Ramayana 2 — पृष्ठ 651–660

वाल्मीकि रामायण — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 651–660

पृष्ठ 651

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१४४० श्रीमद्वाल्मीकीय रामायणे गये, जिनका नाम था सम्पाति । उन्होंने हमें बताया कि सीता लङ्कामें रावण के भवन में निवास करती हैं ॥ ४२ ॥

सो s हं दुःखपरीतानां दुःखं तज्ज्ञातिनां नुदन् ।

आत्मवीर्य समास्थाय योजनानां शतं प्लुतः ।

तत्राहमेकामद्राक्षमशोकवनिकां गताम् ॥ ४३ ॥

' तब दुःखमें डूबे हुए अपने भाई - बन्धुओंके कष्टका निवारण करनेके लिये मैं अपने बल पराक्रमका सहारा ले सौ योजन समुद्रको लाँघ गया और लङ्कामें अशोकवाटिकाके भीतर अकेली बैठी हुई सौतासे मिला ॥ ४३ ॥

कौशेयवस्त्रां मलिनां निरानन्दां दृढव्रताम् ।

तया समेत्य विधिवत् पृष्ट्वा सर्वमनिन्दिताम् ॥ ४४ ॥

अभिज्ञानं मया दत्तं रामनामाङ्गुलीयकम् ।

अभिज्ञानं मणि लब्ध्वा चरितार्थोऽहमागतः ॥ ४५ ॥

, “ वे एक रेशमी साड़ी पहने हुए थीं । शरीरसे मलिन और आनन्दशून्य जान पड़ती थीं तथा पातिव्रत्यके पालनमें दृढ़तापूर्वक लगी थीं । उनसे मिलकर मैंने उन सती - साध्वी देवी-से विधिपूर्वक सारा समाचार पूछा और पहचान के लिये श्रीरामनामसे अङ्कित अँगूठी उन्हें दे दी । साथ ही उनकी ओरसे पहचान के तौरपर चूड़ामणि लेकर मैं कृतकृत्य होकर लौट आया ॥ ४४-४५ ॥

मया च पुनरागम्य समस्याक्लिष्टकर्मणः ।

अभिज्ञानं मया दत्तमर्चिष्मान् स महामणिः ॥ ४६ ॥

" अनायास ही महान् कर्म करनेवाले श्रीरामके पास पुनः लौटकर मैंने वह तेजस्वी महामणि पहचान के रूपमें उन्हें दे दी ॥ ४६ ॥

श्रुत्वा तां मैथिलीं रामस्त्वाशशंसे च जीवितम् ।

जीवितान्तमनुप्राप्तः पीत्वामृतमिवातुरः ॥ ४७ ॥

" जैसे मृत्यु के निकट पहुँचा हुआ रोगी अमृत पीकर पुनः जी उठता है, उसी प्रकार सीताके वियोगमें मरणासन्न हुए श्रीरामने उनका शुभ समाचार पाकर जीवित रहने की आशा की ॥ ४७ ॥

उद्योजयिष्यन्नुद्योगं दधे लङ्कावधे मनः ।

जिघांसुरिव लोकान्ते सर्वाल्लोकान् विभावसुः ॥ ४८ ॥

‘ फिर जैसे प्रलयकाल में संवर्तकनामक अग्निदेव सम्पूर्ण लोकोंको भस्म कर डालनेके लिये उद्यत हो जाते हैं, उसी प्रकार सेनाको प्रोत्साहन देते हुए श्रीरामने लङ्कापुरीको नष्ट कर डालनेका विचार किया ॥ ४८ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये

ततः समुद्रमासाद्य नलं सेतुमकारयत् ।

अतरत् कपिवीराणां वाहिनी तेन सेतुना ॥ ४ ९ ॥

" इसके बाद समुद्रतटपर आकर श्रीरामने नल नामक वानरसे समुद्रपर पुल बँधवाया और उस पुलसे वानरवीरोंकी सारी सेना सागर के पार जा पहुँची ॥ ४ ९ ॥

प्रहस्तमवधीन्नीलः कुम्भकर्णे तु राघवः ।

लक्ष्मणो रावणसुतं स्वयं रामस्तु रावणम् ॥ ५० ॥

" वहाँ युद्ध में नीलने प्रहस्त को, लक्ष्मणने रावणपुत्र इन्द्रजितको तथा साक्षात् रघुकुलनन्दन श्रीरामने कुम्भकर्ण एवं रावणको मार डाला ॥ ५० ॥

स शक्रेण समागम्य यमेन वरुणेन च ।

महेश्वरस्वयंभूभ्यां तथा दशरथेन च ॥ ५१ ॥

' तत्पश्चात् श्रीरघुनाथजी क्रमशः इन्द्र, यम, वरुण, महादेवजी, ब्रह्माजी तथा महाराज दशरथसे मिले ॥ ५१ ॥

तैश्व दत्तवरः श्रीमानृषिभिश्च समागतैः ।

सुरर्षिभिश्च काकुत्स्थो वराँल्लेभे परंतपः ॥ ५२ ॥

" वहाँ पधारे हुए ऋषियों तथा देवर्षियोंने शत्रुसंतापी श्रीमान् रघुवीरको वरदान दिया । उनसे श्रीरामने वर प्राप्त किया ॥ ५२ ॥

स तु दत्तवरः प्रीत्या वानरैश्च समागतैः ।

पुष्पकेण विमानेन किष्किन्धामभ्युपागमत् ॥ ५३ ॥

' वर पाकर प्रसन्नता से भरे हुए श्रीरामचन्द्रजी वानरोंके साथ पुष्पक विमानद्वारा किष्किन्धा आये ॥ ५३ ॥

तां गङ्गां पुनरासाद्य वसन्तं मुनिसंनिधौ ।

अविघ्नं पुण्ययोगेन श्वो रामं द्रष्टुमर्हसि ॥ ५४ ॥

" वहाँसे फिर गङ्गातटपर आकर प्रयागमें भरद्वाजमुनिके समीप वे ठहरे हुए हैं । कल पुष्य नक्षत्रके योगमें आप बिना किसी विघ्न - बाधा के श्रीरामका दर्शन करेंगे ' ॥ ५४ ॥

ततः स वाक्यैर्मधुरैर्हनूमतो निशम्य हृष्टो भरतः कृताञ्जलिः । उवाच वाणीं मनसः प्रहर्षिणीं चिरस्य पूर्णः खलु मे मनोरथः ॥ ५५ ॥

इस प्रकार हनुमान्जीके मधुर वाक्योंद्वारा सारी बातें सुनकर भरतजी बड़े प्रसन्न हुए और हाथ जोड़कर मनको हर्ष प्रदान करनेवाली वाणीमें बोले – “ आज चिरकालके बाद मेरा मनोरथ पूर्ण हुआ ' ॥ ५५ ॥

युद्धकाण्डे षड्विंशत्यधिकशततमः सर्गः ॥ १२६ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें एक सौ छब्बीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ १२६ ॥

पृष्ठ 652

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युद्धकाण्डे सप्तविंशत्यधिकशततमः सर्गः १४४१ सप्तविंशत्यधिकशततमः सर्गः अयोध्या में श्रीराम के स्वागतकी तैयारी, भरत के साथ सबका श्रीरामकी अगवानी के लिये नन्दिग्राममें पहुँचना, श्रीरामका आगमन, भरत आदिके साथ उनका मिलाप तथा पुष्पक विमानको कुबेरके पास भेजना

श्रुत्वा तु परमानन्दं भरतः सत्यविक्रमः ।

दृष्टमाज्ञापयामास शत्रुघ्नं परवीरहा ॥ १ ॥

यह परमानन्दमय समाचार सुनकर शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले सत्यपराक्रमी भरतने शत्रुघ्न को हर्षपूर्वक आज्ञा दी ॥

दैवतानि च सर्वाणि चैत्यानि नगरस्य च ।

सुगन्धमाल्यैर्वादित्रैरर्चन्तु शुचयो नराः ॥ २ ॥

" शुद्धाचारी पुरुष कुलदेवताओंका तथा नगरके सभी देवस्थानोंका गाजे - बाजे के साथ सुगन्धित पुष्पद्वारा पूजन करें ॥ २ ॥

सूताः स्तुतिपुराणज्ञाः सर्वे वैतालिकास्तथा ।

सर्वे वादित्रकुशला गणिकाश्चैव सर्वशः ॥ ३ ॥

राजदारास्तथामात्याः सैन्याः सेनाङ्गनागणाः ।

ब्राह्मणाश्च सराजन्याः श्रेणीमुख्यास्तथा गणाः ॥ ४ ॥

अभिनिर्यान्तु रामस्य द्रष्टुं शशिनिभं मुखम् । " स्तुति और पुराणों के जानकार सूत, समस्त वैतालिक ( भाँट ), बाजे बजाने में कुशल सब लोग, सभी गणिकाएँ, राजरानियाँ, मन्त्रीगण, सेनाएँ, सैनिकोंकी स्त्रियाँ, ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा व्यवसायी संघके मुखिया लोग श्रीरामचन्द्रजीके मुखचन्द्रका दर्शन करनेके लिये नगरसे बाहर चलें ' ॥३-४३ ॥ भरतस्य वचः श्रुत्वा शत्रुघ्नः परवीरहा ॥ ५ ॥

विष्टीरनेकसाहस्त्रीश्वोदयामास भागशः ।

समीकुरुत निम्नानि विषमाणि समानि च ॥ ६ ॥

भरतजी की यह बात सुनकर शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले शत्रुघ्नने कई हजार मजदूरोंकी अलग - अलग टोलियाँ बनाकर उन्हें आज्ञा दी- “ तुमलोग ऊँची - नीची भूमियोंको समतल बना दो ॥ ५-६ ॥

स्थानानि च निरस्यन्तां नन्दिग्रामादितः परम् ।

सिञ्चन्तु पृथिवीं कृत्स्नां हिमशीतेन वारिणा ॥ ७ ॥

‘ अयोध्यासे नन्दिग्रामतकका मार्ग साफ कर दो, आसपास-की सारी भूमिपर बर्फकी तरह ठंडे जलका छिड़काव कर दो ॥ ७ ॥

ततोऽभ्यवाकिरन्त्वन्ये लाजैः पुष्पैश्च सर्वतः ।

समुच्छ्रितपताकास्तु रथ्याः पुरवरोत्तमे ॥ ८ ॥

' तत्पश्चात् दूसरे लोग रास्ते में सब ओर लावा और फूल बा ० रा ० ५.११.१-बिखेर दें । इस श्रेष्ठ नगरकी सड़कोंके अगल - बगल में ऊँची पताकाएँ फहरा दी जायँ ॥ ८ ॥

शोभयन्तु च वेश्मानि सूर्यस्योदयनं प्रति ।

स्त्रग्दाममुतपुष्पैश्च सुवर्णैः पञ्चवर्णकैः ॥ ९ ॥

' कल सूर्योदय तक लोग नगरके सब मकानोंको सुनहरी पुष्पमालाओं, घनीभूत फूलोंके मोटे गजरों, सूतके बन्धन से रहित कमल आदिके पुष्पों तथा पंचरंगे अलङ्कारोंसे सजा दें ॥ ९ ॥

राजमार्गमसम्बाधं किरन्तु शतशो नराः ।

ततस्तच्छासनं श्रुत्वा शत्रुघ्नस्य मुदान्विताः ॥ १० ॥

' राजमार्ग पर अधिक भीड़ न हो, इसकी व्यवस्था के लिये सैकड़ों मनुष्य सब ओर लग जायँ । ' शत्रुघ्नका वह आदेश सुनकर सब लोग बड़ी प्रसन्नता के साथ उसके पालन में लग गये ॥ १० ॥

धृष्टिर्जयन्तो विजयः सिद्धार्थश्चार्थसाधकः ।

अशोको मन्त्रपालश्च सुमन्त्रश्चापि निर्ययुः ॥ ११ ॥

मत्तैर्नागसह ध्वजैः सुविभूषितैः । वृष्टि, जयन्त, विजय, सिद्धार्थ, अर्थसाधक, अशोक, मन्त्रपाल और सुमन्त्र — ये आठों मन्त्री ध्वजा और आभूषणों-से विभूषित मतवाले हाथियोंपर चढ़कर चले ॥ ११३ ॥

अपरे हेमकक्षाभिः सगजाभिः करेणुभिः ॥ १२ ॥

निर्ययुस्तुरगाक्रान्ता रथैश्च सुमहारथाः । दूसरे बहुतसे महारथी वीर सुनहरे रस्सोंसे कसी हुई हथिनियों, हाथियों, घोड़ों और रथपर सवार होकर निकले १२३ शक्त्यष्टिपाशहस्तानां सध्वजानां पताकिनाम् ॥ १३ ॥

तुरगाणां सहस्रैश्च मुख्यैर्मुख्यतरान्वितैः ।

पदातीनां सहस्त्रैश्च वीराः परिवृता ययुः ॥ १४ ॥

ध्वजा - पताकाओं से विभूषित हजारों अच्छे - अच्छे घोड़ों और घुड़सवारों तथा हाथोंमें शक्ति, ऋष्टि और पाश धारण करनेवाले सहस्रों पैदल योद्धाओंसे घिरे हुए वीर पुरुष श्रीराम-की अगवानी के लिये गये ॥ १३-१४ ॥

ततो यानान्युपारूढाः सर्वा दशरथस्त्रियः ।

कौसल्या प्रमुखे कृत्वा सुमित्रां चापि निर्ययुः ॥ १५ ॥

कैकेय्या सहिताः सर्वा नन्दिग्राममुपागमन् ॥ १६ ॥

पृष्ठ 653

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१४४२ श्रीमद्वाल्मीकीय रामायणे तदनन्तर राजा दशरथकी सभी रानियाँ सवारियोंपर चढ़- ' वानर - वीर! वानरोंका चित्त स्वभावतः चञ्चल होता है । कर कौसल्या और सुमित्राको आगे करके निकलीं तथा कैकेयी- कहीं आपने भी उसी गुणका सेवन तो नहीं किया है— श्रीराम-सहित सब की सब नन्दिग्राममें आ पहुँचीं ॥ १५-१६ ॥ के आने की झूठी ही खबर तो नहीं उड़ा दी है; क्योंकि मुझे

द्विजातिमुख्यैर्धर्मात्मा श्रेणीमुख्यैः सनैगमैः ।

माल्यमोदकहस्तैश्च मन्त्रिभिर्भरतो वृतः ॥ १७ ॥

शङ्खभेरीनिनादैश्व बन्दिभिश्वाभिनन्दितः ।

आर्यपादौ गृहीत्वा तु शिरसा धर्मकोविदः ॥ १८ ॥

धर्मात्मा एवं धर्मज्ञ भरत मुख्य - मुख्य ब्राह्मणों, व्यवसायी वर्ग के प्रधानों, वैश्यों तथा हाथोंमें माला और मिठाई लिये मन्त्रियोंसे घिरकर अपने बड़े भाईकी चरणपादुकाओंको सिर-पर धारण किये शङ्खों और भेरियोंकी गम्भीर ध्वनिके साथ चले । उस समय बन्दीजन उनका अभिनन्दन कर रहे थे ॥ १७-१८ ॥

पाण्डुरं छत्रमादाय शुक्लमाल्योपशोभितम् ।

शुक्ले च वालव्यजने राजा हेमभूषिते ॥ १ ९ ॥

श्वेत मालाओं से सुशोभित सफेद रंगका छत्र तथा राजाओं-के योग्य सोनेसे मढ़े हुए दो श्वेत चँवर भी उन्होंने अपने साथ ले रक्खे थे ॥ १ ९ ॥

उपवासकृशो दीनचीरकृष्णाजिनाम्बरः ।

भ्रातुरागमनं श्रुत्वा तत्पूर्व हर्षमागतः ॥ २० ॥

भरतजी उपवासके कारण दीन और दुर्बल हो रहे थे । वे चीर - वस्त्र और कृष्णमृगचर्म धारण किये थे । भाईका आगमन सुनकर पहले - पहल उन्हें महान् हर्ष हुआ था ॥ २० ॥

प्रत्युद्ययौ यदा रामं महात्मा सचिवैः सह ।

अश्वानां खुरशब्दैश्व रथनेमिखनेन च ॥ २१ ॥

शङ्खदुन्दुभिनादेन संचचालेव मेदिनी ।

गजानां बृंहितैश्चापि शङ्खदुन्दुभिनिःखनैः ॥ २२ ॥

महात्मा भरत उस समय श्रीरामकी अगवानीके लिये आगे बढ़े । घोड़ों की टापों, रथके पहियोंकी नेमियों और शङ्खों एवं दुन्दुभियों के गम्भीर नादोंसे सारी पृथ्वी हिलती - सी जान पड़ती थी । शङ्खों और दुन्दुभियोंकी ध्वनियोंसे मिले हुए हाथियोंके गर्जन - शब्द भी भूतलको कम्पित - सा किये देते थे । २१-२२ ॥

कृत्स्नं तु नगरं तत् तु नन्दिग्राममुपागमत् ।

समीक्ष्य भरतो वाक्यमुवाच पवनात्मजम् ॥ २३ ॥

भरतजीने जब देखा कि अयोध्यापुरीके सभी नागरिक नन्दिग्राममें आ गये हैं, तब उन्होंने पवनपुत्र हनुमानजी से कहा -- ॥ २३ ॥

कच्चिन्न खलु कापेयी सेव्यते चलचित्तता ।

नहि पश्यामि काकुत्स्थं राममार्य परंतपम् ॥ २४ ॥

कश्चिन्न चानुदृश्यन्ते कपयः कामरूपिणः । अभीतक शत्रुओं को संताप देनेवाले ककुत्स्थकुलभूषण आर्य श्रीराम के दर्शन नहीं हो रहे हैं तथा इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले वानर भी कहीं दृष्टिगोचर नहीं हो रहे हैं? ' ॥ २४३ ॥

अथैवमुक्ते वचने हनूमानिदमब्रवीत् ॥ २५ ॥

अर्थ्य विज्ञापयन्नेव भरतं सत्यविक्रमम् । भरतजी के ऐसा कहनेपर हनुमानजीने सार्थक एवं सत्य बात बताने के लिये उन सत्यपराक्रमी भरतजी से कहा- ॥२५३ ॥

सदाफलान् कुसुमितान् वृक्षान् प्राप्य मधुस्रवान् ॥२६ ॥

भरद्वाजप्रसादेन मत्तभ्रमरनादितान् । " मुनिवर भरद्वाजजीकी कृपासे रास्ते के सभी वृक्ष सदा फूलने - फलने वाले हो गये हैं और उनसे मधुकी धाराएँ गिरती

हैं । उन वृक्षोंपर मतवाले भ्रमर निरन्तर गूँजते रहते हैं ।

उन्हें पाकर वानरलोग अपनी भूख - प्यास मिटाने लगे हैं ॥

तस्य चैव वरो दत्तो वासवेन परंतप ॥ २७ ॥

ससैन्यस्य तदातिथ्यं कृतं सर्वगुणान्वितम् । ' परंतप! देवराज इन्द्रने भी श्रीरामचन्द्रजीको ऐसा ही वरदान दिया था । अतएव भरद्वाजजीने सेनासहित श्रीराम-चन्द्रजीका सर्वगुणसम्पन्न -- साङ्गोपाङ्ग आतिथ्य - सत्कार किया है ॥ २७३ ॥

निःस्वनः श्रूयते भीमः प्रहृष्टानां वनौकसाम् ॥ २८ ॥

मन्ये वानरसेना सा नदीं तरति गोमतीम् । ' किंतु देखिये, अब हर्षसे भरे हुए वानरोंका भयंकर कोलाहल सुनायी देता है । मालूम होता है इस समय बानर-सेना गोमतीको पार कर रही है ॥ २८३ ॥

रजोवर्ष समुद्भूतं पश्य सालवनं प्रति ॥ २ ९ ॥ मन्ये सालवनं रम्यं लोलयन्ति लवंगमाः । ' उधर सालवनकी ओर देखिये कैसी धूलकी वर्षा हो रही है? मैं समझता हूँ वानरलोग रमणीय सालवनको आन्दोलित कर रहे हैं ॥ २ ९ ३ ॥ तदेतद् दृश्यते दूराद् विमानं चन्द्रसंनिभम् ॥ ३० ॥

विमानं पुष्पकं दिव्यं मनसा ब्रह्मनिर्मितम् ।

रावणं बान्धवैः सार्धं हत्वा लब्धं महात्मना ॥ ३१ ॥

' लीजिये, यह रहा पुष्पक विमान, जो दूरसे चन्द्रमाके समान दिखायी देता है । इस दिव्य पुष्पक विमानको विश्व-कर्माने अपने मनके संकल्पसे ही रचा था । महात्मा श्रीरामने रावणको बन्धु बान्धवसहित मारकर इसे प्राप्त किया है ।

तरुणादित्यसंकाशं विमानं रामवाहनम् ।

धनदस्य प्रसादेन दिव्यमेतन्मनोजवम् ॥ ३२ ॥

पृष्ठ 654

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युद्धकाण्डे सप्तविंशत्यधिकशततमः सर्गः १४४३ ' श्रीरामका वाहन बना हुआ यह विमान प्रातःकाल के सूर्य की भाँति प्रकाशित हो रहा है । इसका वेग मनके समान है । यह दिव्य विमान ब्रह्माजीकी कृपासे कुबेरको प्राप्त हुआ था || ३२ ॥

एतस्मिन् भ्रातरौ वीरौ वैदेह्या सह राघवो ।

सुग्रीवश्च महातेजा राक्षसश्च विभीषणः ॥ ३३ ॥

" इसी में विदेहराजकुमारी सीताके साथ वे दोनों रघुवंशी वीर बन्धु बैठे हैं और इसी में महातेजस्वी सुग्रीव तथा राक्षस विभीषण भी विराजमान हैं ' ॥ ३३ ॥

ततो हर्षसमुद्भूतो निःखनो दिवमस्पृशत् ।

स्त्रीबालयुववृद्धानां रामोऽयमिति कीर्तिते ॥ ३४ ॥

हनुमानजी के इतना कहते ही स्त्रियों, बालकों, नौजवानों और बूढ़ों - सभी पुरवासियोंके मुखसे यह वाणी फूट पड़ी--' अहो! ये श्रीरामचन्द्रजी आ रहे हैं । उन नागरिकोंका वह हर्षनाद स्वर्गलोकतक गूँज उठा ॥ ३४ ॥

रथकुञ्जरवाजिभ्यस्तेऽवतीर्य महीं गताः ।

ददृशुस्तं विमानस्थं नराः सोममिवाम्बरे ॥ ३५ ॥

सब लोग हाथी, घोड़ों और रथोंसे उतर पड़े तथा पृथ्वीपर खड़े हो विमानपर विराजमान श्रीरामचन्द्रजीका उसी तरह दर्शन करने लगे, जैसे लोग आकाशमें प्रकाशित होनेवाले चन्द्रदेवका दर्शन करते हैं ॥ ३५ ॥

प्राञ्जलिर्भरतो भूत्वा प्रहृष्टो राघवोन्मुखः । यथार्थेनार्घ्यपाद्याद्यैस्ततो राममपूजयत् ॥ ३६ ॥

भरतजी श्रीरामचन्द्रजीकी ओर दृष्टि लगाये हाथ जोड़कर खड़े हो गये । उनका शरीर हर्षसे पुलकित था । उन्होंने दूरसे ही अर्ध्य -पाद्य आदिके द्वारा श्रीरामका विधिवत् पूजन किया ॥ ३६ ॥

मनसा ब्रह्मणा सृष्टे विमाने भरताग्रजः ।

रराज पृथुदीर्घाक्षो वज्रपाणिरिवामरः ॥ ३७ ॥

विश्वकर्माद्वारा मनसे रचे गये उस विमानपर बैठे हुए विशाल नेत्रोंवाले भगवान् श्रीराम वज्रधारी देवराज इन्द्रके समान शोभा पा रहे थे ॥ ३७ ॥

ततो विमानागतं भरतो भ्रातरं तदा ।

ववन्दे प्रणतो रामं मेरुस्थमिव भास्करम् ॥ ३८ ॥

विमानके ऊपरी भागमें बैठे हुए भाई श्रीरामपर दृष्टि पड़ते ही भरतने विनीतभावसे उन्हें उसी तरह प्रणाम किया, जैसे मेरुके शिखरपर उदित सूर्यदेवको द्विजलोग नमस्कार करते हैं ॥ ३८ ॥

ततो रामाभ्यनुज्ञातं तद् विमानमनुत्तमम् ।

हंसयुक्तं महावेगं निपपात महीतलम् ॥ ३ ९ ॥

इतनेही में श्रीरामचन्द्रजीकी आज्ञा पाकर वह महान् वेगशाली हंसयुक्त उत्तम विमान पृथ्वीपर उतर आया ॥ ३ ९ ॥

आरोपितो विमानं तद् भरतः सत्यविक्रमः ।

राममासाद्य मुदितः पुनरेवाभ्यवादयत् ॥ ४० ॥

भगवान् श्रीरामने सत्यपराक्रमी भरतजीको विमान पर चढ़ा लिया और उन्होंने श्रीरघुनाथजीके पास पहुँचकर आनन्दविभोर हो पुनः उनके श्रीचरणों में साष्टाङ्ग प्रणाम किया ॥

तं समुत्थाय काकुत्स्थश्चिरस्याक्षिपथं गतम् ।

अङ्के भरतमारोप्य मुदितः परिषखजे ॥ ४१ ॥

दीर्घकालके पश्चात् दृष्टिपथमें आये हुए भरतको उठा-कर श्रीरघुनाथजीने अपनी गोद में बिठा लिया और बड़े हर्ष के साथ उन्हें हृदयसे लगाया ॥ ४१ ॥

ततो लक्ष्मणमासाद्य वैदेहीं च परंतपः ।

अथाभ्यवादयत् प्रीतो भरतो नाम चाब्रवीत् ॥ ४२ ॥

तत्पश्चात् शत्रुओंको संताप देनेवाले भरतने लक्ष्म मिलकर — उनका प्रणाम ग्रहण करके विदेह - राजकुमारी सीताको बड़ी प्रसन्नता के साथ प्रणाम किया और अपना नाम भी बताया ॥ ४२ ॥

सुग्रीवं केकयीपुत्रो जाम्बवन्तमथाङ्गदम् ।

मैन्दं च द्विविदं नीलमृषभं चैव सखजे ॥ ४३ ॥

सुषेणं च नलं चैव गवाक्षं गन्धमादनम् ।

शरभं पनसं चैव परितः परिषखजे ॥ ४४ ॥

इसके बाद कैकेयीकुमार भरतने सुग्रीव, जाम्बवान्, अङ्गद, मैन्द, द्विविद, नील, ऋषभ, सुषेण, नल, गवाक्ष, गन्धमादन, शरभ और पनसका पूर्णरूपसे आलिङ्गन किया ।

ते कृत्वा मानुषं रूपं वानराः कामरूपिणः ।

कुशलं पर्यपृच्छंस्ते प्रहृष्टा भरतं तदा ॥ ४५ ॥

वे इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले वानर मानवरूप धारण करके भरतजीसे मिले और उन सबने महान् हर्षसे उल्लसित होकर उस समय भरतजीका कुशल- समाचार पूछा ॥ ४५ ॥

अथाब्रवीद् राजपुत्रः सुग्रीवं वानरर्षभम् ।

परिष्वज्य महातेजा भरतो धर्मिणां वरः ॥ ४६ ॥

धर्मात्माओं में श्रेष्ठ महातेजस्वी राजकुमार भरतने वानर-राज सुग्रीवको हृदय से लगाकर उनसे कहा ॥ ४६ ॥

त्वमस्माकं चतुर्णा वै भ्राता सुग्रीव पञ्चमः ।

सौहृदाजायते मित्रमपकारोऽरिलक्षणम् ॥ ४७ ॥

' सुग्रीव! तुम हम चारोंके पाँचवें भाई हो; क्योंकि स्नेहपूर्वक उपकार करनेसे ही कोई भी मित्र होता है ( और मित्र अपना भाई ही होता है ) । अपकार करना ही शत्रुका लक्षण है ' ॥ ४७ ॥

पृष्ठ 655

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१४४४ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे

विभीषणं च भरतः सान्त्ववाक्यमथाब्रवीत् ।

दिष्ट्या त्वया सहायेन कृतं कर्म सुदुष्करम् ॥ ४८ ॥

इसके बाद भरतने विभीषणको सान्त्वना देते हुए उनसे कहा - " राक्षसराज! बड़े सौभाग्यकी बात है कि आपकी सहायता पाकर श्रीरघुनाथजीने अत्यन्त दुष्कर कार्य पूरा किया है ' ॥ ४८ ॥

शत्रुघ्नश्च तदा राममभिवाद्य सलक्ष्मणम् ।

सीतायाश्चरणौ वीरो विनयादभ्यवादयत् ॥ ४ ९ ॥

इसी समय वीर शत्रुघ्नने भी श्रीराम और लक्ष्मणको प्रणाम करके सीताजीके चरणों में विनयपूर्वक मस्तक झुकाया ॥

रामो मातरमासाद्य विवर्णा शोककर्शिताम् ।

जग्राह प्रणतः पादौ मनो मातुः प्रहर्षयन् ॥ ५० ॥

माता कौसल्या शोकके कारण अत्यन्त दुर्बल और कान्ति-हीन हो गयी थीं । उनके पास पहुँचकर श्रीरामने प्रणत हो उनके दोनों पैर पकड़ लिये और माताके मनको अत्यन्त हर्ष प्रदान किया ॥ ५० ॥

अभिवाद्य सुमित्रां च कैकेयीं च यशस्विनीम् ।

स मातृश्च ततः सर्वाः पुरोहितमुपागमत् ॥ ५१ ॥

फिर सुमित्रा और यशखिनी कैकेयीको प्रणाम करके उन्होंने सम्पूर्ण माताओंका अभिवादन किया, इसके बाद वे राजपुरोहित वसिष्ठजीके पास आये ॥ ५१ ॥

स्वागतं ते महाबाहो कौसल्यानन्दवर्धन ।

इति प्राञ्जलयः सर्वे नागरा राममब्रुवन् ॥ ५२ ॥

उस समय अयोध्या के समस्त नागरिक हाथ जोड़कर श्रीरामचन्द्रजीसे एक साथ बोल उठे -- " माता कौसल्याका आनन्द बढ़ानेवाले महाबाहु श्रीराम! आपका स्वागत है, स्वागत है ' ॥ ५२ ॥

तान्यञ्जलि सहस्राणि प्रगृहीतानि नागरैः ।

व्याकोशानीव पद्मानि ददर्श भरताग्रजः ॥ ५३ ॥

भरतके बड़े भाई श्रीरामने देखा, खिले हुए कमलोंके समान नागरिकोंकी सहस्रों अञ्जलियाँ उनकी ओर उठी हुई हैं ॥ ५३ ॥

पादुके ते तु रामस्य गृहीत्वा भरतः स्वयम् ।

चरणाभ्यां नरेन्द्रस्य योजयामास धर्मवित् ॥ ५४ ॥

अब्रवीच तदा रामं भरतः स कृताञ्जलिः । तदनन्तर धर्मज्ञ भरतने स्वयं ही श्रीरामकी वे चरण-पादुकाएँ लेकर उन महाराजके चरणोंमें पहना दीं और हाथ • जोड़कर उस समय उनसे कहा – ॥ ५४३ ॥

एतत् ते सकलं राज्यं न्यासं निर्यातितं मया ॥ ५५ ॥

अद्य जन्म कृतार्थ मे संवृत्तश्च मनोरथः ।

यत् त्वां पश्यामि राजानमयोध्यां पुनरागतम् ॥ ५६ ॥

' प्रभो! मेरे पास धरोहर के रूपमें रक्खा हुआ आपका यह सारा राज्य आज मैंने आपके श्रीचरणों में लौटा दिया । आज मेरा जन्म सफल हो गया । मेरा मनोरथ पूरा हुआ, जो अयोध्यानरेश आप श्रीरामको पुनः अयोध्या में लौटा हुआ देख रहा हूँ ॥ ५५-५६ ॥

अक्षतां भवान् कोशं कोष्ठागारं गृहं बलम् ।

भवतस्तेजसा सर्व कृतं दशगुणं मया ॥ ५७ ॥

' आप राज्यका खजाना, कोठार, घर और सेना सब देख लें । आपके प्रतापसे ये सारी वस्तुएँ पहलेसे दसगुनी हो गयी हैं ' ॥ ५७ ॥

तथा ब्रुवाणं भरतं दृष्ट्वा भ्रातृवत्सलम् ।

मुमुचुर्वानरा वाष्पं राक्षसश्च विभीषणः ॥ ५८ ॥

भ्रातृवत्सल भरतको इस प्रकार कहते देख समस्त वानर तथा राक्षसराज विभीषण नेत्रोंसे आँसू बहाने लगे ॥ ५८ ॥

ततः प्रहर्षाद् भरतमङ्कमारोप्य राघवः ।

ययौ तेन विमानेन ससैन्यो भरताश्रमम् ॥ ५ ९ ॥

इसके पश्चात् श्रीरघुनाथजी भरतको बड़े हर्ष और स्नेहके साथ गोद में बैठाकर विमानके द्वारा ही सेनासहित उनके आश्रमपर गये || ५ ९ ॥

भरताश्रममासाद्य ससैन्यो राघवस्तदा ।

अवतीर्य विमानाग्रादवतस्थे महीतले ॥ ६० ॥

भरतके आश्रम में पहुँचकर सेनासहित श्रीरघुनाथजी विमानसे उतरकर भूतलपर खड़े हो गये ॥ ६० ॥

अब्रवीत् तु तदा रामस्तद् विमानमनुत्तमम् ।

वह वैश्रवणं देवमनुजानामि गम्यताम् ॥ ६१ ॥

उस समय श्रीरामने उस उत्तम विमानसे कहा-' विमानराज! मैं तुम्हें आज्ञा देता हूँ, अब तुम यहाँसे देवप्रवर कुबेरके ही पास चले जाओ और उन्हींकी सवारी-में रहो ' ॥ ६१ ॥

ततो रामाभ्यनुज्ञातं तद् विमानमनुत्तमम् ।

उत्तरां दिशमुद्दिश्य जगाम धनदालयम् ॥ ६२ ॥

श्रीरामकी आज्ञा पाकर वह परम उत्तम विमान उत्तर दिशाको लक्ष्य करके कुबेरके स्थानपर चला गया ॥ ६२ ॥

विमानं पुष्पकं दिव्यं संगृहीतं तु रक्षसा ।

अगमद् धनदं वेगाद् रामवाक्यप्रचोदितम् ॥ ६३ ॥

राक्षस रावणने जिस दिव्य पुष्पक विमानपर बलपूर्वक अधिकार कर लिया था, वही अब श्रीरामचन्द्रजीकी आज्ञा से प्रेरित हो वेगपूर्वक कुबेरकी सेवामें चला गया ॥ ६३ ॥

पुरोहितस्यात्मसखस्य राघवो बृहस्पतेः शक्र इवामराधिपः । निपीड्य पादौ पृथगासने शुभे सहैव तेनोपविवेश वीर्यवान् ॥ ६४ ॥

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युद्धकाण्डे अष्टाविंशत्यधिकशततमः सर्गः ९ ४४५ तत्पश्चात् पराक्रमी श्रीरघुनाथजीने अपने सखा पुरोहित बृहस्पतिजीके चरणोंका स्पर्श करते हैं । फिर उन्हें एक सुन्दर वसिष्ठपुत्र सुयज्ञके ( अथवा अपने परम सहायक पुरोहित पृथक् आसनपर विराजमान करके उनके साथ ही दूसरे वसिष्ठजीके ) उसी प्रकार चरण छुए, जैसे देवराज इन्द्र आसनपर वे स्वयं भी बैठे ॥ ६४ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये युद्धकाण्डे सप्तविंशत्यधिकशततमः सर्गः ॥ १२७ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें एक सौ सत्ताईसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ १२७ ॥

अष्टाविंशत्यधिकशततमः सर्गः भरतका श्रीरामको राज्य लौटाना, श्रीरामकी नगरयात्रा, राज्याभिषेक, वानरोंकी विदाई तथा ग्रन्थका माहात्म्य

शिरस्यञ्जलिमाधाय कैकेयीनन्दिवर्धनः ।

बभाषे भरतो ज्येष्ठं रामं सत्यपराक्रमम् ॥ १ ॥

तत्पश्चात् कैकेयीनन्दन भरतने मस्तकपर अञ्जलि बाँधकर अपने बड़े भाई सत्यपराक्रमी श्रीरामसे कहा ॥१ ॥

पूजिता मामिका माता दत्तं राज्यमिदं मम ।

तद् ददामि पुनस्तुभ्यं यथा त्वमददा मम ॥ २ ॥

' आपने मेरी माताका सम्मान किया और यह राज्य मुझे दे दिया । जैसे आपने मुझे दिया, उसी तरह मैं अब फिर आपको वापस दे रहा हूँ ॥ २ ॥

धुरमेकाकिना न्यस्तां वृषभेण बलीयसा ।

किशोरवद् गुरुं भारं न वोढुमहमुत्सहे ॥ ३ ॥

' अत्यन्त बलवान् बैल जिस बोझेको अकेला उठाता है, उसे बछड़ा नहीं उठा सकता; उसी तरह मैं भी इस भारी भारको उठाने में असमर्थ हूँ ॥ ३ ॥

वारिवेगेन महता भिन्नः सेतुरिव क्षरन् ।

दुर्बन्धनमिदं मन्ये राज्यच्छिद्रमसंवृतम् ॥ ४ ॥

' जैसे जलके महान् वेगसे टूटे या फटे हुए बाँधको, जब कि उससे जलका प्रखर प्रवाह बह रहा हो, बाँधना अत्यन्त कठिन होता है, उसी प्रकार राज्यके खुले हुए छिद्रको ढक पाना मैं अपने लिये असम्भव मानता हूँ ॥ ४ ॥

गतिं खर इवाश्वस्य हंसस्येव च वायसः ।

नान्तुमुत्सहे वीर तव मार्गमरिंदम ॥ ५ ॥

' शत्रुदमन वीर! जैसे गदहा घोड़े की और कौवा हंसकी गतिका अनुसरण नहीं कर सकता, उसी तरह मैं आपके मार्ग-का —— रक्षणीय - रक्षणरूपी कौशलका अनुकरण नहीं कर सकता ॥ ५ ॥

यथा चारोपितो वृक्षो जातश्चान्तर्निवेशने ।

महानपि दुरारोहो महास्कन्धः प्रशाखवान् ॥ ६ ॥

शीर्येत पुष्पितो भूत्वा न फलानि प्रदर्शयन् ।

तस्य नानुभवेदर्थं यस्य हेतोः स रोपितः ॥ ७ ॥

एषोपमा महाबाहो त्वमर्थ वेत्तुमर्हसि ।

यद्यस्मान् मनुजेन्द्र त्वं भर्ता भृत्यान् न शाधि हि ॥ ८ ॥

' महाबाहो! नरेन्द्र! जैसे घर के भीतरके बगीचे में एक वृक्ष लगाया गया । वह जमा और जमकर बहुत बड़ा हो गया । इतना बड़ा कि उसपर चढ़ना कठिन हो रहा था । उसका तना बहुत बड़ा और मोटा था तथा उसमें बहुत - सी शाखाएँ थीं । उस वृक्षमें फूल लगे; किंतु वह अपने फल नहीं दिखा सका था । इसी दशामें टूटकर धराशायी हो गया । लगानेवालोंने जिन फलोंके उद्देश्यसे उस वृक्षको लगाया था, उनका अनुभव वे नहीं कर सके । यही उपमा उस राजाके लिये भी हो सकती है, जिसे प्रजाने अपनी रक्षाके लिये पाल-पोसकर बड़ा किया और बड़े होनेपर वह उनकी रक्षासे मुँह मोड़ने लगे । इस कथनके तात्पर्यको आप समझें । यदि भर्त्ता होकर भी आप हम भृत्योंका भरण - पोषण नहीं करेंगे तो आप भी उस निष्फल वृक्षके समान ही समझे जायँगे ॥ ६-८ ॥

जगदद्याभिषिक्तं त्वामनुपश्यतु राघव ।

प्रतपन्तमिवादित्यं मध्याह्ने दीप्ततेजसम् ॥ ९ ॥

' रघुनन्दन! अब तो हमारी यही इच्छा है कि जगत् के सब लोग आपका राज्याभिषेक देखें । मध्याह्नकाल के सूर्य की भाँति आपका तेज और प्रताप बढ़ता रहे ॥ ९ ॥

तूर्यसंघातनिर्घोषैः काची नूपुर निःखनैः ।

मधुरैर्गीतशब्दैश्च प्रतिबुध्यस्व शेष्व च ॥ १० ॥

' आप विवधि वाद्योंकी मधुर ध्वनि, काञ्ची तथा नूपुरोंकी झनकार और गीत के मनोहर शब्द सुनकर सोयें और जागें ॥

यावदावर्तते चक्रं यावती च वसुंधरा ।

तावत् त्वमिह लोकस्य स्वामित्वमनुवर्तय ॥ ११ ॥

' जबतक नक्षत्रमण्डल घूमता है और जबतक यह पृथ्वी स्थित है तबतक आप इस संसारके स्वामी बने रहें ' ॥ ११ ॥

भरतस्य वचः श्रुत्वा रामः परपुरंजयः ।

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१४४६ श्रीमवाल्मीकीय रामायणे तथेति प्रतिजग्राह निषसादासने शुभे ॥ १२ ॥

भरतकी यह बात सुनकर शत्रुनगरीपर विजय पानेवाले भगवान् श्रीरामने ' तथास्तु ' कहकर उसे मान लिया और वे एक सुन्दर आसनपर विराजमान हुए ॥ १२ ॥

ततः शत्रुघ्नवचनान्निपुणाः श्मश्रुवर्धनाः ।

सुखहस्ताः सुशीघ्राश्च राघवं पर्यवारयन् ॥ १३ ॥

फिर शत्रुघ्नजी की आज्ञासे निपुण नाई बुलाये गये, जिनके

हाथ हल्के और तेज चलनेवाले थे । उन सबने श्रीरघुनाथजी-को घेर लिया ॥ १३ ॥

पूर्व तु भरते जाते लक्ष्मणे च महाबले ।

सुत्रीचे वानरेन्द्रे च राक्षसेन्द्रे विभीषणे ॥ १४ ॥

विशोधितजटः स्नातश्चित्रमाल्यानुलेपनः ।

महार्हवसनोपेतस्तस्थौ तत्र श्रिया ज्वलन् ॥ १५ ॥

पहले भरतने स्नान किया फिर महाबली लक्ष्मणने । तत्पश्चात् वानरराज सुग्रीव और राक्षसराज विभीषणने भी स्नान किया । तदनन्तर जटाका शोधन करके श्रीरामने स्नान किया, फिर विचित्र पुष्पमाला, सुन्दर अनुलेपन और बहु-मूल्य पीताम्बर धारण करके आभूषणोंकी शोभासे प्रकाशित होते हुए वे सिंहासनपर विराजमान हुए ॥ १४-१५ ॥

प्रतिकर्म च रामस्य कारयामास वीर्यवान् ।

लक्ष्मणस्य च लक्ष्मीवानिक्ष्वाकुकुलवर्धनः ॥ १६ ॥

इक्ष्वाकु कुलकी कीर्ति बढ़ानेवाले शोभाशाली, पराक्रमी बीर शत्रुघ्नने श्रीराम और लक्ष्मणको शृङ्गार धारण कराया ॥

प्रतिकर्म च सीतायाः सर्वा दशरथस्त्रियः ।

आत्मनैव तदा चक्रुर्मनस्विन्यो मनोहरम् ॥ १७ ॥

उस समय राजा दशरथकी सभी मनस्विनी रानियोंने स्वयं अपने हाथोंसे सीताजीका मनोहर शृङ्गार किया ॥ १७ ॥

ततो वानरपत्तीनां सर्वासामेव शोभनम् ।

चकार यज्ञात् कौसल्या प्रहृष्टा पुत्रवत्सला ॥ १८ ॥

पुत्रवत्सला कौसल्याने अत्यन्त हर्ष और उत्साह के साथ बड़े यत्नसे समस्त वानरपत्नियोंका सुन्दर शृङ्गार किया ॥ १८ ॥

ततः शत्रुघ्नवचनात् सुमन्त्रो नाम सारथिः ।

योजयित्वाभिचक्राम रथं सर्वाङ्गशोभनम् ॥ १ ९ ॥

सुग्रीवो हनुमांश्चैव महेन्द्रसदृशद्युती ।

स्नातौ दिव्यनिभैर्वस्त्रैर्जग्मतुः शुभकुण्डलौ ॥ २१ ॥

सुग्रीव और हनुमानजी दोनों देवराज इन्द्रके समान कान्तिमान् थे । दोनोंके कानोंमें सुन्दर कुण्डल शोभा पा रहे थे । वे दोनों ही स्नान करके दिव्य वस्त्रोंसे विभूषित हो नगर-की ओर चले ॥ २१ ॥

सर्वाभरणजुष्टाश्च ययुस्ताः शुभकुण्डलाः ।

सुग्रीवपत्न्यः सीता च द्रष्टुं नगरमुत्सुकाः ॥ २२ ॥

सुग्रीवकी पत्नियाँ और सीताजी समस्त आभूषणोंसे विभूषित और सुन्दर कुण्डलोंसे अलंकृत हो नगर देखनेकी उत्सुकता मनमें लिये सवारियोंपर चलीं ॥ २२ ॥

अयोध्यायां च सचिवा राज्ञो दशरथस्य च ।

पुरोहितं पुरस्कृत्य मन्त्रयामासुरर्थवत् ॥ २३ ॥

अयोध्या में राजा दशरथके मन्त्री पुरोहित वसिष्ठजी को आगे करके श्रीरामचन्द्रजीके राज्याभिषेक के विषय में आवश्यक विचार करने लगे ॥ २३ ॥

अशोको विजयश्चैव सिद्धार्थश्च समाहिताः ।

मन्त्रयन् रामवृद्धयर्थमृद्धयर्थं नगरस्य च ॥ २४ ॥

अशोक, विजय और सिद्धार्थ — ये तीनों मन्त्री एकाग्रचित्त हो श्रीरामचन्द्रजीके अभ्युदय तथा नगरकी समृद्धि के लिये परस्पर मन्त्रणा करने लगे ॥ २४ ॥

सर्वमेवाभिषेकार्थे जयार्हस्य महात्मनः ।

कर्तुमर्हथ रामस्य यद् यन्मङ्गलपूर्वकम् ॥ २५ ॥

उन्होंने सेवकोंसे कहा-- ' विजयके योग्य जो महात्मा श्रीरामचन्द्रजी हैं, उनके अभिषेक के लिये जो - जो आवश्यक कार्य करना है, वह सब मङ्गलपूर्वक तुम सब लोग करो ' ॥२५ ॥

इति ते मन्त्रिणः सर्वे संदिश्य च पुरोहितः ।

नगरान्निर्ययुस्तूर्ण रामदर्शनबुद्धयः ॥ २६ ॥

इस प्रकार आदेश देकर वे मन्त्री और पुरोहितजी श्रीरामचन्द्रजीके दर्शनके लिये तत्काल नगरसे बाहर निकले ॥ २६ ॥

हरियुक्तं सहस्राक्षो रथमिन्द्र इवानघः ।

प्रययौ रथमास्थाय रामो नगरमुत्तमम् ॥ २७ ॥

शत्रुघ्नजीकी आज्ञासे सारथि सुमन्त्रजी एक जैसे सहस्र नेत्रधारी इन्द्र हरे रंगके घोड़ोंसे जुते हुए रथ-सर्वाङ्गसुन्दर तत्पश्चात् रथ जोतकर ले आये ॥ १ ९ ॥ पर बैठकर यात्रा करते हैं, उसी प्रकार निष्पाप श्रीराम एक श्रेष्ठ रथपर आरूढ़ अपने उत्तम नगरकी ओर चले ॥ २७ ॥

अम्यकमलसंकाशं दिव्यं दृष्ट्वा रथं स्थितम् । आरुरोह महाबाहू रामः परपुरंजयः ॥ २० ॥ जग्राह भरतो रश्मी शत्रुघ्नश्छत्रमाददे ।

अग्नि और सूर्यके समान देदीप्यमान उस दिव्य रथको लक्ष्मणो व्यजनं तस्य मूर्ध्नि संवीजयंस्तदा ॥ २८ ॥

खड़ा देख शत्रुनगरीपर विजय पानेवाले महाबाहु श्रीराम उस- उस समय भरतने सारथि बनकर घोड़ोंकी बागडोर अपने पर आरूढ़ हुए ॥ २० ॥ हाथमें ले रक्खी थी । शत्रुघ्नने छत्र लगा रक्खा था और

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युद्धकाण्डे अष्टाविंशत्यधिकशततमः सर्गः १४४७ लक्ष्मण उस समय श्रीरामचन्द्रजीके मस्तकपर नॅवर डुला रहे थे ॥ २८ ॥

श्वेतं च वालव्यजनं जगृहे परितः स्थितः ।

अपरं चन्द्रसंकाशं राक्षसेन्द्रो विभीषणः ॥ २ ९ ॥

एक ओर लक्ष्मण थे और दूसरी ओर राक्षसराज विभीषण खड़े थे । उन्होंने चन्द्रमाके समान कान्तिमान् दूसरा श्वेत चँवर हाथमें ले रक्खा था ऋषिसङ्घैस्तदाऽऽकाशे स्तूयमानस्य रामस्य उस समय आकाशमें सहित देवताओंके समुदाय ध्वनि सुन रहे थे ॥ ३० ॥

ततः शत्रुंजयं नाम आरुरोह महातेजाः तदनन्तर महातेजस्वी ॥ २ ९ ॥

देवैश्व समरुद्गणैः ।

शुश्रुवे मधुरध्वनिः ॥ ३० ॥

खड़े हुए ऋषियों तथा मरुद्गणों-श्रीरामचन्द्रजीके स्तवनकी मधुर

कुञ्जरं पर्वतोपमम् ।

सुग्रीवः प्लवगर्षभः ॥ ३१ ॥

वानरराज सुग्रीव शत्रुञ्जयनामक पर्वताकार गजराजपर आरूढ़ हुए ॥ ३१ ॥

नव नागसहस्राणि ययुरास्थाय वानराः ।

मानुषं विग्रहं कृत्वा सर्वाभरणभूषिताः ॥ ३२ ॥

वानरलोग नौ हजार हाथियोंपर चढ़कर यात्रा कर रहे थे । वे उस समय मानवरूप धारण किये हुए थे और सब प्रकार के आभूषणोंसे विभूषित थे ॥ ३२ ॥

शङ्खशब्दप्रणादैश्व दुन्दुभीनां च निःखनैः ।

प्रययौ पुरुषव्याघ्रस्तां पुरीं हर्म्यमालिनीम् ॥ ३३ ॥

पुरुषसिंह श्रीराम शङ्खध्वनि तथा दुन्दुभियोंके गम्भीर नाद के साथ प्रासादमालाओं से अलंकृत अयोध्यापुरीकी ओर प्रस्थित हुए ॥ ३३ ॥

ददृशुस्ते समायान्तं राघवं सपुरःसरम् ।

विराजमानं वपुषा रथेनातिरथं तदा ॥ ३४ ॥

अयोध्यावासियोंने अतिरथी श्रीरघुनाथजीको रथपर बैठकर आते देखा । उनका श्रीविग्रह दिव्यकान्तिसे प्रकाशित हो रहा था और उनके आगे - आगे अग्रगामी सैनिकोंका जत्था चल रहा था ॥ ३४ ॥

ते वर्धयित्वा काकुत्स्थं रामेण प्रतिनन्दिताः ।

अनुजग्मुर्महात्मानं भ्रातृभिः परिवारितम् ॥ ३५ ॥

उन सबने आगे बढ़कर श्रीरघुनाथजीको बधाई दी और श्रीरामने भी बदले में उनका अभिनन्दन किया । फिर वे सब पुरवासी भाइयोंसे घिरे हुए महात्मा श्रीरामके पीछे - पीछे चलने लगे ॥ ३५ ॥

अमात्यैर्ब्राह्मणैश्चैव तथा प्रकृतिभिर्वृतः ।

श्रिया विरुरुचे रामो नक्षत्रैरिव चन्द्रमाः ॥ ३६ ॥

जैसे नक्षत्रोंसे घिरे हुए चन्द्रमा सुशोभित होते हैं, उसी प्रकार मन्त्रियों, ब्राह्मणों तथा प्रजाजनोंसे घिरे हुए श्रीराम-चन्द्रजी अपनी दिव्यकान्तिसे उद्भासित हो रहे थे || ३६ ||

स पुरोगामिभिस्तूर्यैस्तालस्वस्तिकपाणिभिः ।

प्रव्याहरद्भिर्मुदितैर्मङ्गलानि वृतो ययौ ॥ ३७ ॥

सबसे आगे बाजेवाले । वे आनन्दमग्न हो तुरही,

करताल और स्वस्तिक बजाते तथा माङ्गलिक गीत गाते थे ।

उन सबके साथ श्रीरामचन्द्रजी नगरकी ओर बढ़ने लगे ॥ ३७ ॥

अक्षतं जातरूपं च गावः कन्याः सहद्विजाः ।

नरा मोदकस्ताश्च रामस्य पुरतो ययुः ॥ ३८ ॥

श्रीरामचन्द्रजीके आगे अक्षत और सुवर्णसे युक्त पात्र, गौ, ब्राह्मण, कन्याएँ तथा हाथमें मिठाई लिये अनेकानेक मनुष्य चल रहे थे ॥ ३८ ॥

सख्यं च रामः सुग्रीवे प्रभावं चानिलात्मजे ।

वानराणां च तत् कर्म ह्याचचक्षेऽथ मन्त्रिणाम् ॥ ३ ९ ॥

श्रीरामचन्द्रजी अपने मन्त्रियोंसे सुग्रीवकी मित्रता, हनुमानजी के प्रभाव तथा अन्य वानरोंके अद्भुत पराक्रमकी चर्चा करते जा रहे थे ॥ ३ ९ ॥ श्रुत्वा च विस्मयं जग्मुर योध्यापुरवासिनः ।

वानराणां च तत् कर्म राक्षसानां च तद् बलम् ।

विभीषणस्य संयोगमाचचक्षेऽथ मन्त्रिणाम् ॥ ४० ॥

वानरोंके पुरुषार्थ और राक्षसोंके बलकी बातें सुनकर अयोध्यावासियों को बड़ा विस्मय हुआ । श्रीरामने विभीषणसे मिलनका प्रसंग भी अपने मन्त्रियों को बताया ॥ ४० ॥

युतिमानेतदाख्याय रामो वानरसंयुतः ।

हृष्टपुष्टजनाकीर्णामयोध्यां प्रविवेश सः ॥ ४१ ॥

यह सब बताकर वानरोंसहित तेजस्वी श्रीरामने हृष्ट - पुष्ट मनुष्योंसे भरी हुई अयोध्यापुरीमें प्रवेश किया ॥ ४१ ॥

ततो भ्युच्छ्रयन पौराः पताकाश्च गृहे गृहे ।

पेक्ष्वाकाभ्युषितं रम्यमाससाद पितुर्गृहम् ॥ ४२ ॥

उस समय पुरवासियोंने अपने - अपने घरपर लगी हुई । पताकाएँ ऊँची कर दीं । फिर श्रीरामचन्द्रजी इक्ष्वाकुवंशी राजाओंके उपयोगमें आये हुए पिताके रमणीय भवनमें गये ॥ ४२ ॥

अथाब्रवीद् राजपुत्रो भरतं धर्मिणां वरम् ।

अर्थोपहितया वाचा मधुरं रघुनन्दनः ॥ ४३ ॥

पितुर्भवनमासाद्य प्रविश्य च महात्मनः ।

कौसल्यांच सुमित्रां च कैकेयीमभिवाद्य च ॥ ४४ ॥

उस समय रघुकुलनन्दन राजकुमार श्रीरामने महात्मा पिताजी के भवनमें प्रवेश करके माता कौसल्या, सुमित्रा और

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१४४८ श्रीमद्वाल्मीकीय रामायणे कैकेयी के चरणों में मस्तक झुकाकर धर्मात्माओं में श्रेष्ठ भरतसे अर्थयुक्त मधुर वाणी में कहा ॥ ४३-४४ ॥

तच्च मद्भवनं श्रेष्ठं साशोकवनिकं महत् ।

मुक्तावैदूर्यसंकीर्ण सुग्रीवाय निवेदय ॥ ४५ ॥

‘ भरत! मेरा जो अशोकवाटिकासे घिरा हुआ मुक्ता एवं वैदूर्यमणियोंसे जटित विशाल भवन है, वह सुग्रीव को दे दो ' ॥ ४५ ॥

तस्य तद् वचनं श्रुत्वा भरतः सत्यविक्रमः ।

हस्ते गृहीत्वा सुग्रीवं प्रविवेश तमालयम् ॥ ४६ ॥

उनकी आज्ञा सुनकर सत्यपराक्रमी भरतने सुग्रीवका हाथ पकड़कर उस भवन में प्रवेश किया ॥ ४६ ॥

ततस्तैलप्रदीपांश्च पर्यङ्कास्तरणानि च ।

गृहीत्वा विविशुः क्षिप्रं शत्रुघ्नेन प्रचोदिताः ॥ ४७ ॥

फिर शत्रुघ्न जी की आज्ञा से अनेकानेक सेवक उसमें तिलके तेलसे जलनेवाले बहुत - से दीपक, पलंग और बिछौने लेकर शीघ्र ही गये || ४७ ||

उवाच च महातेजाः सुग्रीवं राघवानुजः ।

अभिषेकाय रामस्य दूतानाज्ञापय प्रभो ॥ ४८ ॥

तत्पश्चात् महातेजस्वी भरतने सुग्रीवसे कहा - " प्रभो! भगवान् श्रीरामके अभिषेकके निमित्त जल लानेके लिये आप अपने दूतोंको आज्ञा दीजिये ॥ ४८ ॥

सौवर्णान् वानरेन्द्राणां चतुर्णा चतुरो घटान् ।

ददौ क्षिप्रं स सुग्रीवः सर्वरत्नविभूषितान् ॥ ४ ९ ॥

तब सुग्रीवने उसी समय चार श्रेष्ठ वानरोंको सब प्रकारके रत्नोंसे विभूषित चार सोनेके घड़े देकर कहा ॥ ४ ९ ॥

तथा प्रत्यूषसमये चतुर्णां सागराम्भसाम् ।

पूर्णैर्घटैः प्रतीक्षध्वं तथा कुरुत वानराः ॥ ५० ॥

" वानरो! तुमलोग कल प्रातःकाल ही चारों समुद्रोंके जलसे भरे हुए घड़ों के साथ उपस्थित रहकर आवश्यक आदेश-की प्रतीक्षा करो ' ॥ ५० ॥

एवमुक्ता महात्मानो वानरा वारणोपमाः ।

उत्पेतुर्गगनं शीघ्रं गरुडा इव शीघ्रगाः ॥ ५१ ॥

सुग्रीवके इस प्रकार आदेश देनेपर हाथी के समान विशालकाय महामनस्वी वानर, जो गरुड़के समान शीघ्रगामी थे, तत्काल आकाश में उड़ चले ॥ ५१ ॥

जाम्बवांश्च हनूमांश्च वेगदर्शी च वानरः ।

ऋषभश्चैव कलशाञ्जलपूर्णानथानयन् ॥ ५२ ॥

नदीशतानां पञ्चानां जलं कुम्भैरुपाहरन् । जाम्बवान्, हनुमान्, वेगदर्शी ( गवय ) और ऋषभ ये सभी वानर चारों समुद्रोंसे और पाँच सौ नदियोंसे भी सोनेके चहुत - से कलश भर लाये ॥ ५२३ ॥

पूर्वात् समुद्रात् कलशं जलपूर्णमथानयत् ॥ ५३ ॥

सुषेणः सत्त्वसम्पन्नः सर्वरत्नविभूषितम् । जिनके पास रीछोंकी बहुत - सी सुन्दर सेना है वे शक्ति शाली जाम्बवान् सम्पूर्ण रत्नोंसे विभूषित सुवर्णमय कलश लेकर गये और उसमें पूर्वसमुद्रका जल भरकर ले आये ५३३ ऋषभो दक्षिणात्तर्ण समुद्राजलमानयत् ॥ ५४ ॥

रक्तचन्दनकर्पूरैः संवृतं काञ्चनं घटम् । ऋषभ दक्षिण समुद्र से शीघ्र ही एक सोनेका घड़ा भर लाये । वह लाल चन्दन और कपूरसे ढका हुआ था ॥ ५४३ ॥

गवयः पश्चिमात् तोयमाजहार महार्णवात् ॥ ५५ ॥

रत्नकुम्भेन महता शीतं मारुतविक्रमः । वायुके समान वेगशाली गवय एक रत्ननिर्मित विशाल कलशके द्वारा पश्चिम दिशाके महासागरसे शीतल जल भर लाये ॥ ५५३ ॥

उत्तराच्च जलं शीघ्रं गरुडानिलविक्रमः ॥ ५६ ॥

आजहार स धर्मात्मानिलः सर्वगुणान्वितः । गरुड़ तथा वायुके समान तीव्र गति से चलनेवाले, धर्मात्मा सर्वगुणसम्पन्न पवनपुत्र हनुमानजी भी उत्तरवर्ती महासागर से शीघ्र जल ले आये ॥ ५६३ ॥

ततस्तैर्वानरश्रेष्ठैरानीतं प्रेक्ष्य तज्जलम् ॥ ५७ ॥

अभिषेकाय रामस्य शत्रुघ्नः सचिवैः सह ॥ । पुरोहिताय श्रेष्ठाय सुहृद्भ्यश्च न्यवेदयत् ॥ ५८ ॥

उन श्रेष्ठ वानरोंके द्वारा लाये हुए उस जलको देखकर मन्त्रियोंसहित शत्रुघ्नने वह सारा जल श्रीरामजीके अभिषेकके लिये पुरोहित वसिष्ठजी तथा अन्य सुहृदोंको समर्पित कर दिया ॥ ५७-५८ ॥

ततः स प्रयतो वृद्धो वसिष्ठो ब्राह्मणैः सह ।

रामं रत्नमये पीठे ससीतं संन्यवेशयत् ॥ ५ ९ ॥

तदनन्तर ब्राह्मणोंसहित शुद्धचेता वृद्ध वसिष्ठजीने सीता-सहित श्रीरामचन्द्रजीको रत्नमयी चौकीपर बैठाया ॥ ५ ९ ॥ वसिष्ठो वामदेवश्च कात्यायनः सुयज्ञश्च अभ्यषिञ्चन्नरव्याघ्रं सलिलेन सहस्राक्षं तत्पश्चात् जैसे आठ कराया था, उसी प्रकार कात्यायन, सुयज्ञ, गौतम स्वच्छ एवं सुगन्धित

जाबालिरथ काश्यपः ।

गौतमो विजयस्तथा ॥ ६० ॥

प्रसन्नेन सुगन्धिना ।

वसवो वासवं यथा ॥ ६१ ॥

वसुओंने देवराज इन्द्रका अभिषेक वसिष्ठ, वामदेव, जाबालि, काश्यप, और विजय - इन आठ मन्त्रियोंने जलके द्वारा सीतासहित पुरुषप्रवर श्रीरामचन्द्रजीका अभिषेक कराया ॥ ६०-६१ ॥

ऋत्विग्भिर्ब्राह्मणैः पूर्व कन्याभिर्मन्त्रिभिस्तथा ।

योधैश्चैवाभ्यषिञ्चंस्ते सम्प्रहृष्टैः सनैगमैः ॥ ६२ ॥

सर्वौषधिरसैश्वापि दैवतैर्नभसि स्थितैः ।

चतुर्भिर्लोकपालैश्च सर्वैर्देवैश्च संगतैः ॥ ६३ ॥

( किनके द्वारा कराया? यह बताते हैं - ) सबसे पहले उन्होंने सम्पूर्ण ओषधियोंके रसों तथा पूर्वोक्त जलसे ऋ

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युद्धकाण्डे अष्टाविंशत्यधिकशततमः सर्गः १४४ ९ ब्राह्मणोंद्वारा, फिर सोलह कन्याओं द्वारा तत्पश्चात् मन्त्रियोंद्वारा अभिषेक करवाया । इसके बाद अन्यान्य योद्धाओं और हर्षसे भरे हुए श्रेष्ठ व्यवसायियों को भी अभिषेकका अवसर दिया । उस समय आकाशमें खड़े हुए समस्त देवताओं और एकत्र हुए चारों लोकपालोंने भी भगवान् श्रीरामका अभिषेक किया ॥ ६२-६३ ।

ब्रह्मणा निर्मितं पूर्व किरीटं रत्नशोभितम् ।

अभिषिकः पुरा येन मनुस्तं दीप्ततेजसम् ॥ ६४ ॥

तस्यान्ववाये राजानः क्रमाद् येनाभिषेचिताः ।

सभायां मक्लप्तायां शोभितायां महाधनैः ॥ ६५ ॥

रत्नैर्नानाविधैश्चैव चित्रितायां सुशोभनैः ।

नानारत्नमये पीठे कल्पयित्वा यथाविधि ॥ ६६ ॥

किरीटेन ततः पश्चाद् वसिष्ठेन महात्मना ।

ऋत्विग्भिर्भूषणैश्चैव समयोक्ष्यत राघवः ॥ ६७ ॥

॥ तदनन्तर ब्रह्माजीका बनाया हुआ रत्नशोभित एवं दिव्य तेजसे देदीप्यमान किरीट, जिसके द्वारा पहले - पहल मनुजीका और फिर क्रमशः उनके सभी वंशधर राजाओंका अभिषेक हुआ था, भाँति - भाँति के रत्नोंसे चित्रित, सुवर्णनिर्मित एवं महान् वैभवसे शोभायमान सभाभवनमें अनेक रत्नोंसे बनी हुई चौकीपर विधिपूर्वक रक्खा गया । फिर महात्मा वसिष्ठजीने अन्य ऋत्विज ब्राह्मणोंके साथ उस किरीटसे और अन्यान्य आभूषणोंसे भी श्रीरघुनाथजीको विभूषित किया ॥ ६४–६७ ॥

छत्रं तस्य च जग्राह शत्रुघ्नः पाण्डुरं शुभम् ।

श्वेतं च वालव्यजनं सुग्रीवो वानरेश्वरः ॥ ६८ ॥

अपरं चन्द्रसंकाशं राक्षसेन्द्रो विभीषणः । उस समय शत्रुघ्न जी ने उनपर सुन्दर श्वेत रंगका छत्र लगाया । एक ओर वानरराज सुग्रीवने श्वेत चँवर हाथमें लिया तो दूसरी ओर राक्षसराज विभीषणने चन्द्रमाके समान चमकीला चँवर लेकर डुलाना आरम्भ किया ॥ ६८३ ॥

मालां ज्वलन्तीं वपुषा काञ्चनीं शतपुष्कराम् ॥ ६ ९ ॥

राघवाय ददौ वायुर्वासवेन प्रचोदितः ।

सर्वरत्नसमायुक्तं मणिभिश्च विभूषितम् ॥ ७० ॥

मुक्ताहारं नरेन्द्राय ददौ शक्रप्रचोदितः । उस अवसरपर देवराज इन्द्रकी प्रेरणासे वायुदेवने सौ सुवर्णमय कमलोंसे बनी हुई एक दीप्तिमती माला और सब प्रकारके रत्नोंसे युक्त मणियोंसे विभूषित मुक्ताहार राजा रामचन्द्रजीको भेंट किया ॥ ६ ९ -७०३ ॥ प्रजगुर्देवगन्धर्वा ननृतुश्चाप्सरोगणाः ॥ ७१ ॥

अभिषेके तदर्हस्य तदा रामस्य धीमतः । बुद्धिमान् श्रीरामके अभिषेककालमें देवगन्धर्व गाने लगे और अप्सराएँ नृत्य करने लगीं । भगवान् श्रीराम इस सम्मानके सर्वथा योग्य थे ॥ ७१३ ॥

भूमिः सस्यवती चैव फलवन्तश्च पादपाः ॥ ७२ ॥

बा ० रा ० ५.११. २-गन्धवन्ति च पुष्पाणि बभूवू राघवोत्सवे । श्रीरघुनाथजीके राज्याभिषेकोत्सवके समय पृथ्वी खेती से हरी - भरी हो गयी, वृक्षों में फल आ गये और फूलोंमें सुगन्ध छा गयी ॥ ७२३ ॥

सहस्रशतमश्वानां धेनूनां च गवां तथा ॥ ७३ ॥

ददौ शतवृषान् पूर्व द्विजेभ्यो मनुजर्षभः ।

त्रिंशत्कोटीहिरण्यस्य ब्राह्मणेभ्यो ददौ पुनः ॥ ७४ ॥

नानाभरणवस्त्राणि महार्हाणि च राघवः । महाराज श्रीरामने उस समय पहले ब्राह्मणोंको एक लाख घोड़े उतनी ही दूध देनेवाली गौएँ तथा सौ साँड़ दान किये । यही नहीं, श्रीरघुनाथजीने तीस करोड़ अशर्फियाँ तथा नाना प्रकारके बहुमूल्य आभूषण और वस्त्र भी ब्राह्मणों को बाँटे ॥ ७३-७४३ ॥ अर्करश्मिप्रतीकाशां काञ्चनीं मणिविग्रहाम् ॥ ७५ ॥

सुग्रीवाय स्रजं दिव्यां प्रायच्छन्मनुजाधिपः । तत्पश्चात् राजा श्रीरामने अपने मित्र सुग्रीवको सोने की एक दिव्य माला भेंट की, जो सूर्यकी किरणोंके समान प्रकाशित हो रही थी । उसमें बहुत - सी मणियोंका संयोग था ॥ ७५३ ॥

वैदूर्यमयचित्रे च चन्द्ररश्मिविभूषिते ॥ ७६ ॥

वालिपुत्राय धृतिमानङ्गदायाङ्गदे ददौ । इसके बाद धैर्यशाली श्रीरघुवीरने प्रसन्न हो वालिपुत्र अङ्गदको दो अङ्गद ( बाजूबन्द ) भेंट किये, जो नीलमसे जटित होने के कारण विचित्र दिखायी देते थे । वे चन्द्रमाकी किरणोंसे विभूषित - से जान पड़ते थे । ७६३ ॥ तं मुक्ताहारमनुत्तमम् ॥ ७७ ॥

सीतायै प्रददौ रामश्चन्द्ररश्मिसमप्रभम् ।

अरजे वाससी दिव्ये शुभान्याभरणानि च ॥ ७८ ॥

उत्तम मणियोंसे युक्त उस परम उत्तम मुक्ताहारको ( जिसे वायुदेवताने भेंट किया था तथा ) जो चन्द्रमाकी किरणोंके समान प्रकाशित होता था श्रीरामचन्द्रजीनं सीताजीके गले में डाल दिया । साथ ही उन्हें कभी मैले न होनेवाले दो दिव्य वस्त्र तथा और भी बहुत - से सुन्दर आभूषण अर्पित किये ॥ ७७-७८ ॥

अवेक्षमाणा वैदेही प्रददौ वायुसूनवे ।

अवमुच्यात्मनः कण्ठाद्धारं जनकनन्दिनी ॥ ७ ९ ॥

अवैक्षत हरीन् सर्वान् भर्तारं च मुहुर्मुहुः । विदेहनन्दिनी सीताने पतिकी ओर देखकर वायुपुत्र हनुमान् को कुछ भेंट देनेका विचार किया । वे जनकनन्दिनी अपने गलेसे उस मुक्ताहारको निकालकर बारंबार समस्त वानरों तथा पतिकी ओर देखने लगीं ॥ ७ ९ ३ ॥ तामिङ्गितज्ञः सम्प्रेक्ष्य बभाषे जनकात्मजाम् ॥ ८० ॥

प्रदेहि सुभगे हारं यस्य तुष्टासि भामिनि । उनकी उस चेष्टाको समझकर श्रीरामचन्द्रजीने जानकीजी-