Ramayana 2 — पृष्ठ 661–670

वाल्मीकि रामायण — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 661–670

पृष्ठ 661

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१४५० श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे की ओर देखकर कहा - ' सौभाग्यशालिनि! भामिनि! तुम जिसपर संतुष्ट हो, उसे यह हार दे दो ' ॥ ८०३ ॥

अथ सा वायुपुत्राय तं हारमसितेक्षणा ॥ ८१ ॥

तेजो धृतिर्यशो दाक्ष्यं सामर्थ्य विनयो नयः ।

पौरुषं विक्रमो बुद्धिर्यस्मिन्नेतानि नित्यदा ॥ ८२ ॥

तब कजरारे नेत्रोंवाली माता सीताने वायुपुत्र हनुमान् को, जिनमें तेज, धृति, यश, चतुरता, शक्ति, विनय, नीति, पुरुषार्थ, पराक्रम और उत्तम बुद्धि – ये सद्गुण सदा विद्यमान रहते हैं, वह हार दे दिया ॥ ८१-८२ ॥

हनूमांस्तेन हारेण शुशुभे वानरर्षभः ।

चन्द्रांशुचयगौरेण श्वेताभ्रेण यथाचलः ॥ ८३ ॥

उस हारसे कपिश्रेष्ठ हनुमान् उसी तरह शोभा पाने लगे, जैसे चन्द्रमा की किरणों के समूह सदृश श्वेत बादलोंकी मालासे कोई पर्वत सुशोभित हो रहा हो ॥ ८३ ॥

सर्वे वानरवृद्धाश्च ये चान्ये वानरोत्तमाः ।

वासोभिर्भूषणैश्चैव यथाई प्रतिपूजिताः ॥ ८४ ॥

इसी प्रकार जो प्रधान प्रधान एवं श्रेष्ठ बानर थे, उन सबका वस्त्रों और आभूषणोंद्वारा यथायोग्य सत्कार किया गया ॥ ८४ ॥

विभीषणोऽथ सुग्रीवो हनूमाञ्जाम्बवांस्तथा ।

सर्वे वानरमुख्याश्च रामेणाक्लिष्टकर्मणा ॥ ८५ ॥

यथा पूजिताः सर्वे कामै रत्नैश्च पुष्कलैः ।

प्रहृष्टमनसः सर्वे जग्मुरेव यथागतम् ॥ ८६ ॥

अनायास ही महान् कर्म करनेवाले श्रीरामने विभीषण, सुग्रीव, हनुमान् तथा जाम्बवान् आदि सभी श्रेष्ठ वानरवीरों-का मनोवाञ्छित वस्तुओं एवं प्रचुर रत्नोंद्वारा यथायोग्य सत्कार किया । वे सब - के - सब प्रसन्नचित्त होकर जैसे आये थे, उसी तरह अपने - अपने स्थानोंको चले गये । ८५-८६ ॥

ततो द्विविदमैन्दाभ्यां नीलाय च परंतपः ।

सर्वान् कामगुणान् वीक्ष्य प्रददौ वसुधाधिपः ॥ ८७ ॥

तत्पश्चात् शत्रुओंको संताप देनेवाले राजा श्रीरघुनाथजीने द्विविद, मैन्द और नीलकी ओर देखकर उन सबको मनोवाञ्छापूरक गुणोंसे युक्त सब प्रकारके उत्तम रत्न आदि भेंट किये ॥ ८७ ॥

eg सर्वे महात्मानस्ततस्ते वानरर्षभाः ।

विसृष्टाः पार्थिवेन्द्रेण किष्किन्धां समुपागमन् ॥ ८८ ॥

इस प्रकार भगवान् श्रीरामका राज्याभिषेक देखकर सभी महामनस्वी श्रेष्ठ वानर महाराज श्रीरामसे बिदा ले किष्किन्धाको चले गये ॥ ८८ ॥

सुग्रीवो वानरश्रेष्ठो दृष्ट्वा रामाभिषेचनम् ।

पूजितश्चैव रामेण किष्किन्धां प्राविशत् पुरीम् ॥ ८ ९ ॥

वानरश्रेष्ठ सुग्रीवने भी श्रीरामके राज्याभिषेकका उत्सव देखकर उनसे पूजित हो किष्किन्धापुरीमें प्रवेश किया ॥ ८ ९ ॥

विभीषणोऽपि धर्मात्मा सह तैर्नैर्ऋतर्षभैः ।

लब्ध्वा कुलधनं राजा लङ्कां प्रायान्महायशाः ॥ ९ ० ॥

महायशस्वी धर्मात्मा विभीषण भी अपने कुलका वैभव-अपना राज्य पाकर अपने साथी श्रेष्ठ निशाचरोंके साथ लङ्का-पुरीको चले गये ॥ ९ ० ॥ स राज्यमखिलं शासन्निहतारिर्महायशाः ।

राघवः परमोदारः शशास परया मुदा ।

उवाच लक्ष्मणं रामो धर्मज्ञं धर्मवत्सलः ॥ ९ १ ॥

अपने शत्रुओंका वध करके परम उदार महायशस्वी

श्रीरघुनाथजी बड़े आनन्दसे समस्त राज्यका शासन करने लगे ।

उन धर्मवत्सल श्रीरामने धर्मज्ञ लक्ष्मणसे कहा -- ॥ ९ १ ॥

आतिष्ठ धर्मज्ञ मया सहेमां गां पूर्वराजाध्युषितां बलेन । तुल्यं मया त्वं पितृभिर्धृता या तां यौवराज्ये धुरमुद्वहख ॥ ९ २ ॥ ' धर्मज्ञ लक्ष्मण! पूर्ववर्ती राजाओंने चतुरङ्गिणी सेनाके साथ जिसका पालन किया था, उसी इस भूमण्डलके राज्यपर तुम मेरे साथ प्रतिष्ठित होओ । अपने पिता, पितामह और प्रपितामहोंने जिस राज्यभारको पहले धारण किया था, उसीको मेरे ही समान तुम भी युवराज - पदपर स्थित होकर धारण करो ' ॥ ९ २ ॥ सर्वात्मना पर्यनुनीयमानो यदा न सौमित्रिरुपैति योगम् । नियुज्यमानो भुवि यौवराज्ये ततोऽभ्यषिञ्चद् भरतं महात्मा ॥९ ३ ॥ परंतु श्रीरामचन्द्रजीके सब तरह से समझाने और नियुक्त किये जानेपर भी जब सुमित्राकुमार लक्ष्मणने उस पदको नहीं स्वीकार किया, तब महात्मा श्रीरामने भरतको युवराज - पदपर

अभिषिक्त किया ।॥ ९ ३ ॥

पौण्डरीकाश्वमेधाभ्यां वाजपेयेन चासकृत् ।

अन्यैश्च विविधैर्यज्ञैरयजत् पार्थिवात्मजः ॥ ९ ४ ॥

राजकुमार महाराज श्रीरामने अनेक बार पौण्डरीक, अश्वमेध, वाजपेय तथा अन्य नाना प्रकारके यज्ञोंका अनुष्ठान किया ॥ ९ ४ ॥

राज्यं दशसहस्राणि प्राप्य वर्षाणि राघवः ।

शताश्वमेधानाजहे सदश्वान् भूरिदक्षिणान् ॥ ९ ५ ॥

श्रीरघुनाथजीने राज्य पाकर ग्यारह सहस्र वर्षोंतक उसका पालन और सौ अश्वमेध यज्ञोंका अनुष्ठान किया । उन यज्ञों में उत्तम अश्व छोड़े गये थे तथा ऋत्विजोंको बहुत अधिक दक्षिणाएँ बाँटी गयी थीं ॥ ९ ५ ॥ १. अन्यत्र ' दशवर्षसहस्राणि दशवर्षशतानि च ' कहा गया है, उनसे एक वाक्यताके लिये यहाँ दसको ग्यारहका बोधक समझना चाहिये ।

पृष्ठ 662

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युद्धकाण्डे अष्टाविंशत्यधिकशततमः सर्गः १४५१

आजानुलम्बिबाहुः स महावक्षाः प्रतापवान् ।

लक्ष्मणानुचरो रामः शशास पृथिवीमिमाम् ॥ ९ ६ ॥

उनकी भुजाएँ घुटनों तक लंबी थीं । उनका वक्षःस्थल विशाल एवं विस्तृत था । वे बड़े प्रतापी नरेश थे । लक्ष्मणको साथ लेकर श्रीरामने इस पृथ्वीका शासन किया ॥ ९ ६ ॥

राघवश्चापि धर्मात्मा प्राप्य राज्यमनुत्तमम् ।

ईजे बहुविधैर्यज्ञैः ससुहृज्ज्ञातिबान्धवः ॥ ९ ७ ॥

अयोध्या के परम उत्तम राज्यको पाकर धर्मात्मा श्रीरामने सुहृदों, कुटुम्बीजनों तथा भाई - बन्धुओंके साथ अनेक प्रकारके यज्ञ किये ॥ ९ ७ ॥

न पर्यदेवन् विधवा न च व्यालकृतं भयम् ।

न व्याधिजं भयं चासीद्रामे राज्यं प्रशासति ॥ ९ ८ ॥

श्रीरामके राज्य शासनकालमें कभी विधवाओंका विलाप नहीं सुनायी पड़ता था । सर्प आदि दुष्ट जन्तुओंका भय नहीं था और रोगोंकी भी आशङ्का नहीं थी । ९ ८ ॥

निर्दस्युरभवल्लोको नानर्थ कश्चिदस्पृशत् ।

न च स्म वृद्धा बालानां प्रेतकार्याणि कुर्वते ॥ ९९ ॥

सम्पूर्ण जगत् में कहीं चोरों या लुटेरोंका नाम भी नहीं सुना जाता था । कोई भी मनुष्य अनर्थकारी कार्योंमें हाथ नहीं डालता था और बूढ़ोंको बालकोंके अन्त्येष्टि - संस्कार नहीं करने पड़ते थे ॥ ९९ ॥

सर्वे मुदितमेवासीत् सर्वो धर्मपरोऽभवत् ।

राममेवानुपश्यन्तो नाभ्यहिंसन् परस्परम् ॥ १०० ॥

सब लोग सदा प्रसन्न ही रहते थे । सभी धर्मपरायण थे और श्रीरामपर ही बारंबार दृष्टि रखते हुए वे कभी एक दूसरेको कष्ट नहीं पहुँचाते थे ॥ १०० ॥

आसन् वर्षसहस्राणि तथा पुत्रसहस्रिणः ।

निरामया विशोकाश्च रामे राज्यं प्रशासति ॥ १०१ ॥

श्रीरामके राज्य शासन करते समय लोग सहस्रों वर्षोंतक जीवित रहते थे, सहस्रों पुत्रोंके जनक होते थे और उन्हें किसी प्रकारका रोग या शोक नहीं होता था ॥ १०१ ॥

रामो रामो राम इति प्रजानामभवन् कथाः ।

रामभूतं जगदभूद् रामे राज्यं प्रशासति ॥ १०२ ॥

श्रीराम के राज्यशासनकाल में प्रजावर्ग के भीतर केवल राम, राम, रामकी ही चर्चा होती थी । सारा जगत् श्रीराममय हो रहा था ॥ १०२ ॥

नित्यमूला नित्यफलास्तरवस्तत्र पुष्पिताः ।

कामवर्षी च पर्जन्यः सुखस्पर्शश्च मारुतः ॥ १०३ ॥

श्रीरामके राज्य में वृक्षोंकी जड़ें सदा मजबूत रहती थीं । वे वृक्ष सदा फूलों और फलोंसे लदे रहते थे । मेघ प्रजाकी इच्छा और आवश्यकता के अनुसार ही वर्षा करते थे । वायु मन्द गति से चलती थी, जिससे उसका स्पर्श सुखद जान पड़ता था ॥ १०३ ॥

ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः शूद्रा लोभविवर्जिताः ।

खकर्मसु प्रवर्तन्ते तुष्टाः स्वैरेव कर्मभिः ॥ १०४ ॥

ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र चारों वर्णोंके लोग लोभरहित होते थे । सबको अपने ही वर्णाश्रमोचित कमसे संतोष था और सभी उन्हींके पालनमें लगे रहते थे ॥ १०४ ॥

आसन् प्रजा धर्मपरा रामे शासति नानृताः ।

सर्वे लक्षणसम्पन्नाः सर्वे धर्मपरायणाः ॥ १०५ ॥

श्रीरामके शासनकालमें सारी प्रजा धर्ममें तत्पर रहती थी । झूठ नहीं बोलती थी । सब लोग उत्तम लक्षणोंसे सम्पन्न थे और सबने धर्मका आश्रय ले रक्खा था ॥ १०५ ॥

दशवर्षसहस्राणि दशवर्षशतानि च ।

भ्रातृभिः सहितः श्रीमान् रामो राज्यमकारयत् ॥ १०६ ॥

भाइयोंसहित श्रीमान् रामने ग्यारह हजार वर्षोंतक राज्य किया था ॥ १०६ ॥

धर्म्य यशस्यमायुष्यं राज्ञां च विजयावहम् ।

आदिकाव्यमिदं चार्षे पुरा वाल्मीकिना कृतम् ॥ १०७ ॥

यह ऋषिप्रोक्त आदिकाव्य रामायण है, जिसे पूर्वकालमें 0 महर्षि वाल्मीकिने बनाया था । यह धर्म, यश तथा आयुकी वृद्धि करनेवाला एवं राजाओंको विजय देनेवाला है ॥ १०७ ॥

यः शृणोति सदा लोके नरः पापात् प्रमुच्यते ।

पुत्रकामश्च पुत्रान् वै धनकामो धनानि च ॥ १०८ ॥

लभते मनुजो लोके श्रुत्वा रामाभिषेचनम् ।

महीं विजयते राजा रिपुंश्चाप्यधितिष्ठति ॥ १० ९ ॥

संसार में जो मानव सदा इसका श्रवण करता है, वह पापसे मुक्त हो जाता है । श्रीरामके राज्याभिषेक के प्रसंगको सुनकर मनुष्य इस जगत् में यदि पुत्रका इच्छुक हो तो पुत्र और धनका अभिलाषी हो तो धन पाता है । राजा इस काव्य-का श्रवण करनेसे पृथ्वीपर विजय पाता और शत्रुओं को अपने

अधीन कर लेता है । १०८ १० ९ ॥

राघवेण यथा माता सुमित्रा लक्ष्मणेन च ।

भरतेन च कैकेयी जीवपुत्रास्तथा स्त्रियः ॥ ११० ॥

भविष्यन्ति सदानन्दाः पुत्रपौत्रसमन्विताः । जैसे माता कौसल्या श्रीरामको, सुमित्रा लक्ष्मणको और कैकेयी भरतको पाकर जीवित पुत्रोंकी माता कहलायीं, उसी प्रकार संसार की दूसरी स्त्रियाँ भी इस आदिकाव्यके पाठ और श्रवणसे जीवित पुत्रोंकी जननी, सदा आनन्दमग्न तथा पुत्र-पौत्रोंसे सम्पन्न होंगी ॥ ११०३ ॥

श्रुत्वा रामायणमिदं दीर्घमायुश्च विन्दति ॥ १११ ॥

रामस्य विजयं चेमं सर्वमक्लिष्टकर्मणः । क्लेशरहित कर्म करनेवाले श्रीरामकी विजय कथारूप इस सम्पूर्ण रामायण- काव्यको सुनकर मनुष्य दीर्घकालतक स्थिर रहनेवाली आयु पाता है ॥ १११३ ॥

-शृणोति य इदं काव्यं पुरा वाल्मीकिना कृतम् ॥ ११२ ॥

पृष्ठ 663

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१४५२ श्रीमवाल्मीकीय रामायणे श्रद्दधानो जितक्रोधो दुर्गाण्यतितरत्यसौ । पूर्वकालमें महर्षि वाल्मीकिने जिसकी रचना की थी, वही यह आदिकाव्य है । जो क्रोधको जीतकर श्रद्धापूर्वक इसे सुनता है, वह बड़े - बड़े संकटोंसे पार हो जाता है ॥ ११२३ ॥

समागम्य प्रवासान्ते रमन्ते सह बान्धवैः ॥ ११३ ॥

शृण्वन्ति य इदं काव्यं पुरा वाल्मीकिना कृतम् ।

ते प्रार्थितान् वरान् सर्वान् प्राप्नुवन्तीह राघवात् ॥ ११४ ॥

जो लोग पूर्वकालमें महर्षि वाल्मीकिद्वारा निर्मित इस काव्यको सुनते हैं, वे परदेशसे लौटकर अपने भाई - बन्धुओंके साथ मिलते और आनन्दका अनुभव करते हैं । वे इस जगत् में श्रीरघुनाथजीसे समस्त मनोवाञ्छित फलों को प्राप्त कर लेते हैं ॥ ११३ ११४ ॥

श्रवणेन सुराः सर्वे प्रीयन्ते सम्प्रशृण्वताम् ।

विनायकाश्च शाम्यन्ति गृहे तिष्ठन्ति यस्य वै ॥ ११५ ॥

इसके श्रवणसे समस्त देवता श्रोताओं पर प्रसन्न होते हैं तथा जिसके घर में विघ्नकारी ग्रह होते हैं, उसके वे सारे ग्रह ० शान्त हो जाते हैं ॥ ११५ ॥

विजयेत महीं राजा प्रवासी स्वस्तिमान् भवेत् ।

स्त्रियो रजस्वलाः श्रुत्वा पुत्रान् सयुरनुत्तमान् ॥ ११६ ॥

राजा इसके श्रवणसे भूमण्डलपर विजय पाता है । परदेशमें निवास करनेवाला पुरुष सकुशल रहता और रजस्वला स्त्रियाँ ( स्नान के अनन्तर सोलह दिनोंके भीतर ) इसे सुनकर श्रेष्ठ पुत्रोंको जन्म देती हैं ॥ ११६ ॥

पूजयंश्च पठंश्चैनमितिहासं पुरातनम् ।

सर्वपापैः प्रमुच्येत दीर्घमायुरवाप्नुयात् ॥११७ ॥

जो इस प्राचीन इतिहासका पूजन और पाठ करता है, वह सब पापोंसे मुक्त होता और बड़ी आयु पाता है ॥ ११७ ॥

प्रणम्य शिरसा नित्यं श्रोतव्यं क्षत्रियैर्द्विजात् ।

ऐश्वर्य पुत्रलाभश्च भविष्यति न संशयः ॥ १ ९ ८ ॥

क्षत्रियोंको चाहिये कि वे प्रतिदिन मस्तक झुकाकर प्रणाम करके ब्राह्मणके मुखसे इस ग्रन्थका श्रवण करें । इससे उन्हें ऐश्वर्यं और पुत्रकी प्राप्ति होगी, इसमें संशय नहीं है ॥११८ ॥

रामायणमिदं कृत्स्नं शृण्वतः पठतः सदा ।

प्रीयते सततं रामः स हि विष्णुः सनातनः ॥ ११ ९ ॥

जो नित्य इस सम्पूर्ण रामायणका श्रवण एवं पाठ करता है, उसपर सनातन विष्णुस्वरूप भगवान् श्रीराम सदा प्रसन्न रहते हैं ॥ ११ ९ ॥ इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्परामायण आदिकाव्यके

आदिदेवो महाबाहुर्हरिर्नारायणः प्रभुः ।

साक्षाद् रामो रघुश्रेष्ठः शेषो लक्ष्मण उच्यते ॥१२० ॥

साक्षात् आदिदेव महाबाहु पापहारी प्रभु नारायण ही रघुकुलतिलक श्रीराम हैं तथा भगवान् शेष ही लक्ष्मण कहलाते हैं ॥ १२० ॥

एवमेतत् पुरावृत्तमाख्यानं भद्रमस्तु वः ।

प्रव्याहरत विस्रब्धं बलं विष्णोः प्रवर्धताम् ॥ १२१ ॥

( लवकुश कहते हैं- ) श्रोताओ! आपलोगोंका कल्याण हो । यह पूर्वघटित आख्यान ही इस प्रकार रामायण - काव्य के रूपमें वर्णित हुआ है । आपलोग पूर्ण विश्वासके साथ इसका पाठ करें । इससे आपके वैष्णव बलकी वृद्धि होगी ॥ १२१ ॥

देवाश्च सर्वे तुष्यन्ति ग्रहणाच्छ्रवणात् तथा ।

रामायणस्य श्रवणे तृप्यन्ति पितरः सदा ॥ १२२ ॥

रामायणको हृदयमें धारण करने और सुननेसे सब देवता संतुष्ट होते हैं । इसके श्रवणसे पितरोंको भी सदा तृप्ति मिलती है ॥ १२२ ॥

भक्त्या रामस्य ये चेमां संहितामृषिणा कृताम् ।

ये लिखन्तीह च नरास्तेषां वासस्त्रिविष्टपे ॥ १२३ ॥

जो लोग श्रीरामचन्द्रजीमें भक्तिभाव रखकर महर्षि वाल्मीकिनिर्मित इस रामायण - संहिताको लिखते हैं, उनका स्वर्गमें निवास होता है ॥ १२३ ॥

धनधान्यवृद्धि स्त्रियश्च मुख्याः सुखमुत्तमं च । श्रुत्वा शुभं काव्यमिदं महार्थ प्राप्नोति सर्वा भुवि चार्थसिद्धिम् ॥ १२४ ॥

इस शुभ और गम्भीर अर्थसे युक्त काव्यको सुनकर मनुष्यके कुटुम्ब और धन - धान्यकी वृद्धि होती है । उसे श्रेष्ठ गुणवाली सुन्दरी स्त्रियाँ सुलभ होती हैं तथा इस भूतलपर वह अपने सारे मनोरथोंको प्राप्त कर लेता है ॥ १२४ ॥

आयुष्यमारोग्यकरं यशस्यं

सौभ्रातृकं बुद्धिकरं शुभं च ।

श्रोतव्यमेतन्नियमेन सद्भि-राख्यानमोजस्करमृद्धिकामैः ॥ १२५ ॥

यह काव्य आयु, आरोग्य, यश तथा भ्रातृप्रेमको बढ़ाने-वाला है । यह उत्तम बुद्धि प्रदान करनेवाला और मङ्गलकारी है; अतः समृद्धिकी इच्छा रखनेवाले सत्पुरुषोंको इस उत्साह-वर्द्धक इतिहासका नियमपूर्वक श्रवण करना चाहिये ॥ १२५ ॥

युद्धकाण्डेऽष्टाविंशत्यधिकशततमः सर्गः ॥ १२८ ॥

युद्धकाण्डमें एक सौ अट्ठाईसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ १२८ ॥

युद्धकाण्डं सम्पूर्णम्

पृष्ठ 664

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पृष्ठ 665

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वध मालीका द्वारा विष्णुके भगवान्

पृष्ठ 666

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॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः ॥ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम् उत्तरकाण्डम् प्रथमः सर्गः श्रीराम के दरबार में महर्षियोंका आगमन, उनके साथ उनकी बातचीत तथा श्रीरामके प्रश्न

प्राप्तराज्यस्य रामस्य राक्षसानां वधे कृते ।

आजग्मुर्मुनयः सर्वे राघवं प्रतिनन्दितुम् ॥ १ ॥

राक्षसों का संहार करने के अनन्तर जब भगवान् श्रीरामने अपना राज्य प्राप्त कर लिया, तब सम्पूर्ण ऋषि महर्षि श्रीरघुनाथजीका अभिनन्दन करने के लिये अयोध्यापुरी में आये ॥

कौशिकोऽथ यवक्रीतो गाग्यों गालव एव च ।

कण्वो मेधातिथेः पुत्रः पूर्वस्यां दिशि ये श्रिताः ॥ २ ॥

जो मुख्यतः पूर्व दिशामें निवास करते हैं, वे कौशिक, यवक्रीत, गार्ग्य, गालव और मेधातिथिके पुत्र कण्व वहाँ पधारे ॥ २ ॥

स्वस्त्यात्रेयश्च भगवान् नमुचिः प्रमुचिस्तथा ।

अगस्त्योऽत्रिश्च भगवान् सुमुखो विमुखस्तथा ॥ ३ ॥

आजग्मुस्ते सहा गस्त्या ये श्रिता दक्षिणां दिशम् । स्वस्त्यात्रेय, भगवान् नमुचि, प्रमुचि, अगस्त्य, भगवान् अत्रि, सुमुख और विमुख —ये दक्षिण दिशामें रहनेवाले महर्षि अगस्त्य जी के साथ वहाँ आये ॥ ३३ ॥

नृष: कवषो धौम्यः कौशेयश्च महानृषिः ॥ ४ ॥

तेऽप्याजग्मुः सशिष्या वै ये श्रिताः पश्चिमां दिशम् । जो प्रायः पश्चिम दिशाका आश्रय लेकर रहते हैं, वे नृषडु, कवष, धौम्य और महर्षि कौशेय भी अपने शिष्योंके साथ वहाँ आये ॥ ४३ ॥

वसिष्ठः कश्यपोऽथात्रिर्विश्वामित्रः सगौतमः ॥ ५ ॥

जमदग्निर्भरद्वाजस्तेऽपि सप्तर्षयस्तथा ।

उदीच्यां दिशि सप्तैते नित्यमेव निवासिनः ॥ ६ ॥

इसी तरह उत्तर दिशाके नित्य - निवासी वसिष्ठ, कश्यप, अत्रि, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि और भरद्वाज - ये सात ऋषि जो सप्तर्षि कहलाते हैं, अयोध्यापुरी में पधारे ॥ ५-६ ॥

सम्प्राप्यैते महात्मानो राघवस्य निवेशनम् ।

विष्ठिताः प्रतिहारार्थ हुताशनसमप्रभाः ॥ ७ ॥

वेदवेदाङ्गविदुषो नानाशास्त्रविशारदाः । * वसिष्ठमुनि एक शरीरसे अयोध्या में रहते हुए भी दूसरे शरीरसे सप्तर्षिमण्डल में रहते थे । उसी दूसरे शरीर से उनके आनेकी बात यहाँ कही गयी है-- ऐसा समझना चाहिये । ये सभी अग्नि के समान तेजस्वी, वेद - वेदाङ्गों के विद्वान् तथा नाना प्रकार के शास्त्रोंका विचार करनेमें प्रवीण थे । बे महात्मा मुनि श्रीरघुनाथजीके राजभवन के पास पहुँचकर अपने आगमन की सूचना देनेके लिये ड्योढ़ीपर खड़े हो गये ॥७३ ॥

द्वाःस्थं प्रोवाच धर्मात्मा अगस्त्यो मुनिसत्तमः ॥ ८ ॥

निवेद्यतां दाशरथेर्ऋषयो वयमागताः । उस समय धर्मपरायण मुनिश्रेष्ठ अगस्त्यने द्वारपालसे कहा -- ' तुम दशरथनन्दन भगवान् श्रीरामको जाकर सूचना दो कि हम अनेक ऋषि - मुनि आपसे मिलने के लिये आये हैं ' ८३ प्रतीहारस्ततस्तूर्णमगस्त्यवचनाद् द्रुतम् ॥ ९ ॥

समीपं राघवस्याशु प्रविवेश महात्मनः ।

नयेङ्गितज्ञः सद्वृत्तो दक्षो धैर्यसमन्वितः ॥ १० ॥

महर्षि अगस्त्यकी आज्ञा पाकर द्वारपाल तुरंत महात्मा श्रीरघुनाथजी के समीप गया । वह नीतिज्ञ, इशारेसे बातको समझनेवाला, सदाचारी, चतुर और धैर्यवान् था ॥ ९ -१० ॥

स रामं दृश्य सहसा पूर्णचन्द्रसमद्युतिम् ।

अगस्त्यं कथयामास सम्प्राप्तमृषिसत्तमम् ॥ ११ ॥

पूर्ण चन्द्रमाके समान कान्तिमान् श्रीरामका दर्शन करके उसने सहसा बताया- ' प्रभो! मुनिश्रेष्ठ अगस्त्य अनेक ऋषियोंके साथ पधारे हुए हैं ' ॥ ११ ॥

श्रुत्वा प्राप्तान् मुनीस्तांस्तु बालसूर्यसमप्रभान् ।

प्रत्युवाच ततो द्वाःस्थं प्रवेशय यथासुखम् ॥ १२ ॥

प्रातःकालके सूर्य की भाँति दिव्य तेजसे प्रकाशित होनेवाले उन मुनीश्वरोंके पदार्पणका समाचार सुनकर श्रीरामचन्द्रजीने द्वारपालसे कहा-- ' तुम जाकर उन सब लोगों को यहाँ सुखपूर्वक ले आओ ' ॥ १२ ॥

मुस्तांस्तु प्रत्युत्थाय कृताञ्जलिः ।

पाद्यार्थ्यादिभिरानच गां निवेद्य च सादरम् ॥ १३ ॥

( आज्ञा पाकर द्वारपाल गया और सबको साथ ले आया । ) उन मुनीश्वरोंको उपस्थित देख श्रीरामचन्द्रजी हाथ जोड़कर खड़े हो गये । फिर पाद्य - अर्ध्य आदि के द्वारा उनका आदरपूर्वक पूजन किया । पूजनसे पहले उन सबके लिये एक-एक गाय भेंट की ॥ १३ ॥

पृष्ठ 667

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१४५४ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे

रामोऽभिवाद्य प्रयत आसनान्यादिदेश ह ।

तेषु काञ्चनचित्रेषु महत्सु च वरेषु च ॥ १४ ॥

कुशान्तर्धानदत्तेषु मृगचर्मयुतेषु च ।

आसनेष्वृषिपुङ्गवाः ॥ १५ ॥

श्रीरामने शुद्धभावसे उन सबको प्रणाम करके उन्हें बैठनेके लिये आसन दिये । वे आसन सोनेके बने हुए और विचित्र आकार - प्रकार वाले थे । सुन्दर होनेके साथ ही वे विशाल और विस्तृत भी थे । उनपर कुशके आसन रखकर ऊपरसे मृगचर्म बिछाये गये थे । उन आसनोंपर वे श्रेष्ठ मुनि

यथायोग्य बैठ गये । १४-१५ ॥

रामेण कुशलं पृष्टाः सशिष्याः सपुरोगमाः । महर्षयो वेदविदो रामं वचनमब्रुवन् । तब श्रीरामने शिष्यों और गुरुजनोंसहित उन सबका कुशल - समाचार पूछा । उनके पूछनेपर वे वेदवेत्ता महर्षि इस प्रकार बोले -- ॥ १५३ ॥

कुशलं नो महाबाहो सर्वत्र रघुनन्दन ॥ १६ ॥

त्वां तु दिष्ट्या कुशलिनं पश्यामो हतशात्रवम् ।

दिष्ट्या त्वया हतो राजन् रावणो लोकरावणः ॥ १७ ॥

‘ महाबाहु रघुनन्दन! हमारे लिये तो सर्वत्र कुशल - ही-कुशल है । सौभाग्यकी बात है कि हम आपको सकुशल देख रहे हैं और आपके सारे शत्रु मारे जा चुके हैं । राजन्! आपने सम्पूर्णं लोकोंको रुलानेवाले रावणका वध किया, यह सबके लिये बड़े सौभाग्यकी बात है ॥ १६-१७ ॥

नहि भारः स ते राम रावणः पुत्रपौत्रवान् ।

सधनुस्त्वं हि लोकांस्त्रीन् विजयेथा न संशयः ॥ १८ ॥

‘ श्रीराम! पुत्र - पौत्रोंसहित रावण आपके लिये कोई भार जैसे निशाचर आपलोगों के हाथसे मारे गये, यह बड़े आनन्द-की बात है ॥ २१ ॥

यस्य प्रमाणाद् विपुलं प्रमाणं नेह विद्यते ।

दिष्ट्या ते समरे राम कुम्भकर्णो निपातितः ॥ २२ ॥

‘ श्रीराम! शरीरकी ऊँचाई और स्थूलतामें जिससे बढ़कर दूसरा कोई है ही नहीं, उस कुम्भकर्णको भी आपने समराङ्गण-में मार गिराया, यह हमारे लिये परम सौभाग्यकी बात है ॥ २२ ॥

त्रिशिराश्चातिकायश्च देवान्तकनरान्तकौ ।

दिष्ट्या ते निहता राम महावीर्या निशाचराः ॥ २३ ॥

' श्रीराम! त्रिशिरा, अतिकाय, देवान्तक तथा नरान्तक- ये महापराक्रमी निशाचर भी हमारे सौभाग्यसे ही आपके हाथों मारे गये ॥ २३ ॥

कुम्भश्चैव निकुम्भश्च राक्षसो भीमदर्शनी ।

दिष्ट्या तौ निहतौ राम कुम्भकर्णसुतौ मृधे ॥ २४ ॥

‘ रघुवीर! जो देखनेमें भी बड़े भयंकर थे, वे कुम्भकर्ण-के दोनों पुत्र कुम्भ और निकुम्भ नामक राक्षस भी भाग्यवश युद्ध में मारे गये ॥ २४ ॥

युद्धोन्मत्तश्च मत्तश्च कालान्तकयमोपमौ ।

यज्ञकोपश्च बलवान् धूम्राक्षो नाम राक्षसः ॥ २५ ॥

' प्रलयकालके संहारकारी यमराजकी भाँति भयानक युद्धोन्मत्त और मत्त भी कालके गालमें चले गये । बलवान् यज्ञकोप और धूम्राक्ष नामक राक्षस भी यमलोकके अतिथि हो गये ॥ २५ ॥

कुर्वन्तः कदनं घोरमेते शस्त्रास्त्रपारगाः ।

अन्तकप्रतिमैर्वाणैर्दिष्टया विनिहतास्त्वया ॥ २६ ॥

' ये समस्त निशाचर अस्त्र - शस्त्रोंके पारंगत विद्वान् थे नहीं था । आप धनुष लेकर खड़े हो जायँ तो तीनों लोकोंपर इन्होंने जगत् में भयंकर संहार मचा रक्खा था; परंतु आपने विजय पा सकते हैं; इसमें संशय नहीं है ॥ १८ ॥ अन्तकतुल्य बाणोंद्वारा इन सबको मौतके घाट उतार दिया;

दिष्टया त्वया हतो राम रावणो राक्षसेश्वरः । यह कितने हर्षकी बात है ॥ २६ ॥

दिष्ट्या विजयिनं त्वाद्य पश्यामः सह सीतया ॥ १ ९ ॥ दिष्टया त्वं राक्षसेन्द्रेण द्वन्द्वयुद्धमुपागतः । " रघुनन्दन राम! आपने राक्षसराज रावणका वध कर देवतानामवध्येन विजयं प्राप्तवानसि ॥ २७ ॥

दिया और सीताके साथ आप विजयी वीरोंको आज हम सकुशल ' राक्षसराज रावण देवताओंके लिये भी अवध्य था, उसके देख रहे हैं, यह कितने आनन्दकी बात है ॥ १ ९ ॥ साथ आप द्वन्द्वयुद्ध में उतर आये और विजय भी आपको ही लक्ष्मणेन च धर्मात्मन् भ्रात्रा त्वद्धितकारिणा । मिली; यह बड़े सौभाग्य की बात है ॥ २७ ॥

मातृभिर्भ्रातृसहितं पश्यामोऽद्य वयं नृप ॥ २० ॥ संख्ये तस्य न किंचित् तु रावणस्य पराभवः ।

' धर्मात्मा नरेश! आपके भाई लक्ष्मण सदा आपके द्वन्द्वयुद्धमनुप्राप्तो दिष्ट्या ते रावणिर्हतः ॥ २८ ॥

हितमें लगे रहनेवाले हैं । आप इनके, भरत शत्रुघ्नके तथा ' युद्ध में आपके द्वारा जो रावणका पराभव ( संहार ) हुआ, माताओंके साथ अब यहाँ सानन्द विराज रहे हैं और इस रूपमें वह कोई बड़ी बात नहीं है; परंतु द्वन्द्वयुद्ध में लक्ष्मणके द्वारा हमें आपका दर्शन हो रहा है, यह हमारा अहोभाग्य है ॥२० ॥ जो रावणपुत्र इन्द्रजित्का वध हुआ है, वही सबसे बढ़कर

दिष्टया प्रहस्तो विकटो विरूपाक्षो महोदरः । आश्चर्य की बात है ॥ २८ ॥

अकम्पनश्च दुर्धर्षो निहतास्ते निशाचराः ॥ २१ ॥ दिष्ट्या तस्य महाबाहो कालस्येवाभिधावतः ।

‘ प्रहस्त, विकट, विरूपाक्ष, महोदर तथा दुर्धर्ष अकम्पन- मुक्तः सुररिपोर्वीर प्राप्तश्च विजयस्त्वया ॥ २ ९ ॥

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उत्तरकाण्डे द्वितीयः सर्गः १४५५ ' महाबाहुवीर! कालके समान आक्रमण करनेवाले उस देवद्रोही राक्षसके नागपाशसे मुक्त होकर आपने विजय प्राप्त की, यह महान् सौभाग्य की बात है ॥ २ ९ ॥

अभिनन्दाम ते सर्वे संश्रुत्येन्द्रजितो वधम् ।

अवध्यः सर्वभूतानां महामायाधरो युधि ॥ ३० ॥

विस्मयस्त्वेष चास्माकं तं श्रुत्वेन्द्रजितं हतम् । ' इन्द्रजित् के वधका समाचार सुनकर हम सब लोग बहुत प्रसन्न हुए हैं और इसके लिये आपका अभिनन्दन करते हैं । वह महामायावी राक्षस युद्धमें सभी प्राणियोंके लिये अवध्य था । वह इन्द्रजित् भी मारा गया, यह सुनकर हमें अधिक आश्चर्य हुआ है ॥ ३०३ ॥

एते चान्ये च बहवो राक्षसाः कामरूपिणः ॥ ३१ ॥

दिष्टया त्वया हता वीरा रघूणां कुलवर्धन । ' रघुकुलकी वृद्धि करनेवाले श्रीराम! ! ये तथा और भी बहुत - से इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले बीर राक्षस आपके द्वारा मारे गये, यह बड़े आनन्दकी बात है ॥ ३१३ ॥

दत्त्वा पुण्यामिमां वीर सौम्यामभयदक्षिणाम् ॥ ३२ ॥

दिष्टया वर्धसि काकुत्स्थ जयेनामित्रकर्शन । वीर! ककुत्स्थ कुलभूषण! शत्रुसूदन श्रीराम! आप संसारको यह परम पुण्यमय सौम्य अभयदान देकर अपनी विजयके कारण वधाई के पात्र हो गये हैं— निरन्तर बढ़ रहे हैं, यह कितने हर्षकी बात है! ' ॥ ३२३ ॥

श्रुत्वा तु वचनं तेषां मुनीनां भावितात्मनाम् ॥ ३३ ॥

विस्मयं परमं गत्वा रामः प्राञ्जलिरब्रवीत् । उन पवित्रात्मा मुनियोंकी वह बात सुनकर श्रीरामचन्द्रजी-को बड़ा आश्चर्य हुआ । वे हाथ जोड़कर पूछने लगे -३३३ भगवन्तः कुम्भकर्ण रावणं च निशाचरम् ॥ ३४ ॥

अतिक्रम्य महावीर्यौ किं प्रशंसथ रावणिम् । | ' पूज्यपाद महर्षियो! निशाचर रावण तथा कुम्भकर्ण दोनों ही महान् बल - पराक्रम से सम्पन्न थे । उन दोनोंको लाँघ -कर आप रावणपुत्र इन्द्रजित् की ही प्रशंसा क्यों करते हैं? ३४३ महोदरं प्रहस्तं च विरूपाक्षं च राक्षसम् ॥ ३५ ॥

मत्तोन्मत्तौ च दुर्धर्षै देवान्तकनरान्तकौ ।

अतिक्रम्य महावीरान् किं प्रशंसथ रावणिम् ॥ ३६ ॥

' महोदर, प्रहस्त, विरूपाक्ष, मत्त, उन्मत्त तथा दुर्धर्ष वीर देवान्तक और नरान्तक - इन महान् वीरोंका उल्लङ्घन करके आपलोग रावणकुमार इन्द्रजित् की ही प्रशंसा क्यों कर रहे हैं १ ॥ ३५-३६ ॥

अतिकायं त्रिशिरसं धूम्राक्षं च निशाचरम् ।

अतिक्रम्य महावीर्यान् किं प्रशंसथ रावणिम् ॥ ३७ ॥

' अतिकाय, त्रिशिरा तथा निशाचर धूम्राक्ष — इन महा-पराक्रमी वीरोंका अतिक्रमण करके आप रावणपुत्र इन्द्रजित् की ही प्रशंसा क्यों करते हैं? ॥ ३७ ॥

कीदृशो वै प्रभावोऽस्य किं बलं कः पराक्रमः ।

केन वा कारणेनैष रावणादतिरिच्यते ॥ ३८ ॥

' उसका प्रभाव कैसा था? उसमें कौन - सा बल और पराक्रम था? अथवा किस कारणसे यह रावणसे भी बढ़कर सिद्ध होता है ॥ ३८ ॥

शक्यं यदि मया श्रोतुं न खल्वाज्ञापयामि वः ।

यदि गुह्यं न चेद् वक्तुं श्रोतुमिच्छामि कथ्यताम् ॥

' यदि यह मेरे सुनने योग्य हो, गोपनीय न हो तो मैं इसे सुनना चाहता हूँ । आपलोग बतानेकी कृपा करें । यह मेरा विनम्र अनुरोध है । मैं आपलोगोंको आज्ञा नहीं दे रहा हूँ ॥ ३ ९ ॥

शक्रोऽपि विजितस्तेन कथं लब्धवरश्व सः ।

कथं च बलवान् पुत्रो न पिता तस्य रावणः ॥ ४० ॥

' उस रावणपुत्रने इन्द्रको भी किस तरह जीत लिया १ कैसे वरदान प्राप्त किया? पुत्र किस प्रकार महाबलवान् हो गया और उसका पिता रावण क्यों वैसा बलवान् नहीं हुआ १४० कथं पितुञ्चाप्यधिको महाहवे शक्रस्य जेता हि कथं स राक्षसः । वराश्व लब्धाः कथयस्व मे sa पाप्रच्छतश्चास्य मुनीन्द्र सर्वम् ॥ ४१ ॥

' मुनीश्वर! वह राक्षस इन्द्रजित् महासमर में किस तरह पितासे भी अधिक शक्तिशाली एवं इन्द्रपर भी विजय पानेवाला हो गया? तथा किस तरह उसने बहुत - से वर प्राप्त कर लिये? इन सब बातोंको मैं जानना चाहता हूँ, इसलिये बारंबार पूछता हूँ । आज आप ये सारी बातें मुझे बताइये ॥ ४१ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये उत्तरकाण्डे प्रथमः सर्गः ॥ १ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्ड में पहला सर्ग पूरा हुआ ॥ १ ॥

द्वितीयः सर्गः महर्षि अगस्त्य के द्वारा पुलस्त्यके गुण और तपस्याका वर्णन तथा उनसे विश्रवा मुनिकी उत्पत्तिका कथन तस्य तद् वचनं श्रुत्वा राघवस्य महात्मनः । महात्मा रघुनाथजीका वह प्रश्न सुनकर महातेजस्वी 1 कुम्भयोनिर्महातेजा वाक्यमेतदुवाच ह ॥ १ ॥ कुम्भयोनि अगस्त्यने उनसे इस प्रकार कहा ॥ १ ॥

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१४५६ श्रीमद्वाल्मीकीय रामायणे शृणु राम तथा वृत्तं तस्य तेजोवलं महत् । नित्यशस्तास्तु तं देशं गत्वा क्रीडन्ति कन्यकाः ॥ १० ॥

जघान शत्रून् येनासौ न च वध्यः स शत्रुभिः ॥ २ ॥ " वहाँका वन सभी ऋतुओंमें उपभोग में लाने के योग्य

' श्रीराम! इन्द्रजित् के महान् बल और तेजके उद्देश्यसे और रमणीय था, इसलिये वे कन्याएँ प्रतिदिन उस प्रदेशमें जो वृत्तान्त घटित हुआ है, उसे बताता हूँ, सुनो । जिस बल के जाकर भाँति - भाँति की क्रीडाएँ करती थीं ॥ १० ॥

कारण वह तो शत्रुओंको मार गिराता था, परंतु स्वयं किसी देशस्य रमणीयत्वात् पुलस्त्यो यत्र स द्विजः । शत्रुके हाथसे मारा नहीं जाता था उसका परिचय दे रहा हूँ ॥ २ ॥

तावत् ते रावणस्येदं कुलं जन्म च राघव ।

वरप्रदानं च तथा तस्मै दत्तं ब्रवीमि ते ॥ ३ ॥

' रघुनन्दन! इस प्रस्तुत विषयका वर्णन करनेके लिये मैं पहले आपको रावणके कुल, जन्म तथा वरदान प्राप्ति आदिका प्रसङ्ग सुनाता हूँ ॥ ३ ॥

पुरा कृतयुगे राम प्रजापतिसुतः प्रभुः ।

पुलस्त्यो नाम ब्रह्मर्षिः साक्षादिव पितामहः ॥ ४ ॥

' श्रीराम! प्राचीनकाल - -सत्ययुगकी बात है, प्रजापति ब्रह्माजीके एक प्रभावशाली पुत्र हुए, जो ब्रह्मर्षि पुलस्त्य के नामसे प्रसिद्ध हैं । वे साक्षात् ब्रह्माजी के समान ही तेजस्वी हैं ।

नानुकीर्त्या गुणास्तस्य धर्मतः शीलतस्तथा ।

प्रजापतेः पुत्र इति वक्तुं शक्यं हि नामतः ॥ ५ ॥

' उनके गुण, धर्म और शीलका पूरा - पूरा वर्णन नहीं किया जा सकता । उनका इतना ही परिचय देना पर्याप्त होगा कि वे प्रजापतिके पुत्र हैं ॥ ५ ॥

प्रजापतिसुतत्वेन देवानां वल्लभो हि सः ।

इष्टः सर्वस्य लोकस्य गुणैः शुभ्रैर्महामतिः ॥ ६ ॥

' प्रजापति ब्रह्मा के पुत्र होनेके कारण ही देवतालोग उनसे बहुत प्रेम करते हैं । वे बड़े बुद्धिमान् हैं और अपने उज्ज्वल गुणों के कारण ही सब लोगों के प्रिय हैं ॥ ६ ॥

स तु धर्मप्रसङ्गेन मेरोः पार्श्वे महागिरेः ।

तृणबिन्द्वाश्रमं गत्वाप्यवसन्मुनिपुङ्गवः ॥ ७ ॥

' एक बार मुनिवर पुलस्त्य धर्माचरण के प्रसङ्गसे महागिरि मेरुके निकटवर्ती राजर्षि तृणबिन्दुके आश्रम में गये और वहीं रहने लगे ॥ ७ ॥

तपस्तेपे स धर्मात्मा स्वाध्यायनियतेन्द्रियः ।

गत्वाऽऽश्रमपदं तस्य विघ्नं कुर्वन्ति कन्यकाः ॥ ८ ॥

ऋषिपन्नगकन्याश्च राजर्षितनयाश्च याः ।

क्रीडन्त्योऽप्सरसश्चैव तं देशमुपपेदिरे ॥ ९ ॥

' उनका मन सदा धर्ममें ही लगा रहता था । वे इन्द्रियों-को संयममें रखते हुए प्रतिदिन वेदोंका स्वाध्याय करते और तपस्यामें लगे रहते थे । परंतु कुछ कन्याएँ उनके आश्रम में गायन्त्यो वादयन्त्यश्च लासयन्त्यस्तथैव च ॥ ११ ॥

मुनेस्तपखिनस्तस्य विघ्नं चक्रुरनिन्दिताः । ' जहाँ ब्रह्मर्षि पुलस्त्य रहते थे, वह स्थान तो और भी रमणीय था; इसलिये वे सती - साध्वी कन्याएँ प्रतिदिन वहाँ आकर गाती, बजाती तथा नाचती थीं । इस प्रकार उन तपस्वी मुनिके तपमें विघ्न डाला करती थीं ॥ ११३ ॥

अथ रुष्टो महातेजा व्याजहार महामुनिः ॥ १२ ॥

या मे दर्शनमागच्छेत् सा गर्भ धारयिष्यति । " इससे वे महातेजस्वी महामुनि पुलस्त्य कुछ रुष्ट हो गये और बोले -- कलसे जो लड़की यहाँ मेरे दृष्टिपथ में आयेगी, वह निश्चय ही गर्भ धारण कर लेगी ' ॥ १२३ ॥

तास्तु सर्वाः प्रतिश्रुत्य तस्य वाक्यं महात्मनः ॥ १३ ॥

ब्रह्मशापभयाद् भीतास्तं देशं नोपचक्रमुः । ' उन महात्मा की यह बात सुनकर वे सब कन्याएँ ब्रह्म-शापके भयसे डर गयीं और उन्होंने उस स्थानपर आना छोड़ दिया ॥ १३३ ॥

तृणविदोस्तु राजर्षेस्तनया न शृणोति तत् ॥ १४ ॥

गत्वाऽऽश्रमपदं तत्र विचचार सुनिर्भया । ' परंतु राजर्षि तृणबिन्दुकी कन्याने इस शापको नहीं सुना था, इसलिये वह दूसरे दिन भी बेखटके आकर उस आश्रम में विचरने लगी ॥ १४३ ॥

न चापश्यच्च सा तत्र कांचिदभ्यागतां सखीम् ॥ १५ ॥

तस्मिन् काले महातेजाः प्राजापत्यो महानृषिः ।

स्वाध्यायमकरोत् तत्र तपसा भावितः स्वयम् ॥ १६ ॥

" वहाँ उसने अपनी किसी सखीको आयी हुई नहीं देखा । उस समय प्रजापतिके पुत्र महातेजस्वी महर्षि पुलस्त्य अपनी तपस्यासे प्रकाशित हो वहाँ वेदोंका स्वाध्याय कर रहे थे ।

सातु वेदश्रुतिं श्रुत्वा दृष्ट्वा वै तपसो निधिम् ।

अभवत् पाण्डुदेहा सा सुव्यञ्जितशरीरजा ॥ १७ ॥

' उस वेदध्वनिको सुनकर वह कन्या उसी ओर गयी और उसने तपोनिधि पुलस्त्यजीका दर्शन किया । महर्षिकी दृष्टि पड़ते ही उसके शरीरपर पीलापन छा गया और गर्भके लक्षण प्रकट हो गये ॥ १७ ॥

बभूव च समुद्विग्ना दृष्ट्वा तद्दोषमात्मनः ।

स्थिता ॥ १८ ॥

जाकर उनकी तपस्या में विघ्न डालने लगीं । ऋषियों, नागों इदं मे किंत्विति ज्ञात्वा पितुर्गत्वाऽऽश्रमे तथा राजर्षियोंकी कन्याएँ और जो अप्सराएँ हैं, वे भी प्रायः ' अपने शरीर में यह दोष देखकर वह घबरा उठी और करती हुई उनके आश्रमकी ओर आ जाती थीं ॥ ८ - ९ ॥ ' मुझे यह क्या हो गया? ' इस प्रकार चिन्ता करती हुई पिता के

क्रीड़ा रम्यत्वात् काननस्य च । आश्रमपर जाकर खड़ी हुई ॥ १८ ॥

सर्वर्तुषुपभोग्यत्वाद्

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उत्तरकाण्डे द्वितीयः सर्गः १४५७

तां तु दृष्ट्रा तथाभूतां तृणबिन्दुरथाब्रवीत् ।

किं त्वमेतत्सदृशं धारयस्यात्मनो वपुः ॥ १ ९ ॥

‘ अपनी कन्याको उस अवस्थामें देखकर तृणबिन्दुने पूछा -- ' तुम्हारे शरीरकी ऐसी अवस्था कैसे हुई? तुम अपने शरीरको जिस रूपमें धारण कर रही हो, यह तुम्हारे लिये सर्वथा अयोग्य एवं अनुचित है ' ॥ १ ९ ॥

सातु कृत्वाञ्जलिं दीना कन्योवशव तपोधनम् ।

न जाने कारणं तात येन मे रूपमीदृशम् ॥ २० ॥

‘ वह बेचारी कन्या हाथ जोड़कर उन तपोधन मुनिसे बोली- ' पिताजी! मैं उस कारणको नहीं समझ पाती, जिससे मेरा रूप ऐसा हो गया है ॥ २० ॥

किं तु पूर्व गतास्म्येका महर्षेर्भावितात्मनः ।

पुलस्त्यस्याश्रमं दिव्यमन्वेष्टुं खसखीजनम् ॥ २१ ॥

“ अभी थोड़ी देर पहले मैं पवित्र अन्तःकरणवाले महर्षि पुलस्त्य के दिव्य आश्रमपर अपनी सखियोंको खोजने के लिये अकेली गयी थी ॥ २१ ॥

न च पश्याम्यहं तत्र कांचिदभ्यागतां सखीम् ।

रूपस्य तु विपर्यासं दृष्टा त्रासादिहागता ॥ २२ ॥

" वहाँ देखती हूँ तो कोई भी सखी उपस्थित नहीं है । साथ ही मेरा रूप पहलेसे विपरीत अवस्थामें पहुँच गया है; यह सब देखकर मैं भयभीत हो यहाँ आ गयी हूँ ' ॥ २२ ॥

तृणबिन्दुस्तु राजर्षिस्तपसा द्योतितप्रभः ।

ध्यानं विवेश तच्चापि अपश्यदृषिकर्मजम् ॥ २३ ॥

' राज ितृणबिन्दु अपनी तपस्यासे प्रकाशमान थे । उन्होंने ध्यान लगाकर देखा तो ज्ञात हुआ कि यह सब कुछ महर्षि पुलस्त्य के ही करनेसे हुआ है ॥ २३ ॥

स तु विज्ञाय तं शापं महर्षेर्भावितात्मनः ।

गृहीत्वा तनयां गत्वा पुलस्त्यमिदमत्रवीत् ॥ २४ ॥

' उन पवित्रात्मा महर्षिके उस शापको जानकर वे अपनी पुत्रीको साथ लिये पुलस्त्यजीके पास गये और इस प्रकार बोले – ॥ २४ ॥

भगवंस्तनयां मे त्वं गुणैः स्वैरेव भूषिताम् ।

भिक्षां प्रतिगृहाणेमां महर्षे स्वयमुद्यताम् ॥ २५ ॥

“ भगवन्! मेरी यह कन्या अपने गुणोंसे ही विभूषित है । महर्षे! आप इसे स्वयं प्राप्त हुई भिक्षाके रूपमें ग्रहण कर लें ॥ २५ ॥

तपश्चरणयुक्तस्य श्राम्यमाणेन्द्रियस्य ते ।

शुश्रूषणपरा नित्यं भविष्यति न संशयः ॥ २६ ॥

" " आप तपस्या में लगे रहने के कारण थक जाते होंगे; अतः यह सदा साथ रहकर आपकी सेवा - शुश्रूषा किया करेगी, इसमें संशय नहीं है ' || २६ ॥

तं ब्रुवाणं तु तद् वाक्यं राजर्षि धार्मिकं तदा ।

जिघृक्षुरब्रवीत् कन्यां वाढमित्येव स द्विजः ॥ २७ ॥

" ऐसी बात कहते हुए उन धर्मात्मा राजर्षिको देखकर उनकी कन्याको ग्रहण करनेकी इच्छासे उन ब्रह्मर्षिने कहा--' बहुत अच्छा ' ॥ २७ ॥

दत्त्वा तु तनयां राजा स्वमाश्रमपदं गतः ।

सापि तत्रावसत् कन्या तोषयन्ती पतिं गुणैः ॥ २८ ॥

' तब उन महर्षिको अपनी कन्या देकर राजर्षि तृणबिन्दु अपने आश्रमपर लौट आये और वह कन्या अपने गुणोंसे पतिको संतुष्ट करती हुई वहीं रहने लगी ॥ २८ ॥

तस्यास्तु शीलवृत्ताभ्यां तुतोष मुनिपुङ्गवः ।

प्रीतः स तु महातेजा वाक्यमेतदुवाच ह ॥ २ ९ ॥

' उसके शील और सदाचारसे वे महातेजस्वी मुनिवर पुलस्त्य बहुत संतुष्ट हुए और प्रसन्नतापूर्वक बोले -- ॥

परितुष्टोऽस्मि सुश्रोणि गुणानां सम्पदा भृशम् ।

तस्माद् देवि ददाम्यद्य पुत्रमात्मसमं तव ॥ ३० ॥

उभयोर्वेशकर्तारं पौलस्त्य इति विश्रुतम् । “ सुन्दरि! मैं तुम्हारे गुणोंके वैभवसे अत्यन्त प्रसन्न हूँ । देवि! इसीलिये आज मैं तुम्हें अपने समान पुत्र प्रदान करता हूँ, जो माता और पिता दोनोंके कुलकी प्रतिष्ठा बढ़ायेगा और पौलस्त्य नामसे विख्यात होगा ॥ ३०३ ॥

यस्मात् तु विश्रुतो वेदस्त्वयेहाध्ययतो मम ॥ ३१ ॥

तस्मात् स विश्रवा नाम भविष्यति न संशयः । " देवि! मैं यहाँ वेदका स्वाध्याय कर रहा था, उस समय तुमने आकर उसका विशेषरूपसे श्रवण किया, इसलिये तुम्हारा वह पुत्र विश्रवा या विश्रवण कहलायेगा; इसमें संशय नहीं है ' ॥ ३१३ ॥

एवमुक्ता तु सा देवी प्रहृष्टेनान्तरात्मना ॥ ३२ ॥

अचिरेणैव कालेनासूत विश्रवसं सुतम् ।

त्रिषु लोकेषु विख्यातं यशोधर्मसमन्वितम् ॥ ३३ ॥

" पतिके प्रसन्नचित्त होकर ऐसी बात कहनेपर उस देवीने बड़े हर्ष के साथ थोड़े ही समय में विश्रवा नामक पुत्रको जन्म दिया, जो यश और धर्मसे सम्पन्न होकर तीनों लोकोंमें विख्यात हुआ ॥ ३२-३३ ॥

श्रुतिमान् समदर्शी च व्रताचाररतस्तथा ।

पितेव तपसा युक्तो ह्यभवद् विश्रवा मुनिः ॥ ३४ ॥

‘ विश्रवा मुनि वेदके विद्वान्, समदर्शी, व्रत और आचारका पालन करनेवाले तथा पिताके समान ही तपस्वी हुए ' ॥ इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये उत्तरकाण्डे द्वितीयः सर्गः ॥ २ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें दूसरा सर्ग पूरा हुआ ॥ २ ॥

बा ० रा ० ५. ११.३-