श्रीगणेशाय नमः।

वाल्मीकि रामायण — खण्ड २ — पृष्ठ 721–730

वाल्मीकि रामायण — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 721–730

पृष्ठ 721

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श्रीमद्वाल्मीकीय रामायणे १५०६

अपश्यत् स यमं तत्र देवमग्निपुरस्कृतम् ।

विधानमनुतिष्ठन्तं प्राणिनो यस्य यादृशम् ॥ २ ॥

वहाँ जाकर उन्होंने देखा, यमदेवता अग्निको साक्षीके रूपमें सामने रखकर बैठे हैं और जिस प्राणीका जैसा कर्म है, उसीके अनुसार फल देनेकी व्यवस्था कर रहे हैं ॥ २ ॥

स तु दृष्ट्वा यमः प्राप्तं महर्षि तत्र नारदम् ।

धर्मतः ॥ ३ ॥

अब्रवीत् सुखमासीनमर्घ्यमावेद्य • नारदको वहाँ आया देख यमराजने आतिथ्य - धर्म-उनके लिये अर्घ्य आदि निवेदन करके कहा - || ३ || के अनुसार

कच्चित् क्षेमं नु देवर्षे कच्चिद् धर्मो न नश्यति ।

ते देवगन्धर्वसेवित ॥ ४ ॥

किमागमनकृत्यं " देवताओं और गन्धवोंसे सेवित देवर्षे! कुशल तो है न? धर्मका नाश तो नहीं हो रहा है? आज यहाँ आपके शुभागमनका क्या उद्देश्य है? ' ॥ ४ ॥

अब्रवीत् तु तदा वाक्यं नारदो भगवानृषिः ।

विधानं च विधीयताम् ॥ ५ ॥

श्रूयतामभिधास्यामि पितृराज निशाचरः ।

एष नाम्ना दशग्रीवः सुदुर्जयम् ॥ ६ ॥

उपयाति वशं नेतुं विक्रमैस्त्वां तब भगवान् नारद मुनि बोले- ' पितृराज! सुनिये-मैं एक अवश्यक बात बता रहा हूँ, आप सुनकर उसके

अपश्यत् सैनिकांश्चास्य यमस्यानुचरैः सह ।

पुरुषैरुयैर्घोररूपैर्भयानकैः ॥ ११ ॥

यमस्य क्लिश्यमानांश्च देहिनः ।

ददर्श वध्यमानांश्च ॥ १२ ॥

क्रोशतश्च महानादं तीव्रनिष्टनतत्परान् भी उसने यमराजके सेवकोंके साथ उनके सैनिकोंको देखा । उसकी दृष्टिमें यमयातनाका दृश्य भी आया । घोर रूप-धारी उग्र प्रकृतिवाले भयानक यमदूत कितने ही प्राणियों को मारते और क्लेश पहुँचाते थे, जिससे वे बड़े जोर - जोरसे

चीखते और चिल्लाते थे । ११-१२ ॥

सारमेयैश्च दारुणैः । कृमिभिर्भक्ष्यमाणांश्च वाचो वदतश्च भयावहाः ॥ १३ ॥

श्रोत्रायासकरा किन्हींको कीड़े खा रहे थे और कितनोंको भयङ्कर कुत्ते नोच रहे थे । वे सब - के - सब दुखी हो - होकर कानोंको पीड़ा देनेवाला भयानक चीत्कार करते थे ॥ १३ ॥

संतार्यमाणान् वैतरणी बहुशः शोणितोदकाम् ।

च तप्तासु तप्यमानान् मुहुर्मुहुः ॥ १४ ॥

बालुकासु किन्हींको बारंबार रक्तसे भरी हुई वैतरणी नदी पार करने के लिये विवश किया जाता था और कितनोंको तपायी हुई बालुकाओंपर बार - बार चलाकर संतप्त किया जाता था ॥

असिपत्रवने चैव भिद्यमानानधार्मिकान् ।

च क्षुरधारासु चैव हि ॥ १५ ॥

प्रतीकारका भी कोई उपाय कर लें । यद्यपि आपको जीतना रौरवे क्षारनद्यां तृषितान् क्षुधितानपि । अत्यन्त कठिन है, तथापि यह दशग्रीव नामक निशाचर अपने पानीयं याचमानांश्च दीनान् विवर्णान् मुक्तमूर्धजान् ॥१६ ॥

आपको वश में करनेके लिये यहाँ आ रहा है ॥ शवभूतान् कृशान् रुक्षांश्च परिधावतः ।

पराक्रमोंद्वारा त्वरितो ह्यागतः प्रभो । मलपङ्कधरान् दीनान् सहस्रशः ॥ १७ ॥

एतेन कारणेनाहं नु भविष्यति ॥ ७ ॥ ददर्श रावणो मार्गे शतशोऽथ धारके

दण्डप्रहरणस्याद्य तव किं आपको कुछ पापी असिपत्र वनमें, जिसके पत्ते तलवारकी ' प्रभो! इसी कारणसे मैं तुरंत यहाँ आया हूँ कि तीखे थे, विदीर्ण किये जा रहे थे । किन्हींको रौरव इस सङ्कटकी सूचना दे दूँ, परंतु आप तो कालदण्डरूपी समान जाता था । कितनोंको खारे जलसे भरी हुई-आयुधको धारण करनेवाले हैं, आपकी उस राक्षसके आक्रमण- नरकमें डाला जाता था और बहुतोंको छुरोंकी धारोंपर से क्या हानि होगी? ' ॥ ७ ॥ नदियोंमें जाता डुबाया था । कई प्राणी भूख और प्याससे तड़प रहे थे

एतस्मिन्नन्तरे दूरादंशुमन्तमिवोदितम् । दौड़ाया और थोड़े से जलकी याचना कर रहे थे । कोई शवके समान ददृशुर्दीप्तमायान्तं विमानं तस्य रक्षसः ॥ ८ ॥, दीन, दुर्बल, उदास और खुले बालोंसे युक्त दिखायी

इस प्रकार की बातें हो ही रही थीं कि उस राक्षसका कङ्काल ही प्राणी अपने अङ्गोंमें मैल और कीचड़ हुए सूर्य के समान तेजस्वी विमान दूरसे आता देते थे । कितने तथा रूखे शरीरसे चारों ओर भाग रहे थे । उदित लगाये दयनीय दिखायी दिया ॥ ८ ॥ इस तरह के सैकड़ों और हजारों जीवोंको रावणने मार्ग में यातना

तं देशं प्रभया तस्य पुष्पकस्य महाबलः ॥ । ९ ॥ भोगते देखा ॥ १५-१७ ॥

कृत्वा वितिमिरं सर्व समीपमभ्यवर्तत कांश्चिच्च गृहमुख्येषु गीतवादित्रनिःस्वनैः ।

महाबली रावण पुष्पककी प्रभासे उस समस्त प्रदेशको रावणः सुकृतैः स्वकैः ॥ १८ ॥

करके अत्यन्त निकट आ गया ॥ ९ ॥ प्रमोदमानानद्राक्षीद्

रावणने देखा कुछ पुण्यात्मा जीव अपने अन्धकारशून्य स महाबाहुर्दशग्रीवस्ततस्ततः । दूसरी ओर अच्छे - अच्छे घरोंमें रहकर संगीत और सोऽपश्यत् चैव भुञ्जानांश्चैव दुष्कृतम् ॥ १० ॥ पुण्यकमोंके प्रभावसे आनन्दित हो रहे हैं ॥ १८ ॥

प्राणिनः सुकृतं में आकर देखा कि यहाँ वाद्योंकी मनोहर ध्वनिसे । महाबाहु दशग्रीवने यमलोक भोग गोरसं गोप्रदातारो हान्नं चैवान्नदायिनः बहुत - से प्राणी अपने - अपने पुण्य तथा पापका फल गृहदातारः स्वकर्मफलमश्नतः ॥ १ ९ ॥ गृहांश्च रहे हैं ॥ १० ॥

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उत्तरकाण्डे एकविंशः सर्गः १५०७ गोदान करनेवाले गोरसको, अन्न देनेवाले अन्नको और गृह प्रदान करनेवाले लोग गृहको पाकर अपने सत्कर्मों का फल भोग रहे हैं ॥ १ ९ ॥

सुवर्णमणिमुक्ताभिः प्रमदाभिरलंकृतान् ।

धार्मिकानरांस्तत्र दीप्यमानान् स्वतेजसा ॥ २० ॥

दूसरे धर्मात्मा पुरुष वहाँ सुवर्ण, मणि और मुक्ताओंसे अलंकृत हो यौवन के मदसे मत्त रहनेवाली सुन्दरी स्त्रियोंके साथ अपनी अङ्गकान्तिसे प्रकाशित हो रहे हैं ॥ २० ॥

ददर्श स महाबाहू रावणो राक्षसाधिपः ।

ततस्तान् भिद्यमानांश्च कर्मभिर्दुष्कृतैः स्वकैः ॥ २१ ॥

रावणो मोचयामास विक्रमेण बलाद् बली ।

प्राणिनो मोक्षितास्तेन दशग्रीवेण रक्षसा ॥ २२ ॥

महाबाहु राक्षसराज रावणने इन सबको देखा । देखकर बलवान् राक्षस दशग्रीवने अपने पाप कर्मोंके कारण यातना भोगनेवाले प्राणियोंको पराक्रमद्वारा बलपूर्वक मुक्त कर दिया ॥ २१-२२ ॥

सुखमापुर्मुहूर्त ह्यतर्कितमचिन्तितम् ।

प्रेतेषु मुच्यमानेषु राक्षसेन महीयसा ॥ २३ ॥

प्रेतगोपाः सुसंक्रुद्धा राक्षसेन्द्रमभिद्रवन् । | इससे थोड़ी देर तक उन पापियोंको बड़ा सुख मिला, उसके मिलनेकी न तो उन्हें सम्भावना थी और न उसके विषयमें वे कुछ सोच ही सके थे । उस महान् राक्षसके द्वारा जब सभी प्रेत यातनासे मुक्त कर दिये गये, तब उन प्रेतोंकी रक्षा करनेवाले यमदूत अत्यन्त कुपित हो राक्षसराजपर टूट पड़े ॥ २३३ ॥

ततो हलहलाशब्दः सर्वदिग्भ्यः समुत्थितः ॥ २४ ॥

धर्मराजस्य योधानां शूराणां सम्प्रधावताम् । फिर तो सम्पूर्ण दिशाओंकी ओरसे धावा करनेवाले धर्म-राजके शूरवीर योद्धाओंका महान् कोलाहल प्रकट हुआ || ते प्रासैः परिधैः शूलैर्मुसलैः शक्तितोमरैः ॥ २५ ॥

पुष्पकं समधर्षन्त शूराः शतसहस्रशः ।

तस्यासनानि प्रासादान् वेदिकास्तोरणानि च ॥ २६ ॥

पुष्पकस्य बभञ्जुस्ते शीघ्रं मधुकरा इव । जैसे फूलपर झुंड के झुंड भौंरे जुट जाते हैं, उसी प्रकार पुष्पक विमानपर सैकड़ों, हजारों शूरवीर यमदूत चढ़ आये और प्रासों, परिधों, शूलों, मूसलों, शक्तियों तथा तोमरोंद्वारा उसे तहस - नहस करने लगे । उन्होंने पुष्पक विमानके आसन, प्रासाद, वेदी और फाटक शीघ्र ही तोड़ डाले ॥२५-२६३ ॥ देवनिष्ठानभूतं तद् विमानं पुष्पकं मृधे ॥ २७ ॥

भज्यमानं तथैवासीदक्षयं ब्रह्मतेजसा । देवताओंका अधिष्ठानभूत वह पुष्पक विमान उस युद्ध में तोड़ा जानेपर भी ब्रह्माजीके प्रभावसे ज्यों - का - त्यों हो जाता था; क्योंकि वह नष्ट होनेवाला नहीं था ॥ २७३ ॥

असंख्या सुमहत्यासीत् तस्य सेना महात्मनः ॥ २८ ॥

शूराणामग्रयातॄणां सहस्राणि शतानि च । महामना यमकी विशाल सेना असंख्य थी । उसमें सैकड़ों-हजारों शूरवीर आगे बढ़कर युद्ध करनेवाले थे ॥ २८३ ॥

ततो वृक्षैश्च शैलैश्च प्रासादानां शतैस्तथा ॥ २ ९ ॥

ततस्ते सचिवास्तस्य यथाकामं यथाबलम् ।

अयुध्यन्त महावीराः स च राजा दशाननः ॥ ३० ॥

यमदूतोंके आक्रमण करनेपर रावणके वे महावीर मन्त्री तथा स्वयं राजा दशग्रीव भी वृक्षों, पर्वत शिखरों तथा यम-लोकके सैकड़ों प्रासादोंको उखाड़कर उनके द्वारा पूरी शक्ति लगाकर इच्छानुसार युद्ध करने लगे ॥ २ ९ -३० ॥

ते तु शोणितदिग्धाङ्गाः सर्वशस्त्र समाहताः ।

अमात्या राक्षसेन्द्रस्य चक्रुरायोधनं महत् ॥ ३१ ॥

राक्षसराजके मन्त्रियोंके सारे अङ्ग रक्तसे नहा उठे थे । सम्पूर्ण शस्त्रोंके आघातसे वे घायल हो चुके थे । फिर भी उन्होंने बड़ा भारी युद्ध किया ॥ ३१ ॥

अन्योन्यं ते महाभागा जघ्नुः प्रहरणैर्भृशम् ।

यमस्य च महाबाहो रावणस्य च मन्त्रिणः ॥ ३२ ॥

महाबाहु श्रीराम! यमराज तथा रावणके वे महाभाग मन्त्री एक दूसरेपर नाना प्रकारके अस्त्र - शस्त्रोंद्वारा बड़े जोरसे आघात प्रत्याघात करने लगे ॥ ३२ ॥

अमात्यांस्तांस्तु संत्यज्य यमयोधा महाबलाः ।

तमेव चाभ्यधावन्त शूलवर्षैर्दशाननम् ॥ ३३ ॥

तत्पश्चात् यमराजके महाबली योद्धाओंने रावणके मन्त्रियों-को छोड़कर उस दशग्रीवके ही ऊपर शूलोंकी वर्षा करते हुए धावा किया ॥ ३३ ॥

ततः शोणितदिग्धाङ्गः प्रहारैर्जर्जरीकृतः ।

फुल्लाशोक इवाभाति पुष्पके राक्षसाधिपः ॥ ३४ ॥

रावणका सारा शरीर शस्त्रोंकी मारसे जर्जर हो गया । वह खून से लथपथ हो गया और पुष्पकविमानके ऊपर फूले हुए अशोक वृक्षके समान प्रतीत होने लगा ॥ ३४ ॥

स तु शूलगदाप्रासाञ्छक्तितोमर सायकान् ।

मुसलानि शिलावृक्षान् मुमोचास्त्रबलाद् बली ॥ ३५ ॥

तब बलवान् रावणने अपने अस्त्र बलसे यमराजके सैनिकोंपर शूल, गदा, प्रास, शक्ति, तोमर, बाण, मूसल, पत्थर और वृक्षोंकी वर्षा आरम्भ की ॥ ३५ ॥

तरूणां च शिलानां च शस्त्राणां चातिदारुणम् ।

यमसैन्येषु तद् वर्षे पपात धरणीतले ॥ ३६ ॥

वृक्षों, शिलाखण्डों और शस्त्रोंकी वह अत्यन्त भयंकर वृष्टि भूतलपर खड़े हुए यमराजके सैनिकोंपर पड़ने लगी ।

तांस्तु सर्वान् विनिर्भिद्य तदस्त्रमपहत्य च ।

जघ्नुस्ते राक्षसं घोरमेकं शतसहस्रशः ॥ ३७ ॥

वे सैनिक भी सैकड़ों - हजारोंकी संख्या में एकत्र हो उसके

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श्रीमदवाल्मीकीय रामायणे १५०८ सारे आयुर्धीको छिन्न - भिन्न करके उसके द्वारा छोड़े हुए दिव्यास्त्रका भी निवारण कर एकमात्र उस भयंकर राक्षसको ही मारने लगे ॥ ३७ ॥

परिवार्य च तं सर्वे शैलं मेघोत्करा इव ।

भिन्दिपालैश्च शूलैश्च निरुछ्वासमपोथयन् ॥ ३८ ॥

जैसे बादलोंके समूह पर्वतपर सब ओरसे जलकी धाराएँ गिराते हैं, उसी प्रकार यमराजके समस्त सैनिकोंने रावणको चारों ओरसे घेरकर उसे भिन्दिपालों और शूलोंसे छेदना आरम्भ कर दिया । उसको दम लेने की भी फुरसत नहीं दी ॥

विमुक्तकवचः क्रुद्धः सिक्तः शोणितविस्रवैः ।

ततः स पुष्पकं त्यक्त्वा पृथिव्यामवतिष्ठत ॥ ३ ९ ॥

रावणका कवच कटकर गिर पड़ा । उसके शरीर से रक्तकी धारा बहने लगी । वह उस रक्तसे नहा उठा और कुपित हो पुष्पक विमान छोड़कर पृथ्वीपर खड़ा हो गया ॥ ३ ९ ॥

ततः स कार्मुकी वाणी समरे चाभिवर्धत ।

लब्धसंज्ञो मुहूर्तेन क्रुद्धस्तस्थौ यथान्तकः ॥ ४० ॥

वहाँ दो घड़ीके बाद उसने अपने - आपको सँभाला

आकर्णात् स विकृष्याथ चापमिन्द्रारिराहवे ।

मुमोच तं शरं क्रुद्धस्त्रिपुरे शंकरो यथा ॥ ४२ ॥

जैसे भगवान् शङ्करने त्रिपुरासुरपर पाशुपतास्त्रका प्रयोग किया था, उसी प्रकार उस इन्द्रद्रोही रावणने अपने धनुषको कानतक खींचकर वह बाण छोड़ दिया ॥ ४२ ॥

तस्य रूपं शरस्यासीत् सधूमज्वालमण्डलम् ।

वनं दहिष्यतो घर्मे दावाग्नेरिव मूर्च्छतः ॥ ४३ ॥

उस समय उसके बाणका रूप धूम और ज्वालाओंके मण्डलसे युक्त हो ग्रीष्म ऋतुमें जंगलको जलाने के लिये चारों ओर फैलते हुए दावानलके समान प्रतीत होने लगा ॥

ज्वालामाली स तु शरः क्रव्यादानुगतो रणे ।

मुक्तो गुल्मान् द्रुमांश्चापि भस्म कृत्वा प्रधावति ॥ ४४ ॥

रणभूमिमें ज्वालामालाओंसे घिरा हुआ वह बाण धनुष-से छूटते ही वृक्षों और झाड़ियोंको जलाता हुआ तीव्र गतिसे आगे बढ़ा और उसके पीछे - पीछे मांसाहारी जीव - जन्तु चलने लगे 11 ॥ ४४ ॥

। ते तस्य तेजसा दग्धाः सैन्या वैवस्वतस्य तु ।

इव केतवः ॥ ४५ ॥

फिर तो वह धनुष और बाण हाथमें ले बढ़े हुए उत्साह से रणे तस्मिन् निपतिता माहेन्द्रा सारे सैनिक पाशुपतास्त्र के सम्पन्न हो समराङ्गण में कुपित हुए यमराजके समान खड़ा उस युद्धस्थलमें यमराजके समान वे नीचे गिर पड़े ॥ ४५ ॥

तेजसे दग्ध हो इन्द्रध्वजके

हुआ ॥ ४० ॥ सचिवैः सार्धं राक्षसो भीमविक्रमः ।

ततः पाशुपतं दिव्यमस्त्रं संधाय कार्मुके । ततस्तु कम्पयन्निव मेदिनीम् ॥ ४६ ॥

तिष्ठ तिष्ठेति तानुक्त्वा तच्चापं व्यपकर्षत ॥ ४१ ॥ ननाद सुमहानादं मन्त्रियोंके साथ वह भयानक पराक्रमी

उसने अपने धनुषपर पाशुपत नामक दिव्य अस्त्रका तदनन्तर अपने करता हुआ - सा बड़े जोर - जोरसे सिंहनाद संधान किया और उन सैनिकोंसे ' ठहरो ठहरो ' कहते हुए राक्षस पृथ्वीको कम्पित करने लगा ॥ ४६ ॥

उस धनुषको खींचा ॥ ४१ ॥ उत्तरकाण्डे एकविंशः सर्गः ॥ २१ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये इक्कीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ २१ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्धरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें द्वाविंशः सर्गः रावण के वधके लिये उठाये हुए कालदण्डको ब्रह्माजी के यमराज और रावणका युद्ध, यमका कहने से लौटा लेना, विजयी रावणका यमलोकसे प्रस्थान तं रथम् ॥ ३ ॥

तु महानादं श्रुत्वा वैवस्वतः प्रभुः । स्थितः स च महातेजा अध्यारोहत एक दिव्य एवं विशाल रथ स तस्य मेने स्वबलस्य च संक्षयम् ॥ १ ॥ तब उनके सारथिने तत्काल विनीतभावसे खड़ा

शत्रुं विजयिनं उस वहाँ उपस्थित कर दिया और वह सामने ( अगस्त्यजी कहते हैं रघुनन्दन! ) रावणके । फिर वे महातेजस्वी यम देवता उस रथपर आरूढ़ सुनकर सूर्यपुत्र भगवान् यमने यह समझ लिया कि हो गया महानादको हुआ और मेरी सेना मारी गयी ' ॥ १ ॥ हुए ॥ ३ ॥ स्थितः ।

' शत्रु विजयी मत्वा क्रोधसंरक्तलोचनः । प्रासमुद्गरहस्तश्च मृत्युस्तस्याग्रतः ॥ ४ ॥

स हि योधान् हतान् ॥ २ ॥ येन संक्षिप्यते सर्व त्रैलोक्यमिदमव्ययम्

अब्रवीत् त्वरितः सूतं रथो मे उपनीयताम् उनके आगे प्रास और मुद्गर हाथमें लिये साक्षात् मृत्यु ' मेरे योद्धा मारे गये ' यह जानकर यमराजके नेत्र खड़े थे, | प्रवाहरूपसे सदा बने रहनेवाले इस समस्त क्रोधसे लाल हो गये और वे उतावले होकर सारथिसे बोले- देवता संहार करते हैं ॥ ४ ॥

' मेरा रथ ले आओ ' ॥ २ ॥ त्रिभुवनका पार्श्वस्थो मूर्तिमानस्य चाभवत् ।

दिव्यमुपस्थाप्य महारथम् । कालदण्डस्तु तस्य सुतस्तदा

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उत्तरकाण्डे द्वाविंशः सर्गः १५० ९ यमप्रहरणं दिव्यं तेजसा ज्वलदग्निवत् ॥ ५ ॥

उनके पार्श्वभागमें कालदण्ड मूर्तिमान् होकर खड़ा हुआ, जो उनका मुख्य एवं दिव्य आयुध है । वह अपने तेजसे अग्नि के समान प्रज्वलित हो रहा था ॥ ५ ॥

तस्य पार्श्वेषु निच्छिद्राः कालपाशाः प्रतिष्ठिताः ।

पावकस्पर्शसंकाशः स्थितो मूर्तश्च मुद्गरः ॥ ६ ॥

उनके दोनों बगलमें छिद्ररहित कालपाश खड़े थे और जिसका स्पर्श अग्निके समान दुःसह है, वह मुद्गर भी मूर्तिमान् होकर उपस्थित था ॥ ६ ॥

ततो लोकत्रयं क्षुब्धमकम्पन्त दिवौकसः ।

कालं दृष्ट्रा तथा क्रुद्धं सर्वलोकभयावहम् ॥ ७ ॥

समस्त लोकोंको भय देनेवाले साक्षात् कालको कुपित हुआ देख तीनों लोकों में हलचल मच गयी । समस्त देवता काँप उठे ॥ ७ ॥

ततस्त्वचोदयत् सूतस्तानश्वान् रुचिरप्रभान् ।

प्रययौ भीमसंनादो यत्र रक्षःपतिः स्थितः ॥ ८ ॥

तदनन्तर सारथिने सुन्दर कान्तिवाले घोड़ोंको हाँका और वह रथ भयानक आवाज करता हुआ उस स्थानपर जा पहुँचा, जहाँ राक्षसराज रावण खड़ा था ॥ ८ ॥

मुहूर्तेन यमं ते तु हया हरिहयोपमाः ।

प्रापयन् मनसस्तुल्या यत्र तत् प्रस्तुतं रणम् ॥ ९ ॥

इन्द्र के घोड़ोंके समान तेजस्वी और मनके समान शीघ्र गामी उन घोड़ोंने यमराजको क्षणभर में उस स्थानपर पहुँचा दिया, जहाँ वह युद्ध चल eg तथैव विकृतं सचिवा राक्षसेन्द्रस्य मृत्युदेवताके साथ राक्षसराज के सचिव सहसा लघुसत्त्वतया ते हि नेह योद्धुं समर्थाः स्म रहा था ॥ ९ ॥

रथं मृत्युसमन्वितम् ।

सहसा विप्रदुद्रुवुः ॥ १० ॥

उस विकराल रथको आया देख वहाँसे भाग खड़े हुए ॥ १० ॥

नष्टसंज्ञा भयार्दिताः ।

इत्युक्त्वा प्रययुर्दिशः ॥ ११ ॥

उनकी शक्ति थोड़ी थी । इसलिये वे भयसे पीड़ित हो अपना होश - हवाश खो बैठे और ' हम यहाँ युद्ध करनेमें समर्थ नहीं हैं ' ऐसा कहकर विभिन्न दिशाओंमें भाग गये ॥ ११ ॥

स तु तं तादृशं दृष्ट्वा रथं लोकभयावहम् ।

नाक्षुभ्यत दशग्रीवो न चापि भयमाविशत् ॥ १२ ॥

परंतु समस्त संसारको भयभीत करनेवाले वैसे विकराल रथको देखकर भी दशग्रीवके मनमें न तो क्षोभ हुआ और भय ही ॥ १२ ॥

स तु रावणमासाद्य व्यसृजच्छक्तितोमरान् ।

यमो मर्माणि संक्रुद्धो रावणस्य न्यकृन्तत ॥ १३ ॥

अत्यन्त क्रोधसे भरे हुए यमराजने रावणके पास पहुँच कर शक्ति और तोमरोंका प्रहार किया तथा रावणके मर्मस्थानों-को छेद डाला ॥ १३ ॥

रावणस्तु ततः स्वस्थः शरवर्षे मुमोच ह ।

तस्मिन् वैवस्वतरथे तोयवर्षमिवाम्बुदः ॥ १४ ॥

तब रावणने भी सँभलकर यमराजके रथपर बाणोंकी झड़ी लगा दी, मानो मेघ जलकी वर्षा कर रहा हो ॥ १४ ॥

ततो महाशक्तिशतैः पात्यमानैर्महोरसि ।

नाशक्नोत् प्रतिकर्तुं स राक्षसः शल्यपीडितः ॥ १५ ॥

तदनन्तर उसकी विशाल छातीपर सैकड़ों महाशक्तियों की मार पड़ने लगी । वह राक्षस शल्यों के प्रहारसे इतना पीड़ित हो चुका था कि यमराजसे बदला लेने में समर्थ न हो सका ॥ १५ ॥

एवं नानाप्रहरणैर्यमेनामित्रकर्षिणा 1 सप्तरात्रं कृतः संख्ये विसंज्ञो विमुखो रिपुः ॥ १६ ॥

इस प्रकार शत्रुसूदन यमने नाना प्रकारके अस्त्र - शस्त्रका प्रहार करते हुए रणभूमिमें लगातार सात रातोंतक युद्ध किया । इससे उनका शत्रु रावण अपनी सुध - बुध खोकर युद्ध से विमुख हो गया ॥ १६ ॥

तदाऽऽसीत् तुमुलं युद्धं यमराक्षसयोर्द्वयोः ।

जयमाकाङ्क्षतोवर समरेष्वनिवर्तिनोः ॥ १७ ॥

वीर रघुनन्दन! वे दोनों योद्धा समरभूमिसे पीछे हटनेवाले नहीं थे और दोनों ही अपनी विजय चाहते थे; इसलिये उन यमराज और राक्षस दोनोंमें उस समय घोर युद्ध होने लगा ॥ १७ ॥

ततो देवाः सगन्धर्वाः सिद्धाश्च परमर्षयः ।

प्रजापति पुरस्कृत्य समेतास्तद्रणाजिरे ॥ १८ ॥

तब देवता, गन्धर्व, सिद्ध और महर्षिगण प्रजापतिको आगे करके उस समराङ्गणमें एकत्र हुए ॥ १८ ॥

संवर्त इव लोकानां युध्यतोरभवत् तदा ।

राक्षसानां च मुख्यस्य प्रेतानामीश्वरस्य च ॥ १ ९ ॥

उस समय राक्षसोंके राजा रावण तथा प्रेतराज यमके युद्ध-परायण होनेपर समस्त लोकोंके प्रलयका समय उपस्थित हुआ-सा जान पड़ता था ॥ १ ९ ॥

राक्षसेन्द्रोऽपि विस्फार्य चापमिन्द्राशनिप्रभम् ।

निरन्तरमिवाकाशं कुर्वन् वाणांस्ततोऽसृजत् ॥ २० ॥

राक्षसराज रावण भी इन्द्रकी अशनिके सदृश अपने धनुषको खींचकर बाणोंकी वर्षा करने लगा, इससे आकाश ठसाठस भर गया -- उसमें तिलभर भी खाली जगह नहीं रह गयी ॥ २० ॥

मृत्युं चतुर्भिर्विशिखैः सूतं सप्तभिरार्दयत् ।

यमं शतसहस्रेण शीघ्रं मर्मस्वताडयत् ॥ २१ ॥

उसने चार बाण मारकर मृत्युको और सात बाणसे यमके सारथिको भी पीड़ित कर दिया । फिर जल्दी - जल्दी लाख बाण मारकर यमराजके मर्मस्थानों में गहरी चोट पहुँचायी ॥ ततः क्रुद्धस्य वदनाद् यमस्य समजायत ।

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१५१० श्रीमद्वाल्मीकीय रामायणे ज्वालामाली सनिःश्वासः सधूमः कोपपावकः ॥ २२ ॥

तब यमराज क्रोधकी सीमा न रही । उनके मुखसे वह रोष अग्नि बनकर प्रकट हुआ । वह आग ज्वाला - मालाओंसे मण्डित, श्वासवायुसे संयुक्त तथा धूमसे आच्छन्न दिखायी देती थी ॥ २२ ॥

म दृष्ट्वा देवदानवसंनिधौ ।

प्रहर्षितौ सुसंरब्धौ मृत्युकालौ बभूवतुः ॥ २३ ॥

देवताओं तथा दानवोंके समीप यह आश्चर्यजनक घटना देखकर रोषावेशसे भरे हुए मृत्यु एवं कालको बड़ा हर्ष हुआ २३

ततो मृत्युः क्रुद्धतरो वैवस्वतमभाषत ।

मुञ्च मां समरे यावद्धन्मीमं पापराक्षसम् ॥ २४ ॥

तत्पश्चात् मृत्युदेवने अत्यन्त कुपित होकर वैवस्वत यमसे कहा - ' आप मुझे छोड़िये - आज्ञा दीजिये, मैं समराङ्गण में इस पापी राक्षसको अभी मारे डालता हूँ ॥ २४ ॥

नैषा रक्षो भवेदद्य मर्यादा हि निसर्गतः ।

हिरण्यकशिपुः श्रीमान् नमुचिः शम्बरस्तथा ॥ २५ ॥

निसन्दिधूमकेतुश्च बलिर्वैरोचनोऽपि च ।

शम्भुर्दैत्यो महाराजो वृत्रो वाणस्तथैव च ॥ २६ ॥

राजर्षयः शास्त्रविदो गन्धर्वाः समहोरगाः ।

ऋषयः पन्नगा दैत्या यक्षाश्च हाप्सरोगणाः ॥ २७ ॥

युगान्तपरिवर्ते च पृथिवी समहार्णवा ।

क्षयं नीता महाराज सपर्वतसरिद्भुमा ॥ २८ ॥

एते चान्ये च बहवो बलवन्तो दुरासदाः ।

विनिपन्ना मया दृष्टाः किमुतायं निशाचरः ॥ २ ९ ॥

' महाराज! यह मेरी स्वभावसिद्ध मर्यादा है कि मुझसे भिड़कर यह राक्षस जीवित नहीं रह सकता । श्रीमान् हिरण्य कशिपु, नमुचि, शम्बर, निसन्दि, धूमकेतु, विरोचनकुमार बलि, शम्भुनामक दैत्य, महाराज वृत्र तथा बाणासुर, कितने ही शास्त्रवेत्ता राजर्षि, गन्धर्व, बड़े - बड़े नाग, ऋषि, सर्प, दैत्य, यक्ष, अप्सराओंके समुदाय, युगान्तकालमें समुद्रों, पर्वतों, सरिताओं और वृक्षोंसहित पृथ्वी – ये सब मेरे द्वारा क्षयको प्राप्त हुए हैं । ये तथा दूसरे बहुतेरे बलवान् एवं दुर्जय वीर भी मेरे द्वारा विनाशको प्राप्त हो चुके हैं, फिर यह निशाचर किस गिनती में है १ ॥ २५-२९ ॥

मुञ्च मां साधु धर्मश यावदेनं निहन्म्यहम् ।

नहि कश्चिन्मया दृष्टो बलवानपि जीवति ॥ ३० ॥

' धर्मज्ञ! आप मुझे छोड़ दीजिये । मैं इसे अवश्य मार डालूँगा । जिसे मैं देख लूँ, वह कोई बलवान् होनेपर भी जीवित नहीं रह सकता ॥ ३० ॥

बलं मम न खल्वेतन्मर्यादेषा निसर्गतः ।

स दृष्टो न मया काल मुहूर्तमपि जीवति ॥ ३१ ॥

अपने बलको प्रकाशित करना मात्र नहीं है; अपितु यह स्वभावसिद्ध मर्यादा है ' ॥ ३१ ॥

तस्यैवं वचनं श्रुत्वा धर्मराजः प्रतापवान् ।

अब्रवीत् तत्र तं मृत्युं त्वं तिष्ठैनं निहन्म्यहम् ॥ ३२ ॥

मृत्युकी यह बात सुनकर प्रतापी धर्मराजने उससे कहा-' तुम ठहरो, मैं ही इसे मारे डालता हूँ ' ॥ ३२ ॥

ततः संरक्तनयनः क्रुद्धो वैवस्वतः प्रभुः ।

कालदण्डममोघं तु तोलयामास पाणिना ॥ ३३ ॥

तदनन्तर क्रोधसे लाल आँखें करके सामर्थ्यशाली वैवस्वत यमने अपने अमोघ कालदण्डको हाथसे उठाया ॥ ३३ ॥

यस्य पाश्र्वेषु निहिताः कालपाशाः प्रतिष्ठिताः ।

पावकाशनिसंकाशो मुद्गरो मूर्तिमान् स्थितः ॥ ३४ ॥

उस कालदण्डके पार्श्वभागों में कालपाश प्रतिष्ठित थे और वज्र एवं अग्नितुल्य तेजस्वी मुगर भी मूर्तिमान् होकर स्थित था ॥३४ ॥

दर्शनादेव यः प्राणान् प्राणिनामपि कर्षति ।

किं पुनः स्पृशमानस्य पात्यमानस्य वा पुनः ॥ ३५ ॥

वह कालदण्ड दृष्टिमें आनेमात्रसे प्राणियोंके प्राणोंका अपहरण कर लेता था । फिर जिससे उसका स्पर्श हो जाय अथवा जिसके ऊपर उसकी मार पड़े, उस पुरुषके प्राणोंका संहार करना उसके लिये कौन बड़ी बात है १ ॥ ३५ ॥

स ज्वालापरिवारस्तु निर्दहन्निव राक्षसम् ।

तेन स्पृष्टो बलवता महाप्रहरणोऽस्फुरत् ॥ ३६ ॥

ज्वालाओंसे घिरा हुआ वह कालदण्ड उस राक्षसको दग्ध - सा कर देने के लिये उद्यत था । बलवान् यमराजके हाथमें लिया हुआ वह महान् आयुध अपने तेजसे प्रकाशित हो उठा ॥ ३६ ॥

ततो विदुद्रुवुः सर्वे तस्मात् त्रस्ता रणाजिरे ।

सुराश्च क्षुभिताः सर्वे दृष्ट्रा दण्डोद्यतं यमम् ॥ ३७ ॥

उसके उठते ही समराङ्गणमें खड़े हुए समस्त सैनिक भयभीत होकर भाग चले । कालदण्ड उठाये यमराजको देखकर समस्त देवता भी क्षुब्ध हो उठे ॥ ३७ ॥

तस्मिन् प्रहर्तुकामे तु यमे दण्डेन रावणम् ।

यमं पितामहः साक्षाद् दर्शयित्वेदमब्रवीत् ॥ ३८ ॥

यमराज उस दण्डसे रावणपर प्रहार करना ही चाहते थे कि साक्षात् पितामह ब्रह्मा वहाँ आ पहुँचे । उन्होंने दर्शन देकर इस प्रकार कहा- ॥ ३८ ॥

वैवस्वत महाबाहो न खल्वमितविक्रम ।

न हन्तव्यस्त्वयैतेन दण्डेनैष निशाचरः ॥ ३ ९ ॥

' अमित पराक्रमी महाबाहु वैवस्वत! तुम इस कालदण्डके द्वारा निशाचर रावणका वध न करो ॥ ३ ९ ॥ वरः खलु मयैतस्मै दत्तस्त्रिदशपुङ्गव । ' काल! मेरी दृष्टि पड़नेपर वह रावण दो घड़ी भी जीवन सत्वया नानृतः कार्यों यन्मया व्याहृतं वचः ॥ ४० ॥

धारण नहीं कर सकेगा । मेरे इस कथनका तात्पर्य केवल ' देवप्रवर! मैंने इसे देवताओंद्वारा न मारे जा सकनेका

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उत्तरकाण्डे त्रयोविंशः सर्गः १५११ वर दिया है । मेरे मुँहसे जो बात निकल चुकी है, उसे तुम्हें असत्य नहीं करना चाहिये ॥ ४० ॥

यो हि मामनृतं कुर्याद् देवो वा मानुषोऽपि वा ।

त्रैलोक्यमनृतं तेन कृतं स्यान्नात्र संशयः ॥ ४१ ॥

' जो देवता अथवा मनुष्य मुझे असत्यवादी बना देगा, उसे समस्त त्रिलोकीको मिथ्याभाषी बनानेका दोष लगेगा, इसमें संशय नहीं है ॥ ४१ ॥

क्रुद्धेन विप्रमुकोऽयं निर्विशेषं प्रियाप्रिये ।

प्रजाः संहरते रौद्रो लोकत्रयभयावहः ॥ ४२ ॥

' यह कालदण्ड तीनों लोकोंके लिये भयंकर तथा रौद्र है । तुम्हारे द्वारा क्रोधपूर्वक छोड़ा जानेपर यह प्रिय और अप्रिय जनोंमें भेदभाव न रखता हुआ सामने पड़ी हुई समस्त प्रजाका संहार कर डालेगा ॥ ४२ ॥

अमोघो ह्येष सर्वेषां प्राणिनाममितप्रभः ।

कालदण्डो मया सृष्टः पूर्व मृत्युपुरस्कृतः ॥ ४३ ॥

" इस अमित तेजस्वी कालदण्डको भी पूर्वकालमें मैंने ही बनाया था । यह किसी भी प्राणीपर व्यर्थ नहीं होता है । इसके प्रहारसे सबकी मृत्यु हो जाती है ॥ ४३ ॥

तन्न खल्वेष ते सौम्य पात्यो रावणमूर्धनि ।

नह्यस्मिन् पतिते कश्चिन्मुहूर्तमपि जीवति ॥ ४४ ॥

' अतः सौम्य! तुम इसे रावणके मस्तकपर न गिराओ । इसकी मार पड़ने पर कोई एक मुहूर्त भी जीवित नहीं रह सकता ॥ ४४ ॥

यदि ह्यस्मिन् निपतिते न म्रियेतैष राक्षसः ।

म्रियते वा दशग्रीवस्तदाप्युभयतोऽनृतम् ॥ ४५ ॥

' कालदण्ड पड़ने पर यदि यह राक्षस रावण न मरा तो अथवा मर गया तो — दोनों ही दशाओंमें मेरी बात असल्य होगी ॥ ४५ ॥

तन्निवर्तय लङ्केशाद् दण्डमेतं समुद्यतम् ।

सत्यं च मां कुरुष्वाद्य लोकांस्त्वं यद्यवेक्षसे ॥ ४६ ॥

‘ इसलिये हाथमें उठाये हुए इस कालदण्डको तुम लङ्का-पति रावणकी ओरसे हटा लो । यदि समस्त लोकोंपर तुम्हारी दृष्टि है तो आज रावणकी रक्षा करके मुझे सत्यवादी बनाओ ' ॥ ४६ ॥

एवमुक्तस्तु धर्मात्मा प्रत्युवाच यमस्तदा ।

एष व्यावर्तितो दण्डः प्रभविष्णुर्हि नो भवान् ॥ ४७ ॥

ब्रह्माजीके ऐसा कहनेपर धर्मात्मा यमराजने उत्तर दिया-' यदि ऐसी बात है तो लीजिये मैंने इस दण्डको हटा लिया । आप हम सब लोगोंके प्रभु हैं ( अतः आपकी आज्ञाका पालन करना हमारा कर्तव्य है ) ॥ ४७ ॥

किं त्विदानीं मया शक्यं कर्तुं रणगतेन हि ।

न मया यद्ययं शक्यो हन्तुं वरपुरस्कृतः ॥ ४८ ॥

' परंतु वरदानसे युक्त होने के कारण यदि मेरे द्वारा इस निशाचरका वध नहीं हो सकता तो इस समय इसके साथ युद्ध करके ही मैं क्या करूँगा? ॥ ४८ ॥

एष तस्मात् प्रणश्यामि दर्शनादस्य रक्षसः ।

इत्युक्त्वा सरथः साश्वस्तत्रैवान्तरधीयत ॥ ४ ९ ॥

" इसलिये अब मैं इसकी दृष्टिसे ओझल होता हूँ ' कह-कर यमराज रथ और घोड़ोंसहित वहीं अन्तर्धान हो गये । ४ ९ |

दशग्रीवस्तु तं जित्वा नाम विश्राव्य चात्मनः ।

आरुह्य पुष्पकं भूयो निष्क्रान्तो यमसादनात् ॥ ५० ॥

इस प्रकार यमराजको जीतकर अपने नामकी घोषणा करके दशग्रीव रावण पुष्पकविमानपर आरूढ़ हो यमलोक से चला गया ॥ ५० ॥

स तु वैवस्वतो देवैः सह ब्रह्मपुरोगमैः ।

जगाम त्रिदिवं हृष्टो नारदश्च महामुनिः ॥ ५१ ॥

तदनन्तर सूर्यपुत्र यमराज तथा महामुनि नारदजी ब्रह्मा आदि देवताओंके साथ प्रसन्नतापूर्वक स्वर्गमें गये ॥ ५१ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये उत्तरकाण्डे द्वाविंशः सर्गः ॥ २२ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें बाईसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ २२ ॥

त्रयोविंशः सर्गः रावणके द्वारा निवातकवचोंसे मैत्री, कालकेयोंका वध तथा वरुणपुत्रोंकी पराजय

ततो जित्वा दशग्रीवो यमं त्रिदशपुङ्गवम् ।

रावणस्तु रणश्लाघी खसहायान् ददर्श ह ॥ १ ॥

( अगस्त्यजी कहते हैं — रघुनन्दन! ) देवेश्वर यमको पराजित करके युद्धका हौसला रखनेवाला दशग्रीव रावण अपने सहायकों से मिला ॥ १ ॥

ततो रुधिरसिक्ताङ्गं प्रहारैर्जर्जरीकृतम् ।

रावणं राक्षसा दृष्ट्वा विस्मयं समुपागमन् ॥ २ ॥

उसके सारे अङ्ग रक्तसे नहा उठे थे और प्रहारोंसे जर्जर हो गये थे । इस अवस्थामें रावण को देखकर उन राक्षसोंको बड़ा विस्मय हुआ ॥ २ ॥

जयेन वर्धयित्वा च मारीचप्रमुखास्ततः ।

पुष्पकं भेजिरे सर्वे सान्विता रावणेन तु ॥ ३ ॥

' महाराजकी जय हो ' ऐसा कहकर रावणकी अभ्युदय-कामना करके वे मारीच आदि सब राक्षस पुष्पक विमानपर बैठे । उस समय रावणने उन सबको सान्त्वना दी ॥ ३ ॥

ततो रसातलं रक्षः प्रविष्टः पयसां निधिम् दैत्योरगगणाभ्युष्टं वरुणेन सुरक्षितम् ॥ ४ ॥

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श्रीमद्वाल्मीकीय रामायणे १५१२ तदनन्तर वह राक्षस रसातलमें जानेकी इच्छासे दैत्यों और नागोसे सेवित तथा वरुणके द्वारा सुरक्षित जलनिधि समुद्र में प्रविष्ट हुआ ॥ ४ ॥

स तु भोगवतीं गत्वा पुरीं वासुकिपालिताम् ।

कृत्वा नागान् वशे हृष्टो ययो मणिमयीं पुरीम् ॥ ५ ॥

नागराज वासुकिद्वारा पालित भोगवती पुरीमें प्रवेश करके उसने नागोंको अपने वशमें कर लिया और वहाँसे हर्ष-पूर्वक मणिमयी पुरीको प्रस्थान किया ॥ ५ ॥

निवातकवचास्तत्र दैत्या लब्धवरा वसन् ।

राक्षसस्तान् समागम्य युद्धाय समुपाह्वयत् ॥ ६ ॥

उसमें निवातकवच नामक दैत्य रहते थे, जिन्हें ब्रह्माजीसे उत्तम वर प्राप्त थे । उस राक्षसने वहाँ जाकर उन सबको युद्ध के लिये ललकारा ॥ ६ ॥

ते तु सर्वे सुविक्रान्ता दैतेया बलशालिनः ।

प्रहृष्टा युद्धदुर्मदाः ॥ ७ ॥

नानाप्रहरणास्तत्र वे सब दैत्य बड़े पराक्रमी और बलशाली थे । नाना प्रकारके अस्त्र - शस्त्र धारण करते थे तथा युद्धके लिये सदा उत्साहित एवं उन्मत्त रहते थे ॥ ७ ॥

शूलैस्त्रिशूलैः कुलिशैः पट्टिशासिपरश्वधैः ।

अन्योन्यं बिभिदुः क्रुद्धा राक्षसा दानवास्तथा ॥ ८ ॥

उनका राक्षसों के साथ युद्ध आरम्भ हो गया । वे राक्षस और दानव कुपित हो एक दूसरेको शूल, त्रिशूल, वज्र, पट्टिश, खड्ग और फरसोंसे घायल करने लगे ॥ ८ ॥

तेषां तु युध्यमानानां साग्रः संवत्सरो गतः ।

न चान्यतरतस्तत्र विजयो वा क्षयोऽपि वा ॥ ९ ॥

उनके युद्ध करते हुए एक वर्ष से अधिक समय व्यतीत हो गया; किंतु उनमें से किसी भी पक्षकी विजय या पराजय नहीं हुई ॥ ९ ॥

ततः पितामहस्तत्र त्रैलोक्यगतिरव्ययः ।

आजगाम द्रुतं देवो विमानवरमास्थितः ॥ १० ॥

" ( तुम दोनों में वरदानजनित शक्ति एक - सी है ) इसलिये मुझे तो यह अच्छा लगता है कि तुमलोगों के साथ इस राक्षस-की मैत्री हो जाय; क्योंकि सुहृदोंके सभी अर्थ ( भोग्य-पदार्थ ) एक दूसरे के लिये समान होते हैं – पृथक् - पृथक् बँटे नहीं रहते हैं । निःसंदेह ऐसी ही बात है ' ॥ १३ ॥

ततोऽग्निसाक्षिकं सख्यं कृतवांस्तत्र रावणः ।

निवातकवचैः सार्धं प्रीतिमानभवत् तदा ॥ १४ ॥

तब वहाँ रावणने अग्निको साक्षी बनाकर निवातकवचोंके

साथ मित्रता कर ली । इससे उसको बड़ी प्रसन्नता हुई ॥ १४ ॥

अर्चितस्तैर्यथान्यायं संवत्सरमथोषितः ।

स्वपुरान्निर्विशेषं च प्रियं प्राप्तो दशाननः ॥ १५ ॥

फिर निवातकवचसे उचित आदर पाकर वह एक वर्ष-तक वहीं टिका रहा । उस स्थानपर दशाननको अपने नगरके समान ही प्रिय भोग प्राप्त हुए ॥ १५ ॥

तत्रोपधार्य मायानां शतमेकं समाप्तवान् ।

सलिलेन्द्रपुरान्वेषी भ्रमति स्म रसातलम् ॥ १६ ॥

उसने निवातकवचोंसे सौ प्रकारकी मायाओंका ज्ञान प्राप्त किया । उसके बाद वह वरुणके नगरका पता लगाता हुआ रसातल में सब ओर घूमने लगा ॥ १६ ॥

ततोऽश्मनगरं नाम कालकेयैरधिष्ठितम् ।

गत्वा तु कालकेयांश्च हत्वा तत्र बलोत्कटान् ॥ १७ ॥

शूर्पणख्याश्च भर्तारमसिना प्राच्छिनत् तदा ।

श्यालं च बलवन्तं च विधुजिहं बलोत्कटम् ॥ १८ ॥

जिह्वया संलिहन्तं च राक्षसं समरे तदा । घूमते - घूमते वह अश्मनामक नगर में जा पहुँचा, जहाँ कालकेय नामक दानव निवास करते थे । कालकेय बड़े बलवान् थे ॥ रावणने वहाँ उन सबका संहार करके शूर्पणखा-के पति उत्कट बलशाली अपने बहनोई महाबली विद्युजिह्वको, जो उस राक्षसको समराङ्गण में चाट जाना चाहता था, तलवार-तब त्रिभुवनके आश्रयभूत अविनाशी पितामह भगवान् से काट डाला ॥ १७-१८३ ॥ ब्रह्मा एक उत्तम विमानपर बैठकर वहाँ शीघ्र आये ॥ १० ॥

निवातकवचानां तु निवार्य रणकर्म तत् ।

वृद्धः पितामहो वाक्यमुवाच विदितार्थवत् ॥ ११ ॥

बूढ़े पितामहने निवातकवचोंके उस युद्ध कर्मको रोक दिया और उनसे स्पष्ट शब्दों में यह बात कही ॥ ११ ॥

नायं रावणो युद्धे शक्यो जेतुं सुरासुरैः ।

न भवन्तः क्षयं नेतुमपि सामरदानवैः ॥ १२ ॥

' दानवो! समस्त देवता और असुर मिलकर भी युद्ध में इस रावणको परास्त नहीं कर सकते । इसी तरह समस्त तं विजित्य मुहूर्तेन जघ्ने दैत्यांश्चतुःशतम् ॥ १ ९ ॥

ततः पाण्डुरमेघाभं कैलासमिव भाखरम् ।

दिव्यमपश्यद् राक्षसाधिपः ॥ २० ॥

वरुणस्यालयं उसे परास्त करके रावण ने दो ही घड़ीमें चार सौ दैत्यों-को मौत के घाट उतार दिया । तत्पश्चात् उस राक्षसराजने वरुणका दिव्य भवन देखा, जो श्वेत बादलोंके समान उज्ज्वल और कैलास पर्वत के समान प्रकाशमान था ॥ १ ९ -२० ॥

क्षरन्तीं च पयस्तत्र सुरभिं गामवस्थिताम् ।

सागरः ॥ २१ ॥

देवता और दानव एक साथ आक्रमण करें तो भी वे तुम यस्याः पयोऽभिनिष्पन्दात् क्षीरोदो नाम का संहार नहीं कर सकते ॥ १२ ॥ वहीं सुरभि नामकी गौ भी खड़ी थी, जिसके थनोंसे दूध

लोगों च भवद्भिः सह रोचते । झर रहा था । कहते हैं, सुरभिके ही दूधकी धारासे क्षीरसागर राक्षसस्य सखित्वं अविभक्ताश्च सर्वार्थाः सुहृदां नात्र संशयः ॥ १३ ॥ भरा हुआ है ॥ २१ ॥

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उत्तरकाण्डे त्रयोविंशः सर्गः १५१३

ददर्श रावणस्तत्र गोवृषेन्द्रवरारणिम् ।

यस्माच्चन्द्रः प्रभवति शीतरश्मिर्निशाकरः ॥ २२ ॥

रावणने महादेवजीके वाहनभूत महावृषभकी जननी सुरभिदेवीका दर्शन किया, जिससे शीतल किरणोंवाले निशाकर चन्द्रमाका प्रादुर्भाव हुआ है ( सुरभिसे क्षीरसमुद्र और क्षीरसमुद्रसे चन्द्रमाका आविर्भाव हुआ है ) ॥ २२ ॥

यं समाश्रित्य जीवन्ति फेनपाः परमर्षयः ।

अमृतं यत्र चोत्पन्नं स्वधा च स्वधभोजिनाम् ॥ २३ ॥

उन्हीं चन्द्रदेवके उत्पत्तिस्थान क्षीरसमुद्रका आश्रय लेकर फेन पीनेवाले महर्षि जीवन धारण करते हैं । उस क्षीर-सागरसे ही सुधा तथा स्वधाभोजी पितरोंकी स्वधा प्रकट हुई है ॥ २३ ॥

यां ब्रुवन्ति नरा लोके सुरभिं नाम नामतः ।

प्रदक्षिणं तु तां कृत्वा रावणः परमाद्भुताम् ।

प्रविवेश महाघोरं गुप्तं बहुविधैर्बलैः ॥ २४ ॥

लोकमें जिनको सुरभि नामसे पुकारा जाता है, उन परम अद्भुत गोमाताकी परिक्रमा करके रावणने नाना प्रकारकी सेनाओंसे सुरक्षित महाभयंकर वरुणालय में प्रवेश किया ॥ २४ ॥

ततो धाराशताकीर्ण शारदाभ्रनिभं तदा ।

नित्यप्रहृष्टं ददृशे वरुणस्य गृहोत्तमम् ॥ २५ ॥

वहाँ प्रवेश करके उसने वरुणके उत्तम भवनको देखा, जो सदा ही आनन्दमय उत्सवसे परिपूर्ण, अनेक जलधाराओं ( फौवारों ) से व्याप्त तथा शरत्कालके बादलोंके समान उज्ज्वल था ॥ २५ ॥

ततो हत्वा बलाध्यक्षान् समरे तैश्च ताडितः ।

अब्रवीच ततो योधान् राजा शीघ्रं निवेद्यताम् ॥ २६ ॥

तदनन्तर वरुणके सेनापतियोंने समरभूमिमें रावणपर प्रहार किया । फिर रावणने भी उन सबको घायल करके वहाँके योद्धाओंसे कहा – ' तुमलोग राजा वरुणसे शीघ्र जाकर मेरी यह बात कहो - ॥ २६ ॥

युद्धार्थी रावणः प्राप्तस्तस्य युद्धं प्रदीयताम् ।

वद वा न भयं तेऽस्ति निर्जितोऽस्मीति साञ्जलिः ॥२७ ॥

' राजन्! राक्षसराज रावण युद्ध के लिये आया है, आप चलकर उससे युद्ध कीजिये अथवा हाथ जोड़कर अपनी पराजय स्वीकार कीजिये । फिर आपको कोई भय नहीं रहेगा ' ॥ २७ ॥

एतस्मिन्नन्तरे क्रुद्धा वरुणस्य महात्मनः ।

पुत्राः पौत्राश्च निष्क्रामन् गौश्च पुष्कर एव च ॥ २८ ॥

इसी बीचमें सूचना पाकर महात्मा वरुणके पुत्र और पौत्र क्रोधसे भरे हुए निकले । उनके साथ ' गौ ' और ' पुष्कर ' नामक सेनाध्यक्ष भी थे ॥ २८ ॥

ते तु तत्र गुणोपेता बलैः परिवृताः स्वकैः ।

युक्त्वा रथान् कामगमानुधद्भास्करवर्चसः ॥ २ ९ ॥

वा ० रा ० ५.११.१०-वे सब - के - सब सर्वगुणसम्पन्न तथा उगते हुए सूर्य तुल्य तेजस्वी थे । इच्छानुसार चलनेवाले रथोंपर आरूढ़ हो अपनी सेनाओंसे घिरकर वे वहाँ युद्धस्थलमें आये ॥ २ ९ ॥

ततो युद्धं समभवद् दारुणं रोमहर्षणम् ।

सलिलेन्द्रस्य पुत्राणां रावणस्य च धीमतः ॥ ३० ॥

फिर तो वरुण के पुत्रों और बुद्धिमान् रावण में बड़ा भयंकर युद्ध छिड़ गया, जो रोंगटे खड़े कर देनेवाला था ।

अमात्यैश्च महावीर्यैर्दशग्रीवस्य रक्षसः ।

वारुणं तद् बलं सर्व क्षणेन विनिपातितम् ॥ ३१ ॥

राक्षस दशग्रीवके महापराक्रमी मन्त्रियोंने एक ही क्षणमें वरुणकी सारी सेनाको मार गिराया ॥ ३१ ॥

समीक्ष्य स्वबलं संख्ये वरुणस्य सुतास्तदा ।

अर्दिताः शरजालेन निवृत्ता रणकर्मणः ॥ ३२ ॥

युद्धमें अपनी सेनाकी यह अवस्था देख वरुणके पुत्र उस समय बाण - समूहोंसे पीड़ित होनेके कारण कुछ देरके लिये युद्ध - कर्मसे हट गये ॥ ३२ ॥

महीतलगतास्ते तु रावणं दृश्य पुष्पके ।

आकाशमाशु विविशुः स्यन्दनैः शीघ्रगामिभिः ॥ ३३ ॥

भूतलपर स्थित होकर उन्होंने जब रावणको पुष्पक विमानपर बैठा देखा, तब वे भी शीघ्रगामी रथोंद्वारा तुरंत ही आकाशमें जा पहुँचे ॥ ३३ ॥

महदासीत् ततस्तेषां तुल्यं स्थानमवाप्य तत् ।

आकाशयुद्धं तुमुलं देवदानवयोरिव ॥ ३४ ॥

अब बराबरका स्थान मिल जानेसे रावणके साथ उनका भारी युद्ध छिड़ गया । उनका वह आकाश - युद्ध देव - दानव-संग्राम के समान भयंकर जान पड़ता था ॥ ३४ ॥

ततस्ते रावणं युद्धे शरैः पावकसंनिभैः ।

विमुखीकृत्य संहृष्टा विनेदुर्विविधान् रवान् ॥ ३५ ॥

उन वरुण पुत्रोंने अपने अग्नितुल्य तेजस्वी बाणोंद्वारा युद्धस्थलमें रावणको विमुख करके बड़े हर्ष के साथ नाना प्रकारके स्वरोंमें महान् सिंहनाद किया ॥ ३५ ॥

ततो महोदरः क्रुद्धो राजानं वीक्ष्य धर्षितम् ।

त्यक्त्वा मृत्युभयं वीरो युद्धाकाङ्गी व्यलोकयत् ॥ ३६ ॥

राजा रावणको तिरस्कृत हुआ देख महोदरको बड़ा क्रोध हुआ । उसने मृत्युका भय छोड़कर युद्धकी इच्छासे वरुण-पुत्रोंकी ओर देखा ॥ ३६ ॥

तेन ते वारुणा युद्धे कामगाः पवनोपमाः ।

महोदरेण गदया हयास्ते प्रययुः क्षितिम् ॥ ३७ ॥

वरुणके घोड़े युद्धमें हवासे बातें करनेवाले थे और स्वामीकी इच्छा के अनुसार चलते थे । महोदरने उनपर गदासे आघात किया । गदाकी चोट खाकर वे घोड़े धराशायी हो गये ॥ ३७ ॥

तेषां वरुणसूनूनां हत्वा योधान् हयांश्च तान् ।

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वाल्मीकि रामायण — खण्ड २, पृष्ठ 729 का मूल पृष्ठ
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श्रीमद्वाल्मीकीय रामायणे १५१४ मुमोचाशु महानादं विरथान् प्रेक्ष्य तान् स्थितान् ॥ ३८ ॥

वरुण पुत्रों के योद्धाओं और घोड़ोंको मारकर उन्हें रथ-हीन हुआ देख महोदर तुरंत ही जोर - जोर से गर्जना करने लगा । ते तु तेषां रथाः साश्वाः सह सारथिभिर्वरैः ॥ महोदरेण निहताः पतिताः पृथिवीतले ॥ ३ ९ ॥ महोदरकी गदाके आधातसे वरुण - पुत्रोंके वे रथ घोड़ों और श्रेष्ठ सारथियों सहित चूर - चूर हो पृथ्वीपर गिर पड़े॥३९ ॥

ते तु त्यक्त्वा रथान् पुत्रा वरुणस्य महात्मनः ।

आकाशे विष्ठिताः शूराः स्वप्रभावान्न विव्यथुः ॥ ४० ॥

महात्मा वरुणके वे शूरवीर पुत्र उन रथोंको छोड़कर अपने ही प्रभावसे आकाशमें खड़े हो गये । उन्हें तनिक भी व्यथा नहीं हुई ॥ ४० ॥

धनूंषि कृत्वा सज्जानि विनिर्भिद्य महोदरम् ।

रावणं समरे क्रुद्धाः सहिताः समवारयन् ॥ ४१ ॥

उन्होंने धनुषोंपर प्रत्यञ्चा चढ़ायी और महोदरको क्षत-विक्षत करके एक साथ कुपित हो रावणको घेर लिया ॥४१ ॥

सायकैश्चापवि भ्रष्टैर्वज्रकल्पैः सुदारुणैः ।

दारयन्ति स्म संक्रुद्धा मेघा इव महागिरिम् ॥ ४२ ॥

फिर वे अत्यन्त कुपित हो किसी महान् पर्वतपर जलकी धारा गिरानेवाले मेत्रोंके समान धनुषसे छूटे हुए बज्र - तुल्य भयंकर सायकों द्वारा रावणको विदीर्ण करने लगे ॥ ४२ ॥

ततः क्रुद्धो दशग्रीवः कालाग्निरिव मूर्चिछतः ।

शरवर्ष महाघोरं तेषां मर्मपातयत् ॥ ४३ ॥

यह देख दशग्रीव प्रलयकालकी अग्निके समान रोषसे प्रज्वलित हो उठा और उन वरुण पुत्रोंके मर्मस्थानों पर महा-घोर बाणोंकी वर्षा करने लगा ॥ ४३ ॥

मुसलानि विचित्राणि ततो भल्लशतानि च ।

पट्टिशांश्चैव शक्तीश्च शतघ्नीर्महतीरपि ॥ ४४ ॥

पातयामास दुर्धर्षस्तेषामुपरि विष्ठितः । पुष्पक विमानपर बैठे हुए उस दुर्धर्ष बीरने उन सबके

सीदमानान् सुतान् दृष्ट्वा विह्वलान् स महाबलः ।

ननाद रावणो हर्षान्महानम्बुधरो यथा ॥ ४७ ॥

वरुणके पुत्रोंको दुखी एवं व्याकुल देख महाबली रावण महान् मेघ के समान बड़े हर्षसे गर्जना करने लगा ।! ततो रक्षो महानादान् मुक्त्वा हन्ति स्म वारुणान् । नानाप्रहरणोपेतैर्धारापातैरिवाम्बुदः 118211 जोर - जोर से सिंहनाद करके वह निशाचर पुनः नाना प्रकारके अस्त्र - शस्त्रद्वारा वरुण - पुत्रोंको मारने लगा, मानो बादल अपनी धारावाहिक वृष्टिसे वृक्षको पीड़ित कर रहा हो ।

ततस्ते विमुखाः सर्वे पतिता धरणीतले ।

रणात् स्वपुरुषैः शीघ्रं गृहाण्येव प्रवेशिताः ॥ ४ ९ ॥

फिर तो वे सभी वरुण- पुत्र युद्धसे विमुख हो पृथ्वीपर गिर पड़े । तत्पश्चात् उनके सेवकोंने उन्हें रणभूमिसे हटाकर शीघ्र ही घरों में पहुँचा दिया ॥ ४ ९ ॥

तानब्रवीत् ततो रक्षो वरुणाय निवेद्यताम् ।

रावणं त्वब्रवीन्मन्त्री प्रहासो नाम वारुणः ॥ ५० ॥

तदनन्तर उस राक्षसने वरुणके सेवकोंसे कहा- ' अब वरुणसे जाकर कहो कि वे स्वयं युद्ध के लिये आवें । ' तब वरुणके मन्त्री प्रभासने रावणसे कहा – ॥ ५० ॥

गतः खलु महाराजो ब्रह्मलोकं जलेश्वरः ।

गान्धर्व वरुणः श्रोतुं यं त्वमाह्वयसे युधि ॥ ५१ ॥

' राक्षसराज! जिन्हें तुम युद्धके लिये बुला रहे हो, वे जलके स्वामी महाराज वरुण संगीत सुननेके लिये ब्रह्मलोक में गये हुए हैं ॥ ५१ ॥

तत् किं तव यथा वीर परिश्रम्य गते नृपे ।

ये तु संनिहिता वीराः कुमारास्ते पराजिताः ॥ ५२ ॥

' वीर! राजा वरुणके चले जानेपर यहाँ युद्ध के लिये व्यर्थं परिश्रम करनेसे तुम्हें क्या लाभ? उनके जो वीर पुत्र यहाँ मौजूद थे, वे तो तुमसे परास्त हो ही गये ' ॥ ५२ ॥

राक्षसेन्द्रस्तु तच्छ्रुत्वा नाम विश्राव्य चात्मनः । ऊपर विचित्र मूसलों, सैकड़ों भल्लों, पट्टियों, शक्तियों और हर्षान्नादं विमुञ्चन् वै निष्क्रान्तो वरुणालयात् ॥ ५३ ॥

बड़ी - बड़ी शतनियोंका प्रहार किया ॥ ४४३ ॥ मन्त्रीकी यह बात सुनकर राक्षसराज रावण वहाँ अपने

अपविद्धास्तु ते वीरा विनिष्पेतुः पदातयः ॥ ४५ ॥ नामकी घोषणा करके बड़े हर्षसे सिंहनाद करता हुआ

ततस्तेनैव सहसा सीदन्ति स्म पदातिनः । वरुणालयसे बाहर निकल गया ॥ ५३ ॥

महापङ्कमिवासाद्य कुञ्जराः षष्टिहायनाः ॥ ४६ ॥ पथा येन तेनैव विनिवृत्य सः ।

उन अस्त्र - शस्त्रोंसे घायल हो वे पैदल वीर पुनः युद्धके आगतस्तु रक्षो नभस्तलगतो ययौ ॥ ५४ ॥

लिये आगे बढ़े; परंतु पैदल होनेके कारण रावणकी उस लङ्कामभिमुखो वह जिस मार्ग से आया था, उसीसे लौटकर आकाश-अस्त्र- वर्षा से ही सहसा संकटमें पड़कर बड़ी भारी कीचड़ में लङ्काकी ओर चल दिया ॥ ५४ ॥ *

फँसे हुए साठ वर्षके हाथी के समान कष्ट पाने लगे ॥ ४५-४६ ॥ मार्गसे इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये उत्तरकाण्डे त्रयोविंशः सर्गः ॥ २३ ॥

प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के उत्तरकाण्डमें तेईसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ २३ ॥

इस तेईसवें सर्गके बाद पाँच प्रक्षिप्त सर्ग उपलब्ध होते हैं, जिनमें रावणकी दिग्विजय यात्राका विस्तारपूर्वक वर्णन है । * कुछ प्रतियोंमें अनावश्यक विस्तारके भयसे यहाँ उनको नहीं लिया गया है 1

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