Ramayana 2 — पृष्ठ 671–680

वाल्मीकि रामायण — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 671–680

पृष्ठ 671

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१४५८ श्रीमवाल्मीकीय रामायणे तृतीयः सर्गः विश्रवासे वैश्रवण ( कुबेर ) की उत्पत्ति, उनकी तपस्या, वरप्राप्ति तथा लङ्कामें निवास

अथ पुत्रः पुलस्त्यस्य विश्रवा मुनिपुङ्गवः ।

अचिरेणैव कालेन पितेव तपसि स्थितः ॥ १ ॥

पुलस्त्य के पुत्र मुनिवर विश्रवा थोड़े ही समय में पिता की भाँति तपस्या में संलग्न हो गये ॥ १ ॥

सत्यवाञ्शीलवान् दान्तः स्वाध्यायनिरतः शुचिः ।

सर्वभोगेष्वसंसक्तो नित्यं धर्मपरायणः ॥ २ ॥

वे सत्यवादी, शीलवान्, जितेन्द्रिय, स्वाध्यायपरायण, बाहर - भीतरसे पवित्र, सम्पूर्ण भोगों में अनासक्त तथा सदा ही धर्म में तत्पर रहनेवाले थे ॥ २ ॥

ज्ञात्वा तस्य तद् वृत्तं भरद्वाजो महामुनिः ।

ददौ विश्रवसे भार्या स्वसुतां देववर्णिनीम् ॥ ३ ॥

विश्रवाके इस उत्तम आचरणको जानकर महामुनि भरद्वाजने अपनी कन्याका, जो देवाङ्गनाके समान सुन्दरी थी, उनके साथ विवाह कर दिया ॥ ३ ॥

प्रतिगृह्य तु धर्मेण भरद्वाजसुतां तदा ।

प्रजान्वीक्षिका बुद्धा थेयो हास्य विचिन्तयन् ॥ ४ ॥

मुदा परमया युको विश्रवा मुनिपुङ्गवः ।

स तस्यां वीर्यसम्पन्नमपत्यं परमाद्भुतम् ॥ ५ ॥

जनयामास धर्मज्ञः सर्वैर्ब्रह्मगुणैर्वृतम् ।

तस्मिञ्जते तु संहृष्टः स बभूव पितामहः ॥ ६ ॥

धर्मके ज्ञाता मुनिवर विश्रवाने बड़ी प्रसन्नताके साथ धर्मानुसार भरद्वाजकी कन्याका पाणिग्रहण किया और प्रजाका हित - चिन्तन करनेवाली बुद्धिके द्वारा लोककल्याणका विचार करते हुए उन्होंने उसके गर्भ से एक अद्भुत और पराक्रमी पुत्र उत्पन्न किया । उसमें सभी ब्राह्मणोचित गुण विद्यमान थे । उसके जन्मसे पितामह पुलस्त्य मुनिको बड़ी प्रसन्नता हुई ॥

ear श्रेयस्करी बुद्धि धनाध्यक्षो भविष्यति ।

नाम चास्याकरोत् प्रीतः सार्धं देवर्षिभिस्तदा ॥ ७ ॥

उन्होंने दिव्य दृष्टि देखा-- ' इस बालकमें संसार का कल्याण करनेकी बुद्धि है तथा यह आगे चलकर धनाध्यक्ष होगा ' तब उन्होंने बड़े हर्षसे भरकर देवर्षियोंके साथ उसका नामकरण संस्कार किया ॥ ७ ॥

यस्माद् विश्रवसोऽपत्यं सादृश्याद् विश्रवा इव ।

तस्माद् वैश्रवणो नाम भविष्यत्येष विश्रुतः ॥ ८ ॥

R 1 वे बोले— “ विश्रवाका यह पुत्र विश्रवाके ही समान उत्पन्न हुआ है; इसलिये यह वैश्रवण नामसे विख्यात होगा ' ॥

स तु वैश्रवणस्तत्र तपोवनगतस्तदा ।

अवर्धताहुति हुतो महातेजा यथानलः ॥ ९ ॥

कुमार वैश्रवण वहाँ तपोवनमें रहकर उस समय आहुति डालनेसे प्रज्वलित हुई अग्निके समान बढ़ने लगे और महान् तेजसे सम्पन्न हो गये ॥ ९ ॥

तस्याश्रमपदस्थस्य बुद्धिर्जज्ञे महात्मनः ।

चरिष्ये परमं धर्म धर्मो हि परमा गतिः ॥ १० ॥

आश्रममें रहने के कारण उन महात्मा वैश्रवणके मन में भी यह विचार उत्पन्न हुआ कि मैं उत्तम धर्मका आचरण करूँ; क्योंकि धर्म ही परमगति है ॥ १० ॥

स तु वर्षसहस्राणि तपस्तप्त्वा महावने ।

यन्त्रितो नियमैरुयैश्चकार सुमहत्तपः ॥ ११ ॥

यह सोचकर उन्होंने तपस्याका निश्चय करनेके पश्चात् महान् वनके भीतर सहस्रों वर्षोंतक कठोर नियमों से बँधकर बड़ी भारी तपस्या की ॥ ११ ॥

पूर्णे वर्षसहस्रान्ते तं तं विधिमकल्पयत् ।

जलाशी मारुताहारो निराहारस्तथैव च ॥ १२ ॥

एवं वर्षसहस्राणि जग्मुस्तान्येकवर्षवत् । वे एक - एक सहस्र वर्ष पूर्ण होनेपर तपस्याकी नयी - नयी विधि ग्रहण करते थे । पहले तो उन्होंने केवल जलका आहार किया । तत्पश्चात् वे हवा पीकर रहने लगे; फिर आगे चलकर उन्होंने उसका भी त्याग कर दिया और वे एकदम निराहार रहने लगे । इस तरह उन्होंने कई सहस्र वर्षोंको एक वर्ष के समान बिता दिया ॥ १२३ ॥

अथ प्रीतो महातेजाः सेन्द्रः सुरगणैः सह ॥ १३ ॥

tar तस्याश्रमपदं ब्रह्मदं वाक्यमब्रवीत् । ' तब उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर महातेजस्वी ब्रह्माजी इन्द्र आदि देवताओंके साथ उनके आश्रमपर पधारे और इस प्रकार बोले- ॥ १३३ ॥ -परितुष्टोऽस्मि ते वत्स कर्मणानेन सुव्रत ॥ १४ ॥

वरं वृणीष्व भद्रं ते वरार्हस्त्वं महामते ॥ ' उत्तम व्रतका पालन करनेवाले वत्स! मैं तुम्हारे इस कर्म-से - तपस्यासे बहुत संतुष्ट हूँ । महामते! तुम्हारा भला हो । तुम कोई वर माँगो; क्योंकि वर पानेके योग्य हो ' ॥ १४३ ॥

अथाब्रवीद् वैश्रवणः पितामहमुपस्थितम् ॥ १५ ॥

भगवंल्लोकपालत्वमिच्छेयं T लोकरक्षणम् । यह सुनकर वैश्रवणने अपने निकट खड़े हुए पितामहसे कहा- ' भगवन्! मेरा विचार लोककी रक्षा करनेका है, अतः मैं लोकपाल होना चाहता हूँ ' ॥ १५३ ॥

अथाब्रवीद् वैश्रवणं परितुष्टेन चेतसा ॥ १६ ॥

ब्रह्मा सुरगणैः सार्धं वाढमित्येव हृष्टवत् । वैश्रवणकी इस बात से ब्रह्माजी के चित्तको और भी संतोष हुआ । उन्होंने सम्पूर्ण देवताओंके साथ प्रसन्नतापूर्वक कहा-' बहुत अच्छा ' ॥ १६३ ॥

अहं वै लोकपालानां चतुर्थ स्त्रष्टुमुद्यतः ॥ १७ ॥

यमेन्द्रवरुणानां च पदं यत् तव चेप्सितम् ।

पृष्ठ 672

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उत्तरकाण्डे तृतीयः सर्गः १४५ ९ इसके बाद वे फिर बोले- बेटा! मैं चौथे लोकपालकी सृष्टि करनेके लिये उद्यत था । यम, इन्द्र और वरुणको जो पद प्राप्त है, वैसा ही लोकपाल पद तुम्हें भी प्राप्त होगा, जो तुमको अभीष्ट है ॥ १७३ ॥

तद् गच्छ वत धर्मज्ञ निधीशत्वमवाप्नुहि ॥ १८ ॥

शक्राम्बुपयमानां च चतुर्थस्त्वं भविष्यसि । ' धर्मज्ञ! तुम प्रसन्नतापूर्वक उस पदको ग्रहण करो और अक्षय निधियोंके स्वामी बनो । इन्द्र, वरुण और यमके साथ तुम चौथे लोकपाल कहलाओगे ॥ १८३ ॥

एतच्च पुष्पकं नाम विमानं सूर्यसंनिभम् ॥ १ ९ ॥ प्रतिगृह्णीष्व यानार्थ त्रिदशैः समतां व्रज । " यह सूर्य तुल्य तेजस्वी पुष्पक विमान है । इसे अपनी सवारीके लिये ग्रहण करो और देवताओंके समान हो जाओ ॥ ९९ ३ ॥ स्वस्ति तेऽस्तु गमिष्यामः सर्व एव यथागतम् ॥ २० ॥

कृतकृत्या वयं तात दत्त्वा तव वरद्वयम् । ' तात! तुम्हारा कल्याण हो । आये हैं, वैसे लौट जायँगे । तुम्हें ये को कृतकृत्य समझते हैं ' ॥ २०३ ॥

• इत्युक्त्वा स गतो ब्रह्मा स्वस्थानं गतेषु ब्रह्मपूर्वेषु देवेष्वथ धनेशः पितरं प्राह प्राञ्जलिः भगवल्लब्धवानस्मि वरमिष्टं अब हम सब लोग जैसे दो बर देकर हम अपने त्रिदशैः सह ॥ २१ ॥

नभस्तलम् ।

प्रयतात्मवान् ॥ २२ ॥

पितामहात् । ऐसा कहकर ब्रह्माजी देवताओंके साथ अपने स्थानको चले गये । ब्रह्मा आदि देवताओंके आकाशमें चले जानेपर अपने मनको संयम में रखनेवाले धनाध्यक्षने पितासे हाथ जोड़ कर कहा - ' भगवन्! मैंने पितामह ब्रह्माजीसे मनोवाञ्छित फल प्राप्त किया है ॥ २१-२२३ ॥ निवासनं न मे देवो विदधे स प्रजापतिः ॥ २३ ॥

• पश्य भगवन् कंचिन्निवासं साधु मे प्रभो ।

न च पीडा भवेद् यत्र प्राणिनो यस्य कस्यचित् ॥ २४ ॥

' परंतु उन प्रजापतिदेवने मेरे लिये कोई निवास - स्थान नहीं बताया । अतः भगवन्! अब आप ही मेरे रहने के योग्य किसी ऐसे स्थानकी खोज कीजिये, जो सभी दृष्टियोंसे अच्छा हो । प्रभो! वह स्थान ऐसा होना चाहिये, जहाँ रहनेसे किसी भी प्राणीको कष्ट न हो ' ॥ २३-२४ ॥

एवमुक्तस्तु पुत्रेण विश्रवा मुनिपुंगवः ।

वचनं प्राह धर्मज्ञ श्रूयतामिति सत्तम ॥ २५ ॥

दक्षिणस्योदधेस्तीरे त्रिकूटो नाम पर्वतः ।

तस्याग्रे तु विशाला सा महेन्द्रस्य पुरी यथा ॥ २६ ॥

अपने पुत्रके ऐसा कहनेपर मुनिवर विश्रवा बोले— ' धर्मज्ञ! साधुशिरोमणे! सुनो - दक्षिण समुद्र के तटपर एक त्रिकूट नामक पर्बत है | उसके शिखरपर एक विशाल पुरी है, जो देवराज इन्द्रकी अमरावती पुरीके समान शोभा पाती है ॥

लङ्का नाम पुरी रम्या निर्मिता विश्वकर्मणा ।

राक्षसानां निवासार्थं यथेन्द्रस्यामरावती ॥ २७ ॥

' उसका नाम लङ्का है । इन्द्रकी अमरावती के समान उस रमणीय पुरीका निर्माण विश्वकर्माने राक्षसोंके रहने के लिये किया है ॥ २७ ॥

तत्र त्वं वस भद्रं ते लङ्कायां नात्र संशयः ।

हेमप्राकारपरिखा यन्त्रशस्त्रसमावृता ॥ २८ ॥

' बेटा! तुम्हारा कल्याण हो । तुम निःसंदेह उस लङ्का-पुरीमें ही जाकर रहो । उसकी चहारदीवारी सोनेकी बनी हुई है । उसके चारों ओर चौड़ी खाइयाँ खुदी हुई हैं और बह अनेकानेक यन्त्रों तथा शस्त्रोंसे सुरक्षित है ॥ २८ ॥

रमणीया पुरी सा हि रुक्मवैदूर्यतोरणा ।

राक्षसैः सा परित्यक्ता पुरा विष्णुभयार्दितैः ॥ २ ९ ॥

" वह पुरी बड़ी ही रमणीय है । उसके फाटक सोने और नीलमंके बने हुए हैं । पूर्वकालमें भगवान् विष्णुके भवसे पीड़ित हुए राक्षसोंने उस पुरीको त्याग दिया था ॥ २ ९ ॥

शून्या रक्षोगणैः सर्वै रसातलतलं गतैः ।

शून्या सम्प्रति लङ्का सा प्रभुस्तस्या न विद्यते ॥ ३० ॥

' वे समस्त राक्षस रसातलको चले गये थे, इसलिये लङ्कापुरी सूनी हो गयी । इस समय भी लङ्कापुरी सूनी ही है, उसका कोई स्वामी नहीं है ॥ ३० ॥

स त्वं तत्र निवासाय गच्छ पुत्र यथासुखम् ।

निर्दोषस्तत्र ते वासो न बाधस्तत्र कस्यचित् ॥ ३१ ॥

' अतः बेटा! तुम वहाँ निवास करने के लिये सुखपूर्वक

जाओ । वहाँ रहने में किसी प्रकारका दोष या खटका नहीं है ।

वहाँ किसीकी ओरसे कोई विघ्न - बाधा नहीं आ सकती ' ॥३१ ॥

एतच्छ्रुत्वा स धर्मात्मा धर्मिष्ठं वचनं पितुः ।

निवासयामास तदा लङ्कां पर्वतमूर्धनि ॥ ३२ ॥

अपने पिता के इस धर्मयुक्त वचनको सुनकर धर्मात्मा वैश्रवणने त्रिकूट पर्वतके शिखर पर बनी हुई लङ्कापुरीमें निवास किया! ३२ ॥

नैर्ऋतानां सहस्रैस्तु हृष्टैः प्रमुदितैः सदा ।

अचिरेणैव कालेन सम्पूर्णा तस्य शासनात् ॥ ३३ ॥

उनके निवास करनेपर थोड़े ही दिनोंमें वह पुरी सहस्रों हृष्टपुष्ट राक्षसोंसे भर गयी । उनकी आज्ञासे वे राक्षस वहाँ आकर आनन्दपूर्वक रहने लगे ॥ ३३ ॥

स तु तत्रावसत् प्रीतो धर्मात्मा नैर्ऋतर्षभः ।

समुद्रपरिखायां स लङ्कायां विश्रवात्मजः ॥ ३४ ॥

समुद्र जिसके लिये खाईका काम देता था, उस लङ्का-नगरीमें विश्रवाके धर्मात्मा पुत्र वैश्रवण राक्षसोंके राजा हो बड़ी प्रसन्नताके साथ निवास करने लगे ॥ ३४ ॥

काले काले तु धर्मात्मा पुष्पकेण धनेश्वरः ।

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१४६० श्रीमवाल्मीकीय रामायणै अभ्यागच्छद् विनीतात्मा पितरं मातरं च हि ॥ ३५ ॥ गभस्तिभिः सूर्य इवावभासयन्

धर्मात्मा धनेश्वर समय - समयपर पुष्पक विमान के द्वारा पितुः समीपं प्रययौ स वित्तपः ॥ ३६ ॥

आकर अपने माता - पितासे मिल जाया करते थे । उनका हृदय देवता और गन्धर्व उनकी स्तुति करते थे । उनका बड़ा ही विनीत था ॥ ३५ ॥ भव्य भवन अप्सराओंके नृत्य से सुशोभित होता था । वे धन-देवगन्धर्वगणैरभिष्टुत- पति कुबेर अपनी किरणोंसे प्रकाशित होनेवाले सूर्य की भाँति

स सब ओर प्रकाश बिखेरते हुए अपने पिताके समीप गये ॥ ३६ ॥

स्तथाप्सरो नृत्यविभूषितालयः ।

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये उत्तरकाण्डे तृतीयः सर्गः ॥ ३ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के उत्तरकाण्ड में तीसरा सर्ग पूरा हुआ ॥ ३ ॥

चतुर्थः सर्गः राक्षसवंशका वर्णन — हेति, विद्युत्केश और सुकेशकी उत्पत्ति

श्रुत्वागस्त्येरितं वाक्यं रामो विस्मयमागतः ।

कथमासीत् तु लङ्कायां सम्भवो रक्षसां पुरा ॥ १ ॥

अगस्त्यजीकी कही हुई इस बात को सुनकर श्रीरामचन्द्रजी-को बड़ा विस्मय हुआ | उन्होंने मन ही मन सोचा, राक्षसकुल-की उत्पत्ति तो मुनिवर विश्रवा से ही मानी जाती है । यदि उनसे भी पहले लङ्कापुरीमें राक्षस रहते थे तो उनकी उत्पत्ति किस प्रकार हुई थी ॥ १ ॥

ततः शिरः कम्पयित्वा त्रेताग्निसमविग्रहम् ।

तमगस्त्यं मुहुर्दृष्ट्वा स्मयमानोऽभ्यभाषत ॥ २ ॥

इस प्रकार आश्चर्य होने के अनन्तर सिर हिलाकर श्रीराम-चन्द्रजीने त्रिविध अग्नियोंके समान तेजस्वी शरीरवाले अगस्त्यजी की ओर बारंबार देखा और मुस्कराकर पूछा – ॥

भगवन् पूर्वमप्येषा लङ्काऽऽसीत् पिशिताशिनाम् ।

श्रुत्वेदं भगवद्वाक्यं जातो मे विस्मयः परः ॥ ३ ॥

' भगवन्! कुबेर और रावणसे पहले भी यह लङ्कापुरी मांसभक्षी राक्षसोंके अधिकार में थी, यह आपके मुँह से सुनकर मुझे बड़ा विस्मय हुआ है ॥ ३ ॥

पुलस्त्यवंशादुद्भूता राक्षसा इति नः श्रुतम् ।

इदानीमन्यतश्चापि सम्भवः कीर्तितस्त्वया ॥ ४ ॥

' हमने तो यही सुन रखा है कि राक्षसोंकी उत्पत्ति पुलस्त्य-जीके कुलसे हुई है; किंतु इस समय आपने किसी दूसरेके कुलमे भी राक्षसोंके प्रादुर्भावकी बात कही है ॥ ४ ॥

रावणात् कुम्भकर्णाच्च प्रहस्ताद् विकटादपि ।

रावणस्य च पुत्रेभ्यः किं ते बलवत्तराः ॥ ५ ॥

‘ क्या वे पहलेके राक्षस रावण, कुम्भकर्ण, प्रहस्त, विकट तथा रावणपुत्रोंसे भी बढ़कर बलवान् थे? ॥ ५ ॥

एषां पूर्वको ब्रह्मन् किंनामा च बलोत्कटः ।

अपराधं च कं प्राप्य विष्णुना द्राविताः कथम् ॥ ६ ॥

‘ ब्रह्मन्! उनका पूर्वज कौन था और उस उत्कट बल-शाली पुरुषका नाम क्या था? भगवान् विष्णुने उन राक्षसों का कौन - सा अपराध पाकर किस तरह उन्हें लङ्कासे मार भगाया? ॥

एतद् विस्तरतः सर्वे कथयस्व ममानघ ।

कुतूहलमिदं मह्यं नुद भानुर्यथा तमः ॥ ७ ॥

' निष्पाप महर्षे! ये सब बातें आप मुझे विस्तारसे बताइये । इनके लिये मेरे मनमें बड़ा कौतूहल है । जैसे सूर्यदेव अन्धकारको दूर करते हैं, उसी तरह आप मेरे इस कौतूहलका निवारण कीजिये ' ॥ ७ ॥

राघवस्य वचः श्रुत्वा संस्कारालंकृतं शुभम् ।

अथ विस्मयमानस्तमगस्त्यः प्राह राघवम् ॥ ८ ॥

श्रीरघुनाथजीकी वह सुन्दर वाणी पदसंस्कार, वाक्य-संस्कार और अर्थसंस्कारसे अलंकृत थी । उसे सुनकर अगस्त्यजीको यह सोचकर विस्मय हुआ कि ये सर्वज्ञ होकर भी मुझसे अनजानकी भाँति पूछ रहे हैं । तत्पश्चात् उन्होंने श्रीरामसे कहा ॥ ८ ॥

प्रजापतिः पुरा सृष्ट्वा अपः सलिलसम्भवः ।

तासां गोपायने सत्त्वानसृजत् पद्मसम्भवः ॥ ९ ॥

‘ रघुनन्दन! जलसे प्रकट हुए कमलसे उत्पन्न प्रजापति ब्रह्माजीने पूर्वकालमें समुद्रगत जलकी सृष्टि करके उसकी रक्षा के लिये अनेक प्रकारके जल - जन्तुओंको उत्पन्न किया ॥ ९ ॥

ते सत्त्वाः सत्त्वकर्तारं विनीतवदुपस्थिताः ।

किं कुर्म इति भाषन्तः क्षुत्पिपासाभयार्दिताः ॥ १० ॥

‘ वे जन्तु भूख - प्यासके भय से पीड़ित हो ' अब हम क्या करें ' ऐसी बातें करते हुए अपने जन्मदाता ब्रह्माजी के पास विनीतभावसे गये ॥ १० ॥

प्रजापतिस्तु तान् सर्वान् प्रत्याह प्रहसन्निव ।

आभाष्य वाचा यत्नेन रक्षध्वमिति मानद ॥ ११ ॥

“ दूसरोंको मान देनेवाले रघुवीर! उन सबको आया देख प्रजापतिने उन्हें वाणीद्वारा सम्बोधित करके हँसते हुए - से कहा-' जल - जन्तुओ! तुम यत्नपूर्वक इस जलकी रक्षा करो ' ॥११ ॥

रक्षाम इति तत्रान्यैर्यक्षाम इति चापरैः ।

भुङ्क्षिताभुङ्गितैरुक्तस्ततस्तानाह भूतकृत् ॥ १२ ॥

' वे सब जन्तु भूखे - प्यासे थे । उनमें से कुछने कहा—

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उत्तरकाण्डे चतुर्थः सर्गः १४६१ ‘ हम इस जलकी रक्षा करेंगे ' और दूसरेने कहा – ' हम इसका यक्षण ( पूजन ) करेंगे ', तब उन भूतोंकी सृष्टि करनेवाले प्रजापति ने उनसे कहा ॥ १२ ॥

रक्षाम इति यैरुक्तं राक्षसास्ते भवन्तु वः ।

यक्षाम इति यैरुक्तं यक्षा एव भवन्तु वः ॥ १३ ॥

" " तुममें से जिन लोगोंने रक्षा करने की बात कही है, वे राक्षस नामसे प्रसिद्ध हों और जिन्होंने यक्षण ( पूजन ) करना स्वीकार किया है, वे लोग यक्ष नामसे ही विख्यात हों ' ( इस प्रकार वे जीव राक्षस और यक्ष- इन दो जातियोंमें विभक्त हो गये ) ॥ १३ ॥

तत्र हेतिः प्रहेतिश्च भ्रातरौ राक्षसाधिपौ ।

मधुकैटभ संकाश बभूवतुररिंदमौ ॥ १४ ॥

' उन राक्षसोंमें हेति और प्रहेति नामवाले दो भाई थे, जो समस्त राक्षसोंके अधिपति थे । शत्रुओंका दमन करने में समर्थं वे दोनों वीर मधु और कैटभके समान शक्तिशाली थे ।

प्रहेतिर्धार्मिकस्तत्र तपोवनगतस्तदा ।

हेतिर्दारक्रियार्थे तु परं यत्नमथाकरोत् ॥ १५ ॥

" उनमें प्रति धर्मात्मा था अतः वह तत्काल तपोवन में जाकर तपस्या करने लगा । परंतु हेतिने विवाह के लिये बड़ा प्रयत्न किया ॥ १५ ॥

स कालभगिनीं कन्यां भयां नाम महाभयाम् ।

स्वयमेव महामतिः ॥ १६ ॥

" वह अमेय आत्मबल से सम्पन्न और बड़ा बुद्धिमान् था । उसने स्वयं ही याचना करके कालकी कुमारी भगिनी भयाके

साथ विवाह किया । भया बड़ी भयानक थी ॥ १६ ॥

स तस्यां जनयामास हेती राक्षसपुंगवः ।

पुत्रं पुत्र श्रेष्ठ विद्युत्केशमिति श्रुतम् ॥ १७ ॥

' राक्षसराज तिने भयाके गर्भसे एक पुत्रको उत्पन्न किया, जो विद्युत्केशके नामसे प्रसिद्ध था । उसे जन्म देकर हेति पुत्रवानोंमें श्रेष्ठ समझा जाने लगा ॥ १७ ॥

विद्युत्केशो हेतिपुत्रः स दीप्तार्कसमप्रभः ।

व्यवर्धत महातेजास्तोयमध्य इवाम्बुजम् ॥ १८ ॥

' हेति पुत्र विद्युत्केश दीप्तिमान् सूर्यके समान प्रकाशित होता था । वह महातेजस्वी बालक जलमें कमलकी भाँति दिनों-दिन बढ़ने लगा ॥ १८ ॥

स यदा यौवनं भद्रमनुप्राप्तो निशाचरः ।

ततो दारक्रियां तस्य कर्तुं व्यवसितः पिता ॥ १ ९ ॥

' निशाचर विद्युत्केश जब बढ़कर उत्तम युवावस्थाको प्राप्त हुआ, तब उसके पिता राक्षसराज हेतिने अपने पुत्रका ब्याह कर देनेका निश्चय किया ॥ १ ९ ॥

संध्यादुहितरं सोऽथ संध्यातुल्यां प्रभावतः ।

वरयामास पुत्रार्थ हेती राक्षसपुंगवः ॥ २० ॥

‘ राक्षसराजशिरोमणि हेतिने अपने पुत्रको व्याहनेके लिये संध्याकी पुत्रीका, जो प्रभावमें अपनी माता संध्याके ही समान थी, वरण किया ॥ २० ॥

अवश्यमेव दातव्या परस्मै सेति संध्यया ।

चिन्तयित्वा सुता दत्ता विद्युत् केशाय राघव ॥ २१ ॥

' घुनन्दन! संध्याने सोचा- कन्याका किसी दूसरे के साथ व्याह तो अवश्य ही करना पड़ेगा, अतः इसीके साथ क्यों न कर दूँ? ' यह विचारकर उसने अपनी पुत्री विद्युत्केशको ब्याह दी ॥ २१ ॥

संध्यायास्तनयां लब्ध्वा विद्युत्केशो निशाचरः ।

रमते स तया सार्धं पौलोम्या मघवानिव ॥ २२ ॥

' संध्याकी उस पुत्रीको पाकर निशाचर विद्युत्केश उसके साथ उसी तरह रमण करने लगा, जैसे देवराज इन्द्र पुलोम-पुत्री शचीके साथ विहार करते हैं ॥ २२ ॥

केनचित्त्वथ कालेन राम सालकटङ्कटा ।

विद्यत्केशाद् गर्भमाप घनराजिरिवार्णवात् ॥ २३ ॥

' श्रीराम! संध्याकी उस पुत्रीका नाम सालकटङ्कटा था । कुछ कालके पश्चात् उसने विद्युत्केशसे उसी तरह गर्भ धारण किया, जैसे मेघों की पंक्ति समुद्र से जल ग्रहण करती है ॥ २३ ॥

ततः सा राक्षसी गर्भे घनगर्भसमप्रभम् ।

प्रसूता मन्दरं गत्वा गङ्गा गर्भमिवाग्निजम् ।

समुत्सृज्य तु सा गर्भ विद्युत् केशरतार्थिनी ॥ २४ ॥

तदनन्तर उस राक्षसीने मन्दराचलपर जाकर विद्युत् के समान कान्तिमान् बालकको जन्म दिया, मानो गङ्गाने अग्नि के छोड़े हुए भगवान् शिवके तेजःस्वरूप गर्भ ( कुमार कार्तिकेय ) को उत्पन्न किया हो । उस नवजात शिशुको वहीं छोड़कर वह विद्युत्केशके साथ रति - क्रीडाके लिये चली गयी ॥ २४ ॥

रेमे तु सार्धं पतिना विस्मृत्य सुतमात्मजम् ।

उत्सृष्टस्तु तदा गर्भो घनशब्द समखनः ॥ २५ ॥

' अपने बेटेको भुलाकर सालकटङ्कटा पतिके साथ रमण करने लगी । उधर उसका छोड़ा हुआ वह गर्भ मेवकी गम्भीर गर्जना के समान शब्द करने लगा ॥ २५ ॥

तयोत्सृष्टः स तु शिशुः शरदर्कसमद्युतिः ।

निधायास्ये स्वयं मुष्टिं रुरोद शनकैस्तदा ॥ २६ ॥

उसके शरीरकी कान्ति शरत्कालके सूर्य की भाँति उद्भासित होती थी । माताका छोड़ा हुआ वह शिशु स्वयं ही अपनी मुट्ठी मुँह में डालकर धीरे - धीरे रोने लगा ॥ २६ ॥

ततो वृषभमास्थाय पार्वत्या सहितः शिवः ।

वायुमार्गेण गच्छन् वै शुश्राव रुदितखनम् ॥ २७ ॥

' उस समय भगवान् शंकर पार्वतीजीके साथ बैलपर चढ़कर वायुमार्ग ( आकाश ) से जा रहे थे ॥ उन्होंने उस बालक के रोनेकी आवाज सुनी ॥ २७ ॥

अपश्यदुमया सार्धं रुदन्तं राक्षसात्मजम् ।

कारुण्यभावात् पार्वत्या भवस्त्रिपुरसूदनः ॥ २८ ॥

पृष्ठ 675

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१४६२ श्रीमद्द्वाल्मीकीय रामायणे तं राक्षसात्मजं चक्रे मातुरेव वयः समम् । ' सुनकर पार्वतीसहित शिवने उस रोते हुए राक्षस कुमार-की ओर देखा । उसकी दयनीय अवस्था पर दृष्टिपात करके माता पार्वतीके हृदयमें करुणाका स्रोत उमड़ उठा और उनकी प्रेरणा से त्रिपुरसूदन भगवान् शिवने उस राक्षस - बालक-को उसकी माताकी अवस्थाके समान ही नौजवान बना दिया || अमरं चैव तं कृत्वा महादेवोऽक्षरोऽव्ययः ॥ २ ९ ॥ पुरमाकाशगं प्रादात् पार्वत्याः प्रियकाम्यया । " इतना ही नहीं, पार्वतीजीका प्रिय करनेकी इच्छासे अविनाशी एवं निर्विकार भगवान् महादेवने उस बालकको अमर बनाकर उसके रहनेके लिये एक आकाशचारी नगराकार विमान दे दिया ॥ २ ९ ३ ॥ उमयापि वरो दत्तो राक्षसीनां नृपात्मज ॥ ३० ॥

सद्योपलब्धिर्गर्भस्य प्रसूतिः सद्य एव च ।

सद्य एव वयःप्राप्तिं मातुरेव वयः समम् ॥ ३१ ॥

‘ राजकुमार! तत्पश्चात् पार्वतीजीने भी यह वरदान दिया कि आजसे राक्षसियाँ जल्दी ही गर्भ धारण करेंगी; फिर शीघ्र ही उसका प्रसव करेंगी और उनका पैदा किया हुआ बालक तत्काल बढ़कर माताके ही समान अवस्थाका हो जायगा ॥ ३०-३१ ॥ ततः सुकेशो वरदानगर्वितः श्रियं प्रभोः प्राप्य हरस्य पार्श्वतः । चचार सर्वत्र महान् महामतिः खगं पुरं प्राप्य पुरंदरो यथा ॥ ३२ ॥

' विद्युत्केशका वह पुत्र सुकेशके नामसे प्रसिद्ध हुआ । वह बड़ा बुद्धिमान् था । भगवान् शंकरका वरदान पानेसे उसे बड़ा गर्व हुआ और वह उन परमेश्वर के पाससे अद्भुत सम्पत्ति एवं आकाशचारी विमान पाकर देवराज इन्द्रकी भाँति सर्वत्र अबाध गति से विचरने लगा ॥ ३२ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये उत्तरकाण्डे चतुर्थः सर्गः ॥ ४ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें चौथा सर्ग पूरा हुआ ॥ ४ ॥

पञ्चमः सुकेशके पुत्र माल्यवान्, सुमाली

सुकेशं धार्मिकं दृष्ट्रा वरलब्धं च राक्षसम् ।

ग्रामणीर्नाम गन्धर्वो विश्वावसुसमप्रभः ॥ १ ॥

तस्य देववती नाम द्वितीया श्रीरिवात्मजा ।

त्रिषु लोकेषु विख्याता रूपयौवनशालिनी ॥ २ ॥

तां सुकेशाय धर्मात्मा ददौ रक्षः श्रियं यथा । ( अगस्त्यजी कहते हैं -- रघुनन्दन! ) तदनन्तर एक दिन विश्वावमुके समान तेजस्वी ग्रामणी नामक गन्धर्वने राक्षस सुकेशको धर्मात्मा तथा वरप्राप्त वैभवसे सम्पन्न देख अपनी देववती नामक कन्याका उसके साथ ब्याह कर दिया । वह कन्या दूसरी लक्ष्मीके समान दिव्य रूप और यौवनसे सुशोभित एवं तीनों लोकोंमें विख्यात थी । धर्मात्मा ग्रामणीने राक्षसोंकी मूर्तिमती राजलक्ष्मी के समान देववतीका हाथ सुकेशके हाथमें दे दिया ॥ १-२३ ॥ वरदानकृतैश्वर्य सा तं प्राप्य पतिं प्रियम् ॥ ३ ॥

आसीद् देववती तुष्टा धनं प्राप्येव निर्धनः । बरदान में मिले हुए ऐश्वर्यसे सम्पन्न प्रियतम पतिको पाकर देववती बहुत संतुष्ट हुई, मानो किसी निर्धनको धनकी राशि मिल गयी हो ॥ ३३ ॥

स तया सह संयुक्तो रराज रजनीचरः ॥ ४ ॥

अञ्जनादभिनिष्क्रान्तः करेण्वेव महागजः । जैसे अञ्जन नामक दिग्गजसे उत्पन्न कोई महान् गज किसी हथिनी के साथ शोभा पा रहा हो, उसी तरह वह राक्षस गन्धर्व कन्या देववतीकें साथ रहकर अधिक शोभा पाने लगा ॥ सर्गः और मालीकी संतानों का वर्णन ततः काले सुकेशस्तु जनयामास राघव ॥ ५ ॥

त्रीन् पुत्राञ्जनयामास त्रेताग्निसमविग्रहान् । रघुनन्दन! तदनन्तर समय आनेपर सुकेशने देववती के गर्भसे तीन पुत्र उत्पन्न किये, जो तीन अग्नियोंके समान तेजस्वी थे ॥ ५३ ॥

माल्यवन्तं सुमालि च मालिं च बलिनां वरम् ॥ ६ ॥

त्रीस्त्रिनेत्रसमान् पुत्रान् राक्षसान् राक्षसाधिपः । उनके नाम थे - माल्यवान्, सुमाली और माली । माली बलवानोंमें श्रेष्ठ था । वे तीनों त्रिनेत्रधारी महादेवजी के समान शक्तिशाली थे । उन तीनों राक्षसपुत्रों को देखकर राक्षसराज सुकेश बड़ा प्रसन्न हुआ ॥ ६३ ॥

त्रयो लोका इवाव्यग्राः स्थितास्त्रय इवाग्नयः ॥ ७ ॥

यो मन्त्रा इवात्युग्रास्त्रयो घोरा इवामयाः । वे तीनों लोकोंके समान सुस्थिर, तीन अग्नियोंके समान तेजस्वी, तीन मन्त्रों ( शक्तियों अथवा वेदों ) के समान उम्र तथा तीन रोगों के समान अत्यन्त भयंकर थे ॥ ७३ ॥

१. गाईंपत्य, आहवनीय और दक्षिणाग्नि । २. प्रभु - शक्ति, उत्साह - शक्ति तथा मन्त्र - शक्ति - ये तीन शक्तियाँ हैं 1 ३. ऋग्, यजु और सामये तीन वेद हैं । ४. वात, पित्त और कफ इनके प्रकोपसे उत्पन्न होनेवाले तीन प्रकार के रोग हैं ।

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उत्तरकाण्डे पञ्चमः सर्गः १४६३ त्रयः सुकेशस्य सुतास्त्रेताग्निसमतेजसः ॥ ८ ॥

विवृद्धिमगमंस्तत्र व्याधयोपेक्षिता इव । सुकेशके वे तीनों पुत्र त्रिविध अग्नियोंके समान तेजस्वी थे । वे वहाँ उसी तरह बढ़ने लगे, जैसे उपेक्षावश दवा न करनेसे रोग बढ़ते हैं ॥ ८३ ॥

वरप्राप्तिं पितुस्ते तु ज्ञात्वैश्वर्य तपोबलात् ॥ ९ ॥

तपस्तप्तुं गता मेरुं भ्रातरः कृतनिश्चयाः । उन्हें जब यह मालूम हुआ कि हमारे पिताको तपोबलके द्वारा बरदान एवं ऐश्वर्यकी प्राप्ति हुई है, तब वे तीनों भाई तपस्या करने का निश्चय करके मेरुपर्वतपर चले गये ॥ ९ ३ ॥ प्रगृह्य नियमान् घोरान् राक्षसा नृपसत्तम ॥ १० ॥

विचेरुस्ते तपो घोरं सर्वभूतभयावहम् । नृपश्रेष्ठ! वे राक्षस वहाँ भयंकर नियमोंको ग्रहण करके घोर तपस्या करने लगे । उनकी वह तपस्या समस्त प्राणियों को भय देनेवाली थी ॥ १०३ ॥

सत्यार्जवशमोपेतैस्तपोभिर्भुवि दुर्लभैः ॥ ११ ॥

संतापयन्तस्त्रिलोकान् सदेवासुरमानुषान् । सत्य, सरलता एवं शम - दम आदिसे युक्त तपके द्वारा, जो भूतलपर दुर्लभ है, वे देवताओं, असुरों और मनुष्यों-सहित तीनों लोकों को संतप्त करने लगे ॥ ११३ ॥

ततो विभुश्चतुर्वक्त्रो विमानवरमाश्रितः ॥ १२ ॥

सुकेशपुत्रानामन्त्रय वरदोऽस्मीत्यभाषत । तब चार मुखवाले भगवान् ब्रह्मा एक श्रेष्ठ विमानपर बैठकर वहाँ गये और सुकेशके पुत्रोंको सम्बोधित करके बोले -- " मैं तुम्हें वर देनेके लिये आया हूँ ' ॥ १२३ ॥

ब्रह्माणं वरदं ज्ञात्वा सेन्द्रैर्देवगणैर्वृतम् ॥ १३ ॥

ऊचुः प्राञ्जलयः सर्वे वेपमाना इव द्रुमाः । इन्द्र आदि देवताओंसे घिरे हुए वरदायक ब्रह्माजीको आया जान वे सब - के - सब वृक्षोंके समान काँपते हुए हाथ जोड़कर बोले -- ॥ १३३ ॥

तपसाऽऽराधितो देव यदि नो दिशसे वरम् ॥ १४ ॥

अजेयाः शत्रुहन्तारस्तथैव चिरजीविनः ।

प्रभविष्ण्वो भवामेति परस्परमनुव्रताः ॥ १५ ॥

' देव! यदि आप हमारी तपस्या से आराधित एवं संतुष्ट होकर हमें वर देना चाहते हैं तो ऐसी कृपा कीजिये, जिससे हमें कोई परास्त न कर सके । हम शत्रुओंका वध करनेमें समर्थ, चिरजीवी तथा प्रभावशाली हों । साथ ही हमलोगोंमें परस्पर प्रेम बना रहे ' ॥ १४-१५ ॥

एवं भविष्यथेत्युक्त्वा सुकेशतनयान् विभुः ।

स ययौ ब्रह्मलोकाय ब्रह्मा ब्राह्मणवत्सलः ॥ १६ ॥

यह सुनकर ब्रह्माजीने कहा -- " तुम ऐसे ही होओगे ' ।

सुकेशके पुत्रोंसे ऐसा कहकर ब्राह्मणवत्सल ब्रह्माजी ब्रह्मलोक-को चले गये । १६ ॥

वरं लब्ध्वा तु ते सर्वे राम रात्रिचरास्तदा ।

सुरासुरान् प्रबाधन्ते वरदानसुनिर्भयाः ॥ १७ ॥

श्रीराम! वर पाकर वे सब निशाचर उस वरदान से अत्यन्त निर्भय हो देवताओं तथा असुरोंको भी बहुत कष्ट देने लगे ॥ १७ ॥

तैर्बाध्यमानास्त्रिदशाः सर्षिसङ्घाः सचारणाः ।

त्रातारं नाधिगच्छन्ति निरयस्था यथा नराः ॥ १८ ॥

उनके द्वारा सताये जाते हुए देवता, ऋषि - समुदाय और चारण नरकमें पड़े हुए मनुष्यों के समान किसीको अपना रक्षक या सहायक नहीं पाते थे ॥ १८ ॥

अथ ते विश्वकर्माणं शिल्पिनां वरमव्ययम् ।

ऊचुः समेत्य संहृष्टा राक्षसा रघुसत्तम ॥ १ ९ ॥

रघुवंशशिरोमणे । एक दिन शिल्प - कर्मके ज्ञाताओं में श्रेष्ठ अविनाशी विश्वकर्मा के पास जाकर वे राक्षस हर्ष और उत्साह से भरकर बोले -- ॥ १ ९ ॥

ओजस्तेजोबलवतां महतामात्मतेजसा ।

गृहकर्ता भवानेव देवानां हृदयेप्सितम् ॥ २० ॥

अस्माकमपि तावत् त्वं गृहं कुरु महामते ।

हिमवन्तमुपाश्रित्य मेरुं मन्दरमेव वा ॥ २१ ॥

महेश्वरगृहप्रख्यं गृहं नः क्रियतां महत् । ' महामते! जो ओज, बल और तेजसे सम्पन्न होने के कारण महान् हैं, उन देवताओंके लिये आप ही अपनी शक्ति से मनोवाञ्छित भवनका निर्माण करते हैं; अतः हमारे लिये भी आप हिमालय, मेरु अथवा मन्दराचलपर चलकर भगवान् शंकरके दिव्य भवनकी भाँति एक विशाल निवासस्थानका निर्माण कीजिये ' ॥ २०-२१३ ॥ विश्वकर्मा ततस्तेषां राक्षसानां महाभुजः ॥ २२ ॥

निवासं कथयामास शक्रस्येवामरावतीम् । यह सुनकर महाबाहु विश्वकर्माने उन राक्षसोंको एक ऐसे निवासस्थानका पता बताया, जो इन्द्रकी अमरावती को भी लज्जित करनेवाला था ॥ २२३ ॥

दक्षिणस्योदधेस्तीरे त्रिकूटो नाम पर्वतः ॥ २३ ॥

सुवेल इति चाप्यन्यो द्वितीयो राक्षसेश्वरः । ( वे बोले - ) ' राक्षसपतियो! दक्षिण समुद्र के तटपर एक त्रिकूट नामक पर्वत है और दूसरा सुवेल नामसे विख्यात शैल है ॥ २३३ ॥

शिखरे तस्य शैलस्य मध्यमेऽम्बुदसंनिभे ॥ २४ ॥

शकुनैरपि दुष्प्रापे टङ्कच्छिन्न चतुर्दिशि ।

त्रिंशद्योजनविस्तीर्णा शतयोजनमायता ॥ २५ ॥

स्वर्णप्राकारसंवीता हेमतोरणसंवृता ।

मया लङ्केति नगरी शक्राशप्तेन निर्मिता ॥ २६ ॥

' उस त्रिकूट पर्वत के मझले शिखरपर जो हरा - भरा होने के कारण मेघ के समान नीला दिखायी देता है तथा जिसके चारों

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१४६४ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे ओरके आश्रय टाँकीसे काट दिये गये हैं, अतएव जहाँ पक्षियोंके लिये भी पहुँचना कठिन है, मैंने इन्द्रकी आज्ञा से लङ्का नामक नगरीका निर्माण किया है । वह तीस योजन चौड़ी और सौ योजन लंबी है । उसके चारों ओर सोनेकी चहार-दीवारी है और उसमें सोने के ही फाटक लगे हैं ॥ २४-२६ ॥

तस्यां वसत दुर्धर्षा यूयं राक्षसपुंगवाः ।

अमरावती समासाद्य सेन्द्रा इव दिवौकसः ॥ २७ ॥

' दुर्धर्षं राक्षसशिरोमणियो! जैसे इन्द्र आदि देवता अमरावतीपुरीका आश्रय लेकर रहते हैं, उसी प्रकार तुम लोग भी उस लङ्कापुरी में जाकर निवास करो ॥ २७ ॥

लङ्कादुर्ग समासाद्य राक्षसैर्बहुभिर्वृताः ।

भविष्यथ दुराधर्षाः शत्रूणां शत्रुसूदनाः ॥ २८ ॥

' शत्रुसूदन वीरो! लङ्काके दुर्गका आश्रय लेकर बहुत - से राक्षसोंके साथ जब तुम निवास करोगे, उस समय शत्रुओंके लिये तुमपर विजय पाना अत्यन्त कठिन होगा ' ॥ २८ ॥

विश्वकर्मवचः श्रुत्वा ततस्ते राक्षसोत्तमाः ।

सहस्रानुचरा भूत्वा गत्वा तामवसन् पुरीम् ॥ २ ९ ॥

विश्वकर्माकी यह बात सुनकर वे श्रेष्ठ राक्षस सहस्रों अनुचरों के साथ उस पुरीमें जाकर बस गये ॥ २ ९ ॥

दृढप्राकारपरिखां हैमैर्गृहशतैर्वृताम् ।

लङ्कामवाप्य ते हृष्टा न्यवसन् रजनीचराः ॥ ३० ॥

उसकी खाई और चहारदीवारी बड़ी मजबूत बनी थी । सोने के सैकड़ों महल उस नगरीकी शोभा बढ़ा रहे थे । उस लङ्कापुरीमें पहुँचकर वे निशाचर बड़े हर्ष के साथ वहाँ रहने लगे ॥ ३० ॥

एतस्मिन्नेव काले तु यथाकामं च राघव ।

नर्मदा नाम गन्धर्वी बभूव रघुनन्दन ॥ ३१ ॥

तस्याः कन्यात्रयं ह्यासीद्धीश्रीकीर्तिसमद्युति ।

ज्येष्ठ क्रमेण सा तेषां राक्षसानामराक्षसी ॥ ३२ ॥

कन्यास्ताः प्रददौ हृष्टाः पूर्णचन्द्रनिभाननाः । रघुकुलनन्दन श्रीराम! इन्हीं दिनों नर्मदा नामकी एक गन्धर्वी थी । उसके तीन कन्याएँ हुई, जो ह्री, श्री और कीर्ति के समान शोभासम्पन्न थीं । इनकी माता यद्यपि राक्षसी नहीं थी तो भी उसने अपनी रुचि के अनुसार सुकेशके उन तीनों राक्षसजातीय पुत्रोंके साथ अपनी कन्याओंका ज्येष्ठ आदि अवस्थाके अनुसार विवाह कर दिया । वे कन्याएँ

बहुत प्रसन्न थीं । उनके मुख पूर्ण चन्द्रमा के समान मनोहर थे ।

त्रयाणां राक्षसेन्द्राणां तिस्रो गन्धर्वकन्यकाः ॥ ३३ ॥

दत्ता मात्रा महाभागा नक्षत्रे भगदैवते । माता नर्मदाने उत्तराफाल्गुनी नक्षत्रमें उन तीनों महा-ये तीन देवियाँ हैं, जो क्रमशः लज्जा, शोभा - सम्पत्ति और कीर्तिकी अधिष्ठात्री मानी गयी हैं । भाग्यवती गन्धर्व कन्याओंको उन तीनों राक्षसराजों के हाथमें दे दिया ॥ ३३३ ॥

कृतदारास्तु ते राम सुकेशतनयास्तदा ॥ ३४ ॥

चिक्रीडुः सह भार्याभिरप्सरोभिरिवामराः । श्रीराम! जैसे देवता अप्सराओंके साथ क्रीड़ा करते हैं, उसी प्रकार सुकेशके पुत्र विवाह के पश्चात् अपनी उन पत्नियों-के साथ रहकर लौकिक सुखका उपभोग करने लगे ॥३४३ ॥

ततो माल्यवतो भार्या सुन्दरी नाम सुन्दरी ॥ ३५ ॥

स तस्यां जनयामास यदपत्यं निबोध तत् । उनमें माल्यवान् की स्त्रीका नाम सुन्दरी था । वह अपने नामके अनुरूप ही परम सुन्दरी थी । माल्यवान् ने उसके गर्भ से जिन संतानोंको जन्म दिया, उन्हें बता रहा हूँ, सुनिये ॥ वज्रमुष्टिर्विरूपाक्षो दुर्मुखश्चैव राक्षसः ॥ ३६ ॥

सुप्तघ्नो यज्ञकोपश्च मत्तोन्मत्तौ तथैव च ।

अनला चाभवत् कन्या सुन्दर्या राम सुन्दरी ॥ ३७ ॥

वज्रमुष्टि, विरूपाक्ष, राक्षस दुर्मुख, सुप्तघ्न, यज्ञकोप, मत्त और उन्मत्त- ये सात पुत्र थे । श्रीराम! इनके अतिरिक्त सुन्दरीके गर्भ से अनला नामवाली एक सुन्दरी कन्या भी उत्पन्न हुई थी ॥ ३६-३७ ॥

सुमालिनोऽपि भार्याऽऽसीत् पूर्णचन्द्रनिभानना ।

नाम्ना केतुमती राम प्राणेभ्योऽपि गरीयसी ॥ ३८ ॥

सुमालीकी पत्नी भी बड़ी सुन्दरी थी । उसका मुख पूर्ण-चन्द्रमाके समान मनोहर और नाम केतुमती था । सुमालीको वह प्राणोंसे भी अधिक प्रिय श्री ॥ ३८ ॥

सुमाली जनयामास यदपत्यं निशाचरः ।

केतुमत्यां महाराज तन्निबोधानुपूर्वशः ॥ ३ ९ ॥

महाराज! निशाचर सुमालीने केतुमतीके गर्भसे जो संतानें उत्पन्न की थीं, उनका भी क्रमशः परिचय दिया जा जा रहा है, सुनिये ॥ ३ ९ ॥

प्रहस्तो कम्पनश्चैव विकटः कालिकामुखः ।

धूम्राक्षश्चैव दण्डश्च सुपार्श्वश्च महाबलः ॥ ४० ॥

संह्रादिः प्रघसश्चैव भासकर्णश्च राक्षसः ।

राका पुष्पोत्कटा चैव कैक्सी च शुचिस्मिताः ॥ ४१ ॥

कुम्भीनसी च इत्येते सुमालेः प्रसवाः स्मृताः ॥ ४२ ॥

प्रहस्त, अकम्पन विकट, कालिकामुख, धूम्राक्ष, दण्ड, महाबली सुपार्श्व, संहादि, प्रघस तथा राक्षस भासकर्ण — ये सुमालीके पुत्र थे और राका, पुष्पोत्कटा, कैकसी और कुम्भीनसी -- ये चार पवित्र मुस्कानवाली उसकी कन्याएँ थीं । ये सब सुमालीकी संतानें बतायी गयी हैं ॥ ४०-४२ ॥

मालेस्तु वसुदा नाम गन्धर्वी रूपशालिनी ।

भार्यासीत् पद्मपत्राक्षी स्वक्षी यक्षीवरोपमा ॥ ४३ ॥

मालीकी पत्नी गन्धर्व कन्या वसुदा थी, जो अपने रूप-सौन्दर्य से सुशोभित होती थी । उसके नेत्र प्रफुल्ल कमलके

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उत्तरकाण्डे षष्टः सर्गः १४६५ समान विशाल एवं सुन्दर थे । वह श्रेष्ठ यक्ष - पत्नियोंके समान सुन्दरी थी ॥ ४३ ॥

सुमालेरनुजस्तस्यां अपत्यं कथ्यमानं तु प्रभो! घुनन्दन! गर्भसे जो संतति उत्पन्न हूँ; आप सुनिये ॥ ४४ अनलश्चानिलश्चैव एते विभीषणामात्या

जनयामास यत् प्रभो ।

मया त्वं शृणु राघव ॥ ४४ ॥

सुमालीके छोटे भाई मालीने वसुदाके की थी, उसका मैं वर्णन कर रहा ॥

हरः सम्पातिरेव च ।

मालेयास्ते निशाचराः ॥ ४५ ॥

अनल, अनिल, हर और सम्पाति — ये चार निशाचर मालीके ही पुत्र थे, जो इस समय विभीषणके मन्त्री हैं ॥ ४५ ॥

ततस्तु ते राक्षसपुङ्गवास्त्रयो निशाचरैः पुत्रशतैश्च संवृताः । सुरान् सहेन्द्रानृषिनागयक्षान् बबाधिरे तान् बहुवीर्यदर्पिताः ॥ ४६ ॥

माल्यवान् आदि तीनों श्रेष्ठ राक्षस अपने सैकड़ों पुत्रों तथा अन्यान्य निशाचरोंके साथ रहकर अपने बाहुबलके अभिमान से युक्त हो इन्द्र आदि देवताओं, ऋषियों, नागों तथा यक्षोंको पीड़ा देने लगे ॥ ४६ ॥

जगभ्रमन्तोऽनिलवद् दुरासदा मृत्युप्रतिमानतेजसः । वरप्रदानादपि गर्विता भृशं क्रतुक्रियाणां प्रशमंकराः सदा ॥ ४७ ॥

वे वायुकी भाँति सारे संसार में विचरनेवाले थे । युद्धमें उन्हें जीतना बहुत ही कठिन था । वे मृत्युके तुल्य तेजस्वी थे । वरदान मिल जाने से भी उनका घमंड बहुत बढ़ गया था; अतः वे यज्ञादि क्रियाओंका सदा अत्यन्त विनाश किया करते थे ॥ ४७ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकव्ये उत्तरकाण्डे पञ्चमः सर्गः ॥ ५ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्धरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें पाँचवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ५ ॥

षष्ठः सर्गः देवताओंका भगवान् शङ्करकी सलाहसे राक्षसोंके वधके लिये भगवान् विष्णुकी शरण में जाना और उनसे आश्वासन पाकर लौटना, राक्षसोंका देवताओं पर आक्रमण और भगवान् विष्णुका उनकी सहायताके लिये आना

तैर्वध्यमाना देवाश्च ऋषयश्च तपोधनाः ।

भयार्ताः शरणं जग्मुर्देवदेवं महेश्वरम् ॥ १ ॥

( महर्षि अगस्त्य कहते हैं -- रघुनन्दन! ) इन राक्षसोंसे पीड़ित होते हुए देवता तथा तपोधन ऋषि भयसे व्याकुल हो देवाधिदेव महादेवजी की शरण में गये ॥ १ ॥

जगत्सृष्ट्यन्त कर्तारमजमव्यक्तरूपिणम् 1 आधारं सर्वलोकानामाराध्यं परमं गुरुम् ॥ २ ॥

ते समेत्य तु कामारिं त्रिपुरारिं त्रिलोचनम् ।

ऊचुः प्राञ्जलयो देवा भयगद्गदभाषिणः ॥ ३ ॥

जो जगत् की सृष्टि और संहार करनेवाले, अजन्मा, अव्यक्त रूपधारी, सम्पूर्ण जगत् के आधार, आराध्य देव और परम गुरु हैं, उन कामनाशक, त्रिपुरविनाशक, त्रिनेत्रधारी भगवान् शिवके पास जाकर वे सब देवता हाथ जोड़ भयसे गद्गदवाणीमें बोले - ॥ २-३ ॥

सुकेशपुत्रैर्भगवन् पितामहवरोद्धतैः ।

प्रजाध्यक्ष प्रजाः सर्वा बाध्यन्ते रिपुबाधनैः ॥ ४ ॥

' भगवन्! प्रजानाथ! ब्रह्माजी के वरदानसे उन्मत्त हुए सुकेशके पुत्र शत्रुओंको पीड़ा देनेवाले साधनाद्वारा सम्पूर्ण प्रजाको बड़ा कष्ट पहुँचा रहे हैं ॥ ४ ॥

शरण्यान्यशरण्यानि ह्याश्रमाणि कृतानि नः ।

स्वर्गाच्च देवान् प्रच्याव्य स्वर्गे क्रीडन्ति देववत् ॥ ५ ॥

वा ० रा ० ५.११.४-' सबको शरण देने योग्य जो हमारे आश्रम थे, उन्हें उन राक्षसोंने निवासके योग्य नहीं रहने दिया है- उजाड़ डाला है । देवताओंको स्वर्गसे हटाकर वे स्वयं ही वहाँ अधिकार जमाये बैठे हैं और देवताओंकी भाँति स्वर्ग में विहार करते हैं ॥ ५ ॥

अहं विष्णुरहं रुद्रो ब्रह्माहं देवराडहम् ।

अहं यमश्च वरुणश्चन्द्रोऽहं रविरप्यहम् ॥ ६ ॥

इति माली सुमाली च माल्यवांश्चैव राक्षसाः ।

बाधन्ते समरोद्धर्षा ये च तेषां पुरःसराः ॥ ७ ॥

' माली, सुमाली और माल्यवान् ये तीनों राक्षस कहते हैं— ' मैं ही विष्णु हूँ, मैं ही रुद्र हूँ, मैं ही ब्रह्मा हूँ तथा मैं ही देवराज इन्द्र, यमराज, वरुण, चन्द्रमा और सूर्य हूँ इस प्रकार अहंकार प्रकट करते हुए वे रणदुर्जय निशाचर तथा उनके अग्रगामी सैनिक हमें बड़ा कष्ट दे रहे हैं ॥ ६-७ ॥

तन्नो देव भयार्तानामभयं दातुमर्हसि ।

अशिवं वपुरास्थाय जहि वै देवकण्टकान् ॥ ८ ॥

' देव! उनके भयसे हम बहुत घबराये हुए हैं, इसलिये आप हमें अभयदान दीजिये तथा रौद्र रूप धारण करके देवताओंके लिये कण्टक बने हुए उन राक्षसों का संहार कीजिये ' ॥ ८ ॥

इत्युक्तस्तु सुरैः सर्वैः कपर्दी नीललोहितः ।

सुकेशं प्रति सापेक्षः प्राह देवगणान् प्रभुः ॥ ९ ॥

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१४६६ श्रीमदवाल्मीकीय रामायण समस्त देवताओंके ऐसा कहनेपर नील एवं लोहित वर्ण-वाले जटाजूटधारी भगवान् शंकर सुकेशके प्रति घनिष्ठता रखने के कारण उनसे इस प्रकार बोले -- ॥ ९ ॥

अहं तान् न हनिष्यामि ममावध्या हि तेऽसुराः ।

किं तु मन्त्रं प्रदास्यामि यो वै तान् निहनिष्यति ॥ १० ॥

" देवगण! मैंने सुकेशके जीवनकी रक्षा की है । वे असुर सुकेशके ही पुत्र हैं; इसलिये मेरे द्वारा मारे जाने योग्य नहीं हैं । अतः मैं तो उनका वध नहीं करूँगा; परंतु तुम्हें एक ऐसे पुरुषके पास जाने की सलाह दूँगा, जो निश्चय ही उन निशाचरोंका वध करेंगे ॥ १० ॥

एतमेव समुद्योगं पुरस्कृत्य महर्षयः ।

गच्छध्वं शरणं विष्णुं हनिष्यति स तान् प्रभुः ॥ ११ ॥

' देवताओ और महर्षियो! तुम इसी उद्योगको सामने रखकर तत्काल भगवान् विष्णुकी शरण में जाओ । वे प्रभु अवश्य उनका नाश करेंगे ' ॥ ११ ॥

ततस्तु जयशब्देन प्रतिनन्द्य महेश्वरम् ।

विष्णोः समीपमाजग्मुर्निशाचरभयार्दिताः ॥ १२ ॥

यह सुनकर सब देवता जय - जयकार के द्वारा महेश्वरका अभिनन्दन करके उन निशाचरोंके भयसे पीड़ित हो भगवान् विष्णु के समीप आये ॥ १२ ॥

शङ्खचक्रधरं देवं प्रणम्य बहुमान्य च ।

ऊचुः सम्भ्रान्तंवद् वाक्यं सुकेशतनयान् प्रति ॥ १३ ॥

शङ्ख, चक्र धारण करनेवाले उन नारायणदेवको नमस्कार करके देवताओंने उनके प्रति बहुत अधिक सम्मानका भाव प्रकट किया और सुकेशके पुत्रोंके विषयमें बड़ी घबराहटके साथ इस प्रकार कहा- ॥ १३ ॥

सुकेशतनयैर्देव त्रिभिस्त्रेताग्निसंनिभैः ।

आक्रम्य वरदानेन स्थानान्यपहृतानि नः ॥ १४ ॥

' देव! सुकेशके तीन पुत्र त्रिविध अग्नियोंके तुल्य तेजस्वी हैं । उन्होंने वरदानके बलसे आक्रमण करके हमारे स्थान छीन लिये हैं ॥ १४ ॥

लङ्का नाम पुरी दुर्गा त्रिकूटशिखरे स्थिता ।

तत्र स्थिताः प्रबाधन्ते सर्वान् नः क्षणदाचराः ॥ १५ ॥

' अपने चक्रसे उनका कमलोपम मस्तक काटकर आप यमराजको भेंट कर दीजिये । आपके सिवा दूसरा कोई ऐसा नहीं है, जो इस भयके अवसरपर हमें अभय दान दे सके ॥ १७ ॥

राक्षसान् समरे हृष्टान् सानुबन्धान् मदोद्धतान् ।

नुद त्वं नो भयं देव नीहारमिव भास्करः ॥ १८ ॥

" देव! वे राक्षस मदसे मतवाले हो रहे हैं । हमें कष्ट देकर हर्षसे फूले नहीं समाते हैं; अतः आप समराङ्गणमें सगे-सम्बन्धियों सहित उनका वध करके हमारे भयको उसी तरह दूर कर दीजिये, जैसे सूर्य देव कुहरे को नष्ट कर देते हैं ' ॥ १८ ॥

इत्येवं दैवतैरुतो देवदेवो जनार्दनः ।

अभयं भयदोऽरीणां दत्त्वा देवानुवाच ह ॥ १ ९ ॥

देवताओंके ऐसा कहनेपर शत्रुओंको भय देनेवाले देवाधिदेव भगवान् जनार्दन उन्हें अभय दान देकर बोले - ॥ १ ९ ॥

सुकेशं राक्षसं जाने ईशानवरदर्पितम् ।

' तांश्चास्य तनयाञ्जने येषां ज्येष्ठः स माल्यवान् ॥ २० ॥

तानहं समतिक्रान्तमर्यादान् राक्षसाधमान् ।

निहनिष्यामि संक्रुद्धः सुरा भवत विज्वराः ॥ २१ ॥

" देवताओ! मैं सुकेश नामक राक्षसको जानता हूँ । वह भगवान् शङ्करका वर पाकर अभिमान से उन्मत्त हो उठा है । इसके उन पुत्रों को भी जानता हूँ, जिनमें माल्यवान् सबसे बड़ा है । वे नीच राक्षस धर्मकी मर्यादाका उल्लङ्घन कर रहे हैं, अतः मैं क्रोधपूर्वक उनका विनाश करूँगा । तुमलोग निश्चिन्त हो जाओ ' ॥ २०-२१ ॥

इत्युक्तास्ते सुराः सर्वे विष्णुना प्रभविष्णुना ।

यथावासं ययुर्हृष्टाः प्रशंसन्तो जनार्दनम् ॥ २२ ॥

सब कुछ करने में समर्थ भगवान् विष्णुके इस प्रकार आश्वासन देने पर देवताओंको बड़ा हर्ष हुआ । वे उन जनार्दन की भूरि - भूरि प्रशंसा करते हुए अपने - अपने स्थानको चले गये ॥ २२ ॥

विबुधानां समुद्योगं माल्यवांस्तु निशाचरः ।

श्रुत्वा तौ भ्रातरौ वीराविदं वचनमब्रवीत् ॥ २३ ॥

' त्रिकूट पर्वत के शिखर पर जो लङ्का नामवाली दुर्गम देवताओं के इस उद्योगका समाचार सुनकर निशाचर नगरी है, वहीं रहकर वे निशाचर हम सभी देवताओंको क्लेश माल्यवान् ने अपने दोनों वीर भाइयोंसे इस प्रकार कहा —२३

पहुँचाते रहते हैं ॥ १५ ॥ अमरा ऋषयश्चैव संगम्य किल शङ्करम् ।

अस्मद्वधं परीप्सन्त इदं वचनमब्रुवन् ॥ २४ ॥

स त्वमस्मद्धितार्थाय जहि तान् मधुसूदन । शरणं त्वां वयं प्राप्ता गतिर्भव सुरेश्वर ॥ १६ ॥ " सुनने में आया है कि देवता और ऋषि मिलकर

' मधुसूदन! आप हमारा हित करनेके लिये उन हमलोगों का वध करना चाहते हैं । इसके लिये उन्होंने भगवान् असुरोंका वध करें । देवेश्वर! हम आपकी शरण में आये हैं । शङ्करके पास जाकर यह बात कही || २४ ॥

आप हमारे आश्रयदाता हों ॥ १६ ॥ देव वरदानबलोद्धताः ।

निवेदय यमाय 1 बाधन्ते ऽस्मान् समुद्द्द्दप्ता घोररूपाः पदे पदे ॥ २५ ॥

चक्रकूत्तास्यकमलान् येष्वभयदोऽस्माकं नान्योऽस्ति भवता विना ॥ १७ ॥ “ देव! सुकेशके पुत्र आपके वरदानके बलसे उद्दण्ड

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उत्तरका डे षष्ठः सर्गः १४६७ और अभिमानसे उन्मत्त हो उठे हैं । वे भयंकर राक्षस पग-पगपर हमलोगों को सता रहे हैं ॥ २५ ॥

राक्षसैरभिभूताः स्मो न शक्ताः स्म प्रजापते ।

स्वेषु सद्मसु संस्थातुं भयात् तेषां दुरात्मनाम् ॥ २६ ॥

‘ “ प्रजानाथ! राक्षसोंसे पराजित होकर हम उन दुष्टों के भयसे अपने घरोंमें नहीं रहने पाते हैं ॥ २६ ॥

तदस्माकं हितार्थाय जहि तांश्च त्रिलोचन ।

राक्षसान हुंकृतेनैव दह प्रदहतां वर ॥ २७ ॥

“ त्रिलोचन! आप हमारे हितके लिये उन असुरोंका वध कीजिये । दाहकों में श्रेष्ट रुद्रदेव! आप अपने हुंकारसे ही राक्षसोंको जलाकर भस्म कर दीजिये ॥ २७ ॥

इत्येवं त्रिदशैरुक्तो निशम्यान्धकसूदनः ।

शिरः करं च धुन्वान इदं वचनमब्रवीत् ॥ २८ ॥

‘ देवताओंके ऐसा कहनेपर अन्धकशत्रु भगवान् शिवने अस्वीकृति सूचित करनेके लिये अपने सिर और हाथको हिलाते हुए इस प्रकार कहा - ॥ २८ ॥

अवध्या मम ते देवाः सुकेशतनया रणे ।

मन्त्रं तु वः प्रदास्यामि यस्तान् वै निहनिष्यति ॥ २ ९ ॥

“ देवताओ! सुकेश के पुत्र रणभूमिमें मेरे हाथसे मारे जाने योग्य नहीं है, परंतु मैं तुम्हें ऐसे पुरुषके पास जानेकी सलाह दूँगा, जो निश्चय ही उन सबका वध कर डालेंगे ॥ २ ९ ॥

योऽसौ चक्रगदापाणिः पीतवासा जनार्दनः ।

हरिर्नारायणः श्रीमाञ्शरणं तं प्रपद्यथ ॥ ३० ॥

“ जिनके हाथमें चक्र और गदा सुशोभित है, जो पीताम्बर धारण करते हैं, जिन्हें जनार्दन और हरि कहते हैं तथा जो श्रीमान् नारायणके नामसे विख्यात हैं, उन्हीं भगवान् की शरण-में तुम सब लोग जाओ ' ॥ ३० ॥

हरादवाप्य ते मन्त्रं कामारिमभिवाद्य च ।

नारायणालयं प्राप्य तस्मै सर्व न्यवेदयन् ॥ ३१ ॥

' भगवान् शङ्करसे यह सलाह पाकर उन कामदाहक महादेवजीको प्रणाम करके देवता नारायण के धाममें जा पहुँचे और वहाँ उन्होंने उनसे सब बातें बतायीं ॥ ३१ ॥

ततो नारायणेनोक्ता देवा इन्द्रपुरोगमाः ।

सुरारींस्तान् हनिष्यामि सुराभवत निर्भयाः ॥ ३२ ॥

' तब उन नारायणदेवने इन्द्र आदि देवताओंसे कहा-" देवगण! मैं उन देवद्रोहियों का नाश कर डालूँगा, अतः तुम लोग निर्भय हो जाओ ' ॥ ३२ ॥

देवानां भयभीतानां हरिणा राक्षसर्षभौ ।

प्रतिज्ञातो वधोऽस्माकं चिन्त्यतां यदिह क्षमम् ॥ ३३ ॥

' राक्षसशिरोमणियो! इस प्रकार भयभीत देवताओंके समक्ष श्रीहरिने हमें मारने की प्रतिज्ञा की है; अतः अब इस विषयमें हमलोगोंके लिये जो उचित कर्तव्य हो, उसका विचार करना चाहिये ॥ ३३ ॥

हिरण्यकशिपोर्मृत्युरन्येषां च सुरद्विषाम् ।

नमुचिः कालनेमिश्च संहृादो वीरसत्तमः ॥ ३४ ॥

राधेयो बहुमायीच लोकपालोऽथ धार्मिकः ।

यमलार्जुनौ च हार्दिक्यः शुम्भश्चैव निशुम्भकः ॥ ३५ ॥

असुरा दानवाश्चैव सत्त्ववन्तो महाबलाः ।

सर्वे समरमासाद्य न श्रूयन्तेऽपराजिताः ॥ ३६ ॥

हिरण्यकशिपु ' तथा अन्य देवद्रोही दैत्योंकी मृत्यु इन्हीं विष्णुके हाथसे हुई है । नमुचि, कालनेमि, वीर शिरोमणि संहृाद, नाना प्रकारकी माया जाननेवाला राधेय, धर्मनिष्ठ लोकपाल, यमल - अर्जुन, हार्दिक्य, शुम्भ और निशुम्भ आदि महाबली शक्तिशाली समस्त असुर और दानव समरभूमि में भगवान् विष्णुका सामना करके पराजित न हुए हों, ऐसा नहीं सुना जाता ॥ ३४-३६ ॥

सर्वैः क्रतुशतैरिष्टं सर्वे मायाविदस्तथा ।

सर्वे सर्वास्त्रकुशलाः सर्वे शत्रुभयंकराः ॥ ३७ ॥

' उन सभी असुरोंने सैकड़ों यज्ञ किये थे । वे सब - के - सब माया जानते थे । सभी सम्पूर्ण अस्त्रोंमें कुशलं तथा शत्रुओंके लिये भयंकर थे || ३७ ॥ नारायणेन निहताः शतशोऽथ सहस्रशः ।

एतज्ज्ञात्वा तु सर्वेषां क्षमं कर्तुमिहार्हथ ।

दुःखं नारायणं जेतुं यो नो हन्तुमिहेच्छति ॥ ३८ ॥

" ऐसे सैकड़ों और हजारों असुरोंको नारायणदेवने मौत के घाट उतार दिया है । इस बातको जानकर हम सबके लिये जो उचित कर्तव्य हो, वही करना चाहिये । जो नारायणदेव हमारा वध करना चाहते हैं, उन्हें जीतना अत्यन्त दुष्कर कार्य ' है ' ॥ ३८ ॥

ततः सुमाली माली च श्रुत्वा माल्यवतो वचः ।

ऊचतुर्भ्रातरं ज्येष्ठमश्विनाविव वासवम् ॥ ३ ९ ॥

माल्यवान की यह बात सुनकर सुमाली और माली अपने उस बड़े भाईसे उसी प्रकार बोले, जैसे दोनों अश्विनीकुमार देवराज इन्द्र से वार्तालाप कर रहे हों ॥ ३ ९ ॥

स्वधीतं दत्तमिष्टं च ऐश्वर्य परिपालितम् ।

आयुर्निरामयं प्राप्तं सुधर्मः स्थापितः पथि ॥ ४० ॥

वे बोले - राक्षसराज! हमलोगोंने स्वाध्याय, दान और यज्ञ किये हैं । ऐश्वर्यकी रक्षा तथा उसका उपभोग भी किया है । हमें रोग - व्याधि से रहित आयु प्राप्त हुई है और हमने कर्तव्य मार्ग में उत्तम धर्मकी स्थापना की है ॥ ४० ॥

देवसागरमक्षोभ्यं शस्त्रैः समवगाह्य च ।

जिता द्विषो ह्यप्रतिमास्तन्नो मृत्युकृतं भयम् ॥ ४१ ॥

" यही नहीं, हमने अपने शस्त्रोंके बलसे देवसेनारूपी अगाध समुद्र में प्रवेश करके ऐसे - ऐसे शत्रुओं पर विजय पायी है, जो वीरतामें अपना सानी नहीं रखते थे; अतः हमें मृत्युसे कोई भय नहीं है ॥ ४१ ॥