Ramayana 2 — पृष्ठ 731–740

वाल्मीकि रामायण — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 731–740

पृष्ठ 731

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रावणद्वारा सुन्दरी कन्याओं का अपहरण

पृष्ठ 732

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उत्तरकाण्डे चतुर्विंशः सर्गः १५१५ चतुर्विंशः सर्गः रावणद्वारा अपहृत हुई देवता आदिकी कन्याओं और स्त्रियोंका विलाप एवं शाप, रावणका रोती हुई शूर्पणखाको आश्वासन देना और उसे खरके साथ दण्डकारण्य में भेजना

निवर्तमानः संहृष्टो रावणः स दुरात्मवान् ।

जहे पथि नरेन्द्र र्षिदेवदानव कन्यकाः ॥ १ ॥

लौटते समय दुरात्मा रावण बड़े हर्ष में भरा था । उसने मार्गमें अनेकानेक नरेशों, ऋषियों, देवताओं और दानवोंकी कन्याओंका अपहरण किया ॥ १ ॥

दर्शनीयां हि यां रक्षः कन्यां स्त्रीं वाथ पश्यति ।

हत्वा बन्धुजनं तस्या विमाने तां रुरोध सः ॥ २ ॥

वह राक्षस जिस कन्या अथवा स्त्रीको दर्शनीय रूप-सौन्दर्यसे युक्त देखता, उसके रक्षक बन्धुजनोंका वध करके उसे विमानपर बिठाकर रोक लेता था ॥ २ ॥

एवं पन्नगकन्याश्च राक्षसासुरमानुषीः ।

यक्षदानवकन्याश्च विमाने सोऽभ्यरोपयत् ॥ ३ ॥

इस प्रकार उसने नागों, राक्षसों, असुरों, मनुष्यों, यक्षों और दानवोंकी भी बहुत - सी कन्याओंको हरकर विमानपर चढ़ा लिया ॥ ३ ॥

ताहि सर्वाः समं दुःखान्मुमुचुर्वाष्पजं जलम् ।

तुल्यमग्न्यर्चिषां तत्र शोकाग्निभयसम्भवम् ॥ ४ ॥

उन सबने एक साथ ही दुःखके कारण नेत्रोंसे आँसू बहाना आरम्भ किया ॥ शोकाग्नि और भयसे प्रकट होनेवाले उनके आँसुओंकी एक - एक बूँद वहाँ आगकी चिनगारी - सी जान पड़ती थी ॥ ४ ॥

ताभिः सर्वानवद्याभिर्नदीभिरिव सागरः ।

आपूरितं विमानं तद् भयशोकाशिवाधुभिः ॥ ५ ॥

जैसे नदियाँ सागरको भरती हैं, उसी प्रकार उन समस्त सुन्दरियोंने भय और शोकसे उत्पन्न हुए अमङ्गलजनक अश्रुओं से उस विमानको भर दिया ॥ ५ ॥

नागन्धर्व कन्याच महर्षितनयाश्च याः ।

दैत्यदानवकन्याश्च विमाने शतशोऽरुदन् ॥ ६ ॥

नाग, गन्धर्वो महर्षियों कन्याएँ उस विमानपर रो रही दीर्घकेश्यः सुचार्वङ्गयः पीनस्तनतटा मध्ये रथकूवरसंकाशैः स्त्रियः सुराङ्गनाप्रख्या उनके केश बड़े - बड़े थे थे । उनके मुखकी कान्ति , दैत्यों और दानवोंकी सैकड़ों थीं ॥ ६ ॥

पूर्णचन्द्रनिभाननाः ।

वज्रवेदिसमप्रभाः ॥ ७ ॥

श्रोणिदेशैर्मनोहराः ।

निष्टप्तकनकप्रभाः ॥ ८ ॥

। सभी अङ्ग सुन्दर एवं मनोहर पूर्ण चन्द्रमाकी छविको लजित करती थी । उरोजोंके तटप्रान्त उभरे हुए थे । शरीरका मध्य-भाग हीरेके चबूतरेके समान प्रकाशित होता था । नितम्ब-देश रथके कूबर - जैसे जान पड़ते थे और उनके कारण उनकी मनोहरता बढ़ रही थी । वे सभी स्त्रियाँ देवाङ्गनाओंके समान कान्तिमती और तपाये हुए सुवर्णके समान सुनहरी आभासे उद्भासित होती थीं ॥ ७-८ ॥

शोकदुःखभयत्रस्ता विह्वलाश्च सुमध्यमाः ।

तासां निःश्वासवातेन सर्वतः सम्प्रदीपितम् ॥ ९ ॥

अग्निहोत्रमिवाभाति संनिरुद्धाग्नि पुष्पकम् । सुन्दर मध्यभागवाली वे सभी सुन्दरियाँ शोक, दुःख और भयसे त्रस्त एवं विह्वल थीं । उन की गरम - गरम निःश्वास-वायुसे वह पुष्पक विमान सब ओरसे प्रज्वलित - सा हो रहा था और जिसके भीतर अग्निकी स्थापना की गयी हो, उस अग्निहोत्रगृहके समान जान पड़ता था ॥ ९ ३ ॥ दशग्रीववशं प्राप्तास्तास्तु शोकाकुलाः स्त्रियः ॥ १० ॥

दीनवत्रेक्षणाः श्यामा मृग्यः सिंहवशा इव । दशग्रीवके वशमें पड़ी हुई वे शोकाकुल अवलाएँ सिंहके पंजे में पड़ी हुई हरिणियोंके समान दुखी हो रही थीं । उनके मुख और नेत्रोंमें दीनता छा रही थी और उन सबकी अवस्था सोलह वर्षके लगभग थी ॥ १०३ ॥

काचिच्चिन्तयती तत्र किं नु मां भक्षयिष्यति ॥ ११ ॥

काचिद् दध्यौ सुदुःखार्ता अपि मां मारयेक्ष्यम् । कोई सोचती थी, क्या यह राक्षस मुझे खा जायगा? कोई अत्यन्त दुःखसे आर्त हो इस चिन्तामें पड़ी थी कि क्या यह निशाचर मुझे मार डालेगा? ॥ ११३ ॥

इति मातृः पितॄन् स्मृत्वा भर्तृन् भ्रातुंस्तथैव च ॥ १२ ॥

दुःखशोकसमाविष्टा विलेपुः सहिताः स्त्रियः । वे स्त्रियाँ माता, पिता, भाई तथा पतिकी याद करके दुःख-शोक में डूब जातीं और एक साथ करुणाजनक विलाप करने लगती थीं ॥ १२३ ॥

कथं नु खलु मे पुत्रो भविष्यति मया विना ॥ १३ ॥

कथं माता कथं भ्राता निमग्नाः शोकसागरे । " हाय! मेरे बिना मेरा नन्हा सा बेटा कैसे रहेगा । मेरी माँकी क्या दशा होगी और मेरे भाई कितने चिन्तित होंगे ' ऐसा कहकर वे शोकके सागरमें डूब जाती थीं ॥ १३३ ॥

हा कथं नु करिष्यामि भर्तुस्तस्मादहं विना ॥ १४ ॥

मृत्यो प्रसादयामि त्वां नय मां दुःखभागिनीम् ।

किं नु तद् दुष्कृतं कर्म पुरा देहान्तरे कृतम् ॥ १५ ॥

एवं स्म दुःखिताः सर्वाः पतिताः शोकसागरे ।

नखल्विदानीं पश्यामो दुःखस्यास्यान्तमात्मनः ॥ १६ ॥

' हाय! अपने उन पतिदेवसे बिछुड़कर मैं क्या करूँगी? ( कैसे रहूँगी ) । हे मृत्युदेव! मेरी प्रार्थना है कि तुम प्रसन्न

पृष्ठ 733

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श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे १५१६ हो जाओ और मुझ दुखिया को इस लोकसे उठा ले चलो । हाय! पूर्व जन्म में दूसरे शरीरद्वारा हमने कौन - सा ऐसा पाप किया था, जिससे हम सब की सब दुःखसे पीड़ित हो शोकके समुद्रमें गिर पड़ी हैं । निश्चय ही इस समय हमें अपने इस दुःखका अन्त होता नहीं दिखायी देता ॥ १४-१६ ॥

अहो धियानुषं लोकं नास्ति खल्वधमः परः ।

बलवता भर्तारो रावणेन नः ॥ १७ ॥

यद् दुर्बला सूर्येणोदयता काले नक्षत्राणीव नाशिताः । ' अहो! इस मनुष्यलोकको धिक्कार है! इससे बढ़कर अधम दूसरा कोई लोक नहीं होगा; क्योंकि यहाँ इस बलवान् रावणने हमारे दुर्बल पतियोंको उसी तरह नष्ट कर दिया, जैसे सूर्यदेव उदय लेने के साथ ही नक्षत्रोंको अदृश्य कर देते हैं ॥ १७३ ॥

रक्षो वधोपायेषु रज्यते ॥ १८ ॥

अहो सुबलवद् अहो दुर्वृत्तमास्थाय नात्मानं वै जुगुप्सते । इसी समय इच्छानुसार रूप धारण करनेवाली भयंकर राक्षसी शूर्पणखा, जो रावणकी बहिन थी, सहसा सामने आकर पृथ्वीपर गिर पड़ी ॥ २४३ ॥

तां खसारं समुत्थाप्य रावणः परिसान्त्वयन् ॥ २५ ॥

अब्रवीत् किमिदं भद्रे वक्तुकामासि मां द्रुतम् । रावणने अपनी उस बहिनको उठाकर सान्त्वना दी और ' भद्रे! तुम अभी मुझसे शीघ्रतापूर्वक कौन - सी बात पूछा-कहना चाहती थी? ' ॥ २५३ ॥

रक्ताक्षी वाक्यमब्रवीत् ॥ २६ ॥

सा बाष्पपरिरुद्धाक्षी कृतास्मि विधवा राजंस्त्वया बलवता बलात् । शूर्पणखा के नेत्रोंमें आँसू भरे थे, उसकी आँखें रोते - रोते लाल हो गयी थीं । वह बोली- ' राजन्! तुम बलवान् हो, इसीलिये न तुमने मुझे बलपूर्वक विधवा बना दिया है? ॥ वीर्याद दैत्या विनिहता रणे ॥ २७ ॥

एते राजंस्त्वया कालकेया इति ख्याताः सहस्राणि चतुर्दश । ! तुमने रणभूमिमें अपने बल पराक्रमसे चौदह ' अहो! यह अत्यन्त बलवान् राक्षस वधके उपायोंमें ही ' राक्षसराज नामक दैत्योंका वध कर दिया है ॥ २७३ ॥

आसक्त रहता है । अहो! यह पापी दुराचारके पथपर चल- हजार कालकेय गरीयान् मे तत्र भर्ता महाबलः ॥ २८ ॥

कर भी अपने आपको धिक्कारता नहीं है ॥ १८३ ॥ प्राणेभ्योऽपि

त्वया हतस्तात रिपुणा भ्रातृगन्धिना । सदृशस्तावद् विक्रमोऽस्य दुरात्मनः ॥ १ ९ ॥ सोऽपि मेरे लिये प्राणोंसे भी बढ़कर आदरणीय सर्वथा । ' तात! उन्हींमें इदं त्वसदृशं कर्म परदाराभिमर्शनम् मेरे महाबली पति भी थे । तुमने उन्हें भी मार डाला । तुम ' इस दुरात्माका पराक्रम इसकी तपस्या के सर्वथा अनुरूप भाई हो । वास्तवमें मेरे शत्रु निकले! ॥ २८३ ॥

है, परंतु यह परायी स्त्रियोंके साथ जो बलात्कार कर रहा नाममात्रके निहता राजन् स्वयमेव हि बन्धुना ॥ २ ९ ॥ है, यह दुष्कर्म इसके योग्य कदापि नहीं है | १ ९ ३ ॥ त्वयास्मि च भोक्ष्यामि त्वत्कृतं ह्यहम् । यस्मादेव परक्यासु रमते राक्षसाधमः ॥ २० ॥ राजन वैधव्यशब्दं भाई होकर भी तुमने स्वयं ही अपने हाथों

वै स्त्रीकृतेनैव वधं प्राप्स्यति दुर्मतिः । ' राजन्! सगे ) वध कर डाला । अब तुम्हारे कारण तस्माद् " यह नीच निशाचर परायी स्त्रियोंके साथ रमण करता मेरा ( मेरे पतिदेवका करूँगी — विधवा कहलाऊँगी || कारण ही इस दुर्बुद्धि राक्षसका वध होगा ' ॥ मैं ' वैधव्य ' शब्दका उपभोग समरेष्वपि ॥ ३० ॥

है, इसलिये स्त्रीके ॥ २१ ॥ ननु नाम त्वया रक्ष्यो जामाता

सतीभिर्वरनारीभिरेवं वाक्येऽभ्युदीरिते त्वया निहतो युद्धे स्वयमेव न लज्जसे । नेदुर्दुन्दुभयः खस्थाः पुष्पवृष्टिः पपात च । स! तुम मेरे पिताके तुल्य हो । मेरे पति तुम्हारे उन श्रेष्ठ सती - साध्वी नारियोंने जब ऐसी बातें कह दीं, भैया ' तुम्हें युद्ध में अपने दामाद या बहनोई की भी आकाशमें देवताओंकी दुन्दुभियाँ बज उठीं और दामाद थे, क्या स्वयं ही युद्धमें अपने उस समय रक्षा नहीं करनी चाहिये थी? तुमने वहाँ फूलोंकी वर्षा होने लगी ॥ २१३ ॥ वध किया है; क्या अब भी तुम्हें लज्जा नहीं

स तु समं हतौजाइव निष्प्रभः ॥ २२ ॥ दामादका

शप्तः स्त्रीभिः विमना इव । आती ११ ॥ ३०३ ॥ ॥ ३१ ॥

पतिव्रताभिः साध्वीभिर्बभूव एवमुक्तो दशग्रीवो भगिन्या क्रोशमानया पतिव्रता साध्वी स्त्रियोंके इस तरह शाप देनेपर रावणकी सान्त्वयित्वा तां सामपूर्वमिदं वचः । शक्ति घट गयी, वह निस्तेज सा हो गया और उसके मनमें अब्रवीत् कोसती हुई बहिनके ऐसा कहनेपर दशग्रीवने उद्वेग - सा होने लगा ॥ २२३ ॥ रोती और देकर समझाते हुए मधुर वाणीमें कहा – ॥

विलपितं तासां शृण्वन् राक्षसपुङ्गवः ॥ २३ ॥ उसे सान्त्वना ते न भेतव्यं च सर्वशः ॥ ३२ ॥

एवं पूज्यमानो निशाचरैः । अलं वत्से रुदित्वा यत्नतः । प्रविवेश पुरीं लङ्कां रावणने दानमानप्रसादैस्त्वां तोषयिष्यामि इस प्रकार उनका विलाप सुनते हुए राक्षसराज ' बेटी! अब रोना व्यर्थ है, तुम्हें किसी तरह भयभीत नहीं निशाचरोंद्वारा सत्कृत हो लङ्कापुरीमें प्रवेश किया ॥ २३३ ॥ होना चाहिये । मैं दान, मान और अनुग्रहद्वारा यत्नपूर्वक

एतस्मिन्नन्तरे घोरा राक्षसी कामरूपिणी ॥ २४ ॥ करूँगा ॥ ३२३ ॥

भूमौ भगिनी रावणस्य सा । तुम्हें संतुष्ट सहसा पतिता

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उत्तरकाण्डे पञ्चविंशः सर्गः १५१७ युद्धप्रमत्तो व्याक्षिप्तो जयाकाङ्क्षी क्षिपञ्शरान् ॥ ३३ ॥ " यह तुम्हारा मौसेरा भाई निशाचर खर सब कुछ करनेमें

नाहमज्ञासिषं युध्यन् स्वान् परान् वापि संयुगे । समर्थ है और आदेशका सदा पालन करता रहेगा ॥ ३७३ ॥

जामातरं न जाने स्म प्रहरन् युद्धदुर्मदः ॥ ३४ ॥ शीघ्रं गच्छत्वयं वीरो दण्डकान् परिरक्षितुम् ॥ ३८ ॥

“ मैं युद्धमें उन्मत्त हो गया था, मेरा चित्त ठिकाने नहीं दूषणोऽस्य बलाध्यक्षो भविष्यति महाबलः । था, मुझे केवल विजय पानेकी धुन थी, इसलिये लगातार बाण " यह वीर ( मेरी आज्ञा से ) शीघ्र ही दण्डकारण्यकी रक्षामें चलाता रहा । समराङ्गणमें जूझते समय मुझे अपने - परायेका जानेवाला है; महाबली दूषण इसका सेनापति होगा || ३८३ ॥ ज्ञान नहीं रह जाता था । मैं रणोन्मत्त होकर प्रहार कर रहा तत्र ते वचनं शूरः करिष्यति सदा खरः ॥ ३ ९ ॥ था, इसलिये ' दामाद ' को पहचान न सका ॥ ३३-३४ ॥ तेनासौ निहतः संख्ये मया भर्ता तव स्वसः । अस्मिन् काले तु यत् प्राप्तं तत् करिष्यामि ते हितम् । ३५ । ' बहिन! यही कारण है जिससे युद्धमें तुम्हारे पति मेरे हाथसे मारे गये । अब इस समय जो कर्तव्य प्राप्त है, उसके अनुसार मैं सदा तुम्हारे हितका ही साधन करूँगा ॥३५ ॥

भ्रातुरैश्वर्ययुक्तस्य खरस्य वस पार्श्वतः ।

चतुर्दशानां भ्राता ते सहस्राणां भविष्यति ॥ ३६ ॥

प्रभुः प्रयाणे दाने च राक्षसानां महाबलः । ' तुम ऐश्वर्यशाली भाई खर के पास चलकर रहो । तुम्हारा भाई महाबली खर चौदह हजार राक्षसोंका अधिपति होगा । वह उन सबको जहाँ चाहेगा, भेजेगा और उन सबको अन्न, पान एवं वस्त्र देने में समर्थ होगा ॥ ३६३ ॥

तत्र मातृष्वसेयस्ते भ्रातायं वै खरः प्रभुः ॥ ३७ ॥

भविष्यति तवादेशं सदा कुर्वन् निशाचरः । रक्षसां कामरूपाणां प्रभुरेष भविष्यति । " वहाँ शूरवीर खर सदा तुम्हारी आशाका पालन करेगा और इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले राक्षसोंका स्वामी होगा ' ॥ ३ ९ ३ ॥ एवमुक्त्वा दशग्रीवः सैन्यमस्यादिदेश ह ॥ ४० ॥

चतुर्दश सहस्राणि रक्षसां वीर्यशालिनाम् ।

स तैः परिवृतः सर्वै राक्षसैर्घोरदर्शनैः ॥ ४१ ॥

आगच्छत खरः शीघ्रं दण्डकानकुतोभयः ।

स तत्र कारयामास राज्यं निहतकण्टकम् ।

सा च शूर्पणखा तत्र न्यवसद् दण्डके वने ॥ ४२ ॥

ऐसा कहकर दशग्रीवने चौदह हजार पराक्रमशाली राक्षसोंकी सेनाको खर के साथ जाने की आज्ञा दी । उन भयङ्कर राक्षसोंसे घिरा हुआ खर शीघ्र ही दण्डकारण्यमें आया और निर्भय होकर वहाँका अकण्टक राज्य भोगने लगा । उसके साथ शूर्पणखा भी वहाँ दण्डकवनमें रहने लगी ॥ ४०-४२ ॥ इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये उत्तरकाण्डे चतुर्विंशः सर्गः ॥ २४ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें चौबीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ २४ ॥

पञ्चविंशः सर्गः ज्ञद्वारा मेघनाद की सफलता, विभीषण का रावणको पर - स्त्री - हरण के दोष बताना, कुम्भीनसीको आश्वासन दे मधुको साथ ले रावणका देवलोकपर आक्रमण करना

स तु दत्त्वा दशग्रीवो बलं घोरं खरस्य तत् ।

भगिनीं स समाश्वास्य हृष्टः स्वस्थतरोऽभवत् ॥ १ ॥

खरको राक्षसोंकी भयङ्कर सेना देकर और बहिनको धीरज बँधाकर रावण बहुत ही प्रसन्न और स्वस्थचित्त हो गया ॥ १ ॥

ततो निकुम्भिला नाम लङ्कोपवनमुत्तमम् ।

तद् राक्षसेन्द्रो बलवान् प्रविवेश सहानुगः ॥ २ ॥

तदनन्तर बलवान् राक्षसराज रावण लङ्का के निकुम्भिला नामक उत्तम उपवनमें गया । उसके साथ बहुत - से सेवक भी थे ॥ २ ॥

ततो यूपशताकीर्णे सौम्यचैत्योपशोभितम् ।

ददर्श विष्ठितं यज्ञं श्रिया सम्प्रज्वलन्निव ॥ ३ ॥

रावण अपनी शोभा एवं तेजसे अग्नि के समान प्रज्वलित हो रहा था । उसने निकुम्भिला में पहुँचकर देखा, एक यज्ञ हो रहा है, जो सैकड़ों यूपोंसे व्याप्त और सुन्दर देवालयों-से सुशोभित है ॥ ३ ॥

ततः कृष्णाजिनधरं कमण्डलुशिखाध्वजम् ।

ददर्श स्वसुतं तत्र मेघनादं भयावहम् ॥ ४ ॥

फिर वहाँ उसने अपने पुत्र मेघनादको देखा, जो काला मृगचर्म पहने हुए तथा कमण्डलु, शिखा और ध्वज धारण किये बड़ा भयङ्कर जान पड़ता था ॥ ४ ॥

तं समासाद्य लङ्केशः परिष्वज्याथ बाहुभिः ।

अब्रवीत् किमिदं वत्स वर्तसे ब्रूहि तत्त्वतः ॥ ५ ॥

उसके पास पहुँचकर लङ्केश्वरने अपनी भुजाओं द्वारा उसका आलिङ्गन किया और पूछा — ' बेटा! यह क्या कर रहे हो १ ठीक - ठीक बताओ ' ॥ ५ ॥

उशना त्वब्रवीत् तत्र यज्ञसम्पत्समृद्धये ।

रावणं राक्षसश्रेष्ठं द्विजश्रेष्ठो महातपाः ॥ ६ ॥

( मेघनाद यज्ञके नियमानुसार मौन रहा ) उस समय पुरोहित महातपस्वी द्विजश्रेष्ठ शुक्राचार्यने, जो यज्ञ - सम्पत्तिकी समृद्धिके लिये वहाँ आये थे, राक्षसशिरोमणि रावणसे कहा – ॥६ ॥

पृष्ठ 735

वाल्मीकि रामायण — खण्ड २, पृष्ठ 735 का मूल पृष्ठ
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१५१८ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे अहमाख्यामि ते राजन्श्रूयतां सर्वमेव तत् । यज्ञास्ते सप्त पुत्रेण ' राजन्! मैं सब सुनिये -- आपके पुत्रने अनुष्ठान किया है ॥ ७ ॥

अग्निष्टोमो ऽश्वमेधश्च राजसूयस्तथा यज्ञो माहेश्वरे प्रवृत्ते तु प्राप्तास्ते बहुविस्तराः ॥ ७ ॥

बातें बता रहा हूँ, ध्यान देकर बड़े विस्तार के साथ सात यज्ञों का

यज्ञो बहुसुवर्णकः ।

गोमेधो वैष्णवस्तथा ॥ ८ ॥

यज्ञे पुम्भिः सुदुर्लभे ।

वरांस्ते लब्धवान् पुत्रः साक्षात् पशुपतेरिह ॥ ९ ॥

' अग्निष्टोम, अश्वमेध, बहुसुवर्णक, राजसूय, गोमेध तथा वैष्णव - ये छः यज्ञ पूर्ण करके जब इसने सातवाँ माहेश्वर यज्ञ, जिसका अनुष्ठान दूसरोंके लिये अत्यन्त दुर्लभ है, आरम्भ किया, तब आपके इस पुत्रको साक्षात् भगवान् पशुपतिसे बहुत - से वर प्राप्त हुए ॥ ८ - ९ ॥

कामगं स्यन्दनं दिव्यमन्तरिक्षचरं ध्रुवम् ।

मायां च तामसी नाम यया सम्पद्यते तमः ॥ १० ॥

" साथ ही इच्छानुसार चलनेवाला एक दिव्य आकाश-चारी रथ भी प्राप्त हुआ है, इसके सिवा तामसी नामकी माया उत्पन्न हुई है, जिससे अन्धकार उत्पन्न किया जाता है ॥१० ॥

एतया किल संग्रामे मायया राक्षसेश्वर ।

प्रयुक्तया गतिः शक्या नहि ज्ञातुं सुरासुरैः ॥ ११ ॥

' राक्षसेश्वर! संग्राममें इस मायाका प्रयोग करनेपर देवता और असुरों को भी प्रयोग करनेवाले पुरुषकी गतिविधिका पता नहीं लग सकता ॥ ११ ॥

अक्षयाविषुधी वाणैश्चापं चापि सुदुर्जयम् ।

अस्त्रं च वलवद् राजञ्छत्रुविध्वंसनं रणे ॥ १२ ॥

' राजन्! बाणों से भरे हुए दो अक्षय तरकस, अटूट धनुष तथा रणभूमिमें शत्रुका विध्वंस करनेवाला प्रबल अस्त्र-इन सबकी प्राप्ति हुई है ॥ १२ ॥

एतान् सर्वान् वल्लब्ध्वा पुत्रस्तेऽयं दशानन ।

अद्य यज्ञसमाप्तौ च त्वां दिदृक्षन् स्थितो ह्यहम् ॥ १३ ॥

ततो गत्वा दशग्रीवः सपुत्रः सविभीषणः ।

स्त्रियोऽवतारयामास सर्वास्ता बाष्पगद्गदाः ॥ १६ ॥

तदनन्तर दशग्रीवने अपने पुत्र और विभीषण के साथ जाकर पुष्पक विमानसे उन सब स्त्रियोंको उतारा, जिन्हें हरकर ले आया था । वे अब भी आँसू बहाती हुई गद्गदकण्ठसे विलाप कर रही थीं ॥ १६ ॥

लक्षिण्यो रत्नभूताश्च देवदानवरक्षसाम् ।

तस्य तासु मतिं ज्ञात्वा धर्मात्मा वाक्यमब्रवीत् ॥ १७ ॥

वे उत्तम लक्षणोंसे सुशोभित होती थीं और देवताओं, दानवों तथा राक्षसों के घर की रत्न थीं । उनमें रावणकी आसक्ति जानकर धर्मात्मा विभीषणने कहा ॥ १७ ॥

ईदृशैस्त्वं समाचारैर्यशोऽर्थकुलनाशनैः ।

धर्षणं प्राणिनां ज्ञात्वा स्वमतेन विचेष्टसे ॥ १८ ॥

' राजन्! ये आचरण यश, धन और कुलका नाश करने वाले हैं । इनके द्वारा जो प्राणियोंको पीड़ा दी जाती है, उससे बड़ा पाप होता है । इस बातको जानते हुए भी आप सदाचारका उल्लङ्घन करके स्वेच्छाचार में प्रवृत्त हो रहे हैं ॥ १८ ॥

ज्ञातींस्तान् धर्षयित्वेमास्त्वयाऽऽनीता वराङ्गनाः ।

त्वामतिक्रम्य मधुना राजन् कुम्भीनसी हृता ॥ १ ९ ॥

' महाराज! इन बेचारी अबलाओंके बन्धुबान्धवको मार कर आप इन्हें हर लाये हैं और इधर आपका उल्लङ्घन करके— आपके सिरपर लात रखकर मधुने मौसेरी बहिन कुम्भीनसी-का अपहरण कर लिया ' ॥ १ ९ ॥

रावणस्त्वब्रवीद वाक्यं नावगच्छामि किं त्विदम् ।

कोऽयं यस्तु त्वयाऽऽ ख्यातो मधुरित्येव नामतः ॥२० ॥

रावण बोला- ' मैं नहीं समझता कि तुम क्या कह रहे हो । जिसका नाम तुमने मधु बताया है, वह कौन है? ॥२० ॥

विभीषणस्तु संक्रुद्धो भ्रातरं वाक्यमब्रवीत् ।

श्रूयतामस्य पापस्य कर्मणः फलमागतम् ॥ २१ ॥

तब विभीषणने अत्यन्त कुपित होकर भाई रावणसे कहा-" दशानन! तुम्हारा यह पुत्र इन सभी मनोवाञ्छित ' सुनिये, आपके इस पापकर्मका फल हमें बहिन के अपहरण के बरोंको पाकर आज यज्ञकी समाप्तिके दिन तुम्हारे दर्शनकी रूपमें प्राप्त हुआ है || २१ ॥ इच्छासे यहाँ खड़ा है ' ॥ १३ । मातामहस्य योऽस्माकं ज्येष्ठो भ्राता सुमालिनः । ततोऽब्रवीद् दशग्रीवो न शोभनमिदं कृतम् । माल्यवानिति विख्यातो वृद्धः प्राज्ञो निशाचरः ॥ २२ ॥

पूजिताः शत्रवो यस्माद् द्रव्यैरिन्द्रपुरोगमाः ॥ १४ ॥ पिता ज्येष्ठो जनन्या नो ह्यस्माकं चार्यकोऽभवत् ।

यह सुनकर दशग्रीवने कहा- ' बेटा! तुमने यह अच्छा कुम्भीनसी नाम दुहितुर्दुहिताभवत् ॥ २३ ॥

नहीं किया है; क्योंकि इस यज्ञसम्बन्धी द्रव्योंद्वारा मेरे शत्रु- तस्य सा च कन्यानलोद्भवा । भूत इन्द्र आदि देवताओंका पूजन हुआ है ॥ १४ ॥ मातृष्वसुरथास्माकं

भवत्यस्माकमेवैषा भ्रातॄणां धर्मतः स्वसा ॥ २४ ॥

एहीदानीं कृतं यद्धि सुकृतं तन्न संशयः । ' हमारे नाना सुमाली के जो बड़े भाई माल्यवान् नामसे आगच्छ सौम्य गच्छामः खमेव भवनं प्रति ॥ १५ ॥ और बड़े - बूढ़े निशाचर हैं, वे हमारी

' अस्तु, जो कर दिया, सो अच्छा ही किया । इसमें संशय विख्यात, बुद्धिमान् हैं । इसी नाते वे हमलोगों के भी बड़े नहीं है । सौम्य! अब आओ, चलो । हमलोग अपने माता कैकसीके ताऊ मौसी हैं । उन्हींकी पुत्री नाना हैं । उनकी पुत्री अनला हमारी घरको चलें ' ॥ १५ ॥

पृष्ठ 736

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उत्तरकाण्डे पञ्चविंशः सर्गः १५१ ९ कुम्भीनसी है । हमारी मौसी अनलाकी बेटी होने से ही यह कुम्भी- नाना प्रकार के अस्त्र - शस्त्रोंसे सुसज्जित हो सवारियोंपर नसी हम सब भाइयोंकी धर्मतः बहिन होती है ॥। २२-२४ ॥ आज रावणका भय न माननेवाले बैठें । साहृता मधुना राजन् राक्षसेन बलीयसा । करके मित्रोंको साथ लिये युद्धकी मधुका समराङ्गणमें वध यज्ञप्रवृत्ते पुत्रे तु मयि चान्तर्जलोषिते ॥ २५ ॥ करूँगा ' ॥ ३१-३२३ इच्छासे देवलोककी यात्रा

कुम्भकर्णो महाराज निद्रामनुभवत्यथ । अक्षौहिणीसहस्राणि ॥

निहत्य राक्षसश्रेष्ठानमात्यानिह चत्वार्यत्र्याणि रक्षसाम् ॥ ३३ ॥

सम्मतान् ॥ २६ ॥ नानाप्रहरणान्याशु निर्ययुर्युद्धकाङ्क्षिणाम् ।

' राजन्! आपका पुत्र मेघनाद जब यज्ञमें तत्पर हो रावणकी आज्ञासे युद्ध में उत्साह रखनेवाले श्रेष्ठ राक्षसोंकी गया, मैं तपस्या के लिये पानी के भीतर रहने लगा और चार हजार अक्षौहिणी सेना नाना प्रकार के अस्त्र - शस्त्र लिये महाराज! भैया कुम्भकर्णं भी जब नींदका आनन्द लेने लगे, उस समय महाबली राक्षस मधुने यहाँ आकर हमारे आदरणीय मन्त्रियोंको, जो राक्षसोंमें श्रेष्ठ थे, मार डाला और कुम्भीनसीका अपहरण कर लिया ॥ २५-२६ ॥

धर्षयित्वा हृता सा तु गुप्ताप्यन्तःपुरे तव ।

श्रुत्वापि तन्महाराज क्षान्तमेव हतो न सः ॥ २७ ॥

यस्मादवश्यं दातव्या कन्या भर्त्रे हि भ्रातृभिः । ' महाराज! यद्यपि कुम्भीनसी अन्तःपुर में भलीभाँति सुरक्षित थी तो भी उसने आक्रमण करके बलपूर्वक उसका अपहरण किया । पीछे इस घटनाको सुनकर भी हमलोगोंने क्षमा ही की । मधुका वध नहीं किया; क्योंकि जब कन्या विवाह के योग्य हो जाय तो उसे किसी योग्य पतिके हाथमें सौंप देना ही उचित है । हम भाइयोंको अवश्य यह कार्यं पहले कर देना चाहिये था ॥ २७३ ॥

तदेतत् कर्मणो ह्यस्य फलं पापस्य दुर्मतेः ॥ २८ ॥

अस्मिन्नेवाभिसम्प्राप्तं लोके विदितमस्तु ते । ' हमारे यहाँसे जो बलपूर्वक कन्याका अपहरण हुआ है, यह आपकी इस दूषित बुद्धि एवं पापकर्मका फल है, जो आपको इसी लोकमें प्राप्त हो गया । यह बात आपको भली-भाँति विदित हो जानी चाहिये ॥ २८३ ॥

विभीषणवचः श्रुत्वा राक्षसेन्द्रः स रावणः ॥ २ ९ ॥

दौरात्म्येनात्मनोद्धूतस्तप्ताम्भा इव सागरः ।

ततोऽब्रवीद् दशग्रीवः क्रुद्धः संरक्तलोचनः ॥ ३० ॥

विभीषण की यह बात सुनकर राक्षसराज रावण अपनी की हुई दुष्टता से पीड़ित हो तपे हुए जलवाले समुद्र के समान संतप्त हो उठा । वह रोषसे जलने लगा और उसके हो गये । वह बोला – ॥ २ ९ -३० ॥ कल्प्यतां मे रथः शीघ्रं शूराः सज्जीभवन्तु नः भ्राता मे कुम्भकर्णश्च ये च मुख्या निशाचराः वाहनान्यधिरोहन्तु नानाप्रहरणायुधाः अद्य तं समरे हत्वा मधुं रावणनिर्भयम् सुरलोकं गमिष्यामि युद्धाकाङ्क्षी सुहृद्वृतः ‘ मेरा रथ शीघ्र ही जोतकर आवश्यक सामग्रीसे नेत्र लाल

॥ ३१ ॥

॥ ३२ ॥

। सुसज्जित शीघ्र लङ्कासे बाहर निकली ॥ ३३३ ॥

इन्द्रजित् त्वग्रतः सैन्यात् सैनिकान् परिगृह्य च ॥३४ ॥

जगाम रावणो मध्ये कुम्भकर्णश्च पृष्ठतः । मेघनाद समस्त सैनिकों को साथ लेकर सेनाके आगे - आगे चला । रावण बीचमें था और कुम्भकर्णं पीछे - पीछे चलने लगा ॥ ३४३ ॥

विभीषणश्च धर्मात्मा लङ्कायां धर्ममाचरन् ॥ ३५ ॥

शेषाः सर्वे महाभागा ययुर्मधुपुरं प्रति । विभीषण धर्मात्मा थे ॥ इसलिये वे लङ्का में ही रहकर धर्मका आचरण करने लगे । शेष सभी महाभाग निशाचर मधुपुरकी ओर चल दिये ॥ ३५३ ॥

खरैरुष्ट्रैर्हयैर्दीप्तैः शिशुमारैर्महोरगैः ॥ ३६ ॥

राक्षसाः प्रययुः सर्वे कृत्वाऽऽकाशं निरन्तरम् । गदहे, ऊँट, घोड़े, शिशुमार ( सूँस ) और बड़े - बड़े नाग आदि दीप्तिमान् वाहनों पर आरूढ़ हो सब राक्षस आकाशको अवकाशरहित करते हुए चले ॥ ३६३ ॥

दैत्याश्च शतशस्तत्र कृतवैराश्च दैवतैः ॥ ३७ ॥

रावणं प्रेक्ष्य गच्छन्तमन्वगच्छन् हि पृष्ठतः । रावणको देवलोकपर आक्रमण करते देख सैकड़ों दैत्य भी उसके पीछे - पीछे चले, जिनका देवताओंके साथ वैर बँध गया था ॥ ३७३ ॥

स तु गत्वा मधुपुरं प्रविश्य च दशाननः ॥ ३८ ॥

न ददर्श मधुं तत्र भगिनीं तत्र दृष्टवान् । मधुपुरमें पहुँचकर दशमुख रावणने वहाँ कुम्भीनसीको तो देखा, किंतु मधुका दर्शन उसे नहीं हुआ ॥ ३८३ ॥

सा च प्राञ्जलिर्भूत्वा शिरसा चरणौ गता ॥ ३ ९ ॥ तस्य राक्षसराजस्य त्रस्ता कुम्भीनसी तदा । उस समय कुम्भीनसीने भयभीत हो हाथ जोड़कर राक्षसराजके चरणोंपर मस्तक रख दिया ॥ ३ ९ ३ ॥ तां समुत्थापयामास न भेतव्यमिति ब्रुवन् ॥ ४० ॥

रावणो राक्षसश्रेष्ठः किं चापि करवाणि ते । तब राक्षसप्रवर रावणने कहा- ' डरो मत '; फिर उसने कुम्भीनसीको उठाया और कहा- ' -'मैं तुम्हारा कौन - सा प्रिय कर दिया जाय । मेरे शूरवीर सैनिक रणयात्राके लिये तैयार कार्य करूँ? ' ॥ ४०३ ॥

हो जायँ । भाई कुम्भकर्ण तथा अन्य मुख्य - मुख्य निशाचर साब्रवीद् यदि मे राजन् प्रसन्नस्त्वं महाभुज ॥ ४१ ॥

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भीमवाल्मीकीय रामायणे १५२०

भर्तारं न ममेहाद्य हन्तुमर्हसि मानद ।

नहीदृशं भयं किंचित् कुलस्त्रीणामिहोच्यते ॥ ४२ ॥

भयानामपि सर्वेषां वैधव्यं व्यसनं महत् । वह बोली – दूसरोंको मान देनेवाले राक्षसराज! महाबाहो! यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं तो आज यहाँ मेरे पतिका वध न कीजिये; क्योंकि कुलवधुओंके लिये वैधव्यके समान दूसरा कोई भय नहीं बताया जाता है । वैधव्य ही नारीके लिये सबसे बड़ा भय और सबसे महान् संकट है ॥४१-४२३ ॥ भव राजेन्द्र मामवेक्षस्व याचतीम् ॥ ४३ ॥

सत्यवाग् त्वयाप्युक्तं महाराज न भेतव्यमिति स्वयम् । ' राजेन्द्र! आप सत्यवादी हों - अपनी बात सच्ची करें । मैं आपसे पतिके जीवनकी भीख माँगती हूँ, आप मुझ दुखिया बहिनकी ओर देखिये, मुझपर कृपा कीजिये । महाराज! आपने स्वयं भी मुझे आश्वासन देते हुए कहा था कि ' डरो मत । ' अतः अपनी उसी बातकी लाज रखिये‍ ॥ ४३३ ॥

रावणस्त्वत्रवीद्धृष्टः स्वसारं तत्र संस्थिताम् ॥ ४४ ॥

क्व चासौ तव भर्ता वै मम शीघ्रं निवेद्यताम् ।

सह तेन गमिष्यामि सुरलोकं जयाय हि ॥ ४५ ॥

यह सुनकर रावण प्रसन्न हो गया । वह वहाँ खड़ी हुई अपनी बहिनसे बोला- ' तुम्हारे पति कहाँ हैं? उन्हें शीघ्र मुझे सौंप दो । मैं उन्हें साथ लेकर देवलोकपर विजयके लिये जाऊँगा ॥ ४४-४५ ॥

तव कारुण्यसौहार्दान्निवृत्तोऽस्मि मधोर्वधात् ।

सा समुत्थाप्य प्रसुप्तं तं निशाचरम् ॥ ४६ ॥

इत्युक्ता अब्रवीत् सम्प्रहृष्टेव राक्षसी सा पतिं वचः । ‘ तुम्हारे प्रति करुणा और सौहार्दके कारण मैंने मधुके वधका विचार छोड़ दिया है । ' रावणके ऐसा कहनेपर राक्षस-सुरलोकजयाकाङ्क्षी साहाय्ये त्वां वृणोति च । तदस्य त्वं सहायार्थे सबन्धुर्गच्छ राक्षस ॥ ४८ ॥

' राक्षसप्रवर! ये मेरे भाई महाबली दशग्रीव पधारे हैं । और देवलोकपर विजय पानेकी इच्छा लेकर वहाँ जा रहे हैं । इस कार्यके लिये ये आपको भी सहायक बनाना चाहते हैं; अतः आप अपने बन्धु बान्धवोंके साथ इनकी सहायताके

लिये जाइये ॥। ४७-४८ ॥

स्निग्धस्य भजमानस्य युक्तमर्थाय कल्पितुम् ।

वचनं श्रुत्वा तथेत्याह मधुर्वचः ॥ ४ ९ ॥

तस्यास्तद् ' मेरे नाते आपपर इनका स्नेह है, आपको जामाता मान-कर ये आपके प्रति अनुराग रखते हैं; अतः आपको इनके कार्यकी सिद्धिके लिये अवश्य सहायता करनी चाहिये । ' पत्नीकी यह बात सुनकर मधुने ' तथास्तु ' कहकर सहायता देना स्वीकार कर लिया ॥ ४ ९ ॥

ददर्श राक्षसश्रेष्ठं यथान्यायमुपेत्य सः ।

पूजयामास धर्मेण रावणं राक्षसाधिपम् ॥ ५० ॥

फिर वह न्यायोचित रीतिसे निकट जाकर निशाचर-शिरोमणि राक्षसराज रावणसे मिला । मिलकर उसने धर्मके अनुसार उसका स्वागत - सत्कार किया ॥ ५० ॥

प्राप्य पूजां दशग्रीवो मधुवेश्मनि वीर्यवान् ।

तत्र चैकां निशामुष्य गमनायोपचक्रमे ॥ ५१ ॥

मधुके भवन में यथोचित आदर - सत्कार पाकर पराक्रमी दशग्रीव वहाँ एक रात रहा, फिर सबेरे उठकर वहाँसे जानेको उद्यत हुआ ॥ ५१ ॥

ततः कैलासमासाद्य शैलं वैश्रवणालयम् ।

राक्षसेन्द्रो महेन्द्राभः सेनामुपनिवेशयत् ॥ ५२ ॥

मधुपुरसे यात्रा करके महेन्द्र के तुल्य पराक्रमी राक्षसराज कैलास पर्वतपर जा अत्यन्त प्रसन्न -सी होकर अपने सोये हुए रावण सायंकालतक कुबेरके निवास स्थान कन्या कुम्भीनसी उठाकर बोली- ४६३ पहुँचा । वहाँ उसने अपनी सेनाका पड़ाव डालनेका विचार पतिके पास गयी और उस निशाचरको एष प्राप्तो दशग्रीवो मम भ्राता महाबलः ॥ ४७ ॥ किया ॥ ५२ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये उत्तरकाण्डे पञ्चविंशः सर्गः ॥ २५ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्ड में पचीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ २५ ॥

षड्विंशः सर्गः बलात्कार करना और नलकूबरका रावणको भयंकर शाप देना रावणका रम्भापर । ( उसने वहीं छावनी डाल दी ) फिर, कैलास के ही स तु तत्र दशग्रीवः सह सैन्येन वीर्यवान् समान श्वेत कान्तिवाले निर्मल चन्द्रदेवका उदय हुआ और अस्तं प्राप्ते दिनकरे निवासं समरोचयत् ॥ १ ॥ प्रकारके अस्त्र - शस्त्रों से सुसज्जित निशाचरोंकी वह विशाल

जब सूर्य अस्ताचलको चले गये, तब पराक्रमी दशग्रीवने नाना निमग्न हो गयी ॥ २ ॥

अपनी सेनाके साथ कैलासपर ही रातमें ठहर जाना ठीक सेना गाढ़ निद्रामें शैलमूर्धनि । रावणस्तु महावीर्यो निषण्णः समझा ॥ १ ॥ स ददर्श गुणांस्तत्र चन्द्रपादपशोभितान् ॥ ३ ॥

उदिते विमले चन्द्रे तुल्यपर्वतवर्चसि । परंतु महापराक्रमी रावण उस पर्वत के शिखरपर चुपचाप प्रसुप्तं सुमहत् सैम्यं नानाप्रहरणायुधम् ॥ २ ॥

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उत्तरकाण्डे षड्विंशः सर्गः १५२१ बैठकर चन्द्रमाकी चाँदनीसे सुशोभित होनेवाले उस पर्वतके विभिन्न स्थानों की ( जो सम्पूर्ण कामभोगके उपयुक्त थे ) नैसर्गिक छटा निहारने लगा ॥ ३ ॥

कर्णिकार व नैदितैः कदम्बवकुलैस्तथा ।

पद्मिनीभिश्च फुल्लाभिर्मन्दाकिन्या जलैरपि ॥ ४ ॥

चम्पकाशोकपुंनागमन्दार तरुभिस्तथा चूतपाटललोधैश्च प्रियङ्ग्यर्जुनकेतकैः ॥ ५ ॥

तगरैर्नारिकेलैश्च प्रियालपनसैस्तथा ।

एतैरन्यैश्व तरुभिरुद्भासितवनान्तरे ॥ ६ ॥

कहीं कनेरके दीप्तिमान् कानन शोभा पाते थे, कहीं कदम्ब और बकुल ( मौलसिरी ) वृक्षोंके समूह अपनी रमणीयता बिखेर रहे थे, कहीं मन्दाकिनीके जलसे भरी हुई और प्रफुल्ल कमलोंसे अलंकृत पुष्करिणियाँ शोभा दे रही थीं, कहीं चम्पा, अशोक, पुंनाग ( नागकेसर ), मन्दार, आम, पाड़र, लोध, प्रियङ्गु, अर्जुन, केतक, तगर, नारियल, प्रियाल और पनस आदि वृक्ष अपने पुष्प आदिकी शोभासे उस पर्वत - शिखर के वन्यप्रान्तको उद्भासित कर रहे थे । ४-६ ॥

किंनरा मदनेनार्ता रक्ता मधुरकण्ठिनः ।

समं सम्प्रजगुर्यत्र मनस्तुष्टिविवर्धनम् ॥ ७ ॥

मधुर कण्ठवाले कामार्त किन्नर अपनी कामिनियोंके साथ वहाँ रागयुक्त गीत गा रहे थे, जो कानोंमें पड़कर मनका आनन्द - वर्धन करते थे ॥ ७ ॥

विद्याधरा मदक्षीबा मदरकान्तलोचनाः ।

योषिद्भिः सह संक्रान्ताश्चिक्रीडुर्जहृषुश्च वै ॥ ८ ॥

जिनके नेत्र प्रान्त मदसे कुछ लाल हो गये थे, वे मद-मत्त विद्याधर युवतियोंके साथ क्रीडा करते और हर्षमग्न होते थे ॥ ८ ॥

घण्टानामिव संनादः शुश्रुवे मधुरखनः ।

अप्सरोगणसङ्घानां गायतां धनदालये ॥ ९ ॥

वहाँसे कुबेर के भवनमें गाती हुई अप्सराओंके गीतकी मधुर ध्वनि घण्टानाद के समान सुनायी पड़ती थी ॥ ९ ॥

पुष्पवर्षाणि मुञ्चन्तो नगाः पवनताडिताः ।

शैलं तं वासयन्तीव मधुमाधवगन्धिनः ॥ १० ॥

वसन्त ऋतुके सभी पुष्पोंकी गन्धसे युक्त वृक्ष हवाके थपेड़े खाकर फूलों की वर्षा करते हुए उस समूचे पर्वतको सुवासित - सा कर रहे थे ॥ १० ॥

मधुपुष्परजः पृक्तं गन्धमादाय पुष्कलम् ।

प्रववौ वर्धयन् कामं रावणस्य सुखोऽनिलः ॥ ११ ॥

विविध कुसुमोंके मधुर मकरन्द तथा परागसे मिश्रित प्रचुर सुगन्ध लेकर मन्द मन्द बहती हुई सुखद वायु रावण-की काम - वासनाको बढ़ा रही थी ॥ ११ ॥

गेयात् पुष्पसमृद्ध्या च शैत्याद् वायोर्गिरेर्गुणात् ।

प्रवृत्तायां रजन्यां च चन्द्रस्योदयनेन च ॥ १२ ॥

बा ० रा ० ५.११. ११-रावणः स महावीर्यः कामस्य वशमागतः ।

विनिःश्वस्य विनिःश्वस्य शशिनं समवैक्षत ॥ १३ ॥

सङ्गीतकी मीठी तान, भाँति - भाँति के पुष्पोंकी समृद्धि, शीतल वायुका स्पर्श, पर्वतके ( रमणीयता आदि ) आकर्षक गुण, रजनीकी मधुवेला और चन्द्रमाका उदय - उद्दीपनके इन सभी उपकरणों के कारण वह महापराक्रमी रावण कामके अधीन हो गया और बारंबार लंबी साँस खींचकर चन्द्रमाकी ओर देखने लगा ॥ १२-१३ ॥

एतस्मिन्नन्तरे तत्र दिव्याभरणभूषिता ।

सर्वाप्सरोवरा रम्भा पूर्णचन्द्रनिभानना ॥ १४ ॥

इसी बीचमें समस्त अप्सराओंमें श्रेष्ठ सुन्दरी, पूर्ण - चन्द्र-मुखी रम्भा दिव्य वस्त्राभूषणोंसे विभूषित हो उस मार्ग से आ निकली ॥ १४ ॥

दिव्यचन्दनलिप्ताङ्गी मन्दारकृतमूर्धजा ।

दिव्योत्सव कृतारम्भा दिव्यपुष्पविभूषिता ॥ १५ ॥

उसके अङ्गों में दिव्य चन्दनका अनुलेप लगा था और केशपाशमें पारिजातके पुष्प गुँथे हुए थे । दिव्य पुष्पोंसे अपना शृङ्गार करके वह प्रिय - समागमरूप दिव्य उत्सवके लिये जा रही थी ॥ १५ ॥

चक्षुर्मनोहरं पीनं मेखलादामभूषितम् ।

समुद्वहन्ती जघनं रतिप्राभृतमुत्तमम् ॥ १६ ॥

मनोहर नेत्र तथा काञ्चीकी लड़ियोंसे विभूषित पीन जवन - स्थलको वह रतिके उत्तम उपहारके रूपमें धारण किये हुए थी ॥ १६ ॥

कृतैर्विशेषकैराद्रैः पडर्तुकुसुमोद्भवैः ।

बभावन्यतमेव श्रीः कान्तिश्रीद्युतिकीर्तिभिः ॥ १७ ॥

उसके कपोल आदिपर हरिचन्दनसे चित्र - रचना की गयी थी । वह छहों ऋतुओं में होनेवाले नूतन पुष्पोंके आर्द्र हारोंसे विभूषित थी और अपनी अलौकिक कान्ति, शोभा, द्युति एवं कीर्तिसे युक्त हो उस समय दूसरी लक्ष्मी के समान जान पड़ती थी ॥ १७ ॥

नीलं सतोयमेघाभं वस्त्रं समवगुण्ठिता ।

यस्या वक्त्रं शशिनिभं भ्रुवौ चापनिभे शुभे ॥ १८ ॥

उसका मुख चन्द्रमाके समान मनोहर था और दोनों सुन्दर भौंहें कमान सी दिखायी देती थीं । वह सजल जलधर-के समान नील रंगकी साड़ीसे अपने अङ्गको ढके हुए थी ॥ १८ ॥

ऊरू करिकराकारौ करौ पल्लवकोमलौ ।

सैन्यमध्येन गच्छन्ती रावणेनोपलक्षिता ॥ १ ९ ॥

उसकी जाँघों का चढ़ाव उतार हाथी की सूँडके समान था । दोनों हाथ ऐसे कोमल थे, मानो ( देहरूपी रसालकी डालके ) नये - नये पल्लव हों । वह सेनाके बीचसे होकर जा रही थी, अतः रावणने उसे देख लिया ॥ १ ९ ॥

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१५२२ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे

तां समुत्थाय गच्छन्तीं कामवाणवशं गतः ।

करे गृहीत्वा जन्तीं स्मयमानोऽभ्यभाषत ॥ २० ॥

देखते ही वह कामदेवके बार्णोका शिकार हो गया और खड़ा होकर उसने अन्यत्र जाती हुई रम्भाका हाथ पकड़ लिया । बेचारी अबला लाजसे गड़ गयी; परंतु वह निशाचर मुसकराता हुआ उससे बोला- ॥ २० ॥

क्व गच्छसि वरारोहे कां सिद्धि भजसे स्वयम् ।

कस्याभ्युदयकालोऽयं यस्त्वां समुपभोक्ष्यते ॥ २१ ॥

‘ वरारोहे! कहाँ जा रही हो? किसकी इच्छा पूर्ण करनेके लिये स्वयं चल पड़ी हो? किसके भाग्योदयका समय आया है, जो तुम्हारा उपभोग करेगा १ ॥ २१ ॥

त्वदाननरसस्याद्य पद्मोत्पलसुगन्धिनः ।

सुधामृतरसस्येव कोऽद्य तृप्तिं गमिष्यति ॥ २२ ॥

' कमल और उत्पलकी सुगन्ध धारण करनेवाले तुम्हारे इस मनोहर मुखारविन्दका रस अमृतका भी अमृत है । आज इस अमृत रसका आस्वादन करके कौन तृप्त होगा १ ॥ २२ ॥

स्वर्णकुम्भनिभौ पीनी शुभौ भीरु निरन्तरौ ।

कस्योरःस्थलसंस्पर्श दास्यतस्ते कुचाविमौ ॥ २३ ॥

' भीरु! परस्पर सटे हुए तुम्हारे ये सुवर्णमय कलशों के सदृश सुन्दर पीन उरोज किसके वक्षःस्थलोंको अपना स्पर्श प्रदान करेंगे? ॥ २३ ॥

सुवर्णचक्रप्रतिमं स्वर्णदामचितं पृथु ।

अध्यारोक्ष्यति कस्तेऽद्य जघनं स्वर्गरूपिणम् ॥ २४ ॥

' सोनेकी लड़ियोंसे विभूषित तथा सुवर्णमय चक्रके समान विपुल विस्तारसे युक्त तुम्हारे पीन जघनस्थलपर जो मूर्ति मान् स्वर्ग - सा जान पड़ता है, आज कौन आरोहण करेगा? ॥ २४ ॥

मद्विशिष्टः पुमान् कोऽद्य शक्रो विष्णुरथाश्विनौ ।

मामतीत्य हि यच्च त्वं यासि भीरु न शोभनम् ॥ २५ ॥

' इन्द्र, उपेन्द्र अथवा अश्विनीकुमार ही क्यों न हों, इस समय कौन पुरुष मुझसे बढ़कर है? भीरु! तुम मुझे छोड़कर अन्यत्र जा रही हो, यह अच्छा नहीं है ॥ २५ ॥

विश्रम त्वं पृथुश्रोणि शिलातलमिदं शुभम् ।

त्रैलोक्ये यः प्रभुश्चैव मदन्यो नैव विद्यते ॥ २६ ॥

‘ स्थूल नितम्बवाली सुन्दरी! यह सुन्दर शिला है, इस-पर बैठकर विश्राम करो । इस त्रिभुवनका जो स्वामी है, वह मुझसे भिन्न नहीं है— मैं ही सम्पूर्ण लोकोंका अधिपति हूँ ॥ २६ ॥

तदेवं प्राञ्जलिः प्रह्नो याचते त्वां दशाननः ।

भर्तुर्भर्ता विधाता च त्रैलोक्यस्य भजस्व माम् ॥२७ ॥

' तीनों लोकों के स्वामीका भी स्वामी तथा विधाता यह दशमुख रावण आज इस प्रकार विनीतभावसे हाथ जोड़कर

तुमसे याचना करता है । सुन्दरी! मुझे स्वीकार करो ' ॥ २७ ॥

रम्भा वेपमाना कृताञ्जलिः । एवमुक्ताब्रवीद् प्रसीद नार्हसे वक्तुमीदृशं त्वं हि मे गुरुः ॥ २८ ॥

रावणके ऐसा कहनेपर रम्भा काँप उठी और हाथ जोड़ कर बोली -- ' प्रभो! प्रसन्न होइये-- मुझपर कृपा कीजिये । आपको ऐसी बात मुँहसे नहीं निकालनी चाहिये; क्योंकि आप मेरे गुरुजन हैं -- पिताके तुल्य हैं ॥ २८ ॥

अन्येभ्योऽपि त्वया रक्ष्या प्राप्नुयां धर्षणं यदि ।

तद्धर्मतः स्नुषा तेऽहं तत्त्वमेतद् ब्रवीमि ते ॥ २ ९ ॥

" यदि दूसरे कोई पुरुष मेरा तिरस्कार करनेपर उतारू हों तो उनसे भी आपको मेरी रक्षा करनी चाहिये । मैं धर्मतः आपकी पुत्रवधू हूँ- यह आपसे सच्ची बात बता रही हूँ ' ॥

अथाब्रवीद् दशग्रीवश्चरणाधोमुखीं स्थिताम् ।

रोमहर्षमनुप्राप्तां दृष्टमात्रेण तां तदा ॥ ३० ॥

रम्भा अपने चरणोंकी ओर देखती हुई नीचे मुँह किये खड़ी थी । रावणकी दृष्टि पड़नेमात्र से भय के कारण उसके

रोंगटे खड़े हो गये थे । उस समय उससे रावणने कहा —॥३० ॥

सुतस्य यदि मे भार्या ततस्त्वं हि स्नुषा भवेः ।

वाढमित्येव सा रम्भा प्राह रावणमुत्तरम् ॥ ३१ ॥

रम्भे "! यदि यह सिद्ध हो जाय कि तुम मेरे बेटेकी बहू हो, तभी मेरी पुत्र - वधू हो सकती हो, अन्यथा नहीं । ' तब रम्भाने ' बहुत अच्छा ' कहकर रावणको इस प्रकार उत्तर दिया ॥ ३१ ॥

धर्मतस्ते सुतस्याहं भार्या राक्षसपुङ्गव ।

पुत्रः प्रियतरः प्राणैर्भ्रातुर्वैश्रवणस्य ते ॥ ३२ ॥

' राक्षस शिरोमणे! धर्मके अनुसार मैं आपके पुत्रकी ही भार्या हूँ । आपके बड़े भाई कुबेरके पुत्र मुझे प्राणोंसे भी बढ़कर प्रिय हैं ॥ ३२ ॥

विख्यातस्त्रिषु लोकेषु नलकूबर इत्ययम् ।

धर्मतो यो भवेद् विप्रः क्षत्रियो वीर्यतो भवेत् ॥ ३३ ॥

' वे तीनों लोकोंमें ' नलकूबर ' नामसे विख्यात हैं तथा धर्मानुष्ठान की दृष्टिसे ब्राह्मण और पराक्रमकी दृष्टिसे क्षत्रिय हैं ॥

क्रोधाद् यश्च भवेदग्निः क्षान्त्या च वसुधासमः ।

तस्यास्मि कृतसंकेता लोकपालसुतस्य वै ॥ ३४ ॥

' वे क्रोधमें अग्नि और क्षमामें पृथ्वीके समान हैं । उन्हीं लोकपालकुमार प्रियतम नलकूबरको आज मैंने मिलने के लिये संकेत दिया है ॥ ३४ ॥

तमुद्दिश्य तु मे सर्वे विभूषणमिदं कृतम् ।

यथा तस्य हि नान्यस्य भावो मां प्रति तिष्ठति ॥ ३५ ॥

" यह सारा शृङ्गार मैंने उन्हींके लिये धारण किया है: जैसे उनका मेरे प्रति अनुराग है, उसी प्रकार मेरा भी उन्हीं के प्रति प्रगाढ़ प्रेम है, दूसरे किसीके प्रति नहीं ॥ ३५ ॥

तेन सत्येन मां राजन् मोक्तुमर्हस्यरिंदम ।

स हि तिष्ठति धर्मात्मा मां प्रतीक्ष्य समुत्सुकः ॥ ३६ ॥

" शत्रुओंका दमन करनेवाले राक्षसराज! इस सत्यको

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उत्तरकाण्डे षर्विशः सर्गः १५२३ दृष्टिमें रखकर आप इस समय मुझे छोड़ दीजिये; वे मेरे धर्मात्मा प्रियतम उत्सुक होकर मेरी प्रतीक्षा करते होंगे ॥ ३६ ॥

तत्र विघ्नं तु तस्येह कर्तुं नार्हसि मुञ्च माम् ।

सङ्गिराचरितं मार्ग गच्छ राक्षसपुङ्गव ॥ ३७ ॥

' उनकी सेवा के इस कार्यमें आपको यहाँ विघ्न नहीं डालना चाहिये । मुझे छोड़ दीजिये । राक्षसराज! आप सत्पुरुषोंद्वारा आचरित धर्मके मार्गपर चलिये ॥ ३७ ॥

माननीयो मम त्वं हि पालनीया तथास्मि ते ।

एवमुक्तो दशग्रीवः प्रत्युवाच विनीतवत् ॥ ३८ ॥

' आप मेरे माननीय गुरुजन हैं, अतः आपको मेरी रक्षा करनी चाहिये । ' यह सुनकर दशग्रीवने उसे नम्रतापूर्वक उत्तर दिया- ॥ ३८ ॥

स्नुपारिम यदवोचस्त्वमेकपत्नीष्वयं क्रमः ।

देवलोकस्थितिरियं सुराणां शाश्वती मता ॥ ३ ९ ॥

पतिरप्सरसां नास्ति न चैकस्त्रीपरिग्रहः । ' रम्भे! तुम अपनेको जो मेरी पुत्रवधू बता रही हो, वह ठीक नहीं जान पड़ता । यह नाता - रिश्ता उन स्त्रियों के लिये लागू होता है, जो किसी एक पुरुषकी पत्नी हों । तुम्हारे देवलोककी तो स्थिति ही दूसरी है । वहाँ सदासे यही नियम

चला आ रहा है कि अप्सराओंका कोई पति नहीं होता ।

वहाँ कोई एक स्त्रीके साथ विवाह करके नहीं रहता है ' ॥

एवमुक्त्वा स तां रक्षो निवेश्य च शिलातले ॥ ४० ॥

कामभोगाभिसंरको मैथुनायोपचक्रमे । ऐसा कहकर उस राचसने रम्भाको बलपूर्वक शिलापर बैठा लिया और कामभोगमें आसक्त हो उसके साथ समागम किया ॥ ४०३ ॥

सा विमुक्ता ततो रम्भा भ्रष्टमाल्यविभूषणा ॥ ४१ ॥

गजेन्द्राक्रीडमथिता नदीवाकुलतां गता । उसके पुष्पहार टूटकर गिर गये, सारे आभूषण अस्त-व्यस्त हो गये 1 । उपभोगके बाद रावणने रम्भा को छोड़ दिया । उसकी दशा उस नदीके समान हो गयी जिसे किसी गजराजने क्रीडा करके मथ डाला हो; वह अत्यन्त व्याकुल हो उठी ॥ लुलिताकुलकेशान्ता करवेपितपल्लवा ॥ ४२ ॥

पवनेनावधूतेव लता कुसुमशालिनी । वेणी - बन्ध टूट जानेसे उसके खुले हुए केश हवामें उड़ने लगे — उसका शृङ्गार बिगड़ गया । कर - पल्लव काँपने लगे । वह ऐसी लगती थी -- मानो फूलोंसे सुशोभित होनेवाली किसी लताको हवाने झकझोर दिया हो ॥ ४२३ ॥

सा वेपमाना लज्जन्ती भीता करकृताञ्जलिः ॥ ४३ ॥

नलकूबरमासाद्य पादयोर्निपपात ह । लज्जा और भयसे काँपती हुई वह नलकूबरके पास गयी और हाथ जोड़कर उनके पैरोंपर गिर पड़ी ॥ ४३३ ॥

तदवस्थां च तां दृष्ट्रा महात्मा नलकूबरः ॥ ४४ ॥

अग्रवीत् किमिदं भद्रे पादयोः पतितासि मे । रम्भाको इस अवस्थामें देखकर महामना नलकूबरने पूछा- ' भद्रे! क्या बात है? तुम इस तरह मेरे पैरोंपर क्यों पड़ गयीं? ' || ४४३ ॥ सावै निःश्वसमाना तु वेपमाना कृताञ्जलिः ॥ ४५ ॥

तस्मै सर्व यथातत्त्वमाख्यातुमुपचक्रमे । वह थर - थर काँप रही थी । उसने लंबी साँस खींच-कर हाथ जोड़ लिये और जो कुछ हुआ था, वह सब ठीक-ठीक बताना आरम्भ किया ।! - ४५३ ॥ एष देव दशग्रीवः प्राप्तो गन्तुं त्रिविष्टपम् ॥ ४६ ॥

तेन सैन्यसहायेन निशेयं परिणामिता । ' देव! यह दशमुख रावण स्वर्गलोकपर आक्रमण करनेके लिये आया है । इसके साथ बहुत बड़ी सेना है । उसने आज-की रातमें यहीं डेरा डाला है ॥ ४६३ ॥

आयान्ती तेन दृष्टास्मि त्वत्सकाशमरिंदम ॥ ४७ ॥

गृहीता तेन पृष्टास्मि कस्य त्वमिति रक्षसा । ' शत्रुदमन वीर! मैं आपके पास आ रही थी, किंतु उस राक्षसने मुझे देख लिया और मेरा हाथ पकड़ लिया । फिर पूछा- ' तुम किसकी स्त्री हो? ' ॥ ४७३ ॥

मया तु सर्वं यत् सत्यं तस्मै सर्व निवेदितम् ॥ ४८ ॥

काममोहाभिभूतात्मा नाश्रौषीत् तद् वचो मम । " मैंने उसे सब कुछ सच सच बता दिया, किंतु उसका हृदय कामजनित मोहसे आक्रान्त था, इसलिये मेरी वह बात नहीं सुनी ॥ ४८३ ॥

याच्यमानो मया देव स्तुपा तेऽहमिति प्रभो ॥ ४ ९ ॥ तत् सर्वं पृष्ठतः कृत्वा बलात् तेनास्मि धर्षिता । ' देव! मैं बारंबार प्रार्थना करती ही रह गयी कि प्रभो! मैं आपकी पुत्रवधू हूँ, मुझे छोड़ दीजिये; किंतु उसने मेरी सारी बातें अनसुनी कर दीं और बलपूर्वक मेरे साथ अत्याचार किया ॥ ४ ९ ३ ॥ एवं त्वमपराधं मे क्षन्तुमर्हसि सुव्रत ॥ ५० ॥

नहि तुल्यं बलं सौम्य स्त्रियाश्च पुरुषस्य हि । ' उत्तम व्रतका पालन करनेवाले प्रियतम! इस बेबसीकी दशामें मुझसे जो अपराध बन गया है, उसे आप क्षमा करें । सौम्य! नारी अबला होती है, उसमें पुरुषके बराबर शारीरिक बल नहीं होता है ( इसीलिये उस दुष्टसे अपनी रक्षा मैं नहीं कर सकी ) ' ॥ ५०३ ॥

एतच्छ्रुत्वा तु संक्रुद्धस्तदा वैश्रवणात्मजः ॥ ५१ ॥

धर्षणां तां परां श्रुत्वा ध्यानं सम्प्रविवेश ह । यह सुनकर वैश्रवणकुमार नलकूबरको बड़ा क्रोध हुआ । रम्भापर किये गये उस महान् अत्याचारको सुनकर उन्होंने ध्यान लगाया ॥ ५१३ ॥

तस्य तत् कर्म विज्ञाय तदा वैश्रवणात्मजः ॥ ५२ ॥