Ramayana 2 — पृष्ठ 81–90

वाल्मीकि रामायण — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 81–90

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९ ०६ श्रीमद्वाल्मीकीय रामायणे

पीतं कनकपट्टाभं स्तं तद्वसनं शुभम् ।

उत्तरीयं नगासकं तदा दृष्टं प्लवङ्गमैः ॥ ४५ ॥

भूषणानि च मुख्यानि दृष्टानि धरणीतले ।

अनयैवापविद्धानि स्वनवन्ति महान्ति च ॥ ४६ ॥

' उस समय वानरोंने पर्वतपर गिराये हुए सुवर्णपत्र के समान जो सुन्दर पीला वस्त्र और पृथ्वीपर पड़े हुए उत्तमोत्तम बहुमूल्य एवं बजनेवाले आभूषण देखे थे, वे इन्हींके गिराये हुए थे ॥ ४५-४६ ॥

इदं चिरगृहीतत्वाद् वसनं क्लिष्टवत्तरम् ।

तथाप्यनूनं तद्वर्ण तथा श्रीमद्यथेतरत् ॥ ४७ ॥

" यह वस्त्र बहुत दिनोंसे पहने जानेके कारण यद्यपि बहुत पुराना हो गया है, तथापि इसका पीला रंग अभीतक उतरा नहीं है । यह भी वैसा ही कान्तिमान् है, जैसा वह दूसरा वस्त्र था ॥ ४७ ॥

इयं कनकवर्णाङ्गी रामस्य महिषी प्रिया ।

प्रणष्टापि सती यस्य मनसो न प्रणश्यति ॥ ४८ ॥

" ये सुवर्ण के समान गौर अङ्गवाली श्रीरामचन्द्रजीकी प्यारी महारानी हैं, जो अदृश्य हो जानेपर भी उनके मनसे विलग नहीं हुई हैं ॥ ४८ ॥

इयं सा यत्कृते रामश्चतुर्भिरिह तप्यते ।

कारुण्येनानृशंस्येन शोकेन मदनेन च ॥ ४ ९ ॥

" ये वे ही सीता हैं, जिनके लिये श्रीरामचन्द्रजी इस जगत् में करुणा, दया, शोक और प्रेम - इन चार कारणोंसे संतप्त होते रहते हैं ॥ ४ ९ ॥

स्त्री प्रणष्टेति कारुण्यादाश्रिते त्यानृशंस्यतः ।

पत्नी नष्टेति शोकेन प्रियेति मदनेन च ॥ ५० ॥

" एक स्त्री खो गयी, यह सोचकर उनके हृदयमें करुणा भर आती है । वह हमारे आश्रित थी, यह सोचकर वे दयासे द्रवित हो उठते हैं । मेरी पत्नी ही मुझसे बिछुड़ गयी, इसका विचार करके वे शोकसे व्याकुल हो उठते हैं तथा मेरी प्रियतमा मेरे पास नहीं रही, ऐसी भावना करके उनके हृदय में प्रेमकी वेदना होने लगती है ॥ ५० ॥

अस्या देव्या यथारूपमङ्गप्रत्यङ्गसौष्ठवम् ।

रामस्य च यथारूपं तस्येयमसितेक्षणा ॥ ५१ ॥

जैसा अलौकिक रूप श्रीरामचन्द्रजीका है तथा जैसा मनोहर रूप एवं अङ्ग - प्रत्यङ्गकी सुघड़ता इन देवी सीतामें है; इसे देखते हुए कजरारे नेत्रोंवाली सीता उन्हींके योग्य पत्नी हैं ॥ ५१ ॥

अस्या देव्या मनस्तस्मिंस्तस्य चास्यां प्रतिष्ठितम् ।

तेनेयं स च धर्मात्मा मुहूर्तमपि जीवति ॥ ५२ ॥

' इन देवीका मन श्रीरघुनाथजी में और श्रीरघुनाथजीका मन इनमें लगा हुआ है, इसीलिये ये तथा धर्मात्मा श्रीराम जीवित हैं । इनके मुहूर्तमात्र जीवन में भी यही कारण है ॥ ५२ ॥

दुष्करं कृतवान् रामो हीनो यदनया प्रभुः ।

धारयत्यात्मनो देहं न शोकेनावसीदति ॥ ५३ ॥

' इनके बिछुड़ जानेपर भी भगवान् श्रीराम जो अपने शरीरको धारण करते हैं, शोकसे शिथिल नहीं हो जाते हैं, यह उन्होंने अत्यन्त दुष्कर कार्य किया है ' ॥ ५३ ॥

एवं सीतां तथा दृष्ट्वा हृष्टः पवनसम्भवः ।

जगाम मनसा रामं प्रशशंस च तं प्रभुम् ॥ ५४ ॥

इस प्रकार उस अवस्था में सीताका दर्शन पाकर पवनपुत्र हनुमानजी बहुत प्रसन्न हुए । वे मन - ही - मन भगवान् श्रीराम के पास जा पहुँचे - उनका चिन्तन करने लगे तथा सीता जैसी साध्वी को पत्नीरूपमें पानेसे उनके सौभाग्यकी भूरि-भूरि प्रशंसा करने लगे ॥ ५४ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये सुन्दरकाण्डे पञ्चदशः सर्गः ॥ १५ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्धरामायण आदिकाव्यके सुन्दरकाण्ड में पंद्रहवाँ सर्गं पूरा हुआ ॥ १५ ॥

षोडशः हनुमानजी का मन - ही - मन सीताजीके शील कष्ट पड़ी देख स्वयं भी

प्रशस्य तु प्रशस्तव्यां सीतां तां हरिपुङ्गवः ।

गुणाभिरामं रामं च पुनश्चिन्तापरोऽभवत् ॥ १ ॥

परम प्रशंसनीया सीता और गुणाभिराम श्रीरामकी प्रशंसा करके वानरश्रेष्ठ हनुमानजी फिर विचार करने लगे ॥ १ ॥

सर्गः और सौन्दर्यकी सराहना करते हुए उन्हें उनके लिये शोक करना

स मुहूर्तमिव ध्यात्वा बाष्पपर्याकुलेक्षणः ।

सीतामाश्रित्य तेजस्वी हनूमान् विललाप ह ॥ २ ॥

• लगभग दो घड़ीतक कुछ सोच - विचार करनेपर उनके नेत्रोंमें आँसू भर आये और वे तेजस्वी हनुमान् सीताके विषयमें इस प्रकार विलाप करने लगे ॥ २ ॥

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सुन्दरकाण्डे षोडशः सर्गः ९ ०७

मान्या गुरुविनीतस्य लक्ष्मणस्य गुरुप्रिया ।

यदि सीता हि दुःखार्ता कालो हि दुरतिक्रमः ॥ ३ ॥

' अहो! जिन्होंने गुरुजनोंसे शिक्षा पायी है, उन लक्ष्मण-के बड़े भाई श्रीरामकी प्रियतमा पत्नी सीता भी यदि इस प्रकार दुःखसे आतुर हो रही हैं तो यह कहना पड़ता है कि कालका उल्लङ्घन करना सभी के लिये अत्यन्त कठिन है ।

रामस्य व्यवसायक्षा लक्ष्मणस्य च धीमतः ।

नात्यर्थे क्षुभ्यते देवी गङ्गेव जलदागमे ॥ ४ ॥

' जैसे वर्षा ऋतु आनेपर भी देवी गङ्गा अधिक क्षुब्ध नहीं होती हैं, उसी प्रकार श्रीराम तथा बुद्धिमान् लक्ष्मण के अमोघ पराक्रमका निश्चित ज्ञान रखनेवाली देवी सीता भी शोकसे अधिक विचलित नहीं हो रही हैं ॥ ४ ॥

तुल्यशीलवयोवृत्तां तुल्याभिजनलक्षणाम् ।

राघवोऽर्हति वैदेहीं तं येयमसितेक्षणा ॥ ५ ॥

' सीता के शील, स्वभाव, अवस्था और बर्ताव श्रीराम के ही समान हैं । उनका कुल भी उन्हींके तुल्य महान् है, अतः श्रीरघुनाथजी विदेहकुमारी सीता के सर्वथा योग्य हैं तथा ये कजरारे नेत्रोंवाली सीता भी उन्हींके योग्य हैं ॥ ५ ॥

तां दृष्ट्वा नवमाभां लोककान्तामिव श्रियम् ।

जगाम मनसा रामं वचनं चेदमब्रवीत् ॥ ६ ॥

नूतन सुवर्णके समान दीप्तिमती और लोककमनीया लक्ष्मीजी के समान शोभामयी श्रीसीताको देखकर हनुमानजीने श्रीरामचन्द्रजीका स्मरण किया और मन - ही - मन इस प्रकार कहा ॥ ६ ॥

अस्या हे तो विशालाक्ष्या हतो वाली महाबलः ।

रावणप्रतिमो वीर्ये कबन्धश्च निपातितः ॥ ७ ॥

' इन्हीं विशाललोचना सीता के लिये भगवान् श्रीरामने महाबली वालीका वध किया और रावणके समान पराक्रमी कन्धको भी मार गिराया ॥ ७ ॥

विराधश्च हतः संख्ये राक्षसो भीमविक्रमः ।

वने रामेण विक्रम्य महेन्द्रेणेव शम्बरः ॥ ८ ॥

' इन्हीं के लिये श्रीरामने वनमें पराक्रम करके भयानक पराक्रमी राक्षस विराधको भी उसी प्रकार युद्ध में मार डाला, जैसे देवराज इन्द्रने शम्बरासुर का वध किया था ॥ ८ ॥

चतुर्दश सहस्राणि रक्षसां भीमकर्मणाम् ।

निहतानि जनस्थाने शरैरग्निशिखोपमैः ॥ ९ ॥

खरश्च निहतः संख्ये त्रिशिराश्च निपातितः ।

दूषणश्च महातेजा रामेण विदितात्मना ॥ १० ॥

' इन्हीं के कारण आत्मज्ञानी श्रीरामचन्द्रजीने जनस्थान में अपने अग्निशिखाके सदृश तेजस्वी बाणोंद्वारा भयानक कर्म करनेवाले चौदह हजार राक्षसोंको कालके गालमें भेज दिया और युद्ध में खर, त्रिशिरा तथा महातेजस्वी दूषण को भी मार गिराया ॥ ९ -१० ॥

ऐश्वर्य वानराणां च दुर्लभं वालिपालितम् ।

अस्या निमित्ते सुग्रीवः प्राप्तवाँलोकविश्रुतः ॥ ११ ॥

' वानरों का वह दुर्लभ ऐश्वर्य, जो वालीके द्वारा सुरक्षित था, इन्हींके कारण विश्वविख्यात सुग्रीवको प्राप्त हुआ है ॥ ११ ॥

सागरश्च मया ss क्रान्तः श्रीमान् नदनदीपतिः ।

अस्या हेतोर्विशालाक्ष्याः पुरी चेयं निरीक्षिता ॥ १२ ॥

' इन्हीं विशाललोचना सीता के लिये मैंने नदों और नदियोंके स्वामी श्रीमान् समुद्रका उल्लङ्घन किया और इस लङ्कापुरीको छान डाला है ॥ १२ ॥

यदि रामः समुद्रान्तां मेदिनीं परिवर्तयेत् ।

अस्याः कृते जगच्चापि युक्तमित्येव मे मतिः ॥ १३ ॥

" इन के लिये तो यदि भगवान् श्रीरामं समुद्रपर्यन्त पृथ्वी तथा सारे संसार को भी उलट देते तो भी वह मेरे विचार से उचित ही होता ॥ १३ ॥

राज्यं वा त्रिषु लोकेषु सीता वा जनकात्मजा । त्रैलोक्यराज्यं सकलं सीताया नाप्नुयात् कलाम् । १४ । ' एक ओर तीनों लोकोंका राज्य और दूसरी ओर जनक-कुमारी सीताको रखकर तुलना की जाय तो त्रिलोकीका सारा राज्य सीताकी एक कलाके बराबर भी नहीं हो सकता ॥ १४ ॥

इयं सा धर्मशीलस्य जनकस्य महात्मनः ।

सुता मैथिलराजस्य सीता भर्तृदृढव्रता ॥ १५ ॥

' ये धर्मशील मिथिलानरेश महात्मा राजा जनककी पुत्री सीता पतिव्रत धर्म में बहुत दृढ़ हैं ॥ १५ ॥

उत्थिता मेदिनीं भित्त्वा क्षेत्रे हलमुखक्षते ।

पद्मरेणुनिभैः कीर्णा शुभैः केदारपांसुभिः ॥ १६ ॥

' जब हलके मुख ( फाल ) से खेत जोता जा रहा था, उस समय ये पृथ्वीको फाड़कर कमलके परागकी भाँति क्यारीकी सुन्दर धूलोंसे लिपटी हुईं प्रकट हुई थीं ॥ १६ ॥

विक्रान्तस्यार्यशीलस्य संयुगेष्वनिवर्तिनः ।

स्नुषा दशरथस्यैषा ज्येष्ठा राशो यशखिनी ॥ १७ ॥

' जो परम पराक्रमी, श्रेष्ठ शील - स्वभाववाले और युद्ध से कभी पीछे न हटनेवाले थे, उन्हीं महाराज दशरथके ये यशस्विनी ज्येष्ठ पुत्रवधू हैं ॥ १७ ॥

धर्मज्ञस्य कृतज्ञस्य रामस्य विदितात्मनः ।

इयं सा दयिता भार्या राक्षसीवशमागता ॥ १८ ॥

' धर्मज्ञ, कृतज्ञ एवं आत्मज्ञानी भगवान् श्रीरामकी ये प्यारी पत्नी सीता इस समय राक्षसियोंके वशमें पड़ गयी हैं ॥ १८ ॥

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९ ०८ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे

सर्वान् भोगान् परित्यज्य भर्तृस्नेहबलात् कृता ।

अचिन्तयित्वा कष्टानि प्रविष्टा निर्जनं वनम् ॥ १ ९ ॥

" ये केवल पतिप्रेमके कारण सारे भोगोंको लात मारकर विपत्तियों का कुछ भी विचार न करके श्रीरघुनाथजी के साथ निर्जन वनमें चली आयी थीं ॥ १ ९ ॥

संतुष्टा फलमूलेन भर्तृशुश्रूषणापरा ।

या परां भजते प्रीतिं वनेऽपि भवने यथा ॥ २० ॥

' यहाँ आकर फल - मूलसे ही संतुष्ट रहती हुईं पतिदेवकी सेवामें लगी रहीं और वनमें भी उसी प्रकार परम प्रसन्न रहती थीं, जैसे राजमहलोंमें रहा करती थीं ॥ २० ॥

सेयं कनकवर्णाङ्गी नित्यं सुस्मितभाषिणी ।

सहते यातनामेतामनर्थानामभागिनी ॥ २१ ॥

' वे ही ये सुवर्णके समान सुन्दर अङ्गवाली और सदा मुस्कराकर बात करनेवाली सुन्दरी सीता, जो अनर्थ भोगने के योग्य नहीं थीं, इस यातनाको सहन करती हैं ॥ २१ ॥

इमां तु शीलसम्पन्नां द्रष्टुमिच्छति राघवः ।

रावणेन प्रमथितां प्रपामिव पिपासितः ॥ २२ ॥

यद्यपि रावणने इन्हें बहुत कष्ट दिये हैं तो भी ये अपने शील, सदाचार एवं सतीत्वसे सम्पन्न हैं । ( उसके वशीभूत नहीं हो सकी हैं । ) अतएव जैसे प्यासा मनुष्य पौंसलेपर जाना चाहता है, उसी प्रकार श्रीरघुनाथजी इन्हें देखना चाहते हैं ॥ २२ ॥

अस्या नूनं पुनर्लाभाद् राघवः प्रीतिमेष्यति ।

राजा राज्यपरिभ्रष्टः पुनः प्राप्येव मेदिनीम् ॥ २३ ॥

" जैसे राज्यसे भ्रष्ट हुआ राजा पुनः पृथ्वीका राज्य पाकर बहुत प्रसन्न होता है, उसी प्रकार उनकी पुनः प्राप्ति होनेसे श्रीरघुनाथजीको निश्चय ही बड़ी प्रसन्नता होगी ॥ २३ ॥

कामभोगैः परित्यक्ता होना बन्धुजनेन च ।

धारयत्यात्मनो देहं तत्समागमकाङ्क्षिणी ॥ २४ ॥

' ये अपने बन्धुजनों से बिछुड़कर विषयभोगोंको तिलाञ्जलि दे केवल भगवान् श्रीरामचन्द्रजी के समागमकी आशासे ही अपना शरीर धारण किये हुए हैं ॥ २४ ॥

नैषा पश्यति राक्षस्यो नेमान् पुष्पफलद्रुमान् ।

एकस्थहृदया नूनं राममेवानुपश्यति ॥ २५ ॥

" ये न तो राक्षसियों की ओर देखती हैं और न इन फल - फूल-वाले वृक्षोंपर ही दृष्टि डालती हैं, सर्वथा एकाग्रचित्त हो मनकी आँखोंसे केवल श्रीरामका ही निरन्तर दर्शन ( ध्यान ) करती है - इसमें संदेह नहीं है ॥ २५ ॥

भर्ता नाम परं नार्याः शोभनं भूषणादपि ।

एषा हि रहिता तेन शोभनार्हा न शोभते ॥ २६ ॥

' निश्चय ही पति नारी के लिये आभूषणकी अपेक्षा भी अधिक शोभाका हेतु है । ये सीता उन्हीं पतिदेव से बिछुड़ गयी हैं, इसलिये शोभा के योग्य होनेपर भी शोभा नहीं पा रही हैं ॥ २६ ॥

दुष्करं कुरुते रामो हीनो यदनया प्रभुः ।

धारयत्यात्मनो देहं न दुःखेनावसीदति ॥ २७ ॥

' भगवान् श्रीराम इनसे बिछुड़ जानेपर भी जो अपने शरीरको धारण कर रहे हैं, दुःखसे अत्यन्त शिथिल नहीं हो जाते हैं, यह उनका अत्यन्त दुष्कर कर्म है ॥। २७ ॥

इमामसितकेशान्तां शतपत्रनिभेक्षणाम् ।

सुखा दुःखितां ज्ञात्वा ममापि व्यथितं मनः ॥ २८ ॥

' काले केश और कमल - जैसे नेत्रवाली ये सीता वास्तवमें सुख भोगने के योग्य हैं । इन्हें दुखी जानकर मेरा मन भी व्यथित हो उठता है ॥ २८ ॥

क्षितिक्षमा पुष्करसंनिभेक्षणा या रक्षिता राघवलक्ष्मणाभ्याम् । सा राक्षसीभिर्विकृतेक्षणाभिः संरक्ष्यते सम्प्रति वृक्षमूले ॥ २ ९ ॥ ' अहो! जो पृथ्वी के समान क्षमाशील और प्रफुल्ल कमलके समान नेत्रोंवाली हैं तथा श्रीराम और लक्ष्मण जिनकी सदा रक्षा की है, वे ही सीता आज इस वृक्षके नीचे बैठी हैं और ये विकराल नेत्रोंवाली राक्षसियों इनकी रखवाली करती हैं ॥ २ ९ ॥ हिमहतनलिनीव नष्टशोभा व्यसनपरम्परया निपीड्यमाना । सहचररहितेव anarat जनकसुता कृपणां दशां प्रपन्ना ॥ ३० ॥

" हिमकी मारी हुई कमलिनीके समान इनकी शोभा नष्ट हो गयी है, दुःख - पर - दुःख उठानेके कारण अत्यन्त पीड़ित हो रही हैं तथा अपने सहचरसे बिछुड़ी हुई चकवीके समान पति वियोगका कष्ट सहन करती हुई ये जनककिशोरी सीता बड़ी दयनीय दशाको पहुँच गयी हैं ॥ ३० ॥

अस्या हि पुष्पावनताग्रशाखाः

शोकं दृढं वै जनयन्त्यशोकाः ।

हिमव्यपायेन च शीतरश्मि-रभ्युत्थितो नैकसहस्ररश्मिः ॥ ३१ ॥

" फूलोंके भार से जिनकी डालियोंके अग्रभाग झुक गये हैं, वे अशोकवृक्ष इस समय सीतादेवीके लिये अत्यन्त शोक उत्पन्न कर रहे हैं तथा शिशिरका अन्त हो जा

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सुन्दरकाण्डे सप्तदशः सर्गः ९ ० ९ वसन्त की रातमें उदित हुए शीतल किरणोंवाले चन्द्रदेव भी संश्रित्य तस्मिन् निषसाद वृक्षे इनके लिये अनेक सहस्र किरणोंसे प्रकाशित होनेवाले सूर्य- बली हरीणामृषभस्तरखी ॥ ३२ ॥

देवकी भाँति संताप दे रहे हैं ' ॥ ३१ ॥

इस प्रकार विचार करते हुए बलवान् वानरश्रेष्ठ वेग-इत्येवमर्थ शाली हनुमानजी यह निश्चय करके कि ये ही सीता हैं उसी

सीतेयमित्येव तु जातबुद्धिः । वृक्षपर बैठे रहे ॥ ३२ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये सुन्दरकाण्डे षोडशः सर्गः ॥ १६ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्धरामायण आदिकाव्यके सुन्दरकाण्ड में सोलहवाँ सगँ पूरा हुआ ॥ १६ ॥

सप्तदशः सर्गः भयंकर राक्षसियोंसे घिरी हुई सीता के दर्शनसे हनुमानजीका प्रसन्न होना

ततः कुमुदखण्डाभो निर्मलं निर्मलोदयः ।

प्रजगाम नभश्चन्द्रो हंसो नीलमिवोदकम् ॥ १ ॥

तदनन्तर वह दिन बीतने के पश्चात् कुमुदसमूहके समान श्वेत वर्णवाले तथा निर्मलरूपसे उदित हुए चन्द्रदेव स्वच्छ आकाश में कुछ ऊपरको चढ़ आये । उस समय ऐसा जान पड़ता था, मानो कोई हंस किसी नील जलराशिमें तैर रहा हो ।

साचिव्यमिव कुर्वन् स प्रभया निर्मलप्रभः ।

चन्द्रमा रश्मिभिः शीतः सिषेवे पवनात्मजम् ॥ २ ॥

निर्मल कान्तिवाले चन्द्रमा अपनी प्रभासे सीताजीके दर्शन आदिमें पवनकुमार हनुमानजी की सहायता - सी करते हुए अपनी शीतल किरणद्वारा उनकी सेवा करने लगे ॥ २ ॥

स ददर्श ततः सीतां पूर्णचन्द्रनिभाननाम् ।

शोकभारैरिव न्यस्तां भारैर्नावमिवाम्भसि ॥ ३ ॥

उस समय उन्होंने पूर्ण चन्द्रमाके समान मनोहर मुख-वाली सीताको देखा, जो जलमें अधिक बोझके कारण दथी हुई नौकाकी भाँति शोकके भारी भारसे मानो झुक गयी थीं ॥

दिदृक्षमाणो वैदेहीं हनूमान् मारुतात्मजः ।

स ददर्शाविदूरस्था राक्षसीर्घोरदर्शनाः ॥ ४ ॥

वायुपुत्र हनुमानजीने जब विदेहकुमारी सीताको देखने के लिये अपनी दृष्टि दौड़ायी, तब उन्हें उनके पास ही बैठी हुई भयानक दृष्टिवाली बहुत - सी राक्षसियाँ दिखायी दीं ॥

एकाक्षीमेककर्णी च कर्णप्रावरणां तथा ।

अकर्णी शङ्कुकर्णी व मस्तकोच्छ्वासनासिकाम् ॥५ ॥

उनमें से किसीके एक आँख थी तो दूसरीके एक कान । किसी - किसीके कान इतने बड़े थे कि वह उन्हें चादरकी भाँति ओढ़े हुए थीं । किसीके कान ही नहीं थे और किसीके कान ऐसे दिखायी देते थे मानो खूँटे गड़े हुए हों । किसी - किसीकी साँस लेनेवाली नाक उसके मस्तकपर थी ॥ ५ ॥

अतिकायोत्तमाङ्ग व तनुदीर्घशिरोधराम् ।

स्तकेशी तथाकेश केशकम्बलधारिणीम् ॥ ६ ॥

किसीका शरीर बहुत बड़ा था और किसीका बहुत उत्तम । किसीकी गर्दन पतली और बड़ी थी । किसीके केश उड़ गये थे और किसी - किसीके माथेपर केश उगे ही नहीं थे । कोई - कोई राक्षसी अपने शरीर के केशका ही कम्बल धारण किये हुए थी ॥ ६ ॥

लम्बकर्णललाटां च लम्बोदरपयोधराम् ।

लम्बोष्ठीं चिबुकोष्टीं च लम्बास्यां लम्बजानुकाम् ॥७ ॥

किसी के कान और ललाट बड़े - बड़े थे तो किसीके पेट और स्तन लंबे थे । किसीके ओठ बड़े होनेके कारण लटक रहे थे तो किसीके ठोड़ीमें ही सटे हुए थे । किसीका मुँह बड़ा था और किसीके घुटने ॥ ७ ॥

हवां दीर्घा च कुब्जां व विकटां वामनां तथा ।

करालां भुग्नवक्त्रां च पिङ्गाक्षीं विकृताननाम् ॥ ८ ॥

कोई नाटी, कोई लंबी, कोई कुबड़ी, कोई टेढ़ी - मेढ़ी, कोई बवनी, कोई विकराल, कोई टेढ़े मुँहवाली, कोई पीली आँखवाली और कोई विकट मुँहवाली थी ॥ ८ ॥

विकृताः पिङ्गलाः कालीः क्रोधनाः कलहप्रियाः ।

कालायस महाशूलकूटमुद्गरधारिणीः ॥९ ॥

कितनी ही राक्षसियों बिगड़े शरीरवाली, काली, पीली, क्रोध करनेवाली और कलह पसंद करनेवाली थीं । उन सबने काले लोहेके बने हुए बड़े - बड़े शूल, कूट और मुद्गर धारण कर रक्खे थे ॥ ९ ॥

वराहमृगशार्दूलमहिषाजशिवामुखाः गोपा निखातशिरसोऽपराः ॥ १० ॥

कितनी ही राक्षसियोंके मुख सूअर, मृग, सिंह, भैंस, बकरी और सियारिनों के समान थे । किन्हीं के पैर हाथियों के समान, किन्हीं के ऊँटोंके समान और किन्हीं के घोड़ोंके समान थे । किन्हीं - किन्हीं के सिर कबन्धकी भाँति छाती में स्थित थे; अतः गड्ढे के समान दिखायी देते थे ( अथवा किन्हीं - किन्हीं के सिरमें गड्ढे थे ) ॥ १० ॥

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९ १० श्रीमद्वाल्मीकीय रामायणे

एक हस्तैकपादाश्च खरकर्ण्यश्वकर्णिकाः ।

गोकर्णीर्हस्तिकर्णीश्व हरि कर्णीस्तथापराः ॥ ११ ॥

किन्हीं के एक हाथ थे तो किन्हींके एक पैर 1 । किन्हींके कान गदद्दोंके समान थे तो किन्हीं के घोड़ों के समान । किन्हीं किन्हीं के कान गौओं, हाथियों और सिंद्दोंके समान दृष्टिगोचर होते थे ॥ ११ ॥

अतिनासाश्च काश्चिच्च तिर्यङनासा अनासिकाः ।

गजसंनिभनासाइच ललाटोच्छ्वासनासिकाः ॥ १२ ॥

किन्हींकी नासिकाएँ बहुत बड़ी थीं और किन्हींकी तिरछी । किन्हीं - किन्हींके नाक ही नहीं थी । कोई - कोई हाथी-की सूँड़के समान नाकवाली थीं और किन्हीं- किन्हींकी नासिकाएँ ललाट में ही थीं, जिनसे वे साँस लिया करती थीं ॥

हस्तिपादा महापादा गोपादाः पादचूलिकाः ।

अतिमात्रशिरोग्रीवा अतिमात्रकुचोदरीः ॥ १३ ॥

किन्हीं के पैर हाथियों के समान थे और किन्हींके गौओंके समान । कोई बड़े - बड़े पैर धारण करती थीं और कितनी ' ऐसी थीं जिनके पैरोंमें चोटीके समान केश उगे हुए थे । बहुत - सी राक्षसियाँ बेहद लंबे सिर और गर्दनवाली थीं और कितनों के पेट तथा स्तन बहुत बड़े - बड़े थे ॥ १३ ॥

अतिमात्रास्यनेत्राश्च दीर्घजिहाननास्तथा ।

अजामुखी र्हस्तिमुखी र्गोमुखीः सूकरीमुखीः ॥ १४ ॥

राक्षसीर्घोरदर्शनाः । किन्हींके मुँह और नेत्र सीमासे अधिक बड़े थे, किन्हीं-किन्हींके मुखोंमें बड़ी - बड़ी जिह्वाएँ थीं और कितनी ही ऐसी राक्षसियाँ थीं, जो बकरी, हाथी गाय, सूअर, घोड़े, ऊँट और गद्दों के समान मुँह धारण करती थीं । इसीलिये वे देखने में बड़ी भयंकर थीं ॥ १४३ ॥

शूलमुद्गरहस्ताश्च क्रोधनाः कलहप्रियाः ॥ १५ ॥

कराला धूम्रकेशिन्यो राक्षसीर्विकृताननाः ।

पिबन्ति सततं पानं सुरामांससदाप्रियाः ॥ १६ ॥

किन्हीं के हाथमें शूल थे तो किन्हीं के मुद्गर । कोई क्रोधी स्वभावकी थीं तो कोई कलहसे प्रेम रखती थीं । धुएँ - जैसे केश और विकृत मुखवाली कितनी ही विकराल राक्षसियों सदा मद्यपान किया करती थीं । मदिरा और मांस उन्हें सदा प्रिय थे ॥ १५-१६ ॥

मांसशोणितदिग्धाङ्गीर्मासशोणितभोजनाः ।

ता ददर्श कपिश्रेष्ठो रोमहर्षणदर्शनाः ॥ १७ ॥

कितनी ही अपने अङ्गोंमें रक्त और मांसका लेप लगाये रहती थीं । रक्त और मांस ही उनके भोजन थे । उन्हें देखते ही रोंगटे खड़े हो जाते थे । कपिश्रेष्ठ हनुमानजीने उन सबको देखा ॥ १७ ॥

स्कन्धवन्तमुपासीनाः परिवार्य वनस्पतिम् ।

तस्याधस्ताच्च तां देवीं राजपुत्रीमनिन्दिताम् ॥ १८ ॥

लक्षयामास लक्ष्मीवान् हनूमाञ्जनकात्मजाम् ।

निष्प्रभां शोकसंतप्तां मलसंकुलमूर्धजाम् ॥ १ ९ ॥

वे उत्तम शाखावाले उस अशोकवृक्षको चारों ओरसे घेरकर उससे थोड़ी दूरपर बैठी थीं और सती साध्वी राज-कुमारी सीता देवी उसी वृक्षके नीचे उसकी जड़से सटी हुई बैठी थीं । उस समय शोभाशाली हनुमानजीने जनककिशोरी जानकीजी की ओर विशेषरूपसे लक्ष्य किया । उनकी कान्ति फीकी पड़ गयी थी । वे शोकसे संतप्त थीं और उनके केशों में मैल जम गयी थी ॥ १८-१९ ॥

क्षीणपुण्यां च्युतां भूमौ तारां निपतितामिव ।

चारित्रव्यपदेशाढ्यां भर्तृदर्शन दुर्गताम् ॥ २० ॥

जैसे पुण्य क्षीण हो जानेपर कोई तारा स्वर्गसे टूटकर पृथ्वीपर गिर पड़ी हो, उसी तरह वे भी कान्तिहीन दिखायी देती थीं । वे आदर्श चरित्र ( पातिव्रत्य ) से सम्पन्न तथा इसके लिये सुविख्यात थीं । उन्हें पतिके दर्शनके लिये लाले पड़े थे ॥ २० ॥

भूषणैरुत्तमैर्हीनां भर्तृवात्सल्यभूषिताम् ।

राक्षसाधिपसंरुद्धां बन्धुभिश्च विनाकृताम् ॥ २१ ॥

वे उत्तम भूषणोंसे रहित थीं तो भी पति के वात्सल्य से विभूषित थीं ( पतिका स्नेह ही उनके लिये शृङ्गार था ) । राक्षसराज रावणने उन्हें बंदिनी बना रक्खा था । वे स्वजनोंसे बिछुड़ गयी थीं ॥ २१ ॥

वियूथां सिंहसंरुद्धां बद्धां गजवधूमिव ।

चन्द्ररेखां पयोदान्ते शारदात्रैरिवावृताम् ॥ २२ ॥

जैसे कोई हथिनी अपने यूथसे अलग हो गयी हो, यूथपतिके स्नेहसे बँधी हो और उसे किसी सिंहने रोक लिया हो । रावणकी कैदमें पड़ी हुई सीताकी भी वैसी ही दशा थी । वे वर्षाकाल बीत जानेपर शरद् ऋतुके श्वेत बादलोंसे घिरी हुई चन्द्ररेखाके समान प्रतीत होती थीं ॥ २२ ॥

क्लिष्टरूपामसंस्पर्शादयुक्तामिव वल्लकीम् ।

सतां भर्तृहिते युक्तामयुक्तां रक्षसां वशे ॥ २३ ॥

अशोकवनिकामध्ये शोकसागरमाप्लुताम् ।

ताभिः परिवृतां तत्र सग्रहामिव रोहिणीम् ॥ २४ ॥

जैसे वीणा अपने स्वामीकी अङ्गुलियोंके स्पर्शसे वञ्चित हो वादन आदिकी क्रियासे रहित अयोग्य अवस्थामें मूक पड़ी रहती है, उसी प्रकार सीता पतिके सम्पर्क से दूर होने के कारण महान् क्लेशमें पड़कर ऐसी अवस्थाको पहुँच गयी थीं, जो उनके योग्य नहीं थी । पतिके हितमें तत्पर रहनेवाली सीता राक्षसोंके अधीन रहने के योग्य नहीं थीं; फिर भी वैसी दशामें पड़ी थीं । अशोकवाटिकामें रहकर भी वे शोकके सागर में डूबी हुई थीं । क्रूर ग्रहसे आक्रान्त हुई रोहिणी

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सुन्दरकाण्डे अष्टादशः सर्गः ९ ११ भाँति वे वहाँ उन राक्षसियोंसे घिरी हुई थीं । हनुमानजीने उन्हें देखा । वे पुष्पहीन लताकी भाँति श्रीहीन हो रही थीं ॥ ददर्श हनुमांस्तत्र लतामकुसुमामिव ।

सा मलेन च दिग्धाङ्गी वपुषा चाप्यलंकृता ।

मृणाली पङ्कदिग्धेव विभाति च न भाति च ॥ २५ ॥

उनके सारे अङ्गोंमें मैल जम गयी थी । केवल शरीर सौन्दर्य ही उनका अलंकार था । वे कीचड़से लिपटी हुई कमलनालकी भाँति शोभा और अशोभा दोनोंसे युक्त हो रही थीं ॥ २५ ॥

मलिनेन तु वस्त्रेण परिक्लिष्टेन भामिनीम् ।

संवृतां मृगशावाक्षीं ददर्श हनुमान् कपिः ॥ २६ ॥

मैले और पुराने वस्त्रसे ढकी हुई मृगशावकनयनी भामिनी सीताको कपिवर हनुमान्ने उस अवस्थामें देखा ॥

तां देवीं दीनवदनामदीनां भर्तृतेजसा ।

रक्षितां स्वेन शीलेन सीतामसितलोचनाम् ॥ २७ ॥

यद्यपि देवी सीताके मुखपर दीनता छा रही थी तथापि अपने पतिके तेजका स्मरण हो आनेसे उनके हृदयसे वह दैन्य दूर हो जाता था । कजरारे नेत्रोंवाली सीता अपने शीलसे ही सुरक्षित थीं ॥ २७ ॥

तां दृष्ट्वा हनुमान् सीतां मृगशावनिभेक्षणाम् ।

मृगकन्यामिव त्रस्तां वीक्षमाणां समन्ततः ॥ २८ ॥

दहन्तीमिव निःश्वासैर्वृक्षान् पल्लवधारिणः ।

संघातमिव शोफानां दुःखस्योर्मिमिवोत्थिताम् ॥ २ ९ ॥

तां क्षमां सुविभक्ताङ्गीं विनाभरणशोभिनीम् ।

प्रहर्षमतुलं लेभे मारुतिः प्रेक्ष्य मैथिलीम् ॥ ३० ॥

उनके नेत्र मृगछौनोंके समान चञ्चल थे । वे डरी हुई मृगकन्याकी भाँति सब ओर सशङ्क दृष्टिसे देख रही थीं । अपने उच्छ्वासोंसे पल्लवधारी वृक्षोंको दग्ध - सी करती जान पड़ती थीं । शोककी मूर्तिमती प्रतिमा - सी दिखायी देती थीं और दुःखकी उठी हुई तरंग - सी प्रतीत होती थीं । उनके सभी अङ्गका विभाग सुन्दर था । यद्यपि वे विरह - शोक से दुर्बल हो गयी थीं तथापि आभूषणोंके बिना ही शोभा पाती थीं । इस अवस्था में मिथिलेशकुमारी सीताको देखकर पवन-पुत्र हनुमान्को उनका पता लग जाने के कारण अनुपम हर्ष प्राप्त हुआ ॥ २८-३० ॥

हर्षजानि च सोऽश्रूणि तां दृष्ट्वा मदिरेक्षणाम् ।

मुमोच हनुमांस्तत्र नमश्चक्रे च राघवम् ॥ ३१ ॥

मनोहर नेत्रवाली सीताको वहाँ देखकर हनुमानजी हर्ष के आँसू बहाने लगे । उन्होंने मन - ही - मन श्रीरघुनाथजीको नमस्कार किया ॥ ३१ ॥

नमस्कृत्वाथ रामाय लक्ष्मणाय च वीर्यवान् ।

सीतादर्शन संहृष्टो हनुमान् संवृतोऽभवत् ॥ ३२ ॥

सीताके दर्शनसे उल्लसित हो श्रीराम और लक्ष्मणको नमस्कार करके पराक्रमी हनुमान् वहीं छिपे रहे ॥ ३२ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये सुन्दरकाण्डे सप्तदशः सर्गः ॥ १७ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आरामायण आदिकाव्यके सुन्दरकाण्डमें सत्रहवाँ सगँ पूरा हुआ ॥ १७ ॥

अष्टादशः सर्गः अपनी स्त्रियोंसे घिरे हुए रावणका अशोकवाटिकामें आगमन और हनुमानजीका उसे देखना

तथा विप्रेक्षमाणस्य वनं पुष्पितपादपम् ।

विचिन्वतश्च वैदेहीं किंचिच्छेषा निशाभवत् ॥ १ ॥

इस प्रकार फूले हुए वृक्षोंसे सुशोभित उस वनकी शोभा देखते और विदेहनन्दिनीका अनुसंधान करते हुए हनुमानजी की वह सारी रात प्रायः बीत चली । केवल एक पहर रात बाकी रही ॥ १ ॥

षडङ्गवेदविदुषां क्रतुप्रवरयाजिनाम् ।

शुश्राव ब्रह्मघोषान् स विरात्रे ब्रह्मरक्षसाम् ॥ २ ॥

रातके उस पिछले पहर में छहों अङ्गसहित सम्पूर्ण वेदोंके विद्वान् तथा श्रेष्ठ यज्ञद्वारा यजन करनेवाले ब्रह्म - राक्षसोंके घरमें वेदपाठकी ध्वनि होने लगी, जिसे हनुमानजी ने सुना ॥

अथ मङ्गलवादित्रैः शब्दैः श्रोत्रमनोहरैः ।

प्राबोध्यत महाबाहुर्दशग्रीवो महाबलः ॥ ३ ॥

तदनन्तर मङ्गल वाद्यों तथा श्रवण - सुखद शब्दोंद्वारा महाबली महाबाहु दशमुख रावणको जगाया गया ॥ ३ ॥

विबुध्य तु महाभागो राक्षसेन्द्रः प्रतापवान् ।

स्स्रस्तमाल्याम्बरधरो वैदेहीमन्वचिन्तयत् ॥ ४ ॥

जागनेपर महान् भाग्यशाली एवं प्रतापी राक्षसराज रावणने सबसे पहले विदेहनन्दिनी सीताका चिन्तन किया । उस समय नींदके कारण उसके पुष्पहार और वस्त्र अपने स्थान से खिसक गये थे ॥ ४ ॥

भृशं नियुक्तस्तस्यां च मदनेन मदोत्कटः ।

न तु तं राक्षसः कामं शशाकात्मनि गूहितुम् ॥ ५ ॥

वह मदमत्त निशाचर कामसे प्रेरित हो सीता के प्रति अत्यन्त आसक्त हो गया था । अतः उस कामभावको अपने भीतर छिपाये रखनेमें असमर्थ हो गया ॥ ५ ॥

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९ १२ श्रीमदूवाल्मीकीयरामायणे

स सर्वाभरणैर्युको विवच्छ्रियमनुत्तमाम् ।

तां नगैर्विविधैर्जुष्टां सर्वपुष्पफलोपगैः ॥ ६ ॥

वृतां पुष्करिणीभिश्च नानापुष्पोपशोभिताम् ।

सदा मत्तैश्व विहगैर्विचित्रां परमाद्भुतैः ॥ ७ ॥

विविधैर्वृतां दृष्टिमनोहरैः ।

वीथीः सम्प्रेक्षमाणश्च मणिकाञ्चनतोरणाम् ॥ ८ ॥

नानामृगगणाकीर्णी फलैः प्रपतितैर्वृताम् ।

अशोकवनिकामेव प्राविशत् संततद्रुमाम् ॥ ९ ॥

उसने सब प्रकार के आभूषण धारण किये और परम उत्तम शोभासे सम्पन्न हो उस अशोकवाटिका में ही प्रवेश किया, जो सब प्रकारके फूल और फल देनेवाले भाँति-भाँतिके वृक्षोंसे सुशोभित थी । नाना प्रकारके पुष्प उसकी शोभा बढ़ा रहे थे । बहुत - से सरोवरोंद्वारा वह वाटिका घिरी हुई थी । सदा मतवाले रहनेवाले परम अद्भुत पक्षियोंके कारण उसकी विचित्र शोभा होती थी । कितने ही नयनाभिराम क्रीडामृगोंसे भरी हुई वह वाटिका भाँति - भाँति-के मृगसमूह से व्याप्त थी । बहुत - से गिरे हुए फलोंके कारण वहाँकी भूमि ढक गयी थी । पुष्पवाटिकामें मणि और सुवर्ण-के फाटक लगे थे और उसके भीतर पंक्तिबद्ध वृक्ष बहुत दूरतक फैले हुए थे । वहाँकी गलियोंको देखता हुआ रावण उस वाटिका में घुसा ॥ ६ - ९ ॥

अङ्गनाः शतमात्रं तु तं व्रजन्तमनुव्रजन् ।

महेन्द्रमिव पौलस्त्यं देवगन्धर्वयोषितः ॥ १० ॥

जैसे देवताओं और गन्धर्वोंकी स्त्रियाँ देवराज इन्द्रके पीछे चलती हैं, उसी प्रकार अशोकवनमें जाते हुए पुलस्त्यनन्दन रावण के पीछे - पीछे लगभग एक सौ सुन्दरियाँ गयीं ॥ १० ॥

दीपिकाः काञ्चनीः काश्चिज्जगृहुस्तत्र योषितः ।

वालव्यजनहस्ताश्च तालवृन्तानि चापराः ॥ ११ ॥

उन युवतियों में से किन्हीं ने सुवर्णमय दीपक ले रखे थे । किन्हीं के हाथोंमें चँवर थे तो किन्हीं के हाथोंमें ताड़के पंखे ॥ ११ ॥

काञ्चनैश्चैव भृङ्गारैर्जह्नः सलिलमग्रतः ।

मण्डलाग्रा वृसीश्चैव गृह्यान्याः पृष्ठतो ययुः ॥ १२ ॥

कुछ सुन्दरियाँ सोने की झारियोंमें जल लिये आगे - आगे चल रही थीं और कई दूसरी स्त्रियाँ गोलाकार बृसी नामक आसन लिये पीछे - पीछे जा रही थीं ॥ १२ ॥

काचिद् रत्नमयीं पात्र पूर्णा पानस्य भ्राजतीम् ।

दक्षिणा दक्षिणेनैव तदा जग्राह पाणिना ॥ १३ ॥

कोई चतुर चालाक युवती दाहिने हाथमें पेयरससे भरी हुई रत्ननिर्मित चमचमाती कलशी लिये हुए थी ॥ १३ ॥

राजहंसप्रतीकाशं छनं पूर्णशशिप्रभम् ।

सौवर्णदण्डमपरा गृहीत्वा पृष्ठतो ययौ ॥ १४ ॥

कोई दूसरी स्त्री सोनेके डंडेसे युक्त और पूर्ण चन्द्रमा तथा राजहंसके समान श्वेत छत्र लेकर रावणके पीछे - पीछे चल रही थी ॥ १४ ॥

रावणस्योत्तमस्त्रियः ।

अनुजग्मुः पतिं वीरं घनं विद्युल्लता इव ॥ १५ ॥

जैसे बादल के साथ - साथ बिजलियाँ चलती हैं, उसी प्रकार रावणकी सुन्दरी स्त्रियाँ अपने वीर पति के पीछे - पीछे जा रही थीं । उस समय नींदके नशे में उनकी आँखें झपी जाती थीं ॥ १५ ॥

व्याधिद्धहारकेयूराः समामृदितवर्णकाः ।

समागलितकेशान्ताः सस्वेदवदनास्तथा ॥ १६ ॥

उनके हार और बाजूबंद अपने स्थानसे खिसक गये थे । अङ्गराग मिट गये थे । चोटियाँ खुल गयी थीं और मुखपर पसीने की बूँदें छा रही थीं ॥ १६ ॥

घूर्णन्त्यो मदशेषेण निद्रया च शुभाननाः ।

स्वेद क्लिष्टाङ्गकुसुमाः समाल्याकुलमूर्धजाः ॥ १७ ॥

वे सुमुखी स्त्रियाँ अवशेष मद और निद्रासे झूमती हुईं-सी चल रही थीं । विभिन्न अङ्गोंमें धारण किये गये पुष्प पसीने से भींग गये थे और पुष्पमालाओंसे अलंकृत केश कुछ कुछ हिल रहे थे ॥ १७ ॥

प्रयान्तं नैर्ऋतपति नाय मदिरलोचनाः ।

बहुमानाश्च कामाच्च प्रियभार्यास्तमन्वयुः ॥ १८ ॥

जिनकी आँखें मदमत्त बना देनेवाली थीं, वे राक्षस-राजकी प्यारी पत्नियाँ अशोकवनमें जाते हुए पतिके साथ बड़े आदरसे और अनुरागपूर्वक जा रही थीं ॥ १८ ॥

स च कामपराधीनः पतिस्तासां महाबलः ।

सीतासकमना मन्दो मन्दाञ्चित गतिर्बभौ ॥ १ ९ ॥

उन सबका पति महाबली मन्दबुद्धि रावण कामके अधीन हो रहा था । वह सीतामें मन लगाये मन्दगतिसे आगे बढ़ता हुआ अद्भुत शोभा पा रहा था ॥ १ ९ ॥

ततः काञ्चीनिनादं च नूपुराणां च निःखनम् ।

शुश्राव परमस्त्रीणां कपिर्मारुतनन्दनः ॥ २० ॥

उस समय वायुनन्दन कपिवर हनुमानजीने उन परम सुन्दरी रावणपत्नियोंकी करधनीका कलनाद और नूपुरोकी झनकार सुनी ॥ २० ॥

तं चाप्रतिमकर्माणमचिन्त्यबलपौरुषम् ।

द्वारदेशमनुप्राप्तं ददर्श हनुमान् कपिः ॥ २१ ॥

साथ ही, अनुपम कर्म करनेवाले तथा अचिन्त्य बल-पौरुषसे सम्पन्न रावणको भी कपिवर हनुमान्ने देखा, जो अशोक वाटिका के द्वारतक आ पहुँचा था ॥ २१ ॥

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सुन्दरकाण्डे एकोनविंशः सर्गः ९ १३

दीपिकाभिरनेकाभिः समन्तादवभासितम् ।

गन्धतैलावसिक्ताभिर्धियमाणाभिरग्रतः ॥२२ ॥

उसके आगे - आगे सुगन्धित तेलसे भीगी हुई और स्त्रियोंद्वारा हाथोंमें धारण की हुई बहुत - सी मशालें जल रही थीं, जिनके द्वारा वह सब ओरसे प्रकाशित हो रहा था ॥

कामदर्पमदैर्युक्तं जिताम्रायतेक्षणम् ।

समक्षमिव कंदर्पमपविद्धशरासनम् ॥ २३ ॥

वह काम, दर्प और मदसे युक्त था । उसकी आँखें टेढ़ी, लाल और बड़ी - बड़ी थीं । वह धनुषरहित साक्षात् कामदेव के समान जान पड़ता था ॥ २३ ॥

मथितामृतफेनाभमरजोवस्त्रमुत्तमम् पुष्पमवकर्षन्तं विमुक्तं सकमङ्गदे ॥ २४ ॥

उसका वस्त्र मथे हुए दूधके फेनकी भाँति श्वेत, निर्मल और उत्तम था । उसमें मोतीके दाने और फूल टँके हुए थे । वह वस्त्र उसके बाजूबंद में उलझ गया था और रावण उसे खींचकर सुलझा रहा था ॥ २४ ॥

तं पत्रविटपे लीनः पत्र पुष्पशतावृतः ।

समीपमुपसंक्रान्तं विज्ञातुमुपचक्रमे ॥ २५ ॥

अशोक वृक्षके पत्तों और डालियोंमें छिपे हुए हनुमान्जी सैकड़ों पत्रों तथा पुष्पोंसे ढक गये थे । उसी अवस्था में उन्होंने निकट आये हुए रावणको पहचाननेका प्रयत्न किया ॥ २५ ॥

अवेक्षमाणस्तु तदा ददर्श कपिकुञ्जरः ।

रूपयौवनसम्पन्ना रावणस्य वरस्त्रियः ॥ २६ ॥

उसकी ओर देखते समय कपिश्रेष्ठ हनुमान्ने रावणकी सुन्दरी स्त्रियोंको भी लक्ष्य किया, जो रूप और यौवनसे सम्पन्न थीं ॥ २६ ॥

ताभिः परिवृतो राजा सुरूपाभिर्महायशाः ।

तन्मृगद्विजसंघुष्टं प्रविष्टः प्रमदावनम् ॥ २७ ॥

उन सुन्दर रूपवाली युवतियों से घिरे हुए महायशस्वी राजा रावणने उस प्रमदावन में प्रवेश किया, जहाँ अनेक प्रकारके पशु - पक्षी अपनी - अपनी बोली बोल रहे थे ॥ २७ ॥

क्षीबो विचित्राभरणः शङ्कुकर्णो महाबलः ।

तेन विश्रवसः पुत्रः स दृष्टो राक्षसाधिपः ॥ २८ ॥

वह मतवाला दिखायी देता था । उसके आभूषण विचित्र थे । उसके कान ऐसे प्रतीत होते थे, मानो वहाँ खूँटे गाड़े गये हैं । इस प्रकार वह विश्रवा मुनिका पुत्र महाबली राक्षसराज रावण हनुमान् जीके दृष्टिपथमें आया २८

वृतः परमनारीभिस्ताराभिरिव चन्द्रमाः ।

तं ददर्श महातेजास्तेजोवन्तं महाकपिः ॥ २ ९ ॥

रावणोऽयं महाबाहुरिति संचिन्त्य वानरः ।

सोऽयमेव पुरा शेते पुरमध्ये गृहोत्तमे ।

अवप्लुतो महातेजा हनूमान् मारुतात्मजः ॥ ३० ॥

ताराओंसे घिरे हुए चन्द्रमाकी भाँति वह परम सुन्दरी युवतियोंसे घिरा हुआ था । महातेजस्वी महाकपि हनुमान्ने उस तेजस्वी राक्षसको देखा और देखकर यह निश्चय किया कि यही महाबाहु रावण है । पहले यही नगर में उत्तम महलके भीतर सोया हुआ था । ऐसा सोचकर वे वानरवीर महातेजस्वी पवनकुमार हनुमान्जी जिस डालीपर बैठे थे, वहाँसे कुछ नीचे उतर आये ( क्योंकि वे निकटसे रावणकी सारी चेष्टाएँ देखना चाहते थे ) ॥ २ ९ -३० ॥

स तथाप्युग्रतेजाः स निर्धूतस्तस्य तेजसा ।

पत्रे गुह्यान्तरे सक्तो मतिमान् संवृतोऽभवत् ॥ ३१ ॥

यद्यपि मतिमान् हनुमानजी भी बड़े उग्रतेजस्वी थे, तथापि रावण के तेजसे तिरस्कृत - से होकर सघन पत्तोंमें घुसकर छिप गये ॥ ३१ ॥

स तामसितकेशान्तां सुश्रोणीं संहतस्तनीम् ।

दिदृक्षुरसितापाङ्गीमुपावर्तत रावणः ॥ ३२ ॥

उधर रावण काले केश, कजरारे नेत्र, सुन्दर कटिभाग और परस्पर सटे हुए स्तनवाली सुन्दरी सीताको देखने के लिये उनके पास गया ॥ ३२ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये सुन्दरकाण्डेऽष्टादशः सर्गः ॥ १८ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आरामायण आदिकाव्यके सुन्दरकाण्ड में अठारहवाँ सगँ पूरा हुआ ॥ १८ ॥

एकोनविंशः सर्गः रावण को देखकर दुःख, भय और

तस्मिन्नेव ततः काले राजपुत्री त्वनिन्दिता ।

रूपयौवनसम्पन्नं भूषणोत्तमभूषितम् ॥

ततो दृष्ट्वैव वैदेही रावणं राक्षसाधिपम् ।

प्रावेपत वरारोहा प्रवाते कदली यथा ॥

उस समय अनिन्दिता सुन्दरी राजकुमारी सीताने वा ० १० ५.७.७-चिन्तामें डूबी हुई सीताकी अवस्थाका वर्णन उत्तमोत्तम आभूषणोंसे विभूषित तथा रूप - यौवनसे सम्पन्न १ ॥ राक्षसराज रावणको आते देखा, तब वे प्रचण्ड हवामें हिलनेवाली कदलीके समान भयके मारे थर - थर काँपने २ ॥ लगीं ॥ १-२ ॥ जब ऊरुभ्यामुदरं छाद्य बाहुभ्यां च पयोधरौ ।

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९ १४ श्रीमवाल्मीकीयरामायणे उपविष्टा विशालाक्षी रुदती वरवर्णिनी ॥ ३ ॥

सुन्दर कान्तिवाली विशाललोचना जानकीने अपनी जाँघोंसे पेट और दोनों भुजाओं से स्तन छिपा लिये तथा वहाँ बैठी बैठी वे रोने लगीं ॥ ३ ॥

दशग्रीवस्तु वैदेहीं रक्षितां राक्षसीगणैः ।

ददर्श दीनां दुःखार्ता नावं सन्नामिवार्णवे ॥ ४ ॥

असंवृतायामासीनां धरण्यां संशितव्रताम् ।

छिन्नां प्रपतितां भूमौ शाखामिव वनस्पतेः ॥ ५ ॥

राक्षसियोंके पहरेमें रहती हुई विदेहराजकुमारी सीता अत्यन्त दीन और दुखी हो रही थीं । वे समुद्रमें जीर्ण - शीर्ण होकर डूबी हुई नौकाके समान दुःखके सागर में निमग्न थीं । उस अवस्थामें दशमुख रावणने उनकी ओर देखा । वे बिना बिछौनेके खुली जमीनपर बैठी थीं और कटकर पृथ्वीपर गिरी हुई वृक्षकी शाखा के समान जान पड़ती थीं । उनके द्वारा बड़े कठोर व्रतका पालन किया जा रहा था ॥। ४-५ ॥

मलमण्डनदिग्धाङ्गीं मण्डनार्हाममण्डनाम् ।

मृणाली पङ्कदिग्धेव विभाति न विभाति च ॥ ६ ॥

उनके अङ्गोंमें अङ्गरागकी जगह मैल जमी हुई थी । वे आभूषण धारण तथा शृङ्गार करने योग्य होनेपर भी उन सबसे वञ्चित थीं और कीचड़में सनी हुई कमलनालकी भाँति शोभा पाती थीं तथा नहीं भी पाती थीं । ( कमलनाल जैसे सुकुमारता के कारण शोभा पाती है और कीचड़में सनी रहनेके कारण शोभा नहीं पाती, वैसे ही वे अपने सहज, सौन्दर्यसे सुशोभित थीं, किंतु मलिनताके कारण शोभा नहीं देती थीं ) ॥ ६ ॥

समीपं राजसिंहस्य रामस्य विदितात्मनः ।

संकल्पय संयुक्तर्यान्तीमिव मनोरथैः ॥ ७ ॥

संकल्पोंके घोड़ोंसे जुते हुए मनोमय रथपर चढ़कर आत्मज्ञानी राजसिंह भगवान् श्रीराम के पास जाती हुई - सी प्रतीत होती थीं ॥ ७ ॥

शुष्यन्तीं रुदतीमेकां ध्यानशोकपरायणाम् ।

दुःखस्यान्तमपश्यन्तीं रामां राममनुव्रताम् ॥ ८ ॥

उनका शरीर सूखता जा रहा था । वे अकेली बैठकर रोती तथा श्रीरामचन्द्रजीके ध्यान एवं उनके वियोगके शोकमें डूबी रहती थीं । उन्हें अपने दुःखका अन्त नहीं दिखायी देता था । वे श्रीरामचन्द्रजीमें अनुराग रखनेवाली तथा उनकी रमणीय भार्या थीं ॥ ८ ॥

चेष्टमानामथाविष्टां पन्नगेन्द्रवधूमिव ।

धूप्यमानां ग्रहेणेव रोहिणीं धूमकेतुना ॥ ९ ॥

जैसे नागराजकी वधू ( नागिन ) मणि - मन्त्रादिसे अभिभूत हो छटपटाने लगती है, उसी तरह सीता भी पतिके वियोगमें तड़प रही थीं तथा धूमके समान वर्णवाले केतु-ग्रहसे ग्रस्त हुई रोहिणी के समान संतप्त हो रही थीं ॥ ९ ॥

वृत्तशीले कुले जातामाचारवति धार्मिके ।

पुनः संस्कारमापन्नां जातामिव च दुष्कुले ॥ १० ॥

यद्यपि सदाचारी और सुशील कुलमें उनका जन्म हुआ था । फिर धार्मिक तथा उत्तम आचार - विचार वाले कुलमें वे व्याही गयी थीं - विवाह - संस्कार से सम्पन्न हुई थीं, तथापि दूषित कुलमें उत्पन्न हुईं नारीके समान मलिन दिखायी देती थीं ॥ १० ॥

सन्नामिव महाकीर्तिं श्रद्धामिव विमानिताम् ।

प्रशामिव परिक्षीणामाशां प्रतिहतामिव ॥ ११ ॥

आयतीमिव विध्वस्तामाशां प्रतिहतामिव ।

दीप्तामिव दिशं काले पूजामपहतामिव ॥ १२ ॥

पौर्णमासीमिव निशां तमोग्रस्तेन्दुमण्डलाम् ।

पद्मिनीमिव विध्वस्तां हतशूरां चमूमिव ॥ १३ ॥

प्रभामिव तमोध्वस्तामुपक्षीणामिवापगाम् ।

वेदीमिव परामृष्टां शान्तामग्निशिखामिव ॥ १४ ॥

वे क्षीण हुई विशाल कीर्ति, तिरस्कृत हुई श्रद्धा, सर्वथा ह्रासको प्राप्त हुई बुद्धि, टूटी हुई आशा, नष्ट हुए भविष्य, उल्लङ्घित हुई राजाज्ञा, उत्पातकाल में दहकती हुईं दिशा, नष्ट हुई देवपूजा, चन्द्रग्रहणसे मलिन हुईं पूर्णमासीकी रात, तुषारपात से जीर्ण - शीर्ण हुई कमलिनी, जिसका शूरवीर सेनापति मारा गया हो, ऐसी सेना, अन्धकारसे नष्ट हुई प्रभा, सूखी हुई सरिता, अपवित्र प्राणियोंके स्पर्शसे अशुद्ध हुई वेदी और बुझी हुई अग्निशिखाके समान प्रतीत होती थीं ॥ ११-१४ ॥

उत्कृष्टपर्णकमलां वित्रासितविहङ्गमाम् ।

हस्तिहस्तपरामृष्टामाकुलामिव पद्मिनीम् ॥ १५ ॥

जिसे हाथीने अपनी सूँड़से हुँडेर डाला हो; अतएव जिसके पत्ते और कमल उखड़ गये हों तथा जलपक्षी भयसे थर्रा उठे हो, उस मथित एवं मलिन हुई पुष्करिणीके समान सीता श्रीहीन दिखायी देती थीं ॥ १५ ॥

पतिशोकातुरां शुष्कां नदीं विस्रावितामिव ।

परया मृजया हीनां कृष्णपक्षे निशामिव ॥ १६ ॥

पति के विरह शोक - से उनका हृदय बड़ा व्याकुल था । जिसका जल नहरोंके द्वारा इधर - उधर निकाल दिया गया हो, ऐसी नदी के समान वे सूख गयी थीं तथा उत्तम उबटन आदिके न लगने से कृष्णपक्षकी रात्रि के समान मलिन हो रही थीं ॥ १६ ॥

सुकुमारीं सुजाताङ्गीं रत्नगर्भगृहोचिताम् ।

तप्यमानामिवोध्णेन मृणालीमचिरोद्धृताम् ॥ १७ ॥

उनके अङ्ग बड़े सुकुमार और सुन्दर थे । वे रत्नजटित राजमहलमें रहने के योग्य थीं; परंतु गर्मीसे तपी और तुरंत

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सुन्दरकाण्डे विंशः सर्गः ९ १५ तोड़कर फेंकी हुई कमलिनीके समान दयनीय दशाको पहुँच गयी थीं ॥ १७ ॥

गृहीतामालितां स्तम्भे यूथपेन विनाकृताम् ।

निःश्वसन्तीं सुदुःखार्ता गजराजवधूमिव ॥ १८ ॥

जिसे यूथपति से अलग करके पकड़कर खंभेमें बाँध दिया गया हो, उस हथिनीके समान वे अत्यन्त दुःखसे आतुर होकर लंबी साँस खींच रही थीं । १८ ॥

एकया दीर्घया वेण्या शोभमानामयत्नतः ।

नीलया नीरदापाये वनराज्या महीमिव ॥ १ ९ ॥

बिना प्रयत्न ही बँधी हुई एक ही लंबी वेणीसे सीताकी वैसी ही शोभा हो रही थी, जैसे वर्षा ऋतु बीत जानेपर सुदूर-तक फैली हुई हरी - भरी वनश्रेणीसे पृथ्वी सुशोभित होती है ॥ १ ९ ॥

उपवासेन शोकेन ध्यानेन च भयेन च ।

परिक्षीणां कृशां दीनामल्पाहारां तपोधनाम् ॥ २० ॥

वे उपवास, शोक, चिन्ता और भयसे अत्यन्त क्षीण, कृशकाय और दीन हो गयी थीं । उनका आहार बहुत कम हो गया था तथा एकमात्र तप ही उनका धन था ॥ २० ॥

आयाचमानां दुःखार्ता प्राञ्जलिं देवतामिव ।

भावेन रघुमुख्यस्य दशग्रीवपराभवम् ॥ २१ ॥

वे दुःखसे आतुर हो अपने कुलदेवतासे हाथ जोड़कर मन - ही - मन यह प्रार्थना - सी कर रही थीं कि श्रीरामचन्द्रजी के हाथसे दशमुख रावणकी पराजय हो ॥ २१ ॥

समीक्षमाणां रुदतीमनिन्दितां सुपक्ष्मताम्रायतशुक्ललोचनाम् । अनुव्रतां राममतीव मैथिलीं प्रलोभयामास वधाय रावणः ॥ २२ ॥

सुन्दर बरौनियोंसे युक्त, लाल, श्वेत एवं विशाल नेत्रोंवाली सती - साध्वी मिथिलेशकुमारी सीता श्रीरामचन्द्रजी-में अत्यन्त अनुरक्त थीं और इधर - उधर देखती हुई रो रही थीं । इस अवस्थामें उन्हें देखकर राक्षसराज रावण अपने ही व के लिये उनको लुभाने की चेष्टा करने लगा ॥ २२ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये सुन्दरकाण्डे एकोनविंशः सर्गः ॥ १ ९ ॥ इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके सुन्दरकाण्डमें उन्नीसवाँ सगँ पूरा हुआ ॥ १०. ॥ विंशः सर्गः रावणका सीताजीको प्रलोभन

सतां परिवृतां दीनां निरानन्दां तपस्विनीम् ।

साकारैर्मधुरैर्वाक्यैर्न्य दर्शयत रावणः ॥ १ ॥

राक्षसियोंसे घिरी हुईं दीन और आनन्दशून्य तपखिनी सीताको सम्बोधित करके रावण अभिप्राययुक्त मधुर वचनों-द्वारा अपने मनका भाव प्रकट करने लगा ॥ १ ॥

मां दृष्ट्रा नागनासोरु गूहमाना स्तनोदरम् ।

अदर्शनमिवात्मानं भयान्नेतुं त्वमिच्छसि ॥ २ ॥

' हाथी की सूँड के समान सुन्दर जाँघोंवाली सीते! मुझे देखते ही तुम अपने स्तन और उदरको इस प्रकार छिपाने लगी हो, मानो डरके मारे अपने को अदृश्य कर देना चाहती हो ॥ २ ॥

कामये त्वां विशालाक्षि बहु मन्यस्व मां प्रिये ।

सर्वाङ्गगुणसम्पन्ने सर्वलोकमनोहरे ॥ ३ ॥

' किंतु विशाललोचने! मैं तो तुम्हें चाहता हूँ —तुमसे प्रेम करता हूँ । समस्त संसारका मन मोहनेवाली सर्वाङ्गसुन्दरी प्रिये! तुम भी मुझे विशेष आदर दो - मेरी प्रार्थना स्वीकार करो ॥ ३ ॥

नेह किंचिन्मनुष्या वा राक्षसाः कामरूपिणः ।

व्यपसर्पतु ते सीते भयं मत्तः समुत्थितम् ॥ ४ ॥

" यहाँ तुम्हारे लिये कोई भय नहीं है । इस स्थान में न तो मनुष्य आ सकते हैं, न इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले दूसरे राक्षस हो, केवल मैं आ सकता हूँ । परंतु सीते । मुझसे जो तुम्हें भय हो रहा है, वह तो दूर हो ही जाना चाहिये ॥ ४ ।!

स्वधर्मो रक्षसां भीरु सर्वदेव न संशयः ।

गमनं वा परस्त्रीणां हरणं सम्प्रमथ्य वा ॥ ५ ॥

' भीरु! ( तुम यह न समझो कि मैंने कोई अधर्म किया है ) परायी स्त्रियोंके पास जाना अथवा बलात्कारपूर्वक उन्हें हर लाना यह राक्षसोंका सदा ही अपना धर्म रहा है-इसमें संदेह नहीं है ॥ ५ ॥

एवं चैवमकामां त्वां न च स्प्रक्ष्यामि मैथिलि ।

कामं कामः शरीरे मे यथाकामं प्रवर्तताम् ॥ ६ ॥

' मिथिलेशनन्दिनि । ऐसी अवस्था में भी जबतक तुम मुझे न चाहोगी, तबतक मैं तुम्हारा स्पर्श नहीं करूँगा । भले ही कामदेव मेरे शरीरपर इच्छानुसार अत्याचार करे ॥ ६ ॥

देवि नेह भयं कार्य मयि विश्वसिहि प्रिये ।

प्रणयस्व च तत्त्वेन मैवं भूः शोकलालसा ॥ ७ ॥