Ramayana 2 — पृष्ठ 741–750
वाल्मीकि रामायण — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 741–750
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१५२४ श्रीमवाल्मीकीयरामायणे मुहूर्तात् क्रोधताम्राक्षस्तोयं जग्राह पाणिना । उस समय दो ही घड़ीमें रावणकी उस करतूतको जानकर वैश्रवणपुत्र नलकुबर के नेत्र क्रोधसे लाल हो गये और उन्होंने अपने हाथमें जल लिया ॥ ५२३ ॥
गृहीत्वा सलिलं सर्वमुपस्पृश्य यथाविधि ॥ ५३ ॥
उत्ससर्ज तदा शापं राक्षसेन्द्राय दारुणम् । जल लेकर पहले विधिपूर्वक आचमन करके नेत्र आदि सारी इन्द्रियों का स्पर्श करनेके अनन्तर उन्होंने राक्षसराजको बड़ा भयंकर शाप दिया ॥ ५३३ ॥
अकामा तेन यस्मात् त्वं बलाद् भद्रे प्रधर्षिता ॥ ५४ ॥
तस्मात् स युवतीमन्यां नाकामामुपयास्यति । वे बोले - ' भद्रे! तुम्हारी इच्छा न रहनेपर भी रावणने तुमपर बलपूर्वक अत्याचार किया है । अतः वह आजसे दूसरी किसी ऐसी युवती से समागम नहीं कर सकेगा जो उसे चाहती न हो ॥ ५४३ ॥
यदा कामां कामार्तो धर्षयिष्यति योषितम् ॥ ५५ ॥
मूर्धा तु सप्तधा तस्य शकलीभविता तदा । ' यदि वह कामपीड़ित होकर उसे न चाहनेवाली युवती-पर बलात्कार करेगा तो तत्काल उसके मस्तकके सात टुकड़े हो जायँगे ॥ ५५३ ॥
तस्मिन्नुदाहृते शापे ज्वलिताग्निसमप्रभे ॥ ५६ ॥
देवदुन्दुभयो नेदुः पुष्पवृष्टिश्च खाच्च्युता । नलकूबर के मुखसे प्रज्वलित अग्निके समान दग्ध कर देनेवाले इस शापके निकलते ही देवताओंकी दुन्दुभियाँ बज उठीं और आकाशसे फूलोंकी वर्षा होने लगी ॥ ५६३ ॥
पितामहमुखाश्चैव सर्वे देवाः प्रहर्षिताः ॥ ५७ ॥
ज्ञात्वा लोकगतिं सर्वा तस्य मृत्युं च रक्षसः ।
ऋषयः पितरश्चैव प्रीतिमापुरनुत्तमाम् ॥ ५८ ॥
ब्रह्मा आदि सभी देवताओंको बड़ा हर्ष हुआ । रावणके द्वारा की गयी लोककी सारी दुर्दशाको और उस राक्षसकी मृत्युको भी जानकर ऋषियों तथा पितरोंको बड़ी प्रसन्नता प्राप्त हुई ॥ ५७-५८ ॥
श्रुत्वा तु स दशग्रीवस्तं शापं रोमहर्षणम् ।
नारीषु मैथुनीभावं नाकामास्वभ्यरोचयत् ॥ ५ ९ ॥
उस रोमाञ्चकारी शापको सुनकर दशग्रीवने अपनेको न चाहनेवाली स्त्रियोंके साथ बलात्कार करना छोड़ दिया ॥ ५ ९ ॥
तेन नीताः स्त्रियः प्रीतिमापुः सर्वाः पतिव्रताः ।
नलकूबरनिर्मुक्तं शापं श्रुत्वा मनः प्रियम् ॥ ६० ॥
वह जिन - जिन पतिव्रता स्त्रियोंको हरकर ले गया था, उन
सबके मनको नलकूबरका दिया वह शाप बड़ा प्रिय लगा ।
उसे सुनकर वे सब की सब बहुत प्रसन्न हुई ॥ ६० ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये उत्तरकाण्डे षडविंशः सर्गः ॥ २५ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें छब्बीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ २६ ॥
सप्तविंशः सर्गः सेनासहित रावणका इन्द्रलोकपर आक्रमण, इन्द्रकी भगवान् विष्णु से सहायता के लिये प्रार्थना, भविष्य में रावण वधकी प्रतिज्ञा करके विष्णुका इन्द्रको लौटाना, देवताओं और राक्षसोंका युद्ध तथा बसुके द्वारा सुमालीका वध
कैलासं लङ्घयित्वा तु ससैन्यबलवाहनः ।
आससाद महातेजा इन्द्रलोकं दशाननः ॥ १ ॥
कैलास पर्वतको पार करके महातेजस्वी दशमुख रावण सेना और सवारियोंके साथ इन्द्रलोकमें जा पहुँचा ॥ १ ॥
तस्य राक्षससैन्यस्य समन्तादुपयास्यतः ।
देवलोके बभौ शब्दो भिद्यमानार्णवोपमः ॥ २ ॥
सब ओरसे आती हुई राक्षस - सेनाका कोलाहल देवलोकमें ऐसा जान पड़ता था, मानो महासागरके मथे जानेका शब्द प्रकट हो रहा हो ॥ २ ॥
श्रुत्वा तु रावणं प्राप्तमिन्द्रश्चलित आसनात् ।
देवानथाब्रवीत् तत्र सर्वानेव समागतान् ॥ ३ ॥
रावणका आगमन सुनकर इन्द्र अपने आसनसे उठ गये और अपने पास आये हुए समस्त देवताओंसे बोले- ॥
आदित्यांश्च वसून् रुद्रान् साध्यांश्च समरुद्गणान् ।
सज्जा भवत युद्धार्थे रावणस्य दुरात्मनः ॥ ४ ॥
उन्होंने आदित्यों, वसुओं, रुद्रों, साध्यों तथा मरुद्गणसे भी कहा – ' तुम सब लोग दुरात्मा रावणके साथ युद्ध करनेके लिये तैयार हो जाओ ' ॥ ४ ॥
एवमुक्तास्तु शक्रेण देवाः शक्रसमा युधि ।
संनह्य सुमहासत्त्वा युद्धश्रद्धासमन्विताः ॥ ५ ॥
इन्द्रके ऐसा कहनेपर युद्ध में उन्हींके समान पराक्रम प्रकट करनेवाले महाबली देवता कवच आदि धारण करके युद्धके लिये उत्सुक हो गये ॥ ५ ॥
स तु दीनः परित्रस्तो महेन्द्रो रावणं प्रति ।
विष्णोः समीपमागत्य वाक्यमेतदुवाच ह ॥ ६ ॥
देवराज इन्द्रको रावणसे भय हो गया था । अतः वे दुखी हो भगवान् विष्णुके पास आये और इस प्रकार बोले- ॥
विष्णो कथं करिष्यामि रावणं राक्षसं प्रति ।
अहोऽतिबलवद् रक्षो युद्धार्थमभिवर्तते ॥ ७ ॥
' विष्णुदेव! मैं राक्षस रावणके लिये क्या करूँ? अहो!
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उत्तरकाण्डे सप्तविंशः सर्गः १५२५ वह अत्यन्त बलशाली निशाचर मेरे साथ युद्ध करने के लिये आ रहा है ॥ ७ ॥
वरप्रदानाद् बलवान् न खल्वन्येन हेतुना ।
तत् तु सत्यं वचः कार्ये यदुक्तं पद्मयोनिना ॥ ८ ॥
" वह केवल ब्रह्माजी के वरदान के कारण प्रबल हो गया है; दूसरे किसी हेतुसे नहीं । कमलयोनि ब्रह्माजीने जो वर दे दिया है, उसे सत्य करना हम सब लोगोंका काम है ॥ ८ ॥
तद् यथा नमुचिर्वृत्रो बलिर्नरकशम्बरौ ।
त्वबलं समवष्टभ्य मया दग्धास्तथा कुरु ॥ ९ ॥
' अतः जैसे पहले आपके बलका आश्रय लेकर मैंने नमुचि, वृत्रासुर, बलि, नरक और शम्बर आदि असुरोको दग्ध कर डाला है, उसी प्रकार इस समय भी इस असुरका अन्त हो जाय, ऐसा कोई उपाय आप ही कीजिये ॥ ९ ॥
नान्यो देवदेवेश त्वद्यते मधुसूदन ।
गतिः परायणं चापि त्रैलोक्ये सचराचरे ॥ १० ॥
' मधुसूदन! आप देवताओंके भी देवता एवं ईश्वर हैं । इस चराचर त्रिभुवनमें आपके सिवा दूसरा कोई ऐसा नहीं है, जो हम देवताओंको सहारा दे सके । आप ही हमारे परम आश्रय हैं ॥ १० ॥
त्वं हि नारायणः श्रीमान् पद्मनाभः सनातनः ।
त्वयेमे स्थापिता लोकाः शक्रश्चाहं सुरेश्वरः ॥ ११ ॥
' आप पद्मनाभ हैं - आपहीके नाभिकमलसे जगत् की उत्पत्ति हुई है । आप ही सनातनदेव श्रीमान् नारायण हैं । आपने ही इन तीनों लोकोंको स्थापित किया है और आपने ही मुझे देवराज इन्द्र बनाया है ॥ ११ ॥
त्वया सृष्टमिदं सर्वं त्रैलोक्यं सचराचरम् ।
त्वामेव भगवन् सर्वे प्रविशन्ति युगक्षये ॥ १२ ॥
• ' भगवन् | आपने ही स्थावर - जङ्गम प्राणियसहित इस समस्त त्रिलोकीकी सृष्टि की है और प्रलयकालमें सम्पूर्ण भूत ' आपमें ही प्रवेश करते हैं ॥ १२ ॥
तदाचक्ष्व यथातत्त्वं देवदेव मम स्वयम् ।
असिचक्रसहायस्त्वं योत्स्यसे रावणं प्रति ॥ १३ ॥
“ इसलिये देवदेव! आप ही मुझे कोई ऐसा अमोघ उपाय बताइये, जिससे मेरी विजय हो । क्या आप स्वयं चक्र और तलवार लेकर रावणसे युद्ध करेंगे? ' ॥ १३ ॥
एवमुक्तः स शक्रेण देवो नारायणः प्रभुः ।
अब्रवीन्न परित्रासः कर्तव्यः श्रूयतां च मे ॥ १४ ॥
इन्द्रके ऐसा कहनेपर भगवान् नारायणदेव बोले-" देवराज! तुम्हें भय नहीं करना चाहिये । मेरी बात सुनो ॥
न तावदेष दुष्टात्मा शक्यो जेतुं सुरासुरैः ।
हन्तुं चापि समासाद्य वरदानेन दुर्जयः ॥ १५ ॥
“ पहली बात तो यह है इस दुष्टात्मा रावणको सम्पूर्ण देवता और असुर मिलकर भी न तो मार सकते हैं और न परास्त ही कर सकते हैं; क्योंकि वरदान पानेके कारण यह इस समय दुर्जय हो गया है ॥ १५ ॥
सर्वथा तु महत् कर्म करिष्यति बलोत्कटः ।
राक्षसः पुत्रसहितो दृष्टमेतन्निसर्गतः ॥ १६ ॥
' अपने पुत्र के साथ आया हुआ यह उत्कट बलशाली राक्षस सब प्रकारसे महान् पराक्रम प्रकट करेगा । यह बात मुझे अपनी स्वाभाविक ज्ञानदृष्टिसे दिखायी दे रही है ॥ १६ ॥
यत् तु मां त्वमभाषिष्ठा युध्यस्वेति सुरेश्वर ।
नाहं तं प्रतियोत्स्यामि रावणं राक्षसं युधि ॥ १७ ॥
' सुरेश्वर! दूसरी बात जो मुझे कहनी है, इस प्रकार है-तुम जो मुझसे कह रहे थे कि ' आप ही उसके साथ युद्ध कीजिये ' उसके उत्तरमें निवेदन है कि मैं इस समय युद्ध-स्थलमें राक्षस रावणका सामना करने के लिये नहीं जाऊँगा ||
नाहत्वा समरे शत्रुं विष्णुः प्रतिनिवर्तते ।
दुर्लभश्चैव कामोऽद्य वरगुप्ताद्धि रावणात् ॥ १८ ॥
' मुझ विष्णुका यह स्वभाव है कि मैं संग्राममें शत्रुका वध किये बिना पीछे नहीं लौटता; परंतु इस समय रावण वरदानसे सुरक्षित है, इसलिये उसकी ओरसे मेरी इस विजय -सम्बन्धिनी इच्छाकी पूर्ति होनी कठिन है ॥ १८ ॥
प्रतिजाने च देवेन्द्र त्वत्समीपे शतक्रतो ।
भवितास्मि यथास्याहं रक्षसो मृत्युकारणम् ॥ १ ९ ॥
' परंतु देवेन्द्र! शतक्रतो! मैं तुम्हारे समीप इस बातकी प्रतिज्ञा करता हूँ कि समय आनेपर मैं ही इस राक्षसकी मृत्युका कारण बनूँगा || १ ९ ॥
अहमेव निहन्तास्मि रावणं सपुरःसरम् ।
देवता नन्दयिष्यामि ज्ञात्वा कालमुपागतम् ॥ २० ॥
" मैं ही रावणको उसके अग्रगामी सैनिकसहित मारूँगा और देवताओंको आनन्दित करूँगा; परंतु यह तभी होगा जब मैं जान लूँगा कि इसकी मृत्युका समय आ पहुँचा है ॥
एतत् ते कथितं तस्वं देवराज शचीपते ।
युद्धयस्व विगतत्रासः सुरैः सार्धं महाबल ॥ २१ ॥
‘ देवराज! ये सब बातें मैंने तुम्हें ठीक - ठीक बता दीं । महाबलशाली शचीवल्लभ! इस समय तो तुम्हीं देवताओं-सहित जाकर उस राक्षसके साथ निर्भय हो युद्ध करो ' ॥ २१ ॥
ततो रुद्राः सहादित्या वसवो मरुतोऽश्विनौ ।
संनद्धा निर्ययुस्तूर्ण राक्षसानभितः पुरात् ॥ २२ ॥
तदनन्तर रुद्र, आदित्य, वसु, मरुद्गण और अश्विनी-कुमार आदि देवता युद्धके लिये तैयार होकर तुरंत अमरावती-पुरीसे बाहर निकले और राक्षसोंका सामना करने के लिये आगे बढ़े ॥ २२ ॥
एतस्मिन्नन्तरे नादः शुश्रुवे रजनीक्षये ।
तस्य रावणसैन्यस्य प्रयुद्धस्य समन्ततः ॥ २३ ॥
इसी बीचमें रात बीतते - बीतते सब ओरसे युद्ध के लिये
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१५२६- श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे उद्यत हुई रावण की सेनाका महान् कोलाहल सुनायी देने लगा ॥ २३ ॥
ते प्रबुद्धा महावीर्या अन्योन्यमभिवीक्ष्य वै ।
संग्राममेवाभिमुखा अभ्यवर्तन्त हृष्टवत् ॥ २४ ॥
वे महापराक्रमी राक्षससैनिक सबेरे जागनेपर एक दूसरेकी ओर देखते हुए बड़े हर्ष और उत्साह के साथ युद्ध के लिये ही आगे बढ़ने लगे ॥ २४ ॥
ततो दैवतसैन्यानां संक्षोभः समजायत ।
तदक्षयं महासैन्यं eg. समरमूर्धनि ॥ २५ ॥
तदनन्तर युद्धके मुहाने पर राक्षसोंकी उस अनन्त एवं विशाल सेनाको देखकर देवताओंकी सेनामें बड़ा क्षोभ हुआ ॥ २५ ॥
ततो युद्धं समभवद् देवदानवरक्षसाम् ।
घोरं तुमुलनिर्ह्रादं नानाप्रहरणोद्यतम् ॥ २६ ॥
फिर तो देवताओंका दानवों और राक्षसों के साथ भयंकर युद्ध छिड़ गया । भयंकर कोलाहल होने लगा और दोनों ओरसे नाना प्रकारके अस्त्र - शस्त्रोंकी बौछार आरम्भ हो गयी ॥ २६ ॥
एतस्मिन्नन्तरे शूरा राक्षसा घोरदर्शनाः ।
युद्धार्थ समवर्तन्त सचिवा रावणस्य ते ॥ २७ ॥
इसी समय रावणके मन्त्री शूरवीर राक्षस, जो बड़े भयंकर दिखायी देते थे, युद्ध के लिये आगे बढ़ आये ॥ २७ ॥
मारीचश्च प्रहस्तश्च महापार्श्वमहोदरौ ।
अकम्पनो निकुम्भश्च शुकः सारण एव च ॥ २८ ॥
संहृादो धूमकेतुश्च महादंष्ट्रो घटोदरः ।
जम्बुमाली महाहादो विरूपाक्षश्च राक्षसः ॥ २ ९ ॥
सुतनो यज्ञकोपश्च दुर्मुखो दूषणः खरः ।
त्रिशिराः करवीराक्षः सूर्यशत्रुश्च राक्षसः ॥ ३० ॥
महाकायोऽतिकायश्च देवान्तकनरान्तकौ ।
एतैः सर्वैः परिवृतो महावीर्यैर्महाबलः ॥ ३१ ॥
रावणस्यार्यकः सैन्यं सुमाली प्रविवेश ह । मारीच, प्रहस्त, महापार्श्व, महोदर, अकम्पन निकुम्भ, शुक, सारण, संहृाद, धूमकेतु, महादंष्ट्र, घटोदर, जम्बुमाली, महाह्राद, विरूपाक्ष, सुप्तघ्न, यज्ञकोप, दुर्मुख, दूषण, खर, त्रिशिरा, करवीराक्ष, सूर्यशत्रु, महाकाय, अतिकाय, देवान्तक तथा नरान्तक — इन सभी महापराक्रमी राक्षसोंसे घिरे हुए महाबली सुमालीने, जो रावणका नाना था, देवताओंकी सेनामें प्रवेश किया ॥ २८-३१३ ॥ सं दैवतगणान् सर्वान् नानाप्रहरणैः शितैः ॥ ३२ ॥
व्यध्वंसयत् समं क्रुद्धो वायुर्जलधरानिव । उसने कुपित हो नाना प्रकारके पैने अस्त्र - शस्त्रोंद्वारा समस्त देवताओंको उसी तरह मार भगाया, जैसे वायु बादलों-को छिन्न - भिन्न कर देती है ॥ ३२३ ॥
तद् दैवतबलं राम हन्यमानं निशाचरैः ॥ ३३ ॥
प्रणुन्नं सर्वतो दिग्भ्यः सिंहनुन्ना मृगा इव । श्रीराम! निशाचरोंकी मार खाकर देवताओंकी वह सेना सिंहद्वारा खदेड़े गये मृगोंकी भाँति सम्पूर्ण दिशाओंमें भाग चली ॥ ३३३ ॥
एतस्मिन्नन्तरे शूरो वसूनामष्टमो वसुः ॥ ३४ ॥
सावित्र इति विख्यातः प्रविवेश रणाजिरम् । इसी समय वसुओंमेंसे आठवें वसुने, जिनका नाम सावित्र है, समराङ्गणमें प्रवेश किया ॥ ३४३ ॥
सैन्यैः परिवृतो हृष्टैर्नानाप्रहरणोद्यतैः ॥ ३५ ॥
त्रासयञ्शत्रुसैन्यानि प्रविवेश रणाजिरम् । वे नाना प्रकारके अस्त्र - शस्त्रोंसे सुसजित एवं उत्साहित सैनिकोंसे घिरे हुए थे । उन्होंने शत्रुसेनाओं को संत्रस्त करते हुए रणभूमिमें पदार्पण किया ॥ ३५ ॥
तथादित्यौ महावीर्यौ त्वष्टा पूषा च तौ समम् ॥ ३६ ॥
निर्भयौ सह सैन्येन तदा प्राविशतां रणे । इनके सिवा अदिति के दो महापराक्रमी पुत्र त्वष्टा और पूषाने अपनी सेनाके साथ एक ही समय युद्धस्थलमें प्रवेश किया, वे दोनों वीर निर्भय थे ॥ ३६३ ॥
ततो युद्धं समभवत् सुराणां सह राक्षसैः ॥ ३७ ॥
क्रुद्धानां रक्षसां कीर्ति समरेष्वनिवर्तिनाम् । फिर तो देवताओंका राक्षसों के साथ घोर युद्ध होने लगा । युद्धसे पीछे न हटनेवाले राक्षसोंकी बढ़ती हुई कीर्ति देख-सुनकर देवता उनके प्रति बहुत कुपित थे || ३७३ ॥ ततस्ते राक्षसाः सर्वे विबुधान् समरे स्थितान् ॥ ३८ ॥
नानाप्रहरणैर्घोरैर्जघ्नुः शतसहस्रशः । तत्पश्चात् समस्त राक्षस समरभूमिमें खड़े हुए लाखों देवताओंको नाना प्रकारके घोर अस्त्र - शस्त्रद्वारा मारने लगे ॥ ३८३ ॥
देवाश्च राक्षसान् घोरान् महाबलपराक्रमान् ॥ ३ ९ ॥ समरे विमलैः शस्त्रैरुपनिन्युर्यमक्षयम् । इसी तरह देवता भी महान् बल - पराक्रमसे सम्पन्न घोर राक्षसोंको समराङ्गणमें चमकीले अस्त्र - शस्त्रोंसे मार - मारकर यमलोक भेजने लगे ॥ ३ ९ ३ ॥ एतस्मिन्नन्तरे राम सुमाली नाम राक्षसः ॥ ४० ॥
नानाप्रहरणैः क्रुद्धस्तत्सैन्यं सोऽभ्यवर्तत ।
स दैवतबलं सर्व नानाप्रहरणैः शितैः ॥ ४१ ॥
व्यध्वंसयत संक्रुद्धो वायुर्जलधरं यथा । श्रीराम! इसी बीच में सुमाली नामक राक्षसने कुपित होकर नाना प्रकार के आयुधद्वारा देवसेनापर आक्रमण किया । उसने अत्यन्त क्रोधसे भरकर बादलोंको छिन्न - भिन्न कर देनेवाली वायुके समान अपने भाँति - भाँति के तीखे अस्त्र - शस्त्रद्वारा समस्त देवसेनाको तितर - बितर कर दिया ॥ ४०-४१३ ॥
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' उत्तरकाण्डे अष्टाविंशः सर्गः १५२७ ते महाबाणवर्षैश्च शूलप्रासैः सुदारुणैः ॥ ४२ ॥
हन्यमानाः सुराः सर्वे न व्यतिष्ठन्त संहताः । उसके महान् बाणों और भयंकर शूलों एवं प्रासोंकी वर्षांसे मारे जाते हुए सभी देवता युद्धक्षेत्रमें संगठित होकर खड़े न रह सके || ४२३ ॥ ततो विद्राव्यमाणेषु दैवतेषु सुमालिना ॥ ४३ ॥
वसूनामष्टमः क्रुद्धः सावित्रो वै व्यवस्थितः ।
संवृतः स्वैरथानीकैः प्रहरन्तं निशाचरम् ॥ ४४ ॥
सुमालीद्वारा देवताओंके भगाये जानेपर आठवें वसु सावित्रको बड़ा क्रोध हुआ । वे अपनी रथसेनाओंके साथ आकर उस प्रहार करनेवाले निशाचरके सामने खड़े हो गये ॥ ४३-४४ ॥
विक्रमेण महातेजा वारयामास संयुगे ।
ततस्तयोर्महद् युद्धमभवल्लोमहर्षणम् ॥ ४५ ॥
सुमालिनो बसोश्चैव समरेष्वनिवर्तिनोः । महातेजस्वी सावित्रने युद्धस्थल में अपने पराक्रमद्वारा सुमालीको आगे बढ़ने से रोक दिया । सुमाली और वसु दोनों में से कोई भी युद्ध से पीछे हटनेवाला नहीं था; अतः उन दोनों-में महान् एवं रोमाञ्चकारी युद्ध छिड़ गया || ४५३ ॥ ततस्तस्य महाबाणैर्वसुना सुमहात्मना ॥ ४६ ॥
निहतः पन्नगरथः क्षणेन विनिपातितः । तदनन्तर महात्मा वसुने अपने विशाल बाणोंद्वारा सुमालीके सर्प जुते हुए रथको क्षणभर में तोड़ - फोड़कर गिरा दिया ॥ ४६३ ॥
हत्वा तु संयुगे तस्य रथं वाणशतैश्चितम् ॥ ४७ ॥
गदां तस्य वधार्थाय वसुर्जग्राह पाणिना । इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये ततः प्रगृह्य दीप्तायां कालदण्डोपमां गदाम् ॥ ४८ ॥
तां मूर्ध्नि पातयामास सावित्रो वै सुमालिनः । युद्धस्थलमें सैकड़ों बाणसे छिदे हुए सुमालीके रथको नष्ट करके वसुने उस निशाचरके वध के लिये कालदण्डके समान एक भयंकर गदा हाथमें ली, जिसका अग्रभाग अग्नि समान प्रज्वलित हो रहा था । उसे लेकर सावित्रने सुमालीके मस्तकपर दे मारा || ४७-४८३ ॥ सा तस्योपरि चोल्काभा पतन्ती विबभौ गदा ॥ ४ ९ ॥ इन्द्रप्रमुक्ता गर्जन्ती गिराविव महाशनिः । उसके ऊपर गिरती हुई वह गदा उल्काके समान चमक उठी, मानो इन्द्रके द्वारा छोड़ी गयी विशाल अशनि भारी
गड़गड़ाहटके साथ किसी पर्वत के शिखरपर गिर रही हो । ४ ९ ३ ।
तस्य नैवास्थि न शिरो न मांसं ददृशे तदा ॥ ५० ॥
गदया भस्मतां नीतं निहतस्य रणाजिरे । उसकी चोट लगते ही समराङ्गणमें सुमालीका काम तमाम हो गया । न उसकी हड्डीका पता लगा, न मस्तकका और न कहीं उसका मांस हो दिखायी दिया । वह सब कुछ उस गदाकी आग से भस्म हो गया ॥ ५०३ ॥
तं दृष्ट्रा निहतं संख्ये राक्षसास्ते समन्ततः ॥ ५१ ॥
व्यद्रवन् सहिताः सर्वे क्रोशमानाः परस्परम् ।
विद्राव्यमाणा वसुना राक्षसा नावतस्थिरे ॥ ५२ ॥
युद्ध सुमालीको मारा गया देख वे सब राक्षस एक दूसरेको पुकारते हुए एक साथ चारों ओर भाग खड़े हुए । वसुके द्वारा खदेड़े जानेवाले वे राक्षस समरभूमिमें खड़े न रह सके ॥ ५१-५२ ॥ उत्तरकाण्डे सप्तविंशः सर्गः ॥ ३७ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें सत्ताईसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ २७ ॥
अष्टाविंशः सर्गः मेघनाद और जयन्तका युद्ध, पुलोमाका जयन्तको अन्यत्र ले जाना, देवराज इन्द्रका युद्धभूमि में पदार्पण, रुद्रों तथा मरुद्गणोंद्वारा राक्षस सेनाका संहार और इन्द्र तथा रावणका युद्ध
सुमालिनं हतं दृष्ट्रा वसुना भस्मसात्कृतम् ।
स्वसैन्यं विद्रुतं चापि लक्षयित्वार्दितं सुरैः ॥ १ ॥
ततः स बलवान् क्रुद्धो रावणस्य सुतस्तदा ।
निवर्त्य राक्षसान् सर्वान् मेघनादो व्यवस्थितः ॥ २ ॥
सुमाली मारा गया, वसुने उसके शरीरको भस्म कर दिया और देवताओंसे पीड़ित होकर मेरी सेना भागी जा रही है, यह देख रावणका बलवान् पुत्र मेघनाद कुपित हो समस्त राक्षसोंको लौटाकर देवताओंसे लोहा लेनेके लिये स्वयं खड़ा हुआ ॥ १-२ ॥
स रथेनाग्निवर्णेन कामगेन महारथः ।
अभिदुद्राव सेनां तां वनान्यग्निरिव ज्वलन् ॥ ३ ॥
वह महारथी वीर इच्छानुसार चलनेवाले अग्नितुल्य तेजस्वी रथपर आरूढ़ हो वनमें फैलनेवाले प्रज्वलित दावानल-के समान उस देवसेनाकी ओर दौड़ा ॥ ३ ॥
ततः प्रविशतस्तस्य विविधायुधधारिणः ।
विदुद्रुवुर्दिशः सर्वा दर्शनादेव देवताः ॥ ४ ॥
नाना प्रकारके आयुध धारण करके अपनी सेनामें प्रवेश करनेवाले उस मेघनादको देखते ही सब देवता सम्पूर्ण दिशाओं-की ओर भाग चले ॥ ४ ॥
न बभूव तदा कश्चिद् युयुत्सोरस्य सम्मुखे ।
सर्वानाविद्धय वित्रस्तांस्ततः शक्रोऽब्रवीत् सुरान् ॥५ ॥
उस समय युद्ध की इच्छावाले मेघनाद के सामने कोई भी
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१५२८ श्रीमद्द्वाल्मीकीयरामायणे खड़ा न हो सका । तब भयभीत हुए उन समस्त देवताओंको फटकारकर इन्द्र ने उनसे कहा – ॥ ५ ॥
न भेतव्यं न गन्तव्यं निवर्तध्वं रणे सुराः ।
एष गच्छति पुत्रो मे युद्धार्थमपराजितः ॥ ६ ॥
' देवताओ! भय न करो, युद्ध छोड़कर न जाओ और रणक्षेत्रमें लौट आओ । यह मेरा पुत्र जयन्त, जो कभी किसीसे परास्त नहीं हुआ है, युद्धके लिये जा रहा है ' ॥ ६ ॥
ततः शक्रसुतो देवो जयन्त इति विश्रुतः ।
रथेनाद्भुतकल्पेन संग्रामे सोऽभ्यवर्तत ॥ ७ ॥
तदनन्तर इन्द्रपुत्र जयन्तदेव अद्भुत सजावट युक्त रथपर आरूढ़ हो युद्ध के लिये आया ॥ ७ ॥
ततस्ते त्रिदशाः सर्वे परिवार्य शचीसुतम् ।
रावणस्य सुतं युद्धे समासाद्य प्रजघ्निरे ॥ ८ ॥
फिर तो सब देवता शचीपुत्र जयन्तको चारों ओरसे घेरकर युद्धस्थलमें आये और रावणके पुत्रपर प्रहार करने लगे ॥ ८ ॥
तेषां युद्धं समभवत् सदृशं देवरक्षसाम् ।
महेन्द्रस्य च पुत्रस्य राक्षसेन्द्रसुतस्य च ॥ ९ ॥
उस समय देवताओंका राक्षसोंके साथ और महेन्द्रकुमार-का रावणपुत्रके साथ उनके बल पराक्रमके अनुरूप युद्ध होने लगा ॥ ९ ॥
ततो मातलिपुत्रस्य गोमुखस्य स रावणिः ।
सारथेः पातयामास शरान् कनकभूषणान् ॥ १० ॥
रावणकुमार मेघनाद जयन्तके सारथि मातलिपुत्र गोमुख-पर सुवर्णभूषित बाणोंकी वर्षा करने लगा ॥ १० ॥
शचीसुतश्चापि तथा जयन्तस्तस्य सारथिम् ।
तं चापि रावणिः क्रुद्धः समन्तात् प्रत्यविध्यत ॥ ११ ॥
शचीपुत्र जयन्तने भी मेघनाद के सारथिको घायल कर दिया । तब कुपित हुए मेघनादने जयन्तको भी सब ओरसे क्षत - विक्षत कर दिया ॥ ११ ॥
स हि क्रोधसमाविष्टो बली विस्फारितेक्षणः ।
रावणिः शक्रतनयं शरवर्षैरवाकिरत् ॥ १२ ॥
उस समय क्रोधसे भरा हुआ बलवान् मेचनाद इन्द्रपुत्र जयन्तको आँखें फाड़ - फाड़कर देखने और बाणोंकी वर्षासे पीड़ित करने लगा ॥ १२ ॥
ततो नानाप्रहरणाञ्छितधारान् सहस्रशः ।
पातयामास संक्रुद्धः सुरसैन्येषु रावणिः ॥ १३ ॥
अत्यन्त कुपित हुए रावणकुमारने देवताओंकी सेनापर भी तीखी धारवाले नाना प्रकारके सहस्रों अस्त्र - शस्त्र बरसाये ॥ शतघ्नी मुसलप्रासगदाखङ्गपरश्वधान् 1 महान्ति गिरिश्टङ्गाणि पातयामास रावणिः ॥ १४ ॥
उसने शतघ्नी, मूसल, प्रास, गदा, खड्ग और फरसे गिराये तथा बड़े - बड़े पर्वत शिखर भी चलाये ॥ १४ ॥
ततः प्रव्यथिता लोकाः संजज्ञे च तमस्ततः ।
तस्य रावणपुत्रस्य शत्रुसैन्यानि निघ्नतः ॥ १५ ॥
शत्रुसेनाओंके संहारमें लगे हुए रावणकुमारकी मायासे उस समय चारों ओर अन्धकार छा गया; अतः समस्त लोक व्यथित हो उठे ॥ १५ ॥
ततस्तद् दैवतबलं समन्तात् तं शचीसुतम् ।
बहुप्रकारमस्वस्थमभवच्छरपीडितम् ॥ १६ ॥
तब शचीकुमारके चारों ओर खड़ी हुई देवताओंकी वह सेना बाणोंद्वारा पीड़ित हो अनेक प्रकारसे अस्वस्थ हो गयी ॥
नाभ्यजानन्त चान्योन्यं रक्षो वा देवताथवा ।
तत्र तत्र विपर्यस्तं समन्तात् परिधावत ॥ १७ ॥
राक्षस और देवता आपसमें किसीको पहचान न सके ।
वे जहाँ - तहाँ बिखरे हुए चारों ओर चक्कर काटने लगे ॥१७ ॥
देवा देवान् निजघ्नुस्ते राक्षसान् राक्षसास्तथा ।
सम्मूढास्तमसाच्छन्ना व्यद्रवन्नपरे तथा ॥ १८ ॥
अन्धकार से आच्छादित होकर वे विवेकशक्ति खो बैठे थे । अतः देवता देवताओंको और राक्षस राक्षसोंको ही मारने लगे तथा बहुतेरे योद्धा युद्धसे भाग खड़े हुए ॥ १८ ॥
एतस्मिन्नन्तरे वीरः पुलोमा नाम वीर्यवान् ।
दैत्येन्द्रस्तेन संगृह्य शचीपुत्रोऽपवाहितः ॥ १ ९ ॥
इसी बीचमें पराक्रमी वीर दैत्यराज पुलोमा युद्धमें आया और शचीपुत्र जयन्तको पकड़कर वहाँसे दूर हटा ले गया ॥
संगृह्य तं तु दौहित्रं प्रविष्टः सागरं तदा ।
आर्यकः स हि तस्यासीत् पुलोमा येन सा शची ॥२० ॥
वह शचीका पिता और जयन्तका नाना था, अतः अपने दौहित्रको लेकर समुद्र में घुस गया ॥ २० ॥
ज्ञात्वा प्रणाशं तु तदा जयन्तस्याथ देवताः ।
अप्रहृष्टास्ततः सर्वा व्यथिताः सम्प्रदुद्रुवुः ॥ २१ ॥
देवताओंको जब जयन्तके गायब होने की बात मालूम हुई, तब उनकी सारी खुशी छिन गयी और वे दुखी होकर चारों ओर भागने लगे ॥ २१ ॥
रावणिस्त्वथ संक्रुद्धो बलैः परिवृतः स्वकैः ।
अभ्यधावत देवांस्तान् मुमोच च महास्वनम् ॥ २२ ॥
उधर अपनी सेनाओं से घिरे हुए रावणकुमार मेघनादने अत्यन्त कुपित हो देवताओंपर धावा किया और बड़े जोरसे गर्जना की || २२ ॥
er प्रणाशं पुत्रस्य दैवतेषु च विद्रुतम् ।
मातलिं चाह देवेशो रथः समुपनीयताम् ॥ २३ ॥
पुत्र लापता हो गया और देवताओंकी सेनामें भगदड़ मच गयी है — यह देखकर देवराज इन्द्रने मातलिसे कहा-' मेरा रथ ले आओ ' ॥ २३ ॥
स तु दिव्यो महाभीमः सज्ज एव महारथः ।
उपस्थितो मातलिना वाह्यमानो महाजवः ॥ २४ ॥
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उत्तरकाण्डे अष्टाविंशः सर्गः १५२ ९ मातलिने एक सजा - सजाया महाभयङ्कर, दिव्य एवं विशाल रथ लाकर उपस्थित कर दिया । उसके द्वारा हाँका जानेवाला वह रथ बड़ा ही वेगशाली था ॥ २४ ॥
ततो मेघा रथे तस्मिंस्तडित्वन्तो महाबलाः ।
अग्रतो वायुचपला नेदुः परमनिःखनाः ॥ २५ ॥
तदनन्तर उस रथपर बिजलीसे युक्त महाबली मेघ उसके अग्रभागमें वायुसे चञ्चल हो बड़े जोर - जोरसे गर्जना करने लगे ॥ २५ ॥
नानावाद्यानि वाद्यन्त गन्धर्वाश्च समाहिताः ।
ननृतुश्चाप्सरः सङ्घा निर्याते त्रिदशेश्वरे ॥ २६ ॥
देवेश्वर इन्द्रके निकलते ही नाना प्रकारके बाजे बज उठे, गन्धर्व एकाग्र हो गये और अप्सराओंके समूह नृत्य करने लगे || २६ ॥
रुद्रैर्वसुभिरादित्यैरश्विभ्यां समरुद्गणैः ।
वृतो नानाप्रहरणैर्निर्ययौ त्रिदशाधिपः ॥ २७ ॥
तत्पश्चात् रुद्रों, वसुओं, आदित्यों, अश्विनीकुमारों और मरुद्गणोंसे घिरे हुए देवराज इन्द्र नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्र साथ लिये पुरीसे बाहर निकले ॥ २७ ॥
निर्गच्छतस्तु शक्रस्य परुषः पवनो ववैौ ।
भास्करो निष्प्रभश्चैव महोल्काश्च प्रपेदिरे ॥ २८ ॥
इन्द्रके निकलते ही प्रचण्ड वायु चलने लगी 1 । सूर्यकी प्रभा फीकी पड़ गयी और आकाशसे बड़ी - बड़ी उल्काएँ
गिरने लगीं ॥। २८ ॥
एतस्मिन्नन्तरे शूरो दशग्रीवः प्रतापवान् ।
आरुरोह रथं दिव्यं निर्मितं विश्वकर्मणा ॥ २ ९ ॥
इसी बीचमें प्रतापी वीर दशग्रीव भी विश्वकर्माके बनाये हुए दिव्य रथपर सवार हुआ ॥ २ ९ ॥
पन्नगैः सुमहाकायैर्वेष्टितं लोमहर्षणैः ।
येषां निःश्वासवातेन प्रदीप्तमिव संयुगे ॥ ३० ॥
उस रथमें रोंगटे खड़े कर देनेवाले विशालकाय सर्प लिपटे हुए थे । उनकी निःश्वास- वायुसे वह रथ उस युद्धस्थलमें ज्वलित - सा जान पड़ता था ॥ ३० ॥
दैत्यैर्निशाचरैश्चैव स रथः परिवारितः ।
समराभिमुखो दिव्यो महेन्द्रं सोऽभ्यवर्तत ॥ ३१ ॥
दैत्यों और निशाचरोंने उस रथको सब ओरसे घेर रक्खा था । समराङ्गणकी ओर बढ़ता हुआ रावणका वह दिव्य रथ महेन्द्रके सामने जा पहुँचा ॥ ३१ ॥
पुत्रं तं वारयित्वा तु स्वयमेव व्यवस्थितः ।
सोऽपि युद्धाद् विनिष्क्रम्य रावणिः समुपाविशत् ॥ ३२ ॥
रावण अपने पुत्रको रोककर स्वयं ही युद्धके लिये खड्डा हुआ । तब रावणपुत्र मेघनाद युद्धस्थलसे निकलकर चुप-चाप अपने रथपर जा बैठा ॥ ३२ ॥
ततो युद्धं प्रवृत्तं तु सुराणां राक्षसैः सह ।
वा ० रा ० ५.११.१२-शस्त्राणि वर्षतां तेषां मेघानामिव संयुगे ॥ ३३ ॥
फिर तो देवताओंका राक्षसोंके साथ घोर युद्ध होने लगा । जलकी वर्षा करनेवाले मेत्रोंके समान देवता युद्धस्थलमें अस्त्र-शस्त्रोंकी वर्षा करने लगे ॥ ३३ ॥
कुम्भकर्णस्तु दुष्टात्मा नानाप्रहरणोद्यतः ।
नाज्ञायत तदा राजन् युद्धं केनाभ्यपद्यत ॥ ३४ ॥
राजन्! दुष्टात्मा कुम्भकर्ण नाना प्रकार के अस्त्र - शस्त्र लिये किसके साथ युद्ध करता था, इसका पता नहीं लगता था ( अर्थात् मतवाला होनेके कारण अपने और पराये सभी सैनिकोंके साथ जूझने लगता था ) ॥ ३४ ॥
दन्तैः पादैर्भुजैर्हस्तैः शक्तितोमरमुद्गरैः ।
येन तेनैव संक्रुद्धस्ताडयामास देवताः ॥ ३५ ॥
वह अत्यन्त कुपित हो दाँत, लात, भुजा, हाथ, शक्ति, तोमर और मुद्गर आदि जो पाता उसीसे देवताओंको पीटता था ॥ ३५ ॥
स तु रुद्रैर्महाघोरैः संगम्याथ निशाचरः ।
प्रयुद्धस्तैश्च संग्रामे क्षतः शस्त्रैर्निरन्तरम् ॥ ३६ ॥
वह निशाचर महाभयङ्कर रुद्रोंके साथ भिड़कर घोर युद्ध करने लगा । संग्राममें रुद्रोंने अपने अस्त्र - शस्त्रोंद्वारा उसे ऐसा क्षत - विक्षत कर दिया था कि उसके शरीर में थोड़ी - सी भी जगह बिना घावके नहीं रह गयी थी । ३६ ॥
बभौ शस्त्राचिततनुः कुम्भकर्णः क्षरन्नसृक् ।
विद्युत्स्तनितनिर्घोषो धारावानिव तोयदः ॥ ३७ ॥
कुम्भकर्णका शरीर शस्त्रों से व्याप्त हो खूनकी धारा बहा रहा था । उस समय वह बिजली तथा गर्जनासे युक्त जलकी धारा गिरानेवाले मेघके समान जान पड़ता था ॥ ३७ ॥
ततस्तद् राक्षसं सैन्यं प्रयुद्धं समरुद्गणैः ।
रणे विद्रावितं सर्वे नानाप्रहरणैस्तदा ॥ ३८ ॥
तदनन्तर घोर युद्ध में लगी हुई उस सारी राक्षससेनाको रणभूमिमें नाना प्रकारके अस्त्र - शस्त्र धारण करनेवाले रुद्रों और मरुद्गणोंने मार भगाया ॥ ३८ ॥
केचिद् विनिहताः कृत्ताश्चेष्टन्ति स्म महीतले ।
वाहनेष्ववसाश्च स्थिता एवापरे रणे ॥ ३ ९ ॥
कितने ही निशाचर मारे गये । कितने ही कटकर धरती-पर लोटने और छटपटाने लगे और बहुत - से राक्षस प्राणहीन हो जानेपर भी उस रणभूमिमें अपने वाहनोंपर ही चिपटे रहे ॥ ३ ९ ॥
रथान् नागान् खरानुष्ट्रान् पन्नगांस्तुरगांस्तथा ।
शिशुमारान् वराहांश्च पिशाचवदनानपि ॥ ४० ॥
तान् समालिङ्गन्य वाहुभ्यां विष्टब्धाः केचिदुत्थिताः ।
देवैस्तु शस्त्रसंभिन्ना मम्रिरे च निशाचराः ॥ ४१ ॥
कुछ राक्षस रथों, हाथियों, गदहों, ऊँटों, सर्पों, घोड़ों, शिशुमारों, वराहों तथा पिशाचमुख वाहनोंको दोनों भुजाओंसे
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१५३० श्रमवाल्मीकीयरामायणे पकड़कर उनसे लिपटे हुए निश्चेष्ट हो गये थे । ति जो पहले से मूर्छित होकर पड़े थे, मूर्छा दूर होनेपर उठे, किंतु देवताओंके शस्त्रोंसे छिन्न - भिन्न हो मौत के मुखमें चले गये ॥ ४०-४१ ॥ चित्रकर्म इवाभाति निहतानां प्रसुप्तानां प्राणोंसे हाथ धोकर का इस तरह युद्धमें मारा पड़ता था ॥ ४२ ॥
शोणितोदकनिष्पन्दा प्रवृत्ता संयुगमुखे
सर्वेषां रणसम्प्लवः ।
राक्षसानां महीतले ॥ ४२ ॥
धरतीपर पड़े हुए उन समस्त राक्षसों-जाना जादू सा आश्चर्यजनक जान
काकगृध्रसमाकुला ।
शस्त्रग्राहवती नदी ॥ ४३ ॥
युद्धके मुहानेपर खूनकी नदी बह चली, जिसके भीतर अनेक प्रकारके शस्त्र ग्राहोंका भ्रम उत्पन्न करते थे । उस नदी के तटपर चारों ओर गीध और कौए छा गये थे ॥ ४३ ॥
एतस्मिन्नन्तरे क्रुद्धो दशग्रीवः प्रतापवान् ।
निरीक्ष्य तु बलं सर्व दैवतैर्विनिपातितम् ॥ ४४ ॥
इसी बीचमें प्रतापी दशग्रीवने जब देखा कि देवताओंने हमारे समस्त सैनिकों को मार गिराया है, तब उसके क्रोधकी सीमा न रही ॥ ४४ ॥
स तं प्रतिविगाह्याशु प्रवृद्धं सैन्यसागरम् ।
त्रिदशान् समरे निघ्नञ्शक्रमेवाभ्यवर्तत ॥ ४५ ॥
वह समुद्रके समान दूरतक फैली हुई देवसेनामें घुस गया और समराङ्गण में देवताओंको मारता एवं धराशायी करता हुआ तुरंत ही इन्द्रके सामने जा पहुँचा ॥ ४५ ॥
ततः शक्रो महच्चापं विस्फार्य सुमहाखनम् ।
यस्य विस्फारनिर्घोषैः स्तनन्ति स्म दिशो दश ॥ ४६ ॥
तब इन्द्रने जोर - जोरसे टङ्कार करनेवाले अपने विशाल धनुषको खींचा । उसकी टङ्कार - ध्वनिसे दसों दिशाएँ प्रति-ध्वनित हो उठीं ॥ ४६ ॥
तद् विकृष्य महच्चापमिन्द्रो रावणमूर्धनि ।
पातयामास स शरान् पावकादित्यवर्चसः ॥ ४७ ॥
उस विशाल धनुषको खींचकर इन्द्रने रावण के मस्तकपर अग्नि और सूर्य के समान तेजस्वी बाण मारे ॥ ४७ ॥
तथैव च महाबाहुर्दशग्रीवो निशाचरः ।
शक्रं कार्मुकविभ्रष्टैः शरवर्षैरवाकिरत् ॥ ४८ ॥
इसी प्रकार महाबाहु निशाचर दशग्रीवने भी अपने धनुषसे छूटे हुए बाणोंकी वर्षासे इन्द्रको ढक दिया ॥ ४८ ॥
प्रयुध्यतोरथ तयोर्वाणवर्षेः समन्ततः ।
नाज्ञायत तदा किंचित् सर्वं हि तमसा वृतम् ॥ ४ ९ ॥
वे दोनों घोर युद्ध में तत्पर हो जब बाणोंकी वृष्टि करने लगे, उस समय सब ओर सब कुछ अन्धकारसे आच्छादित हो गया । किसीको किसी भी वस्तुकी पहचान नहीं हो पाती थी ॥ ४ ९ ॥ इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये उत्तरकाण्डेऽष्टाविंशः सर्गः ॥ २८ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्ड में अट्ठाईसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ २८ ॥
एकोनत्रिंशः सर्गः रावणका देवसेना के बीचसे होकर निकलना, देवताओंका उसे कैद करने के लिये प्रयत्न, मेघनादका मायाद्वारा इन्द्रको बंदी बनाना तथा विजयी होकर सेनासहित लङ्काको लौटना
ततस्तमसि संजाते सर्वे ते देवराक्षसाः ।
अयुद्धयन्त बलोन्मत्ताः सूदयन्तः परस्परम् ॥ १ ॥
जब सब ओर अन्धकार छा गया, तब बलसे उन्मत्त हुए वे समस्त देवता और राक्षस एक दूसरेको मारते हुए परस्पर युद्ध करने लगे ॥ १ ॥
ततस्तु देवसैन्येन राक्षसानां बृहद् बलम् ।
दशांशं स्थापितं युद्धे शेषं नीतं यमक्षयम् ॥ २ ॥
उस समय देवताओंकी सेनाने राक्षसोंके विशाल सैन्य-समूहका केवल दसवाँ हिस्सा युद्धभूमिमें खड़ा रहने दिया । शेष सब राक्षसों को यमलोक पहुँचा दिया ॥ २ ॥
तस्मिंस्तु तामसे युद्धे सर्वे ते देवराक्षसाः ।
अन्योन्यं नाभ्यजानन्त युध्यमानाः परस्परम् ॥ ३ ॥
उस तामस युद्ध में समस्त देवता और राक्षस परस्पर जूझते हुए एक दूसरेको पहचान नहीं पाते थे ॥ ३ ॥
इन्द्रश्च रावणश्चैव रावणिश्च महाबलः ।
तस्मिंस्तमोजालवृते मोहमीयुर्न ते त्रयः ॥ ४ ॥
इन्द्र, रावण और रावणपुत्र महाबली मेघनाद -- ये तीन ही उस अन्धकाराच्छन्न समराङ्गणमें मोहित नहीं हुए थे ।
स तु दृष्ट्ा बलं सर्व रावणो निहतं क्षणात् ।
क्रोधमभ्यगमत् तीव्रं महानादं च मुक्तवान् ॥ ५ ॥
रावण ने देखा, मेरी सारी सेना क्षणभरमें मारी गयी, तब उसके मनमें बड़ा क्रोध हुआ और उसने बड़ी भारी गर्जना की ॥ ५ ॥
क्रोधात् सूतं च दुर्धर्षः स्यन्दनस्थमुवाच ह ।
परसैन्यस्य मध्येन यावदन्तो नयख माम् ॥ ६ ॥
उस दुर्जय निशाचरने रथपरं बैठे हुए अपने सारथिसे क्रोधपूर्वक कहा – ' सूत! शत्रुओंकी इस सेनाका जहाँतक अन्त है, वहाँतक तुम इस सेनाके मध्य भागसे होकर मुझे ले चलो ॥ ६ ॥
अद्यैतान् त्रिदशान् सर्वान् विक्रमैः समरे स्वयम् ।
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उत्तरकाण्डे एकोनत्रिंशः सर्गः १५३१ नानाशस्त्रमहासारैर्नयामि यमसादनम् ॥ ७ ॥
' आज मैं स्वयं अपने पराक्रमद्वारा नाना प्रकारके शस्त्रोंकी महान् धारावाहिक वृष्टि करके इन सब देवताओंको यम-लोक पहुँचा दूँगा ॥ ७ ॥
अहमिन्द्रं वधिष्यामि धनदं वरुणं यमम् ।
त्रिदशान् विनिहत्याशु स्वयं स्थास्याम्यथोपरि ॥ ८ ॥
" मैं इन्द्र, कुबेर, वरुण और यमका भी वध करूँगा । सब देवताओंका शीघ्र ही संहार करके स्वयं सबके ऊपर स्थित होऊँगा ॥ ८ ॥
विषादो नैव कर्तव्यः शीघ्रं वाहय मे रथम् ।
द्विः खलु त्वां ब्रवीम्यद्य यावदन्तं नयस्व माम् ॥ ९ ॥
' तुम्हें विषाद नहीं करना चाहिये । शीघ्र मेरे रथको ले चलो । मैं तुमसे दो बार कहता हूँ, देवताओंकी सेनाका जहाँतक अन्त है, वहाँतक मुझे अभी ले चलो ॥ ९ ॥
अयं स नन्दनोद्देशो यत्र वर्तावहे वयम् ।
नय मामद्य तत्र त्वमुदयो यत्र पर्वतः ॥ १० ॥
' यह नन्दनवनका प्रदेश है, जहाँ इस समय हम दोनों मौजूद हैं । यहींसे देवताओंकी सेनाका आरम्भ होता है । अब तुम मुझे उस स्थानतक ले चलो, जहाँ उदयाचल है ( नन्दनवन से उदयाचलतक देवताओंकी सेना फैली हुई है ) ॥
तस्य तद् वचनं श्रुत्वा तुरगान् स मनोजवान् ।
आदिदेशाथ शत्रूणां मध्येनैव च सारथिः ॥ ११ ॥
रावणकी यह बात सुनकर सारथिने मनके समान वेगशाली घोड़ोंको शत्रुसेनाके बीचसे हाँक दिया ॥ ११ ॥
तस्य तं निश्चयं ज्ञात्वा शक्रो देवेश्वरस्तदा ।
रथस्थः समरस्थस्तान् देवान् वाक्यमथाब्रवीत् ॥ १२ ॥
रावणके इस निश्चयको जानकर समरभूमिमें रथपर बैठे हुए देवराज इन्द्रने उन देवताओंसे कहा – ॥ १२ ॥
सुराः शृणुत मद्वाक्यं यत् तावन्मम रोचते ।
जीवन्नेव दशग्रीवः साधु रक्षो निगृह्यताम् ॥ १३ ॥
' देवगण! मेरी बात सुनो । मुझे तो यही अच्छा लगता है कि इस निशाचर दशग्रीवको जीवित अवस्थामें ही भली-भाँति कैद कर लिया जाय ॥ १३ ॥
एष ह्यतिबलः सैन्ये रथेन पवनौजसा ।
गमिष्यति प्रवृद्धोर्मिः समुद्र इव पर्वणि ॥ १४ ॥
" यह अत्यन्त बलशाली राक्षस वायुके समान वेगशाली रथके द्वारा इस सेनाके बीचमें होकर उसी तरह तीव्रगतिसे आगे बढ़ेगा, जैसे पूर्णिमाके दिन उत्ताल तरङ्गोंसे युक्त समुद्र बढ़ता है || १४ ||
नह्येष हन्तुं शक्योऽद्य वरदानात् सुनिर्भयः ।
तद् ग्रहीष्यामहे रक्षो यत्ता भवत संयुगे ॥ १५ ॥
" यह आज मारा नहीं जा सकता; क्योंकि ब्रह्माजीके वरदानके प्रभावसे पूर्णतः निर्भय हो चुका है । इसलिये हम लोग इस राक्षसको पकड़कर कैद कर लेंगे । तुमलोग युद्धमें इस बातके लिये पूरा प्रयत्न करो ॥ १५ ॥
यथा बलौ निरुद्धे च त्रैलोक्यं भुज्यते मया ।
एवमेतस्य पापस्य निरोधो मम रोचते ॥ १६ ॥
' जैसे राजा बलिके बाँध लिये जानेपर ही मैं तीनों लोकोंके राज्यका उपभोग कर रहा हूँ, उसी प्रकार इस पापी निशाचर-को बंदी बना लिया जाय, यही मुझे अच्छा लगता है ' ॥ १६ ॥
ततोऽन्यं देशमास्थाय शक्रः संत्यज्य रावणम् ।
अयुध्यत महाराज राक्षसांस्त्रासयन् रणे ॥ १७ ॥
महाराज श्रीराम! ऐसा कहकर इन्द्रने रावणके साथ युद्ध करना छोड़ दिया और दूसरी ओर जाकर समराङ्गणमें राक्षसोंको भयभीत करते हुए वे उनके साथ युद्ध करने लगे ।
उत्तरेण दशग्रीवः प्रविवेशानिवर्तकः ।
दक्षिणेन तु पार्श्वेन प्रविवेश शतक्रतुः ॥ १८ ॥
युद्धसे पीछे न हटनेवाले रावणने उत्तरकी ओरसे देव-सेनामें प्रवेश किया और देवराज इन्द्रने दक्षिणकी ओरसे राक्षससेनामें ॥ १८ ॥
ततः स योजनशतं प्रविष्टो राक्षसाधिपः ।
देवतानां बलं सर्व शरवर्षैरवाकिरत् ॥ १ ९ ॥
देवताओंकी सेना चार सौ कोसतक फैली हुई थी । राक्षसराज रावणने उसके भीतर घुसकर समूची देवसेनाको बाणोंकी वर्षासे ढक दिया ॥ १ ९ ॥
ततः शक्रो निरीक्ष्याथ प्रणष्टं तु स्वकं बलम् ।
न्यवर्तयदसम्भ्रान्तः समावृत्य दशाननम् ॥ २० ॥
अपनी विशाल सेनाको नष्ट होती देख इन्द्रने बिना किसी घबराहटके दशमुख रावणका सामना किया और उसे चारों ओरसे घेरकर युद्धसे विमुख कर दिया ॥ २० ॥
एतस्मिन्नन्तरे नादो मुक्तो दानवराक्षसैः ।
हा हताः स्म इति ग्रस्तं दृष्ट्वा शक्रेण रावणम् ॥ २१ ॥
इसी समय रावणको इन्द्रके चंगुलमें फँसा हुआ देख दानवों तथा राक्षसोंने ' हाय | हम मारे गये ' ऐसा कहकर बड़े जोरसे आर्तनाद किया ॥ २१ ॥
ततो रथं समास्थाय रावणिः क्रोधमूर्च्छितः ।
तत् सैन्यमतिसंक्रुद्धः प्रविवेश सुदारुणम् ॥ २२ ॥
तब रावणका पुत्र मेघनाद क्रोधसे अचेत - सा हो गया और रथपर बैठकर अत्यन्त कुपित हो उसने शत्रुकी भयंकर सेना में प्रवेश किया ॥ २२ ॥
तां प्रविश्य महामायां प्राप्तां पशुपतेः पुरा ।
प्रविवेश सुसंरब्धस्तत् सैन्यं समभिद्रवत् ॥ २३ ॥
पूर्वकालमें पशुपति महादेवजीसे उसको जो तमोमयी महामाया प्राप्त हुई थी, उसमें प्रवेश करके उसने अपनेको छिपा लिया और अत्यन्त क्रोधपूर्वक शत्रुसेनामें घुसकर उसे खदेड़ना आरम्भ किया ॥ २३ ॥
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१५३२ श्रीमवाल्मीकीय रामायणे
स सर्वा देवतास्त्यक्त्वा शक्रमेवाभ्यधावत ।
महेन्द्रश्च महातेजा नापश्यच्च सुतं रिपोः ॥२४ ॥
वह सब देवताओंको छोड़कर इन्द्रपर टूट पड़ा, परंतु महातेजस्वी इन्द्र अपने शत्रुके उस पुत्रको देख न सके ।
विमुक्तवचस्तत्र वध्यमानोऽपि रावणिः ।
त्रिदशैः सुमहावीर्यैर्न चकार च किंचन ॥ २५ ॥
महापराक्रमी देवताओंकी मार खानेसे यद्यपि वहाँ रावण कुमारका कवच नष्ट गया था. तथापि उसने अपने मनमें तनिक भी भय नहीं किया ॥ २५ ॥
स मातलिं समायान्तं ताडयित्वा शरोत्तमैः ।
महेन्द्रं वाणवर्षेण भूय एवाभ्यवाकिरत् ॥ २६ ॥
उसने अपने सामने आते हुए मातलिको उत्तम बाणोंसे घायल करके सायकोंकी झड़ी लगाकर पुनः देवराज इन्द्रको भी ढक दिया ॥ २६ ॥
ततस्त्यक्त्वा रथं शक्रो विससर्ज च सारथिम् ।
ऐरावतं समारुह्य मृगयामास रावणिम् ॥ २७ ॥
तब इन्द्रने रथको छोड़कर सारथिको बिदा कर दिया और ऐरावत हाथीपर आरूढ़ हो वे रावणकुमारकी खोज करने लगे ॥ २७ ॥
स तत्र मायाबलवान दृश्योऽथान्तरिक्षगः ।
इन्द्रं मायापरिक्षिप्तं कृत्वा स प्राद्रवच्छरैः ॥ २८ ॥
मेघनाद अपनी मायाके कारण बहुत प्रबल हो रहा था । वह अदृश्य होकर आकाशमें विचरने लगा और इन्द्रको मायासे व्याकुल करके बाणोंद्वारा उनपर आक्रमण किया ॥
स तं यदा परिश्रान्तमिन्द्रं जज्ञेऽथ रावणिः ।
तदैनं मायया बद्ध्वा स्वसैन्यमभितोऽनयत् ॥ २ ९ ॥
रावणकुमारको जब अच्छी तरह मालूम हो गया कि इन्द्र बहुत थक गये हैं, तब उन्हें मायासे बाँधकर अपनी सेनामें ले आया ॥ २ ९ ॥
तं तु दृष्ट्रा बलात् तेन नीयमानं महारणात् ।
महेन्द्रममराः सर्वे किं नु स्यादित्यचिन्तयन् ॥ ३० ॥
महेन्द्रको उस महासमरसे मेघनादद्वारा बलपूर्वक ले जाये जाते देख सब देवता यह सोचने लगे कि ' अब क्या होगा? ॥ ३० ॥
दृश्यते न स मायावी शक्रजित् समितिंजयः ।
विद्यावानपि येनेन्द्रो माययापहृतो बलात् ॥ ३१ ॥
' यह युद्धविजयी मायावी राक्षस स्वयं तो दिखायी देता नहीं, इसीलिये इन्द्रपर विजय पानेमें सफल हुआ है । यद्यपि देवराज इन्द्र राक्षसी मायाका संहार करनेकी विद्या जानते हैं, तथापि इस राक्षसने मायाद्वारा बलपूर्वक इनका अपहरण किया है ' ॥ ३१ ॥
एतस्मिन्नन्तरे क्रुद्धाः सर्वे सुरगणास्तच ।
रावणं विमुखीकृत्य शरवर्षैरवाकिरन् ॥ ३२ ॥
ऐसा सोचते हुए वे सब देवता उस समय रोषसे भर गये और रावणको युद्ध से विमुख करके उसपर बाणोंकी झड़ी लगाने लगे ॥ ३२ ॥
रावणस्तु समासाद्य आदित्यांश्च वसुंस्तदा । न शशाक स संग्रामे योद्धु ं शत्रुभिरर्दितः ॥ ३३ ॥
रावण आदित्यों और वसुओंका सामना पड़ जानेपर युद्धमें उनके सम्मुख ठहर न सका; क्योंकि शत्रुओंने उसे बहुत पीड़ित कर दिया था ॥ ३३ ॥
स तं दृष्ट्रा परिम्लानं प्रहारैर्जर्जरीकृतम् ।
रावणिः पितरं युद्धेऽदर्शनस्थोऽत्रवीदिदम् ॥ ३४ ॥
मेघनादने देखा पिताका शरीर बाणोंके प्रहारसे जर्जर हो गया है और वे युद्ध में उदास दिखायी देते हैं । तब वह अदृश्य रहकर ही रावणसे इस प्रकार बोला ॥ ३४ ॥
आगच्छ तात गच्छामो रणकर्म निवर्तताम् ।
जितं नो विदितं तेऽस्तु स्वस्थो भव गतज्वरः ॥ ३५ ॥
' पिताजी! चले आइये । अब हमलोग घर चलें । युद्ध बंद कर दिया जाय । हमारी जीत हो गयी; अतः आप स्वस्थ, निश्चिन्त एवं प्रसन्न हो जाइये ॥ ३५ ॥
अयं हि सुरसैन्यस्य त्रैलोक्यस्य च यः प्रभुः ।
सगृहीतो देवबलाद् भग्नदर्पाः सुराः कृताः ॥ ३६ ॥
“ ये जो देवताओंकी सेना तथा तीनों लोकोंके स्वामी इन्द्र हैं, इन्हें मैं देवसेना के बीचसे कैद कर लाया हूँ । ऐसा करके मैंने देवताओंका घमंड चूर कर दिया है ॥ ३६ ॥
यथेष्टं भुङ्क्ष्व लोकांस्त्रीन् निगृह्यारातिमोजसा ।
वृथा किं ते श्रमेणेह युद्धमद्य तु निष्फलम् ॥ ३७ ॥
• आप अपने शत्रुको बलपूर्वक कैद करके इच्छानुसार तीनों लोकोंका राज्य भोगिये । यहाँ व्यर्थ श्रम करनेसे आपको क्या लाभ है? अब युद्धसे कोई प्रयोजन नहीं है ' ॥ ३७ ॥
ततस्ते दैवतगणा निवृत्ता रणकर्मणः ।
रावणेर्वाक्यं शक्रहीनाः सुरा गताः ॥ ३८ ॥
मेघनाद की यह बात सुनकर सब देवता युद्धसे निवृत्त हो गये और इन्द्रको साथ लिये बिना ही लौट गये ॥ ३८ ॥
अथ रणविगतः स उत्तमौजा-स्त्रिदशरिपुः प्रथितो निशाचरेन्द्रः । स्वसुतवचनमादृतः प्रियं तत् समनुनिशम्य जगाद चैव सूनुम् ॥ ३ ९ ॥ अपने पुत्रके उस प्रिय वन्चनको आदरपूर्वक सुनकर महान् बलशाली देवद्रोही तथा सुविख्यात राक्षसराज रावण युद्ध से निवृत्त हो गया और अपने बेटेसे बोला -- ॥ ३ ९ ॥ अतिबलसदृशैः पराक्रमैस्त्वं मम कुलवंशविवर्धनः प्रभो । यदयमतुल्यबलस्त्वयाद्य वै त्रिदशपतिस्त्रिदशाश्च निर्जिताः ॥ ४० ॥
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उत्तरकाण्डे त्रिंशः सर्गः १५३३ ' सामर्थ्यशाली पुत्र! अपने अत्यन्त बलके अनुरूप पराक्रम प्रकट करके आज तुमने जो इन अनुपम बलशाली देवराज इन्द्रको जीता और देवताओंको भी परास्त किया है, इससे यह निश्चय हो गया कि तुम मेरे कुल और वंशके यश और सम्मानकी वृद्धि करनेवाले हो ॥ ४० ॥
नय रथमधिरोप्य वासवं नगर-मितो व्रज सेनया वृतस्त्वम् । अहमपि तव पृष्ठतो द्रुतं सह सचिवैरनुयामि हृष्टवत् ॥ ४१ ॥
' बेटा! इन्द्रको रथपर बैठाकर तुम सेनाके साथ यहाँसे लङ्कापुरीको चलो । मैं भी अपने मन्त्रियोंके साथ शीघ्र ही प्रसन्नतापूर्वक तुम्हारे पीछे - पीछे आ रहा हूँ ' ॥ ४१ ॥
अथ स बलवृतः सवाहन-स्त्रिदशपतिं परिगृह्य रावणिः । स्वभवनमधिगम्य वीर्यवान् कृतसमरान् विससर्ज राक्षसान् ॥ ४२ ॥
पिताकी यह आशा पाकर पराक्रमी रावणकुमार मेघनाद देवराजको साथ ले सेना और सवारियोंसहित अपने निवास-स्थानको लौटा । वहाँ पहुँचकर उसने युद्ध में भाग लेनेवाले निशाचरोंको विदा कर दिया ॥ ४२ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये उत्तरकाण्डे एकोनत्रिंशः सर्गः ॥ २ ९ ॥ इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें उन्तीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ २ ९ ॥ त्रिंशः सर्गः ब्रह्माजीका इन्द्रजितको वरदान देकर इन्द्रको उसकी कैद से छुड़ाना और उनके पूर्व कृत पापकर्मको याद दिलाकर उनसे वैष्णव यज्ञका अनुष्ठान करने के लिये कहना, उस यज्ञको पूर्ण करके इन्द्रका स्वर्गलोकमें जाना
जिते महेन्द्रेऽतिबले रावणस्य सुतेन वै ।
प्रजापतिं पुरस्कृत्य ययुर्लङ्कां सुरास्तदा ॥ १ ॥
रावणपुत्र मेघनाद जब अत्यन्त बलशाली इन्द्रको जीत-कर अपने नगर में ले गया, तब सम्पूर्ण देवता प्रजापति ब्रह्माजी-को आगे करके लङ्कामें पहुँचे ॥ १ ॥
तत्र रावणमासाद्य पुत्रभ्रातृभिरावृतम् ।
अब्रवीद् गगने तिष्ठन् सामपूर्व प्रजापतिः ॥ २ ॥
ब्रह्माजी आकाशमें खड़े - खड़े ही पुत्रों और भाइयोंके साथ बैठे हुए रावणके निकट जा उसे कोमल वाणीमें समझाते हुए बोले - ॥ २ ॥
वत्स रावण तुष्टोऽस्मि पुत्रस्य तव संयुगे ।
अहोऽस्य विक्रमौदार्य तव तुल्योऽधिकोऽपि वा ॥ ३ ॥
' वत्स रावण! युद्धमें तुम्हारे पुत्रकी वीरता देखकर मैं बहुत संतुष्ट हुआ हूँ । अहो! इसका उदार पराक्रम तुम्हारे समान या तुमसे भी बढ़कर है ॥ ३ ॥
जितं हि भवता सर्व त्रैलोक्यं स्वेन तेजसा ।
कृता प्रतिज्ञा सफला प्रीतोऽस्मि ससुतस्य ते ॥ ४ ॥
' तुमने अपने तेजसे समस्त त्रिलोकीपर विजय पायी है । और अपनी प्रतिज्ञा सफल कर ली है । इसलिये पुत्रसहित तुमपर मैं बहुत प्रसन्न हूँ ॥ ४ ॥
अयं च पुत्रोऽतिबलस्तव रावण वीर्यवान् ।
जगतीन्द्रजिदित्येव परिख्यातो भविष्यति ॥ ५ ॥
' रावण! तुम्हारा यह पुत्र अतिशय बलशाली और पराक्रमी है । आजसे यह संसार में इन्द्रजित् के नामसे विख्यात होगा ॥ ५ ॥
बलवान् दुर्जयश्चैव भविष्यत्येव राक्षसः ।
यं समाश्रित्य ते राजन् स्थापितास्त्रिदशा वशे ॥ ६ ॥
' राजन् | यह राक्षस बड़ा बलवान् और दुर्जय होंगा, जिसका आश्रय लेकर तुमने समस्त देवताओंको अपने अधीन कर लिया ॥ ६ ॥
तन्मुच्यतां महाबाहो महेन्द्रः पाकशासनः ।
किं चास्य मोक्षणार्थाय प्रयच्छन्तु दिवौकसः ॥ ७ ॥
' महाबाहो! अब तुम पाकशासन इन्द्रको छोड़ दो और बताओ इन्हें छोड़नेके बदलेमें देवता तुम्हें क्या दें ' ॥ ७ ॥
अथाब्रवीन्महातेजा इन्द्रजित् समितिंजयः ।
अमरत्वमहं देव वृणे यद्येष मुच्यते ॥ ८ ॥
तब युद्धविजयी महातेजस्वी इन्द्रजित्ने स्वयं ही कहा-' देव! यदि इन्द्रको छोड़ना है तो मैं इसके बदले में अमरत्व लेना चाहता हूँ ' ॥ ८ ॥
ततोऽब्रवीन्महातेजा मेघनादं प्रजापतिः ।
नास्ति सर्वामरत्वं हि कस्यचित् प्राणिनो भुवि ॥ ९ ॥
पक्षिणश्चतुष्पदो वा भूतानां वा महौजसाम् । यह सुनकर महातेजस्वी प्रजापति ब्रह्माजीने मेघनादसे कहा - " बेटा! इस भूतलपर पक्षियों, चौपायों तथा महा तेजस्वी मनुष्य आदि प्राणियों में से कोई भी प्राणी सर्वथा अमर नहीं हो सकता ' ॥ ९ ॥
श्रुत्वा पितामहेनोक्तमिन्द्रजित्प्रभुणाव्ययम् ॥ १० ॥
अथाब्रवीत् स तत्रस्थं मेघनादो महाबलः । भगवान् ब्रह्माजीकी कही हुई यह बात सुनकर इन्द्रविजयी महाबली मेघनादने वहाँ खड़े हुए अविनाशी ब्रह्माजी-से कहा- ॥ १०३ ॥