तत्र मोहयन् राघवौ युधि ॥ ३६ ॥

अदृश्यः सर्वभूतानां कूटयोधी निशाचरः ।

बबन्ध शरबन्धेन भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ ॥ ३७ ॥

मायासे आवृत हो समस्त प्राणियोंके लिये अदृश्य होकर वहाँ कूटयुद्ध करनेवाले उस निशाचरने युद्धस्थलमें दोनों रघुवंशी बन्धु श्रीराम और लक्ष्मणको मोहमें डालते हुए उन्हें सर्पाकार बाणके बन्धनमें बाँध लिया ॥ ३६-३७ ॥

तौ तेन पुरुषव्याघ्रौ क्रुद्धेनाशीविषैः शरैः ।

सहसाभिहतौ वीरौ तदा प्रेक्षन्त वानराः ॥ ३८ ॥

इस प्रकार क्रोधसे भरे हुए इन्द्रजित्ने उन दोनों पुरुष-प्रवर वीरोंको सहसा सर्पाकार बार्णोद्वारा बाँध लिया । उस समय वानरोंने उन्हें नागपाशमें बद्ध देखा ॥ ३८ ॥

प्रकाशरूपस्तु यदा न शक्त-स्तौ बाधितुं राक्षसराजपुत्रः । मायां प्रयोक्तं समुपाजगाम बबन्ध तौ राजसुतौ दुरात्मा ॥ ३ ९ ॥ प्रकटरूपसे युद्ध करते समय जब राक्षसराजकुमार इन्द्रजित् उन दोनों राजकुमारोंको बाधा देने में समर्थ न हो सका, तब उनपर मायाका प्रयोग करनेको उतारू हो गया और उन दोनों भाइयोंको उस दुरात्माने बाँध लिया ॥ ३ ९ ॥ युद्धकाण्डे चतुश्चत्वारिंशः सर्गः ॥ ४४ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्ड में चौवालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ४४ ॥