Ramayana 2 — पृष्ठ 761–770
वाल्मीकि रामायण — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 761–770
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१५४४ श्रीमद्वाल्मीकीय रामायणे त्रयस्त्रिंशः सर्गः पुलस्त्यजीका रावणको अर्जुनकी कैदसे छुटकारा दिलाना
रावणग्रहणं तत् तु वायु ग्रहणसंनिभम् ।
ततः पुलस्त्यः शुश्राव कथितं दिवि दैवतैः ॥ १ ॥
रावणको पकड़ लेना वायुको पकड़नेके समान था । धीरे - धीरे यह बात स्वर्गमें देवताओंके मुखसे पुलस्त्यजीने सुनी ॥ १ ॥
ततः पुत्रकृतस्नेहात् कम्पमानो महाधृतिः ।
माहिष्मतीपतिं द्रष्टुमाजगाम महानृषिः । २ ॥
यद्यपि वे महर्षि महान् धैर्यशाली थे तो भी संतान के प्रति होनेवाले स्नेहके कारण कृपापरवश हो गये और माहिष्मती-नरेश से मिलने के लिये भूतलपर चले आये ॥ २ ॥ *
स वायुमार्गमास्थाय वायुतुल्यगतिर्द्विजः ।
पुरीं माहिष्मती प्राप्तो मनःसम्पातविक्रमः ॥ ३ ॥
उनका वेग वायुके समान था और गति मनके समान, वे ब्रह्मर्षि वायुपथका आश्रय ले माहिष्मतीपुरीमें आ पहुँचे ॥
सोऽमरावतिसंकाशां हृष्टपुष्टजनावृताम् ।
प्रविवेश पुरीं ब्रह्मा इन्द्रस्येवामरावतीम् ॥ ४ ॥
जैसे ब्रह्माजी इन्द्रकी अमरावतीपुरीमें प्रवेश करते हैं, उसी प्रकार पुलस्त्यजीने हृष्ट - पुष्ट मनुष्योंसे भरी हुई और अमरावती के समान शोभासे सम्पन्न माहिष्मती नगरी में प्रवेश किया ॥ ४ ॥
पादचारमिवादित्यं निष्पतन्तं सुदुर्द्दशम् ।
ततस्ते प्रत्यभिज्ञाय अर्जुनाय न्यवेदयन् ॥ ५ ॥
आकाशसे उतरते समय वे पैरोंसे चलकर आते हुए सूर्यके समान जान पड़ते थे । अत्यन्त तेजके कारण उनकी ओर देखना बहुत ही कठिन जान पड़ता था । अर्जुनके सेवकोंने उन्हें पहचानकर राजा अर्जुनको उनके शुभागमनकी सूचना दी ॥ ५ ॥
पुलस्त्य इति विज्ञाय वचनाद्धैहयाधिपः ।
शिरस्यञ्जलिमाधाय प्रत्युद्गच्छत् तपखिनम् ॥ ६ ॥
सेवकोंके कहने से जब हैहयराजको यह पता चला कि पुलस्त्यजी पधारे हैं, तब वे सिरपर अञ्जलि बाँधे उन तपस्वी मुनिकी अगवानी के लिये आगे बढ़ आये ॥ ६ ।
पुरोहितोऽस्य गृह्या मधुपर्क तथैव च ।
पुरस्तात् प्रययौ राज्ञः शक्रस्येव बृहस्पतिः ॥ ७ ॥
राजा अर्जुनके पुरोहित अर्ध्य और मधुपर्क आदि लेकर उनके आगे - आगे चले, मानो इन्द्रके आगे बृहस्पति चल रहे हों ॥ ७ ॥
ततस्तमृषिमायान्तमुद्यन्तमिव भास्करम् ।
अर्जुनो दृश्य सम्भ्रान्तो ववन्देन्द्र इवेश्वरम् ॥ ८ ॥
हाँ आते हुए वे महर्षि उदित होते हुए सूर्य के समान तेजस्वी दिखायी देते थे । उन्हें देखकर राजा अर्जुन चकित रह गया । उसने उन ब्रह्मर्षिके चरणोंमें उसी तरह आदरपूर्वक प्रणाम किया, जैसे इन्द्र ब्रह्माजीके आगे मस्तक झुकाते हैं ।
स तस्य मधुपर्क गां पाद्यमर्घ्य निवेद्य च ।
पुलस्त्यमाह राजेन्द्रो हर्षगद्गदया गिरा ॥ ९ ॥
ब्रह्मर्षिको पाद्य, अर्घ्य, मधुपर्क और गौ समर्पित करके राजाधिराज अर्जुनने हर्षगद्गद वाणीमें पुलस्त्यजीसे कहा - ॥ ९ ॥
अद्यैवममरावत्या तुल्या माहिष्मती कृता ।
अद्याहं तु द्विजेन्द्र त्वां यस्मात् पश्यामि दुर्द्दशम् ॥ १० ॥
' द्विजेन्द्र! आपका दर्शन परम दुर्लभ है, तथापि आज मैं आपके दर्शनका सुख उठा रहा हूँ । इस प्रकार यहाँ पधारकर आपने इस माहिष्मतीपुरीको अमरावतीपुरीके समान गौरव-शालिनी बना दिया ॥ १० ॥
अद्य मे कुशलं देव अद्य मे कुशलं व्रतम् ।
अद्य मे सफलं जन्म अद्य मे सफलं तपः ॥ ११ ॥
यत् ते देवगणैर्वन्द्यौ वन्देऽहं चरणौ तव ।
इदं राज्यमिमे पुत्रा इमे दारा इमे वयम् ।
ब्रह्मन् किं कुर्मः किं कार्यमाज्ञापयतु नो भवान् ॥ १२ ॥
' देव! आज मैं आपके देववन्द्य चरणोंकी वन्दना कर रहा हूँ; अतः आज ही मैं वास्तवमें सकुशल हूँ । आज मेरा व्रत निर्विघ्न पूर्ण हो गया । आज ही मेरा जन्म सफल हुआ और तपस्या भी सार्थक हो गयी । ब्रह्मन्! यह राज्य, ये स्त्री- पुत्र और हम सब लोग आपके ही हैं । आप आशा दीजिये । हम आपकी क्या सेवा करें १ ' ॥ ११-१२ ॥
तं धर्मेऽग्निषु पुत्रेषु शिवं पृष्ट्वा च पार्थिवम् ।
पुलस्त्योवाच राजानं हैहयानां तथार्जुनम् ॥ १३ ॥
तब पुलस्त्यजी हैहयराज अर्जुनके धर्म, अग्नि और पुत्रों-का कुशल- समाचार पूछकर उससे इस प्रकार बोले-- ॥ १३ ॥
नरेन्द्राम्बुजपत्राक्ष पूर्णचन्द्रनिभानन ।
अतुलं ते बलं येन दशग्रीवस्त्वया जितः ॥ १४ ॥
' पूर्ण चन्द्रमाके समान मनोहर मुखवाले कमलनयन नरेश! तुम्हारे बलकी कहीं तुलना नहीं है; क्योंकि तुमने दशग्रीवको जीत लिया ॥ १४ ॥
भयाद् यस्योपतिष्ठेतां निष्पन्दौ सागरानिलौ ।
सोऽयं मृधे त्वया बद्धः पौत्रो मे रणदुर्जयः ॥ १५ ॥
" जिसके भयसे समुद्र और वायु भी चञ्चलता छोड़कर सेवामें उपस्थित होते हैं, उस मेरे रणदुर्जय पौत्रको तुमने संग्राममें बाँध लिया ॥ १५ ॥
पुत्रकस्य यशः पीतं नाम विश्रावितं त्वया । मद्वाक्याद् याच्यमानोऽद्य मुञ्च वत्स दशाननम् । १६ ।
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उत्तरकाण्डे चतुस्त्रिंशः सर्गः १५४५ " ऐसा करके तुम मेरे इस बच्चेका यश पी गये और सर्वत्र अपने नामका ढिंढोरा पीट दिया । वत्स! अब मेरे कहनेसे तुम दशाननको छोड़ दो । यह तुमसे मेरी याचना ' है ' ॥ १६ ॥
पुलस्त्याज्ञां प्रगृह्योचे न किंचन वचोऽर्जुनः ।
मुमोच वै पार्थिवेन्द्रो राक्षसेन्द्रं प्रहृष्टवत् ॥ १७ ॥
पुलस्त्यजीकी इस आज्ञाको शिरोधार्यं करके अर्जुनने इसके विपरीत कोई बात नहीं कही । उस राजाधिराजने बड़ी प्रसन्नता-के साथ राक्षसराज रावणको बन्धन से मुक्त कर दिया ॥ १७ ॥
स तं प्रमुच्य त्रिदशारिमर्जुनः प्रपूज्य दिव्याभरणस्त्रगम्बरैः । अहिंसकं सख्यमुपेत्य साग्निकं प्रणम्य तं ब्रह्मसुतं गृहं ययौ ॥ १८ ॥
उस देवद्रोही राक्षसको बन्धनमुक्त करके अर्जुनने दिव्य आभूषण, माला और वस्त्रोंसे उसका पूजन किया और अग्निको साक्षी बनाकर उसके साथ ऐसी मित्रताका सम्बन्ध स्थापित किया, जिसके द्वारा किसीकी हिंसा न हो ( अर्थात् उन दोनोंने यह प्रतिज्ञा की कि हमलोग अपनी मैत्री का उपयोग दूसरे प्राणियों-की हिंसा में नहीं करेंगे ) । इसके बाद ब्रह्मपुत्र पुलस्त्यजीको प्रणाम करके राजा अर्जुन अपने घर को लौट गया ॥ १८ ॥
पुलस्त्येनापि संत्यतो राक्षसेन्द्रः प्रतापवान् ।
परिष्वक्तः कृतातिथ्यो लज्जमानो विनिर्जितः ॥ १ ९ ॥
इस प्रकार अर्जुनद्वारा आतिथ्य सत्कार करके छोड़े गये प्रतापी राक्षसराज रावणको पुलस्त्यजीने हृदय से लगा लिया, परंतु वह पराजयके कारण लजित ही रहा ॥ १ ९ ॥
पितामहसुतश्चापि पुलस्त्यो मुनिपुङ्गवः ।
मोचयित्वा दशग्रीवं ब्रह्मलोकं जगाम ह ॥ २० ॥
दशग्रीवको छुड़ाकर ब्रह्माजीके पुत्र मुनिवर पुलस्त्यजी पुनः ब्रह्मलोकको चले गये ॥ २० ॥
एवं स रावणः प्राप्तः कीर्तवीर्यात् प्रधर्षणम् ।
पुलस्त्यवचनाच्चापि पुनर्मुक्तो महाबलः ॥ २१ ॥
इस प्रकार रावणको कार्तवीर्य अर्जुनके हाथसे पराजित होना पड़ा था और फिर पुलस्त्यजीके कहने से उस महाबली राक्षसको छुटकारा मिला था ॥ २१ ॥
एवं बलिभ्यो बलिनः सन्ति राघवनन्दन ।
नावज्ञा हि परे कार्या य इच्छेच्छ्रेय आत्मनः ॥ २२ ॥
रघुकुलनन्दन! इस प्रकार संसारमें बलवान् से बलवान् वीर पड़े हुए हैं; अतः जो अपना कल्याण चाहे उसे दूसरे की अवहेलना नहीं करनी चाहिये ॥ २२ ॥
ततः स राजा पिशिताशनानां सहस्रवाहोरुपलभ्य मैत्रीम् । पुनर्नृपाणां कदनं चकार चकार सर्वा पृथिवीं च दर्पात् ॥ २३ ॥
सहस्रबाहुकी मैत्री पाकर राक्षसोंका राजा रावण पुनः घमंडसे भरकर सारी पृथ्वीपर विचरने और नरेशोंका संहार करने लगा ॥ २३ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये उत्तरकाण्डे त्रयस्त्रिंशः सर्गः ॥ ३३ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्ड में तैंतीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ३३ ॥
चतुस्त्रिंशः सर्गः वाली के द्वारा रावणका पराभव तथा रावणका उन्हें अपना मित्र बनाना
अर्जुनेन विमुक्तस्तु रावणो राक्षसाधिपः ।
चचार पृथिवीं सर्वामनिर्विण्णस्तथा कृतः ॥ १ ॥
अर्जुनसे छुटकारा पाकर राक्षसराज रावण निर्वेदरहित हो पुनः सारी पृथ्वीपर विचरण करने लगा ॥ १ ॥
राक्षसं वा मनुष्यं वा शृणुते यं बलाधिकम् ।
रावणस्तं समासाद्य युद्धे ह्वयति दर्पितः ॥ २ ॥
राक्षस हो या मनुष्य, जिसको भी वह बलमें बढ़ा - चढ़ा सुनता था, उसीके पास पहुँचकर अभिमानी रावण उसे युद्धके लिये ललकारता था ॥ २ ॥
ततः कदाचित् किष्किन्धां नगरीं वालिपालिताम् ।
गत्वाऽऽह्वयति युद्धाय वालिनं हेममालिनम् ॥ ३ ॥
तदनन्तर एक दिन वह वाली द्वारा पालित किष्किन्धापुरी-में जाकर सुवर्णमालाधारी वालीको युद्धके लिये ललकारने लगा ॥ ३ ॥
ततस्तु वानरामात्यास्तारस्तारापिता प्रभुः ।
उवाच वानरो वाक्यं युद्धप्रेप्सुमुपागतम् ॥ ४ ॥
उस समय युद्धकी इच्छासे आये हुए रावणसे वालीके मन्त्री तार, ताराके पिता सुषेण तथा युवराज अङ्गद एवं सुग्रीव ने कहा – ॥ ४ ॥।
राक्षसेन्द्र गतो वाली यस्ते प्रतिबलो भवेत् ।
कोऽन्यः प्रमुखतः स्थातुं तव शक्तः प्लवङ्गमः ॥ ५ ॥
' राक्षसराज! इस समय वाली तो बाहर गये हुए हैं । वे ही आपकी जोड़के हो सकते हैं । दूसरा कौन वानर आपके सामने ठहर सकता है ॥ ५ ॥
चतुर्भ्योऽपि समुद्रेभ्यः संध्यामन्वास्य रावण ।
इदं मुहूर्तमायाति वाली तिष्ठ मुहूर्तकम् ॥ ६ ॥
' रावण! चारों समुद्रोंसे संन्ध्योपासन करके वाली अब
आते ही होंगे । आप दो घड़ी ठहर जाइये ॥ ६ ॥
वा ० रा ०. ५.११ १४-
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१५४६ श्रीमवाल्मीकीय रामायणे एतानस्थिचयान् पश्य य एते शङ्खपाण्डुराः । न चिन्तयति तं वाली रावणं पापनिश्चयम् ॥ १५ ॥
युद्धार्थिनामिमे राजन् वानराधिपतेजसा ॥ ७ ॥
' राजन्! देखिये, ये जो शङ्खके समान उज्ज्वल हड्डियों के ढेर लग रहे हैं, ये वाली के साथ युद्धकी इच्छासे आये हुए आप जैसे वीरोंके ही हैं । वानरराज वालीके तेजसे ही इन सबका अन्त हुआ है ॥ ७ ॥
यद्वामृतरसः पीतस्त्वया रावण राक्षस ।
तदा वालिनमासाद्य तदन्तं तव जीवितम् ॥ ८ ॥
राक्षस रावण! यदि आपने अमृतका रस पी लिया हो तो भी जब आप वालीसे टक्कर लेंगे, तब वही आपके जीवन-का अन्तिम क्षण होगा || ८!!
पश्येदानीं जगच्चित्रमिमं विश्रवसः सुत ।
इदं मुहूर्त तिष्ठख दुर्लभं ते भविष्यति ॥ ९ ॥
• विश्रवाकुमार! बाली सम्पूर्ण आश्चर्यके भण्डार हैं । आप इस समय इनका दर्शन करेंगे । केवल इसी मुहूर्ततक उनकी प्रतिक्षा के लिये ठहरिये; फिर तो आपके लिये जीवन दुर्लभ हो जायगा ॥ ९ ॥
अथवा त्वरसे मर्तु गच्छ दक्षिणसागरम् ।
वालिनं द्रक्ष्यसे तत्र भूमिष्टमिव पावकम् ॥ १० ॥
" अथवा यदि आपको मरनेके लिये बहुत जल्दी लगी हो तो दक्षिण समुद्र के तटपर चले जाइये । वहाँ आपको पृथ्वीपर स्थित हुए अग्निदेव के समान वालीका दर्शन होगा ' ॥ १० ॥
स तु तारं विनिर्भर्त्स्य रावणो लोकरावणः ।
पुष्पकं तत् समारुह्य प्रययौ दक्षिणार्णवम् ॥ ११ ॥
तब लोकोंको रुलाने वाले रावणने तारको भला - बुरा कहकर पुष्पक विमानपर आरूढ़ हो दक्षिण समुद्रकी ओर प्रस्थान किया ॥ ११ ॥
तत्र हेमगिरिप्रख्यं तरुणार्क निभाननम् ।
रावणो वालिनं दृष्ट्रा संध्योपासनतत्परम् ॥ १२ ॥
वहाँ रावणने सुवर्णगिरिके समान ऊँचे वालीको संध्यो-जैसे सिंह खरगोशको और गरुड़ सर्पको देखकर भी उसकी परवा नहीं करता, उसी प्रकार वालीने पापपूर्ण विचार रखनेवाले रावणको देखकर भी चिन्ता नहीं की ॥ १५ ॥
जिघृक्षमाणमायान्तं रावणं पापचेतसम् । careof म्बनं कृत्वा गमिष्ये त्रीन् महार्णवान् ॥ १६ ॥
उन्होंने यह निश्चय कर लिया था कि जब पापात्मा रावण मुझे पकड़ने की इच्छा से निकट आयेगा, तब मैं इसे काँख में दबाकर लटका लूँगा और इसे लिये दिये शेष तीन महासागरों-पर भी हो आऊँगा ॥ १६ ।
द्रक्ष्यन्त्यरिं ममाङ्कस्थं स्रंसदूरुकराम्बरम् ।
लम्बमानं दशग्रीवं गरुडस्येव पन्नगम् ॥ १७ ॥
इसकी जाँघ, हाथ - पैर और वम्ब खिसकते होंगे । यह मेरी काँखमें दबा होगा और उस दशामें लोग मेरे शत्रुको गरुड़ के पंजे में दबे हुए सर्प के समान लटकते देखेंगे ॥ १७ ॥
इत्येवं मतिमास्थाय वाली मौनमुपास्थितः ।
वे नैगमान् मन्त्रांस्तस्थौ पर्वतरा ( डिव ॥ १८ ॥
जपन् ऐसा निश्चय करके वाली मौन ही रहे और वैदिक मन्त्रोंका जप करते हुए गिरिराज सुमेरु की भाँति खड़े रहे ॥ १८ ॥
तावन्योन्यं जिघृक्षन्तौ हरिराक्षसपार्थिवौ ।
प्रयत्नवन्तौ तत् कर्म ईहतुर्बलदर्पितौ ॥ १ ९ ॥
इस प्रकार बलके अभिमानसे भरे हुए वे वानरराज और राक्षसराज दोनों एक दूसरे को पकड़ना चाहते थे । दोनों ही इसके लिये प्रयत्नशील थे और दोनों ही वह काम बनानेकी घातमें लगे थे ॥ १ ९ ॥
हस्तग्राहं तु तं मत्वा पादशब्देन रावणम् ।
पराङ्मुखोऽपि जग्राह वाली सर्पमिवाण्डजः ॥ २० ॥
रावणके पैरोंकी हल्की - सी आइटसे वाली यह समझ गये कि अब रावण हाथ बढ़ाकर मुझे पकड़ना चाहता है । फिर तो दूसरी ओर मुँह किये होनेपर भी वालीने उसे उसी तरह सहसा पकड़ लिया, जैसे गरुड़ सर्पको दबोच लेता है ॥२० ॥
पाहन करते हुए देखा । उनका मुख प्रभातकालके सूर्यकी हरिः । भाँति अरुण प्रभासे उद्भासित हो रहा था ॥ १२ ॥ ग्रहीतुकामं तं गृह्य रक्षसामीश्वरं ॥ २१ ॥
रावणोऽञ्जन संनिभः । खमुत्पपात वेगेन कृत्वा कक्षावलम्बिनम् पुष्पकादवरुह्याथ ॥ १३ ॥ पकड़ने की इच्छा वाले उस राक्षसराजको वालीने स्वयं ही
ग्रहीतुं वालिनं तूर्ण निःशब्दपदमव्रजत् पकड़कर अपनी काँखमें लटका लिया और बड़े वेग वे उन्हें देखकर काजलके समान काला रावण पुष्पकसे पकड़नेके लिये जल्दी - जल्दी उनकी आकाश में उछले ॥ २१ ॥
उतर पड़ा और वालीको नहीं तं च पीड्यमानं तु वितुदन्तं नखैर्मुहुः ।
ओर बढ़ने लगा । उस समय वह अपने पैरोंकी आहट जहार रावणं वाली पवनस्तोयदं यथा ॥ २२ ॥
होने देता था ॥ १३ ॥ रावण अपने नखोंसे बारंबार वालीको बकोटता और
यदृच्छया तदा दृष्टो वालिनापि स रावणः । पीड़ा देता रहा, तो भी जैसे वायु बादलोंको उड़ा ले जाती पापाभिप्रायकं दृष्ट्रा चकार न तु सम्भ्रमम् ॥ १४ ॥ दबाये लिये फिरते
दैवयोगसे वालीने भी रावणको देख लिया; किंतु वे है, उसी प्रकार वाली रावणको बगलमें उसके पापपूर्ण अभिप्रायको जानकर भी घबराये नहीं ॥१४ ॥ थे ॥ २२ ॥ ।
सिंहो वा पद्मगं गरुडो यथा । अथ ते राक्षसामात्या हियमाणे दशानने शशमालक्ष्य
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उत्तरकाण्डे चतुस्त्रिंशः सर्गः १५४७ मुमोक्षयिष वालिं रचमाणा अभिद्रुताः ॥ ५३ ॥ उत्तरसागर के तटपर संध्योपासना
इस प्रकार रावणके हर लिये जानेपर उसके मन्त्री उसे करके दशाननका वालीसे छुड़ाने के लिये कोलाहल करते हुए उनके पीछे भार वहन करते हुए वाली पूर्व दिशावतीं महासागरके दौड़ते रहे ॥ २३ - पीछे किनारे गये ॥ ३१ ॥
॥ तत्रापि संध्यामन्त्रस्य अन्वीयमानस्तैर्वाली भ्राजतेऽम्बरमध्यगः । किष्किन्धामभितो वासवःस हरीश्वरः । अन्वीयमानो मेघौघैरम्वरस्थ इवांशुमान् ॥ २४ ॥ वहाँ भी संध्योपासना गृह्य रावणं पुनरागमत् ॥ ३२ ॥
पीछे - पीछे राक्षस चलते थे और आगे - आगे वाली । इस सम्पन्न करके वे इन्द्रपुत्र वानरराज अवस्था में वे आकाशके मध्यभागमें पहुँचकर वाली दशमुख रावणको बगल में दबाये फिर किष्किन्धापुरी के अनुगत हुए आकाशवर्ती मे समूहों से निकट आये ॥ ३२ ॥
पाते थे ॥ २४ ॥ अंशुमाली सूर्यके समान शोभा चतुर्ष्वपि समुद्रेषु संध्यामन्यास्य वानरः
रावणोद्वहनश्रान्तः ।
तेऽशक्नुवन्तः सम्प्राप्तुं वालिनं राक्षसोत्तमाः । किष्किन्धोपवनेऽपतत् ॥ ३३ ॥
तस्य बाहूरुवेगेन परिश्रान्ता व्यवस्थिताः ॥ २५ ॥ इस तरह चारों समुद्रोंमें संध्योपासनाका कार्य पूरा करके
वे श्रेष्ठ राक्षस बहुत प्रयत्न करनेपर भी वालीके पासतक उपवन रावणको ढोने के कारण थके हुए वानरराज वाली किष्किन्धा के न पहुँच सके । उनकी भुजाओं और जाँघोंके वेगसे में आ पहुँचे ॥ ३३ ॥
हुई वायुके थपेड़ों से थककर वे खड़े हो गये || २५ ॥ उत्पन्न रावणं तु मुमोचाथ स्वकक्षात् कपिसत्तमः ।
वालिमार्गादपाक्रामन् पर्वतेन्द्रापि गच्छतः ।
किं पुनर्जीवनप्रेप्सुर्विद् वै मांसशोणितम् ॥ २६ ॥
वालीके मार्गंसे उड़ते हुए बड़े - बड़े पर्वत भी हट जाते थे; फिर रक्त - मांसमय शरीर धारण करनेवाला और रक्षा चाहनेवाला प्राणी उनके मार्गसे हट जाय, इसके जीवनकी लिये तो कहना ही क्या है ॥ २६ ॥
अपक्षिगणसम्पातान् वानरेन्द्रो महाजवः ।
क्रमशः सागरान् सर्वान् संध्याकालमवन्दत ॥ २७ ॥
जितनी देरमें वाली समुद्रोंतक पहुँचते थे, उतनी देरमें तीव्रगामी पक्षियोंके समूह भी नहीं पहुँच पाते थे । उन महा-वेगशाली वानरराजने क्रमशः सभी समुद्रोंके तटपर पहुँचकर संध्या- वन्दन किया ॥ २७ ॥
सम्पूज्यमानो यातस्तु खचरैः खचरोत्तमः ।
पश्चिमं सागरं वाली आजगाम सरावणः ॥ २८ ॥
समुद्रोंकी यात्रा करते हुए आकाशचारियों में श्रेष्ठ वाली-की सभी खेचर प्राणी पूजा एवं प्रशंसा करते थे । वे रावणको बगलमें दबाये हुए पश्चिम समुद्र के तटपर आये ॥ २८ ॥
तस्मिन् संध्यामुपासित्वा स्नात्वा जप्त्वा च वानरः ।
उत्तरं सागरं प्रायाद् वहमानो दशाननम् ॥ २ ९ ॥
वहाँ स्नान, संध्योपासन और जप करके वे वानरवीर दशाननको लिये दिये उत्तर समुद्र के तटपर जा पहुँचे ॥२ ९ ॥
बहुयोजनसाहस्रं वहमानो महाहरिः ।
वायुवच्च मनोवच्च जगाम सह शत्रुणा ॥ ३० ॥
वायु और मनके समान वेगवाले वे महावानर वाली कई सहस्त्र योजनतक रावणको ढोते रहे । फिर अपने उस शत्रुके साथ ही वे उत्तर समुद्र के किनारे गये ॥ ३० ॥
उत्तरे सागरे संध्यामुपासित्वा दशाननम् वहमानोऽगमद् वाली पूर्व वै स महोदधिम् ॥ । ३१ ॥ कुतस्त्वमिति चोवाच प्रहसन् रावणं मुहुः ॥ ३४ ॥
वहाँ आकर उन कपिश्रेष्ठने रावणको अपनी काँखसे छोड़ दिया और बारंबार हँसते हुए पूछा ' कहो जी, तुम कहाँसे आये हो ' ॥ ३४ ॥
विस्मयं तु महद् गत्वा श्रमलोलनिरीक्षणः
राक्षसेन्द्रो हरीन्द्रं तमिदं वचनमब्रवीत् ।
रावणकी आँखें ॥ ३५ ॥
वालीके श्रमके कारण चञ्चल रही थीं । इस अद्भुत पराक्रमको देखकर उसे महान् आश्चर्य हुआ और उस राक्षसराजने उन वानरराजसे इस प्रकार वानरेन्द्र महेन्द्राभ राक्षसेन्द्रोऽस्मि कहा- ॥ रावणः । युद्धेप्सुरिह सम्प्राप्तः स चाद्यासादितस्त्वया ' महेन्द्र के समान पराक्रमी ॥ ३६ ॥
हूँ और युद्ध करनेकी वानरेन्द्र! मैं राक्षसेन्द्र रावण तो आपसे इच्छासे यहाँ आया था, सो वह युद्ध मिल ही गया ॥ ३६ ॥
अहो बलमहो वीर्यमहो गाम्भीर्यमेव येनाहं पशुवद् गृह्य च । ' अहो! आपमें अद्भुत भ्रामितश्चतुरोऽर्णवान् ॥ ३७ ॥
आश्चर्यजनक बल है, अद्भुत पराक्रम है और गम्भीरता है । आपने मुझे पशुकी तरह पकड़-कर चारों समुद्रोंपर घुमाया है ॥ ३७ ॥
एवमश्रान्तवद् वीर शीघ्रमेव च वानर ।
मां चैवोद्वहमानस्तु कोऽन्यो वीरो भविष्यति ॥ ३८ ॥
' वानरवीर! तुम्हारे सिवा दूसरा कौन ऐसा शूरवीर होगा, जो मुझे इस प्रकार बिना थके - माँदे शीघ्रतापूर्वक ढो सके || ३८ ॥ त्रयाणामेव भूतानां गतिरेषा
मनोऽनिलसुपर्णानां पुवङ्गम ।
तव चात्र न संशयः ॥ ३ ९ ॥
" वानरराज! ऐसी गति तो मन, वायु और गरुड़ – इन तीन भूतोंकी ही सुनी गयी है । निःसंदेह इस जगत् में चौथे आप भी ऐसे तीव्र वेगवाले हैं ॥ ३ ९ ॥
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१५४८ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे सोऽहं दृष्टवलस्तुभ्यमिच्छामि हरिपुङ्गव त्वया सह चिरं सख्यं सुस्निग्धं पावकाग्रतः ॥ ४० ॥
‘ कपिश्रेष्ठ! मैंने आपका बल देख लिया । अब मैं अग्निको साक्षी बनाकर आपके साथ सदाके लिये स्नेहपूर्ण मित्रता कर लेना चाहता हूँ ॥ ४० ॥
दाराः पुत्राः पुरं राष्ट्रं भोगाच्छादन भोजनम् ।
सर्वमेवाविभक्तं नौ भविष्यति हरीश्वर ॥ ४१ ॥
‘ वानरराज! स्त्री, पुत्र, नगर, राज्य, भोग, वस्त्र और भोजन -- इन सभी वस्तुओंपर हम दोनोंका साझेका अधिकार होगा ' ॥ ४१ ॥
ततः प्रज्वलयित्वाग्निं तावुभौ हरिराक्षसौ ।
भ्रातृत्वमुपसम्पन्नौ परिष्वज्य परस्परम् ॥ ४२ ॥
तब वानरराज और राक्षसराज दोनोंने अग्नि प्रज्वलित करके एक दूसरेको हृदयसे लगाकर आपसमें भाईचारेका सम्बन्ध जोड़ा ॥ ४२ ॥
अन्योन्यं लम्बितकरौ ततस्तौ हरिराक्षसौ ।
किष्किन्धां विशतुर्हौ सिंहौ गिरिगुहामिव ॥ ४३ ॥
फिर वे दोनों वानर और राक्षस एक दूसरेका हाथ पकड़े बड़ी प्रसन्नता के साथ किष्किन्धापुरीके भीतर गये, मानो दो सिंह किसी गुफा में प्रवेश कर रहे हों ॥ ४३ ॥
स तत्र मासमुषितः सुग्रीव इव रावणः ।
अमात्यैरागतैर्नीत स्त्रैलोक्योत्सादनार्थिभिः ॥ ४४ ॥
रावण वहाँ सुग्रीव की तरह सम्मानित हो महीनेभर रहा । फिर तीनों लोकोंको उखाड़ फेंकनेकी इच्छा रखनेवाले उसके मन्त्री आकर उसे लिवा एवमेतत् पुरा वृत्तं धर्षितश्च वृतश्चापि प्रभो! इस प्रकार वालीने रावणको हराया भाई बना लिया ॥ ४५ बलमप्रतिमं राम ले गये ॥ ४४ ॥
वालिना रावणः प्रभो ।
भ्राता पावकसंनिधौ ॥ ४५ ॥
यह घटना पहले घटित हो चुकी है । और फिर अग्नि के समीप उसे अपना ॥
वालिनोऽभवदुत्तमम् ।
सोऽपि त्वया विनिर्दग्धः शलभो वह्निना यथा ॥ ४६ ॥
श्रीराम! वाली में बहुत अधिक और अनुपम बल था, परंतु आपने उसको भी अपनी बाणाग्निसे उसी तरह दग्ध कर डाला, जैसे आग पतिंगे को जला देती है ॥ ४६ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये उत्तरकाण्डे चतुखिंशः सर्गः ॥ ३४ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें चौंतीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ३४ ॥
पञ्चत्रिंशः सर्गः हनुमानजी की उत्पत्ति, शैशवावस्था में इनका सूर्य, राहु और ऐरावतपर आक्रमण, इन्द्र के वज्रसे इनकी मूर्छा, वायुके कोपसे संसार के प्राणियोंको कष्ट और उन्हें प्रसन्न करने के लिये देवताओं सहित ब्रह्माजीका उनके पास जाना
अपृच्छत तदा रामो दक्षिणाशाश्रयं मुनिम् ।
प्राञ्जलिर्विनयोपेत इदमाह वचोऽर्थवत् ॥ १ ॥
तब भगवान् श्रीरामने हाथ जोड़कर दक्षिण दिशा में निवास करनेवाले अगस्त्य मुनिसे विनयपूर्वक यह अर्थयुक्त बात कही - ॥ १ ॥
अतुलं बलमेतद् वै वालिनो रावणस्य च ।
न त्वेताभ्यां हनुमता समं त्विति मतिर्मम ॥ २ ॥
‘ महर्षे! इसमें संदेह नहीं कि वाली और रावणके इस बलकी कहीं तुलना नहीं थी; परंतु मेरा ऐसा विचार है कि इन दोनोंका बल भी हनुमान्जीके बलकी बराबरी नहीं कर सकता था ॥ २ ॥
शौर्य दाक्ष्यं बलं धैर्य प्राज्ञता नयसाधनम् ।
विक्रमश्च प्रभावश्च हनूमति कृतालयाः ॥ ३ ॥
' शूरता, दक्षता, बल, धैर्य, बुद्धिमत्ता, नीति, पराक्रम और प्रभाव -- इन सभी सद्गुणोंने हनुमान्जीके भीतर घर कर रक्खा है ॥ ३ ॥
दैव सागरं वीक्ष्य सीदन्तीं कपिवाहिनीम् ।
समाश्वास्य महाबाहुर्योजनानां शतं प्लुतः ॥ ४ ॥
' समुद्रको देखते ही वानर सेना घबरा उठी है -- यह देख ये महाबाहु वीर उसे धैर्य बँधाकर एक ही छलाँगमें. सौ योजन समुद्रको लाँघ गये ॥ ४ ॥
धर्षयित्वा पुरीं लङ्कां रावणान्तःपुरं तदा ।
दृष्टा सम्भाषिता चापि सीता ह्याश्वासिता तथा ॥ ५ ॥
' ' फिर लङ्कापुरीके आधिदैविक रूपको परास्त कर रावण के अन्तःपुरमें गये, सीताजीसे मिले, उनसे बातचीत की और उन्हें धैर्य बँधाया ॥ ५ ॥
सेनाग्रमा मन्त्रिसुताः किंकरा रावणात्मजः ।
एते हनुमता तत्र एकेन विनिपातिताः ॥ ६ ॥
" वहाँ अशोकवनमें इन्होंने अकेले ही रावण के सेना-पतियों, मन्त्रिकुमारों, किंकरों तथा रावणपुत्र अक्षको मार गिराया ॥ ६ ॥
भूयो बन्धाद् विमुक्तेन भाषयित्वा दशाननम् लङ्का भस्मीकृता येन पावकेनेव मेदिनी ॥ ७ ॥
‘ फिर ये मेघनाद के नागपाशसे बँधे और स्वयं ही मुक्त हो गये । तत्पश्चात् इन्होंने रावणसे वार्तालाप किया । जैसे प्रलय-
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उत्तरकाण्डे पञ्चत्रिंशः सर्गः १५४ ९ कालकी आगने यह सारी पृथ्वी जलायी थी, उसी प्रकार लङ्कापुरीको जलाकर भस्म कर दिया ॥ ७ ॥
न कालस्य न शक्रस्य न विष्णोर्वित्तपस्य च ।
कर्माणि तानि श्रूयन्ते यानि युद्धे हनूमतः ॥ ८ ॥
" युद्ध में हनुमानजी के जो पराक्रम देखे गये हैं, वैसे वीरतापूर्ण कर्म न तो कालके, न इन्द्रके, न भगवान् विष्णुके और न वरुणके ही सुने जाते हैं ॥ ८ ॥
एतस्य बाहुवीर्येण लङ्का सीता च लक्ष्मणः ।
प्राप्ता मया जयश्चैव राज्यं मित्राणि बान्धवाः ॥ ९ ॥
' मुनीश्वर! मैंने तो इन्हींके बाहु - बलसे विभीषण के लिये लङ्का, शत्रुओं पर विजय, अयोध्याका राज्य तथा सीता, लक्ष्मण, मित्र और बन्धुजनों को प्राप्त किया है ॥ ९ ॥
हनूमान् यदि मे न स्याद् वानराधिपतेः सखा ।
प्रवृत्तिमपि को वेत्तुं जानक्याः शक्तिमान् भवेत् ॥ १० ॥
" यदि मुझे वानरराज सुग्रीव के सखा हनुमान् न मिलते तो जानकीका पता लगाने में भी कौन समर्थ हो सकता था १ ॥
किमर्थं वाली चैतेन सुग्रीवप्रियकाम्यया ।
तदा वैरे समुत्पन्ने न दग्धो वीरुधो यथा ॥ ११ ॥
' जिस समय वाली और सुग्रीवमें विरोध हुआ, उस समय सुग्रीवका प्रिय करने के लिये इन्होंने जैसे दावानल वृक्षको जला देता है, उसी प्रकार वालीको क्यों नहीं भस्म कर डाला? यह समझमें नहीं आता ॥ ११ ॥
हि वेदितवान् मन्ये हनूमानात्मनो बलम् ।
यद् दृष्टवाञ्जीवितेष्टं क्लिश्यन्तं वानराधिपम् ॥१२ ॥
" मैं तो ऐसा मानता हूँ कि उस समय हनुमान्जीको अपने बलका पता ही नहीं था । इसीसे ये अपने प्राणोंसे भी प्रिय वानरराज सुग्रीवको कष्ट उठाते देखते रहे ॥ १२ ॥
एतन्मे भगवन् सर्व हनूमति महामुने ।
विस्तरेण यथातत्त्वं कथयामरपूजित ॥ १३ ॥
' देववन्द्य महामुने! भगवन्! आप हनुमानजी के विषय-में ये सब बातें यथार्थरूपसे विस्तारपूर्वक बताइये ' ॥ १३ ॥
राघवस्य वचः श्रुत्वा हेतुयुक्तमृषिस्ततः ।
हनूमतः समक्षं तमिदं वचनमब्रवीत् ॥ १४ ॥
श्रीरामचन्द्रजी के ये युक्तियुक्त वचन सुनकर महर्षि अगस्त्यजी हनुमान्जीके सामने ही उनसे इस प्रकार बोले – ॥
सत्यमेतद् रघुश्रेष्ठ यद् ब्रवीषि हनूमति ।
न बले विद्यते तुल्यो न गतौ न मतौ परः ॥ १५ ॥
' रघुकुलतिलक श्रीराम! हनुमान्जीके विषयमें आप जो कुछ कहते हैं, यह सब सत्य ही है । बल, बुद्धि और गति में इनकी बराबरी करनेवाला दूसरा कोई नहीं है ॥ १५ ॥
अमोघशापैः शापस्तु दत्तोऽस्य मुनिभिः पुरा ।
न वेत्ता हि बलं सर्व बली सन्नरिमर्दन ॥ १६ ॥
" शत्रुसूदन रघुनन्दन! जिनका शाप कभी व्यर्थ नहीं जाता, ऐसे मुनियोंने पूर्वकाल में इन्हें यह शाप दे दिया था कि बल रहने पर भी इनको अपने पूरे बलका पता नहीं रहेगा ॥
बाल्येऽप्येतेन यत् कर्म कृतं राम महाबल ।
तन्न वर्णयितुं शक्यमिति बाल्यतयास्यते ॥ १७ ॥
' महावली श्रीराम! इन्होंने बचपन में भी जो महान् कर्म किया था, उसका वर्णन नहीं किया जा सकता । उन दिनों ये बालभावसे — अनजानकी तरह रहते थे ॥ १७ ॥
यदि वास्ति त्वभिप्रायः संश्रोतुं तव राघव ।
समाधाय मतिं राम निशामय वदाम्यहम् ॥ १८ ॥
" रघुनन्दन! यदि हनुमान्जीका चरित्र सुनने के लिये
आपकी हार्दिक इच्छा हो तो चित्तको एकाग्र करके सुनिये ।
मैं सारी बातें बता रहा हूँ ॥ १८ ॥
सूर्यदत्तवरवर्णः पर्वतः ।
यत्र राज्यं प्रशास्त्यस्य केसरी नाम वै पिता ॥ १ ९ ॥
' भगवान् सूर्यके वरदानसे जिसका स्वरूप सुवर्णमय हो गया है, ऐसा एक सुमेरु नामसे प्रसिद्ध पर्वत है, जहाँ हनुमानजी के पिता केसरी राज्य करते हैं ॥ १ ९ ॥
तस्य भार्या बभूवेष्टा अञ्जनेति परिश्रुता ।
जनयामास तस्यां वै वायुरात्मजमुत्तमम् ॥ २० ॥
' उनकी अञ्जना नामसे विख्यात प्रियतमा पत्नी थी ।
उसके गर्भसे वायुदेवने एक उत्तम पुत्रको जन्म दिया ॥ २० ॥
शालिशूकनिभाभासं प्रासूतेमं तदाञ्जना ।
फलान्याहर्तुकामा वै निष्क्रान्ता गहने वरा ॥ २१ ॥
' अञ्जनाने जब इनको जन्म दिया, उस समय इनकी अङ्ग-कान्ति जाड़े में पैदा होनेवाले धान के अग्रभागकी भाँति पं वर्णकी थी । एक दिन माता अञ्जना फल लानेके लिये आश्रमसे निकली और गहन वनमें चली गयी ॥ २१ ॥
एष मातुर्वियोगाच्च क्षुधया च भृशार्दितः ।
रुरोद शिशुरत्यर्थं शिशुः शरवणे यथा ॥ २२ ॥
' उस समय मातासे बिछुड़ जाने और भूखसे अत्यन्त पीड़ित होने के कारण शिशु हनुमान् उसी तरह जोर - जोर से रोने लगे, जैसे पूर्वकालमें सरकंडोंके वनके भीतर कुमार कार्तिकेय रोये थे ॥ २२ ॥
तदोद्यन्तं विवस्वन्तं जपापुष्पोत्करोपमम् ।
ददर्श फललोभाच्च ह्युत्पपात रविं प्रति ॥ २३ ॥
" इतनेही में इन्हें जपाकुसुमके समान लाल रंगवाले सूर्यदेव उदित होते दिखायी दिये । हनुमानजीने उन्हें कोई फल समझा और ये उस फलके लोभसे सूर्य की ओर उछले ॥२३ ॥
बालार्काभिमुखो बालो बालार्क इव मूर्तिमान् ।
ग्रहीतुकामो बालार्क प्लवतेऽम्बरमध्यगः ॥ २४ ॥
" बालसूर्यकी ओर मुँह किये मूर्तिमान् बालसूर्यके समान बालक हनुमान् बालसूर्यको पकड़ने की इच्छासे आकाशमें उड़ते चले जा रहे थे ॥ २४ ॥
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श्रीमद्वाल्मीकीय रामायणे १५५०
एतस्मिन् प्रवमाने तु शिशुभावे हनूमति ।
देवदानवयक्षाणां विस्मयः सुमहानभूत् ॥ २५ ॥
' शैशवावस्था में हनुमान् जी जब इस तरह उड़ रहे थे, उस समय उन्हें देखकर देवताओं, दानवों तथा यक्षको बड़ा विस्मय हुआ || २५ ॥
नाप्येवं वेगान् वायुर्गरुडो न मनस्तथा ।
यथायं वायुपुत्रस्तु क्रमतेऽम्बरमुत्तमम् ॥ २६ ॥
‘ वे सोचने लगे — ‘ यह वायुका पुत्र जिस प्रकार ऊँचे आकाशमें वेगपूर्वक उड़ रहा है, ऐसा वेग न तो वायुमें है, न गरुड़ में है और न मनमें ही है ॥ २६ ॥
यदि तावच्छिशोरस्य ईदृशो गतिविक्रमः ।
यौवनं बलमासाद्य कथं वेगो भविष्यति ॥ २७ ॥
“ यदि बाल्यावस्थामें ही इस शिशुका ऐसा वेग और पराक्रम है तो यौवनका बल पाकर इसका वेग कैसा होगा ' ।
तमनुप्लवते वायुः लवन्तं पुत्रमात्मनः ।
सूर्यदाहभयाद् रक्षंस्तुषारचयशीतलः ॥२८ ॥
" अपने पुत्र को सूर्य की ओर जाते देख उसे दाहके भयसे बचानेके लिये उस समय वायुदेव भी बर्फके ढेरकी भाँति शीतल होकर उसके पीछे - पीछे चलने लगे ॥ २८ ॥
बहुयोजन साहस्रं क्रामन्नेव गतोऽम्बरम् ।
पितुर्बलाच्च वाल्याच्च भास्कराभ्याशमागतः ॥ २ ९ ॥
‘ इस प्रकार बालक हनुमान् अपने और पिताके बलसे कई सहस्र योजन आकाशको लाँघते चले गये और सूर्यदेवके समीप पहुँच गये ॥ २ ९ ॥
शिशुरेष त्वदोषज्ञ इति मत्वा दिवाकरः ।
कार्य चास्मिन् समायत्तमित्येवं न ददाह सः ॥ ३० ॥
‘ सूर्यदेवने यह सोचकर कि अभी यह बालक है, इसे गुण - दोषका ज्ञान नहीं है और इसके अधीन देवताओंका भी बहुत - सा भावी कार्य है— इन्हें जलाया नहीं ॥ ३० ॥
यमेव दिवसं ह्येष ग्रहीतुं भास्करं प्लुतः ।
तमेव दिवस राहुर्जिघृक्षति दिवाकरम् ॥ ३१ ॥
बुभुक्षापनयं दत्त्वा चन्द्रार्कौ मम वासव ।
किमिदं तत् त्वया दत्तमन्यस्य वलवृत्रहन् ॥ ३४ ॥
' बल और वृत्रासुरका वध करनेवाले वासव । आपने चन्द्रमा और सूर्यको मुझे अपनी भूख दूर करनेके साधन के रूपमें दिया था किंतु अब आपने उन्हें दूसरेके हवाले कर दिया है । ऐसा क्यों हुआ! ॥ ३४ ॥
अद्याहं पर्वकाले तु जिघृक्षुः सूर्यमागतः ।
अथान्यो राहुरासाद्य जग्राह सहसा रविम् ॥ ३५ ॥
" आज पर्व ( अमावास्या ) के समय मैं सूर्यदेवको प्रस्त करनेकी इच्छासे गया था । इतनेहीमें दूसरे राहुने आकर सहसा सूर्यको पकड़ लिया ' ॥ ३५ ॥
सहोर्वचनं श्रुत्वा वासवः सम्भ्रमान्वितः ।
उत्पपातासनं हित्वा उद्वहन् काञ्चनीं स्रजम् ॥ ३६ ॥
' राहुकी यह बात सुनकर देवराज इन्द्र घबरा गये और सोनेकी माला पहने अपना सिंहासन छोड़कर उठ खड़े हुए ॥
ततः कैलासकूटाभं चतुर्दन्तं मदस्रवम् ।
शृङ्गारधारिणं प्रांशुं स्वर्णघण्टाट्टहासिनम् ॥ ३७ ॥
इन्द्रः करीन्द्रमारुह्य राहुं कृत्वा पुरःसरम् ।
प्रायाद् यत्राभवत् सूर्यः सहानेन हनूमता ॥ ३८ ॥
' फिर कैलास शिखर के समान उज्ज्वल, चार दाँतोंसे विभूषित, मदकी धारा बहानेवाले, भाँति - भाँति के शृङ्गारसे युक्त, बहुत ही ऊँचे और सुवर्णमयी घण्टा के नादरूप अट्टहास करनेवाले गजराज ऐरावतपर आरूढ़ हो देवराज इन्द्र राहुको आगे करके उस स्थानपर गये, जहाँ हनुमानजी के साथ सूर्यदेव विराजमान थे ॥ ३७-३८ ॥
अथातिरभसेनागाद् राहुरुत्सृज्य वासवम् ।
अनेन च स वै दृष्टः प्रधाव शैलकूटवत् ॥ ३ ९ ॥
' इधर राहु इन्द्रको छोड़कर बड़े वेगसे आगे बढ़ गया । इसी समय पर्वत - शिखर के समान आकाग्वाले दौड़ते हुए राहुको हनुमानजीने देखा ॥ ३ ९ ॥ ततः सूर्य समुत्सृज्य राहुं फलमवेक्ष्य च । ' जिस दिन हनुमान् जी सूर्यदेवको पकड़नेके लिये उछले उत्पपात पुनव्यम ग्रहीतुं सिंहिकासुतम् ॥ ४० ॥
थे, उसी दिन राहु सूर्यदेवपर ग्रहण लगाना चाहता था । ३१ । ' तब राहुको ही फल के रूपमें देखकर बालक हनुमान् अनेन च परामृष्टो राहुः सूर्यरथोपरि । सूर्यदेवको छोड़ उस सिंहिकापुत्र को ही पकड़ने के लिये पुनः राहुश्चन्द्रार्कमर्दनः ॥ ३२ ॥ आकाशमें उछले ॥ ४० ॥
अपक्रान्तस्ततस्त्रस्तो ‘ हनुमान्जीने सूर्यके रथके ऊपरी भागमें जब राहुका उत्सृज्यार्कमिमं राम प्रधावन्तं लवङ्गमम् । स्पर्श किया, तब चन्द्रमा और सूर्य का मर्दन करनेवाला राहु अवेक्ष्यैवं परावृत्तो मुखशेषः पराङ्मुखः ॥ ४१ ॥
भयभीत हो वहाँसे भाग खड़ा हुआ ॥ ३२ ॥ ' श्रीराम! सूर्यको छोड़कर अपनी ओर धावा करनेवाले
भवनं गत्वा सरोषः सिंहिकासुतः । इन वानर हनुमान्को देखते ही राहु जिसका मुखमात्र ही शेष इन्द्रस्य भ्रुकुटिं कृत्वा देवं देवगणैर्वृतम् ॥ ३३ ॥ था, पीछे की ओर मुड़कर भागा ॥ ४१ ॥
अब्रवीद् ‘ सिंहिकाका वह पुत्र रोषसे भरकर इन्द्रके भवन में गया इन्द्रमाशंसमानस्तु त्रातारं सिंहिकासुतः । और देवताओंसे घिरे हुए इन्द्रके सामने भौंहें टेढ़ी करके इन्द्र इन्द्रेति संत्रासान्मुहुर्मुहुरभाषत ॥ ४२ ॥
' उस समय सिंहिकापुत्र राहु अपने रक्षक इन्द्रसे ही बोला – ॥ ३३ ॥
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उत्तरकाण्डे पञ्चत्रिंशः सर्गः १५५१ अपनी रक्षा के लिये कहता हुआ भयके मारे बारंबार ' इन्द्र! इन्द्र! ' की पुकार मचाने लगा ॥ ४२ ॥
राहोर्विकोशमानस्य प्रागेवालक्षितं स्वरम् ।
श्रुत्वेन्द्रोवाच मा भैषीरहमेनं निषूदये ॥ ४३ ॥
' चीखते हुए राहुके स्वरको जो पहलेका पहचाना हुआ था, सुनकर इन्द्र बोले – ' डरो मत । मैं इस आक्रमणकारीको मार डालूँगा ' ॥ ४३ ॥
ऐरावतं ततो दृष्ट्रा महत्तदिदमित्यपि ।
फलं तं हस्तिगजानमभिदुद्राव मारुतिः ॥ ४४ ॥
' तत्पश्चात् ऐरावतको देखकर इन्होंने उसे भी एक विशाल फल समझा और उस गजराजको पकड़ने के लिये ये उसकी ओर दौड़े ॥ ४४ ॥
तथास्य धावतो रूपमैरावतजिघृक्षया ।
मुहूर्तमभवद् घोरमिन्द्राग्भ्योरिव भास्वरम् ॥ ४५ ॥
“ ऐरावतको पकड़ने की इच्छासे दौड़ते हुए हनुमान् जीका रूप दो घड़ी के लिये इन्द्र और अग्निके समान प्रकाशमान एवं भयंकर हो गया || ४५ ॥
एचमाधावमानं तु नातिक्रुद्धः शचीपतिः ।
हस्तान्तादतिमुक्तेन कुलिशेनाभ्यताडयत् ॥ ४६ ॥
' बालक हनुमान् को देखकर शचीपति इन्द्रको अधिक क्रोध नहीं हुआ । फिर भी इस प्रकार धावा करते हुए इन बालक वानरपर उन्होंने अपने हाथसे छूटे हुए वज्र के द्वारा प्रहार किया || ४६ ॥
ततो गिरौ पपातैष इन्द्रवज्राभिताडितः ।
पतमानस्य चैतस्य हनुरभज्यत ॥ ४७ ॥
‘ इन्द्रके वज्रकी चोट खाकर ये एक पहाड़पर गिरे । वहाँ गिरते समय इनकी बायीं ठुड्डी टूट गयी ॥ ४७ ॥
तस्मिंस्तु पतिते चापि वज्रताडनविह्वले ।
चुक्रोधेन्द्राय पवनः प्रजानामहिताय सः ॥ ४८ ॥
' वज्रके आघातसे व्याकुल होकर इनके गिरते ही वायुदेव इन्द्रपर कुपित हो उठे । उनका यह क्रोध प्रजाजनोंके लिये अहितकारक हुआ || ४८ ॥
प्रचारं स तु संगृह्य प्रजास्वन्तर्गतः प्रभुः ।
गुहां प्रविष्टः स्वसुतं शिशुमादाय मारुतः ॥ ४ ९ ॥
' सामर्थ्यशाली मारुतने समस्त प्रजाके भीतर रहकर भी वहाँ अपनी गति समेट ली - श्वास आदिके रूपमें संचार रोक दिया और अपने शिशुपुत्र हनुमान् को लेकर वे पर्वतकी गुफामें घुस गये ॥ ४ ९ ॥
विण्मूत्राशयमावृत्य प्रजानां परमार्तिकृत् ।
रुरोध सर्वभूतानि यथा वर्षाणि वासवः ॥ ५० ॥
' जैसे इन्द्र वर्षा रोक देते हैं, उसी प्रकार वे वायुदेव प्रजाजनोंके मलाशय और मूत्राशयको रोककर उन्हें बड़ी पीड़ा देने लगे । उन्होंने सम्पूर्ण भूतोंके प्राण - संचारका अवरोध कर दिया ॥ ५० ॥
वायुप्रकोपाद् भूतानि निरुच्छ्वासानि सर्वतः ।
संधिभिर्भिद्यमानैश्व काष्ठभूतानि जज्ञिरे ॥ ५१ ॥
' वायुके प्रकोप से समस्त प्राणियोंकी साँस बंद होने लगी । उनके सभी अङ्गों के जोड़ टूटने लगे और वे सब के सब काठके समान चेष्टाशून्य हो गये ॥ ५१ ॥
निःस्वाध्यायवषट्कारं निष्क्रियं धर्मवर्जितम् ।
वायुप्रकोपात् त्रैलोक्यं निरयस्थमिवाभवत् ॥ ५२ ॥
' तीनों लोकोंमें न कहीं वेदोंका स्वाध्याय होता था और न यज्ञ । सारे धर्म - कर्म बंद हो गये । त्रिभुवनके प्राणी ऐसे कष्ट पाने लगे, मानो नरकमें गिर गये हों ॥ ५२ ॥
ततः प्रजाः सगन्धर्वाः सदेवासुरमानुषाः ।
प्रजापतिं समाधावन् दुःखिताश्च सुखेच्छया ॥ ५३ ॥
' तब गन्धर्व, देवता, असुर और मनुष्य आदि सभी प्रजा व्यथित हो सुख पानेकी इच्छासे प्रजापति ब्रह्माजी के पास दौड़ी गयी ॥ ५३ ॥
ऊचुः प्राञ्जलयो देवा महोदरनिभोदराः ।
त्वया तु भगवन् सृष्टाः प्रजा नाथ चतुर्विधाः ॥ ५४ ॥
त्वया दत्तोऽयमस्माकमायुषः पवनः पतिः ।
सोऽस्मान् प्राणेश्वरो भूत्वा कस्मादेषोऽद्य सत्तम ॥ ५५ ॥
रुरोध दुःखं जनयन्नन्तःपुर इव स्त्रियः । " उस समय देवताओंके पेट इस तरह फूल गये थे, मानो उन्हें महोदरका रोग हो गया हो । उन्होंने हाथ जोड़कर कहा- ' भगवन्! स्वामिन्! आपने चार प्रकारकी प्रजाओंकी सृष्टि की है । आपने हम सबको हमारी आयुके अधिपति के रूपमें वायुदेवको अर्पित किया है । साधुशिरोमणे! ये पवन-देव हमारे प्राणोंके ईश्वर हैं तो भी क्या कारण है कि आज इन्होंने अन्तःपुरमें स्त्रियोंकी भाँति हमारे शरीर के भीतर अपने संचारको रोक दिया है और इस प्रकार ये हमारे लिये दुःख-जनक हो गये हैं ॥ ५४-५५३ ॥ तस्मात् त्वां शरणं प्राप्ता वायुनोपहता वयम् ॥ ५६ ॥
वायुसंरोधजं दुःखमिदं नो नुद दुःखहन् । " वायु से पीड़ित होकर आज हमलोग आपकी शरण में आये हैं । दुःखहारी प्रजापते! आप हमारे इस वायुरोधजनित दुःखको दूर कीजिये ' ॥ ५६३ ॥
एतत् प्रजानां श्रुत्वा तु प्रजानाथः प्रजापतिः ॥ ५७ ॥
कारणादिति चोक्त्वासौ प्रजाः पुनरभाषत । ' प्रजाजनोंकी यह बात सुनकर उनके पालक और रक्षक ब्रह्माजी ने कहा – “ इसमें कुछ कारण है ' ऐसा कहकर वे प्रजाजनोंसे फिर बोले— ॥ ५७३ ॥
यस्मिंश्च कारणे वायुश्चक्रोध व रुरोध च ॥ ५८ ॥
प्रजाः शणुध्वं तत् सर्व श्रोतव्यं चात्मनः क्षमम् ।
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१५५२ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे ‘ “ प्रजाओ! जिस कारणको लेकर वायुदेवताने क्रोध और अपनी गतिका अवरोध किया है, उसे बताता हूँ, सुनो । वह कारण तुम्हारे सुनने योग्य और उचित है ॥ ५८३ ॥
पुत्रस्तस्यामरेशेन इन्द्रेणाद्य निपातितः ॥ ५ ९ ॥ राहोर्वचनमास्थाय ततः स कुपितोऽनिलः । " आज देवराज इन्द्रने राहुकी बात सुनकर वायुके पुत्रको मार गिराया है, इसीलिये वे कुपित हो उठे हैं ॥ ५ ९ ३ ॥ अशरीरः शरीरेषु वायुश्चरति पालयन् ॥ ६० ॥
शरीरं हि विना वायुं समतां याति दारुभिः । " वायुदेव स्वयं शरीर धारण न करके समस्त शरीरोंमें उनकी रक्षा करते हुए विचरते हैं । वायुके बिना यह शरीर सूखे काठके समान हो जाता है । ६०३ ॥ वायुः प्राणः सुखं वायुर्वायुः सर्वमिदं जगत् ॥ ६१ ॥
वायुना सम्परित्यक्तं न सुखं विन्दते जगत् । " वायु ही सबका प्राण है । वायु ही सुख है और वायु ही यह सम्पूर्ण जगत् है । वायुसे परित्यक्त होकर जगत् कभी सुख नहीं पा सकता ॥ ६१३ ॥
अद्यैव च परित्यक्तं वायुना जगदायुषा ॥ ६२ ॥
अद्यैव ते निरुच्छ्वासाः काष्ठकुड्योपमाः स्थिताः । " वायु ही जगत् की आयु है । इस समय वायुने संसारके प्राणियोंको त्याग दिया है, इसलिये वे सब - के - सब निष्प्राण होकर काठ और दीवार के समान हो गये हैं । ६२३ ॥
तद् यामस्तत्र यत्रास्ते मारुतो रुक्प्रदो हि नः ।
मा विनाशं गमिष्याम अप्रसाद्यादितेः सुताः ॥ ६३ ॥
“ अदिति - पुत्रो! अतः अब हमें उस स्थानपर चलना चाहिये, जहाँ हम सबको पीड़ा देनेवाले वायुदेव छिपे बैठे हैं । कहीं ऐसा न हो कि उन्हें प्रसन्न किये बिना हम सबका विनाश हो जाय ' ॥ ६३ ॥
ततः प्रजाभिः सहितः प्रजापतिः सदेवगन्धर्वभुजङ्गगुह्यकैः जगाम तत्रास्यति यत्र मारुतः सुतं सुरेन्द्राभिहतं प्रगृह्य सः ॥ ६४ ॥
' तदनन्तर देवता, गन्धर्व, नाग और गुह्यक आदि प्रजाओंको साथ ले प्रजापति ब्रह्माजी उस स्थानपर गये, जहाँ वायुदेव इन्द्रद्वारा मारे गये अपने पुत्रको लेकर बैठे हुए थे ॥ ६४ ॥
ततोऽर्कवैश्वानर काञ्चनप्रभं सुतं तदोत्सङ्गगतं सदागतेः । चतुर्मुखो वीक्ष्य कृपामथाकरोत् सदेवगन्धर्व ऋषियक्षराक्षसैः ॥ ६५ ॥
' तत्पश्चात् चतुर्मुख ब्रह्माजीने देवताओं, गन्धर्वों, ऋषियों तथा यक्षोंके साथ वहाँ पहुँचकर वायुदेवताकी गोदमें सोये हुए उनके पुत्रको देखा, जिसकी अङ्गकान्ति सूर्य, अग्नि और सुवर्णके समान प्रकाशित हो रही थी । उसकी वैसी दशा देखकर ब्रह्माजीको उसपर बड़ी दया आयी ' ॥। ६५ ॥ पञ्चत्रिंशः सर्गः ॥ ३५ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये उत्तरकाण्डे आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्ड में पैंतीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ३५ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित षट्त्रिंशः सर्गः हनुमान् जीको जीवित करके नाना प्रकार के वरदान देना और वायुका उन्हें ब्रह्मा आदि देवताओंका घर जाना, ऋषियोंके शापसे हनुमानजीको अपने बलकी विस्मृति, श्रीरामका लेकर अञ्जनाके यज्ञमें पधारने के लिये प्रस्ताव करके उन्हें विदा देना अगस्त्य आदि ऋषियोंसे अपने शिशुं तं परिमृष्टवान् ॥ ३ ॥
ततः पितामहं दृष्ट्वा वायुः पुत्रवधार्दितः । वायुमुत्थाप्य ‘ वेदवेत्ता ब्रह्माजीने हस्तेन अपने लम्बे, फैले हुए और आभरण-शिशुकं तं समादाय उत्तस्थौ धातुरग्रतः ॥ १ ॥ उठाकर खड़ा किया तथा उनके
' पुत्र के मारे जानेसे वायुदेवता बहुत दुखी थे । ब्रह्मा- भूषित हाथसे वायुदेवताको शिशुको लिये हुए ही उनके आगे उस शिशुपर भी हाथ फेरा ॥ ३ ॥
जीको देखकर वे उस स्पृष्टमात्रस्ततः सोऽथ सलीलं पद्मजन्मना ।
खड़े हो गये ॥ १ । जलसिक्तं यथा सस्यं पुनर्जीवितमाप्तवान् ॥ ४ ॥
चलकुण्डलमौलिस्रक् तपनीयविभूषणः । ' जैसे पानीसे सींच देनेपर सूखती हुई खेती हरी हो पादयोर्न्यपतद् वायुस्त्रिरुपस्थाय वेधसे ॥ २ ॥ ब्रह्माजीके हाथका लीला-‘ उनके कानोंमें कुण्डल हिल रहे थे, माथेपर मुकुट और जाती है, उसी प्रकार कमलयोनि हो गये ||
कण्ठमें हार शोभा दे रहे थे और वे सोनेके आभूषणोंसे पूर्वक स्पर्श पाते ही शिशु हनुमान् पुनः जीवित विभूषित थे । वायुदेवता तीन बार उपस्थान करके ब्रह्माजीके प्राणवन्तमिमं दृष्ट्रा प्राणो गन्धवहो मुदा । चचार सर्वभूतेषु संनिरुद्धं यथा पुरा ॥ ५ ॥
चरणों में गिर पड़े ॥ २ ॥ ' हनुमान्को जीवित हुआ देख जगत् के प्राणस्वरूप गन्ध-तं तु वेदविदातेन लम्बाभरणशोभिना ।
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उत्तरकाण्डे षट्त्रिंशः सर्गः १५५३ वाहन वायुदेव समस्त प्राणियोंके भीतर अवरुद्ध हुए प्राण कि आजसे यह मेरे वज्रके द्वारा भी नहीं मारा जा सकेगा ' ॥ आदिका पूर्ववत् प्रसन्नतापूर्वक संचार करने लगे ॥ ५ ॥ मार्तण्डस्त्वत्रवीत् तत्र भगवांस्तिमिरापहः
मरुद्रोधाद् विनिर्मुक्तास्ताः प्रजा मुदिताऽभवन् । तेजसोऽस्य मदीयस्य ददामि शतिकां कलाम् । शीतवातविनिर्मुक्ताः पद्मिन्य इव साम्बुजाः ॥ ६ ॥ इसके बाद वहाँ अन्धकारनाशक भगवान् सूर्यने ॥ १३ ॥
वायुके अवरोधसे छूटकर सारी प्रजा प्रसन्न हो गयी । “ मैं इसे अपने तेजका सौवाँ भाग देता हूँ ॥ १३ ॥ कहा-ठीक उसी तरह, जैसे हिमयुक्त वायुके आघात से मुक्त होकर यदा च शास्त्राण्यध्येतुं शक्तिरस्य भविष्यति ।
खिले हुए कमलों से युक्त पुष्करिणियाँ सुशोभित होने तदास्य शास्त्रं दास्यामि येन वाग्मी भविष्यति । लगती हैं ॥ ६ ॥
ततस्त्रियुग्मस्त्रिककुत् त्रिधामा त्रिदशार्चितः ।
उवाच देवता ब्रह्मा मारुतप्रियकाम्यया ॥ ७ ॥
तदनन्तर तीन युग्मोंसे सम्पन्न, प्रधानतः तीन मूर्ति धारण करनेवाले, त्रिलोकरूपी गृहमें रहनेवाले तथा तीन दशाओंसे युक्त देवताओं द्वारा पूजित ब्रह्माजी वायुदेवताका प्रिय करने-की इच्छा से देवगणोंसे बोले -- ॥ ७ ॥
भो महेन्द्राग्निवरुणा महेश्वरधनेश्वराः ।
जानतामपि वः सर्व वक्ष्यामि श्रूयतां हितम् ॥ ८ ॥
' इन्द्र, अग्नि, वरुण, महादेव और कुबेर आदि देवताओ! यद्यपि आप सब लोग जानते हैं तथापि मैं आप लोगोंके हितकी सारी बातें बताऊँगा, सुनिये ॥ ८ ॥
अनेन शिशुना कार्य कर्तव्यं वो भविष्यति ।
तद् ददध्वं वरान् सर्वे मारुतस्यास्य तुष्टये ॥ ९ ॥
" इस बालकके द्वारा भविष्यमें आपलोगों के बहुत - से कार्य सिद्ध होंगे, अतः वायुदेवताकी प्रसन्नता के लिये आप सब लोग इसे वर दें ' ॥ ९ ॥
ततः सहस्रनयनः प्रीतियुक्तः शुभाननः ।
कुशेशयमयीं मालामुत्क्षेप्येदं वचोऽब्रवीत् ॥ १० ॥
तब सुन्दर मुखबाले सहस्र नेत्रधारी इन्द्रने शिशु हनुमानके गलेमें बड़ी प्रसन्नताके साथ कमलोंकी माला पहना दी और यह बात कही -- ॥ १० ॥
मत्करोत्सृष्टवज्रेण हनुरस्य यथा हतः ।
नाम्ना वै कपिशार्दूलो भविता हनुमानिति ॥ ११ ॥
' मेरे हाथसे छूटे हुए वज्रके द्वारा इस बालककी हनु ( ठुड्डी ) टूट गयी थी; इसलिये इस कपिश्रेष्ठका नाम ' हनुमान् ' होगा ॥ ११ ॥
अहमस्य प्रदास्यामि परमं वरमद्भुतम् ।
इतः प्रभृति वज्रस्य ममावध्यो भविष्यति ॥ १२ ॥
" इसके सिवा मैं इसे दूसरा अद्भुत वर यह देता हूँ १. तीन युग्मोंका तात्पर्य यहाँ छः प्रकारके ऐश्वर्यसे है । ऐश्वर्य, धर्म, यश, श्री, ज्ञान और वैराग्य-- ये ही छः प्रकारके ऐश्वर्य हैं । २. ब्रह्मा, विष्णु और शिव - ये ही तीन मूर्तियाँ हैं । ३. बाल्य, पौगण्ड तथा कैशोर —ये ही देवताओंकी तीन
अवस्थाएँ हैं ।
वा ० रा ० ५.११.१५ ----न चास्य भविता कश्चित् सदृशः शास्त्रदर्शने ॥ १४ ॥
" इसके सिवा जब इसमें शास्त्राध्ययन करनेकी शक्ति आ जायगी, तब मैं ही इसे शास्त्रों का ज्ञान प्रदान करूँगा, जिससे यह अच्छा वक्ता होगा । शास्त्रज्ञान में कोई भी इसकी समानता करनेवाला न होगा ' ॥ १४ ॥
वरुणश्च वरं प्रादान्नास्य मृत्युर्भविष्यति ।
वर्षायुतशतेनापि मत्याशादुदकादपि ॥ ५५ ॥
तत्पश्चात् वरुणने वर देते हुए कहा- दस लाख वर्षोंकी आयु हो जानेपर भी मेरे पाश और जलसे इस बालक-की मृत्यु नहीं होगी ' ॥ १५ ॥
यमो दण्डादवध्यत्वमरोगत्वं च दत्तवान् ।
वरं ददामि संतुष्ट अविषादं च संयुगे ॥ १६ ॥
गदेयं मामिका नैनं संयुगेषु वधिष्यति ।
• इत्येवं धनदः प्राह तदा ह्येकाक्षिपिङ्गलः ॥ १७ ॥
फिर यमने वर दिया - " यह मेरे दण्डसे अवध्य और नीरोग होगा । ' तदनन्तर पिंगलवर्णकी एक आँखवालेकुबेरने कहा- - ' " मैं संतुष्ट होकर यह वर देता हूँ कि युद्ध में कभी इसे विषाद न होगा तथा मेरी यह गदा संग्राममें इसका वध न कर सकेगी ' ॥ १६-१७ ॥
मत्तो मदायुधानां च अवध्योऽयं भविष्यति ।
इत्येवं शंकरेणापि दत्तोऽस्य परमो वरः ॥ १८ ॥
इसके बाद भगवान् शंकरने यह उत्तम वर दिया कि " यह मेरे और मेरे आयुधोंके द्वारा भी अवध्य होगा ' ॥ १८ ॥
विश्वकर्मा च दृष्टुमं वालसूर्योपमं शिशुम् ।
शिल्पिनां प्रवरः प्रादाद् वरमस्य महामतिः ॥ १ ९ ॥
शिल्पियों में श्रेष्ठ परम बुद्धिमान विश्वकर्माने बालसूर्य के समान अरुण कान्तिवाले उस शिशुको देखकर उसे इस प्रकार वर दिया -- ॥ १ ९ ॥
मत्कृतानि च शस्त्राणि यानि दिव्यानि तानि च ।
तैरवध्यत्वमापन्नश्चिरजीवी भविष्यति ॥ २० ॥
' मेरे बनाये हुए जितने दिव्य अस्त्र - शस्त्र हैं, उनसे अवध्य होकर यह बालक चिरंजीवी होगा ' ॥ २० ॥
दीर्घायुश्च महात्मा च ब्रह्मा तं प्राब्रवीद् वचः ।
सर्वेषां ब्रह्मदण्डानामवध्योऽयं भविष्यति ॥ २१ ॥
अन्तमें ब्रह्माजीने उस बालकको लक्ष्य करके कहा-" यह दीर्घायु, महात्मा तथा सब प्रकार के ब्रह्मदण्डोंसे अवध्य होगा ' ॥ २१ ॥