Ramayana 2 — पृष्ठ 641–650

वाल्मीकि रामायण — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 641–650

पृष्ठ 641

वाल्मीकि रामायण — खण्ड २, पृष्ठ 641 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

१४३० श्रीमवाल्मीकीय रामायणे लिये ही यह अत्यन्त दुष्कर सेतु बाँधा गया था ॥ १६३ ॥

पश्य सागरमक्षोभ्यं वैदेहि वरुणालयम् ॥ १७ ॥

अपारमिव गर्जन्तं शङ्खशुक्तिसमाकुलम् । ' विदेहनन्दिनि! इस अक्षोभ्य वरुणालय समुद्रको तो देखो, जो अपार - सा दिखायी देता है । शङ्ख और सीपियोंसे भरा हुआ यह सागर कैसी गर्जना कर रहा है ॥ १७३ ॥

हिरण्यनाभं शैलेन्द्रं काञ्चनं पश्य मैथिलि ॥ १८ ॥

विश्रमार्थ हनुमतो भित्त्वा सागरमुत्थितम् । ' मिथिलेशकुमारी! इस सुवर्णमय पर्वतराज हिरण्यनाभको तो देखो, जो हनुमानजीको विश्राम देनेके लिये समुद्र की जल-राशिको चीरकर ऊपरको उठ गया था ॥ १८३ ॥

एतत् कुक्षौ समुद्रस्य स्कन्धावारनिवेशनम् ॥ १ ९ ॥ अत्र पूर्व महादेवः प्रसादमकरोद् विभुः । ' यह समुद्र के उदरमें ही विशाल टापू है, जहाँ मैंने सेना-का पड़ाव डाला था । यहीं पूर्वकालमें भगवान् महादेवने मुझ-पर कृपा की थी— सेतु बाँधनेसे पहले मेरे द्वारा स्थापित होकर वे यहाँ विराजमान हुए थे ॥ १ ९ ३ ॥ एतत् तु दृश्यते तीर्थं सागरस्य महात्मनः ॥ २० ॥

सेतुबन्ध इति ख्यातं त्रैलोक्येन च पूजितम् । “ इस पुण्यस्थलमें विशालकाय समुद्रका तीर्थं दिखायी देता है, जो सेतुनिर्माणका मूलप्रदेश होनेके कारण सेतुबन्ध नामसे विख्यात तथा तीनों लोकोंद्वारा पूजित होगा ॥ २०३ ॥

एतत् पवित्रं परमं महापातकनाशनम् ॥ २१ ॥

अत्र राक्षसराजोऽयमाजगाम विभीषणः । " यह तीर्थं परम पवित्र और महान् पातकोंका नाश करने-वाला होगा । यहीं थे ॥ २१३ ॥

एषा सा दृश्यते सुग्रीवस्य पुरी ' सीते! यह दिखायी देती है, यहीं मैंने वालीका ये राक्षसराज विभीषण आकर मुझसे मिले सीते किष्किन्धा चित्रकानना ॥ २२ ॥

रम्या यत्र वाली मया हतः । विचित्र वनप्रान्तसे सुशोभित किष्किन्धा

जो वानरराज सुग्रीवकी सुरम्य नगरी है ।

वध किया था ' ॥ २२३ ॥

अथ दृष्ट्रा पुरीं सीता किष्किन्धां वालिपालिताम् ॥ २३ ॥

अब्रवीत् प्रथितं वाक्यं रामं प्रणयसाध्वसा । अन्य वानरेश्वरोंकी स्त्रियोंको साथ लेकर आपके साथ अपनी राजधानी अयोध्या में चलना चाहती हूँ ' * ॥ २४-२५ ॥

एवमुक्तोऽथ वैदेह्या राघवः प्रत्युवाच ताम् ।

एवमस्त्विति किष्किन्धां प्राप्य संस्थाप्य राघवः ॥ २६ ॥

विमानं प्रेक्ष्य सुग्रीवं वाक्यमेतदुवाच ह । विदेहनन्दिनी सीताके ऐसा कहने पर श्रीरघुनाथजीने कहा--' ऐसा ही हो । ' फिर किष्किन्धामें पहुँचनेपर उन्होंने विमान ठहराया और सुग्रीवकी ओर देखकर कहा ॥ २६३ ॥

ब्रूहि वानरशार्दूल सर्वान् वानरपुङ्गवान् ॥ २७ ॥

स्त्रीभिः परिवृताः सर्वे ह्ययोध्यां यान्तु सीतया ।

तथा त्वमपि सर्वाभिः स्त्रीभिः सह महाबल ॥ २८ ॥

अभित्वरय सुग्रीव गच्छामः प्लवगाधिप । ' वानरश्रेष्ठ! तुम समस्त वानरयूथपतियोंसे कहो कि वे सब लोग अपनी - अपनी स्त्रियोंको साथ लेकर सीताके साथ अयोध्या चलें तथा महाबली वानरराज सुग्रीव! तुम भी अपनी सब स्त्रियोंके साथ शीघ्र चलनेकी तैयारी करो, जिससे हम सब लोग जल्दी वहाँ पहुँचें ' ॥ २७-२८३ ॥ एवमुक्तस्तु सुग्रीवो रामेणामिततेजसा ॥ २ ९ ॥

वानराधिपतिः श्रीमांस्तैश्च सर्वैः समावृतः ।

प्रविश्यान्तःपुरं शीघ्रं तारामुद्वीक्ष्य सोऽब्रवीत् ॥ ३० ॥

अमित तेजस्वी श्रीरघुनाथजीके ऐसा कहनेपर उन सब वानरोंसे घिरे हुए श्रीमान् वानरराज सुग्रीवने शीघ्र ही अन्तःपुरमें प्रवेश करके तारासे भेंट की और इस प्रकार कहा- ॥ २ ९ -३० ॥

प्रिये त्वं सह नारीभिर्वानराणां महात्मनाम् ।

राघवेणाभ्यनुज्ञाता मैथिलीप्रियकाम्यया ॥ ३१ ॥

त्वर त्वमभिगच्छामो गृह्य वानरयोषितः ।

अयोध्यां दर्शयिष्यामः सर्वा दशरथस्त्रियः ॥ ३२ ॥

" प्रिये! तुम मिथिलेशकुमारी सीताका प्रिय करनेकी इच्छासे श्रीरघुनाथजीकी आज्ञा के अनुसार सभी प्रधान प्रधान महात्मा वानरोंकी स्त्रियोंके साथ शीघ्र चलनेकी तैयारी करो । हमलोग इन वानर- पत्नियोंको साथ लेकर चलेंगे और उन्हें * सीताजीने जो यहाँ वानरोंकी स्त्रियोंको साथ ले चलनेकी इच्छा प्रकट की है, इसके लिये किष्किन्धा में विमानको रोककर तदनन्तर वालिपालित किष्किन्धापुरीका दर्शन करके सबको एक दिन रुकना पड़ा । ऐसा रामायण - तिलककारका मत है । सीताने प्रेमसे विह्वल हो श्रीरामसे विनयपूर्वक कहा ॥२३३ ॥ उनके कथनानुसार आश्विन शुका चतुर्थीको किष्किन्धार्मे रहकर

सुग्रीवप्रियभार्याभिस्ताराप्रमुखतो नृप ॥ २४ ॥ पञ्चमीको वहाँसे प्रस्थान किया गया था । भगवान् रामने वहाँ रुककर

अन्येषां वानरेन्द्राणां स्त्रीभिः परिवृता ह्यहम् । उसी दिन अङ्गदका किष्किन्धाके युवराजपदपर अभिषेक करवाया था, गन्तुमिच्छे सहायोध्यां राजधानीं त्वया सह ॥ २५ ॥ जैसा कि महाभारत, वनपर्व अध्याय २ ९ १ श्लोक ५८-५९ से सूचित

" महाराज! मैं सुग्रीवकी तारा आदि प्रिय भार्याओं तथा होता है ।

पृष्ठ 642

वाल्मीकि रामायण — खण्ड २, पृष्ठ 642 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

युद्धकाण्डे त्रयोविंशत्यधिकशततमः सर्गः १४३१ करायेंगे अयोध्यापुरी तथा महाराज दशरथकी सब रानियोंका दर्शन ' यही वह पम्पा नामक पुष्करिणी है, जो तटवर्ती विचित्र ' ॥ ३१-३२ ॥ काननोंसे सुशोभित हो रही है । यहाँ तुम्हारे वियोगसे अत्यन्त सुग्रीवस्य वचः श्रुत्वा तारा सर्वाङ्गशोभना । दुखी होकर मैंने विलाप किया था ॥ ४०३ ॥

आहूय चाब्रवीत् सर्वा वानराणां तु योषितः ॥ ३३ ॥ अस्यास्तीरे मया दृष्टा शबरी धर्मचारिणी

सुग्रीव की यह बात सुनकर सर्वाङ्गसुन्दरी ताराने समस्त अत्र योजनबाहुश्च कबन्धो निहतो ॥ ४१ ॥

वानर- पत्नियोंको बुलाकर कहा - ॥ ३३ ॥

सुग्रीवेणाभ्यनुज्ञाता गन्तुं सर्वैश्च वानरैः ।

मम चापि प्रियं कार्यमयोध्यादर्शनेन च ॥ ३४ ॥

प्रवेशं चैव रामस्य पौरजानपदैः सह ।

विभूतिं चैव सर्वासां स्त्रीणां दशरथस्य च ॥ ३५ ॥

मया । " इसी पम्पाके तटपर मुझे धर्मपरायणा शबरीका दर्शन हुआ था । इधर वह स्थान है, जहाँ एक योजन लंबी भुजा-वाले कबन्ध नामक असुरका मैंने वध किया था ॥ ४१३ ॥

दृश्यतेऽसौ जनस्थाने श्रीमान् सीते वनस्पतिः ॥ ४२ ॥

जटायुश्च महातेजास्तव हेतोर्विलासिनि । ‘ सखियो! सुग्रीवकी आज्ञाके अनुसार तुम सब लोग अपने रावणेन हतो यत्र पक्षिणां पतियों - समस्त वानरोंके साथ अयोध्या चलनेके प्रवरो बली ॥ ४३ ॥

तैयार हो जाओ । अयोध्याका दर्शन करके लिये शीघ्र ' विलासशालिनी सीते! जनस्थानमें वह शोभाशाली प्रिय कार्य करोगी । वहाँ पुरवासियों तथा तुमलोग मेरा भी विशाल वृक्ष दिखायी दे रहा है, जहाँ बलवान् एवं महातेजस्वी साथ श्रीरामका जो अपने नगरमें प्रवेश जनपदके लोगोंके होगा, वह उत्सव हमें देखने को मिलेगा | हम वहाँ महाराज दशरथकी समस्त रानियों-के वैभवका भी दर्शन करेंगी ' ॥ ३४-३५ ॥

तारया चाभ्यनुज्ञाताः सर्वा वानरयोषितः ।

नेपथ्यविधिपूर्व तु कृत्वा चापि प्रदक्षिणम् ॥ ३६ ॥

अध्यारोहन् विमानं तत् सीतादर्शनकाङ्क्षया । ताराकी यह आज्ञा पाकर सारी वानर- पत्नियोंने शृङ्गार करके उस विमानकी परिक्रमा की और सीताजीके दर्शनकी इच्छासे वे उसपर चढ़ गयीं ॥ ३६३ ॥

ताभिः सहोत्थितं शीघ्रं विमानं प्रेक्ष्य राघवः ॥ ३७ ॥

ऋष्यमूकसमीपे तु वैदेहीं पुनरब्रवीत् । उन सबके साथ विमानको शीघ्र ही ऊपर उठा देख श्रीरघुनाथजीने ऋष्यमूकके निकट आनेपर पुनः विदेह-नन्दिनीसे कहा- ॥ ३७३ ॥

दृश्यतेऽसौ महान् सीते सविद्युदिव तोयदः ॥ ३८ ॥

ऋष्यमूको गिरिवरः काञ्चनैर्धातुभिर्वृतः । ' सीते! वह जो बिजलीसहित मेघके समान सुवर्णमय धातुओंसे युक्त श्रेष्ठ एवं महान् पर्वत दिखायी देता है, उसका नाम ऋष्यमूक है है । || ३८३ ॥ अत्राहं वानरेन्द्रेण सुग्रीवेण समागतः ॥ ३ ९ ॥ समयश्च कृतः सीते वधार्थे वालिनो मया । ' सीते! यहीं मैं वानरराज सुग्रीवसे मिला था और मित्रता करनेके पश्चात् वालीका वध करनेके लिये प्रतिज्ञा की थी ॥ ३ ९ ३ ॥ एषा सा दृश्यते पम्पा पक्षिप्रवर जटायु तुम्हारी रक्षा करनेके कारण रावणके हाथसे मारे गये थे ॥ ४२-४३ ॥

खरश्च निहतो यत्र दूषणश्च निपातितः ।

त्रिशिराश्च महावीर्यो मया बाणैरजिह्मगैः ॥ ४४ ॥

" यह वह स्थान है, जहाँ मेरे सीधे जानेवाले बार्णोद्वारा खर मारा गया, दूषण धराशायी किया गया और महापराक्रमी त्रिशिराको भी मौत के घाट उतार दिया गया ॥ ४४ ॥

एतत् तदाश्रमपदमस्माकं वरवर्णिनि ।

पर्णशाला तथा चित्रा दृश्यते शुभदर्शने ॥ ४५ ॥

यत्र त्वं राक्षसेन्द्रेण रावणेन हृता बलात् । ' वरवर्णिनि! शुभदर्शने! यह हमलोगोंका आश्रम है । तथा वह विचित्र पर्णशाला दिखायी देती है, जहाँ आकर राक्षसराज रावणने बलपूर्वक तुम्हारा अपहरण किया था ॥ ४५३ ॥

एषा गोदावरी रम्या प्रसन्नसलिला शुभा ॥ ४६ ॥

अगस्त्यस्याश्रमश्चैव दृश्यते कदलीवृतः । " यह स्वच्छ जलराशिसे सुशोभित मङ्गलमयी रमणीय गोदावरी नदी है तथा वह केले के कुओंसे घिरा हुआ महर्षि अगस्त्यका आश्रम दिखायी देता है ॥ ४६३ ॥

दीप्तश्चैवाश्रमो ह्येष सुतीक्ष्णस्य महात्मनः ॥ ४७ ॥

दृश्यते चैव वैदेहि शरभङ्गाश्रमो महान् ।

उपयातः सहस्राक्षो यत्र शक्रः पुरंदरः ॥ ४८ ॥

" यह महात्मा सुतीक्ष्णका दीप्तिमान् आश्रम है और विदेहनन्दिनि! वह शरभङ्ग मुनिका महान् आश्रम दिखायी देता है, जहाँ सहस्रनेत्रधारी पुरंदर इन्द्र पधारे थे ॥ ४७-४८ ॥

अस्मिन् देशे महाकायो विराधो निहतो मया ।

नलिनी चित्रकानना ॥ ४० ॥ एते ते तापसा देवि दृश्यन्ते तनुमध्यमे ॥ ४ ९ ॥

त्वया विहीनो यत्राहं विललाप सुदुःखितः । ' यह वह स्थान है, जहाँ मैंने विशालकाय विराधका वध

पृष्ठ 643

वाल्मीकि रामायण — खण्ड २, पृष्ठ 643 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

श्रीमवाल्मीकीय रामायणे १४३२ किया था । देवि! तनुमध्यमे! ये वे तापस दिखायी देते हैं, जिनका दर्शन हमलोगोंने पहले किया था ॥ ४ ९ ॥

अत्रिः कुलपतिर्यत्र सूर्यवैश्वानरोपमः ।

अत्र सीते त्वया दृष्टा तापसी धर्मचारिणी ॥ ५० ॥

' सीते! इस तापसाश्रमपर ही सूर्य और अग्निके समान तेजस्वी कुलपति अत्रि मुनि निवास करते हैं । यहीं तुमने धर्मपरायणा तपस्विनी अनसूयादेवीका दर्शन किया था ॥५० ॥

असौ सुतनु शैलेन्द्रश्चित्रकूटः प्रकाशते ।

अत्र मां कैकयीपुत्रः प्रसादयितुमागतः ॥ ५१ ॥

“ सुतनु! वह गिरिराज चित्रकूट प्रकाशित हो रहा है । वहीं कैकेयीकुमार भरत मुझे प्रसन्न करके लौटा लेनेके लिये आये थे ॥ ५१ ॥

एषा सा यमुना रम्या दृश्यते चित्रकानना ।

भरद्वाजाश्रमः श्रीमान् दृश्यते चैष मैथिलि ॥ ५२ ॥

' मिथिलेशकुमारी! यह विचित्र काननोंसे सुशोभित रमणीय यमुना नदी दिखायी देती है और यह शोभाशाली भरद्वाजाश्रम दृष्टिगोचर हो रहा है ॥ ५२ ॥

इयं च दृश्यते गङ्गा पुण्या त्रिपथगा नदी ।

नानाद्विजगणाकीर्णा सम्प्रपुष्पितकानना ॥ ५३ ॥

" ये पुण्यसलिला त्रिपथगा गङ्गा नदी दीख रही हैं, जिनके तटपर नाना प्रकारके पक्षी कलरव करते हैं और द्विजवृन्द पुण्यकमोंमें रत हैं । इनके तटवर्ती वनके वृक्ष सुन्दर फूलोंसे भरे हुए हैं ॥ ५३ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये

शृङ्गवेरपुरं चैतद् गुहो यत्र सखा मम ।

एषा सा दृश्यते सीते सरयूर्यूपमालिनी ॥ ५४ ॥

एषा सा दृश्यते सीते राजधानी पितुर्मम ।

अयोध्यां कुरु वैदेहि प्रणामं पुनरागता ॥ ५५ ॥

" यह शृङ्गवेरपुर है, जहाँ मेरा मित्र गुह रहता है । सीते! यह यूपमालाओंसे अलंकृत सरयू दिखायी देती है, जिसके तटपर मेरे पिताजीकी राजधानी है । विदेहनन्दिनि!

तुम वनवासके बाद फिर लौटकर अयोध्याको आयी हो ।

इसलिये इस पुरीको प्रणाम करो ' ॥ ५४-५५ ॥

ततस्ते वानराः सर्वे राक्षसाः सविभीषणाः ।

उत्पत्योत्पत्य संहृष्टास्तां पुरीं ददृशुस्तदा ॥ ५६ ॥

तब विभीषणसहित वे सब राक्षस और वानर अत्यन्त हर्षसे उल्लसित हो उछल - उछलकर उस पुरीका दर्शन करने लगे ॥ ५६ ॥

ततस्तु तां पाण्डुरहर्म्यमालिनी विशालकक्ष्यां गजवाजिभिर्वृताम् । पुरीमपश्यन् लवगाः सराक्षसाः पुरी महेन्द्रस्य यथामरावतीम् ॥ ५७ ॥

तत्पश्चात् वे वानर और राक्षस श्वेत अट्टालिकाओंसे अलंकृत और विशाल भवनोंसे विभूषित अयोध्यापुरीको, जो हाथी - घोड़ोंसे भरी थी और देवराज इन्द्रकी अमरावतीपुरीके समान शोभित होती थी, देखने लगे ॥ ५७ ॥

युद्धकाण्डे त्रयोविंशत्यधिकशततमः सर्गः ॥ १२३ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें एक सौ तेईसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ १२३ ॥

चतुर्विंशत्यधिकशततमः सर्गः श्रीरामका भरद्वाज आश्रमपर उतरकर

पूर्णे चतुर्दशे वर्षे पञ्चम्यां लक्ष्मणाग्रजः ।

भरद्वाजाश्रमं प्राप्य ववन्दे नियतो मुनिम् ॥ १ ॥

श्रीरामचन्द्रजीने चौदहवाँ वर्ष पूर्ण होनेपर पञ्चमी तिथि-को भरद्वाज आश्रममें पहुँचकर मनको वशमें रखते हुए मुनि-को प्रणाम किया ॥ १ ॥

सोऽपृच्छदभिवाद्यैनं भरद्वाजं तपोधनम् ।

शृणोषि कच्चिद् भगवन् सुभिक्षानामयं पुरे ।

कच्चित् स युक्तो भरतो जीवन्त्यपि च मातरः ॥ २ ॥

तपस्याके धनी भरद्वाज मुनिको प्रणाम करके श्रीरामने उनसे पूछा - ' भगवन्! आपने अयोध्यापुरीके विषयमें भी महर्षिसे मिलना और उनसे वर पाना कुछ सुना है? वहाँ काल और कुशल - मङ्गल तो है न? भरत प्रजापालनमें तत्पर रहते हैं न? मेरी माताएँ जीवित हैं न ११ ॥ २ ॥

एवमुक्तस्तु रामेण भरद्वाजो महामुनिः ।

प्रत्युवाच रघुश्रेष्ठं स्मितपूर्व प्रहृष्टवत् ॥ ३ ॥

श्रीरामचन्द्रजीके इस प्रकार पूछने पर महामुनि भरद्वाजने मुस्कराकर उन रघुश्रेष्ठ श्रीरामसे प्रसन्नतापूर्वक कहा— ॥ ३ ॥

आज्ञावशत्वे भरतो जटिलस्त्वां प्रतीक्षते ।

पादुके ते पुरस्कृत्य सर्व च कुशलं गृहे ॥ ४ ॥

' घुनन्दन । भरत आपकी आज्ञाके अधीन हैं । वे बटा

पृष्ठ 644

वाल्मीकि रामायण — खण्ड २, पृष्ठ 644 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

युद्धकाण्डे चतुर्विंशत्यधिकशततमः सर्गः १४३३ बढ़ाये आपके आगमन की प्रतीक्षा करते हैं । आपकी चरण-पादुकाओंको सामने रखकर सारा कार्य करते हैं । आपके घरपर और नगरमें भी सब कुशल है ॥ ४ ॥

त्वां पुरा चीरवसनं प्रविशन्तं महावनम् ।

स्त्रीतृतीयं च्युतं राज्याद् धर्मकामं च केवलम् ॥ ५ ॥

पदातिं त्यक्तसर्वस्वं पितृनिर्देशकारिणम् ।

सर्वभोगैः परित्यक्तं स्वर्गच्युतमिवामरम् ॥ ६ ॥

ear तु करुणापूर्व ममासीत् समितिंजय ।

कैकेयीवचने युक्तं वन्यमूलफलाशिनम् ॥ ७ ॥

' पहले जब आप महान् वनकी यात्रा कर रहे थे, उस समय आपने चीरवस्त्र धारण कर रक्खा था और आप दोनों भाइयोंके साथ तीसरी केवल आपकी स्त्री थी । आप राज्यसे वञ्चित किये गये थे और केवल धर्मपालनकी इच्छा मनमें ले सर्वस्व त्यागकर पिताकी आज्ञाका पालन करनेके लिये पैदल ही जा रहे थे । सारे भोगोंसे दूर हो स्वर्गसे भूतलपर गिरे हुए देवताके समान जान पड़ते थे । शत्रुविजयी वीर! आप कैकेयी के आदेश के पालनमें तत्पर हो जंगली फल - मूलका आहार करते थे, उस समय आपको देखकर मेरे मनमें बड़ी

करुणा हुई थी । ५--७ ॥

साम्प्रतं तु समृद्धार्थ समित्रगणबान्धवम् ।

समीक्ष्य विजितारिं च ममाभूत् प्रीतिरुत्तमा ॥ ८ ॥

" परंतु इस समय तो सारी स्थिति ही बदल गयी है । आप शत्रुपर विजय पाकर सफलमनोरथ हो मित्रों तथा बान्धवोंके साथ लौट रहे हैं । इस रूपमें आपको देखकर मुझे बड़ा सुख मिला— मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई ॥ ८ ॥

सर्वच सुखदुःखं ते विदितं मम राघव ।

यत् त्वया विपुलं प्राप्तं जनस्थाननिवासिना ॥ ९ ॥

‘ रघुबीर! आपने जनस्थानमें रहकर जो विपुल सुख - दुःख उठाये हैं, वे सब मुझे मालूम हैं ॥ ९ ॥

ब्राह्मणार्थे नियुक्तस्य रक्षतः सर्वतापसान् ।

रावणेन हृता भार्या बभूवेयमनिन्दिता ॥ १० ॥

' वहाँ रहकर आप ब्राह्मणोंके कार्य में संलग्न हो समस्त तपस्वी मुनियोंकी रक्षा करते थे । उस समय रावण आपकी इस सती - साध्वी भार्याको हर ले गया ॥ १० ॥

मारीचदर्शनं चैव सीतोन्मथनमेव च ।

कबन्धदर्शनं चैव पम्पाभिगमनं तथा ॥ ११ ॥

सुग्रीवेण च ते सख्यं यत्र वाली हतस्त्वया ।

मार्गणं चैव वैदेह्याः कर्म वातात्मजस्य च ॥ १२ ॥

विदितायां च वैदेह्यां नलसेतुर्यथा कृतः ।

यथा चादीपिता लङ्का प्रहृषैर्हरियूथपैः ॥ १३ ॥

वा ० रा ० ५.१०.१८-सपुत्रबान्धवामात्यः सवलः सहवाहनः ।

यथा च निहतः संख्ये रावणो बलदर्पितः ॥ १४ ॥

यथा च निहते तस्मिन् रावणे देवकण्टके ।

समागमश्च त्रिदशैर्यथा दत्तश्च ते वरः ॥ १५ ॥

सर्व ममैतद् विदितं तपसा धर्मवत्सल । ' धर्मवत्सल! मारीचका कपटमृगके रूपमें दिखायी देना, सीताका बलपूर्वक अपहरण होना, इनकी खोज करते समय आपके मार्ग में कबन्धका मिलना, आपका पम्पासरोवर के तट-पर जाना, सुग्रीवके साथ आपकी मैत्रीका होना, आपके हाथसे वालीका मारा जाना, सीताकी खोज, पवनपुत्र हनुमान्का अद्भुत कर्म, सीताका पता लग जानेपर नलके द्वारा समुद्रपर सेतुका निर्माण, हर्ष और उत्साहसे भरे हुए वानर - यूथपतियों-द्वारा लङ्कापुरीका दहन, पुत्र, बन्धु, मन्त्री, सेना और सवारियों-सहित बलाभिमानी रावणका आपके द्वारा युद्ध में वध होना, उस देवकण्टक रावणके मारे जानेपर देवताओंके साथ आपका समागम होना तथा उनका आपको वर देना —ये सारी बातें मुझे तपके प्रभावसे ज्ञात हैं ॥ ११–१५३ ॥ सम्पतन्ति च मे शिष्याः प्रवृत्त्याख्याः पुरीमितः ॥ १६ ॥

अहमप्यत्र ते दद्मि वरं शस्त्रभृतां वर ।

अर्घ्यं प्रतिगृहाणेदमयोध्यां श्वो गमिष्यसि ॥ १७ ॥

" मेरे प्रवृत्ति नामक शिष्य यहाँसे अयोध्यापुरीको जाते रहते हैं ( अतः मुझे वहाँका वृत्तान्त मालूम होता रहता है ); शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ श्रीराम! यहाँ मैं भी आपको एक वर देता हूँ ( आपकी जो इच्छा हो, उसे माँग ले ) । आज मेरा अर्ध्य और आतिथ्य सत्कार ग्रहण करें । कल सवेरे अयोध्याको जाइयेगा ' ॥ १६-१७ ॥

तस्य तच्छिरसा वाक्यं प्रतिगृह्य नृपात्मजः ।

वाढमित्येव संहृष्टः श्रीमान् वरमयाचत ॥ १८ ॥

मुनिके उस वचनको शिरोधार्य करके हर्षसे भरे हुए श्रीमान् राजकुमार श्रीरामने कहा – बहुत अच्छा ' । फिर उन्होंने उनसे यह वर माँगा -- ॥ १८ ॥

अकालफलिनो वृक्षाः सर्वे चापि मधुस्रवाः ।

फलान्यमृतगन्धीनि बहूनि विविधानि च ॥ १ ९ ॥

भवन्तु मार्गे भगवन्नयोध्यां प्रति गच्छतः । ‘ भगवन्! यहाँसे अयोध्या जाते समय मार्गके सब वृक्षोंमें समय न होनेपर भी फल उत्पन्न हो जायँ और वे सब - के - सब मधुकी धारा टपकानेवाले हों । उनमें नाना प्रकार के बहुत - से अमृतोपम सुगन्धित फल लग जायँ ' ॥ १ ९ ३ ॥ तथेति च प्रतिज्ञाते वचनात् समनन्तरम् ॥ २० ॥

अभवन् पादपास्तत्र स्वर्गपादपसंनिभाः ।

पृष्ठ 645

वाल्मीकि रामायण — खण्ड २, पृष्ठ 645 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

१४३४ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे भरद्वाजजीने कहा- ऐसा ही होगा ' । उनके इस प्रकार प्रतिज्ञा करते ही उनकी उस वाणीके निकलते ही तत्काल वहाँके सारे वृक्ष स्वर्गीय वृक्षों के समान हो गये ॥ २०३ ॥

निष्फलाः फलिनश्चासन् विपुष्पाः पुष्पशालिनः ॥२१ ॥

शुष्काः समग्रपत्रास्ते नगाश्चैव मधुस्रवाः ।

सर्वतो योजनास्तिस्रो गच्छतामभवंस्तदा ॥ २२ ॥

जिनमें फल नहीं थे, उनमें फल आ गये । जिनमें फूल नहीं थे, वे फूलोंसे सुशोभित होने लगे । सूखे हुए वृक्षों में भी हरे - हरे पत्ते निकल आये और सभी वृक्ष मधुकी धारा बहाने लगे । अयोध्या जानेका जो मार्ग था, उसके आस - पास तीन योजनतकके वृक्ष ऐसे ही हो गये ॥ २१-२२ ॥ ततः प्रहृष्टाः वर्षभस्ते बहूनि दिव्यानि फलानि चैव । कामादुपाश्नन्ति सहस्रशस्ते मुदान्विताः स्वर्गजितो यथैव ॥ २३ ॥

फिर तो वे सहस्रों श्रेष्ठ वानर हर्षसे भरकर स्वर्गवासी देवताओंके समान अपनी रुचि के अनुसार प्रसन्नतापूर्वक उन बहुसंख्यक दिव्य फलोंका आस्वादन करने लगे ॥ २३ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये युद्धकाण्डे चतुर्विंशत्यधिकशततमः सर्गः ॥ १२४ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें एक सौ चौबीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ १२४ ॥

पञ्चविंशत्यधिकशततमः सर्गः हनुमान्जीका निषादराज गुह तथा भरतजीको श्रीराम के आगमन की सूचना देना और प्रसन्न हुए भरतका उन्हें

अयोध्यां तु समालोक्य चिन्तयामास राघवः ।

प्रियकामः प्रियं रामस्ततस्त्वरितविक्रमः ॥ १ ॥

( भरद्वाज आश्रमपर उतरने से पहले ) विमानसे ही अयोध्यापुरीका दर्शन करके अयोध्यावासियों तथा सुग्रीव आदि-का प्रिय करने की इच्छावाले शीघ्रपराक्रमी रघुकुलनन्दन श्रीरामने यह विचार किया कि कैसे इन सबका प्रिय हो? ॥ १ ॥

चिन्तयित्वा ततो दृष्टिं वानरेषु न्यपातयत् ।

उवाच धीमांस्तेजस्वी हनूमन्तं लवंगमम् ॥ २ ॥

विचार करके तेजस्वी एवं बुद्धिमान् श्रीरामने वानरोंपर दृष्टि डाली और वानर वीर हनुमान् जीसे कहा- ॥ २ ॥

अयोध्यां त्वरितो गत्वा शीघ्रं प्लवगसत्तम ।

जानीहि कच्चित् कुशली जनो नृपतिमन्दिरे ॥ ३ ॥

' कपिश्रेष्ठ! तुम शीघ्र ही अयोध्यामें जाकर पता लो कि राजभवनमें सब लोग सकुशल तो हैं न १॥ ३ ॥

शृङ्गवेरपुरं प्राप्य गुहं गहनगोचरम् ।

निषादाधिपतिं ब्रूहि कुशलं वचनान्मम ॥ ४ ॥

‘ शृङ्गवेरपुरमें पहुँचकर वनवासी निषादराज गुहसे भी मिलना और मेरी ओरसे कुशल कहना ॥ ४ ॥

श्रुत्वा तु मां कुशलिनमरोगं विगतज्वरम् ।

भविष्यति गुहः प्रीतः स ममात्मसमः सखा ॥ ५ ॥

' मुझे सकुशल, नीरोग और चिन्तारहित सुनकर निषाद-राज गुहको बड़ी प्रसन्नता होगी; क्योंकि वह मेरा मित्र है । मेरे लिये आत्मा के समान है ॥ ५ ॥

उपहार देनेकी घोषणा करना

अयोध्यायाश्च ते मार्गे प्रवृत्तिं भरतस्य च ।

निवेदयिष्यति प्रीतो निषादाधिपतिर्गुहः ॥ ६ ॥

' निषादराज गुह प्रसन्न होकर तुम्हें अयोध्याका मार्ग और भरतका समाचार बतायेगा ॥ ६ ॥

भरतस्तु त्वया वाच्यः कुशलं वचनान्मम ।

सिद्धार्थ शंस मां तस्मै सभार्ये सहलक्ष्मणम् ॥ ७ ॥

' भरत के पास जाकर तुम मेरी ओरसे उनका कुशल पूछना और उन्हें सीता एवं लक्ष्मणसहित मेरे सफलमनोरथ होकर लौटनेका समाचार बताना ॥ ७ ॥

हरणं चापि वैदेह्या रावणेन बलीयसा ।

सुग्रीवेण च संवादं वालिनश्च वधं रणे ॥ ८ ॥

मैथिल्यन्वेषणं चैव यथा चाधिगता त्वया ।

लङ्घयित्वा महातोयमापगापतिमव्ययम् ॥ ९ ॥

उपयानं समुद्रस्य सागरस्य च दर्शनम् ।

यथा च कारितः सेतू रावणश्च यथा हतः ॥ १० ॥

वरदानं महेन्द्रेण ब्रह्मणा वरुणेन च ।

महादेवप्रसादाच्च पित्रा मम समागमम् ॥ ११ ॥

' बलवान् रावणके द्वारा सीताजीके हरे जानेका, सुग्रीवसे बातचीत होनेका, रणभूमिमें वालीके वधका, सीताजीके खोजका, तुमने जो महान् जलराशिसे भरे हुए अपार महासागरको लाँघकर जिस तरह सीताका पता लगाया था उसका, फिर समुद्रतटपर मेरे जानेका, सागरके दर्शन देनेका, उसपर पुल बनानेका, रावण के वधका, इन्द्र, ब्रह्मा और वरुणसे मिलने

पृष्ठ 646

वाल्मीकि रामायण — खण्ड २, पृष्ठ 646 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

युद्धकाण्डे पञ्चविंशत्यधिकशततमः सर्गः १४३५ एवं वरदान पानेका और महादेवजी के प्रसाद से पिताजीके दर्शन होने का वृत्तान्त उन्हें सुनाना ॥ ८-११ ॥

उपयातं च मां सौम्य भरताय निवेदय ।

सह राक्षसराजेन हरीणामीश्वरेण च ॥ १२ ॥

जित्वा शत्रुगणान् रामः प्राप्य चानुत्तमं यशः ।

उपायाति समृद्धार्थः सह मित्रैर्महाबलैः ॥ १३ ॥

' सौम्य! फिर भरतसे यह भी निवेदन करना कि श्रीराम शत्रुओंको जीतकर परम उत्तम यश पाकर, सफलमनोरथ हो राक्षसराज विभीषण, वानरराज सुग्रीव तथा अपने अन्य महाबली मित्रोंके साथ आ रहे हैं और प्रयागतक आ पहुँचे हैं १२-१३

एतच्छ्रुत्वा यमाकारं भजते भरतस्ततः ।

स च ते वेदितव्यः स्यात् सर्वे यच्चापि मां प्रति ॥ १४ ॥

" यह बात सुनकर भरतकी जैसी मुख - मुद्रा हो, उसपर ध्यान रखना और समझना तथा भरतका मेरे प्रति जो कर्तव्य या बर्ताव हो, उसको भी जाननेका प्रयत्न करना ॥ १४ ॥

ज्ञेयाः सर्वे च वृत्तान्ता भरतस्येङ्गितानि च ।

तत्त्वेन मुखवर्णेन दृष्ट्या व्याभाषितेन च ॥ १५ ॥

‘ वहाँके सारे वृत्तान्त तथा भरतकी चेष्टाएँ तुम्हें यथार्थरूप-से जाननी चाहिये । मुखकी कान्ति, दृष्टि और बातचीत से उनके मनोभावको समझने की चेष्टा करनी चाहिये ॥ १५ ॥

सर्वकामसमृद्धं हि हस्त्यश्वरथसंकुलम् ।

पितृपैतामहं राज्यं कस्य नावर्तयेन्मनः ॥ १६ ॥

' समस्त मनोवाञ्छित भोगोंसे सम्पन्न तथा हाथी, घोड़े और रथोंसे भरपूर बाप - दादोंका राज्य सुलभ हो तो वह किसके मनको नहीं पलट देता? ॥ १६ ॥

संगत्या भरतः श्रीमान् राज्येनार्थी स्वयं भवेत् ।

प्रशास्तु वसुधां सर्वामखिलां रघुनन्दनः ॥ १७ ॥

' यदि कैकेयीकी संगति अथवा चिरकालतक राज्यवैभवका संसर्ग होनेसे श्रीमान् भरत स्वयं ही राज्य पानेकी इच्छा रखते हों तो वे रघुकुलनन्दन भरत बेखटके समस्त भूमण्डलका राज्य करें ( मुझे उस राज्यको नहीं लेना है । उस दशा में हम कहीं अन्यत्र रहकर तपस्वी जीवन व्यतीत करेंगे ) ॥ १७ ॥

तस्य बुद्धिं च विज्ञाय व्यवसायं च वानर ।

यावन्न दूरं याताः स्मः क्षिप्रमागन्तुमर्हसि ॥ १८ ॥

" वानरवीर! तुम भरतके विचार और निश्चयको जानकर जबतक हमलोग इस आश्रमसे दूर न चले जायँ तभीतक शीघ्र लौट आओ ' ॥ १८ ॥

इति प्रतिसमादिष्टथे हनूमान् मारुतात्मजः ।

मानुषं धारयन् रूपमयोध्यां त्वरितो ययौ ॥ १ ९ ॥

श्रीरघुनाथजीके इस प्रकार आदेश देनेपर पवनपुत्र हनुमानजी मनुष्यका रूप धारण करके तीव्रगतिसे अयोध्या की ओर चल दिये ॥ १ ९ ॥

अथोत्पपात वेगेन हनूमान् मारुतात्मजः ।

गरुत्मानिव वेगेन जिवृक्षन्नुरगोत्तमम् ॥ २० ॥

जैसे गरुड़ किसी श्रेष्ठ सर्पको पकड़ने के लिये बड़े वेगसे झपट्टा मारते हैं, उसी तरह पवनपुत्र हनुमान् तीव्र वेगसे उड़ चले ॥ २० ॥

लङ्घयित्वा पितृपथं विहगेन्द्रालयं शुभम् ।

गङ्गायमुनयोर्भीमं समतीत्य समागमम् ॥ २१ ॥

शृङ्गवेरपुरं प्राप्य गुहमासाद्य वीर्यवान् ।

सवाचा शुभया हृष्टो हनूमानिदमब्रवीत् ॥ २२ ॥

अपने पिता वायुके मार्ग - अन्तरिक्षको, जो पक्षिराज गरुड़का सुन्दर गृह है, लाँघकर गङ्गा और यमुनाके वेगशाली संगमको पार करके शृङ्गवेरपुरमें पहुँचकर पराक्रमी हनुमान्जी निषादराज गुहसे मिले और बड़े हर्ष के साथ सुन्दर वाणी में बोले – ॥ २१-२२ ॥

सखा तु तत्र काकुत्स्थो रामः सत्यपराक्रमः ।

ससीतः सह सौमित्रिः स त्वां कुशलमब्रवीत् ॥ २३ ॥

पञ्चमीमद्य रजनीमुषित्वा वचनान्मुनेः ।

भरद्वाजाभ्यनुज्ञातं द्रक्ष्यस्यत्रैव राघवम् ॥ २४ ॥

' तुम्हारे मित्र ककुत्स्थकुलभूषण सत्यपराक्रमी श्रीराम सीता और लक्ष्मणके साथ आ रहे हैं और उन्होंने तुम्हें अपना कुशल- समाचार कहलाया है । वे प्रयागमें हैं और भरद्वाज-मुनिके कहने से उन्हींके आश्रममें आज पञ्चमीकी रात बिताकर कल उनकी आज्ञा ले वहाँसे चलेंगे । तुम्हें यहीं श्रीरघुनाथजी-का दर्शन होगा ' ॥ २३-२४ ॥

एवमुक्त्वा महातेजाः सम्प्रहृष्टतनूरुहः ।

उत्पपात महावेगाद् वेगवानविचारयन् ॥ २५ ॥

गुहसे यों कहकर महातेजस्वी और वेगशाली हनुमानजी बिना कोई सोच - विचार किये बड़े वेगसे आगेको उड़ चले । उस समय उनके सारे अङ्गोंमें हर्षजनित रोमाञ्च हो आया था ॥ २५ ॥

सोऽपश्यद् रामतीर्थे च नदीं वालुकिनीं तथा ।

वरूथीं गोमतीं चैव भीमं शालवनं तथा ॥ २६ ॥

मार्ग में उन्हें परशुराम - तीर्थ, बालुकिनी नदी, वरूथी, गोमती और भयानक सालवनके दर्शन हुए ॥ २६ ॥

प्रजाश्च बहुसाहस्रीः स्फीताञ्जनपदानपि ।

स गत्वा दूरमध्वानं त्वरितः कपिकुञ्जरः ॥ २७ ॥

आससाद द्रुमान् फुल्लान् नन्दिग्रामसमीपगान् ।

सुराधिपस्योपवने यथा चैत्ररथे द्रुमान् ॥ २८ ॥

पृष्ठ 647

वाल्मीकि रामायण — खण्ड २, पृष्ठ 647 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

१४३६ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे कई सहस्र प्रजाओं तथा समृद्धिशाली जनपदों को देखते हुए कपिश्रेष्ठ हनुमान्जी मनुष्य देह धारण करके आये हुए दूसरे धर्मकी भाँति तीव्रगतिसे दूरतकका रास्ता लाँघ गये उन धर्मज्ञ भरत के पास पहुँचकर पवनकुमार हनुमानजी हाथ और नन्दिग्राम के समीपवर्ती खिले हुए वृक्षोंके पास जा जोड़कर बोले- ॥ ३५३ ॥

पहुँचे । वे वृक्ष देवराज इन्द्रके नन्दनवन और कुबेरके चैत्ररथ बनके वृक्षोंके समान सुशोभित होते थे ॥ २७-२८ ॥

स्त्रीभिः सपुत्रैः पौत्रैश्च रममाणैः स्खलंकृतैः ।

क्रोशमात्रे त्वयोध्यायाश्चीरकृष्णाजिनाम्बरम् ॥ २ ९ ॥

ददर्श भरतं दीनं कृशमाश्रमवासिनम् ।

जटिलं मलदिग्धाङ्गं भ्रातृव्यसनकर्शितम् ॥ ३० ॥

फलमूलाशिनं दान्तं तापसं धर्मचारिणम् ।

समुन्नतजटाभारं वल्कलाजिनवाससम् ॥ ३१ ॥

नियतं भावितात्मानं ब्रह्मर्षिसमतेजसम् ।

पादुके ते पुरस्कृत्य प्रशासन्तं वसुंधराम् ॥ ३२ ॥

उनके आस - पास बहुत - सी स्त्रियाँ अपने उन पुत्रों और पौत्रोंके साथ, जो वस्त्राभूषणोंसे भलीभाँति अलंकृत थे, विचरती और उनके पुष्पों का चयन करती थीं । अयोध्यासे एक कोसकी दूरीपर उन्होंने आश्रमवासी भरतको देखा, जो चीर - वस्त्र और काला मृगचर्म धारण किये दुखी एवं दुर्बल दिखायी देते थे 1 । उनके सिरपर जटा बढ़ी हुई थी, शरीरपर मैल जम गयी थी, भाईके वनवासके दुःखने उन्हें बहुत ही कृश कर दिया था, फल - मूल ही उनका भोजन था, वे इन्द्रियोंका दमन करके तपस्यामें लगे हुए थे और धर्मका आचरण करते थे । सिरपर जटाका भार बहुत ही ऊँचा दिखायी देता था, वल्कल और मृगचर्मसे उनका शरीर ढका था । वे बड़े नियमसे रहते थे । उनका अन्तःकरण शुद्ध था और वे ब्रह्मर्षिके समान तेजस्वी जान पड़ते थे । रघुनाथजीकी दोनों चरणपादुकाओंको आगे रखकर वे पृथ्वीका शासन करते थे । २ ९ -३२ ॥

चातुर्वर्ण्यस्य लोकस्य त्रातारं सर्वतो भयात् ।

उपस्थितममात्यैश्च शुचिभिश्च पुरोहितैः ॥ ३३ ॥

बलमुख्यैश्च युक्तैश्च काषायाम्बरधारिभिः । भरतजी चारों वर्णोंकी प्रजाओंको सब प्रकारके सुरक्षित रखते थे । उनके पास मन्त्री, पुरोहित और भयसे सेनापति भी योगयुक्त होकर रहते और गेरुए वस्त्र पहनते थे ॥ ३३३ ॥

नहि ते राजपुत्रं तं चीरकृष्णाजिनाम्बरम् ॥ ३४ ॥

परिभोक्तुं व्यवस्यन्ति पौरा वै धर्मवत्सलाः । अयोध्याके वे धर्मानुरागी पुरवासी भी उन चीर और काला मृगचर्म धारण करनेवाले राजकुमार भरतको उस दशामें छोड़कर स्वयं भोग भोगनेकी इच्छा नहीं करते थे ॥ ३४३ ॥

तं धर्ममिव धर्मज्ञं देहबन्धमिवापरम् ॥ ३५ ॥

उवाच प्राञ्जलिर्वाक्यं हनूमान् मारुतात्मजः ।

वसन्तं दण्डकारण्ये यं त्वं चीरजटाधरम् ॥ ३६ ॥

अनुशोचसि काकुत्स्थं स त्वां कौशलमब्रवीत् ।

प्रियमाख्यामि ते देव शोकं त्यज सुदारुणम् ॥ ३७ ॥

अस्मिन् मुहूर्ते भ्रात्रा त्वं रामेण सह संगतः । " देव! आप दण्डकारण्य में चीर - वस्त्र और जटा धारण करके रहनेवाले जिन श्रीरघुनाथजी के लिये निरन्तर चिन्तित रहते हैं, उन्होंने आपको अपना कुशल- समाचार कहलाया है । और आपका भी पूछा है । अब आप इस अत्यन्त दारुण शोकको त्याग दीजिये । मैं आपको बड़ा प्रिय समाचार सुना रहा हूँ । आप शीघ्र ही अपने भाई श्रीरामसे मिलेंगे ॥ निहत्य रावणं रामः प्रतिलभ्य च मैथिलीम् ॥ ३८ ॥

उपयाति समृद्धार्थः सह मित्रैर्महाबलैः ।

लक्ष्मणश्च महातेजा वैदेही च यशखिनी ।

सीता समग्रा रामेण महेन्द्रेण शची यथा ॥ ३ ९ ॥

' भगवान् श्रीराम रावणको मारकर मिथिलेशकुमारीको वापस ले सफलमनोरथ हो अपने महाबली मित्रोंके साथ आ रहे हैं । उनके साथ महातेजस्वी लक्ष्मण और यशस्विनी विदेहराजकुमारी सीता भी हैं । जैसे देवराज इन्द्रके साथ शची शोभा पाती हैं, उसी प्रकार श्रीराम के साथ पूर्णकामा सीताजी सुशोभित हो रही हैं ' ॥ ३८-३९ ॥

एवमुक्तो हनुमता भरतः कैकयीसुतः ।

पपात सहसा हृष्टो हर्षान्मोहमुपागमत् ॥ ४० ॥

हनुमान् जी के ऐसा कहते ही कैकेयी- कुमार भरत सहसा आनन्दविभोर हो पृथ्वीपर गिर पड़े और हर्षसे मूच्छित हो गये ॥ ४० ॥

ततो मुहूर्तादुत्थाय प्रत्याश्वस्य च राघवः ।

हनूमन्तमुवाचेदं भरतः प्रियवादिनम् ॥ ४१ ॥

अशोकजैः प्रीतिमयैः कपिमालिङ्गन्य सम्भ्रमात्

सिषेच भरतः श्रीमान् विपुलैरश्रुबिन्दुभिः ।

॥ ४२ ॥

तत्पश्चात् दो घड़ीके बाद उन्हें होश हुआ और वे उठकर खड़े हो गये । उस समय रघुकुलभूषण श्रीमान् भरतने प्रिय-वादी हनुमानजीको बड़े वेगसे पकड़कर दोनों भुजाओं में भर लिया और शोक संसर्गसे शून्य परमानन्दजनित विपुल अश्रु-बिन्दुओंसे वे उन्हें नहलाने लगे । फिर इस प्रकार बोले – || देवो वा मानुषो वा त्वमनुक्रोशादिहागतः । प्रियाख्यानस्य ते सौम्य ददामि ब्रुवतः प्रियम् ॥ ४३ ॥.

" भैया! तुम कोई देवता हो या मनुष्य, जो मुझपर

पृष्ठ 648

वाल्मीकि रामायण — खण्ड २, पृष्ठ 648 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

युद्धकाण्डे पर्विंशत्यधिकशततमः सर्गः १४३७ कृपा करके यहाँ पधारे हो? सौम्य! तुमने जो यह प्रिय संवाद सुनाया है, इसके बदले मैं तुम्हें कौन - सी प्रिय वस्तु प्रदान करूँ? ( मुझे तो कोई ऐसा बहुमूल्य उपहार नहीं दिखायी देता, जो इस प्रिय संवाद के तुल्य हो ) ॥ ४३ ॥

गवां शतसहस्रं च ग्रामाणां च शतं परम् ।

सकुण्डलाः शुभाचारा भार्याः कन्यास्तु षोडश ॥४४ ॥

हेमवर्णाः सुनासोरूः शशिसौम्याननाः स्त्रियः ।

सर्वाभरणसम्पन्नाः सम्पन्नाः कुलजातिभिः ॥ ४५ ॥

' ( तथापि ) मैं तुम्हें इसके लिये एक लाख गौएँ, सौ उत्तम गाँव तथा उत्तम आचार - विचारवाली सोलह कुमारी कन्याएँ पत्नीरूपमें समर्पित करता हूँ । उन कन्याओंके कानोंमें सुन्दर कुण्डल जगमगाते होंगे । उनकी अङ्ग कान्ति सुवर्णके इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये समान होगी । उनकी नासिका सुघड़, ऊरु मनोहर और मुख चन्द्रमाके समान सुन्दर होंगे । वे कुलीन होने के साथ ही सब प्रकारके आभूषणोंसे विभूषित होंगी ' ॥ ४४-४५ ॥ निशम्य रामागमनं नृपात्मजः कपिप्रवीरस्य तदाद्भुतोपमम् । प्रहर्षितो रामदिदृक्षयाभवत् पुनश्च हर्षादिदमब्रवीद् वचः ॥ ४६ ॥

उन प्रमुख वानर - वीर हनुमान्जीके मुख से श्रीरामचन्द्र-जीके आगमनका अद्भुत समाचार सुनकर राजकुमार भरतको श्रीरामके दर्शन की इच्छासे अत्यन्त हर्ष हुआ और उस हर्षातिरेकसे ही वे फिर इस प्रकार बोले – ॥ ४६ ॥

युद्धकाण्डे पञ्चविंशत्यधिकशततमः सर्गः ॥ १२५ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें एक पचीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ १२५ ॥

--40AAAAD + -षड्विंशत्यधिकशततमः सर्गः हनुमानजीका भरतको श्रीराम, लक्ष्मण और सीताके वनवाससम्बन्धी सारे वृत्तान्तों को सुनाना

बहूनि नाम वर्षाणि गतस्य सुमहद्वनम् ।

शृणोम्यहं प्रीतिकरं मम नाथस्य कीर्तनम् ॥ १ ॥

' मेरे स्वामी श्रीरामको विशाल वनमें गये बहुत वर्ष बीत गये । इतने वर्षोंके बाद आज मुझे उनकी आनन्ददायिनी चर्चा सुनने को मिली है ॥ १ ॥

कल्याणी बत गाथेयं लौकिकी प्रतिभाति माम् ।

एति जीवन्तमानन्दो नरं वर्षशतादपि ॥ २ ॥

' आज यह कल्याणमयी लौकिक गाथा मुझे यथार्थ जान पड़ती है— मनुष्य यदि जीता रहे उसे कभी - न - कभी हर्ष और आनन्दकी प्राप्ति होती ही है, भले ही वह सौ वर्षों बाद हो ॥ २ ॥

राघवस्य हरीणां च कथमासीत् समागमः ।

कस्मिन् देशे किमाश्रित्य तत्त्वमाख्याहि पृच्छतः ॥ ३ ॥

' सौम्य! श्रीरघुनाथजीका और वानरोंका यह मेल - जोल कैसे हुआ? किस देशमें और किस कारणको लेकर हुआ?

यह मैं जानना चाहता हूँ । तुम मुझे ठीक - ठीक बताओ ' ॥

स पृष्टो राजपुत्रेण बृस्यां समुपवेशितः ।

आचचक्षे ततः सर्व रामस्य चरितं वने ॥ ४ ॥

राजकुमार भरतके इस प्रकार पूछनेपर कुशासनपर बैठाये हुए हनुमानजीने श्रीरामका वनवासविषयक सारा चरित्र उनसे कह सुनाया – ॥ ४ ॥

यथा प्रव्राजितो रामो मातुर्दत्तौ वरौ तव ।

यथा च पुत्रशोकेन राजा दशरथो मृतः ॥ ५ ॥

यथा दूतैस्त्वमानीतस्तूर्ण राजगृहात् प्रभो ।

त्वयायोध्यां प्रविष्टेन यथा राज्यं न चेप्सितम् ॥ ६ ॥

चित्रकूटगिरिं गत्वा राज्येनामित्रकर्शनः ।

निमन्त्रितस्त्वया भ्राता धर्ममाचरता सताम् ॥ ७ ॥

स्थितेन राज्ञो वचने यथा राज्यं विसर्जितम् ।

आर्यस्य पादुके गृह्य यथासि पुनरागतः ॥ ८ ॥

सर्वमेतन्महाबाहो यथावद् विदितं तव ।

त्वयि प्रतिप्रयाते तु यद् वृत्तं तन्निबोध मे ॥ ९ ॥

" प्रभो! महाबाहो! जिस प्रकार श्रीरामचन्द्रजीको वनवास दिया गया, जिस तरह आपकी माताको दो वर प्रदान किये गये, जैसे पुत्रशोकसे राजा दशरथकी मृत्यु हुई, जिस प्रकार आप राजगृहसे दूतोंद्वारा शीघ्र ही बुलाये गये, जिस तरह अयोध्या में प्रवेश करके आपने राज्य लेनेकी इच्छा नहीं की और सत्पुरुषोंके धर्मका आचरण करते हुए चित्रकूट पर्वतपर जाकर अपने शत्रुसूदन भाईको आपने राज्य लेने के लिये

पृष्ठ 649

वाल्मीकि रामायण — खण्ड २, पृष्ठ 649 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

१४३८ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे निमन्त्रित किया, फिर उन्होंने जिस प्रकार राजा दशरथके वचनका पालन करनेमें दृढ़तापूर्वक स्थित होकर राज्यको त्याग दिया तथा जिस प्रकार अपने बड़े भाईकी चरण पादुकाएँ लेकर आप फिर लौट आये ये सब बातें तो आपको यथावत् रूपसे विदित ही हैं । आपके लौट आनेके बाद जो वृत्तान्त घटित ' हुआ, वह बता रहा हूँ, मुझसे सुनिये -- ॥ ५ ९ ॥

अपयाते त्वयि तदा समुद्भ्रान्तमृगद्विजम् ।

परिधूनमिवात्यर्थे तद् वनं समपद्यत ॥ १० ॥

तद्धस्तिमृदितं घोरं सिंहव्याघ्रमृगाकुलम् ।

प्रविवेशाथ विजनं स महद् दण्डकावनम् ॥ ११ ॥

' आपके लौट आनेपर वह वन सब ओरसे अत्यन्त क्षीण-साहो चला । वहाँके पशु - पक्षी भयसे घबरा उठे थे, तब उस वनको छोड़कर श्रीरामने विशाल दण्डकारण्यमें प्रवेश किया

जो निर्जन था । उस घोर वनको हाथियोंने रौंद डाला था ।

उसमें सिंह, व्याघ्र और मृग भरे हुए थे ॥ १०-११ ॥

तेषां पुरस्ताद् बलवान् गच्छतां गहने वने ।

विनदन् सुमहानादं विराधः प्रत्यदृश्यत ॥ १२ ॥

" उस गहन वनमें जाते हुए इन तीनोंके आगे महान् गर्जना करता हुआ बलवान् राक्षस विराध दिखायी दिया ॥

तमुत्क्षिप्य महानादमूर्ध्वबाहुमधोमुखम् ।

निखाते प्रक्षिपन्ति स्म नदन्तमिव कुञ्जरम् ॥ १३ ॥

' ऊपर बाँह और नीचे मुँह किये चिग्धाड़ते हुए हाथीके समान जोर - जोरसे गर्जना करनेवाले उस राक्षसको उन तीनोंने मारकर गड्ढे में फेंक दिया ॥ १३ ॥

तत् कृत्वा दुष्करं कर्म भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ ।

सायाह्ने शरभङ्गस्य रम्यमाश्रममीयतुः ॥ १४ ॥

" वह दुष्कर कर्म करके दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मण सायंकालमें शरभङ्ग मुनिके रमणीय आश्रमपर जा पहुँचे ॥ १४ ॥

शरभङ्गे दिवं प्राप्ते रामः सत्यपराक्रमः ।

अभिवाद्य मुनीन् सर्वाञ्जनस्थानमुपागमत् ॥ १५ ॥

' शरभंग मुनि श्रीराम के समक्ष स्वर्गलोकको चले गये । तब सत्यपराक्रमी श्रीराम सब मुनियोंको प्रणाम करके जनस्थानमें आये ॥ १५ ॥

पश्चाच्छूर्पणखा नाम रामपार्श्वमुपागता ।

ततो रामेण संदिष्टो लक्ष्मणः सहसोत्थितः ॥ १६ ॥

प्रगृह्य खतं चिच्छेद कर्णनासं महाबलः । ' जनस्थानमें आनेके बाद शूर्पणखा नामवाली एक राक्षसी ( मनमें कामभाव लेकर ) श्रीरामचन्द्रजीके पास आयी । तब श्रीरामने लक्ष्मणको उसे दण्ड देनेका आदेश दिया । महाबली लक्ष्मणने सहसा उठकर तलवार उठायी और उस राक्षसी के नाक - कान काट लिये ॥ १६३ ॥

चतुर्दश सहस्राणि रक्षसां भीमकर्मणाम् ॥ १७ ॥

हतानि वसता तत्र राघवेण महात्मना । ' वहाँ रहते हुए महात्मा श्रीरघुनाथजीने अकेले ही शूर्पणखाकी प्रेरणा से आये हुए भयानक कर्म करनेवाले चौदह हजार राक्षसों का वध किया ॥ १७३ ॥

एकेन सह संगम्य रामेण रणमूर्धनि ॥ १८ ॥

अह्नचतुर्थभागेन निःशेषा राक्षसाः कृताः । ' युद्ध के मुहानेपर एकमात्र श्रीराम के साथ भिड़कर वे समस्त राक्षस पहरभर में ही समाप्त हो गये ॥ १८३ ॥

महाबला महावीर्यास्तपसो विघ्नकारिणः ॥ १ ९ ॥ निहता राघवेणाजी दण्डकारण्यवासिनः । ' तपस्या में विघ्न डालनेवाले उन दण्डकारण्यनिवासी महाबली और महापराक्रमी राक्षसोंको श्रीरघुनाथजीने युद्धमें मार डाला ॥ १ ९ ३ ॥ राक्षसाश्च विनिष्पिष्टाः खरश्च निहतो रणे ॥ २० ॥

दूषणं चाग्रतो हत्वा त्रिशिरास्तदनन्तरम् । ' उस रणभूमिमें वे चौदह हजार राक्षस पीस डाले गये, खर मारा गया, फिर दूषणका काम तमाम हुआ । तदनन्तर त्रिशिराको भी मौत के घाट उतार दिया गया ॥ २०३ ॥

ततस्तेनार्दिता बाला रावणं समुपागता ॥ २१ ॥

रावणानुचरो घोरो मारीचो नाम राक्षसः ।

लोभयामास वैदेहीं भूत्वा रत्नमयो मृगः ॥ २२ ॥

" इस घटना से पीड़ित होकर वह मूर्ख राक्षसी लङ्कामें रावणके पास गयी । रावणके कहनेसे उसके अनुचर मारीच नामक भयंकर राक्षसने रत्नमय मृगका रूप धारण करके विदेहराजकुमारी सीताको लुभाया । २१-२२ ॥

सा राममब्रवीद् दृष्ट्वा वैदेही गृह्यतामिति ।

अयं मनोहरः कान्त आश्रमो नो भविष्यति ॥ २३ ॥

" उस मृगको देखकर सीताने श्रीरामसे कहा- -- " आर्यपुत्र! इस मृगको पकड़ लीजिये । इसके रहनेसे मेरा यह आश्रम कान्तिमान् एवं मनोहर हो जायगा ॥ २३ ॥

ततो रामो धनुष्पाणिर्मृगं तमनुधावति ।

स तं जघान धावन्तं शरेणानतपर्वणा ॥ २४ ॥

' तब श्रीरामने हाथमें धनुष लेकर उस मृगका पीछा किया और झुकी हुई गाँठवाले एक बाणसे उस भागते हुए मृगको मार डाला || २४ ||

अथ सौम्य दशग्रीवो मृगं याति तु राघवे ।

लक्ष्मणे चापि निष्क्रान्ते प्रविवेशाश्रमं तदा ॥ २५ ॥

पृष्ठ 650

वाल्मीकि रामायण — खण्ड २, पृष्ठ 650 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

युद्धकाण्डे षडविंशत्यधिकशततमः सर्गः १४३ ९ ' सौम्य! जब श्रीरघुनाथजी मृगके पीछे जा रहे थे और लक्ष्मण भी उन्हींका समाचार लेनेके लिये पर्णशालासे बाहर निकल गये, तब रावणने उस आश्रममें प्रवेश किया ॥ २५ ॥

जग्राह तरसा सीतां ग्रहः खे रोहिणीमिव ।

त्रातुकामं ततो युद्धे हत्वा गृध्रं जटायुषम् ॥ २६ ॥

प्रगृह्य सहसा सीतां जगामाशु स राक्षसः । ' उसने बलपूर्वक सीताको पकड़ लिया, मानो आकाशमें मंगलने रोहिणीपर आक्रमण किया हो । उस समय उनकी रक्षाके लिये आये हुए गृध्रराज जटायुको युद्धमें मारकर वह

राक्षस सहसा सीताको साथ ले वहाँसे जल्दी ही चम्पत हो गया ।

ततस्त्वद्भुत संकाशाः स्थिताः पर्वतमूर्धनि ॥ २७ ॥

सीतां गृहीत्वा गच्छन्तं वानराः पर्वतोपमाः ।

ददृशुर्विस्मिताकारा रावणं राक्षसाधिपम् ॥ २८ ॥

' तदनन्तर एक पर्वत - शिखर पर रहनेवाले पर्वतोंके समान ही अद्भुत एवं विशाल शरीरवाले वानरोंने आश्चर्यचकित हो सीता को लेकर जाते हुए राक्षसराज रावणको देखा ॥२७-२८ ॥

ततः शीघ्रतरं गत्वा तद् विमानं मनोजवम् ।

आरुह्य सह वैदेह्या पुष्पकं स महाबलः ॥ २ ९ ॥

प्रविवेश तदा लङ्कां रावणो राक्षसेश्वरः । ' वह महाबली राक्षसराज रावण बड़ी शीघ्रता के साथ मनके समान वेगशाली पुष्पक विमानके पास जा पहुँचा और सीताके साथ उसपर आरूढ़ हो उसने लङ्कामें प्रवेश किया ॥ तां सुवर्णपरिष्कारे शुभे महति वेश्मनि ॥ ३० ॥

प्रवेश्य मैथिलीं वाक्यैः सान्त्वयामास रावणः । " वहाँ सुवर्णभूषित विशाल भवन में मिथिलेश कुमारीको ठहराकर रावण चिकनी - चुपड़ी बातोंसे उन्हें सान्त्वना देने लगा ॥ तृणवद् भाषितं तस्य तं च नैर्ऋतपुङ्गवम् ॥ ३१ ॥

अचिन्तयन्ती वैदेही शोकवनिकां गता । ' अशोकवाटिका में रहती हुई विदेहनन्दिनीने रावणकी बातोंको तथा स्वयं उस राक्षसराजको भी तिनकेके समान मानकर ठुकरा दिया और कभी उसका चिन्तन नहीं किया ॥ न्यवर्तत तदा रामो मृगं हत्वा तदा वने ॥ ३२ ॥

निवर्तमानः काकुत्स्थो दृष्टा गृभं स विव्यथे ।

गृधं हतं तदा दृष्ट्वा रामः प्रियतरं पितुः ॥ ३३ ॥

' उधर वनमें श्रीरामचन्द्रजी मृगको मारकर लौटे । लौटते समय जब उन्होंने पिता से भी अधिक प्रिय गृध्रराज-... को मारा गया देखा, तब उनके मनमें बड़ी व्यथा हुई ॥

मार्गमाणस्तु वैदेहीं राघवः सहलक्ष्मणः ।

गोदावरीमनुचरन् वनोद्देशांश्च पुष्पितान् ॥ ३४ ॥

' लक्ष्मणसहित श्रीरघुनाथजी विदेहराजकुमारी सीता की खोज करते हुए गोदावरीतटके पुष्पित वनप्रान्तमें विचरने लगे ॥ ३४ ॥

आसेदतुर्महारण्ये कबन्धं नाम राक्षसम् ।

ततः कबन्धवचनाद् रामः सत्यपराक्रमः ॥ ३५ ॥

ऋष्यमूकगिरिं गत्वा सुग्रीवेण समागतः । ' खोजते खोजते वे दोनों भाई उस विशाल वनमें कबन्ध नामक राक्षसके पास जा पहुँचे । तदनन्तर सत्यपराक्रमी रामने कबन्धका उद्धार किया और उसीके कहनेसे वे ऋष्यमूक पर्वत -पर जाकर सुग्रीवसे मिले || ३५३ ॥ तयोः समागमः पूर्व प्रीत्या हार्दो व्यजायत ॥ ३६ ॥

भ्रात्रा निरस्तः क्रुद्धेन सुग्रीवो वालिना पुरा ।

इतरेतरसंवादात् प्रगाढः प्रणयस्तयोः ॥ ३७ ॥

‘ उन दोनोंमें एक दूसरेके साक्षात्कारसे पहले ही हार्दिक मित्रता हो गयी थी । पूर्वकालमें क्रुद्ध हुए बड़े भाई वालीने ' सुग्रीवको घरसे निकाल दिया था । श्रीराम और सुग्रीवमें जब परस्पर बातें हुई, तब उनमें और भी प्रगाढ़ प्रेम हो गया ॥ ३६-३७ ।

रामः स्वबाहुवीर्येण स्वराज्यं प्रत्यपादयत् ।

वालिनं समरे हत्वा महाकायं महाबलम् ॥ ३८ ॥

' श्रीरामने अपने बाहुबलसे समराङ्गणमें महाकाय, महाबली वालीका वध करके सुग्रीवको उनका राज्य दिला दिया ॥ ३८ ॥

सुग्रीवः स्थापितो राज्ये सहितः सर्ववानरैः ।

रामाय प्रतिजानीते राजपुत्र्यास्तु मार्गणम् ॥ ३ ९ ॥

' श्रीरामने समस्त वानरोंसहित सुग्रीवको अपने राज्यपर स्थापित कर दिया और सुग्रीवने श्रीरामके समक्ष यह प्रतिज्ञा की थी कि मैं राजकुमारी सीताकी खोज करूँगा ॥ ३ ९ ॥

आदिष्टा वानरेन्द्रेण सुग्रीवेण महात्मना ।

दश कोट्यः प्लवङ्गानां सर्वाः प्रस्थापिता दिशः ॥ ४० ॥

' तदनुसार महात्मा वानरराज सुग्रीवने दस करोड़ वानरों-को सीताका पता लगाने की आज्ञा देकर सम्पूर्ण दिशाओंमें भेजा ॥ ४० ॥

तेषां नो विप्रकृष्टानां विन्ध्ये पर्वतसत्तमे ।

भृशं शोकाभितप्तानां महान् कालोऽत्यवर्तत ॥ ४१ ॥

' उन्हीं वानरोंमें हमलोग भी थे । गिरिराज विन्ध्यकी गुफामें प्रवेश कर जानेके कारण हमारे लौटनेका नियत समय बीत गया । हमने बहुत विलम्ब कर दिया । हमारे अत्यन्त शोकमें पड़े - पड़े दीर्घकाल व्यतीत हो गया ॥ ४१ ॥

भ्राता तु गृध्रराजस्य सम्पातिर्नाम वीर्यवान् ।

समाख्याति स्म वसतीं सीतां रावणमन्दिरे ॥ ४२ ॥

' तदनन्तर गृधराज जटायुके एक पराक्रमी भाई मिल