श्रीगणेशाय नमः।

वाल्मीकि रामायण — खण्ड २ — पृष्ठ 681–690

वाल्मीकि रामायण — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 681–690

पृष्ठ 681

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१४६८ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे

नारायणश्च रुद्रश्च शक्रश्चापि यमस्तथा ।

अस्माकं प्रमुखे स्थातुं सर्वे विभ्यति सर्वदा ॥ ४२ ॥

' नारायण, रुद्र, इन्द्र तथा यमराज ही क्यों न हों, सभी सदा हमारे सामने खड़े होने में डरते हैं ॥ ४२ ॥

विष्णोद्वेषस्य नास्त्येव कारणं राक्षसेश्वर ।

देवानामेव दोषेण विष्णोः प्रचलितं मनः ॥ ४३ ॥

' राक्षसेश्वर! विष्णुके मनमें भी हमारे प्रति द्वेषका कोई कारण तो नहीं है । ( क्योंकि हमने उनका कोई अपराध नहीं किया है ) केवल देवताओंके चुगली खानेसे उनका मन हमारी ओरसे फिर गया है ॥ ४३ ॥

तस्मादद्यैव सहिताः सर्वेऽन्योन्यसमावृताः ।

देवानेव जिघांसामो येभ्यो दोषः समुत्थितः ॥ ४४ ॥

‘ इसलिये हम सब लोग एकत्र हो एक दूसरेकी रक्षा करते हुए साथ - साथ चलें और आज ही देवताओंका वध कर डालने की चेष्टा करें, जिनके कारण यह उपद्रव खड़ा हुआ है ' ॥

एवं सम्मन्त्र्य बलिनः सर्वसैन्यसमावृताः ।

उद्योगं घोषयित्वा तु सर्वे नैर्ऋतपुंगवाः ॥ ४५ ॥

युद्धाय निर्ययुः क्रुद्धा जम्मवृत्रादयो यथा । ऐसा निश्चय करके उन सभी महाबली राक्षसपतियोंने युद्ध के लिये अपने उद्योगकी घोषणा कर दी और समूची सेना साथ ले जम्भ एवं वृत्र आदि की भाँति कुपित हो वे युद्धके लिये निकले || ४५३ ॥ इति ते राम सम्मन्य सर्वोद्योगेन राक्षसाः ॥ ४६ ॥

युद्धाय निर्ययुः सर्वे महाकाया महाबलाः । श्रीराम! पूर्वोक्त मन्त्रणा करके उन सभी महाबली विशालकाय राक्षसोंने पूरी तैयारी की और युद्धके लिये कूच कर दिया || ४६३ ॥ स्यन्दनैर्वाणैश्चैव हयैश्च करिसंनिभैः ॥ ४७ ॥

खरैर्गोभिरथोष्ट्रेश्व शिशुमारैर्भुजंगमैः ।

मकरैः कच्छपैमीने विहगैर्गरुडोपमैः ॥ ४८ ॥

सिंहव्याघ्रैर्वराहैश्च सृमरैश्वमरैरपि ।

त्यक्त्वा लङ्कां गताः सर्वे राक्षसा बलगर्विताः ॥ ४ ९ ॥

प्रयाता देवलोकाय योद्धुं दैवतशत्रवः । अपने बलका घमंड रखनेवाले वे समस्त देव द्रोही राक्षस रथ, हाथी, हाथी जैसे घोड़े, गदहे, बैल, ऊँट, शिशुमार, सर्प, मगर, कछुआ, मत्स्य, गरुड़ - तुल्य पक्षी, सिंह, बाघ, सूअर, मृग और नीलगाय आदि वाहनोंपर सवार हो लङ्का छोड़कर युद्धके लिये देवलोककी ओर चल दिये ॥ लङ्काविपर्ययं दृष्ट्रा यानि लङ्कालयान्यथ ॥ ५० ॥

भूतानि भयदर्शीनि विमनस्कानि सर्वशः । लङ्कामें रहनेवाले जो प्राणी अथवा ग्रामदेवता आदि थे, वे सब अपशकुन आदिके द्वारा लङ्काके भावी विध्वंसको देखकर भयका अनुभव करते हुए मन - ही - मन खिन्न हो उठे ॥ रथोत्तमैरुह्यमानाः शतशोऽथ सहस्रशः ॥ ५१ ॥

प्रयाता राक्षसास्तूर्ण देवलोकं प्रयत्नतः ।

रक्षसामेव मार्गेण दैवतान्यपचक्रमुः ॥ ५२ ॥

उत्तम रथोंपर बैठे हुए सैकड़ों और हजारों राक्षस तुरत ही प्रयत्नपूर्वक देवलोककी ओर बढ़ने लगे । उस नगर के देवता राक्षसोंके मार्ग से ही पुरी छोड़कर निकल गये ॥५१-५२ ॥

भौमाश्चैवान्तरिक्षाच कालाक्षता भयावहाः ।

उत्पाता राक्षसेन्द्राणामभावाय समुत्थिताः ॥ ५३ ॥

उस समय कालकी प्रेरणासे पृथ्वी और आकाश में अनेक भयंकर उत्पात प्रकट होने लगे, जो राक्षसोंके विनाशकी सूचना दे रहे थे ॥ ५३ ॥

अस्थीनि मेघा ववृपुरुष्णं शोणितमेव च ।

वेलां समुद्राश्रोत्रा तालुश्चाप्यथ भूधराः ॥ ५४ ॥

बादल गरम - गरम रक्त और हड्डियोंकी वर्षा करने लगे, समुद्र अपनी सीमाका उल्लङ्घन करके आगे बढ़ गये और पर्वत हिलने लगे ॥ ५४ ॥

अट्टहासान् विमुञ्चन्तो घननादसमस्वनाः ।

वाश्यन्त्यश्च शिवास्तत्र दारुणं घोरदर्शनाः ॥ ५५ ॥

मेघ के समान गम्भीर ध्वनि करनेवाले प्राणी विकट अट्टहास करने लगे और भयकर दिखायी देनेवाली गीदड़ियाँ कठोर आवाजमें चीत्कार करने लगीं ॥ ५५ ॥

सम्पतन्त्यथ भूतानि दृश्यन्ते च यथाक्रमम् ।

गृधचकं महच्चात्र प्रज्वालोद्वारिभिर्मुखैः ॥ ५६ ॥

रक्षोगणस्योपरिष्टात् परिभ्रमति कालवत् । पृथ्वी आदि भूत क्रमशः गिरते - विलीन होते से दिखायी देने लगे, गीधोंका विशाल समूह मुखसे आगकी ज्वाला उगलता हुआ राक्षसोंके ऊपर कालके समान मडराने लगा ॥ कपोता रक्तपादाश्च सारिका विद्रुता ययुः ॥ ५७ ॥

काका वारयन्ति तत्रैव विडाला वै द्विपादयः । कबूतर, तोते और मैने लङ्का छोड़कर भाग चले । कौए

वहीं काँव - काँव करने लगे । बिल्लियाँ भी वहां गुर्राने लगीं ।

तथा हाथी आदि पशु आर्तनाद करने लगे ॥ ५७३ ॥

उत्पातांस्ताननादृत्य राक्षसा बलदर्पिताः ॥ ५८ ॥

यान्त्येव न निवर्तन्ते मृत्युपाशावपाशिताः । राक्षस बलके घमंड मतवाले हो रहे थे । वे कालके पाश में बंध चुके थे । इसलिये उन उत्पातोंकी अवहेलना करके युद्ध के लिये चलते ही गये, लौटे नहीं ॥ ५८३ ॥

माल्यवांश्च सुमाली च माली च सुमहाबलः ॥ ५ ९ ॥ पुरासरा राक्षसानां ज्वलिता इव पावकाः । माल्यवान्, सुमाली और महाबली माली - ये तीनों प्रज्वलित अग्निके समान तेजस्वी शरीरसे समस्त राक्षसोंके आगे - आगे चल रहे थे ॥ ५ ९ ३ ॥ माल्यवन्तं तु ते सर्वे माल्यवन्तमिवाचलम् ॥ ६० ॥

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उत्तरकाण्डे सप्तमः सर्गः १४६ ९ निशाचरा आश्रयन्ति धातारमिव देवताः । जैसे देवता ब्रह्माजीका आश्रय लेते हैं, उसी प्रकार उन सब निशाचरोंने माल्यवान् पर्वत के समान अविचल माल्यवान्-का ही आश्रय ले रक्खा था । ६०३ ॥ तद् वलं राक्षसेन्द्राणां महाभ्रघननादितम् ॥ ६१ ॥

जयेप्सया देवलोकं ययौ मालिवशे स्थितम् । राक्षसोंकी वह सेना महान् मेघोंकी गर्जना के समान कोलाहल करती हुई विजय पानेकी इच्छासे देवलोककी ओर बढ़ती जा रही थी । उस समय वह सेनापति मालीके नियन्त्रण-में थी । ६१३ ॥ राक्षसानां समुद्योगं तं तु नारायणः प्रभुः ॥ ६२ ॥

देवदूतादुपश्रुत्य चक्रे युद्धे तदा मनः । देवताओंके दूतसे राक्षसोंके उस युद्धविषयक उद्योगकी बात सुनकर भगवान् नारायणने भी युद्ध करनेका विचार किया ॥ ६२३ ॥

स सज्जायुधतूणीरो वैनतेयोपरि स्थितः ॥ ६३ ॥

आसाद्य कवचं दिव्यं सहस्रार्कसमद्युति । वे सहस्रों सूर्य के समान दीप्तिमान् दिव्य कवच धारण करके बाणोंसे भरा तरकस लिये गरुड़ पर सवार हुए ॥ ६३३ ॥

आवद्ध्य शरसम्पूर्ण इषुधी चिमले तदा ॥ ६४ ॥

श्रोणिसूत्रं च खङ्गं च त्रिमलं कमलेक्षणः । इसके अतिरिक्त भी उन्होंने सायकोंसे पूर्ण दो चमचमाते हुए तूणीर बाँध रक्खे थे । उन कमलनयन श्रीहरिने अपनी कमर में पट्टी बाँधकर उसमें चमकती हुई तलवार भी लटका

ली थी । ६४३ ॥

शङ्खचक्रगदाशाङ्गखांश्चैव वरायुधान् ॥ ६५ ॥

सुपर्ण गिरिसंकाशं वैनतेयमथास्थितः ।

राक्षसानामभावाय ययौ तूर्णतरं प्रभुः ॥ ६६ ॥

इस प्रकार शङ्ख, चक्र, गदा, शार्ङ्गधनुष और खड्ग आदि उत्तम आयुधों को धारण किये सुन्दर पंखवाले पर्वताकार गरुड़पर आरूढ़ हो वे प्रभु उन राक्षसों का संहार करने के लिये तुरंत चल दिये ॥ ६५-६६ ॥

सुपर्णपृष्ठे स बभौ श्यामः पीताम्बरो हरिः ।

काञ्चनस्य गिरेः शृङ्गे सतडित्तोयदो यथा ॥ ६७ ॥

गरुड़की पीठ पर बैठे हुए वे पीताम्बरधारी श्यामसुन्दर श्रीहरि सुवर्णमय मेरुपर्वत के शिखरपर स्थित हुए विद्युत्सहित मेघ के समान शोभा पा रहे थे ॥ ६७ ॥

स सिद्धदेवर्षिमहोरगैश्च गन्धर्वयक्षैरुपगीयमानः 1 समाससादासुरसैन्यशत्रु-चक्रासिशायुधशङ्खपाणिः ॥ ६८ ॥

उस समय सिद्ध, देवर्षि, बड़े - बड़े नाग, गन्धर्व और यक्ष उनके गुण गा रहे थे । असुरोंकी सेनाके शत्रु वे श्रीहरि हाथमें शङ्ख, चक्र, खड्ग और शार्ङ्गधनुष लिये सहसा वहाँ आ पहुँचे ॥ ६८ ॥

सुपर्णपक्षानिलनुन्नपक्षं भ्रमत्पताकं प्रचिकीर्णशस्त्रम् । चचाल तद्राक्षसराज सैन्यं चलोपलं नीलमिवाचलाग्रम् ॥ ६ ९ ॥ गरुड़ के पंखोंकी तीव्र वायुके झोंके खाकर वह सेना क्षुब्ध हो उठी । सैनिकोंके रथों की पताकाएँ चक्कर खाने लगीं और सबके हाथोंसे अस्त्र - शस्त्र गिर गये । इस प्रकार राक्षसराज माल्यवान् की समूची सेना काँपने लगी । उसे देखकर ऐसा जान पड़ता था, मानो पर्वतका नील शिखर अपनी शिलाओंको बिखेरता हुआ हिल रहा हो ॥ ६ ९ ॥ ततः शितैः शोणितमांसरूषितै-युगान्तवैश्वानरतुल्यविग्रहैः । निशाचराः सम्परिवार्य माधवं वरायुधैर्निर्बिभिदुः सहस्रशः ॥ ७० ॥

राक्षसों के उत्तम अस्त्र - शस्त्र तीखे, रक्त और मांसमें सने हुए तथा प्रलयकालीन अग्निके समान दीप्तिमान् थे 1 । उनके द्वारा वे सहस्रों निशाचर भगवान् लक्ष्मीपतिको चारों ओर से घेरकर उनपर चोट करने लगे ॥ ७० ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये उत्तरकाण्डे षष्ठः सर्गः ॥ ६ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें छठा सर्ग पूरा हुआ ॥ ६ ॥

4 सप्तमः सर्गः भगवान् विष्णुद्वारा राक्षसोंका संहार और पलायन

नारायणगिरिं ते तु गर्जन्तो राक्षसाम्बुदाः ।

वर्षेणेवाद्रिमम्बुदाः ॥ १ ॥

( अगस्त्यजी कहते हैं— रघुनन्दन! ) जैसे बादल जलकी वर्षा किसी पर्वतको आल्पावित करते हैं, उसी प्रकार गर्जना करते हुए वे राक्षसरूपी मेत्र अस्त्ररूपी जलकी वर्षासे नारायण-रूपी पर्वतको पीड़ित करने लगे ॥ १ ॥

श्यामावदातस्तै र्विष्णुनीलैर्नचरोत्तमैः 1 वृतोऽञ्जन गिरीवायं वर्षमाणैः पयोधरैः ॥ २ ॥

भगवान् विष्णुका श्रीविग्रह उज्ज्वल श्यामवर्णसे सुशोभित था और अस्त्र - शस्त्रोंकी वर्षा करते हुए वे श्रेष्ठ निशाचर नीले रंगके दिखायी देते थे; इसलिये ऐसा जान पड़ता था, मानो

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१४७० श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे अञ्जनगिरिको चारों ओर से घेरकर मेघ उसपर जलकी धारा बरसा रहे हों ॥ २ ॥

शलभा इव केदारं मशका इव पावकम् ।

यथामृतघटं दंशा मकरा इव चार्णत्रम् ॥ ३ ॥

तथा रक्षोधनुमुक्ता वज्रानिलमनोजवाः ।

हरिं विशन्ति स्म शरा लोका इव विपर्यये ॥ ४ ॥

जैसे टिड्डीदल धान आदिके खेतोंमें, पतिंगे आगमें, डंक मारनेवाली मक्खियाँ मधुसे भरे हुए घड़े में और मगर समुद्रमें घुस जाते हैं, उसी प्रकार राक्षसोंके धनुषसे छूटे हुए वज्र, वायु तथा मनक्त्रे समान वेगवाले बाण भगवान् विष्णुके शरीर में प्रवेश करके इस प्रकार लीन हो जाते थे, जैसे प्रलय-कालमें समस्त लोक उन्होंमें प्रवेश कर जाते हैं ॥ ३-४ ॥

स्यन्दनैः स्यन्दनगता गजैश्च गजमूर्धगाः ।

अश्वारोहास्तथाश्वैश्च पादाताश्चाम्बरे स्थिताः ॥ ५ ॥

रथपर बैठे हुए योद्धा रथोंसहित, हाथीसवार हाथियोंके साथ, घुड़सवार घोड़ोंसहित तथा पैदल पाँव - पया दे ही आकाशमें खड़े थे ॥ ५ ॥

राक्षसेन्द्रा गिरिनिभाः शरैः शक्त्यष्टितोमरैः ।

निरुच्छ्वासं हरिं चक्रुः प्राणायाम इव द्विजम् ॥ ६ ॥

उन राक्षसराजोंके शरीर पर्वतके समान विशाल थे । उन्होंने सब ओरसे शक्ति, ऋष्टि, तोमर और बाणोंकी वर्षा करके भगवान् विष्णुका साँस लेना बंद कर दिया । ठीक उसी तरह, जैसे प्राणायाम द्विजके श्वासको रोक देते हैं ॥ ६ ॥

निशाचरैस्ताड्यमानो मीनैरिव महोदधिः ।

शार्ङ्गमायम्य दुर्धर्षो राक्षसेभ्योऽसृजच्छरान् ॥ ७ ॥

जैसे मछली महासागरपर प्रहार करे, उसी तरह वे निशाचर अपने अस्त्र - शस्त्रोंद्वारा श्रीहरिपर चोट करते थे । उस समय दुर्जय देवता भगवान् विष्णुने अपने शार्ङ्ग -धनुषको खींचकर राक्षसोंपर बाण बरसाना आरम्भ किया ॥ ७ ॥

शरैः पूर्णायतोत्सृष्टैर्वज्रकल्पैर्मनोजवैः ।

चिच्छेद विष्णुर्निशितैः शतशोऽथ सहस्रशः ॥ ८ ॥

वे बाण धनुषको पूर्णरूपसे खींचकर छोड़े गये थे; अतः वज्रके समान असह्य और मनके समान वेगवान् थे । उन पैने बाणोंद्वारा भगवान् विष्णुने सैकड़ों और हजारों निशाचरों-के टुकड़े - टुकड़े कर डाले ॥ ८ ॥

विद्राव्य शरवर्षेण वर्ष वायुरिवोत्थितम् ।

पाञ्चजन्यं महाशङ्खं प्रदध्मौ पुरुषोत्तमः ॥ ९ ॥

जैसे हवा उमड़ी हुई बदली एवं वर्षाको उड़ा देती है, उसी प्रकार अपनी बाणवर्षासे राक्षसोंको भगाकर पुरुषोत्तम श्रीहरिने अपने पाञ्चजन्य नामक महान् शङ्खको बजाया ॥ ९ ॥

सोऽम्बुजो हरिणा ध्मातः सर्वप्राणेन शङ्खराट् ।

ररास भीमनिर्ह्रादत्रैलोक्यं व्यथयन्निव ॥ १० ॥

सम्पूर्ण प्राणशक्तिसे श्रीहरिके द्वारा बजाया गया वह जल-जनित शङ्खराज भयंकर आवाजसे तीनों लोकोंको व्यथित करता हुआ - सा गूँजने लगा ॥ १० ॥

शङ्खराजरवः सोऽथ त्रासयामास राक्षसान् ।

मृगराज इवारण्ये समदानिव कुञ्जरान् ॥ ११ ॥

जैसे वनमें दहाड़ता हुआ सिंह मतवाले हाथियोंको भयभीत कर देता है, उसी प्रकार उस शङ्कराजकी ध्वनिने समस्त राक्षसोंको भय और घबराहटमें डाल दिया ॥ ११ ॥

न शेकुरश्वाः संस्थातुं विमदाः कुञ्जराऽभवन् ।

स्यन्दनेभ्यश्च्युता वीराः शङ्खरावितदुर्बलाः ॥ १२ ॥

वह शङ्ख - ध्वनि सुनकर शक्ति और साहससे हीन हुए घोड़े युद्धभूमिमें खड़े न रह सके, हाथियोंके मद उतर गये और वीर सैनिक रथोंसे नीचे गिर पड़े ॥ १२ ॥

शार्ङ्गचापविनिर्मुक्ता वज्रतुल्याननाः शराः ।

विदार्य तानि रक्षांसि सुपुङ्खा विविशुः क्षितिम् ॥ १३ ॥

सुन्दर पंखवाले उन बाणोंके मुखभाग वज्रके समान कठोर थे । वे शार्ङ्ग धनुषसे छूटकर राक्षसोंको विदीर्ण करते हुए पृथ्वी में घुस जाते थे ॥ १३ ॥

भिद्यमानाः शरैः संख्ये नारायणकरच्युतैः ।

निपेत् राक्षसा भूमौ शैला वज्रहता इव ॥ १४ ॥

संग्रामभूमिमें भगवान् विष्णुके हाथसे छूटे हुए उन बार्णोद्वारा छिन्न - भिन्न हुए निशाचर वज्रके मारे हुए पर्वतों की भाँति धराशायी होने लगे ॥ १४ ॥

व्रणानि परगात्रेभ्यो विष्णुचक्रकृतानि हि ।

असृक् क्षरन्ति धाराभिः स्वर्णधारा इवाचलाः ॥ १५ ॥

श्रीहरिके चक्र के आघातसे शत्रुओंके शरीरोंमें जो घाव हो गये थे, उनसे उसी तरह रक्तकी धारा बह रही थी, मानो पर्वतोंसे गेरुमिश्रित जलका झरना गिर रहा हो ॥ १५ ॥

शङ्खराजरवश्चापि शार्ङ्गचापरवस्तथा ।

राक्षसानां रवांश्चापि ग्रसते वैष्णवो रवः ॥ १६ ॥

शङ्खराजकी ध्वनि, शार्ङ्ग - धनुषकी टंकार तथा भगवान् विष्णुकी गर्जना – इन सबके तुमुल नादने राक्षसोंके कोलाहल -को दबा दिया ॥ १६ ॥

तेषां शिरोधरान् धूताञ्छरध्वजधनूंषि च ।

रथान् पताकास्तूणीरांश्चिच्छेद स हरिः शरैः ॥ १७ ॥

भगवान्ने राक्षसोंके काँपते हुए मस्तकों, बाणों, ध्वजाओं, धनुषों, रथों, पताकाओं और तरकसों को अपने बाणोंसे काट डाला ॥ १७ ॥

सूर्यादिव करा घोरा वार्योघा इव सागरात् ।

पर्वतादिव नागेन्द्रा धारौघा इव चाम्बुदान् ॥ १८ ॥

तथा शार्ङ्गविनिर्मुक्ताः शरा नारायणेरिताः ।

निर्धावन्तीषवस्तूर्ण शतशोऽथ सहस्रशः ॥ १ ९ ॥

जैसे सूर्य से भयंकर किरणें, समुद्रसे जलके प्रवाह, पर्वतसे बड़े - बड़े सर्प और मेघसे जलकी धाराएँ प्रकट होती हैं, उसी

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उत्तरकाण्डे सप्तमः सर्गः १४७१ प्रकार भगवान् नारायणके चलाये और शार्ङ्गधनुषसे छूटे हुए सैकड़ों और हजारों बाण तत्काल इधर - उधर दौड़ने लगे ॥ १८-१९ ॥

शरभेण यथा सिंहाः सिंहेन द्विरदा यथा ।

द्विरदेन यथा व्याघ्रा व्याघ्रेण द्वीपिनो यथा ॥ २० ॥

द्वीपिनेव यथा श्वानः शुना मार्जारको यथा ।

मार्जारेण यथा सर्पाः सर्पेण च यथाखवः ॥ २१ ॥

तथा ते राक्षसाः सर्वे विष्णुना प्रभविष्णुना ।

द्रवन्ति द्राविताश्चान्ये शायिताश्च महीतले ॥ २२ ॥

जैसे शरभसे सिंह, सिंहसे हाथी, हाथीसे बाघ, बाघसे चीते, चीतेसे कुत्ते, कुत्तेसे बिलाव, बिलावसे साँप और साँपसे चूहे डरकर भागते हैं, उसी प्रकार वे सब राक्षस प्रभावशाली भगवान् विष्णुकी मार खाकर भागने लगे । उनके भगाये हुए बहुत - से राक्षस धराशायी हो गये । २०-२२ ॥

राक्षसानां सहस्राणि निहत्य मधुसूदनः ।

वारिजं पूरयामास तोयदं सुरराडिव ॥ २३ ॥

सहस्रों राक्षसों का वध करके भगवान् मधुसूदनने अपने शङ्ख पाञ्चजन्यको उसी तरह गम्भीर ध्वनिसे पूर्ण किया, जैसे देवराज इन्द्र मेघको जलसे भर देते हैं ॥ २३ ॥

नारायणशरत्रस्तं शङ्खनादसुविह्वलम् ।

यो लङ्कामभिमुखं प्रभग्नं राक्षसं बलम् ॥ २४ ॥

भगवान् नारायण के बाणोंसे भयभीत और शङ्खनादसे व्याकुल हुई राक्षस - सेना लङ्काकी ओर भाग चली ॥ २४ ॥

प्रभग्ने राक्षसवले नारायणशराहते ।

सुमाली शरवर्षेण निववार रणे हरिम् ॥ २५ ॥

नारायणके सायकोंसे आहत हुई राक्षससेना जब भागने लगी, तब सुमालीने रणभूमिमें बाणोंकी वर्षा करके उन श्रीहरिको आगे बढ़ने से रोका ॥ २५ ॥

स तु तं छादयामास नीहार इव भास्करम् ।

राक्षसाः सत्त्वसम्पन्नाः पुनधैर्यं समादधुः ॥ २६ ॥

जैसे कुहरा सूर्यदेवको ढक लेता है, उसी तरह सुमालीने बाणोंसे भगवान् विष्णुको आच्छादित कर दिया । यह देख शक्तिशाली राक्षमोंने पुनः धैर्य धारण किया ॥ २६ ॥

अथ सोऽभ्यपतद् रोषाद् राक्षसो बलदर्पितः ।

महानादं प्रकुर्वाणो राक्षसाञ्जीवयन्निव ॥ २७ ॥

उस बलाभिमानी निशाचरने बड़े जोरसे गर्जना करके राक्षसों में नूतन जीवन का संचार करते हुए - से रोषपूर्वक आक्रमण किया ॥ २७ ॥

उत्क्षिप्य लम्बाभरणं धुन्वन् करमिव द्विपः ।

ररास राक्षसो हर्षात् सतडित्तोयदो यथा ॥ २८ ॥

जैसे हाथी सूँड़को उठाकर हिलाता हो, उसी तरह लटकते आभूषण से युक्त हाथको ऊपर उठाकर हिलाता हुआ वह राक्षस विद्युत्सहित सजल जलधरके समान बड़े हर्ष से गर्जना करने लगा ॥ २८ ॥

सुमालेर्नर्दतस्तस्य शिरो ज्वलितकुण्डलम् ।

चिच्छेद यन्तुरश्वाश्च भ्रान्तास्तस्य तु रक्षसः ॥ २ ९ ॥

तब भगवान् ने अपने बाणोंद्वारा गर्जते हुए सुमालीके सारथिका जगमगाते हुए कुण्डलोंसे मण्डित मस्तक काट डाला । इससे उस राक्षसके घोड़े बेलगाम होकर चारों ओर चक्कर काटने लगे ॥ २ ९ ॥

तैरश्वैर्भ्राम्यते भ्रान्तैः सुमाली राक्षसेश्वरः ।

इन्द्रियाश्वैः परिभ्रान्तैर्धृतिहीनो यथा नरः ॥ ३० ॥

उन घोड़ोंके चक्कर काटने से उनके साथ ही राक्षसराज सुमाली भी चक्कर काटने लगा । ठीक उसी तरह, जैसे अजितेन्द्रिय मनुष्य विषयोंमें भटकनेवाली इन्द्रियोंके साथ - साथ स्वयं भी भटकता फिरता है ॥ ३० ॥

ततो विष्णुं महाबाहुं प्रपतन्तं रणाजिरे ।

हृते सुमारश्वैश्च रथे विष्णुरथं प्रति ॥ ३१ ॥

माली चाभ्यद्रवद् युक्तः प्रगृह्य सशरं धनुः । जब घोड़े रणभूमिमें सुमालीके रथको इधर - उधर लेकर भागने लगे, तब माली नामक राक्षसने युद्धके लिये उद्यत हो धनुष लेकर गरुड़की ओर धावा किया । राक्षसोंपर टूटते हुए महाबाहु विष्णुपर आक्रमण किया ॥ ३१३ ॥

मालेर्धनुश्च्युता वाणाः कार्तस्वरविभूषिताः ॥ ३२ ॥

विविशुर्हरिमासाद्य क्रौञ्चं पत्ररथा इव । मालीके धनुषसे छूटे हुए सुवर्णभूषित बाण भगवान् विष्णु के शरीर में उसी तरह घुसने लगे, जैसे पक्षी क्रौञ्चपर्वतके छिद्रमें प्रवेश करते हैं ॥ ३२३ ॥

अर्धमानः शरैः सोऽथ मालिमुक्तैः सहस्रशः ॥ ३३ ॥

चुक्षुभे न रणे विष्णुर्जितेन्द्रिय इवाधिभिः । जैसे जितेन्द्रिय पुरुष मानसिक व्यथाओंसे विचलित नहीं होता, उसी प्रकार रणभूमिमें भगवान् विष्णु मालीके छोड़े हुए सहस्रों बाणोंसे पीड़ित होनेपर भी क्षुब्ध नहीं हुए ॥ ३३३ ॥

अथ मौर्वीस्वनं श्रुत्वा भगवान् भूतभावनः ॥ ३४ ॥

मालिनं प्रति वाणौघान् ससर्जासिगदाधरः । तदनन्तर खड्ग और गदा धारण करनेवाले भूतभावन भगवान् विष्णुने अपने धनुषकी टङ्कार करके मालीके ऊपर बाण समूहोंकी वर्षा आरम्भ कर दी ॥ ३४३ ॥

ते मालिदेहमासाद्य वज्रविद्युत्प्रभाः शराः ॥ ३५ ॥

पिबन्ति रुधिरं तस्य नागा इव सुधारसम् । वज्र और बिजली के समान प्रकाशित होनेवाले वे बाण मालीके शरीर में घुसकर उसका रक्त पीने लगे, मानो सर्प अमृत-रसका पान कर रहे हों ॥ ३५३ ॥

मालिनं विमुखं कृत्वा शङ्खचक्रगदाधरः ॥ ३६ ॥

पृष्ठ 685

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१४७२ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे मालिमौलिं ध्वजं चापं वाजिनश्चाप्यपातयत् । अन्तमें मालीको पीठ दिखाने के लिये विवश करके शङ्ख, चक्र और गदा धारण करनेवाले भगवान् श्रीहरिने उस राक्षसके मुकुट, ध्वज और धनुषको काटकर घोड़ोंको भी मार गिराया ॥ ३६३ ॥

विरथस्तु गदां गृह्य माली नक्तंचरोत्तमः ॥ ३७ ॥

आपुप्लुवे गदापाणिर्गिर्यग्रादिव केसरी । रथहीन हो जानेपर राक्षसप्रवर माली गदा हाथमें लेकर कूद पड़ा, मानो कोई सिंह पर्वतके शिखरसे छलाँग मारकर नीचे आ गया हो || ३७३ ॥ गदया गरुडेशानमीशानमिव चान्तकः ॥ ३८ ॥

ललाटदेशेऽभ्यहनद् वज्रेणेन्द्रो यथाचलम् । जैसे यमराजने भगवान् शिवपर गदाका और इन्द्रने पर्वत-पर वज्रका प्रहार किया हो, उसी तरह मालीने पक्षिराज गरुड़ के ललाटमें अपनी गदाद्वारा गहरी चोट पहुँचायी ॥ ३८३ ॥

गदयाभिहतस्तेन मालिना गरुडो भृशम् ॥ ३ ९ ॥ रणात् पराङ्मुखं देवं कृतवान् वेदनातुरः । मालीकी गदासे अत्यन्त आहत हुए गरुड़ वेदनासे व्याकुल हो उठे । उन्होंने स्वयं युद्धसे विमुख होकर भगवान् विष्णुको भी विमुख- सा कर दिया ॥ ३ ९ ३ ॥ पराङ्मुखो कृते देवे मालिना गरुडेन वै ॥ ४० ॥

उदतिष्ठन्महाशब्दो रक्षसामभिनर्दताम् । मालीने गरुड़के साथ ही जब भगवान् विष्णुको भी युद्धसे विमुख - सा कर दिया, तब वहाँ जोर - जोरसे गर्जते हुए राक्षसों का महान् शब्द गूँज उठा ॥ ४०३ ॥

रक्षसां रुवतां रावं श्रुत्वा हरिहयानुजः ॥ ४१ ॥

तिर्यगास्थाय संक्रुद्धः पक्षीशे भगवान् हरिः ।

पराङ्मुखोऽप्युत्ससर्ज मालेश्चक्रं जिघांसया ॥ ४२ ॥

गर्जते हुए राक्षसों का वह सिंहनाद सुनकर इन्द्रके छोटे भाई भगवान् विष्णु अत्यन्त कुपित हो पक्षिराजकी पीठपर तिरछे होकर बैठ गये । ( इससे वह. राक्षस उन्हें दीखने लगा ) उस समय पराङ्मुख होनेपर भी श्रीहरिने मालीके वधकी इच्छासे पीछे की ओर मुड़कर अपना सुदर्शनचक्र चलाया ॥ ४१-४२ ॥

तत् सूर्यमण्डलाभासं वभासा भासयन् नभः ।

कालचक्रनिभं चक्रं मालेः शीर्षमपातयत् ॥ ४३ ॥

सूर्यमण्डलके समान उद्दीप्त होनेवाले कालचक्र सदृश उस चक्रने अपनी प्रभासे आकाशको उद्भासित करते हुए वहाँ मालीके मस्तकको काट गिराया ॥ ४३ ॥

तच्छिरो राक्षसेन्द्रस्य चक्रत्कृत्तं विभीषणम् ।

पपात रुधिरोद्वारि पुरा राहुशिरो यथा ॥ ४४ ॥

चक्रसे कटा हुआ राक्षसराज मालीका वह भयंकर मस्तक पूर्वकालमें कटे हुए राहुके सिरकी भाँति रक्तकी धारा बहाता हुआ पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥ ४४ ॥

ततः सुरैः सम्प्रहृष्टैः सर्वप्राणसमीरितः ।

सिंहनादरवो मुक्तः साधु देवेतिवादिभिः ॥ ४५ ॥

इससे देवताओंको बड़ी प्रसन्नता हुई । वे ' साधु भगवन्! साधु! ' ऐसा कहते हुए सारी शक्ति लगाकर जोर - जोर से सिंहनाद करने लगे ॥ ४५ ॥

मालिनं निहतं दृष्ट्वा सुमाली माल्यवानपि ।

सबलौ शोकसंतप्तौ लङ्कामेव प्रधावितौ ॥ ४६ ॥

मालीको मारा गया देख सुमाली और माल्यवान् दोनों राक्षस शोकसे व्याकुल हो सेनासिहत लङ्काकी ओर ही भागे ॥ ४६ ॥

गरुडस्तु समाश्वस्तः संनिवृत्य यथा पुरा ।

राक्षसान् द्रावयामास पक्षवातेन कोपितः ॥ ४७ ॥

इतनेही में गरुड़की पीड़ा कम हो गयी, वे पुनः सँभल-कर लौटे और कुपित हो पूर्ववत् अपने पंखोंकी हवासे राक्षसों-को खदेड़ने लगे || ४७ ॥

चक्रकूत्तास्यकमला गदासंचूर्णितोरसः ।

लाङ्गलम्लपितग्रीवा मुसलैर्भिन्नमस्तकाः ॥ ४८ ॥

कितने ही राक्षसों के मुखकमल चक्रके प्रहारसे कट गये । गदाओंके आघातसे बहुतोंके वृक्षःस्थल चूर - चूर हो गये । हलके फालसे कितनोंकी गर्दनें उतर गयीं । मुसलोंकी मारसे बहुतों के मस्तकोंकी धज्जियाँ उड़ गयीं ॥ ४८ ॥

केचिच्चैवासिना छिन्नास्तथान्ये शरताडिताः ।

निपेतुरम्बरात् तूर्ण राक्षसाः सागराम्भसि ॥ ४ ९ ॥

तलवारका हाथ पड़ने से कितने ही राक्षस टुकड़े - टुकड़े हो गये । बहुतेरे बाणोंसे पीड़ित हो तुरंत ही आकाशसे समुद्र के जलमें गिर पड़े ॥ ४ ९ ॥ नारायणोऽपीषुवराशनीभि-विदारयामास धनुर्विमुकैः । नक्तंचरान् धूतविमुक्तकेशान् यथाशनीभिः सतडिन्महाभ्रः ॥ ५० ॥

भगवान् विष्णु भी अपने धनुषसे छूटे हुए श्रेष्ठ बाणों और अशनियोंद्वारा राक्षसों को विदीर्ण करने लगे । उस समय उन निशाचरोंके खुले हुए केश हवासे उड़ रहे थे और पीताम्बरधारी श्यामसुन्दर श्रीहरि विद्युन्मालामण्डित महान् * मेघ के समान सुशोभित हो रहे थे ॥ ५० ॥

भिन्नातपत्रं पतमानशस्त्र शरैरपध्वस्त विनीतवेषम् विनिःसृतान्त्रं भयलोलनेत्रं बलं तदुन्मत्ततरं बभूव ॥ ५१ ॥

राक्षसोंकी वह सारी सेना अत्यन्त उन्मत्त - सी प्रतीत होती थी । बाणोंसे उसके छत्र कट गये थे, अस्त्र - शस्त्र गिर गये थे

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उत्तरकाण्डे अष्टमः सर्गः १४७३ सौम्य वेष दूर हो गया था, आँतें बाहर निकल आयी थीं और सबके नेत्र भयसे चञ्चल हो रहे थे ॥ ५१ ॥

सिंहार्दितानामिव कुञ्जराणां निशाचराणां सह कुञ्जराणाम् । रवाश्च वेगाश्च समं बभूवुः पुराणसिंहेन विमर्दितानाम् ॥ ५२ ॥

जैसे सिंहोंद्वारा पीड़ित हुए हाथियोंके चीत्कार और वेग एक साथ ही प्रकट होते हैं, उसी प्रकार उन पुराणप्रसिद्ध नृसिंहरूपधारी श्रीहरिके द्वारा रौंदे गये उन निशाचररूपी गजराजोंके हाहाकार और वेग साथ - साथ प्रकट हो रहे थे । ते वार्यमाणा हरिबाणजालैः स्वबाणजालानि समुत्सृजन्तः । धावन्ति नक्तंचरकालमेघा वायुप्रणुन्ना इव कालमेघाः ॥ ५३ ॥

भगवान् विष्णुके बाणसमूहोंसे आवृत हो अपने सायकों-का परित्याग करके वे निशाचररूपी काले मेघ उसी प्रकार भागे जा रहे थे, जैसे हवाके उड़ाये हुए वर्षाकालीन मेत्र आकाशमें भागते देखे जाते हैं ॥ ५३ ॥

चक्रप्रहारैर्विनिकृत्तशीर्षाः संचूर्णिताङ्गाश्व असिप्रहारैर्द्विविधाविभिन्नाः पतन्ति शैला इव चक्र के प्रहारोंसे राक्षसोंके मस्तक मारसे उनके शरीर चूर - चूर हो रहे थे

से उनके दो - दो टुकड़े हो गये थे ।

पर्वतके समान धराशायी हो रहे थे ॥

गदाप्रहारैः ।

राक्षसेन्द्राः ॥ ५४ ॥

कट गये थे, गदाओंकी तथा तलवारोंके आघात-इस तरह वे राक्षसराज ५४ ॥ विलम्बमानैर्मणिहारकुण्डलै-निशाचरैर्नीलवलाहकोपमैः 1 निपात्यमानैर्ददृशे निरन्तरं निपात्यमानैरिव नीलपर्वतैः ॥ ५५ ॥

लटकते हुए मणिमय हारों और कुण्डलोंके साथ गिराये जाते हुए नील मेघ - सदृश उन निशाचरोंकी लाशोंसे वह रण-, भूमि पट गयी थी । वहाँ धराशायी हुए वे राक्षस नील-पर्वतोंके समान जान पड़ते थे । उनसे वहाँका ' भूभाग इस तरह आच्छादित हो गया था कि कहीं तिल रखनेकी भी जगह नहीं दिखायी देती थी ॥ ५५ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये उत्तरकाण्डे सप्तमः सर्गः ॥ ७ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें सातवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ७ ॥

अष्टमः सर्गः माल्यवानका युद्ध और पराजय तथा सुमाली आदि सब राक्षसोंका रसातल में प्रवेश

हन्यमाने बले तस्मिन् पद्मनाभेन पृष्ठतः ।

माल्यवान् संनिवृत्तोऽथ वेलामेत्य इवार्णवः ॥ १ ॥

( अगस्त्यजी कहते हैं - रघुनन्दन! ) पद्मनाभ भगवान् विष्णुने जब भागती हुई राक्षसोंकी सेनाको पीछे की ओरसे मारना आरम्भ किया, तब माल्यवान् लौट पड़ा, मानो महा-सागर अपनी तटभूमितक जाकर निवृत्त हो गया हो ॥ १ ॥

संरक्तनयनः क्रोधाच्चलन्मौलिर्निशाचरः ।

पद्मनाभमिदं प्राह वचनं पुरुषोत्तमम् ॥ २ ॥

उसके नेत्र क्रोध से लाल हो रहे थे और मुकुट हिल रहा था । उस निशाचरने पुरुषोत्तम भगवान् पद्मनाभसे इस प्रकार कहा- ॥ २ ॥

नारायण न जानीषे क्षात्रधर्मे पुरातनम् ।

अयुद्धमनसो भीतानस्मान् हंसि यथेतरः ॥ ३ ॥

' नारायणदेव! जान पड़ता है पुरातन क्षात्रधर्मको बिल्कुल नहीं जानते हो, तभी तो साधारण मनुष्यकी भाँति तुम जिनका मन युद्ध से विरत हो गया है तथा जो डरकर भागे जा रहे हैं, ऐसे हम राक्षसों को भी मार रहे हो ॥ ३ ॥

पराङ्मुखवधं पापं यः करोति सुरेश्वर ।

स हन्ता न गतः स्वर्गं लभते पुण्यकर्मणाम् ॥ ४ ॥

' सुरेश्वर! जो युद्ध से विमुख हुए सैनिकोंके वधका पाप बा ० रा ० ५.११. ५-करता है, वह घातक इस शरीरका त्याग करके परलोकमें जाने-पर पुण्यकर्मा पुरुषको मिलनेवाले स्वर्गको नहीं पाता है || ४ ||

युद्धश्रद्धाथवा तेऽस्ति शङ्खचक्रगदाधर ।

अहं स्थितोऽस्मि पश्यामि बलं दर्शय यत् तव ॥ ५ ॥

‘ शङ्ख, चक्र और गढ़ा धारण करनेवाले देवता! यदि तुम्हारे हृदयमें युद्धका हौसला है तो मैं खड़ा हूँ । देखता हूँ, तुममें कितना बल है? दिखाओ अपना पराक्रम ' ॥ ५ ॥

माल्यवन्तं स्थितं दृष्ट्वा माल्यवन्तमिवाचलम् ।

उवाच राक्षसेन्द्रं तं देवराजानुजो बली ॥ ६ ॥

माल्यवान् पर्वतके समान अविचल भावसे खड़े हुए राक्षस-राज माल्यवान् को देखकर देवराज इन्द्रके छोटे भाई महाबली भगवान् विष्णुने उससे कहा ॥ ६ ॥

युष्मत्तो भयभीतानां देवानां वै मयाभयम् ।

राक्षसोत्सादनं दत्तं तदेतदनुपाल्यते ॥ ७ ॥

‘ देवताओंको तुमलोगोंसे बड़ा भय उपस्थित हुआ है, मैंने राक्षसोंके संहारकी प्रतिज्ञा करके उन्हें अभय दान दिया है; अतः इस रूप में मेरे द्वारा उस प्रतिज्ञाका ही पालन किया जा रहा है || ७ ||

प्राणैरपि प्रियं कार्य देवानां हि सदा मया ।

सोऽहं वो निहनिष्यामि रसातलगतानपि ॥ ८ ॥

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१४७४ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे “ मुझे अपने प्राण देकर भी सदा ही देवताओंका प्रिय कार्य करना है; इसलिये तुमलोग भागकर रसातलमें चले जाओ तो भी मैं तुम्हारा वध किये बिना नहीं रहूँगा ' ॥ ८ ॥

देवदेवं ब्रुवाणं तं रक्ताम्बुरुहलोचनम् ।

शक्त्या बिभेद संक्रुद्धो राक्षसेन्द्रो भुजान्तरे ॥ ९ ॥

लाल कमलके समान नेत्रवाले देवाधिदेव भगवान् विष्णु जब इस प्रकार कह रहे थे, उस समय अत्यन्त कुपित हुए राक्षसराज माल्यवान्ने अपनी शक्तिके द्वारा प्रहार करके भगवान् विष्णुका वक्षःस्थल विदीर्ण कर दिया ॥ ९ ॥

शक्तिर्घण्टाकृतस्वना । माल्यद्भुजनिर्मुक्का हरेरुरसि बभ्राज मेघस्थेव शतह्रदा ॥ १० ॥

माल्यवान् के हाथसे छूटकर घंटानाद करती हुई वह शक्ति श्रीहरिकी छातीसे जा लगी और मेघके अङ्कमें प्रकाशित होनेवाली बिजली के समान शोभा पाने लगी ॥ १० ॥

ततस्तामेव चोत्कृष्य शक्तिं शक्तिधरप्रियः ।

माल्यवन्तं समुद्दिश्य चिक्षेपाम्बुरुहेक्षणः ॥ ११ ॥

शक्तिधारी कार्तिकेय जिन्हें प्रिय हैं अथवा जो शक्तिधर स्कन्द के प्रियतम हैं, उन भगवान् कमलनयन विष्णुने उसी शक्तिको अपनी छाती से खींचकर माल्यवान्पर दे मारा ॥११ ॥

स्कन्दोत्सृष्टेव सा शक्तिगोविन्दकरनिःसृता ।

काङ्क्षन्ती राक्षसं प्रायान्महोल्केवाञ्जनाचलम् ॥ १२ ॥

स्कन्दकी छोड़ी हुई शक्ति के समान गोविन्द के हाथसे निकली हुई वह शक्ति उस राक्षसको लक्ष्य करके चली, मानो अञ्जनगिरिपर कोई बड़ी भारी उल्का गिर रही हो ॥ १२ ॥

सा तस्योरसि विस्तीर्णे हारभारावभासिते ।

गिरिकूट इवाशनिः ॥ १३ ॥

आपतद् राक्षसेन्द्रस्य हारोंके समूहसे प्रकाशित होनेवाले उस राक्षसराज के वक्षःस्थलपर वह शक्ति गिरी मानो किसी पर्वतके विशाल शिखरपर वज्रपात हुआ हो ॥ १३ ॥

तया भिन्नतनुत्राणः प्राविशद् विपुलं तमः ।

गिरिरिवाचलः ॥ १४ ॥

ततोऽम्बरे महाञ्छन्दः साधुसाध्विति चोत्थितः ।

आहत्य राक्षसो विष्णुं गरुडं चाप्यताडयत् ॥ १७ ॥

उस समय आकाशमें राक्षसोंका महान् हर्षनाद गूँज उठा- वे एक साथ बोल उठे - ' बहुत अच्छा, बहुत ' अच्छा ' । भगवान् विष्णुको घूसा मारकर उस राक्षसने गरुड़पर भी प्रहार किया ॥ १७ ॥

वैनतेयस्ततः क्रुद्धः पक्षवातेन राक्षसम् ।

व्यपोहद् बलवान् वायुः शुष्कपर्णचयं यथा ॥ १८ ॥

यह देख विनतानन्दन गरुड़ कुपित हो उठे और उन्होंने अपने पंखोंकी हवासे उस राक्षसको उसी तरह उड़ा दिया, जैसे प्रबल आँधी सूखे पत्तोंके ढेरको उड़ा देती है ।

द्विजेन्द्रपक्षवातेन द्रावितं हृदय पूर्वजम् ।

सुमाली स्वबलैः सार्धं लङ्कामभिमुखो ययौ ॥ १ ९ ॥

अपने बड़े भाईको पक्षिराजके पंखोंकी हेवासे उड़ा हुआ देख सुमाली अपने सैनिकोंके साथ लङ्काकी ओर चल दिया ॥

पक्षवातबलोद्धतो माल्यवानपि राक्षसः ।

स्वबलेन समागम्य ययौ लङ्कां हिया वृतः ॥ २० ॥

गरुड़के पंखोंकी हवाके बलसे उड़ा हुआ राक्षस माल्यवान् भी लज्जित होकर अपनी सेनासे जा मिला और लङ्काकी ओर चला गया ॥ २० ॥

एवं ते राक्षसा राम हरिणा कमलेक्षण ।

बहुशः संयुगे भग्ना हतप्रवरनायकाः ॥ २१ ॥

कमलनयन श्रीराम! इस प्रकार उन राक्षसों का भगवान् विष्णु के साथ अनेक बार युद्ध हुआ और प्रत्येक संग्राममें प्रधान- प्रधान नायकोंके मारे जानेपर उन सबको भागना पड़ा ।

अशक्नुवन्तस्ते विष्णुं प्रतियोद्धुं बलार्दिताः ।

त्यक्त्वा लङ्कां गता वस्तुं पातालं सहपत्नयः ॥ २२ ॥

वे किसी प्रकार भगवान् विष्णुका सामना नहीं कर सके । सदा ही उनके बलसे पीड़ित होते रहे । अतः समस्त निशाचर लङ्का छोड़कर अपनी स्त्रियोंके साथ पातालमें रहने के लिये चले गये ॥ २२ ॥

माल्यवान् पुनराश्वस्तस्तस्थौ कट गया तथा वह गहरी मूर्छा- सुमालिनं समासाद्य राक्षसं रघुसत्तम । उससे माल्यवान्का कवच प्रख्यातवीर्यास्ते वंशे सालकटङ्कटे ॥ २३ ॥

में । डूब गया; किंतु थोड़ी ही देरमें पुनः सँभलकर माल्यवान् स्थिताः रघुश्रेष्ठ! वे विख्यात पराक्रमी निशाचर सालकटङ्कट-पर्वतकी भाँति अविचलभावसे खड़ा हो गया ॥ १४ ॥ सुमालीका आश्रय लेकर रहने लगे ||

शूलं कण्टकैर्बहुभिश्चितम् । वंशमें विद्यमान राक्षस ततः कालायसं दृढम् ॥ १५ ॥ ये त्वया निहतास्ते तु पौलस्त्या नाम राक्षसाः ।

प्रगृह्याभ्यहनद् देवं स्तनयोरन्तरे सुमाली माल्यवान् माली ये च तेषां पुरःसराः ।

तत्पश्चात् उसने काले लोहे के बने हुए और बहुसंख्यक रावणाद् बलवत्तराः ॥ २४ ॥

जड़े हुए शूलको हाथमें लेकर भगवान् की छाती में सर्व एते महाभागा का काँटोंसे गहरा आघात किया ॥ १५ ॥

तथैव रणरतस्तु मुष्टिना वासवानुजम् ।

ताडयित्वा धनुर्मात्रमपक्रान्तो निशाचरः ॥ १६

इसी प्रकार वह युद्धप्रेमी राक्षस भगवान् विष्णुको मुक्के मारकर एक धनुष पीछे हट गया ॥ १६ ॥

श्रीराम! आपने पुलस्त्यवंशके जिन - जिन राक्षसों विनाश किया है, उनकी अपेक्षा प्राचीन राक्षसोंका पराक्रम ॥ अधिक था । सुमाली, माल्यवान् और माली तथा उनके से आगे चलनेवाले योद्धा - ये सभी महाभाग निशाचर रावण से बढ़कर बलवान् थे ॥ २४ ॥

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उत्तरकाण्डे नवमः सर्गः १४७५

न चान्यो राक्षसान् हन्ता सुरारीन् देवकण्टकान् ।

ऋते नारायणं देवं शङ्खचक्रगदाधरम् ॥ २५ ॥

देवताओंके लिये कण्टकरूप उन देवद्रोही राक्षसोंका वध शङ्ख, चक्र, गदाधारी भगवान् नारायणदेवके सिवा दूसरा कोई नहीं कर सकता ॥ २५ ॥

भवान् नारायणो देवश्चतुर्बाहुः सनातनः ।

राक्षसान् हन्तुमुत्पन्नो ह्यजय्यः प्रभुरव्ययः ॥ २६ ॥

आप चार भुजाधारी सनातन देव भगवान् नारायण ही हैं । आपको कोई परास्त नहीं कर सकता । आप अविनाशी प्रभु हैं और राक्षसों का वध करनेके लिये इस लोकमें अवतीर्ण हुए हैं ॥ २६ ॥

नष्टधर्मव्यवस्थानां काले काले प्रजाकरः ।

उत्पद्यते दस्युवधे शरणागतवत्सलः ॥ २७ ॥

आप ही इन प्रजाओंके स्रष्टा हैं और शरणागतोंपर दया रखते हैं । जब - जब धर्मकी व्यवस्थाको नष्ट करनेवाले दस्यु पैदा हो जाते हैं, तब - तब उन दस्युओंका वध करनेके लिये आप समय - समयपर अवतार लेते रहते हैं । २७ ॥ एषा मया तव नराधिप राक्षसाना-मुत्पत्तिरद्य कथिता सकला यथावत् । भूयो निबोध रघुसत्तम रावणस्य जन्मप्रभावमतुलं ससुतस्य सर्वम् ॥ २८ ॥

नरेश्वर! इस प्रकार मैंने आपको राक्षसोंकी उत्पत्तिका यह पूरा प्रसंग ठीक - ठीक सुना दिया । रघुवंशशिरोमणे! अब आप रावण तथा उसके पुत्रोंके जन्म और अनुपम प्रभावका सारा वर्णन सुनिये ॥ २८ ॥

चिरात् सुमाली व्यचरद् रसातलं स राक्षसो विष्णुभयार्दितस्तदा । पुत्रैश्च पौत्रैश्च समन्वितो बली ततस्तु लङ्कामवसद् धनेश्वरः ॥ २ ९ ॥ भगवान् विष्णुके भयसे पीड़ित होकर राक्षस सुमाली सुदीर्घ कालतक अपने पुत्र - पौत्रोंके साथ रसातलमें विचरता रहा । इसी बीचमें धनाध्यक्ष कुबेरने लङ्काको अपना निवास-स्थान बनाया ॥ २ ९ ॥ इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये उत्तरकाण्डेऽष्टमः सर्गः ॥ ८ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें आठवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ८ ॥

नवमः सर्गः रावण आदिका जन्म और उनका

कस्यचित्त्वथ कालस्य खुमाली नाम राक्षसः ।

रसातलान्मर्त्यलोकं सर्वे वै विचचार ह ॥ १ ॥

नीलजीमूतसंकाशस्तप्तकाञ्चनकुण्डलः कन्यां दुहितरं गृह्य विना पद्ममिव श्रियम् ॥ २ ॥

कुछ कालके पश्चात् नील मेघके समान श्याम वर्णवाला राक्षस सुमाली तपाये हुए सोनेके कुण्डलोंसे अलंकृत हो अपनी सुन्दरी कन्याको, जो बिना कमलकी लक्ष्मीके समान जान पड़ती थी, साथ ले रसातलसे निकला और सारे मर्त्यलोक में

विचरने लगा । १-२ ॥

राक्षसेन्द्रः स तु तदा विचरन् वै महीतले ।

तदापश्यत् स गच्छन्तं पुष्पकेण धनेश्वरम् ॥ ३ ॥

गच्छन्तं पितरं द्रष्टुं पुलस्त्यतनयं विभुम् ।

तं दृष्ट्रामरसंकाशं गच्छन्तं पावकोपमम् ॥ ४ ॥

रसातलं प्रविष्टः सन्मर्त्यलोकात् सविस्मयः । उस समय भूतलपर विचरते हुए उस राक्षसराजने . अग्निके समान तेजस्वी तथा देवतुल्य शोभा धारण करनेवाले T धनेश्वर कुबेरको देखा, जो पुष्पक विमानद्वारा अपने पिता पुलस्त्यनन्दन विश्रवाका दर्शन करनेके लिये जा रहे थे । A उन्हें देखकर वह अत्यन्त विस्मित हो मर्त्यलोकसे रसातलमें प्रविष्ट हुआ ॥ ३-४३ ॥ इत्येवं चिन्तयामास राक्षसानां महामतिः ॥ ५ ॥

तपके लिये गोकर्ण - आश्रम में जाना किं कृत्वा श्रेय इत्येवं वर्धेमहि कथं वयम् । सुमाली बड़ा बुद्धिमान् था । वह सोचने लगा, क्या करनेसे हम राक्षसों का भला होगा? कैसे हमलोग उन्नति कर सकेंगे? ॥ ५३ ॥

अथाब्रवीत् सुतां रक्षः कैकसीं नाम नामतः ॥ ६ ॥

पुत्रि प्रदानकालोऽयं यौवनं व्यतिवर्तते ।

प्रत्याख्यानाच्च भीतैस्त्वं न वरैः प्रतिगृह्यसे ॥ ७ ॥

ऐसा विचार करके उस राक्षसने अपनी पुत्रीसे, जिसका नाम कैकसी था, कहा- बेटी! अब तुम्हारे विवाह के योग्य समय आ गया है; क्योंकि इस समय तुम्हारी युवावस्था बीत रही है । तुम कहीं इन्कार न कर दो, इसी भयसे श्रेष्ठ वर तुम्हारा वरण नहीं कर रहे हैं ॥ ६-७ ॥

त्वत्कृते च वयं सर्वे यन्त्रिता धर्मबुद्धयः ।

त्वं हि सर्वगुणोपेता श्रीः साक्षादिव पुत्रिके ॥ ८ ॥

' पुत्री! तुम्हें विशिष्ट वरकी प्राप्ति हो, इसके लिये हम लोगोंने बहुत प्रयास किया है; क्योंकि कन्यादानके विषयमें हम धर्मबुद्धि रखनेवाले हैं । तुम तो साक्षात् लक्ष्मी के समान सर्वगुणसम्पन्न हो ( अतः तुम्हारा वर भी सर्वथा तुम्हारे योग्य ही होना चाहिये ) ॥ ८ ॥

कन्यापितृत्वं दुःखं हि सर्वेषां मानकाङ्क्षिणाम् ।

न ज्ञायते च कः कन्यां वरयेदिति कन्यके ॥ ९ ॥

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१४७६ श्रीमवाल्मीकीयरामायणे ‘ बेटी! सम्मानकी इच्छा रखनेवाले सभी लोगोंके लिये भद्रे कस्यासि दुहिता कुतो वा त्वमिहागता ॥ १७ ॥

कन्याका पिता होना दुःखका ही कारण होता है; क्योंकि यह पता नहीं चलता कि कौन और कैसा पुरुष कन्याका वरण करेगा ९ ॥ ९ ॥

मातुः कुलं पितृकुलं यत्र चैव च दीयते ।

कुलत्रयं सदा कन्या संशये स्थाप्य तिष्ठति ॥ १० ॥

' माता के पिता और जहाँ कन्या दी जाती है, उस पतिके कुलको भी कन्या सदा संशयमें डाले रहती है ॥ १० ॥

सा त्वं मुनिवरं श्रेष्ठं प्रजापतिकुलोद्भवम् ।

भज विश्रवसं पुत्र पौलस्त्यं वरय स्वयम् ॥ ११ ॥

' अतः बेटी! तुम प्रजापतिके कुलमें उत्पन्न, श्रेष्ठ गुण-सम्पन्न, पुलस्त्यनन्दन मुनिवर विश्रवाका स्वयं चलकर पतिके रूपमें वरण करो और उनकी सेवा में रहो ॥ ११ ॥

ईदृशास्ते भविष्यन्ति पुत्राः पुत्रि न संशयः ।

तेजसा भास्करसमो तादृशोऽयं धनेश्वरः ॥ १२ ॥

" पुत्री! ऐसा करने से निःसंदेह तुम्हारे पुत्र भी ऐसे ही होंगे, जैसे ये धनेश्वर कुबेर हैं । तुमने तो देखा ही था; वे कैसे अपने तेजसे सूर्य के समान उद्दीप्त हो रहे थे ११ ॥ १२ ॥

सा तु तद्वचनं श्रुत्वा कन्यका पितृगौरवात् ।

तत्र गत्वा च सा तस्थौ विश्रवा यत्र तप्यते ॥ १३ ॥

पिताकी यह बात सुनकर उनके गौरवका ख्याल करके

कैकसी उस स्थानपर गयी, जहाँ मुनिवर विश्रवा तप करते थे ।

वहाँ जाकर वह एक जगह खड़ी हो गयी ॥ १३ ॥

एतस्मिन्नन्तरे राम पुलस्त्यतनयो द्विजः ।

अग्निहोत्रमुपातिष्ठच्चतुर्थ इव पावकः ॥ १४ ॥

श्रीराम! इसी बीचमें पुलस्त्यनन्दन ब्राह्मण विश्रवा सायंकालका अग्निहोत्र करने लगे । वे तेजस्वी मुनि उस समय तीन अग्नियोंके साथ स्वयं भी चतुर्थ अग्निके समान देदीप्य

मान हो रहे थे । १४ ॥

अविचिन्त्य तु तां वेलां दारुणां पितृगौरवात् ।

उपसृत्याग्रतस्तस्य चरणाधोमुखी स्थिता ॥ १५ ॥

पिताके प्रति गौरवबुद्धि होनेके कारण कैकसीने उस भयंकर बेलाका विचार नहीं किया और निकट जा उनके चरणोंपर दृष्टि लगाये नीचा मुँह किये वह सामने खड़ी हो गयी ॥ १५ ॥

विलिखन्ती मुहुर्भूमिमङ्गुष्ठाग्रेण भामिनी ।

स तु तां वीक्ष्य सुश्रोणी पूर्णचन्द्रनिभाननाम् ॥ १६ ॥

अब्रवीत् परमोदारो दीप्यमानां स्वतेजसा । वह भामिनी अपने पैरके अँगूठेसे बारंबार धरतीपर किं कार्य कस्य वा हेतोस्तत्त्वतो ब्रूहि शोभने ॥ १८ ॥

' भद्रे! तुम किसकी कन्या हो, कहाँसे यहाँ आयी हो, मुझसे तुम्हारा क्या काम है अथवा किस उद्देश्यसे यहाँ तुम्हारा आना हुआ है? शोभने! ये सब बातें मुझे ठीक-ठीक बताओ ' ॥ १७-१८ ॥

एवमुक्ता तु सा कन्या कृताञ्जलिरथाब्रवीत् ।

आत्मप्रभावेण मुने ज्ञातुमर्हसि मे मतम् ॥ १ ९ ॥

किं तु मां विद्धि ब्रह्मर्षे शासनात् पितुरागताम् ।

कैकसी नाम नाम्नाहं शेषं त्वं ज्ञातुमर्हसि ॥ २० ॥

विश्रवाके इस प्रकार पूछनेपर उस कन्याने हाथ जोड़कर कहा - ' मुने! आप अपने ही प्रभावसे मेरे मनोभाव को समझ सकते हैं; किंतु ब्रह्मर्षे! मेरे मुखसे इतना अवश्य जान लें कि मैं अपने पिताकी आज्ञा से आपकी सेवामें आयी हूँ और मेरा नाम कैकसी है । बाकी सब बातें आपको स्वतः जान लेनी चाहिये ( मुझसे न कहलावें ) ॥ १ ९ -२० ॥

स तु गत्वा मुनिर्ध्यानं वाक्यमेतदुवाच ह ।

विज्ञातं ते मया भद्रे कारणं यन्मनोगतम् ॥ २१ ॥

सुताभिलाषो मत्तस्ते मत्तमातङ्गगामिनि ।

दारुणायां तु वेलायां यस्मात् त्वं मामुपस्थिता ॥ २२ ॥

शृणु तस्मात् सुतान् भद्रे यादृशाञ्जनयिष्यसि ।

दारुणान् दारुणाकारान् दारुणाभिजनप्रियान् ॥ २३ ॥

प्रसविष्यसि सुश्रोणि राक्षसान् क्रूरकर्मणः । यह सुनकर मुनिने थोड़ी देरतक ध्यान लगाया और उसके बाद कहा- ' भद्रे! तुम्हारे मनका भाव मालूम हुआ । मतवाले गजराजकी भाँति मन्दगति से चलनेवाली सुन्दरी! तुम मुझसे पुत्र प्राप्त करना चाहती हो; परंतु इस दारुण वेलामें मेरे पास आयी हो, इसलिये यह भी सुन लो कि तुम कैसे पुत्रों-को जन्म दोगी । सुश्रोणि! तुम्हारे पुत्र क्रूर स्वभाववाले और शरीर से भी भयंकर होंगे तथा उनका क्रूरकर्मा राक्षसों के साथ ही प्रेम होगा । तुम क्रूरतापूर्ण कर्म करनेवाले राक्षसोंको ही पैदा करोगी ' ॥ २१ - २३३ ॥ सा तु तद्वचनं श्रुत्वा प्रणिपत्याब्रवीद् वचः ॥ २४ ॥

भगवन्नीदृशान् पुत्रांस्त्वत्तोऽहं ब्रह्मवादिनः ।

नेच्छामि सुदुराचारान् प्रसादं कर्तुमर्हसि ॥ २५ ॥

मुनिका यह वचन सुनकर कैकसी उनके चरणोंपर गिर पड़ी और इस प्रकार बोली- ' भगवन्! आप ब्रह्मवादी महात्मा हैं । मैं आपसे ऐसे दुराचारी पुत्रोंको पानेकी अभिलाषा नहीं रखती; अतः आप मुझपर कृपा कीजिये ' ॥ २४-२५ ॥ रेखा खींचने लगीं । पूर्ण चन्द्रमाके समान मुख तथा सुन्दर कन्यया त्वेवमुक्तस्तु विश्रवा मुनिपुङ्गवः । कटि प्रदेशवाली उस सुन्दरीको जो अपने तेजसे उद्दीप्त हो उवाच कैकसीं भूयः पूर्णोन्दुरिव रोहिणीम् ॥ २६ ॥

रही थी, देखकर उन परम उदार महर्षिने पूछा- ॥ १६३ ॥ उस राक्षसकन्याके इस प्रकार कहनेपर पूर्णचन्द्रमाके

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उत्तरकाण्डे नवमः सर्गः १४७७ समान मुनिवर विश्रवा रोहिणी - जैसी सुन्दरी कैकसीसे फिर बोले - ॥ २६ ॥

पश्चिमो यस्तव सुतो भविष्यति शुभानने ।

मम वंशानुरूपः स धर्मात्मा च न संशयः ॥ २७ ॥

“ शुभानने! तुम्हारा जो सबसे छोटा एवं अन्तिम पुत्र होगा, वह मेरे वंशके अनुरूप धर्मात्मा होगा; इसमें संशय नहीं है ' ॥ २७ ॥

एवमुक्ता तु सा कन्या राम कालेन केनचित् ।

जनयामास बीभत्सं रक्षोरूपं सुदारुणम् ॥ २८ ॥

दशग्रीवं महादंष्ट्रं नीलाञ्जनचयोपमम् ।

ताम्रोष्ठं विंशतिभुजं महास्यं दीप्तमूर्धजम् ॥ २ ९ ॥

श्रीराम! मुनिके ऐसा कहनेपर कैकसीने कुछ कालके अनन्तर अत्यन्त भयानक और क्रूर स्वभाववाले एक राक्षसको जन्म दिया, जिसके दस मस्तक, बड़ी - बड़ी दाढ़े, ताँबे - जैसे ओठ, बीस भुजाएँ, विशाल मुख और चमकीले केश थे । उसके शरीरका रंग कोयले के पहाड़ जैसा काला था ॥ २८-२९ ॥

तस्मिञ्जाते ततस्तस्मिन् सज्वालकवलाः शिवाः ।

क्रव्यादाश्चापसव्यानि मण्डलानि प्रचक्रमुः ॥ ३० ॥

उसके पैदा होते ही मुँहमें अङ्गारोंके कौर लिये गीदड़ियाँ और मांसभक्षी गृध्र आदि पक्षी दायों ओर मण्डलाकार घूमने लगे ॥

ववर्ष रुधिरं देवो मेघाश्च खरनिःखनाः ।

प्रबभौ न च सूर्यो वै महोल्काश्चापतन् भुवि ॥ ३१ ॥

चकम्पे जगती चैव ववुर्वाताः सुदारुणाः ।

अक्षोभ्यः क्षुभितश्चैव समुद्रः सरितां पतिः ॥ ३२ ॥

इन्द्रदेव रुधिरकी वर्षा करने लगे, मेघ भयंकर स्वरमें गर्जने लगे, सूर्य की प्रभा फीकी पड़ गयी, पृथ्वीपर उल्कापात होने लगा, धरती काँप उठी, भयानक आँधी चलने लगी तथा जो किसीके द्वारा क्षुब्ध नहीं किया जा सकता, वह सरिताओं-का स्वामी समुद्र विक्षुब्ध हो उठा ॥ ३१-३२ ॥ अथ नामाकरोत् तस्य दशग्रीवः प्रसूतोऽयं उस समय ब्रह्माजी के पुत्रका नामकरण किया -हुआ है, इसलिये ' दशग्रीव तस्य त्वनन्तरं जातः प्रमाणाद् यस्य विपुलं उसके बाद महाबली

पितामहसमः पिता ।

दशग्रीवो भविष्यति ॥ ३३ ॥

समान तेजस्वी पिता विश्रवा मुनिने " यह दस ग्रीवाएँ लेकर उत्पन्न ' नामसे प्रसिद्ध होगा ' ॥ ३३ ॥

कुम्भकर्णो महाबलः ।

प्रमाणं नेह विद्यते ॥ ३४ ॥

कुम्भकर्णका जन्म हुआ, जिसके शरीरसे बड़ा शरीर इस जगत् में दूसरे किसीका नहीं है ॥ ३४ ॥

ततः शूर्पणखा नाम संजज्ञे विकृतानना ।

विभीषणश्च धर्मात्मा कैकस्याः पश्चिमः सुतः ॥ ३५ ॥

इसके बाद विकराल मुखवाली शूर्पणखा उत्पन्न हुई । तदनन्तर धर्मात्मा विभीषणका जन्म हुआ, जो कैकसीके अन्तिम पुत्र थे ॥ ३५ ॥

तस्मिन् जाते महासत्त्वे पुष्पवर्ष पपात ह ।

नभःस्थाने दुन्दुभयो देवानां प्राणदंस्तथा ।

वाक्यं चैवान्तरिक्षे च साधु साध्विति तत् तदा ॥ ३६ ॥

उस महान् सत्त्वशाली पुत्रका जन्म होनेपर आकाशसे फूलोंकी वर्षा हुई और आकाशमें देवोंकी दुन्दुभियाँ बज उठीं । उस समय अन्तरिक्ष में ' साधु - साधु ' की ध्वनि सुनायी देने लगी ॥ ३६ ॥

तौ तु तत्र महारण्ये ववृधाते महौजसौ ।

कुम्भकर्णदशग्रीवौ लोको द्वेगकरौ तदा ॥ ३७ ॥

कुम्भकर्ण और दशग्रीव वे दोनों महाबली राक्षस लोकमें उद्वेग पैदा करनेवाले थे । वे दोनों ही उस विशाल वनमें पालित होने और बढ़ने लगे ॥ ३७ ॥

कुम्भकर्णः प्रमत्तस्तु महर्षीन् धर्मवत्सलान् ।

त्रैलोक्ये नित्यासंतुष्टो भक्षयन् विचचार ह ॥ ३८ ॥

कुम्भकर्ण बड़ा ही उन्मत्त निकला । वह भोजनसे कभी तृप्त ही नहीं होता था; अतः तीनों लोकोंमें घूम - घूमकर धर्मात्मा महर्षियोंको खाता फिरता था ॥ ३८ ॥

विभीषणस्तु धर्मात्मा नित्यं धर्मव्यवस्थितः ।

स्वाध्यायनियताहार उवास विजितेन्द्रियः ॥ ३ ९ ॥

विभीषण बचपन से ही धर्मात्मा थे । वे सदा धर्ममें स्थित रहते, स्वाध्याय करते और नियमित आहार करते हुए इन्द्रियोंको अपने काबू में रखते थे ॥ ३ ९ ॥

अथ वैश्रवणो देवस्तत्र कालेन केनचित् ।

आगतः पितरं द्रष्टुं पुष्पकेण धनेश्वरः ॥ ४० ॥

कुछ काल बीतने पर धनके स्वामी वैश्रवण पुष्पकविमान-पर आरूढ़ हो अपने पिताका दर्शन करनेके लिये वहाँ आये ॥ ४० ॥

तं दृष्ट्रा कैकसी तत्र ज्वलन्तमिव तेजसा ।

आगम्य राक्षसी तत्र दशग्रीवमुवाच ह ॥ ४१ ॥

वे अपने तेजसे प्रकाशित हो रहे थे । उन्हें देखकर राक्षस- कन्या कैकसी अपने पुत्र दशग्रीवके पास आयी और इस प्रकार बोली- ॥ ४१ ॥

पुत्र वैश्रवणं पश्य भ्रातरं तेजसा वृतम् ।

भ्रातृभावे समे चापि पश्यात्मानं त्वमीदृशम् ॥ ४२ ॥

' बेटा! अपने भाई वैश्रवणकी ओर तो देखो । वे कैसे तेजस्वी जान पड़ते हैं? भाई होनेके नाते तुम भी इन्हींके समान हो । परंतु अपनी अवस्था देखो, कैसी है? ॥ ४२ ॥

दशग्रीव तथा यत्नं कुरुष्वामितविक्रम ।

यथा त्वमपि मे पुत्र भवेर्वैश्रवणोपमः ॥ ४३ ॥

' अमित पराक्रमी दशग्रीव! मेरे बेटे! तुम भी ऐसा कोई यत्न करो, जिससे वैश्रवणकी ही भाँति तेज और वैभवसे सम्पन्न हो जाओ ' ॥ ४३ ॥