Ramayana 2 — पृष्ठ 701–710

वाल्मीकि रामायण — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 701–710

पृष्ठ 701

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१४८८ श्रीमद्वाल्मीकीय रामायणे

समाप्ते नियमे तस्मिंस्तत्र देवो महेश्वरः ।

ततः प्रीतेन मनसा प्राह वाक्यमिदं प्रभुः ॥ २६ ॥

' उस नियम के समाप्त होनेपर भगवान् महेश्वरदेवने मुझे दर्शन दिया और प्रसन्न मनसे कहा ॥ २६ ॥

प्रीतोऽस्मि तव धर्मज्ञ तपसानेन सुव्रत ।

या चैतद् व्रतं चीर्ण त्वया चैव धनाधिप ॥ २७ ॥

" उत्तम व्रतका पालन करनेवाले धर्मज्ञ धनेश्वर! मैं तुम्हारी इस तपस्यासे बहुत संतुष्ट हूँ । एक तो मैंने इस व्रतका आचरण किया है और दूसरे तुमने ॥ २७ ॥

तृतीयः पुरुषो नास्ति यश्चरेद् व्रतमीदृशम् ।

व्रतं सुदुष्करं ह्येतन्मयैवोत्पादितं पुरा ॥ २८ ॥

" तीसरा कोई ऐसा पुरुष नहीं है, जो ऐसे कठोर व्रतका पालन कर सके । इस अत्यन्त दुष्कर व्रतको पूर्वकालमें मैंने ही प्रकट किया था ॥ २८ ॥

तत्सखित्वं मया सौम्य रोचयख धनेश्वर ।

तपसा निर्जितश्चैव सखा भव ममानघ ॥ २ ९ ॥

" अतः सौम्य धनेश्वर! अब तुम मेरे साथ मित्रताका सम्बन्ध स्थापित करो, यह सम्बन्ध तुम्हें पसंद आना चाहिये । अनघ! तुमने अपने तपसे मुझे जीत लिया है; अतः मेरा मित्र बनकर रहो ॥ २ ९ ॥

देव्या दग्धं प्रभावेण यच्च सव्यं तवेक्षणम् ।

पैङ्गल्यं यदवाप्तं हि देव्या रूपनिरीक्षणात् ॥ ३० ॥

एकाक्षपिङ्गलीत्येव नाम स्थास्यति शाश्वतम् ।

एवं तेन सखित्वं च प्राप्यानुज्ञां च शङ्करात् ॥ ३१ ॥

आगतेन मया चैवं श्रुतस्ते पापनिश्चयः । “ देवी पार्वतीके रूपपर दृष्टिपात करनेसे देवीके प्रभावसे जो तुम्हारा बायाँ नेत्र जल गया और दूसरा नेत्र भी पिङ्गल-वर्णका हो गया, इससे सदा स्थिर रहनेवाला तुम्हारा ' एकाक्ष-' पिङ्गली ' यह नाम चिरस्थायी होगा । ' इस प्रकार भगवान् शङ्करके साथ मैत्री स्थापित करके उनकी आज्ञा लेकर जब मैं घर लौटा हूँ, तब मैंने तुम्हारे पापपूर्ण निश्चयकी बात सुनी है ॥ ३०-३१३ ॥ तदधर्मिष्ठ संयोगान्निवर्त कुलदूषणात् ॥ ३२ ॥

चिन्त्यते हि वधोपायः सर्विसङ्घैः सुरैस्तव । ' अतः अब तुम अपने कुलमें कलंक लगानेवाले पापकर्मके संसर्ग दूर हट जाओ; क्योंकि ऋषि - समुदायसहित देवता तुम्हारे वधका उपाय सोच रहे हैं ' ॥ ३२३ ॥

एवमुक्तो दशग्रीवः कोपसंरक्तलोचनः ॥ ३३ ॥

हस्तान् दन्तांश्च सम्पिष्य वाक्यमेतदुवाच ह । दूत के मुँह से ऐसी बात सुनकर दशग्रीव रावणके नेत्र क्रोधसे लाल हो गये । वह हाथ मलता हुआ दाँत पीसकर बोला – ॥ ३३३ ॥

विज्ञातं ते मया दूत वाक्यं यत् त्वं प्रभाषसे ॥ ३४ ॥

नैव त्वमसि नैवासौ भ्रात्रा येनासि चोदितः । ' दूत! तू जो कुछ कह रहा है, उसका अभिप्राय मैंने समझ लिया । अब तो न तू जीवित रह सकता है और न वह भाई ही, जिसने तुझे यहाँ भेजा है ॥ ३४३ ॥

हितं नैष ममैतद्धि ब्रवीति धनरक्षकः ॥ ३५ ॥

महेश्वरसखित्वं तु मूढः श्रावयते किल । ' धनरक्षक कुबेरने जो संदेश दिया है, वह मेरे लिये हितकर नहीं है । वह मूढ मुझे ( डरानेके लिये ) महादेवजीके साथ अपनी मित्रताकी कथा सुना रहा है? ॥ ३५३ ॥

नैवेदं क्षमणीयं मे यदेतद् भाषितं त्वया ॥ ३६ ॥

देतावन्मया कालं दूत तस्य तु मर्षितम् ।

न हन्तव्यो गुरुज्र्ज्येष्ठो मयायमिति मन्यते ॥ ३७ ॥

' दूत! तूने जो बात यहाँ कही है, यह मेरे लिये सहन करने योग्य नहीं है । कुबेर मेरे बड़े भाई हैं, अतः उनका वध करना उचित नहीं है — ऐसा समझकर ही मैंने आजतक उन्हें क्षमा किया है ॥ ३६-३७ ॥

तस्य त्विदानीं श्रुत्वा मे वाक्यमेषा कृता मतिः ।

त्रींल्लोकानपि जेष्यामि बाहुवीर्यमुपाश्रितः ॥ ३८ ॥

" किंतु इस समय उनकी बात सुनकर मैंने यह निश्चय किया है कि मैं अपने बाहुबलका भरोसा करके तीनों लोकोंको जीतूंगा ॥ ३८ ॥

एतन्मुहूर्तमेवाहं तस्यैकस्य तु वै कृते ।

चतुरो लोकपालांस्तान् नयिष्यामि यमक्षयम् ॥ ३ ९ ॥

" इसी मुहूर्त में मैं एकके ही अपराधसे उन चारों लोकपालों-को यमलोक पहुँचाऊँगा ' ॥ ३ ९ ॥

एवमुक्त्वा तु लङ्केशो दूतं खङ्गेन जघ्निवान् ।

ददौ भक्षयितुं होनं राक्षसानां दुरात्मनाम् ॥ ४० ॥

ऐसा कहकर लङ्केश रावणने तलवारसे उस दूतके दो टुकड़े कर डाले और उसकी लाश उसने दुरात्मा राक्षसों को खाने के लिये दे दी ॥ ४० ॥

ततः कृतस्वस्त्ययनो रथमारुह्य रावणः ।

त्रैलोक्यविजयाकाङ्क्षी ययौ यत्र धनेश्वरः ॥ ४१ ॥

तत्पश्चात् रावण स्वस्तिवाचन करके रथपर चढ़ा और तीनों लोकोंपर विजय पाने की इच्छासे उस स्थानपर गया, जहाँ धनपति कुबेर रहते थे ॥ ४१ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये उत्तरकाण्डे त्रयोदशः सर्गः ॥ १३ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें तेरहवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ १३ ॥

पृष्ठ 702

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उत्तरकाण्डे चतुर्दशः सर्गः १४८ ९ चतुर्दशः सर्गः मन्त्रियों सहित रावणका यक्षोंपर आक्रमण और उनकी पराजय

ततः स सचिवैः सार्धं ष‌ड्भिर्नित्यबलोद्धतः ।

महोदरप्रहस्ताभ्यां मारीचशुकसारणैः ॥ १ ॥

धूम्राक्षेण च वीरेण नित्यं समरगर्द्धिना ।

वृतः सम्प्रययौ श्रीमान् क्रोधाल्लोकान् दहन्निव ॥ २ ॥

अगस्त्यजी कहते हैं — रघुनन्दन! ) तदनन्तर बलके अभिमानसे सदा उन्मत्त रहनेवाला रावण महोदर, प्रहस्त, मारीच, शुक, सारण तथा सदा ही युद्ध की अभिलाषा रखनेवाले वीर धूम्राक्ष - इन छः मन्त्रियोंके साथ लङ्कासे प्रस्थित हुआ । उस समय ऐसा जान पड़ता था, मानो अपने क्रोधसे सम्पूर्ण लोकोंको भस्म कर डालेगा ॥ १-२ ॥

पुराणि स नदीः शैलान् वनान्युपवनानि च ।

अतिक्रम्य मुहूर्तेन कैलासं गिरिमागमत् ॥ ३ ॥

बहुत - से नगरों, नदियों, पर्वतों, वनों और उपवनको लाँघकर वह दो ही घड़ी में कैलास पर्वतपर जा पहुँचा ॥३ ॥

संनिविष्टं गिरौ तस्मिन् राक्षसेन्द्रं निशम्य तु ।

युद्धेप्सुं तं कृतोत्साहं दुरात्मानं समन्त्रिणम् ॥ ४ ॥

यक्षा न शेकुः संस्थातुं प्रमुखे तस्य रक्षसः ।

राज्ञो भ्रातेति विज्ञाय गता यत्र धनेश्वरः ॥ ५ ॥

यक्षोंने जब सुना कि दुरात्मा राक्षसराज रावणने युद्धके लिये उत्साहित होकर अपने मन्त्रियोंके साथ कैलास पर्वतपर डेरा डाला है, तब वे उस राक्षसके सामने खड़े न हो सके । यह राजाका भाई है, ऐसा जानकर यक्षलोग उस स्थानपर गये, जहाँ धनके स्वामी कुबेर विद्यमान थे । ४-५ ॥

ते गत्वा सर्वमाचख्युर्भ्रातुस्तस्य चिकीर्षितम् ।

अनुज्ञाता ययुर्हृष्टा युद्धाय धनदेन ते ॥ ६ ॥

वहाँ जाकर उन्होंने उनके भाईका सारा अभिप्राय कह सुनाया । तब कुबेरने युद्ध के लिये यक्षोंको आज्ञा दे दी; फिर तो यक्ष बड़े हर्षसे भरकर चल दिये ।

ततो बलानां संक्षोभो व्यवर्धत 11 इवोदधेः ।

तस्य नैर्ऋतराजस्य शैलं संचालयन्निव ॥ ७ ॥

उस समय यक्षराजकी सेनाएँ समुद्रके समान क्षुब्ध हो उठीं । उनके वेगसे वह पर्वत हिलता - सा जान पड़ा ॥ ७ ॥

ततो युद्धं समभवद् यक्षराक्षससंकुलम् ।

व्यथिताश्चाभवंस्तत्र सचिवा राक्षसस्य ते ॥ ८ ॥

तदनन्तर यक्षों और राक्षसोंमें घमासान युद्ध छिड़ गया ।

वहाँ रावणके वे सचिव व्यथित हो उठे ॥ ८ ॥

स दृष्ट्वा तादृशं सैन्यं दशग्रीवो निशाचरः ।

हर्षनादान बहून् कृत्वा स क्रोधादभ्यधावत ॥ ९ ॥

अपनी सेनाकी वैसी दुर्दशा देख निशाचर दशग्रीव बारं-बार हर्षवर्धक सिंहनाद करके रोषपूर्वक यक्षोंकी ओर दौड़ा ॥ ९ ॥

बा ० रा ० ५.११. ७-ये तु ते राक्षसेन्द्रस्य सचिवा घोरविक्रमाः ।

तेषां सहस्रमेकैको यक्षाणां समयोधयत् ॥ १० ॥

राक्षसराजके जो सचिव थे, वे बड़े भयंकर पराक्रमी थे । उनमेंसे एक - एक सचिव हजार - हजार यक्षोंसे युद्ध करने लगा ॥ १० ॥

ततो गदाभिर्मुसलैरसिभिः शक्तितोमरैः ।

हन्यमानो दशग्रीवस्तत्सैन्यं समगाहत ॥ ११ ॥

स निरुच्छ्वासवत् तत्र वध्यमानो दशाननः ।

वर्षद्भिरिव जीमूतैर्धाराभिरवरुध्यत ॥ १२ ॥

उस समय यक्ष जलकी धारा गिरानेवाले मेधके समान गदाओं, मूसलों, तलवारों, शक्तियों और तोमरोंकी वर्षा करने लगे 1 । उनकी चोट सहता हुआ दशग्रीव शत्रुसेना में घुसा । वहाँ उसपर इतनी मार पड़ने लगी कि उसे दम मारने की भी फुरसत नहीं मिली । यक्षोंने उसका वेग रोक दिया ॥ ११-१२ ॥

न चकार व्यथां चैव यक्षशस्त्रैः समाहतः ।

महीधर इवाम्भोदेर्धाराशत समुक्षितः ॥ १३ ॥

यक्षोंके शस्त्रोंसे आहत होनेपर भी उसने अपने मनमें दुःख नहीं माना; ठीक उसी तरह, जैसे मेघद्वारा बरसायी हुई सैकड़ों जलधाराओंसे अभिषिक्त होनेपर भी पर्वत विचलित नहीं होता है ॥ १३ ॥

स महात्मा समुद्यम्य कालदण्डोपमां गदाम् ।

प्रविवेश ततः सैन्यं नयन् यक्षान् यमक्षयम् ॥ १४ ॥

उस महाकाय निशाचरने कालदण्डके समान भयंकर गदा उठाकर यक्षोंकी सेनामें प्रवेश किया और उन्हें यमलोक पहुँचाना आरम्भ कर दिया ॥ १४ ॥

स कक्षमिव विस्तीर्ण शुष्केन्धनमिवाकुलम् ।

वातेनाग्निरिवादीप्तो यक्षसैन्यं ददाह तत् ॥ १५ ॥

वायुसे प्रज्वलित हुई अग्नि के समान रावणने तिनकोंके समान फैली और सूखे ईधनकी भाँति आकुल हुई यक्षोंकी सेनाको जलाना आरम्भ किया ॥ १५ ॥

तैस्तु तत्र महामात्यैर्महोदरशुकादिभिः ।

अल्पावशेषास्ते यक्षाः कृता वातैरिवाम्बुदाः ॥ १६ ॥

जैसे हवा बादलोंको उड़ा देती है, उसी तरह उन महोदर और शुक आदि महामन्त्रियोंने वहाँ यक्षोंका संहार कर डाला । अब वे थोड़ी ही संख्या में बच रहे ॥ १६ ॥

केचित् समाहता भग्नाः पतिताः समरे क्षितौ ।

ओष्ठांश्च दशनैस्तीक्ष्णैरदशन् कुपिता रणे ॥ १७ ॥

कितने ही यक्ष शस्त्रोंके आघातसे अङ्ग भङ्ग हो जाने के कारण समराङ्गणमें धराशायी हो गये । कितने ही रणभूमि में कुपित हो अपने तीखे दाँतोंसे ओठ दबाये हुए थे ॥ १७ ॥

पृष्ठ 703

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१४ ९ ० श्रीमवाल्मीकीय रामायणे

श्रान्ताश्चान्योन्यमालिङ्गय भ्रष्टशस्त्रा रणाजिरे ।

सीदन्ति च तदा यक्षाः कूला इव जलेन ह ॥ १८ ॥

कोई थककर एक - दूसरे से लिपट गये । उनके अस्त्र - शस्त्र गिर गये और वे समराङ्गणमें उसी तरह शिथिल होकर गिरे जैसे जल के वेग से नदी के किनारे टूट पड़ते हैं ॥ १८ ॥

हतानां गच्छतां स्वर्ग युध्यतामथ धावताम् ।

प्रेक्षतामृषिसङ्घानां न बभूवान्तरं दिवि ॥ १ ९ ॥

मर - मरकर स्वर्ग में जाते, जूझते और दौड़ते हुए यक्ष-की तथा आकाश में खड़े होकर युद्ध देखनेवाले ऋषिसमूहों की संख्या इतनी बढ़ गयी थी कि आकाशमें उन सबके लिये जगह नहीं अँटती थी ॥ १ ९ ॥

भग्नस्तु तान् समालक्ष्य यक्षेन्द्रांस्तु महाबलान् ।

धनाध्यक्षो महाबाहुः प्रेषयामास यक्षकान् ॥ २० ॥

महाबाहु धनाध्यक्ष ने उन यक्षोंको भागते देख दूसरे महाबली यक्षराजोंको युद्ध के लिये भेजा ॥ २० ॥

एतस्मिन्नन्तरे राम विस्तीर्णबलवाहनः ।

प्रेषितो न्यपतद् यक्षो नाम्ना संयोधकण्टकः ॥ २१ ॥

श्रीराम! इसी बीच में कुबेरका भेजा हुआ संयोधकण्टक नामक यक्ष वहाँ आ पहुँचा । उसके साथ बहुत - सी सेना और सवारियाँ थीं ॥ २१ ॥

तेन चक्रेण मारीचो विष्णुनेव रणे हतः ।

पतितो भूतले शैलात् क्षीणपुण्य इव ग्रहः ॥ २२ ॥

उसने आते ही भगवान् विष्णुकी भाँति चक्रसे रणभूमि में मारीचपर प्रहार किया । उससे घायल होकर वह राक्षस कैलास-से नीचे पृथ्वीपर उसी तरह गिर पड़ा, जैसे पुण्य क्षीण होने-पर स्वर्गवासी ग्रह वहाँसे भूतलपर गिर पड़ा हो ॥ २२ ॥

ससंज्ञस्तु मुहूर्तेन स विश्रम्य निशाचरः ।

तं यक्षं योधयामास स च भग्नः प्रदुद्रुवे ॥ २३ ॥

दो घड़ीके बाद होश में आनेपर निशाचर मारीच विश्राम करके लौटा और उस यक्ष के साथ युद्ध करने लगा । तब वह यक्ष भाग खड़ा हुआ ॥ २३ ॥

ततः काञ्चनचित्राङ्गं वैदूर्यरजतोक्षितम् ।

मर्यादां प्रतिहाराणां तोरणान्तरमाविशत् ॥ २४ ॥

तदनन्तर रावणने कुबेरपुरीके फाटकमें, जिसके प्रत्येक अङ्गमें सुवर्ण जड़ा हुआ था तथा जो नीलम और चाँदीसे भी विभूषित था, प्रवेश किया । वहाँ द्वारपालोंका पहरा लगता था । वह फाटक ही सीमा था । उससे आगे दूसरे लोग नहीं जा सकते थे || २४ ॥

तं तु राजन् दशग्रीवं प्रविशन्तं निशाचरम् ।

सूर्यभानुरिति ख्यातो द्वारपालो न्यवारयत् ॥ २५ ॥

महाराज श्रीराम! जब निशाचर दशग्रीव फाटकके भीतर प्रवेश करने लगा, तब सूर्यभानु नामक द्वारपालने उसे रोका || २५ ||

स वार्यमाणो यक्षेण प्रविवेश निशाचरः ।

यदा तु वारितो राम न व्यतिष्ठत् स राक्षसः ॥ २६ ॥

ततस्तोरणमुत्पाट्य तेन यक्षेण ताडितः ।

रुधिरं प्रस्रवन् भाति शैलो धातुस्रवैरिव ॥ २७ ॥

जब यक्षके रोकने पर भी वह निशाचर न रुका और भीतर प्रविष्ट हो गया, तब द्वारपालने फाटकमें लगे हुए एक खंभे को उखाड़कर उसे दशग्रीवके ऊपर दे मारा । उसके शरीर से रक्तकी धारा बहने लगी, मानो किसी पर्वतसे गेरुमिश्रित जलका झरना गिर रहा हो ॥ २६-२७ ॥

स शैलशिखराभेण तोरणेन समाहतः ।

जगाम न क्षतिं वीरो वरदानात् स्वयम्भुवः ॥ २८ ॥

पर्वतशिखरके समान प्रतीत होनेवाले उस खंभेकी चोट खाकर भी वीर दशग्रीव की कोई क्षति नहीं हुई । वह ब्रह्माजी-के वरदान के प्रभावसे उस यक्षके द्वारा मारा न जा सका ॥२८ ॥

ते तोरणेनाथ यक्षस्तेनाभिताडितः ।

नादृश्यत तदा यक्षो भस्मीकृततनुस्तदा ॥ २ ९ ॥

तब उसने भी वही खंभ उठाकर उसके द्वारा यक्षपर प्रहार किया, इससे यक्षका शरीर चूर - चूर हो गया । फिर उसकी शकल नहीं दिखायी दी ॥ २ ९ ॥ ततः प्रदुद्रुवुः सर्वे दृष्ट्वा रक्षः पराक्रमम् ।

ततो नदीर्गुहाश्चैव विविशुर्भयपीडिताः ।

त्यक्तप्रहरणाः श्रान्ता विवर्णवदनास्तदा ॥ ३० ॥

उस राक्षसका यह पराक्रम देखकर सभी यक्ष भाग गये । कोई नदियों में कूद पड़े और कोई भयसे पीड़ित हो गुफाओ घुस गये । सबने अपने हथियार त्याग दिये थे । सभी थक गये थे और सबके मुखोंकी कान्ति फीकी पड़ गयी थी ॥ ३० ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये उत्तरकाण्डे चतुर्दशः सर्गः ॥ १४ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्ड में चौदहवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ १४ ॥

पञ्चदशः सर्गः माणिभद्र तथा कुबेरकी पराजय और रावणद्वारा पुष्पक विमानका अपहरण ततस्तलक्ष्य वित्रस्तान् यक्षेन्द्रांश्च सहस्रशः । हजारों यक्षप्रवर भयभीत होकर भाग रहे हैं; तब उन्होंने धनाध्यक्षो महायक्षं माणिभद्रमथाब्रवीत् ॥ १ ॥ माणिभद्र नामक एक महायक्षसे कहा- ॥ १ ॥

अगस्त्यजी कहते हैं -- रघुनन्दन! ) धनाध्यक्षने देखा, रावणं जहि यक्षेन्द्र दुर्वृत्तं पापचेतसम् ।

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उत्तरकाण्डे पञ्चदशः सर्गः IIII III शरणं भव वीराणां यक्षाणां युद्धशालिनाम् ॥ २ ॥

' यक्षप्रवर! रावण पापात्मा एवं दुराचारी है, तुम उसे मार डालो और युद्धमें शोभा पानेवाले वीर यक्षों को शरण दो — उनकी रक्षा करो ' ॥ २ ॥

एवमुक्तो महाबाहुर्माणिभद्रः सुदुर्जयः ।

वृतो यशसहस्रैस्तु चतुर्भिः समयोधयत् ॥ ३ ॥

महाबाहु माणिभद्र अत्यन्त दुर्जय वीर थे । कुबेरकी उक्त आज्ञा पाकर वे चार हजार यक्षोंकी सेना साथ ले फाटक पर गये और राक्षसों के साथ युद्ध करने लगे ॥ ३ ॥

ते गदामुसलप्रासैः शक्तितोमर मुद्गरैः ।

अभिघ्नन्तस्तदा यक्षा राक्षसान् समुपाद्रवन् ॥ ४ ॥

उस समय यक्षयोद्धा गदा, मूसल, प्रास, शक्ति, तोमर तथा मुद्गरोंका प्रहार करते हुए राक्षसोंपर टूट पड़े ॥ ४ ॥

कुर्वन्तस्तुमुलं युद्धं चरन्तः श्येनवल्लघु ।

बाढं प्रयच्छ नेच्छामि दीयतामिति भाषिणः ॥ ५ ॥

वे घोर युद्ध करते हुए बाज पक्षी की तरह तीव्र गतिसे सब ओर विचरने लगे । कोई कहता ' मुझे युद्धका अवसर दो । ' दूसरा बोलता- ' मैं यहाँसे पीछे हटना नहीं चाहता । ' फिर तीसरा बोल उठता- -'मुझे अपना हथियार दो ' ॥ ५ ॥

ततो देवाः सगन्धर्वा ऋषयो ब्रह्मवादिनः ।

दृष्ट्वा तत् तुमुलं युद्धं परं विस्मयमागमन् ॥ ६ ॥

उस तुमुलयुद्धको देखकर देवता, गन्धर्व तथा ब्रह्मवादी ऋषि भी बड़े आश्चर्य में पड़ गये थे ॥ ६ ॥

यक्षाणां तु प्रहस्तेन सहस्रं निहतं रणे ।

महोदरेण चानिन्द्यं सहस्रमपरं हतम् ॥ ७ ॥

उस रणभूमिमें प्रहस्तने एक हजार यक्षोंका संहार कर डाला | फिर महोदरने दूसरे एक सहस्र प्रशंसनीय यक्षोंका विनाश किया ॥ ७ ॥

क्रुद्धेन च तदा राजन् मारीचेन युयुत्सुना ।

निमेषान्तरमात्रेण द्वे सहस्त्रे निपातिते ॥ ८ ॥

राजन्! उस समय कुपित हुए रणोत्सुक मारीचने पलक मारते मारते शेष दो हजार यक्षोंको धराशायी कर दिया ॥ ८ ॥

क्व च यक्षार्जवं युद्धं क च मायाबलाश्रयम् ।

रक्षसां पुरुषव्याघ्र तेन तेऽभ्यधिका युधि ॥ ९ ॥

पुरुषसिंह! कहाँ यक्षोंका सरलतापूर्वक युद्ध? और कहाँ राक्षसोंका मायामय संग्राम? वे अपने मायाबलके भरोसे ही यक्षोंकी अपेक्षा अधिक शक्तिशाली सिद्ध हुए ॥ ९ ॥

धूम्राक्षेण समागम्य माणिभद्रो महारणे ।

मुसलेनोरसि क्रोधात् ताडितो न च कम्पितः ॥ १० ॥

उस महासमर में धूम्राक्षने आकर क्रोधपूर्वक माणिभद्रकी छाती में मूसलका प्रहार किया किंतु इससे वे विचलित नहीं हुए ॥ १० ॥

ततो गदां समाविध्य माणिभद्रेण राक्षसः ।

धूम्राक्षस्ताडितो मूर्ध्नि विह्वलः स पपात ह ॥ ११ ॥

फिर माणिभद्रने भी गदा घुमाकर उसे राक्षस धूम्राक्षके मस्तकपर दे मारा । उसकी चोटसे व्याकुल हो धूम्राक्ष धरतीपर गिर पड़ा ॥ ११ ॥

धूम्राक्षं ताडितं दृष्ट्वा पतितं शोणितोक्षितम् ।

अभ्यधावत संग्रामे माणिभद्रं दशाननः ॥ १२ ॥

धूम्राक्षको गदाकी चोटसे घायल एवं खून से लथपथ होकर पृथ्वीपर पड़ा देख दशमुख रावणने रणभूमिमें माणि भद्रपर धावा किया ॥ १२ ॥

संक्रुद्धमभिधावन्तं माणिभद्रो दशाननम् ।

शक्तिभिस्ताडयामास तिसृभिर्यक्षपुङ्गवः ॥ १३ ॥

दशाननको क्रोधमें भरकर धावा करते देख यक्षप्रवर माणिभद्रने उसके ऊपर तीन शक्तियोंद्वारा प्रहार किया ॥ १३ ॥

ताडितो माणिभद्रस्य मुकुटे प्राहरद् रणे ।

तस्य तेन प्रहारेण मुकुटं पार्श्वमागतम् ॥ १४ ॥

चोट खाकर रावणने रणभूमिमें माणिभद्र के मुकुटपर बार किया । उसके उस प्रहारसे उनका मुकुट खिसककर बगलमें आ गया ॥ १४ ॥

ततःप्रभृति यक्षोऽसौ पार्श्वमौलिरभूत् किल ।

तस्मिंस्तु निमुखीभूते माणिभद्रे महात्मनि ।

संनादः सुमहान् राजंस्तस्मिन् शैले व्यवर्धत ॥ १५ ॥

तबसे माणिभद्र यक्ष पार्श्वमौलिके नामसे प्रसिद्ध हुए । महामना माणिभद्र यक्ष युद्ध से भाग चले । राजन्! उनके युद्ध से विमुख होते ही उस पर्वतपर राक्षसोंका महान् सिंहनाद

सब ओर फैल गया । १५ ॥

ततो दूरात् प्रददृशे धनाध्यक्षो गदाधरः ।

शुक्रप्रोष्ठपदाभ्यां च पद्मशङ्खसमावृतः ॥ १६ ॥

इसी समय धनके स्वामी गदाधारी कुबेर दूरसे आते दिखायी दिये । उनके साथ शुक्र और प्रौष्ठपद नामक मन्त्री तथा शङ्ख और पद्मनामक धनके अधिष्ठाता देवता भी थे ॥ १६ ॥

स दृष्ट्वा भ्रातरं संख्ये शापाद् विभ्रष्टगौरवम् ।

उवाच वचनं धीमान् युक्तं पैतामहे कुले ॥ १७ ॥

विश्रवा मुनिके शापसे क्रूर प्रकृति हो जानेके कारण जो गुरुजनोंके प्रति प्रणाम आदि व्यवहार भी नहीं कर पाता था-गुरुजनोचित शिष्टाचार से भी वञ्चित था, उस अपने भाई रावणको युद्धमें उपस्थित देख बुद्धिमान् कुबेरने ब्रह्माजीके कुलमें उत्पन्न हुए पुरुषके योग्य बात कही ॥ १७ ॥

यन्मया वार्यमाणस्त्वं नावगच्छसि दुर्मतेः ।

पश्चादस्य फलं प्राप्य ज्ञास्यसे निरयं गतः ॥ १८ ॥

' दुर्बुद्धि दशग्रीव! मेरे मना करनेपर भी इस समय तुम समझ नहीं रहे हो, किंतु आगे चलकर जब इस कुकर्मका

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१४ ९ २ श्रीमवाल्मीकीय रामायणे फल पाओगे और नरकमें पड़ोगे, उस समय मेरी बात तुम्हारी समझ में आयेगी ॥ १८ ॥

यो हि मोहाद् विष पीत्वा नावगच्छति दुर्मतिः ।

स तस्य परिणामान्ते जानीते कर्मणः फलम् ॥ १ ९ ॥

' जो खोटी बुद्धिवाला पुरुष मोहवश विषको पीकर भी उसे विष नहीं समझता है, उसे उसका परिणाम प्राप्त हो जाने-पर अपने किये हुए उस कर्मके फलका ज्ञान होता है ॥ १ ९ ॥

देवतानि न नन्दन्ति धर्मयुक्तेन केनचित् ।

येन त्वमीदृशं भावं नीतस्तच्च न बुद्धयसे ॥ २० ॥

' तुम्हारे किसी व्यापारसे, वह तुम्हारी मान्यता के अनुसार धर्मयुक्त ही क्यों न हो, देवता प्रसन्न नहीं होते हैं; इसीलिये तुम ऐसे क्रूर भावको प्राप्त हो गये हो, परंतु यह बात तुम्हारी समझमें नहीं आती है ॥ २० ॥

मातरं पितरं विप्रमाचार्य चावमन्यते ।

स पश्यति फलं तस्य प्रेतराजवशं गतः ॥ २१ ॥

" जो माता, पिता, ब्राह्मण और आचार्यका अपमान करता है, वह यमराजके वशमें पड़कर उस पापका फल भोगता है ॥ २१ ॥

अधुवे हि शरीरे यो न करोति तपोऽर्जनम् ।

सपश्चात् तप्यते मूढो मृतो गत्वाऽऽत्मनो गतिम् ॥२२ ॥

' यह शरीर क्षणभङ्गुर है । इसे पाकर जो तपका उपार्जन नहीं करता, वह मूर्ख मरनेके बाद जब उसे अपने दुष्कर्मोंका. फल मिलता है, पश्चात्ताप करता है ॥ २२ ॥

धर्माद राज्यं धनं सौख्यमधर्माद् दुःखमेव च ।

तस्माद् धर्म सुखार्थाय कुर्यात् पापं विसर्जयेत् ॥ २३ ॥

' धर्मसे राज, धन और सुखकी प्राप्ति होती है । अधर्मसे केवल दुःख ही भोगना पड़ता है, अतः सुखके लिये धर्मका आचरण करे, पापको सर्वथा त्याग दे ॥ २३ ॥

पापस्य हि फलं दुःखं तद् भोक्तव्यमिहात्मना ।

तस्मादात्मापघातार्थ मूढः पापं करिष्यति ॥ २४ ॥

' पापका फल केवल दुःख है और उसे स्वयं ही यहाँ भोगना पड़ता है; इसलिये जो मूढ़ पाप करेगा, वह मानो स्वयं ही अपना वध कर लेगा ॥ २४ ॥

कस्यचिन्न हि दुर्बुद्धेश्छन्दतो जायते मतिः ।

यादृशं कुरुते कर्म तादृशं फलमश्नुते ॥ २५ ॥

' किसी भी दुर्बुद्धि पुरुषको ( शुभ कर्मका अनुष्ठान और गुरुजनोंकी सेवा किये बिना ) स्वेच्छामात्रसे उत्तम बुद्धि की प्राप्ति नहीं होती । वह जैसा कर्म करता है, वैसा ही फल भोगता है ॥ २५ ॥

ऋद्धिं रूपं बलं पुत्रान् वित्तं शूरत्वमेव च ।

प्राप्नुवन्ति नरा लोके निर्जितं पुण्यकर्मभिः ॥ २६ ॥

संसारके पुरुषोंको समृद्धि, सुन्दर रूप, बल, वैभव, वीरता तथा पुत्र आदिकी प्राप्ति पुण्यकर्मों के अनुष्ठानसे ही होती है ॥ २६ ॥

एवं निरयगामी त्वं यस्य ते मतिरीदृशी ।

त्वां समभिभाषिष्ये ऽसद्वृत्तेष्वेव निर्णयः ॥ २७ ॥

" इसी प्रकार अपने दुष्कर्मों के कारण तुम्हें भी नरकमें जाना पड़ेगा; क्योंकि तुम्हारी बुद्धि ऐसी पापासक्त हो रही है । दुराचारियोंसे बात नहीं करना चाहिये, यही शास्त्रोंका निर्णय है; अतः मैं भी अब तुमसे कोई बात नहीं करूँगा ' ॥ २७ ॥

एवमुक्तास्ततस्तेन तस्यामात्याः समाहताः ।

मारीचप्रमुखाः सर्वे विमुखा विप्रदुद्रुवुः ॥ २८ ॥

इसी तरह की बात उन्होंने रावण के मन्त्रियोंसे भी कही । फिर उनपर शस्त्रद्वारा प्रहार किया । इससे आहत होकर वे मारीच आदि सब राक्षस युद्धसे मुँह मोड़कर भाग गये ॥ २८ ॥

ततस्तेन दशग्रीवो यक्षेन्द्रेण महात्मना ।

गदयाभिहतो मूर्ध्नि न च स्थानात् प्रकम्पितः ॥ २ ९ ॥

तदनन्तर महामना यक्षराज कुबेरने अपनी गदासे रावणके मस्तकपर प्रहार किया । उससे आहत होकर भी वह अपने स्थानसे विचलित नहीं हुआ ॥ २ ९ ॥

ततस्तौ राम निघ्नन्तौ तदान्योन्यं महामृधे ।

न विहलौ न च श्रान्तौ तावुभौ यक्षराक्षसौ ॥ ३० ॥

श्रीराम! तत्पश्चात् वे दोनों यक्ष और राक्षस कुबेर तथा रावण दोनों उस महासमर में एक दूसरेपर प्रहार करने लगे; परंतु दोनोंमेंसे कोई भी न तो घबराता था न थकता ही था ।

आग्नेयमस्त्रं तस्मै स मुमोच धनदस्तदा ।

राक्षसेन्द्रो वारुणेन तदस्त्रं प्रत्यवारयत् ॥ ३१ ॥

उस समय कुबेरने रावणपर आग्नेयास्त्रका प्रयोग किया, परंतु राक्षसराज रावणने वारुणास्त्र के द्वारा उनके उस अस्त्रको शान्त कर दिया ॥ ३१ ॥

ततो मायां प्रविष्टोऽसौ राक्षसी राक्षसेश्वरः ।

रूपाणां शतसाहस्रं विनाशाय चकार च ॥ ३२ ॥

तत्पश्चात् उस राक्षसराजने राक्षसी मायाका आश्रय लिया और कुबेरका विनाश करनेके लिये लाखों रूप धारण कर लिये ॥ ३२ ॥

व्याघ्रो वराहो जीमूतः पर्वतः सागरो द्रुमः ।

यक्षो दैत्यस्वरूपी च सोऽदृश्यत दशाननः ॥ ३३ ॥

उस समय दशमुख रावण बाघ, सूअर, मेघ, पर्वत, समुद्र, वृक्ष, यक्ष और दैत्य सभी रूपोंमें दिखायी देने लगा ॥ ३३ ॥

बहूच करोति स्म दृश्यन्ते न त्वसौ ततः ।

प्रतिगृह्य ततो राम महदस्त्रं दशाननः ॥ ३४ ॥

जघान मूर्ध्नि धनदं व्याविध्य महतीं गदाम् । इस प्रकार वह बहुत से रूप प्रकट करता था । वे रूप ही दिखायी देते थे, वह स्वयं दृष्टिगोचर नहीं होता था ।

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उत्तरकाण्डे षोडशः सर्गः १४ ९ ३ श्रीराम! तदनन्तर दशमुखने एक बहुत बड़ी गदा हाथमें ली और उसे घुमाकर कुबेरके मस्तकपर दे मारा ॥ ३४३ ॥

एवं स तेनाभिहतो विह्नलः शोणितोक्षितः ॥ ३५ ॥

कृत्तमूल इवाशोको निपपात धनाधिपः । इस प्रकार रावणद्वारा आहत हो धनके स्वामी कुबेर रक्तसे नहा उठे और व्याकुल हो जड़से कटे हुए अशोककी भाँति पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ ३५३ ॥

ततः पद्मादिभिस्तत्र निधिभिः स तदा वृतः ॥ ३६ ॥

धनदोच्छ्वासितस्तैस्तु वनमानीय नन्दनम् । तत्पश्चात् पद्म आदि निधियोंके अधिष्ठाता देवताओंने उन्हें घेरकर उठा लिया और नन्दनवनमें ले जाकर चेत कराया ॥ ३६३ ॥

निर्जित्य राक्षसेन्द्रस्तं धनदं हृष्टमानसः ॥ ३७ ॥

पुष्पकं तस्य जग्राह विमानं जयलक्षणम् । इस तरह कुबेरको जीतकर राक्षसराज रावण अपने मनमें बहुत प्रसन्न हुआ और अपनी विजयके चिह्नके रूपमें उसने उनका पुष्पक विमान अपने अधिकार में कर लिया ॥ ३७३ ॥

काञ्चनस्तम्भसंवीतं वैदूर्यमणितोरणम् ॥ ३८ ॥

मुक्ताजालप्रतिच्छन्नं सर्वकालफलद्रुमम् । उस विमानमें सोने के खम्भे और वैदूर्यमणिके फाटक लगे थे । वह सब ओरसे मोतियोंकी जालीसे ढका हुआ था । उसके भीतर ऐसे - ऐसे वृक्ष लगे थे, जो सभी ऋतुओं में फल देनेवाले थे || ३८३ ॥ मनोजवं कामगमं कामरूपं विहंगमम् ॥ ३ ९ ॥ मणिकाञ्चनसोपानं तप्तकाञ्चनवेदिकम् । उसका वेग मनके समान तीव्र था । वह अपने ऊपर बैठे हुए लोगोंकी इच्छा के अनुसार सब जगह जा सकता था तथा चालक जैसा चाहे, वैसा छोटा या बड़ा रूप धारण कर लेता था । उस आकाशचारी विमानमें मणि और सुवर्णकी सीढ़ियाँ तथा तपाये हुए सोनेकी वेदियाँ बनी थीं ॥ ३ ९ ३ ॥ देवोपवाह्यमक्षय्यं सदा दृष्टिमनःसुखम् ॥ ४० ॥

बह्नाश्चर्य भक्तिचित्रं ब्रह्मणा परिनिर्मितम् । वह देवताओंका ही वाहन था और टूटने - फूटनेवाला नहीं था । सदा देखने में सुन्दर और चित्तको प्रसन्न करनेवाला था । उसके भीतर अनेक प्रकारके आश्चर्यजनक चित्र थे । उसकी दीवारोंपर तरह - तरह के बेल - बूटे बने थे, जिनसे उनकी विचित्र शोभा हो रही थी । ब्रह्मा ( विश्वकर्मा ) ने उसका निर्माण किया था ॥ ४०३ ॥

निर्मितं सर्वकामैस्तु मनोहरमनुत्तमम् ॥ ४१ ॥

न तु शीतं न चोष्णं च सर्वर्तुसुखदं शुभम् ।

स तं राजा समारुह्य कामगं वीर्यनिर्जितम् ॥ ४२ ॥

जितं त्रिभुवनं मेने दर्पोत्सेकात् सुदुर्मतिः ।

जित्वा वैश्रवणं देवं कैलासात् समवातरत् ॥ ४३ ॥

वह सब प्रकारकी मनोवाञ्छित वस्तुओंसे सम्पन्न, मनोहर और परम उत्तम था । न अधिक ठंडा था और न अधिक गरम | सभी ऋतुओंमें आराम पहुँचानेवाला तथा मङ्गलकारी था । अपने पराक्रमसे जीते हुए उस इच्छानुसार चलनेवाले विमानपर आरूढ़ हो अत्यन्त खोटी बुद्धिवाला राजा रावण अहंकार की अधिकतासे ऐसा मानने लगा कि मैंने तीनों लोकोंको जीत लिया । इस प्रकार वैश्रवणदेवको पराजित करके वह कैलाससे नीचे उतरा ॥ ४१-४३ ॥ स तेजसा विपुलमवाप्य तं जयं प्रतापवान् विमलकिरीटहारवान् । रराज वै परमविमानमास्थितो निशाचरः सदसि गतो यथानलः ॥ ४४ ॥

निर्मल किरीट और हारसे विभूषित वह प्रतापी निशाचर अपने तेजसे उस महान् विजयको पाकर उस उत्तम विमानपर आरूढ़ हो यज्ञमण्डपमें प्रज्वलित होनेवाले अग्निदेवकी भाँति शोभा पाने लगा ॥ ४४ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये उत्तरकाण्डे पञ्चदशः सर्गः ॥ १५ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें पंद्रहवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ १५ ॥

षोडशः सर्गः नन्दीश्वरका रावणको शाप, भगवान् शङ्करद्वारा रावणका मान भङ्ग तथा उनसे चन्द्रहास

स जित्वा धनदं राम भ्रातरं राक्षसाधिपः ।

महासेनप्रसूतिं तद् ययौ शरवणं महत् ॥ १ ॥

( अगस्त्यजी कहते हैं— ) रघुकुलनन्दन राम! अपने भाई कुबेरको जीतकर राक्षसराज दशग्रीव ' शरवण ' नामसे प्रसिद्ध सरकंडों के विशाल वनमें गया, जहाँ महासेन कार्तिकेय-जी की उत्पत्ति हुई थी ॥ १ ॥

अथापश्यद् दशग्रीवो रौक्मं शरवणं महत् । नामक खड़की प्राप्ति गभस्तिजालसंवीतं द्वितीयमिव भास्करम् ॥ २ ॥

वहाँ पहुँचकर दशग्रीवने सुवर्णमयी कान्तिसे युक्त उस विशाल शरवण ( सरकंडोंके जंगल ) को देखा, जो किरण-समूहोंसे व्याप्त होनेके कारण दूसरे सूर्यदेवके समान प्रकाशित हो रहा था ॥ २ ॥

स पर्वतं समारुह्य कंचिद् रम्यवनान्तरम् ।

प्रेक्षते पुष्पकं तत्र राम विष्टम्भितं तदा ॥ ३ ॥

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१४ ९ ४ भीमवाल्मीकीय रामायणे उसके पास ही कोई पर्वत था, जहाँकी वनस्थली बड़ी रमणीय थी 1 । श्रीराम! जब वह उसपर चढ़ने लगा, तब देखता है कि पुष्पक विमानकी गति रुक गयी ॥ ३ ॥

विष्टब्धं किमिदं कस्मान्नागमत् कामगं कृतम् ।

अचिन्तयद् राक्षसेन्द्रः सचिवैस्तैः समावृतः ॥ ४ ॥

किंनिमित्तमिच्छया मे नेदं गच्छति पुष्पकम् ।

पर्वतस्योपरिष्टस्य कर्मेदं कस्यचिद् भवेत् ॥ ५ ॥

तब वह राक्षसराज अपने उन मन्त्रियोंके साथ मिलकर विचार करने लगा – “ क्या कारण है कि यह पुष्पक विमान रुक गया? यह तो स्वामीकी इच्छाके अनुसार चलनेवाला बनाया गया है । फिर आगे क्यों नहीं बढ़ता? कौन सा ऐसा कारण बन गया, जिससे यह पुष्पक विमान मेरी इच्छाके अनुसार नहीं चल रहा है? सम्भव है, इस पर्वत के ऊपर कोई रहता हो, उसी का यह कर्म हो सकता है? ' ॥ ४-५ ॥

ततोऽब्रवीत् तदा राम मारीचो बुद्धिकोविदः ।

नेदं निष्कारणं राजन् पुष्पकं यन्न गच्छति ॥ ६ ॥

श्रीराम! तब बुद्धिकुशल मारीचने कहा – “ राजन्! यह पुष्पक विमान जो आगे नहीं बढ़ रहा है, इसमें कुछ - न - कुछ कारण अवश्य है । अकारण ही ऐसी घटना घटित हो गयी हो, यह बात नहीं है ॥ ६ ॥

अथवा पुष्पकमिदं धनदान्नान्यवाहनम् ।

अतो निस्पन्दमभवद् धनाध्यक्षविनाकृतम् ॥ ७ ॥

' अथवा यह पुष्पक विमान कुबेरके सिवा दूसरेका वाहन नहीं हो सकता, इसीलिये उनके बिना यह निश्चेष्ट हो गया है ' ॥ ७ ॥

इति वाक्यान्तरे तस्य करालः कृष्णपिङ्गलः ।

वामनो विकटो मुण्डी नन्दी ह्रस्वभुजो बली ॥ ८ ॥

ततः पार्श्वमुपागम्य भवस्यानुचरोऽब्रवीत् ।

नन्दीश्वरो वचश्चेदं राक्षसेन्द्रमशङ्कितः ॥ ९ ॥

उसकी इस बात के बीच में ही भगवान् शङ्करके पार्षद नन्दीश्वर रावणके पास आ पहुँचे, जो देखने में बड़े विकराल थे । उनकी अङ्गकान्ति काले एवं पिङ्गल वर्णकी थी । वे नाटे कदके विकट रूपवाले थे । उनका मस्तक मुण्डित और भुजाएँ छोटी - छोटी थीं । वे बड़े बलवान् थे । नन्दीने निःशङ्क होकर राक्षसराज दशग्रीवसे इस प्रकार कहा- ॥ ८ - ९ ॥

निवर्तस्व दशग्रीव शैले क्रीडति शंकरः ।

सुपर्णनागयक्षाणां देवगन्धर्वरक्षसाम् ॥ १० ॥

सर्वेषामेव भूतानामगम्यः पर्वतः कृतः । ' दशग्रीव! लौट जाओ । इस पर्वतपर भगवान् शङ्कर क्रीडा करते हैं । यहाँ सुपर्ण, नाग, यक्ष, देवता, गन्धर्व और राक्षस सभी प्राणियोंका आना - जाना बंद कर दिया गया है ' ॥ इति नन्दिवचः श्रुत्वा क्रोधात् कम्पितकुण्डलः ॥ ११ ॥

रोषात् तु ताम्रनयनः पुष्पकादवरुह्य सः ।

कोऽयं शङ्कर इत्युक्त्वा शैलमूलमुपागतः ॥ १२ ॥

नन्दीकी यह बात सुनकर दशग्रीव कुपित हो उठा । उसके कानोंके कुण्डल हिलने लगे । आँखें रोषसे लाल हो गयीं और वह पुष्पकसे उतरकर बोला- ' कौन है यह शङ्कर? ' ऐसा कहकर वह पर्वतके मूलभागमें आ गया ॥ ११-१२ ॥ सोऽपश्यन्नन्दिनं तत्र देवस्यादूरतः दीप्तं शूलमवष्टभ्य द्वितीयमिव वहाँ पहुँचकर उसने देखा, भगवान् दूरपर चमचमाता हुआ शूल हाथमें लिये भाँति खड़े हैं ॥ १३ ॥

तं दृष्ट्रा वानरमुखमवज्ञाय स प्रहासं मुमुचे तत्र सतोय इव उनका मुँह वानरके समान था ।

स्थितम् ।

शङ्करम् ॥ १३ ॥

शङ्करसे थोड़ी ही नन्दी दूसरे शिवकी

राक्षसः ।

तोयदः ॥ १४ ॥

उन्हें देखकर वह निशाचर उनका तिरस्कार करता हुआ सजल जलधरके समान गम्भीर स्वरमें ठहाका मारकर हँसने लगा ॥ १४ ॥

तं क्रुद्धो भगवान् नन्दी शङ्करस्यापरा तनुः ।

अब्रवीत् तत्र तद् रक्षो दशाननमुपस्थितम् ॥ १५ ॥

यह देख शिवके दूसरे स्वरूप भगवान् नन्दी कुपित हो वहाँ पास ही खड़े हुए निशाचर दशमुखसे इस प्रकार बोले— ॥

यस्माद् वानररूपं मामवज्ञाय दशानन ।

अशनीपातसंकाशमपहासं प्रमुक्तवान् ॥ १६ ॥

तस्मान्मद्वीर्यसंयुक्ता मद्रूपसमतेजसः ।

उत्पत्स्यन्ति वधार्थं हि कुलस्य तव वानराः ॥ १७ ॥

“ दशानन! तुमने वानररूपमें मुझे देखकर मेरी अवहेलना की है और वज्रपातके समान भयानक अट्टहास किया है; अत: तुम्हारे कुलका विनाश करनेके लिये मेरे ही समान पराक्रम, रूप और तेजसे सम्पन्न वानर उत्पन्न होंगे ॥

नखदंष्ट्रायुधाः क्रूर मनःसम्पातरंहसः ।

युद्धोन्मत्ता बलोद्रिकाः शैला इव विसर्पिणः ॥ १८ ॥

' क्रूर निशाचर! नख और दाँत ही उन वानरोंके अस्त्र होंगे तथा मनके समान उनका तीव्र वेग होगा । वे युद्धके लिये उन्मत्त रहनेवाले और अतिशय बलशाली होंगे तथा चलते - फिरते पर्वतों के समान जान पड़ेंगे । १८ ॥

ते तव प्रबलं दर्पमुत्सेधं च पृथग्विधम् ।

व्यपनेष्यन्ति सम्भूय सहामात्यसुतस्य च ॥१ ९ ॥

" वे एकत्र होकर मन्त्री और पुत्रोंसहित तुम्हारे प्रबल अभिमानको और विशालकाय होनेके गर्वको चूर - चूर कर देंगे ॥ १ ९ ॥

किं त्विदानीं मया शक्यं हन्तुं त्वां हे निशाचर ।

न हन्तव्यो हतस्त्वं हि पूर्वमेव स्वकर्मभिः ॥ २० ॥

' ओ निशाचर! मैं तुम्हें अभी मार डालने की शक्ति रखता हूँ, तथापि तुम्हें मारना नहीं है; क्योंकि अपने कुत्सित

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उत्तरकाण्डे षोडशः सर्गः कर्मों द्वारा तुम पहले से ही मारे जा चुके हो ( अतः मरे हुए-को मारनेसे क्या लाभ १ ) ॥ २० ॥

इत्युदीरितवाक्ये तु देवे तस्मिन् महात्मनि ।

देवदुन्दुभयो नेदुः पुष्पवृष्टिश्च खाच्च्युता ॥ २१ ॥

महामना भगवान् नन्दीके इतना कहते ही देवताओंकी दुन्दुभियाँ बज उठीं और आकाशसे फूलोंकी वर्षा होने लगी ॥

अचिन्तयित्वा स तदा नन्दिवाक्यं महाबलः ।

पर्वतं तु समासाद्य वाक्यमाह दशाननः ॥ २२ ॥

परंतु महाबली दशाननने उस समय नन्दीके उन वचनों की कोई परवा नहीं की और उस पर्वतके निकट जाकर कहा- ॥ २२ ॥

पुष्पकस्य गतिरिछन्ना यत्कृते मम गच्छतः ।

तमिमं शैलमुन्मूलं करोमि तव गोपते ॥ २३ ॥

“ पशुपते! जिसके कारण यात्रा करते समय मेरे पुष्पक विमानकी गति रुक गयी, तुम्हारे उस पर्वतको, जो यह मेरे सामने खड़ा है, मैं जड़ से उखाड़ फेंकता हूँ ॥ २३ ॥

केन प्रभावेण भवो नित्यं क्रीडति राजवत् ।

विज्ञातव्यं न जानीते भय स्थानमुपस्थितम् ॥ २४ ॥

' किस प्रभावसे शङ्कर प्रतिदिन यहाँ राजाकी भाँति क्रीडा करते हैं? इन्हें इस जानने योग्य बातका भी पता नहीं है कि इनके समक्ष भयका स्थान उपस्थित है ' ॥ २४ ॥

एवमुक्त्वा ततो राम भुजान् विक्षिप्य पर्वते ।

तोलयामास तं शीघ्रं स शैलः समकम्पत ॥ २५ ॥

श्रीराम! ऐसा कहकर दशग्रीवने पर्वतके निचले भाग में अपनी भुजाएँ लगायीं और उसे शीघ्र उठा लेनेका प्रयत्न किया । वह पर्वत हिलने लगा ॥ २५ ॥

चालनात् पर्वतस्यैव गणा देवस्य कम्पिताः ।

चचाल पार्वती चापि तदाश्लिष्टा महेश्वरम् ॥ २६ ॥

पर्वतके हिलने से भगवान् शङ्करके सारे गण काँप उठे । पार्वती देवी भी विचलित हो उठीं और भगवान् शङ्करसे लिपट गयीं ॥ २६ ॥

ततो राम महादेवो देवानां प्रवरो हरः ।

पादाङ्गुष्ठेन तं शैलं पीडयामास लीलया ॥ २७ ॥

श्रीराम! तब देवताओंमें श्रेष्ठ पापहारी महादेवने उस पर्वतको अपने पैर के अँगूठेसे खिलवाड़ में ही दबा दिया ॥

पीडितास्तु ततस्तस्य शैलस्तम्भोपमा भुजाः ।

विस्मिताश्चाभवंस्तत्र सचिवास्तस्य रक्षसः ॥ २८ ॥

फिर तो दशग्रीवकी वे भुजाएँ, जो पर्वतके खंभोंके समान जान पड़ती थीं, उस पहाड़के नीचे दब गयीं । यह देख वहाँ खड़े हुए उस राक्षसके मन्त्री बड़े आश्चर्यमें पड़ गये ॥

रक्षसा तेन रोषाच्च भुजानां पीडनात् तथा ।

मुक्तो विरावः सहसा त्रैलोक्यं येन कम्पितम् ॥ २ ९ ॥

उस राक्षसने रोष तथा अपनी बाँहोंकी पीड़ाके कारण सहसा बड़े जोरसे विराव — रोदन अथवा आर्तनाद किया, जिससे तीनों लोकोंके प्राणी काँप उठे ॥ २ ९ ॥

मेनिरे वज्रनिष्पेषं तस्यामात्या युगक्षये ।

तदा वर्त्मसु चलिता देवा इन्द्रपुरोगमाः ॥ ३० ॥

उसके मन्त्रियोंने समझा, अब प्रलयकाल आ गया और विनाशकारी वज्रपात होने लगा है । उस समय इन्द्र आदि देवता मार्ग में विचलित हो उठे ॥ ३० ॥

समुद्राश्चापि संक्षुब्धाश्चलिताश्चापि पर्वताः ।

यक्षा विद्याधराः सिद्धाः किमेतदिति चाब्रुवन् ॥ ३१ ॥

समुद्रोंमें ज्वार आ गया । पर्वत हिलने लगे और यक्ष, विद्याधर तथा सिद्ध एक दूसरे से पूछने लगे – “ यह क्या हो गया? ' ॥ ३१ ॥

तोषयस्व महादेवं नीलकण्ठमुमापतिम् ।

तमृते शरणं नान्यं पश्यामोऽत्र दशानन ॥ ३२ ॥

तदनन्तर दशग्रीवके मन्त्रियोंने उससे कहा - ' महाराज दशानन! अब आप नीलकण्ठ उमावल्लभ महादेवजीको संतुष्ट कीजिये । उनके सिवा दूसरे किसीको हम ऐसा नहीं देखते, जो यहाँ आपको शरण दे सके ॥ ३२ ॥

स्तुतिभिः प्रणतो भूत्वा तमेव शरणं व्रज ।

कृपालुः शङ्करस्तुष्टः प्रसादं ते विधास्यति ॥ ३३ ॥

' आप स्तुतियोंद्वारा उन्हें प्रणाम करके उन्हींकी शरण में

जाइये । भगवान् शङ्कर बड़े दयालु हैं । वे संतुष्ट होकर आप-पर कृपा करेंगे ' ॥ ३३ ॥

एवमुक्तस्तदामात्यैस्तुष्टाव वृषभध्वजम् ।

सामभिर्विविधैः स्तोत्रैः प्रणम्य स दशाननः ।

संवत्सरसहस्रं तु रुदतो रक्षसो गतम् ॥ ३४ ॥

मन्त्रियोंके ऐसा कहनेपर दशमुख रावणने भगवान् वृषभध्वजको प्रणाम करके नाना प्रकारके स्तोत्रों तथा साम-वेदोक्त मन्त्रोंद्वारा उनका स्तवन किया । इस प्रकार हाथोंकी पीड़ासे रोते और स्तुति करते हुए उस राक्षसके एक हजार वर्ष बीत गये ॥ ३४ ॥

ततः प्रीतो महादेवः शैलाग्रे विष्ठितः प्रभुः ।

मुक्त्वा चास्य भुजान् राम प्राह वाक्यं दशाननम् ॥ ३५ ॥

श्रीराम! तत्पश्चात् उस पर्वतके शिखरपर स्थित हुए भगवान् महादेव प्रसन्न हो गये । उन्होंने दशग्रीवकी भुजाओं-को उस संकटसे मुक्त करके उससे कहा- ॥ ३५ ॥

प्रीतोऽस्मि तव वीरस्य शौटीर्याश्च दशानन ।

शैलाक्रान्तेन यो मुक्तस्त्वया रावः सुदारुणः ॥ ३६ ॥

यस्माल्लोकत्रयं चैतद् रावितं भयमागतम् ।

तस्मात् त्वं रावणो नाम नाम्ना राजन् भविष्यसि ॥३७ ॥

" दशानन! तुम वीर हो । तुम्हारे पराक्रमसे मैं प्रसन्न हूँ । तुमने पर्वतसे दब जानेके कारण जो अत्यन्त भयानक राव ( आर्तनाद ) किया था, उससे भयभीत होकर तीनों

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१४ ९ ६ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे लोकोंके प्राणी रो उठे थे, इसलिये राक्षसराज! अब तुम रावणके नामसे प्रसिद्ध होओगे ॥ ३६-३७ ॥

देवता मानुषा यक्षा ये चान्ये जगतीतले ।

एवं त्वामभिधास्यन्ति रावणं लोकरावणम् ॥ ३८ ॥

' देवता, मनुष्य, यक्ष तथा दूसरे जो लोग भूतलपर निवास करते हैं, वे सब इस प्रकार समस्त लोकोंको रुलानेवाले तुझ दशग्रीवको रावण कहेंगे ॥ ३८ ॥

गच्छ पौलस्त्य विस्रब्धं पथा येन त्वमिच्छसि ।

मया चैवाभ्यनुज्ञातो राक्षसाधिप गम्यताम् ॥ ३ ९ ॥

' पुलस्त्यनन्दन! अब तुम जिस मार्गसे जाना चाहो, बेखटके जा सकते हो । राक्षसपते!! मैं भी तुम्हें अपनी ओर से जानेकी आज्ञा देता हूँ, जाओ ' ॥ ३ ९ ॥

एवमुक्तस्तु लङ्केशः शम्भुना स्वयमब्रवीत् ।

प्रीतो यदि महादेव वरं मे देहि याचतः ॥ ४० ॥

भगवान् शङ्करके ऐसा कहनेपर लङ्केश्वर बोला-' महादेव! यदि आप प्रसन्न हैं तो वर दीजिये । मैं आपसे बरकी याचना करता हूँ ॥ ४० ॥

अवध्यत्वं मया प्राप्तं देवगन्धर्वदानवैः ।

राक्षसैर्गुह्यकैर्नागैर्ये चान्ये बलवत्तराः ॥ ४१ ॥

" मैंने देवता, गन्धर्व, दानव, राक्षस, गुहथक, नाग तथा अन्य महाबलशाली प्राणियोंसे अवध्य होने का वर प्राप्त किया है ॥ ४१ ॥

मानुषान् न गणे देव स्वल्पास्ते मम सम्मताः ।

दीर्घमायुश्च मे प्राप्तं ब्रह्मणस्त्रिपुरान्तक ॥ ४२ ॥

वाञ्छितं चायुषः शेषं शस्त्रं त्वं च प्रयच्छ मे । " देव! मनुष्यों को तो मैं कुछ गिनता ही नहीं । मेरी मान्यताके अनुसार उनकी शक्ति बहुत थोड़ी है । त्रिपुरान्तक! मुझे ब्रह्माजीके द्वारा दीर्घं आयु भी प्राप्त हुई है । ब्रह्माजीकी दी हुई आयुका जितना अंश बच गया है, वह भी पूरा - का-पूरा प्राप्त हो जाय ( उसमें किसी कारणसे कमी न हो ) । ऐसी मेरी इच्छा है । इसे आप पूर्णं कीजिये । साथ ही अपनी ओरसे मुझे एक शस्त्र भी दीजिये ॥ ४२३ ॥

एवमुक्तस्ततस्तेन रावणेन स शङ्करः ॥ ४३ ॥

ददौ खङ्गं महादीप्तं चन्द्रहासमिति श्रुतम् ।

आयुषश्चावशेषं च ददौ भूतपतिस्तदा ॥ ४४ ॥

रावणके ऐसा कहनेपर भूतनाथ भगवान् शङ्करने उसे एक अत्यन्त दीप्तिमान् चन्द्रहास नामक खड्ग दिया और उसकी आयुका जो अंश बीत गया था, उसको भी पूर्ण कर दिया ॥ ४३-४४ ॥

दरवोवाच ततः शम्भुर्नावज्ञेयमिदं त्वया ।

अवज्ञातं यदि हि ते मामेवैष्यत्यसंशयः ॥ ४५ ॥

उस खड्गको देकर भगवान् शिवने कहा- ' तुम्हें कभी इसका तिरस्कार नहीं करना चाहिये । यदि तुम्हारे द्वारा कभी इसका तिरस्कार हुआ तो यह फिर मेरे ही पास लौट आयेगा; इसमें संशय नहीं है ' ॥ ४५ ॥

एवं महेश्वरेणैव कृतनामा स रावणः ।

अभिवाद्य महादेवमारुरोहाथ पुष्पकम् ॥ ४६ ॥

इस प्रकार भगवान् शङ्करसे नूतन नाम पाकर रावणने उन्हें प्रणाम किया । तत्पश्चात् वह पुष्पक विमानपर आरूढ़ हुआ ॥

ततो महीतलं राम पर्यक्रामत रावणः ।

क्षत्रियान् सुमहावीर्यान् बाधमानस्ततस्ततः ॥ ४७ ॥

श्रीराम! इसके बाद रावण समूची पृथ्वी पर दिग्विजय के लिये भ्रमण करने लगा । उसने इधर - उधर जाकर बहुत - से महापराक्रमी क्षत्रियोंको पीड़ा पहुँचायी ॥ ४७ ॥

केचित् तेजस्विनः शूराः क्षत्रिया युद्धदुर्मदाः ।

तच्छासनमकुर्वन्तो विनेशुः सपरिच्छदाः ॥ ४८ ॥

कितने ही तेजस्वी क्षत्रिय जो बड़े ही शूरवीर और रणोन्मत्त थे, रावणकी आज्ञा न माननेके कारण सेना और परिवार-सहित नष्ट हो गये ॥ ४८ ॥

अपरे दुर्जयं रक्षो जानन्तः प्राज्ञसम्मताः ।

जिताः स्म इत्यभाषन्त राक्षसं बलदर्पितम् ॥ ४ ९ ॥

दूसरे क्षत्रियोंने, जो बुद्धिमान् माने जाते थे और उस राक्षसको अजेय समझते थे, उस बलाभिमानी निशाचरके सामने अपनी पराजय स्वीकार कर ली ॥ ४ ९ ॥ इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये उत्तरकाण्डे षोडशः सर्गः ॥ १६ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यकं उत्तरकाण्डमें सोलहवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ १६ ॥

सप्तदशः सर्गः रावणसे तिरस्कृत ब्रह्मर्षि- कन्या वेदवतीका उसे शाप देकर अग्निमें प्रवेश करना और दूसरे जन्ममें सीताके रूपमें प्रादुर्भूत होना महाबाहुर्विचरन् पृथिवीतले । तत्रापश्यत् स वै कन्यां कृष्णाजिनजटाधराम् । अथ राजन् हिमवद्वनमासाद्य परिचक्राम रावणः ॥ १ ॥ आर्षेण विधिना चैनां दीप्यन्तीं देवतामिव ॥ २ ॥

( अगस्त्यजी कहते हैं - ) राजन्! तत्पश्चात् महाबाहु वहाँ उसने एक तपस्विनी कन्याको देखा, जो अपने अङ्ग-रावण भूतलपर विचरता हुआ हिमालयके वनमें आकर वहाँ सब ओर चक्कर लगाने लगा ॥ १ ॥... में काले रंगका मृगचर्म तथा सिरपर जटा धारण किये हुए थी ।

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उत्तरकाण्डे सप्तदशः सर्गः १४ ९ ७ वह ऋषिप्रोक्त विधिसे तपस्या में संलग्न हो देवाङ्गनाके समान उद्दीप्त हो रही थी ॥ २ ॥

स दृष्ट्वा रूपसम्पन्नां कन्यां तां सुमहाव्रताम् ।

काम मोहपरीतात्मा पप्रच्छ प्रहसन्निव ॥ ३ ॥

उत्तम एवं महान् व्रतका पालन करनेवाली तथा रूप-सौन्दर्य से सुशोभित उस कन्याको देखकर रावणका चित्त काम-जनित मोहके वशीभूत हो गया । उसने अट्टहास करते हुए से ' पूछा- ॥ ३ ॥

' किमिदं वर्तसे भद्रे विरुद्धं यौवनस्य ते ।

नहि युक्ता तवैतस्य रूपस्यैवं प्रतिक्रिया ॥ ४ ॥

' भद्रे! तुम अपनी इस युवावस्था के विपरीत यह कैसा बर्ताव कर रही हो? तुम्हारे इस दिव्य रूपके लिये ऐसा आचरण कदापि उचित नहीं है ॥ ४ ॥

रूपं तेऽनुपमं भीरु कामोन्मादकरं नृणाम् ।

न युक्तं तपसि स्थातुं निर्गतो ह्येष निर्णयः ॥ ५ ॥

' भीरु! तुम्हारे इस रूपकी कहीं तुलना नहीं है । यह पुरुषों के हृदय में कामजनित उन्माद पैदा करनेवाला है । अतः तुम्हारा तपमें संलग्न होना उचित नहीं है 1 । तुम्हारे लिये हमारे हृदयसे यही निर्णय प्रकट हुआ है ॥ ५ ॥

कस्यासि किमिदं भद्रे कश्च भर्ता वरानने ।

येन सम्भुज्यसे भीरु स नरः पुण्यभाग भुवि ॥ ६ ॥

पृच्छतः शंस मे सर्व कस्य हेतोः परिश्रमः । ' भद्रे! तुम किसकी पुत्री हो? यह कौन सा व्रत कर रही हो? सुमुखि! तुम्हारा पति कौन है? भीरु! जिसके साथ तुम्हारा सम्बन्ध है, वह मनुष्य इस भूलोकमें महान् पुण्यात्मा है । मैं जो कुछ पूछता हूँ, वह सब मुझे बताओं । किस फलके लिये यह परिश्रम किया जा रहा है? १ ॥ ६३ ॥

एवमुक्ता तु सा कन्या रावणेन यशखिनी ॥ ७ ॥

अब्रवीद् विधिवत् कृत्वा तस्यातिथ्यं तपोधना । रावण के इस प्रकार पूछनेपर वह यशस्विनी तपोधना कन्या उसका विधिवत् आतिथ्य सत्कार करके बोली – ॥७३ ॥

कुशध्वजो नाम पिता ब्रह्मर्षिरमितप्रभः ॥ ८ ॥

बृहस्पतिसुतः श्रीमान् बुद्धया तुल्यो बृहस्पतेः । ' अमिततेजस्वी ब्रह्मर्षि श्रीमान् कुशध्वज मेरे पिता थे, जो बृहस्पतिके पुत्र थे और बुद्धिमें भी उन्हींके समान माने जाते थे ॥ ८३ ॥

तस्याहं कुर्वतो नित्यं वेदाभ्यासं महात्मनः ॥ ९ ॥

सम्भूता वाङ्मयी कन्या नाम्ना वेदवती स्मृता । ‘ प्रतिदिन वेदाभ्यास करनेवाले उन महात्मा पितासे वाङ्मयी कन्या के रूपमें मेरा प्रादुर्भाव हुआ था । मेरा नाम वेदवती है ॥ ९ ३ ॥ ततो देवाः सगन्धर्वा यक्षराक्षसपन्नगाः ॥ १० ॥

ते चापि गत्वा पितरं वरणं रोचयन्ति मे । बा ० रा ० ५.११.८--' जब मैं बड़ी हुई, तब देवता, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस और

नाग भी पिताजी के पास जा - जाकर उनसे मुझे माँगने लगे । १०३ ।

न च मांस पिता तेभ्यो दत्तवान् राक्षसेश्वर ॥ ११ ॥

कारणं तद् वदिष्यामि निशामय महाभुज । ' महाबाहु राक्षसेश्वर! पिताजीने उनके हाथमें मुझे नहीं सौंपा । इसका क्या कारण था, मैं बता रही हूँ, सुनिये ॥११३ ॥

पितुस्तु मम जामाता विष्णुः किल सुरेश्वरः ॥ १२ ॥

अभिप्रेतस्त्रिलोकेशस्तस्मान्नान्यस्य मे पिता ।

दातुमिच्छति तस्मै तु तच्छ्रुत्वा बलदर्पितः ॥ १३ ॥

शम्भुर्नाम ततो राजा दैत्यानां कुपितोऽभवत् ।

तेन रात्रौ शयानो मे पिता पापेन हिंसितः ॥ १४ ॥

' पिताजीकी इच्छा थी कि तीनों लोकोंके स्वामी देवेश्वर भगवान् विष्णु मेरे दामाद हों । इसीलिये वे दूसरे किसीके हाथमें मुझे नहीं देना चाहते थे । उनके इस अभिप्रायको सुनकर बलाभिमानी दैत्यराज शम्भु उनपर कुपित हो उठा और उस पापीने रातमें सोते समय मेरे पिताजीकी हत्या कर डाली ॥ १२-१४ ॥

ततो मे जननी दीना तच्छरीरं पितुर्मम ।

परिष्वज्य महाभागा प्रविष्टा हव्यवाहनम् ॥ १५ ॥

‘ इससे मेरी महाभागा माताको बड़ा दुःख हुआ और वे पिताजीके शवको हृदयसे लगाकर चिता की आगमें प्रविष्ट हो गयीं ॥ १५ ॥

ततो मनोरथं सत्यं पितुर्नारायणं प्रति ।

करोमीति तमेवाहं हृदयेन समुद्वहे ॥ १६ ॥

' तबसे मैंने प्रतिज्ञा कर ली है कि भगवान् नारायण के

प्रति पिताजीका जो मनोरथ था, उसे मैं सफल करूँगी ।

इसलिये मैं उन्हींको अपने हृदय मन्दिरमें धारण करती हूँ ॥

इति प्रतिज्ञामारुह्य चरामि विपुलं तपः ।

एतत् ते सर्वमाख्यातं मया राक्षसपुङ्गव ॥ १७ ॥

“ यही प्रतिज्ञा करके मैं यह महान् तप कर रही हूँ ।

राक्षसराज! आपके प्रश्न के अनुसार यह सब बात मैंने आप-को बता दी ॥ १७ ॥

नारायणो मम पतिर्न त्वन्यः पुरुषोत्तमात् ।

आश्रये नियमं घोरं नारायणपरीप्सया ॥ १८ ॥

' नारायण ही मेरे पति हैं । उन पुरुषोत्तमके सिवा दूसरा कोई मेरा पति नहीं हो सकता । उन नारायणदेवको प्राप्त करने के लिये ही मैंने इस कठोर व्रतका आश्रय लिया है ॥ १८ ॥

विज्ञातस्त्वं हि मे राजन् गच्छ पौलस्त्यनन्दन ।

जानामि तपसा सर्व त्रैलोक्ये यद्धि वर्तते ॥ १ ९ ॥

' राजन्! पौलस्त्यनन्दन! मैंने आपको पहचान लिया है । आप जाइये । त्रिलोकीमें जो कोई भी वस्तु विद्यमान है, वह सब मैं तपस्याद्वारा जानती हूँ ' ॥ १ ९ ॥ सोऽब्रवीद् रावणो भूयस्तां कन्यां सुमहाव्रताम् ।