Ramayana 2 — पृष्ठ 751–760

वाल्मीकि रामायण — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 751–760

पृष्ठ 751

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१५३४ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे श्रूयतां या भवेत् सिद्धिः शतक्रतुविमोक्षणे ॥ ११ ॥

ममेष्टं नित्यशो हव्यैर्मन्त्रैः सम्पूज्य पावकम् ।

संग्राम च शत्रुनिर्जयकाङ्क्षिणः ॥ १२ ॥

अश्वयुक्तो रथो महामुत्तिष्ठेत् तु विभावसोः ।

तत्स्थस्यामरता स्यान्मे एष मे निश्चितो वरः ॥ १३ ॥

' भगवन्! ( यदि सर्वथा अमरत्व प्राप्त होना असम्भव है ) तब इन्द्रको छोड़ने के सम्बन्धमें जो मेरी दूसरी शर्त है-जो दूसरी सिद्धि प्राप्त करना मुझे अभीष्ट है, उसे सुनिये । मेरे विषयमें यह सदाके लिये नियम हो जाय कि जब मैं शत्रुपर विजय पानेकी इच्छासे संग्राममें उतरना चाहूँ और मन्त्रयुक्त हव्यकी आहुतिसे अग्निदेवकी पूजा करूँ, उस समय अग्निसे मेरे लिये एक ऐसा रथ प्रकट हो जाया करे, जो घोड़ोंसे जुता - जुताया तैयार हो और उसपर जबतक मैं बैठा रहूँ, तब-तक मुझे कोई भी मार न सके, यही मेरा निश्चित वर है ॥ ११-१३ ॥

तस्मिन् यद्यसमाप्ते च जप्यहोमे विभावसौ ।

युध्येयं देव संग्रामे तदा मे स्याद् विनाशनम् ॥ १४ ॥

' यदि युद्ध के निमित्त किये जानेवाले जप और होमको पूर्ण किये बिना ही मैं समराङ्गणमें युद्ध करने लगू, तभी मेरा विनाश हो ॥ १४ ॥

सर्वो हि तपसा देव वृणोत्यमरतां पुमान् ।

विक्रमेण मया त्वेतदमरत्वं प्रवर्तितम् ॥ १५ ॥

' देव! सब लोग तपस्या करके अमरत्व प्राप्त करते हैं; परंतु मैंने पराक्रमद्वारा इस अमरत्वका वरण किया है ' ॥ १५ ॥

एवमस्त्विति तं चाह वाक्यं देवः पितामहः ।

मुक्तश्चेन्द्रजिता शक्रो गताश्च त्रिदिवं सुराः ॥ १६ ॥

यह सुनकर भगवान् ब्रह्माजीने कहा- ' एवमस्तु ( ऐसा ही हो ) ' । इसके बाद इन्द्रजित्ने इन्द्रको मुक्त कर दिया और सब देवता उन्हें साथ लेकर स्वर्गलोकको चले गये ॥

एतस्मिन्नन्तरे राम दीनो भ्रष्टामरद्युतिः ।

इन्द्रश्चिन्तापरीतात्मा ध्यानतत्परतां गतः ॥ १७ ॥

श्रीराम! उस समय इन्द्रका देवोचित तेज नष्ट हो गया था । वे दुखी हो चिन्तामें डूबकर अपनी पराजयका कारण सोचने लगे || १७ ||

तं तु दृष्ट्वा तथाभूतं प्राह देवः पितामहः ।

शतक्रतो किमु पुरा करोति स्म सुदुष्कृतम् ॥ १८ ॥

भगवान् ब्रह्माजीने उनकी इस अवस्थाको लक्ष्य किया और कहा – ' शतक्रतो! यदि आज तुम्हें इस अपमानसे शोक और दुःख हो रहा है तो बताओ पूर्वकालमें तुमने बड़ा भारी दुष्कर्म क्यों किया था? ॥ १८ ॥

अमरेन्द्र मया बुद्धया प्रजाः सृष्टास्तथा प्रभो ।

एकवर्णाः समाभाषा एकरूपाश्च सर्वशः ॥ १ ९ ॥

" प्रभो! देवराज! पहले मैंने अपनी बुद्धिसे जिन प्रजाओंको उत्पन्न किया था, उन सबकी अङ्गकान्ति, भाषा, रूप और अवस्था सभी बातें एक - जैसी थीं ॥ १ ९ ॥

तासां नास्ति विशेषो हि दर्शने लक्षणेऽपि वा ।

ततोऽहमेकाग्रमनास्ताः प्रजाः समचिन्तयम् ॥ २० ॥

' उनके रूप और रंग आदिमें परस्पर कोई विलक्षणता नहीं थी । तब मैं एकाग्रचित्त होकर उन प्रजाओंके विषय में विशेषता लाने के लिये कुछ विचार करने लगा ॥ २० ॥

सोऽहं तासां विशेषार्थ स्त्रियमेकां विनिर्ममे ।

यद् यत् प्रजानां प्रत्यङ्गं विशिष्टं तत् तदुद्धृतम् ॥ २१ ॥

' विचारके पश्चात् उन सब प्रजाओंकी अपेक्षा विशिष्ट प्रजाको प्रस्तुत करनेके लिये मैंने एक नारीकी सृष्टि की । प्रजाओंके प्रत्येक अङ्गमें जो - जो अद्भुत विशिष्टता - सारभूत सौन्दर्य था, उसे मैंने उसके अङ्गों में प्रकट किया ॥ २१ ॥

ततो मया रूपगुणैरहल्या स्त्री विनिर्मिता ।

हलं नामेह वैरूप्यं हल्यं तत्प्रभवं भवेत् ॥ २२ ॥

यस्या न विद्यते हल्यं तेनाहल्येति विश्रुता ।

अहल्येत्येव च मया तस्या नाम प्रकीर्तितम् ॥ २३ ॥

' उन अद्भुत रूप- गुणोंसे उपलक्षित जिस नारीका मेरे द्वारा निर्माण हुआ था, उसका नाम हुआ अहल्या । इस जगत् में हल कहते हैं कुरूपताको, उससे जो निन्दनीयता प्रकट होती है उसका नाम हल्य है । जिस नारीमें हल्य ( निन्दनीय रूप ) न हो, वह अहल्या कहलाती है; इसीलिये वह नवनिर्मित नारी अहल्या नामसे विख्यात हुई । मैंने ही उसका नाम अहल्या रख दिया था ॥ २२-२३ ॥

निर्मितायां च देवेन्द्र तस्यां नार्या सुरर्षभ ।

भविष्यतीति कस्यैषा मम चिन्ता ततोऽभवत् ॥ २४ ॥

' देवेन्द्र! सुरश्रेष्ठ! जब उस नारीका निर्माण हो गया, " तब मेरे मन में यह चिन्ता हुई कि यह किसकी पत्नी होगी? ॥

त्वं तु शक्र तदा नारीं जानीषे मनसा प्रभो ।

स्थानाधिकतया पत्नी ममैषेति पुरंदर ॥ २५ ॥

' प्रभो! पुरंदर! देवेन्द्र! उन दिनों तुम अपने स्थान और पदकी श्रेष्ठताके कारण मेरे अनुमतिके बिना ही मन - ही-मन यह समझने लगे थे कि यह मेरी ही पत्नी होगी ॥ २५ ॥

सा या न्यासभूता तु गौतमस्य महात्मनः ।

न्यस्ता बहूनि वर्षाणि तेन निर्यातिता च ह ॥ २६ ॥

" मैंने धरोहर के रूपमें महर्षि गौतमके हाथमें उस कन्या को सौंप दिया । वह बहुत वर्षोंतक उनके यहाँ रही । फिर गौतम-ने उसे मुझे लौटा दिया ॥ २६ ॥

ततस्तस्य परिज्ञाय महास्थैर्य महामुनेः ।

ज्ञात्वा तपसि सिद्धिं च पत्न्यर्थ स्पर्शिता तदा ॥ २७ ॥

' महामुनि गौतम के उस महान् स्थैर्य ( इन्द्रिय- संयम् ) तथा तपस्याविषयक सिद्धिको जानकर मैंने वह कन्या पुनः उन्हींको पत्नीरूपमें दे दी ॥ २७ ॥

पृष्ठ 752

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उत्तरकाण्डे त्रिंशः सर्गः

स तया सह धर्मात्मा रमते स्म महामुनिः ।

आसन्निराशा देवास्तु गौतमे दत्तया तया ॥ २८ ॥

‘ धर्मात्मा महामुनि गौतम उसके साथ सुखपूर्वक रहने लगे । जब अहल्या गौतमको दे दी गयी, तब देवता निराश हो गये ॥ २८ ॥

त्वं क्रुद्धस्तित्वह कामात्मा गत्वा तस्याश्रमं मुनेः ।

दृष्टवांश्च तदा तां स्त्रीं दीप्तामग्निशिखामिव ॥ २ ९ ॥

' तुम्हारे तो क्रोध की सीमा न रही । तुम्हारा मन कामके अधीन हो चुका था; इसलिये तुमने मुनिके आश्रमपर जाकर अग्निशिखाके समान प्रज्वलित होनेवाली उस दिव्य सुन्दरीको देखा ॥ २ ९ ॥ सा त्वया धर्षिता शक्र दृष्टस्त्वं स तदा तेन ‘ इन्द्र! तुमने कुपित साथ बलात्कार किया । उस तुम्हें देख लिया ॥ ३० ॥

ततः क्रुद्धेन तेनासि गतोऽसि येन देवेन्द्र

कामार्तेन समन्युना ।

आश्रमे परमर्षिणा ॥ ३० ॥

और कामसे पीड़ित होकर उसके समय उन महर्षिने अपने आश्रम में

शप्तः परमतेजसा ।

दशाभागविपर्ययम् ॥ ३१ ॥

‘ देवेन्द्र! इससे उन परम तेजस्वी महर्षिको बड़ा क्रोध हुआ और उन्होंने तुम्हें शाप दे दिया । उसी शापके कारण तुमको इस विपरीत दशामें आना पड़ा है— शत्रुका बंदी बनना पड़ा है ॥ ३१ ॥

यस्मान्मे धर्षिता पत्नी त्वया वासव निर्भयात् ।

तस्मात् त्वं समरे शक्र शत्रुहस्तं गमिष्यसि ॥ ३२ ॥

' उन्होंने शाप देते हुए कहा- " वासव! शक्र! तुमने निर्भय होकर मेरी पत्नीके साथ बलात्कार किया है; इसलिये तुम युद्धमें जाकर शत्रुके हाथमें पड़ जाओगे ॥ ३२ ॥

अयं तु भावो दुर्बुद्धे यस्त्वयेह प्रवर्तितः ।

मानुषेष्वपि लोकेषु भविष्यति न संशयः ॥ ३३ ॥

“ दुर्बुद्धे! तुम - जैसे राजाके दोषसे मनुष्यलोकमें भी यह जारभाव प्रचलित हो जायगा, जिसका तुमने स्वयं यहाँ सूत्रपात किया है; इसमें संशय नहीं है ॥ ३३ ॥

तत्रार्ध तस्य यः कर्ता त्वय्यर्ध निपतिष्यति ।

न च ते स्थावरं स्थानं भविष्यति न संशयः ॥ ३४ ॥

“ जो जारभावसे पापाचार करेगा, उस पुरुषपर उस पाप का आधा भाग पड़ेगा और आधा तुमपर पड़ेगा; क्योंकि इसके प्रवर्तक तुम्हीं हो । निःसंदेह तुम्हारा यह स्थान स्थिर नहीं होगा ॥ ३४ ॥

यश्च यश्च सुरेन्द्रः स्याद् ध्रुवः स न भविष्यति ।

एष शापो मया मुक्त इत्यसौ त्वां तदाब्रवीत् ॥ १५ ॥

" जो कोई भी देवराज के पदपर प्रतिष्ठित होगा, वह वहाँ १५३५

तां तु भार्या सुनिर्भर्त्स्य सोऽब्रवीत् सुमहातपाः ।

दुर्विनीते विनिध्वंस ममाश्रमसमीपतः ॥ ३६ ॥

रूपयौवनसम्पन्ना यस्मात् त्वमनवस्थिता ।

तस्माद् रूपवती लोके न त्वमेका भविष्यति ॥ ३७ ॥

" फिर उन महातपस्वी मुनिने अपनी उस पत्नीको भी भलीभाँति डाँट - फटकारकर कहा- ' दुष्टे! तू मेरे आश्रमके पास ही अदृश्य होकर रह और अपने रूप - सौन्दर्य से भ्रष्ट हो जा । रूप और यौवनसे सम्पन्न होकर मर्यादामें स्थित नहीं रह सकी है, इसलिये अब लोकमें तू अकेली ही रूपवती नहीं रहेगी ( बहुत - सी रूपवती स्त्रियाँ उत्पन्न हो जायँगी ) ॥३६-३७ ॥

रूपं च ते प्रजाः सर्वा गमिष्यन्ति न संशयः ।

यत् तदेकं समाश्रित्य विभ्रमोऽयमुपस्थितः ॥ ३८ ॥

" जिस एक रूप - सौन्दर्यको लेकर इन्द्रके मनमें यह काम-विकार उत्पन्न हुआ था, तेरे उस रूप - सौन्दर्यको समस्त प्रजाएँ प्राप्त कर लेंगी; इसमें संशय नहीं है ' ॥ ३८ ॥

तदाप्रभृति भूयिष्ठं प्रजा रूपसमन्विता ।

सा तं प्रसादयामास महर्षि गौतमं तदा ॥ ३ ९ ॥

अज्ञानाद् धर्षिता विप्र त्वद्रूपेण दिवौकसा ।

न कामकाराद् विप्रर्षे प्रसादं कर्तुमर्हसि ॥ ४० ॥

' तभीसे अधिकांश प्रजा रूपवती होने लगी । अहल्याने उस समय विनीत वचनोंद्वारा महर्षि गौतमको प्रसन्न किया और कहा—— ' विप्रवर! ब्रह्मर्षे! देवराजने आपका ही रूप धारण करके मुझे कलंकित किया है । मैं उसे पहचान न सकी थी । अतः अनजानमें मुझसे यह अपराध हुआ है, स्वेच्छा-चारवश नहीं । इसलिये आपको मुझपर कृपा करनी चाहिये ' ॥ ३ ९ -४० ॥

अहल्यया त्वेवमुक्तः प्रत्युवाच स गौतमः ।

उत्पत्स्यति महातेजा इक्ष्वाकूणां महारथः ॥ ४१ ॥

रामो नाम श्रुतो लोके वनं चाप्युपयास्यति ।

ब्राह्मणार्थे महाबाहुर्विष्णुर्मानुषविग्रहः ॥ ४२ ॥

तं द्रक्ष्यसि यदा भद्रे ततः पूता भविष्यसि ।

स हि पावयितुं शक्तस्त्वया यद् दुष्कृतं कृतम् ॥ ४३ ॥

‘ अहल्याके ऐसा कहनेपर गौतमने उत्तर दिया- ' भद्रे! इक्ष्वाकुवंशमें एक महातेजस्वी महारथी वीरका अवतार होगा, जो संसारमें श्रीरामके नामसे विख्यात होंगे | महाबाहु श्रीराम के रूपमें साक्षात् भगवान् विष्णु ही मनुष्य- शरीर धारण करके प्रकट होंगे 1 । वे ब्राह्मण ( विश्वामित्र आदि ) के कार्य से तपोवनमें पधारेंगे । जब तुम उनका दर्शन करोगी, तब पवित्र हो जाओगी । तुमने जो पाप किया है, उससे तुम्हें वे ही पवित्र कर सकते हैं ॥ ४१-४३ ॥ स्थिर नहीं रहेगा । यह शाप मैंने इन्द्रमात्रके लिये दे दिया तस्यातिथ्यं च कृत्वा वै मत्समीपं गमिष्यसि ॥ ' यह बात मुनिने तुमसे कही थी || ३५ ॥ वत्स्यसि त्वं मया सार्धं तदा हि वरवर्णिनि ॥ ४४ ॥

पृष्ठ 753

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१५३६ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे " वरवर्णिनि । उनका आतिथ्य सत्कार करके तुम मेरे पास आ जाओगी और फिर मेरे ही साथ रहने लगोगी ' ॥ ४४ ॥

एवमुक्त्वा स विप्रर्षिराजगाम स्वमाश्रमम् ।

तपश्चचार सुमहत् सा पत्ती ब्रह्मवादिनः ॥ ४५ ॥

‘ ऐसा कहकर ब्रह्मर्षि गौतम अपने आश्रम के भीतर आ गये और उन ब्रह्मवादी मुनिकी पत्नी वह अहल्या बड़ी भारी तपस्या करने लगी ॥ ४५ ॥

शापोत्सर्गाद्धि तस्येदं मुनेः सर्वमुपस्थितम् ।

तत् स्मरत्वं महाबाहो दुष्कृतं यत् त्वया कृतम् ॥४६ ॥

' महाबाहो! उन महर्षि गौतमके शाप देनेसे ही तुमपर यह सारा संकट उपस्थित हुआ है । अतः तुमने जो पाप किया था, उसको याद करो ॥ ४६ ॥

तेन त्वं ग्रहणं शत्रोर्यातो नान्येन वासव ।

शीघ्रं वै यज यज्ञं त्वं वैष्णवं सुसमाहितः ॥ ४७ ॥

‘ वासव! उस शापके ही कारण तुम शत्रुकी कैदमें पड़े हो, दूसरे किसी कारणसे नहीं । अतः अब एकाग्रचित्त हो शीघ्र ही वैष्णव यशका अनुष्ठान करो ॥ ४७ ॥

पावितस्तेन यज्ञेन यास्यसे त्रिदिवं ततः ।

पुत्रश्च तत्र देवेन्द्र न विनष्टो महारणे ॥ ४८ ॥

नीतः संनिहितश्चैव आर्यकेण महोदधौ । ‘ देवेन्द्र! उस यज्ञसे पवित्र होकर तुम पुनः स्वर्गलोक प्राप्त कर लोगे । तुम्हारा पुत्र जयन्त उस महासमर में मारा नहीं गया है । उसका नाना पुलोमा उसे महासागर में ले गया है । इस समय वह उसीके पास है ' ॥ ४८३ ॥

एतच्छ्रुत्वा महेन्द्रस्तु यज्ञमिष्ट्वा च वैष्णवम् ॥ ४ ९ ॥ पुनस्त्रिदिवमाक्रामदन्वशासच्च देवराट् । ब्रह्माजीकी यह बात सुनकर देवराज इन्द्रने वैष्णव - यज्ञका अनुष्ठान किया । वह यज्ञ पूरा करके देवराज स्वर्गलोक में गये और वहाँ देवराज्यका शासन करने लगे ॥ ४ ९ ३ ॥ एतदिन्द्रजितो नाम बलं यत् कीर्तितं मया ॥ ५० ॥

निर्जितस्तेन देवेन्द्रः प्राणिनोऽन्ये तु किं पुनः । रघुनन्दन! यह है इन्द्रविजयी मेघनादका बल, जिसका मैंने आपसे वर्णन किया है । उसने देवराज इन्द्रको भी जीत लिया था; फिर दूसरे प्राणियोंकी तो बिसात ही क्या थी ५०३ आश्चर्यमिति रामश्च लक्ष्मणश्चाब्रवीत् तदा ॥ ५१ ॥

अगस्त्यवचनं श्रुत्वा वानरा राक्षसास्तदा । अगस्त्यनी की यह बात सुनकर श्रीराम और लक्ष्मण तत्काल बोल उठे - ' आश्चर्य है । साथ ही वानरों और राक्षसों को भी इस बातसे बड़ा विस्मय हुआ ॥ ५१३ ॥

विभीषणस्तु रामस्य पार्श्वस्थो वाक्यमब्रवीत् ॥ ५२ ॥

आश्चर्य स्मारितोऽस्म्यद्य यत् तद् दृष्टं पुरातनम् । उस समय श्रीरामके बगल में बैठे हुए विभीषणने कहा-" मैंने पूर्वकालमें जो आश्चर्य की बातें देखी थीं, उनका आज महर्षिने स्मरण दिला दिया है ' ॥ ५२३ ॥

अगस्त्यं त्वब्रवीद् रामः सत्यमेतच्छुतं च मे ॥ ५३ ॥

एवं राम समुद्भूतो रावणो लोककण्टकः ।

सपुत्रो येन संग्रामे जितः शक्रः सुरेश्वरः ॥ ५४ ॥

तब श्रीरामचन्द्रजीने अगस्त्यजी से कहा- ' आपकी बात सत्य है । मैंने भी विभीषणके मुखसे यह बात सुनी थी । फिर अगस्त्यजी बोले- ' श्रीराम! इस प्रकार पुत्रसहित रावण सम्पूर्ण जगत् के लिये कण्टकरूप था, जिसने देवराज इन्द्रको भी संग्राममें जीत लिया था ' ॥ ५३-५४ ॥ इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये उत्तरकाण्डे त्रिंशः सर्गः ॥ ३० ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें तीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ३० ॥

एकत्रिंशः सर्गः रावणका माहिष्मतीपुरी में जाना और वहाँके राजा अर्जुनको न पाकर मन्त्रियोंसहित उसका विन्ध्यगिरिके समीप नर्मदा में नहाकर भगवान् शिव की आराधना करना

ततो रामो महातेजा विस्मयात् पुनरेव हि ।

उवाच प्रणतो वाक्यमगस्त्यमृषिसत्तमम् ॥ १ ॥

तदनन्तर महातेजस्वी श्रीरामने मुनिश्रेष्ठ अगस्त्यको प्रणाम करके पुनः विस्मयपूर्वक पूछा – ॥ १ ॥

भगवन् राक्षसः क्रूरो पर्यटत् किं तदा लोकाः ' भगवन्! द्विजश्रेष्ठ विजय करता घूम रहा था शौर्य - सम्बन्धी गुणोंसे शून्य राजा वा राजमात्रो वा घर्षणं यत्र न प्राप्तो

यदाप्रभृति मेदिनीम् ।

शून्या आसन् द्विजोत्तम ॥ २ ॥

! जब क्रूर निशाचर रावण पृथ्वीपर , उस समय क्या यहाँके सभी लोग ही थे? ॥ २ ॥

किं तदा नात्र कश्चन ।

रावप्यो राक्षसेश्वरः ॥ ३ ॥

" क्या उन दिनों यहाँ कोई भी क्षत्रिय नरेश अथवा क्षत्रियेतर राजा अधिक बलवान् नहीं था, जिससे इस भूतलपर पहुँचकर राक्षसराज रावणको पराजित या अप नहीं पड़ा ॥ ३ ॥

उताहो हतवीर्यास्ते बभूवुः पृथिवीक्षितः ।

बहिष्कृता वरास्त्रैश्च बहवो निर्जिता नृपाः ॥ ४ ॥

' अथवा उस समयके सभी राजा पराक्रमशून्य तथा शस्त्र-ज्ञानसे हीन थे, जिसके कारण उन बहुसंख्यक श्रेष्ठ नरपालोंको रावणसे परास्त होना पड़ा ' ॥ ४ ॥

राघवस्य वचः श्रुत्वा अगस्त्यो भगवानृषिः ।

उवाच रामं प्रहसन् पितामह इवेश्वरम् ॥ ५ ॥

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उत्तरकाण्डे एकत्रिंशः सर्गः १५३७ श्रीरामचन्द्रजीकी यह बात सुनकर भगवान् अगस्त्यमुनि ठठाकर हँस पड़े और जैसे ब्रह्माजी महादेवजी से कोई बात कहते हों, इसी तरह वे श्रीरामचन्द्रजी से बोले ॥ ५ ॥

इत्येवं बाधमानस्तु पार्थिवान् पार्थिवर्षभ ।

चचार रावणो राम पृथिवीं पृथिवीपते ॥ ६ ॥

' पृथ्वीनाथ! भूपालशिरोमणे! श्रीराम! इसी प्रकार सब राजाओं को सताता और पराजित करता हुआ रावण इस पृथ्वीपर विचरने लगा ॥ ६ ॥

ततो माहिष्मतीं नाम पुरीं स्वर्ग पुरीप्रभाम् ।

सम्प्राप्तो यत्र सांनिध्यं सदासीद् वसुरेतसः ॥ ७ ॥

' घूमते - घूमते वह स्वर्गपुरी अमरावती के समान सुशोभित होनेवाली माहिष्मती नामक नगरीमें जा पहुँचा, जहाँ अग्निदेव सदा विद्यमान रहते थे ॥ ७ ॥

तुल्य आसीन्नृपस्तस्य प्रभावाद् वसुरेतसः ।

अर्जुनो नाम यत्राग्निः शरकुण्डेशयः सदा ॥ ८ ॥

' उन अग्निदेवके प्रभावसे वहाँ अग्निके ही समान तेजस्वी अर्जुन नामक राजा राज्य करता था, जिसके राज्यकाल में - कुशास्तरणसे युक्त अग्निकुण्डमें सदा अग्निदेवता निवास करते थे ॥ ८ ॥

तमेव दिवसं सोऽथ हैहयाधिपतिर्बली ।

अर्जुनो नर्मदां रन्तुं गतः स्त्रीभिः सहेश्वरः ॥ ९ ॥

' जिस दिन रावण वहाँ पहुँचा, उसी दिन बलवान् हैहयराज राजा अर्जुन अपनी स्त्रियोंके साथ नर्मदा नदीमें जल-क्रीड़ा करने के लिये चला गया था ॥ ९ ॥

तमेव दिवस सोऽथ रावणस्तत्र आगतः ।

रावणो राक्षसेन्द्रस्तु तस्यामात्यान पृच्छत ॥ १० ॥

' उसी दिन रावण माहिष्मतीपुरी में आया । वहाँ आकर राक्षसराज रावणने राजाके मन्त्रियोंसे पूछा ॥ १० ॥

कार्जुनो नृपतिः शीघ्रं सम्यगाख्यातुमर्हथ । रावणोऽहमनुप्राप्तो युद्धे सुर्नृवरेण " " मन्त्रियो! जल्दी और ठीक - ठीक बताओ; ह राजा ॥ ११ अर्जुन ॥ कहाँ हैं? मैं रावण हूँ और तुम्हारे महाराजसे युद्ध करने के लिये आया हूँ ॥ ११ ॥

ममागमनमप्यग्रे युष्माभिः संनिवेद्यताम् ।

इत्येवं रावणेनोक्तास्तेऽमात्याः सुविपश्चितः ॥ १२ ॥

अब्रुवन् राक्षसपतिमसांनिध्यं महीपतेः । " तुमलोग पहले ही जाकर उन्हें मेरे आगमनकी सूचना दे दो । ' रावणके ऐसा कहनेपर राजाके विद्वान् मन्त्रियोंने राक्षसराजको बताया कि हमारे महाराज इस समय राजधानी में नहीं हैं ॥ १२३ ॥

सुनकर विश्रवाका पुत्र रावण वहाँसे हटकर हिमालय के समान विशाल विन्ध्यगिरिपर आया ॥ १३३ ॥

स तमभ्रमिवाविष्टमुद्भ्रान्तमिव मेदिनीम् ॥ १४ ॥

अपश्यद् रावणो विन्ध्यमालिखन्तमिवाम्बरम् ।

सहस्रशिखरोपेतं सिंहाध्युषितकन्दरम् ॥ १५ ॥

' वह इतना ऊँचा था कि उसका शिखर बादलोंमें समाया हुआ - सा जान पड़ता था तथा वह पर्वत पृथ्वी फोड़कर ऊपर-को उठा हुआ - सा प्रतीत होता था । विन्ध्यके गगनचुम्बी शिखर आकाशमें रेखा खींचते से जान पड़ते थे । रावणने उस महान शैलको देखा । वह अपने सहस्रों शृङ्गोंसे सुशोभित हो रहा था और उसकी कन्दराओंमें सिंह निवास करते थे ॥ १४-१५ ॥

प्रपातपतितैः शीतैः सा ट्टहासमिवाम्बुभिः ।

देवदानवगन्धर्वैः साप्सरोभिः सकिंनरैः ॥ १६ ॥

स्वस्त्रीभिः क्रीडमानैश्च स्वर्गभूतं महोच्छ्रयम् । ' उसके सर्वोच्च शिखरके तटसे जो शीतल जलकी धाराएँ गिर रही थीं, उनके द्वारा वह पर्वत अट्टहास करता - सा प्रतीत होता था । देवता, दानव, गन्धर्व और किन्नर अपनी - अपनी स्त्रियों और अप्सराओंके साथ वहाँ क्रीड़ा कर रहे थे । वह अत्यन्त ऊँचा पर्वत अपनी सुरम्य सुषमासे स्वर्गके समान सुशोभित हो रहा था ॥ १६३ ॥

नदीभिः स्यन्दमानाभिः स्फटिकप्रतिमं जलम् ॥ १७ ॥

फणाभिश्चलजिह्वाभिरनन्तमिव विष्ठितम् ।

उत्क्रामन्तं दरीवन्तं हिमवत्संनिभं गिरिम् ॥ १८ ॥

' स्फटिक के समान निर्मल जलका स्रोत बहानेवाली नदियों-के कारण वह विन्ध्यगिरि चञ्चल जिह्वावाले फर्नोसे उपलक्षित शेषनागके समान स्थित था । अधिक ऊँचाईके कारण वह ऊर्ध्वलोक को जाता - सा जान पड़ता था । हिमालय के समान विशाल एवं विस्तृत विन्ध्यगिरि बहुत - सी गुफाओंसे युक्त दिखायी देता था ॥ १७-१८ ॥

पश्यमानस्ततो विन्ध्यं रावणो नर्मदां ययौ ।

चलोपलजलां पुण्यां पश्विमोदधिगामिनीम् ॥ १ ९ ॥

महिषैः समरैः सिंहः शार्दूलर्क्षगजोत्तमैः ।

उष्णाभितप्तैस्तृषितैः संक्षोभितजलाशयाम् ॥ २० ॥

‘ विन्ध्याचलकी शोभाको देखता हुआ रावण पुण्यसलिला नर्मदा नदी के तटपर गया, जिसमें शिलाखण्डोंसे युक्त चञ्चल जल प्रवाहित हो रहा था । वह नदी पश्चिम समुद्रकी ओर चली जा रही थी । धूपसे तपे हुए प्यासे भैंसे, हिरन, सिंह, व्याघ्र, रीछ और गजराज उसके जलाशयको विक्षुब्ध कर रहे थे ॥ १ ९ -२० ॥ श्रुत्वा विश्रवसः पुत्रः पौराणामर्जुनं गतम् ॥ १३ ॥ चक्रवाकैः सकारण्डैः सहंसजलकुक्कुटैः ।

अपसृत्यागतो विन्ध्यं हिमवत्संनिभं गिरिम् । सारसैश्च सदा मत्तैः कूजद्भिः सुसमावृताम् ॥ २१ ॥

‘ पुरवासियोंके मुखसे राजा अर्जुनके बाहर जाने की बात ' सदा मतवाले होकर कलरव करनेवाले चक्रवाक, कारण्डव, वा ० रा ० ५.११.१३-

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श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे १५३८ हंस, जलकुक्कुट और सारस आदि जलपक्षी नर्मदाकी जल-राशिपर छा रहे थे! २१ ॥

फुल्लद्रुमकृतोत्तंसां चक्रवाकयुगस्तनीम् ।

विस्तीर्ण पुलिनश्रोणी हंसावलिसुमेखलाम् ॥ २२ ॥

पुष्परेण्वनुलिप्ताङ्ग जलफेनामलांशुकाम् ।

फुल्लोत्पलशुभेक्षणाम् ॥ २३ ॥

जलावगाहसुस्पर्शी

पुष्पकादवरुह्याशु नर्मदां सरितां वराम् ।

इष्टामिव वरां नारीमवगाह्य दशाननः ॥ २४ ॥

स तस्याः पुलिने रम्ये नानामुनिनिषेविते ।

उपोपविष्टः सचिवैः सार्धं राक्षसपुङ्गवः ॥ २५ ॥

' सरिताओं में श्रेष्ठ नर्मदा परम सुन्दरी प्रियतमा नारीके समान प्रतीत होती थी । खिले हुए तटवर्ती वृक्ष मानो उसके थे । चक्रवाकके जोड़े उसके दोनों स्तनोंका स्थान ले रहे आभूषण थे । ऊँचे और विस्तृत पुलिन नितम्बके समान जान पड़ते थे । हंसोंकी पङ्क्ति मोतियोंकी बनी हुई मेखला ( करधनी ) के समान शोभा दे रही थी । पुष्पोंके पराग ही अङ्गराग बन-कर उसके अङ्ग अङ्गमें अनुलिप्त हो रहे थे । जलका उज्ज्वल फेन ही उसकी स्वच्छ, श्वेत साड़ीका काम दे रहा था । जलमें गोता लगाना ही उसका सुखद संस्पर्श था और खिले हुए कमल ही उसके सुन्दर नेत्र जान पड़ते थे । राक्षसशिरोमणि दशमुख रावणने शीघ्र ही पुष्पकविमानसे उतरकर नर्मदा के जलमें डुबकी लगायी और बाहर निकलकर वह नाना मुनियोंसे सेवित उसके रमणीय तटपर अपने मन्त्रियोंके साथ बैठा ॥ २२-२५ ॥

प्रख्याय नर्मदां सोऽथ गङ्गेयमिति रावणः ।

नर्मदादर्शने हर्षमाप्तवान् स दशाननः ॥ २६ ॥

" ये साक्षात् गङ्गा हैं ' ऐसा कहकर दशानन रावणने नर्मदा की प्रशंसा की और उसके दर्शनसे इर्षका अनुभव किया ॥ २६ ॥

उवाच सचिवांस्तत्र सलीलं शुकसारणौ ।

एष रश्मिसहस्रेण जगत् कृत्वेव काञ्चनम् ॥ २७ ॥

तीक्ष्णतापकरः सूर्यो नभसो मध्यमास्थितः । " फिर वहाँ उसने शुक, सारण तथा अन्य मन्त्रियोंसे लीलापूर्वक कहा — ये सूर्यदेव अपनी सहस्रों किरणोंसे सम्पूर्ण

इयं वापि सरिच्छ्रेष्ठा नर्मदा नर्मवर्धिनी ।

नक्रमीनविहंगोर्मिः सभयेवाङ्गना स्थिता ॥ ३० ॥

“ सरिताओंमें श्रेष्ठ यह नर्मदा भी क्रीड़ारस एवं प्रीतिको बढ़ा रही है । इसकी लहरोंमें मगर, मत्स्य और जलपक्षी खेल रहे हैं और यह भयभीत नारीके समान स्थित है ॥ ३० ॥

तद्भवन्तः क्षताः शस्त्रैर्नृपैरिन्द्रसमैर्युधि ।

चन्दनस्य रसेनेव रुधिरेण समुक्षिताः ॥ ३१ ॥

“ तुमलोग युद्धस्थलमें इन्द्रतुल्य पराक्रमी नरेशोंद्वारा अस्त्र - शस्त्रोंसे घायल कर दिये गये हो और रक्तसे इस प्रकार नहा उठे हो कि तुम्हारे अङ्गोंमें लालचन्दन रसका लेप - सा लगा हुआ जान पड़ता है ॥ ३१ ॥

ते यूयमवगाहध्वं नर्मदां शर्मदां शुभाम् ।

सार्वभौममुखा मत्ता गङ्गामिव महागजाः ॥ ३२ ॥

" अतः तुम सब - के - सब सुख देनेवाली इस मङ्गलकारिणी नर्मदा नदीमें स्नान करो । ठीक उसी तरह, जैसे सार्वभौम आदि महान् दिग्गज मतवाले होकर गङ्गामें अवगाहन करते हैं ॥ ३२ ॥

अस्यां खात्वा महानद्यां पाप्मनो विप्रमोक्ष्यथ ।

पुलिने शरदिन्दुसमप्रभे ॥ ३३ ॥

अहमप्यद्य शनकैः करिष्यामि कपर्दिनः । पुष्पोपहारं " इस महानदीमें स्नान करके तुम पाप - तापसे मुक्त हो जाओगे । मैं भी आज शरदऋतुके चन्द्रमाकी भाँति उज्ज्वल नर्मदा - तटपर धीरे - धीरे जटाजूटधारी महादेवजीको फूलोंका उपहार समर्पित करूँगा ' ॥ ३३३ ॥

रावणेनैवमुक्तस्तु प्रहस्तशुकसारणाः ॥ ३४ ॥

समहोदरधूम्राक्षा नर्मदां विजगाहिरे । ' रावण के ऐसा कहने पर प्रहस्त, शुक, सारण, महोदर और धूम्राक्षने नर्मदामें स्नान किया ॥ ३४३ ॥

राक्षसेन्द्रगजैस्तैस्तु क्षोभिता नर्मदा नदी ॥ ३५ ॥

इव महागजैः । वामनाञ्जनपद्माद्यैर्गङ्गा ' राक्षसराजकी सेनाके हाथियोंने नर्मदा नदीमें उतरकर उसके जलको मथ डाला, मानो वामन, अञ्जन, पद्म आदि बड़े - बड़े दिग्गजोंने गङ्गाजीके जलको विक्षुब्ध कर डाला हो ॥ ३५३ ॥

स्नात्वा नर्मदायां महाबलाः ॥ ३६ ॥

जगत्को मानो काञ्चनमय बनाकर प्रचण्ड ताप देते हुए इस ततस्ते राक्षसाः रावणस्य तु । समय आकाश के मध्यभागमें विराज रहे हैं ॥ २७३ ॥ उत्तीर्य पुष्पाण्याजहर्बल्यर्थ

राक्षस गङ्गामें स्नान करके बाहर चन्द्रायति दिवाकरः ॥ २८ ॥ ' तदनन्तर वे महाबली

मामासीनं विदित्वैव आये और रावणके शिवपूजनके लिये फूल जुटाने लगे ॥ ३६३ ॥

नर्मदा जलशीतश्च सुगन्धिः श्रमनाशनः । ये शुभ्रासदृशप्रभे ॥ ३७ ॥

मद्भयादनिलो ह्येष वात्यसौ सुसमाहितः ॥ २ ९ ॥ नर्मदापुलिने गिरिः । “ किंतु मुझे यहाँ बैठा जानकर ही चन्द्रमाके समान शीतल राक्षसैस्तु मुहूर्तेन कृतः पुष्पमयो हैं । मेरे ही भयसे वायु भी नर्मदाके जलसे शीतल, ‘ श्वेत बादलोंके समान शुभ्र एवं मनोरम नर्मदा- पुलिनपर हो गये सावधानीके साथ मन्द- उन राक्षसोंने दो ही घड़ीमें फूलोंका पहाड़ जैसा ढेर लगा सुगन्धित और श्रमनाशक होकर बड़ी गति से बह रही है ॥ २८-२९ ॥ दिया ॥ ३७३ ॥

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उत्तरकाण्डे द्वात्रिंशः सर्गः १५३ ९ पुष्पेषूपहृतेष्वेवं रावणो राक्षसेश्वरः ॥ ३८ ॥

अवतीर्णो नदीं स्नातुं गङ्गामिव महागजः । ' इस प्रकार पुष्पों का संचय हो जानेपर राक्षसराज रावण स्वयं स्नान करनेके लिये नर्मदा नदीमें उतरा, मानो कोई

महान् गजराज गङ्गामें अवगाहन करनेके लिये घुसा हो । ३८३ ।

तत्र स्नात्वा च विधिवज्जप्त्वा जप्यमनुत्तमम् ॥ ३ ९ ॥

नर्मदासलिलात् तस्मादुत्ततार स रावणः । ' वहाँ विधिपूर्वक स्नान करके रावणने परम उत्तम जपनीय मन्त्रका जप किया । इसके बाद वह नर्मदाके जलसे बाहर निकला ॥ ३ ९ ३ ॥ ततः क्लिन्नाम्बरं त्यक्त्वा शुक्लवस्त्र समावृतः ॥ ४० ॥

रावणं प्राञ्जलिं यान्तमन्वयुः सर्वराक्षसाः ।

तद्गतीवशमापन्ना मूर्तिमन्त इवाचलाः ॥ ४१ ॥

" फिर भीगे कपड़े को उतारकर उसने श्वेत वस्त्र धारण किया । इसके बाद वह हाथ जोड़े महादेवजी की पूजाके लिये चला । उस समय और सब राक्षस भी उसके पीछे हो लिये, मानो मूर्तिमान् पर्वत उसकी गतिके अधीन हो खिंचे चले जा रहे हों ॥ ४०-४१ ॥

यत्र यत्र च याति स्म रावणो राक्षसेश्वरः ।

जाम्बूनदमयं लिङ्गं तत्र तत्र स्म नीयते ॥ ४२ ॥

' राक्षसराज रावण जहाँ - जहाँ भी जाता था, वहाँ - वहाँ एक सुवर्णमय शिवलिङ्ग अपने साथ लिये जाता था ॥ ४२ ॥

वालुकावेदिमध्ये तु तल्लिङ्गं स्थाप्य रावणः ।

अर्चयामास गन्धैश्च पुष्पैश्चामृतगन्धिभिः ॥ ४३ ॥

' रावणने बालूकी वेदीपर उस शिवलिङ्गको स्थापित कर दिया और चन्दन तथा अमृत के समान सुगन्धवाले पुष्पोंसे उसका पूजन किया ॥ ४३ ॥

ततः सतामार्तिहरं परं वरं वरप्रदं चन्द्रमयूखभूषणम् । समर्चयित्वा स निशाचरो जगौ प्रसार्य हस्तान् प्रणनर्त चाग्रतः ॥ ४४ ॥

‘ जो अपने ललाटमें चन्द्रकिरणों को आभूषणरूपसे धारण करते हैं, सत्पुरुषोंकी पीड़ा हर लेते हैं तथा भक्तोंको मनोवाञ्छित वर प्रदान करते हैं, उन श्रेष्ठ एवं उत्कृष्ट देवता भगवान् शङ्करका भलीभाँति पूजन करके वह निशाचर उनके सामने गाने और हाथ फैलाकर नाचने लगा ॥ ४४ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये उत्तरकाण्डे एकत्रिंशः सर्गः ॥ ३१ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें इकतीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ३१ ॥

द्वात्रिंशः सर्गः अर्जुनकी भुजाओंसे नर्मदा के प्रवाहका अवरुद्ध होना, रावणके पुष्पोपहारका वह जाना, फिर रावण आदि निशाचरोंका अर्जुन के साथ युद्ध तथा अर्जुनका रावणको कैद करके अपने नगर में ले जाना

नर्मदापुलिने यत्र राक्षसेन्द्रः स दारुणः ।

पुष्पोपहारं कुरुते तस्माद् देशाददूरतः ॥ १ ॥

अर्जुनो जयतां श्रेष्ठो माहिष्मत्याः पतिः प्रभुः ।

क्रीडते सह नारीभिर्नर्मदातोयमाश्रितः ॥ २ ॥

' नर्मदाजी के तटपर जहाँ क्रूर राक्षसराज रावण महादेवजी-को फूलोंका उपहार अर्पित कर रहा था, उस स्थानसे थोड़ी दूरपर विजयी वीरोंमें श्रेष्ठ माहिष्मतीपुरीका शक्तिशाली राजा अर्जुन अपनी स्त्रियोंके साथ नर्मदाके जलमें उतरकर क्रीडा कर रहा था ॥ १-२ ॥

तासां मध्यगतो राजा रराज च तदार्जुनः ।

करेणूनां सहस्रस्य मध्यस्थ इव कुञ्जरः ॥ ३ ॥

' उन सुन्दरियोंके बीच में विराजमान राजा अर्जुन सहस्रों हथिनियोंके मध्यभागमें स्थित हुए गजराजके समान शोभा पाता था ॥ ३ ॥

जिज्ञासुः स तु बाहूनां सहस्रस्योत्तमं बलम् ।

रुरोध नर्मदावेगं बाहुभिर्बहुभिर्वृतः ॥ ४ ॥

‘ अर्जुनके हजार भुजाएँ थीं 1 । उनके उत्तम बलको जाँचने-के लिये उसने उन बहुसंख्यक भुजाओं द्वारा नर्मंदा वेगको रोक दिया || ४ ||

कार्तवीर्यभुजासक्तं तज्जलं प्राप्य निर्मलम् ।

कूलोपहारं कुर्वाणं प्रतिस्रोतः प्रधावति ॥ ५ ॥

' कृतवीर्यं पुत्र अर्जुनकी भुजाओंद्वारा रोका हुआ नर्मदाका वह निर्मल जल तटपर पूजा करते हुए रावणके पासतक पहुँच गया और उसी ओर उल्टी गतिसे बहने लगा ॥ ५ ॥

समीननक्रमकरः सपुष्पकुशसंस्तरः ।

स नर्मदाम्भसो वेगः प्रावृटकाल इवाबभौ ॥ ६ ॥

' नर्मदाके जलका वह वेग मत्स्य, नक्र, मगर, फूल और कुशास्तरणके साथ बढ़ने लगा । उसमें वर्षाकालके समान बाढ़ आ गयी ॥ ६ ॥

स वेगः कार्तवीर्येण सम्प्रेषित इवाम्भसः ।

पुष्पोपहारं सकलं रावणस्य जहार ह ॥ ७ ॥

‘ जलका वह वेग, जिसे मानो कार्तवीर्य अर्जुनने ही भेजा हो, रावणके समस्त पुष्पोपहारको बहा ले गया ॥ ७ ॥

रावणोऽर्धसमाप्तं तमुत्सृज्य नियमं तदा ।

नर्मदां पश्यते कान्तां प्रतिकूलां यथा प्रियाम् ॥ ८ ॥

' रावणका वह पूजन- सम्बन्धी नियम अभी आधा ही समाप्त हुआ था, उसी दशामें उसे छोड़कर वह प्रतिकूल हुईं

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१५४० श्रीमद्द्वाल्मीकीय रामायणे कमनीय कान्तिवाली प्रेयसीकी भाँति नर्मदाकी ओर देखने लगा ॥ ८ ॥

पश्चिमेन तु तं दृष्ट्वा सागरोद्वारसंनिभम् ।

वर्धन्तमम्भसो वेगं पूर्वामाशां प्रविश्य तु ॥ ९ ॥

' पश्चिमसे आते और पूर्व दिशामें प्रवेश करके बढ़ते हुए जलके उस वेगको उसने देखा । वह ऐसा जान पड़ता था, मानो समुद्र में ज्वार आ गया हो ॥ ९ ॥

ततोऽनुद्भ्रान्तशकुनां स्वभावे परमे स्थिताम् ।

निर्विकाराङ्गनाभासामपश्यद् रावणो नदीम् ॥ १० ॥

' उसके तटवर्ती वृक्षों पर रहनेवाले पक्षियों में कोई घबराहट नहीं थी । वह नदी अपनी परम उत्तम स्वाभाविक स्थिति में स्थित थी -- उसका जल पहले ही जैसा स्वच्छ एवं निर्मल दिखायी देता था । उसमें वर्षाकालिक बाढ़के समय जो मलिनता आदि विकार होते थे, उनका उस समय सर्वथा अभाव था । रावणने उस नदीको विकारशून्य हृदयवाली नारीके समान देखा ॥ १० ॥

सव्येतरकराल्या शब्दास्यो दशाननः ।

वेगप्रभवमन्वेष्टुं सोऽदिशच्छुकसारणौ ॥ ११ ॥

‘ उसके मुख से एक शब्द भी नहीं निकला । उसने मौन-व्रतकी रक्षा के लिये बिना बोले ही दाहिने हाथकी अङ्गुलीसे संकेतमात्र करके बाढ़ के कारणका पता लगानेके निमित्त शुक और सारणको आदेश दिया ॥ ११ ॥

तौ तु रावणसंदिष्टौ भ्रातरौ शुकसारणौ ।

व्योमान्तरगतौ वीरौ प्रस्थितौ पश्चिमामुखौ ॥ १२ ॥

' रावणका आदेश पाकर दोनों वीर भ्राता शुक और सारण आकाशमार्ग से पश्चिम दिशाकी ओर प्रस्थित हुए ॥ १२ ॥

अर्धयोजनमात्रं तु गत्वा तौ रजनीचरौ ।

पश्येतां पुरुषं तोये क्रीडन्तं सहयोषितम् ॥ १३ ॥

' केवल आधा योजन जानेपर ही उन दोनों निशाचरौने एक पुरुषको स्त्रियोंके साथ जलमें क्रीडा करते देखा ॥ १३ ॥

बृहत्सालप्रतीकाशं तोयव्याकुलमूर्धजम् ।

मदरक्तान्तनयनं मदव्याकुलचेतसम् ॥ १४ ॥

' उसका शरीर विशाल सालवृक्ष के समान ऊँचा था । उसके केश जलसे ओतप्रोत हो रहे थे 1 । नेत्रप्रान्तमें मदकी लाली दिखायी दे रही थी और चित्त भी मदसे व्याकुल जान पड़ता था ॥ १४ ॥

द बाहुसहस्रेण रुन्धन्तमरिमर्दनम् ।

गिरिं पादसहस्रेण रुन्धन्तमिव मेदिनीम् ॥ १५ ॥

" वह शत्रुमर्दन वीर अपनी सहस्र भुजाओंसे नदीके वेगको रोककर सहस्रों चरणोंसे पृथ्वीको थामे रखनेवाले पर्वतके समान शोभा पाता था ॥ १५ ॥

बालानां वरनारीणां सहस्रेण समावृतम् ।

समदानां करेणूनां सहस्रेणेव कुञ्जरम् ॥ १६ ॥

' नयी अवस्थाकी सहस्रों सुन्दरियाँ उसे घेरे हुए ऐसी जान पड़ती थीं, मानो सहस्रों मदमत्त हथिनियोंने किसी गज-राजको घेर रक्खा हो ॥ १६ ॥

तमद्भुततरं दृष्ट्रा राक्षसौ शुकसारणौ ।

संनिवृत्तावुपागम्य रावणं तमथोचतुः ॥ १७ ॥

' उस परम अद्भुत दृश्यको देखकर राक्षस शुक और सारण लौट आये और रावणके पास जाकर बोले – ॥ १७ ॥

बृहत्सालप्रतीकाशः कोऽप्यसौ राक्षसेश्वर ।

नर्मदां रोधवद् रुद्ध्वा क्रीडापयति योषितः ॥ १८ ॥

' ' राक्षसराज! यहाँसे थोड़ी ही दूरपर कोई सालवृक्षके समान विशालकाय पुरुष है, जो बाँधकी तरह नर्मदाके जलको रोककर स्त्रियोंके साथ क्रीडा कर रहा है ॥ १८ ॥

तेन बाहुसहस्रेण संनिरुद्धजला नदी ।

सागरोद्वारसंकाशानुद्वारान् सृजते मुहुः ॥ १ ९ ॥

" उसकी सहस्र भुजाओंसे नदीका जल रुक गया है । इसीलिये यह बारंबार समुद्रके ज्वारकी भाँति जलके उद्गारकी सृष्टि कर रही है ' ॥ १ ९ ॥

इत्येवं भाषमाणौ तौ निशम्य शुकसारणौ ।

रावणोऽर्जुन इत्युक्त्वा स ययौ युद्धलालसः ॥ २० ॥

' इस प्रकार कहते हुए शुक और सारणकी बातें सुनकर रावण बोल उठा- ' वही अर्जुन है ' ऐसा कहकर वह युद्धकी लालसासे उसी ओर चल दिया ॥ २० ॥

अर्जुनाभिमुखे तस्मिन् रावणे राक्षसाधिपे ।

a ण्डः प्रवाति पवनः सनादः सरजस्तथा ॥ २१ ॥

' राक्षसराज रावण जब अर्जुनकी ओर चला, तब धूल और भारी कोलाहलके साथ वायु प्रचण्ड वेगसे चलने लगी ॥ २१ ॥

सकृदेव कृतो रावः सरक्तपृषतो धनैः ।

महोदर महापार्श्वधूम्राक्षशुकसारणैः ॥ २२ ॥

संवृतो राक्षसेन्द्रस्तु तत्रागाद् यत्र चार्जुनः । ' बादलोंने रक्तबिन्दुओंकी वर्षा करके एक बार ही बड़े जोरसे गर्जना की । इधर राक्षसराज रावण महोदर, महापार्श्व, धूम्राक्ष, शुक और सारणको साथ ले उस स्थान की ओर चला, जहाँ अर्जुन क्रीडा कर रहा था ॥ २२३ ॥

अदीर्घेणैव कालेन स तदा राक्षसो बली ॥ २३ ॥

तं नर्मदाहृदं भीममाजगामाञ्जनप्रभः । ' काजल या कोयले के समान काला वह बलवान् राक्षस थोड़ी देरमें नर्मदाके उस भयंकर जलाशयके पास जा पहुँचा ॥ २३३ ॥

स तत्र स्त्रीपरिवृतं वासिताभिरिव द्विपम् ॥ २४ ॥

नरेन्द्रं पश्यते राजा राक्षसानां तदार्जुनम् । • वहाँ पहुँचकर राक्षसोंके राजा रावणने मैथुनकी इच्छा-वाली हथिनियों से घिरे हुए गजराजके समान सुन्दरी स्त्रियोंसे परिवेष्टित महाराज अर्जुनको देखा ॥ २४३ ॥

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उत्तरकाण्डे द्वात्रिंशः सर्गः १५४१ स रोषाद् रक्तनयनो राक्षसेन्द्रो बलोद्धतः ॥ २५ ॥

इत्येवमर्जुनामात्यानाह गम्भीरया गिरा । ‘ उसे देखते ही रावणके नेत्र रोषसे लाल हो गये । अपने बलके घमंडसे उद्दण्ड हुए राक्षसराजने अर्जुनके मन्त्रियोंसे गम्भीर वाणीमें इस प्रकार कहा- ॥ २५३ ॥

अमात्याः क्षिप्रमाख्यात हैहयस्य नृपस्य वै ॥ २६ ॥

युद्धार्थ समनुप्राप्तो रावणो नाम नामतः । “ मन्त्रियो! तुम दैहयराजसे जल्दी जाकर कहो कि रावण तुमसे युद्ध करनेके लिये आया है ' ॥ २६३ ॥

रावणस्य वचः श्रुत्वा मन्त्रिणोऽथार्जुनस्य ते ॥ २७ ॥

उत्तस्थुः सायुधास्तं च रावणं वाक्यमब्रुवन् । • ' रावणकी बात सुनकर अर्जुनके वे मन्त्री हथियार लेकर खड़े हो गये और रावणसे इस प्रकार बोले - ॥ २७३ ॥

युद्धस्य कालो विज्ञातः साधु भो साधु रावण ॥ २८ ॥

यः क्षीवं स्त्रीगतं चैव योद्धुमुत्सहसे नृपम् । " वाह रे रावण! वाह! तुम्हें युद्धके अवसरका अच्छा ज्ञान है । हमारे महाराज जब मदमत्त होकर स्त्रियोंके बीचमें क्रीडा कर रहे हैं, ऐसे समय में तुम उनके साथ युद्ध करनेके लिये उत्साहित हो रहे हो ॥ २८३ ॥

स्त्रीसमक्षगतं यत् त्वं योद्धुमुत्सहसे नृप ॥ २ ९ ॥ वासितामध्यगं मत्तं शार्दूल इव कुञ्जरम् । “ जैसे कोई व्यात्र कामवासनासे वासित इथिनियोंके बीचमें खड़े हुए गजराजसे जूझना चाहता हो, उसी प्रकार तुम स्त्रियों के समक्ष क्रीडा - विलासमें तत्पर हुए राजा अर्जुनके साथ युद्ध करनेका हौसला दिखा रहे हो ॥ २ ९ ३ ॥

क्षमस्वाद्य दशग्रीव उष्यतां रजनी त्वया ।

युद्धे श्रद्धा तु यद्यस्ति श्वस्तात समरेऽर्जुनम् ॥ ३० ॥

' तात! दशग्रीव! यदि तुम्हारे हृदयमें युद्धके लिये उत्साह है, रातभर क्षमा करो और आजकी रातमें यहीं ठहरो । फिर कल सबेरे तुम राजा अर्जुनको समराङ्गण में उपस्थित देखोगे ॥ ३० ॥

यदि वापि त्वरा तुभ्यं युद्धतृष्णासमावृत । निपात्यास्मान् रणे युद्धमर्जुनेनोपयास्यसि ॥ ३१ ॥ ·

" युद्ध की तृष्णा से घिरे हुए राक्षसराज! यदि तुम्हें जूझने-के लिये बड़ी जल्दी लगी हो तो पहले रणभूमिमें हम सबको मार गिराओ । उसके बाद महाराज अर्जुनके साथ युद्ध करने पाओगे ' ॥ ३१ ॥

ततस्तै रावणामात्यैरमात्यास्ते नृपस्य तु ।

सूदिताश्चापि ते युद्धे भक्षिताश्च बुभुक्षितैः ॥ ३२ ॥

‘ यह सुनकर रावणके भूखे मन्त्री युद्धस्थलमें अर्जुनके अमात्योंको मार - मारकर खाने लगे ॥ ३२ ॥

ततो हलहलाशब्दो नर्मदातीरगो बभौ ।

अर्जुनस्यानुयात्राणां रावणस्य च मन्त्रिणाम् ॥ ३३ ॥

' इससे अर्जुनके अनुयायियों तथा रावणके मन्त्रियों का नर्मदा के तटपर बड़ा कोलाहल होने लगा ॥ ३३ ॥

इषुभिस्तोमरैः प्रासैस्त्रिशूलैर्वज्रकर्षणैः ।

सरावणानर्दयन्तः समन्तात् समभिद्रुताः ॥ ३४ ॥

' अर्जुनके योद्धा बाणों, तोमरों, भालों, त्रिशूलों और वज्र-कर्षण नामक शस्त्रों द्वारा चारों ओरसे धावा करके रावण-सहित समस्त राक्षसोंको घायल करने लगे ॥ ३४ ॥

हैहयाधिपयोधानां वेग आसीत् सुदारुणः ।

सनक्रमीनमकर समुद्रस्येव निःखनः ॥ ३५ ॥

' हैहयराजके योद्धाओंका वेग नाकों, मत्स्यों और मगरों-सहित समुद्रकी भीषण गर्जनाके समान अत्यन्त भयंकर जान पड़ता था ॥ ३५ ॥

रावणस्य तु तेऽमात्याः प्रहस्तशुकसारणाः ।

कार्तवीर्यबलं क्रुद्धा निहन्ति स्म स्वतेजसा ॥ ३६ ॥

' रावणके वे मन्त्री प्रहस्त, शक और सारण आदि कुपित हो अपने बल पराक्रमसे कार्तवीर्य अर्जुनकी सेनाका संहार करने लगे || ३६ ||

अर्जुनाय तु तत्कर्म रावणस्य समन्त्रिणः ।

क्रीडमानाय कथितं पुरुषैर्भयविह्वलैः ॥ ३७ ॥

' तब अर्जुन के सेवकोंने भयसे विह्वल होकर क्रीडामें लगे हुए अर्जुनसे मन्त्रीसहित रावणके उस क्रूर कर्मका समाचार सुनाया ॥ ३७ ॥

श्रुत्वा न भेतव्यमिति स्त्रीजनं स तदार्जुनः ।

उत्ततार जलात् तस्माद् गङ्गातोयादिवाञ्जनः ॥ ३८ ॥

' सुनकर अर्जुनने अपनी स्त्रियोंसे कहा-- ' तुम सब लोग डरना मत । ' फिर उन सबके साथ वह नर्मदा के जलसे उसी तरह बाहर निकला, जैसे कोई दिग्गज ( हथिनियों के साथ ) गङ्गाजीके जलसे बाहर निकला हो ॥ ३८ ॥

क्रोधदूषितनेत्रस्तु स दार्जुनपावकः ।

प्रजज्वाल महाघोरो युगान्त इव पावकः ॥ ३ ९ ॥

" उसके नेत्र रोषसे रक्तवर्णके हो गये । वह अर्जुनरूपी अनल प्रलयकालके महाभयंकर पावककी भाँति प्रज्वलित हो उठा ॥ ३ ९ ॥

स तूर्णतरमादाय वरहेमाङ्गदो गदाम् ।

अभिदुद्राव रक्षांसि तमांसीव दिवाकरः ॥ ४० ॥

‘ सुन्दर सोनेका बाजूबंद धारण करनेवाले वीर अर्जुनने तुरंत ही गदा उठा ली और उन राक्षसोंपर आक्रमण किया, मानो सूर्यदेव अन्धकार समूहपर टूट पड़े हों ॥ ४० ॥

बाहुविक्षेपकरणां समुद्यम्य महागदाम् ।

गारुडं वेगमास्थाय आपपातैव सोऽर्जुनः ॥ ४१ ॥

' जो भुजाओं द्वारा घुमायी जाती थी, उस विशाल गदाको ऊपर उठाकर गरुड़ के समान तीव्र वेगका आश्रय ले राजा अर्जुन तत्काल ही उन निशाचरोंपर टूट पड़ा ॥ ४१ ॥

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१५४२ श्रीमवाल्मीकीयरामायणे

तस्य मार्ग समारुद्ध्य विन्ध्योऽर्कस्येव पर्वतः ।

स्थितो विन्ध्य इवाकम्प्यः प्रहस्तो मुसलायुधः ॥ ४२ ॥

' उस समय मूसलधारी प्रहस्त, जो विन्ध्य- गिरिके समान अविचल था, उसका मार्ग रोककर खड़ा हो गया । ठीक उसी तरह, जैसे पूर्वकालमें विन्ध्याचलने सूर्यदेवका मार्ग रोक लिया था ॥ ४२ ॥

ततोऽस्य मुसलं घोरं लोहबद्धं मदोद्धतः ।

प्रहस्तः प्रेषयन् क्रुद्धो ररास च यथान्तकः ॥ ४३ ॥

' मदसे उद्दण्ड हुए प्रहस्तने कुपित हो अर्जुनपर लोहेसे मढ़ा हुआ एक भयंकर मूसल चलाया और कालके समान भीषण गर्जना की ॥ ४३ ॥

मुसलस्याग्निरशोकापीडसंनिभः ।

प्रहस्त करमुक्तस्य बभूव प्रदहन्निव ॥ ४४ ॥

' प्रहतके हाथ से छूटे हुए उस मूसलके अग्रभागमें अशोक - पुष्पके समान लाल रंगकी आग प्रकट हो गयी, जो जलाती हुई - सी जान पड़ती थी ॥ ४४ ॥

आधावमानं मुसलं कार्तवीर्यस्तदार्जुनः ।

निपुणं वञ्चयामास गदया गतविक्लवः ॥ ४५ ॥

" किंतु कार्तवीर्य अर्जुन को इससे तनिक भी भय नहीं हुआ । उसने अपनी ओर वेगपूर्वक आते हुए उस मूसलको गदा मारकर पूर्णतः विफल कर दिया ॥ ४५ ॥

ततस्तमभिदुद्राव सगदो हैहयाधिपः ।

भ्रामयाणो गदां गुर्वी पञ्चबाहुशतोच्छ्रयाम् ॥ ४६ ॥

' तत्पश्चात् गदाधारी हैहयराज, जिसे पाँच सौ भुजाओं-से उठाकर चलाया जाता था, उस भारी गदाको घुमाता हुआ प्रहस्तकी ओर दौड़ा ॥ ४६ ॥

ततो हतोऽतिवेगेन प्रहस्तो गदया तदा ।

निपपात स्थितः शैलो वज्रिवज्रहतो यथा ॥ ४७ ॥

' उस गदासे अत्यन्त वेगपूर्वक आहत होकर प्रहस्त तत्काल पृथ्वीपर गिर पड़ा, मानो कोई पर्वत वज्रधारी इन्द्रके वज्रका आघात पाकर ढह गया हो ॥ ४७ ॥

प्रहस्तं पतितं दृष्ट्वा मारीचशुकसारणाः ।

समहोदरधूम्राक्षा अपसृष्टा रणाजिरात् ॥ ४८ ॥

' प्रहस्त को धराशायी हुआ देख मारीच, शुक, सारण, महोदर और धूम्राक्ष समराङ्गणसे भाग खड़े हुए ॥ ४८ ॥

अपक्रान्तेष्वमात्येषु प्रहस्ते च निपातिते ।

रावणोऽभ्यद्रवत् तूर्णमर्जुनं नृपसत्तमम् ॥ ४ ९ ॥

" प्रहस्त के गिरने और अमात्योंके भाग जानेपर रावणने नृपश्रेष्ठ अर्जुनपर तत्काल धावा किया ॥ ४ ९ ॥

सहस्रवाहोस्तद्युद्धं विंशद्वाहोश्च दारुणम् ।

नृपराक्षसयोस्तत्र आरब्धं रोमहर्षणम् ॥ ५० ॥

" फिर तो हजार भुजाओंवाले नरनाथ और बीस भुजाओं-वाले निशाचरनाथ में वहाँ भयंकर युद्ध आरम्भ हो गया, जो रोंगटे खड़े कर देनेवाला था ॥ ५० ॥

सागराविव संक्षुब्धौ चलमूलाविवाचलौ तेजोयुक्ताविवादित्यौ ' प्रदहन्ताविवानौ बलोद्धतौ यथा नागौ वासितार्थे यथा वृषौ मेघाविव विनदन्तौ सिंहाविव बलोत्कटौ रुद्रकालाविव क्रुद्धौ तौ तदा राक्षसार्जुनौ परस्परं गदां गृह्य ताडयामासतुर्भृशम् ' विक्षुब्ध हुए दो समुद्रों, जिनकी जड़ हिल ऐसे दो पर्वतों, दो तेजस्वी आदित्यों, दो दाहक

॥ ५१ ॥

॥ ५२ ॥

॥ ५३ ॥

रही हों अग्नियों, बलसे उन्मत्त हुए दो गजराजों, काम - वासनावाली गायके लिये लड़नेवाले दो साँड़ों, जोर - जोरसे गर्जनेवाले दो मेघों, उत्कट बलशाली दो सिंहों तथा क्रोधसे भरे हुए रुद्र और कालदेव के समान वे रावण और अर्जुन गदा लेकर एक दूसरेपर गहरी चोटें करने लगे ॥ ५१-५३ ॥

वज्रप्रहारानचला यथा घोरान् विषेहिरे ।

गदाप्रहारांस्तौ तत्र सेहाते नरराक्षसौ ॥ ५४ ॥

" जैसे पूर्वकालमें पर्वतोंने वज्रके भयंकर आघात सहे थे, उसी प्रकार वे अर्जुन और रावण वहाँ गदाओंके प्रहार सहन करते थे ॥ ५४ ॥

यथाशनिरवेभ्यस्तु जायतेऽथ प्रतिश्रुतिः ।

तथा तयोर्गदापोथैर्दिशः सर्वाः प्रतिश्रुताः ॥ ५५ ॥

' जैसे बिजली की कड़क से सम्पूर्ण दिशाएँ प्रतिध्वनित हो उठती हैं, उसी प्रकार उन दोनों वीरोंकी गदाओंके आघातोंसे सभी दिशाएँ गूँजने लगीं ॥ ५५ ॥

अर्जुनस्य गदा सा तु पात्यमानाहितोरसि ।

काञ्चनाभं नभश्चक्रे विद्युत्सौदामनी यथा ॥ ५६ ॥

" जैसे बिजली चमककर आकाशको सुनहरे रंगसे युक्त कर देती है, उसी प्रकार रावणकी छातीपर गिरायी जाती हुई अर्जुनकी गदा उसके वक्षःस्थलको सुवर्णकी - सी प्रभासे पूर्ण

कर देती थी । ५६ ॥

तथैव रावणेनापि पात्यमाना मुहुर्मुहुः ।

अर्जुनोरसि निर्भाति गदोल्केव महागिरौ ॥ ५७ ॥

' उसी प्रकार रावणके द्वारा भी अर्जुनकी छातीपर बारंबार गिरायी जाती हुई गदा किसी महान् पर्वतपर गिरनेवाली उल्का के समान प्रकाशित हो उठती थी ॥ ५७ ॥

नार्जुनः खेदमायाति न राक्षसगणेश्वरः ।

सममासीत् तयोर्युद्धं यथा पूर्व बलीन्द्रयोः ॥ ५८ ॥

' उस समय न तो अर्जुन थकता था और न राक्षसगणोंका राजा रावण ही । पूर्वकालमें परस्पर जूझनेवाले इन्द्र और बलिकी भाँति उन दोनोंका युद्ध एक समान जान पड़ता था ॥

शृङ्गैरिव वृषायुध्यन् दन्ताप्रैरिव कुञ्जरौ ।

परस्परं विनिघ्नन्तौ नरराक्षससत्तमौ ॥ ५ ९ ॥

' जैसे साँड़ अपने सींगोंसे और हाथी अपने दाँतों के अग्रभागसे परस्पर प्रहार करते हैं, उसी प्रकार वे नरेश और

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उत्तरकाण्डे द्वात्रिंशः सर्गः १५४३ निशाचरराज एक दूसरेपर गदाओंसे चोट करते थे ॥ ५ ९ ॥

ततोऽर्जुनेन क्रुद्धेन सर्वप्राणेन सा गदा ।

स्तनयोरन्तरे मुक्ता रावणस्य महोरसि ॥ ६० ॥

' इसी बीचमें अर्जुनने कुपित होकर रावणके विशाल वक्षः-स्थलपर दोनों स्तनोंके बीचमें अपनी पूरी शक्ति से गदाका प्रहार किया ॥ ६० ॥

वरदानकृतत्राणे सा गदा रावणोरसि ।

दुर्बलेव यथावेगं द्विधाभूतापतत् क्षितौ ॥ ६१ ॥

' परंतु रावण तो वरके प्रभावसे सुरक्षित था, अतः रावणकी छातीपर वेगपूर्वक चोट करके भी वह गदा किसी दुर्बल गदाकी भाँति उसके वक्षकी टक्करसे दो टूक होकर पृथ्वीपर गिर पड़ी ॥ ६१ ॥

स त्वर्जुनप्रयुक्तेन गदाघातेन रावणः ।

अपासर्पद् धनुर्मात्रं निषसाद च निष्टनन् ॥ ६२ ॥

' तथापि अर्जुनकी चलायी हुई गदाके आघातसे पीड़ित हो रावण एक धनुष पीछे हट गया और आर्तनाद करता हुआ बैठ गया ॥ ६२ ।

स विह्वलं तदालक्ष्य दशग्रीवं ततोऽर्जुनः ।

सहसोत्पत्य जग्राह गरुत्मानिव पन्नगम् ॥ ६३ ॥

' दशग्रीवको व्याकुल देख अर्जुनने सहसा उछलकर उसे पकड़ लिया, मानो गरुड़ने झपट्टा मारकर किसी सर्पको घर दबाया हो ॥ ६३ ॥

स तु बाहुसहस्रेण बलाद् गृह्य दशाननम् ।

बबन्ध बलवान् राजा बलिं नारायणो यथा ॥ ६४ ॥

' जैसे पूर्वकालमें भगवान् नारायणने बलिको बाँधा था, उसी तरह बलवान् राजा अर्जुनने दशाननको बलपूर्वक पकड़-कर अपने हजार हार्थोके द्वारा उसे मजबूत रस्सोंसे बाँध दिया ॥ ६४ ॥

बध्यमाने दशग्रीवे सिद्धवारणदेवताः ।

साध्वीति वादिनः पुष्पैः किरन्त्यर्जुनमूर्धनि ॥ ६५ ॥

' दशग्रीवके बाँधे जानेपर सिद्ध, चारण और देवता ‘ शाबाश! शाबाश! ' कहते हुए अर्जुनके सिरपर फूलोंकी वर्षा करने लगे ॥ ६५ ॥

व्याघ्रो मृगमिवादाय मृगराडिव कुञ्जरम् ।

ररास हैहयो राजा हर्षादम्बुदवन्मुहुः ॥ ६६ ॥

' जैसे व्याघ्र किसी हिरणको दबोच लेता है अथवा सिंह हाथीको घर दबाता है, उसी प्रकार रावणको अपने वशमें करके हैहयराज अर्जुन हर्षातिरेक से मेघ के समान बारंबार गर्जना करने लगा ॥ ६६ ॥

प्रहस्तस्तु समाश्वस्तो दृष्ट्वा बद्धं दशाननम् ।

सहसा राक्षसः क्रुद्धो ह्यभिदुद्राव हैहयम् ॥ ६७ ॥

' इसके बाद प्रहस्तने होश सँभाला । दशमुख रावणको बघा हुआ देख वह राक्षस सहसा कुपित हो हैहयराजकी ओर दौड़ा ॥ ६७ ॥

नक्तंचराणां वेगस्तु तेषामापततां बभौ ।

उद्भूत आतपापाये पयोदानामिवाम्बुधौ ॥ ६८ ॥

' जैसे वर्षाकाल आनेपर समुद्र में बादलोंका वेग बढ़ जाता है, उसी प्रकार वहाँ आक्रमण करते हुए उन निशाचरोंका वेग बढ़ा हुआ प्रतीत होता था ॥ ६८ ॥

मुञ्चमुञ्चेति भाषन्तस्तिष्ठतिष्ठेति चासकृत् ।

मुसलानि च शूलानि सोत्ससर्ज तदा रणे ॥ ६ ९ ॥

" छोड़ो, छोड़ो, ठहरो, ठहरो ' ऐसा बारंबार कहते हुए राक्षस अर्जुनकी ओर दौड़े । उस समय प्रहस्तने रणभूमिमें अर्जुनपर मूसल और शुलके प्रहार किये ॥ ६ ९ ॥

अप्राप्तान्येव तान्याशु असम्भ्रान्तस्तदार्जुनः ।

आयुधान्यमरारीणां जग्राहारिनिषूदनः ॥ ७० ॥

" परंतु अर्जुनको उस समय घबराहट नहीं हुई । उस शत्रुसूदन वीरने प्रहस्त आदि देवद्रोही निशाचरोंके छोड़े हुए उन अस्त्रोंको अपने शरीरतक आनेसे पहले ही पकड़ लिया ॥

ततस्तैरेव रक्षांसि दुर्धरैः प्रवरायुधैः ।

भित्त्वा विद्रावयामास वायुरम्बुधरानिव ॥ ७१ ॥

" फिर उन्हीं दुर्धर एवं श्रेष्ठ आयुधोंसे उन सब राक्षसोंको घायल करके उसी तरह भगा दिया, जैसे हवा बादलोंको छिन्न - भिन्न करके उड़ा ले जाती है ॥ ७१ ॥

राक्षसांस्त्रासयामास कार्तवीर्यार्जुनस्तदा ।

रावणं गृह्य नगरं प्रविवेश सुहृद्वृतः ॥ ७२ ॥

' उस समय कार्तवीर्य अर्जुनने समस्त राक्षसोंको भयभीत कर दिया और रावणको लेकर वह अपने सुहृदों के साथ नगर में आया ॥ ७२ ॥

स कीर्यमाणः कुसुमाक्षतोत्करै-द्विजैः सपौरैः पुरुहूतसंनिभः । ततोऽर्जुनः स्वां प्रविवेश तां पुरीं बलिं निगृह्येव सहस्रलोचनः ॥ ७३ ॥

' नगर के निकट आनेपर ब्राह्मणों और पुरवासियोंने अपने इन्द्रतुल्य तेजस्वी नरेशपर फूलों और अक्षतोंकी वर्षा की और सहस्र नेत्रधारी इन्द्र जैसे बलिको बंदी बनाकर ले गये थे, उसी प्रकार उस राजा अर्जुनने बँधे हुए रावणको साथ लेकर अपनी पुरीमें प्रवेश किया ॥ ७३ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये उत्तरकाण्डे द्वात्रिंशः सर्गः ॥ ३२ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें बत्तीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ३२ ॥