Ramayana 2 — पृष्ठ 711–720
वाल्मीकि रामायण — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 711–720
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१४ ९ ८ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे अवरुह्य विमानाग्रात् कन्दर्पशरपीडितः ॥ २० ॥
यह सुनकर रावण कामबाणसे पीड़ित हो विमानसे उतर गया और उस उत्तम एवं महान् व्रतका पालन करनेवाली कन्यासे फिर बोला – ॥ २० ॥
अवलिप्तासि सुश्रोणि यस्यास्ते मतिरीदृशी ।
वृद्धानां मृगशावाक्षि भ्राजते पुण्यसंचयः ॥ २१ ॥
' सुश्रोणि! तुम गर्वीली जान पड़ती हो, तभी तो तुम्हारी बुद्धि ऐसी हो गयी है । मृगशावकलोचने! इस तरह पुण्यका संग्रह बूढ़ी स्त्रियोंको ही शोभा देता है. तुम जैसी युवतीको नहीं ॥ २१ ॥
त्वं सर्वगुणसम्पन्ना नार्हसे वक्तुमीदृशम् ।
त्रैलोक्यसुन्दरी भीरु यौवनं तेऽतिवर्तते ॥ २२ ॥
' तुम तो सर्वगुणसम्पन्न एवं त्रिलोकीकी अद्वितीय सुन्दरी हो । तुम्हें ऐसी बात नहीं कहनी चाहिये । भीरु! तुम्हारी जवानी बीती जा रही है ॥ २२ ॥
अहं लङ्कापतिर्भद्रे दशग्रीव इति श्रुतः ।
तस्य मे भव भार्या त्वं भुङ्क्ष्व भोगान् यथासुखम् ॥ २३ ॥
' भद्रे! मैं लङ्काका राजा हूँ । मेरा नाम दशग्रीव है । तुम मेरी भार्या हो जाओ और सुखपूर्वक उत्तम भोग भोगो ॥ २३ ॥
कश्च तावदसौ यं त्वं विष्णुरित्यभिभाषसे ।
वीर्येण तपसा चैव भोगेन च बलेन च ॥ २४ ॥
समया नो समो भद्रे यं त्वं कामयसेऽङ्गने । ' पहले यह तो बताओ, तुम जिसे विष्णु कहती हो, वह कौन है? अङ्गने! भद्रे! तुम जिसे चाहती हो, वह बल, पराक्रम, तप और भोग - वैभवके द्वारा मेरी समानता नहीं कर सकता ' ॥ २४३ ॥
इत्युक्तवति तस्मिंस्तु मा मैवमिति सा कन्या उसके ऐसा कहने पर बोली- ' नहीं, नहीं, ऐसा त्रैलोक्याधिपतिं विष्णुं त्वद्यते राक्षसेन्द्रान्यः वेदवत्यथ साब्रवीत् ॥ २५ ॥
तमुवाच निशाचरम् । कुमारी वेदवती उस निशाचरसे न कहो ॥ २५३ ॥
सर्वलोकनमस्कृतम् ॥ २६ ॥
कोऽवमन्येत बुद्धिमान् । ‘ राक्षसराज! भगवान् विष्णु तीनों लोकोंके अधिपति हैं । सारा संसार उनके चरणोंमें मस्तक झुकाता है । तुम्हारे सिवा दूसरा कौन पुरुष है, जो बुद्धिमान् होकर भी उनकी अवहेलना करेगा ' ॥२६३ ॥
एवमुक्तस्तया तत्र वेदवत्या निशाचरः ॥ २७ ॥
मूर्धजेषु तदा कन्यां कराग्रेण परामृशत् । वेदवतीके ऐसा कहनेपर उस राक्षसने अपने हाथसे उस कन्याके केश पकड़ लिये ॥ २७३ ॥
ततो वेदवती क्रुद्धा केशान् हस्तेन साच्छिनत् ॥ २८ ॥
असिर्भूत्वा करस्तस्याः केशांश्छिन्नांस्तदाकरोत् । इससे वेदवतीको बड़ा क्रोध हुआ । उसने अपने हाथसे उन केशों को काट दिया । उसके हाथने तलवार बनकर तत्काल उसके केशोंको मस्तकसे अलग कर दिया ॥ २८३ ॥
सा ज्वलन्तीव रोषेण दहन्तीव निशाचरम् ॥ २ ९ ॥ उवाचाग्निं समाधाय मरणाय कृतत्वरा । वेदवती रोषसे प्रज्वलित - सी हो उठी । वह जल मरनेके लिये उतावली हो अग्निकी स्थापना करके उस निशाचरको दग्ध करती हुई - सी बोली - ॥ २ ९ ३ ॥ धर्षितायास्त्वयानार्य न मे जीवितमिष्यते ॥ ३० ॥
रक्षस्तस्मात् प्रवेक्ष्यामि पश्यतस्ते हुताशनम् । ' नीच राक्षस! तूने मेरा तिरस्कार किया है; अतः अब इस जीवनको सुरक्षित रखना मुझे अभीष्ट नहीं है । इसलिये तेरे देखते - देखते मैं अग्निमें प्रवेश कर जाऊँगी ॥ ३०३ ॥
यस्मात् तु धर्षिता चाहं त्वया पापात्मना वने ॥ ३१ ॥
तस्मात् तव वधार्थं हि समुत्पत्स्ये ह्यहं पुनः ।
' तुझ पापात्माने इस वनमें मेरा अपमान किया है ।
इसलिये मैं तेरे वध के लिये फिर उत्पन्न होऊँगी ॥ ३१३ ॥
नहि शक्यः स्त्रिया हन्तुं पुरुषः पापनिश्चयः ॥ ३२ ॥
शापे त्वयि मयोत्सृष्टे तपसश्च व्ययो भवेत् । ' स्त्री अपनी शारीरिक शक्तिसे किसी पापाचारी पुरुषका वध नहीं कर सकती । यदि मैं तुझे शाप दूँ तो मेरी तपस्या क्षीण हो जायगी ॥ ३२३ ॥
यदि त्वस्ति मया किंचित् कृतं दत्तं हुतं तथा ॥ ३३ ॥
तस्मात् त्वयोनिजा साध्वी भवेयं धर्मिणः सुता । ' यदि मैंने कुछ भी सत्कर्म, दान और होम किये हों तो अगले जन्म में मैं सती - साध्वी अयोनिजा कन्याके रूपमें प्रकट होऊँ तथा किसी धर्मात्मा पिताकी पुत्री बनूँ ' ॥ ३३३ ॥
एवमुक्त्वा प्रविष्टा सा ज्वलितं जातवेदसम् ॥ ३४ ॥
पपात च दिवो दिव्या पुष्पवृष्टिः समन्ततः । ऐसा कहकर वह प्रज्वलित अग्निमें समा गयी । उस समय उसके चारों ओर आकाशसे दिव्य पुष्पोंकी वर्षा होने लगी ॥ ३४३ ॥
पुनरेव समुद्भूता पद्मे पद्मसमप्रभा ॥ ३५ ॥
तस्मादपि पुनः प्राप्ता पूर्ववत् तेन रक्षसा । तदनन्तर दूसरे जन्ममें वह कन्या पुनः एक कमलसे प्रकट हुई । उस समय उसकी कान्ति कमलके समान ही सुन्दर थी । उस राक्षसने पहले की ही भाँति फिर वहाँसे भी उस कन्याको प्राप्त कर लिया ॥ ३५३ ॥
कन्यां कमलगर्भाभां प्रगृह्य स्वगृहं ययौ ॥ ३६ ॥
प्रगृह्य रावणस्त्वेतां दर्शयामास मन्त्रिणे । कमलके भीतरी भागके समान सुन्दर कान्तिवाली उस कन्याको लेकर रावण अपने घर गया । वहाँ उसने मन्त्रीको वह कन्या दिखायी ॥ ३६ ॥
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तैयारी अग्निप्रवेशकी एवं भर्त्सना रावणकी द्वारा वेदवतीके कन्या -तपस्वि
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उत्तरकाण्डे अष्टादशः सर्गः १४ ९९ लक्षणज्ञो निरीक्ष्यैव रावणं चैवमब्रवीत् ॥ ३७ ॥
गृहस्थैषा हि सुश्रोणी त्ववधायैव दृश्यते । मन्त्री बालक - बालिकाओंके लक्षणों को जाननेवाला था । उसने उसे अच्छी तरह देखकर रावणसे कहा- ' राजन्! यह सुन्दरी कन्या यदि घरमें रही तो आपके वधका ही कारण होगी, ऐसा लक्षण देखा जाता है ' ॥ ३७३ ॥
एतच्छ्रुत्वार्णवे राम तां प्रचिक्षेप रावणः ॥ ३८ ॥
सा चैव क्षितिमासाद्य यज्ञायतनमध्यगा ।
राज्ञो हलमुखोत्कृष्टा पुनरप्युत्थिता सती ॥ ३ ९ ॥
श्रीराम! यह सुनकर रावणने उसे समुद्र में फेंक दिया । तत्पश्चात् वह भूमिको प्राप्त होकर राजा जनकके यज्ञमण्डपके मध्यवर्ती भूभागमें जा पहुँची । वहाँ राजाके हलके मुखभागसे उस भूभागके जोते जानेपर वह सती साध्वी कन्या फिर प्रकट हो गयी ॥ ३८-३९ ॥
सैपा जनकराजस्य प्रसूता तनया प्रभो ।
तव भार्या महाबाहो विष्णुस्त्वं हि सनातनः ॥ ४० ॥
प्रभो! वही यह वेदवती महाराज जनककी पुत्रीके रूपमें प्रादुर्भूत हो आपकी पत्नी हुई है । महाबाहो! आप ही सनातन विष्णु हैं ॥ ४० ॥
पूर्व क्रोधहतः शत्रुर्ययासौ निहतस्तया ।
उपाश्रयित्वा शैलाभस्तव वीर्यममानुषम् ॥ ४१ ॥
उस वेदवतीने पहले ही अपने रोषजनित शापके द्वारा आपके उस पर्वताकार शत्रुको मार डाला था, जिसे अब आपने आक्रमण करके मौत के घाट उतारा है । प्रभो! आपका पराक्रम अलौकिक है ॥ ४१ ॥
एवमेषा महाभागा मर्त्येषूत्पत्स्यते पुनः ।
क्षेत्रे हलमुखोत्कृष्टे वेद्यामग्निशिखोपमा ॥ ४२ ॥
इस प्रकार यह महाभागा देवी विभिन्न कल्पोंमें पुनः रावणवधके उद्देश्यसे मर्त्यलोकमें अवतीर्ण होती रहेगी । यज्ञवेदी-पर अग्निशिखाके समान हलसे जोते गये क्षेत्रमें इसका आविर्भाव हुआ है ॥ ४२ ॥
एषा वेदवती नाम पूर्वमासीत् कृते युगे ।
त्रेतायुगमनुप्राप्य वधार्थं तस्य रक्षसः ॥ ४३ ॥
उत्पन्ना मैथिलकुले जन महात्मनः ।
सतोत्पन्नातु सीतेति मानुषैः पुनरुच्यते ॥ ४४ ॥
यह वेदवती पहले सत्ययुगमें प्रकट हुई थी । फिर त्रेतायुग आनेपर उस राक्षस रावण के वध के लिये मिथिलावर्ती राजा जनकके कुलमें सीतारूपसे अवतीर्ण हुई । सीता ( हल जोतने-से भूमिपर बनी हुई रेखा ) से उत्पन्न होने के कारण मनुष्य इस देवीको सीता कहते हैं ॥ ४३-४४ ॥ इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये उत्तरकाण्डे सप्तदशः सर्गः ॥ १७ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्धरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्ड में सत्रहवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ १७ ॥
अष्टादशः सर्गः रावणद्वारा मरुतकी पराजय तथा इन्द्र आदि
प्रविष्टायां हुताशं तु वेदवत्यां स रावणः ।
पुष्पकं तु समारुह्य परिचक्राम मेदिनीम् ॥ १ ॥
अगस्त्यजी कहते हैं — रघुनन्दन! वेदवतीके अग्निमें प्रवेश कर जानेपर रावण पुष्पकविमानपर आरूढ़ हो पृथ्वीपर सब ओर भ्रमण करने लगा ॥ १ ॥
ततो मरुतं नृपतिं यजन्तं सह दैवतैः ।
उशीरबीजमासाद्य ददर्श स तु रावणः ॥ २ ॥
उसी यात्रा में उशीरबीज नामक देशमें पहुँचकर रावणने देखा, राजा मरुत्त देवताओंके साथ बैठकर यज्ञ कर रहे हैं ॥ २ ॥
संवर्ती नाम ब्रह्मर्षिः साक्षाद् भ्राता बृहस्पतेः ।
याजयामास धर्मज्ञः सर्वैर्देवगणैर्वृतः ॥ ३ ॥
उस समय साक्षात् बृहस्पतिके भाई तथा धर्मके, मर्मको जाननेवाले ब्रह्मर्षि संवर्त सम्पूर्ण देवताओंसे घिरे रहकर वह यज्ञ करा रहे थे ॥ ३ ॥
देवास्तु तद् रक्षो वरदानेन दुर्जयम् ।
तिर्यग्योनिं समाविष्टास्तस्य धर्षणभीरवः ॥ ४ ॥
ब्रह्माजी के वरदानसे जिसको जीतना कठिन हो गया था, देवताओंका मयूर आदि पक्षियोंको वरदान देना उस राक्षस रावणको वहाँ देखकर उसके आक्रमणसे भयभीत हो देवता लोग तिर्यग्योनिमें प्रवेश कर गये ॥ ४ ।
इन्द्रो मयूरः संवृत्तो धर्मराजस्तु वायसः ।
कृकलासो धनाध्यक्षो हंसश्च वरुणोऽभवत् ॥ ५ ॥
इन्द्र मोर, धर्मराज कौआ, कुबेर गिरगिट और वरुण हंस हो गये ॥ ५ ॥
अन्वेष्वपि गतेष्वेवं देवेष्वरिनिषूदन ।
रावणः प्राविशद् यज्ञं सारमेय इवाशुचिः ॥ ६ ॥
शत्रुसूदन श्रीराम! इसी तरह दूसरे दूसरे देवता भी जब विभिन्न रूपों में स्थित हो गये, तब रावणने उस यज्ञमण्डपमें प्रवेश किया, मानो कोई अपवित्र कुत्ता वहाँ आ गया हो ॥ ६ ॥
तं च राजानमासाद्य रावणो राक्षसाधिपः ।
प्राह युद्धं प्रयच्छेति निर्जितोऽस्मीति वा वद ॥ ७ ॥
राजा मरुत्तके पास पहुँचकर राक्षसराज रावणने कहा-" मुझसे युद्ध करो या अपने मुँह से यह कह दो कि मैं पराजित हो गया ' ॥ ७ ॥
ततो मरुत्तो नृपतिः को भवानित्युवाच तम् ।
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१५०० श्रीमवाल्मीकीय रामायणे अवहासं ततो मुक्त्वा रावणो वाक्यमब्रवीत् ॥ ८ ॥
तत्र राजा मरुत्तने पूछा -- ‘ आप कौन हैं? ' उनका प्रश्न सुनकर रावण हँस पड़ा और बोला- ॥ ८ ॥
अकुतूहलभावेन प्रीतोऽस्मि तव पार्थिव ।
धनदस्यानुजं यो मां नावगच्छसि रावणम् ॥ ९ ॥
' भूपाल! मैं कुबेरका छोटा भाई रावण हूँ । फिर भी तुम मुझे नहीं जानते और मुझे देखकर भी तुम्हारे मनमें न तो कौतूहल हुआ, न भय ही; इससे मैं तुम्हारे ऊपर बहुत प्रसन्न हूँ ॥ ९ ॥
त्रिषु लोकेषु कोऽन्योऽस्ति यो न जानाति मे बलम् ।
भ्रातरं येन निर्जित्य विमानमिदमाहृतम् ॥ १० ॥
' तीनों लोकोंमें तुम्हारे सिवा दूसरा कौन ऐसा राजा होगा, जो मेरे बलको न जानता हो । मैं वह रावण हूँ, जिसने अपने भाई कुबेरको जीतकर यह विमान छीन लिया है ' ॥ १० ॥
ततो मरुतः स नृपस्तं रावणमथाब्रवीत् ।
धन्यः खलु भवान् येन ज्येष्ठो भ्राता रणे जितः ॥ ११ ॥
तब राजा मरुत्तने रावणसे कहा --- ' तुम धन्य हो, जिसने अपने बड़े भाईको रणभूमिमें पराजित कर दिया ॥ ११ ॥
न त्वया सदृशः श्लाघ्यस्त्रिषु लोकेषु विद्यते ।
कं त्वं प्राक्केवलं धर्म चरित्वा लब्धवान् वरम् ॥ १२ ॥
' तुम्हारे जैसा स्पृहणीय पुरुष तीनों लोकोंमें दूसरा कोई नहीं है । तुमने पूर्वकालमें किस शुद्ध धर्मका आचरण करके वर प्राप्त किया है ॥ १२ ॥
श्रुतपूर्व हि न मया भाषसे यादृशं स्वयम् ।
तिष्ठेदानीं न मे जीवन, प्रतियास्यसि दुर्मते ॥ १३ ॥
अद्य त्वां निशितैर्बाणैः प्रेषयामि यमक्षयम् । " तुम स्वयं जो कुछ कह रहे हो, ऐसी बात मैंने पहले कभी नहीं सुनी है । दुर्बुद्धे! इस समय खड़े तो रहो । मेरे हाथसे जीवित बचकर नहीं जा सकोगे । आज अपने पैने बाणोंसे मारकर तुम्हें यमलोक पहुँचाये देता हूँ ' ॥ १३३ ॥
ततः शरासनं गृह्य सायकांश्च नराधिपः ॥ १४ ॥
रणाय निर्ययौ क्रुद्धः संवर्तो मार्गमावृणोत् । तदनन्तर राजा मरुत्त धनुष - बाण लेकर बड़े रोषके साथ युद्ध के लिये निकले, परंतु महर्षि संवर्तने उनका रास्ता रोक लिया || १४३ ॥ सोऽब्रवीत् स्नेहसंयुक्तं मरुत्तं तं महानृषिः ॥ १५ ॥
श्रोतव्यं यदि मद्वाक्यं सम्प्रहारो न ते क्षमः । उन महर्षिने महाराज मरुत्तसे स्नेहपूर्वक कहा - ' राजन्! यदि मेरी बात सुनना और उसपर ध्यान देना उचित समझो तो सुनो । तुम्हारे लिये युद्ध करना उचित नहीं है ॥ १५३ ॥
माहेश्वरमिदं सत्र समाप्तं कुलं दहेत् ॥ १६ ॥
दीक्षितस्य कुतो युद्धं क्रोधित्वं दीक्षिते कुतः । ' यह माहेश्वर यज्ञ आरम्भ किया गया है । यदि पूरा न हुआ तो तुम्हारे समस्त कुलको दग्ध कर डालेगा । जो यज्ञकी दीक्षा ले चुका है, उसके लिये युद्धका अवसर ही कहाँ है? यज्ञदीक्षित पुरुषमें क्रोधके लिये स्थान ही कहाँ है? ॥ १६३ ॥
संशयश्च जये नित्यं राक्षसश्च सुदुर्जयः ॥ १७ ॥
स निवृत्तो गुरोर्वाक्यान्मरुत्तः पृथिवीपतिः ।
विसृज्य सशरं चापं स्वस्थो मखमुखोऽभवत् ॥ १८ ॥
' युद्ध में किसकी विजय होगी, इस प्रश्नको लेकर सदा संशय ही बना रहता है । उधर वह राक्षस अत्यन्त दुर्जय है । ' अपने आचार्यके इस कथनसे पृथ्वीपति मरुत्त युद्धसे निवृत्त हो गये । उन्होंने धनुष - बाण त्याग दिया और स्वस्थभावसे वे यज्ञके लिये उन्मुख हो गये ॥ १७-१८ ॥
ततस्तं निर्जितं मत्वा घोषयामास वै शुकः ।
रावणो जयतीत्युच्चैर्षान्नादं विमुक्तवान् ॥ १ ९ ॥
तब उन्हें पराजित हुआ मानकर शुकने यह घोषणा कर दी कि महाराज रावणकी विजय हुई और वह बड़े हर्ष के साथ उच्चस्वर से सिंहनाद करने लगा ॥ १ ९ ॥
तान् भक्षयित्वा तत्रस्थान् महर्षीन् यज्ञमागतान् ।
वितृप्तो रुधिरैस्तेषां पुनः सम्प्रययौ महीम् ॥ २० ॥
उस यज्ञमें आकर बैठे हुए महर्षियों को खाकर उनके रक्तसे पूर्णतः तृप्त हो रावण फिर पृथ्वीपर विचरने लगा ॥ २० ॥
रावणे तु गते देवाः सेन्द्राश्चैव दिवौकसः ।
ततः स्वां योनिमासाद्य तानि सत्त्वानि चाब्रुवन् ॥ २१ ॥
रावण के चले जाने पर इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवता पुनः अपने स्वरूपमें प्रकट हो उन - उन प्राणियोंको ( जिनके रूपमें वे स्वयं प्रकट हुए थे ) वरदान देते हुए बोले ॥ २१ ॥
हर्षात् तदाब्रवीदिन्द्रो मयूरं नीलबर्हिणम् ।
प्रीतोऽस्मि तव धर्मज्ञ भुजङ्गाद्धि न ते भयम् ॥ २२ ॥
सबसे पहले इन्द्रने हर्षपूर्वक नीले पंखवाले मोरसे कहा-' धर्मज्ञ! मैं तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ । तुम्हें सर्पसे भय नहीं होगा ॥
इदं नेत्रसहस्रं तु यत् तद् बर्हे भविष्यति ।
वर्षमाणे मयि मुदं प्राप्स्यसे प्रीतिलक्षणाम् ॥ २३ ॥
एवमिन्द्रो वरं प्रादान्मयूरस्य सुरेश्वरः ॥ २४ ॥
' मेरे जो ये सहस्र नेत्र हैं, इनके समान चिह्न तुम्हारी पाँखमें प्रकट होंगे । जब मैं मेघरूप होकर वर्षा करूँगा, उस समय तुम्हें बड़ी प्रसन्नता प्राप्त होगी । वह प्रसन्नता मेरी प्राप्तिको लक्षित करानेवाली होगी । इस प्रकार देवराज इन्द्रने मोरको वरदान दिया ॥ २३-२४ ॥
नीलाः किल पुरा बर्हा मयूराणां नराधिप ।
सुराधिपाद वरं प्राप्य गताः सर्वेऽपि वर्हिणः ॥ २५ ॥
नरेश्वर श्रीराम! इस वरदान के पहले मोरों के पंख केवल नीले रंगके ही होते थे । देवराजसे उक्त वर पाकर सब मयूर वहाँसे चले गये ॥ २५ ॥
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उत्तरकाण्डे एकोनविंशः सर्गः १५०१
धर्मराजोऽब्रवीद् राम प्राग्वंशे वायसं प्रति ।
पक्षिस्तवास्मि सुप्रीतः प्रीतस्य वचनं शृणु ॥ २६ ॥
श्रीराम! तदनन्तर धर्मराजने प्रीवंशकी छतपर बैठे हुए कौए से कहा - पक्षी! मैं तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ । प्रसन्न होकर जो कुछ कहता हूँ, मेरे इस वचनको सुनो ॥ २६ ॥
यथान्ये विविधै रोगैः पीड्यन्ते प्राणिनो मया ।
ते न ते प्रभविष्यन्ति मयि प्रीते न संशयः ॥ २७ ॥
" जैसे दूसरे प्राणियोंको मैं नाना प्रकारके रोगोंद्वारा पीड़ित करता हूँ, वे रोग मेरी प्रसन्नता के कारण तुमपर अपना प्रभाव नहीं डाल सकेंगे; इसमें संशय नहीं है ॥ २७ ॥
मृत्युतस्ते भयं नास्ति वरान् मम विहंगम ।
यावत् त्वां न वधिष्यन्ति नरास्तावद् भविष्यसि ॥ २८ ॥
" विहङ्गम! मेरे वरदान से तुम्हें मृत्युका भय नहीं होगा । जबतक मनुष्य आदि प्राणी तुम्हारा वध नहीं करेंगे, तबतक तुम जीवित रहोगे ॥ २८ ॥
ये च मद्विषयस्था वै मानवाः क्षुधयार्दिताः ।
त्वयि भुक्ते सुतृप्तास्ते भविष्यन्ति सवान्धवाः ॥ २ ९ ॥
' मेरे राज्य – यमलोक में स्थित रहकर जो मानव भूखसे पीड़ित हैं, उनके पुत्र आदि इस भूतलपर जब तुम्हें भोजन करावेंगे, तब वे बन्धु - बान्धवोंसहित परम तृप्त होंगे ' ॥२ ९ ॥
वरुणस्त्वत्रवीद्धसं गङ्गातोयविचारिणम् ।
श्रूयतां प्रीतिसंयुक्तं वचः पत्ररथेश्वर ॥ ३० ॥
तत्पश्चात् वरुणने गङ्गाजीके जलमें विचरनेवाले हंसको सम्बोधित करके कहा - ' पक्षिराज! मेरा प्रेमपूर्ण वचन सुनो - ॥ ३० ॥
वर्णो मनोरमः सौम्यश्चन्द्रमण्डलसंनिभः ।
भविष्यति तवोदयः शुद्धफेनसमप्रभः ॥ ३१ ॥
' तुम्हारे शरीरका रंग चन्द्रमण्डल तथा शुद्ध फेनके समान परम उज्ज्वल, सौम्य एवं मनोरम होगा ॥ ३१ ॥
मच्छरीरं समासाद्य कान्तो नित्यं भविष्यसि ।
प्राप्स्यसे चातुलां प्रीतिमेतन्मे प्रीतिलक्षणम् ॥ ३२ ॥
' मेरे अङ्गभूत जलका आश्रय लेकर तुम सदा कान्ति-मान् बने रहोगे और तुम्हें अनुपम प्रसन्नता प्राप्त होगी । यही मेरे प्रेमका परिचायक चिह्न होगा ' ॥ ३२ ॥
हंसानां हि पुरा राम न वर्णः सर्वपाण्डुरः ।
पक्षा नीलाग्रसंवीताः क्रोडाः शष्पाग्रनिर्मलाः ॥ ३३ ॥
श्रीराम! पूर्वकालमें हंसों का रंग पूर्णतः श्वेत नहीं था । उनकी पाँखोंका अग्रभाग नीला और दोनों भुजाओंके बीच-का भाग नूतन दूर्वादल के अग्रभाग - सा कोमल एवं श्याम वर्ण-' युक्त होता था ॥ ३३ ॥
अथाब्रवीद् वैश्रवणः कृकलासं गिरौ स्थितम् ।
हैरण्यं सम्प्रयच्छामि वर्ण प्रीतस्तवाप्यहम् ॥ ३४ ॥
तदनन्तर विश्रवा के पुत्र कुबेरने पर्वतशिखरपर बैठे हुए कृकलास ( गिरगिट ) से कहा - ' मैं प्रसन्न होकर तुम्हें सुवर्णके समान सुन्दर रंग प्रदान करता हूँ ॥ ३४ ॥
सद्रव्यं च शिरो नित्यं भविष्यति तवाक्षयम् ।
एष काञ्चनको वर्णों मत्प्रीत्या ते भविष्यति ॥ ३५ ॥
' तुम्हारा सिर सदा ही सुवर्णके समान रंगका एवं अक्षय होगा । मेरी प्रसन्नता से तुम्हारा यह ( काला ) रंग सुनहरे रंगमें परिवर्तित हो जायगा ' ॥ ३५ ॥
एवं दत्त्वा वरांस्तेभ्यस्तस्मिन् यज्ञोत्सवे सुराः ।
निवृत्ते सह राज्ञा ते पुनः स्वभवनं गताः ॥ ३६ ॥
इस प्रकार उन्हें उत्तम वर देकर वे सब देवता वह यज्ञोत्सव समाप्त होनेपर राजा मरुत्त के साथ पुनः अपने भवन-स्वर्गलोकको चले गये || ३६ | इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये उत्तरकाण्डेऽष्टादशः सर्गः ॥ १८ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें अठारहवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ १८ ॥
एकोनविंशः सर्गः रावणके द्वारा अनरण्यका वध तथा उनके द्वारा उसे शापकी प्राप्ति
अथ जित्वा मरुत्तं स प्रययौ राक्षसाधिपः ।
नगराणि नरेन्द्राणां युद्धकाङ्क्षी दशाननः ॥ १ ॥
( अगस्त्यजी कहते हैं -- रघुनन्दन! ) पूर्वोक्त रूपसे राजा मरुत्तको जीतने के पश्चात् राक्षसराज दशग्रीव क्रमशः अन्य नरेशोंके नगरों में भी युद्धकी इच्छासे गया ॥ १ ॥
समासाद्य तु राजेन्द्रान् महेन्द्रवरुणोपमान् ।
अग्रवीद् राक्षसेन्द्रस्तु युद्धं मे दीयतामिति ॥ २ ॥
निर्जिताः स्मेति वा ब्रूत एष मे हि सुनिश्चयः ।
अन्यथा कुर्वतामेवं मोक्षो नैवोपपद्यते ॥ ३ ॥
महेन्द्र और वरुणके समान पराक्रमी उन महाराजों के पास जाकर वह राक्षसराज उनसे कहता- ' राजाओ! तुम मेरे साथ युद्ध करो अथवा यह कह दो कि ' हम हार गये । " यही मेरा अच्छी तरह किया हुआ निश्चय है । इसके विपरीत करनेसे तुम्हें छुटकारा नहीं मिलेगा ' ॥ २-३ ॥
ततस्त्वभीरवः प्राज्ञाः पार्थिवा धर्मनिश्चयाः ।
मन्त्रयित्वा ततोऽन्योन्यं राजानः सुमहाबलाः ॥ ४ ॥
१. यशशाला के पूर्वभाग में यजमान और उसकी पत्नी आदिके ठहरनेके लिये बने हुए गृहको प्राग्वंश कहते हैं । यह घर हविर्गृहके पूर्व ओर होता है ।
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१५०२ भीमवाल्मीकीय रामायणे निर्जिताः स्मेत्यभाषन्त ज्ञात्वा वरबलं रिपोः । तब निर्भय, बुद्धिमान् तथा धर्मपूर्ण विचार रखनेवाले बहुत - से महाबली राजा परस्पर सलाह करके शत्रुकी प्रबलताको
समझकर बोले— ' राक्षसराज! हम तुमसे हार मान लेते हैं ' ।
दुष्यन्तः सुरथो गाधिर्गयो राजा पुरूरवाः ॥ ५ ॥
एते सर्वेऽब्रुवंस्तात निर्जिताः स्मेति पार्थिवाः । दुष्यन्त, सुरथ, गाधि, गय, राजा पुरूरवा - इन सभी भूपालोंने अपने - अपने राजत्वकालमें रावणके सामने अपनी पराजय स्वीकार कर ली ॥ ५३ ॥
अथायोध्यां समासाद्य रावणो राक्षसाधिपः ॥ ६ ॥
सुगुप्तामनरण्येन शक्रेणेवामरावतीम् ।
स तं पुरुषशार्दूलं पुरंदरसमं बले ॥ ७ ॥
प्राह राजानमासाद्य युद्धं देहीति रावणः ।
निर्जितोऽस्मीति वा ब्रूहि त्वमेवं मम शासनम् ॥ ८ ॥
इसके बाद राक्षसोंका राजा रावण इन्द्रद्वारा सुरक्षित अमरावतीकी भाँति महाराज अनरण्यद्वारा पालित अयोध्या पुरीमें आया । वहाँ पुरन्दर ( इन्द्र ) के समान पराक्रमी पुरुष-सिंह राजा अनरण्यसे मिलकर बोला – ' राजन्! तुम मुझसे युद्ध करने का वचन दो अथवा कह दो कि ' मैं हार गया । " यही मेरा आदेश है ' ॥ ६-८ ॥
अयोध्याधिपतिस्तस्य श्रुत्वा पापात्मनो वचः ।
अनरण्यस्तु संक्रुद्धो राक्षसेन्द्रमथाब्रवीत् ॥ ९ ॥
उस पापात्माकी वह बात सुनकर अयोध्यानरेश अनरण्यको बड़ा क्रोध हुआ और वे उस राक्षसराजसे बोले— ॥
दीयते द्वन्द्वयुद्धं ते राक्षसाधिपते मया ।
संतिष्ठक्षिप्रमायत्तो भव चैवं भवाम्यहम् ॥ १० ॥
‘ निशाचरपते! मैं तुम्हें द्वन्द्वयुद्धका अवसर देता हूँ । ठहरो, शीघ्र युद्धके लिये तैयार हो जाओ । मैं भी तैयार हो रहा हूँ ' ॥ १० ॥
अथ पूर्व श्रुतार्थेन निर्जितं सुमहद् बलम् ।
निष्क्रामत् तन्नरेन्द्रस्य बलं रक्षोवधोद्यतम् ॥ ११ ॥
राजाने रावणकी दिग्विजयकी बात पहले से ही सुन रक्खी थी, इसलिये उन्होंने बहुत बड़ी सेना इकट्ठी कर ली थी । नरेशकी वह सारी सेना उस समय राक्षसके वध के लिये उत्साहित हो नगरसे बाहर निकली ॥ ११ ॥
नागानां दशसाहस्रं वाजिनां नियुतं तथा ।
रथानां बहुसाहस्रं पत्तीनां च नरोत्तम ॥ १२ ॥
महीं संछाद्य निष्क्रान्तं सपदातिरथं रणे । नरश्रेष्ठ श्रीराम! दस हजार हाथीसवार एक लाख घुड़सवार, कई हजार रभी और पैदल सैनिक पृथ्वीको आच्छादित करके युद्धके लिये आगे बढ़े । रथों और पैदलों-सहित सारी सेना रणक्षेत्रमें जा पहुँची ॥ १२३ ॥
ततः प्रवृत्तं सुमहद् युद्धं युद्धविशारद ॥ १३ ॥
अनरण्यस्य नृपते राक्षसेन्द्रस्य चाद्भुतम् । युद्धविशारद रघुवीर! फिर तो राजा अनरण्य और निशाचर रावणमें बड़ा अद्भुत संग्राम होने लगा ॥ १३३ ॥
तद् रावणबलं प्राप्य बलं तस्य महीपतेः ॥ १४ ॥
प्राणश्यत तदा सर्व हव्यं हुतमिवानले । उस समय राजाकी सारी सेना रावणकी सेनाके साथ टक्कर लेकर उसी तरह नष्ट होने लगी, जैसे अग्निमें दी हुई आहुति पूर्णतः भस्म हो जाती है ॥ १४३ ॥
युद्ध्वा च सुचिरं कालं कृत्वा विक्रममुत्तमम् ॥१५ ॥
प्रज्वलन्तं तमासाद्य क्षिप्रमेवावशेषितम् ।
प्राविशत् संकुलं तत्र शलभा इव पावकम् ॥ १६ ॥
उस सेनाने बहुत देर तक युद्ध किया, बड़ा पराक्रम दिखाया; परंतु तेजस्वी रावणका सामना करके वह बहुत थोड़ी संख्या में शेष रह गयी और अन्ततोगत्वा जैसे पति आगमें जलकर भस्म हो जाते हैं, उसी प्रकार कालके गाल में चली गयी ॥ १५-१६ ॥
सोऽपश्यत् तन्नरेन्द्रस्तु नश्यमानं महाबलम् ।
महार्णवं समासाद्य वनापगशतं यथा ॥ १७ ॥
राजाने देखा, मेरी विशाल सेना उसी प्रकार नष्ट होती चली जा रही है, जैसे जलसे भरी हुई सैकड़ों नदियाँ महासागरके पास पहुँचकर उसीमें विलीन हो जाती हैं ॥१७ ॥
ततः शक्रधनुःप्रख्यं धनुर्विस्फारयन् स्वयम् ।
आससाद नरेन्द्रस्तं रावणं क्रोधमूर्च्छितः ॥ १८ ॥
तब महाराज अनरण्य क्रोधसे मूर्छित हो अपने इन्द्र-धनुषके समान महान् शरासनको टंकारते हुए रावण का सामना करने के लिये आये ॥ १८ ॥
अनरण्येन तेऽमात्या मारीचशुकसारणाः ।
प्रहस्तसहिता भग्ना व्यद्रवन्त मृगा इव ॥ १ ९ ॥
फिर तो जैसे सिंहको देखकर मृग भाग जाते हैं, उसी प्रकार मारीच, शुक, सारण तथा प्रहस्त — ये चारों राक्षस मन्त्री राजा अनरण्य से परास्त होकर भाग खड़े हुए ॥ १ ९ ॥
ततो वाणशतान्यष्टौ पातयामास मूर्धनि ।
तस्य राक्षसराजस्य इक्ष्वाकुकुलनन्दनः ॥ २० ॥
तत्पश्चात् इक्ष्वाकुवंशको आनन्दित करनेवाले राजा अनरण्यने राक्षसराज रावणके मस्तकपर आठ सौ बाण मारे ॥
तस्य बाणाः पतन्तस्ते चक्रिरे न क्षतं क्वचित् ।
वारिधारा इवाभ्रेभ्यः पतन्त्यो गिरिमूर्धनि ॥ २१ ॥
परंतु जैसे बादलोंसे पर्वतशिखरपर गिरती हुई जल-धाराएँ उसे क्षति नहीं पहुँचातीं, उसी प्रकार वे बरसते हुए बाण उस निशाचरके शरीरपर कहीं घाव न कर सके ॥ २१ ॥
• ततो राक्षसराजेन क्रुद्धेन नृपतिस्तदा ।
तलेनाभिहतो मूर्ध्नि स रथान्निपपात ह ॥ २२ ॥
इसके बाद राक्षसराजने कुपित होकर राजाके मस्तकपर गि स व हो क त 24 वि व क्य त्र श मु अ त क बा अ कर नह का किंत कार मृत तत आ राक्ष विच उसे तस
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उत्तरकाण्डे र 1 सी == एक तमाचा मारा । इससे आहत होकर राजा रथसे नीचे गिर पड़े ॥ २२ ॥
स राजा पतितो भूमौ विह्वलः प्रविवेपितः ।
वज्रदग्ध इवारण्ये सालो निपतितो यथा ॥ २३ ॥
जैसे वनमें वज्रपातसे दग्ध हुआ साबूका वृक्ष धराशायी हो जाता है, उसी प्रकार राजा अनरण्य व्याकुल हो भूमिपर गिरे और थर - थर काँपने लगे ॥ २३ ॥
तं प्रहस्यान्रवीद् रक्ष इक्ष्वाकुं पृथिवीपतिम् ।
किमिदानीं फलं प्राप्तं त्वया मां प्रति युध्यता ॥ २४ ॥
यह देख रावण जोर - जोर से हँस पड़ा और उन इक्ष्वाकु-वंशी नरेशसे बोला- ' इस समय मेरे साथ युद्ध करके तुमने क्या फल प्राप्त किया है! ॥ २४ ॥
त्रैलोक्ये नास्ति यो द्वन्द्वं मम दद्यान्नराधिप ।
शङ्के प्रसक्तो भोगेषु न शृणोषि बलं मम ॥ २५ ॥
' नरेश्वर! तीनों लोकों में कोई ऐसा वीर नहीं है, जो मुझे द्वन्द्वयुद्ध दे सके । जान पड़ता है तुमने भोगोंमें अधिक आसक्त रहनेके कारण मेरे बल - पराक्रमको नहीं सुना था ' ॥
तस्यैवं ब्रुवतो राजा मन्दासुर्वाक्यमब्रवीत् ।
किं शक्यमिह कर्तु वै कालो हि दुरतिक्रमः ॥ २६ ॥
राजाकी प्राणशक्ति क्षीण हो रही थी । उन्होंने इस प्रकार बातें करनेवाले रावणका वचन सुनकर कहा - ' राक्षसराज! अब यहाँ क्या किया जा सकता है? क्योंकि कालका उल्लङ्घन करना अत्यन्त दुष्कर है ॥ २६ ॥
नाहं निर्जितो रक्षस्त्वया चात्मप्रशंसिना ।
कालेनैव विपन्नोऽहं हेतुभूतस्तु मे भवान् ॥ २७ ॥
' राक्षस! तू अपने मुँह से अपनी प्रशंसा कर रहा है; किंतु तूने जो आज मुझे पराजित किया है, इसमें काल ही कारण है । वास्तव में कालने ही मुझे मारा है । तू तो मेरी मृत्युमें निमित्तमात्र बन गया है ॥ २७ ॥
विंशः सर्गः १५०३
किं त्विदानीं मया शक्यं कर्तुं प्राणपरिक्षये ।
नाहं विमुखी रक्षो युद्धयमानस्त्वया हतः ॥ २८ ॥
' मेरे प्राण जा रहे हैं, अतः इस समय मैं क्या कर सकता हूँ? निशाचर! मुझे संतोष है कि मैंने युद्धसे मुँह नहीं मोड़ा । युद्ध करता हुआ ही मैं तेरे हाथसे मारा गया हूँ ॥ २८ ॥
इक्ष्वाकुपरिभावित्वाद् वचो वक्ष्यामि राक्षस ।
यदि दत्तं यदि हुतं यदि मे सुकृतं तपः ।
यदि गुप्ताः प्रजाः सम्यक् तदा सत्यं वचोऽस्तु मे ॥२ ९ ॥
' परंतु राक्षस! तूने अपने व्यङ्ग्यपूर्ण वचनसे इक्ष्वाकु-कुलका अपमान किया है, इसलिये मैं तुझे शाप दूँगा-तेरे लिये अमङ्गलजनक बात कहूँगा । यदि मैंने दान, पुण्य, होम और तप किये हों, यदि मेरे द्वारा धर्मके अनुसार प्रजा-जनोंका ठीक - ठीक पालन हुआ हो तो मरा बात सत्य होकर रहे ॥ २ ९ ॥
उत्पत्स्यते कुले ह्यस्मिन्निक्ष्वाकूणां महात्मनाम् ।
रामो दाशरथिर्नाम स ते प्राणान् हरिष्यति ॥ ३० ॥
' महात्मा इक्ष्वाकुवंशी नरेशोंके इस वंशमें ही दशरथ-नन्दन श्रीराम प्रकट होंगे, जो तेरे प्राणोंका अपहरण करेंगे ||
ततो जलधरोदग्रस्ताडितो देवदुन्दुभिः ।
तस्मिन्नुदाहृते शापे पुष्पवृष्टिश्व खाच्च्युता ॥ ३१ ॥
राजाके इस प्रकार शाप देते ही मेघके समान गम्भीर स्वरमें देवताओंकी दुन्दुभि बज उठी और आकाशसे फूलोंकी वर्षा होने लगी ॥ ३१ ॥
ततः स राजा राजेन्द्र गतः स्थानं त्रिविष्टपम् ।
स्वर्गते च नृपे तस्मिन् राक्षसः सोऽपसर्पत ॥ ३२ ॥
राजाधिराज श्रीराम! तदनन्तर राजा अनरण्य स्वर्गलोक-को सिधारे । उनके स्वर्गगामी हो जानेपर राक्षस रावण वहाँसे अन्यत्र चला गया ॥ ३२ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये उत्तरकाण्डे एकोनविंशः सर्गः ॥ १ ९ ॥ इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें उन्नीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ १ ९ ॥ ॥ विंशः सर्गः जा नारदजीका रावणको समझाना, उनके कहनेसे रावणका युद्धके लिये यमलोकको ॥ जाना तथा नारदजीका इस युद्ध के विषय में विचार करना 11 ल हुए १ ॥ ॥ कपर
ततो वित्रासयन् मर्त्यान् पृथिव्यां राक्षसाधिपः ।
आससाद घने तस्मिन् नारदं मुनिपुङ्गवम् ॥ १ ॥
( अगस्त्यजी कहते हैं - रघुनन्दन! ) इसके बाद राक्षसराज रावण मनुष्योंको भयभीत करता हुआ पृथ्वीपर विचरने लगा । एक दिन पुष्पक विमान से यात्रा करते समय उसे बादलोंके बीच में मुनिश्रेष्ठ देवर्षि नारदजी मिले ॥ १ ॥
तस्याभिवादनं कृत्वा दशग्रीवो निशाचरः ।
अब्रवीत् कुशलं पृष्ट्वा हेतुमागमनस्य च ॥ २ ॥
निशाचर दशग्रीवने उनका अभिवादन करके कुशल-समाचार की जिज्ञासा की और उनके आगमनका कारण पूछा- |
नारदस्तु महातेजा देवर्षिरमितप्रभः ।
अब्रवीन्मेघपृष्ठस्थो रावणं पुष्पके स्थितम् ॥ ३ ॥
तब बादलोंकी पीठ पर खड़े हुए अमित कान्तिमान्
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श्रीमवाल्मीकीय रामायणे १५०४ महातेजस्वी देवर्षि नारदने पुष्पक विमानपर बैठे हुए रावणसे कहा- ॥ ३ ॥
राक्षसाधिपते सौम्य तिष्ठ विश्रवसः सुत ।
प्रीतोऽस्म्यभिजनोपेत विक्रमैरूर्जितैस्तव ॥ ४ ॥
' उत्तम कुलमें उत्पन्न विश्रवणकुमार राक्षसराज रावण! सौम्य! ठहरो, मैं तुम्हारे बढ़े हुए बल - विक्रमसे बहुत प्रसन्न हूँ ।
विष्णुना दैत्यघातैश्च गन्धर्वोरगधर्षणैः ।
त्वया समं विमर्देश्च भृशं हि परितोषितः ॥ ५ ॥
' दैत्योंका विनाश करनेवाले अनेक संग्राम करके भगवान् विष्णुने तथा गन्धवों और नागको पददलित करनेवाले युद्धौ-द्वारा तुमने मुझे समानरूपसे संतुष्ट किया है ॥ ५ ॥
किंचिद् वक्ष्यामि तावत् तु श्रोतव्यं श्रोष्यसे यदि ।
तन्मे निगदतस्तात समाधिं श्रवणे कुरु ॥ ६ ॥
‘ इस समय यदि तुम सुनोगे तो मैं तुमसे कुछ सुनने योग्य बात कहूँगा । तात! मेरे मुँहसे निकली हुई उस बातको सुनने के लिये तुम अपने चित्तको एकाग्र करो ॥ ६ ॥
किमयं वध्यते तात त्वयाध्येन दैवतैः ।
हत एवायं लोको यदा मृत्युवशं गतः ॥ ७ ॥
' तात! तुम देवताओंके लिये भी अवध्य होकर इस भूलोकके निवासियोंका वध क्यों कर रहे हो? यहाँके प्राणी तो मृत्युके अधीन होनेके कारण स्वयं ही मरे हुए हैं; फिर तुम भी इन मरे हुओं को क्यों मार रहे हो? ॥ ७ ॥
देवदानवदैत्यानां यक्षगन्धर्वरक्षसाम् ।
अवध्येन या लोकः क्लेष्टुं योग्यो न मानुषः ॥ ८ ॥
' देवता, दानव, दैत्य, यक्ष, गन्धर्व और राक्षस भी जिसे नहीं मार सकते, ऐसे विख्यात वीर होकर भी तुम इस मनुष्यलोकको क्लेश पहुँचाओ, यह कदापि तुम्हारे योग्य नहीं है ॥ ८ ॥
नित्यं श्रेयसि सम्मूढं महद्भिर्व्यसनैर्वृतम् ।
हन्यात् कस्तादृशं लोकं जराव्याधिशतैर्युतम् ॥ ९ ॥
पश्य तावन्महाबाहो राक्षसेश्वर मानुषम् ।
मूढमेवं विचित्रार्थे यस्य न ज्ञायते गतिः ॥ १२ ॥
' महाबाहु राक्षसराज! देखो तो सही, यह मनुष्यलोक ज्ञानशून्य होने के कारण मूढ़ होनेपर भी किस तरह नाना प्रकारके क्षुद्र पुरुषार्थों में आसक्त है? इसे इस बातका भी पता नहीं है कि कब दुःख और सुख आदि भोगनेका अवसर आयेगा? ॥ १२ ॥
कचिद् वादित्रनृत्यादि सेव्यते मुदितैर्जनैः ।
रुद्यते चापरैरातर्धारा श्रुनयनाननैः ॥ १३ ॥
यहाँ कहीं कुछ मनुष्य तो आनन्दमग्न होकर गाजे - बाजे और नाच आदिका सेवन करते हैं — उनके द्वारा मन बहलाते । हैं तथा कहीं कितने ही लोग दुःखसे पीड़ित हो नेत्रोंसे आँसू बहाते हुए रोते रहते हैं ॥ १३ ॥
मातापितृसुतस्नेहभार्याबन्धुमनोरमैः 1 मोहितोऽयं जनो ध्वस्तः क्लेशं स्वं नावबुध्यते ॥ १४ ॥
' माता, पिता तथा पुत्र के स्नेहसे और पत्नी तथा भाई-के सम्बन्धमें नाना प्रकारके मनसूबे बाँधने के कारण यह मनुष्यलोक मोहग्रस्त हो परमार्थसे भ्रष्ट हो रहा है । इसे अपने बन्धनजनित क्लेशका अनुभव ही नहीं होता है ॥ १४ ॥
तत्किमेवं परिक्लिश्य लोकं मोहनिराकृतम् ।
जित एव त्वया सौम्य मर्त्यलोको न संशयः ॥ १५ ॥
" इस प्रकार जो मोह ( अज्ञान ) के कारण परम पुरुषार्थ. से वञ्चित हो गया है, ऐसे मनुष्य - लोकको क्लेश पहुँचाकर तुम्हें क्या मिलेगा? सौम्य! तुमने मनुष्य - लोकको तो जीत ही लिया है, इसमें कोई भी संशय नहीं है । १५ ।
अवश्यमेभिः सर्वैश्च गन्तव्यं यमसादनम् ।
तन्निगृह्णीष्व पौलस्त्य यमं परपुरंजय ॥ १६ ॥
तस्मिञ्जिते जितं सर्वे भवत्येव न संशयः । ' शत्रुनगरीपर विजय पानेवाले पुलस्त्यनन्दन! इन सब मनुष्यों को यमलोक में अवश्य जाना पड़ता है । अतः यदि ' जो सदा अपने कल्याण साधनमें मूढ़ हैं, बड़ी - बड़ी शक्ति हो तो तुम यमराजको अपने काबू करो । उन्हें जीत लेने-विपत्तियोंसे घिरे हुए हैं और बुढ़ापा तथा सैकड़ों रोगोंसे युक्त पर तुम सबको जीत सकते हो; इसमें संशय नहीं है ' ॥१६३ ॥
हैं, ऐसे लोगों को कोई भी वीर पुरुष कैसे मार सकता है? ॥ लङ्केशो दीप्यमानं स्वतेजसा ॥ १७ ॥
तैस्तैरनिष्टोपगमैरजस्रं यत्र कुत्र कः । एवमुक्तस्तु अब्रवीन्नारदं तत्र सम्प्रहस्याभिवाद्य च । मतिमान् मानुषे लोके युद्धेन प्रणयी भवेत् ॥ १० ॥ नारद जीके ऐसा कहने पर लङ्कापति रावण अपने तेजसे
" जो नाना प्रकार के अनिष्ठोंकी प्राप्तिसे जहाँ कहीं भी होनेवाले उन देवर्षिको प्रणाम करके हँसता हुआ पीड़ित है, उस मनुष्यलोकमें आकर कौन बुद्धिमान् वीर पुरुष उद्दीप्त बोला -- ॥ १७३ ॥
युद्धके द्वारा मनुष्यों के वधमें अनुरक्त होगा? ॥ १० ॥ महर्षे देवगन्धर्ववहार समरप्रिय ॥ १८ ॥
क्षीयमाणं देवहतं क्षुत्पिपासाजरादिभिः । अहं समुद्यतो गन्तुं विजयार्थ रसातलम् । विषादशोकसम्मूढं लोकं त्वं क्षपयस्व मा ॥ ११ ॥ ' महर्षे! आप देवताओं और गन्धवाके लोकमें बिहार
" यह लोक तो यों ही भूख, प्यास और जरा आदिसे करनेवाले हैं । युद्धके दृश्य देखना आपको बहुत ही क्षीण हो रहा है तथा विषाद और शोक में डूबकर अपनी है । मैं इस समय दिग्विजय के लिये रसातलमें जानेको विवेक - शक्ति खो बैठा है । दैवके मारे हुए इस मर्त्यलोकका विनाश न करो ॥ ११ ॥ उच्चत हूँ ॥ १८३ ॥
तुम
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उत्तरकाण्डे न 1 ततो लोकत्रयं जित्वा स्थाप्य नागान् सुरान् वशे ॥ १ ९ ॥ समुद्रममृतार्थे च मथिष्यामि रसालयम् । ' फिर तीनों लोकोंको जीतकर नागों और देवताओंको अपने वशमें करके अमृतकी प्राप्तिके लिये रसनिधि समुद्रका मन्थन करूँगा ' ॥ १ ९ ३ ॥ अथाब्रवीद् दशग्रीवं नारदो भगवानृषिः ॥ २० ॥
क खल्विदानीं मार्गेण त्वयेहान्येन गम्यते ।
अयं खलु सुदुर्गम्यः प्रेतराजपुरं प्रति ॥ २१ ॥
मार्गो गच्छति दुर्धर्ष यमस्यामित्रकर्शन । यह सुनकर देवर्षि भगवान् नारदने कहा - ' शत्रुसूदन! यदि तुम रसातलको जाना चाहते हो तो इस समय उसका मार्ग छोड़कर दूसरे रास्तेसे कहाँ जा रहे हो? दुर्धर्षे वीर! रसातलका यह मार्ग अत्यन्त दुर्गम है और यमराजकी पुरीसे होकर ही जाता है ' ॥ २०-२१३ ॥ स तु शारदमेघाभं हासं मुक्त्वा दशाननः ॥ २२ ॥
उवाच कृतमित्येव वचनं चेदमब्रवीत् । नारदजीके ऐसा कहनेपर दशमुख रावण शरद् ऋतुके बादलकी भाँति अपना उज्ज्वल हास बिखेरता हुआ बोला-" देवर्षे! मैंने आपकी बात स्वीकार कर ली । इसके बाद उसने यों कहा- ॥ २२३ ॥
तस्मादेव महं ब्रह्मन् वैवस्वतवधोद्यतः ॥ २३ ॥
गच्छामि दक्षिणामाशां यत्र सूर्यात्मजो नृपः । ‘ ब्रह्मन्! अब यमराजका वध करनेके लिये उद्यत होकर मैं उस दक्षिण दिशाको जाता हूँ, जहाँ सूर्यपुत्र राजा यम निवास करते हैं ॥ २३३ ॥
' मया हि भगवन् क्रोधात् प्रतिज्ञातं रणार्थिना ॥ २४ ॥
अवजेष्यामि चतुरो लोकपालानिति प्रभो । ' प्रभो! भगवन्! मैंने युद्ध की इच्छासे क्रोधपूर्वक प्रतिज्ञा की है कि चारों लोकपालोंको परास्त करूँगा ॥ २४३ ॥
तदिह प्रस्थितोऽहं वै पितृराजपुरं प्रति ॥ २५ ॥
प्राणिसंक्लेशकर्तारं योजयिष्यामि मृत्युना । ‘ अतः मैं यहाँसे यमपुरीको प्रस्थान कर रहा हूँ । संसारके प्राणियोंको मौतका कष्ट देनेवाले सूर्यपुत्र यमको स्वयं ही मृत्यु-से संयुक्त कर दूँगा ' ॥ २५३ ॥
एवमुक्त्वा दशग्रीवो मुनिं तमभिवाद्य च ॥ २६ ॥
प्रययौ दक्षिणामाशां प्रविष्टः सह मन्त्रिभिः । एकविंशः सर्गः १५०५ ऐसा कहकर दशग्रीवने मुनिको प्रणाम किया और मन्त्रियोंके साथ वह दक्षिण दिशा की ओर चल दिया ॥ २६३ ॥
नारदस्तु महातेजा मुहूर्त ध्यानमास्थितः ॥ २७ ॥
चिन्तयामास विप्रेन्द्रो विधूम इव पावकः । उसके चले जानेपर धूमरहित अग्निके समान महातेजस्वी विप्रवर नारदजी दो घड़ीतक ध्यानमग्न हो इस प्रकार विचार करने लगे – ॥ २७३ ॥
येन लोकास्त्रयः सेन्द्राः क्लिश्यन्ते सचराचराः ॥ २८ ॥
क्षीणे चायुषि धर्मेण स कालो जेष्यते कथम् । ' आयु क्षीण होनेपर जिनके द्वारा धर्मपूर्वक इन्द्रसहित तीनों लोकोंके चराचर प्राणी क्लेशमें डाले जाते- दण्डित होते हैं, वे कालस्वरूप यमराज इस रावणके द्वारा कैसे जीते जायँगे १ ॥ २८३ ॥
स्वदत्तकृतसाक्षी यो द्वितीय इव पावकः ॥ २ ९ ॥
लब्धसंज्ञा विचेष्टन्ते लोका यस्य महात्मनः ।
यस्य नित्यं त्रयो लोका विद्रवन्ति भयार्दिताः ॥ ३० ॥
तं कथं राक्षसेन्द्रोऽसौ स्वयमेव गमिष्यति । ' जो जीवोंके दान और कर्मके साक्षी हैं, जिनका तेज द्वितीय अग्नि के समान है, जिन महात्मासे चेतना पाकर सम्पूर्ण जीव नाना प्रकारकी चेष्टाएँ करते हैं, जिनके भयसे पीड़ित हो तीनों लोकोंके प्राणी उनसे दूर भागते हैं, उन्हींके पास यह राक्षसराज स्वयं ही कैसे जायगा? ॥ २ ९ -३०३ ॥ यो विधाता च धाता च सुकृतं दुष्कृतं तथा ॥ ३१ ॥
त्रैलोक्यं विजितं येन तं कथं विजयिष्यते ।
अपरं किं तु कृत्वैवं विधानं संविधास्यति ॥ ३२ ॥
' जो त्रिलोकीको धारण - पोषण करनेवाले तथा पुण्य और पापके फल देनेवाले हैं और जिन्होंने तीनों लोकोंपर विजय पायी है, उन्हीं कालदेवको यह राक्षस कैसे जीतेगा? काल ही सबका साधन है । यह राक्षस कालके अतिरिक्त दूसरे किस साधनका सम्पादन करके उस कालपर विजय प्राप्त करेगा १ ॥ ३१-३२ ॥
कौतूहलं समुत्पन्नो यास्यामि यमसादनम् ।
विमर्दे द्रष्टुमनयोर्यमराक्षसयोः स्वयम् ॥ ३३ ॥
' अब तो मेरे मनमें बड़ा कौतूहल उत्पन्न हो गया है, अतः इन यमराज और राक्षसराजका युद्ध देखनेके लिये मैं स्वयं भी यमलोकको जाऊँगा ' ॥ ३३ ॥
से इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये उत्तरकाण्डे विंशः सर्गः ॥ २० ॥
आ इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें बीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ २० ॥
11 एकविंशः सर्गः रावणका यमलोकपर आक्रमण और उसके द्वारा यमराजके सैनिकोंका संहार य र एवं संचिन्त्य विप्रेन्द्रो जगाम लघुविक्रमः । ( अगस्त्यजी कहते हैं — रघुनन्दन! ) ऐसा विचारकर को शीघ्र चलनेवाले विप्रवर नारदजी रावणके आक्रमणका आख्यातुं तद् यथावृत्तं यमस्य सदनं प्रति ॥ १ ॥ समाचार बतानेके लिये यमलोकमें गये ॥ १ ॥
मा ० रा ० ५.११.९