Ramayana 2 — पृष्ठ 771–780
वाल्मीकि रामायण — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 771–780
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१५५४ श्रीमद्वाल्मीकीय रामायणे
ततः सुराणां तु वरैर्दृष्ट्वा ह्येनमलंकृतम् ।
चतुर्मुखस्तु मना वायुमाह जगहुरुः ॥ २२ ॥
तत्पश्चात् हनुमानजीको इस प्रकार देवताओंके वरोंसे अलंकृत देख चार मुखोंवाले जगद्गुरु ब्रह्माजी का मन प्रसन्न हो गया और वे वायुदेवसे बोले - ॥ २२ ॥
अमित्राणां भयकरो मित्राणामभयंकरः ।
अजेयो भविता पुत्रस्तव मारुत मारुतिः ॥ २३ ॥
' मारुत! तुम्हारा यह पुत्र मारुति शत्रुओंके लिये भयंकर और मित्रोंके लिये अभयदाता होगा । युद्ध में कोई भी इसे जीत न सकेगा ॥ २३ ॥
कामरूपः कामचारी कामगः ध्रुवतां वरः ।
भवत्यव्याहतगतिः कीर्तिमांश्च भविष्यति ॥ २४ ॥
" यह इच्छानुसार रूप धारण कर सकेगा, जहाँ चाहेगा जा सकेगा । इसकी गति इसकी इच्छाके अनुसार तीव्र या मन्द होगी तथा वह कहीं भी रुक नहीं सकेगी । यह कपिश्रेष्ठ बड़ा यशस्वी होगा ॥ २४ ॥
रावणोत्सादनार्थानि रामप्रीतिकराणि च ।
रोमहर्षकराण्येव कर्ता कर्माणि संयुगे ॥ २५ ॥
यह युद्धस्थलमें रावणका संहार और भगवान् श्रीराम-चन्द्रजीकी प्रसन्नताका सम्पादन करनेवाले अनेक अद्भुत एवं रोमाञ्चकारी कर्म करेगा ' ॥ २५ ॥
एवमुक्त्वा तमामन्ध्य मारुतं त्वमरैः सह ।
यथागतं ययुः सर्वे पितामहपुरोगमाः ॥ २६ ॥
इस प्रकार हनुमानजी को वर देकर वायुदेवताकी अनुमति ले ब्रह्मा आदि सब देवता जैसे आये थे, उसी तरह अपने-अपने स्थानको चले गये ॥ २६ ॥
सोऽपि गन्धवहः पुत्रं प्रगृह्य गृहमानयत् ।
अञ्जनायास्तमाख्याय वरदन्तं विनिर्गतः ॥ २७ ॥
गन्धवाहन वायु भी पुत्र को लेकर अञ्जनाके घर आये और उसे देवताओंके दिये हुए वरदानकी बात बताकर चले गये ॥ २७ ॥
प्राप्य राम वरानेष वरदानबलान्वितः ।
जवेनात्मनि संस्थेन सोऽसौ पूर्ण इवार्णवः ॥ २८ ॥
श्रीराम! इस प्रकार ये हनुमान्जी बहुत - से वर पाकर वरदानजनित शक्ति से सम्पन्न हो गये और अपने भीतर विद्यमान अनुपम वेगसे पूर्ण हो भरे हुए महासागरके समान शोभा पाने लगे ॥ २८ ॥
तरसा पूर्यमाणोऽपि तदा वानरपुङ्गवः ।
महर्षीणामपराध्यति निर्भयः ॥ २ ९ ॥
भग्नविच्छिन्नविध्वस्तान् संशान्तानां करोत्ययम् ॥ ३० ॥
ये शान्तचित्त महात्माओंके यज्ञोपयोगी पात्र फोड़ डालते, अग्निहोत्रके साधनभूत स्रुक, खुवा आदिको तोड़ डालते और ढेर के ढेर रखे गये वल्कलों को चीर - फाड़ देते थे ॥ ३० ॥
एवंविधानि कर्माणि प्रावर्तत महाबलः ।
सर्वेषां ब्रह्मदण्डानामवध्यः शम्भुना कृतः ॥ ३१ ॥
जानन्त ऋषयः सर्वे सहन्ते तस्य शक्तितः । महाबली पवनकुमार इस तरहके उपद्रवपूर्ण कार्य करने लगे । कल्याणकारी भगवान् ब्रह्माने इन्हें सब प्रकार के ब्रह्म-दण्डोंसे अवध्य कर दिया है — यह बात सभी ऋषि जानते थे; अतः इनकी शक्तिसे विवश हो वे इनके सारे अपराध चुपचाप सह लेते थे ॥ ३१३ ॥
तथा केसरिणा त्वेष वायुना सोऽञ्जनीसुतः ॥ ३२ ॥
प्रतिषिद्धोऽपि मर्यादां लङ्घयत्येव वानरः । यद्यपि केसरी तथा वायुदेवताने भी इन अञ्जनी कुमारको बारंबार मना किया तो भी ये वानरवीर मर्यादाका उल्लङ्घन कर ही देते थे ॥ ३२३ ॥
ततो महर्षयः क्रुद्धा भृग्वङ्गिरसवंशजाः ॥ ३३ ॥
शेपुरेनं रघुश्रेष्ठ नातिक्रुद्धातिमन्यवः । इससे भृगु और अङ्गिराके वंश में उत्पन्न हुए महर्षि कुपित हो उठे । रघुश्रेष्ठ । उन्होंने अपने हृदयमें अधिक खेदपा दुःखको स्थान न देकर इन्हें शाप देते हुए कहा- ॥ बाधसे यत् समाश्रित्य बलमस्मान् लवङ्गम ॥ ३४ ॥
तद् दीर्घकालं वेत्तासि नास्माकं शापमोहितः ।
यदा ते स्मार्यते कीर्तिस्तदा ते वर्धते बलम् ॥ ३५ ॥
' वानरवीर! तुम जिस बलका आश्रय लेकर हमें सता रहे हो, उसे हमारे शापसे मोहित होकर तुम दीर्घकालतक भूले रहोगे - तुम्हें अपने बलका पता ही नहीं चलेगा । जब कोई तुम्हें तुम्हारी कीर्तिका बल बढ़ेगा ' ॥ ३४-३५ ॥ ततस्तु हृततेजौजा एषोऽऽश्रमाणि तान्येव इस प्रकार महर्षियोंके और ओज घट गया । फिर होकर विचरने लगे ॥ ३६ स्मरण दिला देगा, तभी तुम्हारा
महर्षिवचनौजसा ।
मृदुभावं गतोऽचरत् ॥ ३६ ॥
इस वचनके प्रभावसे इनका तेज ये उन्हीं आश्रमों में मृदुल प्रकृतिके ||
अथर्क्षरजसो नाम वालिसुग्रीवयोः पिता ।
सर्ववानरराजासीत् तेजसा इव भास्करः ॥ ३७ ॥
वाली और सुग्रीवके पिताका नाम ऋक्षरजा था । वे सूर्यके समान तेजस्वी तथा समस्त वानरोंके राजा थे ॥ ३७ ॥
आश्रमेषु उन दिनों वेगसे भरे हुए ये वानर शिरोमणि हनुमान् स तु राज्यं चिरं कृत्वा वानराणां महेश्वरः । निर्भय हो महर्षियोंके आश्रमोंमें जा - जाकर उपद्रव किया ततस्त्वर्क्षरजा नाम कालधर्मेण योजितः ॥ ३८ ॥
वे वानरराज ॠक्षरजा चिरकालतक वानरोंके राज्यका करते थे ॥ २ ९ ॥ शासन करके अन्तमें कालधर्म ( मृत्यु ) को प्राप्त हुए । स्रुग्भाण्डान्यग्निहोत्राणि वल्कलानां च संचयान् ।
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उत्तरकाण्डे षट्त्रिंशः सर्गः १५५५
तस्मिन्नस्तमिते चाथ मन्त्रिभिर्मन्त्रकोविदैः ।
पित्र्ये पदे कृतो वाली सुग्रीवो वालिनः पदे ॥ ३ ९ ॥
उनका देहावसान हो जानेपर मन्त्रवेत्ता मन्त्रियोंने पिता के स्थानपर वालीको राजा और वालीके स्थानपर सुग्रीवको युवराज बनाया ॥ ३ ९ ॥
सुग्रीवेण समं त्वस्य अद्वैधं छिद्रवर्जितम् ।
आवाल्यं सख्यमभवदनिलस्याग्निना यथा ॥ ४० ॥
जैसे अग्नि के साथ वायुकी स्वाभाविक मित्रता है, उसी प्रकार सुग्रीवके साथ वालीका बचपनसे ही सख्यभाव था । उन दोनोंमें परस्पर किसी प्रकारका भेदभाव नहीं था । उनमें अटूट प्रेम था ॥ ४० ॥
एष शापवशादेव न वेद बलमात्मनः ।
वालिसुग्रीवयोर्वैरं यदा राम समुत्थितम् ॥ ४१ ॥
न ह्येष राम सुग्रीवो भ्राम्यमाणोऽपि वालिना ।
देव जानाति न ह्येष वलमात्मनि मारुतिः ॥ ४२ ॥
श्रीराम! फिर जब वाली और सुग्रीवमें वैर उठ खड़ा हुआ, उस समय ये हनुमानजी शापवश ही अपने बलको न जान सके । देव! वालीके भयसे भटकते रहनेपर भी न तो इन सुग्रीवको इनके बलका स्मरण हुआ और न स्वयं ये पवनकुमार ही अपने बलका पता पा सके ॥ ४१-४२ ॥
ऋषिशापाहतबलस्तदैव कपिसत्तमः ।
सिंहः कुञ्जररुद्धो वा आस्थितः सहितो रणे ॥ ४३ ॥
सुग्रीवके ऊपर जब वह विपत्ति आयी थी, उन दिनों ऋषियोंके शाप के कारण इनको अपने बलका था, इसीलिये जैसे कोई सिंह हाथीके द्वारा चुपचाप खड़ा रहे, उसी प्रकार ये वाली और चुपचाप खड़े - खड़े तमाशा देखते रहे, कुछ पराक्रमोत्साहमतिप्रताप-सौशील्यमाधुर्यनयानयैश्च गाम्भीर्य चातुर्यसुवीर्यधैयै-ज्ञान भूल गया अवरुद्ध होकर सुग्रीवके युद्धमें कर न सके ॥ I हनूमतः कोऽप्यधिकोऽस्ति लोके ॥ ४४ ॥
संसारमें ऐसा कौन है जो पराक्रम, उत्साह, बुद्धि, प्रताप, सुशीलता, मधुरता, नीति - अनीतिके विवेक, गम्भीरता, चतुरता, उत्तम बल और धैर्यमें हनुमान् जीसे बढ़कर हो ॥ ४४ ॥
असो पुनर्व्याकरणं ग्रहीष्यन् सूर्योन्मुखः प्रष्टुमनाः कपीन्द्रः । उद्यद्विरेरस्तगिरिं जगाम ग्रन्थं महद्धारयनप्रमेयः ॥ ४५ ॥
ये असीम शक्तिशाली कपिश्रेष्ठ हनुमान् व्याकरणका अध्ययन करनेके लिये शङ्काएँ पूछनेकी इच्छासे सूर्य की ओर मुँह रख कर महान् ग्रन्थ धारण किये उनके आगे - आगे उदयाचलसे अस्ताचलतक जाते थे ॥ ४५ ॥
सूत्रवृत्त्यर्थपदं महा ससंग्रहं सिद्ध्यति वै कपीन्द्रः । नहास्य कश्चित् सदृशोऽस्ति शास्त्रे वैशारदे छन्दगतौ तथैव ॥ ४६ ॥
इन्होंने सूत्र, वृत्ति, वार्तिक, महाभाष्य और संग्रह — इन सबका अच्छी तरह अध्ययन किया है । अन्यान्य शास्त्रोंके ज्ञान तथा छन्दःशास्त्र के अध्ययन में भी इनकी समानता करने-वाला दूसरा कोई विद्वान् नहीं है ॥ ४६ || सर्वासु विद्यासु तपोविधाने प्रस्पर्धतेऽयं हि गुरुं सुराणाम् । सोऽयं नवव्याकरणार्थवेत्ता ब्रह्मा भविष्यत्यपि ते प्रसादात् ॥ ४७ ॥
सम्पूर्ण विद्याओं के ज्ञान तथा तपस्या के अनुष्ठान में ये देवगुरु बृहस्पतिकी बराबरी करते हैं । नव व्याकरणोंके सिद्धान्तको जाननेवाले ये हनुमानजी आपकी कृपासे साक्षात् ब्रह्माके समान आदरणीय होंगे ॥ ४७ ॥
प्रवीविविक्षोरिव सागरस्य लोकान् दिधक्षोरिव पावकस्य । लोकक्षयेष्वेव यथान्तकस्य हनूमतः स्थास्यति कः पुरस्तात् ॥ ४८ ॥
प्रलयकालमें भूतलको आप्लावित करनेके लिये भूमिके भीतर प्रवेश करनेकी इच्छावाले महासागर, सम्पूर्ण लोकोंको दग्ध कर डालनेके लिये उद्यत हुए संवर्तक अग्नि तथा लोक-संहारके लिये उठे हुए कालके समान प्रभावशाली इन हनुमानजी के सामने कौन ठहर सकेगा ॥ ४८ ॥
एषेव चान्ये च महाकपीन्द्राः
सुग्रीवमैन्दद्विविदाः सनीलाः ।
सतारतारेयनलाः सरम्भा-स्त्वत्कारणाद् राम सुरैर्हि सृष्टाः ॥ ४ ९ ॥
श्रीराम! वास्तवमें ये तथा इन्हीं के समान दूसरे दूसरे जो सुग्रीव, मैन्द, द्विविद, नील, तार, तारेय ( अङ्गद ), नल तथा रम्भ आदि महाकपीश्वर हैं; इन सबकी सृष्टि देवताओंने आपकी सहायता के लिये ही की है ॥ ४ ९ ॥ गजो गवाक्षो गवयः सुदंष्ट्रो
मैन्दः प्रभो ज्योतिमुखो नलश्च ।
एते च ऋक्षाः सह वानरेन्द्र-स्त्वत्कारणाद् राम सुरैर्हि सृष्टाः ॥ ५० ॥
श्रीराम! गज, गवाक्ष, गवय, सुदंष्ट्र, मैन्द, प्रभ ज्योतिमुख और नल - इन सब वानरेश्वरों तथा रीछोंकी सृष्टि देवताओंने आपके सहयोग के लिये ही की है ॥ ५० ॥
तदेतत् कथितं सर्व यन्मां त्वं परिपृच्छसि ।
हनूमतो बालभावे कर्मैतत् कथितं मया ॥ ५२ ॥
रघुनन्दन! आपने मुझसे जो कुछ पूछा था, वह सब मैंने कह सुनाया । हनुमानजी की बाल्यावस्थाके इस चरित्रका भी वर्णन कर दिया ॥ ५१ ॥
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१५५६ श्रीमवाल्मीकीय रामायणे श्रुत्वागस्त्यस्य कथितं रामः सौमित्रिरेव च । ' मेरी इच्छा है कि पुरवासी और देशवासियोंको अपने-विस्मयं परमं जग्मुर्वानरा राक्षसैः सह ॥ ५२ ॥ अपने कार्यों में लगाकर मैं आप सत्पुरुषोंके प्रभावसे यज्ञोंका
अगस्त्यजीका यह कथन सुनकर श्रीराम और लक्ष्मण बड़े अनुष्ठान करूँ ॥ ५७ ॥
विस्मित हुए । वानरों और राक्षसोंको भी बड़ा आश्चर्य सदस्या मम यज्ञेषु भवन्तो नित्यमेव तु । हुआ ॥ ५२ ॥
अगस्त्यस्त्वब्रवीद् रामं सर्वमेतच्छ्रुतं त्वया ।
दृष्टः सम्भाषितश्चासि राम गच्छामहे वयम् ॥ ५३ ॥
तत्पश्चात् अगस्त्यजीने श्रीरामचन्द्र जी से कहा - " योगियों-के हृदयमें रमण करनेवाले श्रीराम! आप यह सारा प्रसङ्ग सुन चुके । हमलोगोंने आपका दर्शन और आपके साथ
वार्तालाप कर लिया । इसलिये अब हम जा रहे हैं ' ॥ ५३ ॥
श्रुत्वैतद् राघवो वाक्यमगस्त्यस्योग्रतेजसः ।
प्राञ्जलिः प्रणतश्चापि महर्षिमिदमब्रवीत् ॥ ५४ ॥
उग्र तेजस्वी अगस्त्यजीकी यह बात सुनकर श्रीरघुनाथजीने हाथ जोड़ विनयपूर्वक उन महर्षिसे इस प्रकार कहा ॥५४ ॥
अद्य मे देवतास्तुष्टाः पितरः प्रपितामहाः ।
युष्माकं दर्शनादेव नित्यं तुष्टाः सबान्धवाः ॥ ५५ ॥
' मुनीश्वर! आज मुझपर देवता पितर और पितामह आदि विशेषरूपसे संतुष्ट हैं । बन्धुबान्धवसहित हमलोगों को तो आप जैसे महात्माओंके दर्शनसे ही सदा संतोष है ॥ ५५ ॥
विज्ञाप्यं तु ममैतद्धि यद् वदाम्यागत स्पृहः ।
तद् भवद्भिर्मम कृते कर्तव्यमनुकम्पया ॥ ५६ ॥
" मेरे मनमें एक इच्छाका उदय हुआ है, अतः मैं यह सूचित करने योग्य बात आपकी सेवामें निवेदन कर रहा हूँ । मुझपर अनुग्रह करके आपलोगोंको मेरे उस अभीष्ट कार्यको पूरा करना होगा ॥ ५६ ॥
पौरजानपदान स्थाप्य स्वकार्येष्वहमागतः ।
क्रतूनहं करिष्यामि प्रभावाद् भवतां सताम् ॥ ५७ ॥
भविष्यथ महावीर्या ममानुग्रहकाङ्क्षिणः ॥ ५८ ॥
' मेरे उन यज्ञों में आप महान् शक्तिशाली महात्मा मुझपर अनुग्रह करने के लिये नित्य सदस्य बने रहें ॥ ५८ ॥
अहं युष्मान् समाश्रित्य तपोनिर्धूतकल्मषान् ।
अनुगृहीतः पितृभिर्भविष्यामि सुनिर्वृतः ॥ ५ ९ ॥
' आप तपस्या से निष्पाप हो चुके हैं । मैं आपलोगोंका आश्रय लेकर सदा संतुष्ट एवं पितरोंसे अनुगृहीत होऊँगा ॥
तदागन्तव्यमनिशं भवद्भिरिह संगतैः ।
याद्यास्तु तच्छ्रुत्वा ऋषयः संशितव्रताः ॥ ६० ॥
एवमस्त्विति तं प्रोच्य प्रयातुमुपचक्रमुः । ' यज्ञ आरम्भके समय सब लोग एकत्र होकर निरन्तर यहाँ आते रहें । ' श्रीरामचन्द्रजीका यह वचन सुनकर कठोर व्रतका पालन करनेवाले अगस्त्य आदि महर्षि उनसे ' एवमस्तु ( ऐसा ही होगा ) ' कहकर वहाँसे जानेको उद्यत हुए ॥ ६०३ ॥
एवमुक्त्वा गताः सर्वे ऋषयस्ते यथागतम् ॥ ६१ ॥
राघवश्च तमेवार्थ चिन्तयामास विस्मितः । इस प्रकार बातचीत करके सब ऋषि जैसे आये थे, वैसे चले गये । इधर श्रीरामचन्द्रजी विस्मित होकर उन्हीं बार्तोपर विचार करते रहे ॥ ६१३ ॥
ततोऽस्तं भास्करे याते विसृज्य नृपवानरान् ॥ ६२ ॥
संध्यामुपास्य विधिवत् तदा नरवरोत्तमः ।
प्रवृत्तायां रजन्यां तु सोऽन्तःपुरचरोऽभवत् ॥ ६३ ॥
तदनन्तर सूर्यास्त होनेपर राजाओं और वानरोंको विदा करके नरेशोंमें श्रेष्ठ श्रीरामचन्द्रजीने विधिपूर्वक संध्योपासना की और रात होनेपर वे अन्तःपुरमें पधारे ॥ ६२-६३ ॥ इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये उत्तरकाण्डे षटूत्रिंशः सर्गः ॥ ३६ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें छत्तीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ३६ ॥
सप्तत्रिंशः सर्गः श्रीरामका सभासदों के साथ राजसभामें बैठना
• अभिषिक्ते तु काकुत्स्थे धर्मेण विदितात्मनि ।
व्यतीता या निशा पूर्वा पौराणां हर्षवधिनी ॥ १ ॥
ककुत्स्थकुलभूषण आत्मज्ञानी श्रीरामचन्द्रजीका धर्मपूर्वक राज्याभिषेक हो जानेपर पुरवासियों का हर्ष बढ़ानेवाली उनकी पहली रात्रि व्यतीत हुई ॥ १ ॥
तस्यां रजन्यां व्युष्टायां प्रातर्नृपतिबोधकाः ।
बन्दिनः समुपातिष्ठन् सौम्या नृपतिवेश्मनि ॥ २ ॥
वह रात बीतने पर जब सबेरा हुआ, तब प्रातःकाल महाराज श्रीरामको जगानेवाले सौम्य वन्दीजन राजमहल में उपस्थित हुए ॥ २ ॥
ते रक्तकण्ठिनः सर्वे किन्नरा इव शिक्षिताः ।
तुष्टुवुर्नृपतिं वीरं यथावत् सम्प्रहर्षिणः ॥ ३ ॥
उनके कण्ठ बड़े मधुर थे । वे संगीतकी कला में किन्नरोंके समान सुशिक्षित थे । उन्होंने बड़े हर्ष में भरकर यथावत् रूपसे वीर नरेश श्रीरघुनाथजी का स्तवन आरम्भ किया ॥ ३ ॥
वीर सौम्य प्रबुध्यस्व कौसल्याप्रीतिवर्धन ।
जगद्धि सर्व स्वपिति त्वयि सुप्ते नराधिप ॥ ४ ॥
' श्री कौसल्याजीका आनन्द बढ़ानेवाले सौम्य स्वरूप वीर श्रीरघुवीर! आप जागिये । महाराज! आपके सोये रहनेपर
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अभिनन्दन का श्रीकोसलेन्द्र भगवान् मुनियोंद्वारा -ऋषि हुए आये दिशाओंसे विभिन्न
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उत्तरकाण्डे सप्तत्रिंशः सर्गः - १५५७ तो सारा जगत् ही सोया रहेगा ( ब्राह्ममुहूर्त में उठकर धर्मानुष्ठान-में नहीं लग सकेगा ) ॥ ४ ॥
विक्रमस्ते यथा विष्णो रूपं चैवाश्विनोरिव ।
बुद्ध्या बृहस्पतेस्तुल्यः प्रजापतिसमो ह्यसि ॥ ५ ॥
' आपका पराक्रम भगवान् विष्णुके समान तथा रूप
अश्विनीकुमारों के समान है । बुद्धि में आप बृहस्पतिके तुल्य हैं ।
और प्रजा पालनमें साक्षात् प्रजापतिके सदृश हैं ॥ ५ ॥
क्षमा ते पृथिवीतुल्या तेजसा भास्करोपमः ।
वेगस्ते वायुना तुल्यो गाम्भीर्यमुदधेरिव ॥ ६ ॥
' आपकी क्षमा पृथ्वी के समान और तेज भगवान् भास्करके समान है । वेग वायुके तुल्य और गम्भीरता समुद्रके सदृश है ॥ ६ ॥
अप्रकम्प्यो यथा स्थाणुश्चन्द्रे सौम्यत्वमीदृशम् ।
नेदृशाः पार्थिवाः पूर्व भवितारो नराधिप ॥ ७ ॥
' नरेश्वर! आप भगवान् शंकर के समान युद्ध में अविचल हैं । आपकी - सी सौम्यता चन्द्रमामें ही पायी जाती है । आपके समान राजा न पहले थे और न भविष्यमें होंगे ॥ ७ ॥
यथा त्वमसि दुर्धर्षो धर्मनित्यः प्रजाहितः ।
न त्वां जहाति कीर्तिश्च लक्ष्मीश्च पुरुषर्षभ ॥ ८ ॥
' पुरुषोत्तम! आपको परास्त करना कठिन ही नहीं, असम्भव है । आप सदा धर्ममें संलग्न रहते हुए प्रजाके हित-साधनमें तत्पर रहते हैं, अतः कीर्ति और लक्ष्मी आपको कभी नहीं छोड़ती हैं ॥ ८ ॥
श्रीश्व धर्मश्च काकुत्स्थ त्वयि नित्यं प्रतिष्ठितौ ।
एताश्चान्याश्च मधुरा वन्दिभिः परिकीर्तिताः ॥ ९ ॥
" ककुत्स्थ कुलनन्दन! ऐश्वर्य और धर्म आपमें नित्य प्रतिष्ठित हैं । ' वन्दीजनोंने ये तथा और भी बहुत - सी सुमधुर स्तुतियाँ सुनायीं ॥ ९ ॥
सूताश्च संस्तवैर्दिव्यैर्बोधयन्ति स्म राघवम् ।
स्तुतिभिः स्तूयमानाभिः प्रत्यबुध्यत राघवः ॥ १० ॥
सूत भी दिव्य स्तुतियोंद्वारा श्रीरघुनाथजीको जगाते रहे । इस प्रकार सुनायी जाती हुई स्तुतियोंके द्वारा भगवान् श्रीराम जागे ॥ १० ॥
स तद्विहाय शयनं पाण्डुराच्छादनास्तृतम् ।
उत्तस्थौ नागशयनाद्धरिर्नारायणो यथा ॥ ११ ॥
जैसे पापहारी भगवान् नारायण सर्पशय्यासे उठते हैं, उसी प्रकार वे भी श्वेत बिछोनोंसे ढकी हुई शय्याको छोड़कर उठ बैठे ॥ ११ ॥
तमुत्थितं महात्मानं प्रह्नाः प्राञ्जलयो नराः ।
सलीलं भाजनैः शुभैरूपतस्थुः सहस्रशः ॥ १२ ॥
महाराजके शब्यासे उठते ही सहस्रों सेवक विनयपूर्वक हाथ जोड़ उज्ज्वल पात्रों में नल लिये उनकी सेवामें उपस्थित हुए ॥ १२ ॥
कृतोदकः शुचिर्भूत्वा काले हुतहुताशनः ।
देवागारं जगामाशु पुण्यमिक्ष्वाकुसेवितम् ॥ १३ ॥
स्नान आदि करके शुद्ध हो उन्होंने समयपर अग्निमें आहुति दी और शीघ्र ही इक्ष्वाकुवंशियोंद्वारा सेवित पवित्र देवमन्दिरमें वे पधारे ॥ १३ ॥
तत्र देवान् पितृन् विप्रानर्चयित्वा यथाविधि ।
बाह्यकक्षान्तरं रामो निर्जगाम जनैर्वृतः ॥ १४ ॥
वहाँ देवताओं, पितरों और ब्राह्मणों का विधिवत् पूजन करके वे अनेक कर्मचारियों के साथ बाहरकी ड्योढ़ीमें आये ॥
उपतस्थुर्महात्मानो मन्त्रिणः सपुरोहिताः ।
वसिष्ठप्रमुखाः सर्वे दीप्यमाना इवाग्नयः ॥ १५ ॥
इसी समय प्रज्वलित अग्निके समान तेजस्वी वसिष्ठ आदि सभी महात्मा मन्त्री और पुरोहित वहाँ उपस्थित हुए ॥ १५ ॥
क्षत्रियाश्च महात्मानो नानाजनपदेश्वराः ।
रामस्योपाविशन् पार्श्वे शक्रस्येव यथामराः ॥ १६ ॥
तत्पश्चात् अनेकानेक जनपदों के स्वामी महामनस्वी क्षत्रिय श्रीरामचन्द्रजीके पास उसी तरह आकर बैठे, जैसे इन्द्रके समीप देवतालोग आकर बैठा करते हैं ॥ १६ ॥
भरतो लक्ष्मणश्चात्र शत्रुघ्नश्च महायशाः ।
उपासांचक्रिरे हृष्टा वेदास्त्रय इवाध्वरम् ॥ १७ ॥
महायशस्वी भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न – ये तीनों भाई बड़े हर्ष के साथ उसी तरह भगवान् श्रीरामकी सेवामें उपस्थित रहते थे, जैसे तीनों वेद यशकी ॥ १७ ॥
याताः प्राञ्जलयो भूत्वा किंकरा मुदिताननाः ।
मुदिता नाम पार्श्वस्था बहवः समुपाविशन् ॥ १८ ॥
इसी समय सुदित नामसे प्रसिद्ध बहुत - से सेवक भी, जिनके मुखपर प्रसन्नता खेलती रहती थी, हाथ जोड़े सभा भवन में आये और श्रीरघुनाथजीके पास बैठ गये ॥ १८ ॥
वानराश्च महावीर्या विंशतिः कामरूपिणः ।
सुग्रीवप्रमुखा राममुपासन्ते महौजसः ॥ १ ९ ॥
फिर महापराक्रमी महातेजखी तथा इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले सुग्रीव आदि बीसे वानर भगवान् श्रीरामके समीप आकर बैठे ॥ १ ९ ॥
विभीषणश्च रक्षोभिश्चतुर्भिः परिवारितः ।
उपासते महात्मानं धनेशमिव गुह्यकः ॥ २० ॥
अपने चार राक्षस मन्त्रियोंसे घिरे हुए विभीषण भी उसी प्रकार महात्मा श्रीरामकी सेवामें उपस्थित हुए, जैसे गुह्यकगण धनपति कुबेरकी सेवामें उपस्थित होते हैं ॥ २० ॥
तथा निगमवृद्धाश्च कुलीना ये च मानवाः । १. सुग्रीव, भङ्गद, हनुमान्, जाम्बवान्, सुषेण, तार, नील, नल, मैन्द, द्विविद, कुमुद, शरभ, शतवलि, गन्धमादन, गण, गवाक्ष, गवय, धूम्र, रम्भ तथा ज्योतिमुखये प्रधान प्रधान वानर - वीर बीसकी संख्या में उपस्थित थे ।
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१५५८ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे शिरसा वन्द्य राजानमुपासन्ते विचक्षणाः ॥ २१ ॥
जो लोग शास्त्रज्ञानमें बढ़े चढ़े और कुलीन थे, वे चतुर मनुष्य भी महाराजको मस्तक झुकाकर प्रणाम करके वहाँ बैठ गये ॥ २१ ॥
तथा परिवृतो राजा श्रीमद्भिऋषिभिर्वरैः ।
राजभिश्च महावीर्यैर्वानरैश्व सराक्षसैः ॥ २२ ॥
इस प्रकार बहुत - से श्रेष्ठ एवं तेजस्वी महर्षि, महा-पराक्रमी राजा, वानर और राक्षसोंसे घिरे राजसभामें बैठे हुए श्रीरघुनाथजी बड़ी शोभा पा रहे थे ॥ २२ ॥
यथा देवेश्वरो नित्यमृषिभिः समुपास्यते ।
अधिकस्तेन रूपेण सहस्राक्षाद् विरोचते ॥ २३ ॥
जैसे देवराज इन्द्र सदा ऋषियोंसे सेवित होते हैं, उसी तरह महर्षि - मण्डलीसे विरे हुए श्रीरामचन्द्रजी उस समय सहस्रलोचन इन्द्रसे भी अधिक शोभा पा रहे थे ॥ २३ ॥
तेषां समुपविष्टानां तास्ताः सुमधुराः कथाः ।
कथ्यन्ते धर्मसंयुक्ताः पुराणज्ञैर्महात्मभिः ॥ २४ ॥
जब सब लोग यथास्थान बैठ गये, तब पुराणवेत्ता महात्मा लोग भिन्न - भिन्न धर्म - कथाएँ कहने लगे ॥२४ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये उत्तरकाण्डे सप्तत्रिंशः सर्गः ॥ ३७ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के उत्तरकाण्डमें सैंतीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ३७ ॥
Spe1143 अष्टात्रिंशः सर्गः श्रीराम द्वारा राजा जनक, युधाजित, प्रतर्दन तथा अन्य नरेशोंकी विदाई
एवमास्ते महाबाहु रहन्यहनि राघवः ।
प्रशासत् सर्वकार्याणि पौरजानपदेषु च ॥ १ ॥
महाबाहु श्रीरघुनाथजी इसी प्रकार प्रतिदिन राजसभामें बैठकर पुरवासियों और जनपदवासियोंके सारे कार्योंकी देखभाल करते हुए शासनका कार्य चलाते थे ॥ १ ॥
ततः कतिपयाहःसु वैदेहं मिथिलाधिपम् ।
राघवः प्राञ्जलिर्भूत्वा वाक्यमेतदुवाच ह ॥ २ ॥
तदनन्तर कुछ दिन बीतने पर श्रीरामचन्द्रजीने मिथिला-नरेश विदेहराज जनकजीसे हाथ जोड़कर यह बात कही ॥
भवान् हि गतिरव्यग्रा भवता पालिता वयम् ।
भवतस्तेजसोग्रेण रावणो निहतो मया ॥ ३ ॥
' महाराज! आप हमारे सुस्थिर आश्रय हैं । आपने सदा हमलोगोंका लालन पालन किया है । आपके ही बढ़े हुए तेजसे मैंने रावणका वध किया है ॥ ३ ॥
इक्ष्वाकूणां च सर्वेषां मैथिलानां च सर्वशः ।
अतुलाः प्रीतयो राजन् सम्बन्धकपुरोगमाः ॥ ४ ॥
' राजन्! समस्त इक्ष्वाकुवंशी और मैथिल नरेशोंमें आपसके सम्बन्धके कारण सब प्रकारसे जो प्रेम बढ़ा है, उसकी कहीं तुलना नहीं है ॥ ४ ॥
तद् भवान् खपुरं यातु रत्नान्यादाय पार्थिव ।
भरतश्च सहायार्थ पृष्ठतश्चानुयास्यति ॥ ५ ॥
' पृथ्वीनाथ! अब आप हमारे द्वारा भेंट किये गये ये रत्न लेकर अपनी राजधानीको पधारें । भरत ( तथा उनके साथ-साथ शत्रुघ्न भी ) आपकी सहायता के लिये आपके पीछे - पीछे जायँगे ' ॥ ५ ॥
* इस सर्गके बाद कुछ प्रतियोंमें प्रक्षिप्तरूपसे पाँच सर्ग
स तथेति ततः कृत्वा राघवं वाक्यमब्रवीत् ।
प्रीतोऽस्मि भवता राजन् दर्शनेन नयेन च ॥ ६ ॥
तब जनकजी बहुत अच्छा ' कहकर श्रीरामचन्द्र जीसे बोले – ' राजन्! मैं आपके दर्शन तथा न्यायानुसार व्यवहारसे बहुत प्रसन्न हूँ ॥ ६ ॥
यान्येतानि तु रत्नानि मदर्थं संचितानि वै ।
दुहित्रे तान्यहं राजन् सर्वाण्येव ददामि वै ॥ ७ ॥
' आपने मेरे लिये जो रत्न एकत्र किये हैं, वह सब मैं अपनी सीता आदि पुत्रियोंको देता हूँ ' ॥ ७ ॥
एवमुक्त्वा तु काकुत्स्थं जनको हृष्टमानसः ।
प्रययौ मिथिलां श्रीमांस्तमनुज्ञाय राघवम् ॥ ८ ॥
श्रीरामचन्द्रजीसे ऐसा कहकर श्रीमान् राजा जनक प्रसन्न-चित्त हो श्रीरामकी अनुमति ले मिथिलापुरीको चल दिये ||
ततः प्रयाते जनके केकयं मातुलं प्रभुम् ।
राघवः प्राञ्जलिर्भूत्वा विनयाद् वाक्यमब्रवीत् ॥ ९ ॥
जनेकजीके चले जानेके पश्चात् श्रीरघुनाथजीने हाथ जोड़कर अपने मामा केकय नरेश युधाजित्से, जो बड़े सामर्थ्य-शाली थे, विनयपूर्वक कहा – ॥ ९ ॥
इदं राज्यमहं चैव भरतश्च सलक्ष्मणः ।
आयत्तस्त्वं हि नो राजन् गतिश्च पुरुषर्षभ ॥ १० ॥
' राजन्! पुरुषप्रवर! यह राज्य, मैं, भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न- सब आपके अधीन हैं । आप ही हमारे आश्रय हैं ॥ १० ॥
राजा हि वृद्धः संतापं त्वदर्थमुपयास्यति ।
तस्माद् गमनमद्यैव रोचते तव पार्थिव ॥ ११ ॥
और उपलब्ध होते हैं, जिनमें वाली और सुग्रीवको उत्पत्तिका तथा रावण-के श्वेतद्वीप गमनका इतिहास वर्णित है । इस इतिहासके वक्ता भी अगस्त्यजी ही हैं । परंतु इसके पहले सर्ग में ही अगस्त्यजीके बिदा होने का वर्णन आ गया है; अतः यहाँ इन सगँका उल्लेख असङ्गत प्रतीत होता है । इसीलिये ये सर्ग यहाँ नहीं लिये गये हैं ।
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उत्तरकाण्डे अष्टात्रिंशः सर्गः १५५ ९ ' महाराज केकयराज वृद्ध हैं । वे आपके लिये बहुत चिन्तित होंगे । इसलिये पृथ्वीनाथ! आपका आज ही जाना मुझे अच्छा जान पड़ता है ॥ ११ ॥
लक्ष्मणेनानुयात्रेण पृष्ठतोऽनुगमिष्यते ।
धनमादाय बहुलं रत्नानि विविधानि च ॥ १२ ॥
" आप बहुत सा धन तथा नाना प्रकारके रत्न लेकर पधारें । मार्ग में सहायता के लिये लक्ष्मण आपके साथ जायँगे ' ॥
युधाजित् तु तथेत्याह गमनं प्रति राघव ।
रत्नानि च धनं चैव त्वय्येवाक्षय्यमस्त्विति ॥ १३ ॥
तब युवा जित्ने ' तथास्तु ' कहकर श्रीरामचन्द्रजीकी बात मान ली और कहा – ' रघुनन्दन! ये रत्न और धन सब तुम्हारे ही पास अक्षय रूपसे रहें ' ॥ १३ ॥
प्रदक्षिणं च राजानं कृत्वा केकयवर्धनः ।
रामेण च कृतः पूर्वमभिवाद्य प्रदक्षिणम् ॥ १४ ॥
फिर पहले श्रीरघुनाथजीने प्रणामपूर्वक अपने मामाकी परिक्रमा की, इसके बाद केकयकुलकी वृद्धि करनेवाले राज-कुमार युधाजित्ने भी राजा श्रीराम की प्रदक्षिणा की ॥ १४ ॥
लक्ष्मणेन सहायेन प्रयातः केकयेश्वरः ।
हतेऽसुरे यथा वृत्रे विष्णुना सह वासवः ॥ १५ ॥
इसके बाद केकयराजने लक्ष्मणजीके साथ उसी तरह अपने देशको प्रस्थान किया, जैसे वृत्रासुरके मारे जानेपर इन्द्रने भगवान् विष्णु के साथ अमरावतीकी यात्रा की थी ।
तं विसृज्य ततो रामो वयस्यमकुतोभयम् ।
प्रतर्दनं काशिपतिं परिष्वज्येदमब्रवीत् ॥ १६ ॥
मामाको विदा करके रघुनाथजीने किसीसे भी भय न माननेवाले अपने मित्र काशिराज प्रतर्दनको हृदयसे लगाकर कहा- ॥ १६ ॥
दर्शिता भवता प्रीतिर्दर्शितं सौहृदं परम् ।
उद्योगश्च त्वया राजन् भरतेन कृतः सह ॥ १७ ॥
' राजन्! आपने राज्याभिषेकके कार्य में भरत के साथ पूरा उद्योग किया है और ऐसा करके अपने महान् प्रेम तथा परम सौहार्द का परिचय दिया है ॥ १७ ॥
तद् भवानद्य काशेय पुरीं वाराणसीं व्रज ।
रमणीयां त्वया गुप्तां सुप्राकारां सुतोरणाम् ॥ १८ ॥
" काशिराज! अब आप सुन्दर परकोटों तथा मनोहर फाटकोंसे सुशोभित और अपने ही द्वारा सुरक्षित रमणीय पुरी वाराणसीको पधारिये ॥ १८ ॥
एतावदुक्त्वा चोत्थाय काकुत्स्थः परमासनात् ।
पर्यष्वजत धर्मात्मा निरन्तरमुरोगतम् ॥ १ ९ ॥
ऐसा कहकर धर्मात्मा श्रीरामने पुनः अपने उत्तम आसन से उठकर प्रतर्दनको छाती से लगा उनका गाढ़ आलिङ्गन किया ॥ १ ९ ॥
विसर्जयामास तदा कौसल्याप्रीतिवर्धनः ।
राघवेण कृतानुज्ञः काशेयो ह्यकुतोभयः ॥ २० ॥
वाराणसीं ययौ तूर्ण राघवेण विसर्जितः । इस प्रकार कौसल्याका आनन्द बढ़ानेवाले श्रीरामने उस समय काशिराजको विदा किया । श्रीरघुनाथजीकी अनुमति पाकर उनसे विदा ले निर्भय काशिराज तत्काल वाराणसीपुरी की ओर चल दिये ॥ २०३ ॥
विसृज्य तं काशिपति त्रिशतं पृथिवीपतीन् ॥ २१ ॥
प्रहसन् राघवो वाक्यमुवाच मधुराक्षरम् । काशिराजको विदा करके श्रीरघुनाथजी हँसते हुए अन्य तीन सौ भूपालोंसे मधुर वाणीमें बोले - ॥ २१३ ॥
भवतां प्रीतिरव्यग्रा तेजसा परिरक्षिता ॥ २२ ॥
धर्मश्च नियतो नित्यं सत्यं च भवतां सदा । ' मेरे ऊपर आपलोगोंका अविचल प्रेम है, जिसकी रक्षा आपने अपने ही तेजसे की है । आपलोगों में सत्य और धर्मं नियतरूपसे नित्य - निरन्तर निवास करते हैं ॥ २२३ ॥
युष्माकं चानुभावेन तेजसा च महात्मनाम् ॥ २३ ॥
इतो दुरात्मा दुर्बुद्धी रावणो राक्षसाधमः । ' आप महापुरुषोंके प्रभाव और तेजसे ही मेरेद्वारा दुर्बुद्धि दुरात्मा राक्षसाधम रावण मारा गया है ॥ २३३ ॥
हेतुमात्र महं तत्र भवतां तेजसा हृतः ॥ २४ ॥
रावणः सगणेो युद्धे सपुत्रामात्यबान्धवः । " मैं तो उसके वधमें निमित्तमात्र बना हूँ । वास्तवमें तो आपलोगोंके तेजसे ही पुत्र, मन्त्री, बन्धु बान्धव तथा सेवक-गणोंके सहित रावण युद्धमें मारा गया है || २४३ ॥ भवन्तश्च समानीता भरतेन महात्मना ॥ २५ ॥
श्रुत्वा जनकराजस्य काननात् तनयां हृताम् । ' वनसे जनकराजनन्दिनी सीताके अपहरणका समाचार
सुनकर महात्मा भरतने आपलोगों को यहाँ बुलाया था ।
उद्युक्तानां च सर्वेषां पार्थिवानां महात्मनाम् ॥ २६ ॥
कालोऽप्यतीतः सुमहान् गमनं रोचयास्यतः ।-' आप सभी महामना भूपाल राक्षसोंपर आक्रमण करने के लिये उद्योगशील थे । तबसे आजतक यहाँ आपलोगोंका बहुत समय व्यतीत हो गया है । अतः अब मुझे आपलोगों-का अपने नगरको लौट जाना ही उचित जान पड़ता है ' ॥ प्रत्यूचुस्तं च राजानो हर्षेण महता वृताः ॥ २७ ॥
दिष्ट्या त्वं विजयी राम खराज्येऽपि प्रतिष्ठितः । इसपर राजाओंने अत्यन्त हर्षसे भरकर कहा - ' श्रीराम! आप विजयी हुए और अपने राज्यपर भी प्रतिष्ठित हो गये, यह बड़े सौभाग्य की बात है ॥ २७३ ॥
दिष्ट्या प्रत्याहृता सीता दिष्ट्या शत्रुः पराजितः ॥ २८ ॥
एष नः परमः काम एषा नः प्रीतिरुत्तमा ।
यत् त्वां विजयिनं राम पश्यामो हतशात्रवम् ॥ २ ९ ॥
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१५६० श्रीमवाल्मीकीय रामायणे ' हमारे सौभाग्यसे ही आप सीताको लौटा लाये और उस प्रबल शत्रुको परास्त कर दिया । श्रीराम! यही हमारा सबसे बड़ा मनोरथ है और यही हमारे लिये सबसे बढ़कर प्रसन्नता की बात है कि आज हमलोग आपको विजयी देख रहे हैं तथा आपकी शत्रु- मण्डली मारी जा चुकी है । २८-२९ ॥
एतत् त्वय्युपपन्नं च यदस्मांस्त्वं प्रशंससे ।
प्रशंसा न जानीमः प्रशंसां वकुमीद्दशीम् ॥ ३० ॥
' प्रशंसनीय श्रीराम! आप जो हमलोगोंकी प्रशंसा कर रहे हैं, यह आपहीके योग्य है । हम ऐसी प्रशंसा करने की कला नहीं जानते हैं ॥ ३० ॥
आपृच्छामो गमिष्यामो हृदिस्थो नः सदा भवान् ।
वर्तामहे महाबाहो प्रीत्यात्र महता वृताः ॥ ३१ ॥
भवेव ते महाराज प्रीतिरस्मासु नित्यदा ।
बाढमित्येव राजानो हर्षेण परमान्विताः ॥ ३२ ॥
' अब हम आज्ञा चाहते हैं । अपनी पुरीको जायेंगे । जिस प्रकार आप सदा हमारे हृदयमें विराजमान रहते हैं, उसी प्रकार हे महाबाहो! जिसमें हमलोग आपके प्रति प्रेमसे युक्त रहकर आपके हृदयमें बसे रहें, ऐसी प्रीति आपकी हमपर सदा बनी रहनी चाहिये । ' तब श्रीरघुनाथजीने हर्षसे भरे हुए उन राजाओंसे कहा- ' अवश्य ऐसा ही होगा ' ॥ ३१-३२ ॥
ऊचुः प्राञ्जलयः सर्वे राघवं गमनोत्सुकाः ।
पूजितास्ते च रामेण जग्मुर्देशान् खकान् स्वकान् ॥३३ ॥
तत्पश्चात् जानेके लिये उत्सुक हो सबने हाथ जोड़कर श्रीरघुनाथजी से कहा – ' भगवन्! अब हम जा रहे हैं । " इस तरह श्रीराम से सम्मानित हो वे सब राजा अपने - अपने देश-को चले गये ॥ ३३ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये उत्तरकाण्डे अष्टात्रिंशः सर्गः ॥ ३८ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्धरामायण आदिकाव्य के उत्तरकाण्ड में अड़तीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ३८ ॥
एकोनचत्वारिंशः सर्गः राजाओंका श्रीराम के लिये भेंट देना और श्रीरामका वह सब लेकर अपने मित्रों, वानरों, रीछों और राक्षसोंको बाँट देना
ते प्रयाता महात्मानः पार्थिवास्ते प्रहृष्टवत् ।
गजवाजिसहस्त्रौघैः कम्पयन्तो वसुंधराम् ॥
अयोध्या से प्रस्थित हो वे महामना भूपाल सहस्रों घोड़े तथा पैदल - समूहोंसे पृथ्वीको कम्पित करते हुए - से पूर्वक आगे बढ़ने लगे ॥ १ ॥
अक्षौहिण्यो हि तत्रासन् राघवार्थे समुद्यताः ।
भरतस्याज्ञयानेकाः प्रहृष्टबलवाहनाः ॥
भरतकी आज्ञा से श्रीरामचन्द्रजीकी सहायताके लिये कई अक्षौहिणी सेनाएँ युद्ध के लिये उद्यत होकर आयी थीं सबके सैनिक और वाहन हर्ष एवं उत्साह से भरे हुए थे
ऊचुस्ते च महीपाला वलदर्पसमन्विताः ।
न रामरावणं युद्धे पश्यामः पुरतः स्थितम् ॥
वे सभी भूपाल बलके घमंड में भरकर आपसमें इस की बातें करने लगे — ‘ हमलोगोंने युद्ध में श्रीराम और को आमने - सामने खड़ा नहीं देखा ॥ ३ ॥
भरतेन वयं पश्चात् समानीता निरर्थकम् ।
हता हि राक्षसाः क्षिप्रं पार्थिवैः स्युर्न संशयः ॥
' भरतने ( पहले तो सूचना नहीं दी ) पीछे युद्ध हो जानेपर हमें व्यर्थ ही बुला लिया । यदि सब राजा गये उनके द्वारा समस्त राक्षसों का संहार बहुत जल्दी हो गया इसमें संशय नहीं है ॥ ४ ॥
रामस्य बाहुवीर्येण रक्षिता लक्ष्मणस्य च ।
सुखं पारे समुद्रस्य युध्येम विगतज्वराः ॥
तथा वानर आदिका वहाँ सुखपूर्वक रहना ' श्रीराम और लक्ष्मण के बाहुबलसे सुरक्षित एवं निश्चिन्त १ ॥ हो हमलोग समुद्रके उस पार सुखपूर्वक युद्ध कर सकते हाथी, थे ' ॥ ५ ॥
हर्ष - एताश्चान्याश्च राजानः कथास्तत्र सहस्रशः ।
कथयन्तः स्वराज्यानि जग्मुर्हर्षसमन्विताः ॥ ६ ॥
ये तथा और भी बहुत - सी बातें कहते हुए वे सहस्रों २ ॥ नरेश बड़े हर्ष के साथ अपने - अपने राज्यको गये ॥ ६ ॥
वहाँ स्वानि राज्यानि मुख्यानि ऋद्धानि मुदितानि च ॥ उन समृद्धधनधान्यानि पूर्णानि वसुमन्ति च ॥ ७ ॥
॥२ ॥ यथापुराणि ते गत्वा रत्नानि विविधान्यथ ।
रामस्य प्रियकामार्थमुपहारं नृपा ददुः ॥ ८ ॥
३ ॥ अश्वान् यानानि रत्नानि हस्तिना मदोत्कटान् ।
तरह चन्दनानि च मुख्यानि दिव्यान्याभरणानि च ॥ ९ ॥
रावण- मणिमुक्ताप्रवालांस्तु दास्यो रूपसमन्विताः ।
अजाविकं च विविधं रथांस्तु विविधान् बहून् ॥ १० ॥
उनके अपने - अपने प्रसिद्ध राज्य समृद्धिशाली, सुख और ४ ॥ आनन्दसे परिपूर्ण, धन - धान्यसे सम्पन्न तथा रत्न आदिसे भरे-समाप्त पूरे थे । उन राज्यों तथा नगरोंमें जाकर उन नरेशोंने श्रीराम-होते तो चन्द्रजीका प्रिय करने की इच्छासे नाना प्रकारके रत्न और होता, उपहार भेजे । घोड़े, सवारियाँ, रत्न, मतवाले हाथी, उत्तम चन्दन, दिव्य आभूषण, मणि, मोती, मूँगे, रूपवती दासियाँ, नाना प्रकारकी बकरियाँ और भेड़ें तथा तरह - तरहके बहुत - से ५ ॥ रथ भेंट किये ॥ ७-१० ॥
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उत्तरकाण्डे एकोनचत्वारिंशः सर्गः १५६१
भरतो लक्ष्मणश्चैव शत्रुघ्नश्च महाबलः ।
आदाय तानि रत्नानि स्वां पुरीं पुनरागताः ॥ ११ ॥
आगम्य च पुरीं रम्यामयोध्यां पुरुषर्षभाः ।
तानि रत्नानि चित्राणि रामाय समुपानयन् ॥ १२ ॥
महाबली भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न उन रत्नोंको लेकर पुनः अपनी पुरीमें लौट आये । रमणीय पुरी अयोध्यामें आकर उन तीनों पुरुषप्रवर बन्धुओंने ये विचित्र रत्न श्रीरामको समर्पित कर दिये ॥ ११-१२ ॥
प्रतिगृह्य च तत् सर्वं रामः प्रीतिसमन्वितः ।
सुग्रीवाय ददौ राज्ञे महात्मा कृतकर्मणे ॥ १३ ॥
विभीषणाय च ददौ तथान्येभ्योऽपि राघवः ।
राक्षसेभ्यः कपिभ्यश्च यैर्वृतो जयमाप्तवान् ॥ १४ ॥
उन सबको ग्रहण करके महात्मा श्रीरामने बड़ी प्रसन्नता-के साथ उपकारी वानरराज सुग्रीव और विभीषणको तथा अन्य राक्षसों और वानरोंको भी बाँट दिया क्योंकि उन्हींसे घिरे रहकर भगवान् श्रीरामने युद्धमें विजय प्राप्त की थी ॥१३-१४ ॥
ते सर्वे रामदत्तानि रत्नानि कपिराक्षसाः ।
शिरोभिर्धारयामासुर्भुजेषु च महाबलाः ॥ १५ ॥
उन सभी महाबली वानरों और राक्षसोंने श्रीरामचन्द्रजीके दिये हुए वे रत्न अपने मस्तक और भुजाओं में धारण कर लिये ॥ १५ ॥
हनूमन्तं च नृपतिरिक्ष्वाकूणां महारथः ।
अङ्गदं च महाबाहुमङ्कमारोप्य वीर्यवान् ॥ १६ ॥
रामः कमलपत्राक्षः सुग्रीवमिदमब्रवीत् ।
अङ्गदस्ते सुपुत्रोऽयं मन्त्री चाप्यनिलात्मजः ॥ १७ ॥
सुग्रीवमन्त्रिते युक्तौ मम चापि हिते रतौ ।
अर्हतो विविधां पूजां स्वत्कृते वै हरीश्वर ॥ १८ ॥
तत्पश्चात् इक्ष्वाकुनरेश महापराक्रमी महारथी कमलनयन श्री-रामने महाबाहु हनुमान् और अङ्गदको गोदमें बिठाकर सुग्रीवसे इस प्रकार कहा – ' सुग्रीव! अङ्गद तुम्हारे सुपुत्र हैं और पवनकुमार हनुमान् मन्त्री । वानरराज! ये दोनों मेरे लिये मन्त्रीका भी काम देते थे और सदा मेरे हित - साधनमें लगे रहते थे । इसलिये और विशेषतः तुम्हारे नाते ये मेरी ओरसे विविध आदर - सत्कार एवं भेंट पानेके योग्य हैं ' १६-१८
इत्युक्त्वा व्यपमुच्याङ्गाद् भूषणानि महायशाः ।
स बबन्ध महार्हाणि तदाङ्गदहनूमतोः ॥ १ ९ ॥
ऐसा कहकर महायशस्वी श्रीरामने अपने शरीरसे बहुमूल्य आभूषण उतारकर उन्हें अङ्गद तथा हनुमान् के अङ्गोंमें बाँध दिया ॥ १ ९ ॥
आभाष्य च महावीर्यान् राघवो यूथपर्षभान् ।
नीलं नलं केसरिणं कुमुदं गन्धमादनम् ॥ २० ॥
सुषेणं पनसं वीरं मैन्दं द्विविदमेव च ।
वा ० रा ० ५.११. १६ ---जाम्बवन्तं गवाक्षं च विनतं धूम्रमेव च ॥ २१ ॥
बलीमुखं प्रजङ्गं च संनादं च महाबलम् ।
दरीमुखं दधिमुखमिन्द्रजानुं च यूथपम् ॥ २२ ॥
मधुरं श्लक्ष्णया वाचा नेत्राभ्यामापिवन्निव ।
सुहृदो मे भवन्तश्च शरीरं भ्रातरस्तथा ॥ २३ ॥
युष्माभिरुद्धृतश्चाहं व्यसनात् काननौकसः ।
धन्यो राजा च सुग्रीवो भवद्भिः सुहृदां वरैः ॥ २४ ॥
इसके बाद श्रीरघुनाथजीने महापराक्रमी वानरयूथपतियों-नील, नल, केसरी, कुमुद, गन्धमादन, सुषेण, पनंस, वीर मैन्द, द्विविद, जाम्बवान्, गवाक्ष, विनत, धूम्र, बलीमुख, प्रजङ्घ, महाबली संनाद, दरीमुख, दधिमुख और यूथप इन्द्रजानुको बुलाकर उनकी ओर दोनों नेत्रोंसे इस प्रकार देखा, मानो वे उन्हें नेत्रपुटोंद्वारा पी रहे हों । उन्होंने स्नेह-युक्त मधुर वाणीमें उनसे कहा- ' वानरवीरो! आपलोग मेरे सुहृद्, शरीर और भाई हैं । आपने ही मुझे संकटसे उबारा है । आप जैसे श्रेष्ठ सुहृदोंको पाकर राजा सुग्रीव धन्य हैं ' ॥ २०-२४ ॥
एवमुक्त्वा ददौ तेभ्यो भूषणानि यथार्हतः ।
वज्राणि च महार्हाणि सखजे च नरर्षभः ॥ २५ ॥
ऐसा कहकर नरश्रेष्ठ रघुनाथजीने उन्हें यथायोग्य आभूषण और बहुमूल्य हीरे दिये तथा उनका आलिङ्गन किया ॥ २५ ॥
ते पिबन्तः सुगन्धीनि मधूनि मधुपिङ्गलाः ।
मांसानि च सुमृष्टानि मूलानि च फलानि च ॥ २६ ॥
मधुके समान पिङ्गल वर्णवाले वे वानर वहाँ सुगन्धित मधु पीते, राजभोग वस्तुओंका उपभोग करते और स्वादिष्ठ फल - मूल खाते थे || २६ ॥
एवं तेषां निवसतां मासः साग्रो ययौ तदा ।
मुहूर्तमिव ते सर्वे रामभक्त्या च मेनिरे ॥ २७ ॥
इस प्रकार निवास करते हुए उन वानरोंका वहाँ एक महीनेसे अधिक समय बीत गया; परंतु श्रीरघुनाथजी के प्रति भक्तिके कारण उन्हें वह समय एक मुहूर्तके समान ही जान पड़ा ॥ २७ ॥
रामोऽपि रेमे तैः सार्धं वानरैः कामरूपिभिः ।
राक्षसैश्च महावीर्यैर्ऋक्षैश्चैव महाबलैः ॥ २८ ॥
श्रीराम भी इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले उन वानरों, महापराक्रमी राक्षसों तथा महाबली रीछोंके साथ बड़े आनन्दसे समय बिताते थे || २८ ॥
एवं तेषां ययौ मासो द्वितीयः शिशिरः सुखम् ।
वानराणां प्रहृष्टानां राक्षसानां च सर्वशः ॥ २ ९ ॥
इक्ष्वाकुनगरे रम्ये परां प्रीतिमुपासताम् ।
रामस्य प्रीतिकरणैः कालस्तेषां सुखं ययौ ॥ ३० ॥
इस तरह उनका शिशिर ऋतुका दूसरा महीना भी सुख-