श्रीगणेशाय नमः।
वाल्मीकि रामायण — खण्ड २ — पृष्ठ 691–700
वाल्मीकि रामायण — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 691–700
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१४७८ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे
मातुस्तद् वचनं श्रुत्वा दशग्रीवः प्रतापवान् ।
अमर्षमतुलं लेभे प्रतिशां चाकरोत् तदा ॥ ४४ ॥
माताकी यह बात सुनकर प्रतापी दशग्रीवको अनुपम अमर्ष हुआ । उसने तत्काल प्रतिज्ञा की - ॥ ४४ ॥
सत्यं ते प्रतिजानामि भ्रातृतुल्योऽधिकोऽपि वा ।
भविष्याम्योजसा चैव संतापं त्यज हगतम् ॥ ४५ ॥
" माँ! तुम अपने हृदयकी चिन्ता छोड़ो । मैं तुमसे सच्ची प्रतिज्ञापूर्वक कहता हूँ कि अपने पराक्रमसे भाई वैश्रवण समान या उनसे भी बढ़कर हो जाऊँगा ' ॥ ४५ ॥
ततः क्रोधेन तेनैव दशग्रीवः सहानुजः ।
चिकीर्षुदुष्करं कर्म तपसे धृतमानसः ॥ ४६ ॥
प्राप्स्यामि तपसा काममिति कृत्वाध्यवस्य च ।
भगच्छदात्मसिद्धयर्थं गोकर्णस्याश्रमं शुभम् ॥ ४७ ॥
तदनन्तर दुष्कर कर्मकी अपना मनोरथ तपस्या का ही वह गोकर्णके स उसी क्रोधके आवेशमें भाइयोंसहित दशग्रीवने इच्छा मनमें लेकर सोचा – मैं तपस्या से ही पूर्ण कर सकूँगा, ऐसा विचारकर उसने मन में निश्चय किया और अपनी अभीष्ट - सिद्धि के लिये पवित्र आश्रमपर गया ॥ ४६-४७ ॥ राक्षसस्तत्र सहानुजस्तदा तपश्चचारातुलमुग्रविक्रमः अतोषयच्चापि पितामहं विभुं ददौ स तुष्टश्व वराञ्जयावहान् ॥ ४८ ॥
भाइयोसहित उस भयंकर पराक्रमी राक्षसने अनुपम तपस्या आरम्भ की । उस तपस्याद्वारा उसने भगवान् ब्रह्माजीको संतुष्ट किया और उन्होंने प्रसन्न होकर उसे विजय दिलानेवाले वरदान दिये ॥ ४८ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये उत्तरकाण्डे नवमः सर्गः ॥ ९ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें नवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ९ ॥
दशमः सर्गः रावण आदिकी तपस्या और वर - प्राप्ति
अथाब्रवीन्मुनिं रामः कथं ते भ्रातरो वने ।
कीदृशं तु तदा ब्रह्मंस्तपस्तेपुर्महाबलाः ॥ १ ॥
इतनी कथा सुनकर श्रीरामचन्द्रजीने अगस्त्य मुनिसे पूछा- ' ब्रह्मन्! उन तीनों महाबली भाइयोंने वनमें किस प्रकार और कैसी तपस्या की ११ ॥ १ ॥
अगस्त्यस्त्वब्रवीत् तत्र रामं सुप्रीतमानसम् ।
तांस्तान् धर्मविधस्तत्र भ्रातरस्ते समाविशन् ॥ २ ॥
तब अगस्त्यजीने अत्यन्त प्रसन्नचित्तवाले श्रीरामसे कहा - " घुनन्दन! उन तीनों भाइयोंने वहाँ पृथक् - पृथक् धर्मविधियों का अनुष्ठान किया ॥ २ ॥
कुम्भकर्णस्ततो यत्तो नित्यं धर्मपथे स्थितः ।
तताप ग्रीष्मकाले तु पञ्चाग्नीन् परितः स्थितः ॥ ३ ॥
' कुम्भकर्ण अपनी इन्द्रियोंको संयममें रखकर प्रतिदिन धर्मके मार्ग में स्थित हो गर्मी के दिनोंमें अपने चारों ओर आग जला धूपमें बैठकर पञ्चाग्निका सेवन करने लगा ॥ ३ ॥
मेघाम्बुसिको वर्षासु वीरासनम सेवत ।
नित्यं च शिशिरे काले जलमध्यप्रतिश्रयः ॥ ४ ॥
" फिर वर्षाऋतु में खुले मैदान में वीरासन से बैठकर मेघों के बरसाये हुए जलसे भीगता रहा और जाड़ेके दिनोंमें प्रतिदिन जलके भीतर रहने लगा ॥ ४ ॥
एवं वर्षसहस्राणि दश तस्यापचक्रमुः ।
धर्मे प्रयतमानस्य सत्पथे निष्ठितस्य च ॥ ५ ॥
' इस प्रकार सन्मार्ग में स्थित हो धर्मके लिये प्रयत्नशील हुए उस कुम्भकर्णके दस हजार वर्ष बीत गये ॥ ५ ॥
विभीषणस्तु धर्मात्मा नित्यं धर्मपरः शुचिः ।
पञ्चवर्षसहस्राणि पादेनैकेन तस्थिवान् ॥ ६ ॥
' विभीषण तो सदा से ही धर्मात्मा थे । वे नित्यधर्मपरायण रहकर शुद्ध आचार - विचारका पालन करते हुए पाँच हजार वर्षोंतक एक पैरसे खड़े रहे ॥ ६ ॥
समाप्ते नियमे तस्य ननृतुश्चाप्सरोगणाः ।
पपात पुष्पवर्षे च तुष्टुवुश्चापि देवताः ॥ ७ ॥
" उनका नियम समाप्त होनेपर अप्सराएँ नृत्य करने लगीं । उनके ऊपर आकाशसे फूलोंकी वर्षा हुई और देवताओं-ने उनकी स्तुति की ॥ ७ ॥
पञ्चवर्षसहस्राणि सूर्य चैवान्ववर्तत ।
तस्थौ चोर्ध्वशिरोबाहुः स्वाध्याये धृतमानसः ॥ ८ ॥
‘ तदनन्तर विभीषण ने अपनी दोनों बाँहें और मस्तक ऊपर उठाकर स्वाध्यायपरायण हो पाँच हजार वर्षोंतक सूर्यदेव-की आराधना की ॥ ८ एवं विभीषणस्यापि दशवर्षसहस्राणि ' इस प्रकार मनको हजार वर्ष बड़े सुखसे निवास करते हों ॥। ९ ॥ दशवर्षसहस्रं तु पूर्ण वर्षसहस्रे तु ' दशमुख रावणने ॥
स्वर्गस्थस्येव नन्दने ।
गतानि नियतात्मनः ॥ ९ ॥
वशमें रखनेवाले विभीषण के भी द बीते, मानो वे स्वर्गके नन्दनवन में
निराहारो दशाननः ।
शिरश्चाग्नौ जुहाव सः ॥ १० ॥
दस हजार वर्षोंतक लगातार उपवास किया । प्रत्येक सहस्र वर्षके पूर्ण होनेपर वह अपना एक मस्तक काटकर आगमें होम देता था ॥ १० ॥
एवं वर्षसहस्राणि नव तस्यातिचक्रमुः ।
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उत्तरकाण्डे दशमः सर्गः १४७ ९ शिरांसि नत्र चाप्यस्य प्रविष्टानि हुताशनम् ॥ ११ ॥
' इस तरह एक - एक करके उसके नौ हजार वर्ष बीत गये और नौ मस्तक भी अग्निदेवके भेंट हो गये ॥ ११ ॥
अथ वर्षसहस्रे तु दशमे दशमं शिरः ।
छेत्तुकामे दशग्रीवे प्राप्तस्तत्र पितामहः ॥ १२ ॥
' जब दसवाँ सहस्र पूरा हुआ और दशग्रीव अपना दसवाँ मस्तक काटनेको उद्यत हुआ, इसी समय पितामह ब्रह्माजी वहाँ आ पहुँचे ॥ १२ ॥
पितामहस्तु सुप्रीतः सार्धं देवैरुपस्थितः ।
तव तावद् दशग्रीव प्रीतोऽस्मीत्यभ्यभाषत ॥ १३ ॥
' पितामह ब्रह्मा अत्यन्त प्रसन्न होकर देवताओंके साथ वहाँ पहुँचे थे । उन्होंने आते ही कहा- ' दशग्रीव! मैं तुम-पर बहुत प्रसन्न हूँ ॥ १३ ॥
शीघ्रं वरय धर्मज्ञ वरो यस्तेऽभिकाङ्क्षितः ।
कं ते कामं करोम्यद्य न वृथा ते परिश्रमः ॥ १४ ॥
“ धर्मज्ञ! तुम्हारे मनमें जिस वरको पानेकी इच्छा हो, उसे शीघ्र माँगो 1 । बोलो, आज मैं तुम्हारी किस अभिलाषाको पूर्ण करूँ? तुम्हारा परिश्रम व्यर्थ नहीं होना चाहिये ' ॥ १४ ॥
अथाब्रवीद् दशग्रीवः प्रहृष्टेनान्तरात्मना ।
प्रणम्य शिरसा देवं हर्षगद्गदया गिरा ॥ १५ ॥
" यह सुनकर दशग्रीवकी अन्तरात्मा प्रसन्न हो गयी । उसने मस्तक झुकाकर भगवान् ब्रह्माको प्रणाम किया और हर्ष - गद्दवाणी में कहा- ॥ १५ ॥
भगवन् प्राणिनां नित्यं नान्यत्र मरणाद् भयम् ।
नास्ति मृत्युसमः शत्रुरमरत्वमहं वृणे ॥ १६ ॥
“ भगवन्! प्राणियोंके लिये मृत्युके सिवा और किसीका सदा भय नहीं रहता है; अतएव मैं अमर होना चाहता हूँ; क्योंकि मृत्युके समान दूसरा कोई शत्रु नहीं है ' ॥ १६ ॥
एवमुक्तस्तदा ब्रह्मा दशग्रीवमुवाच ह ।
नास्ति सर्वामरत्वं ते वरमन्यं वृणीष्व मे ॥ १७ ॥
' उसके ऐसा कहने पर ब्रह्माजीने दशग्रीवसे कहा – ' तुम्हें सर्वथा अमरत्व नहीं मिल सकता; इसलिये दूसरा कोई वर माँगो ' ॥ १७ ॥
एवमुक्ते तदा राम ब्रह्मणा लोककर्तृणा ।
दशग्रीव उवाचेदं कृताञ्जलिरथाग्रतः ॥ १८ ॥
“ श्रीराम! लोकस्रष्टा ब्रह्माजी के ऐसा कहनेपर दशग्रीवने उनके सामने हाथ जोड़कर कहा- ॥ १८ ॥
सुपर्णनागयक्षाणां दैत्यदानवरक्षसाम् ।
अवध्योऽहं प्रजाध्यक्ष देवतानां च शाश्वत ॥ १ ९ ॥
" " सनातन प्रजापते! मैं गरुड़, नाग, यक्ष, दैत्य, दानव, राक्षस तथा देवताओंके लिये अवध्य हो जाऊँ ॥ १ ९ ॥
नहि चिन्ता ममान्येषु प्राणिष्वमरपूजित ।
तृणभूता हि ते मन्ये प्राणिनो मानुषादयः ॥ २० ॥
" देववन्द्य पितामह! अन्य प्राणियोंसे मुझे तनिक भी चिन्ता नहीं है । मनुष्य आदि अन्य जीवोंको तो मैं तिनकेके समान समझता हूँ ' ॥ २० ॥
एवमुक्तस्तु धर्मात्मा दशग्रीवेण रक्षसा ।
उवाच वचनं देवः सह देवैः पितामहः ॥ २१ ॥
" राक्षस दशग्रीवके ऐसा कहनेपर देवताओंसहित भगवान् ब्रह्माजीने कहा- ॥ २१ ॥
भविष्यत्येवमेतत् ते वचो राक्षसपुङ्गव ।
एवमुक्त्वा तु तं राम दशग्रीवं पितामहः ॥ २२ ॥
" राक्षसप्रवर! तुम्हारा यह वचन सत्य होगा । ' श्रीराम! दशग्रीवसे ऐसा कहकर पितामह फिर बोले - ॥ २२ ॥
शृणु चापि वरो भूयः प्रीतस्येह शुभो मम ।
हुतानि यानि शीर्षाणि पूर्वमग्नौ त्वयानघ ॥ २३ ॥
पुनस्तानि भविष्यन्ति तथैव तव राक्षस ।
वितरामीह ते सौम्य वरं चान्यं दुरासदम् ॥ २४ ॥
छन्दतस्तव रूपं च मनसा यद् यथेप्सितम् । " निष्पाप राक्षस! सुनो- मैं प्रसन्न होकर पुनः तुम्हें यह शुभ वर प्रदान करता हूँ —तुमने पहले अग्निमें अपने जिन - जिन मस्तकोंका हवन किया है, वे सब तुम्हारे लिये फिर पूर्ववत् प्रकट हो जायँगे । सौम्य! इसके सिवा एक और भी दुर्लभ वर मैं तुम्हें यहाँ दे रहा हूँ —तुम अपने मनसे जब जैसा रूप धारण करना चाहोगे, तुम्हारी इच्छा के अनुसार उस समय तुम्हारा वैसा ही रूप हो जायगा ' ॥ २३-२४३ ॥ एवं पितामहोकस्य दशग्रीवस्य रक्षसः ॥ २५ ॥
अग्नौ हुतानि शीर्षाणि पुनस्तान्युत्थितानि वै । ' पितामह ब्रह्मा के इतना कहते ही राक्षस दशग्रीवके वे मस्तक, जो पहले आगमें होम दिये गये थे, फिर नये रूपमें प्रकट हो गये || २५३ ॥ एवमुक्त्वा तु तं राम दशग्रीवं पितामहः ॥ २६ ॥
विभीषणमथोवाच वाक्यं लोकपितामहः । ' श्रीराम! दशग्रीवसे पूर्वोक्त बात कहकर लोकपितामह ब्रह्माजी विभीषणसे बोले - ॥ २६३ ॥
विभीषण त्वया वत्स धर्मसंहितबुद्धिना ॥ २७ ॥
परितुष्टोऽस्मि धर्मात्मन् वरं वरय सुव्रत । " बेटा विभीषण! तुम्हारी बुद्धि सदा धर्ममें लगी रहने-वाली है, अतः मैं तुमसे बहुत संतुष्ट हूँ । उत्तम व्रतका पालन करनेवाले धर्मात्मन्! तुम भी अपनी रुचिके अनुसार कोई वर माँगो ' ॥ २७३ ॥
विभीषणस्तु धर्मात्मा वचनं प्राह साञ्जलिः ॥ २८ ॥
वृतः सर्वगुणैर्नित्यं चन्द्रमा रश्मिभिर्यथा ।
भगवन् कृतकृत्योऽहं यन्मे लोकगुरुः स्वयम् ॥ २ ९ ॥
प्रीतेन यदि दातव्यो वरो मे शृणु सुव्रत ।
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१४८० श्रीमवाल्मीकीयरामायणे ‘ तब किरणमालामण्डित चन्द्रमाकी भाँति सदा समस्त गुणोंसे सम्पन्न धर्मात्मा विभीषणने हाथ जोड़कर कहा-‘ भगवन्! यदि साक्षात् लोकगुरु आप मुझपर प्रसन्न हैं तो मैं कृतार्थं हूँ । मुझे कुछ भी पाना शेष नहीं रहा । उत्तम व्रतको धारण करनेवाले पितामह! यदि आप प्रसन्न होकर मुझे वर देना ही चाहते हैं तो सुनिये ॥ २८-२९ ३ ॥ परमापगतस्यापि धर्मे मम मतिर्भवेत् ॥ ३० ॥
अशिक्षितं च ब्रह्मास्त्रं भगवन् प्रतिभातु मे । “ भगवन्! बड़ी से बड़ी आपत्तिमें पड़नेपर भी मेरी बुद्धि धर्म में ही लगी रहे — उससे विचलित न हो और बिना सीखे ही मुझे ब्रह्मास्त्रका ज्ञान हो जाय ॥ ३०३ ॥
या या मे जायते बुद्धिर्येषु येष्वाश्रमेषु च ॥ ३१ ॥
सा सा भवतु धर्मिष्ठा तं तं धर्मे च पालये ।
एष मे परमोदारो वरः परमको मतः ॥ ३२ ॥
" जिस - जिस आश्रमके विषय में मेरा जो - जो विचार हो, वह धर्मके अनुकूल ही हो और उस - उस धर्मका मैं पालन करूँ, यही मेरे लिये सबसे उत्तम और अभीष्ट वरदान है ॥ ३१-३२ ॥
नहि धर्माभिरतानां लोके किंचन दुर्लभम् ।
पुनः प्रजापतिः प्रीतो विभीषणमुवाच ह ॥ ३३ ॥
“ क्योंकि जो धर्म में अनुरक्त हैं, उनके लिये कुछ भी दुर्लभ नहीं है ' यह सुनकर प्रजापति ब्रह्मा पुनः प्रसन्न हो विभीषणसे बोले - ॥ ३३ ॥
धर्मिष्ठस्त्वं यथा वत्स तथा चैतद् भविष्यति ।
यस्माद् राक्षसयोनौ ते जातस्यामित्रनाशन ॥ ३४ ॥
नाधर्मे जायते बुद्धिरमरत्वं ददामि ते । " वत्स! तुम धर्ममें स्थित रहनेवाले हो; अतः जो कुछ चाहते हो, वह सब पूर्ण होगा । शत्रुनाशन! राक्षस - योनिमें उत्पन्न होकर भी तुम्हारी बुद्धि अधर्म में नहीं लगती है; इसलिये मैं तुम्हें अमरत्व प्रदान करता हूँ ॥ ३४३ ॥
इत्युक्त्वा कुम्भकर्णाय वरं दातुमवस्थितम् ॥ ३५ ॥
प्रजापतिं सुराः सर्वे वाक्यं प्राञ्जलयोऽब्रुवन् । ' विभीषण से ऐसा कहकर जब ब्रह्माजी कुम्भकर्णको वर देनेके लिये उद्यत हुए, तब सब देवता उनसे हाथ जोड़कर बोले – ॥ ३५३ ॥
न तावत् कुम्भकर्णाय प्रदातव्यो वरस्त्वया ॥ ३६ ॥
जानीषे हि यथा लोकांस्त्रासयत्येष दुर्मतिः । " प्रभो! आप कुम्भकर्णको वरदान न दीजिये; क्योंकि आप जानते हैं कि यह दुर्बुद्धि निशाचर किस तरह म लोकों को त्रास देता है ॥ ३६३ ॥
नन्दनेऽप्सरसः सप्त महेन्द्रानुचरा दश ॥ ३७ ॥
अनेन भक्षिता ब्रह्मन्नृषयो मानुषास्तथा । “ ब्रह्मन्! इसने नन्दनवनकी सात अप्सराओं, देवराज इन्द्रके दस अनुचरों तथा बहुत - से ऋषियों और मनुष्योंको भी खा लिया है || ३७३ ॥ अलब्धवरपूर्वेण यत् कृतं राक्षसेन तु ॥ ३८ ॥
यद्येष वरलब्धः स्याद् भक्षयेद् भुवनत्रयम् । " पहले वर न पानेपर भी इस राक्षसने जब इस प्रकार प्राणियोंके भक्षणका क्रूरतापूर्ण कर्म कर डाला है, तब यदि इसे वर प्राप्त हो जाय, उस दशामें तो यह तीनों लोकोंको खा जायगा ॥ ३८३ ॥
वरव्याजेन मोहोऽस्मै दीयताममितप्रभ ॥ ३ ९ ॥ लोकानां स्वस्ति चैवं स्याद् भवेदस्य व सम्मतिः । " " अमिततेजस्वी देव! आप वरके बहाने इसको मोह प्रदान कीजिये । इससे समस्त लोकोंका कल्याण होगा और इसका भी सम्मान हो जायगा ॥ ३ ९ ३ ॥ एवमुक्तः सुरैर्ब्रह्माचिन्तयत् पद्मसम्भवः ॥ ४० ॥
चिन्तिता चोपतस्थेऽस्य पार्श्व देवी सरस्वती । ' देवताओंके ऐसा कहनेपर कमलयोनि ब्रह्माजीने सरस्वती-का स्मरण किया । उनके चिन्तन करते ही देवी सरस्वती पास आ गयीं ॥ ४०३ ॥
प्राञ्जलिः सा तु पार्श्वस्था प्राह वाक्यं सरखती ॥ ४१ ॥
इयमस्म्यागता देव किं कार्य करवाण्यहम् । उनके पार्श्वभाग में खड़ी हो सरस्वतीने हाथ जोड़कर कहा - ' देव! यह मैं आ गयी । मेरे लिये क्या आज्ञा है? मैं कौन - सा कार्य करूँ? ' ॥ ४ ९ ३ ॥ प्रजापतिस्तु तां प्राप्तां प्राह वाक्यं सरखतीम् ॥ ४२ ॥
वाणि त्वं राक्षसेन्द्रस्य भव वाग्देवतेप्सिता । ' तब प्रजापतिने वहाँ आयी हुई सरस्वतीदेवीसे कहा-' वाणि! तुम राक्षसराज कुम्भकर्णकी जिह्वापर विराजमान हो देवताओंके अनुकूल वाणीके रूपमें प्रकट होओ ' ॥ ४२ ॥
तथेत्युक्त्वा प्रविष्टा सा प्रजापतिरथाब्रवीत् ॥ ४३ ॥
कुम्भकर्ण महाबाहो वरं वरय यो मतः । ' तब ' बहुत अच्छा ' कहकर सरस्वती कुम्भकर्णके मुखमें समा गयीं । इसके बाद प्रजापतिने उस राक्षससे कहा-' महाबाहु कुम्भकर्ण! तुम भी अपने मनके अनुकूल कोई वर माँगो ' ॥ ४३३ ॥
कुम्भकर्णस्तु तद्वाक्यं श्रुत्वा वचनमब्रवीत् ॥ ४४ ॥
स्वप्तं वर्षाण्यनेकानि देवदेव ममेप्सितम् ।
एवमस्त्विति तं चोक्त्वा प्रायाद् ब्रह्मा सुरैः समम् ॥ ४५ ॥
" उनकी बात सुनकर कुम्भकर्ण बोला- ' देवदेव! मैं अनेकानेक वर्षोंतक सोता रहूँ । यही मेरी इच्छा है । ' तब ' एवमस्तु ( ऐसा ही हो ) ' कहकर ब्रह्माजी देवताओंके साथ चले गये ॥ ४४-४५ ॥ देवी सरस्वती चैव राक्षसं तं जहाँ पुनः 1 ब्रह्मणा सह देवेषु गतेषु च नभःस्थलम् ॥ ४६ ॥
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उत्तरकाण्डे एकादशः सर्गः १४८१
विमुक्तोऽसौ सरस्वत्या स्वां संज्ञां च ततो गतः ।
कुम्भकर्णस्तु दुष्टात्मा चिन्तयामास दुःखितः ॥ ४७ ॥
" फिर सरस्वतीदेवीने भी उस राक्षसको छोड़ दिया । ब्रह्माजी के साथ देवताओंके आकाशमें चले जानेपर जब सरस्वतीजी उसके ऊपरसे उतर गयीं, तब दुष्टात्मा कुम्भकर्ण-को चेत हुआ और वह दुखी होकर इस प्रकार चिन्ता करने लगा - ॥ ४६-४७ ॥
ईदृशं किमिदं वाक्यं ममाद्य वदनाच्च्युतम् ।
अहं व्यामोहितो देवैरिति मन्ये तदागतैः ॥ ४८ ॥
" अहो! आज मेरे मुँह से ऐसी बात क्यों निकल गयी । मैं समझता हूँ, ब्रह्माजीके साथ आये हुए देवताओंने ही उस समय मुझे मोह में डाल दिया था ' ॥ ४८ ॥
एवं लब्धवराः सर्वे भ्रातरो दीप्ततेजसः ।
श्लेष्मातकवनं गत्वा तत्र ते न्यवसन् सुखम् ॥ ४ ९ ॥
" इस प्रकार वे तीनों तेजस्वी भ्राता वर पाकर श्लेष्मातक-वन ( लसोड़े के जंगल ) में गये और वहाँ सुखपूर्वक रहने लगे ॥४ ९ ॥ इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये उत्तरकाण्डे दशमः सर्गः ॥ १० ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें दसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ १० ॥
एकादशः सर्गः रावणका संदेश सुनकर पिताकी आज्ञासे कुबेरका लङ्का को छोड़कर कैलासपर जाना, लङ्कामें रावणका राज्याभिषेक तथा राक्षसोंका निवास
सुमाली वरलब्धांस्तु ज्ञात्वा चैतान् निशाचरान् ।
उदतिष्ठद्भयं त्यक्त्वा सानुगः स रसातलात् ॥ १ ॥
रावण आदि निशाचरोंको वर प्राप्त हुआ है, यह जानकर सुमाली नामक राक्षस अपने अनुचरोंसहित भय छोड़कर रसातलसे निकला ॥ १ ॥
मारीचश्च प्रहस्तश्च विरूपाक्षो महोदरः ।
उदतिष्ठन् सुसंरब्धाः सचिवास्तस्य रक्षसः ॥ २ ॥
साथ ही मारीच, प्रहस्त, विरूपाक्ष और महोदर —ये उस राक्षसके चार मन्त्री भी रसातलसे ऊपरको उठे । वे सब-के - सब रोषावेशसे भरे हुए थे ॥ २ ॥
सुमाली सचिवैः सार्धं वृतो राक्षसपुङ्गवैः ।
अभिगम्य दशग्रीवं परिष्वज्येदमब्रवीत् ॥ ३ ॥
श्रेष्ठ राक्षसोंसे घिरा हुआ सुमाली अपने सचिवोंके साथ दशग्रीवके पास गया और उसे छातीसे लगाकर इस प्रकार बोला- ॥ ३ ॥
दिष्ट्या ते वत्स सम्प्राप्तश्चिन्तितोऽयं मनोरथः ।
यस्त्वं त्रिभुवनश्रेष्ठाल्लब्धवान् वरमुत्तमम् ॥ ४ ॥
‘ वत्स! बड़े सौभाग्यकी बात है कि तुमने त्रिभुवनश्रेष्ठ ब्रह्माजीसे उत्तम वर प्राप्त किया, जिससे तुम्हें यह चिरकालसे चिन्तित मनोरथ उपलब्ध हो गया ॥ ४ ॥
यत्कृते च वयं लङ्कां त्यक्त्वा याता रसातलम् ।
तद्गतं नो महाबाहो महद्विष्णुकृतं भयम् ॥ ५ ॥
' महाबाहो! जिसके कारण हम सब राक्षस लङ्का छोड़कर रसातलमें चले गये थे, भगवान् विष्णुसे प्राप्त होनेवाला हमारा यह महान् भय दूर हो गया ॥ ५ ॥
असकृत् तद्भयाद् भग्नाः परित्यज्य स्वमालयम् ।
विद्रुताः सहिताः सर्वे प्रविष्टाः स्म रसातलम् ॥ ६ ॥
' हम सब लोग बारंबार भगवान् विष्णुके भयसे पीड़ित वा ० रा ० ५.११.६-होनेके कारण अपना घर छोड़ भाग निकले और सब के सब एक साथ ही रसातलमें प्रविष्ट हो गये ॥ ६ ॥
अस्मदीया च लङ्केयं नगरी राक्षसोषिता ।
निवेशिता तव भ्रात्रा धनाध्यक्षेण धीमता ॥ ७ ॥
' यह लङ्कानगरी जिसमें तुम्हारे बुद्धिमान् भाई धनाध्यक्ष कुबेर निवास करते हैं, हमलोगोंकी है । पहले इसमें राक्षस ही रहा करते थे || ७ ||
यदि नामात्र शक्यं स्यात् साम्ना दानेन वानघ ।
तरसा वा महाबाहो प्रत्यानेतुं कृतं भवेत् ॥ ८ ॥
' निष्पाप महाबाहो! यदि साम, दान अथवा बलप्रयोग-के द्वारा भी पुनः लङ्काको वापस लिया जा सके तो हमलोगों-का काम बन जाय ॥ ८ ॥
त्वं च लङ्केश्वरस्तात भविष्यसि न संशयः ।
त्वया राक्षसवंशोऽयं निमग्नोऽपि समुद्धृतः ॥ ९ ॥
' तात! तुम्हीं लङ्काके स्वामी होओगे, इसमें संशय नहीं है; क्योंकि तुमने इस राक्षसवंशका जो रसातलमें डूब गया था, उद्धार किया है ॥ ९ ॥
सर्वेषां नः प्रभुश्चैव भविष्यसि महाबल ।
अथाब्रवीद् दशग्रीवो मातामहमुपस्थितम् ॥ १० ॥
वित्तेशो गुरुरस्माकं नार्हसे वक्कुमीदृशम् । ' महाबली वीर! तुम्हीं हम सबके राजा होओगे । ' यह सुनकर दशग्रीवने पास खड़े हुए अपने मातामहसे कहा-' नानाजी! धनाध्यक्ष कुबेर हमारे बड़े भाई हैं, अतः उनके सम्बन्ध में आपको मुझसे ऐसी बात नहीं कहनी चाहिये ' ॥ साम्ना हि राक्षसेन्द्रेण प्रत्याख्यातो गरीयसा ॥ ११ ॥
किंचिन्नाह तदा रक्षो ज्ञात्वा तस्य चिकीर्षितम् । उस श्रेष्ठ राक्षसराजके द्वारा शान्तभावसे ही ऐसा कोरा उत्तर पाकर सुमाली समझ गया कि रावण क्या करना चाहता
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१४८२ श्रीमवाल्मीकीय रामायणे है, इसलिये वह राक्षस चुप हो गया । फिर कुछ कहने का साहस न कर सका ॥ ११३ ॥
कस्यचित् त्वथ कालस्य वसन्तं रावणं ततः ॥ १२ ॥
उक्तवन्तं तथा वाक्यं दशग्रीवं निशाचरः ।
प्रहस्तः प्रथितं वाक्यमिदमाह सकारणम् ॥ १३ ॥
तदनन्तर कुछ काल व्यतीत होनेपर अपने स्थानपर निवास करते हुए दशग्रीव रावणसे जो सुमालीको पहले पूर्वोक्त उत्तर दे चुका था, निशाचर प्रहस्तने विनयपूर्वक यह युक्तियुक्त बात कही ॥ १२-१३ ॥
दशग्रीव महाबाहो नार्हसे वक्कुमीदृशम् ।
सौभ्रात्रं नास्ति शूराणां शृणु चेदं वचो मम ॥ १४ ॥
' महाबाहु दशग्रीव! आपने अपने नानासे जो कुछ कहा है, वैसा नहीं कहना चाहिये; क्योंकि वीरोंमें इस तरहके भ्रातृभावका निर्वाह होता नहीं देखा जाता । आप मेरी यह बात सुनिये ॥ १४ ॥
अदितिश्च दितिश्चैव भगिन्यौ सहिते हि ते ।
भायें परमरूपिण्यौ कश्यपस्य प्रजापतेः ॥ १५ ॥
' अदिति और दिति दोनों सगी बहनें हैं । वे दोनों ही प्रजापति कश्यपकी परम सुन्दरी पत्नियाँ हैं ॥ १५ ॥
अदितिर्जनयामास देवस्त्रिभुवनेश्वरान् ।
दितिस्त्वजनयद् दैत्यान् कश्यपस्यात्मसम्भवान् ॥ १६ ॥
' अदितिने देवताओंको जन्म दिया है, जो इस समय त्रिभुवनके स्वामी हैं और दितिने दैत्योंको उत्पन्न किया है । देवता और दैत्य दोनों ही महर्षि कश्यपके और स पुत्र 11
दैत्यानां किल धर्मश पुरेयं सवनार्णवा ।
सपर्वता मही वीर तेऽभवन् प्रभविष्णवः ॥ १७ ॥
' धर्मज्ञ वीर! पहले पर्वत, वन और समुद्रोंसहित यह सारी पृथ्वी दैत्योंके ही अधिकारमें थी; क्योंकि वे बड़े प्रभाव-शाली थे ॥ १७ ॥
निहत्य तांस्तु समरे विष्णुना प्रभविष्णुना ।
देवानां वशमानीतं त्रैलोक्यमिदमव्ययम् ॥ १८ ॥
‘ किंतु सर्वशक्तिमान् भगवान् विष्णुने युद्धमें दैत्योंको मारकर त्रिलोकीका यह अक्षय राज्य देवताओंके अधिकारमें दे दिया ॥ १८ ॥
नैतदेको भवानेव करिष्यति विपर्ययम् ।
सुरासुरैराचरितं तत् कुरुष्व वचो मम ॥ १ ९ ॥
" इस तरहका विपरीत आचरण केवल आप ही नहीं करेंगे । देवताओं और असुरोंने भी पहले इस नीतिसे काम लिया है; अतः आप मेरी बात मान लें ' ॥ १ ९ ॥
एवमुक्तो दशग्रीवः प्रहृष्टेनान्तरात्मना ।
चिन्तयित्वा मुहूर्त वै वाढमित्येव सोऽब्रवीत् ॥ २० ॥
प्रहस्तके ऐसा कहनेपर दशग्रीवका चित्त प्रसन्न हो गया । उसने दो घड़ीतक सोच - विचारकर कहा - " बहुत अच्छा ( तुम जैसा कहते हो, वैसा ही करूँगा ) ' ॥ २० ॥
स तु तेनैव हर्षेण तस्मिन्नहनि वीर्यवान् ।
वनं गतो दशग्रीवः सह तैः क्षणदाचरैः ॥ २१ ॥
तदनन्तर उसी दिन उसी हर्ष के साथ पराक्रमी दशग्रीव उन निशाचरोंको साथ ले लङ्काके निकटवर्ती वनमें गया ॥
त्रिकूटस्थः स तु तदा दशग्रीवो निशाचरः ।
प्रेषयामास दौत्येन प्रहस्तं वाक्यकोविदम् ॥ २२ ॥
उस समय त्रिकूट पर्वतपर जाकर निशाचर दशग्रीव ठहर गया और बातचीत करनेमें कुशल प्रहस्त को उसने दूत बनाकर भेजा ॥ २२ ॥
प्रहस्त शीघ्रं गच्छ त्वं ब्रूहि नैर्ऋतपुङ्गवम् ।
वचसा मम वित्तेशं सामपूर्वमिदं वचः ॥ २३ ॥
वह बोला- ' प्रहस्त! तुम शीघ्र जाओ और मेरे कथना-नुसार धनके स्वामी राक्षसराज कुबेरसे शान्तिपूर्वक यह बात कहो ॥ २३ ॥
इयं लङ्का पुरी राजन् राक्षसानां महात्मनाम् ।
त्वया निवेशिता सौम्य नैतद् युक्तं तवानघ ॥ २४ ॥
' राजन्! यह लङ्कापुरी महामना राक्षसोंकी है, जिसमें आप निवास कर रहे हैं । सौम्य! निष्पाप यक्षराज! यह आपके लिये उचित नहीं है ॥ २४ ॥
तद् भवान् यदि नो ह्यद्य दद्यादतुलविक्रम ।
कृता भवेन्मम प्रीतिर्धर्मश्चैवानुपालितः ॥ २५ ॥
' अतुल पराक्रमी धनेश्वर! यदि आप हमें यह लङ्कापुरी लौटा दें तो इससे हमें बड़ी प्रसन्नता होगी और आपके द्वारा धर्मका पालन हुआ समझा जायगा ॥ २५ ॥
स तु गत्वा पुरीं लङ्कां धनदेन सुरक्षिताम् ।
अब्रवीत् परमोदारं वित्तपालमिदं वचः ॥ २६ ॥
तब प्रहस्त कुबेरके द्वारा सुरक्षित लङ्कापुरीमें गया और उन वित्तपालसे बड़ी उदारतापूर्ण वाणी में बोला- ॥ २६ ॥
प्रेषितोऽहं तव भ्रात्रा दशग्रीवेण सुव्रत ।
त्वत्समीपं महाबाहो सर्वशस्त्रभृतां वर ॥ २७ ॥
तच्छ्रयतां महाप्राज्ञ सर्वशास्त्रविशारद ।
वचनं मम वित्तेश यद् ब्रवीति दशाननः ॥ २८ ॥
' उत्तम व्रतका पालन करनेवाले, सम्पूर्ण शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ, सर्वशास्त्रविशारद, महाबाहु, महाप्राज्ञ धनेश्वर! आपके भाई दशग्रीवने मुझे आपके पास भेजा है । दशमुख रावण आपसे जो कुछ कहना चाहते हैं, वह बता रहा हूँ । आप मेरी बात सुनिये ॥ २७-२८ ॥
इयं किल पुरी रम्या सुमालिप्रमुखैः पुरा ।
पूर्वा विशालाक्ष राक्षसैर्भीमविक्रमैः ॥ २ ९ ॥
तेन विज्ञाप्यते सोऽयं साम्प्रतं विश्रवात्मज ।
तदेषा दीयतां तात याचतस्तस्य सामतः ॥ ३० ॥
' विशाललोचन वैश्रवण! यह रमणीय लङ्कापुरी पहले
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उत्तरकाण्डे एकादशः सर्गः १४८३ भयानक पराक्रमी सुमाली आदि राक्षसोंके अधिकारमें रही है । उन्होंने बहुत समयतक इसका उपभोग किया है । अतः वे दशग्रीव इस समय यह सूचित कर रहे हैं कि " यह लङ्का जिनकी वस्तु है, उन्हें लौटा दी जाय । ' तात! शान्तिपूर्वक याचना करनेवाले दशग्रीवको आप यह पुरी लौटा दें ' ॥
प्रहस्तादपि संश्रुत्य देवो वैश्रवणो वचः ।
प्रत्युवाच प्रहस्तं तं वाक्यं वाक्यविदां वरः ॥ ३१ ॥
प्रहस्तके मुखसे यह बात सुनकर वाणीका मर्मं समझने-वालोंमें श्रेष्ठ भगवान् वैश्रवणने प्रहस्त को इस प्रकार उत्तर दिया- ॥ ३१ ॥
दत्ता ममेयं पित्रा तु लङ्का शून्या निशाचरैः ।
निवेशिता च मे रक्षो दानमानादिभिर्गुणैः ॥ ३२ ॥
' राक्षस! यह लङ्का पहले निशाचरोंसे सूनी थी । उस समय पिताजीने मुझे इसमें रहने की आज्ञा दी और मैंने इसमें दान, मान आदि गुणोंद्वारा प्रजाजनोंको बसाया ॥ ३२ ॥
ब्रूहि गच्छ दशग्रीवं पुरी राज्यं च यन्मम ।
तत्राप्येतन्महाबाहो भुङ्क्ष्व राज्यमकण्टकम् ॥ ३३ ॥
“ दूत! तुम जाकर दशग्रीवसे कहो - महाबाहो! यह पुरी तथा यह निष्कण्टक राज्य जो कुछ भी मेरे पास है, वह
सब तुम्हारा भी है । तुम इसका उपभोग करो ॥ ३३ ॥
अविभक्तं त्वया सार्धं राज्यं यच्चापि मे वसु ।
एवमुक्त्वा धनाध्यक्षो जगाम पितुरन्तिकम् ॥ ३४ ॥
" मेरा राज्य तथा सारा धन तुमसे बँटा हुआ नहीं है ' ऐसा कहकर धनाध्यक्ष कुबेर अपने पिता विश्रवा मुनिके पास चले गये ॥ ३४ ॥
अभिवाद्य गुरुं प्राह रावणस्य यदीप्सितम् ।
एष तात दशग्रीवो दूतं प्रेषितवान् मम ॥ ३५ ॥
दीयतां नगरी लङ्का पूर्व रक्षोगणोषिता ।
मयात्र यदनुष्ठेयं तन्ममाचक्ष्व सुव्रत ॥ ३६ ॥
वहाँ पिताको प्रणाम करके उन्होंने रावणकी जो इच्छा थी, उसे इस प्रकार बताया- ' तात! आज दशग्रीवने मेरे पास दूत भेजा और कहलाया है कि इस लङ्का नगरीमें पहले राक्षस रहा करते थे, अतः इसे राक्षसों को लौटा दीजिये । सुव्रत! अब मुझे इस विषय में क्या करना चाहिये, बतानेकी कृपा करें ' ॥ ३५-३६ ॥
ब्रह्मर्षिस्त्वेवमुक्तोऽसौ विश्रवा मुनिपुङ्गवः ।
प्राञ्जलिं धनदं प्राह शृणु पुत्र वचो मम ॥ ३७ ॥
उनके ऐसा कहनेपर ब्रह्मर्षि मुनिवर विश्रवा हाथ जोड़ कर खड़े हुए धनद कुबेरसे बोले - " बेटा! मेरी बात सुनो ।
दशग्रीवो महाबाहुरुक्तवान् मम संनिधौ ।
मया निर्भत्सितश्चासीद् बहुशोक्तः सुदुर्मतिः ॥ ३८ ॥
स क्रोधेन मया चोको ध्वंससे च पुनः पुनः । " महाबाहु दशग्रीवने मेरे निकट भी यह बात कही थी । इसके लिये मैंने उस दुर्बुद्धिको बहुत फटकारा, डाँट बतायी और बारंबार क्रोधपूर्वक कहा – ' अरे! ऐसा करनेसे तेरा पतन हो जायगा ' किंतु इसका कुछ फल नहीं हुआ ॥ २८३ ॥
श्रेयोऽभियुक्तं धर्म्य च शृणु पुत्र वचो मम ॥ ३ ९ ॥
वरप्रदानसम्मूढो मान्यामान्यं सुदुर्मतिः ।
न वेत्ति मम शापाच्च प्रकृतिं दारुणां गतः ॥ ४० ॥
" बेटा! अब तुम्हीं मेरे धर्मानुकूल एवं कल्याणकारी वचनको ध्यान देकर सुनो । रावणकी बुद्धि बहुत ही खोटी है । वह वर पाकर मदमत्त हो उठा है— विवेक खो बैठा है । मेरे शापके कारण भी उसकी प्रकृति क्रूर हो गयी है ॥
तस्माद् गच्छ महाबाहो कैलासं धरणीधरम् ।
निवेशय निवासार्थं त्यक्त्वा लङ्कां सहानुगः ॥ ४१ ॥
“ इसलिये महाबाहो! अब तुम अनुचरोंसहित लङ्का छोड़कर कैलास पर्वतपर चले जाओ और अपने रहनेके लिये वहीं दूसरा नगर बसाओ ॥ ४१ ॥
तत्र मन्दाकिनी रम्या नदीनामुत्तमा नदी ।
काञ्चनैः सूर्यसंकाशैः पङ्कजैः संवृतोदका ॥ ४२ ॥
कुमुदैरुत्पलैश्चैव अन्यैश्चैव सुगन्धिभिः । ‘ वहाँ नदियोंमें श्रेष्ठ रमणीय मन्दाकिनी नदी बहती है, जिसका जल सूर्य के समान प्रकाशित होनेवाले सुवर्णमय कमलों, कुमुदों, उत्पलों आच्छादित है ॥ ४२ ॥
तत्र देवाः सगन्धर्वाः विहारशीलाः सततं नहि क्षमं तवानेन जानीषे हि यथानेन ' उस पर्वतपर देवता आदि दिव्य प्राणी, जिन्हें और दूसरे- दूसरे सुगन्धित कुसुमसे साप्सरोरगकिंनराः ॥ ४३ ॥
रमन्ते सर्वदाश्रिताः ।
वैरं धनद रक्षसा ॥ ४४ ॥
लब्धः परमको वरः ॥ ४५ ॥
, गन्धर्व, अप्सरा, नाग और किन्नर स्वभावसे ही घूमना - फिरना अधिक प्रिय है, सदा रहते हुए निरन्तर आनन्दका अनुभव करते हैं । धनद! इस राक्षसके साथ तुम्हारा वैर करना उचित नहीं है । तुम तो जानते ही हो कि इसने ब्रह्माजीसे कैसा उत्कृष्ट वर प्राप्त किया है '. ॥ ४३-४५ ॥
एवमुक्तो गृहीत्वा तु तद्वचः पितृगौरवात् ।
सदारपुत्रः सामात्यः सवाहनधनो गतः ॥ ४६ ॥
मुनिके ऐसा कहने पर कुबेरने पिताका मान रखते हुए उनकी बात मान ली और स्त्री, पुत्र, मन्त्री, वाहन तथा धन साथ लेकर वे लङ्का से कैलासको चले गये ॥ ४६ ॥
प्रहस्तोऽथ दशग्रीवं गत्वा वचनमब्रवीत् ।
प्रहृष्टात्मा महात्मानं सहामात्यं सहानुजम् ॥ ४७ ॥
तदनन्तर प्रहस्त प्रसन्न होकर मन्त्री और भाइयोंके साथ बैठे हुए महामना दशग्रीव के पास जाकर बोला- ॥ ४७ ॥
शून्या सा नगरी लङ्का त्यक्त्वैनां धनदो गतः ।
प्रविश्य तां सहास्माभिः स्वधर्मे तत्र पालय ॥ ४८ ॥
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१४८४ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे ' लङ्का नगरी खाली हो गयी । कुबेर उसे छोड़कर चले गये । अब आप हमलोगों के साथ उसमें प्रवेश करके अपने ' धर्मका पालन कीजिये ॥ ४८ ॥
एवमुक्तो दशग्रीवः प्रहस्तेन महाबलः ।
विवेश नगरीं लङ्कां भ्रातृभिः सबलानुगैः ॥ ४ ९ ॥
धनदेन परित्यक्तां सुविभक्तमहापथाम् ।
आरुरोह स देवारिः स्वर्गं देवाधिपो यथा ॥ ५० ॥
प्रहस्त के ऐसा कहने पर महाबली दशग्रीवने अपनी सेना, अनुचर तथा भाइयों सहित कुबेरद्वारा त्यागी हुई लङ्कापुरीमें प्रवेश किया । उस नगरी में सुन्दर विभागपूर्वक बड़ी - बड़ी सड़कें बनी थीं । जैसे देवराज इन्द्र स्वर्गके सिंहासनपर आरूढ़ हुए थे, उसी प्रकार देवद्रोही रावणने लङ्कामें पदार्पण किया ॥ स चाभिषिक्तः क्षणदाचरैस्तदा निवेशयामास पुरीं दशाननः । निकामपूर्णा च बभूव सा पुरी निशाचरैर्नीलबलाहकोपमैः ॥ ५१ ॥
उस समय निशाचरोंने दशमुख रावणका राज्याभिषेक किया । फिर रावणने उस पुरीको बसाया । देखते - देखते समूची लङ्कापुरी नील मेघके समान वर्णवाले राक्षसोंसे पूर्णतः भर गयी ॥ ५१ ॥
धनेश्वरस्त्वथ पितृवाक्यगौरवा-न्न्यवेशयच्छशिविमले गिरौ पुरीम् । स्वलंकृतैर्भवनवरैर्विभूषितां पुरंदरः स्वरिव यथामरावतीम् ॥ ५२ ॥
धनके स्वामी कुबेरने पिताकी आशाको आदर देकर चन्द्रमाके समान निर्मल कान्तिवाले कैलास पर्वतपर शोभा-शाली श्रेष्ठ भवनों से विभूषित अलकापुरी बसायी, ठीक वैसे ही
जैसे देवराज इन्द्रने स्वर्गलोकमें अमरावती पुरी बसायी थी ।
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये उत्तरकाण्डे एकादशः सर्गः ॥ ११ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्धरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें ग्यारहवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ११ ॥
द्वादशः सर्गः शूर्पणखा तथा रावण आदि तीनों भाइयोंका विवाह और मेघनादका जन्म
राक्षसेन्द्रोऽभिषिकस्तु भ्रातृभिः सहितस्तदा ।
ततः प्रदानं राक्षस्या भगिन्याः समचिन्तयत् ॥ १ ॥
( अगस्त्यजी कहते हैं— श्रीराम! ) अपना अभिषेक हो जाने पर जब राक्षसराज रावण भाइयोसहित लङ्कापुरीमें रहने लगा, तब उसे अपनी बहिन राक्षसी शूर्पणखा के ब्याहकी चिन्ता हुई ॥ १ ॥
स्वसारं कालकेयाय दानवेन्द्राय राक्षसीम् ।
ददौ शूर्पणखां नाम विद्युजिह्वाय राक्षसः ॥ २ ॥
उस राक्षसने दानवराज विद्युजिह्वको, जो कालकाका पुत्र था, अपनी बहन शूर्पणखा ब्याह दी ॥ २ ॥
अथ दत्त्वा स्वयं रक्षो मृगयामदते स्म तत् ।
तत्रापश्यत् ततो राम मयं नाम दितेः सुतम् ॥ ३ ॥
कन्यासहायं तं दृष्ट्वा दशग्रीवो निशाचरः ।
अपृच्छत् को भवानेको निर्मनुष्यमृगे वने ॥ ४ ॥
अनया मृगशावाक्ष्या किमर्थे सह तिष्ठसि । श्रीराम! बहिनका ब्याह करके राक्षस रावण एक दिन स्वयं शिकार खेलनेके लिये वनमें घूम रहा था । वहाँ उसने दितिके पुत्र मयको देखा । उसके साथ एक सुन्दरी कन्या भी थी । उसे देखकर निशाचर दशग्रीवने पूछा- आप कौन जो मनुष्यों और पशुओंसे रहित इस सूने वनमें घूम रहे हैं? इस मृगनयनी कन्याके साथ आप यहाँ किस उद्देश्यसे निवास करते हैं? ॥ ३-४३ ॥ मयस्तदाश्रवीद् राम पृच्छन्तं तं निशाचरम् ॥ ५ ॥
श्रूयतां सर्वमाख्यास्ये यथावृत्तमिदं तव । श्रीराम! इस प्रकार पूछनेवाले उस निशाचरसे मय बोला - ' सुनो, मैं अपना सारा वृत्तान्त तुम्हें यथार्थरूपसे बता रहा हूँ ॥ ५३ ॥
हेमा नामाप्सरास्तात श्रुतपूर्वा यदि त्वया ॥ ६ ॥
दैवतैर्मम सा दत्ता पौलोमीव शतक्रतोः ।
तस्यां सकमना ह्यासं दशवर्षशतान्यहम् ॥ ७ ॥
सा च दैवतकार्येण गता वर्षाश्चतुर्दश ।
तस्याः कृते च हेमायाः सर्व हेममयं पुरम् ॥ ८ ॥
वज्रवैदूर्यचित्रं च मायया निर्मितं मया ।
तत्राहमवसं दीनस्तया हीनः सुदुःखितः ॥ ९ ॥
" तात! तुमने पहले कभी सुना होगा, स्वर्गमें हेमा नामसे प्रसिद्ध एक अप्सरा रहती है । उसे देवताओंने उसी प्रकार मुझे अर्पित कर दिया था, जैसे पुलोम दानवकी कन्या शची देवराज इन्द्र को दी गयी थीं । मैं उसीमें आसक्त होकर एक सहस्र वर्षोंतक उसके साथ रहा हूँ । एक दिन वह देवताओंके कार्यसे स्वर्गलोकको चली गयी, तबसे चौदह वर्ष बीत गये । मैंने उस हेमाके लिये मायासे एक नगरका निर्माण किया था, जो सम्पूर्णतः सोनेका बना है । हीरे और नीलमके संयोगसे वह विचित्र शोभा धारण करता है । उसीमें मैं अबतक उसके वियोगसे अत्यन्त दुखी एवं दीन होकर रहता था ॥ ६ - ९ ॥
तस्मात् पुराद् दुहितरं गृहीत्वा वनमागतः ।
इयं ममात्मजा राजंस्तस्याः कुक्षौ विवर्धिता ॥ १० ॥
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उत्तरकाण्डे द्वादशः सर्गः १४८५ " उसी नगरसे इस कन्याको साथ लेकर मैं वनमें आया हूँ । राजन्! यह मेरी पुत्री है, जो हेमाके गर्भ में ही पली है और उससे उत्पन्न होकर मेरे द्वारा पालित हो बड़ी हुई है ।
भर्तारमनया सार्धमस्याः प्राप्तोऽस्मि मार्गितुम् ।
कन्यापितृत्वं दुःखं हि सर्वेषां मानकाङ्क्षिणाम् ॥ ११ ॥
कन्या हि द्वे कुले नित्यं संशये स्थाप्य तिष्ठति । " इसके साथ मैं इसके योग्य पतिकी खोज करनेके लिये आया हूँ । मानकी अभिलाषा रखनेवाले प्रायः सभी लोगोंके लिये कन्याका पिता होना कष्टकारक होता है । ( क्योंकि इसके लिये कन्याके पिताको दूसरोंके सामने झुकना पड़ता है । ) कन्या सदा दो कुलोंको संशयमें डाले रहती है ॥ ११३ ॥
पुत्रद्वयं ममाप्यस्यां भार्यायां सम्बभूव ह ॥ १२ ॥
मायावी प्रथमस्तात दुन्दुभिस्तदनन्तरः । ' तात! मेरी इस भार्या हेमाके गर्भ से दो पुत्र भी हुए हैं, जिनमें प्रथम पुत्रका नाम मायावी और दूसरेका दुन्दुभि है ॥ १२३ ॥
एवं ते सर्वमाख्यातं याथातथ्येन पृच्छतः ॥ १३ ॥
त्वामिदानीं कथं तात जानीयां को भवानिति । ' तात! तुमने पूछा था, इसलिये मैंने इस तरह अपनी सारी बातें तुम्हें यथार्थरूपसे बता दीं । अब मैं यह जानना चाहता हूँ कि तुम कौन हो? यह मुझे किस तरह ज्ञात हो सकेगा? ' ॥ १३३ ॥
एवमुक्तं तु तद् रक्षो विनीतमिदमब्रवीत् ॥ १४ ॥
अहं पौलस्त्यतनयो दशग्रीवश्च नामतः ।
मुनेर्विश्रवसो यस्तु तृतीयो ब्रह्मणोऽभवत् ॥ १५ ॥
मयासुरके इस प्रकार कहनेपर राक्षस रावण विनीतभावसे यों बोला - " मैं पुलस्त्य के पुत्र विश्रवाका बेटा हूँ । मेरा नाम दशग्रीव है । मैं जिन विभवा मुनिसे उत्पन्न हुआ हूँ, वे ब्रह्माजीसे तीसरी पीढ़ीमें पैदा हुए हैं ' ॥ १४-१५ ॥
एवमुक्तस्तदा राम राक्षसेन्द्रेण दानवः ।
महर्षेस्तनयं ज्ञात्वा मयो हर्षमुपागतः ॥ १६ ॥
दातुं दुहितरं तस्मै रोचयामास तत्र वै । श्रीराम! राक्षसराजके ऐसा कहनेपर दानव मय महर्षि विश्रवाके उस पुत्रका परिचय पाकर बहुत प्रसन्न हुआ और उसके साथ वहाँ उसने अपनी पुत्रीका विवाह कर देनेकी इच्छा की ॥ १६३ ॥
करेण तु करं तस्या ग्राहयित्वा मयस्तदा ॥ १७ ॥
प्रहसन प्राह दैत्येन्द्रो राक्षसेन्द्रमिदं वचः । इसके बाद दैत्यराज मय अपनी बेटीका हाथ रावणके हाथमें देकर हँसता हुआ उस राक्षसराजसे इस प्रकार बोला ॥ १७३ ॥
इयं ममात्मजा राजन हेमयाप्सरसा धृता ॥ १८ ॥
कन्या मन्दोदरी नाम पत्त्यर्थं प्रतिगृह्यताम् । ' राजन्! यह मेरी बेटी है, जिसे हेमा अप्सराने अपने गर्भमें धारण किया था । इसका नाम मन्दोदरी है । इसे तुम अपनी पत्नीके रूपमें स्वीकार करो ' ॥ १ ९ ८३ ॥ वाढमित्येव तं राम दशग्रीवोऽभ्यभाषत ॥ १ ९ ॥ प्रज्वाल्य तत्र चैवाग्निमकरोत् पाणिसंग्रहम् । श्रीराम! तब दशग्रीवने ' बहुत अच्छा ' कहकर मयासुरकी बात मान ली । फिर वहाँ उसने अग्निको प्रज्वलित करके मन्दोदरीका पाणिग्रहण किया ॥ १ ९ ३ ॥ स हि तस्य मयो राम शापाभिज्ञस्तपोधनात् ॥ २० ॥
विदित्वा तेन सा दत्ता तस्य पैतामहं कुलम् । रघुनन्दन! यद्यपि तपोधन विश्रवासे रावणको जो क्रूर-प्रकृति होनेका शाप मिला था, उसे मयासुर जानता था; तथापि रावणको ब्रह्माजी के कुलका बालक समझकर उसने उसको अपनी कन्या दे दी ॥ २०३ ॥
अमोघां तस्य शक्तिं च प्रददौ परमाद्भुताम् ॥ २१ ॥
परेण तपसा लब्धां जघ्निवाँलक्ष्मणं यया । साथ ही उत्कृष्ट तपस्या से प्राप्त हुई एक परम अद्भुत अमोघ शक्ति भी प्रदान की, जिसके द्वारा रावणने लक्ष्मणको घायल किया था ॥ २१३ ॥
एवं स कृत्वा दारान् वै लङ्काया ईश्वरः प्रभुः ॥ २२ ॥
गत्वा तु नगरी भार्ये भ्रातृभ्यां समुपाहरत् । इस प्रकार दारपरिग्रह ( विवाह ) करके प्रभावशाली लङ्केश्वर रावण लङ्कापुरीमें गया और अपने दोनों भाइयोंके लिये भी दो भार्याएँ उनका विवाह कराकर ले आया ॥ २२३ ॥
वैरोचनस्य दौहित्रीं वज्रज्वालेति नामतः ॥ २३ ॥
तां भार्या कुम्भकर्णस्य रावणः समकल्पयत् । विरोचन कुमार बलिकी दौहित्रीको, जिसका नाम वज्र-ज्वाला था, रावणने कुम्भकर्णकी पत्नी बनाया ॥ २३३ ॥
गन्धर्वराजस्य सुतां शैलूषस्य महात्मनः ॥ २४ ॥
सरमां नाम धर्मज्ञां लेभे भार्या विभीषणः । गन्धर्वराज महात्मा शैलूषकी कन्या सरमाको, जो धर्मके तत्त्वको जाननेवाली थी, विभीषणने अपनी पत्नीके रूपमें प्राप्त किया ॥ २४३ ॥
तीरे तु सरसो वै तु संजज्ञे मानसस्य हि ॥ २५ ॥
सरस्तदा मानसं तु ववृधे जलदागमे ।
मात्रा तु तस्याः कन्यायाः स्नेहेनाक्रन्दितं वचः ॥ २६ ॥
सरो मा वर्धयस्वेति ततः सा सरमाभवत् । वह मानसरोवरके तटपर उत्पन्न हुई थी । जब उसका जन्म हुआ, उस समय वर्षा ऋतुका आगमन होनेसे मान-सरोवर बढ़ने लगा । तब उस कन्या की माताने पुत्री स्नेहसे करुणक्रन्दन करते हुए उस सरोवरसे कहा- ' सरो मा वर्धयस्व ( हे सरोवर! तुम अपने जलको बढ़ने न दो ) । ' उसने
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१४८६ श्रीमद्वाल्मीकीय रामायणे घबराहट में ' सरः मा ' ऐसा कहा था इसलिये उस कन्याका नाम सरमा हो गया ॥ २५-२६३ ॥ एवं ते कृतदारा वै रेमिरे तत्र राक्षसाः ॥ २७ ॥
स्वां स्वां भार्यामुपादाय गन्धर्वा इव नन्दने । इस प्रकार वे तीनों राक्षस विवाहित होकर अपनी - अपनी स्त्रीको साथ ले नन्दनवनमें विहार करनेवाले गन्धर्वोके समान लङ्कामें सुखपूर्वक रमण करने लगे ॥ २७३ ॥
ततो मन्दोदरी पुत्रं मेघनादमजीजनत् ॥ २८ ॥
स एष इन्द्रजिनाम युष्माभिरभिधीयते । तदनन्तर कुछ कालके बाद मन्दोदरीने अपने पुत्र मेघनादको जन्म दिया, जिसे आपलोग इन्द्रजित् के नामसे पुकारते थे ॥ २८३ ॥
जातमात्रेण हि पुरा तेन रावणसुनुना ॥ २ ९ ॥ रुदता सुमहान् मुक्तो नादो जलधरोपमः । पूर्वकालमें उस रावणपुत्रने पैदा होते ही रोते - रोते मेघके समान गम्भीर नाद किया था ॥ २ ९ ३ ॥ जडीकृता च सा लङ्का तस्य नादेन राघव ॥ ३० ॥
पिता तस्याकरोन्नाम मेघनाद इति स्वयम् । रघुनन्दन! उस मेघतुल्य नादसे सारी लङ्का जड़वत् स्तब्ध रह गयी थी; इसलिये पिता रावणने स्वयं ही उसका नाम मेघनाद रक्खा ॥ ३०३ ॥
सोऽवर्धत तदा राम रावणान्तःपुरे शुभे ॥ ३१ ॥
रक्ष्यमाणो वरस्त्रीभिश्छन्नः काष्ठैरिवानलः ।
मातापित्रोर्महाहर्ष जनयन् रावणात्मजः ॥ ३२ ॥
श्रीराम! उस समय वह रावणकुमार रावणके सुन्दर अन्तःपुरमें माता - पिताको महान् हर्ष प्रदान करता हुआ श्रेष्ठ नारियोंसे सुरक्षित हो काष्ठसे आच्छादित हुई अग्निके समान बढ़ने लगा ॥ ३१-३२ ॥ इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये उत्तरकाण्डे द्वादशः सर्गः ॥ १२ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें बारहवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ १२ ॥
त्रयोदशः सर्गः रावणद्वारा बनवाये गये शयनागार में कुम्भकर्णका सोना, रावणका अत्याचार, कुबेरका दूत SS भेजकर उसे समझाना तथा कुपित हुए रावणका उस दूतको मार डालना
अथ लोकेश्वरोत्सृष्टा तत्र कालेन केनचित् ।
निद्रा समभवत् तीव्रा कुम्भकर्णस्य रूपिणी ॥ १ ॥
( अगस्त्यजी कहते हैं — रघुनन्दन! ) तदनन्तर कुछ काल बीतने पर लोकेश्वर ब्रह्माजीकी भेजी हुई निद्रा जंभाई आदिके रूपमें मूर्तिमती हो कुम्भकर्णके भीतर तीव्र वेगसे प्रकट हुई ॥ १ ॥
ततो भ्रातरमासीनं कुम्भकर्णोऽब्रवीद् वचः ।
निद्रा मां बाधते राजन् कारयस्व ममालयम् ॥ २ ॥
तब कुम्भकर्णने पास ही बैठे हुए अपने भाई रावण से कहा- ' राजन्! मुझे नींद सता रही है; अतः मेरे लिये शयन करने के योग्य घर बनवा दें ' ॥ २ ॥
विनियुक्तास्ततो राज्ञा शिल्पिनो विश्वकर्मवत् ।
विस्तीर्ण योजनं स्निग्धं ततो द्विगुणमायतम् ॥ ३ ॥
दर्शनीयं निराबाधं कुम्भकर्णस्य चक्रिरे ।
स्फाटिकैः काञ्चनैश्चित्रैः स्तम्भैः सर्वत्र शोभितम् ॥
यह सुनकर राक्षसराजने विश्वकर्माके समान सुयोग्य शिल्पियोंको घर बनाने के लिये आज्ञा दे दी । उन शिल्पियोंने दो योजन लंबा और एक योजन चौड़ा चिकना घर बनाया, जो देखने ही योग्य था । उसमें किसी प्रकारकी बाधाका अनुभव नहीं होता था । उसमें सर्वत्र स्फटिकमणि एवं सुवर्ण के बने हुए खम्भे लगे थे, जो उस भवनकी शोभा बढ़ा रहे थे ॥ ३-४ ॥
वैदूर्यकृतसोपानं किङ्किणीजालकं तथा ।
दान्ततोरणविन्यस्तं वज्रस्फटिकवेदिकम् ॥ ५ ॥
उसमें नीलमकी सीढ़ियाँ बनी थीं । सब ओर घुघुरूदार झालरें लगायी गयी थीं । उसका सदर फाटक हाथी- दाँतका बना हुआ था और हीरे तथा स्फटिकमणिकी वेदी एवं चबूतरे शोभा दे रहे थे ॥ ५ ॥
मनोहरं सर्वसुखं कारयामास राक्षसः ।
सर्वत्र सुखदं नित्यं मेरोः पुण्यां गुहामिव ॥ ६ ॥
वह भवन सब प्रकारसे सुखद एवं मनोहर था । मेरुकी पुण्यमयी गुफा के समान सदा सर्वत्र सुख प्रदान करनेवाला था । राक्षसराज रावणने कुम्भकर्णके लिये ऐसा सुन्दर एवं सुविधाजनक शयनागार बनवाया ॥ ६ ॥
तत्र निद्रां समाविष्टः कुम्भकर्णो महाबलः ।
बहून्यब्दसहस्राणि शयानो न च बुध्यते ॥ ७ ॥
महाबली कुम्भकर्ण उस घरमें जाकर निद्राके वशीभूत हो
कई हजार वर्षों तक सोता रहा । जाग नहीं पाता था ॥ ७ ॥
निद्राभिभूते तु तदा कुम्भकर्णे दशाननः ।
देवर्षियक्षगन्धर्वान संजघ्ने हि निरङ्कुशः ॥ ८ ॥
जब कुम्भकर्णं निद्रासे अभिभूत होकर सो गया, तब दशमुख रावण उच्छृङ्खल हो देवताओं, ऋषियों, यक्षों और गन्धके समूहों को मारने तथा पीड़ा देने लगा ॥ ८ ॥
उद्यानानि विचित्राणि नन्दनादीनि यानि च ।
तानि गत्वा सुसंक्रुद्धो भिनत्ति स्म दशाननः ॥ ९ ॥
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उत्तरकाण्डे त्रयोदशः सर्गः १४८७ देवताओंके नन्दनवन आदि जो विचित्र उद्यान थे, उनमें जाकर दशानन अत्यन्त कुपित हो उन सबको उजाड़ देता था ॥ ९ ॥
नदीं गज इव क्रीडन् वृक्षान् वायुरिव क्षिपन् ।
नगान् वज्र इवोत्सृष्टो विध्वंसयति राक्षसः ॥ १० ॥
वह राक्षस नदी में हाथीकी भाँति क्रीडा करता हुआ उसकी धाराओं को छिन्न - भिन्न कर देता था । वृक्षोंको वायुकी भाँति झकझोरता हुआ उखाड़ फेंकता था और पर्वतोंको इन्द्रके हाथसे छूटे हुए वज्रकी भाँति तोड़ - फोड़ डालता था ॥ १० ॥
तथावृत्तं तु विज्ञाय दशग्रीवं धनेश्वरः ।
कुलानुरूपं धर्मज्ञो वृत्तं संस्मृत्य चात्मनः ॥ ११ ॥
सौभ्रात्रदर्शनार्थं तु दूतं वैश्रवणस्तदा ।
लङ्कां सम्प्रेषयामास दशग्रीवस्य वै हितम् ॥ १२ ॥
दशग्रीवके इस निरंकुश बर्तावका समाचार पाकर धनके स्वामी धर्मज्ञ कुबेरने अपने कुलके अनुरूप आचार - व्यवहारका विचार करके उत्तम भ्रातृप्रेमका परिचय देनेके लिये लङ्कामें एक दूत भेजा । उनका उद्देश्य यह था कि मैं रावणको उसके हितकी बात बताकर राहपर लाऊँ ॥ ११-१२ ॥
स गत्वा नगरीं लङ्कामाससाद विभीषणम् ।
मानितस्तेन धर्मेण पृष्टश्चागमनं प्रति ॥ १३ ॥
वह दूत लङ्कापुरीमें जाकर पहले विभीषणसे मिला । विभीषणने धर्मके अनुसार उसका सत्कार किया और लङ्कामें आनेका कारण पूछा ॥ १३ ॥
पृष्ट्वा च कुशलं राज्ञो ज्ञातीनां च विभीषणः ।
सभायां दर्शयामास तमासीनं दशाननम् ॥ १४ ॥
फिर बन्धुबान्धवका कुशल- समाचार पूछकर विभीषणने उस दूतको ले जाकर राजसभा में बैठे हुए रावणसे मिलाया ॥ १४ ॥
स दृष्ट्रा तत्र राजानं दीप्यमानं स्वतेजसा ।
जयेति वाचा सम्पूज्य तूष्णीं समभिवर्तत ॥ १५ ॥
राजा रावण सभा में अपने तेजसे उद्दीप्त हो रहा था, उसे देखकर दूतने ' महाराजकी जय हो, ऐसा कहकर वाणीद्वारा उसका सत्कार किया और फिर वह कुछ देरतक चुपचाप खड़ा रहा ॥ १५ ॥
स तत्रोत्तम पर्य वरास्तरणशोभिते ।
उपविष्टं दशग्रीवं दूतो वाक्यमथाब्रवीत् ॥ १६ ॥
तत्पश्चात् उत्तम बिछौनेसे सुशोभित एक श्रेष्ठ पलंगपर बैठे हुए दशग्रीवसे उस दूतने इस प्रकार कहा – ॥१६ ॥
राजन् वदामि ते सर्व भ्राता तव यदब्रवीत् ।
उभयोः सदृशं वीर वृत्तस्य च कुलस्य च ॥ १७ ॥
' वीर महाराज! आपके भाई धनाध्यक्ष कुबेरने आपके पास जो संदेश भेजा है, वह माता - पिता दोनोंके कुल तथा सदाचारके अनुरूप है, मैं उसे पूर्णरूपसे आपको बता रहा हूँ; सुनिये - ॥ १७ ॥
साधु पर्याप्तमेतावत् कृत्यश्चारित्रसंग्रहः ।
साधु धर्मे व्यवस्थानं क्रियतां यदि शक्यते ॥ १८ ॥
“ दशग्रीव! तुमने अबतक जो कुछ कुकृत्य किया है, इतना ही बहुत है । अब तो तुम्हें भलीभाँति सदाचारका संग्रह करना चाहिये । यदि हो सके तो धर्मके मार्गपर स्थित रहो; यही तुम्हारे लिये अच्छा होगा ॥ १८ ॥
दृष्टं मे नन्दनं भग्नमृषयो निहताः श्रुताः ।
देवतानां समुद्योगस्त्वत्तो राजन् मया श्रुतः ॥ १ ९ ॥
' तुमने नन्दनवनको उजाड़ दिया - यह मैंने अपनी आँखों देखा है । तुम्हारे द्वारा बहुत से ऋषियोंका वध हुआ है, यह भी मेरे सुननेमें आया है । राजन्! ( इससे तंग आकर देवता तुमसे बदला लेना चाहते हैं ) मैंने सुना है कि तुम्हारे विरुद्ध देवताओंका उद्योग आरम्भ हो गया है ॥ १ ९ ॥
निराकृतश्च बहुशस्त्वयाहं राक्षसाधिप ।
सापराधोऽपि बालो हि रक्षितव्यः खबान्धवैः ॥ २० ॥
' राक्षसराज! तुमने कई बार मेरा भी तिरस्कार किया है; तथापि यदि बालक अपराध कर दे तो भी अपने बन्धु-' बान्धवको तो उसकी रक्षा ही करनी चाहिये ( इसीलिये तुम्हें हितकारक सलाह दे रहा हूँ ) ॥ २० ॥
अहं तु हिमवत्पृष्टं गतो धर्ममुपासितुम् ।
रौद्रं व्रतं समास्थाय नियतो नियतेन्द्रियः ॥ २१ ॥
“ मैं शौच - संतोषादि नियमोंके पालन और इन्द्रियसंयम-पूर्वक ' रौद्र व्रत का आश्रय ले धर्मका अनुष्ठान करनेके लिये हिमालय के एक शिखरपर गया था ॥ २१ ॥
तत्र देवो मया दृष्ट उमया सहितः प्रभुः ।
सव्यं चक्षुर्मया देवात् तत्र देव्यां निपातितम् ॥ २२ ॥
का वेषेति महाराज न खल्वन्येन हेतुना ।
रूपं चानुपमं कृत्वा रुद्राणी तत्र तिष्ठति ॥ २३ ॥
" वहाँ मुझे उमासहित भगवान् महादेवजीका दर्शन हुआ । महाराज! उस समय मैंने केवल यह जानने के लिये कि देखूँ ये कौन हैं? दैववश देवी पार्वतीपर अपनी बायीं दृष्टि डाली थी । निश्चय ही मैंने दूसरे किसी हेतुसे ( विकारयुक्त भावनासे ) उनकी ओर नहीं देखा था । उस वेलामें देवी रुद्राणी अनुपम रूप धारण करके वहाँ खड़ी थीं ॥२२-२३ ॥
देव्या दिव्यप्रभावेण दग्धं सव्यं ममेक्षणम् ।
रेणुध्वस्तामिव ज्योतिः पिङ्गलत्वमुपागतम् ॥ २४ ॥
' देवी के दिव्य प्रभाव से उस समय मेरी बायीं आँख जल गयी और दूसरी ( दायीं आँख ) भी धूलसे भरी हुई - सी पिङ्गल वर्णकी हो गयी ॥ २४ ॥
ततोऽहमन्यद् विस्तीर्णे गत्वा तस्य गिरेस्तटम् ।
तूष्णीं वर्षशतान्यष्टौ समधारं महाव्रतम् ॥ २५ ॥
‘ तदनन्तर मैंने पर्वतके दूसरे विस्तृत तटपर जाकर आठ सौ वर्षोंतक मौनभावसे उस महान् व्रतको धारण किया ॥